मनोबल सदा ऊँचा रखना
परिस्थितियाँ जीवन में कैसी भी आ जाएँ मनुष्य को अपना मनोबल सदा ऊँचा ही रखना चाहिए। उसे किसी भी स्थिति में गिरने नहीं देना चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव पहिए के अरों की तरह की कभी ऊपर और कभी नीचे होते रहते हैं। यह गति ही जीवन का अभिन्न अंग है। यदि पहिए की भाँति जीवन की गति थम जाए तो सब स्थिर हो जाएगा। तब जीने का आनन्द ही धीरे-धीरे समाप्त होता जाएगा।
मनोबल ऊँचा रखने के लिए हर स्थिति में सकारात्मक पहलू खोजना चाहिए। नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए क्योंकि एक नकारात्मक विचार सकारात्मक विचारों को नष्ट कर सकता है। ध्यान करने से विचारों में स्पष्टता आती है और मनोबल बढ़ता है। व्यायाम तनाव को कम करता है। स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए। कठिन समय में भी शान्त रहकर निर्णय लेना चाहिए और साहस बनाए रखना चाहिए।
उन लोगों की तरफ जरा अपनी नजर दौड़ाइए जिनका जीवन एक निश्चित ढर्रे पर चलता है। उनसे कभी चर्चा करेंगे तो पता चलेगा कि वे कितने परेशान रहते हैं। उनका कहना है कि जिन्दगी से दुखी हैं। सवेरे से शाम तक बस वही घिसी-पिटी बदरंग जिन्दगी है, इसमें कोई आकर्षण नहीं है। वे लोग स्वयं को एक मशीन से अधिक और कुछ भी नहीं मानते। उन्हें लगता है कि उनका जीवन एक बोझ है जिसे वे उठाकर घूम रहे हैं। अपने पास सब सुख-सुविधाएँ होते हुए भी ऐसे लोग डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। बिना किसी विशेष रोग के प्रतिदिन डाक्टरों के पास चक्कर काटते रहते हैं।
अब अपने आहार को ही ले लो। एक जैसा यानि रूटीन खाना खाकर हम बोर हो जाते हैं। प्रतिदिन केवल बिना मसाले का फीका, कम नमक का खाना हम नहीं खा पाते। इसी तरह हररोज केवल मीठे खाद्य नहीं खा सकते। हमें भोजन में वैरायटी चाहिए। हमें मीठा, तीखा, चटपटा, दाल, सब्जी, सलाद, आचार, चटनी, पापड़ आदि सब खाद्य पदार्थ भोजन करते समय थाली में चाहिए। अत्यधिक मिर्च-मसालेदार भोजन मनोबल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सात्विक आहार अपनाना चाहिए।
इसी तरह एक ही ढर्रे में हम जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यहाँ भी हमें विविधता चाहिए। इसीलिए ईश्वर ने हमारे जीवन को विविध रंगों से ही सराबोर कर दिया है। जीवन के आरम्भ में यानी कि बाल्यकाल बालसुलभ चेष्टाओं से रंगीन बना दिया। वहाँ सब कुछ समझने-बूझने का उतावलापन होता है। अपनी सम्पूर्ण योग्यताओं को निखारने और सेटल होने की ललक होती है।
उसके बाद यौवनकाल में घर-गृहस्थी, बच्चों और नौकरी-व्यापार आदि की सभी जिम्मेदारियों से लदकर मनुष्य कोल्हू के बैल की तरह बन जाता है। आयु बढ़ने के साथ बच्चों को सेटल करना, उनके विवाह करना और अपनी रिटायरमेंट की समस्याएँ उसके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
इसके बाद वृद्धावस्था में बिमारियाँ, शरीर का अशक्त होना, खर्चो में वृद्धि की परेशानियाँ मुँह बाए खड़ी हो जाती हैं। पति-पत्नी का साथ बना रहे तो जीवन सरल हो जाता है। बच्चों का साथ मिले तो बहुत अच्छा और यदि किसी कारणवश न मिल पाए तो उदासी और दुखों की पराकाष्ठा।
जीवन के इन इन्द्रधनुषी रंगों को यहाँ उकेरने का मात्र यही उद्देश्य है कि हर मोड़ पर मानव की स्थतियाँ भिन्न होती हैँ। कभी-कभी जीवन नदी की धारा की तरह बाधारहित निरन्तर गतिशील रहता है और कभी उसमें बाढ़ भी आ जाती है जो सारे तटबन्धों को तोड़कर तबाही मचा देती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन में सुख के पलों हम मानो जी उठते हैं। दुख की घड़ियों में भी जीते हैं पर मर-मरकर, डरते हुए, उदास-निराश होकर अथवा जीवन से हार मानने लगते हैं। सब कुछ सहन कर लेना चाहिए पर जिन्दगी से हारना नहीं चाहिए। उससे डटकर मुकाबला करना चाहिए। चुनौतियों का सामना करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।
जिस प्रकार काले घने बादलों में छुपा सूर्य उनके बरसने पर मुस्कुराता हुआ आ जाता है, दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, उसी प्रकार परेशानियों की घनी काली रात के बाद फिर खुशियाँ का सवेरा आता है। दुख की बदली भी छट जाती है।
मनोबल मानसिक शक्ति का प्रतीक है जो जीवन की चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। जीवन पर्यन्त आने वाले सभी सुख-दुख कोई नया पाठ पढ़ाकर जाते हैं। इसीलिए यह संसार उस प्रभु की पाठशाला है जिसके हम सभी जीव विद्यार्थी हैं। हर पाठ को पढ़कर परीक्षा देनी पड़ती है और योग्यता से उत्तीर्ण भी होना होता है। इस सबके लिए हमारा अपना मनोबल ही हमारा सच्चा मित्र होता है जो जीवन में कभी लड़खड़ाने नहीं देता।
चन्द्र प्रभा सूद