शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

पितरों को श्रद्धा से तृप्त करें, श्राद्ध से नहीं

पितरों  को श्रद्धा से तृप्त करो, श्राद्ध से नहीं 
      
संसार में हर व्यक्ति अपने जीवन में कल्याण की कामना करता है। वह अपने परिवारों जनों तथा समाज  में एक अच्छी सन्तान होने का मेडल पहनना चाहता है। इस प्रसिद्धी को पाने का एकमात्र यही उपाय है कि अपने बुजुर्ग होते माता-पिता को श्रद्धापूर्वक अपने आचार-व्यवहार से प्रसन्न करना चाहिए। 
           जहॉं तक हो सके उनके जीवनकाल में ही उनकी सेवा कर ली जाए। उनके खान-पान का समुचित ध्यान रखा जाए। उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न बरती जाए। उनके वस्त्रों के प्रति सजग रहा जाए। उनके साथ कुछ समय व्यतीत किया जाए ताकि वे अकेलेपन से घबरा न जाऍं। जो बच्चे ऐसा करते हैं उनका घर ही मन्दिर बन जाता है और वहॉं पत्थर की मूर्तियों का स्थान जीवित मूर्तियॉं यानी उनके माता-पिता ले लेते हैं।
          गुरु नानक देव जी के जीवन से ‌जुड़ी एक घटना कहीं पढ़ी थी, उसे यहॉं उद्धृत करना‌ चाहती‌ हूॅं। एक बार गुरू नानक देव जी भ्रमण करते हुए शिष्यों सहित तीर्थराज हरिद्वार गए । वहाॅं उन्होनें देखा कि हजारों भावुक अन्ध विश्वासी श्रद्धालु लोग गंगा में खड़े होकर मरे हुए माता-पिता आदि को पानी द्वारा तर्पण व पिण्ड दान कर रहे हैं।   
       नानक देव जी ने सोचा कि इन भोले लोगों कैसे समझाया जाय, अतः वे भी गंगा की धारा में खड़े होकर पंजाब की तरह मुॅंह करके दोनों हाथों से गंगा का पानी फैंकने लगे। स्वयं से विपरीत दिशा में जल फैंकते देख लोगों को आश्चर्य हुआ तो उन्होनें नानक देव जी से पूछा महाराज! आप ये क्या कर रहे हैं? 
            सरल स्वभाव गुरु नानक जी बोले, "भाइयो, मैं अपने खेत को पानी दे रहा हूँ।"  
         यह सुनकर सब लोग हंसने लगे और गुरु नानक जी से कहने लगे, "महाराज इस प्रकार आपके खेतों में पानी पहुॅंचना सम्भव है क्या?" 
       तब महात्मा नानक देव जी बोले, "ओ भोले लोगो! मेरा पानी मेरे पंजाब प्रान्त के खेतों में नहीं पहुँचेगा तो तुम्हारे मरे हुए माता-पिता जो किस योनि में किस देश में और अपने कर्मानुसार क्या फल भुगत रहे हैं, उन्हें तुम्हारा ये तर्पण पिण्ड दान कैसे पहुँचेगा ?" 
        लोगों को समझाते हुए गुरु नानक देव जी ने फिर कहा, "अतः इस पर विचार करो और अपने जीवित माता पिता और गुरुजनों को श्रद्धा व भक्ति भाव से तृप्त करो तभी तुम्हारा कल्याण होगा अन्यथा आप दुःख सागर में गोते ही खाते रहोगे।"
           इस घटना को पढ़कर यही प्रतीत होता है कि महापुरुषों के समझाने का‌ तरीका बड़ा विचित्र होता है। वे अपनी क्रियात्मकता से जन साधारण के मन में अपनी बात को बड़ी‌ सरलता से पहुॅंचा देते हैं। गुरु नानक देव जी के उपदेश के‌ बाद मेरे कहने के लिए कुछ नहीं बचता। यह अब आप सुधीजनों पर निर्भर करता है कि आप महापुरुषों का अनुसरण करना चाहते हैं या अन्धविश्वासों एवं रुढ़ियों में फसे रहना चाहते हैं।
           मैं बस इतना ही‌ कहना चाहती हूॅं कि अपने माता-पिता का ऋण जीवनभर उनकी सेवा करके भी नहीं चुका सकते। इसलिए उनके जीवनकाल में ही उन्हें इतना सन्तुष्ट कर दीजिए ताकि उनके परलोक सिधारने पर आपको किसी ढकोसले की आवश्यकता ही न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

मन से पार पाना कठिन

मन से पार पाना कठिन 

मानव मन से पार पाना बहुत कठिन कार्य कहलाता है। यह मन उसे बड़े ही नाच नचाता है। यह सदा आगे-ही-आगे भागता रहता है। इसकी गति बहुत तीव्र होती है। इसे बॉंधकर रखना मनुष्य के बस की बात नहीं है। मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है। यदि यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और चाहे तो गर्त में ढकेल सकता है।
        हमारा यह मन नित नए मूड पर आधारित रहता है। जिसे भी देखो वह यही कहता सुनाई पड़ता है कि मेरा मूड नहीं है। यह कभी प्रसन्न हो जाता है तो कभी उदास रहता है। कभी-कभी यह बच्चों की तरह चहकने लगता है। उस समय ऐसा लगता है मानो इन्सान के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे। कभी उदास या मायूस हो जाता है और फिर निराशा के सागर में गोते खाने लगता है यानी डूबने-उबरने लगता है। कभी ऐसा उखड़ जाता है कि इन्सान कहने लगता है कि मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा।
        ये सब इस मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं जो समय-समय पर मनुष्य को अपना रंग दिखाती रहती हैं। ईर्ष्या-द्वेष, हर्ष-विषाद, क्रोध-प्यार, आश्चर्य आदि भावनाएँ भी इसी मन में निवास करती हैं। ये भाव उसके चरित्र का एक अहं हिस्सा बन जाते हैं। जिस भी भाव की अधिकता समय विशेष पर होती है, उसी के अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगता है। 
        मन को मौजी इसीलिए कहते हैं कि यह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। कोई कुछ भी कहता रहे, यह उसे अनसुना कर देता है। मानो इसे किसी भी व्यक्ति से कोई लेना-देना ही नहीं हैं। मनीषी कहते हैं-
      मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
अर्थात् यदि मनुष्य अपने मन की बात मानकर, निराश होकर, थक-हारकर बैठ जाए तो असफलता ही उसके हाथ लगेगी। परन्तु यदि मनुष्य अपने मन की निराशा को दरकिनार करके साहसिक कार्य कर जाता है तो कोई ऐसा कारण नहीं कि वह सफलता की सीढ़ियाँ न चढ़ सके। अब यह निर्णय तो उसका अपना ही होता है कि वह अपने जीवन को किस ओर ले जाना चाहता है।
           मन को हम चमत्कारी शब्द कह सकते हैं। भाषा की दृष्टि से यदि मन के बाद 'न' शब्द जोड़ दिया जाए तो एक नया शब्द मनन बन जाता है। इसके विपरीत यदि मन से पूर्व न शब्द को जोड़ा जाए तो नया शब्द 'नमन' बन जाता है। मनुष्य यदि अपने जीवन में यथायोग्य प्रणाम अथवा नमन करे और मनन करने का अभ्यास कर ले तो निस्सन्देह उसका यह जीवन सार्थक हो जाएगा।
        यह मन हमारे शरीर रूपी रथ की लगाम है। इस लगाम को अनुशासन में रखना बहुत आवश्यक होता है। इस पर विवेक या बुद्धि का नियन्त्रण होना बहुत आवश्यक होता है। यदि लगाम न कसी जाए तो इन्द्रियाँ रूपी घोडे यहाँ वहाँ भागने लगते हैं। यदि वह इसे चलाने में कोताही करेगा तो मानव शरीर में बैठा यात्री रूपी आत्मा अपने गन्तव्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। 
          हमारा यह मन आकर्षक और लुभावने रास्तों पर चलकर बड़ा खुश रहता है, उसे शार्टकट भाते हैं। चाहे आगे जाकर उस गलती का कितना ही भयंकर परिणाम क्यों न हो। इस मन का क्या? वह तो अपने बचाव में सौ बहाने गढ़ लेगा और स्वयं को सन्तुष्ट कर लेगा। लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भुगतना तो मनुष्य को ही पड़ता है। चारों ओर से प्रश्नों की बौछार को उसे ही सहना होता है।
       गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि
मन बहुत चंचल है इसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।
    मनीषी समझाते हुए कहते हैं-
      मन साडे आखे नहीं लगदा 
    अस्सी मन दे आखे क्यों लगिए
इस उक्ति का तात्पर्य है कि जब मन हमारे कहने पर नहीं चलता तो हम उसके कहने पर क्यों चलें? यदि इसके कहने पर चलेंगे तो हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनने से कतराने लगेंगे। इसका कारण स्पष्ट है कि मन पंख लगाकर उड़ना चाहता है। इसलिए जब बिना मेहनत के सब कुछ पाना चाहेगा है तो प्रायः शार्टकट का सहारा लेगा। उस समय वह हमें कुमार्ग पर चलने के लिए विवश करेगा ओर हम खुशी-खुशी उसके सुझाए मार्ग पर चल पड़ेंगे। फिर वहाँ से लौटकर आना हमारे लिए बहुत ही कठिन हो जाएगा।
        यह मन भी सच्चाई और ईमानदारी की कठिन डगर पर चलने के लिए मनुष्य को हमेशा हतोत्साहित करता है। हालाँकि यह मार्ग कठिन भी होता है और लम्बा भी होता है पर इस पर चलने से हमेशा शुभ ही होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य को सफलता इसी राह पर चलकर मिलती है।
          मन के कहने पर यदि मनुष्य चलने लगें तो अनेकश: परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है। इसलिए उन्नति अथवा सफलता की कामना करने वाले लोगों को मन के अनुसार चलने के बजाय अपने तरीके से उसे चलाना चाहिए। उसे यत्नपूर्वक साधकर अपनी मर्जी से चलाना ही श्रेयस्कर होता है। इससे मनुष्य का जीवन भटकाव से बचा रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 30 सितंबर 2026

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए हर व्यक्ति को बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए। यद्यपि इस अवस्था में हर मनुष्य शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है। शारीरिक अस्वस्थता के कारण वह किसी प्रकार का कठोर परिश्रम नहीं कर पाता। चलने-फिरने और काम-काज करने उसे में असुविधा होने लगती है। इस समय उसे अपनों के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है। 
         वृद्धावस्था  में व्यक्ति को स्वतन्त्रता की भी आवश्यकता होती है। वे पूर्ववत खाना-पीना, सोना-जागना, उठना-बैठना, घूमना-फिरना आदि अपनी इच्छानुसार करना चाहते हैं। जीवन के इस पड़ाव में ये सुविधाएँ मिल जाएँ तो उनका जीवन सुखद हो सकता है। इस अवस्था में  कुछ लोगो में खाने-पीने की ललक बढ़ जाती हैं। उन्हें अपनी इच्छा से जीवन यापन की सुविधा मिलना बहुत जरूरी है।
        इस आयु में व्यक्ति बहुत संवेदनशील हो जाता है। उसे सभी अपनों से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार की अपेक्षा होती है। यदि ऐसे हालात में अपने बच्चे उपेक्षा करने लगें तो बुजुर्ग व्यक्ति टूटने लगता है। उसे यही लगता है कि जिन बच्चों के लिए उसने अपना सारा सुख-आराम छोड़कर उनकी जिन्दगी बनाई, वही विमुख हो रहे हैं। यह बात उन्हें पच नहीं पाती।
        अपनी वृद्धावस्था का समय बिना कष्ट के सुविधापूर्वक व्यतीत हो, उसके लिए सबसे पहले अपने आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा। सबसे पहले अपने बच्चों पर निर्भर रहने का विचार त्याग देना चाहिए। यदि बच्चे अपना कर्तव्य समझकर वृद्धावस्था में माता-पिता की सेवा करें तो बहुत अच्छा है अन्यथा उनसे किसी प्रकार की कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। समय के साथ-साथ उनकी प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं।
          अपने व्यवहार को यथासम्भव सन्तुलित रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी यह विचार मन में नहीं रखना चाहिए कि अपनी वृद्धावस्था को आधार बनाकर किसी से सेवा करवा ली जाए अथवा सम्मान प्राप्त कर लिया जाए। यदि किसी सेवक से अपने कार्य करवाएँ तो उसे पूरा पारिश्रमिक देना चाहिए ताकि दोबारा उसे कोई काम कहा जाए तो वे कभी आनाकानी न करें।
          बड़ों को चाहिए कि वे अपने बच्चों के जीवन में दखलअंदाजी न करें। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने अपना जीवन जब अपनी इच्छाओं व शर्तो पर जिया है तो बच्चों को भी उनका जीवन अपने तरीके से जीने देना चाहिए।
        अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों के साथ नहीं करनी चाहिए और अपने बच्चों, बन्धु-बान्धवों किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ऐसा करने से निराशा हाथ लगती है और मन उदास होने लगता है। सबसे वितृष्णा होने लगती है जो मनुष्य को नकारात्मक बनाती है।
        यदि बच्चे साथ न रहना चाहें तो उन पर दबाव नहीं डालना चाहिए और न ही उन्हें भला-बुरा कहकर अपने मन को व्यथित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए, अपने उसी घर में रहा जाए जहाँ जीवनभर की यादें जुड़ी हुई हों। वहाँ जीवन सुविधा से जिया जा सकता है।
          इस आयु में उन लोगों को अपना मित्र बनाना चाहिए जो उनकी मनोस्थिति को भली-भाँति समझते हों तथा उनके जीवन के कठिन पलों में सहयोगी बन सकें। सब लोगों की बातें सुन लेने में कोई हर्ज नहीं है। पर निर्णय सदा अपने विवेक को ही आधार बनाकर लेना चाहिए।
      अपने जीवन में थककर कभी हारना नहीं चाहिए। अकेले रहते हुए स्वयं ही सदा अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। समय-समय पर डाक्टर के पास जाकर स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श लेते रहना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो चिकित्सीय परीक्षण भी करवाते रहना चाहिए। जहाँ तक हो सके पौष्टिक भोजन खाना चाहिए और हर सम्भव प्रयास करना चाहिए कि अपने काम अपने हाथों से करने चाहिए, किसी पर भी निर्भर नहीं रहना चाहिए।
        यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अपनी जिजीविषा को बनाए रखें ताकि जीवन में उत्साह बना रहे। निराशा को किसी भी कारण से अपने मन में स्थान नहीं देना चाहिए। किसी के भी समक्ष अपनी असहायता का रोना रोकर सम्बन्धों की भीख नहीं माँगनी चाहिए। 
      सबसे अहं बात यह है कि बच्चों को अपना व्यापार, अपनी धन-सम्पति अवश्य सौंपिए परन्तु अपने पास इतना बैंक बेलेंस और भौतिक संपत्ति रख लेनी चाहिए जिससे अपनी वृद्धावस्था का समय अपने साथी के साथ सुविधापूर्वक व्यतीत हो सके। किसी के भी समक्ष अपनी जरूरतों को पूरा करने हेतु पैसे के लिए हाथ न पसारना पड़े।
         अपने समय का सदुपयोग सामाजिक कार्यो, ईश्वर भजन, स्वाध्याय, योग आदि में करना चाहिए। उस जगज्जननी माता यानी ईश्वर से अपने कुशल-क्षेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। वही रक्षक है और हर कदम पर सहयता करने वाला है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

नश्वर मानव देह

नश्वर मानव देह

मानव देह की नश्वरता के विषय में कोई सन्देह नहीं है। इस संसार को असार कहा जाता है। हमारे ग्रन्थों का कहना है कि जिस जीव का जन्म इस संसार में होता है, उसकी मृत्यु निश्चित होती है। यह शरीर जीव को अपने पूर्वकृत कर्मो के अनुसार कुछ निश्चित समयावधि के लिए मिला है। जब भी यह समय सीमा समाप्त हो जाती है तो उसे इस भौतिक शरीर को त्यागना पड़ता है। इसके लिए उसकी राय का कोई मूल्य नहीं होता। वह चाहे अथवा न चाहे, कितना रोना-धोना कर ले, मिन्नतें कर ले उसे एक क्षण की भी मोहलत नहीं मिलती।
         नश्वर मानव देह का अर्थ है कि मानवीय शरीर जिसका अन्त या नाश निश्चित है। मनुष्य का यह भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पंचतत्वों से बना हुआ है। एक दिन जब यह मृत हो जाता है तो उसे अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। उस समय वे पांचों तत्व उन उन तत्त्वों में जाकर मिल जाते हैं। इस शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है। यही सार तत्त्व है। 
          वेद, उपनिषद् आदि महान ग्रन्थ हमें बार-बार चेतावनी देते हुए कहते हैं, 'हे मानव, इस नश्वर देह का मोह बिल्कुल मत करो। यथाशीघ्र शुभकर्मो की ओर प्रवृत्त हो जाओ।'
         यजुर्वेद का निम्न मन्त्र शरीर की नश्वरता और शुभकर्मों की शुचिता के प्रति यह उद् घोष करता है-
       वायुरनिलममृतमवेदं    भस्मान्तँ     शरीरम्।
       ऊँ ऋतो स्मर कृतँ स्मर ऋतो स्मर कृतं स्मर।
अर्थात् प्राणवायु शरीर में रहता है, वह मृत्यु के समय विश्व के प्राण में लीन हो जाता है। यह शरीर तभी तक है जब तक वह भस्म नहीं हो जाता। हे मनुष्य! सत्कर्म को स्मरण कर, जो कर्म अब तक कर चुका है उन्हें भी स्मरण कर।
        यह मन्त्र हमें स्पष्ट आदेश देता है कि मनुष्य का यह शरीर नश्वर है। अपने भूतकाल में किए गए कर्म या जो कर्म वर्तमान में कर रहे हैं अथवा जो कर्म भविष्य में करने वाले हैं, उन सब कर्मों की ओर मनुष्य को ध्यान देना चाहिए। 
        यदि मनुष्य तन पाकर वह शुभकर्म नहीं करता तो निश्चित ही उसे अपने आगामी जन्मों में मनुष्येतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। वे सभी केवल भोग योनियाँ ही कहलाती हैं जहाँ जीव मात्र अपने किए गए दुष्कर्मों का भोग करके उनसे मुक्त होता है। उसे उन योनियों में सुकर्म करने की बुद्धि ईश्वर नहीं देता। वहाँ उसे अपने कर्मो के अधीन रहने की विवशता होती है।
          भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में शरीर के नाशवान होने और कर्म करने पर बल देते हैं। उनका कथन है कि सृष्टि के आदि से लेकर आज तक जीव ने विभिन्न रूपों में अनेक जन्म लिए हैं। आत्मा अपने पुराने, रोगी और कटे-फटे शरीर ऐसे बदलती है जैसे हम लोग फटे-पुराने या बदरंग हुए वस्त्रों को फैंककर नए कपड़े पहनते हैं। सरल शब्दों में कहें तो शरीर का यह परिवर्तन आत्मा का स्वभाव है। यही भाव निम्न श्लोक में है-
            जीर्णानि वासांसि यथा विहाय
            नवानि   गृह्णाति   नरोपराणि।
            तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
            न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
कहने का तात्पर्य है कि शरीर को  परिवर्तित करना आत्मा के लिए एक सतत प्रक्रिया है जिससे गुजरते समय इस आत्मा को जरा भी दुख नहीं होता। वह तो परम पिता परमात्मा का ही एक अंश है। इसलिए आत्मा को उससे मिलने की इच्छा बलवती होती रहती है। 
        श्रीकृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म पर बल दिया है। वे कहते हैं-
        कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
        मा कर्मफलहेतुर्मा ते संगोSस्त्वकर्मणि।।
अर्थात् कर्म करो पर कर्त्तापन का भाव न रखो। यदि मनुष्य स्वयं को कर्त्ता मानने लगता है तो उसका अहं भाव प्रबल होने लगता है। वही अहं भाव उसके पतन का निमित्त बनता है। कर्म करके उसे ईश्वर को समर्पित कर देने से मनुष्य निरहंकार हो जाता है। तब वह आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उस समय ईश्वर प्राप्ति की ओर वह अपने कदम बढ़ाने लगता है।
          भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें वही भक्त प्रिय है जो अपने कर्त्ता होने के मिथ्याभिमान को त्याग करके उनकी यानी ईश्वर की शरण में आ जाता है। 
        इस संसार में हर जीव और पदार्थ विनाशी या नश्वर है, केवल एक ईश्वर ही है जो अविनाशी है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी ईश्वर रूपी धुरी के इर्दगिर्द चक्कर लगाता रहता हैं।
        इसी कारण हर जीव का यह भौतिक शरीर भस्म होने वाला है। मानव का चोला प्राप्त करके यदि मनुष्य सकाम कर्म करता है तो उससे उसकी भौतिक उन्नति होती है। इसके विपरीत निष्काम कर्म करता हुआ वह आध्यात्मिक उन्नति करके मालिक का कृपा पात्र बन जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 28 सितंबर 2026

श्राद्ध किसका करना चाहिए

श्राद्ध किसका करना चाहिए?

पितृपक्ष में  श्राद्ध करने का विधान पुराणों  में बताया गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर श्राद्ध किसका करना चाहिए? मरे हुए परिवारी जनों का अथवा जीवित माता-पिता का? यह एक गम्भीर चिन्तन का विषय है।
        मुझे श्राद्ध का अर्थ यही समीचीन लगता है कि अपने जीवित माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, गुरु-आचार्य और अन्य वृद्धजनों तथा तत्ववेत्ता विद्वानों की श्रद्धापूर्वक सेवा करनी चाहिए।
        जीवित व्यक्ति ही अपनी सन्तान को उपदेश दे सकता है और अपने जीवन के अनुभव से संसार के व्यवहारों का ज्ञान करा सकता है। हर प्रकार से रक्षा कर सकता है। मरने के पश्चात कोई पितर नहीं होता क्योंकि पितर न तो आत्मा है और न ही शरीर है। आत्मा अविनाशी है। मृत्यु जब आत्मा और शरीर दोनों का सम्बन्ध छुड़ा देती है तब पितर नहीं रह जाते हैं। यदि ऐसा नहीं  माना जाता तब पितर शब्द का सम्बन्ध आत्मा से नहीं जुड़ सकता फिर श्राद्ध किया किसका किया जाएगा?
         वास्तव में जीव से माता-पिता आदि का सम्बन्ध नहीं होता, जीव और शरीर का संयोग विशेष से सम्बन्ध है। सारे भौतिक नाते-रिश्ते इस संसार में ही सम्बन्ध रखते हैं। मरने के पश्चात न कोई किसी का पितर रहता है और न कोई किसी की सन्तान। सब जीव अपना-अपना कर्म-फल भोगने के लिए इस संसार में आते है।
        कहते हैं पितर सूक्ष्म शरीर धारण करके श्राद्ध के दिनों में आते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन करते हैं। यदि ऐसा हो कि वे कभी पितृलोक से न आ सकें तो क्या ब्राह्मणों को खिलाया हुआ भोजन उन्हें मिल सकेगा? दूसरी बात क्या बिना स्थूल शरीर के वे भोजन कर सकते हैं?     
        यहाँ एक और प्रश्न मन में आता है कि  ब्राह्मणों के साथ जब पितर भोजन करते हैं तो पहले कौन खाता है? यदि वे एक-दूसरे के बाद खाते हैं तो झूठा खाते हैं जो शास्त्र व सिद्धान्त के अनुसार गलत है।
         मनुष्य किन लोगों का श्राद्ध करना चाहता है जिनका जन्म चौरासी लाख योनियों में से किसी एक में हो चुका है। यह भी पता नहीं कि उसका पितर पुनः मनुष्य बना है या कोई खूँखार जंगली जानवर या फिर कोई कीट-पतंगा।
        मनुष्य को यह भी तो नहीं पता होता कि उसका पितर इस समय किस अवस्था में है? वह रोगी है या स्वस्थ। यदि वह रोगी है तो ब्राह्मणों को हलवा, पूरी खीर आदि गरिष्ठ भोजन क्यों खिलाया जाए। उन्हें तो कड़वी दवा पिलानी चाहिए और मूँग की दाल खिलानी चाहिए।
        क्या यह सम्भव है कि पितर के नाम पर खिलाया जाने वाला भोजन उसे ही मिल रहा है? यदि भोजन पितर के पास पहुँच रहा है तो फिर ब्राह्मण का पेट नहीं भरना चाहिए, उसे तो भूखा ही रह जाना चाहिए।  
         यह तो वही बात हो गई कि किसी आदमी के पास पत्र भेजने के लिए लैटरबाक्स में दिया परन्तु उसका पता नहीं लिखा। अब बताइए क्या वह पत्र उस आदमी के पास पहुँचेगा? इसी तरह पितरों के पते के बिना ब्राह्मणों को खिलाने से भोजन पितरों के पास कैसे पहुँच जाएगा? यह तो कोरा अन्धविश्वास है।
        घर पर ब्राह्मणों को खिला देने से परदेश या परलोक जाने वाले का पेट नहीं भरता फिर तथाकथित मृत पितरों का पेट भरना भी असम्भव है। अत: मृतक व्यक्ति के नाम पर का श्राद्ध करना व्यर्थ है। इस तरह करके मनुष्य स्वयं को धोखा देता है।
        यदि श्राद्ध दान देने की भावना से किया जाए तो सुपात्र को दान देना चाहिए। इन तथाकथित समाज के ठेकेदारों को नहीं जो नौकरी या व्यापार करके अपनी आजीविका चलाते हैं। भोजन खिलाना ही है तो किसी अनाथालय में, वृद्धाश्रम में अन्धविद्यालय में या किसी भूखे-लाचार को खिलाइए। उनका पेट भरेगा तो दुआएँ देंगे।
        यदि अपने जीवनकाल में जीवित माता-पिता की सारी आवश्यकताओं को यथासमय पूरा किया जाए और उनकी यथाशक्ति सेवा की जाए तो ऐसे व्यक्ति को इन सब ढकोसलों को करने की कोई जरूरत नहीं होती। समय रहते सच्चे मन से जीवित पितरों का श्राद्ध करें अर्थात् श्रद्धापूर्वक अपने हाथों से उनकी सुख-सुविधा की सारी व्यवस्थाएँ करनी चाहिए। जीते जी उनकी खोज-खबर न लेकर मरे पीछे आडम्बर करने का न कोई लाभ होता है 
और न ही उसे कोई पुण्य मिलता है।
          शायद कबीरदास जी ने इसी लिए मृत्युभोज की कुप्रथा पर लिखा होगा। उनके शब्दों से ही लेख को समाप्त करना चाहती हूॅं -
        जियत हाड़ में दंगम-दंगा, 
        मरे पिता पहुंचाए गंगा।
        जिया पिता की न पूछी बात, 
        मरे पिता को खीर और भात।
        जिया पिता को घूंसे लात, 
        मरे पिता को श्राद्ध करात।
        जिया पिता को डंडा लठिया, 
        मरे पिता को तोसक तकिया। 
        जिया पिता को कछु न मान,
        भरत पिता की पिंड दान।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 27 सितंबर 2026

पुनर्जन्म सम्भव होता है

पुनर्जन्म सम्भव होता है 

पुनर्जन्म का अर्थ पुनः या फिर से जन्म। हम कह सकते हैं कि इस संसार में जीव के जन्म लेने के अनन्तर अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त समयावधि के पश्चात उसकी मृत्यु होती है। फिर उस मृत्यु के बाद जीव एक बार पुनः जन्म लेता है। यही पुनर्जन्म कहलाता है। पुनर्जन्म की इन घटनाओं की यदा कदा जानकारी हमें अपने आसपास से मिलती ही रहती है।
         सनातन धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसी कई प्राचीन मान्यताओं और दर्शनों में पुनर्जन्म को एक सत्य और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया माना गया है। इनके अनुसार यह शरीर नश्वर है परन्तु आत्मा अजर और अमर है। मृत्यु के बाद आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है। जब कोई जीव अपने संचित कर्मों और मोह-माया से मुक्त होकर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह जन्म-मृत्यु के इस चक्र से निश्चित समय के लिए छूट जाता है।
         भारतीय संस्कृति में ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के अन्तिम क्षणों में व्यक्ति के मन में जो तीव्र इच्छा या विचार होते हैं, वही उसकी अगली योनि या जन्म का आधार बनते हैं। जीव का अगला जन्म तुरन्त भी हो सकता है और इसमें सैकड़ों या हजारों वर्ष का समय भी लग सकता है। 
          मनीषियों का कथन है कि जन्म के कुछ समय तक जीव को अपना पिछला जन्म याद रहता है। जब जीव अपना होश सम्हालता है और नए जन्म में रचने-बसने लगता है तो पुराने जन्म को भूलने लगता है। परन्तु कुछ जीव ऐसे होते हैं कि जिन्हें बड़े होने तक भी अपना बीता जन्म याद रहता है। वे अपने इस जन्म के परिजनों को पिछले जन्म के घर-परिवार, साथियों व स्थान के विषय में बताते हैं। उनकी जाँच-परख करने पर उनकी सच्चाई का ज्ञान हो जाता है।
          टीवी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर ऐसी खबरों को हम पढ़ते और सुनते रहते हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने इस विषय पर लेख, सत्य घटनाएँ / कथाएँ या कहानियाँ प्रकाशित की हैं। हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी ऐसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं। कई टीवी सीरियलों में भी इस विषय को कथानक बनाया जाता रहा है।
          हमारी भारतीय संस्कृति के दो आधार स्तम्भ हैं- कर्म सिद्धान्त और पुनर्जन्म। दोनों ही अन्योन्य आश्रित हैं। कर्म तो मनुष्य को करना ही पड़ता है, उसके बिना वह रह नहीं सकता। वह चाहे सुकर्म करे या कुकर्म, कुछ तो करता ही रहता है। वह निठल्ला नहीं बैठ सकता।
        अपने इन्हीं शुभाशुभ कर्मो के ही अनुसार जीव का पुनर्जन्म चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनि में हो सकता है। मनीषी इन सब योनियों में मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। मानव योनि में जीव कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है, इसलिए इसे कर्मयोनि कहते हैं जबकि अन्य सभी केवल भोग योनियाँ कहलातीं हैं। उनमें जीव को कर्म करने की स्वतन्त्रता नहीं है।
          उपनिषदों का सार कही जाने वाली 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में इस पुनर्जन्म पर प्रकाश डाला है। वे कहते कि हमारे शरीर में जो आत्मा विद्यमान है वह बार-बार जन्म लेती है। सृष्टि के आदि से अब तक वह अगणित जन्म ले चुकी है। न जाने कितने रूपों में वह इस धरा पर उसका जन्म हो चुका है। वह उसी प्रकार अपना शरीर परिवर्तित करती है जैसे मनुष्य अपने वस्त्र बदलता है।
          रीतिकाल के सुप्रसिद्ध कवि रसखान जो भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे, उन्होंने इस विषय में अपनी आस्था प्रकट करते हुए लिखा था-
          मानुष हौं तो वही रसखानि 
          बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन।
          जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो 
         चरौं नित नन्द की धेनु मझारन।।
          पाहन हो तो वही गिरि को जो 
          धारयो कर छत्र पुरन्धर धारन। 
          जो खग हौं तो बसेरो करौ मिल     
          कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।
अर्थात् इस पद में रसखान जी कहते हैं कि यदि उन्हें अगला जन्म मिले तो उन्हें गोकुल का ग्वाला बनाना जो भगवान श्रीकृष्ण के मित्र थे। कर्मानुसार यदि पशु का जन्म मिलना हो तो मुझे नन्द बाबा की गाय बनाना जिसे प्रभु स्वयं चराते थे। यदि निर्जीव बनाना हो तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनाना जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने छत्र की तरह धारण किया था। अन्त में रसखान जी कहते हैं कि यदि मुझे पक्षी बनाना हो तो यमुना जी के किनारे उस कदम्ब वृक्ष पर मेरा बसेरा रखना जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाएँ किया करते थे। 
          इससे अधिक पुनर्जन्म का और कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। हो सकता है कुछ धर्म अथवा लोग इस सिद्धान्त को न मानते हुए इसका उपहास कर सकते हैं परन्तु वे भारतीय सस्कृति और सभ्यता में गहरे पैठे इसके अस्तित्व को नकार नहीं सकते। 
        मानव के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त करने के लिए मनुष्य को उसी के अनुरूप अपने किए जाने वाले कर्मों की शुचिता और शुभता पर ध्यान देना बहुत आवश्यक होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 26 सितंबर 2026

अपनी अच्छाई को कभी न त्यागें

अपनी अच्छाई को कभी न त्यागें

मनुष्य को स्वयं यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि वह बहुत अच्छा इन्सान है। आओ और उसकी उसकी अच्छाई देख लो। उसकी अच्छाई या उसके सद् गुण कभी-न-कभी दूसरों के सामने प्रकट हो ही जाते हैं। समय अवश्य लगता है परन्तु एक दिन वह अपना प्रभाव दिखा ही देती है। इसके लिए मनुष्य को धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जब उसक समय आएगा तो निश्चित ही लोग उसे पहचानेंगे।
        अच्छा व्यवहार मनुष्य की खुद की पहचान और आन्तरिक शान्ति का प्रतीक होता है। कठिन समय में ही व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव की परख होती है। संकट को देखकर अच्छाई छोड़ देना व्यक्ति को असफलता की ओर ले जाता है। लोग मनुष्य की अच्छाई को उसकी कमजोरी समझ सकते हैं। ईश्वर सदैव मनुष्य की नीयत को देखता है। मनुष्य को अपनी अच्छाई को कभी नहीं त्यागना चाहिए। अन्त में जीत हमेशा उसकी सच्चाई और अच्छे कर्मों की ही होती है। 
        अपनी अच्छाई रूपी गुणों का एक-एक तिनका चुनकर पक्षियों की तरह कठोर परिश्रम करके मनुष्य अपने जीवन का घरौंदा बनाता है। जहाँ वह गलत रास्ते पर चलकर बुराई को अपनाने लगता है तो वही एक पल उसे मिट्टी में मिला देने के लिए पर्याप्त होता है।
          अहंकार रूपी दानव जब राहू-केतु की भाँति उसे ग्रसने लगता है तब वह इस बात को भूल जाता है कि वस्तुत: प्रशंसा  उसके गुणों की हो रही है उसकी नहीं। उस समय वह अपने भले-बुरे का या अपने-पराए में अन्तर करने का मानो विवेक ही खो देता है।
        मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह अपनी चापलूसी भरी झूठी तारीफ सुनकर बहुत प्रसन्न होता है। दूसरों के स्वार्थ पूरे करने के लिए बर्बाद होना पसन्द कर लेता है। यदि कोई हितैषी उसकी सच्ची आलोचना करे तो वह आग बबूला हो जाता है। सम्हलना तो बड़े दूर की बात है, वह अपने ही हाथों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है।
          उसे चाहिए कि इस अभिमान को अपने जीवन में स्थान न दे। इसका यह अर्थ नहीं कि अपने स्वाभिमान को ताक पर रख दे। हमेशा याद रखना चाहिए कि अभिमान पतन का कारक है वह मनुष्य को सम्हलने का अवसर नहीं देता जबकि उसका स्वाभाविक उसे महान बनाता है और गिरने नहीं देगा। संसार में उन्नति वही मनुष्य करता है जिसकी योजनाएँ फलदायी होती हैं।   
        मनुष्य को इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि कौन क्या कर रहा है? कैसे कर रहा है? अथवा क्यों कर रहा है? वह जितना इन चक्करों से दूर रहेगा उतना ही उसका भला होगा और फिर वह खुश रहेगा।
        किसी भी व्यक्ति की कोई बात यदि बुरी लगे तो उसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने का प्रयास करना चाहिए। परन्तु यदि किसी सयाने ने कोई बात कही है तो निश्चित ही वह महत्वपूर्ण होगी, तब उसे हितोपदेश समझकर उस पर मनन करना चाहिए उसे कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
          मनुष्य जब चुप रहकर भगवान शिव की तरह विषपान करता है तब वह दुनिया को पसन्द आता है। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि जब तक मनुष्य बिना प्रतिकार किए दूसरे लोगों की कटु आलोचनाओं को सहन करे, तभी वह भला मानस कहा जाता है।
          इसके विपरीत यदि एक बार भी कोई मनुष्य सच्ची बात कह दे तो उससे बुरा कोई और होता ही नहीं है। वास्तविकता यही है कि कोई भी इन्सान अपनी कमियों को इंगित करने वाले को पसन्द नहीं करता। ऐसा व्यक्ति सबको जहर की तरह कड़वा लगता है। उसे किनारे कर देने में लोग कोई परहेज नहीं करते।
        जहाँ हम व्यक्ति की पहचान की चर्चा कर रहे हैं तो मैं यह भी जोड़ना चाहती हूँ कि मनुष्य को किसी की चापलूसी करके सफलता मिलती है तो वह बहुत समय तक प्रसन्नता नहीं दे सकती। अपने कठोर परिश्रम से यदि उसे सफलता मिलती है तो वह चिरस्थायी होती है।
          मनुष्य जीवन में क्या घटने वाला है यह भविष्य के गर्भ में छिपा रहता है। कोई कितना भी प्रयत्न कर ले उसे बदल नहीं सकता। किन्तु जब मानव अपने व्यवहार व अपनी आदतें बदलने के लिए कटिबद्ध हो जाता है तब उसका भविष्य बदलने से कोई नहीं रोक सकता।
        अतः हम यह कह सकते हैं कि जब लोग अपनी बुराई को नहीं छोड़ते तो मनुष्य को अपनी अच्छाई को कभी त्यागना नहीं चाहिए। उसकी यही अच्छाई ही उसकी ताकत बनकर उसका मनोबल बढ़ाती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य अपनी उन्हीं अच्छाइयों की बदौलत समाज में एक सम्मानित स्थान प्राप्त कर लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद