जीवन जीने के बदलते मायने
जीवन को जीने के हमारे मायने बदलते जा रहे हैं। हमारी जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन हो चुका है। हमारा आहार-विहार जीवनोपयोगी नहीं रह गया। मनीषियों का कथन है कि हमें जीने के लिए खाना चाहिए परन्तु हम खाने के लिए जीने लगे हैं।विचार का यह अन्तर हमारे लिए एक चुनौती बन सकता है।
हमारे आहार-विहार में बहुत बदलाव हो गया है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में युवाओं के पास अपने लिए समय नहीं निकल पाता। इसलिए सामाजिक कार्यों में चाहकर भी भाग नहीं ले पाते। सही लोगों के पास आज गाड़ियॉं हैं। इस कारण आवागमन में कठिनाई नहीं होती। शायद यही कारण है कि आज शादी-ब्याह और पार्टियॉं देर रात तक चलती हैं। इसलिए नींद पूरी नहीं हो पाती। पूरा दिन शरीर पर आलस्य छाया रहता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तुलित और सुपाच्य भोजन के स्थान पर हम मिर्च-मसालों वाला और जंक फूड खाना पसन्द करते हैं। परिणाम स्वरूप हम अनेक बिमारियों को न्यौता दे बैठते हैं। कुछ लोग लाचार हैं, मजबूर हैं इसलिए बीमार होते है किन्तु कुछ दूसरे लोग अपनी बिमारियों की वजह से लाचारी का जीवन ढो रहे है।
सारा दिन टेबल वर्क करने से भी शरीरिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। फिर जिम संस्कृति के चक्कर में पड़कर और परेशान होते हैं। डाक्टर परामर्श देते हैं सैर करिए। उस समय अमीर लोग खाना पचाने के लिए मीलों चलते हैं। इसके विपरीत गरीब व्यक्ति खाना खाने के लिए पता नहीं कितने मील पैदल चल लेता है।
आज महँगाई के समय घर के सभी लोग कमाने में लगे हुए हैं। दिन-रात काम की धुन में खाने-पीने की सुध नहीं रहती। जिस भोजन को पाने के लिए इतने जतन करते हैं उसी खाने के लिए समय नहीं निकल पाता। दूसरी ओर संसार में ऐसे भी असहाय लोग हैं जिनको खाने के लाले पड़े हुए हैं। उन बेचारों को कितने वक्त का खाना नसीब हो पाएगा, यह भी कुछ निश्चित नहीं होता।
अपनी गरीबी की लाचार अवस्था में माता-पिता अपने बच्चों को रोटी खिला देते हैं और स्वयं भूखे रह जाते हैं। उधर साधन सम्पन्न होते हुए भी बच्चे माता-पिता को असहाय छोड़ देते हैं। वे बेचारे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं और दरबदर की ठोकरें खाते हैं। इस समय स्थिति बड़ी विकट बनती जा रही है। दो वक्त की रोटी न खिलानी पड़ जाए इसलिए लोग अपने ही प्रियजनों से मुँह मोड़ने में लगे हुए हैं।
दिन-प्रतिदिन हम अपने संकुचित विचारों के कारण इस दुनिया को भी संकीर्ण बनाते जा रहे हैं। ईश्वर ने तो हमें ऐसा कभी नहीं बनाया था फिर ऐसा नकारात्मक परिवर्तन क्योंकर हो गया। यह हमारी समझ से परे है।
कुछ समय पहले जब हम बच्चे थे तब प्रतिदिन छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते थे, तकरार करते थे और फिर थोड़े समय बाद एक-दूसरे को मना भी लिया करते थे। एक-दूसरे के गले मे गलबहियाँ डालकर मुस्कुराते थे। अब जब हम बड़े हो गए हैं तो हमारे अहं परस्पर टकराने लगे हैं। हम अपने बचपन जैसी सहजता औऱ सरलता कहीं पीछे छोड़ आए हैं। इसलिए स्थितियाँ बहुत खराब हो गई हैं। अब यदि हम एक बार लड़ते है तो रिश्तों को ही खत्म करने के बहाने ढूँढने लगते हैं। आपसी प्यार और विश्वास तो मानो पता नहीं कहॉं खोते जा रहे हैं।
जिन्दगी ने हमें बहुत अनुभवी बना दिया है। हम आवश्यकता से अधिक सीखकर बुद्धिमान हो गए हैं। अब हम इतने बड़े होते जा रहे हैं कि बाकी सब लोग हमें बौने दिखाई देने लगे हैं। किसी दूसरे के कष्ट को देखकर हमारा मन बिल्कुल नहीं पसीजता। हम हाथ बढ़ाकर किसी भी व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहते। हम लोग दूसरों को परेशान देखकर अपनी ऑंखें मूॅंद लेते हैं। हमें सिर्फ और सिर्फ अपनी समस्याएँ दिखाई देती हैं।
हम लोगों पर आज केवल स्वार्थ हावी होता जा रहा है जो बहुत ही गलत है। न तो हमें अपने दोस्तों में कोई दिलचस्पी है और न ही अपने भाई-बन्धुओं में। जिससे हमारे स्वार्थ पूरे होते हैं वही हमें अपना-सा प्रतीत होता है। स्वार्थ पूरे होने के बाद सबके रास्ते अलग हो जाते हैं। लोग मिलने पर नजरें चुराकर या कन्नी काटकर निकली जाते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो वे एक-दूसरे को पहचानते ही नहीं हैं।
अपने हृदयों को थोड़ा विशाल बनाकर और सकारात्मक रूख अपनाकर हम इस संसार को अपना बना सकते हैं। इस जीवन यात्रा में हमें बहुत से हमसफर मिलते हैं। उनके साथ यदि कदम मिलाकर चलने की मानसिकता हम बना लें तो तभी बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। हम सब लोग मिलकर ही सम्बन्धों में परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद