शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

संसार चक्की के दो पाटों की भॉंति

संसार चक्की के दो पाटों की भाँति

यह असार संसार चक्की के दो पाटों की भाँति निरन्तर चलायमान है। चक्की में जब हम अनाज डालते हैं तो वह उसे पीस देती है। इस संसार रूपी चक्की में जीव पिसता है। इस चक्की का एक पाट जन्म है और दूसरा पाट मृत्यु है। इस जन्म और मृत्यु के दोनों पाटों में जीव आजन्म पिसता रहता है। क्षणभंगुर कहे जाने वाले इस संसार में जन्म और मृत्यु के दो पाटों में पिसते हुए मनुष्य का अन्त निश्चित है। अतः इस असार संसार से मनुष्य की विरक्ति होना स्वाभाविक ही है।
        सन्त कबीरदास जी ने इसी सार को अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोया है-
        चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय।
        दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
अर्थात् कबीर दास जी कहते हैं कि अनाज पीसने वाली चलती हुई चक्की को देखकर उन्हें रोना आ गया। जिस प्रकार चक्की के दो पाट जो पत्थर से बने हुए हैं, उनके बीच में आने पर अनाज का कोई भी दाना साबुत नहीं बचता। उसी प्रकार इस संसार रूपी चक्र में जन्म और मृत्यु के बीच पिसकर कोई भी जीव अछूता नहीं रहता। हर जीव को काल के गाल में समाना ही होता है। यह दोहा हमें स्मरण कराता है कि यह जीव का यह जीवन और संसार दोनों ही नाशवान हैं। 
          ये दो पाट द्वन्द्व हैं यानी सुख-दुःख, लाभ- हानि, जय-पराजय, यश-अपयश, अपना-पराया, दिन-रात आदि। इनसे जो जीत गया, समझो वही बच सकता है। वही परम ज्ञान को प्राप्त करके मुक्त हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' में इसे साक्षी भाव कहा है। 
        कबीरदास जी को उदास देखकर उनके पुत्र कमाल ने यह दोहा लिखा- 
     चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
     कीले  से जो  लग  रहा, सोई  रहा  बचाय।। 
अर्थात् जब कबीरदास जी संसार की नश्वरता को देखकर रोते हैं कि जन्म और मृत्यु रूपी दो पाटों के बीच में फंसकर कोई भी जीव साबुत नहीं बचता यानी सब नष्ट हो जाते हैं। उनके इस प्रकार शोक करने पर उनके पुत्र कमाल हँसते हैं और समझाते हैं कि जो दाने चक्की की कीलों या बीच के हिस्से से चिपके रहते हैं, वे पिसने से बच जाते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य स्वयं को भगवान की भक्ति और उनकी शरण रूपी कील से जोड़कर रखता है, उसका भक्षण काल या मृत्यु और संसार के दुःख नहीं कर पाते। 
        पहला दोहा मनुष्य की अनित्यता के कारण वैराग्य उपजाता है लेकिन दूसरा दोहा मन में आशा और आस्था का दीपक दिखाता है। आवागमन रूपी दो पाटों में फँसा जीव अपने दायित्वों को निभाते हुए सदा ऐसे ही पिसता रहता है। 
        इस विवेचना से कुछ प्रश्न मन में उठते हैं कि बचकर क्या जीवन और मृत्यु से मुक्त हो सकते है? क्या काल को वश में किया जा सकता है? पानी के बुलबुले जैसे इस नश्वर जीवन को क्या स्थायित्व मिल सकता है? पल-पल नष्ट होते हुए इस शरीर को सदा यथावत रखा जा सकता है?
           इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है - नहीं। जो मनुष्य प्रभु भक्ति के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, केवल वही इस संसार में बच सकता है। हर तरफ से स्वयं को समेटकर सिर्फ उस मालिक के साथ एकाकार हो जाना ही इस ज्ञान का मूल मन्त्र है।
          जन्म और मृत्यु के इस भय से बचने का ही साधन है मुक्ति। मनीषी इसे निर्वाण, परम पद और अभय पद आदि नामों से अभिहित करते हैं। इस अवस्था को शरीर की सीमा में रहते हुए पाया जा सकता है। अपने अन्तस् के शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से स्वयं को मुक्त कराना ही मोक्ष पाना है। 
      मनुष्य को वीतरागी बनना चाहिए। सभी विपरीत गुणों के अतिक्रमण से जब वह बच जाता है तो उसके पश्चात ही व्यक्ति गुणातीत बनता है। जीवन के तमाम परस्पर विरोधी भाव चक्की के दो पाटों की तरह होते हैं। निस्सन्देह पाप कर्म और पुण्य कर्म दोनों ही प्रकार के कर्म मनुष्य के बन्धन की वजह बनते हैं। 
        राग-द्वेष आदि भाव संसार, समाज, परिवार और  राष्ट्र में हमेशा ही रहेंगे। मनुष्य स्वयं को इनसे विलग करके मुक्त हो सकता है। जीवन के सभी विरोधी प्रतीत होने वाले भावों में जो सम रहता है उसे उपनिषदों, ऋषियों-मुनियों और भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोगी कहा है। वही जन्म और मृत्यु के बन्धनों को काट सकता है। तब वह काल का ग्रास नहीं बनता। 
          जीवन का द्वैत भाव उसे चक्की के दो पाटों की तरह ही खा जाता है। जो सच्ची श्रद्धा और अपने निश्चित मन से कीले में चिपके अनाज की तरह उस परमपिता परमात्मा के सदैव समीप रहता है, वही इस भव सागर को पार कर लेता है। जो अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहण करते हुए चौबिसों घण्टे अपने हृदय में प्रभु का स्मरण करता रहता है, वह बालक भक्त प्रह्लाद की तरह हर प्रकार के भौतिक कष्टों से मुक्त हो जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

आवागमन के चक्र से मुक्ति

आवागमन के चक्र से मुक्ति

अपने दुखों, कष्टों और परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए ही मनुष्य को भगवान याद आते हैं। अपनी पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए हर इन्सान ईश्वर को याद करने लगता है। यदि सुख में प्रभु को याद किया जाए तो मनुष्य के पास दुख नहीं आता। यानी ईश्वर के स्मरण से उसका आत्मिक बल बढ़ जाता है। इसलिए उसमें दुखों से लड़ने, उनसे मुक्ति पाने की सामर्थ्य आ जाती है। इस तरह मानव का जीवन आनन्ददायक और सुखद बना जाता है।
        प्रत्येक जीव में परमात्मा का वास है, इस देखना और समझना चाहिए। शरीर नश्वर है, इसलिए अपने इस क्षणभंगुर जीवन में कभी भी इस देह पर अभिमान नहीं करना चाहिए। जिसके मन में अभिमान का भाव आ जाता है, उसमें भगवान का वास नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में प्रभु उससे दूर होने लगता है। क्योंकि घमण्ड में आकर मनुष्य स्वयं को ही सर्वसमर्थ समझने लगता है। तब वह सोचता है कि उसे ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है।
          हर समय विषय और विकारों में डूबे रहने पर भी मनुष्य की इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होतीं। अपनी इन्द्रियों को शमन करने के चक्कर में फंसा हुआ मनुष्य अपने शरीर को रोगी बना लेता है। रोगग्रस्त हो जाने पर उसका मन हर समय अशान्त रहने लगता है। उस समय मानव को प्रभु का नाम सिमरन करने की सुध आती है। 
        सुखों की हिलोर में प्रायः लोग प्रभु को स्मरण करना ही नहीं चाहते। जहाँ वह दुखों से घिर गया वहीं मालिक की याद सताने लगती है। तब वह प्रभु के नाम का सिमरन करने लगता है। उसकी कृतघ्नता तो देखो, उस समय वह उस दाता को कष्ट से मुक्त करने के लिए रिश्वत तक देने की बात कहने लगता है। 
          कबीरदास जी ने इसीलिए मनुष्य को समझाते हुए कहा है-
    दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय।
    जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।। 
        इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी मानव को चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि दुख के समय सब लोग प्रभु का स्मरण करते हैं परन्तु सुख में उसे कोई भी याद नहीं करता। यदि सुख में उसका स्मरण कर लिया जाए तो मनुष्य के पास कभी दुख आएगा ही नहीं।
          इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि प्रभु का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के सारे दुख कट जाऍंगे। अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों से कोई जीव बच नहीं सकता, यही ईश्वरीय न्याय है। यही प्रभु का कठोर विधान है।
          हमारे मनीषियों ने इस विषय में हमारा मार्गदर्शन किया है। वे कहते हैं कि हर समय यानी चौबीसों घण्टे मनुष्य को ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। कैसी भी अवस्था क्यों न  हो, सदा उसी की शरण में रहना चाहिए।
        इसका कदापि यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि दुनिया को बिसराकर बस धूनी रमाकर बैठ जाएँ। इसका सरल-सा अर्थ यही है कि अपने सभी दैनन्दिन कार्यों और दायित्वों का भली-भाँति निर्वहण करते हुए मनुष्य को सदा उस मालिक को याद करते रहना चाहिए।
        सभी द्वन्द्वों को सहन करते हुए, अपने सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मो का फल उस मालिक को अर्पित करते रहना चाहिए। व्यवहार मे ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं बन सकता। भगवान श्रीकृष्ण ने भी 'श्रीमद्भगवद्गीता' में यही उपदेश मनुष्य को दिया है कि-
       कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
       मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोSस्तवकर्मणि।।
अर्थात् केवल कर्म करना ही मनुष्य का अधिकार है, फल की कामना नहीं करनी चाहिए। कर्मफल का हेतु बनने पर मनुष्य में अकर्मन्यता का भाव आने लगता है।
        'ईशावास्योपनिषद्' के प्रथम दो मन्त्र भी यही समझाते हैं। 'ईशोपनिषद्' का निम्न पहला मन्त्र हमें कहता है -
      ईशावास्यमिदं सर्वंयत्किंच जगत्यां जगत्।
     तेन त्यक्तेन भुंजीथा मां गृध: कस्यस्विद्धनम्।।
अर्थात् इस संसार में जो कुछ भी स्थावर-जंगम या चर-अचर जगत है, वह सब ईश्वर से आच्छादित या व्याप्त है। इसलिए उस त्यागपूर्वक भावना से ही उसका उपभोग करो। किसी के भी धन या सम्पत्ति का लालच मत करो। 
        'ईशावास्योपनिषद्' का दूसरा मन्त्र हमें समझाता हुआ कहता है -
      कुर्वन्नैवेह  कर्माणि जिजीविषेत्  शतं समा:।
       एवं त्वयि नान्यथेतोsस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
अर्थात् मनुष्य को इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। हे मनुष्य! तुम्हारे लिए इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्म शुभ-अशुभ फल या बन्धन न प्रतीत हो।
यानी कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की कामना करनी चाहिए। कर्म किए बिना कोई चारा नहीं। ऐसा करने हुए भी मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता।
        दुख हो या सुख जो मनुष्य हर समय परमात्मा का स्मरण करता है उसके जीवन में सुख आए अथवा दुख वह हर स्थिति में समान रहता है। दोनों को प्रसाद समझकर ग्रहण करता है। जिसका मन उस निरंकार प्रभु से जुड़ा रहता है उसे ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, आवागमन के इस चक्र से मुक्ति मिल सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

पार्टनर की जासूसी करने की गलती

पार्टनर की जासूसी करने की गलती

बहुत से पति-पत्नी आपसी सम्बन्धों से इतने निराश हो जाते हैं कि एक-दूसरे की जासूसी जैसा घृणित कार्य करने, करवाने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि अपने जीवन साथी की जासूसी करवाकर वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। इसका खामियाजा निश्चित ही उन्हें भविष्य में भुगतना पड़ सकता है। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालकर वे दोनों अपना सुख-चैन खो बैठते हैं।
          सन्देह का कीड़ा धीरे-धीरे जीवन को खोखला कर देता है। उस समय जीवन बेमायने प्रतीत होने लगता है। कहते हैं शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था जो हर प्रकार का इलाज करने में सिद्धहस्त थे। 
        एक-दूसरे पर अविश्वास मानसिक शान्ति भंग कर देता है। हर समय इन्सान टेंशन में रहने लगता है। डरा-सहमा वह अनमना हो जाता है। तब उसे खाना-ओढ़ना, घूमना-फिरना, मौज-मस्ती करना कुछ भी नहीं भाता। हर समय मायूस रहता हुआ वह व्यक्ति नकारात्मक विचारों का शिकार होने लगता है। यह स्थिति मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक होती है।
        कभी-कभी अनावश्यक ही विचारों का पिष्टपेषण करते रहने से कुछ लोग मानसिक अवसाद या डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। कभी उससे भी बढ़कर मानसिक रोगी हो जाते हैं। उन्हें यही लगने लगता है कि सारी दुनिया बेवफा है। उन्हें किसी पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए। हर समय उन्हें यही लगता है कि कोई भी व्यक्ति सामने से आकर धोखा दे जाएगा।
          कहीं-कहीं तो यह सच्चाई हो सकती है पर हर केस में यह सम्भव नहीं होता। इस तरह की जासूसी करने के लिए जासूस लोग मनमानी रकम वसूलते हैं। जो पति-पत्नी सचमुच साथी से द्रोह कर रहे होते हैं, उनमें लानत-मलानत तो होती है। फिर उन सबूतों को आधार बनाकर तलाक ले लिया जाता है। इससे भी तो उनके दुखों का अन्त नहीं हो सकता।
        इसके विपरीत जहाँ व्यर्थ शक किया गया होता है, वहाँ दूसरे साथी को जब इस वास्तविकता का पता चलता है तो वहाँ तू तू मैं मैं होने लगती है। फिर गलत काम करने वाले साथी पर से दूसरे साथी का विश्वास उठ जाता है। यहाँ भी घर मे नित्य प्रति झगड़े होने लगते हैं और जिसका अन्त भी अलगाव ही होता है।
        यह भी सुना है कि कुछ व्यवसायी अपने पार्टनर की जासूसी करवाते हैं। शादी तय करते समय भी कई लोग लड़के या लड़की की जासूसी करवा लेते हैं। यदा कदा प्रेमी-प्रेमिका भी परस्पर अविश्वास के कारण दूसरे की जासूसी करवाते हैं। राजनैतिक स्तर पर तो यह बात बहुत सामान्य-सी होती है। राजनेताओं द्वारा अपने  विरोधियों की जासूसी करवाई जाती है। एक देश दूसरे पड़ौसी देश की जासूसी अपनी एजेन्सियों के द्वारा सुरक्षा कारणों से करवाते हैं।
        अब हम पति-पत्नी में इस अविश्वास के कारण की चर्चा करते हैं। जिस घर में पति और पत्नी अपने मोबाइल फोन को एक-दूसरे को छूने नहीं देते अथवा उसे हाथ लगाने पर झगड़ा करते हैं तो वहाँ विश्वासघात होने की पूरी सम्भावना बन जाती है। 
          उस समय परस्पर अविश्वास के कारण वे दोनों छुप-छुपकर साथी का फोन देखते हैं कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो रहा। उनका साथी दिनभर में किससे फोन पर बात करता है अथवा चैट करता है। कहीं वह गलत लोगों की संगति करके दोनों का जीवन तो बर्बाद नहीं कर रहा।
          यदि इन्सान कोई गलत काम नहीं करता या साथी उससे विश्वासघात नहीं कर रहा तो उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं होती। ये गजट तो ऐसे होने चाहिए कि पति-पत्नी तो क्या बच्चे भी उसका प्रयोग कर सकें। जो लोग ऐसा करते हैं निश्चित ही उनके घर में प्यार-मुहब्बत और सामंजस्य बना रहता हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं होता।
        पति-पत्नी का सम्बन्ध खून का नहीं होता। यह भावनात्मक होता है। इस एक रिश्ते के लिए इन्सान दुनिया के सारे रिश्ते-नातों को होम करने के लिए तत्पर रहता है।  समझ नहीं आता कि आखिर ऐसा क्या हो जाता है कि उनके चरित्र में इस हद तक गिरावट आ जाती है?
        दोनों को आपसी सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। अनावश्यक ही एक-दूसरे पर सन्देह करके बाहरी लोगों अथवा किराए के जासूसों को अपने जीवन में झाँकने देने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए। यदि साथी की कोई बात नापसन्द हो तो मिल-बैठकर बातचीत करके समस्या का निदान करना चाहिए। यदि दूसरा साथी किसी भी शर्त पर अपनी गलती सुधारने को तैयार न हो तो उस स्थिति में अपना-अपना रास्ता अलग किया जा सकता है। अन्यथा यथासम्भव अपने साथी के प्रति ईमानदारी और निष्ठापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। इस प्रकार करने से अपना, घर, परिवार और बच्चों सबका मान बना रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

भारी भरकम बोझ तले दब रहा बचपन

भारी भरकम बोझ तले दब रहा बचपन 

बच्चे बेचारे आजकल बस्ते यानी बैग के भार से दबे जा रहे हैं जो बहुत अधिक है। आजकाल यह फैशन बनता जा रहा है कि जितना बड़ा और भारी स्कूल का बैग होगा, उस विद्यालय में उतनी ही अच्छी पढाई होगी। हालॉंकि भारी बैग शिक्षा की गुणवत्ता का कोई प्रमाण नहीं हो सकता।
          विचारणीय है कि क्या वास्तव में शिक्षा का स्तर इतना बढ़ गया है कि भारी भरकम बोझ के बिना पढाई सम्भव नहीं हो सकती? क्या शिक्षाविद बच्चों को इस बोझ से कभी मुक्ति दिलाने में समर्थ हो सकेंगे।
           प्राचीन काल में भारतीय शिक्षण पद्धति ऐसी होती थी जहाँ बच्चों पर पुस्तकों का बोझ कम होता था। उस समय जीवन को क्रियात्मक बनाने पर बल दिया जाता था। बड़े दुख की बात है कि आज की शिक्षा व्यावसायिक हो गई है। शिक्षण संस्थान मोटी फीस को ही महत्त्व देते हैं।
        बैग के इस बोझ के कारण बच्चों की रीढ़ की हड्डी पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है और वे कमर दर्द, कन्धो के दर्द और थकान आदि से परेशान हो सकते हैं। यद्यपि उतना अधिक वजन उठाना बच्चों के लिए कठिन होता है।
         स्कूल बैग का वजन बच्चे के स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर बुरा असर डाल रहा है। सन 2014 में की गई एक स्टडी के अनुसार भारत में बच्चों के स्कूल बैग का औसत वजन 8 किलो होता है। यह वास्तव में बहुत अधिक है।
        एक साल में लगभग 200 दिन तक बच्चे स्कूल जाते हैं। स्कूल जाने और वहाँ से वापस आने के समय जो भार बच्चा अपने कन्धों पर उठाता है यदि उसे आधार मानकर गणना की जाए तो वह साल भर में 3200 किलो का वजन उठा लेता है। ये भार एक Pickup ट्रक के बराबर है। अच्छे अंक लाने के दबाव और भारी भरकम बोझ के नीचे बचपन दब रहा है। हैरानी की बात है कि कोई इसके विरोध मे आवाज नहीं उठाता। 
        स्कूल अभिभावकों को जिम्मेदार बताते हैं कि वे बच्चों के टाइम टेबल चेक नहीं करते। दूसरी ओर अभिभावकों का कहना है कि स्कूली बच्चों के पास अनेक विषयों की अलग-अलग किताबें और कापियाँ होती हैं। उन्हें हर दिन स्कूल ले जानी पड़ती हैं जिससे वे परेशान हो जाते हैं। बच्चों को सिखाएँ कि स्कूल बस या वैन में बैग को नीचे रखें। अनावश्यक वस्तुओं को स्कूल बैग में न रखें। कुछ बच्चे इतने आलसी होते हैं जो हर रोज बैग न लगाना पड़े अत: सारा सामान उसी में रखते हैं।
          कुछ समय पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने एक अनोखी पहल की। तीसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को बिना बस्ते के स्कूल बुलाया गया। स्कूल ने इस दिन को 'वाचन प्रेरणा दिवस' का नाम दिया। इसी तर्ज पर केरल ने भी यह पहल की। हालॉंकि बच्चों के बस्ते का बढ़ता बोझ अब दिल्ली में भी कम होने लगा है। सरकारी स्कूलों के साथ-साथ कई प्राइवेट स्कूलों ने भी यह कदम उठाना शुरू किया है। गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अन्य प्रदेशों के मुकाबले स्कूली बस्तों का बोझ कम ही है। 
          तीसरी कक्षा में बच्चों के लिए भारी बैग मुसीबत बन जाता है। कई ऐसे भी पीरियड होते हैं, जो किसी भी कारण से स्कूलों में खाली चले जाते हैं। कई बार कुछ पढ़ाई भी नहीं होती पर बैग में किताबें, कापियाँ तो सारी ले जानी पड़ती हैं।
            सीबीएसई के अनुसार दूसरी कक्षा तक के बच्चों के बस्ते स्कूल में ही रहने चाहिए। बाकी बच्चों के लिए शिक्षकों और प्रिंसिपल को मिलकर ऐसा टाइम टेबल बनाना चाहिए जिसमें बच्चों को ज्यादा किताबें न लानी पड़ें। चिकित्सकों की राय मानें तो भारी बस्ता शारीरिक और मानसिक विकास पर असर डालता है।
          1980 में आर. के. नारायण ने राज्यसभा में बच्चों के बस्ते के बोझ को कम करने की आवाज उठाई थी। बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि आज 46 वर्षों बाद भी बच्चे उसी बोझ के तले दबे जा रहे हैं। 
        स्कूली बस्ते का बोझ कम करने के लिए कुछ समय पूर्व दिल्ली सरकार ने पहल की थी। सरकार का मानना है कि स्कूलों में पढ़ाई का समय कम करके खेल-कूद और दूसरी गतिविधियों का समय बढ़ाया जाना चाहिए। 
          इस पहल का लाभ तभी हो सकता है जब बच्चों को रोबोट की तरह न पढ़ाया जाए। बस्ते रखने का प्रबन्ध स्कूल को सुनिश्चित करना चाहिए। कुछ स्कूलों ने ऐसे उपाय किए हैं। बच्चे उतनी ही किताबें घर ले जाएँ जितनी उन्हें जरूरत है। शेष पुस्तकें वे अपने विद्यालय से मिले लॉकर‌ में सुरक्षित रख सकते हैं।
          भारी बस्ते के बोझ से छुटकारे के लिए सटीक उपाय ढूँढने होंगे। दृढ़ इच्छाशक्ति से निश्चित ही नए विकल्प खुल सकते हैं। बच्चों के सुखमय भविष्य और बेहतर शिक्षा उनमें स्वस्थ जीवन ला सकते हैं।
           कुछ समय पूर्व महाराष्ट्र के चन्द्रपुर में दो स्कूली बच्चों ने भारी बस्ते के खिलाफ आवाज उठाई। इन्होंने एक Press Confrence करके पत्रकारों को बच्चे की शारीरिक क्षमता से अधिक भार उठाने पर मजबूरी को बताया।
           हम चाहते हैं कि भारत सरकार का शिक्षा विभाग बच्चों की इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर ध्यान दे। प्रयास यही होना चाहिए कि बच्चों से इस भारी बस्ते के बोझ को कम किया जाए। 
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

नामी स्कूलों के पीछे भागने की भेड़चाल

नामी स्कूलों के पीछे भागने की भेड़चाल 

माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे किसी नामी स्कूल में पढ़कर अपना जीवन संवार लें और बड़ा आदमी बन सकें। अपनी तरफ से वे हर सम्भव प्रयास भी करते हैं। स्कूल में दी जाने वाली मोटी फीस आदि का भी प्रबन्ध करते हैं। इस तथ्य को हम झुठला नहीं सकते कि पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चे होशियार नहीं हो जाते और न ही वे योग्य बन पाते हैं। 
          माता-पिता पैसे के बल पर लाखों रुपयों की कैपिटेशन फीस देकर अपने बच्चों का दाखिला बड़े नामी-गिरामी स्कूलों में करवा देते हैं। यह मेरे अकेले का कथन नहीं है। समाचारपत्रों, टी वी और सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे समाचार आते रहते हैं। किसी-किसी स्कूल, कालेज या यूनिवर्सिटी में होने वाले ऐसे दाखिलों की अनियमिताओं का वे सब पर्दाफाश करते रहते हैं।
        प्रश्न यह उठता है कि क्या नामी स्कूल में पढ़ने वाले सारे बच्चे योग्य बनते हैं? क्या उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे संस्कारी भी बन पाते हैं?
        इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे भी अनुत्तीर्ण होते रहते हैं। एक कक्षा में एक या दो वर्ष भी बिताते हैं। यह उन बच्चों का हाल है जिन पर माता-पिता साल भर में लाखों रुपए खर्च कर देते हैं। स्कूल की पढ़ाई के साथ ही ट्यूशन पर भी बहुत सारा धन व्यय करते हैं। परन्तु फिर भी बच्चों को उत्तीर्ण नहीं करवा सकते। उनका दिमाग तो उतना ही चलेगा जितनी उसमें सामर्थ्य होगी। माता-पिता अपने बच्चे को अनावश्यक ही कोल्हू का बैल बना देते हैं।
          इन संस्थाओं में पढ़ने वाले बहुत से बच्चे राउडी होते हैं। उन्हें लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी हद तक जा सकते हैं। समय आने पर माता-पिता का रसूख और पैसा किस काम आएगा? माता-पिता की तरह वे भी दुनिया को मुट्ठी में करने या दुनिया को देख लेने वाली प्रवृत्ति रखते हैं। छुटपन से ही उनके ये विचार उन्हें सभ्य इन्सान नहीं बनने देते। 
      बहुत सारे ऐसे बच्चे संस्था के नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते। घर से स्कूल तो वे समय पर निकलते हैं पर वहाँ से बंक करके या भागकर इधर-उधर घूमने, सिनेमा देखने अथवा किसी होटल में चले जाते हैं। अपनी छोटी आयु से ही शराब और सिगरेट पीने लगते हैं। होस्टलों में तो यह आम बात कही जाती है। बच्चों के घर से भाग जाने तक की घटनाएँ भी यदा कदा हो जाती हैं।
          कालेजों में परस्पर साथियों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार का असर स्कूलों में भी पड़ने लगा है। वहाँ भी कुछ बच्चे दादागिरी करते हैं और उनका साथ देने वाले अन्य बच्चे भी गलत कार्य करने से बाज नहीं आते। वे दूसरे बच्चों को टार्चर करते रहते हैं और वे उनके डर के कारण स्कूल और घर में उनकी शिकायत नहीं कर पाते। इससे उनका मनोबल कमजोर होने लगता है।
        कुछ पैसे वालों के बच्चे अपने झूठे अहं के कारण अध्यापकों का सम्मान नहीं करते। वे समझते हैं कि हमारे सामने इनकी औकात क्या है? पर वे भूल जाते हैं कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे उन्हीं पर ही निर्भर हैं। वे जरा-सी बात हो जाने पर अपने अध्यापकों की हत्या की कर देते हैं। ऐसी घटनाओं की जानकारी देने के दायित्व से मीडिया चूकता नहीं है।
          आज पैसे के दम पर मनमानी करने वाले इन स्कूलों में भी बच्चे गुटबाजी करते हैं और परस्पर शत्रुता निभाते रहते हैं। मौका हाथ लगने पर उनमें भीषण लड़ाइयाँ भी होती हैं। उस समय चाकू, पिस्तौल आदि निकाल लेना मामूली बात होती है। देश-विदेश के स्कूली बच्चों के ऐसे कारनामे टीवी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर प्रमुखता से की जाती है। बच्चों के इस अनैतिक व्यवहार को हम उचित नहीं ठहरा सकते।
        स्कूल में कमजोर वर्ग के बच्चों के साथ प्रायः इनका व्यवहार असन्तुलित होता है। उन बच्चों को मारना-पीटना, गाली-गलौच करना, ताने कसना तो उनका रोज का शगल होता है। बात-बात पर उन बेचारों को अपमानित करना ये लोग अपना अधिकार समझते हैं। उनके माता-पिता के लिए भी ये गाली-गलौज करते हैं। अपने पैसों का उन पर रौब दिखाते हैं 
        ऐसे नालायक बच्चे न तो स्कूल में अध्यापकों का सम्मान करते हैं और न ही घर पर अपने माता-पिता का। घर में काम करने वाले सभी लोगों को हर बात पर अपमानित करना ये बच्चे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।
          यह आलेख लिखने का मेरा उद्देश्य आप सबको डराना नहीं है बल्कि मात्र इतना समझाना है कि नामी स्कूलों के पीछे भागने के स्थान पर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए वहाँ भेजिए जो आपकी जेब के अनुरूप हो। पढ़ाना तो बच्चों को स्वयं ही पड़ता है। केवल स्कूली पढ़ाई पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। अपने बच्चों को योग्य और संस्कारी बनाना चाहते हैं तो इसका दायित्व स्वयं ही उठाना आरम्भ कीजिए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

छोटे बच्चों पर बढ़ता प्रैशर

छोटे बच्चों पर बढ़ता प्रैशर 

छोटे-छोटे बच्चों पर भी आज बहुत प्रैशर बढ़ता जा रहा है। उनका बचपन तो मानो कहीं खो सा गया है। जिस आयु में उन्हें घर-परिवार के लाड़-प्यार की महती आवश्यकता होती है‌ और जो समय उनके मान-मुनव्वल करने का होता है, उस आयु में उन्हें स्कूल में धकेल दिया जाता है। आज हम देखते हैं कि दो या अढ़ाई साल तक के बच्चों को माता-पिता प्ले स्कूल में भेज देते हैं। उस समय तक वे बच्चे बोल भी नहीं सकते। उन्हें सूसू, पाटी करने का भी ज्ञान नहीं होता। 
        हम अपने आसपास देखते हैं कि कुकुरमुत्ते की तरह उगने वाले नर्सरी स्कूलों की मानो बाढ़-सी आ गई है। वहाँ पर जाकर सर्वेक्षण करने से यह पता चलता है कि दो साल या उससे भी कम आयु के बच्चे पढ़ने के लिए भेज दिए जाते हैं। माता-पिता अपने सिर से भला टालने का काम करते हैं। 
          अब स्वयं ही सोचिए कि जो बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पाता, जिसे स्कूल या पढ़ाई के मायने ही नहीं पता, उसे पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। कितना बड़ा अन्याय और अत्याचार हो रहा है उन मासूमों के साथ। 
        इसका कारण समझ नहीं आता। इतने छोटे बच्चे क्या सीखेंगे? कहीं माता-पिता अबोध बच्चों को वहाँ भेजकर अपना पिण्ड छुड़ाने का काम तो नहीं कर रहे? इन मासूमों से उनका बचपन छीनकर आखिर हासिल क्या हो पाएगा?
        यदि छोटे बच्चे से पूछो कि क्या वह स्कूल जाएगा? तो प्रायः बच्चे एकदम इन्कार देते हैं कि उन्हें स्कूल नहीं जाना। इसका कारण शायद माता या घर से दूर होना होता है। हो सकता है उसके मन में घर से बाहर जाने पर असुरक्षा की भावना आ जाती हो। उसे घर में अपनी मॉं के ऑंचल में अधिक सुरक्षा महसूस होती है।
        वे मासूम बेचारे अपने माता-पिता की उच्च महत्त्वाकाँक्षाओं के कारण ही अपना स्वाभाविक जीवन जी नहीं पा रहे हैं। इसका एक कारण शायद आज हर क्षेत्र में होने वाला कम्पीटिशन ही है। माता-पिता जो योग्यता अपने जीवनकाल में प्राप्त नहीं कर पाए, उसे बच्चों के माध्यम से पाना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वे अपने सपने बच्चों से पूरा होते देखना चाहते हैं। माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कैरियर बनाने में कहीं चूक न जाए। वह उच्च शिक्षा ग्रहण करके अच्छी नौकरी करे जहाँ उसे खूब सारा वेतन मिले। वह जीवन में हर ऊॅंचाई को छू सके। यह सोच बहुत ही अच्छी है कि उनके बच्चे समर्थ बनें।
          इसके लिए बच्चे का बचपन नहीं छीनना चाहिए। उसे पैदा होते ही गौर-गम्भीर बना दिया जाए कि वह हँसना-बोलना ही भूल जाए। उनका सारा समय स्कूल जाने और फिर घर आकर ट्यूशन पढ़ने जाने में निकल जाता है और जो थोड़ा बहुत समय बचता है वह टी वी देखने या विडियो गेम खेलने में निकल जाता है।
          आऊटडोर गेम खेलने का समय भी आज बच्चों को नहीं मिल पाता जो उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। इससे उनका तन और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। मुझे याद है कि बचपन में हम स्कूल से लौटकर शाम के समय घर के बाहर घण्टों खेला करते थे। आज के बच्चों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती।
          बच्चों पर पढ़ाई का बोझ तो दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। उनके बस्ते का भार भी बहुत अधिक होता है जो उनके लिए परेशानियों का कारण बन रहा है। आज यह माँग बड़े जोर शोर से उठ रही है कि बच्चों पर पढ़ाई और बस्ते का बोझ कम किया जाए।
          आजकल बेबी शो आदि कई तरह के कम्पीटिशन चल रहे हैं। टी वी आग में घी डालने का कार्य कर रहा है। वहाँ डाँस शो, गायन प्रतियोगिता, खाना बनाने की महारत को परखना, जी. के. क्विज आदि शो चल रहे हैं। इसलिए हर माता-पिता इसे भी अपना सपना बनाते जा रहे हैं। बच्चों पर यह दबाव भी रहता है कि इनका प्रशिक्षण लेकर इन प्रतियोगिताओं में भाग लें।
           इन सबसे बढ़कर पढ़ाई में अंक कम नहीं आने चाहिए। उच्च शिक्षा के लिए यदि 98 या 99 प्रतिशत अंक न आएँ तो बच्चों की जान पर बन आती है। माता-पिता को लगता है कि उनका बच्चा रेस में पिछड़ रहा है। आज इतने अंक लाने पर भी यह गायत्री नहीं है कि उसे मन पसन्द विषय या कॉलेज मिल जाएगा। जो बच्चे बेचारे इस प्रैशर को झेल नहीं पाते वे आत्महत्या जैसा घृणित कार्य कर बैठते हैं। फिर माता-पिता पश्चाताप करते रह जाते हैं कि व्यर्थ ही उन्होंने अपने बच्चे पर‌ इतना अधिक दबाव बनाया।
        इसीलिए आज बच्चों को बीपी, शूगर, मोटापा, डिप्रेशन जैसी बिमारियाँ घेरती जा रही हैं। समय रहते इस स्थिति में सुधार न किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। वे शायद मशीन की तरह सम्वेदना शून्य बनते जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियाँ माता-पिता और सभ्य समाज दोनो के लिए घातक हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

बच्चों से जासूसी न करवाऍं

बच्चों से जासूसी न करावाऍं

छोटे बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। उन बच्चों की सहजता, सरलता और भोलेपन का दुरूपयोग घर के बड़ों को किसी भी कारण से नहीं करना चाहिए। उनके बचपन को अपने स्वार्थ के लिए किसी सौदे में नहीं बदलना चाहिए। मेरे कथन पर टिप्पणी करते हुए आप लोग कह सकते हैं कि कोई भी अपने बच्चों का नाजायज उपयोग कैसे कर सकता है? 
          इस विषय में मेरा यही मानना है कि हम बड़े अपनी सुविधा के लिए अनजाने में ही बच्चों को गलत आदतें सिखाते हैं। घर में विद्यमान छोटे बच्चों से जासूसी जैसा घृणित कार्य बहुत से लोग करवाते हैं। वे लोग शायद यह समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते कि वे कितना अनर्थ कर रहे हैं। इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए।
          सास-बहू ने एक-दूसरे की बुराई करते हुए क्या कहा? पति-पत्नी में से किसी एक ने दूसरे साथी के विषय में क्या कहा? ननद-भाभी में से किसने और क्या चुगली की? भाई-बहन में से किसने किसे भला-बुरा कहा? इनके अतिरिक्त और भी कई विषय हो सकते हैं जिनके लिए वे लोग जानना चाहते हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है। परन्तु यह जानकारी जुटाने के लिए छोटे बच्चों को मोहरा बनना बिल्कुल अनुचित है।
          छोटे बच्चे को विश्वास में लेकर या उसे किसी खिलौने, चाकलेट, पैसे आदि की रिश्वत देकर अथवा अनावश्यक प्यार जताकर बच्चे से कुरेद-कुरेदकर अपने मतलब की बात जानने की कोशिश लोग करते हैं। इस तरह बच्चे के मन में ताक-झाँक करके या छिपकर दूसरों की बातें सुनने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
          इसी प्रकार लालच या दबाव या प्यार के ब्लैकमेल के कारण बच्चा चुगली करना सीख जाता है। इसके विपरीत उसी कारण से दूसरों की बातें छिपाने लगता है। फिर धीरे-धीरे अपने स्कूल की, अपने घर की या दोस्तों से झगड़े की अपनी गलतियाँ सबसे छिपाने में महारत हासिल कर लेता है। बहुत दुखी की बात है कि इस तरह बड़ों की महत्वाकांक्षा के कारण धीरे-धीरे बच्चा झूठ बोलने में एक्सपर्ट होने लगता है।
        बच्चों को चोरी करना, दूसरे का हक छीनना भी हमीं सिखाते हैं। घर में माँ या दादी या नानी या कोई और सदस्य सबसे छिपाकर उसे खाने की या अन्य कोई चीज यह कहकर दे देते हैं कि किसी को बताना नहीं। इसका यह अर्थ हुआ कि घर के एक बच्चे को विशेष बना दिया जाता है।
        कभी बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए जिद करता है या रोता है तो घर के लोग उसकी इच्छा पूरी कर देते हैं। इस तरह हठ करके या रो-धोकर वह अपनी बात मनवाने का आदि हो जाता है। यदि उसकी बात को उसके जिद करने से पहले मान लिया जाए तो कितना ही अच्छा हो जाए।
        बच्चा झूठ बोलना घर से ही सीखता है। माता-पिता यदि बच्चे को कहीं नहीं ले जाना चाहते और घर छोड़कर जाना चाहते हैं तो कह देते हैं डाक्टर के पास जा रहे हैं या आफिस जा रहे हैं। बच्चा उनकी यह बात सच मान लेता है और वह चुप हो जाता है और उस समय उनके साथ जाने की जिद नहीं करता।
        इसके अतिरिक्त जब कोई अवांछित मित्र या सम्बन्धी घर मिलने आता है या उसका फोन आता है तो घर के सदस्य कहला देते हैं कि वे घर पर नहीं हैं। यहीं से बच्चे के झूठ बोलने की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है, आजन्म जिसका प्रयोग वह अपने बचाव के लिए करता है।
      घर के सदस्यों का व्यवहार छोटा बच्चा बहुत बारीकी से परखता है और उसके मन में सभी सदस्यों की एक छवि अंकित हो जाती है। वह यह देखता है कि उसके माता-पिता का अपने  माता-पिता, भाई-बहनों, सम्बन्धियों, मित्रों और सहकर्मियों के साथ कैसा व्यवहार है? उसी के अनुरूप ही वह भी व्यवहार करने लगता है। 
        बहुधा बच्चों को हम मुँहफट कह देते हैं। पर उस समय वे सच बोल रहे होते हैं। बड़े अपनी पोल खुल जाने को सहन नहीं कर पाते और बच्चों को दोषी मानकर उन्हें प्रताड़ित करते हैं। वे उस समय इस सत्य को भूल जाते हैं कि सब उन्हीं के बोए बीजों का परिणाम हैं।
        बच्चे बेचारे को तो पता ही नहीं होता कि वह क्या कर रहा है? हम बड़ों की साजिश ही उसे इस दलदल में धकेलने की दोषी बनती है। बड़ा होकर जब वह ये सब हरकतें करता हैं तो उसे घर के बड़े लोग डाँटते हैं, मारते हैं या सजा देते हैं पर अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखते।
          घर छोटे बच्चे की पाठशाला होता है जहाँ पर वह जीवन का ककहरा पढ़ता है। वहीं पर वह अच्छाई और बुराई को देखता है, समझता है और सीखता है। और फिर उसकी बुद्धि के अनुसार जो उसे सरल और सुविधाजनक मार्ग लगता है उस पर बिना परिणाम की चिन्ता किए चलने लगता है। बच्चों के समक्ष अपने व्यवहार को सन्तुलित रखें ताकि उन मासूमों को दोषी ठहराने की आवश्यकता ही न पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद