सोमवार, 19 अगस्त 2019

बेटी का जन्म भाग्य से

बेटी का जन्म किसी सद्गृहस्थ के घर उस समय पर होता है, जब उनके भाग्य में पुण्यकर्मों की अधिकता होती है अथवा उनका उदय होता है। कितने ही ऐसे लोग हैं, जो एक बेटी के लिए तरसते है। उसके लिए जगह-जगह जाकर मन्नतें माँगते हैं, ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनकी झोली में बेटी को उपहार स्वरूप डाल दे। जब उनके घर बेटी का जन्म होता है, तो वे खुशियाँ मनाते हैं।
          वे बेटी के जन्म के उपलक्ष्य में पार्टी करते हैं, बन्धु-बान्धवों को उपहार देते हैं। उसके लिए शास्त्र सम्मत संस्कार करते हैं। उसकी हर इच्छा को पूर्ण करना अपना धर्म समझते हैं। अपनी हैसियत के अनुसार उसे अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं। बेटी को उच्च शिक्षा दिलाकर वे उसका भविष्य सँवारने में लगे रहते हैं। जब उनकी बेटी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, तब वे अपने इस जीवन को धन्य हो गया मानते हैं।
            घर में बेटी सदा अपनी माता की सहायता के लिए तत्पर रहती है। वह घर की सार-सम्हाल करती है। उसे सजाकर रखने का प्रयास करती है। समय-समय उसके लिए माता-पिता को परामर्श देती रहती है और उनके साथ जाकर घर के लिए खरीददारी भी करती है। उसे यही लगता है कि घर पर आने-जाने वाले सभी लोग उनके सलीके से सजे हुए घर की प्रशंसा करें।
            बेटी उच्च शिक्षा ग्रहण करके जब उच्च पद पर कार्यरत होती है, तो उसके माता-पिता की प्रसन्नता का पारावार नहीं होता। यही बेटियाँ समय पड़ने पर अपने माता-पिता की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में दिन-रात एक कर देती हैं। वे अपने नालायक भाइयों के भरोसे शारिरिक रूप से असहाय होते हुए माता-पिता को दर बदर की ठोकरें खाने के लिए कदापि अकेला नहीं छोड़तीं। अपितु उनके बुढ़ापे की लाठी बनकर उनकी सेवा करती हैं। उनकी जिम्मेदारी ओटती हैं।
          अनेक परिवारों में ऐसा देखा गया है, जहाँ सबसे बड़ी बेटी माता अथवा पिता की मृत्यु, घर की खस्ताहाल स्थिति आदि किसी भी कारण से अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने, उन्हें सेटल करने और उनके विवाह करने की जिम्मेदारी लेते हुए अपना सारा जीवन व्यतीत कर देती है। अपनी सारी खुशियों का बलिदान कर देती है। इन सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए, वह कब युवा से वृद्ध हो जाती है, उसे पता ही नहीं चलता।
          बेटी के माता-पिता की आर्थिक स्थिति जब उसके ससुराल के मुकाबले अच्छी नहीं होती, तब वह उनकी इज्जत रखती है। अपने पास से धन खर्च करके कह देती है कि उसे मायके से मिला है। बेटी की महानता इससे भी प्रकट होती है कि वह अपने माता-पिता के धन-दौलत को बिना माथे पर शिकन लाए, हँसते हुए अपने भाई के लिए छोड़ देती है। उसकी स्वयं की स्थिति चाहे कितनी ही खस्ता क्यों न हो।
       समाज में कुछ अपवाद अवश्य मिलते हैं, जहाँ बेटियाँ अपनी पैतृक सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं। ऐसी बेटियों का मायके से अलगाव हो जाता है और उनका अपने भाई-बहनों से भी सम्बन्ध विच्छेद भी हो जाता है। इसके विपरीत कुछ गिने-चुने ही माता-पिता ऐसे हैं, जो स्वेच्छा से बेटियों को अपनी सम्पत्ति का कुछ भाग उपहार में देते हैं।
          चाहे बेटियाँ अपने माता-पिता के पास रहें या रोजी-रोटी के कारण अपने परिवार के साथ देश-विदेश में कहीं अन्यत्र रहें। उनकी चिन्ता बेटियों को सदा रहती है। वे बस यही चाहती हैं कि उनके भाई-भाभी माता-पिता की देखभाल अपना दायित्व समझकर करें। उन्हें बोझ मानकर उनकी अवहेलना न करें। अन्त में यही कहना चाहूँगी की बेटियाँ मनुष्य को सौभाग्य से ही मिलती हैं। उनका सदा ही सम्मान करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 18 अगस्त 2019

लालच विनाश का कारक

मनुष्य का लालच उसे केवल सारा समय भटकाता रहता है। वह उसे किसी लायक नहीं छोड़ता। वह किसी एक वस्तु को पाने का लालच करता है, तो उसे पाने के तुरन्त बाद ही दूसरा लालच उसे घेरकर खड़ा हो जाता है। वह लालच के इस मकड़जाल में फँसा हुआ, बेबस होकर बस उससे मुक्त होने का उपाय तलाशता रहता है। परन्तु इसके चँगुल से बच निकलना मनुष्य के लिए सरल नहीं होता।
        वर्षों पहले इस विषय में एक कथा पढ़ी थी या किसी कक्षा में पढ़ाई थी। इस कथा के लेखक का नाम अब याद नहीं है। यह कहानी हृदय में एक गहरी  छाप छोड़ गई है। इस कहानी में लालच करने पर एक व्यक्ति को अपने प्राणों से ही हाथ धोना पड़ जाता है। यह हृदयस्पर्शी कथा आप सुधीजनों ने भी पढ़ी होगी और इस विषय पर मन्थन भी किया होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
         किसी समय एक व्यक्ति राजा के पास गया और उसने कहा, "वह बहुत गरीब है, उसके पास कुछ भी नहीं, उसे मदद की आवश्यकता है।"
          राजा बहुत दयालु था। उसने पूछा, "तुम्हें क्या मदद चाहिए?"
        आदमी ने कहा, "थोड़ा-सी जमीन दे दीजिए।"
       राजा ने कहा, “कल सुबह सूर्योदय के समय तुम दरबार में आना और तुम्हें जमीन दिखाई जाएगी। उस पर तुम दौड़ना और जितनी दूर तक तुम वहाँ दौड़ सकोगे, वह पूरा भूखण्ड तुम्हारा हो जाएगा। परन्तु यह ध्यान रखना कि जहाँ से तुम दौड़ना शुरू करोगे, सूर्यास्त तक तुम्हें वहीं लौटकर वापिस आना होगा। अन्यथा तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा।"
          राजा की बात सुनकर वह आदमी प्रसन्न हो गया क्योंकि उसकी मनोकामना पूर्ण होने वाली थी। ज्योंहि सुबह हुई वह आदमी सूर्योदय के साथ दौड़ने लगा, वह दौड़ता रहा और बस दौड़ता ही रहा। सूरज सिर पर चढ़ आया था, पर उस आदमी का दौड़ना नहीं रुक। वह हाँफता रहा, पर रुका नहीं। उसे लग रहा था कि थोड़ी-सी और मेहनत कर ले, तो फिर उसकी पूरी जिन्दगी आराम से बीतेगी।
          अब शाम होने लगी थी। आदमी को याद आया कि लौटना भी है, नहीं तो फिर कुछ नहीं मिलेगा। उसने देखा कि वह बहुत दूर चला आया था, अब बस उसे लौट जाना चाहिए। सूरज पश्चिम की ओर जा चुका था। उस आदमी ने पूरा दम लगाया कि वह किसी तरह लौट सके, पर समय तो तेजी से व्यतीत हो रहा था। उसे थोड़ी ताकत और लगानी होगी, वह पूरी गति से दौड़ने लगा। अब उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। वह थककर गिर गया और उसके प्राणों ने उसका साथ नहीं दिया, वे उसे छोड़कर चले गए।
           राजा यह सब देख रहा था। अपने सहयोगियों के साथ वह वहाँ गया, जहाँ आदमी जमीन पर गिरा था। राजा ने उसे गौर से देखा, फिर सिर्फ इतना ही कहा, "इसे सिर्फ दो गज़ जमीन चाहिए थी। यह व्यर्थ ही इतना दौड़ रहा था। इस आदमी को लौटना था, पर लौट नहीं पाया। वह ऐसे स्थान पर लौट गया, जहाँ से लौटकर कोई वापिस नहीं आता।"
