रविवार, 9 अगस्त 2020

बुरा करने वाले से व्यवहार

बुरा करने वाले से व्यवहार

अपने साथ बुरा करने वाले इन्सान से जब तक मनुष्य बदला नहीं ले लेता, उसके कलेजे में ठण्डक नहीं पड़ती। वह इस बात को पचा ही नहीं पता कि अमुक व्यक्ति ने उसका अहित क्यों और किसलिए किया? वह सोचता है कि उसने तो उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था। सब लोगों से अपनी सफाई देते हुए वह कहता फिरता है, "उस व्यक्ति विशेष की हिम्मत तो देखो, मेरे साथ उसने इतना बुरा किया।"
          यह वाक्य हर मनुष्य को सदा याद रहता है कि 'ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए।' इसी बात को संस्कृत भाषा में इस प्रकार कहते हैं-
          शठे शाठयं समाचरेत्।
                   तथा
     आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति:।
अर्थात् दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए। तथा दुष्टों का साथ सरलता का व्यवहार नहीं करना चाहिए।
          अपने गिरेबान में कोई भी मनुष्य झाँककर नहीं देखना चाहता। हर इन्सान समझता है कि वह दूध का धुला हुआ है। वही एक ऐसा मनुष्य है, जो सबके साथ अच्छा व्यवहार करता है। बाकी सब लोग उससे और उसकी तरक्की से जलते हैं। इसीलिए उसका बुरा चाहते हैं और करते भी हैं। वास्तव में ऐसा हो नहीं सकता कि एक मनुष्य ठीक हो और बाकी सारी दुनिया गलत हो।
           जब कोई किसी मनुष्य के साथ बुरा व्यवहार करता है, तब उसे एकान्त में बैठकर गहन चिन्तन करना चाहिए। उसे सारी स्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए। उसे जानना चाहिए कि इसका कारण क्या है? दूसरे मनुष्य को आखिर उस सीमा तक जाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? कहीं गलती उसी की तरफ से तो नहीं हो गई? बात इस हद तक बढ़ी ही क्यों?
          मनुष्य को निश्चित ही समझ आ जाएगी कि गलती कहाँ पर हुई। यदि अपनी गलती हो, तो क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। इससे अपने मन को शान्ति मिलती है। यदि दूसरे की गलती हो, तो उचित समय देखकर उसे अहसास करवा देना चाहिए। यदि वह पूर्वाग्रह से ग्रसित होगा, तो अकड़ जएगा और अपनी गलती स्वीकार नहीं करेगा। ऐसे मनुष्य से किनारा कर लेना श्रेयस्कर होता है।
           अपना अहित करने वाले का प्रतिकार करना हर मनुष्य अपना अधिकार समझता है। इसलिए उसके लिए योजना बनाने में वह जी जान से जुट जाता है। अनेक प्रकार से वह उसकी सफलता को परखता है। जब उसे विश्वास हो जाता है कि वह अपने विरोधी को मात दे देगा, तो वह आगे कदम बढ़ाता है। अब उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सामने वाला कितना शक्तिशाली है?
           यहाँ मैं एक बात कहना चाहती हूँ कि मनुष्य पहले अपने मन को दुखी करता है। यानी वह बदला लेने के विभिन्न तरीकों को सोचेगा। दूसरे का बुरा तो वह समय आने पर ही करेगा, पर स्वयं को बार-बार परेशान करता है। जैसे माचिस की एक तीली पहले स्वयं को जलाती है, फिर दूसरी वस्तुओं को जलती है। उसी प्रकार मनुष्य पहले स्वयं को जलता है, फिर दूसरों को जलाने का कार्य करता है।
          मनुष्य को एक बात सदा याद रखनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं होता। कबीरदास द्वारा लिखत निम्न दोहा देखिए-
बुरा जो देखने मैं चला बुरा न मिलया कोय।
जो मन खोजा अपना मुझसे बुरा न कोय।।
अर्थात्  जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
         मेरे विचार में बुरा करने वाले व्यक्ति से बदला लेना, समस्या का कोई हल नहीं है। दोष तो हर व्यक्ति में मिलते हैं। फिर किसी से शत्रुता मोल लेने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। शत्रुता का क्रम तो बहुत लम्बा  होता है। इसलिए उसे क्षमा करके उसे छोटेपन का अहसास करवा देना चाहिए। मनुष्य को पहल करके स्वयं को जलाने के स्थान पर महान बन जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 8 अगस्त 2020

वन्दनीय व्यक्ति

वन्दनीय व्यक्ति 

वन्दनीय व्यक्ति समाज मे वही कहलाता है, जो स्व से ऊपर उठकर पर के विषय में सोचे। परोपकारी मनुष्य सबकी आँख का तारा होते हैं। उनके सारे कार्य कलाप देश और समाज के हितार्थ होते हैं। सबके साथ वे समानता का व्यवहार करते हैं। उनके लिए कोई मनुष्य छोटा-बड़ा, छूत-अछूत, काला-गोरा नहीं होता। वे धर्म और जाति से परे होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी मनुष्य बिना भेदभाव के उनकी दृष्टि में एकसमान होते हैं।
         किसी कवि ने निम्न श्लोक में इन महानुभावों के विषय मे लिखा है-
          वदनं प्रसादसदनं 
                सदयं दयं सुधामुचो वाच:।
          करणं परोपकरणं 
                येषां केषां न ते वन्द्या:॥
अर्थात् जिसके मुख पर मुस्कान के साथ तेज हो, दिल दया से भरा हो, अमृत के समान वचन मुख से निकलते हों और वह परोपकार में तल्लीन हो। ऐसे  व्यक्ति किसके वन्दनीय नहीं होते यानी वे सबके वन्दनीय होते हैं।
         यदि मनुष्य इस व्यक्तित्व का बन जाए तो इस मानव-सभ्यता का वर्तमान बहुत बेहतर हो जाएगा। ऐसे महानुभाव जो सदा मधुर मुस्कान से स्वागत करें, दयालु हों, सबसे प्यार से बोलें, वे चिराग लेकर ढूंढने पर भी बड़ी कठिनता से मिलते हैं। समाज की भलाई के लिए इन लोगों को यत्नपूर्वक खोजना चाहिए। इन्हीं महान परोपकारी लोगों की बदौलत ही यह संसार गतिमान हो रहा है।
          'विदुरनीति:' के निम्न श्लोक में महात्मा विदुर पुण्यात्माओं के विषय में इस प्रकार कहते हैं-
     पुण्यं प्रज्ञा वर्धयति क्रियमाणं पुन:पुन:।
     वृद्ध प्रज्ञा पुण्यमेव नित्यमारभते नर:॥
अर्थात् बार बार पुण्य कार्य करने से बुद्धि  बढ़ती है। जिसकी विवेक बुद्धि बढ़ती है, वह व्यक्ति पुण्य ही करता है।
           विदुर जी का मत है कि बार बार पुण्य कार्यों के सम्पादन से मनुष्य की बुद्धि विकसित होती है। ऐसी विवेकी बुद्धि वाला मनुष्य पुण्यात्मा होता है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य पुण्यात्मा तभी बनता है, जव वह शुभ कर्म करता है। ऐसा मनुष्य स्वयं तो शुद्ध एवं पवित्र बनता है, साथ ही सब लोगों को भी उसी राह पर चलने की प्रेरणा देता है। लोग इस प्रेरक व्यक्ति के दिखाए मार्ग पर चलकर अपनेजीवन सफल कर लेते हैं।
            'मनुस्मृति:' में भगवान मनु साधू या सज्जन लोगों के विषय में इस श्लोक में कह रहे हैं-
न प्रहृष्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति।
न क्रुद्धः परुषं ब्रूयात् स वै साधूत्तमः स्मृतः॥
अर्थात् जो व्यक्ति सम्मानित किये जाने पर बहुत प्रसन्न नहीं होते हैं और अपमानित किये जाने पर क्रोधित नहीं होते, तथा क्रोधित होने पर भी अपशब्द या कठोर वचन नही बोलते हैं। ऐसे ही लोगों को महान साधु के रूप में सदैव याद किया जाता है।
           इस श्लोक में महान लोगों के बारे में यह कहा है कि वे सम्मानित किए जाने पर उछलते नहीं और अपमानित किए जाने पर क्रोध या उठा-पटक नहीं करते। क्रोध आने पर भी कड़वा नहीं बोलते। यह बहुत बड़ी विशेषताएँ हैं उनके जीवन की। यानी वे हर स्थिति में सम रहते हैं। वे अपनी कमियों को दूर करते हैं। उन्हें स्वयं पर नियन्त्रण रहता है। इसीलिए वे सब सहन कर पाते हैं।
         वास्तव में ये महानुभाव अपने दिव्य गुणों के कारण ही वन्दनीय होते हैं। इन्हें ही भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में स्थितप्रज्ञ की श्रेणी में रखा जा सकता है। सभी द्वन्द्वों को सहन करते हुए अपने जीवन को साधते हैं। मनुष्योचित कमजोरियों को दूर करके ही, समाज में विशेष स्थान प्राप्त करके ये लोग आम से खास बन जाते हैं। सम्माननीय बनकर ही ये समाज को दशा और दिशा प्रदान करते हैं।
          परोपकार करने वाले महान सज्जन सामने वाले से सहृदयतापूर्वक व्यवहार करके उसे जीत ही लेते हैं। इस प्रकार पुण्य कार्यों के करने से वे धीरे-धीरे पुण्यात्मा बन जाते हैं। अपने विवेक का सहारा लेते हुए ये निरन्तर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर होते रहते हैं। सबके साथ मधुर व्यवहार करने ओर दया-ममता रखने के कारण संसार में ये पूजनीय बन जाते हैं। इनके मार्ग का अनुगमन करने मनुष्य के कल्मष दूर हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

सख-दुख का खेल

सुख-दुख का खेल

सुख और दुख मनुष्य की दो भुजाओं की भाँति हैं, जिनमें से एक आगे बढ़ती है, तो दूसरी पीछे रहती है। यानी कभी दुख आगे बढ़कर मनुष्य को सताता है, रुलाता है और डराता है। कभी सुख आगे आकर मनुष्य को आशा देता है और हँसाता है। इस तरह दुख और सुख का यह खेल अनवरत ही चलता रहता है। मनुष्य चाहकर भी सुख और दुख के इस चक्र से बाहर नहीं निकल सकता।
           मनुष्य तराजू के दो पलड़ों पर सुख और दुख को रखकर तोलता रहता है। कभी उसके सुख का पलड़ा भारी हो जाता है, तो कभी उसके दुख का। मनुष्य सारा जीवन सुख के पलड़े को ही भारी होते हुए देखना चाहता है। परन्तु उसके चाहने मात्र से कुछ नहीं होता। एक बात तो निर्विवाद सत्य है कि दुख का अनुभव किए बिना, सुख का मूल्य मनुष्य को ज्ञात नहीं हो सकता।
            कवि ने बताया हैं कि सुख की अनुभूति कब सुखद होती है-   
     सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभते
            यथान्धकारादिवदीपदर्शनम्।
      सुखात्तु यो याति दशांदरिद्रतां 
            धृतः शरीरेण मृतः स जीवति॥
अर्थात् वास्तव में दुखों का अनुभव करने के बाद ही सुख का अनुभव शोभा देता है। जैसे घने अँधेरे से निकलने के बाद दीपक का दर्शन अच्छा लगता है। सुख से रहने के बाद जो मनुष्य दरिद्र हो जाता है, वह शरीर के होते हुए भी मृतक की तरह जीवित रहता है।
             कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि दुख को भोगने के बाद ही सुख का आनन्द मिलता है। अँधेरे का सामना किए बिना प्रकाश की कीमत पता नहीं चलती। चाहे दीपक का ही प्रकाश हो, अँधेरे के उपरान्त वह भी सुखदायक प्रतीत होता है। कारण स्पष्ट है कि अँधकार किसी को रुचिकर नहीं लगता। उसमें मनुष्य को कुछ भी नहीं दिखाई देता, उससे मनुष्य डरता है और वहाँ ठोकर भी खा जाता है। इसलिए उसे प्रकाश चाहिए।
          मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह सुखपूर्वक रहने के बाद दरिद्र हो जाए। दरिद्रता के पश्चात सुख-समृद्धि मिले तो मनुष्य सारी पुरानी कठिनाइयाँ भूल जाता है और उस ऐश्वर्य का भोग करके आनन्दित होता है। परन्तु सुख के बाद आने वाली दरिद्रता को वह पचा नहीं पाता। उस समय वह टूटकर बिखर जाता है और वह निराशा के अँधकूप में डूब जाता है। वह मनुष्य अपने जीवन से हार जाता है। ऐसी स्थिति में उस मनुष्य का जीवन मृतप्रायः हो जाता है।
            पतझड़ ऋतु की उदासी के पश्चात आने वाली वसन्त ऋतु सबके हृदयों को आह्लादित करने वाली होती है। चारों ओर के निराशाजनक माहौल को फल-फूलों से लदे पेड़ बदल देते हैं। सर्वत्र ही सुगन्ध का साम्राज्य हो जाता है। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु से होने वाले असह्य कष्टों से वर्षा ऋतु की रिमझिम बरसती फुहारें निजात दिलाती हैं। वे सम्पूर्ण प्रकृति में नवजीवन का संचार करती हैं।
            सुख-दुख का यह खेल धूप-छाँव की तरह चलता रहता है। ये दोनों चक्र के अरों की भाँति कभी ऊपर चले जाते हैं, तो कभी नीच आ जाते हैं। यह खेल लगातार इसी प्रकार चलता रहता है। मनुष्य को कभी भी, किसी भी स्थिति में हार नहीं माननी चाहिए। इसका अर्थ है कि मनुष्य को दुख आने पर रोना-चिल्लाना नहीं चाहिए और सुख आने पर अहंकारी बनकर हवा में उड़ना नहीं चाहिए।
           सुख और दुख दोनों ही मनुष्य की परीक्षा लेने के लिए आते हैं। इन स्थितियों में ही मनुष्य के धैर्य को परखा जाता है। जो इस निकष पर खरा उतरता है, वह अग्नि में तपाए गए सोने की तरह कुन्दन बनकर सफल हो जाता है। जो मनुष्य इस परीक्षा में असफल होता है, उसे दुबारा भट्टी में तपना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को हर स्थिति में द्वन्द्वों को सहन करना पड़ता है और स्थितप्रज्ञ बनना पड़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

पिता के प्रसन्न होने पर देवता प्रसन्न

पिता के प्रसन्न होने पर देवता प्रसन्न

पिता की महानता को वही मनुष्य समझ सकता है, जो सन्तान का पालन-पोषण करते हुए पिता की गई साधना को अनुभव करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सन्तान का पोषण करते समय पिता अपना सुख-चैन होम कर देता है। उसकी दुनिया। अपने बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है। उनकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वह कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात एक कर देता है। 
          पिता वह स्वयं भूखे रहकर अपने बच्चों के लिए भोजन का प्रबन्ध करता है। पिता अपनी सन्तान को कभी अभावग्रस्त नहीं देखना चाहता। अपनी शक्ति से भी बढ़कर एक पिता बच्चों के सुख के लिए परिश्रम करता है। वह अपने बच्चों को इतना योग्य बना देखना चाहता है कि वह अपने पैरों पर खड़ा होकर समाज में सिर उठकर चल सके और अपना स्थान प्राप्त कर सके। 
       जो व्यक्ति अपने पिता के इस तप का साक्षी बनता है और उसे समझता है, वह कभी उसका तिरस्कार नहीं कर सकता। वह निम श्लोक के भाव को आत्मसात कर सकता है। किसी कवि ने बहुत सुन्दर शब्दों में पिता के विषय में कहा है-
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्व देवताः।।
अर्थात् पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है, पिता परम तप है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
          कवि के अनुसार पिता धर्म है, तप है और तप है। यानी जो अपने पिता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म अथवा कर्त्तव्य समझता है, उसके लिए उससे बड़ा धर्म और कोई नहीं है। बच्चा जब युवा होकर कमाने-खाने लगता है। तब वह अपना परिवार बनाता है। उस समय उसका पिता आयुप्राप्त करने लगता है। यह उसके पिता की रिटायरमेण्ट की आयु कही जा सकती है।
          दूसरे शब्दों में पिता अपना कदम वृद्धावस्था में रखता है। यह वह समय होता है, जब मनुष्य का शरीर अशक्त होने लगता है। उसे बच्चों के मजबूत कन्धों के सहारे की आवश्यकता होती है। उस समय उनका ध्यान रखना, उनकी समुचित सेवा-सुश्रुषा करना, उनकी आज्ञा का पालन करना हर बच्चे का दायित्व बनता है। इन सबका पालन करना ही बच्चे का धर्म भी कहा जा सकता है।
          जो बच्चा अपना धर्म समझकर इनका पालन करता है, उसे किसी मन्दिर आदि में जाकर पूजा करने की आवश्यकता नहीं होती। वह अपने जीवित देवता यानी अपने माता-पिता की पूजा-अर्चना करता है। ऐसा करने से उसकी कीर्ति दूर-दूर तक प्रसारित होती है। उसके माता-पिता जब प्रसन्न होते हैं, तब उनका घर स्वर्ग के समान सुखदायक बन जाता है। माता-पिता के चरणों में ही स्वर्ग कहा जाता है।
          यह सब इसी तपश्चर्या से प्राप्त होता है। पिता के तप से बच्चा योग्य बनकर समाज में एक मुकाम प्राप्त करता है। पिता की तपस्या का ही परिणाम उसकी सन्तान होती है। उसकी सफलता उसके पिता के अथक परिश्रम की ही देन होती है। जो बच्चे इस बात को स्मरण रखते हैं, उनके घर में सुख-शान्ति का वास होता है। उनकी सुगन्ध को चारों ओर फैलने से कोई नहीं रोक सकता।
          इसके विपरीत जो बच्चे स्वार्थ में अन्धे हो जाते हैं, वे अपने माता-पिता की सुध नहीं लेते। वे बेचारे इस वृद्धावस्था में दर-बदर की ठोकरें खाते हैं, दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं। उनकी सेवा नहीं होती और न ही दवा-दारू होती है। उनकी कोई जरूरत पूरी नहीं होती। ऐसे अवज्ञाकारी बच्चों के सभी धर्म-कर्मों का पुण्य नष्ट हो जाता है क्योंकि उन्होनें अपने घर में बैठे हुए जीवित भगवान की पूजा नहीं की होती।
          पिता का स्थान आकाश से भी ऊँचा है। सन्तान को संसार में लाने के कारण उसे  देवता कहा जाता है। ऐसा पिता जब प्रसन्न होता है, तो सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। है न यह छोटा-सा गणित। बहुतों को खुश करने में इन्सान परेशान हो जाता है। एक खुश होता है, तो दूसरा नाराज हो जाता है। कवि कहता है कि केवल अपने पिता को प्रसन्न कर लो, सभी बन्धु-बान्धव, समाज और सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए उसकी प्रसन्नता का ध्यान प्रत्येक मनुष्य को यत्नपूर्वक करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 5 अगस्त 2020

मन का सयंम

 मन का संयम

मन को ध्यान के द्वारा एकाग्र किया जा सकता है। यद्यपि यह कार्य इतना सरल है नहीं, जितना कहने-सुनने में लगता है। एक ही बिन्दु, एक वस्तु या एक स्थान पर मन की वृत्ति को लगाया जा सकता है। ध्यान को धारणा के द्वारा पूर्ण किया जा सकता है। इससे मन की सजगता को शून्यता की ओर लेकर जाने में सफलता प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने मन को एकाग्र करने की आवश्यकता है।
         मनुष्य के मन में अपरिमित शक्तियाँ छिपी रहती हैं। उनका आलोड़न करना पड़ता है क्योंकि ये इधर-उधर बिखरी रहती हैं। मनुष्य का मन बिना कुछ सोचे, बहुत कुछ विचरता रहता है। उसके लिए किसी भूमिका विशेष की आवश्यकता नहीं होती। वह अनायास ही यहाँ वहाँ भटकता रहता है। यह किसी एक विषय पर अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकता। इसका कारण उसका चञ्चल होना है।
           सामान्य तौर पर यह मन अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करता। संयमी मन शक्तिशाली होता है। जबकि असंयमित मन दुर्बल होता है। मानसिकता शक्ति के लिए मन को एकाग्र करना आवश्यक होता है। मन के बिखरे विचारों को ध्यान या धारणा के अभ्यास से समेत सकते हैं। जब मनुष्य अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब वह सामने वाले के मन को प्रभावित करने में सक्षम हो जाता है।
           संयमित मन जो निर्णय लेता है, उसका पालन वह दूसरों से करवा सकता है। वह अपने कार्यों को टालता नहीं अपितु निश्चयपूर्वक कर लेता है। जब तक उसका उद्देश्य सफल नहीं होता, वह चैन की साँस नहीं लेता। इसीलिए सभी लोग उसके ही अनुसार चलने में कतराते नहीं हैं। ये लोग किसी भी क्षेत्र में हों, अपने इस मन के दृढ़ संकल्प के कारण ही महान बनते हैं। दूसरों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
          इसके विपरीत दुर्बल मन वाला स्वयं अपने ही निर्णय पर स्वयं अडिग नहीं रह पाता, तो उसकी बात को कौन सुनेगा? वह अपने कार्य कल पर टालता रहता है। फिर समय बीतते वह उसे भूल जाता है। ऐसी परिस्थितियों में उसे सफलता नहीं मिल पाती। वह रेस में पिछड़कर जगहँसाई करवाता है। अपने ऊपर यदि उसे क्रोध आ भी जाए, तो व्यर्थ है। अपनी आदतों को वह बदलता नहीं है।
          अपनी उन्नति चाहने वाले मनुष्य को सदा ही अपने मन को उन्नत रखना पड़ता है। तभी वह अपने कार्यों की गुणवत्ता बनाए रख सकता है। यदि मनुष्य का मन ही कमजोर हो जाएगा, तब उसका प्रत्येक कार्य निम्न कोटि का होगा। इस मन को संयमी या उच्चकोटि का बनाने के लिए अपने उद्देश्यों का  विश्लेषण करना पड़ता है। इसके लिए नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।
         मनीषियों के द्वारा मन को संयमित करना बहुत सरल कार्य है। भुल्ले शाह जी ने कहा है-
         भुल्लया मन दा की पाना
         एत्थों पुटना ओत्थे लाना
अर्थात् मन को प्राप्त कर लेना बहुत सरल है। उसे इधर से उखाड़कर उधर लगाना होता है। बात यह है कि चावल को एक स्थान पर बोया जाता हैं और फिर वहाँ से उखाड़कर दूसरे स्थान पर लगा दिया जाता है। तब अच्छी फसल होती है।
          इस तरह अपने इस चञ्चल मन को भी एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर लगाना होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मन के भटकाव को रोकने के लिए उसे स्थायित्व प्रदान करना होता है। यानी इस असार संसार के भौतिक कारोबार से हटाकर उस परमपिता परमात्मा की राह पर लगाना होता है। यह कोई सरल कार्य नहीं है, पर बार-बार अभ्यास करने पर यह नियन्त्रित हो जाता है।
          इस तरह अपने इस चञ्चल मन को भी एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर लगाना होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि मन के भटकाव को रोकने के लिए उसे स्थायित्व प्रदान करना होता है। यानी इस असार संसार के भौतिक कारोबार से हटाकर उस परमपिता परमात्मा की राह पर लगाना होता है। यह कोई सरल कार्य नहीं है, पर बार-बार अभ्यास करने पर यह नियन्त्रित हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

मन की शुद्धि

मनुष्य की शुद्धि

अपने तन और मन को शुद्ध करना ही शुद्धि कहलाता है। शरीर को शुद्ध करना बहुत सरल कार्य है। शरीर पर साबुन मला और जल लेकर स्नान कर लेने से मनुष्य का शरीर शुद्ध हो जाता है। परन्तु हमारा जो यह मन है, वह है कि शुद्ध और पवित्र होने का नाम ही नहीं लेता। इसे साबुन और जल से कदापि शुद्ध नहीं किया जा सकता। कितने ही जतन कर लो, पर यह धत्ता बता ही देता है। अब प्रश्न यह है कि मन को किस प्रकार शुद्ध किया जाए?
          'मनुस्मृति:' में भगवान मनु निम्न श्लोक में कहते हैं-
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्त मनः सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति॥
अर्थात् जल से शरीर शुद्ध होता है, सत्य से मन पवित्र होता है। विद्या और तप से जीवात्मा की शुद्धि होती है। ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है।
           कहने का तात्पर्य यह हैं कि शरीर बहुत से स्थानों पर जाता है। वह पूजा के स्थान पर भी जाता है। श्मशान में जाकर अपवित्र माना जाता है। इसी प्रकार परिश्रम करके पसीने से तरबतर हो जाता है, गर्मी से परेशान हो जाता है। यानी किसी भी कारण से शरीर में से गन्ध आने लगती है। ऐसी स्थिति में जल से स्नान कर लो तो वह शुद्ध हो जाता है। उसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर लो तो उसकी गन्दगी दूर हो जाती है।
           मनुष्य का मन जन्म-जन्मान्तरों के मल को लिए हुए है। इस मन को शुद्ध करना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य है। मनुष्य जितना सत्याचरण करता है, उतना ही यह शुद्ध होता जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सत्य की साधना करने से ही यह तपकर कुन्दन बनता है। समस्या यह है कि मन बहुत चञ्चल है। वायु से भी तीव्र गति से कहीं भी भागता चला जाता है। मन की गति रोके नहीं रुकती।
          संसार के आकर्षण इसे आकर्षित करते रहते हैं और मनुष्य का यह मन है जो विषय वासनाओं और मोहमाया के जाल में उलझता रहता है। इस उलझन को सुलझाने में महान मनीषी और साधु-सन्त लगे रहते हैं। यह दुष्ट मन बहुत ही कठिनाई से वश में होता है। 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि इस मन को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही वश में किया जा सकता है। 
           मनुष्य के शरीर में विद्यमान यह जीवात्मा विद्या और तप से शुद्ध होता है। परमात्मा का अंश आत्मा का ज्ञान विद्या से ही प्राप्त किया जा सकता है। तप से ही इसे साधा जा सकता है। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित नहीं करता तब तक वह अपने लक्ष्य मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। यह सारा ज्ञान विद्या से ही प्राप्त होता है। इस बात को निम्न उदाहरण से समझते हैं।
           'कठोपनिषद' में आत्मा को यात्री बताया गया है, जिसका रथ यह शरीर है। इन्द्रियाँ इस रथ के घोड़े हैं, मन इसकी लगाम है और बुद्धि सारथी है। जब सारथी रूपी बुद्धि मन रूपी लगाम से इन्द्रियों रूपी अश्वों को ठीक से नियन्त्रित करके, उचित मार्ग पर नहीं ले जाएगा, तब तक यात्री आत्मा अपने गन्तव्य मोक्ष तक नहीं पहुँच सकेगा। यह सब विद्या और तप से ही सम्भव हो सकता है।
          मनुष्य की बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। मनुष्य बाल्यकाल से युवावस्था तक विद्यार्जन करता है। उसका उद्देश्य योग्यता प्राप्त करना होता है। मनुष्य जितना ज्ञान अर्जित करता है, उतनी ही उसकी बुद्धि तीव्र होती है। यही बुद्धि की शुद्धता होती है। यदि मनुष्य ज्ञानार्जन न करे तो वह अज्ञ या मूर्ख कहलाता है। इस संसार का सार जानना आवश्यक है, जो केवल ज्ञान के द्वारा ही सम्भव है।
           इस चर्चा का सार यही है कि मनुष्य को इस शरीर, मन, आत्मा और बुद्धि को सदा शुद्ध रखना चाहिए। इन्हें शुद्ध करने के लिए जल, सत्य, विद्या, तप और ज्ञान की आवश्यकता होती है। शरीर के शुद्ध होने पर मनुष्य के पास बैठने वाले व्यक्ति को कठिनाई नहीं होती। मन शुद्ध हो जाए तो मनुष्य किसी से ईर्ष्या, द्वेष, घृणा नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्य स्वयं भी नहीं भटकता। 
            तप और विद्या से आत्मा के शुद्धिकरण से वह अपने मोक्ष के पथ पर अग्रसर होती है। तब उसे चौरासी लाख योनियों में आवागमन से छुट्टी मिल जाती है, अर्थात् उस समय आत्मा मुक्त हो जाती है। बुद्धि को ज्ञान के द्वारा शुद्ध किया जाता है, जिससे वह कुमार्ग का त्याग करके सदा सन्मार्ग पर चलती है। इसलिए इन चारों को मनुष्य को शुद्ध करते रहना चाहिए, ताकि इनमें विकार न आने पाए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 3 अगस्त 2020

कृतप्रतिज्ञ मनुष्य

 कृतप्रतिज्ञ मनुष्य

मनुष्य अपने जीवन में यदि कुछ भी करने की ठान ले, तो वह कर गुजरता हैं। लोग उसे कितना हतोत्साहित या निराश क्यों न करें, वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। यदि मनुष्य की लगन सच्ची है, तो फिर उसे किसी की आलोचना या प्रशंसा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऐसे व्यक्तियों को आम जन सिरफिरा कहते हैं, क्योंकि वे उनके ईमानदार और सच्चे यत्न को समझ ही नहीं पाते।
            इसी प्रकार नेक कार्य करने की दृढ़ प्रतिज्ञा करने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी कठिन नहीं होता। यदि व्यक्ति किसी काम को करने के लिए अपनी सामर्थ्य से जुट जाए, तो उसके रास्ते में आने वाली सारी मुश्किलें आसान हो जाती हैं। वह उन कठिनाइयों को तिनके की तरह तुच्छ समझता हुआ, आगे बढ़ता चला जाता है। पीछे मुड़कर देखना ऐसे व्यक्ति के स्वभाव में ही नहीं होता।
          निम्न श्लोक में कृतप्रतिज्ञ व्यक्ति के लिए कहा गया है-
      अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या 
            जलधि: स्थली च पातालम्।
      वाल्मिक: च सुमेरू: 
             कृतप्रतिज्ञाम्पस्य धीरस्य॥
अर्थात् कृतप्रतिज्ञ पुरुष के लिए सम्पूर्ण धरती घर के आँगन के समान होती है। अथाह सागर छोटी-सी नहर की तरह बन जाता है, पाताल लोक बगीचे जैसा दिखने लगता है और सुमेरू पर्वत चींटियों द्वारा बिल के बाहर रखी गई मिट्टी के समान हो जाता है। 
           कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि कृतप्रतिज्ञ व्यक्ति के लिए सारी पृथ्वी उसके घर का आँगन है। हमारी संस्कृति में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' यानी सारा संसार ही हमारा घर है। यहाँ कवि के द्वारा इसी भाव को उकेरा गया है। ऐसे विचार रखने वाले मनुष्य के लिए कोई भी प्राय नहीं होता। वह सभी को अपना मानता है। सारी धरा को घर का आँगन कहने का अर्थ ही यही है कि उसके घर-आँगन में बिना भेद-भाव के सबके लिए स्थान है।
           सबके विषय में सोचने वाले के लिए विशाल सागर एक छोटी-सी नदी के समान हो जाता है। समुद्र की विशालता उस व्यक्ति के व्यक्तित्व के समक्ष गौण हो जाती है। पाताल लोक उसे बगीचे की तरह दिखाई देता है। यानी धरती और पाताल उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। वह कहीं भी अपने दृढ़ संकल्प के कारण जा सकता है। उनकी दूरी उसके मार्ग में बाधक नहीं बनती।
          विशाल सुमेरू पर्वत उसके लिए ऐसा होता है, मानो चींटियों ने मिट्टी निकाल कर एक तरफ रख दी हो और उस मिट्टी ने पर्वत का रूप ले लिया हो। सुमेरू पर्वत उसके मार्ग की बाधा नहीं बनता, अपितु वह उसे सरलता से पार कर जाता है। यह श्लोक मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यदि मनुष्य की संकल्प शक्ति प्रबल हो, तो सागर की गहराई, पाताल लोक का भय अथवा पृथ्वी का विस्तार आदि उसके मजबूत इरादों को डिगा नहीं सकते।
           ऐसे कृत संकल्प मनुष्य के लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीव उसके अपने होते हैं। वे उसका अपना परिवार होते हैं। वह आकाश और पाताल सर्वत्र अपनी पैठ बनाए रखता है। उसे किसी से भी भय नहीं लगता। समुद्र तो मानो उसके लिए एक छोटी-सी नदी है, जिसे वह सरलता से पार कर सकता है। जहाँ चाहे, जब चाहे वह आवागमन कर सकता है। वह पर्वतों का सीन चीरकर, वहाँ से जनमानस के लिए मार्ग बना सकता है। 
           ये सभी कार्य उस व्यक्ति के लिए बाँए हाथ का खेल हैं, जो दृढ़प्रतिज्ञ है। वह व्यक्ति अपने मन सहित सभी इन्द्रियों को वश में करके, केवल अपने निर्धारित लक्ष्य का ही अनुसन्धान करता है। वह अपने इस उद्देश्य में सफल भी हो जाता है। समाज की दृष्टि में ऐसा वह मनुष्य माननीय बन जाता है। सभी लोग उसका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। यानी वह दिग्दर्शक बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद