बुधवार, 18 मार्च 2026

परिस्थिति के अनुसार ढलना

परिस्थिति के अनुसार ढलना

मनुष्य के स्वभाव की यह विशेषता है कि वह स्वयं को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल लेता है। चाहे वह मौसम हो, सुख-दुख कक समय हो अथवा वियोगकाल हो यानी उसके हालात कैसे भी क्यों न हों, वह सदा साहस से डटकर उनका सामना करता है। पीठ दिखाकर भाग जाना उसकी प्रकृति में नहीं होता है। इस विषय में कुछ अपवाद अवश्य मिल सकते हैं।
               मनुष्य मौसम की तरह पल-पल बदलता रहता है। कभी वह क्रोधित होता है तो कभी प्यार करता है। इसी तरह कभी वह अकेला रहना चाहता है तो कभी सबके साथ मिलकर, नाच-गाकर सदा मस्त रहना चाहता है। ईर्ष्या, द्वेष, राग, घृणा, प्रेम, क्रूरता, वात्सल्य, करुणा आदि भाव उसे नया-नया रूप देते रहते हैं। यही कारण है कि कभी हमें ऐसा लगने लगता है कि इस व्यक्ति विशेष से बढ़कर हमारा अपना कोई और है ही नहीं परन्तु कभी वही मनुष्य हमें अजनबी-सा प्रतीत होता है।
           मानव स्वभाव का यह नित्यप्रति परिवर्तन उसकी तत्कालीन परिस्थियों पर निर्भर करता है। जीवन के हालात उसके मानस को झकझोरते रहते हैं। इसीलिए कभी-कभी वह एक सामान्य-सा इन्सान प्रतीत होता है। यही समय होता है जब वह हमारा अपना होता है। उस समय वह धरातल पर रहता हुआ दूसरों के दुख-दर्द को समझने वाला मनुष्य होता है। उस समय घर-परिवारी जनों और भाई-बन्धुओं के साथ उसके मधुर सम्बन्ध होते हैं। सभी मिल-जुलकर अपने जीवन को प्रसन्नतापूर्वक चलाते हैं।
             इसके विपरीत कभी असामान्य स्थितियों के चलते वही व्यक्ति हमें अपनी पहुँच से बहुत दूर दिखाई देता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि वह हमसे रूठा हुआ है या बहुत घमण्डी हो गया है। हो सकता वह अपने घर, परिवार अथवा कार्यक्षेत्र की किसी परेशानी में उलझा हुआ हो। इसके अतिरिक्त उसे कोई शरीरिक या मानसिक पीड़ा भी हो सकती है। इनमें से कोई भी कारण उसके अनमनेपन का हो सकता है। शायद तभी वह व्यक्ति इस प्रकार का विचित्र व्यवहार कर रहा हो, जिसे हम समझ नहीं पाते।
            मनुष्य के जीवन में समयानुसार सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि स्थितियाँ आती रहती हैं। यही सब उसके स्वभाव या मूड परिवर्तन का कारण बन जाती हैं। उसके नित्य प्रति के आचरण में इन सबका प्रभाव हो जाना स्वाभाविक होता है। जब वह प्रसन्न होता है और अपने जीवन से सन्तुष्ट होता है, तब उसका व्यवहार सन्तुलित होता है। उस समय वह सारे अपनों की खुशियों के लिए जीता है। सबको साथ लेकर चलने की बातें करने लगता है। घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों  में सामंजस्य बनाते हुए उनके साथ समय व्यतीत करता है। उस समय सब लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते। 
            इसके विपरीत जब वह स्वयं कष्ट में होता है तब वह अपने जीवन के प्रति उदासीन हो जाता है। ऐसे निरुत्साहित व्यक्ति को सबसे अलग-थलग एकान्त में रहना रुचिकर लगता है। कोई भी आवाज उसे चिड़चिड़ा बना देती है। जब उसके मन में अवसाद हो जाता है तब संसार के हर किसी व्यक्ति से अथवा हर क्रिया कलाप से उसका मोहभंग हो जाता है और उसे सबसे घृणा होने लगती है। उस स्थिति में उसे हंसना, बोलना, खाना, पीना, घूमना सब बेकार लगने लगता है।
              वह स्वयं को दुनिया का सबसे अधिक दुर्भाग्यहीन व्यक्ति मानने लगता है। वह सोचता है कि वह इस पृथ्वी पर भार है। उसकी जरूरत न अपनों को है और न किसी को है। इस तरह वह मायूसी में घिरता चला जाता है। अनावश्यक तनाव लेता हुआ मनुष्य कभी-कभी डिप्रेशन में जाने लगता है। उस समय उसे डॉक्टरी परामर्श की आवश्यकता होती है।
            ‌  इस प्रकार अपने अस्थिर स्वभाव के कारण मनुष्य का स्थान सबके हृदयों में बदलता रहता है। अपने ऊपर नियन्त्रण रखते हुए मनुष्य को अन्तस के भावों को प्रकट नहीं होने देना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि हमारे कारण किसी दूसरे को किसी तरह की परेशानी न हो।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 17 मार्च 2026

बेटी और बेटे में अन्तर

बेटी और बेटे में अन्तर

बेटी और बेटे में लिंगभेद का भाव उनके पैदा होने से ही आरम्भ हो जाता है। यद्यपि एक ही माता-पिता की दोनों ही सन्तान होते हैं और एक ही कोख से उनका जन्म होता है। फिर भी यह भेदभाव युक्त व्यवहार प्रायः घरों में देखने को मिल जाता है। यह उपेक्षित व्यवहार बेटे को उत्कृष्ट और बेटी को‌ निकृष्ट समझने का कारण बन जाता है। यह भेदभाव उन दोनों बच्चों के मनों में घर कर जाता है जिससे स्वस्थ परिवेश में नकारात्मकता का साम्राज्य खड़ा हो जाता है।
          कहने और सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है कि हमारे घर में बेटी व बेटे दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है। यह सच है कि बहुत से माता-पिता आज दोनों की पढ़ाई-लिखाई के विषय में सोचने लगे हैं। उन्हें समान सुख-सुविधाएँ भी दी जाने लगी हैं। दोनों के खान-पान और रहन-सहन में भी आजादी दी जा रही है। 
            उन घरो की लड़किया उच्च शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन हैं। ज्ञान, विज्ञान, राजनीति, साहित्य, व्यापार आदि हर क्षेत्र में वह अग्रणी बन रही हैं। यही कारण है कि वे हर क्षेत्र अपने झण्डे गाढ़ रही हैं। भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री  श्रीमति इन्दिरा गाधी और राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल से हम सभी परिचचित हैं। अपने क्षेत्र कीआधुनिक सफल महिलाओं सुश्री किरण बेदी, सुश्री कल्पना चावला, सुश्री इन्दिरा नूई आदि को भी नहीं भूल सकते।
          प्रश्न यह है कि ऐसे लोग कितने हैं जिनकी सोच का ऐसा विस्तृत दायरा है? मेरे विचार में इनका प्रतिशत आज भी बहुत कम है।
          बहुत से माता-पिता लड़के और लड़की के खाने-पीने, सोने-जागने, हँसने-खेलने आदि में भी अन्तर करते हैं। जो अच्छा, पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हैं वे बेटे को दिए जाते हैं, बेटी को नहीं। इस कारण उनमें पौष्टिकता की कमी हो जाने से एनिमिया आदि कई रोग होते हैं। ऐसे घरों में लड़के को अधिक माना जाता है।
          लड़का देर तक सोए और घर या बाहर का कोई भी काम न करे तब भी उसके लाड़ लड़ाए जाते हैं। दूसरी ओर लड़की से आशा की जाती है कि वह सवेरे उठकर घर के काम-काज में हाथ बटाए। हर खेल लड़का खेल सकता है और कितना भी समय वह घर से बाहर रह सकता है परन्तु लड़की के लिए यहाँ भी बन्धन रहता है। कुछ ही खेल खेलने की उसे आज्ञा मिलती है और घर से बाहर अधिक समय रहने की उसे आज्ञा नहीं मिलती। लड़की को जोर से बोलने अथवा हँसने पर यह कहकर टोक दिया जाता है कि उसे पराए घर जाना है। इसलिए उसका व्यवहार सदा संयमित होना चाहिए। लड़कों को यहाँ पर भी बड़ी सहजता से छूट दे दी जाती है। 
        पैदा होने के बाद जब वह होश सम्भालती है तभी से उसे यह घुट्टी में पिलाया जाता है कि उसे अपने बाबुल का यह घर छोड़कर ससुराल जाना है। उसे घरेलू कार्यों, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि में दक्ष होना चाहिए। उसका ऊँचा बोलना, जिद करना आदि अनुचित कार्य माने जाते हैं। उसे उच्च शिक्षा दिलाने में आज भी बहुत से माता-पिता आनाकानी करते हैं। बहुत से माता-पिता उसे नौकरी भी नहीं करने देते।
            वह अपने भाई के साथ बराबरी के व्यवहार की माँग नहीं कर सकती। दोनों यदि कहीं से आते है तो लड़की से ही अपेक्षा की जाती है कि आराम न करके भाई को चाय-पानी लाकर दे। वह नवाब बना रहे और खुद होकर पानी का गिलास भी न ले। घर में होने वाले ऐसे भेदभाव वाले व्यवहार लड़की के मन को तार-तार कर देते हैं। उसे लगने लगता है कि सारे बन्धन उसी के लिए ही क्यों हैं? उसे क्यों लड़की का यह जन्म ईश्वर ने दिया है?
            धार्मिक स्थलों पर उसके प्रवेश का मुद्दा कुछ समय पूर्व सुर्खियों में था जो बहुत ही गरमाया हुआ था। आज इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे है। फिर भी यह बेटे और बेटी के लिए व्यवहार में यह भेदभाव समझ में नहीं आता जो कन्या भ्रूण को गर्भ में ही नष्ट करा देता है। संवैधानिक रूप से उसे माता-पिता की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त है। फिर भी प्राय: उसे वंचित रखा जाता है। बेटे को ही सब कुछ सौंप दिया जाता है चाहे वह उस योग्य हो या नहीं। यदि कोई बहन विरोध करे तो उसे तिरस्कृत किया जाता है।
            बहुत सुकून की बात है कि आज की युवा पीढ़ी प्रेक्टिकल होने लगी है। उनके मन में बेटे-बेटी का अन्तर समाप्त होने लगा है। समय के अनुसार मंहगाई और एकल परिवार की समस्याओं के कारण वे एक ही बच्चा चाहने लगे हैं। वह चाहे बेटा हो या फिर बेटी। उसकी परवरिश पर वे अपना ध्यान लगाने लगे हैं।
            आज एकल परिवारों के चलते समय और परिस्थितियों की माँग यही है कि दोनों बच्चों को ही घर-बाहर के कार्यों में दक्ष होना चाहिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के बेटे-बेटी दोनों के लिए ही समानता का व्यवहार अपेक्षित है। बेटियों को भी यदि समान अवसर दिए जाएँ तो निस्सन्देह वे किसी भी क्षेत्र में चमत्कार कर सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 16 मार्च 2026

शत्रुता करना सरल निभाना कठिन

शत्रुता करना सरल निभाना कठिन 

शत्रुता अथवा दुश्मनी करना मनुष्य के मन के कटु भावों की परिणति होती है। किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध अपने मन में जितना अधिक ईर्ष्या, घृणा आदि विचारों को एकत्रित करते जाते हैं, उतना ही उसके प्रति क्रोध और नफरत बढ़ती जाती है। यही सारे दुर्भाव आगे चलकर दुश्मनी को जन्म देते हैं। हालांकि दुश्मनी का कोई बीज नहीं होती परन्तु फिर भी किसी-न-किसी कारण से वह बोयी जाती है।
          समाज में हम अपने आसपास देखते हैं और किस्से भी पढ़ते-सुनते हैं कि दुश्मनी की यह आग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। इसके चलते न जाने कितने ही मासूम मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। पता नहीं ऐसे क्या कारण होते हैं जो ऐसी दुश्मनियाँ निभाई जाती हैं। इससे किसी भी पक्ष का हित नहीं होता। दोनों ही ओर के पक्षों को यह आग जलाकर रख देती है। 
      इस विषय को लेकर बहुत-सी फिल्में बन चुकी हैं और टीवी सीरियल भी बने हैं। यदा कदा ऐसी घटनाएँ हमें समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलती हैं और टीवी चैनलों पर भी इनकी चर्चा होती रहती है।
        जर, जोरु और जमीन प्राय: शत्रुता के कारण माने जाते हैं। आज भी इन्हीं को हम दुश्मनी की जड़ मान सकते हैं। जर का अर्थ है धन सम्पत्ति, जोरु का अर्थ है पत्नी और जमीन का अर्थ है जयदाद।
          धन-सम्पत्ति और जमीन-जयदाद के लिए तो सगे भाई-बहन भी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। न्यायालय की शरण लेकर अपना समय और धन दोनों ही नष्ट करते हैं। बरसों लग जाते हैं इनका फैसला होने में। इसके लिए वे ईश्वर तुल्य अपने माता-पिता से धोखा करने और उन्हें दर-बदर करने में भी बाज नहीं आते। ऐसा घोर पापाचरण करते समय उन लोगों को पता नहीं उनकी आत्मा नहीं कचोटती। 
          अपनी पत्नी की मान-मर्यादा की रक्षा करना हर पति का ही कर्त्तव्य होता है। किसी दुष्ट के कुदृष्टि डालने पर खून तक कर दिए जाते हैं। रामायणकाल और महाभारतकाल इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। जहाँ इस दुस्साहस के लिए भयंकर युद्ध लड़े गए और इतना विनाश हुआ। 
          इतिहास के पन्नों में भी दुश्मनी की ऐसी घटनाओं की भरमार है जहाँ दो देशों में किसी भी कारण से अनावश्यक ही युद्ध हुए और दोनों ओर के असंख्य लोग काल कवलित हो गए। 
          आज भी दो देशों में युद्ध का कारण दूसरे की जमीन पर कब्जा करना ही होता है। यही प्रतिस्पर्धा दोनों देशों में चलती रहती है कि मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूँ। हमारे पास आधुनिक युद्ध सामग्री तुमसे अधिक है। यानि कि दो देशों में शक्तिप्रदर्शन भी इस शत्रुता का एक कारण बन जाता है।
          मेरे विचार में अधिकांश दुश्मनियाँ जाति के मद और अपनी नाक को बचाने के लिए की जाती हैं। और भी देखें तो कुम्भ के मेलों में पहले स्नान करने के नाम पर ही साधुओं के अखाड़ों में भी अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए लट्ठ चल जाते हैं।
          कहने का तात्पर्य यही है कि इस दुश्मनी के अजगर को अपने जीवन से निकाल फैंकने में ही सबका भला है। इसे ढोल की तरह अपने गले से लगा लेने पर अपना ही नुकसान होता है। हमारी अपनी मानसिक शान्ति नष्ट होती है जो अमूल्य है, इसके लिए मनुष्य जगह-जगह भटकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 मार्च 2026

ऑंखे हमारा आईना

आँखे हमारा आईना 

ऑंखें मनुष्य जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। यह पॉंच ज्ञानेन्द्रियों में से एक है। इनके बिना व्यक्ति लाचार हो जाता है। वह इस सतरंगी दुनिया के नहीं देख सकता। उसे अपने लिए किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती है।  हमारी ऑंखे आखिर क्या काम करती हैं? जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उससे परावर्तित प्रकाश हमारी ऑंखों में प्रवेश करता है। इसी कारण हम देखने का कार्य करते हैं। प्रकाश कॉर्निया से होकर प्रवेश करता है जो आँख के सामने एक खिड़की की तरह काम करता है।
             आँखे हमारा आईना होती हैं। जो भाव हमारे मन में होते हैं, उन्हें ये प्रकट कर देती हैं। ये जो आँखे हैं, बहुत ही दुष्ट और नालायक हैं जो कभी हमारा कहना नहीं मानतीं। ये आँखें बहुत चुगलखोर होती हैं जो न चाहते हुए भी हमारे मन के भावों की सबके समक्ष चुगली कर देती हैं। ऊपर से मनुष्य चाहे कितना ही न न करते रहें परन्तु इनकी बदौलत उसकी चोरी पकड़ी ही जाती हैं। ये ऑंखें हैं ही ऐसी कि किसी का लिहाज नहीं करती। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने कौन बैठा है? किसके सामने संयम रखना होता‌ है?
              सुख, खुशी, दुख, सन्तोष, ईर्ष्या, क्रोध, वात्सल्य आदि मानव मन के सभी भाव और सारी संवेदनाएँ, उसकी इन आँखों से ही प्रकट होती हैं। जब भी मनुष्य के जीवन में खुशी का समय आता है या गम अनचाहे आ जाते है तब मौका मिलते ही ये तालाब की तरह भर आती हैं। गंगा-यमुना की धारा की भाँति ये बहने लगती हैं अथवा फिर बादलों की तरह बरसने लगती हैं। जहाँ मन के विपरीत कोई घटना अथवा बात हो जाती है, वहीं पर ये छलकने लगती हैं और मनुष्य की वेदना को प्रकट करने लगती हैं।
              काली, नीली, कजरारी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें कवियों की रचनाओं के लिए सदा ही प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। इन ऑंखों की गहराई में डूबते-उतरते हुए कवियों ने इनके सौन्दर्य को लेकर बहुत से काव्य लिखे हैं। यत्र तत्र उन सभी काव्यों की सराहना भी की गई है। उनको पढ़कर ऐसे कवियों को दाद दिए बिना कोई सहृदय पाठक नहीं रह सकता।    
            इनकी चितोरी चितवन से कोई बच नहीं सकता। इनके कटाक्ष बाण किसी को भी घायल कर सकते हैं। न जाने कितने ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की गहन तपस्या इन्होंने भंग की है। आज भी इनके सौन्दर्य से किसी संसारी व्यक्ति का बच पाना सम्भव नहीं है। 
          गम्भीरता का भाव लिए आँखे व्यक्ति के मन की पवित्रता और गहराई को प्रकट करती हैं। सरलता और सहजता के भाव वाली आँखे मनुष्य के हृदय की विशालता को दर्शाती हैं। बच्चों की तरह चंचल आँखें मानव मन की चंचलता का परिचायक होती हैं। क्रूरता या निर्दयता के भाव वाली आँखों से सभी बचना चाहते हैं। क्रोध से भरी हुई आँखों से डरकर लोग सहम जाते हैं और किनारा करने में अपनी भलाई समझकर कहीं भी छुप जाते हैं।
             किसी अपने के मिलने के समय अथवा वियोग के समय ये अनायास ही बिन बुलाए हुए मेहमान की तरह ये ऑंखें ऑंसू टपकाने लगती हैं। प्रसन्नता का समय होने पर हमारा साथ देती हैं। अत्यधिक कष्ट के समय ये मनुष्य के मनोबल को कमजोर बनाती हैं।
             ऑंखों से निकलने वाले ये आँसू किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं। स्त्री या पुरुष दोनों पर ये समान रूप से अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कठोर कहे जाने पुरुष भी असहनीय कष्ट या किसी अनहोनी के समय अपने ऑंखों से बहते इन आँसुओं को रोक नहीं पाते, उस स्थिति में उनकी तथाकथित कठोरता न जाने कहॉं गायब हो जाती है?
               स्त्रियों को तो वैसे भी कमजोर दिल और करुणामयी कहा जाता है। इसलिए हर स्थिति का प्रभाव उन पर अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसीलिए उनकी ऑंखों से आँसू किसी-न-किसी बात पर छलक आते हैं। पुरुष प्राय: यह दोषारोपण करते हैं कि स्त्रियाँ इन आँसुओं का अपनी बात मनवाने के लिए सदा हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। हालॉंकि यह कह देना उनकी सच्चाई पर प्रहार करना होता है। निस्सन्देह इसके अपवाद भी हो सकते हैं।
           मक्कारों की ऑंखों से बहने वाले घड़ियाली आँसुओं से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता होती है। पता नहीं इन पर पिघल जाने वालों की पीठ में कब ये छुरा घोंप दें, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्वार्थी लोग प्राय: दूसरों को चकमा देकर भ्रमित करते हैं।
              ये आँसुओ से भरी हुई आँखे वास्तव में दो हृदयों को जोड़ने के लिए एक पुल का कार्य करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। जो व्यक्ति इनके जाल में उलझ गया वह तो समझो काम से गया। जो इनसे बचकर निकल गया वह संयमी कुछ भी कर सकने में समर्थ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 मार्च 2026

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का वरदान ईश्वर ने मनुष्य को दिशा है। यह बुद्धि मनुष्य के जीवन को दिशा देने का कार्य करती है। यह हमें अच्छे बुरे का ज्ञान कराती है। हमारी बुद्धि तब कुण्ठित होती है जब हम अपने सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय नहीं करते और सत्संगति में जाकर उसे पैना नहीं करते अथवा उसे सुविचारों से पोषित नहीं करते। हम जितना अधिक अध्ययन करेंगे, हमारी बुद्धि को उतना ही अधिक भोजन मिलेगा। तभी हमारे विचारों में भी परिपक्वता आ सकती है। इसकी बदौलत हम मनुष्य सफलता के सोपानों पर चढ़ते हैं।
           मनीषी कहते हैं कि ज्ञानार्जन की कोई आयु नहीं होती। किसी भी आयु में मनुष्य, किसी भी जीव से कुछ सीख सकता है। मनुष्य का यह सौभाग्य है कि वह आजन्म कुछ-न-कुछ सीखकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त कर सकता है। अपने जीवन को ऊॅंचाइयों पर ले जा सकता है।
               हमारी बुद्धि को भी जंग लग सकता है। यद्यपि हमारी यह बुद्धि लोहा नहीं है। परन्तु फिर भी कभी-कभी मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने वालों को अथवा दूसरे की कही हुई बात को उस समय न समझ सकने वालों को हम कह देते हैं -
         1 तुम्हारी बुद्धि को जंग लग गया है 
         2 तुम्हारी मति मारी गई है 
         3 तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है
         4 तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। इत्यादि। 
          इन सबको कहने का मात्र यही अर्थ होता है कि उस समय विशेष पर वे अपनी बुद्धि का वैसा प्रयोग नहीं कर रहे होते जैसा किसी समझदार मनुष्य को उस परिस्थिति में करना चाहिए।
            कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यदि लम्बे समय तक बुद्धि को सुविचारों से पोषित न किया जाए तो इसमें मोह-माया व स्वार्थपरक भावों का जंग लग जाता है। तब ये भाव मनुष्य को चैन से नहीं बैठने देते बल्कि उसे भटकने के लिए विवश कर देते हैं। उस समय वह अनावश्यक ही पिष्टपेशन करता रहता है। अपने मन को दुविधा की स्थिति में पहुॅंचा देता है। मनुष्य के लिए यह स्थिति कभी भी सुखदायक नहीं हो सकती। 
             मनुष्य जब खाली बैठकर सोचता है तो उसके मन के विचारों का ताना-बाना उसे परेशान करता रहता है। इसका प्रभाव उसके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। उसकी विवेकशील बुद्धि उसे विचलित कर देती है।
         यदि अपनी बुद्धि का उपयोग हम अपने परिवार, देश, समाज और धर्म के लिए करते हुए सकारात्मक कार्य करते हैं तो यह बुद्धि का सदुपयोग करना कहलाता है। अर्थात् उस समय हम बुद्धिमान कहलाते हैं। समाज में अग्रणी बनकर हम पूज्य हो जाते हैं।
        इसके विपरीत यदि हम इस बुद्धि को अपने देश, धर्म, परिवार अथवा समाज के विरुद्ध नकारात्मक कार्यों में लगाने लगते हैं तो इसका दुरूपयोग करते हैं। तब मनुष्य तोड़फोड़, भ्रष्टाचार, अनाचार व कदाचार के कार्य करते हैं। उस समय वह मनुष्य विशेष विघटनकारी बनकर द्रोही कहलाते हैं। समाज के लिए एक अभिशाप बन जाते हैं। उन्हें हर तरफ हिकारत की नजर से देखा जाता है। हो सकता है अपनी कुटिल चालों से कुछ समय तक वे दूसरों को प्रभावित कर सकें, परन्तु अन्तत: उन सब कृत्यों के दुष्परिणामों को उन्हें भोगना ही पड़ता है।
            ये लोग देश, धर्म व न्याय के शत्रु बन जाते हैं। सब कुछ होते हुए भी इधर-उधर भागते हुए और छिपते-छिपाते हुए, ये सारा जीवन गुमनाम रहकर बिता देते हैं। उनसे किनारा कर लेने में ही सबको अपना भला दिखाई देता है। कोई भी उनके साथ सम्पर्क रखकर स्वयं को मुसीबत में डालना नहीं चाहता।
              लोमड़ी जैसी चालाक बुद्धि किसी भी व्यक्ति को पसन्द नहीं आती है। सबका प्रिय वही मनुष्य बनता है जिसकी बुद्धि का सरल और सहज हो। उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से दूसरे लोगों के हृदयों को छू जाए।
          सदैव सकारात्मक कार्यों में अपनी बुद्धि को नियोजित करना बुद्धिमानी होती है। इसे हम सद् बुद्धि कहते हैं। नकारात्मक सोच रखने से बुद्धि कुटिल बन जाती है। इसलिए यथासम्भव बुद्धि को कुटिलता से बचते हुए इसे सरल और सहज बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को लोग अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

भाग्य व्यक्तिगत बैंक बैलेंस

भाग्य व्यक्तिगत बैक बैलेंस 

प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य उसका अपना व्यक्तिगत बैक बेलैंस होता है जो जन्म-जन्मान्तरों तक सभी लोगों के खाते में मल्टीप्लाई होता रहता है। हम सबका वास्ता बैंक से पड़ता रहता है। इसलिए हम बैंक की कार्यप्रणाली के विषय में भली-भॉंति जानते-समझते हैं। हम‌ अपने-अपने बैंक अकाऊँट में पैसा जमा करवाते हैं अथवा निकालते हैं। जो धन हम जमा करवाते हैं, उस पर ब्याज मिलता है। इससे हमारा धन बढ़ता जाता है। इसके विपरीत धन निकालने से कोई ब्याज नहीं मिलता बल्कि हमारा उतना धन कम हो जाता है।
              उसी प्रकार हम अपने सुकर्मों की कमाई को अपने भाग्य के खाते में जमा करते हैं तो हमारे शुभकर्म बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब हम अपने कुकर्मों की कमाई करते हैं तो हम उस पूँजी को अपने खाते में जमा करवाते हैं। सद्कर्मों के फलस्वरूप उन शुभ  फल मिलता है। हम हर प्रकार से सुविधा सम्पन्न बनकर सुख भोगते हैं। जब हम अशुभ कर्मों का  कुफल हम भोगते हैं तो हमें जीवन में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।‌इसका अर्थ यही होता है कि हमने अपने खाते में से उन उतने कर्मो की पूँजी निकालकर खर्च कर ली है। इस प्रकार लेन और देन का यह क्रम अनवरत चलता रहता है।
             हम कुछ जान भी नहीं पाते परन्तु हमारा यह खाता नित्य ही आटोमेटिकली कम अथवा अधिक होता रहता है। शुभकर्मों की इस खाते में यदि अधिकता होती है तभी जीव को मानव के रूप में जन्म मिलता है। उसमें भी हमारे कर्मानुसार हमें सुख-शान्ति, भौतिक सम्पत्ति, अच्छा घर-परिवार, रिश्ते-नाते, बन्धुजन, रूप-सौन्दर्य और सामाजिक रुतबा आदि मिलते हैं। शुभकर्मौं के कम होने मानव जन्म तो मिलता है पर जीवन अभावों में गुजरता‌ रहता है।
               इसके विपरीत यदि हमारे अशुभ कर्मों की अधिकता होती है तो जीव को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मानुसार चौरासी योनियों के भयावह चक्र से गुजरना पड़ता है। मनुष्य योनि को छोड़कर ये सभी योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगकर जीव को फिर से मानव जन्म की प्राप्ति होती है। 
              यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है पर उनका फल भोगने में नहीं। अपने किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का फल उसे भुगतना ही पड़ता है, उसे किसी भी तरह इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। चाहे वह कितने ही उपाय क्यों न कर ले। वह अपनी इच्छा से तीर्थों की यात्रा करे, तन्त्र या मन्त्र का सहारा या तथाकथित धर्मगुरुओं के पास चला जाए, उनसे किसी भी तरह से मुक्ति सम्भव नहीं होती।
             इन्सान कहता है कि जब वह गलत काम करता है अथवा कुमार्ग पर चलता है तब ईश्वर उसे उस समय सन्मार्ग क्यों नहीं दिखाता, चुप क्यों रहता है? सोचिए, यह तो हुई चोरी और सीनाजोरी वाली बात। जब भी मनुष्य शुभकर्म करता है तब वह मालिक उसे उत्साहित करता है। जब वह अशुभकर्म करता है तब वह उसे चेतावनी भी देता है। सुकर्म करते समय मन से प्ररेणादायक आवाज आती है और दुष्कर्म करते समय अन्तस से समझाने जैसी आवाज आती है। उसके अपने मन में विचारों का अन्तर्द्वन्द्व होने लगता है।
            यह मनुष्य है कि अपने स्वार्थों को पूर्ण करने में इतना अन्धा हो जाता है कि वह बार-बार उस अन्तरात्मा की आवाज को अनसुना करता रहता है। सन्मार्ग पर चलने के स्थान पर कुमार्ग पर चलने लगता है। फिर बाद में वह दोषारोपण करने से भी बाज नहीं आता।
               सुख-ऐश्वर्य का समय जीवन में आने पर वह गर्व से इतराता फिरता है कि मेरे परिश्रम के फलस्वरूप मुझे यह सब मिला है। तब उसे ईश्वर को याद करने का ध्यान ही नहीं आता। इसके विपरीत जब उसके जीवन में दुख और परेशानियाँ आती हैं तब वह ईश्वर को दोष देता है। उसे अपनी की गई गलतियों की जरा भी याद नहीं आती। वह सारा समय मालिक को और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
             उसे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि उसका तो भाग्य ही खराब है अथवा मेरा भाग्य ही मुझसे रूठ गया है। उसे स्मरण करना चाहिए कि। यह भाग्य अथवा यह किस्मत हमारी सखी नहीं है जो बार-बार हमसे रूठ जाती है और फिर जब मनाएँगे तब मान जाएगी। हर जन्म यदि मानव जीवन का चाहिए तो अभी से अपने कर्मों पर लगाम लगानी आरम्भ कर देनी चाहिए। सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जहाँ तक हो सके ईश्वर को साक्षी मानकर अपने जीवन की डोर उसके हाथ में सौंप देनी चाहिएओ भोगना उतना ही कठिन होता है। मित्रता करना और उसे निभाना दोनों ही कठिन कार्य कहे जाते हैं। अपने अतिप्रिय मित्र को भी पलभर में अपना दुश्मन बनाया जा सकता है पर दुश्मन को अपना बनाना टेढ़ी खीर होता है। उन दोनों में परस्पर विश्वास हो जाना असम्भव नहीं पर कठिन अवश्य होता है क्योंकि अविश्वास की एक रेखा उनके मनों में छुपी रहती है। इसलिए उन दोनों में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आ सकता है।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

आत्मसम्मान

आत्मसम्मान

अपना आत्मसम्मान हर मनुष्य को बहुत प्रिय होता है। आत्मसम्मान मनुष्य की वह थाती होती है जिसके कारण वह समाज में सिर उठाकर चलता है। उस पर होने वाले तनिक से प्रहार को भी वह सहन नहीं कर पाता। यह आत्मसम्मान न हुआ मानो कोई शीशा है जो जरा-सी चोट लग जाने पर किरच-किरच होकर बिखर जाता है। यद्यपि यह आत्मसम्मान कोई शरीर नहीं है परन्तु फिर भी हर बात पर घायल हो जाने के लिए बेताब रहता है। कोई भी चोट यह सहन नहीं कर पाता।
             यह सत्य भी है कि आत्मसम्मान मनुष्य के लिए बहुत ही आवश्यक है। उसके बिना उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वैसे देखा जाए तो जिस व्यक्ति को अपने सम्मान की चिन्ता नहीं रहती वह जीवित होते हुए भी मृत के समान है। वास्तव में सम्मान की कामना हर व्यक्ति करता है। कहते हैं कि जहाँ मान व सम्मान न मिले वहाँ भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। फिर आत्मसम्मान की बात कुछ अलग ही है। जिस व्यक्ति को अपना आत्मसम्मान प्रिय नहीं है, वह तो इन्सान कहलाने के योग्य भी नहीं है। इसीलिए मनीषी कहते हैं- 
          मानो हि महतां धनम्।
अर्थात् मान ही महान लोगो का धन है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनस्वी लोग अपने जीवन को अभावों में जी लेंगे पर अपने स्वाभिमान को ठेस नहीं लगने देते। उनके लिए उनका मान यानी स्वाभिमान या आत्मसम्मान ही सर्वोपरि होता है, अन्य शेष कुछ भी उन्हें चाहिए नहीं होता।
             इसे हम नाक का प्रश्न भी कह सकते है। स्वाभिमानी व्यक्ति किसी को भी अपनी पगड़ी उछालने नहीं देते। वे स्वयं भी सावधान रहते हैं कि उनके द्वारा किसी का सम्मान न रौंदा जाए। यहॉं हम एक उदाहरण लेते हैं। अग्नि जब अपने उत्कर्ष पर होती है यानी उसमें सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य होती है। उसमें तेज में होता है तो सभी जीव-जन्तु उससे डरते हैं, उसके पास जाने से कतराते हैं। जब वही आग जब राख बन जाती है तो चींटियाँ भी उस पर चलने लगती हैं।
              स्वाभिमानी व्यक्ति टूट सकते हैं पर किसी के आगे अनावश्यक रूप से झुकते नहीं है। वे चाहते है कि उन्हें कोई खाने के लिए दे चाहे न दे परन्तु उनके आत्मसम्मान को ठेस न लगाए। वे दुनिया के हर सुख व ऐश्वर्य को इसके लिए बलिदान कर सकते हैं। महाराणा प्रताप, गुरु गोबिन्द सिंह आदि स्वाभिमानी व्यक्तियों के बलिदानों से इतिहास के पन्ने भरे हुए हैं जिन्होंने अपने देश, धर्म व समाज के लिए अपनी व अपने बच्चों तक की परवाह नहीं की। इसीलिए वे आदरणीय हमारे हृदयों में बसते हैं। हम उनके लिए प्रात:स्मरणीय विशेषण का प्रयोग करते हैं।
             इसके विपरीत ऐसे लोग भी दुनिया में होते हैं जो अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर अपने तुच्छ स्वार्थो को महत्त्व देते हैं। उन्हें कोई कुछ भी कह ले, चिकने घड़े की तरह उन पर कोई असर नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है -
      बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैय्या।
अर्थात् वे हर रिश्ते या सम्बन्ध को केवल पैसे के तराजू पर तौलते हैं। इसीलिए उनके मायने अलग ही होते हैं। उन्हें लोग डीठ, चापलूस, चिकना घड़ा अथवा चाटूकार आदि विशेषणों से नवाजते हैं। ये लोग अपनी तथाकथित प्रशंसा को सुनकर बस दाँत निपोरकर रह जाते हैं। 
            ऐसे लोगों का यही मन्त्र होता है कि दुनिया भाड़ में जाए, बस इनके स्वार्थों की पूर्ति किसी भी तरह से होती रहनी चाहिए। ये किसी भी हद तक गिरकर अपना काम्य पाना चाहते हैं। रिश्वतखोरी, हेराफेरी, लूटपाट करने में इन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे ही लोग अपने स्वार्थ पूर्ति करने में इतने अन्धे हो जाते हैं कि अपने देश व धर्म का सौदा करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग अपने ही देश के गुप्त दस्तावेजों को चन्द टुकड़े लेकर शत्रु देश को बेच देने का दुस्साहस करते हैं। 
            उन्हें इस बात का तनिक भी भय नहीं लगता कि शत्रु देश यदि अपने देश पर आक्रमण करेगा तब न जाने कितने वीरों को उनके कारण अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। देश पर युद्ध का अनावश्यक बोझ बढ़ जाने से उन्नति के कार्य प्रभावित हो जाएँगे। चारों ओर त्राहि-त्राहि होने लगेगी। ऐसे देशद्रोही लोग पकड़े जाने पर अपना सारा जीवन सलाखों के पीछे ही व्यतीत करते हैं। अपने कुत्सित कर्मों के कारण ही वे‌ अपने देश और अपनों के लिए कलंक बन जाते हैं।
             मनुष्य को अपनी इच्छाओं को अपने मेहनत के बलबूते पर पूर्ण करना चाहिए। स्वार्थों को अपने ऊपर इतना अधिक हावी नहीं होने देना चाहिए कि वह कुमार्ग पर चलकर तिरस्कार का पात्र बन जाए। अपना आत्मसम्मान बचाए रखने का सदा प्रयत्न करना चाहिए। उसे किसी भी मूल्य पर गँवाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद