सोमवार, 29 जून 2026

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक, उसकी समझदारी, उसका अच्छा स्वभाव, उसकी संगति और उसके प्रगाढ़ सम्बन्ध हमेशा साथ निभाते हैं। यद्यपि उसका समय कभी सदा एक-सा नहीं रह पाता, उसकी सत्ता का दबदबा भी हमेशा कायम नहीं रह सकता। उसकी धन-सपत्ति आदि भी सदा‌ उसका साथ नहीं निभा पाते। और तो और उसका अपना यह शरीर भी एक निश्चित समय के बाद अशक्त हो जाने के कारण साथ नहीं दे पाता। समय बीतने के पश्चात वह भी उसका साथ छोड़ देता है।
            मनुष्य एक विवेकशील और विचारशील प्राणी है जो उचित-अनुचित और भविष्य के परिणामों को समझने की क्षमता रखता है। यह क्षमता उसे अन्य जीवधारियों से श्रेष्ठ बनाती है और स्वयं के उत्थान या पतन के लिए जिम्मेदार बनाती है। विवेकशीलता का अर्थ है अपनी बुद्धि का सही उपयोग करना, आत्म-नियन्त्रण करना और सोच-समझकर कोई भी निर्णय लेना। 
          अपने विवेक से, अपनी समझदारी से मनुष्य यदि अपने जीवन का निर्वहण करता है तो यह उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात कही जा सकती है। इस प्रकार वह सफल व्यक्ति बनता है। अपने सम्पर्क में आने वालों का मार्गदर्शन करता है। 
          तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मनुष्य को सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और निरन्तर आत्म-चिन्तन करना चाहिए। तात्कालिक सुख के स्थान पर मनुष्य को स्थायी भलाई और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
          अपने अच्छे स्वभाव के कारण वह सबको अपना बना लेता है। उससे कोई भी नाराज नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा करता भी है तो उसके अच्छे स्वभाव के कारण अधिक दिन उससे रूठा नहीं रह सकता। इसी तरह सहृदयता का परिचय देते हुए वह सबको उनकी गलतियों के लिए उन्हें क्षमा कर देता है। इसलिए उसके सम्बन्ध सबके साथ लम्बे समय तक बने रहते हैं।
            मनुष्य को सदा यही प्रयास करना चाहिए कि वह यथासम्भव दूसरों की दुआओं अथवा आशीर्वाद को अपने जमा खाते में जोड़ता जाए। कहा जाता है कि दूसरों द्वारा दी गई बददुआओं का असर मनुष्य के जीवन पर अवश्य पड़ता है। यदि अभिशाप का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है तो दूसरों के मन से निकलने वाले आशीर्वाद भी अपनी छाप छोड़ते हैं। जितने अधिक आशीर्वाद उसे मिलेंगे उतनी ही उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में प्रसरित होगी।
          सदा याद रखना चाहिए कि धन, दौलत और प्रसिद्धि का कोई भरोसा नहीं कि वे सदा‌ साथ निभाएँगे अथवा नहीं। इसका कारण है कि ये दोनों अपने साथ अनेक बुराइयों को साथ लेकर आते हैं। इनके चंगुल में फंसकर मनुष्य धोखा खाकर अपनी हानि कर बैठता है।
            जो मनुष्य इन्हें सम्हाल पाता है या इनके मिलने पर अहंकारी न होकर विनम्र बना रहता है, वही सबका प्रिय भाजन बनता है। उसकी सर्वत्र जय जयकार होती है।
          अपनों पर भरोसा करना मनुष्य की बहुत बड़ी पूँजी है। यह यूँ ही नहीं बाँट दी जाती। पहले मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए तभी उसे आत्मविश्वास की शक्ति मिलती है। इसके विपरीत दूसरों पर अन्धविश्वास करना उसकी कमजोरी बन जाता है।
         मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब वह सफलता की ऊँचाइयों को छू रहा होता है तो उसकी सफलता के गुब्बारे में सबसे पहले पिन चुभाने वाला व्यक्ति कोई अपना ही होता है जिस पर वह आँख मूँदकर विश्वास कर रहा होता है। पीठ पर छुरा भौंकने वालों से सावधानी रखना बहुत ही आवश्यक होता है।
          हम अपने जीवन में बहुत सारे सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हमारी जिन्दगी बहुत ही चालाक है, हमें ठगती रहती है। यह हर रोज एक नया कल देने का वादा करके हमारी उम्र छीनती रहती है। इसलिए समय रहते इरादे मजबूत करके अपने देखे हुए सपनों को सच कर लेना चाहिए।
          मनुष्य को आत्मोन्नति के लिए सदा सत्संगति में रहना चाहिए और ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ईश्वर की राह पर जब कोई एक कदम बढ़ाता है तो ईश्वर उसे थामने के लिए सौ कदम आगे बढ़ाता है। हम इन्सानों की ही तरह वह मालिक भी अपनी सन्तानों से बहुत प्यार करता है। उनकी परेशानियों के समय उन्हें सहारा देता है। 
           वह हमेशा चाहता कि उसकी सन्तानें हम मानव शुभ कर्म करें जिससे हमें कष्टों का सामना न करना पड़े। हम मालिक की ऐसी नालायक सन्तानें बन जाते हैं जो इस संसार में आने के बाद अपने सही रास्ते से भटककर गलत मार्ग पर चल पड़ते हैं। तभी कष्टों और परेशानियाँ झेलते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 28 जून 2026

लक्ष्य निर्धारित करना

लक्ष्य निर्धारित करना

मनुष्य को अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए तभी वह अपने जीवनकाल में सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है। लक्ष्य को पाने की कामना करने वाले के लिए आत्मानुशासन (self discipline) की आवश्यकता होती है। जब वह अपने लक्ष्य को पाने के प्रयास में परिश्रम करता है, दिन-रात एक कर देता है तभी अपने अनथक श्रम से वह लक्ष्य पाकर ही चैन लेता है। छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने से आत्मविश्वास बढ़ाता है और अन्ततः बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर मनुष्य कदम बढ़ाता है। 
          दूसरे शब्दों में कहें तो वह मनुष्य भाग्यशाली है जो एक निश्चित लक्ष्य की ओर अपने कदम बढ़ाता है। उसका जीवन किसी विशेष उद्देश्य के लिए होता है। ऐसे ही अनुशासित लोग घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के लिए कुछ गुजरने का माद्दा रखते हैं।
           लक्ष्य निर्धारण जीवन में सफलता पाने और दिशा निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। इसमें  प्रासंगिक और समयबद्ध लक्ष्यों को परिभाषित किया जा सकता है। यह टालमटोल को कम करके मनुष्य के फोकस बढ़ाता है और उपलब्धियों की निगरानी करने में मदद करता है। लक्ष्य हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में काम करता है। इससे अपने विकास को प्रबन्धित करना और आवश्यक बदलावों की शुरूआत करना आसान हो जाता है। लक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो प्रेरित करें। मनुष्य को अपनी प्रगति की नियमित समीक्षा करनी चाहिए।
            लक्ष्य मनुष्य के जुनून से जुड़े होने चाहिए और उन्हें हासिल करने के लिए एक चरणबद्ध योजना बनाने की आवश्यकता होती है। लक्ष्यहीन व्यक्ति कटी हुई पतंग की तरह केवल इधर-उधर भटकता रहता है। जब तक मनुष्य यह निर्धारित नहीं करेगा कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है अथवा क्या करना चाहता है? तब तक वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकता। 
          यदि हमें कही जाना हो तो पहले हम स्थान निर्धारित करते हैं। फिर वहाँ तक पहुँघने का मार्ग सुनिश्चित करते हैं। जब हम पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाते हैं तभी यात्रा के लिए निकलते हैं और निश्चित ठिकाने पर पहुँच जाते हैं। उसी प्रकार जीवन की यात्रा भी करनी होती है। वहाँ किन्तु अथवा परन्तु से काम नहीं चलता। जीवन में एक स्पष्ट रूपरेखा की आवश्यकता होती है। तब जाकर मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। अन्यथा मानव जन्म पाकर भी वह उस जीवन को वृथा गँवा देता है। 
          मनीषी कहते हैं कि लक्ष्यहीन जीवन बिना पता लिखे लिफाफे की तरह होता है जो कहीं भी नहीं पहुँच सकता, उसे बस रद्दी की टोकरी में फैंक दिया जाता है। उसे भेजने वाला और पाने वाला दोनों ही उसके लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में लक्ष्य पाने के लिए यदि दूसरों का मुँह ताकता रहेगा तो वह जीवन की इस रेस में पिछड़ जाएगा।
              हर किसी के कहने पर यदि मनुष्य चलेगा तो वह थाली के बैगन की तरह इधर-उधर लुड़कता रहेगा। सभी लोग अपने-अपने जीवन में भागमभाग में लगे हुए हैं। इसलिए किसी की ओर देखने का समय उनके पास नहीं है। जब तक मनुष्य स्वयं भागकर उन भागने वालों के साथ कदम नहीं मिलाएगा तब तक वह बस निराशा का सामना ही करता रहेगा। फिर ऐसे पिछड़े हुए का साथ देना कौन चाहेगा?
             हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था, "इन्तजार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते है।"
          स्वामी विवेकानन्द का कथन है, "आप जैसे विचार रखोगे वैसे ही बन जाओगे। अगर अपने आपको को निर्बल मानोगे तो निर्बल बन जाओगे।यदि अपने आपको समर्थ मानोगे तभी तो समर्थ बन पाओगे।"
           अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह विचार करे कि आखिर वह अपने जीवन में क्या चाहता है? क्या वाले वह दूसरों को हसरत भरी निगाहों से निहारता रहना चाहता है? अथवा वह कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य रखने वाला बनना चाहता‌ है?
          इसलिए विवेकपूर्वक मनन करते हुए जीवन को सही दिशा की ओर ले जाना ही समझदारी है। नदी में प्रायः वही किश्तियाँ डूबती हैं जो बिना योग्य मल्लाह के केवल आनन्द के लिए बस यूँ ही दिशाहीन दौड़ाई जाती हैं।
          उसी प्रकार जिनके जीवन लक्ष्यहीन होकर डगमगाते हैं वे इस संसार सागर में डूब जाते हैं। जिनके दिल में कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य होती है वे ही हरदम झूमते-गाते हैं, मस्त रहते हैं। सफलता इन्हीं महानुभावों के चरण चूमती है। दुनिया भी इन लोगों को अपनी सिर आँखों पर बिठाती है। ऐसे उद्यमी समाज को दिशा  देते हैं। 
        अतः जीवन को लक्ष्यहीन होकर नहीं भटकने देना चाहिए, अपने लक्ष्य का निर्धारण करके वहीं बाण का अनुसन्धान करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 27 जून 2026

मनुष्य का वास्तविक धन

मनुष्य का वास्तविक धन

आजन्म मनुष्य धन की कामना करता है।यह धन उसकी आवश्यकता होता है और वह इसे पाने के लिए अनथक प्रयास भी करता है। दिन-रात अपना सुख-चैन गॅंवाकर वह‌ इस धन को कमाने का प्रयास करता है। सोचने वाली बात यह है कि क्या मनुष्य परिश्रम से अर्जित धन को प्राप्त करके सन्तुष्ट हो जाता है? यदि नहीं तो फिर मनुष्य का वास्तविक धन क्या है? यह एक गहन विषय है। आज हम इसी विषय पर चर्चा करते हैं।
            मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक धन उसका उत्तम स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच, सन्तोष, बन्धु-बान्धवों के साथ मधुर सम्बन्ध और शुभकर्म होते‌ हैं। भौतिक धन-वैभव नश्वर है जबकि अच्छा स्वास्थ्य और सत्चरित्र जीवन भर साथ निभाते हैं। यही जीवन को भी सार्थक बनाते हैं। 
          हम सांसारिक लोग हैं, हमारे घरों में यदा कदा अतिथि आते रहते हैं। कुछ अतिथि थोड़े समय के लिए आते हैं और कुछ अतिथि हमारे साथ कुछ दिन व्यतीत करते हैं। हम सबकी आवभगत अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हैं। जब कोई अतिथि हमारे घर कुछ दिन रहता है और जाते समय प्रसन्न मन यह से कहता है कि आपके घर में आकर मेरा मन रम गया है, यहाँ से जाने का दिल नहीं कर रहा। यह घर नहीं एक मन्दिर है तो यह मनुष्य का सबसे बड़ा धन होता है।
          जब माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार से, उनकी सेवा सुश्रुषा से प्रसन्न होते हैं तब उनके मन से अपने आप ही आशीर्वाद निकलते हैं। वे अनायास ही यह कहते हैं कि ये बच्चे हमारे कलेजे का टुकड़ा हैं। मेरे विचार में किसी भी मनुष्य के लिए इससे बढ़कर और कोई धन हो ही नहीं सकता।
          घर-परिवार में सामञ्जस्य का वातावरण हो। बच्चे माता-पिता की आज्ञाकारी सन्तान हों, उनका आदेश बच्चों के लिए ब्रह्मवाक्य हो। ऐसे माहौल में यदि कोई बेटा या बेटी यह कहे कि मेरे माँ-बाप ही मेरे भगवान हैं तो यह मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी कहलाएगी।
            पति-पत्नी में परस्पर प्यार और विश्वास हो और वे दोनों एक बन्द मुट्ठी की तरह मिलकर रहते हों, उनके बच्चे भी संस्कारी हों तो ऐसा घर स्वर्ग से भी बढ़कर सुखी होता है। शादी के बीस साल के बाद भी पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति लगाव कम न होकर बढ़ता रहे तो उनके इस प्रेमधन के समक्ष अन्य सभी धन फीके पड़ जाते हैं। 
           घर-परिवार में प्रायः सास और बहू की नोकझोंक चलती रहती है। यदि वहाँ सभी को यथोचित सम्मान देने की परम्परा हो तो इस समस्या से बचा जा सकता है। बहू अपनी सास को सास नहीं माँ माने और इसी प्रकार सास भी अपनी बहू को बहू नहीं बेटी मान लें तो अधिकतर झगड़े समाप्त हो जाएँ। दोनों ही एक-दूसरे की गलतियों को अनदेखा करके यदि परस्पर सौहार्द बनाए रखें तो वहाँ टकराव होगा ही नहीं। उस घर की खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। यही गृहस्थी का सबसे बड़ा धन है।
           जिस घर में घर में बड़ों को मान और छोटों को प्यार भरी नजरों से देखा जाता है वहाँ सुख-शान्ति का वास होता है। बड़ों को चाहिए कि वे अपना हृदय विशाल बनाकर बच्चों को उनके किसी भी दोष के लिए क्षमा कर दें। इसी प्रकार बच्चों का दायित्व भी बनता है कि वे बड़ों की कोई बात रुचिकर न लगने की स्थिति में घर में बवाल न मचाकर प्यार से समाधान करें। छोटे-बड़े सभी को हठधर्मिता छोड़कर रिश्तों में तालमेल बनाए रखना चाहिए। ऐसा करने पर घर के सभी सदस्यों का आपसी व्यवहार सन्तुलित रहता है। बाहर जाने पर घर में भागकर आने का मन करता है। अब आप ही बताइए कि इससे बड़ा कोई और धन मनुष्य के लिए हो सकता है?
           भाई-बन्धुओं अथवा घर-परिवार के किसी सदस्य की यदि जरूरत के समय आप अपना फर्ज समझकर प्रसन्नतापूर्वक, बिना अहसान जताए सहायता कर सकें और वह आपको अपने दिल की गहराई से दुआ दे तो यह सबसे धन होगा। यह धन आत्मसन्तुष्टि का भाव देता है।
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि जो वस्तुऍं मनुष्य को मानसिक शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करें, वही सच्चा कहलाता धन है। अच्छा स्वास्थ्य मनुष्य का मनोबल बढ़ाता है, उसे ऊर्जावान बनाता है और जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके खुशियॉं तलाशना और मन की शान्ति को वास्तविक सम्पत्ति माना जाता है। अपने भाई-बन्धुओं के साथ समय व्यतीत करना सुकून देता है। 
            यदि अपने विवेक से ऐसा धन मनुष्य पा सके तो उससे बढ़कर भाग्यशाली व्यक्ति कोई और हो ही नहीं सकता। मनुष्य को अपने घर को यत्नपूर्वक ऐसा बनाना चाहिए कि उसके मन में कोई और कामना न रह जाए। ईश्वर की कृपा से हर किसी व्यक्ति को ऐसे परम धन की प्राप्ति हो और वह अपना खुशहाल जीवन जी सके।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 26 जून 2026

धन दैनन्दिन आवश्यकता

धन दैनन्दिन आवश्यकता

धन हमारी सभी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत आवश्यक है। इसके बिना हम जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। कदम-कदम पर हमें धन की आवश्यकता का अनुभव होता है। इसे कमाना बहुत ही कठिन कार्य है। अपने सुख-चैन को तिलांजलि देकर दिन-रात अथक प्रयास करना पड़ता है। कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुते रहना पड़ता है। उस पर भी यह कोई गारण्टी नहीं होती कि मनुष्य को मनोवांच्छित सफलता मिल सकेगी।
            एक मजदूर सर्दी-गर्मी की परवाह किए बिना दिन-रात मेहनत करता है फिर भी उसके घर का चूल्हा कितने दिन जल पाएगा? यह नहीं कहा जा सकता। यह धन, यह लक्ष्मी किसी की सगी नहीं है। यह बहुत ही चंचल कही जाती है। यह आज यहाँ है तो कल कहाँ होगी? इसका पता किसी को नहीं चल पाता। पलभर में यह राजा को रंक बना देती है और रंक को राजगद्दी पर बैठा देती है। इसकी महिमा अपरम्पार है, जिसका पार इस संसार में कोई नहीं पा सकता।
          यह धन मनुष्य को कहता है कि मुझे इस हद तक पसन्द करो कि लोग आपको नापसन्द करने लग जाऍं। यदि इस धन के पीछे भागते रहे तो सभी संगी-साथी पीछे छूट जाते हैं। इसकी अधिकता होने पर मनुष्य में सबसे पहले अहंकार आता है जो सारे विनाश की जड़ है। फिर उसके साथ-साथ दुर्व्यसन भी मनुष्य को घेरने लगते हैं। तब सब लोग उस व्यक्ति से किनारा करने लगते हैं। वह मनुष्य सभी बन्धु-बान्धवों के रहते भी हुए निपट अकेला हो जाता है।
           यही धन सारे फसाद की जड़ है। फिर भी न जाने क्यों सब लोग इसके पीछे पागल हुए रहते हैं। यह सारे रिश्तों को खोखला कर देता है। भाई को भाई के खून का प्यासा बना देता है। माना कि जीवन के लिए इसकी बहुत उपयोगिता है परन्तु यह सब कुछ नहीं कहा जा सकता। यह इन्सान के लिए न तो खुशियाँ खरीद सकता है और न ही उसके लिए स्वास्थ्य खरीद सकता है। न ही उसकी इस लोक में मृत्यु से रक्षा कर सकता है। इन स्थितियों में इसके होने का कोई लाभ नहीं मिल पाता।
             मरने के बाद इसे ऊपर नहीं ले जा सकते। यह इसी लोक में रह जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही विदा लेता है। उसका सब साम्राज्य यहीं धरा रह जाता है। मनुष्य के अपने सच्चे साथी उसके अच्छे या बुरे कर्म होते हैं जो जन्म-जन्मान्तरों तक साथ निभाते हैं। यह धन जीते जी मनुष्य को ऊपर ले जा सकता है। यह मनुष्य को अपमानित कराने का कोई अवसर नहीं चूकता। धन के नशे में चूर व्यक्ति को कुकर्मों में फँसाने में तनिक भी देर नहीं करता।
             इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनके पास बेशुमार धन-दौलत थी पर फिर भी जब वे मरे तब उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था। जब तक यह धन अपने पास है तभी तक ही अपना है। जब यह अपने पास नहीं है तब यह किसी का सगा नहीं रह जाता। इस धन की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि जब यह मनुष्य के पास होता है तब अपने-पराए सभी उसके अपने बन जाते हैं। स्वार्थ के कारण उस धनी को भगवान कहने लगते हैं और उसके सौ खून भी माफ कर देते हैं। वैसे तो धन भगवान नहीं है परन्तु लोग उसे भगवान से कम भी नहीं मानते।
            धन नमक की तरह होता है जो भोजन का स्वाद बढ़ाता है परन्तु सब्जी में इसे यदि गलती से अधिक डाल दिया जाए तो मुँह का स्वाद बिगाड़ देता है। उसी प्रकार अपने पास धन आवश्यकता के अनुसार हो तो वह जीवन में आनन्द देता है। सही प्रकार की खुशियॉं देता है।‌ लेकिन जब यह‌ जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो जिन्दगी का स्वाद बिगाड़ देता है। 
             धन की मादकता के कारण बच्चे अपने माता-पिता के अहंकार को देखते हुए बिगड़ जाते हैं। वे भी अपने माता-पिता की तरह सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे। दुनिया को अपने पैरों तले कुचलने की बातें करने लगते हैं। ऐसे घमण्डी लोग दूसरों को हीन समझने की भूल करने लगते हैं। इसी नशे में वे गलत रास्ते पर चलकर न्याय व्यवस्था के दोषी बनने लगते हैं। इस विषय में समाचार पत्र, टीवी और सोशल मीडिया गाहे-बगाहे हमें बताते रहते हैं।
           धन को जीवन में यदि साधन मानकर चला जाए तो श्रेयस्कर होता है। जहाँ मानव इसे साध्य मानने की भूल करता है, वहीं उसके पथभ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जाती है। खूब धन कमाइए और उसका सदुपयोग सत्कार्यों में लगाकर कीजिए। घर-परिवार की सभी आवश्यकताओं को और दायित्वों को पूरा करते हुए दान धर्म का निर्वहण भी करना चाहिए। वैसे यह कर पाना बहुत कठिन होता है। फिर भी प्रयास करना चाहिए कि उसे अपने सिर पर सवार न होने दिया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 25 जून 2026

माता मनुष्य की प्रथम गुरु

माता मनुष्य की प्रथम गुरु

माता मनुष्य की प्रथम गुरु कहलाती है। विद्यालय में बच्चा बाद में जाता है पर माता उससे पहले घर में ही बच्चे को सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान करवा देती है। उसका अपनी सन्तान से रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से नौ माह अधिक होता है। इस धरती पर लाने के कारण उसे भगवान का रूप कहा जाता है। वह बच्चे को संस्कारित करती है। इस कारण ऐसे बच्चे को सर्वत्र प्रशंसा मिलती है।
          बच्चे का लालन-पालन वह बहुत ही ममता और प्यार से करती है। स्वयं गीले में सो जाती है परन्तु बच्चे को सदा सूखे में सुलाती है। अपना सारा सुख और आराम बच्चे के लिए कुर्बान कर देती है। उसकी ममता के समक्ष दुनिया के सभी सुख फीके पड़ जाते हैं। जब बच्चा पहली बार मॉं शब्द का उच्चारण करता है तो वह अपने बच्चे पर बलिहारी जाती है।
            उसके चरणों में ही मनीषियों ने स्वर्ग की अवधारणा की है। भगवान गणेश ने माता पार्वती और पिता महादेव की परिक्रमा करके सारी पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर ली थी। देवताओं ने उनके इस कदम की सराहना की थी। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य आयुपर्यन्त उसकी सेवा करने के उपरान्त भी उसके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। जब वह अशक्त हो जाए तब बच्चे की तरह उसकी देखभाल करनी चाहिए। उसके खान-पान और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
        स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन की एक घटना है कि एक नवयुवक उनका शिष्य बनने की इच्छा से उनके पास आया और उनके चरणों में गिर गया। वहउनसे प्रार्थना करने लगा, "अपना शिष्य बनाकर मुझे दीक्षा दीजिए।"
          युवक की बात सुनकर परमहंस जी ने मुस्कुराकर उससे पूछा, "परिवार में तुम्हारे अतिरिक्त और कौन-कौन लोग हैं? अथवा क्या वह अपने घर पर अकेला ही है?"
           उनका यह प्रश्न सुनकर युवक ने  उत्तर दिया, "उसके घर में सिर्फ उसकी बूढी माँ है और कोई नहीं है।"
            युवक के उत्तर को सुनकर परमहंस जी को क्रोध आया। परन्तु अपने क्रोध को पीकर उन्होंने उससे पूछा, "तुम साधु क्यों बनना चाहते हो?"
             युवक ने कहा, "वह मोह-माया और ऊँच-नीच से युक्त संसार को छोड़कर मुक्ति पाना चाहता है।"
             इस उत्तर को सुनकर परमहंस जी ने उसे समझाते हुए कहा, "अपनी बूढ़ी माँ को असहाय छोड़कर तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकती। सच्ची मुक्ति तुम्हें माँ की सेवा करने से मिलेगी। मानव जीवन का यही सार है।" 
            विद्याध्ययन करने के पश्चात नव जीवन में प्रवेश करने वाले युवा शिष्य को आचार्य शिक्षा यही देते हैं- 
                मातृ देवो भव। 
 अर्थात माँ ईश्वर का रूप होते हैं। वही सबसे बड़ा देवता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने माता को अपना प्रतिनिधि बनाकर इस संसार में भेजता है। माता के प्रति अपने सारे दायित्वों का निर्वहण प्रसन्नता पूर्वक करने चाहिए।
            माता को जीवन में कोई कष्ट न हो, उसके सुख-साधन का ध्यान रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना है। मन्दिर मे जाकर पत्थर की मूर्तियों के सामने माथा रगड़ने के स्थान पर यदि घर में बैठे जीवित माता-पिता रूपी भगवान की पूजा की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। यही माता का सच्चा श्राद्ध तभी कहलाता है जब सन्तान जीवित रहती माता की तन, मन और धन से सेवा करता है।
          सारे रिश्ते-नाते और बन्धु-बान्धव मनुष्य को मझधार में छोड़ सकते हैं परन्तु ममता की छाया से वह कभी वंचित नहीं हो सकता। वहाँ आकर जो स्वर्गिक आनन्द उसे मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए सयाने कहते हैं-
       माँवा ठण्डियाँ छावाँ कि छाँवा कौन करे?
अर्थात् माँ शीतल छाया की भाँति होती है। उसके अलावा और कहीं से इन्सान को ठण्डी छाया नहीं मिल सकती।
          इसका सबसे बड़ा कारण है कि पुत्र कुपुत्र बन सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती। आवश्यकता होने पर वह अपने बच्चों की बुराइयों पर भी पर्दा डाल देती है। दुनिया की नजरों में उसे हमेशा ऊँचा उठा हुआ देखना चाहती है। सबसे बढ़कर वह सन्तान को गरम हवा भी नहीं लगने देना चाहती। 
          उसका वश चले तो अपने बच्चों के सारे दुख स्वयं झेल ले। इन्सान को दुनिया से चाहे दुत्कार मिले लेकिन माता के लिए वह सबसे श्रेष्ठ होता है। वह कभी अपनी सन्तान को अपमानित होते हुए नहीं देख सकती। सन्तान को यदि कष्ट होता है तो उसका कलेजा छलनी हो जाता है। माता के अतिरिक्त ऐसा निस्वार्थ प्रेम किसी और रिश्ते में नहीं मिल सकता। उसकी सेवा करने से चारों धामों की यात्रा के पुण्य का फल मिलता है तथा मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 24 जून 2026

पति-पत्नी

पति-पत्नी

पति-पत्नी की जोड़ी ईश्वर बनाकर भेजता है, ऐसा सभी मानते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। इसमें हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही ये संयोग बनता है। इसके लिए किसी की च्वाइस का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः उस रिश्ते की पवित्रता व गरिमा बनाए रखना और उसे बिना किसी शिकवा-शिकायत के निभाना हम सभी मनुष्यों का नैतिक दायित्व है। अन्य सभी रिश्ते इस एक रिश्ते पर कुर्बान किए जा सकते हैं। 
        भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की परिकल्पना इसी सत्य को ही उजागर करती है। महाकवि कालिदास ने पति-पत्नी को शब्द और अर्थ की तरह परस्पर मिला हुआ कहा है, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शब्द को अर्थ से और अर्थ को शब्द से अलग करना असम्भव है, उसी प्रकार पति और पत्नी को अलग-अलग ईकाई मानना भी सर्वथा गलत है। इसीलिए उनके दोनों के लिए एक शब्द 'दम्पत्ति' का प्रयोग किया जाता है। उन्हें दो जिस्म और एक जान कहा जाता है।
        वाटसअप पर किसी ने यह कहानी पोस्ट की थी, जो हम सभी को इस रिश्ते की वास्तविकता को समझाती है। किसी कॉलेज में Happy married life पर एक  workshop हो रही थी, उसमें शादीशुदा जोड़े भाग ले रहे थे। जब प्रोफेसर मंच पर आए तो उन्होंने नोट किया कि सभी पति-पत्नी शादी पर जोक सुनाकर हँस रहे थे। यह देख कर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले एक खेल खेलते है। उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे। 
        सभी लोग खुश हो गए और उन्होंने खेल के विषय में पूछा? तब प्रोफ़ेसर ने एक शादीशुदा लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लेक बोर्ड पर ऐसे 25-30 लोगों के  नाम लिखो जो तुम्हें सबसे अधिक प्रिय हों। लड़की ने पहले अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे सम्बन्धियों, दोस्तों, पड़ोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए।
           अब प्रोफ़ेसर ने उसे उनमें से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए। प्रोफेसर ने उसे और 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने थोडा सोचकर अपने पड़ोसियों के नाम मिटा दिए। अब प्रोफ़ेसर ने और 10 नाम मिटाने को कहा। लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए। 
        अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी-पापा, पति और बच्चे का नाम था। अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो। लड़की असमंजस में पड़ गयी। बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने माता-पिता का नाम मिटा दिया।
        सभी लोग स्तब्ध और शान्त बैठे थे क्योकि वे जानते थे कि ये गेम सिर्फ वह लड़की ही नहीं खेल रही थी, उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था। अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे उसके पति और बेटे का। प्रोफ़ेसर ने एक और एक नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की अब बहुत सहमी गयी। बहुत सोचने के बाद रोते हुए उसने अपने बेटे का नाम मिटा दिया।
          प्रोफ़ेसर ने  उस लड़की से कहा तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ और सभी की तरफ गौर से देखा और पूछा- 'क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।'
          कोई भी इस प्रश्न उत्तर नहीं दे सका। सभी मुँह लटकाकर बैठे हुए थे। प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और ऐसा करने का कारण पूछा। जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया और तो और तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया, उसका भी नाम तुमने मिटा दिया? लड़की ने जवाब दिया कि अब मम्मी-पापा बूढ़े हो चुके हैं, कुछ साल बाद वे मुझे और इस दुनिया को छोड़कर चले जाएँगे। मेरा बेटा जब बड़ा हो जाएगा तो 
जरूरी नहीं कि वह शादी के बाद मेरे साथ ही रहे। 
        लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है, तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभाएँगे। इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज मेरे पति हैं। प्रोफेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूँज से लड़की को सलामी दी।
          प्रोफेसर ने कहा तुमने बिल्कुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात् अपने पति के बिना नहीं रह सकती। मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब से ज्यादा अजीज होता है। सभी पति और पत्नियों के लिए ये वास्तव में सत्य है, इसे कभी मत भूलना।
        वास्तव में गृहस्थ जीवन की सच्चाई यही है कि सभी रिश्ते-नातों से हम दूर हो सकते हैं पर पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ हाथ थामे हुए जीवन के अन्तिम समय तक साथ निभाते हैं। जीवन साथी में लाख कमियाँ हों परन्तु उन कमियों को अनदेखा करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूरी करें। एक बात और कहना चाहती हूँ कि जो पति-पत्नी परस्पर एक-दूसरे को सम्मान नहीं दे सकते उन्हें घर अथवा बाहर कोई नहीं पूछता। स्वार्थी बनकर भी यदि रिश्ता निभाना पड़े तो सौदा महँगा नहीं है। अतः सभी से विनम्र अनुरोध है कि इस सत्य को स्वीकार करते हुए दोनों परस्पर विश्वास और प्रेम को खण्डित न होने दें। फूँक-फूँककर कदम बढ़ाते हुए अपने-अपने जीवन में पारदर्शिता बनाकर रखें। एक-दूसरे के लिए ही जीना और मरना श्रेयस्कर है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 23 जून 2026

कर्म का फल

कर्म का फल

कर्म का विधान बहुत कठोर है। उससे कोई बच नहीं सकता। वह किसी को भी नहीं छोड़ता। मनुष्य यदि किसी का बुरा करता है तो वह उसके साथ रहता है और उसका दुष्परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। यदि वह अच्छा कार्य करता है तो वह पलटकर उसके ही सामने आता है। तब उसे जीवन में सुख-समृद्धि रूपी फल मिलता है। यानी कि सच्चाई यही है कि बुराई का फल कष्टदायी होता है और उसकी अच्छाई का फल उसे खुशियाँ देता है। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
            जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
       ‌‌        ‌‌     अथवा
             जैसा करोगे वैसा भरोगे।
 अर्थात् मनुष्य द्वारा की गई अच्छाई या बुराई का परिणाम उसके सामने आ ही जाता है।
          इसी विषय को स्पष्ट करती एक बोधकथा है। एक औरत अपने परिवार के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी। एक रोटी वह किसी भूखे व्यक्ति के लिए पकाकर उसे खिड़की के सहारे रख देती थी। जिसे कोई भी भूखा व्यक्ति वहॉं से ले जाकर अपना पेट भर सकता था।
        एक कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन उस रोटी को ले जाता था। धन्यवाद देने के स्थान पर अपने रस्ते पर चलता हुआ बड़बड़ाता रहता था, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौटकर आएगा।" 
           इस तरह दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा। वह कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन रोटी लेकर  बड़बड़ाता हुआ चला जाता। वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी थी। वह मन-ही-मन सोचने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो कहता नहीं और न जाने क्या-क्या उल्टा-सीधा बड़बड़ाता रहता है? मतलब क्या है इसका।"
           एक दिन क्रोधित होकर उसने निर्णय लिया और बोली, "मैं इस कुबड़े से अब निजात पाकर ही रहूँगी।"
           उस दिन उसने रोटी में जहर मिला दिया। जैसे ही उसने रोटी को खिड़की पर रखा, अचानक उसके हाथ काँपने लगे और वह बोली, "हे भगवन, मैं यह क्या करने जा रही थी?" 
            उसने तुरन्त उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया। फिर उसने एक ताजी रोटी बनाई और खिड़की के सहारे रख दी। हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह इससे बिलकुल बेखबर था कि आज उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
           वह महिला खिड़की पर रोटी रखते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगी, "हे प्रभु, मेरे पुत्र को सही-सलामत रखना और घर वापिस भेज देना जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए शहर से बाहर गया हुआ था।"
         महीनों से उसकी कोई खबर नहीं मिली थी। ठीक उसी शाम उसका बेटा घर आया। वह कमजोर हो गया था। उसके कपड़े फट गए थे और वह भूख के कारण बेहाल हो गया था। 
             माँ को देखते ही उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार ही है कि मैं आज यहाँ हूँ। जब घर से एक मील दूर था तो मैं भूख के कारण गिर गया था। मैं मर गया होता यदि वहाँ से गुजर रहे एक कुबड़े की नजर मुझ पर न पड़ी होती। उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। भूख के मारे मानो मेरे प्राण निकले जा रहे थे।"
             मैंने उससे कहा, "बाबा खाने के लिए कुछ हो तो दे दो।" 
           उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कहते हुए दे दी, "मैं हर रोज यही खाता हूँ। आज मुझसे ज्यादा तुम्हें इसकी जरूरत है। बेटा, यह खा लो और अपनी भूख शान्त करो।"
           अपने बेटे की यह बात सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा ले लिया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूमने लगी कि यदि उसने सुबह जहर मिली हुई रोटी को आग में जलाकर नष्ट नहीं किया होता तो शायद आज उसका बेटा उसी रोटी को खाकर मर जाता?
             उस महिला को उन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ आ गया, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे तो वह तुम तक लौटकर आएगा।
            इस कहानी को पढ़कर यही बात समझ में आती है कि हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अच्छा करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस समय उस कृत कार्य के लिए आपकी सराहना या प्रशंसा हो अथवा न हो। अपने प्रयासों को यत्नपूर्वक बढ़ाते रहना चाहिए। पता नहीं किस मोड़ पर हमारी बुराई हमसे सर्वस्व छीन ले। इसके विपरीत हमारी अच्छाई हमें बहुत कुछ दे जाए।
चन्द्र प्रभा सूद