गुरुवार, 5 नवंबर 2026

भारतीय संस्कृति में विवाह के प्रकार

भारतीय संस्कृति में विवाह के प्रकार 

भारतीय संस्कृति में विवाह पद्धति मूल में है। इसका कारण यह है कि विवाह के पश्चात नवयुवक और नवयुवती ब्रह्मचर्याश्रम से निकलकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं। यह गृहस्थाश्रम शेष तीनों आश्रमों- ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम का पालन करता है।
          हिन्दू धर्म शास्त्रों और धर्मसूत्रों के अतिरिक्त मुख्य रूप से 'मनुस्मृति:' के अध्याय 3, श्लोक 21 में विवाह के आठ प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त 'महाभारत' के आदि पर्व और अनुशासन पर्व में भीष्म और दुष्यन्त द्वारा इन आठों प्रकार के विवाहों का वर्णन मिलता है। ये आठ प्रकार हैं - ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच। 
1 ब्राह्म विवाह - भारतीय समाज में सबसे उत्तम विवाह माना जाता है। ब्राह्म विवाह में पितृपक्ष से सात पीढ़ी और मातृपक्ष की पाँच पीढ़ी में विवाह सम्बन्ध वर्जित हैं। पहले समय में वेदों के ज्ञाता और शीलवान वर को स्वयं बुलाकर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित करके माता-पिता यह विवाह सम्पन्न करवाते थे।
         आज भी शादी के समय कन्या का परिवार बेटी के लिए सुयोग्य वर की तलाश करता है और बेटे के लिए सुयोग्य कन्या की। दोनों परिवार के एक-दूसरे से मिलकर अपनी तसल्ली करते हैं और फिर दोनों की सहमति से विवाह तय कर दिया जाता है। आज के समय के अनुसार इसे हम 'अरेंज्ड मैरिज' कह सकते हैं। इस विवाह में दोनों बच्चों की भी सहमति ली जाती है।
2 दैव विवाह - धार्मिक अनुष्ठान के बदले में पिता का अपनी कन्या का कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता था।
3 आर्ष विवाह- ऋषि-मुनि जब गार्हस्थ जीवन जीना चाहते थे, तब कन्या के पिता को दान में गो मिथुन यानी गाय और बैल देते थे। कन्या पक्ष यदि गोदान स्वीकार कर लेता था तो ऋषि से कन्या की शादी हो जाती थी। कन्या पक्ष की इच्छा न होने पर ऋषि को सादर वह गो मिथुन वापिस कर देना होता था। 
4  प्रजापत्य विवाह -  प्रजापत्य विवाह में पितृपक्ष से पाँच पीढ़ी और मातृपक्ष से केवल तीन पीढ़ी तक विवाह वर्जित माने जाते है। इस विवाह में कन्या की सहमति आवश्यक नहीं मानी जाती है। कन्या पक्ष कोई भी अभिजात्य वर देखकर उससे अपनी पुत्री का विवाह तय कर देता थे।
         'तुम दोनों मिलकर धर्म का आचरण करो' ऐसा कहकर जोड़े को आशीर्वाद देते हुए कन्या का विवाह किया जाता था।
5 गन्धर्व विवाह - इस विवाह में युवक एवं युवती दोनों अपने-अपने परिवार की स्वीकृति के बिना विवाह कर लेते हैं। इसे भागकर विवाह करना भी कह सकते हैं। प्रेम विवाह का नाम भी दे सकते हैं। दूसरे शब्दों में वर और वधू का आपसी प्रेम और सहमति से बिना औपचारिक रीति-रिवाजों के विवाह करना गन्धर्व विवाह कहलाता है।
6 असुर विवाह - पैसे आदि का लेन-देन करके विवाह करना असुर विवाह की श्रेणी में आता है। इस विवाह में वर द्वारा कन्या के परिवार व पिता को अपनी इच्छा से धन या मूल्य देकर स्वेच्छा के विरुद्ध विवाह करना आता‌ है।
          यानी पहले कन्या को खरीदा जाता है फिर उससे विवाह किया जाता था। पिता अपनी पुत्री का मूल्य लगाता था और इच्छित युवक उतना धन देकर कन्या से विवाह कर लेता था। 
7 राक्षस विवाह - किसी युवती का बलात् अपहरण करके, जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने को राक्षस विवाह कहा जाता है। राजा या योद्धाओं द्वारा बलपूर्वक युद्ध करके या कन्या की इच्छा के विरुद्ध उसका अपहरण करके जबरदस्ती घर में लाकर  विवाह करना, राक्षस विवाह कहलाता है।
8 पिशाच विवाह - युवती की मानसिक दशा या धोखे से नशा पिलाकर छलपूर्वक या बलपूर्वक शारीरिक सम्बन्ध बना लिया जाए यानी बलात्कार आदि के बाद सजा आदि से बचने के लिए उस पीड़ित युवती से विवाह किया जाए। यानी अन्तिम विकल्प के रूप में विवाह कर लिया जाए। ऐसा आजकल भी होता है जो अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिलता है। इसे विवाह को सबसे निन्दनीय माना गया है।
      रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में स्वंयवर विवाह का वर्णन है। इसे विवाह के प्रकारों में नहीं लिया गया। शायद इसे ब्राह्म विवाह माना जा सकता है। इस प्रकार के विवाह में माता-पिता और कन्या सबकी सहमति होती थी।
          नारद पुराण ब्राह्म विवाह को सर्वश्रेष्ठ मानता है। दूसरे नम्बर पर दैव विवाह को रखते हैं। आर्य विवाह को भी उत्तम माना है। प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच विवाह को अशुभ माना है। परन्तु कुछ विद्वान प्राजापत्य विवाह को भी उचित मानते है। शुभ मुहूर्त में अग्नि को साक्षी मानकर, विधि-विधान से मन्त्रोच्चारण करके विवाह सम्पन्न कराया जाता है। इन विवाहों के समय सभी बन्धु-बान्धव उपास्थित रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 4 नवंबर 2026

भारतीय संस्कृति में पाणिग्रहण संस्कार

भारतीय संस्कृति में पाणिग्रहण संस्कार

भारतीय संस्कृति में पाणिग्रहण संस्कार अथवा विवाह का बहुत महत्त्व है। इसका अर्थ है - विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना। विवाह योग्य युवा स्त्री और पुरुष का यह विवाह उन दोनों के साथ-साथ उनके पारिवारों के जीवन में भी परिवर्तन लेकर आता है।
        अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानते हुए दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बन्धन में बन्ध जाते हैं। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्ध की अपेक्षा आत्मिक सम्बन्ध अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। इस बन्धन को अत्यन्त पवित्र माना गया है।
        परम्पराओं में सबसे मुख्य रस्म सात फेरों की होती है जो वैवाहिक जीवन की स्थिरता का मुख्य आधार होती है। यही सात फेरे उनके रिश्ते को सात जन्मों तक बाँधकर रखते हैं। वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर परिक्रमा करते हुए पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
        हिन्दू वैवाहिक संस्कार के अन्तर्गत वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व कन्या हर फेरे में वर से एक वचन लेती है। प्रत्येक वचन लेते हुए वह कहती है कि यदि आप इसे स्वीकार करते हो तो मैं आपके वाम अंग में आना स्वीकार करती हूँ-
1 प्रथम वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा के लिए जाओ तो मुझे भी अपने साथ लेकर जाना। कोई भी धार्मिक कार्य यदि आप करें तो मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान प्रदान करें।
           किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान की सफलता हेतु पति-पत्नि दोनों मिलकर उसे करते हैं। पत्नी के इस वचन से धार्मिक कार्यों में उसकी सहभागिता और महत्त्व को हमारे शास्त्रों ने बखूबी दर्शाया गया है।
2 दूसरे वचन में कन्या वर से कहती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करेंगे तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बनें।
          आज कुछ लोगों की गृहस्थी में किसी प्रकार के मनमुटाव होने पर पत्नी के परिवार से सम्बन्धों में दरार आने लगती है। दोनों को अपने-अपने ससुराल पक्ष से सदैव समान सदव्यवहार करना चाहिए। 
3 तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं- युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था में मेरा पालन करते रहना।
4 चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से मुक्त थे। अब विवाह के बन्धन में बन्धने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कन्धों पर होगा।
          इस वचन के माध्यम से कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति सजग कराती है। विवाह पश्चात पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। यदि पति पूरी तरह से अपने माता-पिता पर आश्रित रहे तो गृहस्थी नहीं चल सक। कन्या चाहती है कि पति पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने और अपने परिवारिक दायित्वों का निर्वहण सुचारू रूप से करे। इस वचन से यह स्पष्ट होता है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वह योग्य बनकर अपने पैरों पर खडा हो जाए।
5 पाँचवें वचन में कन्या कहती है कि अपने गृहकार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा कोई अन्य खर्च करते समय मेरी भी सलाह लेना। 
        आज भी बहुत से पुरुष अपने झूठे अहं के कारण पत्नी से किसी भी विषय में परामर्श नहीं करते। यदि वे ऐसा कर लें तो उन्हें सम्मान व आत्मसन्तुष्टि मिलेगी।
6 छटे वचन में कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों आदि के बीच बैठी हूँ तब किसी के सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। स्वयं को जुए अथवा अन्य किसी भी दुर्व्यसन से दूर रखेंगे।
        वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसे गम्भीरता से देखने की आवश्यकता हैं। विवाह के कुछ समय पश्चात पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा-सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं जो उसके मन को आहत करता है। एकान्त में पति उसे चाहे समझा ले पर सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा करनी चाहिए। दुर्व्यसनों में फँसकर अपनी गृहस्थी को बर्बाद नहीं करना चाहिए।
7 सातवें वचन में कन्या कहती है कि पराई स्त्रियों को माता के समान समझना। आपसी प्रेम में किसी अन्य की भागीदारी नहीं होनी चाहिए।
          विवाहेत्तर सम्बन्ध गृहस्थी की नींव हिला देते हैं। इसलिए पारिवारिक जीवन को सुरक्षित रखने के लिए इस वचन की बहुत आवश्यकता है।
        विश्व के अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी दोनों के बीच एक प्रकार का अनुबन्ध होता है जिसे वे किसी परिस्थिति विशेष में तोड़ सकते हैं। यानी तलाक लेकर अपने रास्ते अलग कर सकते हैं। परन्तु भारतीय भारतीय संस्कृति में पति और पत्नी के बीच यह सम्बन्ध सात जन्मों का माना जाता है, इसे किसी भी परिस्थिति में तोड़ा नहीं जा सकता। यानी तलाक नहीं लिया जाना चाहिए। सम्बन्धों की गरिमा बनाए रखने के लिए परस्पर सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। इसकी सुखमय गृहस्थ जीवन में बहुत आवश्यकता होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

मोबाइल से दिलों और घरों में बढ़ती दूरियॉं

मोबाइल से दिलों और घरों में बढ़ती दूरियाँ

इक्कीसवीं सदी के चमत्कार मोबाइल ने जीवन सरल बना दिया है। आज के इस डिजिटल युग में एक छोटे से यन्त्र मोबाइल फोन ने सबको अपनी गिरफ्त में ले लिया है। वैसे उसने सबको दुनिया से जोड़ने का नाम बखूबी किया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुनिया मनुष्य की मुट्ठी में समा गई है। दूसरी ओर घर के भीतर बैठे हुए अपनों के बीच में दिलों की दूरियॉं बढ़ती जा रही हैं।
           छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक सबके पास मौजूद इस मोबाइल ने दिलों और घरों में दूरियाँ बढ़ा दी हैं। सभी सदस्य इसी पर व्यस्त रहते हैं, एक ही घर में रहते हुए किसी से बात करने का समय उन्हें नहीं मिल पाता। यह चिन्ता का विषय है। सबसे इस मोबाइल की इतनी तल लग गई है कि न चाहते हुए भी इसके बिना रह पाना कठिन हो जाता है।
          वास्तव में मोबाइल ने हम सबको इस हद तक अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि इसके बिना सब सूना लगता है। ऐसा लगता है मानो आदिम युग में आ गए हैं। पार्टी में, विवाह में या अन्य किसी कारण से इकट्ठे होने पर सभी अपने मोबाइल पर ही व्यस्त रहते हैं। शायद उनकी इच्छा ही नहीं होती किसी से मिलने की। इसीलिए शायद एक-दूसरे से न मिल पाने के लिए आज सबके पास समय की कमी का बहाना रहता है। 
         घरों और दिलों में बढ़ती दूरियों के कारण यह भी है कि सब लोग हर समय रील्स, सोशल मीडिया और नोटिफिकेशन में व्यस्त रहते हैं। इसलिए उनके पास परिवार के लिए समय ही नहीं बचता। सारा समय फोन में डूबे रहने के कारण परिवार के सदस्यों के बीच अपनापन, सम्वेदनशीलता और आपसी जुड़ाव कम होता जा रहा है। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद लोग आमने-सामने बैठकर खुलकर बात करने के बजाय ऑनलाइन चैट को प्राथमिकता देते हैं। 
          आज दूरियाँ और व्यस्तताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि मनुष्य को खुद से ही संवाद करने का समय नहीं मिलता। आपस में मिल-बैठकर सुख-दुख बाँटने का समय भी किसी के पास नहीं है। बस सन्देश भेज दिया और दायित्व से मुक्त हो गए।
          मोबाइल ने संवाद और रिश्तों को ऐप्स में समेट दिया है। किसी का हालचाल पूछना, जन्मदिन की शुभकामना देना, पार्टी या शादी में निमन्त्रण देना हो तो वाट्सअप कर दो। देखते-ही-देखते हम में इतने सीमित हो गए हैं कि बाहरी दुनिया से सम्बन्ध, रिश्ते न के बराबर बचे हुए हैं। अब तो समय व्यतीत करने का माध्यम बस मोबाइल रह गया है।
          सबकी अपनीअपनी एक अलग दुनिया  है, जिसमें सभी अपने मोबाइल के साथ बस खुश रहते हैं। जब उदास या परेशान होते हैं तब फेसबुक या ट्विटर पर कुछ भी लिखकर पोस्ट कर देते हैं। कुछ ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ पाकर खुश या फिर उदास हो जाते हैं। 
      मजे की बात यह है कि अपनों की चिन्ता से अधिक आभासी दुनिया द्वारा चिन्ता किया ज्यादा अच्छा लगता है। बच्चे के पैदा होने की, बीमारी की अथवा किसी सम्बन्धी के मरने की खबर रिश्तेदारों को देने से पहले फेसबुक पर डाली जाती है।
        इस मोबाइल-संस्कृति ने सबको आत्मकेन्द्रित कर दिया है। सोते-जागते सदा ही घण्टी बजने या मैसेज आने का आभास होता रहता है। मोबाइल की दुनिया बहुत तेजी से बदलती जा रही है। मोबाइल के इस आकर्षण बच पाना सबके लिए असम्भव होता जा रहा है।
      यह बीमारी बच्चों में भी बढ़ती जा रही है। जब उन्हें फुर्सत मिलती है तब मोबाइल पर अपना मन बहलाते हैं। आजकल दो-तीन साल के बच्चों की मोबाइल पर तेजी से चलती अंगुलियों को देखकर दंग रह जाते हैं। वास्तव में इन बच्चों को मोबाइल की दुनिया में धकेलने में माता-पिता का बहुत योगदान है। फिर वे उनसे परेशान होते हैं कि इसका ध्यान मोबाइल के अलावा कहीं लगता नहीं।
        मोबाइल का उपयोग उत्पादों और सेवाओं के आदेश देने, प्रतियोगिताओं में भाग लेने, विज्ञापन देने और सेवाएँ प्रदान करने के लिए किया जाने लगा है। भुगतान देय तिथियों तथा अन्य सूचनाओं के लिए भी मोबाइल आज का प्रयोग सरलता से किया जा रहा है।
        मोबाइल 'आल इन वन' हो गया है। इसके आने से हाथ की घड़ी, अलार्म घड़ी, म्यूजिक सिस्टम, डी वी डी प्लेयर, ट्राँजिस्टर, टेप रिकार्डर, कैमरा आदि इन सबकी आवश्यकता ही नहीं रह गई है। इनके साथ ही तार भेजने के स्थान पर मैसेज भेज दिए जाते हैं। इससे आन लाइन शापिंग, मनी ट्राँस्फर, बिलों का भुगतान किया जा सकता है। रेलवे व हवाई जहाज की टिकट बुक करना, सिनेमा टिकट लेना, होटलों मे बुकिंग आदि सुविधा से होने लगी है।
          यह मोबाइल बुजुर्गों के लिए भी समय बिताने का एक साधन है। इससे अच्छे या बुरे हर तरह के संस्कार लिए जा सकते हैं। इस नई तकनीक का सदुपयोग अथवा दुरूपयोग करना हमारे अपने हाथ में है। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 2 नवंबर 2026

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग घर-परिवार परिवार और समाज की रीढ़ होते हैं। उनके होने से ही परिवार का अस्तित्व होता है। वे घर को एक सूत्र में बॉंधकर रखते हैं। यदि वे न होते तो परिवार भी नहीं होता। वे नमक की तरह बहुत उपयोगी होते हैं। नमक के बिना कितनी ही मेहनत करके बनाए सभी भोग स्वादिष्ट होने के स्थान पर स्वादहीन हो जाते हैं। उन्हें कोई भी खाना पसन्द नहीं करता।
          इसीलिए जिस प्रकार भोजन का नमक से स्वाद बढ़ता है वैसे ही बुजुर्गों के रहने से घर-परिवार के सदस्यों के संस्कार बढ़ते हैं। अन्यथा बच्चे संस्कारहीन होकर देश और समाज पर भार ही बन जाते हैं। किसी परिवार में बुजुर्गों का होना बहुत ही आवश्यक होता है।
         बुजुर्गों ने एक लम्बा जीवन जिया होता है। अतः उनका अनुभव अपने बच्चों से अपेक्षाकृत अधिक होता है। यह अनुभव कठिन समय में सही रास्ता दिखाता है। बच्चों को संस्कारित करने और नैतिक मूल्य सिखाने में दादा-दादी की भूमिका अहं होती है। घर में विद्यमान बुजुर्गों का हर मुश्किल घड़ी में एक मजबूत सहारा होता है। 
        मनुष्य अपने जीवन में सफलता पाने के लिए मन्दिरों में माथा रगड़ता है, तीर्थ स्थानों में भटकता है अथवा तथाकथित गुरुओं, तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के चंगुल में फंस जाता है।
        जो व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता को असहाय छोड़कर तीर्थ स्थलों पर अथवा मन्दिरों में भटकते रहते हैं, उनसे परमपिता परमात्मा बहुत नाराज होता है। ईश्वर उनकी सहायता करने के स्थान पर उन्हें अकेला छोड़ देता है। 
          मनुष्य के वास्तविक देवता और तीर्थ घर में बैठे हुए उसके जीवित माता-पिता होते हैं। इसीलिए उनके चरणों में सारा संसार होता है, स्वर्ग माना जाता है। 
          इस विषय में एक कथा का स्मरण हो रहा है। एक पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं के बीच ब्रह्माण्ड की परिक्रमा की प्रतियोगिता हुई थी।  कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर निकल पड़े।गणेश जी ने भगवान भोलेनाथ और भगवती पार्वती यानी अपने माता-पिता की परिक्रमा करके मानो पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा अपने भाई कुमार कार्तिकेय से पहले पूर्ण कर ली थी।
           माता-पिता की भक्ति और बुद्धि से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गणेश जी को यह वरदान दिया कि सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाएगी। इसलिए भगवान गणेश की पूजा सभी देवताओं से पहले की जाती है।
         आज संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवार के चलते कई बुजुर्ग अकेलापन का दंश झेल रहे हैं। बच्चे अपने व्यस्त जीवनशैली के कारण कई बार उनकी भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह बहुत दुखद स्थिति है।
          प्रत्येक मनुष्य को अपना सम्पूर्ण जीवन उनकी सेवा में लगाना चाहिए। वह अपना सारा जीवन भी यदि उनकी सेवा करता रहे तो भी कम है। मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने का उनका उपकार उनकी सेवा से कहीं बढ़कर है। उनके इस ऋण से उऋण होना बिल्कुल असम्भव है।
          दूसरे शब्दों में यही कहा जा सकता हैं कि उनकी आवश्यकताओं को अपना दायित्व समझकर अपने मन से पूर्ण करना चाहिए। कभी उनकी सेवा-सुश्रुषा भार मानकर नहीं करनी चाहिए। सदा उनके खान-पान का ध्यान रखना चाहिए जैसे वे उनके लिए करते थे। अस्वस्थ होने पर उनके इलाज की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। यही उनकी सच्ची पूजा-अर्चना कहलाती है।
        इसके विपरीत कुछ लोग अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति लड़-झगड़कर या धोखा देकर हड़प लेते हैं। उन बुजुर्गों को मानसिक सन्ताप देते हैं। वे उनके स्वास्थ्य और खान-पान का ध्यान नहीं रखते। उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे लोगों को अपने जीवनकाल में कभी सुख और शान्ति नहीं मिल पाती। 
          कभी-न-कभी जब उनका अन्तर्मन उन्हें कचोटने लगता है, वे पश्चाताप करते हैं। तब तक अपने ही हाथों से वे सब कुछ गँवा चुके होते हैं। तब समय उनका साथ नहीं देता। सब कुछ भूत के गर्भ में समा चुका होता है। तब चाहकर भी अपनी गलतियों को सुधारने का एक अवसर उन्हें नहीं मिल सकता।
          जो लोग अपने माता-पिता को हर तरह से प्रसन्न और सन्तुष्ट रखते हैं, उन्हें सदा ही उनका आशीर्वाद मिलता रहता है। उनका यश चारों ओर फैलता है। उन्हें लोग 'श्रवण पुत्र' कहकर सम्मानित करते हैं।
        इसके विपरीत माता-पिता तिरस्कार करने वालों के लिए उनके मन को कष्ट होता है। वह मानसिक सन्ताप किसी बद् दुआ से कम नहीं होता। यह समाज भी उन्हें यदा कदा तिरस्कृत करता रहता है। सब सुविधाओं के होते हुए भी उनके मन का कोई कोना रीता या खाली रह जाता है।
          जिन लोगों को इस संसार में माता-पिता का आशीर्वाद मिल जाता है, उनसे परमपिता भी प्रसन्न रहते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में खुशियाँ हमेशा अपनी दस्तक देती रहती हैं। समाज भी उन्हें यथोचित सम्मान देकर गौरवान्वित अनुभव करता है। उनका यश श्रवण कुमार की भॉंति चारों ओर प्रसरित होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 1 नवंबर 2026

अवसादग्रस्त जीवन एक बोझ

अवसादग्रस्त जीवन एक बोझ

डिप्रेशन या अवसाद आधुनिक भौतिक युग की देन है। हर इन्सान वे सब सुविधाएँ पाना चाहता है जो उसकी जेब खरीद सकती है और वे भी जो उसकी सामर्थ्य से परे हैं। इसलिए जीवन की रेस में भागते हुए हर व्यक्ति अपने आप में इतना अधिक व्यस्त रहने लगा है कि सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक गतिविधियों के लिए उसके पास समय ही नहीं बचता। इसीलिए आज डिप्रेशन की समस्या बढ़ती जा रही है। वृद्ध और युवा तो इसकी चपेट में आ ही गए हैं, इसने बच्चों तक को नहीं छोड़ा, उनको अपने जाल में फंसा लिया है।
         अवसाद या डिप्रेशन में खुद को एक बोझ समझ लेना एक बहुत नकारात्मक विचार है। यह वास्तविकता नहीं है अपितु बीमारी का एक मानसिक लक्षण है। डिप्रेशन मनुष्य के दिमाग में ऐसे विचार पैदा करता है कि वह दूसरों के लिए परेशानी बन रहा है। इसके कारण शारीरिक और मानसिक थकान होने लगती है। इन्सान अपने दैनन्दिन कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाता। तब व्यक्ति के मन में  अपराधबोध‌ होने लगता है। वह अपनी भावनाओं को दूसरों के साथ साझा से कतराने लगता है।
      वह किसी के साथ सम्पर्क बनाना नहीं चाहता। जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो स्वयं को नितान्त अकेला पाता है। इसका कारण है कि अपनों को तो वह पता नहीं कब का पीछे छोड़ आया होता है। यही नामुराद अकेलापन उसके जीवन के लिए सबसे बड़ा अवसाद का कारण बन जाता है। 
      इस अकेलेपन के कई और भी कारण हो सकते हैं। पति या पत्नी की मृत्यु के बाद, तलाक के बाद पुनर्विवाह न करना, माता-पिता की अत्यधिक व्यस्तता के कारण बच्चों में, आफिस में किसी के द्वारा किया गया दुर्व्यवहार, वृद्धावस्था आदि में भी इस अकेलेपन की समस्या आड़े आती है।
        अनावश्यक ही अधिक सोचते रहने के कारण मनुष्य की अपने जीवन के प्रति नकारात्मक अवधारणा बनाने लगती है। वह ऐसी अपेक्षाएँ करता है जो वास्तव में पूर्ण होनी असम्भव होती हैं। जब उसकी अपेक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं तो वे उसे अन्तर्मन की गहराइयों तक तोड़ देती हैं। ऐसी स्थिति में खाना-पहनना, घूमने जाना, हास-परिहास आदि उसे कुछ भी नहीं सुहाता। वह बस उल्टा-सीधा सोचता रहता है। ऐसे में उसके मन का उपचार करने की भी आवश्यक होती है। मन को नकारात्मक बनाने के स्थान पर उसे वास्तविकता के धरातल पर लाना आवश्यक होता है।
          यह अवसाद यदि लम्बे समय तक बना रहे तो मन-मस्तिष्क को हानि पहुँचाता है। भावनात्मक परिवर्तन शरीर पर स्थाई एवं अस्थाई प्रभाव छोड़ते हैं। परेशानी इस कारण होती है कि मस्तिष्क का आकार घटने लगता है। शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं।
         अवसादग्रस्त जीवन के प्रति अरुचि जैसे लक्षण उभरने लगते हैं। यह अवस्था अधिक समय तक नहीं बनी रहती अपितु कुछ समय पश्चात स्वत: सामान्य हो जाती है। कई मानसिक रोगी तनावग्रस्त होने पर अधिक खाने लगते हैं। उनकी मानसिक एकाग्रता नष्ट हो जाती है। वे हर बात को भूलने लगते हैं और अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाते हैं। उनके विचारों की स्पष्टता खत्म हो जाती है व गडमड होने लगते हैं।
          प्राचीनकाल से ही हमारे भारतीय मनीषी सकारात्मक सोच रखने की शिक्षा देते रहे। इसकी मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ के लिए बहुत जरूरत होती है। 
          इन सकारात्मक विचारों से शरीर की ग्रन्थियाँ अधिक सक्रिय होकर काम करने लगती हैं। हारमोन्स का प्रवाह शरीर को स्फूर्ति प्रदान करता है जिससे भरपूर नींद आने लगती है और मन व मस्तिष्क को सुकून मिलता है। फिर से जीवन के प्रति उत्साह होने लगता है। तब यही दुनिया जो पहले बदसूरत दिखाई देती थी, अब सुन्दर लगने लगती है। चिन्ता, तनाव अथवा अवसाद बढ़ जाने की स्थिति में किसी योग्य चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक होता है। अन्यथा व्यक्ति के मानसिक सन्तुलन खो जाने में बहुत अधिक समय नहीं लगता।
        इस अवसाद से मुक्त होने के लिए सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए, सज्जनों की संगति में रहना चाहिए और ईश्वर का ध्यान लगाना चाहिए। यौगिक क्रियाएँ भी लाभदायक होती हैं। इन सबसे बढ़कर मनुष्य को स्वयं को सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए। सबके साथ मिलना-जुलना चाहिए और हो सके तो किसी हाबी में समय बिताना चाहिए।
        ईश्वर पर विश्वास सदैव आत्मिक बल देता है। अवसादग्रस्त व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि ईश्वर उसका अपना सच्चा मीत है। वह उसकी रक्षा करेगा, उसके दुख दूर करेगा, सहायता करेगा और कल्याण भी करेगा। ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखने वाले को कभी अवसाद हो नहीं सकता। यदि दुर्भाग्यवश कभी ऐसी स्थिति बन जाती है तो वह शीघ्र ही उस अवसाद से बाहर निकल आता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

संसार चक्की के दो पाटों की भॉंति

संसार चक्की के दो पाटों की भाँति

यह असार संसार चक्की के दो पाटों की भाँति निरन्तर चलायमान है। चक्की में जब हम अनाज डालते हैं तो वह उसे पीस देती है। इस संसार रूपी चक्की में जीव पिसता है। इस चक्की का एक पाट जन्म है और दूसरा पाट मृत्यु है। इस जन्म और मृत्यु के दोनों पाटों में जीव आजन्म पिसता रहता है। क्षणभंगुर कहे जाने वाले इस संसार में जन्म और मृत्यु के दो पाटों में पिसते हुए मनुष्य का अन्त निश्चित है। अतः इस असार संसार से मनुष्य की विरक्ति होना स्वाभाविक ही है।
        सन्त कबीरदास जी ने इसी सार को अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोया है-
        चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय।
        दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
अर्थात् कबीर दास जी कहते हैं कि अनाज पीसने वाली चलती हुई चक्की को देखकर उन्हें रोना आ गया। जिस प्रकार चक्की के दो पाट जो पत्थर से बने हुए हैं, उनके बीच में आने पर अनाज का कोई भी दाना साबुत नहीं बचता। उसी प्रकार इस संसार रूपी चक्र में जन्म और मृत्यु के बीच पिसकर कोई भी जीव अछूता नहीं रहता। हर जीव को काल के गाल में समाना ही होता है। यह दोहा हमें स्मरण कराता है कि यह जीव का यह जीवन और संसार दोनों ही नाशवान हैं। 
          ये दो पाट द्वन्द्व हैं यानी सुख-दुःख, लाभ- हानि, जय-पराजय, यश-अपयश, अपना-पराया, दिन-रात आदि। इनसे जो जीत गया, समझो वही बच सकता है। वही परम ज्ञान को प्राप्त करके मुक्त हो सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' में इसे साक्षी भाव कहा है। 
        कबीरदास जी को उदास देखकर उनके पुत्र कमाल ने यह दोहा लिखा- 
     चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
     कीले  से जो  लग  रहा, सोई  रहा  बचाय।। 
अर्थात् जब कबीरदास जी संसार की नश्वरता को देखकर रोते हैं कि जन्म और मृत्यु रूपी दो पाटों के बीच में फंसकर कोई भी जीव साबुत नहीं बचता यानी सब नष्ट हो जाते हैं। उनके इस प्रकार शोक करने पर उनके पुत्र कमाल हँसते हैं और समझाते हैं कि जो दाने चक्की की कीलों या बीच के हिस्से से चिपके रहते हैं, वे पिसने से बच जाते हैं। इसी प्रकार जो मनुष्य स्वयं को भगवान की भक्ति और उनकी शरण रूपी कील से जोड़कर रखता है, उसका भक्षण काल या मृत्यु और संसार के दुःख नहीं कर पाते। 
        पहला दोहा मनुष्य की अनित्यता के कारण वैराग्य उपजाता है लेकिन दूसरा दोहा मन में आशा और आस्था का दीपक दिखाता है। आवागमन रूपी दो पाटों में फँसा जीव अपने दायित्वों को निभाते हुए सदा ऐसे ही पिसता रहता है। 
        इस विवेचना से कुछ प्रश्न मन में उठते हैं कि बचकर क्या जीवन और मृत्यु से मुक्त हो सकते है? क्या काल को वश में किया जा सकता है? पानी के बुलबुले जैसे इस नश्वर जीवन को क्या स्थायित्व मिल सकता है? पल-पल नष्ट होते हुए इस शरीर को सदा यथावत रखा जा सकता है?
           इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है - नहीं। जो मनुष्य प्रभु भक्ति के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, केवल वही इस संसार में बच सकता है। हर तरफ से स्वयं को समेटकर सिर्फ उस मालिक के साथ एकाकार हो जाना ही इस ज्ञान का मूल मन्त्र है।
          जन्म और मृत्यु के इस भय से बचने का ही साधन है मुक्ति। मनीषी इसे निर्वाण, परम पद और अभय पद आदि नामों से अभिहित करते हैं। इस अवस्था को शरीर की सीमा में रहते हुए पाया जा सकता है। अपने अन्तस् के शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से स्वयं को मुक्त कराना ही मोक्ष पाना है। 
      मनुष्य को वीतरागी बनना चाहिए। सभी विपरीत गुणों के अतिक्रमण से जब वह बच जाता है तो उसके पश्चात ही व्यक्ति गुणातीत बनता है। जीवन के तमाम परस्पर विरोधी भाव चक्की के दो पाटों की तरह होते हैं। निस्सन्देह पाप कर्म और पुण्य कर्म दोनों ही प्रकार के कर्म मनुष्य के बन्धन की वजह बनते हैं। 
        राग-द्वेष आदि भाव संसार, समाज, परिवार और  राष्ट्र में हमेशा ही रहेंगे। मनुष्य स्वयं को इनसे विलग करके मुक्त हो सकता है। जीवन के सभी विरोधी प्रतीत होने वाले भावों में जो सम रहता है उसे उपनिषदों, ऋषियों-मुनियों और भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोगी कहा है। वही जन्म और मृत्यु के बन्धनों को काट सकता है। तब वह काल का ग्रास नहीं बनता। 
          जीवन का द्वैत भाव उसे चक्की के दो पाटों की तरह ही खा जाता है। जो सच्ची श्रद्धा और अपने निश्चित मन से कीले में चिपके अनाज की तरह उस परमपिता परमात्मा के सदैव समीप रहता है, वही इस भव सागर को पार कर लेता है। जो अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहण करते हुए चौबिसों घण्टे अपने हृदय में प्रभु का स्मरण करता रहता है, वह बालक भक्त प्रह्लाद की तरह हर प्रकार के भौतिक कष्टों से मुक्त हो जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

आवागमन के चक्र से मुक्ति

आवागमन के चक्र से मुक्ति

अपने दुखों, कष्टों और परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए ही मनुष्य को भगवान याद आते हैं। अपनी पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए हर इन्सान ईश्वर को याद करने लगता है। यदि सुख में प्रभु को याद किया जाए तो मनुष्य के पास दुख नहीं आता। यानी ईश्वर के स्मरण से उसका आत्मिक बल बढ़ जाता है। इसलिए उसमें दुखों से लड़ने, उनसे मुक्ति पाने की सामर्थ्य आ जाती है। इस तरह मानव का जीवन आनन्ददायक और सुखद बना जाता है।
        प्रत्येक जीव में परमात्मा का वास है, इस देखना और समझना चाहिए। शरीर नश्वर है, इसलिए अपने इस क्षणभंगुर जीवन में कभी भी इस देह पर अभिमान नहीं करना चाहिए। जिसके मन में अभिमान का भाव आ जाता है, उसमें भगवान का वास नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में प्रभु उससे दूर होने लगता है। क्योंकि घमण्ड में आकर मनुष्य स्वयं को ही सर्वसमर्थ समझने लगता है। तब वह सोचता है कि उसे ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है।
          हर समय विषय और विकारों में डूबे रहने पर भी मनुष्य की इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होतीं। अपनी इन्द्रियों को शमन करने के चक्कर में फंसा हुआ मनुष्य अपने शरीर को रोगी बना लेता है। रोगग्रस्त हो जाने पर उसका मन हर समय अशान्त रहने लगता है। उस समय मानव को प्रभु का नाम सिमरन करने की सुध आती है। 
        सुखों की हिलोर में प्रायः लोग प्रभु को स्मरण करना ही नहीं चाहते। जहाँ वह दुखों से घिर गया वहीं मालिक की याद सताने लगती है। तब वह प्रभु के नाम का सिमरन करने लगता है। उसकी कृतघ्नता तो देखो, उस समय वह उस दाता को कष्ट से मुक्त करने के लिए रिश्वत तक देने की बात कहने लगता है। 
          कबीरदास जी ने इसीलिए मनुष्य को समझाते हुए कहा है-
    दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय।
    जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।। 
        इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी मानव को चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि दुख के समय सब लोग प्रभु का स्मरण करते हैं परन्तु सुख में उसे कोई भी याद नहीं करता। यदि सुख में उसका स्मरण कर लिया जाए तो मनुष्य के पास कभी दुख आएगा ही नहीं।
          इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि प्रभु का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के सारे दुख कट जाऍंगे। अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों से कोई जीव बच नहीं सकता, यही ईश्वरीय न्याय है। यही प्रभु का कठोर विधान है।
          हमारे मनीषियों ने इस विषय में हमारा मार्गदर्शन किया है। वे कहते हैं कि हर समय यानी चौबीसों घण्टे मनुष्य को ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। कैसी भी अवस्था क्यों न  हो, सदा उसी की शरण में रहना चाहिए।
        इसका कदापि यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि दुनिया को बिसराकर बस धूनी रमाकर बैठ जाएँ। इसका सरल-सा अर्थ यही है कि अपने सभी दैनन्दिन कार्यों और दायित्वों का भली-भाँति निर्वहण करते हुए मनुष्य को सदा उस मालिक को याद करते रहना चाहिए।
        सभी द्वन्द्वों को सहन करते हुए, अपने सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मो का फल उस मालिक को अर्पित करते रहना चाहिए। व्यवहार मे ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं बन सकता। भगवान श्रीकृष्ण ने भी 'श्रीमद्भगवद्गीता' में यही उपदेश मनुष्य को दिया है कि-
       कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
       मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोSस्तवकर्मणि।।
अर्थात् केवल कर्म करना ही मनुष्य का अधिकार है, फल की कामना नहीं करनी चाहिए। कर्मफल का हेतु बनने पर मनुष्य में अकर्मन्यता का भाव आने लगता है।
        'ईशावास्योपनिषद्' के प्रथम दो मन्त्र भी यही समझाते हैं। 'ईशोपनिषद्' का निम्न पहला मन्त्र हमें कहता है -
      ईशावास्यमिदं सर्वंयत्किंच जगत्यां जगत्।
     तेन त्यक्तेन भुंजीथा मां गृध: कस्यस्विद्धनम्।।
अर्थात् इस संसार में जो कुछ भी स्थावर-जंगम या चर-अचर जगत है, वह सब ईश्वर से आच्छादित या व्याप्त है। इसलिए उस त्यागपूर्वक भावना से ही उसका उपभोग करो। किसी के भी धन या सम्पत्ति का लालच मत करो। 
        'ईशावास्योपनिषद्' का दूसरा मन्त्र हमें समझाता हुआ कहता है -
      कुर्वन्नैवेह  कर्माणि जिजीविषेत्  शतं समा:।
       एवं त्वयि नान्यथेतोsस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
अर्थात् मनुष्य को इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। हे मनुष्य! तुम्हारे लिए इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्म शुभ-अशुभ फल या बन्धन न प्रतीत हो।
यानी कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की कामना करनी चाहिए। कर्म किए बिना कोई चारा नहीं। ऐसा करने हुए भी मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं होता।
        दुख हो या सुख जो मनुष्य हर समय परमात्मा का स्मरण करता है उसके जीवन में सुख आए अथवा दुख वह हर स्थिति में समान रहता है। दोनों को प्रसाद समझकर ग्रहण करता है। जिसका मन उस निरंकार प्रभु से जुड़ा रहता है उसे ही परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है, आवागमन के इस चक्र से मुक्ति मिल सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद