सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

अन्न का निरादर ब्रह्म का निरादर

अन्न का‌ निरादर ब्रह्म का अनादर

अपनी थाली में मनुष्य को उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना वह आराम से खा सकता है। यदि आवश्यकता से अधिक अन्न थाली में डाल लिया जाए तो मनुष्य उसे खाने में असमर्थ हो जाता है। अतः वह बच जाता है और फिर उस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान में फैंक दिया जाता है। इस तरह यह अनमोल अन्न बरबाद होता रहता है।
          अन्न का एक-एक दाना बहुत ही मूल्यवान होता है। उस एक दाने को जब बीज के रूप में किसान बोता है तब वह उस बीज को बहुत-से अनाज में बदल लेता है। इस अन्न के हर दाने को उपजाने के लिए किसान हर मौसम में दिन-रात अथक परिश्रम करता है। 
        किसान सर्दी, गर्मी, बरसात की परवाह नहीं करता। जीवन भर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, भूकम्प, जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भी सहन करता है। अपना सारा आराम छोड़कर, अपना खून-पसीना एक करके हम सबके लिए अनाज उपजाता है। बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारा अन्नदाता किसान स्वयं भूखा रह लेता है परन्तु हम सबको पोषित करने का दायित्व बखूबी निभाता है। हम उसके इस परिश्रम का कभी मूल्य नहीं लगा सकते।
        अन्न को बर्बाद करके हम अन्न की बर्बादी तो करते ही हैं और किसान के खून-पसीने के साथ ही उसके सपनों को भी चकनाचूर करते हैं। फिर भी वह धर्म नहीं त्यागता।
        इस अन्न का मूल्य उन लोगों से अधिक कौन जान सकता है जिनके घरों में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता। बड़े दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अपने आसपास हम बच्चों को कचरे से बीनकर खाते हुए देखते हैं। जिन स्थानों में दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है या बाढ़, भूकम्प, तूफान आदि दैवी आपदाओं के कारण लोगों को घर से बेघर होकर विस्थापितों सा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। दो जून रोटी कमाने के लिए मनुष्य कितने पापड़ बेलता है, स्याह-सफेद करता है। सभी पाप-दुराचार करता है। संस्कृत भाषा के 'पंचतन्त्र' नामक ग्रन्थ में कवि विष्णु दत्त ने कहा है -
             बुभुक्षित:किं न करोति पापम्।
अर्थात् भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप है जो नहीं करता यानी वह क्या कुछ नहीं कर गुजरता?
      ‌  भूख से व्याकुल इन्सान भगवान से यहाँ तक कह देता है-
        भूखे भजन न होई गोपाला, 
        ले ले अपनी कण्ठी माला।
        यदि मनुष्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के विषय मे सोच ले, कचरे से खाते और भूख से बिलबिलाते बच्चों के बारे में सोच ले तो कभी अन्न की बर्बादी नहीं कर सकेगा। उसे बर्बाद करने से पहले दस बार सोचेगा।
        यदि मनुष्य भोजन को ईश्वरीय प्रसाद के रूप में मान ले तो वह अनाज को इस तरह कभी बर्बाद नहीं कर सकता। जब उसके मन में यह भाव आ जाएगा कि अन्न भगवान का प्रसाद है तब वह अपनी थाली में उतना ही भोजन लेगा जितना वह खा सकेगा। इस तरह करने से अनाज व्यर्थ नहीं जाएगा। जिसकी बर्बादी का कारण भोजन थाली में भर-भरकर लेना हैं और न खा सकने की स्थिति में झूठा छोड़ देना है। 
        इसके विपरीत प्रसाद को लोग हाथ में लेकर खाते हैं और यदि गलती से वह कभी जमीन पर गिर जाए तो उसे उठाकर अपने माथे से लगाते हैं और फिर उसे खा लेते हैं। प्रसाद का एक भी दाना बरवबाद नहीं कर सकते। इसे हम धर्मभीरूता भी कह सकते हैं। 
        यदि अन्न को प्रसाद मान लेने से उसे बर्बाद होने से बचाया जा सकता है तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है। हर हाल में अन्न का संरक्षण किया जाना चाहिए।
          यह अहं कदापि नहीं करना चाहिए कि हमारे पास पैसा है तो हम मँहगा-सस्ता कैसा भी हो अनाज खरीद कर अपना पेट भर सकते हैं। अब यह अन्न हमारा है हम चाहे इसे खाएँ या बर्बाद करें किसी को हमसे क्या लेनादेना?
        यह प्रवृत्ति बहुत कष्टप्रद है। हम शादी-ब्याह या पार्टियों में अन्न को बर्बाद होते हुए देखते हैं। मन को पीड़ा होती है। यही भोजन यदि किसी भूखे व्यक्ति को खाने के लिए दिया जाए तो उसका पेट भर जाए और उसके मन से कितनी ही दुआएँ निकलेंगी। बड़े ही जब इस ओर ध्यान नहीं देते तो बच्चों को वे अन्न को सुरक्षित रखने के लिए क्या समझाएँगे?
          भारतीय सस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहते हैं। अन्न का अनादर करना ईश्वर का अपमान करना माना जाता है। इसीलिए भोजन खाने के समय जब थाली में अन्न परोसा जाता है तो पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना की जाती है।
          उपनिषद का यह कथन है -  
       जो अन्न को नष्ट करता है, अन्न उसे ही 
       नष्ट कर देता है।
         इसलिए अन्न को न सही स्वयं को बचाने के लिए ही उसका सम्मान कर लेना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

ईश्वरीय न्याय को बदला नहीं जा सकता

ईश्वरीय न्याय को बदला नहीं जा सकता

ईश्वर की न्याय व्यवस्था बहुत कठोर है। इसे हम विधि का विधान भी कह सकते हैं। उसके न्याय में फेर-बदल करवाना हम मनुष्यों के बस की बात नहीं है। वह मालिक किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। सभी जीवों के लिए उसकी व्यवस्था एकसमान है। किसी जीव विशेष को छूट देने का वहॉं कोई विधान नहीं है। जैसे ही शुभाशुभ कर्म मनुष्य करता है, उसे उन्हीं के अनुरूप फल की प्राप्ति होती है।
       अपने किसी प्रियजन को जब इस असार संसार से विदा करना पड़ता है तब मन उस अकथनीय पीड़ा से विदीर्ण होने लगता है। यह दुख सहन करना बहुत ही कठिन होता है। जैसे किसी भी कारण से शाखा से टूटा हुआ फूल वापिस उसी टहनी पर नहीं लगाया जा सकता, उसी प्रकार इस दुनिया से विदा हुए मनुष्य को पुनः लौटाकर उसी रूप में वापिस नहीं लाया जा सकता।
        पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार जितना भी समय जीव को वर्तमान जीवन में ईश्वर की ओर से मिलता है, उसे भोगने के पश्चात मनुष्य को एक पल की भी मोहलत नहीं मिल पाती। अपनी सारी धन-सम्पत्ति और भौतिक रिश्ते-नातों को इसी धरा पर छोड़कर उसे खाली हाथ परलोक गमन करना पड़ता है।
        संसार मे ऐसा कोई भी एक घर नहीं मिलेगा जहाँ से आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। यदि ऐसा हो पाता तो सभी राजा-महाराजा, महापुरुष और शक्तिशाली लोग तो सृष्टि के आदि से आज तक जीवित होते। तब इस धरती पर तिल रखने जितनी जगह भी हमें न मिल पाती। इस मरणधर्मा संसार में किसी भी जीव के स्थायित्व की कल्पना कर लेना नितान्त असम्भव है। यदि कोई सदा के लिए जीवित रहने का वादा करता है तो वह असत्य कह रहा होता है। उस पर विश्वास करना सरासर मूर्खता कहीं जाएगी।
        इस विषय में मुझे एक कथा स्मरण हो रही है। बहुत लोगों ने इसे पढ़ा और सुना होगा। अनेक महात्माओं के साथ जोड़कर यह कथा समझाने के लिए सुनाई जाती है।
         एक स्त्री के इकलौते बेटे की मृत्यु हो गई। वह बहुत दुखी थी और रो-रोकर उसका बहुत बुरा हाल था। फिर कुछ सोचकर और निर्णय करके अपने गाँव में पधारे हुए सन्त के पास अपने बच्चे के शव को लेकर गई।
        महात्मा जी के पास जाकर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने बेटे के शव को उनके चरणों में रख दिया। उनसे बार-बार आग्रह करने लगी, "महात्मा जी, मेरे जीवन के एकमात्र सहारे इस बेटे को जीवित कर दीजिए।"
      सन्त ने कहा, "जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे जीवित करना किसी के वश की बात नहीं है।"
         यह सच है कि ईश्वर के इस न्याय को कोई भी नहीं बदल सकता। परन्तु वह स्त्री हठ ठानकर बैठ गई कि उसे उसका बेटा जीवित चाहिए। उसने कहा, "सन्त-महात्मा चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं।"
        महात्मा के लाख समझाने पर भी वह स्त्री नहीं मानी।अन्त में महात्मा ने उस स्त्री से कहा, "ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आओ, जिस घर में किसी की मौत न हुई हो। तभी मैं तुम्हारे बेटे को जीवित करूँगा।"
        वह स्त्री महात्मा जी के कहने के अनुसार एक मुट्ठी चावाल लेने गाँव में चली गई। वह आश्वस्त हो गई थी कि अब उसका बेटा अवश्य जीवित हो जाएगा। वह अपने सारे गाँव का चक्कर लगाकर आ गई। पर यह क्या, उसे ऐसा कोई भी घर वहाँ नहीं मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो। 
        तब उसे समझ में आ गया कि कुदरत के फैसले को बदला नहीं जा सकता। यह तो सृष्टि का नियम है कि जो इस संसार में आया है उसे यहाँ से विदा लेनी ही पड़ती है। लौटकर उसने महात्मा जी के चरण पकड़ लिए और अपने किए पर पश्चाताप करने लगी।
        यह कथा मनुष्य को मात्र यही शिक्षा देती है कि इस संसार में ईश्वरीय नियम अटल हैं। उन्हें बदलने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मनुष्य तो बस भोक्ता मात्र है, वह मूक दर्शक है। वह अपने पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिए इस संसार में आता है। सभी रिश्ते-नाते, भाई-बन्धु उसे जीवन यात्रा पूर्ण करने के लिए मिलते हैं। वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है अथवा उनकी कितनी सहायता लेता है, उस पर निर्भर करता है।
          हमारा प्रिय-से-प्रिय जन भी एक-न-एक दिन अपना हाथ छुड़ाकर हमें रोता-बिलखता छोड़कर परलोक की यात्रा के लिए अकेला ही चला जाता है। हालाँकि अपने प्रियजनों का वियोग सहन कर पाना इतना सहज नहीं होता परन्तु कोई और चारा भी तो नहीं होता। ईश्वर के इस न्याय के आगे सिर झुका देना ही समझदारी है। उस परम न्यायकारी परमात्मा को कोसने या गाली देने से उसका न्याय नहीं बदल सकता। हमें अपनी मानसिकता को ही बदलना पड़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

शारदीय नवरात्र

शारदीय नवरात्र 

आज से शारदीय नवरात्र प्रारम्भ हो गए हैं। 'नवरात्र' संस्कृत भाषा का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है नौ रातों का समय। इन नौ दिनों और रातों के दौरान शक्ति या देवी दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों की आराधना करने का विधान है।
     प्रथमा शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
     तृतीया चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
     पंचमं स्कन्धमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
     सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
     नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता:।
अर्थात् पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघण्टा, चौथी कूष्माण्डा, पांचवी स्कन्दमाता, छटी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौंवी सिद्धिदात्री  - ये नौ नाम 'नवदुर्गा' के रूप में प्रसिद्ध हैं।
         हिन्दू वर्ष में कुल चार बार नवरात्र आते हैं। इनमें दो प्रकट नवरात्र होते हैं यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र और दो गुप्त नवरात्र होते हैं यानी माघ और आषाढ़ के नवरात्र। इनमें से चैत्र नवरात्र और आश्विन माह के शारदीय नवरात्र सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। ये दोनों नवरात्र व्यापक रूप से मनाए जाती हैं। 
         इस नवरात्र पर्व का प्रभाव देश के विभिन्न भागों में दिखाई देता है। इन नौ दिनों में लोग व्रत रखकर और पूजा करके देवी को विभिन्न तरीकों से प्रसन्न करने का यत्न करते हैं। 
          नवरात्रि में खेतरी या खेतड़ी बोने की परम्परा बहुत शुभ मानी जाती है। इसे ज्वारे या जयंती भी कहते हैं। यह घर में सुख, समृद्धि, हरियाली और मॉं दुर्गा की कृपा का प्रतीक होती है। नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि को एक साफ मिट्टी के बर्तन, कसोरे या गमले में गंगाजल और थोड़ी साफ मिट्टी डाली जाती है। इसके बाद जौ या गेहूॅं के बीज बोए जाते हैं और उस पर हल्का पानी छिड़का जाता है। नौ दिनों तक सुबह और शाम माता की पूजा के साथ खेतड़ी पर भी जल छिड़का जाता है। इसका विसर्जन अष्टमी के दिन किया जाता है। 
          उस दिन यानी अष्टमी के ही दिन कन्याओं का पूजन किया जाता है। उनके पैर धोकर उन्हें भोजन, वस्त्र व दक्षिणा दी जाती है। कुछ लोग यह कन्या पूजन नवमी के दिन भी करते हैं।
         बंगाल में दुर्गापूजा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और दशहरे पर मॉं दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। गुजरात में इन दिनों गरबे की धूम होती रहती है। इन दिनों में कुछ श्रद्धालु भक्त मॉं वैष्णो देवी के दरबार में जाकर अपनी हाजिरी लगाते हैं।
        तान्त्रिकों के लिए नवरात्र बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। नवरात्रि में तान्त्रिक आदिशक्ति की गुप्त और तीव्र ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए साधना करते हैं। प्रकट नवरात्रि में देवी की सात्विक पूजा की प्रधानता होती है। दूसरी ओर गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से तीव्र तन्त्र साधना और सिद्धियों के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। 
        यद्यपि तन्त्र पूजा को लेकर समाज में कई भ्रॉंतियॉं हैं। वास्तव में यह यन्त्र, यन्त्र और कठोर अनुशासन के माध्यम से आत्म-कल्याण और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जुड़ने का एक पवित्र मार्ग है।
नवरात्रों में तान्त्रिक लोग कठोर साधना करते हैं और सिद्धियॉं प्राप्त करने का यत्न करते हैं।
         व्रत रखने वाले लोग इन दिनों प्रायः फलाहार लेते हैं। व्रतधारी स्वांक के चावल और कुट्टू के आटे का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग केवल एक समय भोजन खाते हैं और कुछ अन्य लोग केवल जल पीकर ही भगवती की अराधना करते हैं।
       नवरात्र में मांसाहार त्यागने का विधान है। कारण है मन की पवित्रता। इन दिनों मन को साधने के लिए व्रत और नियम का पालन किया जाता है। मांसाहार तामसिक भोजन कहलाता है। इसलिए इसके प्रयोग का लोग अपने घर में नहीं करते। बहुत से ऐसे लोग भी मिलेंगे जो इन दिनों लहसुन और प्याज भी नहीं खाते। 
           मनीषी कहते हैं -
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन। 
कई लोग इन नौ दिनों में बाल नहीं काटते। बहुत से पुरुष अपनी दाढ़ी नहीं बनाते।
        हर ओर मन्दिरों में चहल पहल रहती है। वहाँ प्रतिदिन भण्डारे किए जाते हैं। लोग अपने-अपने क्षेत्र में भी भण्डारे करते हैं। इन दिनों कुछ लोग माता की चौकी रखवाते हैं और कुछ लोग जागरण कराते हैं। इस प्रकार देवी को मनाने का हरसम्भव प्रयत्न किया जाता हैं। लोग अपने-अपने तरीके से नवरात्र बड़ी श्रद्धा व उल्लास से मनाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

भौतिक चक्षुओं से ईश्वर नहीं दिखाई देता

भौतिक चक्षुओं से ईश्वर नहीं दिखाई देता 

ईश्वर को हम सर्वव्यापक मानते हैं। वह इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त है। उस परमात्मा की सत्ता का हम अनुभव तो कर सकते हैं पर उसे इन भौतिक चक्षुओं से देख नहीं सकते। उसका दर्शन करने के लिए मनुष्य को साधना करनी पड़ती है। तब कहीं उस ईश्वर को साधक अपने अन्तर्चक्षुओं से प्रकाश के रूप में देख सकता है।
          उसकी इस व्याप्ति का अर्थ हम कर सकते हैं - व्याप्त होने की अवस्था या भाव, विस्तार या फैलाव और सभी अवस्थाओं में प्रायः व्याप्त होने का भाव।
          व्याप्ति के हम दो भेद कर सकते है- संयोग व्याप्ति  और स्वरूप व्याप्ति
          संयोग व्याप्ति-  इसमें अलग-अलग चीजों का मिलना संयोग होता है। हम दूध और चीनी दो अलग-अलग पदार्थ लेते हैं। यदि दूध में चीनी को मिला दो तो वह दूध में घुल-मिलकर उसी का ही भाग बन जाती है। तब उन दोनों को पृथक करना किसी के लिए भी नामुमकिन हो जाता है।
        स्वरूप व्याप्ति-  इसका तात्पर्य यह है कि एक ही पदार्थ का स्वरूप परिवर्तित हो जाना। स्वर्ण से यदि हम आभूषण बनाते हैं तो सोने का मात्र रूप बदलता है, इस समय भी वही सोना उन आभूषणों में ही रहता है।
          इसी प्रकार ईश्वर और प्रकृति दोनों वैसे तो अलग-अलग हैं पर प्रकृति भी उसी ईश्वर का ही रूप है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, नदियाँ, पर्वत, सागर, पेड़-पौधे सभी उसके ही रूप हैं। इसीलिए इनकी समय-समय पर इनकी उपासना भी की जाती रहती है।
       सृष्टि की रचना से पहले केवल अद्वितीय और निराकार परमात्मा ही विद्यमान था। तब ब्रह्म के भीतर यह इच्छा या संकल्प जागृत हुआ कि वह एक से अनेक बन जाए। यह सम्पूर्ण संसार, जीव-जन्तु, प्रकृति बन गए। इसी भाव को 'छान्दोग्योपनिषद्' में एक अत्यन्त प्रसिद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक महावाक्य से प्रकट किया है -
               एकोsहं बहुत स्याह
अर्थात् मैं एक हूॅं और मैं बहुत हो जाऊॅं।
        कहने का तात्पर्य यह है कि जब ईश्वर ने कामना की तो उसने अपनी परम आत्मा में से अनेक अंश बनाकर जीवों की सृष्टि कर दी। जलचर, नभचर और भूचर सभी जीवों की मालिक ने रचना की। हम मनुष्यों को भी उसने रचा। इन सभी जीवों में व्याप्त उस परमपिता परमात्मा की छवि को हम चाहें तो देख सकते हैं।
        यहाँ तर्कशास्त्र का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहती हूँ। वहॉं कह गया है- 
              'यत्र यत्र धूम: तत्र तत्र वह्नि:।'
अर्थात् जहाँ जहाँ धुआँ होता है वहाँ वहाँ पर अग्नि होती है।
        कहने का तात्पर्य यही है कि दूर बैठे व्यक्ति को जलती हुई आग नहीं दिखाई दे रही, उसे केवल उड़ता हुआ धुआँ दिखाई दे रहा है। इसका यह अर्थ तो नहीं हो सकता कि सिर्फ धुआँ ही है, आग नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो बिना आग के धुआँ हो ही नहीं सकता।
          व्याप्ति का पूर्ण रूपेण ज्ञान हो गया है यह नहीं माना जा सकता। व्याप्ति का अन्तर अर्थात् मन से प्रत्यक्ष होता है, यह मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अन्त:करण या मन बाह्य इन्द्रियों के सर्वथा अधीन होता है। इसीलिए कभी भी मन स्वतन्त्र रूप से बाह्य विषयों को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं देखा जाता है। व्याप्ति के इस अनुमान का प्रमाण से साक्षात्कार सम्भव नहीं होता।
        अन्य पदार्थों का विश्लेषण न करके हम अपने बारे में विवेचना करते हैं। हम सारा समय साँस लेते हैं, यह वायु हमारी जीवनी शक्ति कहलाती है। फिर भी हम उस वायु को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, केवल उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि हम किसी कारण से सॉंस न ले सकें तो पलक झपकते ही यह जीवन ही समाप्त हो जाएगा।
        मन को भी हम नहीं देख सकते, बस यही जानते हैं कि वह है जो हम सबको अपने वश मे करके रखता है। हम उसी के कहे अनुसार उठते हैं और जागते हैं। यानी दुनिया के सारे कार्य-व्यापार हम करते हैं। चाहकर भी हम उसे कभी नकार नहीं सकते।
        जीव के गुण-दोष आदि सभी स्वभाव के अंश हैं जिन्होंने मात्र अनुभव किया जा सकता है, उन्हें अपनी इन आँखों से देख या छूकर परख नहीं सकते। इसी प्रकार एक नन्हें से बीज में कहीं भी विशाल वृक्ष दिखाई नहीं देता परन्तु समय रहते वह बीज उस महान वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है। परिणाम को देखकर हम ये सब अनुमान लगाते रहते हैं। लकड़ी में व्याप्त अग्नि को भी हम देख नहीं सकते पर उसे जलाकर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।
          उसी प्रकार  ब्रह्माण्ड के इस विस्तार को देखकर उस प्रभु के अस्तित्व का स्वतः ही बोध हो जाता है। इस पर भी कोई व्यर्थ ही विवाद करे अथवा उसकी परम सत्ता को स्वीकार न करते हुए उसे चुनौती दे तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में और कौन हो सकता है?
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

जीवन और मृत्यु की जंग जीतना

जीवन और मृत्यु की जंग जीतना

हर मनुष्य अपने जीवन और मृत्यु की जंग को सुविधापूर्वक जीत लेना चाहता है। वह इस जन्म-मरण के रहस्य को जानने और समझने के लिए हर समय उत्सुक रहता है। यह कुण्डली मारकर उसके जीवन में बैठा हुआ है। सारा जीवन बीत जाता है पर यह सार उसकी समझ में नहीं आ पाता। इन्सान क्या करे और क्या न करे की कशमकश से उभर नहीं पाता।
        शरीर क्षणभंगुर है और इसमें विद्यमान आत्मा अमर है। इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना ही वास्तविक शक्ति है। जीवन और मृत्यु की जंग जीतना केवल शारीरिक अस्तित्व की लड़ाई नहीं है बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक रूप से जागरूक रहने का नाम है।
         भौतिक शरीर और संसार के दृष्टिकोण से मृत्यु जीवन का एक अटल और शाश्वत सत्य है। इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है, उसका अन्त निश्चित है। इसे कोई भी ताकत टाल नहीं सकती। यह भी सच्चाई है कि इस संसार में परिवर्तन ही एकमात्र नियम है। यहाँ पर कुछ भी स्थायी नहीं रहता। अमीर, गरीब, राजा या रंक, कोई भी मौत से बच नहीं सकता। 
       मृत्यु जीवन का अन्तिम सत्य है यह भ्रम है। मृत्यु जीवन की गाड़ी की दिशा के परिवर्तन के लिए एक जंक्शन मात्र है जहॉं से जीवन किसी अन्य जीवन के लिए परिवर्तित हो जाता है। 
          भारतीय संस्कृति में बहुत ही गहरी जड़े जमाकर बैठे हुए हैं कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म। इनके बिना हम जीवन मे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। इन दोनों के विषय में हर व्यक्ति जानना चाहता है, समझना चाहता है। जितना गहरे उतरता जाता है, उतना ही उलझता जाता है।
        मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि इस ब्रह्माण्ड का हर जीव आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। हर सम्बन्ध कर्म पर आधारित है। जीव जन्म लेने के पश्चात उन सभी लोगों के सम्पर्क में स्वतः ही आ जाता है जिनके साथ उसका लेनदेन का सम्बन्ध होता है। 
        दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पूर्वजन्म में जिसका उसने किसी भी रूप में ऋण चुकाना होता है उससे उसका संयोग हो जाता है। वह व्यक्ति उसका माता, पिता, भाई, बहन, चाचा, मामा आदि परिवारी जन हो सकता है। कोई पड़ौसी, बन्धु-बान्धव, मित्र, कार्यालयीन साथी या बास कुछ भी हो सकता है। 
        कभी-कभी राह चलते अनजाने व्यक्ति से मधुर सम्बन्ध बन जाते हैं और वह उसकी सहायता कर जाता या वही उसकी कोई मदद कर देता है। इसके विपरीत अचानक मिले अनजान व्यक्ति से गाली-गलौच हो जाती है अथवा उसके कारण कोई हानि हो जाती है। 
        इसका अर्थ यही निकलता है कि उस व्यक्ति विशेष के साथ पूर्वजन्म का इतना ही सम्बन्ध था कि ऐसा शुभाशुभ व्यवहार हो गया। उसके पश्चात शायद सारा जीवन उस व्यक्ति से कभी सम्पर्क भी नहीं होता। यह यही सिद्ध करता है कि उन दोनों के पूर्वजन्म के वे विशेष कर्म अब समाप्त हो गए हैं।
          एक बोधकथा की हम चर्चा करते हैं। एक योगी किसी वृक्ष के नीचे अपने ध्यान में मग्न बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति वह आया और उसने उनका बहुत अपमान किया। वे शान्त रहे और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें उसके दुर्व्यवहार पर क्रोध नहीं आया।   
          उनके शिष्य यह सब कुछ देख और सुन रहे थे, उन्होंने अपने गुरु से उस व्यक्ति पर क्रोध न करने का कारण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में उन्होंने उसका अपमान किया होगा। शायद इसी कारण उसने मेरा अपमान किया। अब मेरा और उसका हिसाब बराबर हो गया है।
        यह घटना प्रत्यक्ष रूप से हमारी भारतीय कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म की प्रतिपादक है जिसे समझने का हम प्रयास कर रहे हैं।
        यहाँ मैं एक और सत्य को उद्घाटित करना चाहती हूँ कि पूरे विश्व में अरबों-खरबों मनुष्य और जीव-जन्तु रहते हैं परन्तु हमारा सम्बन्ध उन मुट्ठी भर लोगों या जीवों के साथ ही क्यों होता है? इतने बड़े भारत देश अथवा संसार के उस स्थान विशेष में जन्म क्यों होता है?
        इन प्रश्नों के उत्तर में मनीषियों के विचार बिल्कुल स्पष्ट हैं कि उनमें से किसी की मनुष्य ने सेवा करनी होती है अथवा किसी से सेवा करवानी होती है। इसी तरह किसी सै धन लेना होता है अथवा किसी पर धन व्यय करना होता है।
        एवंविध धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचारी, पीठ मे छुरा भौंकने जैसे कार्य नाक का बाल बनकर भी कर जाते हैं। ये सब भी व्यक्ति लेनदेन के ही भाग हैं। इसलिए किसी से शिकवा-शिकायत न करके यही मानना चाहिए कि यदि हमने पूर्वजन्म में उस व्यक्ति का कुछ अनिष्ट किया है तो हमारे कर्मों का निपटान हो गया। यदि उस व्यक्ति का हमने पूर्वजन्म में अहित नहीं किया तो आगामी जन्म वह अपना कर्ज चुकाएगा।
       इस प्रकार गहन-गम्भीर कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म विषय को वेदादि ग्रन्थों के स्वाध्याय के अनुसार जितना मैं समझ पाई हूँ, स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

कर्मफल का‌ विधान

कर्मफल का विधान 

मनुष्य किसी भी समय खाली नहीं बैठ सकता। वह कुछ-न-कुछ करता रहता है। उनमें कुछ शुभ कर्म होते और कुछ अशुभ कर्म होते हैं। इन्हीं शुभाशुभ कर्मों के चक्र में मनुष्य उलझता रहता है। हमारे महान शास्त्रों में तीन प्रकार के कर्मों का उल्लेख किया गया है- संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म।
          संचित कर्म - जन्म-जन्मान्तरों में जो भी कर्म मनुष्य करता है, उन सबका योग संचित कर्म कहलाते हैं। इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि जिस प्रकार बैंक में पैसे जमा करते हैं तो चक्रवृद्धि ब्याज उसमें जुड़ता रहता है। इस प्रकार वह संचित धन प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। उसी प्रकार संचित कर्म भी वृद्धि को प्राप्त होते हैं। 
         यानी जो शुभाशुभ कर्म हम करते हैं, उनमें से कुछ को हम उसी जीवन में भोग लेते हैं। जो कर्म भोगने से बच जाते हैं, वे पुराने जन्मों के बचे हुए कर्मों में जाकर मिल जाते हैं। इस प्रकार इन सभी कर्मों का संचय होता रहता है।
      प्रारब्ध कर्म-  संचित कर्म का ही एक भाग होते हैं। ये संचित कर्म ही मनुष्य का प्रारब्ध बनते हैं।इन्हीं कर्मों के अनुसार मनुष्य को अगला नया शरीर मिलता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं-
        पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर।
अर्थात् पहले जीव का प्रारब्ध या भाग्य बनता है और फिर उसके अनुसार उसे नया शरीर मिलता है।
            पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह बने ये सभी संचित कर्म एक ही जन्म में नहीं भोगे जा सकते। इसलिए वर्तमान जीवन में भोगे गए प्रारब्ध कर्म संचित कर्म में से घटा दिए जाते हैं। इस प्रकार केवल प्रारब्ध कर्म ही मनुष्य अपने नएजीवन में भोगता है। ये कर्म संचित कर्मों का एक भाग मात्र होते है।
        क्रियमाण कर्म-  मनुष्य इस जीवन में प्रतिदिन जो कर्म करता है वे क्रियामाण कर्म कहलाते हैं। उनसे ही संचित कर्मों का निर्माण होता है। इस प्रकार जमा-घटा का यह खेल मनुष्य के जीवन में अनवरत चलता रहता है।
            मनुष्य अपने विवेक को नकारते हुए लक्ष्यहीन होकर जब कर्म करता है तो उसके संचित कर्मों में वृद्धि हो जाती है। एक उदाहरण लेते है कि यदि किसी के अपमान करने पर मनुष्य क्रोधित होता है तो उसके संचित कर्म बढ़ते हैं।  कोई अपमान करे और मनुष्य उस पर क्रोध न करे तो निश्चित ही उसके संचित कर्म कम होते हैं।
        यदि मनुष्य अपनी चेतना को जागृत करके प्रतिक्रिया न करें तो अपने संचित कर्मों को नष्ट कर सकता है। इसके लिए सबसे पहली शर्त है अन्तर्मन की शान्ति। मनुष्य को केवल क्रोध का शमन ही नहीं करना है, क्रोध उत्पन्न ही न हो इसके लिए भी प्रयास करना होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे संचित कर्म कम होते हुए एक दिन शून्य हो जाते हैं। 
          जब वे समाप्त हो जाते हैं तब मनुष्य को फिर जीवन मरण के चक्र में पड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती। 
          ये प्रश्न हमारे समक्ष मुँह बाए खड़े रहते हैं जिनका उत्तर विद्वानों ने समय-समय हमें पर दिया है। ये प्रश्न हैं- जीव जन्म क्यों लेता है? वह पुनः पुनः शरीर धारण क्यों करता है? उसे मुक्ति कब और कैसे मिलती है?
            यह चक्र तब तक चलता रहता है और मनुष्य क्रियमाण कर्मों के द्वारा अपने कर्मों का संचय करता रहता है। अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए जीव का बारम्बार जन्म होता है। जब तक उसके कर्मो का हिसाब पूर्ण नहीं हो जाता तब तक जीव को जन्म-मरण के चक्र में आवागमन करना पड़ता है।
          महर्षि पातंजलि ने 'योगशास्त्र' नामक अपने ग्रन्थ के तीसरे अध्याय में कर्म के इस जटिल विषय को स्पष्ट करते हुए आश्चर्यचकित कर देने वाली सत्य बात कही है - 'यदि मनुष्य अपने कर्मों को जान लेता है तो वह उसे अपनी मृत्यु का समय भी ज्ञात हो सकता है।'
          वर्तमान जन्म में किए जा रहे कुछ कर्मों का फल मनुष्य इसी जन्म मे भोग लेता है। जिनका फल वह नहीं भोग पाता वे उसके सचित कर्मो में जाकर जुड़ जाते हैं जिनका भुगतान उसे आगामी जन्मों में करना पड़ता है। उस समय बड़ा ही कष्ट होता है। कर्म करते समय मनुष्य जरा भी विचार नहीं करता परन्तु उनको भोगते समय वह परमपिता परमात्मा से शिकवा-शिकायत करता है।
        वह मालिक तो समय-समय पर मनुष्य को चेतावनी देता रहता है पर इन्सान उसे अनसुना कर देता है। उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता। ऐसा करते करते उसे वह चेतावनी सुननी बन्द हो जाती है। फिर वह उसी परम न्यायकारी प्रभु पर पक्षपात करने का आरोप लगाता रहता है। अपने इहलोक और परलोक को सुधारने के लिए समय रहते हुए मनुष्य को अपने क्रियमाण कर्मों की शुचिता की ओर ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

स्वैच्छिक एकान्तवास सुखदायी

स्वैच्छिक एकान्तवास सुखदायी

एकान्तवास यदि स्वैच्छिक हो तो उसमें मनुष्य आनन्द का अनुभव करता है। स्वैच्छिक एकान्तवास मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यन्त सुखदायक और शान्तिदायक होता है। इसके विपरीत किसी मजबूरी या दबाव में किया गया एकान्तवास कष्टदायक बन जाता है। 
         हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन को चार आश्रमों में बॉंटा गया है -
1 ब्रह्मचर्याश्रम - पच्चीस वर्ष तक
2 गृहस्थाश्रम - पच्चीस से पचास वर्ष तक 
3 वानप्रस्थाश्रम - पचास से पिचहतर वर्ष तक
4 संन्यासाश्रम - पिचहतर से शेष जीवन 
          स्वैच्छिक एकान्तवास को हम वानप्रस्थाश्रम कह सकते हैं। हमारे देश में ऐसी परिपाटी थी कि जब घर-परिवार के दायित्वों को मनुष्य पूर्ण कर लेता था यानी बच्चों को पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देता था और बच्चों का कैरियर बना जाता था तथा उनकी शादियाँ भी कर दी जाती थीं तब लोग वानप्रस्थ आश्रम में रहना पसन्द करते थे। इसका अर्थ यही था कि अपने दायित्व पूर्ण हो गए, अब हरि भजन की वेला आ गई है। उन्होंने ने अपना जीवन जी लिया है अब अगली पीढ़ी के लिए स्थान खाली कर दिया जाना चाहिए।
          वानप्रस्थाश्रम तीसरा आश्रम है। वानप्रस्थी बनकर जीवन व्यतीत करने के लिए लोग जंगलों की शरण लेते थे ताकि उनके और उनकी प्रभुभक्ति के मध्य आकर कोई व्यवधान न डाल सके। यह एकान्तवास उनकी आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनता था। इस प्रकार चारों आश्रमों का विधिवत पालन करने से सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चलती थी। 
        जो एकान्तवास इन्सान के लिए विवशता का कारण बन जाता है, वह उसे जीवन में निराश और हताश कर देता है। इस अकेलेपन के कई कारण हो सकते हैं। जीवन साथी की मृत्यु के बाद कुछ लोग अकेले हो जाते हैं। तलाक के बाद स्त्री या पुरुष पुनः विवाह नहीं करते तो अकेले रह जाते हैं। वृद्धावस्था में बच्चों के द्वारा देखभाल न करने के कारण भी बहुत से लोगों को अकेलेपन का दंश झेलना पड़ता है।
        बहुत-सी विधवाएँ घर-परिवार के द्वारा दुत्कारे जाने पर काशी, हरिद्वार आदि धार्मिक स्थानों में बहुत यातनाएँ सहन करने करने के लिए विवश हो जाती हैं। वहाँ न उनके खाने की कोई व्यवस्था होती है और न ही रहने की। उनके घर-परिवार की घटिया सोच पर शर्म आती है कि जिन्हें अपने घर की महिलाओं की दुर्दशा पर जरा भी दुख नहीं होता। बहुत ही बेशर्मी से उन्हें वे दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश करते हैं।
        अकेलेपन की इस त्रासदी को बहुत से लोग झेल नहीं पाते तो वे चिड़चिड़े होने लगते हैं।  बात-बात पर क्रोध करना उनका स्वभाव बन जाता है। कुछ लोग मानसिक अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं और अनेक बिमारियाँ उन्हें घेर लेती हैं।
          इस प्रकार विवशता से अपनाया गया यह एकान्त मनुष्य को काटने को दौड़ता है। उस समय इन्सान को समझ ही नहीं आता कि पहाड़ जैसा दिन वह कैसे व्यतीत करे? 
        उस समय यदि मनुष्य अकेलेपन को अपने ऊपर हावी न होने दे तो बहुत कुछ सम्हल सकता है। उसे चाहिए कि अपने खाली समय का सदुपयोग करे। सामाजिक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखे। अपने सद् ग्रन्थों का पारायण करे। अपने जैसे लोगों का एक क्लब बना ले जिससे अकेलेपन से मुक्ति मिल सके। वे लोग मिल-बैठकर चर्चा कर सकते हैं, कोई खेल खेल सकते हैं, कभी पार्टी कर सकते हैं अथवा ग्रुप बनाकर कहीं देश-विदेश में घूमने जा सकते हैं। इस तरह समय का सदुपयोग हो जाता है और पहाड़ जितना दिन रौनक में गुजर जाता है।
          आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो एकान्त में रहकर शान्ति का अनुभव करते हैं। लोग चाहे उन्हें सनकी, खपती अथवा पागल कहें, उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं होती। लोग उनके बारे में क्या कहते हैं, वे जानना ही नहीं चाहते। वे तो बस अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं। 
        अनेक लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए जप-तप आदि करते हैं। इसके लिए उन्हें एकान्त की आवश्यकता होती है। कुछ लोग एकान्त में रहकर अपनी मौन साधना भी करते है। तब उन्हें संसार और सांसारिक कार्य-कलापों से परे ईश्वर की शरण में रहना अच्छा लगने लगता है।
          इस प्रकार एकान्तवास को ढोना कुछ लोगों के लिए मजबूरी बन जाता है। वे अपने इस एकान्त से घबराकर अजीब-सा व्यवहार करने लगते हैं। कुछ लोगों के लिए यह वरदान बन जाता है।
            जिनके लिए यह एकान्तवास स्वैच्छिक होता है, वे अपने इस एकान्त का सदुपयोग अपनी आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाने अथवा सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए करते हैं। यही लोग परमानन्द को प्राप्त करते हैं। मानव मन आदिकाल से ही कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ है। यह अबूझ पहेली की तरह उसे सदा उलझाए रहता है। ऋषि-मुनियों ने इस उलझन को सुलझाने का बहुत प्रयत्न किया।
चन्द्र प्रभा सूद