शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

डर केवल एक भाव

डर केवल एक भाव

डर क्या होता है यानी कि कुछ भी नहीं होता। यह केवल मन का एक भाव होता है। परन्तु यह व्यक्ति विशेष के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। उसे सुख और आराम से नहीं रहने देता। उसके दिन-रात के चैन को लील जाता है। मनुष्य हर समय बदहवास-सा रहने लगता है। वास्तव में अक्सर मन में डर का कारण गलत धारणाऍं होती हैं। यह डर मनुष्य को कहीं बाहर से नहीं मिलता अपितु उसके अपने अन्तस् में होता है। मनुष्य को अनावश्यक रूप से नहीं डरना चाहिए।
            डर लगने का मुख्य कारण मस्तिष्क में खतरे की पहचान और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो मनुष्य को सम्भावित नुकसान से बचाने के लिए विकसित होती है। यह आघात सीखी हुई प्रतिक्रियाओं, अनिश्चितता अथवा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन और सांस तेज हो जाती है। डर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो सुरक्षा के लिए होती है परन्तु इसकी अति हो जाने पर यह मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकती है।
             इन्सान को अपने डर पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यह डर उसके मन में कुण्डली मारकर पसरा रहता है। इस नाग से छुटकारा पाना इन्सान के लिए अति आवश्यक होता है। मनुष्य अपना सारा जीवन किसी-न-किसी कारण से डर-डरकर व्यतीत करता है। कभी धर्म के नाम पर डरता है तो कभी समाज से डरता रहता है। कभी वह अन्धेरे की घुटन से त्रस्त रहता है तो कभी उजाले से। बचपन में माँ से दूर होने का डर होता है। फिर गृहकार्य न करके स्कूल में जाकर मिलने वाली डाँट का भय रहता है। कभी परीक्षा में अपेक्षानुसार अंक न आने का भय उसे व्याकुल कर देता है।
            बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली असफलताओं का भय उसे जीने नहीं देता। जीवन में आने वाली परीक्षाओं में सफलता पाना उसका ध्येय होता है। इसलिए उसके मन में डर का घर कर जाना स्वाभाविक है कि अगर किसी कारण से चूक गए तो क्या होगा?
             कभी मनुष्य को अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने के लिए परेशानी रहती है। कभी-कभी न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ और कभी इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि उसे भयभीत करते हैं। कभी कार्यालय में की गई किसी गलती के कारण बास या साथियों का डर उसे बेचैन कर देता है। कभी-कभी घर-परिवार के दायित्वों को ठीक से न निभा पाने पर होने वाला विस्फोट उसे भयभीत कर देता है।
            किसी को पानी से, किसी को ऊँचाई से और किसी को आग से डर लगता है। किसी-किसी को तथाकथित भूत-प्रेतों का भय सताता है। और भी न जाने क्या क्या अनजाने डर उसे घेरकर उसके व्यक्तित्व को ग्रसने का कार्य करते हैं। उस समय वह थरथर काँपने लगता है। इस भय की अधिकता होने पर मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन तक खो देता है। किसी को कुछ कीड़ों से डर लगता है।
             विचारणीय है कि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज सबके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व होता है। उनके पालन में जहाँ भी चूक होती है, वहीं एक अनजाना-सा डर उसे सताने लगता है। 'लोग क्या कहेंगे' की यह चिन्ता उसके मन को निरन्तर व्यथित करने लगती है। यदि कभी मनुष्य से गलती हो जाए तो निस्सन्देह उसे डरना चाहिए। किन्तु उसके अलावा उसे कभी भी किसी से भी डरना नहीं चाहिए। 
            मनुष्य को अपनी की गई गलती का मन से प्रायश्चित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि वह गलती दुबारा न दोहराई जाए। मनुष्य अपनी जिन्दगी का मालिक स्वयं होता है। यदि मनुष्य अपनी गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ता है तो उस जैसा कोई और इन्सान नहीं हो सकता।यदि मनुष्य सही तरीके से नियमानुसार कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा हो तो कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह अपने सही रास्ते पर चलता रहे तो उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती, दूसरे उसका सामना करने से घबराते हैं।
            जिस बात से डर लगता है, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। जब मनुष्य डर का सामना करता है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।इस बात पर विचार करना‌ चाहिए कि क्या उसका डर वास्तव में तर्कसंगत है? डर लगने पर गहरी सांस लेनी शारीरिक व्यायाम (योगा) भी डर व घबराहट को कम करने में मददगार हैं। चाहिए, इससे शरीर को शान्त करने में सहायता मिलती है। मेडिटेशन (ध्यान) के जरिए मन को शान्त रखना चाहिए। नियमित मेडिटेशन मन को शान्त करती है और डर को नियन्त्रित करने में बहुत सहायता करता है। स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि नकारात्मक विचार मन में न आ सकें। ईश्वर अथवा किसी मार्गदर्शक में विश्वास रखने‌ से मन मजबूत होता है। शारीरिक व्यायाम यानी योग भी डर और घबराहट को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।
          इनके अतिरिक्त अपने डर पर काबू पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर से सहायता की गुहार लगानी चाहिए। शौर्य सम्पन्न महपुरुषों की जीवन गथाएँ पढ़कर प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे लोगो का साथ करना चाहिए जो सकारात्मक हों और उसे अनजाने डर से बाहर निकलने में सहायता कर सकें। सबसे बढ़कर उसे यह मानकर चलना चाहिए कि डर के आगे जीत है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

मनुष्य यदि सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है तो वह कभी व्यर्थ नहीं होती। वह उस ईश्वर तक पहुँच ही जाती है और वह भी ऐसे व्यक्ति को अपनी शरण में ले लेता है। उसके दुखों को दूर करके उसे कुन्दन बना देता है। ईश्वर को मनुष्य की भौतिक पद प्रतिष्ठा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे तो बस मनुष्य के हृदयगत भावों की आवश्यकता होती है। वह प्रभु मनुष्य के भाव में ही अपना बसेरा बनाना पसन्द करता है। निम्न श्लोक इसी बात पर प्रकाश डाल रहा है -
       न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
    भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥  
अर्थात् न ही लकड़ी या पत्थर की मूर्ति में , न ही मिट्टी में देवता का निवास होता है। देवता का निवास तो भाव यानी हृदय में होता है। अतः भाव ही सर्वोपरि कारण है। यानी हृदय में ही देवता का निवास होता है।
               इस भौतिक संसार में एक बच्चा जब अपनी माता को करुणा से रोते हुए पुकारता है तो उसकी माँ उसे अपने आँचल में छुपा लेती है। उसे हर तरह से सान्त्वना देती है, उसके कष्ट का निवारण करती है। उसी प्रकार वह जगत जननी भी अपने बच्चों करुण पुकार सुनकर द्रवित हो जाती है और फिर झट से उन्हें सहारा देकर कृतार्थ करती है। उस जगज्जननी मॉं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। स्वयं को उसे सच्चे मन से सौंपने पर वह कभी मनुष्य को निराश नहीं करती। बस हम लोग ही उस पर भरोसा नहीं कर पाते।
            यदि मनुष्य की प्रार्थना मात्र आडम्बर हो तो उसका कोई औचित्य नहीं होता। तब वह बस व्यर्थ होकर रह जाती है। उस व्यक्ति को उसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाता। सच्चे मन से ईश्वर की अराधना करने वाले को कभी‌ हताशा का मुॅंह नहीं देखना पड़ता। सुख का समय हो अथवा दुःख का, ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुरक्षा करता है। कभी उसे अकेला नहीं रहने देता। हर कदम पर उसके साथ होता है। हम मनुष्य प्रभु की इस कृपा को समझ नहीं पाते।
             बहुत से लोग इस संसार में ऐसे भी होते हैं जो केवल मात्र दूसरों को दिखाने के लिए ही पूजा-अर्चना करते हैं, उनके मन में कोई भाव नहीं होते। ऐसे लोग जो बरसों बरस प्रदर्शन करते रहते हैं, उनका बस यही उद्देश्य होता है कि  लोग उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानें। बताइए जब स्वयं पर ही उस प्रार्थना का प्रभाव नहीं हो रहा तो उस ईश्वर के पास भी तो वह नहीं पहुँच सकेगी।
           अब यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। ईश्वर को कभी आडम्बर वाली भक्ति नहीं चाहिए। उसे तो श्रद्धा से ओतप्रोत स्तुति चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की उपासना आत्मोन्नति के लिए करता है तो उसके पास अणिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियाँ स्वयं ही आ जाती हैं। उसके उपरान्त मनुष्य को वहीं रुकना नहीं चाहिए अपितु और अधिक प्रयास में जुट जाना चाहिए। यदि वह उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा तो उसकी उन्नति वहीं रुकना जाती है।
             उसका हृदय शुद्ध, पवित्र और निर्मल हो जाता है। उसके मनोविकार स्वत: ही दूर होने लगते हैं। तब मनुष्य एक साधारण मानव न रहकर एक महामानव बन जाता है। उसके मुख से निकला हुआ हर शब्द पत्थर पर पड़ी लकीर की तरह सच होने लगता है। उसका बोला हुआ हर वाक्य सारगर्भित होता है। उसके चेहरे का दिव्य तेज देखते ही बनता है। उसके आभामण्डल या औरा से निकलने वाली सात्विक किरणें किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं।
             इनके पास आने वालों को इनकी सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित करती है। इनकी वाणी में एक ओज होता है जिससे कुमार्गगामी लोग भी भयभीत होते हैं। इन लोगों का तेज ही इतना अधिक होता है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक इनसे घबराते हैं। शरीरिक बल न होने पर भी मानसिक और आत्मिक बल के कारण ये किसी का भी सामना कर सकते हैं। कैसा भी कार्य क्यों न हो, कर गुजरते हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इन महापुरुषों के विषय में बहुत कुछ पढ़ने और जानने के लिए मिल जाएगा।
             हम देखते हैं कि बादल इस पृथ्वी से जल लेते हैं और उसे वापिस इस धरा को लौटा देते हैं। आकाश से बादलों के द्वारा गिरा हुआ जल किसी-न-किसी रास्ते से होकर अपने लक्ष्य समुद्र तक पहुँच ही जाता है। उसी प्रकार नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की गई प्रार्थना भी किसी-न-किसी प्रकार से उस प्रभु तक पहुँच ही जाती है। कहते हैं ईश्वर को चाहे छप्पन व्यंजनों का भी भोग लगा लो तो वे सब व्यर्थ हो जाते हैं, यदि ईश्वर को पाने की मन में ललक न हो। 
           ईश्वर ने दुनिया की सब नेमते हमें दी हैं। हमारी क्या सामर्थ्य कि हम उसे कुछ भेंट में दे सकें? हम लोग तो बस उसे रिश्वत देकर रिझाने का यत्न करते हैं। यह तो मनुष्य की भावना नहीं कहलाती। इसे हम सौदा करना ही कह सकते हैं। संक्षेप में ईश्वर मनुष्य के मन के भाव में रहता है, ये भाव ही उस तक पहुँचने का कारण हैं, माध्यम हैं। इसलिए अपने मन में उसे पाने की उत्कट भावना रखते हुए उसका स्मरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

अपने अन्त:करण में विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लालच, अहंकार आदि के कूड़े को मनुष्य सम्हालकर रखता रहता है। कुछ समय पश्चात कचरा बने हुए ये सभी दूषित भाव धीरे-धीरे सड़कर बदबू देने लगते हैं। पिष्टपेषण किए गए वे विचार मनुष्य के मन-मस्तिष्क को और अधिक प्रभावित करने लगते हैं। उस समय अपने अहं के कारण जब मनुष्य विश्लेषण करने लगता है तो उसका अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर से विश्वास उठने लगता है।
           उन कुविचारों पर बार-बार मन्थन करने पर उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में सभी उससे जलते हैं, कोई भी उसे तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता। सभी लोग उसका फायदा उठाना चाहते हैं पर उससे उन्हें कोई लगाव नहीं है। सब लोग उसके साथ स्वार्थवश जुड़े हुए हैं। वह इससे परे कुछ सोचना ही नहीं चाहता। उसकी प्रवृत्ति जब नकारात्मक होने‌ लगती है तब उसकी सोच का दायरा संकुचित होने लगता है। उस समय वह कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता।
              सदा ही इस प्रकार सोच-विचार करते रहने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे समय बीतते नकारात्मक दृष्टिकोण वाले बन जाते हैं। उन्हें हर मनुष्य में खोट ही नजर आने लगता है चाहे वह उनका प्रिय ही क्यों न हो। वे हर व्यक्ति को वे सन्देहभरी नजरों से देखते हैं। वे इस बात का दावा करते हैं कि लोग उन्हें समझते ही नहीं है। उन लोगों की बुद्धि ही ऐसी है जो उन्हें उनकी अच्छाई दिखाई नहीं देती। अपने अन्तस में झॉंककर देखने के स्थान पर वे सबमें खोट निकालने का कार्य करते हैं।
             उन्हें हर समय यही लगता है कि एक वे ही हैं जो दुनिया बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं और उनके आसपास रहने वाले बाकी सभी लोग मूर्ख हैं। उनकी सोच संकुचित है। वे हर अच्छी चर्चा को अपने नकारात्मक विचारों से बर्बाद करके सबकी आलोचना का शिकार बन जाते हैं। निराश होकर बाद में वे यही शिकायत करते हैं कि उनकी बात को कोई सुनकर लाभ ही नहीं उठाना चाहता और एक दिन वे सब अपनी इस गलती के लिए पश्चाताप करेंगे। तब उन्हें समझ आएगा।
              मोह-माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मनुष्य इनसे अपना पल्लू नहीं झाड़ पाता। न चाहते हुए भी अज्ञानतावश बार-बार इनके जाल में फँस जाता है। इसलिए वह केवल अपनों के लिए सब सुख-सुविधाएँ जुटाता है और दूसरे सभी लोगों को अनदेखा करने लगता है। जैसे अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे, उसी प्रकार अपनों के मोह में फंसे मनुष्य भी बारबार जाने-अनजाने सब गलत-सही काम करने से परहेज नहीं करते। बाद में परेशान होते हैं और पश्चाताप करते हैं।
              इसी प्रकार क्रोध करते हुए ऐसे लोग अपना विवेक दाँव पर लगा देते हैं। वे किसी ऐसे मनुष्य से दोस्ती नहीं करना चाहते जो अनावश्यक ही क्रोध करके अपने सामने वाले का अपमान करे अथवा दूसरों से अलग होता जाए।
             जिस प्रकार अपने घर के अन्दर जमा हुए कूड़े-कचरे को फैंकने के लिए उसका विज्ञापन अखबार आदि में नहीं किया जाता बल्कि चुपचाप प्रसन्नतापूर्वक बाहर जाकर कूड़दान में फैंक दिया जाता है। उसी प्रकार अपने अन्तस् में विद्यमान कुत्सित भावरूपी कचरे को निकालकर फैंकने के लिए भी ढिंढोरा नहीं पीटा जाता या विज्ञापित नहीं किया जाता। इन विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। न ही इन्हें अपने जीवन को नरक के तुल्य कष्टदायी बनाने देना चाहिए। इन्हें नियन्त्रित करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
            ईश्वर की शरण में जाने से और अपने सद् ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करने से मन में बसे हुए इन कुत्सित नकारात्मक विचारों को वश में किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपनी संगति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यथासम्भव सज्जनों की संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए। नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने के लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। यदि विचार बहुत अधिक परेशान कर रहे हों तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। स्वयं को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास तो करना ही पड़ेगा। 
          नकारात्मक विचारों को मन से निकालना मानसिक शान्ति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए नकारात्मक विचारों को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। उन्हें साक्षी भाव से देखना चाहिए और फिर धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को ध्यान तथा स्व-देखभाल‌ से बदलना चाहिए। खुद की आलोचना करने से बचना चाहिए। यदि विचार बार-बार आऍं तो धैर्य रखना चाहिए। धीरे-धीरे सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ना चाहिए। मन को खाली न छोड़ें। अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक संगीत सुनें या आभारी रहने की आदत डालनी चाहिए।
           अपने मन को साधने के लिए प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। रात को सोते समय कुछ वक्त निकालकर एक बार सारे दिन के कार्य व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। इससे अपनी अच्छाई-बुराई का भान हो जाता है। उससे सबक लेकर अच्छे कृत्यों को बढ़ाते जाना चाहिए और अपनी कमियों को यथासम्भव दूर करते रहना चाहिए। वास्तव में थोड़ा-सा प्रयत्न करने से व्यक्ति स्वयं ही समझदार मनुष्य बनकर सबका प्रिय हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

संविधान में महिलाऍं बराबर

संविधान में महिलाऍं बराबर

महिलाओं को मन्दिर में जाना चाहिए अथवा नहीं यह एक ज्वलन्त मुद्दा है। इस विषय पर कुछ वर्षों पूर्व ऐसी बहस प्राय: हर न्यूज चैनल पर आयोजित की जा गई थी। शेष अन्य विवादों की तरह इस समस्या का भी कोई समाधान नहीं निकला था। सभी विद्वान अपने-अपने विचार रख रहे थे, तीखी टीका-टिप्पणियाँ कर रहे थे परन्तु परिणाम वही रहा था यानी ढाक के तीन पात।
           7 मार्च 2016 को न्यूज24 पर शाम 7 बजे तीखी बहस में हो रही थी, उसी को देखते-सुनते हुए यह आलेख लिखने का मन बनाया था।
          आज यह ज्वलन्त प्रश्न एक मुद्दा बनता जा रहा है कि यदि पूजा करने के लिए महिलाओं को मन्दिर में जाने की अनुमति नहीं है तो पुरुषों को भी नहीं होनी चाहिए। इसका कारण है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यह कहना बिल्कुल गलत है कि पुरुष स्त्री से अधिक श्रेष्ठ है। हाँ, शारीरिक रूप से वह अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर आज ज्ञान, विज्ञान, उद्योग, राजनीति आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ महिलाएँ पुरुषों से कमतर सिद्ध हो रही हैं। 
            पुरुष को अपने जीवन में हर कदम पर स्त्री के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। जन्म लेने के लिए एक माता की जरूरत होती है और फिर एक बहन चाहिए होती है। बाद में पत्नि की आवश्यकता होती है जिसके काल कवलित हो जाने पर वह अपना घर अकेले नहीं चला सकता और अपने बच्चों को भी अकेले नहीं पाल-पोसकर बड़ा नहीं कर सकता। जबकि पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को इन सब समस्याओं से दो-चार नहीं होना पड़ता। वह पुरुष के सहारे के बिना भी सभी दायित्वों को सरलता से निभा लेती है। 
             यदि हम बात करें वेदों की तो उनमें ऐसा कोई विधान किसी के लिए भी नहीं है कि वे मन्दिरों में नहीं जा सकते। वहाँ पर तो पूजा करने के लिए मन्दिरों की कल्पना ही नहीं की गई थी। वैसे वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों से कम अधिकार नहीं दिए गए थे। वे हर क्षेत्र में अपनी पैठ रखती थीं। यह तो कुछ तथाकथित विद्वानों के पूर्वाग्रह युक्त दिमाग‌ की उपज है जिन्होंने नारी को पुरुषों से कमतर समझा। इस प्रकार धर्म और समाज को दोषमुक्त बनाने का अपराध किया।
              हमारे मनीषी समझाते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए किसी मन्दिर यानी धर्म स्थानों या तीर्थों में जाने, जंगलों में खोजने, तथाकथित गुरुओं अथवा तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के पास जाकर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे पाना बहुत ही सरल होता है। वह तो मनुष्य के मन में ही रहता है और वहीं पर ही मिलता है। वह केवल मनुष्य के मन के भाव में रहता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि स्त्री घर में बैठकर ईश्वर की उपासना करे तो फिर यही नियम पुरुषों पर क्यों लागू नहीं होता? वह घर बैठकर साधना क्यों नहीं कर सकता?
              किसी-किसी क्षेत्र में आज महिलाएँ पुरुषों से भी आगे निकल गई हैं। उनके अधीनस्थ पुरुष कर्मचारी इस बात को पचा नहीं पाते कि उन्हें किसी महिला अधिकारी के अधीन कार्य करना पड़ रहा है। इक्कसवीं सदी में आज के युग में भी पुरुषों की मानसिकता यही है कि स्त्री उनके अँगूठे के नीचे दबकर रहे। उसे सिर उठाकर चलने का अधिकार वे नहीं देना चाहते। स्वयं  वे चाहे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएँ परन्तु यदि बहन या पत्नि किसी साथी पुरुष से बात भी कर ले तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, उसे खरी-खोटी सुनाई जाती है। 
             यदि वह पुरुष प्रधान समाज में अपना एक स्थान विशेष बनाने के लिए संघर्ष करना चाहती है तो उसके पैरों में बेड़ियाँ डालने का प्रयास किया जाता है। उसे कभी तो घर-परिवार का वास्ता दिया जाता है और फिर कभी परम्पराओं के नाम की दुहाई देकर उसके बढ़ते हुए कदमों को पलटने के लिए विवश किया जाता है। पुरुष अपने झूठे अहं के कारण अपना वर्चस्व त्यागकर स्त्री को कभी भी महत्त्वपूर्ण बनने नहीं देना चाहते।
             मन्दिर प्रवेश तो मात्र एक बहाना है।  इस बहाने पुरुष कुत्सित राजनैतिक चालें चल रहे हैं। टी वी पर होने वाली चर्चाओं में उन पर कटाक्ष भी किए जाते हैं। पुरुष आज अपनी पत्नी को धन कमाने का माध्यम तो बनाना चाहता है पर उसकी वैचारिक स्वतन्त्रता में बाधक बनता है। स्त्री यदि आगे बढ़ती है तो उस पर लाँछन लगाने से भी बाज नहीं आता। वह नहीं चाहता कि स्त्री उससे आगे बढ़ जाए। बहुत से पुरुष आज भी अपनी पत्नी की उन्नति में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आते।
             हमारा भारतीय संविधान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है। अपने इन अधिकारों को महिलाओं को निस्सन्देह आगे बढ़कर को प्राप्त करना चाहिए पर वहीं उन्हें अपने दायित्वों से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। नारी मुक्ति के नाम पर की जाने वाली उच्छ्रँखता असहनीय है। इससे बचने का हर सम्भव प्रयास हर महिला को करना चाहिए। इसके नाम पर परिवार को छोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कही जा सकती।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक वह व्यक्ति होता है तो किसी दूसरे का कल्याण, सुख अथवा सफलता की कामना करता है। यह वह व्यक्ति है जो सबके हित या भलाई के विषय में सोचता है। हितचिन्तक को अंग्रेजी भाषा में Well W isher कहते हैं। वे सदा ही निस्वार्थ रहकर देश, धर्म और समाज की भलाई के विषय में सोचते हैं। इस नेक काम के लिए अपने घर-परिवार तक की परवाह न करते हुए वे अपने तन, मन और धन सबका उपयोग करते हैं। सबसे बढ़कर अपना अमूल्य समय भी जनहित में खर्च करते हैं। 
              जहाँ लोग अपने शारीरिक आराम को अधिक महत्त्व देते हैं और वे अपने शरीर को सजाने-संवारने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते। वे इसके सुखों में खोए रहते हैं। वहीं पर ये महानुभाव अपने सुख और आराम को तिलांजलि देकर दिन-रात जनहित के कार्य करते रहते हैं। इन लोगों का मानना है कि यह मानव शरीर ईश्वर ने अपने बनाए जीवों का ध्यान रखने के लिए दिया है। वे अपने नैतिक दायित्व को पूर्ण कर रहे हैं, किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे।
            ये परोपकारी जीव अपने मन से भी सबका हित चाहते हैं। किसी का अहित करने के विषय में कभी सोच नहीं सकते। हर समय नित-नए ऐसे उपाय  सोचते रहते हैं जिनसे जन मानस की भलाई के कार्य किए जा सकें। दीन-दुखियों के जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य करने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं। इसीलिए इनका मन बहुत ही खूबसूरत होता है, जिसमें किसी के प्रति घृणा, ईर्ष्या आदि का कोई स्थान नहीं होता। प्राणिमात्र की भलाई में जुटे रहना उनका एकमात्र लक्ष्य होता है।
            अपने अथक परिश्रम से अर्जित धन को परमार्थ के लिए खर्च करने से भी ये लोग नहीं हिचकिचाते। हम सभी जानते हैं कि धन के बिना मनुष्य इस संसार में एक कदम भी नहीं चल सकता। कहीं आने-जाने में भी धन का व्यय होता है और किसी की सहायता के लिए भी उसे दिया जाता है। ये निस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहते हैं। वे अपने धन का मोह पालते हुए कभी स्वार्थी नहीं बनते। बादलों की तरह जो भी इस समाज से लेते हैं उसे इसी धरती पर लोगों में बाँट देने में विश्वास रखते हैं। 
              हो सकता है कुछ स्वार्थी व मूर्ख लोग इसे धन का अपव्यय समझें पर वास्तव में ये महान लोग अपने धन का सदुपयोग करते हैं जिसे वे अज्ञ समझ नहीं सकते। तन, मन और धन से भी बढ़कर मूल्यवान समय होता है। जो इसका सदुपयोग करते हैं, सफल कहलाते हैं और इस समय को अपनी लापरवाही से व्यर्थ गंवाने वाले अपने जीवन में असफल रहते हैं। उचित समय पर ही मनुष्य को उसके कृत कर्मों का फल अथवा कुफल भी मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं। ऐसे मूल्यवान समय को भी ये सज्जन दूसरों पर खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं। 
          हितचिन्तक नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई, सेवा या कल्याण के लिए अपना समय, धन अथवा प्रतिभा समर्पित करते हैं। वे दूसरों के दुखों को दूर करने और बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या प्रतिफल के समाज को बेहतर बनाने की भावना से कार्य करते हैं। इसे 'देव वृत्ति' भी कहा जा सकता है, जो करुणा और उदारता से प्रेरित होती है। नदियॉं अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, वे अपना सब कुछ दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं। उसी प्रकार ये महान लोग भी बिना शिकन लाए अपना सर्वस्व देश, समाज और धर्म के लिए अर्पित कर देते हैं।
          वे समय का मूल्य समझते हैं और जानते हैं कि समय पर यदि किसी की सहायता न की जाए तो उसकी उपयोगिता नहीं रह जाती। यदि हल जुते तैयार खेत में वर्षा अपने ठीक समय पर न हो तो उस खेत की मिट्टी सूख जाती है। फिर उसके बाद कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न हो जाए पर उस सूखे खेत में फसल नहीं हो पाती बल्कि उस खेत के लिए वह व्यर्थ हो जाती है।
            ऐसे व्यक्तियों को हमेशा अधिक महत्त्व और मान-सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे दूसरों के लिए अपने जीवन के वो पल खर्च कर रहे होते हैं जो उन्हें कभी वापिस नहीं मिल सकते। कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता चाहे कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए। परोपकार करने वाले जन इस समय का वास्तव में निस्वार्थ रूप से सदुपयोग करते हैं।  इसीलिए इनका यश बिना किसी प्रयास के स्वयं ही चारों दिशाओं में फैल जाता है। इनकी कीर्ति इनके कहीं भी जाने से पहले पहुँच जाती है।
              सार रूप हम कह सकते हैं कि अपना स्वार्थ त्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए जीना ही वास्तव में हितचिन्तक होना कहलाता है। अपनी इच्छा से, अपने मानसिक सन्तोष के लिए अपने तन, मन, धन और समय का सत्कार्यों में उपयोग करने से मनुष्य के पुण्य कर्मों में स्वत: ही बढ़ोत्तरी होती जाती है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं। ऐसे यही महापुरुष विश्व वन्दनीय होते हैं और ईश्वर के प्रिय बन जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 अप्रैल 2026

दान धर्म का पालन करना

दान धर्म का पालन करना

दान करना मनुष्य का धर्म है जो उसे आत्मसन्तोष देता है। किसी जरूरतमन्द की समय पर सहायता करना भी दान कहलाता है। वह मनुष्य कदापि नहीं हो सकता जिसके मन में दया, ममता, करुणा आदि मानवोचित गुण विद्यमान न हों। हमारे महान ग्रन्थ और मनीषी दान देने को महत्त्व देते हैं। मनुष्य में जितनी भी सामर्थ्य हो उसके अनुसार ही उसे अन्न, वस्त्रादि का दान देना चाहिए। दान मनुष्य को इस प्रकार करना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिए। 
            दान धर्म का अर्थ होता है अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी स्वार्थ या प्रतिफल की अपेक्षा के किसी जरूरतमन्द को स्वेच्छा से धन, भोजन, वस्त्र, ज्ञान या अन्य वस्तुऍं निस्वार्थ भाव से समर्पित की जाऍं। यह हिन्दू धर्म में एक कर्तव्य, आत्म-शुद्धि का साधन और करुणा का सर्वोच्च गुण माना गया है जो इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण लाता है। हमारे शास्त्र कहते हैं -
         दाऍं हाथ से दान दो पर बाऍं हाथ को
          पता नहीं चलना चाहिए। 
अर्थात् ऐसा भी कह सकते हैं कि दान और पुण्य जैसे कार्य एकान्त में होने चाहिए। दान ढिंढोरा पीटकर नहीं करना चाहिए अपितु गुप्त रूप से करने चाहिए। तभी वह दान फलीभूत होता है।
         पद्म पुराण का इस विषय में यह कथन है - 
       सच्चे मन से किया गया दान 
       मनुष्य को सुख और शान्ति प्रदान करता है। 
          सामाजिक प्रणी मनुष्य समाज से बहुत कुछ लेता है। इसलिए उसका कर्त्तव्य बनता है कि उस समाज की भलाई के लिए अपनी नेक कमाई का कुछ अंश दान में देना चाहिए। कबीरदास जी  दान देने के लिए कहते हैं-
        चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
        दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर॥
अर्थात् कबीरदास का कहना है कि नदी की विशाल जलराशि से चिड़िया अपनी चोंच में जरा-सा जल ले लेती है तो नदी का पानी कम नहीं होता। उसी प्रकार दान देने से धन में कोई कमी नहीं आती बल्कि उसमें बढ़ोत्तरी होती है।
            दान के विभिन्न रूप हैं। जरूरतमन्दों की सहायता करने से दुखों का निवारण और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। किसी को भयमुक्त या सुरक्षित महसूस कराना अभयदान कहलाता है। अस्पताल में मरीज के लिए खून या दवाओं का प्रबन्ध करना यानी दवाई या चिकित्सा सहायता प्रदान करना औषधि दान कहा जाता है। भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे बड़ा दान माना जाता है। भोजन या अनाज का दान करने को अन्नदान कहते हैं। शिक्षा का दान सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना या उसे शिक्षित करके उसके जीवन को सुधारना होता है। सर्दियों में बेघर लोगों को कम्बल या कपड़े बॉंटने को वस्त्रदान कहते हैं।
             दान का अप्रत्यक्ष यह लाभ होता है कि मनुष्य का यश चारों दिशाओं में फैलता है। दानवीर कर्ण, राजा हरिश्चन्द्र आदि को आज तक उनके दान के कार्यों के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त पुण्य कार्यों में यह दानकार्य भी जुड़ जाता है जिससे हमारे इहलोक के साथ-साथ परलोक भी सुधरता है। मनुष्य को ऐसी मानसिक शान्ति भी मिलती है जो अमूल्य है। इसी शान्ति की खोज में वह तीर्थों, जंगलों तथा तथाकथित गुरुओं के पास जाकर भटकता है।
            इस विषय में एक उदाहरण दिया जाता है कि स्नान बन्द बाथरूम में किया जाता है, सड़क या चौराहे पर नहीं। दान और पुण्य छिपाने से बढ़ते है और बताने से नष्ट हो जाते है अर्थात् उसका महत्त्व नहीं रह जाता। 
            यह इन्सानी कमजोरी है कि वह राई जितना छोटा-सा उपकार का काम करके उसे पहाड़ जितना बड़ा करके बताता है। यद्यपि शुभकार्य करके उसका ढिंढोरा पीटा जाए तो लोग ऐसे व्यक्ति को घमण्डी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति से सहायता लेने में भी उन्हें संकोच होने लगता है। दान देकर हर स्थान पर अपने नाम के पत्थर लगवाने का अर्थ यही है कि वर्षों तक लोग याद रखें कि फलाँ व्यक्ति ने दान दिया था। बताइए दान आत्मतोष के लिए दिया जाता है। फिर इस प्रकार से उसका आत्मप्रचार किसलिए करना?
            ईश्वर में हम चौबीसों घण्टे अपने लिए कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं और वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार भरपूर देता है। हमें देकर न जतलाता है और न पछताता है। उसका गुणगान अथवा धन्यवाद करने में हम सदा कंजूसी बरतते हैं, पर आशा यही करते हैं कि हमने जिसकी सहायता की है वह हमारे समक्ष हमेशा नतमस्तक रहे।         
          विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञान का दीपक जलाने से आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञानवान होकर, मार्गदर्शक बनकर अपने देश, धर्म व समाज का हित करने में सक्षम बनती हैं। 
          दूसरो की होड़ में दान देने के नाम पर सब कुछ नहीं लुटा देना चाहिए। अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करने और उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करने तथा अतिथियों के आदर-सत्कार से जो धन शेष बचे उसका कुछ अंश दान करके सामाजिक यज्ञ में सबको आहुति देनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

मृत्यु का विधान

मृत्यु का विधान 

मृत्यु एक अटल सत्य है। यह विधि का एक कठोर विधान है। इसमें किसी भी जीव को छूट नहीं मिल सकती। इस चराचर जगत में जिस भी जीव का जन्म होता है, चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो अथवा पेड़-पौधे हों, उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। हर जीव अपने कृत कर्मों के अनुसार निश्चित समय के लिए इस संसार में आता है। मनुष्य स्वयं चाहे अथवा न चाहे परन्तु समयावधि पूर्ण होने के पश्चात उसे इस दुनिया से विदा लेनी ही पड़ती है। इसमें उसकी राय नहीं पूछी जाती और न ही उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती।
             उसके इहलोक के प्रस्थान के समय उसके निकटस्थ सम्बन्धी, परिवारी जन, बन्धु-बान्धव रोते-बिलखते रह जाते हैं और वह दूसरे लोक की यात्रा के लिए निपट अकेले ही प्रस्थान कर जाता है। अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति को साथ लेकर जाने की अनुमति उसे ईश्वर की ओर से नहीं मिलती। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही यहॉं से विदा लेकर चला जाता है। वह अपनी सारी धन-दौलत और अपने महल-चौबारे इसी धरती पर छोड़कर खाली हाथ मुट्ठी बॉंधे चला जाता है।
          प्राण जब इस शरीर का त्याग कर देते हैं तब जीव की आँखें सदा के लिए मुँद जाती हैं। उस समय सभी भौतिक रिश्ते-नाते इसी संसार में छूट जाते हैं। कोई भी सम्बन्धी उसका अपना नहीं रह जाता और न ही वह भी किसी का नहीं रहता है। जिन परिवारी जनों के लिए वह अपना सारा जीवन स्याह-सफेद कार्य करता रहता है, वे सभी भाई-बन्धु केवल जीते जी की माया होते हैं और सिर्फ श्मशान तक ही वे उसका साथ निभाते हैं। उसके पश्चात की यात्रा जीव को स्वयं अकेले ही तय करनी होती है। वहॉं उसका कोई साथी नहीं होता।
           मनुष्य का जब जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता। जब वह इस संसार को छोड़कर जाता है तब उसके पास नाम तो होता है पर शरीर दंगा दे जाता है। अब हमें यहाँ यह भी विचार करना है कि क्या सिर्फ साँसे बन्द होने से ही कोई मुर्दा हो जाता है? जिसे अपने प्रियजन भी कुछ समय के लिए अपने घर रखने के लिए तैयार नहीं होते। बस शीघ्र ही उसे घर से निकाल देने के लिए उत्सुक रहते हैं। यही रह जाती है बस मनुष्य के जीवन की कहानी। 
            यह चिरन्तन सत्य है कि श्वासों की डोर थमने या टूट जाने से जीव मृत हो जाता है। उसे हम आम बोलचाल में शव या मुर्दा कहते हैं। फिर उस शव को उसी के ही परिवारी जन और बन्धु-बान्धव जुलूस बनाकर, श्मशान में ले जाकर अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं। उसके जल जाने की थोड़ी-सी प्रतीक्षा किए बिना ही अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। यदि अधिक समय तक उसे रखा जाए तो उस मृत शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है जो बिमारी का कारण बन जाती है।
            यह भी सत्य है कि जब मनुष्य से उसकी इन्सानियत निकल जाती है या फिर उसकी आँखों का पानी मर जाता है, उस समय भी वह मृतप्राय होता है। मनुष्य के लिए यही आवश्यक है कि सबसे पहले वह एक अच्छा इन्सान बने। एक मनुष्य में सबसे पहले मानवोचित गुणों का होना जरूरी है। उन गुणों के बिना इस मनुष्य को राक्षस या हैवान कहते हैं। ये दुष्ट प्रकृति के लोग मनुष्यता के नाम पर कलंक होते हैं, जो इन्सानियत की कब्र खोदते हैं। इन्हें न तो घर-परिवार में स्थान मिलता है और न ही देश-समाज में। नैतिक, धार्मिक और सामाजिक नियमों के विरुद्ध चलने वाले ये लोग देश, धर्म और समाज के शत्रु कहलाते हैं। 
              इसलिए ये लोग न्याय व्यवस्था के साथ आँखमिचौली खेलते हुए, अन्तत: कानून की बेड़ियों में जकड़कर सलाखों के पीछे जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाते है। किसी भी व्यक्ति के जीवित रहते हुए उसे मिलने वाली यह एक ऐसी मृत्यु होती है जो स्वयं उसके लिए और उसके अपनों के लिए बहुत कष्टकारी होती है। वह व्यक्ति तो दुष्कर्म कर लेता है परन्तु उसके बन्धु-बान्धवों को भी दारुण कष्ट भोगना पड़ता है और समाज में अपमानित होना पड़ता है।
            वैसे तो जरा-सा कष्ट आने पर हम सब लोग मृत्यु को पुकारने लगते हैं पर वह क्षणिक रोष होता है। कभी-कभी लम्बी या असाध्य बीमारी की अवस्था में भी मनुष्य जीवन से हारकर मृत्यु का दामन थामना चाहता है परन्तु यह उसके वश में नहीं होता। ईश्वरीय इच्छा के समक्ष मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है। जब वह पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोग लेता है तभी उसे अपने जीवन से छुटकारा मिलता है, उसकी कामना करने के कारण पहले नहीं।
            ईश्वर के प्राकृतिक न्याय के अनुसार मृत्यु होना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है परन्तु अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने वाली यह मृत्यु मनुष्य की स्वयं की बुलाई हुई होती है। मनुष्य को अपनी मृत्यु को इस प्रकार अनावश्यक रूप से कष्टदायक नहीं बनाना चाहिए। उसे सही रास्ते का चुनाव करके उस मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सुखद बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद