ईश्वर भक्तों का वर्गीकरण
परमपिता परमात्मा की इस सुन्दर सृष्टि में विभिन्न प्रकार के लोग विद्यमान हैं। वे अलग विचार और स्वभाव वाले होते हैं। सबके चारित्रिक गुण एवं दोष भी एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न होते हैं। ईश्वर के प्रति उनके कैसे भाव हैं? इसे आधार बनाकर यदि उनका वर्गीकरण किया जाए तो उन लोगों को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। यानी इस संसार में प्रभु के भक्त तीन तरह के लोग होते हैं - प्रथम कोटि, मध्यम कोटि और अन्य कोटि।
प्रथम श्रेणी में वे लोग आते हैं जो परमपिता परमात्मा के प्रति अपने मन में अतिशय अनुराग रखते है। ऐसे मनुष्य ईशचर्चा के अतिरिक्त कभी कोई अन्य बात करना ही नहीं चाहते। सोते-जागते, उठते-बैठते वे प्रभु भक्ति में ही लीन रहना चाहते हैं। यही भक्त लोग ईश्वरमय कहलाते हैं। इस संसार में वे जल में कमल की भॉंति विचरण करते हैं। ऐसे लोगों को हम ईश्वर का सच्चे भक्त कहते हैं।
उन्हें लगता है कि यह जीवन उस मालिक की अमानत है। इसलिए निस्वार्थ भाव से उसका ध्यान और स्मरण करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। ऐसा विचार करते हुए वे लोग सदा अपनी सच्ची साधना बिना किसी दिखावे के करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे ईश्वर की भक्ति में लीन रहने के कारण अपने दायित्वों से मुॅंह मोड़ लेते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वे अपने सभी कार्य ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। उनमें कर्त्तापन का भाव समाप्त हो जाता है।
दुनिया के लोग उनके विषय में कुछ भी कहते रहें, वे अपनी धुन के पक्के होते हैं और अपने चुने हुए मार्ग पर बिना पीछे मुड़कर देखे आगे बढ़ते चले जाते हैं। ऐसे ही लग्नशील लोग अन्ततः प्रभु की शरण में जाते हैं और इस संसार के चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। निस्सन्देह यही लोग ईश्वर के उत्तम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो सदा ही सांसारिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते हैं। उनका मन संसार में रमता है। वे सदा ही भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते रहते हैं। वे ईश्वर नाम की किसी सत्ता को नहीं मानते। कभी भी उसकी सत्ता को चुनौती देने से परहेज नहीं करते। उन्हें स्वयं को भगवान कहलवाने में कोई संकोच नहीं होता बल्कि वे आनन्दित होते हैं।
जो लोग उस मालिक के परमभक्त हैं, वे उनका उपहास करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग भी करते हैं। जब उन पर अत्यधिक कष्ट आते हैं तब मजबूरी में ही सही उसकी शरण में जाते हैं। उस समय मालिक को कोसने और गाली-गलौच करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग मध्यम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
तीसरी श्रेणी में वे लोग आते है जो प्रभुचर्चा करते अवश्य हैं परन्तु उनकी वृत्ति उसमें नहीं लगाती। फिर भी वे चाहते हैं कि सभी लोग उनको ईश्वर का परम भक्त मानें, उनकी सराहना करें और भक्त होने का सम्मान दें। इसलिए वे दान-पुण्य का प्रदर्शन करते हैं और प्रभुभक्ति का ढोंग करते हैं। वे अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं। चर्चा में बने रहें, इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
इसके साथ-साथ कालाबाजारी करना, हेराफेरी करना, भ्रष्टाचार में लिप्त होना, किसी का गला काटना आदि दुष्कार्य करने में भी परहेज नहीं करते। इस प्रकार उनकी भक्ति का दिखावा और दुर्व्यसनों में वृत्ति एकसाथ चलते रहते हैं। उनकी सफेदपोशी बनी रहे इसके लिए वे अनेकानेक तिकड़में भिड़ाते रहते हैं। समाज के लोग इनके सामने किसी भी कारण से कुछ न कहें पर उनकी पीठ पीछे उनका तिरस्कार करते हैं। उनके विषय में कभी अच्छा नहीं बोलते।
ये अधम कोटि के लोग सदा ही दो नावों पर सवार होना चाहते हैं। परन्तु वे यह बात भूल जाते हैं कि दुनिया का दस्तूर यही है कि दो नावों पर सवार होने वाले व्यक्ति कभी तरते नहीं हैं, वे निश्चित ही डूब जाते हैं। उस समय उन लोगों का बचना कठिन हो जाता है।
उत्थान और पतन की एक सहज गति होती है। इन्हें हम एक ही सिक्के के दो पहलू कह सकते हैं। अब हमारा चुनाव है कि हम सिक्के की किस ओर का चयन करते हैं। ईश्वरोन्मुख व्यक्ति सदा आध्यात्मिक उन्नति करते हैं और उससे विमुख रहने वाले पतन या अधोगति की ओर जाते हैं। अवचेतन मन की पाशविक ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य को पुनः पुनः अपने जाल में फंसाती रहती हैं। वे उसे विषय-भोगों की ओर प्रवृत्त करती रहती हैं। मनुष्य चाहकर भी स्वंय को उनसे विलग नहीं कर पाता और पतन के मार्ग पर चल पड़ता है।
अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह किस और जाना चाहता है। अपनी मानवीय कमजोरियों पर अंकुश लगाकर जन्म-जन्मान्तरों के बन्धनों से मुक्त होकर वह सद् गति प्राप्त करना चाहता है अथवा विषय-भोगों में डूबकर चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ जन्म-मरण के बन्धन में बँधे रहना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद