सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

धन और बिमारी की चाल

धन और बिमारी की चाल

कुछ समय पूर्व विशाल वर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
             यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैं। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और उसे दिन-रात ही परेशान करते हैं। उस समय हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं, उसी तरह पलक झपकते ही वे चले भी जाएँ। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और पहले हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं । हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ते हैं। फिर हमने समय और धन को खर्च करवाकर वापिस लौटते हैं।
          बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में प्रत्येक मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा या अनिच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को हम स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है। परिवार हमारे साथ होता है। सभी परिवारी जन हमारे कष्ट में हमारे साथ खड़े होते हैं, वे चिन्ता करते हैं। वे अच्छे से अच्छा इलाज करवाते हैं। वे धन और समय भी व्यय करते हैं। पर हमारा दुख, हमारी तकलीफ नहीं बॉंटे सकते।
             सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्वजन्मों में बोयी होती है, वैसी ही तो काटनी पड़ती है। यानी उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होते हैं। इन सबसे बचना किसी भी तरह से सम्भव ही नहीं होता। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
        बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है, वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है। उस कष्ट के समय हम कितना भी रोना-धोना कर लें अथवा चिल्ला लें, उससे कुछ भी नहीं होता। उस समय बस अपने सभी जनों को हम परेशान करने का कारण मात्रा बन जाते हैं।
            अब हम धन की बात करते हैं। धन कमाने के लिए सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। वह रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह अथक परिश्रम करता है तब कहीं जाकर वह अपना और अपने घर-परिवार का पालन-पोषण कर पाता है। 
             कहते हैं पानी की एक-एक बूँद को डालते रहने से मटका भर जाता है, उसी प्रकार एक-एक पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात् कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है तब जाकर मनुष्य अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर पाता है। उस धन से वह अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा के बारे साधन जुटाने में समर्थ होता है।
           खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान को किसी भी तरह के नशे अथवा रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बर्बादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं। वैसे भी सयाने कहते हैं कि यदि धन गलत तरीकों से कमाया जाए तो वह लम्बे समय तक मनुष्य के पास टिकता नहीं है। अनुचित साधनों से कमाया हुआ धन अपने साथ बहुत-सी बुराइयों को लेकर आता है।
          अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली तो हम इस जीवन में नहीं बना सकते परन्तु अपने वर्तमान जीवन में हमें ऐसा प्रयास अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें दबोचने न पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस जन्म में हमें अपने साधनों की शुचिता की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।
           इस प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए। इसके अतिरिक्त खरगोश की चाल से आई हुई बिमारी हमें नैतिक और शारीरिक तौर पर तोड़ने में समर्थ नहीं हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सन्तुलित व्यवहार

सन्तुलित व्यवहार

'इतना मीठा न बनो कि कोई निगल जाए और इतना कड़वा भी न बनो कि कोई उगल दे'- यह उक्ति सचमुच विचार करने के लिए विवश करती है। मनुष्य को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। इसलिए उसे हमेशा यही यत्न करना चाहिए कि उसका व्यवहार सन्तुलित हो। उसके अपने ही व्यवहार के कारण किसी को गलतफहमी पैदा न होने पाए।
           सन्तुलित व्यवहार से तात्पर्य भावनाओं, विचारों और कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने से है। इससे कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में मानसिक शान्ति और स्पष्टता बनी रहती है। यह सकारात्मक अभ्यास है। इससे भावनाओं पर नियन्त्रण, सहानुभूति और सोच-समझकर निर्णय लेने की समझ आती है। यह व्यक्तिगत, पेशेवर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक प्रभावी प्रबंधन है। 
              यह परम सत्य है कि जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ आएँगी ही। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोगों में परस्पर जुड़ाव अथवा टकराव की सम्भावना भी बनी रहती है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य किसी दूसरे के कदमों में इतना अधिक गिर जाए और अपने स्वाभिमान को ही गिरवी रख दे।
             मनुष्य को दूसरों की जी-हजूरी अथवा चापलूसी करने के लिए किसी के सामने इतना भी नहीं बिछना चाहिए कि सामने वाला उसे कुचलता हुआ आगे बढ़ जाए और उसकी परवाह भी न करे। ऐसी अपमानजनक स्थिति किसी भी सहृदय व्यक्ति के लिए घातक हो सकती है। मनुष्य को इसके दूरगामी परिणामों के विषय में अवश्य ही विचार कर लेना चाहिए। उन्हें कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
            कुछ लोग ऐसे बोलते हैं मानो अपनी जुबान में उन्होंने शहद घोला हुआ है। ऐसी जरूरत से ज्यादा मीठी जुबान पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वह पीठ पीछे वार करने वाली हो सकती है। कुछ लोग बनावटी आवाज में बोलते हैं। ऐसे लोग भी हितैषी नहीं हो सकते। वाणी की प्राकृतिक स्वाभाविकता से पहचान की जा सकती है कि कौन हमारा हितैषी है और कौन हमारी जड़ें काटने वाला होगा।
          मीठा बोलना चाहिए परन्तु इतना मीठा भी नहीं कि हर कोई अपमानित कर चलता बने। लोग सोचते हैं कि जो मीठा बोल रहा है वह निश्चित ही हमसे अपना कोई स्वार्थ पूरा करना चाहता है। दुनिया असल और नकल की पहचान करना नहीं जानते।
           'मृदुभाषी बनो' यह तो सभी कहते हैं परन्तु संसार में ऐसे लोगों को बेवकूफ समझने में कोई परहेज भी नहीं करता। वे सोचते है इन लोगों का क्या है? इन्हें तो मनचाहे ढंग से नचा लेंगे।
             मनुष्य को कटुभाषी, हठी, अहंकारी और क्रोधी भी नहीं होना चाहिए कि सभी उसे अपने से दूर कर दें और उससे मित्रता भी न करने के बारे में दस बार सोचें। दूसरे शब्दों में कहें तो हर स्थान पर उनका उपहास उड़ाया जाए या उनसे किनारा कर लिया जाए। ऐसे लोग अपनी हठधर्मिता के कारण और अपने दुर्व्यवहार के चलते उन सभी लोगों को जो उनके सम्पर्क में आते हैं, उन्हें अनायास ही अपना शत्रु बना लेते हैं। तब फिर अकेलेपन को स्वेच्छा से अपना साथी बना लेते हैं।
             कोई भी मनुष्य अपने जीवन में कभी अपमानित नहीं होना चाहता इसलिए वह ऐसे लोगों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है। उनके विषय में कोई भी भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि कब उनका मूड खराब हो जाए और वे अपने प्रिय-से-प्रिय का भी अपमान कर दें। इस अपमानित होने के भय से सब यही सोचते हैं कि इन्हें छोड़ दो। न तो इन लोगों की दोस्ती अच्छी है और न ही इनकी दुश्मनी। इसलिए जितना भी हो सके इनसे कन्नी काटते हुए बचकर निकल जाओ, इसी में ही सभी लोगों की भलाई है।
           कैसी भी परिस्थिति हो अत्यधिक गुस्सा, डर अथवा प्रसन्नता के स्थान पर शान्त बने रहना चाहिए। अच्छी तरह सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना उचित होता है। दूसरों के साथ व्यवहार में सदैव सौजन्यता, सम्मान का भाव और धैर्य रखने से मित्रों और शुभचिन्तकों की संख्या बढ़ती है। अपनी शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसी भी अनपेक्षित स्थिति के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उसे स्वीकार करके समझदारी से निपटना चाहिए। सन्तुलित व्यवहार का पालन करने से मानसिक तनाव कम होता है, उत्पादकता बढ़ती है और रिश्तों में मजबूती आती है। 
           अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बहुत अधिक मीठा बनकर ससार में जीना चाहते हैं या कड़वा बनकर। वैसे तो सुधीजनों का यही मानना है कि मनुष्य को इस संसार में सहजता से जीने के लिए आवश्यकता अधिक मधुरता और कटुता दोनों का ही त्याग करना चाहिए। मनुष्य को अपने स्वाभाविक आचार-व्यवहार का ही पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद