सोमवार, 18 मई 2026

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

इन्सानी प्रवृत्ति है कि वह बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाता हैं अथवा अनदेखा करता रहता हैं। समय बीतते-बीतते उसके घावों पर मलहम लग जाती है। वह भली-भाँति जानता है कि जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी है जीवन जिसे हम सब यत्नपूर्वक जीते हैं। परिश्रम करते हैं और अपनी सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं। भूलना इसलिए भी जरूरी है ताकि हम मानसिक स्वास्थ्य को सन्तुलित रख सकें, सामान्य दिनचर्या को सुविधाजनक बना सकें और स्वतन्त्रता और विकास का आनन्द ले सकें।
          कदम-कदम पर अपनी जीत का जश्न मनाते हुए हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। उस समय हम चाहते हैं कि सारी कायनात हमारी ही खुशी में शामिल हो जाए और जब हम दुखी हों तब सारा ब्रह्माण्ड हमारे दुख में दुखी होता हुआ दिखाई दे। यद्यपि ऐसा होता नहीं है, ये तो मात्र इन्सानी भावनाऍं हैं। मनुष्य अपने सुख-दुख को ब्रह्माण्ड के साथ जोड़कर देखता रहता है।
           ईश्वर ने मनुष्य को इस प्रकृति का बनाया है कि वह शीघ्र ही हर दुख, हर परेशानी को भूलकर आगे बढ़ जाता है। यह उसके लिए बहुत आवश्यक भी है। यदि वह पुरानी सफलता-असफलता और सुख-दुख को पकड़कर बैठा रहेगा तो वह कदापि दुनिया की रेस में भाग नहीं ले सकता। अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति के परलोक गमन पर भी दुनिया का कोई काम नहीं रुकता। मनुष्य पूर्ववत खाता-पीता है, हंसता-बोलता है, अपनी खुशियॉं मनाता है, शुभ कार्यों को सम्पादित करता है।
            कुछ लोग हमारे जीवन में उस समय आते हैं जब हम टूट चुके होते हैं या जब हमें किसी की आवश्यकता होती है अथवा जब हम बिना किसी बनावट के होते हैं। उस समय जो रिश्ता बनता है, वह दिमाग से नहीं आत्मा से जुड़ता है। आत्मा से जुड़े रिश्ते समय की मार नहीं सहते, वे बस चुप हो जाते हैं पर समाप्त नहीं होते। समय हमें सिखाता है कि जो हो गया उसे भूलकर आगे बढ़ो, इसी में समझदारी है।
           दिन-दिन करके मनुष्य जन्म के बाद बचपन से जवानी की ओर बढ़ता है और फिर वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है। तदुपरान्त मृत्यु उसका वरण कर लेती है। वह हर वर्ष अपने बन्धु-बान्धवों के साथ अपना जन्मदिवस मनाकर आनन्दित होता है। पर वह भूल जाता है कि उसके जीवन का एक वर्ष और कम हो गया और मृत्यु तक पहुँचने की एक साल की दूरी उसने तय कर ली है। यह इस जीवन की सच्चाई है। हम सब लोग इस अटल सत्य से नजरें चुराते रहते हैं। हम बस यही सोचते हैं कि हम आयुप्राप्त हो रहे हैं तथा अधिक अनुभवी बनते जा रहे हैं।
          भर्तृहरि जी ने 'वैराग्यशतकम्' ग्रन्थ में जीवन के इस सत्य को बहुत ही सुन्दर शब्दों में उदाहरण सहित उद्घाटित किया है-
          व्याघ्रीव  तिष्ठति  जरापरितर्जयन्ति।
          रोगाश्च  शत्रव  इव  प्रहरन्ति  देहम्॥
          आयु: परिस्त्रवतिभिन्नघटादिवाम्भो।
          लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्॥
अर्थात् बुढ़ापा बाघ की तरह गुर्राता हुआ सामने खड़ा है, शत्रु की तरह रोग शरीर पर नित्य प्रहार करते हैं, छेदयुक्त घट की तरह आयु का नित्य क्षय हो रहा है लेकिन आश्चर्य है कि फिर भी लोग अहित आचरण कर रहे हैं।
           इस श्लोक का कथन है कि वृद्धावस्था बाघ की तरह गुर्राते हुए, मुँह बाए हमारी ओर बढ़ रही है। हमें इस बाघ से इसलिए डर नहीं लगता क्योंकि वह सिर्फ गुर्रा रहा है, हमें खाने नहीं आ रहा। इसलिए उस बाघ को हम अनदेखा करके चैन की बाँसुरी बजाते हैं। उस समय अपने झूठे अहं के कारण हम यही सोचते हैं कि जब वह हमें खाने के लिए आएगा तब हम उसे भी देख लेंगे।
          ज्यों-ज्यों हमारी आयु बीत रही है और हम वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं, हमारा शरीर रोगों का घर बनता जाता है। वह दिन-दिन करके अशक्त हो रहा है। जिस प्रकार घड़े में छेद हो जाने पर पानी बूँद-बूँद करके समाप्त होता रहता है, उसी प्रकार एक-एक दिन करके मनुष्य मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता रहता है। फिर भी मृत्यु की गोद में समा जाने के भय को छोड़कर मनुष्य हर प्रकार के अच्छे-बुरे कर्मों को करने में व्यस्त रहते हैं। न उन्हें वृद्ध होने का भय होता है और न ही मृत्यु का डर। इसीलिए करणीय-अकरणीय कार्यों को करके वे प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
            किसी की मृत्यु होने पर किसी मृत शरीर को देखकर क्षणिक वैराग्य मनुष्य के मन में आता है। कभी श्मशान जाने पर संसार की असारता का ज्ञान मन में कुछ पल के लिए अवश्य आता है। पर वह क्षणिक वैराग्य दूसरे ही पल संसार के आकर्षणों से आवेष्टित (ढक) जाता है। फिर आरम्भ हो जाते है वही दुनिया के सभी आडम्बर और ढकोसले।
           इस सबको लिखने का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि मनुष्य दीन-दुनिया को भूलकर जंगलों में जाकर तपस्या करने के नाम पर उसे छोड़ जाए। यानी मनुष्य पलायनवादी बन जाए। दुनिया में रहते हुए सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए मनुष्य को जल में कमल की तरह रहना चाहिए। तभी वह अपने मानव होने के अर्थ को सार्थक करने में सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 17 मई 2026

अन्नदाता की शोचनीय दशा

अन्नदाता की शोचनीय दशा 

किसान शब्द सुनते ही हमारे सामने सादा-सा कुर्ता और धोती पहने, बैलों की सहायता से अपने खेत में हल जोतते हुए उसकी छवि प्रकट हो जाती है। यह किसान हमारा अन्नदाता है। हमारे भोजन के लिए वह हमें अन्न देता है परन्तु उसने अपने परिवार के साथ दिन में दो समय का भोजन खाया भी है अथवा नहीं, यह कोई नहीं समझना चाहता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा अन्नदाता कितने ही दिन भूखे पेट सोने के लिए विवश होता है। उनकी दशा हमारे देश में हमेशा से ही शोचनीय रही है।
             किसानों की दुर्दशा होने का सबसे बड़ा कारण रहा है उनकी अशिक्षा और आर्थिक रूप से पिछड़ापन। हालॉंकि आज उनके बच्चे पढ़ने लगे हैं। फिर भी अभी बहुत कुछ शेष है जो उनके लिए करना आवश्यक है। बहुत से गाँव इतने वर्षों की आजादी के बाद भी अभी तक शहरों से नहीं जुड़ पाए हैं, वहाँ पक्की सड़कें नहीं हैं। दिल्ली जो भारत की राजधानी है वहाँ भी लोग बिजली और पानी के संकट से यदाकदा जूझते रहते हैं तो उन दूर-दराज के गाँवों में तो यह समस्याएँ सदा ही‌ मुँह बाए खड़ी रहती हैं।
            पहले समय में कृषि पूर्णरूपेण वर्षा पर आश्रित रहती थी। आज भी उन स्थितियों में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कृषि के लिए बहुत से आधुनिक यन्त्र बन गए हैं जिनका उपयोग किसान करते रहते हैं। परन्तु फिर भी वर्षा उनके इरादों पर पानी फेर देती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और असमय ओलावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ उनकी फसलों को बर्बाद कर देती हैं। 
            महंगाई के चलते उर्वरक, खाद और बीज इत्यादि दिन-प्रतिदिन बहुत महंगे होते जा रहे हैं। उनको खरीदने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जिसे वह साहूकार से या बैंक से कर्ज के रूप में लेता है। यदि फसल अच्छी हो गई तो कर्ज का भुगतान कर दिया जाता है। परन्तु यदि दुर्भाग्यवश फसल बर्बाद हो जाए तो फिर कर्ज चुका पाना असम्भव हो जाता है। 
           किसान अच्छी फसल की आशा में बच्चों की शादी, अथवा अन्य शुभ कार्य सम्पन्न करने की, टपकती हुई छत वाले घर की मुरम्मत आदि की योजनाएँ बनाता है। लेकिन जब आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण यदा कदा उसकी फसल ही चौपट हो जाती है तब उसकी सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं।
          पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे किसानों की जमीन के टुकड़े छोटे होते जा रहे हैं। उस पर मौसम की मार और कर्ज लिया धन उनकी कमर ही तोड़ देता है। वे असहाय हो जाते हैं। बैंकों से लिए कर्ज को न चुका पाने के कारण गुँडानुमा एजेण्ट उनके मन में इतना आतंक भर देते हैं कि आत्महत्या के अतिरिक्त उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझता।
          पहले समय में साहूकार उन अनपढ़ किसानों को थोड़े से कर्ज को न चुका पाने के कारण उनकी पीढ़ियों को ही बन्धक बना लिया करते थे।  इसी विषय से सम्बन्धित स्कूल में पढ़ी हुई  इंगलिश भाषा में लिखी कहानी 'A handful of wheat' यानी 'मुट्ठी भर अनाज' जो ऋण स्वरूप लिया गया था, उसकी याद आ रही है। इसके लेखक शायद मुलख राज आनन्द हैं। इस कहानी को याद करके आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कहानी बहुत ही हृदयस्पर्शी है।
        लेखक ने इस कहानी में किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया है। अपनी किसी आवश्यकता के कारण साहूकार से थोड़ा-सा ऋण लेता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज के अनुसार उसका बढ़ता रहता है। उसका ऋण कभी चुकाया हुआ माना ही नहीं जाता। तब पिता के द्वारा लिए गए उस ऋण को चुकाने के लिए उसके बच्चों को सारी आयु उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। साहूकारों का यह बहुत ही शर्मनाक व्यवहार कहा जा सकता है।
             पहले साहूकारों का आतंक होता था जो ब्याज के रूप में उनकी फसलें कटवाकर ले जाया करते थे और अब बैंकों का खौफ रहता है। इन‌ सबके अतिरिक्त इन छोटे किसानों के पास अनाज को सुरक्षित रखने के लिए भण्डार गृह भी नहीं होते। इन्हें औने-पौने भाव अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल को दलालों को बेचना पड़ता है। मण्डियों में जाकर अनाज बेचने पर भी उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
            सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएँ किसानों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते रहते हैं। उन सबके किए गए उपाय अभी किसानों की दशा को सुधारने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। हम सभी को भी उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उनके उत्थान के लिए मनन करना चाहिए।
            ऐसे किसान जो परिश्रम करके हमें जीवन देते हैं, हम उनके प्रति थोड़ा भी संवेदनशील नहीं हैं। वे किसान और उनके परिवारी जन दाने-दाने को तरसते हैं। हम सबका पेट भरने के लिए दिनोंदिन फाके करते हैं। हम उनके परिश्रम का मूल्य तो नहीं चुका सकते पर अन्न को सुरक्षित रखकर उनकी मेहनत का सम्मान तो कर सकते हैं। अपने झूठे अहं का प्रदर्शन करते हुए अपने घर में और अपनी की जाने वाली पार्टियों में अन्न को बर्बाद होने से हम बचा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 16 मई 2026

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति और पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मान्तर यानी सात जन्मों का होता है, ऐसा हमारी भारतीय संस्कृति मानती है। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। हमारी ऐसी मान्यता है कि शरीर पीछे बनता है पर भाग्य पहले लिख दिया जाता है। उसी प्रकार जोड़ियॉं भी ईश्वर पहले ही बनाकर मनुष्य को इस संसार में भेजता है। इस रिश्ते को सही तरीके से निभाना पति और पत्नी दोनों का ही दायित्व होता है। इसमें चूक होने की गुँजाइश घर-परिवार और समाज में कदापि मान्य नहीं होती।
            स्कूल में पढ़ते समय अंग्रेजी भाषा की एक कहानी पढ़ी थी। अब भी जब मैं उस कथा को याद करती हूं तो मन भर जाता है। इस कहानी में जिम और डैला नामक दो पति-पत्नी थे। वे दोनों सुविधा सम्पन्न नहीं थे। वे अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रहे थे। जिम के पास सुन्दर-सी सोने की एक घड़ी थी पर उसकी चेन सोने की नहीं थी। डैला चाहती थी कि जिम की घड़ी में सोने की चेन हो। पर उनके पास सोने की चेन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।   
           दूसरी ओर डैला के बाल बहुत सुन्दर थे जिनके लिए जिम एक सोने का क्लिप खरीदना चाहता था। पर धन न होने के कारण लाचार था। दोनों ही अपनी आर्थिक स्थिति के कारण बहुत मजबूर थे। चाहकर भी वे दोनों एक-दूसरे के लिए सोने की चेन अथवा सोने का क्लिप नहीं खरीद सकते थे। इन्हें खरीदना उन दोनों के बूते से बाहर था। इसलिए वे दोनों अपना मन मसोस कर रह जाते थे।
          इस प्रकार समय बीतता गया। एक दिन जिम का जन्मदिन आया। उस दिन डैला ने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन उपहार स्वरूप खरीदने की सोची। परन्तु पैसे तो उसके पास नहीं थे। वह पार्लर गई और उसने अपने सुन्दर बाल बेच दिए। उन पैसों से उसने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन खरीदी। उधर जिम ने अपनी पत्नी को रिटर्न गिफ्ट देने के लिए अपनी घड़ी बेच दी और उसके लिए सोने का क्लिप खरीद लिया।
           शाम के समय डैला ने जिम को जन्मदिन के उपहार स्वरूप सोने की चेन भेंट की। फिर जिम ने रिटर्न गिफ्ट के तौर पर डैला को सोने का क्लिप भेंट किया। यद्यपि अब सोने की चेन और क्लिप की आवश्यकता नहीं रह गई थी। अपनी-अपनी पूँजी को गँवाकर भी वे एकदम-दूसरे के प्रति समर्पण भाव से विभोर हो उठे।
          ऐसा समर्पण भाव पति-पत्नी के मध्य होना आवश्यक होता है। उन दोनों में आपसी प्रेम और विश्वास होना आवश्यक है। इसके बिना आपस में सामंजस्य नहीं स्थापित किया जा सकता। उन दोनों को दो जिस्म और एक जान की तरह जीवन व्यतीत करना चाहिए। तभी उनके जीवन में खुशियाँ सदा बरकरार रह सकती हैं।
           दोनों के सुख-दुख भी साझे होने चाहिए। उन दोनों के मध्य किसी भी स्थिति में तीसरे की गुँजाइश नहीं होनी चाहिए। आपसी विश्वास गृहस्थ जीवन की पहली सीढ़ी है। दोनों को सहनशीलता अपनानी चाहिए। यदि दोनों में से कोई एक अपने साथी से विश्वासघात करता है तब रिश्ते दरकने लगते हैं। उसका अन्त अलगाव के रूप में होता है। उनका अलग होना घर-परिवार को तोड़ देता है। मासूम बच्चे बिना किसी दोष के सबसे अधिक कष्ट भोगते हैं।
           अपने-अपने पूर्वाग्रह त्याग करके उन्हें भावी जीवन के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए। उन दोनों का व्यवहार परस्पर सहृदयतापूर्वक होना चाहिए। मन, वचन और कर्म से इस पावन रिश्ते को निभाना चाहिए। इससे आपसी मनमुटाव की गुॅंजाइश बिल्कुल नहीं रहती। पति-पत्नी दोनों में प्रेम और विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। यही गृहस्थ जीवन की पूॅंजी कहलाती है। यहॉं स्वर्ग के समान शान्ति का वातावरण रहता है। ऐसे परिवार की सुगन्ध चहुॅं ओर फैलती है।
             इस प्रकार का व्यवहार जब उन दोनों के मध्य होता है तब उनके बीच पनपने वाली सभी दूरियाँ समाप्त हो जाती हैं और उनके हृदयों के तार फिर से जुड़ जाते हैं। जिसे हम दूसरे शब्दों में टेलीपेथी कह सकते हैं। यही टेलीपेथी उनके जीवनों के जुड़ाव का प्रमाण होती है। उन्हें इसे सिद्ध करने के लिए किसी शपथ को खाने की आवश्यकता नहीं होती।
            पति-पत्नी में ऐसी प्रगाढ़ता सफल दाम्पत्य जीवन का मूल मन्त्र होती है। ऐसा घर सबके लिए एक उदाहरण बन जाता है। वहॉं धन-वैभव की यदि कभी कमी भी हो तो उनके व्यहार में कोई परिवर्तन नहीं आता। वे एकजुट होकर हर संकट से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार रहते हैं।
            हर माता-पिता को अपने बच्चों में संस्कार बचपन से ही देने चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हो वे अपने जीवन साथी के साथ, सारा जीवन एक-दूसरे की कमियों को अनदेखा करते हुए, राजी-खुशी व्यतीत करके सबके समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करें। इसी में सबका सुख-चैन निहित है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 15 मई 2026

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल 

हमारे मनीषी कहते हैं कि जीवन उसी व्यक्ति का सफल होता है जो इस ससार में अकेला नहीं है। उसके भाई-बन्धुओं के आवागमन से घर में रौनक रहती है, चहल-पहल रहती है। वह घर तो मानो भूतों के डेरे के समान होता है जहाँ पर कभी कोई नहीं आता। इसका सीधा-सा अर्थ यही निकलता है कि जिसके घर बहुत से लोग आते रहते हैं चाहे वे मिलने-जुलने हों अथवा चाहे किसी कार्य से आने वाले हों, उसका जीवन ही वास्तव में इस भूतल पर सफल माना जाता है।   
            सबके साथ सामंजस्य बनाकर चलना जीवन को सफल, शान्तिपूर्ण और सन्तोषजनक बनाता है। यह दृष्टिकोण न केवल रिश्तों को मजबूत करता है बल्कि व्यक्तिगत और पेशेवर विकास के लिए भी आवश्यक है। सहयोग से सफलता मिलने पर आप मानसिक शान्ति और खुशी अनुभव होती है। जीवन की दौड़ में केवल अकेले दौड़ने वाले को प्रतिस्पर्धा में प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
            'पञ्चतन्त्रम्' नामक ग्रन्थ में पण्डित विष्णु शर्मा ने इसी आशय को अपने शब्दों में बहुत सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है-
        य धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले।
       आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थं सुहृदो जना:।।
अर्थात् इस जगत में वे लोग धन्य, विवेकी और सभ्य हैं जिनके आवास स्थान पर मित्रगण काम के लिए आते हैं।
            इस श्लोक से कवि यही स्पष्ट करना चाहते हैं कि दूसरे की उम्मीदों पर जो लोग खरे उतरते हैं, संसार में उन्हीं को पूछा जाता है। उन्हें सभी अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं। सबके अपने वही कहलाते हैं जिनके पास कोई भी व्यक्ति बेझिझक होकर अपनी समस्याओं के साथ आ सकता है। ऐसे महानुभावों का जीना ही इस धरा पर वास्तव में जीना कहलाता है। ऐसे लोगो को धन्य और विवेकी कहा जाता है।
               अपने अहं के कारण दूसरों को हेय समझकर दुत्कारने वालों से सभी किनारा कर लेते हैं। सबको अपना बनाकर चलने वालों के साथियों की कतार बहुत लम्बी हो जाती है। इसी से ज्ञात होता है कि मनुष्य कितना सभ्य है? वह कितने लोगों को अपने साथ लेकर चल सकता है? उसे दूसरों की कितनी चिन्ता और परवाह है?
            आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में इस विषय पर लिखते हैं-
       जीवने यस्य जीवन्ति मित्राणीष्टा सबान्धवा।
       सफलं जीवितं तस्य आत्मर्थे को न जीवति।।
अर्थात् जिसके जीवन से इष्ट , मित्र, बन्धु-बान्धव जीवित रहते हैं, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए कौन नहीं जीता? यानी अपने लिए तो सभी लोग जीते हैं।
           जो मनुष्य अपने इष्टजनों और बन्धु-बान्धवों के जीने का कारण बनता है, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए यानी अपने घर-संसार के लिए तो सभी जीते हैं। यह जीना स्वार्थपरक होता है जहाँ मेरे और मेरे परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान ही नहीं होता। अपने और अपनों के लिए सब सुख-साधनों को जुटाना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। उनकी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करना मनुष्य का कर्त्तव्य होता है।
              इसका यह तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मनुष्य समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाए या अनदेखा करने लगे जिसके कारण ही उसका अपना यह अस्तित्व है। वह समाज में अकेला रहकर नहीं जी सकता। ‌‌भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में अन्यत्र इस विषय पर लिखते हैं- 
        स जीवति गुणो यस्यधर्मो यस्य सजीवति।
        गुणधर्म-विहीनो य: जीवितं तस्य निष्फलम्।।
अर्थात् वही जीवित रहता है जिसमें गुण हों अथवा धर्म हो। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निष्फल है।
           आचार्य चाणक्य ने मानव जीवन के लिए बहुत ही गूढ़ रहस्य बताया है। उनके अनुसार गुण और धर्म का मनुष्य में होना आवश्यक है। गुणों से रहित मूर्ख व्यक्ति का होना या न होना एक समान होता है। वह इस पृथ्वी पर बोझ के समान होता है। उसके होने से किसी को खुशी मिलती है और न ही उसके जाने का किसी को गम होता है।
            अपने धर्म यानी अपनी जिम्मेवारियों को सुचारू रूप से निर्वहण करने वाला ही मनुष्य ही सर्वत्र सम्मान प्राप्त करता है। इसके विपरीत आचरण करने वाला हर कदम पर तिरस्कृत होता है। उसे कोई घास नहीं डालता। धीरे-धीरे वह अन्धेरों में खो जाता है। इसलिए गुण और धर्म के बिना जीने वाले मनुष्य का जीवन संसार में व्यर्थ हो जाता है।
            मानव जीवन की ऊँचाइयों को छूने वाला सफल व्यक्ति सबका प्रिय बनता है। वह समाज को उचित मार्गदर्शन देता है। उसके दिखाए गए मार्ग पर चलकर आने वाली पीढ़िया भी स्वयं को धन्य मानती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 14 मई 2026

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति के लोग जब किसी को बर्बाद करने लग जाऍं तब विनाश होना निश्चित है। इस कथन का अर्थ है कि इन्सान इन्सान का शत्रु बन जाए या शेर ही शेर का दुश्मन जाए (यानी एक ही प्रकार या जाति का पशु) अथवा एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएँ तब उनका बच पाना वाकई कठिन हो जाता है। इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। यह कथन सर्वथा सत्य है। किसी जाति का विनाश दूसरे लोग कम करते हैं। अपने ही किसी से जाति का विनाश कर दिया जाता है।
             दूसरा कोई यदि अहित करने की सोचेगा तो अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार उसका प्रतिकार किया जा सकता है। परन्तु जब अपने ही लोग पीठ में खंजर घोंप दें यानी धोखा देने लग जाएँ तब बचना नामुमकिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि वे हमारी अच्छाइयों, बुराइयों और कमजोरियों को भली-भाँति जानते हैं।   
          'कामन्दकीयनीतिसार' ग्रन्थ में इसी तथ्य को कवि ने उदाहरण सहित हमें समझाया है-
        विषं  विषेण  व्यथते  वज्रं  वज्रेण  भिद्यते।
        गजेन्द्रो      दृष्टसारेण     गजेन्द्रेणैव     च॥
        मत्स्यो मत्स्यमुपादत्ते ज्ञातिर्ज्ञातिमसशयम्।
        रावणोच्छिद्यत्तये  रामो  विभूषणमपूजयत्॥
अर्थात् विष से विष का नाश होता है, वज्र से वज्र का भेदन होता है, गजेन्द्र गजेन्द्र के द्वारा बन्धन में आता है, मछली को मछली ही निगलती है। निस्सन्देह जाति का विनाश जाति के द्वारा ही होता है। राम ने रावण के विनाश के लिए विभीषण का ही सत्कार किया।
              दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह श्लोक हमें चेताने का यत्न कर रहा है कि जहर को जहर काटता है। वज्र को वज्र काटता है, इसे ऐसे भी कह सकते है कि लोहे को लोहा काटता है। हाथी को पकड़ने के लिए महावत हाथी का इस्तेमाल करता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। ये सभी जातियाँ अपनी दुश्मनी खुद ही निभाती हैं। इसी प्रकार एक कुत्ते के क्षेत्र में यदि कोई अन्य कुत्ता आ जाता है तो अपने एरिया से वे उसे बाहर निकाल कर ही चैन लेते हैं।
          आगे और भी सटीक उदाहरण देते हुए कवि ने कहा है कि अपने शत्रु रावण का वध करने के लिए भगवान राम को भी विभीषण की सहायता लेनी पड़ी। तभी तो बड़े-बजुर्ग कहते हैं घर का भेदी लंका ढाए। इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं इस प्रकार के उदाहरणों से जहाँ इन जैसे विभीषणों और जयचन्दों ने बड़े-बड़े साम्राज्यों का विनाश करवा दिया। तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने ही देश को शत्रुओं के हाथों सुपुर्द करने में उनकी सहायता की। उनके समक्ष सारे रहस्यों का उद्घाटन किया। अनेक मासूम लोगों को मौत की नींद सुलाते हुए न तो उन्हें किसी से डर लगा और न ही उनके मन ने उन्हें कचोटा। 
             सृष्टि की रचना करते समय उसमें सभी जीवों में तालमेल बना रहे, इसका ध्यान ईश्वर ने रखा था। जीव-जन्तुओं की अधिकता न हो जाए, इसलिए शायद यह विधान बनाया कि अपनी जाति ही उसके विनाश का कारण बन जाए। पशुओं की आबादी बहुत अधिक न हो जाए इसलिए शेर, लोमड़ी, सियार आदि मांसाहारी हिंसक पशु बनाए। इसी प्रकार समुद्र में जन्तुओं का सामंजस्य बना रहे इसलिए बड़ी हिंसक मछलियाँ बना दीं। इसी प्रकार सभी जीवो की बुद्धियों को बना दिया कि वे अपनी जाति के विनाश का कारण बन जाएँ।
          मनुष्य जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है उसकी बुद्धि को भी ऐसा बना दिया कि वह अवसर आते ही दूध की तरह फट जाती है और सभी अनर्थों का मूल (जड़) बन जाती है। अपनी मूर्खताओं के कारण शत्रु राज्यों को अपने गुप्त रहस्यों को देकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारता है। देशद्रोही बनकर सबकी नफरत और नाराजगी मोल लेता है। अन्ततः मनुष्य न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सलाखों के पीछे चला जाता है।
          प्रकृति का अत्यधिक दोहन करके और उसे दूषित करके मनुष्य अपने रास्ते में खड्डे खोदता है। समय बीतते भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता देकर वह अनेक मनुष्यों के विनाश और उनके दरबदर होने का कारण बन‌ जाता है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में मनुष्यों के साथ हम अन्य जीवों के विनाश का कारण भी बन जाते हैं। ऐसी आपदाओं के समय जान और माल की बहुत हानि होती है। उससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं।
          अपनी जाति को विनाश से बचाने के लिए मनुष्यों को सदा सकारात्मक कार्य करने चाहिए। उसे अपने विवेक का आश्रय लेकर मानव जाति की भलाई के कार्य करने चाहिए। पशु-पक्षियों की तो बुद्धि ऐसा नहीं सोच सकती। परन्तु मनुष्य को तो ईश्वर ने बुद्धि का वरदान दिया है, उसे तो सावधान होना चाहिए। अपनों से शत्रुता न करके उनके लिए सम्वेदनशील होना चाहिए। यथासम्भव उनकी भलाई के कार्य करने चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 13 मई 2026

सोने का ढोंग करने वाले

सोने का ढोंग करने वाले 

व्यक्ति यदि गहरी नींद में सो रहा हो तो उसे जगाया जा सकता है परन्तु जो सोने का ढोंग कर रहा हो (मचला बन जाए) तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी जगा नहीं सकती। उसके कानों के पास यदि ढोल भी बजाया तब भी उसकी नींद नहीं खुलेगी, वह नहीं जागेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि सोने वाले व्यक्ति को जगाया जा सकता है पर जो जाग रहा हो और जानते-बूझते सोने का दिखावा कर रहा हो तो उसे जगाना वाकई टेढ़ी खीर होती है। ईश्वर ही उसका मालिक होता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं किसी विषय की जानकारी न होना कोई अपराध नहीं होता। इस कारण अपने मन में हीन भावना नहीं आने देनी चहिए। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। जानकर या समझकर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और स्वयं को ज्ञानवान बनाया जा सकता है। उसके पश्चात सही रास्ते पर चलकर ही वास्तव में मनुष्य सफलता की ऊँचाइयों को छूने में समर्थ हो सकता है। इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
          इसके विपरीत जो मनुष्य किसी विषय को जानता है और समझता है पर फिर भी अज्ञानी बनने का प्रदर्शन करता है, गलत रास्ते का चुनाव करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में कोई और नहीं हो सकता। ऐसे लोगों से सदा ही सावधान रहना आवश्यक होता है। ये लोग स्वयं अपना नुकसान तो करते हैं पर दूसरों को बर्बाद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। इन‌ लोगों से दूरी बनाना मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। 
            हम सब जानते हैं कि घर, परिवार, धर्म, देश अथवा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण न करने वालों को सभी हेय समझते हैं। कदम-कदम पर उन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को अपने जीवन में नाकामयाब होने का मेडल मिलता है जिसे उन्हें सारा जीवन ढोना पड़ता है। उनके भाई-बन्धु भी ऐसे लोगों से नाराज होकर शीघ्र ही उनसे किनारा कर लेते हैं। वे स्वयं को उनके साथ रहकर तिरस्कृत होना पसन्द नहीं करते।
          समाज में रहते हुए जब सामाजिक व्यवस्था पर कुठाराघात किया जाता है तब वह चरमराने लगती है। उसका प्रभाव पूरे समाज पर ही पड़ता है। समाज में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का माहौल बनने लगता है। हर व्यक्ति दूसरे को सन्देह की नजर से देखने लगता है। इस प्रकार वातावरण दूषित हो जाता है, उसमें हर सहृदय व्यक्ति को बहुत घुटन महसूस होने लगती है। वह ऐसी स्थिति में अन्यत्र कहीं जाने के लिए बेचैन होने लगता है।
          जानते-बूझते हम दुनिया की अन्धी दौड़ में शामिल हो जाते हैं। जब अपनी आर्थिक, शारीरिक, बौद्धिक अथवा अन्य क्षमताओं में कमजोर होने को हम अनदेखा कर बैठते हैं तब हमें मुँह की खानी पड़ती है। उस समय चारों खाने चित्त होकर हम निराशा का लबादा ओढ़ लेते हैं। हम लोगों से सहानुभूति की आशा करते हैं पर वे हमारा उपहास करते हैं कि हमने अपनी क्षमताओं को जानते हुए भी कुँए में छलाँग लगा दी। तब हम दोषी करार किए हुए कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
            हम जानते हैं कि रात को जल्दी सोना और प्रात: जल्दी उठना स्वास्थ्यवर्धक होता है फिर भी हम लेट नाइट पार्टियाँ करते हैं। हर प्रकार के स्वास्थ्य के नियमों को धत्ता बताकर ऊल-जलूल खाते हैं। जब रोग हल्ला बोलते हैं तो डाक्टरों के पास जाकर मेहनत की कमाई और समय दोनों बरबाद करते हैं।
          हम सब इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि आलस्य करने से हम उन्नति नहीं कर सकते बल्कि पिछड़ जाते हैं पर फिर भी उसे गले लगाकर आनन्दित होते हैं। पढ़ने की आयु में जब कैरियर बनाने का समय होता है तब स्कूल-कालेज बंक करके हीरो बनते हैं। बताइए हो गया न सब गुड़ गोबर।
          अपने अन्तस् में विराजमान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी शत्रुओं और बाहरी शत्रुओं से हमारी गहरी छनती है। तब असफलताओं को हम अनजाने में ही दावत दे देते हैं और फिर अपनी हार पर रोते हैं। सारी दुनिया को पानी पी-पीकर कोसते हैं कि किसी से हमारी खुशी सहन नहीं होती। जब तक हम इन शत्रुओं के जाल से नहीं बचेंगे तब तक हमारा उद्धार नहीं हो सकता। इस बात को जितना जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम सुखी रहेंगे।
            हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं ही होते हैं। यदि हम जागते रहते है यानी कि सचेत रहते हैं तो हम निश्चित ही महान कार्य करते हुए विश्व में अपना एक स्थान बना सकते हैं। इसके विपरीत समझते हुए भी सोने का उपक्रम करते है यानी अनजान बनने का ढोंग करते हैं तो पतन निश्चित होता है। असफलता हमारा स्वागत करने के लिए तैयार बैठी रहती है। इसलिए सदा ही सावधानी बरतनी चाहिए। किसी के जगाने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 12 मई 2026

नीति वचन

नीति वचन 

नीति-कथाओं का संग्रह 'हितोपदेश' नामक ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने मनुष्यों के लिए नीतिपूर्ण बातें लिखी हैं। निम्नलिखित श्लोक में उन्होंने प्रिय व्यक्ति, सत्कर्म, अच्छी पत्नी, बुद्धिमान व्यक्ति, लक्ष्मी, मित्र और पुरुष इन सबके विषय में बहुत सुन्दर विवेचना की है-
      स स्निग्धोSकुशलान्निवारयति 
                    यस्तत्कर्म यन्निर्मलम्।
       सा स्त्री यानुविधायिनी स 
                ‌मतिमान्य: सद्भिरम्यर्च्यते॥
       सा धीर्या न मदं करोति स 
                 सुखी यस्तृष्णया मुच्यते।
        तन्मित्रं  यदकृत्रिमं  स  पुरुषो 
                   य:  खिद्यते  नैन्द्रियै:॥      
अर्थात् प्रिय व्यक्ति वही होता है जो अमंगल का निवारण करता है, सत्कर्म वही है जो निर्मल है, पत्नी वही है जो अनुगामिनी है, बुद्धिमान वही है जो सज्जनों के द्वारा पूजित होता है, लक्ष्मी वह है जो मद उत्पन्न न करे, सुख वही है जो तृष्णा से विमोचित करे, मित्र वही है जो अकृत्रिम (बिना दिखावे का) है और पुरुष वही है जो इन्द्रियों के वश में नहीं है।
            प्रिय व्यक्ति दूसरों का हित करने वाला होता है। वह अपने प्रियजनों की हर अमंगल से रक्षा करता है। वह नहीं चाहता कि उसके प्रियजन किसी भी कारण से दुख पाएँ या उनको जीवन में कभी गर्म हवा की तपिश सताए। वह सदैव उनके जीवन में खुशियाँ लाने का यथासम्भव प्रयास करता है। व्यक्ति प्रिय तभी बनता है जब वह निस्वार्थ भाव से अपने बन्धु-बान्धवों के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन-रात कार्य करता है। उनके मंगल की कामना करता हुआ उनके सुख-दुख में हर समय साथ निभाता है।
             सत्कर्म वही कहलाते‌ हैं जो निर्मल हैं यानी अन्त:करण को शुद्ध और पवित्र करने वाले हों। रैदास जी ने कहा था -
          मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मनुष्य का मन शुद्ध, पवित्र और निष्कपट है तो घर पर या अपने कार्यस्थल पर ही ईश्वर की प्राप्ति और पुण्य मिल सकता है, तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं। इसका भाव है कि आन्तरिक पवित्रता ही सबसे बड़ी भक्ति है, बाहरी आडम्बर नहीं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सत्कर्म करने वाला अपने इहलोक और परलोक दोनों को सुधारता है। उसके मन में कभी कुमार्ग की ओर प्रवृत्त होने के विषय में सोच ही नहीं सकता।
           पत्नी वही है जो अनुगामिनी है अर्थात् अपने जीवन साथी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चले। उसके सुख-दुख के समय उसकी परछाई बनकर रहे। अपने व्यवहार से कभी ऐसा प्रदर्शन न करे कि वह अपने पति के घर में सामंजस्य नहीं बिठा सकती। वही पत्नी भाती है जो गृहस्थी को कुशलता से चलाए। घर चलाने की उसकी कुशलता उसे ‌विशेष बनाती है। अपने परिवारी‌ जनों के साथ उसे सदा‌ यथायोग्य व्यवहार करना‌ चाहिए।
            बुद्धिमान वह मनुष्य कहा जाता है जो सदा सज्जनों के द्वारा पूजित होता है। अपने विवेक के कारण सदा सत्संगति में रहता है। हर प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ, उसे विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना भी बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं। उसे सभी लोगों के साथ सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखना चाहिए।
             लक्ष्मी के विषय में हम सभी जानते हैं कि वह एक स्थान पर टिककर नहीं रह सकती। आज यहाँ है तो पलक झपकते ही वहाँ यानी अन्यत्र पहुँच जाती है। राजा को रंक बनाने और रंक को राजा बनाने की भरपूर क्षमता रखती है। गलत तरीके से धन कमाने पर अपने साथ व्यसनों को भी लेकर आती है। मनुष्य को आसमन से जमीन पर पटकना इसे बखूबी आता है। इसलिए मनुष्य को अपने धन और वैभव पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी वही है जो मद उत्पन्न न करे।
          सुख वही कहलाता है जिससे तृष्णा दूर रहे। यदि एक के बाद एक तृष्णा मनुष्य को घेरे रखेंगी तो वह कोल्हू के बैल की तरह अपना सुख-चैन गॅंवाकर दिन-रात परिश्रम करता रहेगा। फिर भी कोई-न-कोई तृष्णा उसे भटकाती ही रहेगी। सुख की चाह रखनी हो तो तृष्णाओं का त्याग करना पड़ता है। यदि जीवन में सुख की कामना हो तो मनुष्य को सन्तोष रखना चाहिए। जो उसके पास है, उसी में सुख की तलाश करनी चाहिए।
             मित्र उसे कहते है जो आडम्बर रहित, सरल व निश्छल होता है। वह सदा अपने मित्र का हितचिन्तक होता है। उसके लिए हमेशा शुभ करने वाला और सोचने वाला होता है। सुख-दुख के समय अपने मित्र के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर वह खड़ा रहता है। वह पीठ पीछे भी अपने मित्र की बुराई नहीं करता। मित्र के विषय में मनीषी‌ कहते हैं कि वह श्मशान तक‌ साथ निभाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मित्रों की मित्रता जीवन भर चलती है। मृत्यु के अतिरिक्त उन्हें कोई अलग‌‌ नहीं कर सकता।
            मनीषियों का कथन है कि वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जिसे अपने ऊपर संयम है। वह कदापि इन्द्रियों के वश में नहीं होता। वह जानता है कि इन्द्रियों के वश में हो जाने का अर्थ है अपने लक्ष्य से भटक जाना। इनके अधीन होने वाले व्यक्ति को कभी शान्ति नहीं मिल सकती। मनुष्य एक अद्वितीय सामाजिक, बुद्धिमान और तर्कशील प्राणी है जो अपनी उच्च संज्ञानात्मक क्षमताओं के कारण अन्य जीवों से भिन्न है। वे आत्म-जागरूकता, नैतिक मूल्यों, जटिल उपकरणों के निर्माण और संस्कृति के विकास में सक्षम हैं। 
          ‌‌    हितोपदेश के इस श्लोक में बताए गए नीतिपूर्वक वचनों के अनुसार व्यवहार करने वाले ही वास्तव में जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। इन बातों का ध्यान रखने से मनुष्य सदा ऊँचाइयों को छूता है।
चन्द्र प्रभा सूद