पिता के साए में सौभाग्यशाली बच्चे
संसार में वे बच्चे बहुत ही सौभाग्यशाली होते हैं जिनके सिर पर उनके पिता का साया बना रहता है। पिता के होने से ही मनुष्य का अस्तित्व होता है। पिता और माता ही वे दो भगवान हैं जो मनुष्य को इस धरती पर लेकर आते हैं। बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए इन दोनों की आवश्यकता होती है। पिता के होने से बच्चों में अनुशासन बना रहता है। माता और पिता मिलकर ही बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में अपना सिर ऊँचा करके चल सके और सुविधापूर्वक अपना जीवन यापन कर सके।
हमारे महान ऋषि ने 'तैत्तरीयोपनिषद्' में हमें समझाते हुए कहा है-
पितृदेवो भव
अर्थात् पिता को देवता मानो। कहने का तात्पर्य यह है कि मन्दिर में जाकर निर्जीव मूर्तियों की पूजा अवश्य करो, पर घर में जीवित देवता यानी पिता और माता की पूजा पहले करो। यहाँ पूजा करने का अर्थ है यह नहीं है कि धूप अगरबत्ती जलाकर उनकी आरती उतारी जाए। बल्कि इसका अर्थ यही है कि उनकी अच्छी तरह से देखभाल करनी चाहिए। जैसे उन्होंने कभी अपनी सन्तान की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण किया था। मनुष्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब वे अशक्त होने लगें, तब उन्हें समय पर भोजन मिले, आवश्यकता होने पर दवा मिले। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को अपना धर्म समझकर, बिना माथे पर शिकन लाए पूरा किया जाए।
बच्चे को यह अहसास होता है कि पिता के होने से वह सदा सुरक्षित है। जब तक पिता जीवित हैं, वह स्वयं को बच्चा ही समझता है। उसे लगता है कि यदि उससे कुछ गलत हो जाएगा तो पिता है न उसे बचाने के लिए, उसकी सुरक्षा करने के लिए। पिता के रहने से वह घर-गृहस्थी की चिन्ताओं से मुक्त रहता है। उसकी दृष्टि में उसके पिता का कद बहुत ऊँचा होता है जिसे कोई छू नहीं सकता। पिता के घर पर रहने से बच्चे अपने कार्य पर अच्छी तरह ध्यान दे सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि घर में उनके पिता बैठे हैं जो घर की और अगली पीढ़ी का ध्यान रख लेंगे।
महाभारत के काल में जब पाण्डव वन में विचरण रहे थे, उस समय चलते हुए उन्हें प्यास लगी। उन्हें समीप ही एक तालाब मिल गया। चारों भाई बारी-बारी से उस तालाब के पास पानी लेने के लिए पहुँचे। उस तालाब का स्वामी एक यक्ष था उसने उनसे पानी लेने से पहले, उसके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। वे सभी इतने प्यासे थे कि बिना उत्तर दिए ही जल लेना चाहते थे। उसके प्रश्नों का उत्तर न देने के कारण अर्जुन सहित चारों भाई बेहोश हो गए।
तब धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ गए। उन्हें भी यक्ष ने पहले प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। यक्ष के अनेक प्रश्नों में से एक प्रश्न यह था, "आकाश से ऊँचा कौन है?"
इस प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था, "पिता आकाश से ऊँचा है।"
पिता का महत्त्व इसी बात से चलता है कि शास्त्रों में उसे शीर्ष स्थान पर रखा गया है। सन्तान चाहे भी तो उस आकाश को हाथ बढ़ाकर नहीं छू सकती। वह केवल उस आकाश को दूर से निहार सकती है और उसके जैसा बनने का प्रयास कर सकती है।
पिता के विषय में 'नीतिशास्त्र' का यह कथन द्रष्टव्य है-
स पिता यस्तु पोषक:।
अर्थात् पिता वही है जो पोषक यानी पालन-पोषण करता है।
इस नीति वचन का तात्पर्य यह है कि पिता वही है जो अपने सारे सुखों का त्याग करके अपनी सन्तान का पालन-पोषण करता है। वह उसे कभी किसी वस्तु की कमी का अनुभव नहीं होने देता। अपनी सामर्थ्य से बढ़कर भी वह अपने बच्चों की सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है, उन्हें हर प्रकार से योग्य बनाता है।
'ब्रह्मवैवर्तपुराणम्' का यह कथन भी बहुत समीचीन है-
सर्वेषामपि वन्द्यानां जनक: परमो गुरु:।
अर्थात् सभी वन्दनीय जनों में पिता सर्वश्रेष्ठ है।
इस संसार में बहुत से लोग पूजनीय होते हैं, जिनकी हम किसी भी कारण से वन्दना करते हैं। उनके आगे-पीछे घूमते रहते हैं, उनकी कही हुई बात को महत्त्व देते हैं। उन सबसे अधिक पिता की अर्चना करनी चाहिए, ऐसा ब्रह्मवैवर्त पुराण का आदेश है। मनुष्य के जीवन में जो स्थान पिता का है, उसे कोई नहीं ले सकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में पिता स्थान बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह सत्य है कि उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।
अन्त में यही कह सकते हैं कि प्रत्येक बच्चे का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने पिता के मान-सम्मान को बनाए रखे। ऐसा कोई भी कार्य उसे नहीं करना चाहिए जिससे उनके पिता को दूसरों के समक्ष कभी अपनी नजर नीची करनी पड़ें। उसे स्वयं उनकी सेवा-सुश्रुषा के कार्य प्रसन्नतापूर्वक करने चाहिए। ऐसा करके वह अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद