शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक कला विशेष है। इस कला में हर कोई निपुण नहीं हो सकता। वैसे व्यक्ति इस कला में निपुणता हासिल न ही करे तो अच्छा है। इस शब्द का प्रयोग लोग गाली के रूप में करते हैं। चमचा, चुगलखोर, बॉस का कुत्ता आदि कहकर लोग उनके सामने अथवा पीछे उनका उपहास उड़ाते हैं। इन चिकने घड़ों को इस विशेषण से कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे उल्टा खुश होते हैं। इस चुगलखोरी की नामुराद आदत को हम नकारात्मक सोच का नाम दे सकते हैं। प्राय: लोग इस आदत को पसन्द नहीं करते। 
             अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए ये चुगलखोर दूसरों की यानी अपने साथियों की पीठ में छुरा भौंकने जैसा निकृष्ट कार्य करते हैं। ऐसा दुष्कृत्य करने वालों से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उन्हें देखते ही प्रायः लोग अपनी बात का रुख मोड़ देते हैं। लोग उनके सामने ऐसी कोई भी बात करने से कतराते हैं जिसको तोड़-मरोड़कर वे अपने लाभ के लिए उपयोग कर सकें। जबान का यह कुटेव एक इन्सान को सबकी नजरों से गिरा देता है। 
              लोग यही सोचते हैं कि जब दूसरों की चुगली करके अमुक व्यक्ति हमारे सामने वाहवाही लूटना चाहता है तो फिर अन्यों के समक्ष अवश्य ही हमारी बुराई भी करता होगा। ऐसे लोग हमारे आसपास सर्वत्र ही उपलब्ध रहते हैं। कार्यालयों में कम्पनी के स्वामी अथवा बॉस ऐसे चुगलखोरों को पालते हैं जो आफिस में बैठे हुए उन्हें अपने साथियों के विषय में बताते रहें। 
             ग्यारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कश्मीरी कवि और विद्वान क्षेमेन्द्र हैं। 'नर्ममाला' उनके द्वारा रचित एक प्रमुख व्यंग्यात्मक काव्य है। इस ग्रन्थ में उन्होंने तत्कालीन समाज, भ्रष्ट अधिकारियों और  कर्मचारियों की बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है। यह कृति सामाजिक व्यंग्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। चुगलखोर नामक प्राणि के विषय में 'नर्ममाला' में कहा गया है -
       पिशुनेभ्य:नमस्तेभ्य: यत्प्रसादान्नियोगिन:।
       दूरस्था अपि जायन्ते सहस्त्रश्रोत्रचक्षुष:॥
अर्थात् उन चुगलखोरों को नमस्कार है जिनकी कृपा से स्वामी दूर रहते हुए भी हजार आँख और कान वाले हो जाते हैं।
              इसका तात्पर्य यही है कि किसी भी कार्यालय में कार्य करने वाले स्वामी यदि दूर भी बैठे हों तब भी उनको ऑफिस की खबरें देने वाले उनके चमचे वहाँ विद्यमान रहते हैं। वे उन्हें आँखों देखी सारी खबरें देते रहते हैं। वे नमक-मिर्च लगाकर सारी झूठी-सच्ची खबरें बताने का अपना कार्य बड़ी कुशलता से निभाते हैं। इन चुगलखोरों को बॉस भी कोई महत्त्व नहीं देते। सिर्फ स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ही बॉस इनको मुँहलगा बनाते हैं। अपना काम पूरा हो जाने पर वे इन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फैंकने से भी परहेज नहीं करते।
          इस चुगलखोरी के दूरगामी परिणाम भयंकर होते हैं। ये लोग अपनी दुश्मनी निकालने के लिए बॉस के कान भरते हुए अनजाने में अपने साथियों का अहित कर बैठते हैं। पण्डित विष्णु शर्मा रचित 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक इसी भाव को स्पष्ट करती है -
        अहो खलभुजङ्गस्य विपरीतो वचक्रम:।
        कर्णे लगति चैकस्य प्राणैरन्यो वियुज्यते॥
अर्थात् यह आश्चर्य की बात है कि इस चुगलखोर रूपी सर्प के मारने का उपाय ही विपरीत प्रकार का है। वह एक के कान में डसता है पर प्राणों से कोई दूसरा ही वियुक्त होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि कवि चुगलखोर को साँप की संज्ञा दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि इनके मारने का तरीका बहुत विचित्र है। यह किसी एक व्यक्ति के कान में अपनी चुगली का विष उगलता है परन्तु उससे किसी दूसरे व्यक्ति का विनाश होता है।
            चुगलखोरी रूपी निन्दा पुराण दूसरे का अहित तो करता ही है, स्वयं अपने लिए भी गड्ढा खोदता है। दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में मनुष्य हर जगह अपनी हानि कर बैठता है। ऐसे व्यक्ति हमेशा ही अविश्वसनीय होते हैं। अत: उन पर कोई विश्वास नहीं करता। ऐसा कुकृत्य करता हुआ मनुष्य अपने अन्तस् के विचारों को दूषित करता है। इस चुगली रूपी मल से अपने अन्त:करण की शुद्धि करना बहुत कठिन हो जाता है। जीवन के अन्त अर्थात् मृत्यु के बाद भी ऐसे लोगों का नाम सभी हिकारत से लेते हैं।
            प्रयास यही करना चाहिए कि इस बुराई के घर से यथासम्भव दूर ही रहा जाए। अपने क्षणिक तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति करते हुए मनुष्य को अपना इहलोक और परलोक बिगड़ने नहीं देना चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत सावधान रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

स्वर्णिम अवसर

स्वर्णिम अवसर

उन्नति करने के लिए हर मनुष्य को उसके जीवन काल में एक स्वर्णिम अवसर ईश्वर की ओर से अवश्य मिलता है। समझदार मनुष्य उस अवसर को पहचान लेता है और उसका सदुपयोग कर लेता है। उस समय वह अपने जीवन में ऊँचाइयों को छू लेता है। मनुष्य वह सब प्राप्त कर लेता है जो उसे समाज में एक विशेष स्थान प्रदान करता है। परन्तु यदि वह किसी भी कारण से आया हुआ मौका अपने हाथ से गँवा देता है तो कोई गारण्टी नहीं कि वह पल फिर से उसके जीवन काल में कभी दुबारा आएगा भी अथवा नहीं।
            पण्डित विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक में यह श्लोक लिखा है जो इसी सार को समझाता हुआ हमें कह रहा है  -
      कालोहि सकृदभ्येति यन्नरं कालाङ्क्षिणम्।
       दुर्लभ: स पुनस्तेन कालकर्माचिकीर्षता॥
अर्थात् सुअवसर के इच्छुक पुरुष को, वह उसके जीवन में एक ही बार प्राप्त होता है। उस समय जो पुरुष कार्य नहीं करता, पुन: वह उसे वह अवसर प्राप्त नहीं होता।
             ईश्वर हमें बारबार ऐसे अवसर नहीं देता। हमें स्वय ही अपने विवेक से उसका उपयोग करना होता है। यदि हम अपने अहं में चूर होकर अथवा आलस्यवश उस समय कोई योजना क्रियान्वित करके सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे तब हमारा भाग्य भी फलदायी नहीं होगा। इसका कारण यही है कि भाग्य से मिले सुअवसर के समय पुरुषार्थ नही किया, उसे गॅंवा दिया।
          'हरिवंश पुराण' भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुए कह रहा है-
           न मुह्यति प्राप्तकृतां कृती हि।
अर्थात् कुशल मनुष्य उचित अवसर पर कार्य करने से नहीं चूकते।
          हमारे मनीषी हमें समय-समय पर जगाते रहते हैं परन्तु हम हैं जो कान में तेल डालकर बैठे रहते हैं। उनके समझाने को हम अपने अहं में आकर अनदेखा कर देते हैं। अपने आराम में खलल हमें जरा भी पसन्द नहीं आता। 'हमारा मन होगा तो हम जाग जाएँगे नहीं तो सोते रहेंगे किसी के पेट में दर्द क्यों होता है' - हमारा यही रवैया हमें अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के लिए मजबूर करता है। अवसर चूक जाने पर यदि पश्चाताप करते हैं तो कोई लाभ नहीं होता।
            आजीवन हम उस एक पल के लिए तरसते रहते हैं जिसे पाकर हम सफल व्यक्ति बनकर वाहवाही लूट सकते थे। सबकी आँखों का तारा बन सकते थे। काश ऐसा हो सकता अथवा हम उस पल को ही वहीं रोककर रख पाते। हम तो बस सदा उस पल को कोसते रहते हैं जिसका हम किसी भी कारणवश सदुपयोग नहीं कर सके। उस समय हमारे किन्तु, परन्तु अथवा काश आदि कुछ भी काम नहीं आते।
            अवसर को चूकने वाले मनुष्य से बढ़कर मूर्ख और कोई नहीं होता। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य अपनी मूर्खता को ढकने के लिए सौ-सौ बहाने गढ़ता रहता है। और कुछ नहीं तो यह रटा-रटाया वाक्य तो बोल ही सकता है - 
        यदि दुर्भाग्य ही प्रबल हो तो मनुष्य क्या 
           कर सकता है?
              ऐसे ही व्यक्ति होते हैं जो अपने पूरे जीवन में नाकामयाबी का बोझ ढोते रहते हैं। अपने घर-परिवार और समाज में एक असफल व्यक्ति का टेग लगाकर घूमते हैं। उन्हें अपनी पत्नी, बच्चों और अन्य परिवारी जनों से कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता है। उनके जीवन के ये सबसे अधिक दुखदायी पल होते हैं। उनके अपने भी उन्हें कौंचने के बहाने ढूँढते रहते हैं।
          यदि उनसे यह पूछा लिया जाए कि 'क्या तुमने कुछ यत्न किया था, मौके का लाभ उठाने का, जिसे तुमने गँवा दिया है?' उनके पास इस प्रश्न का कोई सही उत्तर होता ही नहीं है। वे बस इधर-उधर की बातें करके टाल-मटोल करते रहते हैं। इसीलिए वे अपने जीवन से सदा मायूस रहते हैं। अपनी नाकामयाबी का ठीकरा ईश्वर पर फोड़ते हुए उसे लानत-मलानत करते हैं। उससे शिकवा-शिकायत करते नहीं अघाते।  
             मनुष्य को जीवन में हर समय सावधान रहना चाहिए। मिलने वाले सुअवसर का लाभ उठाने का मौका उसे मिल सके। उसे व्यर्थ गँवाकर मनुष्य को पश्चाताप न करना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

गुरुता और लघुकथा दो अवस्थाऍं

गुरुता और लघुता दो अवस्थाएँ

मनुष्य छोटा है अथवा बड़ा, यह हमारे मस्तिष्क की सोच है। हम लोग मनुष्य को उसके धन-वैभव से आँक लेते हैं कि अमुक व्यक्ति महान है अथवा अमुक व्यक्ति तुच्छ है। यदि व्यक्ति विपन्न अवस्था में है अथवा अपना गुजर-बसर मात्र कर सकता है, तो उसे छोटा कह दिया जाता है। इसके विपरीत यदि वह व्यक्ति जो सभी सुख-साधनों से सम्पन्न है और समय-समय पर अपने वैभव का प्रदर्शन करता है, दूसरों को उपकृत सकता है। उसे हम लोग आम बोलचाल में बड़ा आदमी कह देते हैं।
             महाराज भर्तृहरि ने 'नीतिशतक' में इस कथन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है -
        परिक्षीण: कश्चित्स्पृहति यवानां प्रसृतये।
       स पश्चात्सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसम्।।
       अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्षेषु धनिना-
       मवस्था वस्तूनी प्रथयति च सङ्कोचयति च॥
अर्थात् जो दरिद्र एक मुट्ठी भर जौं की इच्छा करता है, वही सम्पन्न होने पर सारे संसार को तुच्छ समझने लगता है। लघुता और गुरुता निश्चित नहीं हैं। ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा अथवा बड़ा बनाती हैं और वस्तुओं को संकुचित या विस्तृत बनाती हैं।
            इस श्लोक से हम यही समझ सकते हैं कि जब मनुष्य को खाने के लाले होते हैं तो वह दरिद्र कहलाता है। परन्तु जब दैवयोग से उसे ऐश्वर्य की प्राप्त हो जाती है तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। इसका कारण है कि वह धनवान या वैभवशाली बनकर देश, धर्म व समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण ईकाई बन जाता है। समाज में उसकी पूछ होने लगती है। लोग उसे सम्मानित करने लगते हैं। हर स्थान पर उसकी उपस्थिति की आकाँक्षा करते हैं।
              यहीं से मनुष्य की चारित्रिक गिरावट आरम्भ होने लगती है। भौतिक धन-दौलत पाकर मनुष्य फूला नहीं समाता। वह सारे संसार को हिकारत की नजर से देखने लगता है। अपने समक्ष उसे दूसरे लोग बौने दिखाई देने लगते हैं। वह स्वयं को भगवान मानकर अकड़ने लगता है। वह सारी दुनिया को देख लेने और आग लगा देने की बातें करने लगता है। जीवन के उस उत्कर्ष काल में वह यह बात भी भूल जाता है कि घमण्डी का सिर नीचा हो जाता है।
          भर्तृहरि जी ने कहा है कि लघुता और गुरुता निश्चित नहीं होतीं। छोटा होने या महान होने की ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा या बड़ा बनाती हैं। वस्तुओं को देखने का मनुष्य का जो नजरिया है, वही उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाता है। यह संसार भी वही है और संसारी जन भी वही हैं। उन सबको हम वैसा ही देखते हैं जैसा देखना चाहते हैं। हमारा दृष्टिकोण ही उनमें धर्म, जाति, रंग, रूप आदि की  दीवारें खड़ी करते हैं। उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाने का कार्य हम लोग ही करते हैं।
            अपनी इस नश्वर भौतिक सम्पदा पर कभी भी मनुष्य को वृथा अभिमान नहीं करना चाहिए। यह सब इसी संसार का है और यहीं शेष रह जाता है। मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाता है। उसके सभी महल-दोमहले जो इसी दुनिया की अमानत हैं, उसे मुस्कुराते हुए, मुँह चिढ़ाते हुए अन्तिम विदाई दे देते हैं। उसे यह अहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि हमें पाने के लिए जो भी जायज-नाजायज रास्ते तूने खोजे, वे सब व्यर्थ हैं। तू इनका भोग कितना कर पाया, तू ही जान। हम तो यहीं तक के तेरे साथी थे। अब तू अपने रास्ते चला जा और हम अपने इस जहान में रहेंगे।
             इसलिए जिस भी अवस्था में रहे उसे सारे संसार को तुच्छ समझने के बजाय यह भाव रखना चाहिए कि हम तो इस सारे ऐश्वर्य के रक्षक मात्र हैं। देने वाला तो वह मालिक है जो हमारी सारी मनोकामनाओं को देर-सवेर पूरा करता है। यही विचार करते हुए कर्त्तापन के भाव से मनुष्य को विमुख रहना चाहिए। ऐसा करता हुआ मनुष्य गुरुता और लघुता की भावना से मुक्त हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

कौन-सा शत्रु अवध्य

कौन-सा शत्रु अवध्य?

हमारे ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि हत्या बहुत बड़ा अपराध कहलाता है। किसी भी व्यक्ति को कारण-अकारण जान से मार देना कोई बड़ा बहादुरी का कार्य नहीं होता। किसी मनुष्य ने यदि गलती की है तो उसे सुधारना चाहिए। उसे जान से मार देना कोई हल नहीं होता। इसलिए प्रत्येक सामर्थ्यवान व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि वह यथासम्भव असहायों की रक्षा करे। यहाँ हम चर्चा करेंगे कि किन-किन मनुष्यों का वध न करके उनकी रक्षा करना कर्त्तव्य होता है।
              महर्षि वाल्मीकि ने 'वाल्मीकि रामायण' में इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-
       अयुद्धयमानं प्रच्छन्न प्राञ्जलिं शरणगतम्।
        पलायन्तं प्रमत्त वा न त्वं हन्तुमिहार्हसि॥
अर्थात् बिना शस्त्र के, छिपा हुआ, हाथ जोड़े हुए ,  शरण में आए हुए, पलायन करने वाले अथवा उन्मत्त (पागल) व्यक्ति का वध करना उचित नहीं होता है।
             इसी विषय पर 'हिंगुलप्रकरण' में प्रकाश डालते हुए कहा है-झ
       यो दधाति तृणं वक्त्रा प्रत्यनीकोSपि मानवो।
        सोSवध्य: सतां लोके कथं वध्यातृणादना:
अर्थात् जो शत्रु अपने मुख में तृण ले लेता है, वह अवध्य होता है। यानी उस व्यक्ति का वध नहीं किया जाता। 
            जो व्यक्ति निहत्था है, उस पर वार करना अनुचित कृत्य होता है। हथियारों से लैस व्यक्ति यदि निरपराधियों को मौत के घाट उतार देता है तो इसे कायरता ही कहा जाएगा। वास्तव में असहाय व्यक्ति की हत्या करने को कोई भी सही नहीं ठहरा सकता। अपने बराबर के लोगों से यदि युद्ध किया जाए तो उसका परिणाम द्रष्टव्य होता है।
            जो व्यक्ति छिपा हुआ है, उस पर भी वार नहीं करना चाहिए। प्राचीनकाल में युद्ध के मैदान में भी ऐसा न करने के लिए कहा जाता था। हो सकता है कि डर के कारण छिप जाने वाला निर्दोष हो। इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं कि छिप जाने वाले व्यक्ति ने मानो बिना लड़े‌ ही अपने हथियार डाल दिए हैं। जो व्यक्ति पहले ही डरा हुआ है या अपनी हार स्वीकार कर रहा है तो उसका शव करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
             जो व्यक्ति हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा है, क्षमायाचना कर रहा है, उसे मारकर भी कोई तमगा नहीं मिल सकता। उसे यदि क्षमा कर दिया जाए तो वाह-वाही अवश्य मिल सकती है। ऐसा व्यक्ति महान कहलाता है।
            शरण में आए हुए यानी शरणागत की रक्षा करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य होता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिल जाएँगे, जहाँ शरणागत जीव की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों को भी संकट में डाल दिया गया। महाराज शिवि से बड़ा उदाहरण कोई और नहीं हो सकता। उन्होंने अपनी शरण में आए हुए एक निरीह कबूतर की रक्षा के लिए स्वयं को मांसाहारी बाज के हवाले कर दिया था।
             पलायन करने वाले का भी वध नहीं करना चाहिए। वह तो बेचारा स्वयं हालात का सामना नहीं कर पा रहा। इसीलिए वह पीठ दिखाकर भाग रहा है। उसे छोड़ देना चाहिए। दुर्भाग्यवश जो व्यक्ति उन्मत्त है, उसे मारकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। उसे अपने हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। जो व्यक्ति पहले से ही हार मान ले या मुँह में तिनका डाल ले उसका भी वध नहीं करना चाहिए।
             ऐसे सभी शत्रु दया के पात्र होते हैं। उनका वध नहीं करना चाहिए। आज भी किसी अन्य देश में शरण लेने वाले किसी राजनायिक को या किसी मनुष्य को पूर्ण सुरक्षा दी जाती है। जो सेना युद्धक्षेत्र से पलायन करती है, उसे जाने दिया जाता है। दो देशों में सुरक्षा मुद्दों पर आवशकयक चर्चा होना भी इसी का ही एक रूप है। एक देश के नागरिक या मछुआरे आदि गलती से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, उनसे पूछताछ करके बाद में छोड़ दिया जाता है।
               प्राचीनकाल में युद्ध के भी नियम होते थे, जिनका पालन सभी राजा किया करते थे। बड़े दुख की बात है कि आजकल सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया हैं। आधुनिक हथियारों से लैस शस्त्र न दिन देखते हैं और न रात ही देखते हैं, बस हमला करके निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में या युद्ध के मैदान में शायद ये सारी बातें बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकें, परन्तु दैनन्दिन जीवन में इन सबकी हमें बहुत ही आवश्यकता होती है। मनुष्य जितना ही अधिक क्षमाशील बनता है, उतना ही उसे यश और मानसिक सन्तोष मिलता है, जो उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

ईश्वर की उपासना

ईश्वर की उपासना

सृष्टि के रचयिता परमपिता परमात्मा का हम पर बहुत उपकार है। उसने ही हमें इस धरा पर अवतरित किया। एक वही है जो हमें दुनिया की सभी सुख-सुविधाऍं प्रसन्नता से देता है। कभी वह हम पर अहसान नहीं दिखाता। हम यदि चौबीसों घण्टे उसकी महिमा का गुणगान कर सकें तो वह भी उसकी दी गई नेमतों से कम ही रहेगा।
           'द्वात्रिंशत् पुतलिकासिंहासनम्' नामक एक संस्कृत भाषा का ग्रन्थ है। इसका हिन्दी में 'सिंहासन बतीसी' नाम से अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में निम्न श्लोक कवि ने वर्षों पूर्व लिखा था, वह आज भी उतना ही सटीक है -
        देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
       यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
अर्थात् देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु में मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
            हम ईश्वर की उपासना किस रुप में करते हैं अथवा जिस किसी भी नाम से उसे याद करते हैं, यह मायने नहीं रखता। असली मुद्दा यह है कि हमारे मन में अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिए कितनी तड़प है। हम उसकी उपासना सच्चे मन से करते हैं अथवा केवल दिखावा करते हैं। ईश्वर के भजन का तभी फल मिलता है जब हम पूर्णरूपेण उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए या उनसे सबसे बड़ा भक्त होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए किया गया प्रयास, उस परमेश्वर की नजर में शून्य होता है। 
           तीर्थ स्थान पर यदि हम मौज-मस्ती के लिए जाते हैं तो तीर्थ भ्रमण का हमें लाभ नहीं मिलता। न तो हमारे विचारों में कोई परिवर्तन आता है और न ही हम प्रभु के सच्चे और बड़े भक्त बन सकते हैं। तीर्थ करने की हमारे जीवन में तभी उपयोगिता होती है यदि वहाँ जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों से मन को विरक्त करके मालिक का स्मरण करते हैं। विद्वानों की सत्संगति करते हुए ज्ञानार्जन करते हैं। साधना करते हुए अपने अन्त:करण को शुद्ध-पवित्र बनाते हैं, तभी तीर्थ करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण होता है। अन्यथा तो पिकनिक मनाकर लौट आने वाली बात होती है।
          ब्राह्मण में यदि हमारा विश्वास होता है तभी उससे मार्गदर्शन लिया जाता है। हमें अपने संस्कारों को करवाने के लिए भी सदा योग्य ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यदि उसमें आस्था नहीं होगी तो हमारे धार्मिक कृत्यों को करने का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकेगा।
           मन्त्रों में अपार शक्ति होती है। ये आत्मोन्नति करने में हमारी सहायता करते हैं। ये मन्त्र हमें अपने इष्ट तक पहुँचाने का सफल माध्यम बनते हैं। हम मन्त्र जाप करके ही तो अपने प्रभु का सानिध्य प्राप्त करते हैं। यदि मन्त्र पर हमें विश्वास नहीं होगी तो हमें कोई सिद्धि भी नहीं मिलेगी। यदि हम मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करते हैं तो भी उसका फल नहीं मिलता। कभी-कभी उससे अनिष्ट भी हो जाता है।तब ये अमूल्य मन्त्र हमें अपने इष्ट से मिलाने में सफल नहीं हो पाएँगे।
           तान्त्रिक इन मन्त्रों को सिद्ध करके चमत्कार करते हैं। मैं उनकी इस पद्धति पर कोई आलोचना नहीं करना चाहती। यह व्यक्ति विशेष की मान्यता होती है। पर मैं इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि इन मन्त्रों से प्राप्त सिद्धियों का समाज के हित में उपयोग करना चाहिए। मारण-उच्चाटन आदि में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।
             ज्योतिष एक वेदांग है। ज्योतिषीय गणना की विधा अपने आप में सम्पूर्ण है। उस पर मन से विश्वास करना आवश्यक है। हाँ, फलित ज्योतिष में जहाँ लालच व स्वार्थ हावी हो जाते हैं, वहाँ पर गलती की गुँजाइश बनी रहती है। फिर भी मनुष्य किसी ज्योतिषी के पास विश्वास होने पर ही जाता है। वह अपनी विकट समस्या का उपाय जानना चाहता है।
            डॉक्टर पर यदि विश्वास नहीं होगातो वह कितना ही योग्य क्यों न हो रोगी स्वस्थ नहीं हो पाता। इसलिए उस पर अपने मन से विश्वास करना चाहिए।
            गुरु पर विश्वास न हो तब उसकी शरण में जाना व्यर्थ होता है। प्राचीन काल में योग्य गुरु के पास लोग अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए के लिए भेजते थे। उन्हें यही विश्वास होता था कि उनके बच्चे योग्य बनकर जीवन में यश कमाएँगे। गुरु का कार्य शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति करना होता है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव मनुष्य को इहलोक और परलोक के बन्धनों से मुक्त करवाता है।
              सार रूप में हम कह सकते हैं कि मन की सच्ची भावना होने से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर औ र गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखकर हम उनसे लाभ ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

पराई स्त्री माता समान

पराई स्त्री माता समान

भारतीय संस्कृति में माता के महत्त्व को स्थान-स्थान पर बताया गया है। अपनी मॉं का सदैव सम्मान करने के लिए अनुशासित किया गया है। पराई स्त्री के साथ मनुष्य को कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसके विषय में भी आदिष्ट किया गया है। हितोपदेश के रचयिता प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान नारायण पण्डित ने कहा है जो कहा है, वह हमारी संस्कृति का परिचायक है -
                  मातृवत् परदारेषु 
अर्थात् पराई स्त्री को माता समझो। कहने का तात्पर्य यह है कि पराई स्त्री पर कभी भी गलत नजर नहीं डालनी चाहिए और उसका अपनी माँ की तरह सम्मान करना चाहिए।
              यह नीति वचन पुरुषों के लिए मर्यादा निर्धारित करता है। मर्यादा और अमर्यादा के बीच मात्र एक झीनी-सी दीवार होती है। एक ओर  मर्यादित आचरण उसे देवतुल्य बना देता है। उसे समाज युगों-युगों तक याद रखता है। उसे ताज की तरह अपने सिर पर बिठाता है और उसके उदाहरण देता है।
              इसके विपरीत दूसरी ओर का अमर्यादित आचरण उसे दानव बना देता है। ऐसे मनुष्य को समाज के लोग हिकारत की नजर से देखते हैं। वह समाज व न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सारी आयु सजा भोगता है। उसके साथ ही उसके अपने निर्दोष होते हुए भी उसकी गलतियों की बलि चढ़ जाते हैं। कोई भी उससे सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। ऐसे लोगों को कहीं, किसी पार्टी आदि में भी बुलाना अपनी नैतिकता के विरुद्ध समझते है। एक व्यक्ति के ऐसे अमर्यादित आचरण के कारण उन सबका सामजिक बायकाट हो जाता है।
              स्त्री से सतीत्व की अपेक्षा रखने वाले पुरुष से भी यही आशा की जाती है कि वह अपने आचार-व्यवहार पर अंकुश रखे। यदि वह अपनी पत्नी में भगवती सीता का प्रतिरूप देखना चाहता है तो उसे स्वयं भी राम जैसा एकपत्नी व्रत धारण करना होगा। इसी तथ्य को निम्न श्लोकांश में इस प्रकार कहा है -
            सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च 
             धर्मस्तथार्थश्च रति:स्वदारै:।
अर्थात् गृहस्थ पुरुष सत्य और सरलता का पालन करे। अतिथिपूजा, धर्म, अर्थ के कार्य करे और अपनी स्त्री में अनुराग रखे।
             सत्य और सरलता का व्यवहार करना मात्र स्त्री का धर्म नहीं पुरुष का भी धर्म होता है। इसी प्रकार अतिथि सत्कार करना भी दोनों ही का दायित्व है। सभी धार्मिक कार्यों में पति-पत्नी दोनों की उपस्थिति अनिवार्य यानी जाती है। अश्वमेध यज्ञ के समय सीता जी की अनुपस्थिति की अवस्था में में भगवान राम ने उनकी स्वर्ण प्रतिमा रखी थी। एवंविध घर-गृहस्थी के आर्थिक मामलों में भी दोनों की स्वीकृति होने से बड़ा और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं होता।
            हमारे महान मनीषियों ने सदा ही यह उपदेश दिया है कि पुरुष केवल अपनी पत्नी का ही होकर रहे। इस प्रकार समाज में व्यभिचार नहीं फैलता। ऐसे व्यवहार से बलात्कार जैसे अपराधों से समाज को मुक्ति मिल सकती है। दूसरी ओर व्यक्ति बहुत-सी सम्भावित बिमारियों से ग्रसित होने से बच जाता है।
              अपनी पत्नी के लिए एक पुरुष बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की ओर नजर उठाकर देखे अथवा वह किसी अन्य से कोई सम्बन्ध रखे। फिर अपने लिए भी उसे ऐसा ही सोचना चाहिए कि यदि वह किसी अन्य महिला को नजर उठाकर देखेगा या उससे अनैतिक सम्बन्ध बनाएगा तो उसकी पत्नी को भी यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। तब उस पत्नी के मन में उसके लिए नफरत और क्रोध का होना स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
             पत्नी के अप्रत्याशित बदले हुए व्यवहार पर शिकायत करना अथवा उसे भला-बुरा कहने का ऐसे दुराचारी व्यक्ति को कोई हक नहीं होता। उसे सबसे पहले अपने गिरेबान में पहले झाँककर देखना चाहिए। उसके बाद ही उसे बोलने या कुछ कहने का अधिकार होता है।
          स्त्री के लिए यदि शास्त्र मर्यादाओं की रेखा खींचते हैं तो पुरुष के लिए भी उन्होंने संयमित और मर्यादित जीवन जीने का विधान बनाया है। अपनी सीमाओं को लाँघने का हक शास्त्र किसी व्यक्ति को नहीं देते, फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। उन नियमों का पालन करते हुए पुरुष को अपने जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। अपने एकनिष्ठ जीवन जीने की मर्यादा का निर्वहण पुरुष को सच्चाई और ईमानदारी से करना चाहिए। मनुष्य की मन की भावना सर्वोपरि होती है। उसकी श्रद्धा और उसका विश्वास उसे कहीं-का-कहीं पहुँचा सकते हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

चिकित्सा सुविधाऍं

चिकित्सा सुविधाएँ

विज्ञान की कृपा से आज आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं। बहुत से सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों में विभिन्न रोगों की चिकित्सा कराई जा सकती है। इनमें प्रशिक्षित और स्पेशलिस्ट डॉक्टर विद्यमान रहते हैं। अब अनेकानेक मल्टी स्पेशिलटी अस्पताल बड़े-बड़े शहरों में खुल चुके हैं। उन्हें हम फाइव स्टार होटलों की श्रेणी में रख सकते हैं। जितना अधिक पैसा मनुष्य खर्च कर सकता है, वहॉं उतनी ही अधिक सुविधाएँ उसे उपलब्ध कराई जाती हैं।
           जितनी ऊपरी चमक-दमक ये हमें दिखाते हैं, उतनी ही अधिक जेब भी काटते हैं। ऐसा भी सुनने में आया है कि यहाँ कार्यरत डाक्टरों को अस्पताल की आय बढ़ाने के लिए टारगेट दिए जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है, कम-से-कम मैं तो नहीं कह सकती। इन अस्पतालों की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि एक ही छत के नीचे सभी कार्य हो जाते हैं। रोगी को अपने विभिन्न टेस्ट, एक्स-रे, ईसीजी आदि करवाने के लिए कहीं अन्यत्र नहीं भागना पड़ता। वहीं पर टेस्ट करवाओ और डॉक्टर को दिखाकर परामर्श लें लो।
          आजकल वे डाक्टर बहुत ही कम रह गए हैं जो नब्ज पकड़ते ही रोग की जड़ तक पहुँच जाते थे। एक रोग को समझने के लिए आजकल के ये डॉक्टर न जाने कितने ही टेस्ट करवा लेते हैं। उस पर भी बिमारी ठीक से पकड़ में आ जाएगी कोई गारण्टी नहीं। इस विषय पर भी सोशल मीडिया टी. वी., समाचार पत्र प्रकाशित करते रहते हैं कि रोग कोई और था, इलाज कुछ और हो रहा था। होने वाली ऐसी लापरवाही रोगी का मनोबल तोड़ देती है। इसीलिए लोग परेशान होकर डॉक्टरों पर अदालत में केस दायर कर देते हैं।
          आज के समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि युवा डॉक्टरों की इस पीढ़ी में सहनशक्ति का बहुत अभाव है। इनकी सोच यही होती जा रही है कि जरा सी भी परेशानी हो जाए तो शरीर का वह अंग काटकर फैंक दो। उसके बाद होने वाले जो दुष्परिणाम रोगी को भोगने पड़ते हैं, उसके विषय में कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। कष्ट से जूझ रहे असहाय व्यक्ति का धन और समय तो बर्बाद होता ही है, साथ में जीवन भर की परेशानी वह मोल ले लेता है।
             हो सकता है इसके पीछे यही कारण हो कि वे सोचते हैं कि लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई की है तो उस पैसे को जितनी जल्दी हो सके वसूल कर लिया जाए। वे भूल जाते हैं कि बहुत नोबल व्यवसाय है डॉक्टरी पेशा। डॉक्टर को हम भगवान के समान मानते हैं। उससे यही आशा की जाती है कि वह अपने मरीज को उचित परामर्श दे और उसका ध्यान बिना किसी लालच के करे। रुग्ण व्यक्ति बड़े विश्वास के साथ किसी डॉक्टर के पास जाता है। वह चाहता है कि उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय न किया जाए।
             बहुत से ऐसे किस्से हमने सुने हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं और टी.वी. के अनेक चैनलों पर दिखाए जाने वाले टॉक शो में भी देखते हैं, जहाँ रोगियों के साथ अन्याय किया जाता है। कभी-कभी किसी रोग का आपरेशन करते समय उसके शरीर के दूसरे अंग को निकालकर उसे महंगे दामों में भी बेच दिया जाता है। इस प्रकार के मानव अंगों की तस्करी के रेकेट चलते रहते हैं। उनके विषय में भी संचार माध्यमों पर प्रायः चर्चा होती रहती है। इस नोबेल प्रोफेशन में आने के पश्चात ऐसे कुकर्मों से बचना चाहिए। ऐसे दुष्कृत्य तो सीधे-सीधे 
            समय बीतने पर जब उसको कोई अन्य शारीरिक समस्या सामने आती है तब पता चलता है कि रोगी का कोई अंग विशेष निकाल लिया गया है। तब पीड़ित व्यक्ति ठगा-का-ठगा रह जाता है। फिर वह पुलिस में शिकायत करता है और अदालतों के चक्कर लगाता रह जाता है। ऐसे भी एपीसोड टी.वी. पर दिखाए गए हैं जिनमें नवजात शिशु को बेच दिया गया अथवा उन्हें पैसो के लालच में बदल दिया गया। यहाँ तक भी कह दिया गया कि उनके घर मृत बच्चे ने जन्म लिया है। ऐसा दुष्कर्म करते समय इन लोगों को उन बेचारे माता-पिता के दुख का भी ध्यान नहीं आता। दिल दहलाने वाले ये हादसे हैरान कर देते हैं।
           मेडिक्लेम के कारण रोगी आश्वस्त हो जाता है कि कोई भी रोग आ जाए उसके इलाज में कोई कमी नहीं रहेगी। शायद यही उसके जंजाल का कारण भी बनता जा रहा है। इस मेडिक्लेम का दुरुपयोग यही है कि आवश्यकता न होने पर भी रोगी को ऐसे डरा दिया जाता है कि उसे लगता है कि आप्रेशन के अतिरिक्त उसके पास कोई और उपाय नहीं है। इसका जिक्र भी टी.वी. व समाचार पत्रों में अक्सर होता रहता है।
            सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण लोग वहाँ इलाज के लिए जाना नहीं चाहते और इन लुभावने नामों के पीछे भागते हैं। इसी का फायदा उठाकर ये लोग बकरा हलाल करने वाली प्रवृत्ति के बनते जा रहे हैं। इसकी चर्चा भी समाचार पत्रों आदि में होती रहती है कि पैसे के लालच में ये इतने अन्धे हो गए हैं कि रोगी की मृत्यु हो जाने की सूचना एक-दो दिन बाद उसके परिजनों को दी गई। 
           जगमग चमकते हुए ये सभी अस्पताल लोगों के जीवन में कितनी रोशनी कर पाते हैं, बस यही देखना और समझना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

नीतिज्ञ तक पहुॅंचना कठिन

नीतिज्ञ तक पहुँचना कठिन 

नीतिज्ञ महान होते हैं, उन तक पहुँच पाना बहुत कठिन कार्य होता है। ये लोग अपने आचार-व्यवहार से सबके प्रिय बन जाते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु नहीं होते और यदि ईर्ष्यावश कोई बन भी जाए तो वे संख्या में नगण्य होते हैं। वे ऊपरी तौर से चाहे उनका विरोध करते रहें पर मन से उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। निम्न श्लोक में ऐसे गुणज्ञों के विषय में कहा है-
       शस्त्रो नीतिहीनानां यथापथ्याशिनां गदा:।
      सद्य: केचिच्च कालेन भवन्ति न भवन्ति च॥
अर्थात् जिस प्रकार अपथ्य खाने वालों को कभी-न-कभी रोग ग्रस्त कर लेते हैं जबकि संयमी लोगों को कोई रोग नहीं होता। उसी प्रकार नीति विहीन व्यक्तियों के कभी शीघ्र और कभी विलम्ब से अनेक शत्रु बन जाते हैं। जबकि नीति का अनुसरण करने वालों के शत्रु नहीं होते अर्थात् सभी उनके मित्र बन जाते हैं।
             यह श्लोक हमें समझा रहा है कि जो लोग खाने-पीने में परहेज नहीं करते, वे कई रोगों की चपेट में आते हैं। अपनी जीभ पर उनका नियन्त्रण नहीं होता। जहाँ स्वादिष्ट, मसालेदार या चटपटा भोजन देखा वहीं उनकी लार टपकने लगती है। वे यह भी नहीं सोचते कि उनकी आयु के अनुसार वह भोजन उनके लिए लाभप्रद होगा या शरीर के लिए हानिकारक रहेगा। इसलिए रोग शीघ्र इन्हें अपना मित्र बना लेते हैं।
             इसी प्रकार अपनी वाणी पर भी इन लोगों का नियन्त्रण नहीं होता। जरा-जरा-सी बात पर भड़ककर लाल-पीले हो जाते हैं। बिना सोचे-समझे और बिना किसी का लिहाज किए हर किसी को जो मुँह में आया कह देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु अधिक और मित्र कम होते हैं।
              संयमी व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं। अपने जीवन को सदा ही नियमपूर्वक चलाते हैं। रोग इन्हें अपना मित्र बनाने से कतराते हैं।
        नीतिज्ञ नीति को जानने वाले एवं बुद्धिमान होते हैं। नीतिज्ञ व्यक्ति सभी कार्य सुनियोजित नीतियों के अनुसार ही करता है। ये लोग प्रायः निर्णय लेने में निपुण होते हैं और विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने की क्षमता रखते हैं। वे अक्सर शासन, कूटनीति या प्रबन्धन के क्षेत्रों में काम करते हैं। 
          नीति विहीन लोग सदा बेपेन्दे लोटे होते हैं अथवा कहें तो थाली के बैंगन की तरह होते हैं। वे इधर-उधर अनावश्यक रूप से ही भटकते रहते हैं। अपनी निजी कोई सोच-समझ न रखने के कारण वे प्राय: भेड़चाल में विश्वास रखते हैं। इनके लिए यही कह सकते हैं - 
        'गंगा गए तो गंगा दास और यमुना  
        गए तो यमुना दास।'
अर्थात् जिस भी माहौल में जाते हैं, वहीं के होकर रच बस गए, उनका अपना कुछ भी मौलिक नहीं होता।
             हर किसी की बात पर ये जल्द ही आँख मूँदकर विश्वास करने वाले होते हैं। ऐसे लोग अक्सर दूसरे के झाँसे में आकर धोखे और ठगी के शिकार हो जाते हैं। जब अपना नुकसान जब कर बैठते हैं तब उन धोखेबाजों को कोसते हैं। उस समय फिर पश्चाताप करते हैं कि काश वे धोखे का शिकार होने से पहले चेत जाते, तो अपनी हानि न होने देते। मुझे एक गीत स्मरण आ रहा है। उस गीत की एक पंक्ति यहॉं उद्धृत कर रही हूॅं जो सन 1957 की फिल्म 'एक साल' का एक प्रसिद्ध दर्दभरा गीत है -
   सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ।
इसका अर्थ है कि जब सब कुछ बर्बाद हो जाने के  बाद या मौका हाथ से निकल जाने के बाद यदि समझदारी आती है तो उस समझदारी का कोई फायदा नहीं होता।           
            इसके विपरीत संयमी लोग सबके मित्र बन जाते हैं। उन महान् आत्माओं का अनुसरण बहुत से लोग करने  लगते हैं। उनके आचार-व्यवहार में एक अनुशासन होता है। वे किसी व्यक्ति का अहित करने के विषय में सोच ही नहीं सकते, बल्कि निस्वार्थ परोपकार के कार्य करते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भी छोटा अथवा बड़ा मनुष्य नहीं होता। वे सदा धर्म, जाति, व्यवसाय, रग-रूप आदि मुद्दों से परे रहते हुए सब लोगों के साथ ही समानता का व्यवहार करते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समाज निर्माण में सक्रिय योगदान रहता है।
          हमें स्वयं को निर्णय लेना है कि हम नीतिज्ञ एव संयमी बनकर स्वस्थ और समाज के दिग्दर्शक बनना चाहते हैं अथवा नीति-विहीन एवं इन्द्रियों के वश में रहने वाले बनकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारकर मूर्ख बनना पसन्द करेंगे।  
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

त्रिया हठ

त्रिया‌ हठ

त्रिया हठ के विषय में बहुत कुछ कहा और सुना गया है। अपने घर में अथवा अपने आसपास कहीं भी यह शब्द अवश्य ही आपको सुनने को मिला होगा। इस त्रिया हठ पर मैं अपने विचार रख रही हूॅं। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप सब सुधी जनों को यह आलेख रुचिकर प्रतीत होगा।
            त्रिया हठ अथवा किसी स्त्री हठ। इसका अर्थ है किसी स्त्री द्वारा अपनी किसी विशेष इच्छा या जिद को पूरा करने के लिए अड़ जाना। चाहे वह इच्छा उचित हो या अनुचित हो। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ महिला अपनी बात मनवाने पर अड़ जाती है। इसके लिए कई बार भावुकता, रूठना या विशेष अभिनय के द्वारा उसका काम निकलवाना शामिल माना जाता है। यानी स्त्री यदि अपने हठ पर आ जाए तो परिवार की चूलें तक हिल जाती हैं। इससे उसकी चतुराई, उसका रहस्यमय स्वभाव अथवा उसके कपटपूर्ण व्यवहार ज्ञाऐ होता है। 
             महान कवि और नीतिज्ञ भर्तृहरि ने स्त्री के चरित्र के विषय में 'नीतिशतकम्' में बताया है -
         नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तम्।
           मनोरथाः दुर्जनमानवानाम्।।
           त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम्।
           देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
अर्थात् राजा का चित्त, कंजूस का धन, दुर्जनों का मनोरथ, पुरुष का भाग्य और स्त्रियों का चरित्र देवता तक नहीं जान पाते तो मनुष्यों की तो बात ही क्या है?
            इस श्लोक से हम स्त्रियों के चरित्र के विषय में कहा गया है कि देवता भी उनके चरित्र के बारे में नहीं जान सकते तो हम मनुष्य उन्हें समझने में असफल हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उनका चरित्र बहुत जटिल होता है। उसे समझना मनुष्यों के बस की बात नहीं है।
             यह जीवन की अनिश्चितता को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि नारी की सोच, व्यवहार और पुरुष का भाग्य, ये कर्म इतने जटिल और रहस्यमय होते हैं कि उन्हें समझना मानवीय क्षमता से परे है। यहॉं तक कि ईश्वर भी इन्हें पूरी तरह से नहीं समझ सकते। यह श्लोक यह सन्देश देता है कि हमें किसी के चरित्र या भाग्य के बारे में बिना सोचे-समझे, कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। लोक मान्यता में त्रियाचरित्र यानी स्त्री के चरित्र को समझ पाना कठिन माना गया है।
           अब हम इस विषय पर कुछ उदाहरण लेते हैं। मॉं सती भगवान शिव की पत्नी और राजा दक्ष की पुत्री थीं। महाराज दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें शिव और सती को उन्होंने आमन्त्रित नहीं किया। भगवान शिव के समझाने पर भी वे नहीं मानीं और पिता के यज्ञ में पहुॅंचा गईं।वहॉं पिता के यज्ञ में शिवजी का अपमान न सह पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।
           रामायण काल की कैकेई का हठ सर्वविदित है। वहॉं आपने पुत्र भरत को राजगद्दी पर बैठाने के लिए कैकेई ने भगवान के लिए चौदह वर्षों का वनवास मॉंगा था। फलस्वरूप भगवान, भगवती सीता और लक्ष्मण वन में चले गए। उनके वियोग‌ में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई। वनवास में उनके कठोर जीवन और कठिनाइयों के विषय में हमने पढ़ा है।
           रामायण का ही दूसरा उदाहरण लेते हैं जहॉं भगवती सीता ने स्वर्णिम हिरण की पाने का हठ किया। लक्ष्मण को भगवान राम की सहायता करने के लिए विवश किया। फिर लक्ष्मण द्वारा खींची गई रेखा का उल्लघंन किया। तत्पश्चात उनका रावण द्वारा अपहरण हुआ, उनकी खोज में भगवान राम और लक्ष्मण का भटकना, राम-रावण युद्ध हुआ। मॉं सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। अन्ततः उन्हें गर्भावस्था में जंगल में जाना पड़ा।
           अब महाभारत काल के उदाहरण लेते हैं। गान्धरी के पति महाराज धृतराष्ट्र अन्धे थे। गान्धारी ने स्वयं की ऑंखों पर पट्टी बाॉंध ली यानी की खुद भी अन्धी हो गई। यह नहीं किया कि पति की ऑंखें बने। दुर्याधन का पापाचार सहन करती रही परन्तु युद्ध के समय उसे ‘विजयी भव’ नहीं कहा। अपने ही पुत्र को विजेता होने का आशीर्वाद नहीं दिया। जब श्रीकृष्ण सामने आये तो सौ मृत पुत्रों की मॉं ने भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया। शाप देने के उपरान्त पश्चाता लगी कि मैने यह क्या कर दिया। 
             महाभारत का ही दूसरा उदाहरण देखते हैं। महारानी कुन्ती कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाकर रखा। उसे अपने सामने प्रतिदिन प्रताडित होते हुए देखती रही। जब पाण्डवों पर युद्ध में कर्ण के हाथें सम्भावित मृत्यु का संकट आया तो उसी परितयक्त पुत्र के पास याचना के लिए चली गई। पाण्डवों के लिए अभय दान माॉंग लिया। 
            ये इतिहास के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं। अपने आसपास भी हम ऐसी स्त्रियों को देख सकते हैं जिनके हठ के कारण परिवार बर्बाद हो गए। घर-परिवार की भलाई के लिए भी स्त्रियों ने अवश्य ही हठ किया होगा पर वे उदाहरण शायद नगण्य होंगे। इसीलिए वे चर्चा में नहीं आ सके होंगे। यह भी हो सकता है कि कोई इस विषय पर ध्यान ही नहीं देना चाहता।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

सौ वर्षों तक जीवन

सौ वर्षों तक जीवन

मनीषी ऋषियों ने ईश्वर से सौ वर्ष तक का जीवन देने की कामना की है। इन्हीं सौ वर्षों के आधार पर आश्रमों का विभाजन किया गया था। जो इस प्रकार होता था -
1 ब्रह्मचर्य आश्रम - जन्म से पच्चीस वर्ष 
2 गृहस्थ आश्रम - पच्चीस से पचास वर्ष 
3 वानप्रस्थाश्रम - पचास से पिचहतर वर्ष 
4 संन्यासाश्रम - पिचहतर से शेष आयु
           इस सौ वर्ष की आयु में हमारा शरीर कैसा होना चाहिए यह महत्त्वपूर्ण बात है। निम्न वेदमन्त्र के माध्यम से वे कहते हैं-
      पश्येम शरद: शतं  जीवेम शरद: शतम्
     श्रृणुयां शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना:   
    स्याम शरद:शतं भूयश्च शरद: शतात्।
अर्थात् हम सौ वर्ष की आयु तक भली-भाँति देख सकें। सौ वर्ष तक स्वस्थ होकर जी सकें। सौ सालों तक ठीक से सुन सकें और सौ वर्षो तक अच्छे से बोल सकें। हम सौ वर्षों तक दीन न बनें। ऐसा जीवन हम जी सकें।
            ऋषियों द्वारा इस मन्त्र में की गई प्रार्थना का तात्पर्य यही है कि सौ वर्षों तक हमारी सारी इन्द्रियाँ अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहे। हम स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट रहें। कोई रोग हमारे पास न आने पाए। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा सम्भव हो सकता है क्या? 
              यदि हम लोग अपने जीवन को संयमित कर सकें तो यह सब सम्भव हो सकता है। आधुनिक जीवनशैली के अनुसार हमारा आहार-विहार दोनों सन्तुलित नहीं हैं। हमें अपनी जीभ पर बिल्कुल भी नियन्त्रण नहीं है। तला-भुना, मिर्च-मसाले वाला जो भोजन है, उसे खाकर हम सब आनन्दित होते हैं। अपने शरीर को किसी तरह का कष्ट न देना पड़े, इसलिए दुनिया भर का जंक फूड खाते हैं। होटलों का खाना खाने के लिए हम मचलते रहते हैं। हम इसलिए अभोज्य पदार्थों का सेवन बहुत आनन्द पूर्वक करते हैं। 
          सादा और सन्तुलित भोजन खाने के नाम पर हमें बहुत कष्ट होता है। हम नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, मुँह बनाते हैं। घर में झगड़ा तक कर बैठते हैं। अब आप खुद ही बताइए कि ऐसी अवस्था में हमारा पेट बेचारा क्या करेगा? यह किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है, हम सभी ऐसा ही करते हैं। फिर दोष दूसरों को देते हैं। ऐसे दोषपूर्ण और अमर्यादित खान-पान के कारण बिमारियाँ शरीर को गाहे-बगाहे घेरती ही रहेंगी। हमारी जीभ स्वाद के लालच में आकर लपलपाती रहती है। हम बस उसी के चक्कर में पड़कर स्वय को लाचार और रोगी बना लेते हैं।
             हमारे सोने-जागने का कोई समय नहीं है। आज जीवन  शैली ऐसी बन गई है कि सारी पार्टियॉं रात देर तक चलती हैं। हम रात को देर से सोते है और फिर प्रात: देर से उठते हैं। जो उल्टा-सीधा मिला, बस उसे ही खाकर अपने काम पर निकल जाते हैं। इसी तरह खाना खाने का भी कोई समय नहीं बनता। जिस भोजन के लिए सारे पाप-पुण्य, भ्रष्टाचार, कदाचार सब करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय का सदा अभाव रहता है। शेष सभी सांसारिक कार्य हमारे लिए इससे ज्यादा आवश्यक हो जाते हैं।
             आजकल अन्न, फल और सब्जियों आदि में डलने वाले कीटनाशक भी हमारे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को और अधिक कमजोर कर रहे हैं। इससे भी अनेक रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है।
                इन सबसे अधिक दूषित होता हुआ पर्यावरण है जो हमारी सबकी लापरवाही का परिणाम है। नदियों के जल में हम सीवर की गंदगी फेक्ट्रियों का कचरा डालकर दूषित करते हैं। उस जल का उपयोग भी हमारे बहुत से रोगों का कारण है। इसी प्रकार वायु को हर तरह से दूषित करके लोगों को न्योता देते हैं।
            जब हमारा खान-पान और रहन-सहन ऐसा हो जाएगा तो हम डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपनी मेहनत की कमाई और पैसा व्यर्थ बर्बाद करते रहेंगे। मैं यह तो नहीं कहूँगी कि सभी लोग 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली नीति का जबरदस्ती पालन करें। स्वेच्छा से इसका अनुकरण करना ही श्रेयस्कर होता है।
          सौ वर्ष की आयु तक जीने के लिए आँख, नाक, कान आदि सभी इन्द्रियों का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। यदि ये सभी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाएँगी और शरीर रोगी हो जाएगा तब तो जीवन भार बन जाएगा। जीने का आनन्द भी नहीं आएगा। उस समय मनुष्य बस दिन-रात, उठते-बैठते ईश्वर से मृत्यु की कामना करता रहेगा। अपने जीवन का शतक पूरा करने के लिए जीवन में सबसे पहले आत्मसंयम और आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। शेष सब ईश्वर पर छोड़ देना ही बेहतर है क्योकि वह सब जानता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों की चर्चा प्राय: होती रहती है। पुरातन वैदिक परम्परा में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण थे। शिष्य गुरु के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्रवत मानते थे। गुरु अपने शिष्यों का सम्पूर्ण व्यय वहन करते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके शिष्य अपने घर वापिस लौटते थे। 
              आधुनिक काल में गुरु-शिष्य परम्परा के मायने बदल गए हैं। आज के इस भौतिक युग में जहाँ अर्थ प्रधान हो गया है, वहाँ इस रिश्ते में भी स्वार्थपरता बढ़ गई है। ये सम्बन्ध भी अब धन की कसौटी पर कसे जाने लगे हैं। जिस गुरु के पास बेहिसाब धन-दौलत व सम्पत्ति का अम्बार है, वह बड़ा गुरु कहलाता है। इसी तरह जो जितना मनुष्य धनवान है, वह उतना बड़ा शिष्य कहलाता है। उस धनिक को रिझाने के लिए गुरु भी नानाविध उपाय करते रहते हैं।
           धन और स्वार्थ के कारण जुड़े गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में कहीं पारदर्शिता नहीं दिखाई देती। मुझे इसका यही कारण समझ में आता है कि जब तक इन दोनों के स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है, वे परस्पर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं और जहाँ स्वार्थ खत्म हो जाता है, वहीं उनके सम्बन्धों को भी धत्ता दिखा दिया जाता है। फिर आरम्भ होता है एक नए गुरु और एक नए शिष्य की तलाश का खेल। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यहॉं समर्पण की भावना नहीं होती, मात्र प्रदर्शन होता है।
               वे गुरु तो आज चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलते, जिनके विषय में हमारे ग्रन्थों में कहा गया था-
         गुरुर्बह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
    गुरु: साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥
अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। गुरु साक्षात् परम ब्रह्म है, उसे हम प्रणाम करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस श्लोक के अनुसार गुरु को ईश्वर से भी महान बना दिया गया।
            और भी बहुत कुछ गुरु की प्रशस्ति में गाया गया। बड़े दुख का विषय है कि ऐसे गुरु अब शायद ही उपलब्ध हैं जो शिष्य को अपनी सन्तान के  समान मानते थे, वे उसकी उन्नति में प्रसन्न होते थे। उनका प्रयास यही होता था कि जितना ज्ञान उनके पास है वे अपने शिष्य को सौंप दें। वे अपने शिष्य का स्वार्थ रहित होकर सर्वांगीण विकास करते थे। ऐसे वे महान गुरु शायद विरल ही हैं। ऐसी महान गुरु-शिष्य परम्परा को हम शीश नवाकर प्रणाम करते हैं।
              गुरु का नाम लेते ही उन तथाकथित धर्मगुरुओं की ओर आज बरबस ध्यान चला जाता है, जिनके आश्रमों में दुराचार व कदाचार धड़ल्ले से होता है। अपने भक्तों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले ऐसे गुरुओं के आश्रमों में आप सब देश-विदेश से नाजायज तरीके से आई हुई दौलत के अम्बार देख सकते हैं। हिरण्यकश्यप के शायद वे वंशज हैं जिन्हें स्वयं को ईश्वर कहने में भी उन्हें रंचमात्र भी संकोच नहीं होता। धर्म, समाज और न्याय व्यवस्था की नजर में दोषी कुछ आज सलाखों के पीछे भी बन्द हैं।
              गुरु के नाम पर वे कलंक है जो अपनी बेटी कही जाने वाली शिष्या से दुराचार अथवा बलात्कार जैसे घिनौने कर्म करने से नहीं घबराते। अपने शिष्यओं का अपहरण व उनकी हत्या करते हुए उनके हाथ नहीं काँपने और न ही उनका मानस उन्हें कचोटता है।
              जहाँ तक मेरा विचार है यह सारी गिरावट महामारत काल से आरम्भ हुई। उस समय अन्य मर्यादाओं के साथ इस मर्यादा का भी हनन हुआ। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने एकनिष्ठ शिष्य भील पुत्र एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा दक्षिणा में इसलिए माँग लिया कि वे राजाश्रित गुरु थे। वे नहीं चाहते थे कि राजकुमार अर्जुन से बड़ा कोई और धनुर्धर इस विश्व में हो।
               महारथी कर्ण ने धोखे से अपने गुरु से युद्धकौशल सीखा और गुरु ने उसे क्षमा करने के स्थान पर श्राप दे दिया, 'जब तुझे मेरी सिखाई हुई इस विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तेरा यह ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा।' इस अभिशाप का परिणाम महान दानवीर कर्ण की मृत्यु के रूप में हमारे समक्ष आया।
             गुरु गोरखनाथ जैसे शिष्य किसी गुरु को चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे। उन्होंने संसार की वासना से ग्रस्त अपने गुरु को सन्मार्ग दिखाया। फिर उन्हें सांसारिक वासनाओं से मुक्त करवाकर वैराग्य की ओर लौटाकर ले आए।
              आर्यसमाज के प्रवर्तक प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी का नाम इतिहास में अमर कर दिया। 
आधुनिक काल के ये दोनों गुरु-शिष्य परम्परा का सटीक उदाहरण कहे जा सकते हैं।
             ऐसे महान, सद् गुणी गुरु और ऐसे महान शिष्य तो बस अब किस्से कहानियों में सुनने व पढ़ने के लिए रह गए हैं। अब तो ऐसी आशा नहीं दिखाई देती कि फिर कभी महान गुरु-शिष्य परम्परा हमें भविष्य में दिखाई देगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर में समा जाना होता है। सागर तक पहुँचने की उसकी तड़प ही उसे सफल बनाती है। अपने रास्ते में आने वाली सारी बाधाओं को बिना रुके पार करते हुए वह अपने लक्ष्य को भेद लेती है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को पाना चाहे तो वह सहजता से उसे प्राप्त कर सकता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होता है। जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता वह जन्म और मरण के चक्र में भटकता रहता है। 
             मनुष्य इस असार संसार में आकर सब भूल जाता है। वह मोह-माया का दामन थाम लेता है। इसलिए वह अपने लक्ष्य से दूर होता जाता है। यदि वह अपने लक्ष्य का सन्धान करने का मन बना ले तो उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। परमपिता परमात्मा से एकाकार होने की उसकी तड़प उसे अपने उद्देश्य से भटकाने में सफल नहीं हो सकती। अपने लक्ष्य की ओर उसका बढ़ता हुआ कदम ही उसे इच्छित सफलता दिला सकता है।
             नदी को सागर से मिलने की और उसमें एकाकार होने की बहुत जल्दी होती है। वह अपने उद्गम स्थल से निकलते हुए वह रास्ता रोकने वाली चट्टानों की परवाह किए बिना, उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अन्ततः सागर में जाकर समा जाती है। दिन-रात का उसे कोई ख्याल नहीं रहता। हर मौसम के वारों को झेलती हुई वह निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली जाती है। कोई भी बाधा ऐसी नहीं होती जो उसे अपने लक्ष्य से भटका सके। उसकी एकाग्रता ही उसकी सफलता की कसौटी होती है।
             हम मनुष्य बाँध बनाकर उसके प्रवाह को रोकते हैं। जगह-जगह उसमें हम कचरा डालते हैं। कभी-कभी आँधी और तूफान भी उसका रास्ता रोकने का यत्न करते हैं। फिर भी वह इन सभी व्यवधानों को सदा ही अनदेखा करके अन्त में अपने गन्तव्य सागर तक पहुँच जाती है। सबसे मुख्य बात यह है कि वह बिना विश्राम किए अनवरत मीलों लम्बी यात्रा करती चली जाती है। उसके लिए  दिन-रात, मौसम और सबसे बढ़कर हम इन्सानों की बाधाऍं उसे नहीं रोक सकतीं।
              इस सत्य से हम इन्कार नहीं कर सकते कि सागर में मिल जाने के बाद से उसका मीठा जल भी खारा हो जाता है। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। वह सागर का ही एक रूप बन जाती है। उसका अपना नाम, उसकी पहचान समाप्त हो जाती है। फिर भी उसकी तड़प सागर के साथ उसे एकरूप कर देती है।
             मनुष्य के मन में भी यदि ईश्वर को पा लेने की तड़प बलवती हो जाए तो वह भी मीराबाई की तरह संसार सागर के अगणित थपेड़ों को झेलता हुआ, उनसे बिना डरे और बिना रुके अपनी निश्चित डगर पर चल पड़ता है। सुखों की नरम मुलायम छाँव और दुखों के पहाड़ कदापि उसका रास्ता नहीं रोक सकते। ये सब रूकावटें उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। इस दुनिया के प्रलोभन उसके लिए मिट्टी के ढेले के समान व्यर्थ हो जाते हैं। वह इन प्रलोभनों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करता। वह बस अपने लक्ष्य की ओर टकटकी लगाए देखता रहता है।
             संसार के लुभावने यह मोह-माया के जाल उसके पैरों की बेड़ियाँ नहीं बन सकते। वह महात्मा बुद्ध की तरह एक ही पल में, एक ही झटके में उन सब जंजीरों को तोड़कर मुक्त हो जाने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे ही लोग युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं। इनके मार्गदर्शन का लाभ अनेक लोग उठाते हैं।
              अब पतंगे को ही देख लीजिए। लौ का दीवाना, उसे पाने की चाहत में वह अपने प्राणों की आहुति तक दे डालता है। पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। ऐसा दिव्य समर्पण भाव अन्यत्र कहाँ मिल सकता है? अपने प्राणों की परवाह किए बिना पतंगा अपने लक्ष्य को पाने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है। पतंगे जैसी दीवानगी यदि हो तो मनुष्य का लक्ष्य उसे शीशे की तरह साफ-साफ चमकता हुआ दिखाई दे सकता है। जिसे वह चाहे तो सरलता से हाथ बढ़ाकर पा सकता है।
             नदी और पतंगे दोनों के उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करते हैं कि जब तक प्रेम की तड़प न हो तो मनुष्य इस संसार के सम्बन्धों को नहीं निभा सकता। क्योंकि माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र, नाते-रिश्ते यानी हर भौतिक सम्बन्ध प्यार के बिना अधूरा रहता है। जितना प्रेम का खिंचाव होता है, सम्बन्ध उतना ही प्रगाढ़ बनता है। तो फिर प्रभु को प्रेम की तड़प के बिना किस प्रकार पाया जा सकता है? 
             मालिक को पाने के लिए सच्ची तड़प का होना बहुत आवश्यक है। तभी मनुष्य उसके पास जाने, उससे मिलने, उसे जानने, उसमें एकाकार हो जाने के सभी प्रयत्न कर सकता है और फिर अन्तत: अपने इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा एक प्रकार का दृष्टि भ्रम होता है। दूर या रेगिस्तान में पानी होने का आभास होता है परन्तु वास्तव में वहॉं पानी नहीं होता है। यह गर्म दिनों में प्रकाश के अपवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। जहाँ जमीन के पास की गर्म हवा प्रकाश की किरणों को मोड़ देती है और आकाश का प्रतिबिम्ब जमीन पर दिखने लगता है, उसे पानी समझ लिया जाता है।वास्तव में मृग का अर्थ हिरण और तृष्णा का अर्थ प्यास होता है। यह उस मिथ्या विश्वास को दर्शाता है कि प्यासा हिरण पानी समझकर चकाचौंध वाली रेत के पीछे भागता है।
             जीवन में किसी ऐसी चीज की खोज करना या चाहना जो वास्तव में वहॉं होती नहीं है या जिसे प्राप्त करना नामुमकिन है। मृगतृष्णा के पीछे मनुष्य आखिर कब तक भागता रहेगा। इस भटकन का कहीं कोई अन्त तो होना चाहिए न। सीमित समय के लिए मिले इस मानव जीवन को मनुष्य मानो रेस में भागते हुए बिता देता है। अपना सारा सुख-चैन गँवाकर भी यदि उसे शान्ति मिल जाए तब गनीमत समझो। 
              वह न्यायकारी परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं करता। वह ईश्वर चींटी जैसे छोटे से जीव से लेकर हाथी जैसे बड़े, हर जीव के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। मनुष्य को भी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार बिन माँगे ही सब दे देता है। ज्ञानी जन कहते हैं-  
           जिसने यह जीवन दिया है,
           भोजन की व्यवस्था भी वही करेगा।
          जीवन चलाने के लिए आवश्यक साधनों को मनुष्य सरलता से जुटा सकता है। परन्तु जब महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर उठाने लगती हैं, तब समस्याएँ मुस्कुराती हुई उसे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। उस समय मनुष्य उन असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। दिन-रात एक करता हुआ जी-तोड़ मेहनत करता है। इस पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे सदा ही सफलता मिल जाएगी।
            जिनके लिए वह ये सब यत्न करता है वे तो उसे अपनी इच्छा पूर्ति का एक साधन मात्र समझने लगते हैं। जब तक उनकी जरूरतें वह पूरी करता रहेगा तब तक तो उसके बराबर उनका और कोई प्रिय नहीं होता है। सभी उसकी प्रशंसा करेंगे और मिन्नत-चिरौरी भी करेंगे। 
               इसके विपरीत जब मनुष्य दूसरों की आकाँक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता तब उससे बुरा और कोई नहीं होता। सबसे अधिक उसका बुरा तब होता है जब उसे नालायक और कामचोर कहकर अपमानित किया जाता है। उसके नाम के आगे एक असफल या नाकामयाब व्यक्ति होने का ठप्पा लग जाता है। फिर वह कितनी भी कोशिश कर ले स्थितियों को सुधारने में वह सफल नहीं हो पाता।
              एक के बाद एक भौतिक वस्तुओं को जुटाने की फिराक में भागता हुआ मनुष्य इतनी दूर निकल जाता है कि उसका सब कुछ छूटता चला जाता है। जब पीछे की ओर मुड़कर देखता है तब वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। फिर चाहकर भी अपनों के बीच नहीं जा पाता। यही वह समय होता है जब मनुष्य जीवन के उस मोड़ पर पहुँच जाता है जहाँ उसे अपनों के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए वह अशक्त होने लगता है। उस वक्त उसे अपनों के सशक्त कन्धों की जरूरत स्वाभाविक रूप से होती है।
             यही उसके सन्ताप का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। उस समय वह बस कलपता है, अपना मन मसोसकर रह जाता है कि जिनके लिए सारा जीवन भागदौड़ की, अपना सुख-चैन खो दिया, इससे भी बढ़कर स्वयं को भी भूल गया, वही नजरें मिलाकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। उससे कहीं दूर बेगानों की तरह हो गए हैं। उस स्थिति में भी इन्सान चेत जाए तब भी अच्छा है। एकाकी बैठकर आत्मचिन्तन करने पर ही समझ आती है कि अपने इस जीवन में क्या खोया और क्या पाया? मनुष्य जब तक खोये-पाये का लेखा-जोखा सुलझाता है तब तक इस संसार को अलविदा कहने का उसका समय आ जाता है।
                मनुष्य को अपनी असीम इच्छाओं को कुछ हद तक सीमित करना चाहिए। अनावश्यक ऐष्णाओं के पीछे भागने से कोई हल नहीं निकलने वाला। जितने भोगों को एकत्र करते जाओ, उतना ही मानसिक सन्ताप बढ़ता जाता है। इसलिए मृगतृष्णा के इस मायाजाल से यथासम्भव बचते हुए अपने जीवन में सुखोपभोग करना चाहिए अन्यथा इसके चंगुल से बच निकलना असम्भव तो नहीं बहुत ही कठिन अवश्य हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जिजीविषा

जिजीविषा

जिजीविषा एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ होता है जीने की प्रबल इच्छा अथवा जीवन के प्रति गहरा लगाव होता है। जीवन जीने की चाह, जीवन जीने की कला अथवा दीर्घायु की महत्वाकांक्षा। यह शब्द उस मानवीय जजबे को व्यक्त करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को न छोड़ने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन जीने की तीव्र लालसा, उत्साह और जीवटता को दर्शाता है।
            जिजीविषा शब्द का प्रयोग प्रायः उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह शब्द दर्शाता है कि मनुष्य अपने जीवन से कितना प्यार करता है और उसे बनाए रखने के लिए उसमें कितनी अदम्य इच्छाशक्ति है। जिजीविषा का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
            जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती तो वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े,  दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर प्रतिदिन ईश्वर से मृत्यु की कामना करता है। उसकी स्थिति को देखते हुए उसकी मनःस्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं।
           यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात लगती है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे मनुष्य के रूप में अवतरित हुए तब उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बस बैठा-बैठा कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
              जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ होना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह व्यक्ति मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई दे जाती हैं।
            हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी मनुष्य का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
             मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य या विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
          ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है। इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उबर जाता है। उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
            हम देखते हैं कि प्रकृति में भी जिजीविषा होती है। तभी सूखे और ठूॅंठ हो चुके पेड़ों में भी हरियाली देखी जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य की जिजीविषा असम्भव को भी सम्भव बना देती है। जिजीविषा मानव मन की अद्भुत शक्ति का प्रतीक होती है जो हमें हर परिस्थिति में जीवन को अपनाने और उसका जश्न मनाने की प्रेरणा देती है।
           कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे बिना डगमगाए खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही मनुष्य आकाश की बुलन्दियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

अग्नि का गुण

अग्नि का गुण

अग्नि का स्वाभाविक गुण जलाना होता है। हम इसे छू नहीं सकते। हम जानते हैं कि यदि इस पर हाथ रखेंगे तो वह जल जाएगा और तब हाथ पर फफोले पड़ जाऍंगे। फिर बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा। अग्नि का मुख्य गुण रूपान्तरण होता है जो उष्णता, तेज और प्रकाश प्रदान करना है। यह पंचतत्वों में से एक है। यह गर्म करने, पचाने और किसी भी पदार्थ को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। इसके अन्य गुणों में तीक्ष्णता, गतिशीलता, शुष्कता, हल्कापन और प्रकाश फैलाना शामिल है जो शारीरिक व मानसिक दोनों स्तरों पर क्रियाशील हैं। 
          अग्नि से हमारा जीवन चलता है। हम हर प्रकार के अन्न को इसी के माध्यम से पकाकर खाते हैं और स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं। यदि यह अग्नि न होती तो हम आज भी आदि मानव की तरह पेड़ों से तोड़कर सब कच्चा ही खाते। इसी अग्नि के कारण हम जीवन में सभी प्रकार की सुख और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। हमारे घर और बाहर हर ओर रौशनी होती है।
             अग्नि तीन प्रकार की मानी जाती है- दावानल, बड़वानल और जठराग्नि। दावानल जंगल में लगने वाली आग को कहते हैं जो जरा-सी हवा चलने पर बड़े-बड़े जगलों को जलाकर राख कर देती है। उसमें बड़े-बड़े वृक्ष, पशु और पक्षी जलकर खाक हो जाते हैं। बड़वानल समुद्र में लगने वाली आग को कहते हैं। पानी की यही आग है जिससे हम बिजली बनाते हैं और अपने जीवन में सारी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं।
           जठराग्नि मनुष्य के शरीर में होती है। यह भोजन को अच्छे से पचाने में सहायता करती है। शरीर की अग्नि जब सुचारू रूप से काम करती है तब मनुष्य के चेहरे पर तेज चमकता है उसकी रौनक ही अलग दिखाई देती है। युवावस्था में प्राय: लोगों के चेहरों पर हम देख सकते हैं। अपने जीवन को संयमित रखने वालों के चेहरों पर तेज हमेशा दिखाई देता है।
           शरीर में जठराग्नि सही स्थिति, मन की स्पष्टता, तीक्ष्ण बुद्धि और साहस प्रदान करती है।यदि यह अग्नि शरीर में बढ़ जाए तो बहुत-सी परेशानियों को जन्म देती है। मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है। पसीना भी बहुत अधिक आने लगता है। एसिडिटी और रक्त सम्बन्धी दोष शरीर में हो जाते हैं। शरीर में जलन होने लगती है। जरा-सी ठण्ड लग जाने पर खाँसी-जुकाम जैसी परेशानी हो जाती है। बारबार छींकते रहना पड़ता है। आवाज भारी हो जाती है और गला बैठने लगता है। 
            यदि शरीर की अग्नि मन्द हो जाती है तो मनुष्य का चेहरा कान्तिहीन हो जाता है। उस समय उसे बहुत से रोग घेर लेते हैं। उसकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे उसका भोजन पच नहीं पाता। पेट की बहुत-सी बिमारियों से मनुष्य घिर जाता है। पेट खराब हो जाने से खाने-पीने में परहेज करना पड़ता है।
            कभी घरों, बाजारों या फैक्टरियों आदि में आग लग जाए तो कितना नुकसान कर देगी पता नहीं। न जाने कितने ही लोगों की जान भी चली जाती है। यह अग्नि किसी को भी क्षमा नहीं करती जो इसमें घिर जाता है, वह फिर भस्म हो जाता है। परन्तु जब यह अग्नि तेजहीन होकर बुझ जाती है तो चींटियाँ भी इस पर चलने लगती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब रोगों से घिर जाता है तो वह भी तेजहीन हो जाता है। उसका चेहरा पीला या सफेद पड़ जाता है। उस समय वह सामर्थ्यहीन होकर ईश्वर से अपनी मृत्यु की गुहार लगाता है।
              अग्नि के प्रभाव से विभिन्न पदार्थ रूप परिवर्तित करते हैं। अग्नि हमेशा ही शुद्ध होती है। इसमें कैसा भी कचरा डाल दो, वह उसे भस्म कर देती है। इसी अग्नि में ही हम शव का दाह संस्कार भी करते हैं। किसी वस्तु अथवा विचार की शुद्धता की परीक्षा अग्नि में तपने के बाद ही होती है। यह रूक्ष होती है। अग्नि संयोग और वियोग दोनों का ही कारण भी होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम का आधार अग्नि तत्त्व होता है। इसी के कारण सृष्टि की सर्जना होती है। इसके मन्द पड़ जाने पर अलगाव की स्थिति बन जाती है।
            अग्नि का सबसे महत्वपूर्ण गुण भोजन, भावनाओं और विचारों को पचाकर उन्हें ऊर्जा में रूपान्तरित करना है। यह शरीर को पोषक तत्व अवशोषित करने में सहायता करती है। शारीरिक क्रियाओं को यह तेज और सुचारू बनाती है।अग्नि तीखी और तेज होती है जो बहुत तेजी से जल सकती है या धीमी गति से भी सुलग सकती है। अग्नि अपने सम्पर्क में आने वाली हर वस्तु को अपने में समाहित करने, भस्म करने या पवित्र करने का गुण रखती है।
            अग्नि का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व भी है। वेदों में अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है जो यज्ञ, हवन के द्वारा को विभिन्न देवताओं का भाग उन तक पहुँचाती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में इसके असन्तुलित हो जाने पर अग्नि विषमाग्नि यानी कभी तेज, कभी धीमी हो जाती है। कभी यह तीक्ष्णाग्नि यानी बहुत तेज हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में यह मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। 
            अग्नि हर स्थान पर अपनी शुद्धता को दर्शाती है। इसके होने पर तेज, प्रकाश और ताप से ही इस सृष्टि का जीवन है। इसके न होने पर चारों ओर अन्धकार तथा शीत का प्रकोप हो जाएगा जिसके कारण इस जीव जगत का अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वायु का प्रकोप

वायु का प्रकोप

वायु के प्रकोप पर हम चर्चा करते हैं। वैसे तो वायु हमारी जीवनी शक्ति है। इसके बिना हम एक पल भी नहीं रह सकते। यदि वायु के कुछ पल के लिए न होने की स्थिति में सब समाप्त हो जाता है, ब्रह्माण्ड में कुछ भी शेष नहीं बचता। वायु जहाँ हमें सुख देती है वहीं बहुत सारे कष्ट भी देती है चाहे वह हमारे शरीर के अन्दर की वायु हो अथवा ब्रह्माण्डीय वायु हो। इसके साथ की गई छेड़छाड़ हमें हमेशा बहुत मंहगी पड़ती है। फिर भी हम नहीं सुधरते, इसे दूषित करने का दुस्साहस करते हैं।
          वायु शरीर रूपी यन्त्र और शरीर के अव्ययों को धारण करती है। इस वायु का गुण सुखाना होता है। यह शरीर में रुक्षता पैदा करती है। यही वायु मन को भी चंचल बनाती है। शरीर से जब प्राणवायु निकल जाती है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है अर्थात मृत हो जाता है। इसे अग्नि को समर्पित करने में हम शीघ्रता करते हैं। कुछ समय के लिए इस शरीर को घर में नहीं रख सकते। यदि कुछ दिनों तक शरीर को सम्हालकर रखने का प्रयास किया जाए तो चारों ओर वातावरण में दुर्गन्ध आने लगती है। इससे बिमारियॉं फैलने का डर बढ़ जाता है।
           जब हमारे शरीर के भीतर की वायु बिगड़ने लगती है तब पेट में अफारा हो जाता है, पेट फूल जाता है। डकारें और पाद आने लगते हैं। अर्थात् ऊपर और नीचे से हवा निकलने लगती है। इस कारण कभी-कभी मनुष्य को हिचकियाँ आने लगती हैं। इसी प्रकार शरीर के अंग यानी हाथ, पैर और गर्दन आदि हिलने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो पार्किन्सन नामक रोग मनुष्य को हो जाता है। कुछ लोगों की आँख, कुछ के गाल और कुछ के होंठ भी चलने लगते हैं।
              इन सबसे भी अधिक कष्टकारी वह स्थिति होती है जब मनुष्य के शरीर में लकवा मार जाता है जिससे वह अपाहिज की तरह बिस्तर पर पड़ जाता है। स्वय कुछ भी नहीं कर पाता बल्कि वह दूसरों की कृपा का मोहताज हो जाता है। उस समय वह ईश्वर से अपने लिए मौत की गुहार लगता है। परन्तु समय से पहले उसे मौत भी नहीं आती। इस वायु के ही कारण मनुष्य को हृदय रोग तथा मस्तिष्क रोग भी होते हैं।
             प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर वायु बिगड़ जाती है जिसके कारण से झंझावात आते हैं। तब सब तहस-नहस होने लगता है। आँधी-तूफान बर्बादी मचाने लगते हैं। हर ओर प्रलंयकारी स्थिति बनने लगती है। ब्रह्माण्ड में वायु तब बिगड़ती है जब हम उसे प्रदूषित करते हैं। तब उसी प्रदूषित वायु का सेवन करने से हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। साँस की बिमारियाँ इसी प्रदूषित वायु का उपहार हैं। श्वास नली के कैंसर जैसे भयंकर रोगों तक की चपेट में आ जाते हैं।
             हमारे शरीर की वायु हो या हमारे ब्रह्माण्ड की वायु उन दोनों को दूषित करने के दोषी हम स्वयं हैं। गलत खान-पान का परिणाम होता है शरीर की वायु का दूषण जो समय-समय पर रोग के रूप में आकर हम लोगों को चेतावनी देती रहती है। पहले हम जीभ के चटोरेपन के कारण आवश्यकता से अधिक खा लेते हैं या फिर वे खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनका हमें परहेज करना चाहिए। उन्हें खाकर बीमार पड़ते हैं। हमें स्वास्थ्यवर्धक भोजन रुचिकर नहीं लगता। हम लोग जंक फूड अथवा अधिक तला-भुना भोजन खाकर प्रसन्न होते हैं, उसमें हमें अधिक स्वाद आता है। यही स्वाद हमारे शरीर को रोगी बना देता‌ है।
           हमारे गलत रहन-सहन का कारण होता है वायु प्रदूषण। हम अपने सुविधापूर्वक आवागमन के लिए विभिन्न प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण नित्य‌ प्रति वायुप्रदूषण बढ़ता रहता है। अपनी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए फैक्टरियाँ लगाते हैं जिनका धुँआ भी वायु को दूषित करता है। अपने घरों और दफ्तरों आदि को सुरक्षित करने और उन्हें सजाने तथा दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु कागज के लिए हम पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करते जाते हैं जो वायु को दूषित करने का प्रमुख कारण बन जाता है। इस प्रदूषित वायु से हम अनेक रोगों को आमन्त्रण दे बैठते हैं।
             इस प्रकार शरीर और वायुमण्डल दोनों ही प्रकार की वायु को दूषित करके हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। तब हम डाक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों बर्बाद करते हैं।इनके कुपित हो जाने के फलस्वरूप हम जीवन में कष्ट पाते हैं। ऋतुओं के क्रम को वायु ही बिगाड़ती है। इसी कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि का दंश हमें झेलना पड़ता है। तेज चलने वाले ऑंधी और तूफानों का हमें सामना करना पड़ता है। किसी स्थान विशेष पर लगने वाली आग अथवा‌ जंगल की आग को भी यही वायु भड़काती है। इससे कितने ही जान और माल की हमें हानि उठानी पड़ती है। 
              वायु का स्थान ईश्वर के समान है। यह अव्यय भी है और अविनाशी है। यही वायु प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का कारण बनती है। इस प्रकार वायु सुख और दुख का कारण होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

पल की खबर नहीं

पल की खबर नहीं 

पल की खबर नहीं कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व जन्म कृत कर्मों के अनुसार हम इस संसार में सीमित समय के लिए आए हैं। यहॉं से विदा होने के विषय में हम नहीं जानते। इसकी जानकारी तो केवल सृष्टि कर्ता ईश्वर को है, हम मनुष्यों को नहीं है। हम तो बस उस प्रभु के हाथ की कठपुतलियॉं हैं। जैसा वह चाहता है वैसा कार्य हम लोगों से करवा लेता‌ है। निम्न उक्ति हम सबने बहुत बार सुनी है और कहीं भी है -
          सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
यह उक्ति प्राय: हम सभी यदा-कदा दोहराते रहते हैं। परन्तु बड़े दुख की बात है कि जब इस पर आचरण करने का समय आता है तब हम सभी इसे भूल जाते हैं। हम अपने घर में एक के बाद एक सामानों के बिना सोचे-समझे अनावश्यक ढेर लगाते चले जाते हैं चाहे हमें उनकी आवश्यकता हो अथवा न हो। बस झूठे आत्मतोष के लिए अनावश्यक रूप से हम भटकते रहते हैं।
             कभी पड़ौसी की होड़ में लगकर तो कभी किसी नाते-रिश्तेदार की नकल में हम रेस लगा रहे हैं। यह तो वही बात हुई कि उसकी 'कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे?' पता नहीं यह अन्धी दौड़ कब तक और कहाँ तक जाकर रूकेगी? कोई भी किसी से छोटा नहीं कहलवाना चाहता। हमारे घर में दुनिया की हर चीज होनी चाहिए चाहे उसे खरीदने की हमारी हैसियत न हो या न हो। हमारे पास साधन हैं तो बहुत बढ़िया, नहीं तो हम कर्ज लेकर ही अपनी जिद पूरी कर लेना चाहते हैं। इसका परिणाम तो हम प्रतिदिन सड़क पर जाम के रूप में और बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के रूप में भोगते जा रहे हैं। फिर भी हम जाग नहीं रहे, बस मस्त हैं अपनी ही धुन में।
          अपने घर की ओर नजर दौड़ाइए जहाँ जगह ही नहीं हैं। घर की अल्मारियाँ कपड़ों से ठूँसी पड़ी हैं परन्तु हमारे पास किसी भी अवसर पर पहनने के लिए वस्त्र नहीं होते। क्राकरी सम्हाले नहीं सम्हल रही पर किसी के सामने हम उसमें सर्व नहीं कर सकते। घर के हमारे कमरे सामान रखते-रखते गोदाम की शक्ल के बनते जा रहे हैं। चलते समय शायद सामान से ठोकर ही लग जाती हो, उसकी हमें कोई चिन्ता नहीं होती। हम तो अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं।
               हम सब जानते हैं कि इस ससार में हम सीमित समय के लिए जन्म लेते हैं और फिर यहाँ से निश्चित जीवन व्यतीत करके, विदा लेकर अपने अगले पड़ाव के लिए चल पड़ते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच की इस दूरी को पार करते समय हम अपने लोभ और मोह के वशीभूत सब कर्म और कुकर्म करते चले जाते हैं। इस सत्य को हम भूल जाते हैं कि मृत्यु आने के बाद सब यहीं रह जाएगा। बस सदा अन्धाधुन्ध अनुकरण करते चले जाते हैं।
          कुछ महानुभाव ऐसे हैं जो जायज-नाजायज हर तरीके से धन कमाने में जुटे हुए हैं। वे कहते हैं हमारे पास इतना धन है कि हमारी सात पुश्तें बैठकर खा सकती हैं। फिर भी दूसरो का हक छीनने और गला दबाने में उन्हें कोई परहेज नहीं। वे लोग इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि यदि आज भूकम्प, बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आ जाएँ तो उनकी सारी लूट-खसौट धरी-की-धरी रह जाएगी। वह किसी काम नहीं आने वाली। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी के मन से निकलने वाली हाय कभी चैन नहीं लेने देती।
             जमाखोरी और हेराफेरी करने वाले लोग इतने हृदयहीन हो गए है कि जन साधारण के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए उन्हें ईश्वर से जरा भी डर नहीं लगता। बस पैसा और हाय पैसा यही उनके जीवन का मानो उद्देश्य रह गया है। समय आने पर यह पैसा भी काम नहीं आता। न यह स्वास्थ्य खरीद सकता है और न ही रिश्ते। ऐसे ही लोग एक समय आने पर निपट अकेले रह जाते हैं। उस समय पश्चाताप करते हैं पर तब तक सब साथ से निकल चुका होता है।
            आज वातावरण कुछ ऐसा दूषित होता जा रहा है कि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लूट-खसौट का बाजार बहुत गरम हो रहा है। हर शक्तिशाली कमजोर को दबाकर उसका सब हड़पना चाहता है। शायद सभी सोचते हैं कि वे पृथ्वी पर आ गए है तो यहाँ से कभी नहीं जाएँगे। उनका यह घमण्ड किस दिन टूट जाए कोई भी नहीं जानता। इस सबका परिणाम यह है कि इन्सान एक-दूसरे पर से अपना विश्वास खोता जा रहा है। हर एक को सन्देह की नजर से देखने लगा है। दया, ममता, सहनशीलता, करुणा, परोपकार आदि मानवोचित गुणों का ह्रास होता जा रहा है। 
            मनुष्य यदि यह याद रख सके कि वह सदा के लिए इस धरा पर रहने नहीं आया है तो शायद सौ बरस की जमाखोरी, हेराफेरी, चार सौ बीसी, रिश्वतखोरी की हवस कुछ कम हो जाए। इन्सान को हमेशा परमपिता से डरते रहना चाहिए। अपनी जरूरतों व इच्छाओं की पूर्ति मनुष्य को करनी चाहिए पर उन्हें अपने सिर पर सवार नहीं होने देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बाल हठ

बाल हठ 

सामान्यतः तीन प्रकार के हठ माने जाते हैं - बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ। त्रिया हठ और राज हठ की अपेक्षा बाल हठ को सबसे खतरनाक अथवा गम्भीर माना गया है। इसका कारण है कि बच्चों की जिद का परिणाम बहुत कष्टदायक होता है। बाल हठ का अर्थ है बच्चे की जिद या अपनी बात मनवाने के लिए अड़ जाना। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चा अक्सर अपनी जिद पूरी करवा ही लेता है। इसे ठिनक या हठधर्मिता भी कहा जाता है
             बाल हठ सबके लिए परेशानी का कारण बनता है। बच्चे प्राय: जिद करते हैं। वे किसी भी चीज को लेकर हठ कर सकते हैं। यदि उनकी जिद को पूरा न किया जाए तो वे फर्श पर लेट जाएँगे, चीखे-चिल्लाएँगे, तोड़-फोड़ करेंगे और घर में खूब शोर मचाएँगे। बच्चे के ऐसे व्यवहार से घर का वातावरण अशान्त हो जाता है। उनके ऐसा व्यवहार करने के उपरान्त यदि माता-पिता उनके हठ को मान लेते हैं तो समझ लीजिए कि बच्चा सौ प्रतिशत हठी बन जाएगा।
            इसके विपरीत यदि उसके ऐसे व्यवहार के बदले उसे थोड़ी देर के लिए उसी हालत में अकेला छोड़ दिया जाए तो उसे समझ आ जाएगा कि उसकी दाल नहीं गलने वाली। तब वह थक-हारकर स्वयं चुप हो जाएगा और माता-पिता को मनाने का यत्न करेगा। यदि बच्चा हठ करने लगे तब उसे प्यार से समझाइए अथवा कोई मजबूरी हो तो बताइए, वह अवश्य मान जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता कि वह फिर से कोई ऐसी माँग आपके सामने रखेगा कि आप इन्कार कर दें।
            आदर्श स्थिति यही है कि बच्चे के कुछ माँगने से पहले ही उसकी जरूरतों को पूरा कर दिया जाए। एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप अपने लिए नित नई वस्तुएँ घर में लाएँगे और बच्चे की माँग पूरी नहीं करेंगे तो बच्चा आपको ताना देने से बाज नहीं आएगा। वह अवश्य कहेगा कि अपने लिए पैसे हैं, बस मेरे लिए ही पैसे खत्म हो जाते हैं। इसलिए बड़ों के लिए सावधानी और संयम दोनों ही बरतना बहुत आवश्यक है।
             इतिहास गवाह है कि दुनिया को झुकाने की सामर्थ्य रखने वाले बड़े-बड़े साम्राज्य तक बाल हठ के समक्ष हार जाते हैं। रामायण में एक प्रसंग आया है कि लव और कुश अपनी माता भगवती सीता को बताए बिना हठ ठान लेते हैं कि वे भगवान राम द्वारा छोड़े गए अश्वमेध के घोड़े को पकड़ेंगे। उन्होनें भगवान राम की चतुरंगिनी सेना की परवाह नहीं की और अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए उस अश्व को पकड़ लिया। उस समय उन दोनों के अदम्य साहस को अयोध्या की सारी शक्तिशाली सेना देखती रह गई।
             रामचरितमानस के अनुसार इसी प्रकार बाल हनुमान जी ने तो भगवान सूर्य को निगल लेने का हठ कर लिया था और उन्होंने अपने हठ को पूरा भी किया।
               हठी बच्चे किसी को भी अच्छे नहीं लगते। किसी के घर जाने पर उन्हें वह सम्मान और प्यार नहीं मिल पाता जो उन्हें मिलना चाहिए। लोग उन्हें यह कहकर तिरस्कृत करते है कि 'बड़े ही डीठ बच्चे है, मानेंगे नहीं।' यही जब बड़े होते हैं तो उनके माता-पिता स्वयं ही ऐसे बच्चों से डरने लगते हैं। बताइए, ऐसी औलाद का क्या लाभ जो हमेशा सिर पर ही सवार रहे।  
              बच्चों के हठ यानी जिद को यदि हम सकारात्मक कार्यों में जुनून अथवा धुन के रूप में  परिवर्तित कर सकें तो वह हमेशा आश्चर्यचकित कर देने वाले कार्य करते हैं। इस जुनून की बदौलत ज्ञान, विज्ञान, खेल आदि किसी भी क्षेत्र में वे आशातीत सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उसका परिणाम हमारे समक्ष वैज्ञानिक चमत्कारों के रूप में हैं। निस्सन्देह हमारे सभी महापुरुष भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
             यदि बाल हठ को हम हौव्वा मानकर चलेंगे तो अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का कार्य करेंगे। आतंकवाद ऐसे ही हठी बच्चों की जिद का परिणाम है जिसकी चपेट में आज पूरा विश्व है। सभी इससे छुटकारा पाना चाहते हैं। बच्चों को ऐसे संस्कार देने की महती आवश्यकता है जिससे वे हठी, जिद्दी या डीठ न बनकर समझदार बच्चे बन सकें। अपना तथा अपने माता-पिता का नाम समाज में रौशन कर सकें। लोग उन्हें हिकारत की नजर से न देखें बल्कि उनके उदाहरण दूसरों के सामने रखने के लिए मजबूर हो जाएँ।
            माता-पिता का दायित्व है कि बचपन से ही अपने बच्चों को आपसी सामंजस्य से रहने की और सहनशील बनने की शिक्षा दें। इससे वे अपने माता-पिता का मान बनेंगे और अपने लिए समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकेंगे। इन्हीं भावी कर्णधारों के कन्धों पर हमारे देश तथा समाज का दायित्व निर्भर करता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

माता-पिता साक्षात भगवान

माता-पिता साक्षात भगवान 

निर्विवाद सत्य है कि माता-पिता का स्थान संसार में सबसे ऊपर है। ईश्वर को हम लोगों ने कभी नहीं देखा परन्तु हाँ, उसकी उपस्थिति को हम हर कदम पर अनुभव करते हैं। माता-पिता साक्षात ईश्वर का स्वरूप हैं जो मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने का महान कार्य करते हैं। आजन्म उनकी सेवा करके भी मनुष्य उनके इस ऋण से उऋण नहीं नहीं हो सकता। जो मनुष्य उन्हें ईश्वर की तरह मानते हुए उनका हर प्रकार से ध्यान रखता है और उनका सम्मान करता है उसे सभी प्रकार के सुख-साधन ईश्वर उन्हें देता है।
           अपने माता-पिता का दिल दुखाने के विषय में तो सोचना भी अपराध है। वे मनुष्य सारा जीवन परेशान रहते हैं जो अपने माता-पिता की अवहेलना करते हैं। मात्र दिखावा करने से उनकी सेवा नहीं की जा सकती। उसके लिए मन में पूर्ण श्रद्धा रखनी आवश्यक होती है। यहाँ मुझे एक कथा याद आ रही है।
              इस विषय से सम्बन्धित एक कथा मुझे स्मरण हो रही है। कथा कहती है कि कभी किसी समय देवताओं के मध्य यह विवाद उत्पन्न हुआ, "किस देवता की सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए?"
           देवों के मध्य कोई स्वीकृति नहीं बन रही थी। इसलिए सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनके कहा, "पितामह, आप बताइए कि सबसे पहले किस देवता की उपासना की जानी चाहिए?"
            उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा, "जो देवता समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटकर आएगा, सभी देवों में उसकी उपासना पहले की जाएगी।"
            सभी देवगण अपने लक्ष्य का सन्धान करने के लिए चल पड़े। गणेश जी अपने वाहन मूषक के साथ वहीं रुके रहे। यह देखकर देवर्षि नारद परेशान हो गए थे उन्होंने पूछा, "गणेश, तुम परिक्रमा के लिए क्यों नहीं जा रहे? आपका वाहन मूषक है जो धीरे-धीरे चलता है फिर भी आपको कोई चिन्ता नहीं है हारने की।" 
             नारद जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो गणेश जी ने अपने माता-पिता यानी कि भगवान शंकर और भगवती पार्वती की परिक्रमा की और कहा, "मेरी परिक्रमा तो पूर्ण हो गई।"
            पूछने पर उन्होंने बताया, "माता-पिता के चरणों में ही मेरा सारा संसार है। अतः मुझे अन्यत्र कहीं भी जाने की आवश्यकता ही नहीं है।"
             अपने माता-पिता की परिक्रमा करके गणेश जी सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। सभी देवता जब लौटे तो गणेश जी के वाहन मूषक के पैरों के निशान देखकर वे हैरान हो गए और कहा, "गणेश जी सबसे पहले परिक्रमा करके कैसे लौट आए?"
              तब ब्रह्मा जी ने बताया, "गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके मानो सारे संसार की परिक्रमा कर ली हैं।"
            उनकी इसी मातृ-पितृ भक्ति के कारण ही किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान का सम्पादन करते समय सब देवताओं में सबसे पहले गणेश जी वन्दना की जाती है।
            यह कथा हमें समझाती है कि माता-पिता के चरणों में सम्पूर्ण जगत है जो इस सत्य का मनसा पालन करता है, उस जैसा मनुष्य तो इस धरा पर कोई और हो नहीं सकता। माता-पिता घर-परिवार का आधार स्तम्भ होते हैं। ये वह धुरी होते हैं जिनके ईर्दगिर्द परिवार का पहिया घूमता रहता है। इसीलिए कहा जाता है- 
        माता-पिता की बादशाही होती है और    
       भाई-बहनों का व्यापार होता है।
          माता-पिता की सेवा और अर्चना को  महत्त्व को समझाते हुए संस्कृत भाषा का निम्न श्लोक कहता है- 
          येन माता पिता सेव्या पूजिता वा।
         मन्दिरे  तेन पूजा  कृता वा न वा।।
अर्थात् जो मनुष्य माता-पिता की सेवा और पूजा करता है, वह मन्दिर जाकर पूजा करे अथवा न करे।
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे माता-पिता जीवित देवता हैं। उनकी सेवा करना सबसे बड़ी पूजा है। ईश्वर मन्दिर से ज्यादा उन लोगों के हृदय में रहते हैं जो अपने माता-पिता की सेवा मन लगाकर करते हैं। यदि माता-पिता की सेवा नहीं करते और सिर्फ मन्दिर में पूजा करते है  तो वह पूजा अधूरी रह जाती है। माता-पिता का सम्मान और सेवा-सुश्रुषा ही सबसे बड़ा तीर्थ और सबसे बड़ी पूजा है
            हमारे शास्त्र भी यही मानते हैं कि मन्दिर में मूर्तियों के आगे माथा टेको या नहीं पर घर में जीवित विद्यमान साक्षात ब्रह्म स्वरूप माता और पिता की पूजा-अर्चना अवश्य करो। पूजा-अर्चना का अर्थ थाली सजाकर पूजा करना नहीं बल्कि उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करना और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देना है। अपने लोक-परलोक को सुधारने के लिए कृत संकल्प हो जाएँ तो श्रेयस्कर होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

नकारात्मक बयार

नकारात्मक बयार

वायुमण्डल में चारों ओर ही नकारात्मक बयार बह रही है। हर वो चीज जो हमारी आत्मा के स्तर को उठाने के स्थान पर नीचे गिराती है, उसे हम  नकारात्मकता है। वह कुछ भी हो सकता है - जैसे बुरे विचार, डर, लोभ, मोह, आलस, घृणा, अन्याय, बुरे संस्कार, गलत कार्य आदि। ऐसे सभी कार्य, वस्तुऍं अथवा भाव जो हमें जीवन में नीचे गिराते हैं, नकारात्मकता का ही रूप होते हैं। नकारात्मकता का गहरा प्रभाव हम सबके तन यानी हमारे स्वास्थ्य, मन, धन और मस्तिष्क सब पर  होता है।
              सबसे पहले हम तन की चर्चा करते हैं। पर्यावरण के दूषित होने कारण हमारे शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है। गाड़ियों, ए सी, फेक्टरियों आदि के धुँए के कारण दूषित वायु के चलने से साँस सम्बन्धी बिमारियों से बहुत से लोग झूझ रहे हैं। हमारी नदियों के जल को कारखानों का कचरा और सीवर का गन्दा पानी दूषित कर रहा है। इससे पेट सम्बन्धी बिमारियों से लोगों को न चाहते हुए लड़ना पड़ रहा है।
             हमारे खाद्यान्नों, सब्जियों और फलों आदि पर इस दूषित जल का कुप्रभाव पड़ता है। खेती में किसानों द्वारा डाले गए उन जहरीले कीटनाशक रासायनिकों के कारण ये सब खाने योग्य नहीं रह जाते परन्तु फिर भी हम खा रहे हैं। इसलिए जन साधारण को कैंसर जैसे अनेकानेक असाधारण रोग दिन-प्रतिदिन पीड़ित कर रहे हैं।
           सड़कों पर वाहनों के बढ़ते शोर और उनके बजने वाले हार्न परेशान करते हैं। शादी-विवाह में समय-असमय बजने वाले डीजे व बैंड-बाजे की कनफाड़ू धुनों से हम लोगों को कानों से सम्बन्धित बिमारियाँ हो रही हैं।
             ईश्वर ने हमारे चंचल मन को बहुत ही संवेदनशील बनाया है। जरा से भी नकारात्मक विचार इसे मथने लगते हैं और यह व्याकुल हो जाता है। चारों ओर ही निराशा का माहौल पसरा हुआ है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अपहरण, लूट, बलात्कार, हत्या जैसी जघन्य घटनाएँ निराशा को जन्म देती हैं। राजनैतिक उठा-पटक भी नित्य ही विचलित करने में पीछे नहीं रहती। ऐसे माहौल में जीवन यापन करना बड़े जीवट का काम है। कुछ लोग ऐसे माहौल को देखकर डिप्रेशन के शिकार होने लगते हैं।
        इन सब घटनाओं को पढ़कर और सुनकर मन तार-तार होने लगता है। दूसरा कारण मन के पीड़ित होने का है बिमारियों की चपेट में आना। शरीर जब किसी भी कारण से अशक्त हो जाता है तब मनुष्य लाचार हो जाता है और दूसरों पर आश्रित हो जाता है। ऐसी स्थिति में मन में निराशा के भाव आना स्वाभाविक होता है। धन और समय की हानि अलग होती है।
          इस सबके अतिरिक्त कुछ फिल्मी गीतों में भी निराशा के भाव झलकते रहते हैं। कमप्यूटर पर खेले जाने वाले साहसिक खेल बच्चों को आत्महत्या करने के लिए उकसाते हैं जिनकी चर्चा टीवी सीरियलों, समाचार पत्रों आदि में समय-समय पर होती रहती है। ये सभी कारण मानव मन को विचलित करने के लिए पर्याप्त होते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को ताबड़तोड़ बढ़ती मंहगाई के कारण पूर्ण न कर पाना भी मानसिक अवसाद का एक बड़ा कारण बन जाता है। इस तरह मन का अस्वस्थ होना अनेक मनोरोगों को जन्म देता है।
          धन बेचारा क्या-क्या करे? मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करे या हर रोज बिमार पड़ जाने पर डाक्टरों के पास जाकर व्यय हो जाए। अब शरीरिक और मानसिक रोगों का इलाज करवाना भी तो जरूरी है। दिन-रात एक करके और खून-पसीने से कमाए धन को और समय को डाक्टरों के पास जाकर खर्च करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। फिर भी कोई गारण्टी नहीं है कि मनुष्य पूर्णरूपेण स्वस्थ हो ही जाएगा।
          सरकार कितने ही कड़े कानून क्यों न बना ले उससे कोई हल नहीं निकल सकता जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे। बहुत-सी समाजसेवी संस्थाएँ अपने-अपने स्तर पर हमें जगाने का प्रयास करती रहती हैं। सरकार भी विज्ञापनों के माध्यम से भी जन जागरण का यत्न करती है। फिर भी इच्छाशक्ति और विश्वास की शायद कहीं कमी रह जाती है। इसीलिए ये परेशानियाँ हम सब लोगों को झेलनी पड़ती हैं।
             एवंविध वायुमण्डल व पर्यावरण को दूषित करने के दोषी हम सभी लोग हैं। इसका निदान भी हम सबको मिलकर ही खोजना होगा। अपने तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचना ही वास्तव में मानवता कहलाती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

हरि भजन आवश्यक कार्य

हरि भजन आवश्यक कार्य

निम्नलिखित लोकोक्ति को पढ़कर हम अन्तस की पीड़ा का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं-
     आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
अर्थात् मानव का यह चोला मनुष्य को ईश्वर की भक्ति करने के लिए मिला था पर इस संसार की हवा लगते ही मनुष्य यहॉं की चकाचौंध में खो जाता है। ईश्वर से किए हुए अपने सब वायदे भूलकर यहाँ के कारोबार में व्यस्त हो जाता है। फिर धीरे-धीरे उस मालिक की ओर से अपनी नजरें फेर लेता है।
           इस लोकोक्ति का हम यह अर्थ भी कर सकते हैं कि किसी महान अथवा उच्च उद्देश्य को छोड़कर किसी तुच्छ या साधारण काम में लग जाना है। यह लोकोक्ति मूल काम से भटककर अनावश्यक कार्यों में समय बर्बाद करने के सन्दर्भ में प्रयोग की जाती है। 
            मनीषियों का कथन है कि जब जीव माता के गर्भ में होता है तो उस समय वह कष्ट उससे सहन नहीं होता। ईश्वर को उस अन्धकार से बाहर निकालने के लिए वह गुहार लगता है। तब वह कसमें खाता है कि वह जन्म लेने के पश्चात उस मालिक की आराधना करेगा, उसे हर पल याद स्मरण करेगा और क्षण भर के लिए भी उसे नहीं भूलेगा।
             इस संसार में जब वह जन्म लेने के कुछ समय तक उसे अपनी सारी कसमें याद रहती हैं और उस प्रभु का स्मरण करता है। फिर धीरे-धीरे दुनिया के झमेलों में घिरता हुआ वह ईश्वर की ओर से विमुख होने लगता है। तब वह सोचता है कि सारी उम्र पड़ी है हरि का भजन करने के लिए, उसका नाम जपने की। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वह नित नए बहाने गढ़ने लगता है। 
            इस तरह करते हुए सारी आयु बीत जाती है और अन्तकाल आ जाता है परन्तु हरि भजन की आयु नहीं आ पाती। काल को सामने देखकर वह हाथ जोड़कर क्षमा याचना करता है परन्तु उस उस समय तक तीर निशाने से निकल चुका होता है और बचते हैं वही ढाक के तीन पात। कहने का तात्पर्य है कि तब प्रायश्चित करना ही शेष बचता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण यही है कि तब उस समय मालिक मनुष्य को पश्चाताप करने के लिए पलभर का समय भी मोहलत के रूप में उधार नहीं देता।
            हम भी यदि किसी को समय सीमा निश्चित करके कोई काम देते हैं और वह तय समय में उस कार्य को नहीं कर पाता तो हम भी दूसरे व्यक्ति पर दया नहीं दिखाते बल्कि उसे लताड़ते हैं। एकाध बार तो हम उसे क्षमा कर सकते हैं परन्तु जब यह उसकी आदत बन जाती है तो हम उसे कदापि नहीं छोड़ते। और वह कार्य उससे छीन लेते हैं। यदि हम ऐसा व्यवहार दूसरे लोगों से करते हैं तो उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह बारबर हमें अपने काम में कोताही करने पर हमारी पुकार पर द्रवित हो जाए। हमें माफ करके थोड़ा और समय उपहार में दे।
            इस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उस मालिक निश्चित समय देकर हमें इस संसार में भेजता है। उसी समय के अनुसार हमें सौंपा गया कार्य निपटाना होता है। हम न जाने कितने जन्मों से अपने लिए निर्धारित कार्यों को पूरा नहीं कर रहे होते तो हम उस मालिक से आँख मिलाने का साहस ही नहीं जुटा पाते। हमारी बारबार याचना करने पर भी वह अनसुना करता है क्योंकि वह हमारी आदतों को भली-भाँति जानता है।
             इसीलिए मनीषियों के मन में यह क्षोभ रहता है कि मनुष्य दुनिया के बेकार के कामों में उलझे रहते हैं जिनके बिना उनका जीवन बड़ी आसानी से सुविधापूर्वक चल सकता था। जिस कार्य को करने का लक्ष्य लेकर वे इस धरा पर अवतरित हुए थे, उसे पूरा करने में सफल नहीं हो पाए। इसलिए वे नाकामयाबी का कलंक अपने माथे पर लेकर इस दुनिया से विदा हो रहे हैं।
            जब हम अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में होते हैं तब हम यह विचार करते हैं कि हम अच्छे कर्मों के साथ विदा लेंगे। यदि इस दुनिया में वापिस आना पड़े तो हम एक ऐसा इन्सान बनकर आऍं जो अपने अच्छे कर्मों के साथ आया है। बड़े दुख की बात है कि फिर से वही चक्र चलता है और हम वही गलतियॉं दोहराते हैं। हम एक दूसरे की बुराइयॉं करते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि  विशेष कार्य को छोड़कर हम अनावश्यक कार्य में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं। अपने को बुरे कर्मों के कारण फिर से उनका हिसाब अपने सिर पर खड़ा कर लेते हैं।
          उचित समय तो हमेशा ही रहता है। इसलिए उसकी प्रतीक्षा न करते हुए अपने लक्ष्य यानी ईश्वर की उपासना करते हुए मोक्ष प्राप्त करने की ओर मात्र ध्यान लगाना चाहिए। ऐसा करते हुए हम उस मालिक के प्रिय पात्र बनेंगे और उससे मुँह छिपाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। तब उसके पास जाने के लिए प्रसन्नता से समय की प्रतीक्षा करेंगे। उस समय मन में यह दुख नहीं होगा कि अपने लक्ष्य को भूलकर संसार के चक्रव्यूह में फंसे रहे।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

अपने बच्चों को जहाँ तक हो सके बचपन से ही स्वावलम्बी (independent) बनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से छोटे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। उस समय उन्हें ऐसा लगता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। इसलिए माता-पिता उन पर विश्वास करने लग गए हैं।
               बच्चे हर काम को स्वयं करना चाहते हैं। हम देखते हैं कि बहुत छोटे बच्चे दूध पीते समय बोतल को स्वय पकड़ना चाहते हैं। उन्हें खाना होता है तो चम्मच अपने हाथ से पकड़ने की जिद करते हैं, चाहे वे खा पाएँ या बिखेरते रहें। सबके बीच में बैठा हुआ बच्चा यही कोशिश करता है कि अपनी प्लेट से खाना खुद ही खाए। जो भी दाल-सब्जी वगैरह बड़ों की प्लेट में हैं, वे सब पदार्थ उनकी प्लेट में भी होने चहिए।
             बच्चे जब थोड़े और बड़े होते हैं तब बड़ों की देखा-देखी वे भी स्वयं ही अपना खाना परोसना चाहते हैं। हर बात पर उनका यही उत्तर होता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। उनके इस कथन का मान रखते हुए थोड़े-थोड़े काम उन्हें सौंपने चाहिए। सच मानिए बच्चे बहुत खुश होते हैं जब उन्हें यह अहसास होता है कि वे बड़े हो गए हैं। इसलिए उन्हें काम करने के लिए कहा गया है।
              पापा घर से दफ्तर जाते है या दफ्तर से वापिस घर आते हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चा भाग-भागकर पापा की सेवा में हाजिर हो जाता है। वह उनके कहे कामों को करके और उनसे शाबाशी पाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। इसी तरह अपनी माँ को घर का काम करते देख बच्चा भागकर हाथ बटाने चला आता है। कभी वह डस्टिंग करने लगता है तो कभी झाड़ू उठा लेता है। कभी-कभी तो वह रोटी बनाने तक की जिद कर बैठता है। वह बात अलग है कि ऐसा करते समय काम कुछ अधिक फैल जाता है।
              इसी तरह घर में रहने वाले पालतू जीव को खिलाना, उसके साथ खेलना और उसे घूमाना भी वह पसन्द करता है। पौधो को पानी देने में भी उसे मजा आता है। उसका खेल भी हो जाता है और काम भी हो जाता है। बच्चे को प्रोत्साहित करते हुए उसे काम करने की आदत डालिए। हो सकता है कि निकट भविष्य में विदेशों की तरह यहाँ हमारे देश में भी काम करने वाले नहीं मिलें। उस समय बच्चों के साथ मिल-जुलकर बिना परेशान हुए आप सभी कार्य कर सकेंगे।
             बच्चा जब चलना शुरू करता है और बात को समझने लगता है तभी से उसे स्वावलम्बी बनाने की ट्रेनिंग देनी पड़ती है। छोटा-छोटा सामान रसोई में रखकर आना, खिलौने सम्हालने में मदद करना, अपने जूते व कपड़े पहनना, कचरा इधर-उधर न फैंकर कूड़ेदान में डालकर आना आदि कार्य करने के लिए बच्चे को सिखाया जाना चाहिए।
             जब और बड़ा हो तब उसे उसकी आयु के अनुसार घर में कार्य दिए जाने चाहिए। बाजार से दूध, ब्रेड, आइसक्रीम या और जरूरत का छोटा-मोटा सामान लाने के लिए सिखाया जाए। एकाध बार यदि कोई गलती हो जाए तो उसे डाँटने के बजाय प्यार से समझाएँ ताकि उसका उत्साह बना रहे। उसे यह कभी नहीं लगना चाहिए कि उसके हर काम में मीनमेख निकालकर उसे लताड़ा जाता है। दो-चार बार ऐसा हो जाने पर उसका आत्मविश्वास डगमगा जाएगा।
               ज्यो-ज्यों बच्चे बड़े होते हैं त्यों-त्यों वे स्वावलम्बी बनते जाते हैं। उन्हें इतनी ट्रेनिंग अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपना पेट भरने लायक कुछ भी बना सकें। ऐसा करने पर उनके भूखे रहने की चिन्ता नहीं रहती और माता-पिता भी निश्चिन्त होकर अपने कार्य कर पाते हैं।
              बच्चों को स्वावलम्बी बनाने के लिए उन्हें छोटी आयु से ही उनके निजी काम करने देने  चाहिए। जैसे कपड़े पहनना, अपना बैग पैक करना आदि। उम्र के अनुसार घरेलू जिम्मेदारियॉं यानी पौधों को पानी देना, मेज साफ करना आदि कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को  विकसित करना चाहिए। अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही खोजने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि वे गलती करें तो उन्हें निराश नहीं करना चाहिए। उन्हें गलतियों से सीखने में माता-पिता को सहायता करनी चाहिए। वे अपनी ओर से जो भी प्रयास करें, उनकी सराहना करनी चाहिए।
             माता-पिता का यह दायित्व बनता है कि बच्चों को अनावश्यक ही प्रोटेक्ट न करके उन्हें बचपन से ही स्वावलम्बी बनाएँ। उन्हें सही और गलत की शिक्षा भी देनी चाहिए जिससे बच्चे अपने भले-बुरे की पहचान कर सकें। अपने लिए फैसले लेने की समझ उनमें आ सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

जीवन की डोर

जीवन की डोर 

हम सबके मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से बार-बार उठती है कि क्या मनुष्य के जीवन की डोर उसके हाथ में है? यदि उसके हाथ में डोर नहीं तो किसके हाथ में  है? क्या सारा जीवन वह ऊपर वाले के इशारों पर ही नाचता रहेगा?
             इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि मनुष्य इस रंगमंच रूपी संसार में अपने चरित्र अथवा निर्धारित पात्र का अभिनय करने आया है। जो भी रोल उसे डायरेक्टर ईश्वर ने दिया है, उसे दक्षता से निभाना ही उसका दायित्व है। यदि वह अपना किरदार बखूबी निभाता है तो उसे लोगो की सराहना रूपी तालियाँ मिलती रहती हैं। चारों ओर उसका यश फैलता है। लोग उस मंझे हुए अभिनेता को अपनी सिर-आँखों पर बिठाते हैं। उसका मूल्य इस संसार रूपी रंगमंच पर बढ़ जाता है। सभी लोग उसे अपने पक्ष में करने के लिए मिन्नतें करने लगते हैं अथवा जुगाड़ करते रहते हैं।
             इसके विपरीत यदि मनुष्य अपना किरदार निभाने में चूक हो जाता है तब उस पर सड़े-गले टमाटर व अंडे फैंके जाते हैं। यानी जीवन में उसे अपमान के घूँट कदम-कदम पर पीने पड़ते हैं। जीवन की बाजी हारे हुए ऐसे अभिनेता का मूल्य लोगों की नजर में कम हो जाता है। उसे इस रंगमंच पर अभिनय करने के लिए अच्छा रोल नहीं मिलता। यूँ कहें तो वह नाकारा घोषित कर दिया जाता है। ऐसे अभिनेता को फिर कोई अच्छा रोल नहीं मिल पाता।
              जीवन सिनेमा की तरह नहीं होता। यहॉं उसे रंगमंच पर द्रष्टाओं के समक्ष अभिनय करना पड़ता है। वास्तविकता यही है कि यह संसार एक रंगमंच है। हम सभी जीव यहाँ अपना एक विशेष किरदार निभाने के लिए भेजे जाते हैं। कोई राजा तो कोई रंक, कोई अमीर तो कोई गरीब, कोई पुलिस तो कोई चोर, कोई जज तो कोई अपराधी, कोई साधु और कोई फरेबी, कोई नेता तो कोई अभिनेता। इस तरह अच्छे और बुरे सभी तरह के चरित्र वाले पात्र इस रंगमंच पर वह मालिक भेजता है। पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों के अनुसार ही वह हमारा रोल इस जन्म मे निर्धारित करता है।
             हमें साथी कलाकार यानी नाते-रिश्तेदार व भाई-बन्धु वही मिलते हैं जिनके साथ कभी हमारा पूर्वजन्मों के सुकर्मों अथवा कुकर्मों का बकाया शेष होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिनके साथ हमारा लेन-देन का सम्बन्ध होता है, उनके साथ ही हमें रिश्ता निभाना होता है। यह हमारी विवशता होती है कि हम उनसे अपनी नजरें चुराकर दूर नहीं भाग सकते। उनके साथ रहते हुए हमें जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों को  इच्छा अथवा अनिच्छा से सॉंझा‌‌ करना पड़ता है।
              यदि हम उस ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो अगले जन्म के लिए मालिक हम सबको और अधिक अच्छा रोल देकर पुनः इस संसार में भेजता है। जिसमें हमें सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और बन्धु-बान्धव मिलते हैं। जीवन में यश मिलता है, चारों ओर से हमें वाहवाही मिलती रहती है।
              इसके विपरीत यदि हम उस प्रभु की अपेक्षाओं पर किसी भी कारणवश खरे सिद्ध नहीं होते अथवा नाकारा सिद्ध हो जाते हैं तो वह आने वाले जन्म में अच्छा पात्र बनाकर नहीं भेजता। तब वह ऐसे-ऐसे रोल देता है जो सारा समय दुखों और परेशानियों में जीने वाले होते हैं। चारों ओर अपेक्षा, और तानों-उलाहनों को सहन करना पड़ता है। सारा जीवन अच्छा समय आने की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है।
              मनुष्य का जन्म या मरण कब होगा, उसे सुख अथवा समृद्धि मिलेगी या नहीं, उसके जीवन में कब सुख अथवा दुख आएँगे ये सब वही ईश्वर निर्धारित करता है। वह चाहे तो मनुष्य घर से बाहर कदम निकाल सकता है अथवा हाथ में पकड़ा हुआ रोटी का निवाला मुँह तक ले जाकर खा सकता है। मनुष्य चाहे भी तो कहीं छुपकर नहीं बैठ सकता क्योंकि वह हर क्षण, हर पल उस मालिक की नजर में रहता है।
             मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है। यदि वह इस स्वतन्त्रता का सदुपयोग करता है तो आगामी जन्म पुण्य कर्मों से भरा होता है। यदि मनुष्य उसका दुरुपयोग करते है तो सजा के रूप में निम्न योनियों में भेजता है। जैसे हम अपने बच्चों को अच्छा काम करने पर शाबाशी और पुरस्कार देते हैं और गलत काम करने पर सजा देते हैं। हम अपने बच्चों को कोई भी काम करने से पहले सदा चेतावनी देते रहते हैं, इसी प्रकार वह भी हमें अन्तरात्मा के द्वारा चेतावनी देता रहता है। यदि हम मान जाते हैं तब गलत काम नहीं करते और अगर सुनकर अनसुना करते हैं तो कष्ट पाते हैं।
             निष्कर्ष से स्वरूप में हम कह सकते हैं कि निश्चित ही मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है परन्तु उसका फल भोगने में नहीं। जहाँ तक हो सके जीवन में नियमानुसार जीने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

धन और बिमारी की चाल

धन और बिमारी की चाल

कुछ समय पूर्व विशाल वर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
             यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैं। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और उसे दिन-रात ही परेशान करते हैं। उस समय हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं, उसी तरह पलक झपकते ही वे चले भी जाएँ। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और पहले हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं । हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ते हैं। फिर हमने समय और धन को खर्च करवाकर वापिस लौटते हैं।
          बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में प्रत्येक मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा या अनिच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को हम स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है। परिवार हमारे साथ होता है। सभी परिवारी जन हमारे कष्ट में हमारे साथ खड़े होते हैं, वे चिन्ता करते हैं। वे अच्छे से अच्छा इलाज करवाते हैं। वे धन और समय भी व्यय करते हैं। पर हमारा दुख, हमारी तकलीफ नहीं बॉंटे सकते।
             सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्वजन्मों में बोयी होती है, वैसी ही तो काटनी पड़ती है। यानी उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होते हैं। इन सबसे बचना किसी भी तरह से सम्भव ही नहीं होता। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
        बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है, वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है। उस कष्ट के समय हम कितना भी रोना-धोना कर लें अथवा चिल्ला लें, उससे कुछ भी नहीं होता। उस समय बस अपने सभी जनों को हम परेशान करने का कारण मात्रा बन जाते हैं।
            अब हम धन की बात करते हैं। धन कमाने के लिए सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। वह रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह अथक परिश्रम करता है तब कहीं जाकर वह अपना और अपने घर-परिवार का पालन-पोषण कर पाता है। 
             कहते हैं पानी की एक-एक बूँद को डालते रहने से मटका भर जाता है, उसी प्रकार एक-एक पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात् कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है तब जाकर मनुष्य अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर पाता है। उस धन से वह अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा के बारे साधन जुटाने में समर्थ होता है।
           खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान को किसी भी तरह के नशे अथवा रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बर्बादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं। वैसे भी सयाने कहते हैं कि यदि धन गलत तरीकों से कमाया जाए तो वह लम्बे समय तक मनुष्य के पास टिकता नहीं है। अनुचित साधनों से कमाया हुआ धन अपने साथ बहुत-सी बुराइयों को लेकर आता है।
          अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली तो हम इस जीवन में नहीं बना सकते परन्तु अपने वर्तमान जीवन में हमें ऐसा प्रयास अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें दबोचने न पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस जन्म में हमें अपने साधनों की शुचिता की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।
           इस प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए। इसके अतिरिक्त खरगोश की चाल से आई हुई बिमारी हमें नैतिक और शारीरिक तौर पर तोड़ने में समर्थ नहीं हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद