शुक्रवार, 8 मई 2026

मकड़जालों से मनुष्य का वास्ता

मकड़जालों से मनुष्य का वास्ता 

मकड़ी के जाले प्रायः घरों में लगते रहते हैं। हम इनका घर में लगना शुभ नहीं माना जाता। इसके अतिरिक्त दीवार पर लगे जाले घर की खूबसूरती को नष्ट करते हैं। कहते है कि जाले यदि घर में लगे हों तो मनहूसियत फैलाते हैं। इसीलिए जाले दिखते ही हम उनकी सफाई करने के लिए बेचैन हो जाते हैं और उन्हें उस स्थान से हटाकर ही दम लेते हैं। खाली पड़े घरों में तो ये बहुत ही अधिक फैल जाते हैं। मकड़जाल का शाब्दिक अर्थ है उलझन भरी संरचना। मकड़ी का जाला उलझन, फरेब अथवा किसी को फंसाने वाली कोई भी पेचीदा वस्तु या योजना हो सकती है। यानी साजिशों के मकड़जाल में किसी को फँसाना कह सकते हैं।
           मकड़ी के पेट में स्थित विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं जो एक तरल रूप में सिल्क या रेशे का निर्माण करती हैं। यह सिल्क बाद में ठोस रूप में बदल जाता है और मकड़ी के पैरों से बाहर निकलता है जिसे वह जाल बनाने में इस्तेमाल करती है। मकड़ी अपने शिकार यानी छोटे-छोटे कीट-पतंगों को अपने जाल में फंसाने के लिए जाल बनाती है। जाल की विशेष संरचना शिकार को फंसाने में मदद करती है। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने रहने के स्थान के रूप में भी करती हैं। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने अण्डे रखने के लिए भी करती हैं।
            मकड़ी का जाला बहुत मजबूत होता है और इसके रेशे काफी हल्के होते हैं। ये रेशे स्टील से भी मजबूत हो सकते हैं। यह जाल बहुत लचीला और खिंचाव को सहन करने में सक्षम होता है जो शिकार को पकड़ने के दौरान टूटता नहीं है। मकड़ी का जाल उसकी जीवित रहने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह उसकी शिकार करने की विशेष विधि को दर्शाता है।
          जंगलों में भी मकड़ियाँ अपने जाले बनाती रहती हैं। इन जालों से बचकर ही सब लोगों को निकलना पड़ता हैं। यदि शरीर या चेहरे को ये छूते हैं तो हम एक अजीब तरह की उलझन का अनुभव करते हैं। उनसे पीछा छुड़ाने का भरसक प्रयास भी करते हैं।
            मकड़ी की कारीगरी की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी। इतनी खूबसूरती से वह अपने जाले बुनती हैं। यदि उस बुनावट को निहारने लगो तो नजर  उस पर से हटती नहीं है। मन हैरान रह जाता है मकड़ी के कौशल को देखकर। यह जाल जो मकड़ी बुनती है उसमें अपने शिकार यानी कीट-पतंगो को फंसाकर अपना पेट भरती है।
            जाल कितना भी आकर्षक हो अथवा खूबसूरत क्यों न हो इसमें फंसने वाले को कभी भी राहत नहीं मिल सकती। मनुष्य को मकड़ी के जाल से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि किसी प्रकार के जाल में भी वह नहीं फंसेगा फिर वह चाहे कितना ही मनमोहक हो।  
            संसार में रहते हुए मनुष्य को इस तरह के मकड़जालों से प्रतिदिन ही वास्ता पड़ता रहता है। कभी मोहमाया के जाल उसे लुभाते है तो कभी सुविधाभोगी होने के कारण शार्टकट का मार्ग। कभी-कभी वह जान-बूझकर अन्न की तलाश में भटकते हुए कबूतरों की तरह स्वयं ही इन जालों में फंसकर असहाय अनुभव करता है। कभी-कभी अनजाने में फंसकर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता है। 
            यदि मनुष्य की इच्छा शक्ति दृढ़ हो तो वह संसार के किसी प्रलोभन देने वाले जाल का तिरस्कार कर सकता है और उसमें फंसता नहीं है। परन्तु कमजोर मानसिकता वाले मनुष्य क्षणिक लाभ के लिए इस जाल में फंसकर अपना जीवन नरक के समान कष्टदायी बना लेते हैं। उस समय ऐसी भयंकर भूल के लिए उनके पास पश्चाताप करने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं बचता।
            शिकार करने वाले शिकारियों का तो काम ही होता है दाना डालने का और जाल बिछाने का। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उन शिकारियों के जाल में न फंसने के उपाय ढूँढ निकालें और उन्हें दूर से ही बॉय-बॉय करते हुए हँसते हुए सुरक्षित रहें।
          इस संसार में जितने भी लुभावने जाल हैं वे मनुष्य को पागल बना देने के लिए पर्याप्त हैं। सच्चाई का रास्ता लम्बा और पथरीला होता है पर यह आकर्षण वाला मार्ग दूर से सुहावना प्रतीत होता है और उस पर चलने वाले को लहुलूहान कर देता है। यहाँ दया अथवा करुणा की कोई भी गुँजाइश नहीं होती।
            मकड़ी जिस प्रकार जाला बनाकर उसके तन्तुओं से स्वयं को समेट लेती है अर्थात् अपने आप को छिपा लेती है, उसी प्रकार तन्तु रूप मायाजाल अथवा सृष्टि की रचना करके ईश्वर भी स्वयं को अपनी इच्छा से आच्छादित कर लेता है यानी स्वयं को समेट लेता है। परमेश्वर और उसकी रचना को समझने के लिए ही 'मुण्डकोपनिषद्' के प्रथम मुण्डक में मकड़ी का उदाहरण दिया गया है। फिर उस प्रभु को पाने के लिए अनेकानेक यत्न करने पड़ते हैं। वही जीव को चौरासी लाख योनियों में भटकने से बचाकर, जन्म-मरण के इन बन्धनों से स्वतन्त्र करके मोक्ष प्रदान कर सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 7 मई 2026

मित्रता को कसौटी पर परखें

 मित्रता को कसौटी पर परखें

मित्रता सदा जाँचकर और परखकर ही करनी चाहिए। मित्र अपने मानसिक स्तर के अनुरूप तो कम-से-कम होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ऐसे लोगों से दोस्ती कर ली जाए जिससे कि उन दोस्तों के कारण जीवन में कभी पछताना पड़े अथवा शर्मिन्दा होना पड़े। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके दोस्ती ऐसे व्यक्ति से ही करनी चाहिए जो हर प्रकार से योग्य हो, विश्वसनीय हो और हितचिन्तक हो अथवा सज्जन हो।
             मित्रता मानव जीवन का एक अनिवार्य और अमूल्य भाग है जो भावनात्मक समर्थन, खुशी और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देती है। सच्चे मित्र कठिन समय में सहारा बनते हैं, तनाव कम करते हैं और व्यक्तिगत विकास में सहायता करते हैं। यह रिश्ता विश्वास, आपसी सम्मान और निस्वार्थ प्रेम की नींव पर टिका होता है। 
              वास्तव में मित्र वही होता है जो माता के समान मनुष्य की रक्षा करता है, पिता की तरह उसे हितकारक कार्यों में लगाता है। कुमार्ग पर जाने पर डाँटकर लौटाकर ला सकता है। सच्चा मित्र किसी भी परिस्थिति में साथ नहीं छोड़ता। वह हर दुख-सुख में सबसे पहले कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़ा मिलता है। 
            वह इससे अनजान रहना चाहता है कि उसका मित्र अमीर है या गरीब। मित्रता के रास्ते में स्टेटस आड़े नहीं आता। वह मित्र को उसके धर्म अथवा जाति से नहीं बल्कि अपनेपन के कारण पहचानता है। इसीलिए भगवान कृष्ण और गरीब ब्राह्मण सुदामा की मित्रता से बड़ा और कोई उदाहरण हो ही नहीं सकता।
            सज्जन व्यक्ति के साथ मित्रता को हम गन्ने के समान मान सकते हैं। गन्ना जिसे हम पूजा में रखते हैं और उससे बनी चीनी से तैयार स्वादिष्ट पदार्थ खाकर जीवन का आनन्द लेते हैं। उसे कितना ही तोड़ लो, छील लो, चूस लो, यहाँ तक कि उसे मशीन में डालकर पीस ही डालो, वह हर बार केवल अपनी मिठास से ही हम सबको निहाल करता है। यानी हर रूप में गन्ना मिठास ही देता है। वह मिठास हमारे अनेक भोज्य पदार्थों को रसीला और स्वादिष्ट बनाती है। उन मनभावन व्यंजनों को खाकर हम सभी तृप्त हो जाते हैं।
            मित्र की मित्रता भी इसी तरह होती है जो मनुष्य को अपनी मिठास से सराबोर करती है। फूल की तरह यह नाजुक और सुगन्ध देने वाली होती है। इस मित्रता को विश्वास और सच्चाई की खाद से पुष्ट करना चाहिए और स्नेह के जल से सींचना चाहिए। तभी यह दोस्ती पुष्पित और पल्लवित होती है जिसकी खुशबू चारों ओर फैलती है। इस मित्रता को देखकर किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है।
          मित्रता में यदि विश्वास को तोड़ा जाए अथवा झूठ, छल-फरेब घर कर जाएँ तो इसमें दरार आ जाती है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी अनमोल दौलत को कोई भी नहीं खोना चाहेगा। इसे खोने का अहसास ही बहुत कष्टदायी होता है। इसलिए सच्चे मित्रों से किसी भी परिस्थिति में किनारा नहीं करना चाहिए और न ही दोस्तों के रास्ते में काँटे बिछाने के विषय में सोचना चाहिए।
           बचपन में जब बच्चा मित्रता के मायने नहीं समझता, उस समय वह अपने पास आने वाले हर किसी को अपना दोस्त मान लेता है यानी जो उससे बात करता है या उसके साथ खेलता है अथवा अपने खिलौने आदि शेयर करता है।
            वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब वह समझदार बन जाता है। उस समय उसे अपने विवेक से मित्रों का चुनाव करना चाहिए। यथासम्भव चापलूस लोगों को अपने से सदा दूर रखना चाहिए। क्योंकि वे स्वार्थवश साथ जुड़ते हैं और अपनी स्वार्थ की पूर्ति होते ही वे पराए हो जाते हैं। ऐसा करके उस समय लगने वाले मानसिक आघात से बचा जा सकता है।
         मित्रता स्वार्थरहित प्रेम और भरोसे का एक अनमोल रिश्ता है जो सुख में प्रसन्नता को दोगुना कर देता है और दुःख में उसे आधा कर देता है। सच्चा मित्र जीवन के हर मुश्किल दौर में छायादार वृक्ष की तरह सहारा बनता है और सही मार्ग दिखाता है। सच्ची दोस्ती सबसे बड़ी दौलत है जो मुसीबत में भी साथ निभाती है। दोस्ती यदि दिल से की जाए तो इसमें कभी भी संदेह की सम्भावना नहीं रहती। सही  मायने में यदि स्वार्थ रहित कन्धा मिल जाए तो फिर मनुष्य के जीवन में कभी कोई गम शेष नहीं रह जाता।
          मित्र वास्तव में श्मशान तक का साथ निभाने वाला होना चाहिए तभी जीवन का आनन्द बना रहता है। आज के भौतिक युग में सच्चा, निस्वार्थ मित्र मिलना किसी खजाने को पाने से कमतर नहीं है। मनुष्य का सौभाग्य होता है तभी उसे ऐसा साथी मिलता है। ऐसे रत्न को सम्हालकर रखना चाहिए जो दुनिया की भीड़ में बिना किसी हील-हुज्जत के हाथ थामकर आगे जाने में समर्थ हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 5 मई 2026

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाने का अर्थ होता है अपने अहंकार को त्याग करके पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ प्रभु पर भरोसा करना। परमात्मा ने सभी जीवों को इस संसार में भेजा है। सदा उसका धन्यवाद करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारी परेशानियाँ धीरे-धीरे खुशियों में बदल जाती हैं। खामोशी से यदि उनका सामना किया जाए तो वे सामान्यत: कम हो जाती हैं। इससे सांसारिक तनाव कम हो जाता है। धैर्य धारण करने पर समय बीतते-बीतते वे समाप्त होने लगती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की शरण में किस प्रकार जा सकते हैं? 
              इसका कारण है कि भक्त को भरोसा होता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है। जीवन में परेशानियाँ चाहे कितनी भी क्यों न आ जाएँ यदि उनके बारे में सदा चिन्ता ही करते रहो अथवा सोचते रहो तो वे कम होने के स्थान पर बढ़ने लगती हैं। ऐसा करके मनुष्य अपने ही चारों ओर उदासियों का एक घेरा बना लेता है। फिर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता हुआ हार-पैर मारता रहता है। मनुष्य सदा सफल हो जाएगा, ऐसा आवश्यक नहीं होता।
          मनुष्य के जीवन में अनेकानेक परेशानियाँ एक के बाद एक करके आती रहती हैं। वह अपने गिरते स्वस्थ्य या किसी बीमारी से आक्रान्त होने पर जिसका इलाज सम्भव नहीं से व्यथित होता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के आपसी वैमनस्य या दुर्व्यवहार को देखकर दुखी होता है। कभी वह अवज्ञा करने वाले बच्चों के कुमार्गगामी हो जाने के कारण टूटने लगता है। अपने आर्थिक हालातों के कारण मनुष्य अनमना-सा रहता है। 
             अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली कठिनाइयों को सहने में अक्षम हो जाता है। ऐसे हालात जब बन जाते हैं तब उस गम के कारण उसके होंठ सिल जाते हैं और वह अपनी परेशानी को किसी से कह नहीं पाता। उसके मन में यह डर घर कर जाता है कि लोग उसके विषय में जानकर क्या सोचेंगे? यदि वह अपनी  परेशानी किसी को बताएगा तो लोग पीठ पीछे उसका उपहास करेंगे। यदि मनुष्य अपनी सभी परेशानियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे उनके बारे में हमेशा सोचने के स्थान पर, उनका डटकर सामना करते हुए, उन्हें दूर करने का उपाय करना चाहिए।
            मनुष्य को किसी इन्सान के दुख का कारण नहीं बनना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को दुख के सागर में धकेलने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए। इन्सान कितना भी अच्छा क्यों न हो उससे कभी-कभी भूल तो हो ही जाती है। उसे उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए और दूसरे के दुख को कुछ हद तक कम करने के लिए क्षमायाचना अवश्य कर लेनी चाहिए।
          दूसरे के मन में इससे कितना गहरा घाव हो जाएगा इसका अनुमान भी लगाया नहीं जा सकता। जैसे समुद्र में पत्थर फैंकने पर यह कोई भी नहीं जान सकता कि वह फैंका गया पत्थर वहाँ कितनी गहराई में उतर गया होगा। उसी प्रकार मनुष्य के मन की टीस का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। पीड़ित व्यक्ति के मन से निकलने वाली आह किसी को भी नष्ट कर सकती है।
          परेशानियों से बचने के लिए हमेशा अच्छे कार्य करने का यत्न करना चाहिए। भलाई के कार्य करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। मनुष्य की चाहे प्रशंसा हो या न हो उसे अपने सच्चाई के रास्ते से दूर नहीं जाना चाहिए। इस तरह करने से मन को शान्ति मिलती है और वह अपने दुखों को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। ऐसा करने से मनुष्य को अपने जीवन को समझ आती है।
             हमें नित्य ईश्वर के साथ संवाद करना चाहिए और प्रतिदिन उसे स्मरण करते हुए उसके साथ समय बिताना चाहिए। अपने अहंकार का त्याग करके नि:स्वार्थ भाव से प्रभु को सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। अपने जीवन, सुख-दुख और चिन्ताओं को भगवान को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है। जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं तो हमारा हृदय प्रेम और शान्ति से भर जाता है। ईश्वर को अपना मानने वाले कभी निराश नहीं होते। दुख और विपत्ति के समय में भी हम मनुष्य सुरक्षित अनुभव करते हैं। भगवान की शरण में जाने पर जीवन से मृत्यु और असफलता का भय दूर हो जाता है।
              दुखों और परेशानियों को दूर करने के लिए ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए मनुष्य को सदा अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहकर अपने कष्टों को भोगने के लिए उचित मार्ग की तलाश करनी चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को सहारा मिलता है। उचित मार्गदर्शन और आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त करने का यह एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 4 मई 2026

बार-बार चेतावनी देता शरीर

बार-बार चेतावनी देता शरीर 

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना इस प्रकार की है कि इसमें कोई कमी ढूँढने से भी नहीं मिल सकती। इसे इस प्रकार से मालिक ने बनाया है कि अपनी आवश्यकता के सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों का निर्माण यह स्वयं कर लेता है। जिन-जिन तत्त्वों की इसे जरूरत नहीं होती उन्हें इस शरीर से बाहर निकाल फैंकता है। यह स्वयं ही अपना सुधार कार्य करने में समर्थ है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब नीरोग रहने के लिए यह सारा निर्माण कार्य कर सकता है तो फिर यह बार-बार रोगी क्यों होने लगता है?
            इस प्रश्न के उत्तर में मात्र यही कह सकते हैं कि यह स्वयं रोगी नहीं होता। इसे हम अपनी मूर्खता से रुग्ण बना देते हैं। अब आप कह सकते हैं कि मैंने कितनी हास्यास्पद बात कही है। कौन व्यक्ति होगा जो रोगी बनकर कष्ट उठाना चाहता है? कौन अपने धन और समय दोनों ही की बर्बादी करना चाहता है? कौन डाक्टरों के चक्कर लगाना चाहता है?
            इन सभी प्रश्नों के उत्तर में मैं फिर वही कहूँगी कि हम स्वयं ही इस सबके उत्तरदायी हैं। हम अपनी नादानी के कारण रोगी बनकर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हैं और अपना समय व धन दोनों ही को व्यर्थ गंवाते हैं।
             हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सदा लापरवाह रहते हैं। अथवा यूँ कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हम उसकी ओर बिल्कुल ही ध्यान ही नहीं देते हैं। हम स्वयं ही अपने सबसे बड़े दुश्मन बनते हैं। हमारा आहार-विहार, हमारे तौर-तरीके अथवा हमारी जीवन शैली सभी पूर्णरूपेण दोषपूर्ण है। इसके लिए कोई अन्य नहीं, हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
            स्वस्थ रहने के बेसिक नियम हैं कि समय पर सोओ और जागो, समय पर भोजन करो, प्रतिदिन सैर करने जाओ और व्यायाम करो। हम इन मूलभूत नियमों को अपनी व्यस्तता का बहाना बनाते हुए अनदेखा कर देते हैं।
              जिस रोटी को कमाने के लिए सारे प्रपंच रचते हैं, झूठ-सच करते हैं, पाप-पुण्य के कार्य करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। समय-असमय खाने से भोजन ठीक से नहीं पचता और हम परेशानी में आ जाते हैं। हमारी सारी पार्टियाँ रात देर तक चलती हैं, शादियों में बारातें भी आधी रात में पहुँचती है। स्वाभाविक है कि हम देर रात घर लौटेंगे और देर से ही सोएँगे। इसलिए प्रात: भी देर से ही जागेंगे। नाइट शिफ्ट वाली नौकरी भी इसका एक कारण कही जा सकती है। सारा दिन शरीर अलसाया-सा टूटता हुआ रहेगा। उसमें स्फूर्ति नहीं रह सकती।
            अपनी व्यस्त जीवनचर्या में हम अपने खान-पान को सुधार नहीं पाते। न चाहते हुए भी मोटापे के शिकार होते जाते हैं जो सब बिमारियों का मूल कारण है। इन सबके अतिरिक्त हमारे शौक अथवा अपनी शान बघारने के लिए पार्टियों में पी जाने वाली शराब अथवा अन्य किसी प्र्कार के नशीले पदार्थों का सेवन भी शरीर को खोखला बनाता जा रहा है। सारा समय की जाने वाली टेंशन भी शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है।
            हमें अपनी ऋतुचर्या के विषय में तो शायद ज्ञान ही नहीं है। हम नहीं जानते कि किस मौसम में क्या खाना चाहिए और क्या पहनना चाहिए? यह अज्ञानता भी हमारे अस्वस्थ होने का एक प्रमुख कारण हैं। जंक फूड भी हमारी अस्वस्थता का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। सभी समझदार और डाक्टर लोग हमें समय-समय पर चेताते रहते हैं पर हम हैं कि उस शिक्षा पर अमल न करने की कसम खाए बैठे हैं। तब इसका खामियाजा हम बीमार पड़कर चुकाना पड़ता है।
          हमारा शरीर हमें बार-बार चेतावनी देता रहता है और हम अपनी शान बघारते हुए उसे अनदेखा करते रहते हैं। तब फिर उसका परिणाम हमें रोगों से आक्रान्त हो करके भुगतना पड़ता है। यदि वास्तव में हम अपना मित्र बनना चाहते हैं तब हमें स्वयं से शत्रुता निभाना छोड़कर स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना पड़ेगा अन्यथा रोगो की चपेट में आकर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपने बहुमूल्य समय और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को व्यर्थ ही गंवाना पड़ेगा।
            कभी-कभी पर्याप्त आराम के बाद भी महसूस होने वाली थकान एनीमिया, थायराइड या हृदय रोग का संकेत हो सकता है। इसी प्रकार बिना कोशिश किए वजन का तेजी से घटना या बढ़ना थायराइड या कैंसर की चेतावनी हो सकता है। सीने में जकड़न या सॉंस का फूलना हृदय सम्बन्धी समस्याओं के गम्भीर संकेत हो सकते हैं। मखमली काले धब्बे, नए या बदलते तिल और त्वचा का पीला पड़ना त्वचा में बदलाव के संकेत होते हैं।
          बार-बार पेट फूलना, कब्ज, या दस्त होना पाचनतन्त्र की गड़बड़ी से होते हैं। अत्यधिक चिन्ता, तनाव या अनिद्र मानसिक और भावनात्मक संकेत होते हैं। धुंधली दृष्टि, आँखों में लगातार खुजली होना या लाली हो जाना आंखों की समस्या के कारण होते हैं। शरीर से मिलने वाले इन संकेतों को 'फायर अलार्म' की तरह समझना चाहिए। यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाकर जॉंच करवानी चाहिए।
           संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शरीर हमें बार-बार थकान, अनिद्रा, अचानक वजन में गिरावट, सिरदर्द, त्वचा की समस्याओं या सीने में दर्द जैसे संकेतों के माध्यम से गम्भीर बिमारियों की चेतावनी देता है। इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि ये तनाव, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, या हृदय रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। समय पर जॉंच और डॉक्टर से परामर्श करके बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 3 मई 2026

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

भारतीय संस्कृति में गृहस्थ जीवन का बहुत महत्त्व है। दो युवा मिलकर जब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं तब उसे चलाने का दायित्व उन दोनों पर होता है यानी पति और पत्नी दोनों का होता है। परन्तु पति प्राय: यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयत्न करता है कि यह तुम्हारा अपना घर है, बच्चे भी तो तुम्हारे हैं और मैं भी तुम्हारा हूँ, तुम जैसे चाहो अपने इस घर को चला सकती हो।
            पति-पत्नी का मुख्य धर्म एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान, विश्वास और सहयोग के साथ गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाना होता है। दोनों का कर्तव्य है कि वे विपरीत परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहारा बनें, सही मार्ग पर चलने में सहायता करें, और नैतिक मूल्यों को बनाए रखते हुए परिवार व समाज के कल्याण के लिए साथ मिलकर कार्य करें। पति को गलत रास्ते पर जाने से रोकना और पतित या गलत रास्ते पर जाने से बचाना पत्नी का दायित्व होता है। 
            पति के साथ सम्मानपूर्वक रहना और घर-परिवार को सुखी रखना भी पत्नी का कर्तव्य होता है। दोनों के निस्वार्थ प्रेम और समर्पण की भावना से घर-परिवार में स्वर्गिक सुख-शान्ति का वातावरण बनता है। वैवाहिक जीवन में प्रेम और सम्मान के साथ एक-दूसरे की जरूरतों को समझना आवश्यक होता है। पति-पत्नी का काम सुख-दुःख में साथ रहकर अपनी जिम्मेदारियों का साझा करना होता है। यह एक-दूसरे को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने का आपसी सम्बन्ध कहलाता है। 
            घर के मुखिया के रूप में परिवार के प्रति अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना चाहिए। पत्नी और बच्चों की शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा करना पति की जिम्मेदारी होती है। पत्नी के विचारों को आदर देना और उससे पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए। पति नामक प्राणी का पत्नी को तथाकथित रूप से महिमा मण्डित करके अपनी जिम्मेदारियों से भागने का यह बहुत अच्छा उपाय है। उस समय का उपयोग वे घर से बाहर जाकर दोस्तों से गपशप करके, मौजमस्ती करके बिताते हैं। घर में क्या हो रहा है? इससे वे अनजान रहना चाहते हैं अथवा बेखबर रहने का ढोंग करते हैं।
            जहाँ तक घर चलाने की बात है, उसके लिए यही कहा जा सकता है कि पति और पत्नी दोनों की समान सहभागिता की आवश्यकता होती है। आज यह ज्वलन्त प्रश्न है कि घर और बाहर दोनों मोर्चों को स्त्री सम्हाल सकती है तो पुरुष क्यों नहीं?आज मंहगाई के दौर में यदि दोनों कार्य न करें तो जरूरतों को पूरा करना कठिन हो जाता है। दोनो घर से एक ही समय पर जाते हैं और संध्या समय भी एक ही समय पर वापिस लौटते हैं। 
            उस समय भी कुछ अपवाद छोड़ दीजिए, प्राय: पुरुष चहते हैं कि वे महाराजा की तरह बैठे रहें और पत्नी उसकी तिमारदारी में जुट जाए। एक गिलास पानी वह खुद होकर न लें और एक कप चाय भी उन्हें टेबल पर बैठे हाजिर हो जाए। यदि ऐसा न हो पाए तब तकरार होने से कोई नहीं रोक सकता। उस समय पुरुष भूल जाता है कि पत्नी भी उसकी ही तरह थकी-हारी आई है। वह भी एक इन्सान है, उसे भी एक गिलास पानी या एक कप चाय की इच्छा हो रही होगी। 
            पत्नी की कमाई पर ऐश करना या हक जताना तो पुरुष का अधिकार है परन्तु उसे उसी के अनुरूप सुख-सुविधा देने के दायित्व से वह भागता फिरता है। यह दोहरा मापदण्ड किसलिए? हमारी समझ से बाहर की बात है। घर की औरत यदि दफ्तर से आकर किचन का कार्य देख रही है तो उसे भी उसका हाथ बटाना चाहिए, इससे उसके सम्मान को कोई आँच नहीं आती। बच्चों को उनकी पढ़ाई में सहायता करना भी उसका उतना ही दायित्व है। पढ़ी-लिखी पत्नी का क्या लाभ यदि वह यह सब काम न कर सके? ऐसा कहकर पुरुष फिर अपने कर्त्तव्यों से पलायन करना चाहता है।
            पति बीमार हो तो चाहता है पत्नी उसकी तिमारदारी करे, उसके आगे-पीछे चक्करघिनी बनी घूमती रहे। परन्तु यदि पत्नी बिमार हो जाए तो वह सोचता है कि वह नाटक कर रही है। उस समय भी पत्नी की ओर से प्राय: पुरुष लापरवाह हो जाते हैं। ऐसे कष्ट के समय वे उसकी सहायता नहीं करते। यदि वह कुछ कह दे तो फिर घर में महाभारत का युद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता। 
             हम सब जानते हैं कि विदेशों में जहाँ काम करने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए वहाँ जाकर दोनों मिल-जुलकर कार्य कर लेते हैं। परन्तु अपने देश में पुरुष घर के कार्य करने में अपनी हेठी समझते हैं। वे बड़े गर्व से कहते हैं कि हमें तो घर का कोई काम करना नहीं आता। देखा जाए तो यह कोई घमण्ड करने वाली बात नहीं। वास्तव में इस विषय पर सीरियस होकर सोचने की बहुत ही आवश्यकता है।
            विशेष रूप से विचार्य है कि जब घर आप दोनों का है तो सभी दायित्व भी आप दोनों के साझे हैं। किसी एक पक्ष को दूसरे का शोषण करते हुए उसे मानसिक आघात नहीं देना चाहिए। पुरुष को अपने श्रेष्ठ होने के पूर्वाग्रह को त्यागकर अपने घर-परिवार के लिए पूर्णरूप से समर्पित रहना चाहिए। तभी गृहस्थी की गाड़ी के दोनों पहिए ठीक से चल पाते हैं अन्यथा मनमुटाव बढ़ते-बढ़ते अबोलापन होने लगता है। धीरे-धीरे अलगाव होने की स्थिति बनने लगती है जो किसी भी तरह समाज में स्वीकार्य नहीं हो पाती।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 2 मई 2026

झूठे अहं से किसी का भला नहीं

झूठे अहं से किसी का भला नहीं 

मनुष्य के मानस पर यह निर्भर करता है कि वह अपने रास्ते में फूल बिछाना चाहता है अथवा काँटे। फूलों की कोमलता, सुन्दरता, आकर्षण और सुगन्ध के कारण हर व्यक्ति उनकी कामना करता है। परन्तु कठोर और दम्भी काँटों से लहुलूहान हो जाने के डर से सभी लोग उनसे बचते हुए किनारा करना चाहते हैं। इसलिए लोग फूलों और कॉंटों में से फूलों का चुनाव करते हैं। वे उन्हें सुगन्ध देते हैं और उनका मन मोह लेते हैं।
             मंगल की कामना करने वाला हर मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य कर जाता है जिनका नुकसान उसे अपने जीवनकाल में उठाना ही पड़ जाता है। कार्य करते समय तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु उसका फल भोगते समय उसे कष्ट होता है।
           बचपन में एक कहानी पड़ी थी जो आज भी उतनी ही सटीक है। एक हाथी प्रतिदिन नदी में स्नान करने के लिए जाता था। उसके रास्ते में एक दर्जी की दुकान पड़ती थी। हाथी को अपनी दुकान के सामने से हर रोज गुजरते हुए देखकर दर्जी के मन में शरारत सूझी। अब इन्सानी दिमाग है तो कभी-न-कभी कोई खुराफात कर ही बैठता है। इस तरह वह अनजाने में अपने लिए परेशानी मोल ले लेता है। उसका परिणाम भोगते समय उसे नानी याद आने लगती है।
           उसने एक दिन अपनी सुई ली और दुकान के सामने से जाते हुए उस हाथी को चुभो दी। अब तो यह नित्य का क्रम बन गया कि हाथी वहाँ से गुजरता और दर्जी उसे सुई चुभो देता। अकारण पीड़ित होते हुए हाथी को उस दर्जी पर क्रोध आने लगा। एक दिन हाथी ने उस शरारत करने वाले दर्जी को सबक सिखाने की सोची।
           फिर क्या था, वह हाथी नदी पर स्नान करने के लिए गया और अपनी सूँड में पानी भरकर ले आया। वापसी पर जब दर्जी की दुकान आई तो उसने सूँड में भरा हुआ सारा पानी वहाँ उड़ेल दिया। हाथी के ऐसा करने पर उस दर्जी की दुकान पर रखे हुए बहुत सारे ग्राहकों के कपड़े खराब हो गए और उसे बहुत नुकसान हो गया। तब उसे पश्चाताप हुआ कि उसने व्यर्थ ही हाथी जैसे शक्तिशाली जीव से पंगा ले लिया।
            तीर जब कमान से निकल जाता है तो उसे लौटाकर नहीं लाया जा सकता। उस समय मात्र पश्चाताप ही शेष बचता है। यही स्थिति उस दर्जी की भी हो गई। अब उसके पछताने से कुछ भी बदलने वाला नहीं था। अपने नुकसान की भरपाई करने के अतिरिक्त उसके पास अब और कोई चारा नहीं बचा था।
          यह कहानी हमें यही समझा रही है कि दर्जी की तरह ही कभी ईर्ष्या से, कभी मौज-मस्ती के कारण और कभी अपनी मजबूरी में हम दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाते रहते हैं। फिर दर्जी की भाँति हानि उठाकर दुखी हो जाते हैं और तत्पश्चात पश्चाताप करते हैं।
            यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि वह जो व्यवहार वह दूसरों के साथ कर रहा है क्या वही व्यवहार वह अपने लिए चाहता है? यदि उसे वह व्यवहार अपने लिए पसन्द है तो फिर सब ठीक है। परन्तु यदि उसे अपने लिए वह व्यवहार नहीं चाहिए तो कहीं-न-कहीं गड़बड़ है। तब उसे दूसरों के साथ ऐसा कोई बरताव नहीं करना चाहिए जो दूसरे के हृदय को तार-तार कर दे।
            इस प्रकार मनुष्य जानते-बूझते गलत रास्ते पर चल रहा है और दूसरों के रास्ते में काँटे बिछा रहा है। यही काँटे समय बीतते उसके मार्ग पर बिछकर उसे घायल कर देते हैं। इसलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि बबूल का पेड़ बोकर आम का फल नहीं पाया जा सकता।
            इसके विपरीत दूसरों के लिए फूल बरसाने वालों को सर्वत्र सुगन्ध ही मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि फूलों की तरह उनका यश चारों ओर फैलता है।
            अपने झूठे अहं और अनावश्यक पूर्वाग्रह पालने से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। ये सदा ही विनाश का कारण होते हैं। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
    जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
    तोको फूल के फूल हैं वाको हैं तिरसूल।।
अर्थात् जो हमारे लिए काँटे बोता है, उसके लिए भी फूल बोने चाहिए। हमें तो जीवन में फूल रूपी सुख मिल जाएँगे पर उसे दुख ही मिलेंगे।
           इस दोहे का आशय यह है कि बदले की भावना न रखकर, शत्रु के प्रति भी क्षमा और प्रेम का भाव रखना चाहिए। इसका कारण है कि भलाई का फल सुख और बुराई का फल दुख यानी त्रिशूल होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें क्षमा, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार की शिक्षा देता है। 
         ‌‌   बुराई को प्रेम से जीता जा सकता है और ईर्ष्या-द्वेष का उत्तर प्रेम से देना चाहिए। साथ रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने अहं का परित्याग करना चाहिए। इससे हमारा मन शान्त रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 1 मई 2026

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता बेशक बूढ़े हो जाएँ पर वे घर के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होते हैं। वे घर में रहते हुए चाहे शारीरिक कार्य पूर्ववत दक्षता से न कर सकें परन्तु फिर भी वे बहुत सारे कार्य संवारते रहते हैं। हालाँकि वृद्धावस्था में किसी भी कार्य के सम्पादन में उन्हें कठिनाई होती है पर फिर भी घर में बैठे हुए ही वे उस घर की रौनक होते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र ही अपने बच्चों के मन को यह विश्वास दिला देती है कि वे एकल परिवार के बच्चों की तरह अकेले नहीं हैं। 
             छतनार वृक्ष का अर्थ ऐसे घने और फैले हुए पेड़ से है जिनकी शाखाऍं और टहनियॉं छाते यानी छतरी की भॉंति दूर तक फैली होती हैं। ये वृक्ष घनी छाया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए महुआ, नीम और पीपल जैसे वृक्षों को उनके फैलाव के कारण छतनार कहा जाता है। ये वृक्ष एक विशाल छत्र की तरह दिखाई देते हैं। ये पेड़ भीषण गर्मी में भी अपने नीचे बैठने वालों को ठण्डी और सघन छाया प्रदान करते हैं। साहित्य में 'छतनार वृक्ष' का उपयोग सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैसे एक मॉं का अपने बच्चे को प्यार और सुरक्षा देना।
           बच्चे अपनी हर छोटी-मोटी समस्या को अपने बुजुर्ग होते हुए माता-पिता से शेयर करके चिन्ता मुक्त हो सकते हैं। बड़ों के रहते हुए मनुष्य बिना टेंशन के कहीं भी आ जा सकता है। उन्हें अपने बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। वे चिन्ता मुक्त होकर अपने आफिस में ध्यानपूर्वक कार्य कर सकते हैं। बड़ों के रहते उन्हें अपने घर में ताला तक लगाने की आवश्यकता नहीं होती। बहुत से घरों में तो उनकी मृत्यु के पश्चात जब ताले ढूँढे जाते हैं तो वे नहीं मिलते।
          जिस प्रकार पेड़ बेशक बूढ़ा हो जाए तो भी उसे अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए। वह फल तो शायद नहीं दे पाएगा पर छाया अवश्य ही देगा। उस वृक्ष पर आकर जब विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं तब उस घर का प्रकृति के साथ जुड़े रहने का एक सुखद अहसास होता है। उसी प्रकार घर के वयोवृद्ध माता-पिता को यथोचित सम्मान देना बच्चों का नैतिक दायित्व है।
            यद्यपि अपनी ढलती हुई आयु के कारण वे धन-दौलत नहीं कमा सकते परन्तु बच्चों को अवश्य संस्कार दे सकते हैं। उनके संस्कार और जीवन के अनुभव से संस्कारित हुए बच्चे ही घर, परिवार, देश और समाज के लिए बहुमूल्य रत्न बनते हैं। इन्हें हर स्थान पर सम्मान मिलता है और चारों दिशाओं में इनका यश फैलता है।
            माता-पिता मनुष्य के लिए जीते-जागते भगवान होते हैं जो उन्हें इस दुनिया में लाने का महान् कार्य करते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में सिर उठाकर शान से चल सके। अपने जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटा सकें। अपने निस्वार्थ प्यार और सेवा के साथ-साथ वे अपना सर्वस्व बच्चों को सौंप देते हैं।जो भी धन-सम्पत्ति परिश्रम से उन्होंने अपने जीवन में कमाई होती है, उसे सहर्ष अपने बच्चों को सौंप‌ देते हैं।
              बच्चों का भी यह दायित्व बनता है कि वृद्धावस्था में उन्हें असहाय न छोड़ें। बच्चे भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का सम्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं। उन बच्चों को यह शोभा नहीं देता कि वे तो अपने जीवन में ऐश्वर्य भोगें और उनके माता-पिता दर-बदर की ठोकरें खाएँ, दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ अथवा बिना उचित इलाज के इस दुनिया से विदा ले लें। अपने को असहाय मानकर दूसरों के रहमो कर्म पर जीवित रहें अथवा बच्चों के होते हुए किसी ओल्ड होम की शरण लें।
             बच्चे को अंगुली थामकर चलाते समय हर माता-पिता का सपना होता है कि बड़ा होकर उनका बच्चा कभी उनसे अंगुली छुड़ाकर उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ेगा। वे सदा अपने नाती-पोतों की मोहिनी मुस्कुराहटों और बाल सुलभ चंचल अदाओं के बीच जीना चाहते हैं। हर मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि माता-पिता का अनादर करने वाला सब कुछ होते हुए भी कंगाल होता है। उसे जीवन भर सुख-चैन नहीं मिलता। उसके मन का कोई कोना सदा ही रीता या खाली रह जाता है। उसे भरने के सारे भौतिक प्रयास असफल रह जाते हैं।
          भगवान गणेश ने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माँ भगवती की परिक्रमा करके संसार के समक्ष उदाहरण रखा था कि माता-पिता ही उनका सम्पूर्ण संसार हैं। उन्हीं के चरणों में ही मनुष्य का वास्तविक स्वर्ग होता है। चारों धामों की यात्रा मनुष्य करे अथवा न करे परन्तु अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा करने वाले को सारे तीर्थों का फल घर में  बैठे हुए ही मिल जाता है। इसीलिए भगवान राम और श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों की कामना सभी माता-पिता ईश्वर से करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद