मंगलवार, 7 जुलाई 2026

शरीर शुभ कर्म करने के लिए

शरीर शुभ कर्म करने के लिए

ईश्वर ने हम जीवों को यह शरीर शुभ कर्म करने के लिए उपहार स्वरूप दिया है। उसने हमें इस मूल्यवान शरीर के साथ-साथ आँख, कान, नाक, जीभ और मन पाँच इन्द्रियाँ भी दी हैं। इन्हें अपने वश में करके निश्चित ही हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियों को मनुष्य अपने वश में नहीं कर सकता तो वह जीवन की बाजी हार जाता है। 
             यदि मनुष्य इनके वश में हो जाता तब ये इन्द्रियाँ मनुष्य को भटका देती हैं जिससे वह अपने लक्ष्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। जब उसका अन्त समय आता है तब वह अपने अधूरे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए के लिए ईश्वर से रो-रोकर थोड़े से और समय की मोहलत माँगता है। किन्तु उस समय उसे पलभर की भी मोहलत भी नहीं मिल पाती।
            विशाल वर्मा द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई निम्न बोधकथा के माध्यम से इस सत्य को समझते हैं। कुछ संशोधन के साथ इस कथा को प्रस्तुत कर रही हूॅं।
            एक बार एक गरीब किसान एक साहूकार के पास आया और कहा, "सेठ जी, मुझे अपना एक खेत एक साल के लिए उधार दे दीजिए।"
           उसने साहूकार को वचन दिया,"मैं दिन-रात मेहनत से काम करके अपने खाने के लिए अन्न उपजाने का कार्य करूॅंगा।"
          ‌साहूकार बहुत ही दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को अपना एक खेत दे दिया और उसकी मदद के लिए पाँच मजदूर भी दिए। ताकि उनकी सहायता से उसे खेती करने में आसानी हो जाए।
           साहूकार को प्रणाम करके और धन्यवाद देकर किसान उन पाँच मजदूरों को अपने साथ लेकर चला गया। उन्हें खेत ले जाकर काम पर लगा दिया। किसान ने सोचा, "जब ये पाँच लोग खेत में काम कर तो रहे हैं, फिर मैं क्यों करू?"
           किसान दिन रात बस सपने ही देखता रहता कि खेत में जो अन्न उगेगा उससे क्या क्या करेगा? मालिक के सामने न होने पर वे पाँचो मजदूर अपनी मनमर्जी से खेत में काम करते। जब मन करता वे फसल को पानी देते और अगर उनका मन नहीं करता तो मस्ती करते। इस तरह कई दिनों तक फसल सूखी पड़ी रहती।
           समयानुसार जब फसल काटने का समय आया तो किसान ने देखा कि खेत में खड़ी फसल बहुत ही खराब है। जितनी लागत उसने खेत में पानी और खाद डालने में लगाई, खेत में उतनी लागत की फसल भी नहीं पैदा नहीं हुई।   
            किसान यह देखकर बहुत दुखी हो गया। एक साल बाद साहूकार अपना खेत किसान से वापिस माँगने आया। तब किसान उसके सामने रोने लगा और बोला, "आपने मुझे जो पाँच मजदूर दिए थे, मैं उनसे सही तरीके से काम नहीं करवा पाया। इसलिए मेरी सारी फसल बर्बाद हो गयी।"
            किसान ने साहूकार से हाथ जोड़कर आगे कहा, "मुझे एक और साल का समय दे दीजिए ताकि मैं अच्छे से काम कर सकूॅं और उसका खेत उसे लौटा सकूॅं।"
          किसान की बात सुनकर साहूकार ने उससे कहा, "बेटा, ऐसा मौका मनुष्य को बार-बार नहीं मिल पाता। मैं अब तुम्हें यह अपना खेत नहीं दे सकता।"
          यह कहकर साहूकार वहाँ से चला गया। उसे रोते हुए किसान पर जरा भी दया नहीं आई। 
            विचारणीय है कि दयालु साहूकार वह परमपिता परमात्मा है। गरीब किसान हम सभी लोग हैं जो इस शरीर रूपी खेत को उससे कुछ समय के लिए उधार लेते हैं। यानी ईश्वर हमें यह शरीर सीमित समय के लिए उपहार स्वरूप देता है। वह मालिक हमारी मदद के लिए आँख, कान, नाक, जीभ और मन आदि पाँच इन्द्रियाँ रूपी मजदूर साथ में देता है। ताकि हम इस संसार में कमल की भाँति रहते हुए, किसी प्रकार की कोताही न करते हुए अपने सभी दायित्वों को ठीक से निभा सकें। ताकि जब भगवान हमसे अपना दिया हुआ यह शरीर वापिस माँगे तो हमें रोना न आये बल्कि हम प्रसन्नतापूर्वक इस दुनिया से विदा ले सकें।
          वास्तव में हम मनुष्य इतने नाशुकरे हैं कि दुनिया की रंगीनियों में खोकर सब कुछ भूल जाते हैं। संसार के आकर्षण ही इतने हैं कि हम कुछ भी याद नहीं रखना चाहते। हम तो बस यहॉं के सारे एशो-आराम भोगना चाहते हैं। इस संसार में आते समय हम ईश्वर से किया गया अपना वादा याद नहीं रहता। उस समय हम इतना मस्त हो जाते हैं कि यह भी याद नहीं करना चाहते कि अपने कृत कर्मो का निपटारा करके शुभ कर्मों को अपने खाते में जोड़ने आए हैं। अपने कार्य को पूरा न कर पाने का मलाल हमें मृत्यु के समय नहीं हो, यह प्रयास समय रहते यथासम्भव कर लेना चाहिए। 
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 6 जुलाई 2026

नाम का बहुत महत्त्व

नाम का बहुत महत्त्व

भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में मनुष्य के नाम का बहुत महत्त्व स्वीकार किया गया है। मनुष्य के बच्चे के रूप में जन्म के पूर्व से लेकर उसकी मृत्यु के उपरान्त तक सोलह संस्कारों का विधान हमारे महान् शास्त्रों द्वारा किया गया है। इन्हीं संस्कारों में एक है नामकरण संस्कार। यह बच्चे में सकारात्मक ऊर्जा लाने के उद्देश्य से किया जाता है।
         ‌ नामकरण संस्कार के माध्यम से ही किसी व्यक्ति को समाज में एक अस्तित्व और अर्थ मिलता है। नाम मनुष्य के कर्मों से जुड़कर कीर्ति उसकी बनता है। लोग नाम से ही उसे जानते और सम्मान देते हैं। नाम मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यन्त गहरा होता है। यह मनुष्य को पुकारने का एक साधन होता है। धीरे-धीरे यही नाम मनुष्य की पहचान बन जाता है।
          ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सही अर्थ वाला नाम जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाता है जबकि गलत नाम बाधाऍं उत्पन्न कर सकता है। इसलिए कई लोग अपनी समस्याओं का निदान करने के लिए अपने नाम में किसी वर्ण विशेष को जोड़ लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि नाम व्यक्ति के स्वभाव, रूप और गुणों को प्रभावित करता है। नाम मनुष्य को भीड़ में दूसरों से अलग करता है और समाज में उसकी पहचान स्थापित करता है।
          बच्चे के जन्म के कुछ दिनों बाद ही उसका नामकरण संस्कार बहुत धूमधाम से किया जाता है। घर-परिवार के लोगों के साथ-साथ रिश्तेदारों, बन्धु-बान्धवों और पड़ोसियों को भी आमन्त्रित किया जाता है। यथाशक्ति सबको दावत दी जाती है। इस संस्कार के सम्पादन के लिए किसी योग्य पुरोहित को बुलाया जाता है। संस्कार के पश्चात उन्हें यथोचित राशि भेंट स्वरूप दी जाती है।
           बच्चे के अभिभावक या माता-पिता जन्म के समय जो उसका नामकरण करते हैं, प्रायः उसी नाम से आयुपर्यन्त मनुष्य को जाना जाता है। बहुत ही कम लोग होते हैं जो माता-पिता का दिया हुआ नाम बदल देते हैं। यदा कदा परिस्थितिवश बच्चे का नाम बदला जाता है। कुछ परिवारों में शादी के उपरान्त बहु का नाम बदलने की परम्परा भी देखी गई है।
            मनीषी कहते हैं कि नाम का मनुष्य के जीवन पर बहुत प्रभाव होता है। पर्वतों, नदियों, देवताओं आदि के नाम पर बच्चे का नाम नहीं रखने के लिए कहा गया है। नाम अर्थपूर्ण होना चाहिए। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आजकल लोग बच्चों का नाम रख देते हैं परन्तु उन्हें स्वयं ही उसका अर्थ नहीं पता होता। इसलिए जब अर्थ का अनर्थ हो जाता है तो उसका दुष्प्रभाव बच्चे के जीवन पर भी पड़ता है। कई नामों का उच्चारण अशुद्ध किया जाता है। जैसे कण्व का उच्चारण कणव करते हैं। 
              बच्चे के पैदा होते ही उसके चरित्र और स्वाभाव के विषय में ज्ञान नहीं होता है। बड़ा होकर व्यक्ति कैसा आचरण करेगा यह कोई नहीं जानता। हर माता-पिता अपने बच्चे को अच्छे-से-अच्छे संस्कार देने का यत्न करते हैं जिससे उसे समाज में उचित स्थान मिल सके। यद्यपि आसपास के वातावरण, उसके स्कूल और दोस्तों का प्रभाव भी बच्चे के चरित्र निर्माण पर पड़ता है। परन्तु यदि घर के संस्कार प्रबल हों तो बाहरी संस्कार उस पर किसी भी तरह हावी नहीं हो सकते।
          नाम के अनुरूप बच्चे का आचरण हो यह जरूरी नहीं होता। एक कहावत है-
          आँख का अन्धा नाम नयनसुख।
यानी नाम तो नयन सुख है पर मनुष्य आँखों से देख नहीं सकता अर्थात् वह अन्धा है। इसी प्रकार किसी का नाम गरीब दास होता है पर वह बहुत अमीर होता है। एवंविध नाम अमीर चन्द होता है पर सारी जिन्दगी वह दाने-दाने को तरसता रहता है। ऐसा भी देखा गया है कि नाम हवेली राम होने के बावजूद इन्सान सारी आयु सड़कों पर जीवन जीते हुए बिता देता है। 
            इसी श्रेणी में उस महिला के नाम की चर्चा भी कर सकते हैं जिसका नाम कोयल है लेकिन उसका स्वभाव बहुत ही कर्कश है। सुन्दरी या माधुरी नाम वाली महिलाएँ भी कुरूप देखी जा सकती हैं।
          ऐसा भी देखा जाता है कि किसी देवता के नाम वाले मनुष्य क्रूर और आततायी बन जाते हैं। शान्ति या शान्त अर्थ के नाम वाले जीवन भर अशान्त रहते हैं। दूसरों के साथ कठोर व्यवहार करके उन्हें भी परेशान करते रहते हैं।
          एक ही नाम वाले दो व्यक्तियों के चरित्र और स्वाभाव एक जैसे हों यह भी आवश्यक नहीं बल्कि इसकी सम्भावना अधिक हो सकती है कि दोनों ध्रुवों की भाँति वे सर्वथा विपरीत हों।
           किसी व्यक्ति के नाम के कारण उससे एक बार मिलकर अथवा बात करके उसके विषय मे कोई सम्मति या राय नहीं बनाई जा सकती। जब तक उसके साथ व्यवहार न किया जाए उसकी असलियत का ज्ञान नहीं होता। 
         नाम के महत्त्व को समझकर बच्चे को सार्थक और अर्थपूर्ण नाम दें। बहुत से माता-पिता बच्चे की जन्म राशि के अनुसार किसी भी विद्वान से पूछकर उसका नाम रखते हैं। पुस्तकों से पढ़कर अथवा नेट से देखकर बच्चे को वह नाम न दें जिसके विषय में स्वयं आपको जानकारी न हो।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 5 जुलाई 2026

एकता में बल होता है

एकता में बल होता है

अपने घर-परिवार में एक मुट्ठी की तरह मिल-जुलकर रहने वाले सदस्य ही स्वयं को सदा दुनिया में सबसे अधिक सुरक्षित अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि परिवार की ताकत उनके साथ है। वैसे भी कहते हैं- 
                  एकता में बल है।
                     और
        अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
कहकर अकेले व्यक्ति की असहायता का वर्णन किया गया है। इसी बात पर बल देते हुए अन्यत्र कहा है- 
          एक अकेला और दो ग्यारह।
अर्थात् एक व्यक्ति अकेला ही होता है परन्तु जब उसे एक साथी और मिल जाता है तो उनकी शक्ति बढ़कर ग्यारह के बराबर हो जाती है।
         जब तक मनुष्य मिलकर रहता है उसकी शक्ति, उसकी साख कई गुणा बढ़ जाती है। कोई भी व्यक्ति उससे पंगा लेने से डरता है। उन्हें पता होता है कि अमुक व्यक्ति के पीछे उसके घर-परिवार का पूर्ण सहयोग है।
           फूलों के गुच्छे जब पौधों पर लगे होते हैं तो वे सबके आकर्षण का केन्द्र होते हैं। जो भी उन्हें देखता है, उनकी सराहना किए बिना नहीं रह पाता। दुर्भाग्यवश जब एक फूल टहनी से अलग हो जाता है तो उसका सौन्दर्य मानो कहीं खो जाता है। वह सब फूलों से यानी अपने गुच्छे से कटकर रह जाता है। तब लोग उसे अपने पैरों तले रौंदकर निकल जाते हैं।
           इसी प्रकार एक पत्ता जब तक अपनी शाखा से जुड़ा रहता है तब तक आँधी भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। परन्तु ज्योंहि वह अपनी शाखा से टूटकर अलग हो जाता है त्योंहि हवा उसे उड़ाकर कहीं भी फैंक देती है। जब माली आता है तब उन सब जमीन पर गिरे हुए फूलों या पत्तों को समेटकर कूड़े में फैंक देता है और फिर उन्हें अग्नि के हवाले कर देता है।
            हम बाजार में फल लेने जाते हैं तो देखते हैं कि एक गुच्छे में रहने वाले फलों का मूल्य अधिक होता है। लेकिन पास ही पड़े हुए, अपने गुच्छे से अलग टूटे हुए फलों के दाने कितने भी बढ़िया क्यों न हों, उनका मूल्य बहुत ही कम रह जाता है। अच्छे फलों को चाहने वाले ग्राहक उनकी ओर देखते तक नहीं हैं।
          मनुष्य तभी तक मूल्यवान है जब तक वह अपने परिवार रूपी शाखा, किसी संगठन और समाज से जुड़ा रहता है जब वह अपने परिवार, संगठन अथवा समाज से कटकर अलग हो जाता है तब उसकी कीमत आधे से भी कम रह जाती है। इसलिए मनुष्य को अपने मन में यह बात गहरे से बिठा लेनी चाहिए कि उसे अपनों से अलग होकर नहीं रहना है।
           एक कथा की चर्चा करते हैं जिसमें एक मरणासन्न पिता ने अपने चारों बेटों से कहा, " बच्चो, आओ और मेरे पास बैठ जाओ।"
            उन्होंने पिता से पूछा, "पिता जी क्या बात है? हमें क्यों बुलाया है?"
           पिता ने बच्चों से कहा, "तुम लोग हमेशा लड़ाई-झगड़ा करते रहते हो। यह बात बिल्कुल ठीक नहीं है।" 
          फिर पिता को ने पुत्रों को कहा, "जाओ और कुछ लकड़ियाँ लेकर आओ।"
           बेटे पिता के आदेशानुसार कुछ लकड़ियाँ लेकर आए। तब पिता ने उन्हें कहा, "एक-एक लकड़ी को तोड़ दो।"
          चारों बेटे एक-एक करके लकड़ियाँ तोड़ने लगे जो बड़े आराम से टूटने लगीं।
          पिता ने तब उन्हें कहा, "सब लकड़ियों का एक गट्ठर बनाओ।"
         गट्ठर बनने के बाद पिता ने कहा, "उसे अब तोड़ दो।"
         चारों बेटों ने बारी-बारी से यत्न किया पर गट्ठर बनी लकड़ियों को तोड़ने में वे समर्थ नहीं हो सके।
          पिता ने अपने बेटों को समझाया, "यदि वे चारों भाई लकड़ी के गट्ठर की तरह मिलकर, एकजुट होकर रहेंगे तो कोई उनको हानि नहीं पहुँचा सकता। लेकिन यदि वे लकड़ियों की तरह अलग-अलग रहेंगे तो वे अकेले पड़ जाएँगे और कोई भी उन्हें तोड़ सकता है। उनको नुकसान पहुँचा सकता है।"
            पिता की यह बात सुनकर उन बच्चों को समझ आ गई कि यदि एकता से रहेंगे तो बलशाली बन जाएँगे। तब उन्होंने पिता को वचन दिया, "वे चारों भाई भविष्य में मिलकर, एक होकर रहेंगे और झगड़ा नहीं करेंगे।"
          यह चिन्ता उस एक पिता की नहीं है अपितु हर माता-पिता का सपना होता है कि  इस दुनिया से जाने के बाद भी उनके बच्चे एक ईकाई की तरह मिलकर रहें। दुनिया की कोई ताकत उन्हें अलग न कर सके जिससे कभी उनको किसी प्रकार की हानि अथवा परेशानी का सामना न करना पड़ जाए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 4 जुलाई 2026

बहू से बेटी बनने की प्रक्रिया

 बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया 

माता-पिता अपने बेटे के लिए एक सुशील और सुघड़ बहू की आवश्यकता पर बल देते हैं। कोई भी व्यक्ति अच्छी पत्नी के स्थान पर ऐसी खूबसूरत वस्तु की कामना नहीं करता जिसे किसी के घर के किसी कोने में अथवा शोकेस में सजाकर रख दिया जाए। सभी माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपनी बेटी को सर्वगुण सम्पन्न बनाएँ। वे उसकी सभी छोटी-छोटी बातों पर अवश्य ध्यान दें। 
           अपनी सन्तान सबको प्रिय होती है। बेटियाँ अपने माता-पिता की बहुत दुलारी होती हैं। बेटी कितनी भी प्यारी क्यों न हो, उससे घर का काम-काज अवश्य आना चाहिए। हमारा सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है जिसमें लड़की के कन्धों पर ही घर-गृहस्थी और बच्चों को सम्हालने का दायित्व होता है। हर माता का यह दायित्व है कि वह अपनी रानी बिटिया के लाड़ लड़ाने के साथ-साथ उसे गृहकार्यों में भी दक्ष करे जिससे उसे ये काम करने में कभी परेशानी न हो। माता अपनी राजकुमारी को व्यवहार कुशल भी बनाए ताकि जीवन में उसे कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
          ऐसा नहीं है कि ससुराल में जाकर ही वह घर-गृहस्थी को अच्छी तरह सम्हाले बल्कि अपने माता-पिता के घर में किसी के अस्वस्थ होने पर माता का हाथ बटाए। यदि कभी माता रुग्ण हो जाए तो घर को ठीक से सम्हाल सके। ताकि किसी बाहर वाले को घर की देखरेख के लिए बुलाने की कभी आवश्यकता न पड़े।
          माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी की गलतियों पर पर्दा न डालकर उसको समय-समय पर डाँट-डपट भी करें, जिससे उसे अपनी गलती को सुधारने की समझ पैदा हो सके। दूसरों के सामने अपने बच्चों की सदा प्रशंसा करें परन्तु घर में अनुशासन आवश्यक है। हर परिस्थिति का डटकर सामना करने की सूझबूझ उसे दें। ससुराल में कभी ज्यादा काम पड़ने या कभी डाँट मिलने पर वह कोई गलत कदम उठाने की कोशिश न करे। उस समय मन में यह मलाल न हो कि काश हमारे घर बेटी पैदा ही न हुई होती।
            समय रहते अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाएँ। इस तरह वह योग्य बनकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी। उसके जीवन में आर्थिक स्वतन्त्रता का होना बहुत ही आवश्यक है। अन्यथा उसे हर कदम पर दूसरों का मुँह देखना पड़ेगा। बेटी नौकरी या व्यवसाय करती होगी तो उसे घर में किसी कारण से ऊॅंच-नीच होने की स्थिति को मैनेज करने में सरलता रहेगी। पढ़ी-लिखी बेटी दोनों परिवारों का मान बढ़ाती है। अपनी बेटी को उसके अधिकारों और कर्त्तव्यों की जानकारी भी कराएँ।
              बेटी से बहु बनाने की प्रक्रिया से हर लड़की को गुजरना पड़ता है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी को संस्कारित करें। यदि किसी कारणवश माता-पिता इस दायित्व से चूक जाते हैं तो उनकी बेटी को इसका खामियाजा जीवन भर भुगतना पड़ता है। उसके साथ-साथ माता-पिता को भी जिन्दगी भर अपमानित होता पड़ता है। हर कोई यही कहता है कि बेटी को क्या सिखाया है? 
            सभी माता-पिता यदि अपनी बेटियों में एक अच्छी बेटी और एक सुघड़ बहू बनने के संस्कार देंगे तभी तो हर घर को संस्कारित बहू मिलेगी? इस कटु सत्य को हर माता और पिता को समझ लेना चाहिए।
          यदि ऐसा होने लगे तो किसी घर में बिखराव अथवा टकराव नहीं होगा। तब किसी बहन के मन में यह कसक नहीं रहेगी कि उसका भाई और उसकी भाभी उसके माता-पिता की सेवा नहीं करते, उनका ध्यान नहीं रखते। उन्हें वृद्धाश्रम या ओल्ड होम में छोड़ना चाहते हैं। माता-पिता की होती अवहेलना का दोषी सभी लोग बेटों को ही मानकर कोसते हैं। 
             सोचने की बात यह है कि बेटे अपने माता-पिता को शादी के पहले वृद्धाश्रम क्यों नही भेजते? शादी के बाद ही उन्हें वहॅं क्यों भेजते हैं? माता-पिता भूल जाते हैं कि यदि उन्होंने अपने बच्चों को संस्कारित करने का दायित्व ठीक से निभाया होता तो आज हमारे देश में एक भी ओल्ड होम न होता। किसी की बेटी यदि उनकी बहू है तो निश्चित ही उनकी अपनी बेटी भी किसी के घर की बहू है। 
             मैं यह नहीं कह रही कि सारी बेटियॉं शादी के पश्चात ससुराल वालों के प्रति अपने दायित्व नहीं निभाती अथवा अपने सास-ससुर को ओल्डहोम भेज देती हैं। अपने ससुराल में सामंजस्य नहीं बिठाना चाहती। ऐसी हृदयहीन बेटियॉं अपवाद स्वरूप मिल जाती हैं जिन्हें घर की जिम्मेदारी उठाने से अधिक अपनी आजादी, पार्टी या घूमना-फिरना ही प्रिय होता है।
            सभी माता-पिता से अनुरोध है कि जब तक अपरिहार्य परिस्थितियाँ न हों, बेटी के ससुराल मे जाकर अनावश्यक रूप से दखलअंदाजी न करें और बच्चों को घर में तालमेल बिठाने का परामर्श दें। इसी से दोनों घरों की इज्जत बनी रहती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

मौन और मुस्कान

मौन और मुसकान

इस ससार में आते समय ईश्वर ने हर मनुष्य को आत्मरक्षा के लिए मौन और मुसकान नामक दो शस्त्र दिए हैं। इन दोनों का वार कभी खाली नहीं जा सकता। अब यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह उनका उपयोग किस प्रकार करता है।
           हमारे ऋषि-मुनि आत्मबल बढ़ाने के लिए मौन धारण किया करते हैं। इसकी शक्ति को वही पहचान सकता है जो इसे साध लेता है। हम कह सकते हैं कि यदि मनुष्य मौन रहने की आदत को अपना लेता है तो बहुत से झगड़े स्वयं ही समाप्त हो सकते हैं और कुछ को टाला भी जा सकता हैं। घर-परिवार में किसी की बात नापसन्द होने पर यदि प्रतिकार किया जाता है तो वह पलक झपकते ही विवाद का रूप ले लेती है। 
          कभी-कभी ये झगड़े इतने बढ़ जाते हैं कि परिवार में विघटन तक की स्थिति बन जाती है अथवा पति-पत्नी में अलगाव हो जाता है। सदियों पुरानी मित्रता भी विवाद के चलते होम हो जाती है। कभी-कभी शत्रुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है जिससे किसी का भला नहीं होता। इस दुश्मनी के किस्से हम फिल्मों और टीवी सीरियलों में  प्रायः देखते रहते हैं। समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में पढ़ते रहते हैं।
        इसी प्रकार अपने कार्यक्षेत्र में भी चुप के शस्त्र से अपने विरोधियों को सरलता से परास्त किया जा सकता है और अपना दबदबा बनाकर रखा जा सकता है। 
        यदि ठण्डे दिमाग से यदि विशलेषण कर लिया जाए तो समझ आ जाता है कि मामले को अकारण तूल दी गई। उस समय सब हाथ से निकल चुका होता है। जो हानि होनी थी वह हो चुकी होती है। फिर उसकी भरपाई करना कठिन हो जाता है। उस समय मनोमालिन्य इतना बढ़ चुका होता है कि कोई भी एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। ये स्थितियाँ कभी भी अच्छी नहीं कही जा सकतीं।
          मौन से जो कहा जा सकता है उसे शब्दों से नहीं कहना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 
              एक चुप सौ को हराए। 
                       अथवा 
                 एक चुप सौ सुख। 
         चुप रहना वास्तव में हमारे सस्कारों का प्रतीक है लेकिन कुछ लोग ऐसे संस्कारी जनों को कायर या मूर्ख समझने की भूल करते हैं। यदि मौन रहकर अपरिहार्य स्थितियों से बचा जा सके तो यह सौदा किसी भी तरह से मनुष्य के लिए महँगा नहीं कहा जा सकता।
          एक प्यारी-सी मनमोहक मुस्कान से मनुष्य किसी भी पराए को अपना बना सकता है। यदि मुस्कान सरल व सहज है तो उसी प्रकार सरलता से सबका दिल जीत लेती है जैसे एक बच्चे की निश्छल मुस्कान। परन्तु कुटिल मुस्कान मनुष्य को सबसे काटकर अलग-थलग कर देती है। इसका कारण है कि वह कुटिल मुस्कान बर्बरता का प्रतीक होती है। हर आततायी के चेहरे पर यही दिल दहला देने वाली क्रूर मुस्कान ही होती है। इसको देखकर सभी को भयभीत होते हैं।
            एक बार गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से पूछा था, "प्रभु मौन और मुस्कान में क्या अन्तर है?"
          भगवान महावीर ने बहुत ही सुन्दर जवाब दिया था, "मौन और मुस्कान" दो शक्तिशाली हथियार हैं। मुस्कान से कई समस्याओं को हल किया जा सकता है और मौन रहकर कई समस्याओं को दूर रखा जा सकता है।"
          जहाँ तक हो सके इस मौन की साधना करने का यत्न करना चाहिए। ईश्वर का ध्यान लगाने के लिए अथवा उसकी उपासना करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। अपने दैनन्दिन कार्यो को करते हुए, घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण करते हुए और कार्यालयीन कार्यों को दक्षता से निपटाते हुए प्रतिदिन थोड़ा से समय के लिए मौन रखें। इससे आत्मबल तो बढ़ता ही है साथ ही अपने कार्यों के सुचारु रूप से सम्पादन के लिए ऊर्जा भी मिलती है।
          कितने भी कष्ट व परेशानियाँ क्यों न हों, मनुष्य को अपनी मोहक मुस्कान को कभी खोना नहीं चाहिए। उसकी बदौलत हम अपने कष्टों को कुछ समय तक भूल जाते हैं और हम अपने बन्धु-बान्धवों के चहेते बन जाते हैं।
          अतः मौन और मुस्कान को अपनाने वाले की कभी हार नहीं हो सकती। शारीरिक रूप से शक्तिहीन होने पर भी मनुष्य का मानसिक बल व आत्मिक बल बढ़ता है। उसके चाहने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती रहती है। सबको साथ लेकर चलने वाले मनुष्य का यश चहुँ दिशाओं में फैलने लगता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 1 जुलाई 2026

याद करना और याद आना अलग

याद करना और याद आना अलग

किसी को याद करना और किसी को याद आना दोनों अलग-अलग बातें हैं। हम प्रायः उन सबको याद करते हैं जो हमारे अपने होते हैं और जिनसे हमारा कोई-न-कोई सम्बन्ध होता है। कभी हम उन्हें अपने प्यार के कारण याद कर लेते हैं और कभी स्वार्थ के वशीभूत होकर याद करते रहते हैं।
         याद करने को  हम एक सक्रिय क्रिया कह सकते हैं जहाँ मनुष्य जानबूझकर किसी के विषय में सोचता है। पुरानी बातों अथवा घटनाओं को याद करता है। अथवा वह किसी व्यक्ति की कमी महसूस करता है। किसी को याद करना मनुष्य के नियन्त्रण में हो सकता है। याद करना प्यार या स्मृतियों की गहराई प्रदर्शित करता है। 
            इसके विपरीत याद आना एक अनैच्छिक प्रक्रिया है जहाँ कोई बात या व्यक्ति अचानक दिमाग में आ जाता है। याद आना भावनात्मक जुड़ाव का संकेत होता है। यह प्रायः भावनात्मक यादों से जुड़ा होता है। यह एक अनैच्छिक क्रिया होती है। यह याद आना अचानक और बिना सोचे हो जाता है। उन लोगों को हम सदा याद आते हैं जो हमें अपना समझते हैं। पलक पाँवड़े बिछाकर वे हमारी प्रतीक्षा करते रहते हैं। हमारी पीठ पीछे भी कभी निन्दा नहीं करते बल्कि प्रशंसा करते हैं। उन पर आँख मूँदकर विश्वास किया जा सकता है। ये हमारे लिए अपनों से भी बढ़कर होते हैं। इनके सच्चे प्यार पर हर प्रकार से भरोसा किया जा सकता है।
            मनुष्य को यथासम्भव उन लोगों की संगति से बचने का यत्न करना चाहिए जो किसी के पास जाकर हमेशा दूसरों की बुराई करते हैं। कहने का अर्थ है कि उन्हें बस दूसरों की निन्दा-चुगली करने में ही आनन्द आता है। इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं कि ऐसे लोग जो हमारे सामने दूसरों की बखिया उधेड़ते हैं, वे दूसरों के पास जाकर हमारी बुराई भी अवश्य करते होंगे। 
          उन लोगों का बस एक ही उद्देश्य होता है, बिना कारण किसी की छिछालेदार करना। ऐसे लोग बहुत खतरनाक होते हैं। ये न तो कभी किसी के सगे होते हैं और न ही किसी के दिल में अपना स्थान बना पाते हैं। ऐसे लोगों को कोई भी याद नहीं करना चाहता। यदि ये कभी-कभी याद आ ही जाते हैं तो सबके मुँह का मानो स्वाद ही बिगड़ने लगता है।
            इन्सान गलतियों का पुतला है। यदि वह गलती नहीं करेगा तो साक्षात भगवान बन जाएगा। होना तो यह चाहिए कि जिसकी गलती है, उसे विश्वास में लेकर प्यार से समझा दिया जाए और दूसरे किसी को इसकी कानोंकान खबर न होने दी जाए। कारण यही है कि अपनी गलतियों अथवा कमियों को उस व्यक्ति विशेष ने सुधारना है किसी अन्य ने नहीं। इस प्रकार मनुष्य यदि विशाल हृदयता का परिचय देता है तो वास्तव में वह सबका अपना बन जाता है। ऐसे लोग प्रायः मनुष्य की यादों में बसे रहते हैं।
             इसीलिए सयाने कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा लगता है उसे बहुत अधिक गौर से या बारीकी से न देखो और न परखो। हो सकता है कि उसमें कोई बुराई दिखाई दे जाए। इससे मनमुटाव बढ़ जाता है और आपसी सम्बन्धों में खटास आने की सम्भावना बनी रहती है।
           इसके विपरीत जो व्यक्ति बुरा लगता है, उसे गहराई से देखो और परखो। हो सकता है उसकी कोई ऐसी अच्छाई दिखाई दे जाए जो सचमुच प्रशंसनीय हो। फिर वह व्यक्ति अपने मन को भाने लग जाए और उसकी यादें मधुर बन जाएँ।
          यह दुनिया एक रैन बसेरे की तरह है। पता नहीं कितने दिन तक यहाँ रहना है। इसका किसी को भी ज्ञान नहीं कि कौन पहले जाएगा और कौन बाद में। यह सब तो उस मालिक को ज्ञात है जिसने इस सम्पूर्ण माया की रचना की है। जहाँ तक हो  सके लोगों के दिलों को जीत लो और उनके मनों में अपनी पैठ बना लो। तब चाहकर भी ऐसे व्यक्ति को कोई भी अपने दिल से नहीं निकाल पाएगा।
        जहाँ तक हो सके सबमें प्यार बाँटते चलो। अपने मन में आने वाली कटुताओं को दरकिनार करते हुए उसमें भरने वाले जहर को निकाल फैंक सकें तो समाज में चारों ओर प्यार की नदियाँ बहाई जा सकती हैं। तब हम सबको निश्छल प्यार करेंगे और सभी हमें प्यार कर सकेंगे। उस समय प्यार करना और प्यार होने वाली रेखा समाप्त हो जाएगी। तब किसी को याद करना और किसी को याद आना दोनों का भेद मिट जाएगा, दोनों बातें अलग-अलग नहीं एक हो जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 30 जून 2026

कुछ रह तो नहीं गया?

कुछ रह तो नहीं गया?

हम मनुष्य हैं और यदा कदा गलती कर ही बैठते हैं। फिर बाद में पछताना पड़ता है। इसलिए बार-बार सोचते रहते हैं, चेक करते रहते हैं कि कुछ रह तो नहीं गया? कुछ पीछे छूट तो नहीं गया? अथवा कोई गलती तो नहीं हो गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हम सभी को जीवन के हर मोड़ पर चलते हुए हमेशा परेशान करते रहते हैं। यदि विचार किया जाए तो हम दिन में न जाने कितनी बार इन प्रश्नों से दो-चार होते रहते हैं। 
           छोटे बच्चे को आया के पास अथवा क्रच में छोड़कर नौकरी पर जाने वाली माँ दस बार अपना और बच्चे का सामान चैक करती है और बार-बार यही सोचती है कि कुछ रह तो नहीं गया? यदि यहाँ कुछ छूट गया तो फिर दिनभर बच्चे के लिए परेशानी हो जाएगी। मॉं अपने बच्चे को कभी भी परेशान होते हुए नहीं देख सकती। इसलिए वह पूरी तैयारी करती है।
            रसोई में खाना बनाकर निकलने से पहले सब कुछ सम्हालने और गैस बन्द कर देने के बाद गृहिणी जब कमरे में आकर बैठ जाती है। उस समय उसके मन में आशंका उठती है कि मैंने गैस बन्द कर दिया था क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि सब्जी जल जाए और परेशानी हो जाए?
           किसी भी कारण से घर से बाहर निकलने वाले हम सभी अपने पर्स, गाड़ी की चाबी, घर की चाबी आदि रख लेने के बाद फिर इन चीजों को जाँचते रहते हैं कि उन्हें रख लिया या नहीं? समस्या तब आती है कि जब भागमभाग कुछ छूट जाता है तो बाहर जाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसी तरह घर के सारे स्विच तथा ताले बार-बार चैक कर लेते हैं। फिर भी मन के किसी कोने में एक अनजाना-सा डर बना रहता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? यदि कुछ छूट जाएगा तो फिर बहुत झंझट हो जाएगा।
          शादी में दुल्हन को बिदा करने के बाद दुल्हन के माता-पिता घर के सभी सदस्यों से कहते हैं कि अपना सामान अच्छे से देख लो, कुछ रह तो नहीं गया न? कहीं घर जाने पर कोई परेशानी न हो जाए? वहाँ कुछ छूटे-न-छूटे पर बचपन से आज तक जिस नाम वे अपनी बेटी को पुकारते थे, वह नाम पीछे रह जाता है। जब भी लाडली बिटिया को याद करेंगे उनकी आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहेंगे। बेटी की बचपन से अब तक की यादें, उसका रूठना-मानना यानी कि उसकी हर बात माता-पिता के हृदयों में याद बनकर पीछे रह जाती है।
          माता-पिता, बहन-भाई अपनी जुबान से चाहे कुछ न बोलें परन्तु उनके दिल में एक कसक तो रह ही जाती है। विदा होते समय दुल्हन का मन भी यही कहता है कि सब कुछ तो यहीं छूट गया। अपने नाम के आगे गर्व से जो सरनेम लगाती थी वह भी पीछे छूट गया। उस घर से उसका नाता छूट रहा है। माता-पिता का प्यार, उनसे की जाने वाली जिद, सखी-सहेलियाँ और बाबुल का  आँगन  सब पीछे छूट रहे हैं।
          इन्सान बड़ी हसरत से अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजता है और वे पढ़कर वहीं सैटल हो जाते हैं। उनसे मिलने के लिए बड़ी ही मुश्किल से उन्हें अधिकतम छह महीने का वीजा मिला पाता है। वापिस लौटते समय जब बच्चे पूछते हैं कि सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया? उस समय बच्चों से बिछुड़ते समय सब तो वहीं छूट जाता है। ऐसा लगता है मानो हृदय की गहराइयों से कुछ-कुछ छीजता जा रहा है। इससे अधिक और छूटने के लिए क्या बचा रह जाता है? 
              साठ वर्ष पूर्ण करने के उपरान्त जब सेवानिवृत्ति की शाम जब दोस्त याद दिलाते हैं कि सब चेक कर लो, कुछ रह तो नही गया। तब मन में एक टीस उठती है कि सारी जिन्दगी तो यहीं आने-जाने में बीत गई, अब क्या रह गया होगा? उस समय मन उदास हो जाता है।
            किसी अपने बन्धु-बान्धव की अन्तिम यात्रा के समय शमशान में उसका संस्कार करके लौटते समय लगता है कि कुछ छोड़कर जा रहे हैं। एक बार पीछे देखने पर चिता की सुलगती आग को देखकर मन भर आता है। अपने से वियोग के समय उससे पुनः न मिल पाने की पीड़ा में सब पीछे रह जाता है। भरी आँखों से इन्सान कुछ बोल तो नहीं  पाता पर कुछ तो पीछे छूट जाता है। उस प्रिय की वे यादें उसके अन्तस् में सदा उसके साथ रहती हैं। ये यादें यदा कदा उसके दिल में टीस दे देती हैं।
              आत्मचिन्तन करना हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है। हमें अपने पूरे जीवन में झाँकना चाहिए। यह जानकारी लेने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसा तो नहीं है कि कुछ पीछे छूट रहा हो? जिसे हम अपने साथ लेकर चल सकते थे। इस मलाल को जीवन भर ढोने के बजाय समय रहते यदि ध्यान दे दिया जाए तो उचित होता है, बाद में तो बस हमारे मन में पश्चाताप ही शेष बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद