हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक
हितचिन्तक वह व्यक्ति होता है तो किसी दूसरे का कल्याण, सुख अथवा सफलता की कामना करता है। यह वह व्यक्ति है जो सबके हित या भलाई के विषय में सोचता है। हितचिन्तक को अंग्रेजी भाषा में Well W isher कहते हैं। वे सदा ही निस्वार्थ रहकर देश, धर्म और समाज की भलाई के विषय में सोचते हैं। इस नेक काम के लिए अपने घर-परिवार तक की परवाह न करते हुए वे अपने तन, मन और धन सबका उपयोग करते हैं। सबसे बढ़कर अपना अमूल्य समय भी जनहित में खर्च करते हैं।
जहाँ लोग अपने शारीरिक आराम को अधिक महत्त्व देते हैं और वे अपने शरीर को सजाने-संवारने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते। वे इसके सुखों में खोए रहते हैं। वहीं पर ये महानुभाव अपने सुख और आराम को तिलांजलि देकर दिन-रात जनहित के कार्य करते रहते हैं। इन लोगों का मानना है कि यह मानव शरीर ईश्वर ने अपने बनाए जीवों का ध्यान रखने के लिए दिया है। वे अपने नैतिक दायित्व को पूर्ण कर रहे हैं, किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे।
ये परोपकारी जीव अपने मन से भी सबका हित चाहते हैं। किसी का अहित करने के विषय में कभी सोच नहीं सकते। हर समय नित-नए ऐसे उपाय सोचते रहते हैं जिनसे जन मानस की भलाई के कार्य किए जा सकें। दीन-दुखियों के जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य करने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं। इसीलिए इनका मन बहुत ही खूबसूरत होता है, जिसमें किसी के प्रति घृणा, ईर्ष्या आदि का कोई स्थान नहीं होता। प्राणिमात्र की भलाई में जुटे रहना उनका एकमात्र लक्ष्य होता है।
अपने अथक परिश्रम से अर्जित धन को परमार्थ के लिए खर्च करने से भी ये लोग नहीं हिचकिचाते। हम सभी जानते हैं कि धन के बिना मनुष्य इस संसार में एक कदम भी नहीं चल सकता। कहीं आने-जाने में भी धन का व्यय होता है और किसी की सहायता के लिए भी उसे दिया जाता है। ये निस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहते हैं। वे अपने धन का मोह पालते हुए कभी स्वार्थी नहीं बनते। बादलों की तरह जो भी इस समाज से लेते हैं उसे इसी धरती पर लोगों में बाँट देने में विश्वास रखते हैं।
हो सकता है कुछ स्वार्थी व मूर्ख लोग इसे धन का अपव्यय समझें पर वास्तव में ये महान लोग अपने धन का सदुपयोग करते हैं जिसे वे अज्ञ समझ नहीं सकते। तन, मन और धन से भी बढ़कर मूल्यवान समय होता है। जो इसका सदुपयोग करते हैं, सफल कहलाते हैं और इस समय को अपनी लापरवाही से व्यर्थ गंवाने वाले अपने जीवन में असफल रहते हैं। उचित समय पर ही मनुष्य को उसके कृत कर्मों का फल अथवा कुफल भी मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं। ऐसे मूल्यवान समय को भी ये सज्जन दूसरों पर खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं।
हितचिन्तक नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई, सेवा या कल्याण के लिए अपना समय, धन अथवा प्रतिभा समर्पित करते हैं। वे दूसरों के दुखों को दूर करने और बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या प्रतिफल के समाज को बेहतर बनाने की भावना से कार्य करते हैं। इसे 'देव वृत्ति' भी कहा जा सकता है, जो करुणा और उदारता से प्रेरित होती है। नदियॉं अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, वे अपना सब कुछ दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं। उसी प्रकार ये महान लोग भी बिना शिकन लाए अपना सर्वस्व देश, समाज और धर्म के लिए अर्पित कर देते हैं।
वे समय का मूल्य समझते हैं और जानते हैं कि समय पर यदि किसी की सहायता न की जाए तो उसकी उपयोगिता नहीं रह जाती। यदि हल जुते तैयार खेत में वर्षा अपने ठीक समय पर न हो तो उस खेत की मिट्टी सूख जाती है। फिर उसके बाद कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न हो जाए पर उस सूखे खेत में फसल नहीं हो पाती बल्कि उस खेत के लिए वह व्यर्थ हो जाती है।
ऐसे व्यक्तियों को हमेशा अधिक महत्त्व और मान-सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे दूसरों के लिए अपने जीवन के वो पल खर्च कर रहे होते हैं जो उन्हें कभी वापिस नहीं मिल सकते। कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता चाहे कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए। परोपकार करने वाले जन इस समय का वास्तव में निस्वार्थ रूप से सदुपयोग करते हैं। इसीलिए इनका यश बिना किसी प्रयास के स्वयं ही चारों दिशाओं में फैल जाता है। इनकी कीर्ति इनके कहीं भी जाने से पहले पहुँच जाती है।
सार रूप हम कह सकते हैं कि अपना स्वार्थ त्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए जीना ही वास्तव में हितचिन्तक होना कहलाता है। अपनी इच्छा से, अपने मानसिक सन्तोष के लिए अपने तन, मन, धन और समय का सत्कार्यों में उपयोग करने से मनुष्य के पुण्य कर्मों में स्वत: ही बढ़ोत्तरी होती जाती है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं। ऐसे यही महापुरुष विश्व वन्दनीय होते हैं और ईश्वर के प्रिय बन जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद