गुरुवार, 10 सितंबर 2026

परस्पर अहंकार का टकराव

परस्पर अहंकार का टकराव

परस्पर अहं यानी Ego का टकराव दो मनुष्यों में तब होता है जब वे दोनों व्यक्ति अपनी-अपनी श्रेष्ठता अथवा स्वयं के सही होने को साबित करने की जिद पर अड़ जाते हैं। हर व्यक्ति यही मानता है कि उसका विचार या निर्णय ही सबसे अच्छा है। उसे हर किसी को मान लेना चाहिए। अपनी गलती को मानने से डरना और खुद को सर्वगुण सम्पन्न दिखाना उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। ऐसे लोग दूसरे के नजरिए और परिस्थिति को समझने का प्रयास नहीं करना चाहते।
            इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो आज तक कोई भी युग ऐसा नहीं हुआ जिसमें न्याय-अन्याय न हुआ हो और आगे आने वाले समय में भी शायद इस अभिशाप से बचा जा सके। इसका कारण है परस्पर अहंकार का टकराव। 
          रामायण काल में भगवान श्रीराम का अगले दिन होने वाला राज्यतिलक सहसा वनवास में बदल जाना, कैकेयी के अहंकार और स्वार्थ का परिणाम था। यहाँ श्रीराम के प्रति अन्याय किया गया जिसे उन्होंने से सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
          शूर्पणखा की नाक काटना, अहिल्या का अपमान होना व उसका मूर्तिवत हो जाना, बाली व रावण जैसे योद्धाओं का वध होना, भगवती सीता का हरण और उनकी अग्नि परीक्षा तथा गर्भावस्था में पुनः निष्कासन सभी इसी न्याय-अन्याय की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।
         इसी प्रकार महाभारत काल में भी न्याय और अन्याय का चला यह चक्र बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है। कौरवों द्वारा पाण्डवों का राज्य हथियाना, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर का जुए के खेल में राज्य के साथ अपने भाइयों और द्रौपदी को हार जाना, कौरवों का अन्यायपूर्ण राज्य करना और अन्ततः होने वाला महाभारत का युद्ध जिसमें सारे नियमों को अनदेखा करके छल-छद्म का सहारा लिया गया। इस युद्ध ने इतना भयंकर विनाश कर दिया था जिसका भुगतान देश ने बहुत समय तक किया।
        ये सब उन सबके अहं का परिणाम ही कहे जा सकते हैं। महाभारत काल में नैतिक-अनैतिक, न्याय-अन्याय आदि के सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया था जिसके परिणाम का हम लोग आज तक भुगतान रहे हैं और न जाने कब तक भोगेंगे?
          उसके पश्चात मुगलों के शासनकाल का भयावह रूप हमें आज तक सताता है। उस समय जबरदस्ती तलवार के बल से लोगों का धर्म परिवर्तन कराना और न मानने पर नृशंसता करना, बहु-बेटियों का अपहरण करना, जन साधारण पर अत्याचार करना, मन्दिरों को ध्वस्त करना आदि बहुत से अन्यायपूर्ण कार्य उनके द्वारा किए गए। इसके फलस्वरूप देश में अशिक्षा, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का जन्म हुआ। महापुरुषों के अथक प्रयत्नों के बाद भी आज तक हम उनसे मुक्त नहीं हो सके।
          अंग्रेजों के शासन काल में भी कुछ कम अन्याय नहीं हुआ। निहत्थों पर गोली चलना, लोगों को बन्धुआ मजदूर बना लेना, चलती ट्रेन से किसी भी नागरिक को नीचे फैंक देना, स्वतन्त्रता सेनानियों को फाँसी देना व काले पानी भेजना, जन साधारण पर अनेक प्रकार के अत्याचार करना आदि इन अंग्रेजों का शगल था।
          ये तो थे न्याय-अन्याय के इतिहास से सम्बन्धित कुछ ऐसे उदाहरण जिन्हें प्रायः सभी लोग जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी न जाने कितने शासकों और उनके चमचों के द्वारा जनता अन्याय का शिकार होती रही है। जिस भी कालखण्ड के विषय में पढ़ने लगो तो उस समय में हुए अन्याय और अत्याचार के विषय में पढ़कर मन उदास और परेशान हो जाता है।
          आज हमारे भारत देश में राजतन्त्र नहीं प्रजातन्त्र है पर जन साधरण को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है। सत्ता में कोई भी आए, उसे तो बस पिसना ही है। अन्याय का सामना करना ही उसकी विवशता है। पुरातन युग की तरह आज भी राजपुरुषों का विरोध करना अपनी मौत को बुलावा देना ही होता है। 
          प्रतिदिन टी वी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में ऐसी दुखद खबरें हम सुनते और देखते रहते हैं। आज ह्यूमन राइट वाले बहुत एक्टिव हो रहे हैं किन्तु वे भी किसी को न्याय दिलाने में समर्थ नहीं हो रहे। ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वत्र होने वाला अन्याय शायद अधिक मुखर होता जा रहा है और इसीलिए उसका ही बोलबाला है। बहुत हो-हल्ला होता है परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात ही दिखाई देता है।
          केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में कमोबेश यही स्थिति है। कहीं भी किसी भी व्यक्ति ने जरा-सा सिर उठाने का दुस्साहस किया नहीं कि बस उसकी आफत आई समझो। बेशक हम लोग आज इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं परन्तु सामन्तवादी सोच से हम अभी भी बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए आज न्याय-अन्याय की जिम्मेदारी किस व्यक्ति को दी जाए, यह समझ नहीं आ रहा।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 9 सितंबर 2026

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार पर चलने जैसा होता है। जहाँ चूक हुई वहीं सब समाप्त हो जाता है। प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार की धार के समान इसलिए होता है क्योंकि इसमें अपार आनन्द के साथ-साथ गहरी पीड़ा और जोखिम भी जुड़ा होता है।  इस मार्ग पर चलने के लिए इन्सान को अपने अहंकार और स्वार्थ को छोड़ना पड़ता है जो किसी तलवार की धार पर चलने जितना कठिन होता है। जिस प्रकार दुधारी तलवार जरा सी चूक पर घायल कर देती है, उसी तरह प्रेम में भी अत्यधिक अपेक्षाऍं अथवा असावधानी रिश्तों को तोड़ सकती है।
            प्रेम व्यक्ति को जीवन का अपनापन और परम आनन्द का अहसास कराता है परन्तु साथ ही यह विरह, डर और असहनीय मानसिक कष्ट भी दे सकता है। यह प्रेम एक ऐसी उच्च अवस्था होती है जिसमें स्वयं को ही मिटा देना होता है। जब तक स्वयं को मिटा देने की भावना मनुष्य में न आ जाए तब तक वह प्रेम की पराकाष्ठा को छू भी नहीं सकता। इसीलिए कहा गया है-
     प्रेम गली अति संकरी जा में दो न समाए।
अर्थात् प्रेम का रास्ता इतना संकरा या तंग होता है कि इसमें दो लोग एकसाथ नहीं गुजर सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तक दो लोगों का अहं परस्पर टकराता रहेगा तब तक प्रेम हो ही नहीं सकता। जब वे अपने अहं को त्यागकर दो से एक बन जाते हैं, उनका मन से उनका जुड़ाव हो जाता है तभी प्रेम परवान चढ़ता है।
        स्वार्थ में अन्धे होकर कभी प्रेम नहीं किया जा सकता। उसके लिए तो अपना सर्वस्व समर्पित करना पड़ता है। प्रेम कुछ पाने का नाम नहीं अपितु उसमें पूर्ण समर्पण करना होता है। अपनी हस्ती को मिटाकर ही वास्तव में सच्चा प्रेम किया जा सकता है और पाया जा सकता है।
        एक माँ का निश्छल प्रेम अपने बच्चे की एक मुस्कान पर बलिहारी हो जाता है। प्रेम वही सात्त्विक होता है जहाँ वह अपने जीवन की परवाह न करते हुए अपना सब कुछ अपनी सन्तान के लिए दाँव पर लगाने के लिए तैयार हो जाती है। उसे अपने बच्चे के अतिरिक्त और कोई दिखाई नहीं देता।
        सेवक और स्वामी में कभी प्रेम नहीं हो सकता। क्योंकि वहाँ स्वार्थ प्रधान होता है। दोनों को एक-दूसरे से कुछ-न-कुछ पाने की आशा होती है। सेवक को स्वामी से धन की कामना होती हे और मालिक को अपने अधीनस्थ से अच्छा कार्य करने की चाह होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में वहाँ पर प्रेम की सम्भावना हो ही नहीं सकती। इस अन्तर को समझना आवश्यक होता है।
        आज विश्व में प्रेम की सम्भावना प्रायः समाप्त होती जा रही है। आज प्रेम दूसरे व्यक्ति की हैसियत को देखकर किया जाता है। उसमें यही भाव प्रधान होता है कि मुझे उस दूसरे व्यक्ति से क्या मिलेगा? जबकि विशुद्ध प्रेम वही होता है जो दूसरे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति नहीं देखता। वह तो अपने साथी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर स्वयं को मिटा देता है। वहॉं कुछ पाने या चाहने की बात नहीं होती।
          हमारे भारत देश में यद्यपि पति-पत्नी साथ रह रहे हैं और इस साथ रहने को वे प्रेम समझ बैठते हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि मात्र एक-दूसरे के साथ रहने को ही प्रेम नहीं कहा जा सकता। इस प्रेम को सरासर धोखा कह सकते है। साथ रहने भर से प्रेम कभी नहीं हो सकता है। एक-दूसरे के प्रति उनके निस्वार्थ समर्पण को ही प्रेम का दूसरा रूप कहा जाता है।
          परस्पर कलह-क्लेश करके किसी तरह जीवन साथी का जीवन चौबीसों घण्टे नरक बनाकर जिन्दगी गुजार देना प्रेम नहीं कहला सकता। प्रेम और समर्पण की कमी के कारण ही आज भारत में तलाक लेने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 
        प्रेम एक पुलक है और एक प्रकार का उत्साह है। वह सच्चे मन से की गई एक प्रार्थना मात्र है। इस प्रेम की अपनी ही एक महक होती है जो दूर-दूर तक फैलती है। युगों तक उसे जनसाधारण याद रखता है। प्रेम अपने आप में एक ऐसा संगीत है जो मन को ही नहीं मनुष्य की आत्मा को भी तृप्त कर देता है।
          इस समर्पित प्रेम का उदाहरण मीरा बाई हैं। उन्होंने सम्पूर्ण राज्य भोगों का परित्याग करके भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ली थी। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई भाता ही नहीं था। सूरदास जी की कृष्ण भक्ति का भी कोई सानी नहीं है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप की उपासना की थी।
          यहाँ किसी विवाद में न पड़ते हुए श्री राधा जी और गोपिकाओं की कृष्ण भक्ति की चर्चा भी कर सकते हैं। उनकी भक्ति की प्रशस्ति में आज तक अनेक ग्रन्थ लिखे गए हैं। लोग श्रद्धापूर्वक उनका महिमा मण्डन करते नहीं अघाते। उनकी इस उपासना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
          ईश्वर से किया जाने वाला वह प्रेम वस्तुतः चरम प्रेम होता है जब साधक अपने पूर्ण समर्पण के साथ उसकी शरण में जाता है। भक्त के मन में इहलौकिक और पारलौकिक कोई कामना नहीं रह जाती। वह बस उसी परमात्मा में लीन हो जाना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। जिस प्रकार कच्ची मिट्टी से कुम्हार मनचाहा आकर देता हुआ विभिन्न पात्र बना लेता है, उसी प्रकार एक छोटे बच्चे को माता-पिता जिस भी साँचे में चाहें, उसे ढाल सकते हैं। जैसा भी आकार देना चाहते हैं, वैसा दे सकते हैं। जिस तरह एक चावल से ही सारे चावल पक जाने का ज्ञान हो जाता है। उसी प्रकार से घर के बच्चे के व्यवहार को देखकर पता चल जाता है कि इस परिवार में रहने वाले लोगों के संस्कार कैसे होंगे?
          बचपन में निम्न कथा सुनी थी। उस समय शायद इसकी गहराई समझ नहीं आई होगी पर अब ज्ञात होता है कि इस कथा का क्या रहस्य है?
          एक गाँव में तीन सहेलियाँ रहती थीं। एक दिन वे तीनों कुएँ पर पानी भरने गयीं। उसी समय एक महिला का बेटा वहाँ से गुजरा। वह बड़े गर्व से बोली, "यह मेरा बेटा कान्वेंट स्कूल में पढ़ता है। पढ़ाई में यह बहुत योग्य है।"
          माँ को कुँए से पानी भरते हुए देखकर वह होशियार बेटा वहाँ से निकल गया। थोड़ी देर के बाद दूसरी महिला का पुत्र भी वहाँ से गुजरा।
         उसकी माँ बोली,"देखो यह मेरा बेटा है जो एक पब्लिक स्कूल में पढ़ता है।" 
          वह भी अपनी माता को वहाँ पर पानी भरता हुआ छोड़कर चला गया। अन्त में तीसरी महिला का पुत्र भी वहाँ से गुजरा। उसने अपनी माँ को पानी भरते देखा और उसके पास आ गया। पानी से भरा हुआ मटका उसने उठाकर अपने कन्धे पर रख लिया और वहीं पास रखी पानी की भरी हुई बाल्टी भी दूसरे हाथ से पकड़ ली। 
        पानी से भरे दोनों बर्तन उठाने के बाद उसने आपनी माता कहा, "मॉं, चलो अब हम दोनों घर चलते हैं।"
        उसकी माँ ने गर्व से प्रसन्न होते हुए कहा," मेरा बेटा एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है।" 
         उस माँ के चेहरे की प्रसन्नता देखकर अन्य दोनों माताओं की नजरें शर्म से झुक गईं।
        पहली और दूसरी दोनों महिलाओं के पुत्रों के मन में यह भावना ही नहीं आई कि उनकी माँ दो-दो बर्तन उठाकर घर तक कैसे लेकर जाएगी? उन्हें अपनी माता के कष्ट का जरा भी ध्यान नहीं आया, केवल उन्होंने ने अपने बारे में ही सोचा। जबकि तीसरी महिला का बेटा संस्कारी था। उसके मन में अपनी माता के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना भरी हुई थी।
        इस कथा का सार मात्र इतना ही है कि माता-पिता अपने बच्चों को लाड़ लड़ाते हुए उद्दण्ड, नकचढ़ा और सिरफिरा तो बना सकते हैं किन्तु लाखों रुपए खर्च करके भी उन्हें संस्कारवान नहीं बना सकते। बचपन में जैसे संस्कार बच्चों में डाले जाते हैं, वे उसी के अनुसार ही बन जाते हैं। 
         कई घरों में देखा है कि छोटे बच्चे से बड़े सदस्य कहते हैं, "मॉं के बल पकड़ लो या पिता को चाँटा मार दो। अपनी तुतलाती बोली में गाली बोलकर बताना।"
         जब बच्चा बालपन में यह हरकतें अपने घर वालों की मर्जी से करता है तब घर के लोग उसकी उस बालसुलभ चंचलता पर प्रसन्न होते हैं, उस पर बलिहारी जाते हैं। उस समय बच्चे के मन में यह बात घर कर जाती है कि वह निश्चित ही कोई अच्छा और बड़ा काम कर रहा है जिससे घर के सब लोग खुश हो रहे हैं। 
          बड़ा होकर बच्चा जब यही सब करता है तो उसे मारा-पीटा जाता है या उस पर क्रोध किया जाता है। तब बच्चे को यह समझ में नहीं आता कि बचपन से जो कार्य वह करता हुआ आ रहा है वे अचानक गलत कैसे हो गए? उसे किसलिए सजा दी जा रही है? 
        इसके अतिरिक्त घर के सदस्यों का परस्पर व्यवहार देखकर छोटा बच्चा बहुत कुछ सीख जाता है। उस सबको बारीकी से परखते हुए वह भी वैसा ही व्यवहार करने लगता है। हद तो तब पर हो जाती है जब घर के बड़े सदस्य उससे एक-दूसरे की जासूसी का काम लालच देकर उससे करवाते हैं। इससे उसे दूसरों की भावनाओं से खेलने की समझ स्वत: ही आ जाती है। रिश्वतखोरी और दूसरे व्यक्ति को ब्लैकमेल करना, वह मासूम बच्चा बखूबी जान जाता है। 
          कभी-कभी घर में कोई व्यक्ति आ जाता है और मनुष्य उसे पसन्द नहीं करता अथवा वह उससे उस समय किसी कारण से बात नहीं करना चाहता तो बच्चे से कह दिया जाता है, "बेटा, बाहर जाकर अंकल से कह दो कि पापा घर पर नहीं हैं।"
          इस तरह बच्चा झूठ बोलना सीख जाता है।बड़े होकर वह अपनी गलतियॉं छुपाने लगता है। इस सबका का यही कारण है कि बच्चे ने अपनी ट्रेनिंग अच्छे से कर ली है।
         वैसे तो बाहरी परिवेश यानी आस-पड़ोस अथवा विद्यालय के साथियों का प्रभाव बच्चे पर अवश्य पड़ता है। परन्तु यदि घर के संस्कार मजबूत हों तो बाहरी संस्कार उस बच्चे पर हावी नहीं हो सकते। इसलिए बच्चे में छुटपन से ही सुसंस्कारों को रोपित कीजिए जिससे बड़े होने पर यह पौधा सड़ने या मुरझाने न पाए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 7 सितंबर 2026

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें 

मनुष्य इस संसार में शत्रु अथवा मित्र लेकर पैदा नहीं होता बल्कि यहाँ रहते हुए उनका चयन करता है। अपनी सहृदयता से, अपने सद् व्यवहार से वह किसी भी पराए को जीवन भर के लिए अपना बना सकता है। कठोर-से-कठोर व्यक्ति को वह मोम की तरह पिघला सकता है। उसे शीघ्र ही अपना प्रिय बना सकता है।
          इसके विपरीत नाक के बाल के सामान अपने किसी प्रियजन अथवा किसी भी मित्र को क्षण भर में शत्रु बना सकता है। यह सब उसकी मानसिकता और सूझबूझ पर निर्भर करता है। मनुष्य को समझते हुए कबीरदास जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
          जो तोको काँटे बोए ताको दीजो फूल।
          तोको फूल के फूल हैं वा को हैं तिरसूल।।
इस दोहे का सार यही है कि दूसरों का शुभ करते चलो। जो रास्ते में काँटे बिछाने का काम करता है, उसे फूल दो। इसका कारण है कि परोपकारी मनुष्य को अन्ततः फूल मिलते हैं। इसके विपरीत दूसरे व्यक्ति को कुदरत के न्याय के अनुसार त्रिशूल जैसे कष्ट मिलते हैं।
          ऐसा ही भाव हमने एक फिल्म में भी देखा था जहाँ अपने साथ शत्रुता करने वाले लोगों को संजय दत्त अपने साथियों के साथ जाकर फूल भेंट करते हैं। 
        कहने का तात्पर्य यही है कि यदि मनुष्य थोड़ा-सा सहनशील होकर दूसरे की बुराई का उत्तर उसकी भाषा में न देकर, उसे क्षमा करता हुआ उसके साथ अच्छा व्यवहार करता है तो उसे उसका सुफल अवश्य मिलता है। इसीलिए ऐसे महापुरुषों को इस समाज में युगों-युगों तक याद किया जाता है। वे समाज के दिग्दर्शक बनते हैं।
        दूसरों का हित चाहने वाले को वक्ती तौर पर दुःख या परेशानी का सामना करना पड़ सकता है अथवा दूसरों के कोप का भजन बनना पड़ सकता है परन्तु अन्ततः जीत अच्छाई और सच्चाई की ही होती है। लोगों को समय बीतते स्वयं ही यह अहसास हो जाता है कि उन्होंने उस व्यक्ति विशेष को पहचानने में भूल कर दी है। अपनी इस गलती के लिए तब वे क्षमा याचना करने के लिए उसके पास आते हैं।
          इसी भाव को प्रकट करती हुए एक घटना जो वाट्सअप पर पढ़ी थी, उसे अपने अनुसार लिख रही हूँ।
        किसी व्यक्ति ने अपने लिए एक नया घर खरीदा जिसमें फलों के पेड़ लगे हुए थे। उसके पड़ौस में एक पुराना-सा मकान था जिसमें बहुत लोग रहते थे। एक दिन उसने देखा कि पड़ोस के मकान से किसी ने ढेर सारा कूड़ा उसके घर के बाहर दरवाजे पर डाल दिया है। उसने उनसे जाकर झगड़ा नहीं किया। बल्कि शाम को वह व्यक्ति एक टोकरी में ताजे फल रखकर उस पड़ोसी के घर पर चला गया।
          पड़ोसी उसे देखकर परेशान हो गए कि वह शायद उनसे सुबह की उस घटना के लिये झगड़ा करने आया होगा। दरवाजा खोलते ही वे हैरान हो गये कि जिसे वे भला-बुरा कह रहे थे, वही व्यक्ति चेहरे पर मुस्कान लिए रसीले ताजे फलों की भरी टोकरी के साथ सामने खडा था। 
         उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "अपने पेड़ों के ताजे फल मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपया इन्हें स्वीकार करें।"
          इसमें कोई दोराय नहीं है कि मनुष्य अपने व्यवहार से किसी के हृदय में अपना स्थान बना सकता है। यदि मनुष्य के पास किसी को देने के लिए कुछ भी नहीं है पर अपनी गलतियों की माफी उसे स्वयं से ही माँग लेनी चाहिए। इस जीवन का कोई भी भरोसा नहीं है कि अगले पल उसकी ये आँख खुले-न-खुले।
        मनुष्य इस संसार में रहते हुए जो भी दूसरों को देता है, वही उसे ब्याज सहित वापिस मिल जाता है। फिर चाहे वह प्यार हो या घृणा, खुशी हो या गम, नेकी हो या बदी। अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह समाज से क्या पाना चाहता है और क्या नहीं?
        अपने हृदय को यदि विशाल बना लिया जाए तो सामने वाले की ओछी हरकत पर गुस्सा नहीँ आता अपितु उससे सहानुभूति होती है। मन ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि अमुक व्यक्ति को वह सद् बुद्धि दे। 
        हमारी भारतीय परम्परा में तो काटने से मौत देने वाले विषधर यानी साँप को भी दूध पिलाने का विधान है। नागपंचमी के दिन लोग उसकी पूजा करके उसे दूध पिलाते हैं।
        यदि बुरे लोग अपनी बुराई नहीं छोड़ते तो अच्छे लोगों को अपनी अच्छाई किसी भी शर्त पर नहीं छोड़नी चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति सदैव यत्नपूर्वक सावधान रहना चाहिए। मनुष्य के अच्छे व्यवहार के कारण वह समाज में लोकप्रिय और सम्मानित बन जाता है। उसके इस संसार से प्रस्थान करने के पश्चात भी लोग उसके सद् व्यवहार के कारण उसे स्मरण करते रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 6 सितंबर 2026

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते 

रिश्ते मनुष्य की धन-सम्पत्ति की तरह ही बहुत मूल्यवान होते हैं। उन्हें यत्नपूर्वक सहेजकर रखना पड़ता है। धन को यदि बैंक में जमा करवा दो तो उस पर ब्याज मिलता है और वह बढ़ता रहता है। उसी प्रकार रिश्तों की जमा पूँजी भी तभी बढ़ती है जब मनुष्य उनका कद्र करता है, उन सबके साथ वह समानता का व्यवहार करता है और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देता है। बढ़ती हुई रिश्तों की यह पूॅंजी उसका सम्बल बनती है। उनके रहते उसे कभी अकेलापन नहीं सताता।
          यदि हम बैंक में जमा अपने धन को बार-बार निकालते रहते हैं, उसमें कुछ जमा नहीं करते तो धीरे-धीरे वह धन समाप्त होने लगता है। उसी प्रकार अपने रिश्तों की पूॅंजी को हम अपने झूठे अहं के कारण गॅंवाते जाऍंगे तो वे भी हमसे दूर होते जाऍंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा जब हम अकेले पड़ जाऍंगे। हमारे पास अपना कहने के लिए कोई नहीं होगा। उस समय हमें उनकी कमी अखरने लगेगी। उस पछताना व्यर्थ होगा।
        वह सम्पत्ति जो अपने या किसी परिवारी जन के नाम पर हो तो वास्तव में वही अपनी होती है। यदि बेनामी सम्पत्ति हो और उसके विषय में किसी को पता न हो तो कोई गारण्टी नहीं होती कि वह अपनी रहेगी भी या नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि जिसके नाम पर वह सम्पत्ति है, वही कल को धोखा दे जाए और वह अपने हाथ से निकल जाए। उस समय मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। तब उसे समझ आता है कि सम्पत्ति अपने नाम ली होती तो अच्छा होता।
       उसी तरह रिश्ते भी होते हैं, वे तभी तक अपने बने रहते हैं जब तक उनकी पहचान होती है। यानी कि माता, पिता भाई, बहन, चाचा, बेटा, बेटी, मित्र आदि कोई भी नाम उनका हो सकता है। यदि उनकी पहचान खोने लगो तो उनके खो जाने का डर हमेशा बना रहता हैं। जब इन रिश्तों से दूरी बनने लगती है तो ये मनुष्य से विलग हो जाते हैं। तब मनुष्य की पूॅंजी में कटौती होने‌ल लगती है।
        यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि जिन्दगी के बैंक में जब प्रेम और सौहार्द का बैलेंस कम होने लगता है तभी सुख और रिश्तों के चैक बाउंस होने लगते हैं। मनुष्य सदा अपने रिश्तेदारों से ही सुशोभित होता है। किसी भी खुशी या गम में यदि अपनों का साथ न हो तो जीवन नीरस हो जाता है। उनके बिना मनुष्य को अपना अस्तित्व शून्य जैसा प्रतीत होने लगता है।
         मनुष्य का रिश्ता ऐसा होना चाहिए जिस पर उसे नाज हो। उन पर उसे सदा मान और भरोसा होना चाहिए। रिश्ता वही होता अपना होता है जो सदा अपनेपन की अहसास देता हो। सुख या दुःख में साथ निभाने वाले रिश्ते शीघ्र ही सिमटकर रह जाते हैं, उनमें दूरी अधिक होती है और सम्बन्ध केवल दिखावे भर के होते हैं। उनमें उतनी गर्माहट नहीं होती जितनी किसी एक रिश्ते में वास्तव में होनी चाहिए।
         मनुष्य का यह जीवन और रिश्ते दोनों मौसम की तरह होते हैं कभी सर्द और कभी गर्म। पेड़-पौधों को यदि समय पर खाद और पानी देते रहो तो वे अपने समय पर हमें छाया तथा फल देते हैं। यदि उनको नजरअंदाज कर दो तो वे पनपते ही नहीं हैं, मुरझा जाते हैं। ऐसे ही पतझड़ के मौसम में जब पेड़ों के पत्ते सूख जाते हैं और वे ठूँठ होकर बदसूरत दिखाई देने लगते हैं, उस समय प्रकृति भी नीरस लगने लगती है।
         उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में जब अहं रूपी पतझड़ आ जाता है तब रिश्ते मुरझा जाते हैं यानी उनमें दूरियाँ बढ़ जाती हैं। वे मनुष्य को बोझ की तरह लगने लगते हैं। मनुष्य की पहुँच से दूर होकर वे उसे संसार सागर में हिचकोले खाने के लिए अकेला छोड़ देते हैं। जब उसे इस सबका होश आता है तो वह स्वयं को बिल्कुल अकेला पाता है। यह उसके लिए कष्टकारी स्थिति बन जाती है।
        अच्छे और  सच्चे रिश्ते उन्हें ही कहा जा सकता है जो हमेशा हवा की तरह खामोशी से मनुष्य की जीवनीशक्ति की तरह उसके आसपास बने रहें। उसे कभी अकेलेपन का अहसास न होने दें। उनके साथ से वह खिल जाए। उनके बिना तो मानो उसका जीना ही दुश्वार हो जाए।
         एक सार की बात यहॉं बताना चाहती हूँ कि धनवान व्यक्ति वह नहीं होता जिसकी तिजोरी सदा नोटों या सोने-चाँदी के आभूषणों से भरी रहे अथवा ईश्वर की कृपा से वह बहुत ही सुख-सुविधाओं का भोग करता हो।
         मेरे विचार में उसी व्यक्ति को हम धनी कह सकते हैं जिसकी तिजोरी धन के बजाय सच्चे रिश्तों की पूँजी से भरी हुई होती है। दूसरे शब्दों में मनुष्य के रिश्ते जितने अधिक मजबूत होते हैं, उतना ही उसकी भुजाऍं होती हैं। ऐसा व्यक्ति भौतिक रूप से शक्तिशाली बन जाता है।
        अपने रिश्तों की पूँजी को व्यर्थ ही अपने अहं के कारण गॅंवाना नहीं चाहिए अपितु उन्हें अपने साथ लेकर चलते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 5 सितंबर 2026

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज के माथे पर लगने वाला यह बहुत बड़ा कलंक है कि यदि उसके आयुप्राप्त बुजुर्गों के लिए घर में स्थान न हो। वह घर-परिवार एक श्मशान की तरह है जहाँ उनके वृद्ध हुए माता-पिता की सुरक्षा अथवा देखभाल नहीं की जा सकती। उन्हें घर पर सम्मान देने के स्थान पर ओल्ड होम में भेजने की योजना बनाई जाए। वास्तव में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जा सकती है।
       माता-पिता अपना सारा जीवन बच्चों के लालन-पालन में व्यतीत कर देते हैं। उनकी खुशी में खुश होते हैं और उनके कष्ट में दुखी हो जाते हैं। साधन सम्पन्न लोगों की तो खैर बात ही अलग है। वे अपने बच्चों की सारी आवश्यकताएँ सुविधा से पूरी करते हैं। परन्तु जिनके पास उतनी सुविधाएँ नहीं हैं, वे माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए कोई कमी नहीं छोड़ते।
        आजकल लोग घर में कुत्ते-बिल्लियाँ पालते हैं और उनकी देखभाल के लिए नौकरों की फौज भी रखते हैं। उन पर वर्षभर में लाखों रुपए हँसी-खुशी खर्च देते हैं किन्तु माता-पिता को देने के लिए कुछ थोड़ी-सी राशि उनके पास नहीं बचती। यानी सारी कटौती उन्हीं के लिए की जाती हैं। इसे हम उन बच्चों का दुर्भाग्य ही कहा सकते हैं।
       धन्य हैं ऐसी नालायक सन्तान जिसे इतनी भी तमीज नहीं कि वे रत्तीभर भी अपने माता-पिता की परवाह कर लें। यह देख लें कि उन्होंने भोजन खाया है या नहीं, कहीं उनका स्वास्थ्य तो खराब नहीं है, उन्हें दवा की आवश्यकता तो नहीं, उनके पास पहनने के लिए वस्त्र तो हैं। ऐसे घरों में किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान, दिए जाने वाले दान आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ से सुख-शान्ति कब उड़न छू हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
       इन्हीं कपूतों को पाने के लिए माता-पिता ईश्वर से हाथ जोड़कर पुत्र की कामना करते हैं। जो उनके जीते जी सेवा नहीं कर सकता, उनका ध्यान नहीं रख सकता वह उन्हें कौन से तथाकथित नरक से उभारेगा, जैसी कि मान्यता है।
        इन्हीं कपूतों के लिए बेटियों को जन्म लेने से पहले ही माता के गर्भ में मार दिया जाता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकॉंश बेटियों को अपने माता-पिता की परवाह बेटों से अधिक होती है। वे आजन्म उनकी चिन्ता करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनका सहारा भी बनती हैं।
        बहुत दुर्भाग्य की बात है कि अपने माता-पिता के लिए चिन्तित रहने वाली यही बेटियाँ जब बहु बनकर ससुराल जाती हैं तो वहाँ जाकर सास-ससुर को ही भार मानने लगती हैं। उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने में कोताही बरतती हैं। वहाँ जाकर उन्हें सारी नैतिकता भूल जाती है। उन्हीं माता-पिता समान सास-ससुर से उन्हें उनकी सारी धन-सम्पत्ति चाहिए होती है। उनके सारे कर्त्तव्य तो उन्हें बड़ी अच्छी तरह से याद रहते हैं परन्तु अपने दायित्वों से वे मुॅंह मोड़ लेती हैं। यानी उन्हें अपने कर्त्तव्य बिल्कुल भूल जाते हैं।
          यही कारण है कि आवश्यकता से अधिक पढ़ी-लिखी आज की यह युवा पीढ़ी अपने सारे कर्त्तव्यों को ताक पर रखकर मात्र अपने ही स्वार्थ को साधने में लगी रहती है। जिसका परिणाम बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। जिनकी पूजा करनी चाहिए थी, वे ईश्वर तुल्य माता-पिता उन्हें बहुत बड़ा बोझ लगने लगे हैं।
        घर के बुजुर्गों को या तो कोने में किया जा रहा है या फिर परेशान होकर उन्हें किसी वृद्धाश्रम की शरण में जाना पड़ रहा है। यहाँ भी धन प्रधान है। यदि वह है तो मनचाही सुविधाएँ मिल जाएँगी अन्यथा पूछ नहीं होती। कितने दुर्भाग्य की बात है कि अकेले माता-पिता दस बच्चों को पाल सकते हैं परन्तु दस बच्चों के होते हुए वे दरबदर की ठोकरें खाने को विवश हैं।
         कभी वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिले तो वहाँ विद्यमान वृद्धों से यह अवश्य पूछना कि आपका बेटा क्या करता है? उनमें से अधिकॉंश बजुर्गों का यही उत्तर होगा कि उनका बेटा बड़ा अफसर है या नामी डॉक्टर है या सुप्रसिद्ध वकील है या योग्य इंजीनियर है या मजिस्ट्रेट है अथवा किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। इन सभी पढ़े-लिखों को क्यों और किसलिए कोई उनके कर्त्तव्य का बोध कराए।
         इसके विपरीत शायद ही कोई वृद्ध वहाँ पर ऐसा मिलेगा जिसका बेटा अनपढ़ है या गरीब है। इसका कारण है कि अनपढ़ या गरीब व्यक्ति को समाज और ईश्वर का डर होता है। उसके मन में कभी यह बात कभी नहीं आएगी कि माता-पिता को कभी वृद्धाश्रम भेजा जा सकता है।
       यदि पाश्चात्य जगत के अन्धानुकरण के कारण यही आधुनिक युग का सत्य बनता जा रहा है तो इस सच्चाई पर सौ बार धिक्कार है। ऐसी सन्तान के लिए तो अन्ततः माता-पिता यही कह बैठते हैं ऐसी सन्तान के न होने पर वे निस्सन्तान रह जाते तो अच्छा था। ईश्वर तथाकथित शिक्षित और सभ्य कहलाने वाली ऐसी नालायक पीढ़ी को सद् बुद्धि प्रदान करे।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 2 सितंबर 2026

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय किसी मनुष्य के बाँधने से थम नहीं जाता। वह तो निरन्तर अपनी गति से प्रवाहित होता रहता है। कहते हैं कि महाबली रावण ने अपने समय में काल को अपने सिरहाने बाँधकर रखा था। फिर भी काल ने उसका पक्ष नहीं लिया। न ही उसे उसकी गलतियों के लिए बख्शा। समय किसी को क्षमा नहीं करता चाहे वह व्यक्ति स्वयं को कितना शक्तिशाली समझने की भूल क्यों न करता रहे।
          समय के इसी फेर बदल में इन्सान सदा उलझा रहता है पर इसका रहस्य वह आयुपर्यन्त नहीं जान पाता। मनुष्य का समय कभी अच्छा होता है और कभी वह पटकनी खाने लगता है। यानी कभी वह उन्नति करता है और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसके विपरीत वह कभी अनथक दुखों और परेशानियों में घिरकर लाचार हो जाता है। उस समय उसका किया गया परिश्रम इच्छानुसार फलदायी नहीं हो पाता।
          समय के इस फेर से बचने के लिए मनुष्य विभिन्न उपाय करता रहता है। धर्मस्थानों में जाता है, तीर्थ यात्राएँ करता है, तन्त्र-मन्त्र वालों के जाल में फंस जाता है, जंगलों की खाक छानता है और कभी-कभी तथाकथित धर्मगुरुओं की शरण में भी चला जाता है। फिर भी समय के इस दुस्सह फेर से बाहर निकालने में वह स्वयं को असमर्थ पाकर सिर धुनने लगता है।
          ग्रन्थों में एक प्रसंग ऐसा भी आता है कि एक बार धनुर्धारी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध किया, "प्रभु! इस दीवार पर कुछ ऐसा लिख दीजिए कि जब खुशी में पढूँ तो दुख हो और जब दुख में पढूँ तो मुझे प्रसन्नता हो।"
         प्रभु ने अर्जुन के आग्रह पर बस यह वाक्य लिखा, "यह समय व्यतीत हो जाएगा।"
          इस प्रसंग का तात्पर्य यही है कि यह समय हर परिस्थिति में बदल जाता है। जब मनुष्य सुखों का भोग कर रहा होता है तो वह समय भी बीत जाता है। इसी प्रकार दुखों-कष्टों का समय भी सदा नहीं रहता, वह भी बदल जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य का अच्छा या बुरा कैसा भी समय हो, अन्ततः वह समय बदल ही जाता है। 
        समय कभी अच्छा या बुरा नहीं होता बल्कि अच्छी या बुरी इन्सान की वे सभी परिस्थितियाँ होती हैं जो उस समय विशेष पर मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। उनके कारण ही वह कभी-कभी विचलित भी होने लगता है और उससे बचने के लिए कुमार्ग को अपना लेता है। समय बीतते जब उसे होश आता है तो पश्चाताप करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचता। उस समय वह सोचता है कि काश उसने वह कुमार्ग कभी चुना ही न होता।
        मनुष्य जब प्रसन्न होता है तो कह दिया जाता है कि फलाँ व्यक्ति का समय अच्छा चल रहा है तभी तो वह जीवन की ऊँचाइयों को छू रहा है। इसके विपरीत जब वह कष्ट में होता है तब आम भाषा में कह दिया जाता है कि उस व्यक्ति विशेष का समय खराब चल रहा है, तभी उसकी ऐसी दुर्दशा हो रही है। ईश्वर न जाने उस बेचारे पर कब अपनी मेहरबानी करेंगे? 
        इसी बात को हम इन शब्दों में कह सकते हैं कि आदिकाल से ही समय अपनी गति से समान रूप से चलता जा रहा है। न वह किसी की भलाई करता है और न ही वह किसी का अनिष्ट करता है। उसके लिए सभी जीव एक सामान हैं। इसीलिए सबके ही साथ वह समान रूप से व्यवहार करता है। ईश्वर का यह कठोर नियम है कि दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन आता है। सही ऋतुऍं अपने समयानुसार परिवर्तित होती रहती हैं। किसी के भी कहने से समय का यह क्रम कभी बदलता नहीं है।
          मनुष्य के जीवन में पहिए के अरों की तरह समय ऊपर-नीचे होता रहता है। अर्थात् सुख और दुःख उसके जीवन में क्रम से आते रहते हैं। जीवन की धूप-छॉंव का यह सम्पूर्ण क्रम उसे उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलता है। जैसे भी सुकर्म या दुष्कर्म उसने किए होते हैं, उनसे उसे किसी भी तरह छुटकारा नहीं मिल पाता। 
          जब तक मनुष्य अपने किए गए शुभाशुभ कर्मों का फल भोग नहीं लेता तब तक वह जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन में जकड़ा हुआ चौरासी लाख योनियों के फेर में ही भटकता रहता है। इससे उसकी मुक्ति सम्भव नहीं हो सकती। 
          समय को सदा दोष देते रहने का कभी कोई औचित्य नहीं होता। समय का वरद हस्त हम सब पर हमेशा बना रहता है। बस हम अज्ञ लोग समझ नहीं पाते। उसका सदुपयोग करता हुआ मनुष्य इस संसार सफल हो जाता है और दुरुपयोग करता हुआ व्यक्ति अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य कर बैठता है। इसलिए समय के साथ यदि मनुष्य कदम मिलाकर चल सके तो यह उसका सौभाग्य बन जाता है। फिर उसे अपने जीवन में कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
चन्द्र प्रभा सूद