शनिवार, 1 अगस्त 2026

शिकायत पुराण

शिकायत पुराण

हम इन्सानों को सदा ही हर दूसरे व्यक्ति से  शिकायत रहती है। हर मनुष्य को लगता है कि उसके बराबर इस संसार में कोई और बुद्धिमान हो नहीं सकता। वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं। इसीलिए हर किसी में कमियाँ ढूँढकर, उनका उपहास करके आत्मसन्तोष का अनुभव करता है। यदि उसमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो बहुत अच्छा होता। दूसरों के स्थान पर अपनी कमियाँ ढूँढकर यदि वह उन्हें सुधार पाता तो निश्चित ही इस संसार का भला हो जाता।
         मनुष्य को अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों, संगी-साथियों के साथ-साथ प्रकृति, मौसम और ईश्वर से भी शिकायत रहती है। पति-पत्नी को एक-दूसरे से, बच्चों को माता-पिता से, माता-पिता को बच्चों से, घर-परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों, शत्रुओं, पड़ोसियों, कार्यालयीन साथियों आदि सभी से हमेशा शिकायत रहती है। मनुष्य को यही लगता है कि हर कोई उसका अहित करना चाहता है। सब उससे और उसके ऐश्वर्य से जलते हैं। तरक्की करते हुए उसे देखकर उसकी टाँग खींचकर जमीन पर पटखनी देना चाहते हैं। उसे सदा यही चिन्ता सताती रहती है कि किस तरह सबको नीचा दिखाकर वह पतंग की तरह ऊँचा उड़ता रहे।
        इसी प्रकार दूसरों को कोसते हुए हम सभी अपने जीवन में अशान्ति खरीद लेते हैं। सब कुछ होते हुए भी परेशान रहते हैं। यही एक शंका मन में घुन की तरह लगा लेते हैं कि हमसे कोई भी व्यक्ति आगे न निकल जाए। यदि कोई अपने परिश्रम से आगे निकलने में सफल हो जाता है तब हमें सहन नहीं होता। बस फिर उसकी बुराइयाँ करने की कवायद शुरू होने लगती है।
         प्रकृति जिससे मनुष्य सब कुछ लेता है, उसे उससे विशेष रूप से शिकायत रहती है। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के उपरान्त भी उसका मन नहीं भरता और उसे दूषित करने से वह बाज नहीं आता। जब उसकी मूर्खता के कारण अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती है या भूकम्प आते हैं तब उनके कारण खेती और अन्य जानमाल की बर्बादी होती है। फिर प्रकृति की शिकायत करते हुए वह थकता नहीं है।
       नदियों पर बड़े-बड़े बाँध और पुल बनाकर मनुष्य सुविधाएँ भोगना चाहता है। उन्हें अपने यातायात के लिए प्रयोग करना चाहता है। पर उनकी सफाई और रख-रखाव पर ध्यान नहीं देना चाहता। इसलिए उनके द्वारा जब तबाही होने लगती है, उस समय वह बिसूरने लगता है। बड़े-बड़े भाषण देकर अपनी कमियॉं छुपाने का असफल प्रयास करता है।
       सागर से भी उसे परेशानी होती है। वह सोचता है कि समुद्र का पानी खारा न होकर मीठा होता तो पानी की समस्या स्वत: हल हो जाती। स्वयं तो वह ध्यान नहीं देता और हर समय पानी को बर्बाद करता रहता है। विद्वान कहते भी हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।
        पक्षियों से विशेषकर कोयल से उसे यह शिकायत है कि उसका रंग काला है। उसकी मधुर आवाज के साथ यदि रंग भी गोरा होता तो अच्छा होता। फूलों अर्थात् विशेषकर गुलाब से शिकायत रहती है कि उसमें काँटे होते हैं। यदि वे न होते तो बहुत अच्छा होता। जब वह उसे तोड़ना चाहता है, वे उसे चुभ जाते हैं। 
          पेड़-पौधों से शुद्ध वायु और सभी प्रकार के खाद्यान्न पाकर मुदित होता रहता है, फिर भी उन्हें काटकर अपने घर को सजाने तथा ईंधन के रूप में प्रयोग करने में जरा भी परहेज नहीं करता। उसे हर मौसम से भी शिकायत रहती है चाहे वह सर्दी हो, गर्मी हो, वर्षा हो या पतझड़ हो। सर्दी में उसे बहुत ठण्ड लगती है और उसे हीटर व गीजर जलाने पड़ते हैं। गर्मी में उसे गर्मी लगती है तो उसे ए.सी. चलाने पड़ते हैं। इस कारण इन दोनों मौसम में उसका बिजली का बिल बढ़ जाता है। वर्षा ऋतु में बाढ़ आने से घर से बाहर निकलने में परेशानी होती है। पतझड़ के समय गन्दगी बहुत हो जाती है। इसलिए सफाई अधिक करनी पड़ती है।
        इसी प्रकार पशुओं को अपने आराम और मनोरंजन के लिए पालतू बनाता है और अपने जीभ के स्वाद के लिए मारकर खा जाता है। जब वे इसके विपरीत कार्य करने लगते हैं तब उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है।
        ईश्वर जिसने उसे इस संसार में भेजा है और झोली भर-भरकर नेमते दीं हैं। चौबीसों घण्टे किसी-न-किसी बात पर उसी से शिकायत करता रहता है। उसे यही लगता है कि दुनिया को मालिक सुख देता है किन्तु सारे दुख, कष्ट और परेशानियाँ उसकी झोली में डाल देता है। अतः ईश्वर को लानत-मलामत करता है।
          ये सभी शिकायतें वास्तव में मनुष्य के नकारात्मक रवैए का परिणाम होता है। यदि इस शिकायत पुराण को तिलांजलि देकर मनुष्य सकारात्मक सोच अपना ले तो उसकी बहुत सारी स्थितियाँ स्वयं ही बदल जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

पुण्य कर्मों की पूॅंजी कैश करवाऍं

पुण्य कर्मो की पूँजी कैश करवाऍं

बैंक में हम अपना पैसा जमा करवाते हैं। जब हमें आवश्यकता होती है तब वहाँ से इच्छित राशि निकाल सकते हैं। उस पैसे से हम अपनी अनेक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यदि हम बैंक में अपना अकाउंट खुलवाकर पैसा जमा नहीं करेंगे तो आवश्यकता होने पर बैंक से हमें पैसा नहीं मिल सकेगा। इसका सीधा-सीधा यही अर्थ हुआ कि बैंक से पैसा निकालने के लिए वहॉं अकाउंट होना और धन होना आवश्यक होता है। अपना जमा किया हुआ पैसा भविष्य में हमारे काम आता है।
          इसी प्रकार अपने पुण्य कर्मो की पूँजी को यदि हम अपने भाग्य के खाते में जमा कराएँगे तभी अगले जन्म में उसे कैश करवा सकेंगे। उसी पुण्य कर्मों की पूॅंजी से हम उस जीवन में सुख भोग सकेंगे। यदि इस जीवन में हम इस पूॅंजी से वंचित रह जाऍंगे तो अगले जन्मों में हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। हमारे शास्त्र, हमारे बड़े-बुजुर्ग और मनीषी हमें अपने सत्कर्मों की पूॅंजी बढ़ाने पर बल देते हैं।
          बैंक में जमा करवाए हुआ धन के कारण हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद हम अपने जीवन के आड़े वक्त के लिए धन का संग्रह करने के लिए व्यघ्र रहते हैं।
        इस एक भौतिक जीवन को जीने के लिए हम इतने तामझाम करते हैं परन्तु जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे शरीर में रहने वाले जीव को अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी होती है, उसके विषय में हम कभी नहीं सोचते। जबकि यह विचार मन में अधिक हावी होना चाहिए। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि उसे हम अपने मन-मस्तिष्क में कभी आने ही नहीं देते। अपने आसपास रहने वाले लोगों को देखकर भी हम कुछ नहीं सीखते।
        एक दिन बैंक हमेशा की तरह पैसे निकालने वालों की भीड़ थी। भीड़ को देखकर एक व्यक्ति रुक गया। उसने वहाँ खड़े हुए एक व्यक्ति से सहज ही पूछा, "भाई, यहाँ भीड़ क्यों है?"
            दूसरे आदमी ने जवाब में कहा,"यह भीड़ पैसे लेने वालों की है।"
          वह आगन्तुक बैंक की प्रणाली से अनजान था। उसने फिर पूछा, "क्या सबको पैसे मिलते हैं?"
           दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हाँ।"
          उसकी हॉन् सुनकर वह व्यक्ति भी उसी लाइन में खड़ा हो गया।
        जब उसकी बारी आई तो बैंक के कैशियर ने उससे पूछा, "उसे कितने पैसे चाहिए, पर्ची भरी है क्या, तुम्हारा खाता बैंक में है क्या?" 
        अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित करते हुए उसने न में सिर हिला दिया और कहा, "तुम सबको पैसे दे रहे थे। मुझे भी पैसे चाहिए थे, इसलिए मैं भी लाइन में खड़ा हो गया।"
          उसका भोला-सा उत्तर सुनकर कैशियर ने उसे समझाया, "यह बैंक है। यहाँ पर लोग पैसे जमा करवाते हैं। फिर जब जितने पैसे की उनको जरूरत होती है तब पर्ची भरकर उतने पैसे ले लेते हैं और फिर अपनी पासबुक में एंट्री करवा लेते हैं।"
        कहने का अर्थ यही है कि बैंक में पहले पैसे जमा करवाने होते हैं तभी निकल पाते हैं। पासबुक में केवल तीन एंट्री होती हैं-  डिपाजिट यानी धनराशि जमा कराना, विड्राल अर्थात् पैसा निकालना और बैलेंस यानी खाते में कितना धन शेष बच गया है।
          बैंकिंग प्रणाली से अनजान उस व्यक्ति ने जब बैंक में अपना पैसा जमा ही नहीं करवाया था तो फिर उसे आवश्यकता होने पर भी वहाँ से पैसा नहीं मिल सकता था। वह व्यक्ति खाली हाथ ही रह गया।
        हम सब लोग जो इस बैंकिंग प्रणाली को भली-भाँति जानते हैं, वे भी भूल जाते हैं कि धन की तरह हमारे भाग्य का भी अपना एक अकाऊंट होता है। वहाँ भी जमा, घटा और शेष बची हुई राशि का हिसाब रखा जाता है।
        इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भाग्य एक बैंक है। हमारे पुण्यकर्म और हमारे पापकर्म हमारी जमाराशि है। पुण्य कर्मों के कारण हम अपने इस भौतिक जीवन में सुख-समृद्धि, शान्ति, सफलता, यश और स्वस्थ जीवन आदि का आनन्द ले सकते हैं।
        इसके विपरीत पापकर्मों के कारण हमें जीवन में अभाव, परेशानी, रोग, कलह-क्लेश और निराशा आदि भोगने पड़ते हैं। जब जीव अपने पापकर्मों को भोग लेता है तभी उसे उनसे मुक्ति मिलती है।
          पापकर्मों और पुण्यकर्मो को भोगने के बाद उनमें से जितने कर्म शेष बचते हैं, उन्हीं के अनुसार जीव को अगला जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों में से उसे अपने कर्मों के अनुसार कोई भी शरीर मिल सकता है।
        अतः अपने पुण्यकर्मो को अपने भाग्य के खाते में जोड़ने के लिए अभी से सन्नद्ध हो जाइए। ऐसा न हो कि पापकर्मों की अधिकता से न अगला जन्म अच्छा मिले और न ही इस जीवन में ही सुख-सुविधाएँ मिल सकें। उस समय सिर धुनकर पश्चाताप करने से अच्छा है कि हम अभी से चेत जाएँ। इसका कारण है कि हमारे इन पुण्यकर्मो और पापकर्मों के लेखे-जोखे के अनुसार ही हमें सब कुछ मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

आकर्षित करते मोहजाल

  आकर्षित करते मोहजाल 

इस संसार में रहने वाले मनुष्य को सदैव परेशानियाँ अथवा डर डराते रहते हैं। उनसे घिरा वह सुख की सॉंस नहीं ले पाता। सारा समय उनसे छुटकारा पाने का प्रयास करता रहता है। जब भी, जहाँ भी, उसे कहीं से थोड़ी-सी राहत मिल जाती है, वह वहीं सब कुछ भूल जाता है। उसे यह भी याद नहीं रह जाता कि वह इस संसार में सीमित समय के लिए ही आया है। तत्पश्चात तो उसे यहॉं से विदा हो होकर दूसरे लोक या परलोक जाना‌ है।
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संसार के आकर्षण और मोहमाया के जाल इतने अधिक लुभावने हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी उनके तिलस्म में उलझकर रह जाता है। वह जितना भी उनसे बाहर निकलने का प्रयत्न करता है, उतना ही गहरे उसमें फँसता चला जाता है। मजे की बात यह है कि उसे पता ही नहीं चलता।
          एक बोधकथा की यहाँ चर्चा करते है जिसे हममें से कई लोगों ने पढ़ा होगी। एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था। तभी एक शेर उसका शिकार करने के लिए उसके पीछे भागने लगता है। भागते हुए उसे एक कुँआ दिखाई देता है। उसके सामने विकट स्थिति आ जाती है। यह वही बात हो गई -
            आगे कुआँ और पीछे खाई 
इस स्थिति से बचने के लिए वह छटपटाने लगता है। उसे आगे एक कुऑं दिखाई देता है। वह डरा हुआ बेचारा अपनी जान बचाने के लिए उस कुएँ में के ऊपर लगे हुए चक्र में बंधी हुई रस्सी को पकड़कर लटक जाता है। 
          वह वहाँ लटक तो गया परन्तु जब उसकी नजर नीचे कुँए की गहराई में पड़ी तो उसके होश उड़ गए। वहॉं पर फन फैलाए हुए एक काले साँप बैठा होता है। उसे देखकर वह चौंक जाता है। मौत को साक्षात् अपने समक्ष देखकर वह बहुत घबरा जाता है। उसी समय उसकी नजर काले और सफेद रंग के दो चूहों पर पड़ती है जो उस रस्सी को काट रहे होते हैं, जिसको पकड़कर वह लटक रहा था। ऐसा भयावह दृश्य देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। 
          ईश्वर का चमत्कार देखिए कि कुँए में उसे एक शहद का छत्ता नजर आता है। उसे थोड़ी-सी राहत मिलती है। उस छत्ते से शहद की एक-एक बूँद उसके मुँह पर गिरने लगती है। अपनी जीभ से वह उस शहद को चाटने लगता है। शहद की मिठास में वह इतना खो जाता है कि उसे वहाँ मौजूद शेर, भयानक साँप और चूहों के डर को भूल जाता है। उस समय वह अपने सिर मंडराती मौत तक को नजरंदाज कर देता है। यही है इन्सानी फितरत कहीं जा सकती है कि क्षणिक सुख के सामने वह अपनी मौत को बिसरा बैठा।
           यह दुनिया जंगल की तरह है। कुआँ मौत का घर है और साँप मौत का कारण है जिसे हर हाल में डसना ही है। दोनों चूहे दिन और रात हैं जो हमारी जिन्दगी की डोर को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं। शहद इस संसार का रस-रंग है जिसे थोड़ा-सा भी चख लिया जाए तो मनुष्य भूल जाता है कि उसे इस असार संसार से विदा लेनी है।
          यह कथा हमें समझाती है कि काल रूपी सर्प मनुष्य को भयभीत करता रहता है। वह समझता है कि यही काल एक दिन उसे अपना ग्रास बना लेगा। फिर भी यह मनुष्य समय से न डरते हुए मस्त रहता है, मानो उसने रावण की तरह काल को बाँध लिया है। जो मनुष्य विषय-भोगों में अपना समय व्यतीत करता है, वह इस समय को व्यर्थ गँवा देता है। इसके विपरीत जो इस समय का सदुपयोग कर लेता है सफलता उसके कदम चूमती है और उस व्यक्ति को आम से खास बनाकर सबके सिरों पर बिठा देती है।
        हमारा यह जीवन पल-पल करके बीत रहा है। जन्म लेने के पश्चात से बीतता हुआ यह समय हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, यह क्रम अनवरत चलता रहता है। ये दोनों मिलकर हमारी जीवन की डोर को धीरे-धीरे काट रहे हैं यानी कम से और कम करते जा रहे हैं। इससे जीवन और मृत्यु के बीच का जो अन्तर है वह दिन-प्रतिदिन कम से कमतर होता जा रहा है। हम सब इस तथ्य को अनदेखा करते हुए इस अमूल्य जीवन को दुनिया के झंझटों में व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं।
          मनमोहक दुनिया के माध्यम से इस संसार सागर में वह प्रभु इन्सान को चारा डालकर ललचाता रहता है। मनुष्य को पता ही नहीं चलता कि कब वह उसके काँटे में मछली की तरह फँस जाता है और मालिक वह काँटा खींच लेता है। तब मनुष्य तड़पता रह जाता है। हाथ-पैर पटकता रहता है पर सब व्यर्थ हो जाता है।
          मौत को हमेशा प्रत्यक्ष खड़ा हुआ मानना चाहिए। व्यवहार ऐसा करना चाहिए जैसे आज का दिन ही अन्तिम दिन है और अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना है। इसी भावना के साथ मौत से बिना डरे निश्शंक होकर विचरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता 

मनुष्य निस्वार्थ भाव से जो भी परोपकार के कार्य करता है, वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे कार्य उसके शुभकर्मों में जुड़ जाते हैं और उसके पुण्यों की वृद्धि करते हैं। समयानुसार जैसे फलदार वृक्ष राहगीरों को मीठा फल देते हैं, उसी प्रकार परोपकारी जन अपने कर्मों से दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का यत्न करके उन्हें सुख पहुॅंचाते हैं। ऐसे मनुष्य की प्रसिद्धि कहाँ तक फैलेगी, यह सब ईश्वर ही जानता है। न तो वह स्वयं जानता है और न ही कोई अन्य लोग।
          उसके समीपस्थ अन्य दूसरे लोग चाहे उसकी कितनी ही आलोचना क्यों न करते रहें, उन्हें अनदेखा करते हुए वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। अपने द्वारा चुने हुए मार्ग पर सूर्य की तरह निरन्तर गतिमान रहता है।
        यहाँ हम एक कथा को लेते हैं जो इन्हीं विचारों की पोषक है। एक बहुत ही सज्जन मनुष्य थे जो हर आने-जाने वाले व्यक्ति को अपने पास बिठाकर पानी पूछते थे। आया हुआ कोई परदेसी यदि भूखा होता तो उसे पूछकर खाना भी खिलाते थे। वे बस यही कहते थे, "जो यहाँ दिया है तो वहीं वहाँ मिलेगा।"
         एक बार उन्हें किसी कार्यवश अपने घर से दूसरे शहर जाना पड़ गया। उन्होंने अपनी बहू से कहा, "बेटा, चार पराँठे बनाकर मेरे बैग में रख दो। जब भूख लगेगी तो किसी पेड़ की छाया में बैठकर खाना खा लूँगा।"
          उनकी बहू ने मन में विचार किया कि नित्य प्रति लोगों को खाना खिलाते रहते हैं और कहते हैं, "यहाँ दिया है तो वहाँ मिलेगा। इन्हें भोजन की क्या आवश्यकता आ पड़ी।"
          उसने खाना नहीं बनाया। जब वे सज्जन घर से जाने लगे तो उन्होंने बहू से पूछा, "बेटा, क्या तुमने भोजन रख दिया है।"
          उसने हाँ में उत्तर देते हुए कहा, "बाबू जी, रख दिया है, आगे जाकर मिल जाएगा।"
          वे अपने गन्तव्य पर थके-माँदे पहुँचे और एक चबूतरे पर बैठ गए। थोड़ी दूरी पर काम रहे युवक ने उन्हें देखा तो पहचान गया कि वे वही सज्जन हैं जिन्होंने थके और भूखे-प्यासे उसे खाना खिलाया था। वह उनके पास आया और उनसे हालचाल पूछा तथा फिर पूछा, "आपने भूखा का लिया है।"
           उन्होंने ने कहा, "नहीं, अभी नहीं खाया।"
          उन्हें भूखा जानकर उसने उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाया।
        तब उन सज्जन ने कहा,"मेरे बैग में मेरी बहू ने खाना रखा है, उसे भी खा लेते हैं।"
         परन्तु जब उन्होंने बैग खोला तो देखा कि उसमें बहू ने खाना रखा ही नहीं था। तभी उन्हें बहू के शब्द याद आ गए, "यहाँ जो खाना दिया है, वह आगे जाकर मिल जाएगा।"
          यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अपना खुद का पेट भर लेना और अन्य किसी के बारे में कभी न सोचना पशुवृत्ति कहलाती है। मनुष्य को मिल-बाँटकर खाना चाहिए। सम्पूर्ण प्रकृति यानी जल, पृथ्वी, वायु, पेड़-पौधे, सूर्य, बादल आदि अपने पास कुछ भी नहीं रखते। उनके पास जो भी है, वे उसे हम जीवों में बॉंट देते हैं। वे अपने स्वार्थ का त्याग करके परमार्थ का कार्य दिन-रात करते रहते हैं।
          स्वयं के हिस्से का भोजन खाना तो प्रकृति कहलाती है किन्तु दूसरों के हिस्से पर नजर रखना अथवा खा लेना विकृति कहलाती है। इन सबसे भी बढ़कर होता है किसी भूखे को अपना हिस्सा दे देना, यह उसके संस्कारों को बताता है। हमारी भारतीय संस्कृति सदा अतिथि की सेवा करने का निर्देश देती है और कहती है -
              अतिथि देवो भव।
अर्थात् अतिथि को ईश्वर की तरह मानो।
        जिन लोगों ने कभी भूख की ज्वाला का अनुभव नहीं किया उन्हें तो पता ही नहीं कि भूखा व्यक्ति क्या-क्या अनर्थ नहीं कर गुजरता? बहुत से लोग अपनी असह्य भूख के कारण गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। जिनके पेट भरे होते हैं उनके दिमाग खराब हो जाते हैं और नखरे अलग होते हैं। इसलिए उनके घर की रोटियाँ किसी जरूरतमन्द को देने के स्थान पर कूड़े में फैंक दी जाती हैं अथवा खाने लायक नहीं रहतीं। इससे बढ़कर और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।
          जरूरतमन्द इन्सान की सहायता यदि बिना उससे कुछ प्राप्ति की भावना से सहृदयतापूर्वक की जाए तो वह अवश्य ही फलदायी होती है। ऐसे ही महानात्मा लोगों के पुण्यों के कारण इस धरती पर आज तक मानवता का अस्तित्व आज बचा हुआ है। अन्यथा स्वार्थि लोगों ने इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे लोग अपने तुच्छ स्वार्थों को महत्त्व देते हुए दूसरे लोगों को गलत सन्देश देते हैं। इससे लोगों का मानवता पर विश्वास डगमगाने लगता है जिसे हम किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहरा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

स्वस्थ्य शरीर मात्र साधन

स्वस्थ शरीर मात्र साधन

स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का परम कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता। यह स्वास्थ्य मनुष्य की अमूल्य निधि है। जैसे धन-वैभव को सम्हालकर रखा जाता है, उसी प्रकार अपने इस स्वास्थ्य को भी सम्हालकर रखना चाहिए। परन्तु बहुत दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हम इसी ईश्वरीय नेमत के साथ दिन-रात खिलवाड़ करते हैं।
           हमारे शास्त्रों के द्वारा जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। उन सबको धत्ता दिखाते हुए हम किसी दूसरे ही युग में जाते जा रहे हैं। हमारा आहार-विहार बिल्कुल उलट-पुलट हो चुका है। आज हमारे किसी भी कार्य को करने का कोई समय नहीं होता। हम न समय पर सोते हैं और न ही समय पर जागते है। हमारी सभी पार्टियाँ, शादी-ब्याह आदि देर रात तक चलते रहते हैं। देर रात तक क्लबों में मौज-मस्ती चलती है। इसलिए प्रातः देर से उठते हैं। परिणामस्वरूप सभी कार्य देर से होते‌ हैं।
           जिस रोजी-रोटी को कमाने के लिए हम अथक परिश्रम करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं और कोल्हू का बैल तक बन जाते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। हम पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक भोजन न खाकर अधिक मसालेदार और तले हुए खाद्यान्न खाना पसन्द करते हैं। डिब्बाबन्द पदार्थ और जंकफूड खाकर हम बहुत इतराते हैं। घर का खाना हमें नहीं भाता, यह कहकर हम अपनी शान बघारते हैं।
           फिर एक समय ऐसा आता है जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है यानी हमारा यह स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। उस समय जब हम असहाय हो जाते हैं तब रो-रोकर ईश्वर से स्वस्थ करने की या इस दुनिया से उठा लेने की प्रार्थना करते हैं। हमें अपनी गलती तब भी समझ नहीं आती कि हमने स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। 
         अस्वस्थ हो जाने पर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हुए अपना बहुमूल्य समय व मेहनत की गाढ़ी कमाई बर्बाद करते हैं। वह एक समय जीवन में ऐसा होता है जब डाक्टरों की सलाह पर सादा खाना खाना हमारी लाचारी बन जाती है। तब डायटिशियन के बनाए हुए चार्ट के अनुसार अपना खानपान सन्तुलित करने के लिए हम विवश हो जाते हैं और तब हमारी सारी हेकड़ी निकल जाती है। उस समय कमाया हुआ सारा धन धरा रह जाता है। 
           अपने प्रिय से प्रिय और जान छिड़कने वाला भी कोई सहायता नहीं कर सकता। रुग्ण शरीर के कष्ट को कोई भी न बॉंट सकता है और न ही दूर कर सकता है। अपने प्रियजन मात्र दर्शक बनकर रह जाते हैं। उस समय कितना भी पैसा खर्च लो किन्तु यह स्वास्थ्य पलटकर वापिस नहीं आ सकता और न ही मुँह में कोई एक निवाला डाल सकता है।
          हमारे मनीषी इसलिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने पर बल देते हैं। हम ऐसे नालायक हैं जो उनकी महत्त्वपूर्ण बातों को अनदेखा करके कष्ट पाते हैं। महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा था-
        शरीरमाध्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् हमारा यह शरीर धार्मिक कार्यों अथवा हमारे दायित्वों को पूरा करने का साधन है।
        शरीर जब स्वस्थ होता है तो मनुष्य अपने सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो वह दूसरों का मुॅंह देखने लगता है। मनुष्य घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। इन कारणों से उसके मन को बहुत कष्ट होता है। 
        समस्या हमारे सामने तब आती है जब हम इस साधन शरीर को साध्य मान लेते हैं। दिन-रात इसे सजाने-सँवारने में लगे रहते हैं। इस पर सदा घमण्ड करते रहते हैं। अपने सामने दूसरों को हीन समझते हैं। बड़े दुख की बात है कि इसे स्वस्थ रखने का प्रयास मनुष्य नहीं करता। अस्वस्थ होने पर दूसरों को दोष देते हैं। ईश्वर को उलाहना देते हैं और लानत-मलामत करते हैं।
          मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य है कि वह चौरासी लाख योनियों के साथ-साथ जन्म-जन्मान्तरों के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना। ईश्वर की उपासना अपना प्रमुख कर्त्तव्य मानकर करे। लेकिन इस दुनिया के आकर्षणों में फँसकर वह सब भूल जाता है और आजन्म कष्ट भोगता रहता है।
          इस स्वस्थ शरीर में ही अपने विचारों को शुद्ध व पवित्र रख सकते हैं और अपने मन को साध सकते हैं। कठोपनिषद् ने इस शरीर को रथ माना है। यदि यह रथ अपनी गति से चलेगा तभी तो हमें अपनी मंजिल मुक्ति तक पहुँचाएगा। इसलिए इस शरीर की देखभाल करनी अत्यन्त आवश्यक है। शेष अन्य दायित्वों की भाँति इसका निर्वहण भी करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर लो दुनिया मुट्ठी में

कर लो दुनिया मुट्ठी में

प्रत्यक्ष रूप से समक्ष न होने पर हमारी आपसी बातचीत का माध्यम टेलीफोन होता है। पहले लोग पत्रों के सहारे अपने बन्धु-बान्धवों से सम्पर्क साधा करते थे। वह प्रक्रिया पूर्ण होने में बहुत समय लग जाता था। आज हम सभी अपने विचारों का आदान-प्रदान एक-दूसरे के साथ फोन के द्वारा करते हैं। इस वैज्ञानिक आविष्कार को हम एक चमत्कार कह सकते हैं।आधुनिक तकनीक की यह बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। इससे आपसी दूरी का अहसास भी नहीं होता।
        देश-विदेश में हम बहुत कम पैसों में अपने बन्धु-बान्धवों से अपने सुख-दुख साझा कर सकते हैं, उनका हालचाल जान लेते हैं। कुछ दशक पहले लैण्डलाइन टेलीफोन बहुत वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिला करते थे क्योंकि उस समय फोन घर में लगवा लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था। जिसके घर पर टेलीफोन होता था, उसे लोग बड़ा आदमी कहते थे। शायद टेलीफोन के कठिनता से उपलब्ध होने के कारण ही एक फिल्म में यह गाना फिल्माया गया था जिसकी बहुत अधिक धूम मची थी और बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह गाना था-
    मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से  
      टेलीफून तुम्हारी याद सताती है।
ये बहुत ही प्रसिद्ध पुराने गाने के बोल हैं। यह सदाबहार गीत 1949 में आई फिल्म 'पतंगा' का है। इसे दिग्गज गायिका शमशाद बेगम और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने गाया था। इसके बोल राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखे थे। 
        कुछ समय पूर्व अपने प्रदेश से बाहर या विदेश में रहने वाले किसी से बात करनी होती थी तो एस. टी. डी. अथवा आई. एस. डी. बुक करवानी पड़ती थी। उन दिनों ऐसे फोन यदि दिन में किए जाते थे तो बिल बहुत अधिक आया करता था। इसलिए लोग रात दस के बजे के बाद फोन करते थे। उस समय फोन का रेट बहुत कम हो जाया करता था। उस समय काल बुक कराई जाती थी किन्तु यह कोई गारण्टी नहीं होती थी कि बात हो ही जाएगी।
         आज वाकई दुनिया हमारी मुट्ठी में हो गई है। वैज्ञानिक चमत्कारों के कारण दूरियों के कम हो जाने से दुनिया सिमटकर रह गई हैं। किसी भी समय बाजार से मोबाइल फोन खरीदो और अपने बन्धु-बान्धवों से पलक झपकते ही देश-विदेश में कहीं भी, किसी भी समय बहुत ही कम पैसों में बात कर लो। रात में काल रेट कम होने का इन्तजार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। इससे भी बढ़कर स्काईप, वाट्सअप, फेसबुक आदि से भी मुफ्त में काल करके बात कर सकते हैं।
          जिस प्रकार दूर बैठा व्यक्ति जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, उससे टेलीफोन के माध्यम से बातचीत करते हैं। उसी प्रकार ईश्वर जो हमसे बहुत दूर है, उससे बात करने के लिये मौन रहने की आवश्यकता होती है। वह इन भौतिक चर्म चक्षुओं से हमें प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता परन्तु हम मौन रहकर, ध्यान लगाकर और प्रार्थना के माध्यम से जब चाहें उससे बातचीत कर सकते हैं।
        जैसे हम मालिक से अपनी प्रार्थना के माध्यम से बात करते हैं उसी प्रकार वह दाता भी हमसे बात करता है। अन्तरात्मा की आवाज के माध्यम से वह हमारे साथ संवाद करता है। जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं तो हमारे मन में उत्साह होगा यानी वह शाबाशी देता है। इसके विपरीत गलत कार्य करने पर मन से आवाज आती है कि यह काम गलत है अथवा कोई देख न ले या किसी को पता चलेगा तो क्या होगा ? यानी हमें गलत कार्य न करने की चेतावनी देता है। उस परमपिता का हमारे साथ संवाद करने का यही तरीका है।
          भौतिक फोन से बात करने के लिए हमें निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। यानी उसके लिए हमें बिल देना होता है। यदि बिल का भुगतान न किया जाए तो कम्पनी के द्वारा फोन काट दिया जाता है। दूसरी ओर अपने प्रभु से बात करने के लिए अपने मन की भावना का समर्पण करना पड़ता है। वहाँ किसी प्रकार के धन का व्यय नहीं करना पड़ता और न ही फोन कटने या काल ड्राप होने का डर रहता है।
           आज तकनीक इतनी एडवांस हो गई है कि विडीयो कॉल करने पर हम सामने वाले का चेहरा भी देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हम आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हैं। इसी प्रकार उस मालिक से संवाद करने के हेतु सामने प्रत्यक्ष बैठकर बात करने के लिए हमें अपने अन्तस् में ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है। 
        हमें अपने जीवन में प्रतिदिन अपना थोड़ा-सा समय निकालकर अपने मालिक के साथ वार्तालाप करना चाहिए। सांसारिक रिश्ते जिनके साथ हम हमेशा बातचीत में व्यस्त रहते हैं, वे हमारे परलोक सिधारते ही समाप्त हो जाते हैं। केवल प्रभु का और हमारा साथ चिरन्तन है। अतः उससे चर्चा भी करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 जुलाई 2026

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य को ईश्वर ने इस सृष्टि का सबसे अधिक समझदार जीव बनाया है। बुद्धि का उपहार देकर इतनी उसे सामर्थ्य दे दी है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। यदि वह सकारात्मक रुख रखता है तो चमत्कार कर देता है। इसके विपरीत वह अपने नकारात्मक विचारों के कारण स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
        ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थीं। इन्हें आप सबके साथ कुछ वर्तनी संशोधन के पश्चात साझा कर रही हूँ। आशा है आप भी इन्हें आत्मसात करना चाहेंगे।
        'नजर रखो अपने विचार पर क्योंकि वे शब्द बनते हैं। नजर रखो अपने शब्द पर क्योंकि वे कार्य बनते हैं। नजर रखो अपने कार्य पर क्योंकि वे स्वभाव बनता है। नजर रखो अपने स्वभाव पर क्योंकि वह आदत बनता है। नजर रखो अपनी आदत पर क्योंकि वह चरित्र बनती है। नजर रखो अपने चरित्र पर क्योंकि वह जीवन का आदर्श बनता है।'
          इन पंक्तियों को पढ़ने के पश्चात यही समझ आता है कि मनुष्य जो भी विचार अपने मन में रखता है, उसी के अनुरूप बोलता है और फिर उसे अपने आचरण में ढाल लेता‌ है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह सबको प्रभावित करेगा। निश्चित ही उसे उन सबका समर्थन मिलेगा। उनका मार्गदर्शक बनकर वह समाज में अपना अहं किरदार निभाएगा।
          इसके विपरीत नकारात्मक सोच होने पर मनुष्य न सही ढंग से कोई कार्य कर पाता है और न ही किसी को उचित परामर्श दे सकता है। जीवन की बाजी हारने वाला वह इन्सान जीत का जश्न नहीं मना पाता। ऐसे व्यक्ति घर-परिवार और समाज के लिए बोझ के समान बन जाते हैं। उन्हें कहीं पर भी सम्मान नहीं मिल पाता।
          मनुष्य के क्रियाकलापों पर उसके विचारों की छाप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। उत्साही मनुष्य सदा सबको प्रेरित करेगा और निरुत्साही व्यक्ति सबको निराश ही करेगा। विवेकी व्यक्ति और अज्ञ व्यक्ति के कार्यो में जमीन और आकाश जैसा अन्तर होता है। जिसका अनुमान हम उनके कार्य-व्यवहार से भलीभॉंति लगा सकते हैं।
          चोर व्यक्ति चोरी करना सिखाएगा, भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टाचरण की शिक्षा देगा, धोखेबाज इन्सान धोखाधड़ी सिखाएगा, सदाचरी महापुरुष सदाचरण पर बल देगा। विद्वान व्यक्ति सदा दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य को अपने मन, वचन और कर्म पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसे हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य यही है कि जिसके पास जो गुण-अवगुण होंगे, उसीके अनुरूप ही उसका आचरण अथवा स्वभाव बन जाता है। भविष्य में मनुष्य का यह स्वभाव परिपक्व होकर अनजाने ही उसकी आदत बन जाता है। यदि उसमें अच्छी आदतें ढल गयी तो चारों ओर उसकी जय-जयकार होती है। ऐसा मनुष्य सफलता की सीढ़ियों पर सुगमता से चढ़ता जाता है।
          यदि गलत आदतें अपना ली गई हों तो लाख कोशिशों के बाद भी वह अपनी आदतों को बदल नहीं पाता। तब उसके कारण उसके भाई-बन्धुओं तथा परिवारी जनों को शर्मसार होना पड़ता है। उनके समझाने पर भी यदि वह अपनी गलत आदतें नहीं छोड़ता तो वे सब उससे किनारा करने लगते हैं। तब वह अकेला हो जाता है। उसके लिए यह बहुत दुखदाई स्थिति होती है।
        अपने जीवन का आदर्श ही मनुष्य का चरित्र बनाता है। उसके चरित्र की महानता उसे महान बनाकर ऊपर उठाती है और उसकी चारित्रिक विकृति उसे रसातल की ओर धकेल देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सदैव चरित्र निर्माण पर बल देती है।
          जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है तब व्यष्टि का यानी समाज का चरित्र बनता है। समाज के साथ-साथ देश के चरित्र का भी  निर्माण होता है। जिस देश का और उसके निवासियों का चरित्र उदात्त होता है, उस देश का गौरवशाली ध्वज सदा ही ऊँचा फहराता है। उस देश की ओर कितना ही शक्तिशाली शत्रु हो, आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। यदि किसी खुशफहमी के कारण ऐसा करने का दुस्साहस करता है तो उस शत्रु को मुँह की खानी पड़ती है।
        इस प्रकार विचार, शब्द, कार्य, स्वभाव, आदत, चरित्र और जीवन आदर्श ये सब एक चेन या कड़ी हैं। ये सभी एक ही सूत्र में पिरोए गए हैं। इनका परस्पर अन्तर्सम्बन्ध होता है। इसीलिए विचारों की शुद्धता, सरलता, सहजता पर सयाने बल देते हैं जो सर्वथा समीचीन है और आज भी उतने ही सटीक हैं।
चन्द्र प्रभा सूद