         मनुष्य को अपनी कामनाओं की सीमाओं का ज्ञान ही नहीं होता। उसकी आवश्यकताएँ तो सीमित होती हैं, परन्तु इच्छाएँ अनन्त होती हैं। उसकी ये इच्छाएँ कब लालच के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं, उसे पता ही नहीं चलता। उनको पूरा करने के मोह में मनुष्य कभी वापिस लौटने की तैयारी नहीं कर पाता। यदि ऐसा करने में वह सफल हो जाता है, तो कहानी वाले उस युवक की तरह उसे बहुत देर हो चुकी होती है। तब तक वह अपना सब कुछ दाँव पर लगा चुका होता है। उसके  पास शेष कुछ भी नहीं बचता।
          हम सभी लोग अन्धी दौड़ में भाग ले रहे हैं। इसका कारण भी शायद किसी को नहीं पता। अपने जीवन के सूर्योदय यानी युवावस्था से लेकर, अपने जीवन के संध्याकाल यानी वृद्धावस्था तक हम सभी
बिना कुछ समझे हुए भागते जा रहे हैं। इस बारे में विचार ही नहीं करते कि सूर्य अपने समय पर लौट जाता है। उसी प्रकार मनुष्य भी इस दुनिया से खाली हाथ ही विदा ले लेता है।
       हम मनुष्य भी महाभारत काल के अभिमन्यु की भाँति इस लालच के चक्रव्यूह में प्रवेश करना तो जानते हैं, पर वापिस लौटना नहीं जानते। इसीलिए चारों ओर से आने वाले प्रहारों को न चाहते हुए भी झेलते रहते है। जीवन का सत्य मात्र यही है कि जो मनुष्य अपने लालच पर विजय प्राप्त करके लौटना जानते हैं, वही वस्तुतः में जीवन को जीने का वास्तविक सूत्र जानते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 17 अगस्त 2019

मेरा देश महान्

धन्य है वह देश, जहाँ के नागरिक अपने देश से प्रेम करने वाले होते हैं। ऐसे देश को उन्नति की ऊँचाइयों को छूने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती। ऐसे देशप्रेमी अपने देश को महान् बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। देश के नेताओं से, उनकी कार्यप्रणाली से उन्हें रोष हो सकता है। परन्तु वे ऐसा कोई देश विरोधी कार्य नहीं करते, जिससे उनके देश का सिर विश्व में दूसरे राष्ट्रों के समक्ष झुक जाए।
         यहाँ मैं जापान देश की बात कर रही हूँ, जो विश्व में एक अनूठा उदाहरण है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय सन् 1945 में मित्रदेशों ने उनके दो प्रदेशों हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम्ब गिराए गए थे। फलस्वरूप जापान के अनेक निर्दोष नागरिक काल कवलित हो गए और अनेक लोग अपाहिज हो गए थे। इतना सब होने पर जापान के लोगों ने हार नहीं मानी। आज टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में यह देश अग्रणी है। इसलिए उसका लोहा पूरा विश्व मानता है। उनकी बनाई  हुई वस्तुएँ पूरे विश्व में प्रयोग की जाती हैं।
         अपने देश जापान को दूसरों के सामने न झुकने देने वाली यह कथा मैंने बहुत बार पढ़ी है। इसे पढ़कर, इस पर विचार करके उनकी देशभक्ति पर सचमुच गर्व होता है। आप सुधीजनों की नजर में भी यह घटना अवश्य आई होगी। यह घटना कुछ इस प्रकार है।
         जापान में ट्रेन की सीट फटी हुई थी, एक जापानी नागरिक ने अपने बैग में से सुई धागा निकाला और सीट की सिलाई करने लगा।
          एक भारतीय नागरिक भी उसी ट्रेन में था उसने पूछा, "क्या आप रेलवे के कर्मचारी हैं?"
         उसने कहा, "नहीं मैं एक शिक्षक हूँ, मैं इस ट्रेन से हर रोज अप-डाउन करता हूँ , जाते वक्त इस सीट की खस्ता हालत देखकर वापस आते वक्त बाजार से सुई धागा खरीद लाया हूँ।"
           मुझे लग रहा था, "यदि कोई विदेशी नागरिक इस फटी सीट को देखेगा, तो मेरे देश का अपमान होग। यह सोचकर मैं इस सीट की सिलाई कर रहा हूँ।"
       जो नागरिक देश की इज्जत अपनी इज्जत समझता हो, जिस देश के नागरिकों की सोच महान हो, वह देश विकसित और महान बन जाता है, जापान आज इतना विकसित हो गया है कि हम उससे बुलेट ट्रेन खरीद रहे है।
           इस घटना का उल्लेख करने का तात्पर्य यही है कि अपने देश को प्यार करने का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता। जापान के लोग बहूत परिश्रमी होते हैं। वे लोग हमारे देशवासियों की तरह नित्य-प्रति हड़ताल करके काम नहीं रोकते या चक्का जाम नहीं करते। अपितु वे काली पट्टी बाँधकर और अधिक उत्पादन करते हैं। वे अपने नेताओं को इस प्रकार सकारात्मक चुनौती देते हैं।
           हमारे देश में हर समस्या को बड़े ही सामान्य तरीके से लिया जाता है। इसीलिए हमारे देशवासी मेरा भारत महान् का नारा लगाकर, इस विषय पर लेख लिखकर, भाषण देकर, टी.वी. डिबेट में हिस्सा लेकर या पोस्टर लगाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। वे यह सोच लेते हैं कि उन्होनें देश को महान् बना दिया है। बस इतने मात्र से ही वे अपना दायित्व पूर्ण हो गया समझ लेते है। यह सोच ही वास्तव में गलत है।
           देश को महान् बनाने के लिए इन सब टोटकों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि अपनी सोच की अग्नि को भड़काना होता है। उसके लिए अथक प्रयास करने पड़ते हैं। केवल जबानी जमा खर्च कर देने से देश की उन्नति नहीं हो सकती। जब सभी देशवासी मिल-जुलकर साझा प्रयत्न करते हैं, तभी देश आसमान छूने के योग्य बन सकता है तथा विश्ववन्दनीय बन सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 15 अगस्त 2019

दर्द ही दवा

मनुष्य जब बहुत अधिक दर्द सहन करने के लिए विवश हो जाता है, तब एक समय ऐसा भी आता है, जब वही दर्द उसकी दवा बन जाता है। उस दर्द को सहन करते-करते मनुष्य के मन में उस कष्ट को बर्दाश्त करने की शक्ति आ जाती है। तब वह दुख शायद उसके जीवन का एक अहं अंग बन जाता है, मानो यह दर्द उस मनुष्य का अभिन्न मित्र बन गया हो। उसके बिना जीने की कल्पना करना उस मनुष्य के लिए कठिन हो जाता है।
         एक उदाहरण लेते हैं, कई बार ऐसा होता है कि मनुष्य अपने किसी प्रियजन की प्रतिदिन प्रतीक्षा करता रहता है। उसका इन्तजार करते करते उसकी आँखें पथराने लगती हैं या थक जाती हैं। फिर धीरे-धीरे उसे इसकी आदत होने लगती है। उस समय की जाने वाली यही लम्बी प्रतीक्षा उसके जीवन का एक अहं हिस्सा बन जाती है। तब वास्तव में उसे उस इन्तजार को करने में ही एक प्रकार का आनन्द आने लगता है।
          कहने का तात्पर्य यह है कि काले घने बादलों के समान दुख-कष्ट अनायास ही बिनबुलाए मेहमान की तरह किसी मनुष्य के जीवन में डेरा जमा लेते हैं। बादलों की तरह बरसकर वे चले जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वातावरण से अन्धकार की चादर हट जाती है और प्रकाश हो जाता है। मनुष्य को ये दुख जब भोगने पड़ते हैं, उस समय वह दुखी होता है, रोता है। उससे उसे तभी मुक्ति मिलती है, जब उन कष्टों को वह भोग लेता है।
           यदा कदा ऐसे कष्ट भी जीवन में आ जाते हैं, जिनकी अवधि लम्बी होती है। अथवा अपने किसी प्रियजन का वियोग हो जाता है। उस कष्ट से उबर पाने में उसे वर्षों लग जाते हैं। इसी प्रकार व्यापार में हानि हो जाती है। जिसकी भरपाई करने में पूरा जीवन भी लग सकता है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाद, सुनामी, भूकम्प आदि दैवी आपदाओं के कारण मनुष्य असहाय हो जाता है।
           इन दैवी आपदाओं के कारण मनुष्य को लम्बे समय तक दुखों और परेशानियों को झेलना पड़ता है। मनुष्य इसे अपनी नियति मानकर सन्तोष कर लेता है। उसके पास और कोई उपाय भी तो नहीं होता। वह नियति के हाथों की कठपुतली बना बस अपने भविष्य को सुधारने का अथक प्रयास करता रहता है। कभी वह इस यत्न में सफल हो जाता है और कभी जीवन पर्यन्त उसे त्रासदी सहन करनी पड़ती है।
         इन्सान को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि उसका सपना क्यों पूरा नहीं हो रहा? यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि साहसी लोगों के इरादा कभी अधूरे नहीं रहते। देर-सवेर ईश्वर उन्हें अवश्य पूर्ण करता है। ईश्वर मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही फल देता है। जिस इन्सान के कर्म अच्छे होते है, उसके जीवन में कभी अँधेरा नहीं हो सकता। जिस जीव ने अपने पूर्वजन्मों में कुकर्म किए होते हैं, उसे उनका दुष्परिणाम इस जन्म में भुगतना ही पड़ता है।
           पूर्वजन्मों में जीव ने क्या शुभाशुभ कर्म किए, इस विषय में वह नहीं जानता। उसके पास इसे जानने का कोई तरीका भी नहीं है। इतनी सावधानी उसे बरतनी चाहिए। इस जन्म में उसे ऐसे कर्म कर लेने चाहिए, जिससे आगामी जन्मों में उसके ऊपर कष्टों और परेशानियों की छाया न पड़े। तब उसके जीवन में सुख का प्रकाश दीर्घकाल तक रहे। उस समय उसे स्वयं को एक भाग्यशाली इन्सान समझकर ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 12 अगस्त 2019

अकेलापन

अकेलापन मनुष्य के लिए किसी सजा से कम नहीं है, वह एक अभिशाप है। अकेलेपन का अहसास मनुष्य को भीतर तक तोड़ देता है। वह बिन बुलाए मेहमान की तरह बिना किसी आमन्त्रण के आ धमकता है और विदा होने का नाम नहीं लेता। घर के सदस्यों के द्वारा अनदेखा किए जाने पर भी वह किसी अड़ियल और ढीठ अतिथि की तरह जमकर बैठ जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि किसी के भी हृदय में वह अंगद की तरह पैर जमाकर गहरे बैठ जाता है।
         कभी-कभार कोई व्यक्ति अपने कार्यों से थक जाता है या अस्वस्थ होता है या किसी परेशानी से जूझ रहा होता है, तब वह अकेला रहना चाहता है, झल्लाता है। वह कुछ समय शान्ति से जीना चाहता है। उसकी यह चाहत कुछ ही पल के लिए होती है। वह सदा के लिए कभी अकेले नहीं रहना चाहता। कई बार दूसरों के साथ कदम मिलाकर न चल पाने के कारण या फिर समाज के रंग-ढंग, लोगों का व्यवहार देखकर मनुष्य स्वयं अकेले चलने के लिए विवश हो जाता है।
          अकेलापन अपने आप में बहुत ही कष्टकारी स्थिति का परिचायक है। मनुष्य अनजाने में ही अपने लिए अकेलेपन को आमन्त्रित कर लेता है। अकेलापन हमारा स्वयं का व्यवहार जाले की तरह बुन देता है और फिर मकड़े की तरह व्यक्ति उसमें जकड़ा रहता है। मनुष्य उससे बाहर निकलने के लिए भरसक प्रयास करता है, हाथ-पैर पटकता रहता है, पर उसमें सफल नहीं हो पाता।
          विचारों के उर्वरकों और समय के जल से सम्बन्ध रूपी पौधों की सिंचाई करनी पड़ती है। तभी मनुष्य के सम्बन्ध लम्बे समय तक चलते हैं। जिस प्रकार कुछ पौधे शीघ्र फलने-फूलने लगते हैं और कुछ सालों के उपरान्त। उसी तरह कुछ बन्धु-बान्धव भी निश्चित समयावधि तक मनुष्य साथ चलते हैं और कुछ जीवन पर्यन्त साथ निभाते हैं। उनकी पहचान करनी आवश्यक होती है। नहीं तो उनके धोखा देने पर मन निराश होकर अकेलेपन की चादर ओढ़ लेता है।
         पौधे हरे-भरे रहे सकें इसके लिए समय-समय पर पूरे मन से सिंचाई, निराई, गुड़ाई करनी होती है। यदि पौधे को सूर्य के प्रकाश में रखने के स्थान पर बन्द कमरे में ही रख देंगे तो बड़े वृक्ष न बनकर वे बोंजाई बन जाएंगे। ऐसे पौधे केवल सजावट के लिए होते हैं, उससे फल और फूल तो मिल सकते हैं, पर शीतल छाया नहीं मिल सकती। मनुष्य के सम्बन्ध मिलने-जुलने से या सम्पर्क बनाए रखने पर ही फलदायी होते हैं।
           यदि बन्धु-बान्धवों से दूरी बनाई जाए तो वे सम्बन्ध भी मुरझाने लगते हैं। वे केवल नाम के ही रह जाते हैं। उस समय मनुष्य की भी वही स्थिति होत्ती है, जो अपनों से कटकर अलग-थलग रहने लगता है। वह शीघ्र ही अपनों से दूर हो जाता है। तब स्वेच्छा से अपनाया गया उसका यह अकेलापन अन्ततः न उससे उगलते बनता है और न ही निगलते बनता है। वह अपने द्वारा चुने हुए अन्धेरों के मध्य कहीं खो जाता है।
           प्रसन्नचित व्यक्तियों से बिना किसी स्वार्थ के मिलने पर मनुष्य का मन चहकता है, खुश होता है, प्रसन्न रहता है। ऐसा मनुष्य कभी एकाकी नहीं हो सकता। वह सदा चारों ओर खुशियाँ ही बाँटता है और अजनबियों का स्वागत खुले दिल से करता है। वह लोगों को उसी प्रकार मोह लेता  है जैसे वृक्ष बादलों को आकर्षित करके वर्षा करवा लेते हैं।
          अन्त में इतना ही कहना चाहती हूँ कि दुर्भाग्य से मिले अकेलेपन को भी दूर करने का प्रयास करना चाहिए। समाज से कटकर नहीं रहना चाहिए। लोगों से इच्छा न होते हुए भी मिलते रहना चाहिए। परिस्थिति कैसी भी कयों न हो अपने लिए इस अकेलेपन का चुनाव करने का कठोर फैसला करने से पहले दस बार विचार अवश्य कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 11 अगस्त 2019

बेटियों को उड़ान भरने दो

माता-पिता को अपनी बेटियों को सदा ही प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। उन्हें ऊँची उड़ान भरने देनी चाहिए। वे जितना ऊँचा उड़ना चाहें, उन्हें उड़ने देना चाहिए। उनके पंख काटकर धरती पर गिराने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिए। जितना वे परिश्रम करेंगी, उतना ही सफलता के सोपानों पर अपने कदम रखेंगी। उनके लिए माता-पिता को रोल मॉडल बनना चाहिए।
          मैं आप सबसे यही कहना चाहती हूँ कि बेटी जिस भी क्षेत्र में अपना नाम रोशन करने चाहे, उसे वैसा करने के लिए उत्साहित करना चाहिए। आजकल किसी विशेष क्षेत्र में स्थान बनाना आवश्यक नहीं रह गया है। बेटी शिक्षा, खेल, राजनीति, ज्ञान-विज्ञान, नृत्य, संगीत, कला, खाना पकाना(Hotel managemenत) आदि किसी भी क्षेत्र में अपना नाम कमाने चाहे, तो उसे अपने मनपसन्द कार्य करने देना चाहिए।
         शिक्षा के क्षेत्र में तो सदियों से वह अपना कैरियर बनाती रही है। आजकल विभिन्न खेलों में बेटियाँ विश्व प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल ला रही हैं। राजनीति में देखें तो भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े गणतन्त्र की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी थीं और राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल बनीं। इसके अतिरिक्त विधान सभाओं और संसद
में अनेक महिलाएँ है। कितने प्रदेशों की मुख्यमन्त्री व राज्यपाल के पद को महिलाएँ सुशोभित कर रही हैं। भारत के बाहर विदेशों में वे उच्चायोग में राजदूत का पद भी सम्हाल रही हैं।
          चाहे फ़िल्म जगत हो या पत्रकारिता का क्षेत्र हो वे सर्वत्र अपना लोहा मानव रही हैं। नृत्य और संगीत के क्षेत्र में टी.वी. माता-पिता को अपनी बेटियों को सदा ही प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। उन्हें ऊँची उड़ान भरने देनी चाहिए। वे जितना ऊँचा उड़ना चाहें, उन्हें उड़ने देना चाहिए। उनके पंख काटकर धरती पर गिराने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिए। जितना वे परिश्रम करेंगी, उतनी सफलता के सोपानों पर अपने कदम रखेंगी। उनके लिए माता-पिता को रोल मॉडल बनना चाहिए।
          चाहे फ़िल्म जगत हो या पत्रकारिता का क्षेत्र हो वे सर्वत्र अपना लोहा मानव रही हैं। नृत्य और संगीत के क्षेत्र में टी.वी. पर  रिएल्टी शो में भी भाग लेकर वाहवाही लूट रही हैं। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी वे अपना परचम लहरा रही है। टी.वी. पर होने वाले रिएल्टी शो में भाग भी लेकर वे वाहवाही लूट रही हैं। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी वे अपना परचम लहरा रही है। कला के क्षेत्र में वे अपने देश और विदेश में प्रदर्शनियाँ लगाकर अपने झण्डे गाड़ रही हैं। आकाश से समुद्र तक उसकी पैठ सुविधापूर्वक हो रही है।        
          कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी क्षेत्र की चर्चा करें, तो योग्य बेटियों के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। वे हर मायने में लड़कों को पछाड़कर या पीछे छोड़कर बिना पीछे देखे आगे की ओर कदम बढ़ाती जा रही हैं। वे निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर होती जा रही हैं। उच्च पदों पर आसीन होती वे आज आर्थिक मोर्चे पर भी अपना कीर्तिमान स्थापित करती जा रही है।
          इस आलेख को लिखने का उद्देश्य मात्र यही है कि आज बेटियों के लिए कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है। सर्वत्र उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा रहा है। ऐसी बेटियों पर उनके माता-पिता को तो गर्व होता ही है, देश का मस्तक भी ऊँचा हो जाता है। धन्य है वे माता-पिता जिन्होंने ऐसी बेटियों को जन्म दिया है। जिनके प्रोत्साहन से आज बेटियाँ आकाश छू रही हैं। उन पर देश और समाज को उन पर गर्व है।
चन्द्र प्रभा सूद
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