मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव
मनुष्य को ईश्वर ने इस सृष्टि का सबसे अधिक समझदार जीव बनाया है। बुद्धि का उपहार देकर इतनी उसे सामर्थ्य दे दी है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। यदि वह सकारात्मक रुख रखता है तो चमत्कार कर देता है। इसके विपरीत वह अपने नकारात्मक विचारों के कारण स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थीं। इन्हें आप सबके साथ कुछ वर्तनी संशोधन के पश्चात साझा कर रही हूँ। आशा है आप भी इन्हें आत्मसात करना चाहेंगे।
'नजर रखो अपने विचार पर क्योंकि वे शब्द बनते हैं। नजर रखो अपने शब्द पर क्योंकि वे कार्य बनते हैं। नजर रखो अपने कार्य पर क्योंकि वे स्वभाव बनता है। नजर रखो अपने स्वभाव पर क्योंकि वह आदत बनता है। नजर रखो अपनी आदत पर क्योंकि वह चरित्र बनती है। नजर रखो अपने चरित्र पर क्योंकि वह जीवन का आदर्श बनता है।'
इन पंक्तियों को पढ़ने के पश्चात यही समझ आता है कि मनुष्य जो भी विचार अपने मन में रखता है, उसी के अनुरूप बोलता है और फिर उसे अपने आचरण में ढाल लेता है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह सबको प्रभावित करेगा। निश्चित ही उसे उन सबका समर्थन मिलेगा। उनका मार्गदर्शक बनकर वह समाज में अपना अहं किरदार निभाएगा।
इसके विपरीत नकारात्मक सोच होने पर मनुष्य न सही ढंग से कोई कार्य कर पाता है और न ही किसी को उचित परामर्श दे सकता है। जीवन की बाजी हारने वाला वह इन्सान जीत का जश्न नहीं मना पाता। ऐसे व्यक्ति घर-परिवार और समाज के लिए बोझ के समान बन जाते हैं। उन्हें कहीं पर भी सम्मान नहीं मिल पाता।
मनुष्य के क्रियाकलापों पर उसके विचारों की छाप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। उत्साही मनुष्य सदा सबको प्रेरित करेगा और निरुत्साही व्यक्ति सबको निराश ही करेगा। विवेकी व्यक्ति और अज्ञ व्यक्ति के कार्यो में जमीन और आकाश जैसा अन्तर होता है। जिसका अनुमान हम उनके कार्य-व्यवहार से भलीभॉंति लगा सकते हैं।
चोर व्यक्ति चोरी करना सिखाएगा, भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टाचरण की शिक्षा देगा, धोखेबाज इन्सान धोखाधड़ी सिखाएगा, सदाचरी महापुरुष सदाचरण पर बल देगा। विद्वान व्यक्ति सदा दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य को अपने मन, वचन और कर्म पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसे हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
कहने का तात्पर्य यही है कि जिसके पास जो गुण-अवगुण होंगे, उसीके अनुरूप ही उसका आचरण अथवा स्वभाव बन जाता है। भविष्य में मनुष्य का यह स्वभाव परिपक्व होकर अनजाने ही उसकी आदत बन जाता है। यदि उसमें अच्छी आदतें ढल गयी तो चारों ओर उसकी जय-जयकार होती है। ऐसा मनुष्य सफलता की सीढ़ियों पर सुगमता से चढ़ता जाता है।
यदि गलत आदतें अपना ली गई हों तो लाख कोशिशों के बाद भी वह अपनी आदतों को बदल नहीं पाता। तब उसके कारण उसके भाई-बन्धुओं तथा परिवारी जनों को शर्मसार होना पड़ता है। उनके समझाने पर भी यदि वह अपनी गलत आदतें नहीं छोड़ता तो वे सब उससे किनारा करने लगते हैं। तब वह अकेला हो जाता है। उसके लिए यह बहुत दुखदाई स्थिति होती है।
अपने जीवन का आदर्श ही मनुष्य का चरित्र बनाता है। उसके चरित्र की महानता उसे महान बनाकर ऊपर उठाती है और उसकी चारित्रिक विकृति उसे रसातल की ओर धकेल देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सदैव चरित्र निर्माण पर बल देती है।
जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है तब व्यष्टि का यानी समाज का चरित्र बनता है। समाज के साथ-साथ देश के चरित्र का भी निर्माण होता है। जिस देश का और उसके निवासियों का चरित्र उदात्त होता है, उस देश का गौरवशाली ध्वज सदा ही ऊँचा फहराता है। उस देश की ओर कितना ही शक्तिशाली शत्रु हो, आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। यदि किसी खुशफहमी के कारण ऐसा करने का दुस्साहस करता है तो उस शत्रु को मुँह की खानी पड़ती है।
इस प्रकार विचार, शब्द, कार्य, स्वभाव, आदत, चरित्र और जीवन आदर्श ये सब एक चेन या कड़ी हैं। ये सभी एक ही सूत्र में पिरोए गए हैं। इनका परस्पर अन्तर्सम्बन्ध होता है। इसीलिए विचारों की शुद्धता, सरलता, सहजता पर सयाने बल देते हैं जो सर्वथा समीचीन है और आज भी उतने ही सटीक हैं।
चन्द्र प्रभा सूद