गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों की राह में काँटे बिछाने वालों को जीवन में फूल नहीं मिला करते, यह एक शाश्वत सत्य है। यदि मनुष्य दूसरों के लिए फूल बोता है तो बदले में उसे सुख यानी फूल ही मिलेंगे।इसके विपरीत बुराई करने वाले मनुष्य को उसके कर्मों का दण्ड त्रिशूल की तरह पीड़ादायक फल के रूप में वापस मिलता है। इसलिए यथासम्भव यही प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य जाने-अनजाने किसी के भी दुख का कारण न बने। 
          यह संसार एक सुन्दर बगीचे की तरह है। इसमें जैसी खेती की जाती है, फसल भी वैसी ही काटी जाती है। प्यार, मुहोब्बत, भाईचारे, विश्वास आदि के बीज बोने वाले लोगों को सत्यता: प्यार आदि मिलते हैं। सब लोग ऐसे सज्जनों पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं और उनका साथ देने के लिए सदा तैयार रहते हैं। यही उन लोगों की एक ऐसी विशेषता होती है जिसके कारण वे संसार में पूजनीय बन जाते हैं।
           इसके विपरीत ईर्ष्या, द्वेष आदि की फसल बोने वाले मनुष्यों को दुनिया से नफरत ही मिलती है। दूसरों का अहित करने वाले उन लोगों का साथ कोई भी पसन्द नहीं करता। लोग ऐसे नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों को छोड़ देने में जरा भी देर नहीं करते। ऐसे लोग धीरे-धीरे समाज से काट दिए जाते हैं। फिर वे अकेले होने लगते हैं।
           दूसरों को दुख देकर खुश होने वाले अपने जीवन में कभी भी सुख नहीं प्राप्त कर सकते। कभी-न-कभी तो उन लोगों का अन्तस् उन्हें झकझोरता ही है कि सारा जीवन उन्होंने षडयन्त्र करते हुए बिता दिया है। अपने जीवन के अन्तिम समय में जब उनका कोई भी सहायक नहीं बनता तब उन्हें इस बात का अहसास होता है। उस समय प्रायश्चित करने से भी कुछ हल नहीं निकल पाता। जो हानि हो जाती है, उसे फिर बदल पाना सम्भव नहीं हो सकता।
           जिस प्रकार कमान से निकला हुआ तीर वापिस नहीं आता, उसी प्रकार उन कुविचार रखने वालों की भी स्थिति होती है। सुख और दुख तो मनुष्य के पास उसके जीवन में कर्मभोग फल होते हैं जिन्हें भोगे बिना उनसे छुटकारा सम्भव नहीं होता। बड़े दुख की बात है कि कुछ लोग उस स्थिति में भी अपना हित साधने में लगे रहते हैं। शायद उन्हें कोई डर नहीं बताता। 
            मनीषी जन मानते हैं कि दुख और कष्ट भगवान की बनाई हुई ऐसी प्रयोगशाला हैं जहाँ मनुष्य की योग्यता और आत्मविश्वास को परखा जाता है। दुख-तकलीफ के समय मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को डिगने नहीं देना चाहिए बल्कि दृढ़तापूर्वक कुमार्ग का सहारा लिए बिना कष्टदायक समय को विनयपूर्वक ईश्वर की उपासना करते हुए और स्वाध्याय करते हुए गुजर जाने देना चाहिए जैसे तूफान आने पर पेड़ झुककर अपने ऊपर से उसे गुजर जाने देते हैं। मनुष्य दुखों की अग्नि में तपकर ही कुन्दन बनकर उभरता है।
            यह बात हर व्यक्ति को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुख भोगने वाला समय बीतने के बाद आगे जाकर मनुष्य फिर से सुखी हो जाता है परन्तु दूसरों को दुख देने वाला मनुष्य अपने जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकता। दुखी व्यक्ति के मन से निकलने वाली हाय उसे कभी चैन से नहीं बैठने देती। कबीरदास जी के निम्न दोहे को भी झुठलाया नहीं जा सकता -
       जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
     तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं तिरसूल॥
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति आपके जीवन में कष्ट उत्पन्न करता है तो आप प्रतिशोध लेने के बजाय उसके साथ प्यार और विनम्रता का व्यवहार करें। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रास्ते में काँटे बोने वालों के लिए अपनी ओर से फूल बोने चाहिए। कबीरदास जी का कहना है कि तुम्हें इस नेक कार्य के बदले फूल मिलेंगे और उसे काँटे मिलेंगे। मनीषी इसीलिए समझाते हैं -
          जैसा करोगे वैसा भरोगे
                  अथवा 
         जैसी करनी वैसी भरनी
 इसके अतिरिक्त भी कहते हैं-
      बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाए।
अर्थात् इन उक्तियों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, उसके बदले में वैसा ही पाता है। बबूल का पेड़ बोकर आम के फल की आशा करना व्यर्थ है। 
           दूसरों को कष्ट की सौगात देने वालों को रिटर्न गिफ्ट में कष्ट और परेशानियाँ ही मिलेंगी। इसके विपरीत अपने जीवन में दूसरों को खुशियाँ बाँटने वालों को बदले में खुशियाँ ही मिलती हैं। इस सत्य को अपने जीवन में ढाल लेना चाहिए।
            एक सज्जन व्यक्ति और एक दुर्जन व्यक्ति की वैचारिकता में यही अन्तर होता है। दुर्जनों के चेहरे पर कठोरता का तथा मन में क्रूरता का भाव होता है और सज्जनों के चेहरे व हृदय में सरलता का भाव होता है।
          सार रूप में हम कह सकते हैं कि दूसरों को कष्ट की भट्टी में धकेलकर उनके शत्रु बनने के स्थान पर वास्तव में हमें उनके आँसू पौंछने वाला एक सच्चा मददगार बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत हर मनुष्य को होती है। इसीलिए वह अपने व्यक्तित्व को निखारने में जुटा रहता है। हर प्रकार के उपाय करता है। विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करता है। यह रंग-रूप मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिलता है। उसमें उसकी मर्जी शामिल नहीं होती। वह चाहकर भी अपनी इच्छानुसार अपने शरीर को नहीं बना सकता।
         एक आकर्षक व्यक्तित्व का अर्थ मात्र सुन्दर दिखना नहीं होता। यह शारीरिक हाव-भाव, संवाद कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सकारात्मक सम्बन्ध बनाने की क्षमता का समग्र मिश्रण होता है। मनुष्य की ऊर्जा और व्यवहार उसके बोलने से पहले ही उसका परिचय करा सकते हैं जिससे हर बातचीत का माहौल तय हो जाता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, सक्रिय रूप से सुनने की क्षमता, मुस्कान और अपनी गलतियों को स्वीकार करने के साहस से यह निर्मित होता है। इसकी व्यक्तिगत और पेशेवर सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यकता होती है। 
           यद्यपि कुछ लोग शरीरिक दोषों को सुधारने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं परन्तु वह तो कोई स्थायी हल नहीं है। केवल शारीरिक सौन्दर्य के कारण मनुष्य इठलाता फिरता है। उसे इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ये रूप-सौन्दर्य क्षणिक होता है। कहने का तात्पर्य है यह कि सुन्दरता नश्वर है, अनश्वर नहीं। 
           रोग से आक्रान्त होने पर शरीर बदसूरत हो सकता है। आयु के एक पड़ाव पर शरीर पर झुरियाँ आ जाने से उसका वह रूप खो जाता है जिस पर वह गर्व करता है। इससे भी बढ़कर किसी रोग के कारण भी शरीर बेडौल हो सकता है। इसमें अपना कोई दोष न होते हुए भी तब वह दूसरों से नजरें चुराने लगता है।
            इसलिए मात्र शरीर के सौन्दर्य को देखने के स्थान पर मनुष्य की आन्तरिक सुन्दरता परखी जानी चाहिए। अपने ज्ञान, अपनी योग्यता के बल पर अग्रणी रहने वाले व्यक्तित्व देश अथवा विदेश सर्वत्र पूजनीय होते है। वास्तव में सुदर्शन व्यक्तित्व उन्हीं लोगों का ही माना जाता है और वही समाज के प्रेरणास्त्रोत और आदर्श होते हैं।
            इस महत्त्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचने के लिए वे समय रहते अथक परिश्रम करके ज्ञानार्जन करते रहते हैं। फिर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन होते हैं। बहुत से लोग उनके सज्जन और दुश्मन बन जाते हैं। उनकी योग्यता की परख करने वाले उनके मित्र बनते हैं।
            इसके विपरीत उनकी उन्नति से ईर्ष्या करने वाले उनके साथ अपनी शत्रुता निभाते हैं। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने जीवन में वे स्वयं तो कुछ नहीं कर पाते यानी असफल रहते हैं। इसलिए उच्च पदासीन मेधावी लोगों की ओर देखकर, उनकी बुराई करके चर्चा में बने रहने के लिए अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। अन्यथा इन बुरे लोगों की ओर किसका ध्यान जाएगा? 
             ये लोग फलदायी वृक्ष की भाँति होते हैं जिनका संसर्ग पाकर हर व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ समझता है। फलों से लदे हुए वृक्षों पर लोग पत्थर फैंककर मारते हैं और स्वादिष्ट फल खाकर आनन्द लेते हैं। इन पर कटाक्ष करने वाले उन लोगों को छोड़कर अन्य बुद्धमान इनसे मार्गदर्शन रूपी मधुर फल को पाकर लोग लाभान्वित होते हैं।
           दुष्ट लोग सूखे पेड़ की तरह होते हैं। ठूँठ बने वृक्ष जरा-सी चिन्गारी गिर जाने जल जाते हैं। इसी तरह वे दुर्जन सफल लोगों से केवल ईर्ष्या ही करके अपने आप को जलाने का कार्य करते हैं। जैसे उन सूखे वृक्षों पर पत्थर मारने का कोई लाभ नहीं होता, उनसे न फल मिलते हैं और न ही छाया। उसी प्रकार इनकी संगति में लाभ न के बराबर मिलता है पर हानि अधिक होती है।
           मनुष्य को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति दयालु व सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। सक्रिय रूप से दूसरों की बातें सुनने की क्षमता होनी चाहिए और समझना चाहिए कि केवल अपने बोलने पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य को विनम्रता से बात करनी चाहिए, शालीन रहना चाहिए और मुस्कुराते रहना चाहिए। मनुष्य को अपनी स्वच्छता, पहनावे और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अपने काम के प्रति उत्साहित रहना चाहिए। मनुष्य के मन में निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।
            हर मनुष्य को उसके जीवन काल में अपने आप को साबित करने का एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस अवसर का लाभ उठा लेते हैं वे अपने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा लेते हैं। उस अवसर को किसी भी कारण से चूकने वाले रेस में पिछड़कर आयु पर्यन्त नाकामयाबी का कलंक ढोते हैं। हर व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह अपने व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

परिवार की एकसूत्रता

परिवार की एकसूत्रता

परिवार जब तक एकसूत्र में बॅंधा रहता है तब तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी टिक नहीं सकता। कोई भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी लोग उस परिवार की एकता से घबराते हैं। उस समय उसमें सेंध लगा पाना बहुत कठिन होता है। दूसरे लोगों को पता होता है कि यदि वे इस परिवार का किसी भी प्रकार अहित करना चाहेंगे तो सभी परिवारी जन उन पर टूट पड़ेंगे। तब उनका वहॉं से बचकर निकलना बहुत कठिन हो जाएगा।
            इसके विपरीत परिवार के टूटकर बिखरते ही स्वार्थी लोगों की बन आती है। वे उन सभी को अलग-अलग बहला-फुसलाकर अपना हित साधने में जुट जाते हैं। इसके लिए वे उन सबको हानि पहुँचाने से बाज नहीं आते। इसलिए वे नए-नए तरीके खोजने‌ लगते हैं। इस प्रकार कभी-न-कभी वे उनके चंगुल में फंसे जातै हैं और अनावश्यक ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर बैठते हैं। जिसका बाद में उन्हें पश्चाताप भी होता है।‌ परन्तु जब हानि हो जाती है तो उसके बाद उसका कोई लाभ नहीं होता।
           इसी विषय में एक दृष्टान्त देखते हैं। किसी समय में एक व्यक्ति के चार बेटे थे। उसे सभी भाग्यशाली मानते थे। वह अपने बच्चों के नित्य के लड़ाई-झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। समय बीतते जब वह मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी तब वह उदास हो गया। तब उस मरणासन्न अवस्था में भी बच्चों के आपसी व्यवहार के कारण उसे चैन नहीं मिल रहा था। उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा, "जाओ, जाकर कुछ लकड़ियाँ लेकर आओ।" 
            चारों बेटे पिता के आदेश के अनुसार ही लकड़ियाँ लेकर उपस्थित हो गए। उन्होंने पूछा, "पिताजी, इन लकड़ियों का क्या करना है?"
           पिता ने उनसे कहा, "इन लकड़ियों को तोड़ दो।"
             वे लोगबहुत ही सरलता से वे उन्हें तोड़ने लगे। तब पिता ने उन चारों बेटों से कहा, "इन सारी लकड़ियों का एक गट्ठर बना दो।"
            बच्चों ने पिता के आदेश का पालन किया और उन लकड़ियों का एक गट्ठर बना दिया। पिता ने उनसे कहा, "अब इस गट्ठर को तोड़ दो।"
           चारों बेटों ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उस गट्ठर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए।
           उस समय पिता ने चारों को समझाया और मिल-जुलकर रहने के लाभ बताते हुए कहा, "यदि तुम चारों  भाई मिल-जुलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हारा अहित करने के लिए तुम लोगों में फूट नहीं डाल सकता। जब तक वे चारों एक बॅंधी हुई मुट्ठी की तरह रहेंगे तो दूसरे उनका बुरा करने के लिए दस बार सोचेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि चारों मिलकर उसे परास्त कर देंगे।यदि वे चारों जीवन में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो दूसरे इस बात का लाभ उठाएँगे।"
           बच्चों को यह बात समझ आ गई और तब उन्होंने अपने पिता को वचन दिया कि वे भविष्य में मिलकर रहेंगे।
          इसी प्रकार जब तक झाडू एक सूत्र में बॅंधी रहती है तब तक वह कचरा साफ करती है। परन्तु जब वही झाडू सूत्र के टूट जाने से बिखर जाती है तब खुद ही कचरा बन जाती है। उस समय उस अनावश्यक कचरे को उठाकर लोग कूड़ेदान में फैंक देते हैं। यानी वही बिखरे तिनके सबके लिए असह्य हो जाते हैं।
          इसलिए हमें हमेशा परिवार में एक मुट्ठी की तरह बॅंधकर, मिल-जुलकर रहना चाहिए। आपसी द्वन्द्वों के कारण बिखरकर दूसरों की नजर में आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला शिकार बनने से बचना चाहिए। इसी में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा होती है।
         अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। यह मानना चाहिए कि परिवार का हित साधने में ही सबका भला होता है। मन की शुद्धता के लिए लोग सप्ताह के किसी भी दिन उपवास रखते हैं और अन्न का त्याग करते हैं। होना यही चाहिए कि अपने मन की शुद्धि के लिए अपने परिवार को तोड़ने वाले कुविचारों का त्याग करके उसे तोड़ने के स्थान पर जोड़कर रखने का यत्न करना चाहिए। 
          परिवारी जनों के प्रति मन से ईर्ष्या और द्वेष के भावों को दूर करके अपने हृदय को सरल और सहज बनाना चाहिए। सभी सदस्यों को अपने अहं का बलिदान करके परिवार की एकजुटता को बनाए रखना चाहिए। इससे बुजुर्गों और बच्चों में होने वाली अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है। अत: अपने परिवार हितों को सर्वोपरि मानते हुए थोड़ा-सा धैर्य रखना चाहिए। इसके लिए विवेकी बनकर यदि अपने स्वार्थों की बलि भी देनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

भौतिक पूॅंजी के साथ सुविचारों की पूॅंजी बढ़ाऍं

भौतिक पूँजी के साथ सुविचारों की पूँजी बढ़ाऍं

मनुष्य जीवन भर अपनी पूँजी बढ़ाने की फिराक में रहता है। ऐसा कोई अवसर नहीं चूकता जिससे उसकी पूँजी में बढ़ोत्तरी हो सके और उसका धन दिन-प्रतिदन द्विगुणित होता रहे। इसके लिए अपने धन को बैक में फिक्सड कराता है, स्वर्ण आदि के बाँड खरीदता है, उसे शेयर मार्किट में लगाता है, नए व्यापार में उसे इन्वेस्ट करता है। और भी न जाने क्या-क्या उपाय अपने जीवन काल में करता रहता है?
    मनुष्य हर हाल में दूसरों से आगे निकलकर विजयी कहलाना चाहता है। इसके लिए घर-परिवार की परवाह किए बिना दिन-रात का सुख-चैन होम कर देता है। माता-पिता, पत्नी-बच्चों, बन्धु-बान्धवों तक सबको भुलाकर पूँजी को बढ़ाने के लिए अपने एकसूत्री मिशन पर आगे-आगे बढ़ता ही जाता है। तब उसके पास पीछे मुड़कर देखने के लिए भी कोई समय नहीं होता।
      उस संघर्ष काल में उसका अपना समय भी उसके हाथ से फिसल जाता है। उसके जीवन में फिर एक समय भी ऐसा आ जाता है जब अथक परिश्रम से कमाई हुई मनचाही दौलत उसके पास एकत्र हो जाती है पर अपनों का साथ छूट जाता है। तब वह हैरान रह जाता है और पश्चाताप करता है कि यह उसने क्या कर डाला? उसके हाथ में उस समय कुछ भी नहीं बच पाता। वह मानो खाली हाथ रहकर दूसरों का मुँह ताकता रह जाता है।
      उस भागमभाग में वह इस सत्य को भी भूल जाता है कि उसकी वास्तविक पूँजी उसके अपने बन्धु-बान्धव हैं। उनसे भी बढ़कर उसके अपने सद् विचार हैं, उसकी नेक करनी है। धन-दौलत और ऐश्वर्य तो सब इस लोक की कमाई है जो परलोक में उसके साथ नहीं जाते। जहाँ आँखे बन्द हुईं सब कुछ मानो समाप्त हो जाता है। उसके सत्कर्म और उसके विचार रूपी पूँजी जन्म-जन्मान्तरों तक उसके साथ रहती है। उन्हीं के अनुसार ही मृत्यु के पश्चात उसे पुनर्जन्म मिलता है।
      जैसे-जैसे कर्म मनुष्य करता रहता है वैसा-ही-वैसा फल उसे मिलता है। न उससे कम और न उससे ज्यादा। ईश्वर के न्याय में किसी प्रकार की हेराफेरी अथवा भाई-भतीजा वाद नहीं होता। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। इसलिए वहाँ पर बस केवल फेयर गेम होती है।
      इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह धन-वैभव मोहिनी माया है। वह आज एक के पास है तो कल दूसरे के पास चली जाती है। उसके लिए राजा और रंक सब एक समान हैं। आज पैसा जेब से निकालो तो वह दूसरे की जेब में चला जाता है और उसकी पूँजी को बढ़ाता है।
      इसलिए मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन न होकर उसके अपने विचार होते हैं। धन तो खरीददारी करते समय दूसरों के पास चला जाता है। उसके सद् विचार तब तक उसका साथ नहीं छोड़ते जब तक वह स्वयं कुमार्ग पर चलने के लिए उन्हें न छोड़ दे। ये उसके अपने पास उसकी जमा पूँजी बनकर ही रहते हैं। यह पूँजी केवल इसी जन्म में शेष नहीं रह जाती बल्कि जन्म-जन्मान्तरों में कमाई हुई पूँजी के जुड़कर उसमें वृद्धि करती है। इस तरह हमारे सद् विचार हमारी आध्यात्मिक उन्नति करते हुए हमें महान बनाते हैं।
      ज्यों ज्यों वह अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करके, सज्जनो की संगति करके और ईश्वर की आराधना करके उनका संचय करता जाता है, त्यों त्यों वे उसे आम साधारण जन से ऊपर उठाकर महामानव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं। फिर वह समाज में शिरोमणि पद प्राप्त कर लेता है। दुनिया उसके पीछे चलती है। 
      अत: अपनी भौतिक पूँजी अवश्य बढ़ाइए पर साथ ही अपने सुविचारों की पूँजी बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 12 अप्रैल 2026

ईश्वर वहीं देता है जो हमारे लिए अच्छा है

ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा है 

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। उसे हम लोगों की यह साधारण बुद्धि नहीं समझ सकती। पता नहीं उसके कितने हाथ हैं जो पूरे संसार के असंख्य जीवों को झोली भर-भरकर देता है। यानी छप्पर फाड़कर देता है। जब लेने पर आता है तो घर के दाने भी बिक जाते हैं।
          वह परम न्यायकारी है। किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। उसकी अदालत में जो फैसले किए जाते हैं, उनकी अन्यत्र कहीं सुनवाई नहीं होती। सत्कर्म करने वालों को वह हर तरह से मालामाल कर देता है। दुष्कर्म करने वालों को माफ नहीं करता।उन्हें दुखों और तकलीफों में तपाकर कुन्दन बनाता है। इसीलिए उसकी लाठी की आवाज नहीं होती।
           वह बारबार हमें हर काम को करने से पहले चेतावनी अथवा प्रोत्साहन देता रहता है पर हम कानों में रुई डालकर बैठे रहते हैं। उसके समझाने अथवा इन्कार करने का हम लोगों पर कोई असर नहीं होता। तभी हम हर समय बौखलाए हुए से रहते हैं।
           एक बच्चा हर उस वस्तु के लिए अपने माता-पिता से जिद करता है जिसे वह अपने मित्र, पडौसी अथवा किसी दुकान पर देखता है। यह तो आवश्यक नहीं कि माता-पिता उसकी माँगी हुई सारी वस्तुएँ खरीद दें। कुछ ही वस्तुएँ वे उसे लेकर देते हैं शेष के लिए मन कर देते हैं या बहला देते हैं। वे वही वस्तुएँ उसे खरीदकर देते हैं जिनकी उसके जीवन के लिए वाकई उपयोगिता होती है।
           बच्चों की तरह हम लोगों को भी हर वह वस्तु चाहिए होती है जो दुनिया में किसी के भी पास होती है, चाहे उसकी हम आवश्यकता हो अथवा न हो। वह परम पिता परमेश्वर भी हमारी सारी जायज-नाजायज माँगों में से वही हमें देता है जो हमारे पूर्वजन्म कृत हमारे कर्मों के अनुसार हमें मिलनी चाहिए। उससे न कम और न ज्यादा। हम है कि अनावश्यक हठ करते हुए परेशान रहते हैं।
         ईश्वर वह कभी नहीं देता जो हम सबको अच्छा लगता है। हमारा क्या है? हमें हर चीज अच्छी लगती है। मनुष्य का वश चले तो वह चाँद को लाकर अपनी दीवार पर सजा ले। सूर्य के प्रकाश को अपने घर में कैद करके उसे आगे न जाने दे। बाकी सारी दुनिया चाहे अंधेरे में ठोकरें खाती रहे। इसी तरह नदियों का सारा पानी भी किसी को न लेने दे। यानि सारी प्रकृति पर अपनी सत्ता कायम कर ले। वह स्वार्थी बनकर दूसरे के मुँह में जाता हुआ निवाला भी छीनकर खा ले और उसे भूखा मरने के लिए छोड़ दे।
            ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। हमारी योग्यता और भाग्य के अनुसार ही वह हमें देता है। यदि हमारे भाग्य में नहीं हो तो वह किसी-न-किसी रूप से हमारे हाथ से निकल जाएगा। जैसे बन्दर के गले में मोतियों का मूल्यवान् हार डाल दिया जाए तो वह उसे तोड़कर फैंक देगा। उसी प्रकार हम सभी अज्ञ मनुष्य अपनी मूर्खताओं के कारण उस मालिक द्वारा प्रदत्त नेमतों का लाभ नहीं उठा पाते। अपने दुर्भाग्य के कारण उन्हें व्यर्थ गंवा देते हैं।
          यहाँ मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक लकड़हारे की ईमानदारी और उपकार पर प्रसन्न होकर राजा ने उपहार स्वरूप उसे चन्दन का वन दे दिया। उस मूर्ख को उस चन्दन का मूल्य ही ज्ञात नहीं था। इसलिए अमूल्य चन्दन भी उसके भाग्य को नहीं पलट सका। यानि उसकी गरीबी को दूर करने में सफल नहीं हो सका। वह वहीं-का-वहीं रह गया। जब राजा को उसकी मूर्खता का पता चला तो उसने माथा पीट लिया।
            यह उसकी दयानतदारी है जो हमें जीवन में मायूस नहीं करता। वह बिना माँगे नित्य ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। यह हमारी सूझबूझ पर निर्भर करता है कि हम अपनी झोली में मालिक के द्वारा दिया गया कितना खजाना समेट सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

गलती करना मानवीय स्वभाव

गलती करना मानवीय स्वभाव 

मनुष्य का अपने जीवन काल में अनेक लोगों से वास्ता पड़ता है। सभी लोग अलग-अलग स्वभाव व कार्यक्षेत्र के होते हैं। कुछ लोगों की मधुर स्मृतियाँ उसके जीवन की पूँजी बन जाती हैं। उन्हे जीवन में प्राय: याद करके वह आनन्द से सराबोर हो जाता है। कुछ लोगों के साथ होने वाले अपने कटु अनुभवों के कारण उन्हें याद करके उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है। उन्हें वह दुस्वप्न समझकर भूलने की नाकामयाब कोशिश करता है।
             अलेक्जेंडर पोप का यह प्रसिद्ध कथन जीवन का मूलमंत्र है -
          गलती करना मानवीय स्वभाव है,
        क्षमा करना ईश्वरीय।   
गलतियाँ सीखने और आगे बढ़ने का हिस्सा हैं। खुद को और दूसरों को माफ करना मानसिक शान्ति और प्रगति के लिए आवश्यक है।
            यह सत्य है कि मनुष्य मशीन नहीं है। अतः उससे गलतियाँ स्वाभाविक रूप से होती हैं। गलती करना अपराध नहीं है बल्कि उससे सीखकर सुधार करना महत्वपूर्ण होता है। अपनी गलतियों के लिए स्वयं को कोसने के स्थान पर उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना  बुद्धिमानी कहलाती है। अपनी गलती को स्वीकार करना मनुष्य की महानता का प्रतीक होता है। उसे न मानना अथवा बार-बार दोहराना मूर्खता कहीं जा सकती है। अपनी गलतियों का विश्लेषण करके ही हम अपनी कार्यक्षमता में सुधार कर सकते हैं। 
            हर मनुष्य का स्वभाव ऐसा नहीं होता कि वह उनका प्रतिकार करे अथवा उनके मुँह पर जूता मारने जैसा व्यवहार करे। उस स्थिति में वह अपने भीतर-ही-भीतर कुढ़ता रहता है। यह पिष्टपेषण उसे चैन नहीं लेने देता और वह असहज होने लगता है। इस तरह उसके दिन-रात की मानसिक शान्ति भंग होने लगती है। यह स्थिति किसी भी तरह सराही नहीं जा सकती।
            हमारे मनीषी इसीलिए समझाते है कि दिल में बुराई रखने से बेहतर है उस नाराजगी को प्रकट कर दो। ऐसी विकट परिस्थिति में जहाँ दूसरों को समझाना कठिन हो जाए वहाँ स्वयं को समझा लेना ही बेहतर होता है। मनुष्य को आत्मविश्लेषण करते रहना चाहिए। इससे यह पता चल जाता है कि गलती सामने वाले की थी या हमीं से कहीं कोई चूक हो गई।
          प्रसन्न रहने का सीधा-सा मन्त्र यही है कि आशा या उम्मीद केवल अपने आप से रखी जाए, किसी अन्य से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर प्राय: निराशा ही हाथ लगती है। जितनी अपनी सामर्थ्य है उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिल पाती है। बहुत बार हम स्वयं ही अपनी उम्मीद के अनुसार सफलता पाने से चूक जाते हैं।
           जब हम स्वयं अपनी आशा और विश्वास पर खरे नहीं उतर पाते तब हमें यह सोचना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति भी इन्सान है, उससे भी चूक हो सकती है। इसलिए हमें दूसरों से नाराज नहीं होना चाहिए। सहृदयतापूर्वक चिन्तन करने पर मन में दूसरों के प्रति आने वाली दुर्भावनाएँ स्वयं ही किनारा कर लेती हैं। इससे दूसरों के लिए मन में जमी ईर्ष्या व क्रोध रूपी धूल की परतें साफ होने लग जाती हैं और हमारा मन दर्पण की तरह चमकने लगता है।
           मेरा विचार है कि जब दो लोगों में किसी भी विषय पर टकराव हो तो उसे आमने-सामने बैठकर सुलझा लेना चाहिए। अपने मन में दुराग्रह पाल करके बैठने से अच्छा है कि अपनी नाराजगी के कारण को प्रकट करके उसे दूर कर देना चाहिए। ऐसा करने से सम्बन्धों में आने वाला मनमुटाव दूर हो जाता है और वे लम्बे समय तक बने रहते हैं।
            सम्बन्ध कोई भी हो, चाहे माता-पिता का हो, पति-पत्नी का हो, फिर दोस्तों-रिश्तेदारों के मध्य हो अथवा कार्यालयीन साथियों का हो, उन सबमें पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है। अपने मनों में कभी भी, किसी भी कारण से दरार नहीं आनी चाहिए। उसके कारण आने वाली दूरी को पाटना असम्भव तो नहीं परन्तु कठिन अवश्य हो जाता है।
          यदि सम्बन्धों में तनाव बना रहेगा और उसे दूर करने का प्रयास नहीं किया जाएगा तब सभी प्रभावित लोगों के मनों को अतीव कष्ट होगा। यह स्थिति किसी भी सहृदय के लिए भी सुखद नहीं कही जा सकती। सबसे बड़ी बात कि सहजता और सरलता का वातावरण बनाने में आई बाधा को सभी दूर करना चाहते हैं। इसके मूल में सभी पक्षों का अहं आड़े आ जाता है जो समझौता करने से इन्कार कर देता है।
         गलती करना मानवीय प्रकृति है, इसे सदा याद रखना चाहिए। यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे स्वीकार करते हुए यदि क्षमाशील बना जाए तो दूसरों को मानसिक सन्ताप देने के स्थान पर उन्हें उन्हीं की गलती का अहसास कराते हुए अपनी विशालहृदयता का परिचय देना चाहिए। हर व्यक्ति दूसरों की उम्मीद पर खरा नहीं हो सकता। अतः दूसरों से नाउम्मीद होने के स्थान पर स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

स्वार्थ को हावी न होने दें

स्वार्थ को हावी न होने दें 

अपने झूठे अहं के कारण जो मनुष्य दूसरों की सहायता नहीं करता, वह अन्ततः खाली हाथ रह जाता है। वह चाहे कितनी ही सुख-समृद्धि जुटा ले पर उसे मानसिक सन्तोष नहीं मिलता। वह सदा ही किसी-न-किसी कारण से भटकता रहता है। यह भटकाव उसे आजीवन परेशान करता रहता है। वह उसके सुख-चैन पर सदा घात लगाए बैठा रहता है। मनुष्य यदि दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से तत्पर हो जाए तो उसके बिना माँगे ही उसकी झोली में सब कुछ आ जाता है।
               एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक बार देवताओं और असुरों दोनों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया। जब वे दोनों आ गए तो उन दिनों गुटों को अलग-अलग मेज पर भोजन करने के लिए बिठा दिया गया। उनके सामने एक शर्त रखी गई, "उनकी बाहों में खप्पचियाँ बाँधी जाएँगी और उन सबको बॅंधे हुए हाथों से ही उन्हें भोजन समाप्त करना है।" 
           फिर उनको खप्पचियाँ बाँध दी गईं और फिर उनके समक्ष भोजन को परोस दिया गया। उन्हें खाना खाने के लिए आदेश देते हुए कहा गया, "अब आप सब भोजन कीजिए।"
            देवताओं और असुरों दोनों ने बहुत प्रयास किया परन्तु बाहें न मोड़ पाने के कारण वे खाना खाने में सफल नहीं हो पाए। वे चम्मच में खाना भरकर मुँह की ओर ले जाते तो बॅंधे हाथों के कारण खाना उनके मुँह में न जाकर जमीन पर गिर जाता। अब वे दोनों ही परेशान होने लगे, उनके समक्ष एक ही समस्या थी, "अब खाना कैसे खाया जाए?"
             असुरों की प्रकृति होती है कि वे कभी मिल-जुलकर रह नहीं पाते, अपने अहं के कारण सदा झगड़ते ही रहते हैं। यहाँ भी मिलकर खाने के विषय में वे असुर सोच ही नहीं पाए। उनका भोजन नीचे धरती पर गिरकर बिखरता हुआ समाप्त हो गया और वे बिनखाए भूखे ही उठ गए।
              दूसरी ओर देवता थे जो सहिष्णु और सबके हितचिन्तक होते हैं। उन्होंने बहुत विचार किया। फिर उन लोगों ने मिलकर एक उपाय सोचा और उस पर अमल करने लगे। सभी देवता गण आमने-सामने होकर बैठ गए। चम्मच में भोज्य लेते और सामने वाले के मुँह में डालते। इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते हुए ही उन्होंने भरपेट भोजन का आनन्द लिया। इस प्रकार देवताओं की बुद्धिमानी और परोपकार की भावना के कारण उनका भोजन बिल्कुल व्यर्थ में नष्ट नहीं हुआ और अपनी मेज से वे तृप्त होकर उठे। 
              यह कथा हमें यही समझाती है कि दूसरों के हित की चिन्ता करने पर अपना हित स्वयं ही सिद्ध हो जाता है। ईश्वर का न्याय है - 
           इस हाथ दो और उस हाथ लो।
बार-बार हम इस सत्य को भूल जाते है और स्वार्थ के हाथों विवश हो जाते हैं। यह स्वार्थ हमारी कामनाओं की पूर्ति का मात्र साधन नहीं है अपितु हमें मूर्ख बनाकर दिन-रात हमें ठगता रहता है। इस तरह हम भी अनजान बनकर अपना तमाशा स्वयं ही बन जाते हैं।
             मनुष्य जितना अधिक 'स्व' तक ही सीमित रहता है, उसे परेशानियो का सामना करना पड़ता है। परन्तु जब वह 'स्व' से ऊपर उठकर 'पर' यानी दूसरों के बारे में सोचना आरम्भ करने लगता है तो उसे सहज ही वह सब प्राप्त हो जाता है जिसे वह अपनी कल्पना में ही पाता रहता है। 
            इसीलिए हमारे मनीषी व्यष्टि(एक) से समष्टि(समूह या अनेक) की ओर चलने की बात करते हैं। यही कारण रहा होगा कि हमारे शास्त्रों में विश्व बन्धुत्व की परिकल्पना ककी गई। इसीलिए कहा जाता है- 
               वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् सारी पृथ्वी अपना घर है। 
             इस विचारधारा में सबको साथ लेकर चलने और मिल-जुलकर रहने की भावना बलवती होती है। हर मनुष्य को अपने घर-परिवार के आगे कुछ भी नहीं दिखाई देता। उन्हीं के लिए ही वह जीता है और सारा जीवन खटता रहता है। 
              स्वार्थ को हावी न होने देने के लिए परोपकार को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। सन्तुलित जीवन के लिए जरूरी है कि निजी स्वार्थ को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए।  जिससे 'मैं' और 'हम' के बीच सन्तुलन बना रहेजब मन में स्वार्थपरक विचार आने लगें तो वहीं रुक जाना चाहिए और रिश्तों की अहमियत को समझने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य को सदा यह समझना चाहिए कि  समाज के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है जिससे स्वार्थ स्वतः ही परोपकार में बदल जाएगा। 
           अतः सम्पूर्ण संसार को यदि मनुष्य अपना परिवार ही मान ले तो सारे फसाद की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। तब हर ओर से हम शुभ की ही कामना करेंगे। तब कोई स्वार्थ किसी पर हावी नहीं होगा। सब एक दूसरे का हित साधेंगे और सहायता करेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद