शुक्रवार, 22 मई 2026

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, इस बात को हम सब जानते हैं। फिर भी जानते-बूझते हम अपने शत्रु स्वयं ही बन जाते हैं। दूषित खान-पान पाचन तन्त्र को कमजोर करता है जिससे भूख कम लगती है और पेट में भारीपन या असहजता महसूस होती है। दूषित भोजन में पोषक तत्व कम होते हैं जिससे शरीर कमजोर हो सकता है।
           प्रदूषित या दूषित खाना खाने से फूड पॉइजनिंग हो सकती है  जिसके मुख्य लक्षणों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन शामिल हैं। यह जीवाणुओं, वायरस, रसायनों या भारी धातुओं के कारण होता है जो गम्भीर मामलों में डायरिया, पाचन तन्त्र में खराबी, कैंसर और हार्मोनल असन्तुलन का कारण बन सकते हैं। सोचने वाली बात है कि कोई मनुष्य अपना दुश्मन खुद कैसे बन सकता है?
           कितनी विचित्र है यह बात किन्तु सत्य है। यदि गहनता से विचार कर लिया जाए तो शीशे की तरह सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगेगा। हम सभी अपनी मन और जिह्वा के गुलाम हैं। जहाँ मन को बैठे-बिठाए याद आ गया कि फलाँ पदार्थ खाना है, वहाँ हमारी जीभ उसके स्वाद को याद करके लपलपाने लगती है। हम बस शीघ्र ही उसे खाने के लिए उतावले हो जाते हैं। फिर हमारा मस्तिष्क आदेश देता है खाने चलो। तब हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि उसे खाकर हमारे शरीर को हानि तो नहीं होगी।
           एक छोटा-से उदाहरण से इसे स्पष्ट करते हैं। प्रतिदिन हम सभी के खान-पान में चीनी और नमक का एक अहं रोल होता है। इन दोनों का निश्चित मात्रा में प्रयोग होना चाहिए। जहाँ इनकी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई वहीं दोनों शरीर को नुकसान पहुँचाने लगते हैं। नमक की अधिकता हमारी किडनियों को प्रभावित करती है और हाई बी. पी. की सम्भावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार चीनी की अधिकता शूगर जैसी बिमारी को जन्म देती है। इसके अतिरिक्त इनसे शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। इसलिए इनके साथ-साथ और अनेक रोगों की चपेट में भी मनुष्य धीरे-धीरे आने लगता है। 
          जब भी कभी बन्धु-बान्धवों से चर्चा होती है तो हम यही कहते हैं कि हम तो कुछ भी फालतू या ऊल-जलूल खाते ही नहीं। वास्तविकता यह है कि हम पौष्टिक खाने से दिन-प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। जंक फूड, डिब्बाबन्द खाद्य और बासी खाना खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। यदि किसी बिमारी के कारण कभी डाक्टर कुछ परहेज बताते हैं तो भी उस पर अमल करना नहीं चाहते।
           खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक और ऊर्वरक अन्न को प्रदूषित कर रहे हैं। गोदामों में स्टोर किए गए अन्न के रख-रखाव के लिए भी कई प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है। कोल्ड स्टोर में रखे गए खाद्य पदार्थ भी हमारे शरीर के लिए निश्चित ही नुकसानदेह होते हैं। इन स्थितियों को अनदेखा किया जा रहा है।
        किसान के अधिक फसल पाने और कमाई करने की लालसा भी हानिप्रद है जो मानव शरीर के साथ खिलवाड़ कर रही है। पहले समय में जैविक खाद का प्रयोग किया जाता था जिससे बिमारियों का खतरा नहीं ही होता था। हानिकारक बैक्टीरिया और रसायन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते जा रहे हैं। 
            इसके अतिरिक्त हमारे रहन-सहन ने और भी बेड़ा गर्क किया हुआ है। हमारे आहार-विहार, सोने-जागने आदि के सारे गलत नियम 'एक करेला और दूसरा नीम चढ़ा' वाली उक्ति को चरितार्थ करने में देर नहीं कर रहे हैं। यदि दूषित खाना खाने के बाद लक्षण गम्भीर हों जैसे कि उच्च बुखार, गम्भीर निर्जलीकरण या मल में खून आए तो तुरन्त डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
          अपनी मूर्खता के कारण बड़े धड़ल्ले से वायुमण्डल को गाड़ियों, फैक्टरियों आदि के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। नदियों के अमृत रूपी जल को विष में बदल रहे हैं। पृथ्वी की मिट्टी आदि को हम जहरीला बना रहे हैं। शहर में पेड़ों और जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। प्रकृति को प्रदूषित करने का खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना पड़ेगा। इस प्रदूषण का मूल्य हम अनजाने में अपने स्वास्थ्य से चुका रहे हैं। फिर भी हम खुश हैं, यह मजे की बात है।
            सरकार को लानत भेजकर हम अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते। जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तब तक कुछ भी सुधार नहीं हो सकेगा। जब तक सरकार, सोशल मीडिया, समाचार पत्र, स्वयं सेवी संस्थाएँ और सबसे बढ़कर हम स्वयं जन-जागृति का कार्य नहीं करेंगे तब तक प्रदूषित खान-पान से हम लोगों की जिन्दगियों से खिलवाड़ होता रहेगा। फाइव स्टार और मल्टी स्पेशिलिटी अस्पताल आम जनता को मूर्ख बनाकर उनकी जेब काटते रहेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 21 मई 2026

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा जब हो जाती है तब उस समय मनुष्य स्वयं को असहाय अनुभव करने लगता है। उसकी उस स्थिति में अपने साथ नहीं निभा पाते अथवा निभाना नहीं चाहते। तब अपनों से बेज़ार होकर, वह सबसे कटकर अलग-थलग हो जाता है। रिश्तों को निभाने के उसके सभी प्रयास खोखले दिखाई देने लगते हैं।
         ‌   वास्तव में दुख एक मानसिक, शारीरिक अथवा भावनात्मक कष्ट की अवस्था है। दुख तब उत्पन्न होता है जब इच्छाऍं, अपेक्षाऍं या परिस्थितियॉं मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं। यह किसी महत्वपूर्ण हानि जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु का होना, किसी रिश्ते के टूटने या असफलता के कारण होने वाली एक प्राकृतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुःख मन की वह व्याकुलता है जो किसी हानि या प्रतिकूल परिस्थिति के कारण पैदा होती है। यह स्थिति व्यक्ति को व्यथित करती रहती है। 
           मनीषी कहते हैं कि ऐसे कठिन समय में जब अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है, तब मनुष्य अनहोनी के भय से कदम-कदम पर चौंकने लगता है। अपनों के प्यार-दुलार से ठुकराए जाते हुए मनुष्य को कहीं ठौर नहीं मिलता। ऐसे कष्ट के समय पति को अपनी पत्नी का और पत्नी को अपने पति का सहारा मिल जाए तो ईश्वर की बड़ी कृपा समझो। यदि उनके बच्चे माता अथवा पिता के दुख को समझने वाले हों और उन्हें सहारा देने वाले हों तो सोने पर सुहागे जैसी स्थिति बन जाती है। मनुष्य अपने दुखों से जूझने में एक हद तक सफल हो जाता है।
            दुख एक अस्थायी स्थिति है परन्तु इसे स्थायी मान लेने पर व्यक्ति बहुत अधिक दुखी हो जाता है। दुख केवल दुखद भावनाओं तक सीमित नहीं होता बल्कि इसमें शारीरिक पीड़ा, अवसाद, और मानसिक अशान्ति भी शामिल किया जा सकता है।
            अपने दुख के विषय में हर समय सोचते रहने पर मनुष्य को लगने लगता है कि उसके मनोमस्तिष्क पर उसके दुख की सोच हावी होती जा रही है। अधिक तनाव में आ जाने के कारण उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके मस्तिष्क की नसें फट जाएँगी। उस समय मनुष्य किसी को भी अपनी व्यथा कथा सुनाकर अपने मन को हल्का कर‌ लेना चाहता है।
            इसी भाव को पुष्ट करती हुई एक कहानी का स्मरण हो रहा है जो कभी स्कूल में पढ़ी थी। यह कथा अंग्रेजी भाषा की पुस्तक में थी। कहानी का या उसके लेखक का नाम भी याद नहीं। कहानी के नायक के दुख का कारण भी याद नहीं है। पर वह घटना मन को इतना छू गई थी कि यदा कदा याद आ जाती है कि एक इन्सान दूसरे इन्सान के प्रति इतना सम्वेदनाहीन कैसे हो सकता है?
            यह कहानी एक टाँगा चलाने वाले गरीब व्यक्ति की है। लोगों की नजर में जिसकी कोई कीमत नहीं होती। दिनभर उसके टाँगे पर सवारियाँ चढ़ती और उतरती रहती हैं। टॉंगे में बैठे सभी लोग अपनी किसी-न-किसी समस्या को डिस्कस करते रहते हैं। वह भी अपनी समझ के अनुसार उन्हें उत्तर देता रहता है। 
            उनकी बातें या समस्याएँ सुनकर वह भी अपनी परेशानी को उनसे बाँटना चाहता है किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई भी सवारी तैयार नहीं होती। कोई उसे गाली देता है तो कोई उसे झिड़ककर चुप करा देता है। हद तो तब होती है जब अपनी व्यथा सुनाने के कसूर में एक सवारी उसे लात मारकर चुप कराती है। मानो वह इन्सान नहीं या उसके मन को कष्ट नहीं होता। दिनभर वह अपने मन में अतीव कष्ट का अनुभव करता है।
            रात के समय घर जाकर घोड़े को बाँधता है और उसे खाने के लिए दाना देता है। उस समय वह अपने घोड़े के पास बैठ जाता है और अपने मन की भड़ास, अपनी व्यथ की कथा और दिन में अपने साथ होने वाले अत्याचार की कहानी अपने उस घोड़े को सुनाकर अपना मन हल्का करता है।
            इस कहानी के याद रह जाने का कारण है कि आज लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। अपना कष्ट सबको बड़ा लगता है। दूसरे का कष्ट उनकी दृष्टि में कुछ महत्त्व ही नहीं रखता। उनकी सम्वेदनाएँ मानो मरती जा रही हैं। कोई भी दूसरे की परेशानी को अथवा दुख को समझना ही नहीं चाहता। हाँ, दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए, नमक-मिर्च लगाकर चटखारे लेने के लिए लोग जानकारी जुटाने में महारत हासिल कर रहे हैं। इससे उनके झूठे अहं को शान्ति मिलती है। वे भूल जाते हैं कि यदि वे कष्ट में हों और दूसरे लोग उनके वैसा व्यवहार करेँगे तब उनकी स्थिति कैसी होगी?
           किसी के दुख में बेशक साझेदार न बनो पर उनसे सहानुभूति के दो बोल तो बोले जा सकते हैं। दूसरे के दुख पर मलहम लगाने वाला छोटा नहीं हो जाता बल्कि महान होता है। सुख और दुख शरीर के भोग हैं। वे पूर्वकृत कर्मानुसार हर मनुष्य के जीवन में आते हैं। अतः सुधी जनों से दूसरों के प्रति सहृदयतापूर्वक व्यवहार अपेक्षित है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 20 मई 2026

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि इस मानव शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक है। पाचक अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है और शेष सभी अग्नियों की तुलना में यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रुप से पेट और आंतों के बीच नाभि के आस पास रहती है। यह अग्नि अपनी गर्मी से बहुत जल्दी ही भोजन को पचा देती है। हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे यह अग्नि छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर उन्हें शरीर के अनुरूप बना देती है। फिर ये शरीर को पुष्ट करते हैं।
             इस अग्नि को विद्वान मनीषी जठराग्नि कहते हैं। यह अग्नि मनुष्य  को ओजस्वी बनाती है। उसके तेज से ही हम सबका चेहरा दमकता है। उसकी गरमी से ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है। सभी कामों को करने के लिए अग्नि का सन्तुलित अवस्था में होना बहुत आवश्यक होता है।
          यदि शरीर की यह अग्नि मन्द हो जाए यानी मन्दाग्नि हो जाए तब मनुष्य का शरीर रोगी होने लगता है। उस पर सर्दी का प्रकोप बार-बार होता है। मनुष्य का पाचनतन्त्र प्रभावित हो जाता है। तब उसे भोजन पचाने में भी असुविधा होती है। उसका लीवर प्रभावित हो जाता है। यह लीवर मानव शरीर में महत्त्वपूर्ण रोल निभाता है।
          यदि शरीर में अग्नि न हो तो मनुष्य के द्वारा किया गया भोजन पचेगा नहीं और शरीर में धातुऍं भी नहीं बनेंगी। आयुर्वेद में बताया गया है कि शरीर की जठराग्नि जब शान्त हो जाती है अर्थात् समाप्त हो जाती है तो मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। शरीर का तापमान भी इसी अग्नि द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के कुछ ही समय पश्चात ही मनुष्य शरीर एकदम ठण्डा हो जाता है।
            'सन्यासोपनिषद्' का कथन है कि-
     मय्यग्रेsग्नि गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन।
     मयि प्रज्ञां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्।।
अर्थात् मैं अपने सम्मुख अग्नि को क्षमा, तेज, बल और ओज के साथ ग्रहण करता हूँ।
            हम कह सकते हैं कि क्षमा, तेज, बल और ओज आदि सभी गुणों के साथ अग्नि को ग्रहण करना चाहिए। अग्नि के साथ अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ की जाए तो वह बच्चों तक को भी नहीं छोड़ती। सबको जलाकर राख कर देती है। मनुष्य भी क्रोध की अधिकता में सारी दुनिया को जलाकर राख कर देने का दावा करता है। दूसरों की हानि तो समय बीतते हो पाती है परन्तु अपने पैर पर वह कुल्हाड़ी अवश्य मार लेता है। 
          इसलिए मनुष्य से क्षमाशील होने की आशा की जाती है। दूसरों को क्षमा कर देने वाले तेजस्वी व्यक्ति संसार के अमूल्य रत्न होते हैं। उनका बल असहायों की रक्षा और सहायता करने के लिए होना चाहिए, उनका दमन करने वाला कदापि नहीं होना चाहिए।
            इस अग्नि के बल पर हम साहसी बने रहते हैं। इसके अभाव में मनुष्य का चेहरा तेजहीन दिखाई देता है। वह स्वयं को बलहीन अनुभव करता है। निर्बल व्यक्ति जरा-सी समस्या आने पर घबरा जाता है और उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं। उसे कम्पकपी छूटने लगती है। वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। उस समय अपने लिए सहारा खोजने लगता है और बहाने बनाने लगता है।
          जब तक मनुष्य स्वास्थ्य के नियमों का पालन करता रहता है तब तक उसके शरीर में ऊर्जा तत्त्व बना रहता है। शरीर में अग्नि ठीक तरह से अपना काम करती रहती है।
          जंगलों में जब आग यानी दावानल भड़कती है तब वह किसी से पक्षपात नहीं करती अपितु सभी प्रकार के हरे-भरे या ठूँठ हुए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों आदि सभी को जलाकर राख कर देती है। उसकी चपेट में आने से कोई मनुष्य अथवा कोई जीव नहीं बच सकता। सबको समान रूप से भस्मसात् कर देती है। घने जंगलों को पलभर में पलक झपकते ही राख के ढेर में बदल देती है।    
        इसी तरह समुद्र में लगने वाली आग यानी बड़वानल समुद्री जीवों को अपनी चपेट में लेती है। 'रघुवंशम्' महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने अग्नि के विषय में कहा है-
        पावकस्य महिमा स गणयते   
        कक्षवज्ज्वलति सागरेSपि य:॥   
अर्थात् अग्नि का यही महत्त्व गिना जाता है कि वह समुद्र में घास की तरह जलती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि समुद्र के पानी में लगने वाली अग्नि को बड़वानल कहते हैं जो वहाँ कभी भी, किसी भी स्थान पर जलने लगती है।
            यह अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसके बिना हम अपना भोजन सुपाच्य नहीं बना सकते। यह भी एक प्रकार से हमारी जीवनी शक्ति है। इससे छेड़छाड़ की जाए तो फिर यह बच्चे तक को क्षमा नहीं करती, सबको अपनी चपेट में ले लेती है। अत: सावधान रहना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 19 मई 2026

आत्मचिन्तन करना आवश्यक

आत्मचिन्तन करना आवश्यक 

मनुष्य को प्रतिदिन समय निकालकर आत्मचिन्तन करना चाहिए। आत्मचिन्तन का अर्थ है अपने विषय में विचार करना। यह मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। इसका यह अर्थ नहीं कर सकते कि मनुष्य केवल अपने लाभ के विषय में सोचता हुआ स्वार्थी बन जाए। अपनी अच्छाइयों और बुराइयों दोनों पर मथन करना ही इस कथन का उपयुक्त अर्थ होगा। 
          आत्मचिन्तन का हम यह अर्थ कर सकते हैं कि है अपने स्वयं के विचारों, भावनाओं, कार्यों और अनुभवों का गहराई से विश्लेषण और मूल्यॉंकन करना। बाहरी दुनिया से हटकर अन्तर्मुखी होकर, अपनी कमियों और खूबियों को समझकर, व्यक्तित्व में सुधार और आत्म-विकास करने की यह एक सचेत प्रक्रिया है।अपने कार्यों की समीक्षा करना कि वे सही थे या गलत। गलतियों से सीखकर उन्हें भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेना। 
          आत्ममन्थन करते समय अपने अन्तस् में विद्यमान बुराई को दूर करने का प्रयास ईमानदारी से करना चाहिए। उस बुराई को त्यागने का ढोंग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना तो स्वयं को धोखा देना कहलाएगा। इससे अपना हितसाधन नहीं होगा बल्कि हम स्वयं के शत्रु बन जाएँगे।
          'पद्मपुराण' में मर्हषि वेदव्यास हमें समझा रहे हैं कि-
       सर्वथा   प्रातरुत्थाय   पुरुषेण   सुचेतसा।
       कुशलाकुशलं स्वस्य चिन्तनीयं विवेकत:॥
अर्थात् बुद्धिमान को प्रात:काल उठकर विवेकपूर्वक अपने हित-अहित का विचार करना चाहिए।
दूसरे शब्दों में प्रतिदिन मनुष्य को गहन चिन्तन करना चाहिए। उसे अपने भले-बुरे का विचार करते हुए अपने हित के कार्य करने चाहिए।
           अपनी कमियों को दूर करते हुए अपनी अच्छाइयों को बढ़ाते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए धीरे-धीरे बुराइयों का त्याग करके मनुष्य अपनी आत्मोन्नति की यात्रा सुगमतापूर्वक तय करने लगता है। इस प्रकार जब उसे सही और गलत की पहचान हो जाती है तब वह गलत रास्ते पर चलकर अपने जीवन को कष्टमय होने से बचाकर स्वयं का मित्र बन जाता है।
          हमें किन-किन विषयों पर विवेचना करनी चाहिए? 'तन्त्रोपाख्यानम्' ग्रन्थ इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहता है कि अतीत का चिन्तन छोड़कर वर्तमान के बारे सोचना चाहिए-
नातिकान्तानि शोचेत प्रस्तुतान्यानगतानि चिन्त्यानि।
अर्थात् अतीत का चिन्तन नहीं करना चाहिए। जो प्रस्तुत है या समक्ष है वही चिन्तनीय है। 
          अपने अतीत की समृद्धि का बखान करते हुए मनुष्य को उसका गर्व नहीं करना चाहिए। साथ ही मद में निठल्ला होकर भी नहीं बैठ जाना चाहिए। इसी तरह अपनी पुरानी असफलताओं और मिले हुए कष्टों से व्यथित होकर मनुष्य को निराशावादी नहीं बन जाना चाहिए। ऐसे चिन्तन का कोई लाभ नहीं होता। इसलिए इसका त्याग करना चाहिए। अपना वर्तमान ही मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत होता है वही चिन्तनीय है।  
           'चाणक्यनीति:' में अन्यत्र आचार्य चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को किस-किस के विषय में चिन्तन करना चाहिए-
        क: काल: कानि मित्राणि 
             को देश: कौ व्ययाव्ययौ।
को वाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहु:॥         
अर्थात् कैसा समय है, कौन मित्र हैं, कैसा देश है, आय-व्यय कैसा है, वाहन कैसा है और मेरी शक्ति कैसी है, इस विषय पर पुन:पुन: चिन्तन करना चाहिए।
           मनुष्य यदि समय को पहचानकर उसके अनुरूप कार्य करता रहे तो उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। वह सदा सफलता के सोपानों को छू सकता है। उसे स्वयं ही ज्ञात हो जाएगा कि उसका सच्चा मित्र कौन है? और बरसाती मेंडकों की तरह टर्राने वाले मित्र कौन से है? तब वह अपने सच्चे मित्रों के साथ अपनी जीवन यात्रा का भरपूर आनन्द उठा सकता है और स्वार्थी मित्रों से अपनी रक्षा कर सकता है।
           मनुष्य अपने देश के विष्य में जानकारियाँ एकत्र करते हुए अपने आय और व्यय का सामंजस्य बिठा सकता है। इसी प्रकार वह अपने वाहन के रख-रखाव आदि पर नजर रखकर सुविधा का यथोचित लाभ ले सकता है। एवंविध अपनी शरीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों की परीक्षा करते हुए वह अपना इहलोक और परलोक सुधार सकता है।
           मनुष्य को चिन्तन आवश्य करना चाहिए पर केवल वर्तमान का। जो बीत चुका है उससे सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भविष्य में क्या होगा अथवा क्या नहीं? इस विषय में हम नहीं जानते। इसलिए उसके विषय में चिन्ता करना व्यर्थ है। अत: अपना वर्तमान सुधारने के लिए मनन करते हुए अथक परिश्रम करना चाहिए। तभी वह एक सफल मनुष्य बनकर समाज में मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 18 मई 2026

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

इन्सानी प्रवृत्ति है कि वह बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाता हैं अथवा अनदेखा करता रहता हैं। समय बीतते-बीतते उसके घावों पर मलहम लग जाती है। वह भली-भाँति जानता है कि जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी है जीवन जिसे हम सब यत्नपूर्वक जीते हैं। परिश्रम करते हैं और अपनी सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं। भूलना इसलिए भी जरूरी है ताकि हम मानसिक स्वास्थ्य को सन्तुलित रख सकें, सामान्य दिनचर्या को सुविधाजनक बना सकें और स्वतन्त्रता और विकास का आनन्द ले सकें।
          कदम-कदम पर अपनी जीत का जश्न मनाते हुए हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। उस समय हम चाहते हैं कि सारी कायनात हमारी ही खुशी में शामिल हो जाए और जब हम दुखी हों तब सारा ब्रह्माण्ड हमारे दुख में दुखी होता हुआ दिखाई दे। यद्यपि ऐसा होता नहीं है, ये तो मात्र इन्सानी भावनाऍं हैं। मनुष्य अपने सुख-दुख को ब्रह्माण्ड के साथ जोड़कर देखता रहता है।
           ईश्वर ने मनुष्य को इस प्रकृति का बनाया है कि वह शीघ्र ही हर दुख, हर परेशानी को भूलकर आगे बढ़ जाता है। यह उसके लिए बहुत आवश्यक भी है। यदि वह पुरानी सफलता-असफलता और सुख-दुख को पकड़कर बैठा रहेगा तो वह कदापि दुनिया की रेस में भाग नहीं ले सकता। अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति के परलोक गमन पर भी दुनिया का कोई काम नहीं रुकता। मनुष्य पूर्ववत खाता-पीता है, हंसता-बोलता है, अपनी खुशियॉं मनाता है, शुभ कार्यों को सम्पादित करता है।
            कुछ लोग हमारे जीवन में उस समय आते हैं जब हम टूट चुके होते हैं या जब हमें किसी की आवश्यकता होती है अथवा जब हम बिना किसी बनावट के होते हैं। उस समय जो रिश्ता बनता है, वह दिमाग से नहीं आत्मा से जुड़ता है। आत्मा से जुड़े रिश्ते समय की मार नहीं सहते, वे बस चुप हो जाते हैं पर समाप्त नहीं होते। समय हमें सिखाता है कि जो हो गया उसे भूलकर आगे बढ़ो, इसी में समझदारी है।
           दिन-दिन करके मनुष्य जन्म के बाद बचपन से जवानी की ओर बढ़ता है और फिर वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है। तदुपरान्त मृत्यु उसका वरण कर लेती है। वह हर वर्ष अपने बन्धु-बान्धवों के साथ अपना जन्मदिवस मनाकर आनन्दित होता है। पर वह भूल जाता है कि उसके जीवन का एक वर्ष और कम हो गया और मृत्यु तक पहुँचने की एक साल की दूरी उसने तय कर ली है। यह इस जीवन की सच्चाई है। हम सब लोग इस अटल सत्य से नजरें चुराते रहते हैं। हम बस यही सोचते हैं कि हम आयुप्राप्त हो रहे हैं तथा अधिक अनुभवी बनते जा रहे हैं।
          भर्तृहरि जी ने 'वैराग्यशतकम्' ग्रन्थ में जीवन के इस सत्य को बहुत ही सुन्दर शब्दों में उदाहरण सहित उद्घाटित किया है-
          व्याघ्रीव  तिष्ठति  जरापरितर्जयन्ति।
          रोगाश्च  शत्रव  इव  प्रहरन्ति  देहम्॥
          आयु: परिस्त्रवतिभिन्नघटादिवाम्भो।
          लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्॥
अर्थात् बुढ़ापा बाघ की तरह गुर्राता हुआ सामने खड़ा है, शत्रु की तरह रोग शरीर पर नित्य प्रहार करते हैं, छेदयुक्त घट की तरह आयु का नित्य क्षय हो रहा है लेकिन आश्चर्य है कि फिर भी लोग अहित आचरण कर रहे हैं।
           इस श्लोक का कथन है कि वृद्धावस्था बाघ की तरह गुर्राते हुए, मुँह बाए हमारी ओर बढ़ रही है। हमें इस बाघ से इसलिए डर नहीं लगता क्योंकि वह सिर्फ गुर्रा रहा है, हमें खाने नहीं आ रहा। इसलिए उस बाघ को हम अनदेखा करके चैन की बाँसुरी बजाते हैं। उस समय अपने झूठे अहं के कारण हम यही सोचते हैं कि जब वह हमें खाने के लिए आएगा तब हम उसे भी देख लेंगे।
          ज्यों-ज्यों हमारी आयु बीत रही है और हम वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं, हमारा शरीर रोगों का घर बनता जाता है। वह दिन-दिन करके अशक्त हो रहा है। जिस प्रकार घड़े में छेद हो जाने पर पानी बूँद-बूँद करके समाप्त होता रहता है, उसी प्रकार एक-एक दिन करके मनुष्य मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता रहता है। फिर भी मृत्यु की गोद में समा जाने के भय को छोड़कर मनुष्य हर प्रकार के अच्छे-बुरे कर्मों को करने में व्यस्त रहते हैं। न उन्हें वृद्ध होने का भय होता है और न ही मृत्यु का डर। इसीलिए करणीय-अकरणीय कार्यों को करके वे प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
            किसी की मृत्यु होने पर किसी मृत शरीर को देखकर क्षणिक वैराग्य मनुष्य के मन में आता है। कभी श्मशान जाने पर संसार की असारता का ज्ञान मन में कुछ पल के लिए अवश्य आता है। पर वह क्षणिक वैराग्य दूसरे ही पल संसार के आकर्षणों से आवेष्टित (ढक) जाता है। फिर आरम्भ हो जाते है वही दुनिया के सभी आडम्बर और ढकोसले।
           इस सबको लिखने का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि मनुष्य दीन-दुनिया को भूलकर जंगलों में जाकर तपस्या करने के नाम पर उसे छोड़ जाए। यानी मनुष्य पलायनवादी बन जाए। दुनिया में रहते हुए सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए मनुष्य को जल में कमल की तरह रहना चाहिए। तभी वह अपने मानव होने के अर्थ को सार्थक करने में सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 17 मई 2026

अन्नदाता की शोचनीय दशा

अन्नदाता की शोचनीय दशा 

किसान शब्द सुनते ही हमारे सामने सादा-सा कुर्ता और धोती पहने, बैलों की सहायता से अपने खेत में हल जोतते हुए उसकी छवि प्रकट हो जाती है। यह किसान हमारा अन्नदाता है। हमारे भोजन के लिए वह हमें अन्न देता है परन्तु उसने अपने परिवार के साथ दिन में दो समय का भोजन खाया भी है अथवा नहीं, यह कोई नहीं समझना चाहता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा अन्नदाता कितने ही दिन भूखे पेट सोने के लिए विवश होता है। उनकी दशा हमारे देश में हमेशा से ही शोचनीय रही है।
             किसानों की दुर्दशा होने का सबसे बड़ा कारण रहा है उनकी अशिक्षा और आर्थिक रूप से पिछड़ापन। हालॉंकि आज उनके बच्चे पढ़ने लगे हैं। फिर भी अभी बहुत कुछ शेष है जो उनके लिए करना आवश्यक है। बहुत से गाँव इतने वर्षों की आजादी के बाद भी अभी तक शहरों से नहीं जुड़ पाए हैं, वहाँ पक्की सड़कें नहीं हैं। दिल्ली जो भारत की राजधानी है वहाँ भी लोग बिजली और पानी के संकट से यदाकदा जूझते रहते हैं तो उन दूर-दराज के गाँवों में तो यह समस्याएँ सदा ही‌ मुँह बाए खड़ी रहती हैं।
            पहले समय में कृषि पूर्णरूपेण वर्षा पर आश्रित रहती थी। आज भी उन स्थितियों में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कृषि के लिए बहुत से आधुनिक यन्त्र बन गए हैं जिनका उपयोग किसान करते रहते हैं। परन्तु फिर भी वर्षा उनके इरादों पर पानी फेर देती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और असमय ओलावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ उनकी फसलों को बर्बाद कर देती हैं। 
            महंगाई के चलते उर्वरक, खाद और बीज इत्यादि दिन-प्रतिदिन बहुत महंगे होते जा रहे हैं। उनको खरीदने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जिसे वह साहूकार से या बैंक से कर्ज के रूप में लेता है। यदि फसल अच्छी हो गई तो कर्ज का भुगतान कर दिया जाता है। परन्तु यदि दुर्भाग्यवश फसल बर्बाद हो जाए तो फिर कर्ज चुका पाना असम्भव हो जाता है। 
           किसान अच्छी फसल की आशा में बच्चों की शादी, अथवा अन्य शुभ कार्य सम्पन्न करने की, टपकती हुई छत वाले घर की मुरम्मत आदि की योजनाएँ बनाता है। लेकिन जब आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण यदा कदा उसकी फसल ही चौपट हो जाती है तब उसकी सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं।
          पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे किसानों की जमीन के टुकड़े छोटे होते जा रहे हैं। उस पर मौसम की मार और कर्ज लिया धन उनकी कमर ही तोड़ देता है। वे असहाय हो जाते हैं। बैंकों से लिए कर्ज को न चुका पाने के कारण गुँडानुमा एजेण्ट उनके मन में इतना आतंक भर देते हैं कि आत्महत्या के अतिरिक्त उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझता।
          पहले समय में साहूकार उन अनपढ़ किसानों को थोड़े से कर्ज को न चुका पाने के कारण उनकी पीढ़ियों को ही बन्धक बना लिया करते थे।  इसी विषय से सम्बन्धित स्कूल में पढ़ी हुई  इंगलिश भाषा में लिखी कहानी 'A handful of wheat' यानी 'मुट्ठी भर अनाज' जो ऋण स्वरूप लिया गया था, उसकी याद आ रही है। इसके लेखक शायद मुलख राज आनन्द हैं। इस कहानी को याद करके आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कहानी बहुत ही हृदयस्पर्शी है।
        लेखक ने इस कहानी में किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया है। अपनी किसी आवश्यकता के कारण साहूकार से थोड़ा-सा ऋण लेता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज के अनुसार उसका बढ़ता रहता है। उसका ऋण कभी चुकाया हुआ माना ही नहीं जाता। तब पिता के द्वारा लिए गए उस ऋण को चुकाने के लिए उसके बच्चों को सारी आयु उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। साहूकारों का यह बहुत ही शर्मनाक व्यवहार कहा जा सकता है।
             पहले साहूकारों का आतंक होता था जो ब्याज के रूप में उनकी फसलें कटवाकर ले जाया करते थे और अब बैंकों का खौफ रहता है। इन‌ सबके अतिरिक्त इन छोटे किसानों के पास अनाज को सुरक्षित रखने के लिए भण्डार गृह भी नहीं होते। इन्हें औने-पौने भाव अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल को दलालों को बेचना पड़ता है। मण्डियों में जाकर अनाज बेचने पर भी उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
            सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएँ किसानों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते रहते हैं। उन सबके किए गए उपाय अभी किसानों की दशा को सुधारने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। हम सभी को भी उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उनके उत्थान के लिए मनन करना चाहिए।
            ऐसे किसान जो परिश्रम करके हमें जीवन देते हैं, हम उनके प्रति थोड़ा भी संवेदनशील नहीं हैं। वे किसान और उनके परिवारी जन दाने-दाने को तरसते हैं। हम सबका पेट भरने के लिए दिनोंदिन फाके करते हैं। हम उनके परिश्रम का मूल्य तो नहीं चुका सकते पर अन्न को सुरक्षित रखकर उनकी मेहनत का सम्मान तो कर सकते हैं। अपने झूठे अहं का प्रदर्शन करते हुए अपने घर में और अपनी की जाने वाली पार्टियों में अन्न को बर्बाद होने से हम बचा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 16 मई 2026

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति और पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मान्तर यानी सात जन्मों का होता है, ऐसा हमारी भारतीय संस्कृति मानती है। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। हमारी ऐसी मान्यता है कि शरीर पीछे बनता है पर भाग्य पहले लिख दिया जाता है। उसी प्रकार जोड़ियॉं भी ईश्वर पहले ही बनाकर मनुष्य को इस संसार में भेजता है। इस रिश्ते को सही तरीके से निभाना पति और पत्नी दोनों का ही दायित्व होता है। इसमें चूक होने की गुँजाइश घर-परिवार और समाज में कदापि मान्य नहीं होती।
            स्कूल में पढ़ते समय अंग्रेजी भाषा की एक कहानी पढ़ी थी। अब भी जब मैं उस कथा को याद करती हूं तो मन भर जाता है। इस कहानी में जिम और डैला नामक दो पति-पत्नी थे। वे दोनों सुविधा सम्पन्न नहीं थे। वे अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रहे थे। जिम के पास सुन्दर-सी सोने की एक घड़ी थी पर उसकी चेन सोने की नहीं थी। डैला चाहती थी कि जिम की घड़ी में सोने की चेन हो। पर उनके पास सोने की चेन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।   
           दूसरी ओर डैला के बाल बहुत सुन्दर थे जिनके लिए जिम एक सोने का क्लिप खरीदना चाहता था। पर धन न होने के कारण लाचार था। दोनों ही अपनी आर्थिक स्थिति के कारण बहुत मजबूर थे। चाहकर भी वे दोनों एक-दूसरे के लिए सोने की चेन अथवा सोने का क्लिप नहीं खरीद सकते थे। इन्हें खरीदना उन दोनों के बूते से बाहर था। इसलिए वे दोनों अपना मन मसोस कर रह जाते थे।
          इस प्रकार समय बीतता गया। एक दिन जिम का जन्मदिन आया। उस दिन डैला ने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन उपहार स्वरूप खरीदने की सोची। परन्तु पैसे तो उसके पास नहीं थे। वह पार्लर गई और उसने अपने सुन्दर बाल बेच दिए। उन पैसों से उसने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन खरीदी। उधर जिम ने अपनी पत्नी को रिटर्न गिफ्ट देने के लिए अपनी घड़ी बेच दी और उसके लिए सोने का क्लिप खरीद लिया।
           शाम के समय डैला ने जिम को जन्मदिन के उपहार स्वरूप सोने की चेन भेंट की। फिर जिम ने रिटर्न गिफ्ट के तौर पर डैला को सोने का क्लिप भेंट किया। यद्यपि अब सोने की चेन और क्लिप की आवश्यकता नहीं रह गई थी। अपनी-अपनी पूँजी को गँवाकर भी वे एकदम-दूसरे के प्रति समर्पण भाव से विभोर हो उठे।
          ऐसा समर्पण भाव पति-पत्नी के मध्य होना आवश्यक होता है। उन दोनों में आपसी प्रेम और विश्वास होना आवश्यक है। इसके बिना आपस में सामंजस्य नहीं स्थापित किया जा सकता। उन दोनों को दो जिस्म और एक जान की तरह जीवन व्यतीत करना चाहिए। तभी उनके जीवन में खुशियाँ सदा बरकरार रह सकती हैं।
           दोनों के सुख-दुख भी साझे होने चाहिए। उन दोनों के मध्य किसी भी स्थिति में तीसरे की गुँजाइश नहीं होनी चाहिए। आपसी विश्वास गृहस्थ जीवन की पहली सीढ़ी है। दोनों को सहनशीलता अपनानी चाहिए। यदि दोनों में से कोई एक अपने साथी से विश्वासघात करता है तब रिश्ते दरकने लगते हैं। उसका अन्त अलगाव के रूप में होता है। उनका अलग होना घर-परिवार को तोड़ देता है। मासूम बच्चे बिना किसी दोष के सबसे अधिक कष्ट भोगते हैं।
           अपने-अपने पूर्वाग्रह त्याग करके उन्हें भावी जीवन के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए। उन दोनों का व्यवहार परस्पर सहृदयतापूर्वक होना चाहिए। मन, वचन और कर्म से इस पावन रिश्ते को निभाना चाहिए। इससे आपसी मनमुटाव की गुॅंजाइश बिल्कुल नहीं रहती। पति-पत्नी दोनों में प्रेम और विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। यही गृहस्थ जीवन की पूॅंजी कहलाती है। यहॉं स्वर्ग के समान शान्ति का वातावरण रहता है। ऐसे परिवार की सुगन्ध चहुॅं ओर फैलती है।
             इस प्रकार का व्यवहार जब उन दोनों के मध्य होता है तब उनके बीच पनपने वाली सभी दूरियाँ समाप्त हो जाती हैं और उनके हृदयों के तार फिर से जुड़ जाते हैं। जिसे हम दूसरे शब्दों में टेलीपेथी कह सकते हैं। यही टेलीपेथी उनके जीवनों के जुड़ाव का प्रमाण होती है। उन्हें इसे सिद्ध करने के लिए किसी शपथ को खाने की आवश्यकता नहीं होती।
            पति-पत्नी में ऐसी प्रगाढ़ता सफल दाम्पत्य जीवन का मूल मन्त्र होती है। ऐसा घर सबके लिए एक उदाहरण बन जाता है। वहॉं धन-वैभव की यदि कभी कमी भी हो तो उनके व्यहार में कोई परिवर्तन नहीं आता। वे एकजुट होकर हर संकट से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार रहते हैं।
            हर माता-पिता को अपने बच्चों में संस्कार बचपन से ही देने चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हो वे अपने जीवन साथी के साथ, सारा जीवन एक-दूसरे की कमियों को अनदेखा करते हुए, राजी-खुशी व्यतीत करके सबके समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करें। इसी में सबका सुख-चैन निहित है।
चन्द्र प्रभा सूद