बुधवार, 12 अगस्त 2026

परमात्मा शक्तियॉं किसे देता

परमात्मा शक्तियाँ किसे देता

परमात्मा सारी शक्तियाँ उसी व्यक्ति को देता हैं जो सच्चे मन से उसकी पूजा-अर्चना करता है। यदि हम मन की गहराई से उसे याद करें तो मनुष्य को कुछ भी माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वह मालिक तो स्वयं ही सब कुछ दे देता है। परमात्मा से कुछ माँगो नहीं और उससे दूरी भी मत बनाओ। बल्कि उसे सदा अपने हृदय में बसाकर याद करो। 
         परमात्मा शक्तियाँ किसी विशेष व्यक्ति को छॉंटकर नहीं देता। वह सच्चे मन से  उपासना करने वाले भक्त, पवित्र मन वाले और परोपकारी स्वभाव वाले मनुष्यों को देता है। जो लोग ध्यान, प्रार्थना और अच्छे कर्मों से खुद को योग्य बनाते हैं, परमात्मा उन्हें आन्तरिक शक्ति, शान्ति और ज्ञान का वरदान देता है। 
        जो लोग बिना किसी स्वार्थ के ईश्वर का स्मरण करते हैं। उनका मन बुरे विचारों और विकारों से साफ होता है। वे अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता करने के लिए करते हैं। उन्हें ईश्वर कठिन समय में अडिग रहने के लिए सहनशक्ति देता है। मन को बिखरने से बचाने की उन्हें क्षमता प्रदान करता है। साथ ही उन्हें सही और गलत की पहचान करने की बुद्धि देता है।
          दुःख आने पर तो उस मालिक को सभी याद करते हैं परन्तु सुख के समय तो उसे भूल जाते हैं। उसका हर स्थिति में स्मरण करते रहना चाहिए। कबीरदास बहुत सुन्दर शब्दों में इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- 
    दुःख में सिमरन सब करें सुख में करे न कोय।
   जो सुख में सिमरन करें तो दुःख कहे को होय।।
अर्थात् कबीरदास जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि दुःख में तो ईश्वर को सब याद करते हैं पर सुख के समय कोई स्मरण नहीं करता। यदि सुख के समय परमपिता परमात्मा का पूजन-अर्चन किया जाए तो दुःख अपनी दाल गलती न देखकर मनुष्य के पास फटकते ही नहीं हैं, दूर भाग जाते हैं। ईश्वर उन्हें इतनी आत्मिक शक्ति देता है कि वे दुख मनुष्य को पीड़ित नहीं करते।
        दुःख मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अवश्य मिलते अवश्य हैं। ईश्वर का स्मरण करते रहने से मनुष्य में बहुत अधिक आत्मशक्ति आ जाती है। तब  उसे दुःख शूलों या काँटों की तरह नहीं प्रतीत होते बल्कि वे फूलों की तरह लगने लगते हैं। इन्सान के मन से सुख और दुःख दोनों का ही भेद मिट जाता है। वह सुख-दुःख के द्वन्द्व को एक समान रूप से मानने लगता है।
          एक छोटा बच्चा जब किसी कारण से परेशान होता है तब अपनी माँ के पास जाता है। माँ अपने बच्चे के बिना कुछ कहे ही, केवल उसका चेहरा देखकर समझ जाती है कि उसका बच्चा किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट से गुजर रहा है। वह उसे बड़े प्यार से अपने पास बैठाकर उसके सिर पर अपना हाथ रखती है। उसका निस्वार्थ प्रेम बच्चे के दुःख-दर्द को दूर करने में सहायक बनता है।
           ईश्वर जो जगज्जननी है, उसकी भी अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएँ होती है। वह भी तो अपनी सन्तान मनुष्य को हर परिस्थिति में अपनी शरण में लेने के बाहें फैलाए प्रतीक्षा करता रहता है। जिस प्रकार सागर नदी को उसके उदगम से वहाँ पहुँचने तक की यात्रा के सारे कष्टों से मुक्त करने के लिए, उसकी प्रतीक्षा अपनी बाहें फैलाकर करता है।
          इस भौतिक संसार के माता-पिता के पास हम अपनी सभी समस्याओं को लेकर जाते हैं। इसी तरह उस मालिक की भी इच्छा होती है कि उसके बच्चे सदा अपनी हर समस्या को उससे साझा करें। उसके पास आकर वे अपनी व्यथा-कथा का बखान करें। उससे उस कष्ट से मुक्त करने के लिए गुहार लगाएँ।
          गर्मी के ताप से तपा हुआ मनुष्य पंखे से हवा माँगता नहीं है अपितु बटन दबाता है और उसके सामने बैठ जाता है। उस समय स्वयं ही हवा उसे मिलने लगती है और उस ताप से मुक्ति देती है।
          उसी तरह दुनिया के सन्तापों से तपे हुए मनुष्य यदि बिना आडम्बर के उसका ध्यान करते हुए बैठ जाएँ तो वह निश्चित ही उनके त्रिविध तापों -  आधिभौतिक (सांसारिक वस्तुओं या जीवों से प्राप्त कष्ट), आधिदैविक (दैवीं आपदाएँ या पूर्व में स्वयं के किए गए कर्मों से प्राप्त कष्ट) और आध्यात्मिक (अज्ञानजनित) को दूर करता है।
        संसार के सभी कार्यव्यवहार करते हुए, उनमें जल में कमल की तरह लिप्त न होते हुए, प्रभु को पाने की स्वाभाविक तड़प ही मनुष्य को उस मालिक के करीब ले जाती है। तब वह उसी का चिन्तन करता है और उसी का भजन करता है। तभी मनुष्य की ऐसी स्थिति बनती है कि वह आगे-आगे चलता है और सिद्धियाँ उसके पीछे-पीछे भागती हैं।
          परमात्मा की निष्काम उपासना का यही सार है कि मनुष्य को बिना माँगे ही वह सब कुछ मिल जाता है जो उसके हर प्रकार के अज्ञान को दूर करके उसे भवसागर से पार तर जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

अन्तस् की प्रतिच्छाया चेहरे पर

अन्तस् की प्रतिच्छाया चेहरे पर

हमारे अन्तस् में जो भी विचार होते हैं, उनकी प्रतिच्छाया हमारे चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देती है और हमारे हाव-भाव फिर उसे मूर्त रूप दे देते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य प्रसन्न होता है तो खुशी उसके चेहरे पर छलकती है। जब वह हताश या निराश होता तब उसका चेहरा मुर्झाया हुआ होता है। इसी प्रकार कठोर, नृशंस व्यक्ति के चेहरे पर कठोरता दिखाई देती है। सरल व सहज हृदय व्यक्ति के चेहरे पर अलग ही ओज होता है।
        इसीलिए अंग्रेजी भाषा में यह निम्न उक्ति कही जाती है-       
      face is the index of mind.
        विद्वान यदि ऐसा कहते हैं तो इसमें सार अवश्य ही होगा। हमारे मन के भाव चेहरे पर आते हैं, इसका अनुभव हम सब ने बहुधा किया है। आज इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है? मनुष्य में अपने भावों को छिपाने की महारत हासिल क्यों नहीं कर सका? क्यों चेहरे के हावभाव देखकर उसके मन की बात पढ़ ली जाती है?
          इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले हम इस बोधकथा पर विचार करते हैं। हो सकता है इसे पढ़कर हमारी जिज्ञासा का कुछ समाधान हमें मिल जाए।
          एक व्यक्ति ने अपने गुरु से पूछा, "मेरे कर्मचारी मेरे प्रति ईमानदार नहीं है। मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और सभी दुनिया के लोग स्वार्थी हैं, कोई भी सही नहीं हैं।"
        गुरु थोडा मुस्कुराए और उन्होंने उसे एक कहानी सुनाई, "एक गाँव में एक अलग-सा कमरा था, उसमें एक हजार शीशे लगे हुए थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा एक हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे है। उसे उन बच्चों को देखकर आनन्द आने लगा। जैसे ही उसने अपने हाथ से ताली बजाई, सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाने लगे। उसने सोचा यह दुनिया की सबसे अच्छी जगह है और यहाँ वह सबसे अधिक प्रसन्न रह सकती है। वह बार बार इस स्थान पर आना चाहेगी।"
          इसी जगह पर एक उदास आदमी आया। उसने अपने चारों ओर हजारों दुखी और रोष से भरे हुए चेहरे देखे। वह बहुत दुखी हुआ और उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाना चाहा, उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है। उसने कहा दुखी होते हुए कहा, "यह दुनिया की सबसे खराब जगह है। वह यहाँ दुबारा नहीं आना चाहता और उसने वह जगह छोड़ दी।"
           इसी तरह यह दुनिया भी एक कमरा है जिसमें हजारों आईने यानी शीशे लगे हुए हैं। जो कुछ भी हमारे अन्दर भरा होता है, वही हमें सर्वत्र दिखाई देता है। हम अपने मन को बच्चों की तरह सरल, सहज और निश्छल रख सकें तो यह दुनिया हमारे  लिए स्वर्ग की तरह ही आनन्ददायी हो जाएगी। 
          हमें अपने मन को बस संकुचित नहीं बनने देना है बल्कि उसे विशाल बनाना है। यह कोई ऐसा कठिन कार्य नहीं है जो हम कर नहीं सकते। बस मन में सोई हुई इच्छाशक्ति को जगाना है।
          हृदय में जो भाव होते हैं वे मनुष्य के चेहरे पर स्पष्टतः दिखाई देते हैं। वह उनको छिपा नहीं सकता क्योंकि उसके चेहरे के हावभाव देखकर उसके मन को आसानी से पढ़ा जा सकता है।
        सज्जनों की स्वभावगत सरलता और जनमानस के प्रति उनका अगाध प्रेम उनके चेहरे से छलकता है। सन्तों के मुख पर उनकी भक्ति का तेज दिखाई दे जाता है। मनुष्य का भोलापन भी किसी से छिप नहीं सकता।
        इसके विपरीत दुर्जनों की कठोरता, उनकी क्रूरता की झलक उनके चेहरों पर प्रत्यक्ष देखी जा सकती है जिससे सभी समझदार लोग बचकर निकलना चाहते हैं। यही कहते हैं कि इनके मुँह कौन लगे।
          इसी प्रकार दुःख-तकलीफ और कष्ट-परेशानी को भी चेहरे की रेखाओं में पढ़ा जा सकता है। मानवोचित गुण दया, ममता, करुणा, सहृदयता आदि गुण मनुष्य की पहचान बनते हैं। इनके अतिरिक्त क्रोध, ईर्ष्या, नफरत, लालच (लार टपकना), असहायता, दयनीयता आदि भावों को चाहकर भी मनुष्य किसी से छुपाने में सफल नहीं हो सकता।
          कुछ लोग इस कला में दक्ष होते हैं उनके मन की बात जोर देने पर भी कोई नहीं जान पाता। उनका हृदय सभी प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने में समर्थ होता है। इसलिए वे हर स्थिति में एकसमान रहते हैं। 
          इस तरह मनुष्य का चेहरा उसकी चुगली कर देता है। यदि वह नहीं चाहता कि उसकी चोरी पकड़ी जाए तो उसे अपने मन को साधना होगा। तभी उसके मजबूत हृदय के भाव किसी दूसरे को नहीं दिखाई देंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

विद्वत्ता की कसौटी

विद्वत्ता की कसौटी

मनुष्य पढ़-लिखकर जब योग्य बनता है तो उसके घर-परिवार और बंधु-बान्धवों में उसे  सम्मान मिलता है। वैसे प्रत्येक मनुष्य की हार्दिक इच्छा होती है कि वह बुद्धिमान व्यक्ति कहलाए। विद्वान उसकी बुद्धिमत्ता का लौहा मानें। किसी सभा में यदि वह जाए तो उस विद्वत सभा में उसकी ही चर्चा हो। सभी उससे अपना सम्बन्ध बनाने के लिए इच्छुक रहें। सर्वत्र उसे एक विशेष स्थान मिले। 
          अब हम विचार करते हैं कि विद्वत्ता की कसौटी क्या है? मनुष्य को बुद्धिमान बनने के लिए कुछ तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक हैं- 
          सबसे पहली अथवा प्रमुख बात यह है कि मनुष्य का विचरवान होना आवश्यक होता है। उसे मननशील होना चाहिए। जब वह एकान्त में बैठकर विचार करता है तो उसे करणीय और अकरणीय का बोध हो जाता है। उसी के अनुरूप अकरणीय कार्यों का परित्याग करता हुआ और करणीय कार्यों के आलम्बन से दिन-प्रतिदिन उन्नति करता हुआ वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है।
          सज्जनों का अनुकरण करना और विद्वानों की संगति में रहना बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य में एक प्रकार का ठहराव आता है। उसका व्यवहार सब लोगों के साथ प्रायः सन्तुलित होने लगता है। उसके मन में व्यष्टि (एक) के स्थान पर समष्टि (सबका) का भाव आने लगता है। तभी वह सबको अपने साथ लेकर चल पाता है।
        जब वह ज्ञानार्जन करता है तब वह अपने नकारात्मक विचारों के जंजाल से मुक्त होकर सकारात्मक मनोवृत्ति वाला हो जाता है। इस तरह ईर्ष्या-द्वेष आदि दुर्भावनाओं के परित्याग करने से वह महापुरुषों की श्रेणी में आ जाता है। हर स्थान पर उसे यथोचित मान-सम्मान मिलने लगता है। इस तरह वह अग्रणी बनकर समाज में दिशा देने का कार्य करने लग जाता है।
          मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपनी योग्यता और अनुभव को देश, समाज, घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में बाँटे। इससे उसे अपना जीवन संवारने के साथ-साथ दूसरों को भी मार्गदर्शन करना चाहिए। समाज को ऐसे मनीषियों की बहुत आवश्यकता है जो निस्वार्थ होकर उसकी भलाई के कार्य कर सकें। इन समाज सुधारकों को युगों-युगों तक स्मरण किया जाता है।
        आजकल राजाओं का युग नहीं है फिर भी हम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति को इस श्रेणी में मान सकते हैं। मनीषियों का विद्वानों के सम्मान के विषय में यह मानना है - 
        स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
अर्थात् राजा का सम्मान उसके अपने देश में होता है। इसके विपरीत विद्वान को हर स्थान पर मान दिया जाता है।
          हम देखते हैं कि हमारे देश के उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर आदि विश्व के किसी भी देश में चले जाएँ, उन्हें सर्वत्र सिर-आँखों पर बिठाया जाता है और उन्हें समान रूप से सम्मान दिया जाता है। उनकी नियुक्तियाँ अच्छे वेतनमान पर होती हैं। इन लोगों को अपने देश में भी उतना‌ ही पुरस्कृत किया जाता है।
          कहने का तात्पर्य यही है कि विद्वान किसी भी आयु अथवा जाति का हो वह सदा पूजनीय होता है। विद्वत्ता के समक्ष आयु की सीमा कोई मायने नहीं रखती, वह गौण हो जाती है। जाति का बन्धन भी गौण हो जाता है। सीखने की जहॉं तक बात है, एक बच्चे से भी ज्ञान लिया जा सकता है। इसमें हेठी जैसी कोई बात नहीं होती।
          यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि विद्वत्ता न होने पर, उसका ढोंग कर लेने से वह विद्वानों की श्रेणी में आ जाएगा तो यह उस मनुष्य की सरासर भूल है। मूर्ख व्यक्ति जब भी मुँह खोलेगा तो उसकी पोल खुल जाएगी। इस तरह तब दूसरों से तिरस्कृत होने पर उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है। इसके लिए हम कह सकते हैं कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, बार-बार नहीं चढ़ती।
          यहॉं संस्कृत भाषा के विश्व सुप्रसिद्ध विद्वान् महाकवि कालिदास की चर्चा करना चाहती हूॅं। अपने पूर्व काल में वे निपट मूर्ख थे। विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए उनका विवाह परम विदुषी विद्योतमा से करवा दिया था। अशुद्ध 'उष्ट्र' शब्द सुनकर उनकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया था। विद्वानों की संगति और ईश्वर की उपासना से वे विद्वान बने।
          विद्वानों को यह सिद्ध करने की या प्रचार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वे बहुत जानकार हैं। लोग उनके प्रचारतन्त्र से प्रभावित होकर उनसे कुछ सीखें। होता इसके विपरीत है, लोग ढूँढते हुए उनके पास आकर अपनी ज्ञान पिपसा को शान्त करते हैं।
          विद्वानों की विद्वत्ता कस्तूरी की गन्ध की भाँति होती है जिसे चाहे सात पर्दों में भी छुपाकर क्यों न रखा जाए, वह चारों ओर के वातावरण को सुगन्धित कर ही देती है।
          विद्वत्ता मनुष्य को ईश्वर का दिया हुआ उपहार है। वह उसे अपने पुण्य कर्मों की बदौलत प्राप्त करता है। मनुष्य भाग्य के भरोसे नहीं बैठ सकता। उसे फिर भी कठोर परिश्रम करना पड़ता है। दिन-रात एक करना पड़ता है। स्वाध्याय, मनन, सज्जनों की संगति और ईश्वर की उपासना करके ज्ञान को निस्सन्देह प्राप्त किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 9 अगस्त 2026

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता 

 मनुष्य के भाग्य में जो भी लिखा होता है वही उसे मिलता है। न उससे अधिक और न ही उससे कम। यह भाग्य हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार बनता है। यदि पूर्व जन्मों में हमारे शुभकर्मों की अधिकता होती है तो इस जन्म में सुख-सुविधा के सभी साधन उपलब्ध होते हैं। इसके विपरीत दुष्कर्मों की यदि अधिकता होती है तब इस जन्म में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक बेहद लोकप्रिय और गहरी सोच है -
        समय से पहले और भाग्य से ज्यादा 
        किसी को कुछ नहीं मिलता
यद्यपि इसका सही अर्थ यह है कि हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए। भाग्य और कर्म दोनों ही जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
          भाग्य मनुष्य को जीवन की परिस्थितियाँ और अवसर प्रदान करता है, लेकिन उन परिस्थितियों में वह कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या निर्णय लेता है, यह पूरी तरह से उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। मनुष्य की कामना या इच्छा ही उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। बिना इच्छा के कोई भी सार्थक प्रयास सम्भव नहीं हो सकता।
          भाग्य के भरोसे बैठने से सब कुछ मिल जाएगा, ऐसा नहीं होता। बिना पुरुषार्थ या मेहनत‌ के भाग्य का फल भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि सब कुछ भाग्य में ही लिखा है तो भी कर्म करना आवश्यक है क्योंकि भाग्य केवल पिछले कर्मों का परिणाम (बैंक बैलेंस) होता है।‌ मनुष्य की वर्तमान इच्छाऍं और पुरुषार्थ या परिश्रम ही मनुष्य 
के नए भाग्य का निर्माण करते हैं।‌ यदि वह आज कर्म नहीं करेगा तो भविष्य में उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा। 
          हमें समझाते हुए सयाने यह कहते हैं - 
         पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर
अर्थात् इस कथन का सीधा-सा अर्थ यही है कि मनुष्य का भाग्य उसके जन्म लेने से पूर्व ही निर्धारित हो जाता है। इसीलिए वर्तमान जीवन में मनुष्य को उसी के अनुसार समय-समय पर शुभाशुभ फल प्राप्त होता है।
        इसी विषय को उदाहरण सहित भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाया है -
  पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्?
 नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्    धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? 
  यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क क्षमः।अर्थात् करीर के वृक्ष में यदि पत्ते नहीं लगते तो इसमें वसन्त ऋतु का क्या दोष है? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? चातक पक्षी के मुँह में यदि वर्षा की धारा नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात उसे ब्रह्मण्ड की कोई ताकत भी नहीं मिटा सकती।
           करीर के वृक्ष पर पत्ते न लगने का कारण वसन्त ऋतु नहीं है। पतझड़ में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और वसन्त में तो सभी वृक्ष हरे-भरे दिखाई देते हैं। उन पर खिले रंग-बिरंगे फूल प्रकृति के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं।  चारों ओर हरियाली का साम्राज्य होता है जो बहुत ही मनमोहक होती है।
          कर्म के माध्यम से भाग्य को बदलने की शक्ति और उदाहरणों के बारे में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले 'श्रीमद्भगवद्गीता' के कर्म सिद्धान्त पर प्रकाश डाला गया है। वहॉं स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है। जैसा वह आज बोएगा, उसी का फल कल भाग्य बनकर उसके सामने आएगा।
        विश्व के सभी जीव-जन्तु सूर्य की रौशनी में दिन में देखते हैं। रात में उन्हें देखने में कठिनाई होती है। परन्तु उल्लू एक ऐसा पक्षी है जो दिन के उजाले में नहीं देख पाता बल्कि रात के अँधेरे में उसे दिखाई देता है। वह दिन में नहीं देख पाता तो हम इसके लिए सूर्य को दोष नहीं दे सकते।
          वर्षा की पहली बूँद चातक पक्षी के मुँह में यदि पड़ती है तो वह अपनी प्यास बुझाता है। यदि वर्षा की पहली बूँद उसके मुँह में न पड़े तो वह प्यास रह जाता है और फिर वर्षा की पहली बूँद के लिए वह पूरा वर्ष प्रतीक्षा करता है। सभी जीवों की प्यास बुझाने वाली वर्षा का इसमें कोई दोष नहीं होता।
          करीर वृक्ष, उल्लू और चातक पक्षी के इन सभी उदाहरणों से यही सिद्ध होता है कि विधाता ने जिसके ललाट पर या मस्तक पर उसके जन्म दे पहले ही जो लिख दिया, उसे इस संसार की कोई भी शक्ति नहीं मिटा सकती। न ही उसे बदलने की सामर्थ्य किसी में है।
          मनीषियों का यह भी कथन है कि अपने जीवन में मनुष्य जिस भी अंग का अधिक दुरुपयोग करता है, आगामी जीवन में ईश्वर उसे उस अंग से वंचित कर देता है। वर्तमान जीवन में वह एक अपाहिज का जीवन व्यतीत करता है और कष्ट पता है। वह सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाता है। हम अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों से मिलते रहते हैं।
          आगामी जन्म में अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए बिना समय व्यर्थ गॅंवाए सत्कर्मो की पूँजी को बढ़ाने के लिए हम सब प्रवृत्त हो जाएँ। इस प्रकार करने से सिर धुनकर रोने और पश्चाताप करने से हम बच सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना करने का अर्थ है, उसको नित्य प्रति स्मरण करना। मनुष्य किसी भी रूप में चाहे प्रभु की भक्ति कर सकता है। यानी चाहे उसकी साधना साकार रूप में की जाए अथवा निराकार रूप में की जाए। उसे किसी भी नाम से याद किया जा सकता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। किसी को उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इस संसार में भेजने वाले उस मालिक का नाम उसे प्रतिदिन भजना चाहिए।
           समस्या यह है कि इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उस ईश्वर की उपासना करने में मनुष्य का मन रमता ही नहीं है। यह एक मनुष्य की बात नहीं है परन्तु प्रायः सभी लोगों की यही समस्या है। इन्सान केवल ऐशो-आराम में मस्त रहना चाहता है। उसे लगता है कि वह यहॉं पर मौज-मस्ती करने आया है। इसलिए उसका ध्यान उस मालिक की ओर जाता ही नहीं है जिसने उसे इस संसार में मनुष्य के रूप में भेजा है।
        ईश्वर की उपासना करना सबसे कठिन कार्य है। यह मैंने इसलिए कहा कि उसकी भक्ति का प्रदर्शन अधिक होता है जिसका कोई लाभ मनुष्य को नहीं होता। जो लोग सच्चे मन से उसकी उपासना करना चाहते हैं जब उनका मन उस समय दुनिया के कारोबार में भटकने लगता है तो वे परेशान रहते हैं।
          ईश्वर का यदि सच्चे मन से भजन किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है यानी मनुष्य ईश्वर के करीब हो जाता है। उसका प्रिय बन जाता है। ये मात्र अड़चनें है जो इन्सान को डिगाने के लिए आती हैं। वह प्रभु भी परीक्षा लेता रहता है कि मनुष्य की लगन कितनी सच्ची है, उसमें कितनी ईमानदारी है। निश्चित समय पर और मन से सोचा गया जप मनुष्य को अवश्य करते रहना चाहिए।
          कहते हैं जब राम कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का मन साधुओं के उपदेश के कारण बदल गया तो वे साधना में लीन हो गए। तपस्या करते हुए उनके ऊपर चींटियों ने बाम्बी बना ली थी। इसलिए उन्हें वाल्मीकि कहते हैं।। वे राम नाम के स्थान पर मरा शब्द का जप करते हुए तर गए। उन्हें तब भी इसका फल मिला और वे विश्व विख्यात हुए वे रामकथा लिखकर इस संसार में सदा के लिए अमर हो गए।
            एक बार तुलसीदास से किसी व्यक्ति ने पूछा था, "कभी-कभी भक्ति करने में मन नहीं लगता। फिर भी जप करने बैठ जाते हैं, क्या उसका फल मिलता है?"
      इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास ने उसे मुस्कुराते हुए कहा था - 
    तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
    भौम पड़ा जा में सभी, उल्टा सीधा बीज।।
अर्थात् जब भूमि में बीज बोए जाते हैं तो यह नहीं पता चलता कि वे उल्टे पड़े हैं या सीधे। पर फिर भी कालान्तर में फसल  तैयार हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु के नाम का सुमिरन कैसे भी किया जाए, उसके सुमिरन का फल अवश्य मिलता है।
        यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि जप कैसे किया बल्कि इसकी उपयोगिता है कि जप करने का जो नियम बनाया था उसे भार तो नहीं समझ रहे। कहीं मन में यही विचार हावी हो रहा हो कि बेकार ही मुसीबत मोल ले ली। यदि ऐसी भवना मन में कभी आ जाए तो अपने ऊपर किए गए उस प्रभु के उपकारों का स्मरण कर लीजिए। फिर मन स्वयं ही उसकी आराधना करने के लिए नतमस्तक हो जाएगा।
        कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर किसी ने भेजा था कि ईश्वर को स्मरण करने के लिए उसे एस. एम.एस. करो। ईश्वर को एस.एम.एस. करने के विषय में लिखे गए ये विचार बहुत ही सुन्दर लगे, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         एक बार कोई भक्त ने किसी सन्त के पास गया और उनसे पूछा, 'मुझे आज तक भगवान नहीं मिले, कैसे मिलेंगे बताइए?"
        सन्त बोले, "भगवन तो हर स्थान पर विद्यमान हैं, वह कण-कण में वास करते हैं। इसीलिए उन्हें सर्वव्यापी कहते हैं। तुमने भगवान को एस.एम. एस. नहीं किया होगा। एक बार उन्हें एस.एम. एस. करना शुरू कर दो फिर निस्सन्देह वे स्वयं ही तुम्हें मिल जाएँगे।" 
        भक्त ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए फिर उनसे पूछा, "मैं एस.एम.एस. कहाँ पर करूँ? भगवन का नम्बर तो मेरे पास नहीं है।" 
          सन्त ने कहा, "अच्छा एक बार इसका अर्थ समझ लो। इसके हर शब्द का अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं- एस- सच्चे,  एम- मन से,  एस - स्मरण।
अर्थात् सच्चे मन से उसका स्मरण कर तो वह तुरन्त मिल जाता है।"
          इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर को मनुष्य से कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो बस मनुष्य के भाव को परखता है। उसकी उपासना करने के लिए मनुष्य को सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए, उसका मन चाहे लगे अथवा न लगे। अपने नियम का पालन सच्चे मन से करने का ईमानदार प्रयास करते रहना चाहिए। कभी तो उसकी उपासना में मन लगने लगेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

धनवान बनने की बलवती कामना

धनवान बनने की बलवती कामना

जीवन को सुविधापूर्वक जीने के लिए मनुष्य के लिए धन एक बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए उसकी सबसे पहली और बलवती कामना होती है धनवान बनने की। यह ऐसा धन है कि बहुत कठिनाइयों और प्रयत्नों से पकड़ में आता है। हाथ में आते ही फिर यह फिसलने के लिए मचलने लगता है। इसका कारण है कि जब इन्सान जी तोड़ श्रम करके धन एकत्र का लेता है तो फिर वह संसार की समस्त सुख-सुविधाएँ भोगना चाहता है। अतः वह अपने और अपनों के लिए उन्हें जुटाने का प्रयास करता है।
        यानी रहने के लिए एक बड़ा घर, घूमने के लिए मँहगी गाड़ी, अच्छे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, ऐशो-आराम के सभी साधन अपने जीवन काल में जुटा लेना चाहता है। उसकी यही इच्छा होती है कि वह और उसका घर-परिवार किसी भी तरह के कष्ट का सामना न करे। यदि घर में कभी कोई अस्वस्थ हो जाए तो अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाना चाहता है। उसकी यही हार्दिक इच्छा होती है कि उसके घर का कोई भी सदस्य अपना मन मारकर न रहे। 
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका कमाया हुआ पैसा बोलने लगता है। यदि वह स्वयं पर नियन्त्रण रख लेता है तो सब सुविधाओं को भोगता है। परन्तु यदि उस पैसे को न सम्हाल सके तो उसका सारा कमाया हुआ धन बर्बाद हो जाता है। इसके पीछे केवल यही कारण है कि पैसा अपने साथ बहुत से दुर्व्यसन लेकर आता है। इन कुटेवों में यदि वह पड़ जाता है तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। सब कुछ हारकर फिर वह सिर धुनकर पश्चाताप करता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसलिए सयाने कहते हैं -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
          जब वह दौलत एकत्रित कर लेता है तब समाज में अपना एक विशेष स्थान भी चाहता है। उसके मन में यश पाने की आशा जागने लगती है। वह चाहता है कि उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले, लोग उसे पहचानें। उसका सर्वत्र समाना हो। इस चक्कर में वह उस समय सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगता है। खूब दान देता है, अपने नाम के पत्थर भी लगवाता है।
         जब वह प्रभूत धन अर्जित कर लेता है और चारों ओर उसका यश फैलने लगता है तब फिर उसके मन में एक शक्तिशाली इन्सान बनने की उत्कट लालसा बलवती होने लगती है। उस समय कुछ लोग स्वयं को सिद्ध करने के लिए अनायास ही असामाजिक तत्वों से साँठ-गाँठ कर बैठते हैं। दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए अपने साथ हथियारबन्द गार्ड रखता है ताकि लोग उसका लौहा मानें और उससे डरकर रहें। 
        समय बीतते वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाता है। तब वहाँ से निकलने के लिए वह छटपटाने लगता है परन्तु उसके सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। वह चाहकर भी अपने जाल को काटकर मुक्त नहीं हो पाता।
        धन कमाने, यश पाने और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए मनुष्य भटकता रहता है। फिर अन्त में वह मन की शान्ति पाने के लिए तलाश में दर-बदर भटकने लगता है। वह तीर्थों, जंगलों की खाक छानता है। यदा कदा तथाकथित धर्मगुरुओं के चंगुल में फंस जाता है। 
         इन सभी स्थानों पर भी जब उसे शान्ति नहीं मिल पाती तब उसकी खोज अधूरी रह जाती है। इस तरह भटकते हुए उसका अन्तकाल आ जाता है और वह मिट्टी में मिल जाता है। उसके सारे-के-सारे ठाठ-बाठ इसी धरा पर धरे रह जाते हैं। वह खाली हाथ इस संसार से विदा हो जाता है।
        मनुष्य अपने जीवन की इस यात्रा में बहुत-सी उम्मीदें पल लेता है। आशा ऐसी होनी चाहिए जो उसे उसके लक्ष्य तक ले जाए। अपने लक्ष्यों को पाने की होड़ में वह अपने रिश्तों से दूर होता जाता है। जब सबसे ऊबकर उसे उनकी आवश्यकता होती है तब तक वे पीछे छूट गए होते हैं। ये वही लोग होते हैं जो उसके अपने होते हैं किन्तु समय की ठोकर लगने से पराए हो गए होते हैं।
          इन्सान का यह दुर्भाग्य है कि जरा-सा ऐश्वर्य, कीर्ति, शक्ति पाकर वह घमण्ड से फूल नहीं समाता और अपनी औकात भूल जाता है। दूसरी और इतनी विशाल जलराशि का स्वामी होकर भी सागर सदा अपनी सीमा में रहता है। 
          बड़े दुःख की बात है कि मनुष्य अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। धन के मद में चूर वह हर किसी को देख लेने की धमकी देता हुआ स्वयं को ईश्वर से भी महान समझने की भूल करने लगता है। उसकी सत्ता को चुनौती देने लगता है जिसका अन्त अच्छा नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहिए की सब सुखों को देने वाले उस प्रभु को सदा स्मरण करते हुए उसका धन्यवाद करे। अपने अन्तस् में अहं को स्थान न देकर सबसे सहृदयता का व्यवहार करके वास्तविक पूँजी का संग्रह करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

आयु‌ में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

आयु में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। वह बच्चे के रूप में जन्म लेता है। फिर वर्षों वर्ष व्यतीत होते रहते हैं और मनुष्य रिटायर हो जाता है। यानी एक आयु के पश्चात उसे वृद्ध मान लिया जाता है। वयोवृद्ध व्यक्ति समाज में सम्माननीय होता है। परन्तु वास्तव में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मात्र आयु में वृद्ध होने से ही कोई भी मनुष्य बड़ा कहला सकता है?
         इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि आयु में वृद्ध होने पर मनुष्य को बड़ा अथवा समझदार नहीं कहा जा सकता। हम यह भी कहा सकते हैं कि मनुष्य का अपना व्यवहार जो वह दूसरों के प्रति करता है, उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं। बड़ा वही व्यक्ति कहलाता है जो अपनी विद्वत्ता और अपने अनुभवजन्य ज्ञान का उपयोग देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए करे। 
          बड़प्पन उसी मनुष्य का माना जाता है जो अपने छोटों के प्रति सहृदय हो। उन्हें पूरा प्यार व सम्मान दे। उनकी समस्याओं को सुलझाने की सामर्थ्य रखता हो। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति उसकी शीतल छाया का आनन्द ले सके। उसके ज्ञान और उसके सद्वयवहार की छाप लेकर ही विदा हो। बार-बार उनसे सम्पर्क साधने के लिए उसका मन लालायित रहे।
          आयु में बड़े होने के उपरान्त यदि मनुष्य में ओछापन हो, चरित्रहीन हो या अहंकारी हो तब भी कोई उसका आदर नहीं करता। लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यदि वह क्रोधी हो तो कोई उसके पास नहीं जाना चाहता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं। यदि वृद्ध व्यक्ति मूर्ख हो तब भी उसका कोई सम्मान नहीं करता।
          जिस बड़े व्यक्ति को अपने पद, ज्ञान, धन-दौलत आदि का घमण्ड हो, वह दूर की कौड़ी जैसा व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं बन पाता बल्कि सबके द्वारा नकार दिया जाता है। उस मनुष्य की स्थिति खजूर के पेड़ की तरह होती है। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में हमें समझाते हुए कहा है-
     बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
     पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर।।
अर्थात् यह दोहा हमें यही समझ रहा है कि खजूर के पेड़ के बड़े होने का लाभ न किसी इन्सान को होता है और न किसी पक्षी को होता है। खजूर के पेड़ की लम्बाई क्योंकि बहुत अधिक होती है। इसलिए वह धूप में तपे हुए किसी भी यात्री को छाया नहीं दे सकता। उस पर लगने वाला फल इतनी ऊँचाई पर होता है जिसे कोई भी तोड़कर नहीं खा सकता और न ही अपनी भूख मिटा सकते हैं। 
        इस दोहे का भावार्थ और इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। केवल आकार या धन-दौलत में बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता। यदि आपका बड़प्पन किसी जरूरतमन्द के काम न आए तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती।
         जो लोग ज्ञान या धर्मचर्चा में योग्य होते हैं, उनके विषय में मनीषी कहते हैं-
        धर्मवृद्धेषु वयः न समीक्षते।
अर्थात् धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती।
          इस सूक्ति के अनुसार यदि धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती तो फिर क्या देखा जाता है? उन लोगों की आयु न देखकर केवल ज्ञान ही परखा जाता है। इस विषय में हम कह सकते हैं कि साधु-सन्त या विद्वान चाहे छोटी आयु के हों या बड़ी आयु के सभी उनके चरण छूते हैं। यहाँ उनका ज्ञान ही महत्वपूर्ण होता है, उनकी आयु नहीं।
          जो मनुष्य बड़े होने पर भी अपने छोटों को अपनी छाया में सुरक्षित नहीं रख सकता, उनका समुचित ध्यान भी नहीं रख सकता, उसे कोई पसन्द नहीं करता। हर इन्सान उससे दूरी बनाए रखने का प्रयत्न करता है, कोई भी व्यक्ति उससे अपना रिश्ता नहीं रखना चाहता। उस समय वह मनुष्य बरगद के विशाल वृक्ष की तरह इस संसार में निपट अकेला ही रह जाता है।
          बरगद के पेड़ की तरह मनुष्य को महान नहीं बनना चाहिए। वह बहुत विशाल होता है। उसकी छाया में कोई और पौधा नहीं पनप सकता। ऐसे उस बरगद की बहुत अधिक आयु होने का किसी को कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण है कि अपनी छाया में अन्य पौधों के न होने से वह बड़ा होने पर भी निपट अकेला ही रह जाता है।
          यदि कोई वयोवृद्ध दुर्वासा ऋषि की तरह क्रोधी हो तो भी वह पूज्य नहीं होता। क्रोधी व्यक्ति यदि गुणवान हो तब भी वह लोकमान्य नहीं बन पाता। जब तक उसके स्वभाव में मधुरता नहीं होगी तब तक कोई उसे नहीं पूछता। इसीलिए कहते हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है।
          इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य का सम्मान उसकी योग्यता, उसके ज्ञान, उसके जीवनभर के अर्जित अनुभवों के आधार पर होता है, उसके वयोवृद्ध होने से नहीं होता।
चन्द्र प्रभा सूद