मंगलवार, 22 सितंबर 2026

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे हम पूर्ण कह सकें क्योंकि उसमें अच्छाई और बुराई दोनों का ही समावेश होता है। इसीलिए कभी वह गलतियाँ या अपराध कर बैठता है तो कभी महान कार्य करके अमर हो जाता है। यानी कि उसमें हमेशा स्थायित्व की कमी रहती है। यदि वह पूर्ण हो जाए तो भगवान ही बन जाएगा तथा ईश्वर कहलाने लगेगा। 
          केवल और केवल वह परमपिता परमात्मा ही इस जगत में पूर्ण है। इसीलिए उसकी यह सृष्टि भी पूर्ण है। उसमें से कोई कमी नहीं निकाली जा सकती। वह मालिक सभी भौतिक गुण-दोषों से परे है। उसमें किसी प्रकार की कोई कलुषता नहीं हो ही सकती। इसीलिए हम सब उसे पूर्णब्रह्म कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करके सदा ही उससे कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं। परमात्मा के विषय में निम्न प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र 'ईशोपनिषद्' और 'बृहदारण्यकोपनिषद्' से लिया गया है। मन्त्र कहता है-
       ऊॅं पूर्णमिद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदुच्यते।   
       पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
अर्थात् वह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
         हम कह सकते हैं कि वह जो दिखाई नहीं देता है पर वह पूर्ण है। वह दृश्यमान जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण है। क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण से उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए तब भी पूर्ण ही शेष बचता है।
        यह पूर्णता कहलाती है जहाँ अपूर्ण होने का कोई भाव ही नहीं है। सब तरह से हमें उसकी पूर्णता का साक्षात्कार होता है। उसमें से कुछ ले भी लिया जाए तब भी सागर के जल की तरह वह सदा पूर्ण ही रहता है।
        यह सर्वथा सत्य है कि इन्सान पूर्ण नहीं हो सकता पर पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास अवश्य कर सकता है। इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हर मनुष्य की अपनी एक शक्ति होती है और उसी प्रकार उसकी कोई-न-कोई कमजोरी भी होती है। उसी के आधार पर समाज में उसकी एक निश्चित पहचान बन जाती है।
          इस असार संसार के किसी मनुष्य के पास धन का बल होता है, किसी अन्य व्यक्ति के पास विद्या का बल होता है, दूसरे किसी के पास सत्ता का बल होता है और कुछेक के पास शारीरिक बल होता है। कुछ ऐसे सन्त प्रकृति के लोग भी होते हैं जिनके पास आत्मिक शक्ति होती है। इन सबके अतिरिक्त वे लोग होते हैं जो अपने घमण्ड में सदा ही चूर रहते हैं। वे उसे ही अपनी शक्ति मानकर इतराते रहते हैं।
         बल या शक्ति की ही भाँति हर मनुष्य की अपनी-अपनी कमजोरी भी होती है। शारीरिक बल या आत्मिक बल अथवा मानसिक बल किसी की भी कमी मनुष्य में हो सकती है। इनके अतिरिक्त धन, विद्या, अनुभव जन्य ज्ञान, अनुशासन में से किसी एक की भी कमी उसकी कमजोरी बन जाती है। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी मनुष्य की कमजोरियाँ हो सकती हैं यथा पानी को देखकर डरना, ऊँचाई से घबराहट, अग्नि से भय, किसी पशु विशेष से डर जाना, कहीं भी भीड़ को देखकर परेशान हो जाना आदि।    
          समझदार मनुष्य वही है जो अपनी ताकत या शक्तियों का अनावश्यक प्रदर्शन न करे। जिससे लोग उसकी ताकत का दुरूपयोग करने के लिए उसे उकसाने न लग जाएँ। यदि मनुष्य उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों के झाँसे में आ गया तो उसका विनाश निश्चित समझ लीजिए। इसका कारण है कि अपनी चाटुकारिता होती देखकर वह जीवन की वास्तविकता से विमुख होने लगता है। वह उसे ही सच्चाई मान लेता है।
        अपनी कमजोरियों को भी दूसरों के सामने प्रकट न होने दे जिससे किसी को उसका उपहास उड़ाने का अवसर न मिल सके। इससे उसका मनोबल कमजोर नहीं पड़ेगा।
        जिस प्रकार मछली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती और पशु, पक्षी या इन्सान पानी में अपना घरौंदा नहीं बना सकते। सबके लिए उपयुक्त स्थान निश्चित हैं। उसी प्रकार मनुष्य की शक्ति अथवा कमजोरी उसके गले की हड्डी नहीं बनने चाहिए। उसे अपनी शक्ति का उपयोग देश, धर्म, परिवार, समाज की भलाई के लिए करना चाहिए। इसी तरह अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके चमत्कार करने उसे निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्र प्रभा 

सोमवार, 21 सितंबर 2026

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

दबाव अथवा प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन है। आज सभी लोग भागमभाग की जिन्दगी जी रहे हैं। दूसरों की देखादेखी हर व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा के अधिक-से-अधिक साधन जुटाना चाहता है। उसके लिए बहुत सारे पैसों की आवश्यकता होती है। इस धन को कमाने के लिए दिन-रात एक करता हुआ वह कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। 
        बच्चे, युवा, बड़े-बुजुर्ग प्रायः सभी लोग किसी-न-किसी दबाव में रहते हैं। बच्चों के सिर पर पढ़ाई का और फिर कैरियर बनाने का दबाव रहता है। समय की माँग के कारण माता-पिता उनके परीक्षा परिणाम में अच्छे अंक लाने के लिए उन पर दबाव बनाए रहते हैं। यदि कहीं कमी रह जाए तो उनका भविष्य प्रभावित हो जाता है। यही कारण है कि बच्चों का बचपन मानो आज कहीं खो सा गया है।
        युवाओं के समक्ष अपने भावी जीवन और अच्छी नौकरी मिलने का दबाव होता है। दिनभर इतना दबाव रहता है कि उनके कार्यक्षेत्र में आने-जाने का कोई समय निश्चित नहीं रहता। इसी कारण वे अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों को पूर्ण करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके पास समय का प्रायः अभाव-सा रहता है। जिसके कारण उनकी सोशल लाइफ सिमटती जा रही है और वे अलग-थलग होते जा रहे हैं।
          अपने दायित्वों को निपटाने और रिटायरमेंट के पश्चात भी बड़े-बुजुर्ग आज के बदलते माहौल के चलते दबाव में रहते हैं। नौकरी के लिए बच्चों के बाहर चले जाने के कारण उनके खानपान, शरीरिक स्वास्थ्य, देखभाल, सुरक्षा, अकेलेपन आदि की समस्या के कारण उन पर मानसिक दबाव बना रहता है।
        कच्ची दाल को पकाने के लिए जब हम प्रैशर कुक्कर में डालकर गैस पर रखते हैं तो प्रैशर से वह पक जाती है। तब वह खाने लायक हो जाती है और हमें पुष्ट करती है।
          यह दबाव परिवर्तन लाता है। वह परिवर्तन कोई अनुभव कर पाता है और किसी को वह महसूस नहीं होता। सबमें इसे अनुभव करने की क्षमता अलग-अलग होती है। इस दबाव से एनर्जी या शक्ति के कारण शारीरिक अथवा मानसिक बदलाव होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी गुणवत्ता यानी क्वालिटी और क्वांटिटी पर निर्भर करता है।
        इस दबाव को सहन करने की क्षमता भी सबकी अलग-अलग होती है। कुछ लोग इसे किसी भी तरह सहन कर लेते हैं। वे अपने दुखों और परेशानियों से स्वयं को बचाकर निकाल लेते हैं। डटकर उनका सामना करते हुए विजयी हो जाते हैं।
          इसके विपरीत कुछ लोग इस दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे लोग अपने दुखों और परेशानियों से घबरा जाते हैं और कायरतापूर्ण मार्ग अपना लेते हैं। यानी आत्महत्या कर लेते हैं। 
          इन लोगों के विषय में हम प्रतिदिन समाचार पत्रों, टी वी व सोशल मीडिया पर हम पढ़ते व सुनते हैं। इनमें बाढ़, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि के कारण फसल के नष्ट हो जाने पर किसान हो सकते हैं। खराब परीक्षा परिणाम डर से घबराए छात्र हो सकते हैं। व्यापार में हानि अथवा अन्य कारणों से आर्थिक स्थिति के बिगड़ने का बोझ न सहने वाला कोई भी हो सकता है। कुछ लोग अपनी शारीरिक दुरावस्था से घबराकर भी इस मार्ग को अपना लेते हैं।
          कहने का तात्पर्य है कि पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक अथवा राजनैतिक  किसी भी तरह के दबाव को न झेल पाने के कारण नेता, अभिनेता, न्याय व्यवस्था का रक्षक या सामान्य जन कोई भी इस गलत मार्ग को अपनाने वाला हो सकता है।
          आजकल मनुष्य हमेशा ही तनाव में रहता है। उसकी भलाई के लिए कही गई किसी भी बात पर वह अनावश्यक ही भड़क उठता है। वह जाने-अनजाने असहनशील बनता जा रहा है। इस कारण उसका शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह दबाव या तनाव बहुत से रोगों को निमन्त्रण देता है। इसीलिए छोटी आयु से ही बच्चे दवाइयों पर निर्भर रहने लगे हैं।
       अनेक बुराइयों की जड़ इस तनाव को अपने सिर पर हावी नहीं होने देना चाहिए। अपने को यथासम्भव शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। दिन में थोड़ा समय निकालकर परिवार के साथ चर्चा करनी चाहिए। अवकाश का दिन बच्चों से मस्ती करनी चाहिए। योग का आश्रय लिया जा सकता है। मेडिटेशन या ध्यान लगाया जा सकता है। इससे दबाव या प्रैशर दूर होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 20 सितंबर 2026

अपनी तुलना किसी से न करें

अपनी तुलना किसी से न करें 

मनुष्य को अपनी तुलना कभी किसी दूसरे से नहीं करनी चाहिए। उसे इस बात को अपने मन में गहरे बिठा लेनी चाहिए कि वह ईश्वर की एक श्रेष्ठ रचना है। इसलिए वह जैसा भी है सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर के हर कार्य में अच्छाई होती है। उसे भी मालिक ने कुछ सोचकर ही इस संसार मे भेजा है। इसलिए उसे कोई विशेष कार्य करना चाहिए।
          उस प्रभु की हर रचना अपने आप में सर्वोत्तम और अद् भुत होती हैं। किसी भी इन्सान में इतनी सामर्थ्य नही है कि उसे समझ सके अथवा उसमें से कोई कमी नहीं निकालकर स्वयं को सर्व शक्तिमान सिद्ध सके। इसलिए अपने में विद्यमान कमियों अथवा आने वाली परेशानियों को देखते हुए सदा ही अपने आप को कोसते रहना उचित नहीं है। उस मालिक पर मनुष्य को पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए।
        यहाँ एक उदाहरण लेते हैं। हम एक बीज बोते हैं और उस छोटे से बीज से एक बहुत बड़ा वृक्ष बन जाता है। यदि जब हम उस बीज को खोलकर देखते हैं तो हमें कुछ भी ऐसा भी नहीं दिखाई देता। उस समय हम समझ ही नहीं पाते कि यह नन्हा-सा बीज महान वृक्ष का कारक बन जाएगा।
        एक छोटे से बीज में इतना बड़ा वट वृक्ष समाया होता है। उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में भी अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। आवश्यकता होती है तो बस उन्हें तलाशने की। अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को पहचानकर उसके अनुसार कार्य करने वाले को जीवन में कभी हार का स्वाद नहीं चखना पड़ता।
       हम अपना स्वयं का ही उदाहरण लेते हैं। हमारे अपने हाथ की पॉंचों अंगुलियॉं बराबर नहीं होती। जब हमारी अपनी अंगुलियों में समानता नहीं होती तो संसार के सभी जीवों की क्षमता एक जैसी कैसे हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती। इसलिए दूसरों को देखकर स्वयं को दोष नहीं देना चाहिए। जितनी अपनी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार कार्य करने चाहिए। दूसरों से तुलना करके अनावश्यक तनाव लेना उचित नहीं होता।
       मनुष्य जब अपनी दूसरों से तुलना करता है तो उस समय वह अपनी मेहनत की खुशी को भी खो देता है। हर व्यक्ति इस दुनिया में विशेष योग्ताऍं लेकर पैदा होता है। उसकी अपनी अलग पहचान होती है। इसी प्रकार हर किसी का जीवन और संघर्ष अलग-अलग होता है। इसलिए किसी और से बराबरी करना व्यर्थ है। 
          मनुष्य को वास्तव में अपनी तुलना केवल अपने बीते हुए कल से करनी चाहिए। दूसरों की नकल करने के स्थान पर उसे अपनी क्षमताओं को पहचानना और निखारना चाहिए। जो कुछ भी उसके पास है, उसकी सराहना करनी चाहिए।
        मनुष्य को यह सोचकर कभी दुखी नहीं होना चाहिए कि उसके पास कुछ नहीं है। उसके पास यह नहीं है या वह नहीं है, सोचने के स्थान पर उसे पुनः पुनः यह मनन करना चाहिए कि सीमित समय के लिए मिले हुए इस मानव जीवन में उसके पास क्या-क्या है? उसे अपने जीवन में क्या-क्या करना चाहिए? क्या वह अपने जीवन में कुछ नए मानकों की स्थापना कर सकता है?
         मनुष्य को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुनिया की कोई भी शक्ति उसे तब तक नहीं हरा सकती जब तक वह स्वयं ही हार न माने। अपना मनोबल उच्च रखते हुए मनुष्य को संसार सागर में छलाँग लगा लेनी चाहिए। यह निश्चित मानिए कि वह इसे पार करने की सामर्थ्य रखता है। चाहे तो सफलता अवश्य ही उसके कदम चूमेगी।
        इसमें कोई दोराय नहीं है कि यदि मनुष्य सही है, उसने कोई गलती नहीं की तो उसे क्रोध नहीं करना चाहिए। अपने बेगुनाह होने की बात को दृढ़तापूर्वक सबके समक्ष रखना चाहिए। 
          इसके विपरीत यदि मनुष्य ने गलती की हैं तो उसे गुस्सा करने का हक बिल्कुल नहीं है। तब तो यह चोरी और सीनाजोरी वाली बात हो जाएगी जिसकी सराहना किसी तरह नहीं की जा सकती। उस समय क्षमा याचना करने से उसे परहेज नहीं करना चाहिए। अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने वाला कभी छोटा नहीं हो जाता बल्कि उसे महत्त्व दिया जाता है।
          घर-परिवार के लोग तथा बन्धु-बान्धव सभी यही चाहते हैं कि उनका प्रियजन अपने जीवनकाल में कुछ अच्छा करे। लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वे कभी नहीं चाहते कि उनका वह प्रियजन उनसे बेहतर करें। जहाँ पर वह उनसे आगे बढ़ने लगता है, सभी उसकी टाँग खींचने में लग जाते हैं। उसे नीचा दिखाकर आत्मतुष्टि करते हैं।
            यदि मनुष्य अपने पूर्व निर्धारित दृष्टिकोण में किञ्चित मात्र परिवर्तन कर ले तो उसका काया कल्प सम्भव हो सकता है। इसलिए हर समय को उपयुक्त समय मानते हुए ही मनुष्य को सदा उत्साह और लग्न से अपने दायित्वों का निर्वहण करते रहना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद        

शनिवार, 19 सितंबर 2026

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मकता एक सोच है जो मनुष्य को सबसे अलग-थलग करने में अपनी विशेष भूमिका निभाती है। नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति की पहचान यह है कि उसे हर परिस्थिति में बुराई ही दिखाई देती है। ऐसे लोग लगातार शिकायत करते हैं और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं। 
         नकारात्मक सोच वाले लोग मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा को चूस लेते हैं और आपको हमेशा हताश करते हैं। उनकी लगातार की गई शिकायतें और निराशाजनक बातें सामने वाले के मन में भी बेचैनी पैदा करती हैं। नकारात्मक माहौल में रहने से बड़े लक्ष्यों को हासिल करने का हौसला कमजोर पड़ता है। नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूरी बनाना मानसिक शान्ति और सकारात्मकता के लिए बहुत जरूरी है।
          अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्य पर पहुँचने के लिए यदि मनुष्य कटिबद्ध हो गया हो तो उसे नकारात्मक लोगों की निराशाजनक बातों की ओर कदापि ध्यान नहीं देना चाहिए। उनके सामने उसे बहरा अथवा मूर्ख बन जाने का ढोंग करना चाहिए। उन्हें तब अनदेखा करके उसे अपने लक्ष्य का सन्धान कर लेना चाहिए।
          ये निराशावादी लोग कभी किसी को प्रोत्साहित कर ही नहीं सकते। इनके हर कार्य के साथ किन्तु, परन्तु जुड़ा रहता है। हर कार्य में सफलता या लाभ के विषय में न सोचकर ये हर समय असफलताओं की लम्बी लिस्ट लेकर बैठ जाते हैं। ये लोग हर समय रोते-झींकते रहते हैं। परेशानियों के साथ इनका चोली-दामन का साथ रहता है जिसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि जबरदस्ती गले गलाते हैं।
        इसीलिए न ये स्वयं कोई साहसिक कार्य कर सकते हैं और न किसी दूसरे को करने देना चाहते हैं। सबको  हतोत्साहित करके बस अपने दायित्व को पूरा कर लेते हैं। यही कारण है कि जीवन में सफलता इनके आगे-आगे भागती रहती है और ये उसे पाने के लिए उसके पीछे भरसक दौड़ लगाते रहते हैं। 
        साहसी मनुष्य को चाहिए कि जब भी वह किसी कार्य करने के बारे में ठोस योजना बनाए तब सकारात्मक विचार वाले सज्जनों से परामर्श ले। उनकी मूल्यवान सोच कभी उसे डूबने नहीं देती। वे सदा ऐसी सलाह देते हैं जिससे  दूसरों की उन्नति होती रहती है।
          एक बोध कथा की यहाँ चर्चा करना चाहती हूँ। एक मेंढक ने पेड़ की चोटी पर चढ़ने के विषय में विचार किया और फिर वह आगे बढ़ने लगता है। उसे उस पेड़ पर चढ़ता देखकर बाकी के सारे मेंढक शोर मचाने लगते हैं, "ये असम्भव कार्य है आज तक कोई भी मेंढक पेड़ पर नहीं चढ़ सका। यह नहीं हो सकता है, तुम पेड़ पर नहीं चढ़ पाओगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम लौटकर वापिस आ जाओ।" 
          मेंढक का संकल्प और दृढ़ निश्चय रंग लाया और आखिरकार वह पेड़ की चोटी पर पहुँच ही जाता है। इसका कारण यही है कि वह मेंढक बहरा होता है और अपने साथियों की बात नहीं सुन सका। सारे मेंढकों को चिल्लाते हुए देखकर उसने अपने मन में यही सोचा कि आज वह एक आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक कार्य करने जा रहा है। उसके सभी साथी उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं। इसलिए वह और अधिक जोश से भर जाता है। अन्ततः अथक संघर्ष करते हुए असम्भव कार्य को कर गुजरता है।
          यह बोधकथा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? उसकी संकल्पशक्ति दृढ होनी चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में डाँवाडोल नहीं होनी चाहिए। इस दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वह अनेकानेक साहसिक कार्य कर लेता है। विश्व में हुए सभी चमत्कार इन्हीं सकारात्मक विचारों के कारण सम्भव हो सके।
          ये कार्य कोई भी हो सकते हैं- चाहे आकाश को नापना हो, ग्रह-नक्षत्रों आदि की जानकारी जुटाना हो, ऊँचे पर्वतों का सीना चीरकर सुविधाजनक यातायात के लिए रेल या सड़क मार्ग बनाना हो, समुद्र पर पुल बनाना या जहाज चलाना हो, हिमालय की चढ़ाई करनी हो अथवा फिर खूँखार जंगली जानवरों अपने को वश में करना हो। 
          कैसा भी कठिन या असम्भव कार्य हो वे मानो चुटकी बजाते ही कर लेते हैं। वे मुसीबतों से कभी घबराते नहीं हैं। तभी तो सच्चे पराक्रमी कहलाते हैं। सकारात्मक सोच वाले यही लोग इतिहास रचते हैं और उन हैरतअँगेज कारनामों को आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ती हैं। उनमें से भी कुछ लोग उन्हीं के पदचिह्नों का अनुगमन करते हुए धारा के विपरीत चलते हुए इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
          इसीलिए मनीषियों का सद्परामर्श सभी सकारात्मक सोच वालों के लिए है कि यत्नपूर्वक नकारात्मक सोच वालों से किनारा कर लेना चाहिए। उनके विचारों को सुनने की यदि मजबूरी सामने आ जाए तो उसे अनसुना करते हुए आगे बढ़ते चलो। नकारात्मक विचारों का परित्याग करते हुए, अपनी सोच का दायरा विस्तृत करके उसे सकारात्मक बनाते हुए, दुनिया के साथ कदम ताल करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य 

किसी की आँख में आँख डालकर बात करना बड़े जीवट का काम है। ऐसा वही मनुष्य कर सकता है जो किसी से भी न डरता हो। यह तभी सम्भव हो सकता है जब मनुष्य का मनोबल उच्च हो और उसके पास आत्मिक बल हो। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आत्मिक बल उसी व्यक्ति के पास हो सकता है, जिसके साथ सच्चाई और ईमानदारी होती है।
       सच्चाई और ईमानदारी वे शक्तिशाली नैतिक बल होते हैं जो बड़े-बड़े और अहंकारी साम्राज्यों की नींव को भीतर से खोखला करके हिला देते हैं। साम्राज्य अपनी ताकत, सेना और धन के बल पर चलते हैं। उनके पास नैतिक बल नहीं होता। सच्चाई के आगे सत्ता का अहंकार टिक नहीं सकता। जब कोई व्यक्ति या समाज ईमानदारी और सत्य का मार्ग चुनता है, तो आम जनता में भी साहस आता है। यह सामूहिक एकता किसी भी बड़े शासन को झुकने के लिए मजबूर कर देती है।
        इस सच्चाई की शक्ति से तो बड़े-बड़े साम्राज्य तक हिल जाते हैं। शारीरिक बल न होते हुए भी मनुष्य आत्मिक बल के रहते किसी से भी लोहा ले सकता है। यहाँ हम महात्मा गांधी के जीवन का उदाहरण ले सकते हैं जिन्होंने कृशकाय होते हुए भी अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ली। उनकी एक आवाज पर हजारों लोग अपने सारे काम-काज छोड़कर भागे चले आते थे। विदेशी शासक के अत्याचारों को भी हँसकर सहन करते थे।
          इसी प्रकार के अनेक उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा हुआ है जहाँ केवल आत्मिक बल अथवा सच्चाई की ताकत के कारण लोग शक्तिशालियों से भिड़ गए और उनकी नाक में दम कर दिया।
         झूठ और अन्याय की एक सीमा होती है। जब सच्चाई सामने आ जाती है तो साम्राज्य का पर्दाफाश हो जाता है। ईमानदार आचरण बाहरी डर को समाप्त कर देता है। बिना डर के जीने वाला यह समाज किसी भी दमनकारी व्यवस्था को बदलने में सक्षम हो जाता है। 
        टीवी पर, सोशल मीडिया पर एवं समाचार पत्रों में भी आए दिन ऐसे समाचार देखने, सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं। दृढ़तापूर्वक प्रतिकार करने वालों की कमी नहीं है।
        आम व्यवहार में हम सभी प्रायः इन वाक्यों का प्रयोग करते रहते हैं- 'मेरी आँखों में देखकर बोल', 'नजरें क्यों चुरा रहे हो?', 'हिम्मत है तो नजर मिलाकर बात कर', 'आँखों में आँखें डालकर बात कर' आदि।
        इन सभी वाक्यों से पता चलता है कि कोई व्यक्ति स्वयं कितना ही धोखेबाज, मक्कार, हेराफेरी मास्टर क्यों न हो, उसे हर बात सच्ची ही सुननी होती है बस। असत्य भाषण अथवा अनर्गल प्रलाप कोई नहीं सुनना चाहता। झूठ और फरेब के कारण असामाजिक तत्त्व और आतंकवादी आदि अपने पुराने वफादारों तक को जान से मार देने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। इस विषय पर अनेक फिल्में तथा टीवी सीरियल बने हैं। जिन्हें देखकर इन लोगों का व्यवहार समझा जा सकता है
          कार्यक्षेत्र आदि में भी बॉस चाहता है कि उसके अधीनस्थ सत्य का व्यवहार करें। यदि कोई उसके समक्ष असत्य बोलता है तो वह अपना आपा खो देता है और उल्टा-सीधा बहुत कुछ सुना देता है। इस कृत्य के लिए सरकारी दफ्तरों में मेमो इश्यू कर दिए जाते हैं पर प्राइवेट में तो कर्मचारी को नौकरी से हाथ तक धोना पड़ जाता है। इससे उस व्यक्ति का कैरियर बर्बाद हो जाता है।
          अपने घर में यदि बच्चे बड़ों से किसी भी कारण से सच्चाई छिपाएँ तो उनके साथ डाँट-डपट की जाती है अथवा सजा भी दी जाती है। किन्तु यदि घर के सदस्य एक-दूसरे से पर्देदारी करने लगें तो वह परिवार टूटकर बिखर जाता है। कोई भी व्यक्ति दूसरे का असत्य आचरण सहन नहीं कर पाता।
          मनुष्य की जुबान की बड़ी कीमत होती है। इसकी सच्चाई और ईमानदारी के कारण लाखों करोडों के व्यापार उचन्ती में हो जाते हैं। जहाँ किसी के मन में धोखाधड़ी करने की भावना आ गई, वहाँ पर व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और तब व्यवसाय की साख गिर जाने से व्यापार में हानि होने लगती है।
          मनुष्य की आँखों की चमक से ही ज्ञात हो जाता है कि उसकी बात में कितनी सच्चाई है और कितनी धूर्तता है। उसकी बात विश्वसनीय है अथवा नहीं। ऐसा व्यक्ति किसी से नजर नहीं मिला सकता। बात करते समय वह या तो इधर-उधर देखेगा या नाखून दाँतों से कुतरेगा या पैर के अँगूठे से जमीन खोदेगा या फिर नजरें चुराने का प्रयास करता है अथवा हकलाने लगता है।
        सत्य की शक्ति इतनी अधिक होती है कि सत्यवादी के मुँह से निकलने वाला हर वचन ब्रह्मवाक्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति की बोलते समय न कभी जुबान लड़खड़ाती है और न ही वह किसी से डरता है। सबके सामने सिर उठाकर और दूसरों से आँखें मिलाकर वह बात कर सकता है।  
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन और विश्वास इन तीनों का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व होता है। इनके बिना मनुष्य का कोई मूल्य नहीं होता। ये तीनों वास्तव में उसके प्रिय और सच्चे मित्र होते हैं जो चौबीसों घण्टे उसके साथ ही रहते हैं। ज्ञान उसका मार्गदर्शन करता रहता है, धन उसकी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूर्ण करता है और उसकी विश्वास की पूँजी हर कदम पर उसकी सहायक बनती है।
          यदि इन तीनों के विषय में विचार करें और इन्हें ढूँढने लगे जाऍं तो सोचिए ये सब हमें कहाँ पर मिल सकेंगे?
        आज की परिस्थितियों में ज्ञान धार्मिक स्थलों और विद्या का मन्दिर कहे जाने वाले स्कूलों में मिलता है। वहाँ उन स्थानों पर इसका व्यापार किया जाता है। धर्म स्थलों में धर्म के ठेकेदार अपने ज्ञान का दुरूपयोग करते हुए जन साधारण को गुमराह करते हैं। उन्हें धर्म के नाम पर जन साधारण को बाँटने का कार्य करते हैं और मारकाट करवाते हैं। अपने विरोध में सिर उठाने वालों पर अत्याचार करते हैं और समाज में अनाचार फैलाते हैं। लोगों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले ये तथाकथित ज्ञानी विद्वान समाज को उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं।
          बच्चों को विद्यालय में स्कूली शिक्षा यानी किताबी ज्ञान ही मिल सकता है। मोटी डोनेशन लेकर जहाँ दाखिला दिया जाता है और मोटी फीस लेकर पढ़ाई कराई जाती है। उन विद्यालयों और कालेजों में पढ़ने वाले छात्र सदा ही नियम-कानून को धत्ता दिखाते रहते हैं। अपने अध्यापकों का भी सम्मान नहीं करते। एक ओर व्यापारी मैनेजमेंट लूट-खसौट करने पर लगी रहती है। और दूसरी ओर शिक्षक अपने व्यवसाय के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ नहीं हैं। वे भी सदा अपना हितसाधक बने रहते हैं। 
         इन स्थानों पर ऐसे ज्ञान का दुरूपयोग खुल्लमखुल्ला किया जा रहा है जो मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों को संवारता है। ये सब देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को बहुत पीड़ा होती है। आम आदमी इस दुरूपयोग का प्रतिकार नहीं सकता।
        धन केवल अमीरों के पास मिलता है जो हर तरह की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इसके लिए वे ईमानदारी, सच्चाई और नियम-कानून को ताक पर रख देते हैं। वे चोरबाजारी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी आदि को प्रश्रय देते हैं। इस क्रम में यदि किसी की पीठ मे छुरा घोंपना पड़े या गला काटना पड़े तो गुरेज नहीं करते। जिस सीढ़ी से ये लोग ऊपर चढ़े होते हैं उसे ठोकर मारकर गिराना पड़े तो वे कदापि परहेज नहीं करते। इन लोगों का उद्देश्य मात्र धन कमाना होता है और कुछ नहीं। 
        जबकि यह धन मनुष्य के लिए केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ खरीद सकता है। उसके लिए यह स्वास्थ्य, शान्ति, संस्कारी या आज्ञाकारी सन्तान, सहृदय बन्धु-बान्धव और रिश्तों में परस्पर विश्वास आदि को जीवन में नहीं खरीद सकता। फिर भी वे इसके पीछे दीवानों की तरह पड़े रहते हैं। उन्हें न खाने की सुध रहती है और न ही अपने आराम की।अपने दिन-रात का सुख-चैन गॅंवाकर ये कोल्हू का बैल बन जाते हैं। 
          विश्वास मनुष्य के जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। एक बार यदि यह जीवन से निकल गया तो फिर कभी वापिस नहीं लौटकर नहीं आता। आज के भौतिक युग में मानो विश्वास बेचारा तोड़ने के लिए ही होता है। हर रिश्ते को निभाने के लिए विश्वास बहुत आवश्यक होता है। लोग उसका मान नहीं रख पाते। एक बार विश्वास खो जाए तो समाज में मनुष्य की साख प्रभावित होती है। उसे पुनः बनाने में बहुत समय लग जाता है। फिर भी कोई गारण्टी नहीं होती।
          आज बहुत से भाई, बहन, माता, पिता, पति, पत्नी, मित्र, पड़ौसी, नेता, अभिनेता आदि एक-दूसरे के साथ विश्वासघात करने में परहेज नहीं कर रहे। वे तो दूसरे की आँखों में धूल झौंककर बड़े खुश होते हैं। वचनबद्धता तो उनके लिए एक प्रकार से खिलवाड़ बनती जा रही है। माना यही जाता है कि दुनिया विश्वास पर चलती है। इस क्षेत्र में भी लोग पिछड़ने लगे हैं।
        यदि मनुष्य किसी का विश्वास तोड़ता है अथवा कोई अन्य व्यक्ति उसका विश्वास खण्डित करता है तो दोनों ही स्थितियों में उसे पुनः जमा पाना बहुत कठिन हो जाता है। यह विश्वास काँच की तरह बहुत नाजुक होता है। यदि यह एक बार टूटकर बिखर जाता है तो फिर उसे समेटना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य हो जाता है।मनुष्य की आयु बीत जाती है लोगों के हृदयों में पुनः इसे जमाने में।
          ज्ञान, धन और विश्वास मनुष्य के परम मित्र हैं किन्तु जहाँ सावधानी हटी वहीं पर दुर्घटना घट जाती है। यानी मनुष्य को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इन तीनों के भरोसे मनुष्य चमत्कार करता है। समाज में अपना स्थान बनाता है। इनमें से किसी एक की भी कमी उसे सबकी नजरों से गिरा देती है। तब वह हीरे सा मूल्यवान होते हुए भी सबकी नजरों मे काँच की तरह बेकार बन जाता है। उसे दूर फैंक देने में बिल्कुल परहेज नहीं किया जाता।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 16 सितंबर 2026

सुनो अधिक और बोलो कम

सुनो अधिक और बोलो कम

ईश्वर ने मनुष्य को कान दो दिए हैं पर मुँह एक दिया है। इससे यही अर्थ लगाया जा सकता है कि प्रभु का यह स्पष्ट सन्देश है कि सुनो अधिक और बोलो कम। सभी जानते हैं कि कानों का काम है सुनना और मुँह का काम है बोलना। 
         अधिक सुनना और कम बोलना एक महान गुण है जो आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली और समझदार बनाता है। इसके बहुत लाभ होते हैं। ध्यान से दूसरों की बात सुनने से नई चीजें सीखने और समझने का अवसर मिलता है। कम बोलने से आपकी मानसिक ऊर्जा सुरक्षित रहती है और अनावश्यक तनाव से बचाव होता है। कम बोलने और सोच-समझकर बात करने वाले लोग समाज में अधिक विश्वसनीय और सम्मानित माने जाते हैं।
          अब विचार इस विषय पर करना है कि मनुष्य को क्या सुनना चाहिए और क्या नहीं? इसी प्रकार क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं?
          मनुष्य को सदा ही अच्छा सुनना चाहिए और अच्छा बोलना चाहिए। अच्छा सुनने का तात्पर्य है अपने देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के हितकर शब्द सुनने चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों एवं महापुरुषों के उपदेशों तथा आदर्शों के विषय में सुनना चाहिए। उन पर आचरण करना चाहिए।
          महाजनों की सुसंगति में रहते हुए, उनके सुवचनों का लाभ उठाते हुए अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए। समष्टि का भला करने वाले या लाभ पहुँचाने वाले सद् वाक्यों को सुनना सदा ही सबको आनन्दित करता रहता है। 
          दुर्जनों से और उनके कठोर वचनों को सुनने से बचना चाहिए। उनके अपशब्द व गाली-गलौज सुनने से दूर रहना मनुष्य के लिए आवश्यक है। इनके अतिरिक्त ऐसे वचन भी नहीं सुनने चाहिए जिनमें किसी की निन्दा-चुगली की गई हो या तोड़फोड़ करने की बात हो।
          देश, धर्म, समाज तथा घर-परिवार को तोड़ने वाले दुर्वचनों को सुनने से बचना चाहिए। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले जिन वचनों में षडयन्त्र की बू आ रही हो, मनुष्य को उन्हें सुनने से सदा परहेज करना चाहिए।
          एवंविध बोलते समय वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 
             पहले तोलो फिर बोलो।
ऐसा बोलने से हमेशा बचने का प्रयास करना चाहिए जिससे किसी के मन को कष्ट हो या किसी का हृदय छलनी हो जाए। अपनी तरफ से सदा यही प्रयत्न करना चाहिए कि दूसरे के मन को हरने वाले बोल ही बोले जाएँ।
            वाणी की सरलता और सहजता का पुट उसमें होना चाहिए, छल-फरेब वाली भाषा का प्रयोग मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरों के जख्मों पर मलहम लगाने वाले वचन सबको पसन्द आते हैं।
          किसी मनुष्य के साथ यदि कोई भी व्यक्ति अपने रहस्यों को साझा करता है तो उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि जिसके पास जाकर वह अपना मन हल्का कर रहा है, वह उन्हें अपने अन्तस् में ही समाकर रख लेगा। उन्हें किसी दूसरे के सामने कभी भी, किसी भी परिस्थिति में प्रकट नहीं करेगा। वह उन्हें अपने तक ही सीमित रखेगा।
          उसे यह भी विश्वास होता है कि वह स्वयं लोगों के सामने न तो उसका उपहास करेगा और किसी दूसरे को भी उसकी छिछालेदार नहीं करने देगा। जिस व्यक्ति पर लोग इतना विश्वास करते हैं, उससे महान कोई और हो ही नहीं सकता। 
          इस प्रकार बोलने और सुनने में यदि अनुशासन का पालन किया जाए तो होने वाले बहुत से झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है। वाणी से किया गया प्रहार बहुत गहरा घाव करता है। इस प्रकार के तीक्ष्ण वारों को करने से मनुष्य को यथासम्भव बचना चाहिए।
         वास्तव में जब मनुष्य बात कर रहा होता है तो वह प्रायः अधिक सुनता नहीं हैं। इसलिए अक्सर बहुत कुछ सीखता भी नहीं है। इसलिए कम बोलने और अधिक सुनने से मनुष्य एक बेहतर वार्ताकार बन सकता है। अच्छे श्रोता बनने से बातचीत की गुणवत्ता बेहतर हो जाती है। दूसरे लोगों को व्यक्ति से बातचीत करने में आनन्द आता है। वे खुलकर अपनी बातें साझा करने लगते हैं।
          मन में दूसरों के गूढ़ रहस्यों को सदा छुपाकर रखने वाला और वाणी का संयम रखने वाला मनुष्य वास्तव में महान होता है। ऐसे महापुरुषों को समाज अपना नेता मानकर उसके बताए मार्ग पर चलने लगते हैं।
          इन सबसे भी बढ़कर प्रत्येक मनुष्य को उस परमपिता का यशोगान भी अपनी वाणी से सदैव करते रहना चाहिए और उसी की प्रार्थनाओं को अपने इन कानों से सुनना भी चाहिए। तभी इन दो कानों और इस मुँह की सार्थकता है। अपने अन्तस् में ईश्वरोचित गुणों का समावेश करने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद