सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

धन और बिमारी की चाल

धन और बिमारी की चाल

कुछ समय पूर्व विशाल वर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
             यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैं। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और उसे दिन-रात ही परेशान करते हैं। उस समय हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं, उसी तरह पलक झपकते ही वे चले भी जाएँ। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और पहले हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं । हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ते हैं। फिर हमने समय और धन को खर्च करवाकर वापिस लौटते हैं।
          बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में प्रत्येक मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा या अनिच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को हम स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है। परिवार हमारे साथ होता है। सभी परिवारी जन हमारे कष्ट में हमारे साथ खड़े होते हैं, वे चिन्ता करते हैं। वे अच्छे से अच्छा इलाज करवाते हैं। वे धन और समय भी व्यय करते हैं। पर हमारा दुख, हमारी तकलीफ नहीं बॉंटे सकते।
             सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्वजन्मों में बोयी होती है, वैसी ही तो काटनी पड़ती है। यानी उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होते हैं। इन सबसे बचना किसी भी तरह से सम्भव ही नहीं होता। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
        बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है, वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है। उस कष्ट के समय हम कितना भी रोना-धोना कर लें अथवा चिल्ला लें, उससे कुछ भी नहीं होता। उस समय बस अपने सभी जनों को हम परेशान करने का कारण मात्रा बन जाते हैं।
            अब हम धन की बात करते हैं। धन कमाने के लिए सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। वह रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह अथक परिश्रम करता है तब कहीं जाकर वह अपना और अपने घर-परिवार का पालन-पोषण कर पाता है। 
             कहते हैं पानी की एक-एक बूँद को डालते रहने से मटका भर जाता है, उसी प्रकार एक-एक पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात् कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है तब जाकर मनुष्य अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर पाता है। उस धन से वह अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा के बारे साधन जुटाने में समर्थ होता है।
           खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान को किसी भी तरह के नशे अथवा रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बर्बादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं। वैसे भी सयाने कहते हैं कि यदि धन गलत तरीकों से कमाया जाए तो वह लम्बे समय तक मनुष्य के पास टिकता नहीं है। अनुचित साधनों से कमाया हुआ धन अपने साथ बहुत-सी बुराइयों को लेकर आता है।
          अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली तो हम इस जीवन में नहीं बना सकते परन्तु अपने वर्तमान जीवन में हमें ऐसा प्रयास अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें दबोचने न पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस जन्म में हमें अपने साधनों की शुचिता की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।
           इस प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए। इसके अतिरिक्त खरगोश की चाल से आई हुई बिमारी हमें नैतिक और शारीरिक तौर पर तोड़ने में समर्थ नहीं हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सन्तुलित व्यवहार

सन्तुलित व्यवहार

'इतना मीठा न बनो कि कोई निगल जाए और इतना कड़वा भी न बनो कि कोई उगल दे'- यह उक्ति सचमुच विचार करने के लिए विवश करती है। मनुष्य को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। इसलिए उसे हमेशा यही यत्न करना चाहिए कि उसका व्यवहार सन्तुलित हो। उसके अपने ही व्यवहार के कारण किसी को गलतफहमी पैदा न होने पाए।
           सन्तुलित व्यवहार से तात्पर्य भावनाओं, विचारों और कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने से है। इससे कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में मानसिक शान्ति और स्पष्टता बनी रहती है। यह सकारात्मक अभ्यास है। इससे भावनाओं पर नियन्त्रण, सहानुभूति और सोच-समझकर निर्णय लेने की समझ आती है। यह व्यक्तिगत, पेशेवर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक प्रभावी प्रबंधन है। 
              यह परम सत्य है कि जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ आएँगी ही। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोगों में परस्पर जुड़ाव अथवा टकराव की सम्भावना भी बनी रहती है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य किसी दूसरे के कदमों में इतना अधिक गिर जाए और अपने स्वाभिमान को ही गिरवी रख दे।
             मनुष्य को दूसरों की जी-हजूरी अथवा चापलूसी करने के लिए किसी के सामने इतना भी नहीं बिछना चाहिए कि सामने वाला उसे कुचलता हुआ आगे बढ़ जाए और उसकी परवाह भी न करे। ऐसी अपमानजनक स्थिति किसी भी सहृदय व्यक्ति के लिए घातक हो सकती है। मनुष्य को इसके दूरगामी परिणामों के विषय में अवश्य ही विचार कर लेना चाहिए। उन्हें कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
            कुछ लोग ऐसे बोलते हैं मानो अपनी जुबान में उन्होंने शहद घोला हुआ है। ऐसी जरूरत से ज्यादा मीठी जुबान पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वह पीठ पीछे वार करने वाली हो सकती है। कुछ लोग बनावटी आवाज में बोलते हैं। ऐसे लोग भी हितैषी नहीं हो सकते। वाणी की प्राकृतिक स्वाभाविकता से पहचान की जा सकती है कि कौन हमारा हितैषी है और कौन हमारी जड़ें काटने वाला होगा।
          मीठा बोलना चाहिए परन्तु इतना मीठा भी नहीं कि हर कोई अपमानित कर चलता बने। लोग सोचते हैं कि जो मीठा बोल रहा है वह निश्चित ही हमसे अपना कोई स्वार्थ पूरा करना चाहता है। दुनिया असल और नकल की पहचान करना नहीं जानते।
           'मृदुभाषी बनो' यह तो सभी कहते हैं परन्तु संसार में ऐसे लोगों को बेवकूफ समझने में कोई परहेज भी नहीं करता। वे सोचते है इन लोगों का क्या है? इन्हें तो मनचाहे ढंग से नचा लेंगे।
             मनुष्य को कटुभाषी, हठी, अहंकारी और क्रोधी भी नहीं होना चाहिए कि सभी उसे अपने से दूर कर दें और उससे मित्रता भी न करने के बारे में दस बार सोचें। दूसरे शब्दों में कहें तो हर स्थान पर उनका उपहास उड़ाया जाए या उनसे किनारा कर लिया जाए। ऐसे लोग अपनी हठधर्मिता के कारण और अपने दुर्व्यवहार के चलते उन सभी लोगों को जो उनके सम्पर्क में आते हैं, उन्हें अनायास ही अपना शत्रु बना लेते हैं। तब फिर अकेलेपन को स्वेच्छा से अपना साथी बना लेते हैं।
             कोई भी मनुष्य अपने जीवन में कभी अपमानित नहीं होना चाहता इसलिए वह ऐसे लोगों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है। उनके विषय में कोई भी भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि कब उनका मूड खराब हो जाए और वे अपने प्रिय-से-प्रिय का भी अपमान कर दें। इस अपमानित होने के भय से सब यही सोचते हैं कि इन्हें छोड़ दो। न तो इन लोगों की दोस्ती अच्छी है और न ही इनकी दुश्मनी। इसलिए जितना भी हो सके इनसे कन्नी काटते हुए बचकर निकल जाओ, इसी में ही सभी लोगों की भलाई है।
           कैसी भी परिस्थिति हो अत्यधिक गुस्सा, डर अथवा प्रसन्नता के स्थान पर शान्त बने रहना चाहिए। अच्छी तरह सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना उचित होता है। दूसरों के साथ व्यवहार में सदैव सौजन्यता, सम्मान का भाव और धैर्य रखने से मित्रों और शुभचिन्तकों की संख्या बढ़ती है। अपनी शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसी भी अनपेक्षित स्थिति के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उसे स्वीकार करके समझदारी से निपटना चाहिए। सन्तुलित व्यवहार का पालन करने से मानसिक तनाव कम होता है, उत्पादकता बढ़ती है और रिश्तों में मजबूती आती है। 
           अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बहुत अधिक मीठा बनकर ससार में जीना चाहते हैं या कड़वा बनकर। वैसे तो सुधीजनों का यही मानना है कि मनुष्य को इस संसार में सहजता से जीने के लिए आवश्यकता अधिक मधुरता और कटुता दोनों का ही त्याग करना चाहिए। मनुष्य को अपने स्वाभाविक आचार-व्यवहार का ही पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 31 जनवरी 2026

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह है। इसमें हमें बिना रुके लगातार ऊपर की ओर बढ़ते रहना चाहिए। यह यात्रा धैर्य, कड़ी मेहनत, सकारात्मकता और समर्पण के साथ हर कदम पर नए मुकाम हासिल करने का नाम है जो हमें सफलता और ऊॅंचाइयों तक ले जाती है। ऊपर जाओ तो सफलता की बुलन्दियों को छू लो और यदि नीचे उतरने पर आएँ तो गिरावट का कोई अन्त नहीं। इनके अतिरिक्त यदि घुमावदार सीढ़ियों में उलझ गए तो फिर मनुष्य को चक्करघिन्नी की तरह गोल-गोल घूमते रह जाना पड़ता है। 
             जितना हम जीवन में पढ़-लिखकर योग्य बनते हैं उतनी ही उन्नति करते जाते हैं और फिर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं। तब धीरे-धीरे हम हर प्रकार की सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं। जब वह अपने लक्ष्य तक पहुँचता है और ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा होकर नीचे की ओर देखता है तब उसे सब बौने दिखाई देते हैं। उस समय उसे अपने साथ कोई भी खड़ा नहीं दिखता। वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। इसका अर्थ यही है कि जितना मनुष्य ऊँचाइयों को छूता है उतना ही उसके पास समयाभाव हो जाता है। अपने कार्यालयीन दायित्वों को निपटाने में दिन-रात व्यस्त रहता है। चाहकर भी अपने पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को वाँच्छित समय नहीं दे पाने के कारण वह बिल्कुल अकेला रह जाता है। 
          इस समय अपने उच्च पद के कारण मनुष्य को अहंकार से बचना चाहिए बल्कि उससे दूर रहना चाहिए तभी तो उसकी महानता तभी बनी रह सकती है। यदि वह चाटुकारों के मध्य घिरकर घमण्डी हो जाए तो उसका पतन निश्चित होता है।
          सीढ़ियों से नीचे उतरने पर मनुष्य नीचे आ जाता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने जीवन में नीचे की ओर जाने लगे तो वह कहाँ तक पतन के रास्ते पर चलता जाएगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह अधोपतन अन्तत: मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है जो उसे सबसे दूर कर देता है। उसके अपने ही घर-परिवार के लोग उसे एक कलंक की तरह देखते हैं जो उनके सपनों और आशाओं को चूर-चूर कर रहा है। तब वह सभ्य समाज पर बोझ की तरह हो जाता है।
            सभी लोग उसको हिकारत की नजर से देखते हैं। उससे मित्रता करना आम इन्सान पसन्द नहीं करता। सभी उससे दूर जाने की सोचते हैं और मौका मिलने पर अपमानित करने से नहीं चूकते। ऐसा व्यक्ति समाज विरोधी कार्य करता हुआ न्याय व्यवस्था का अपराधी बनकर इधर-उधर छुपता फिरता है। उसका दिन-रात का चैन नष्ट हो जाता है। अपने बन्धु-बान्धव ही उससे किनारा कर लेते हैं और वह अकेलेपन का दंश भोगने के लिए विवश हो जाता है।
          घुमावदार सीढ़ियों पर गोल-गोल घुमते हुए भी हम लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इसी प्रकार जीवन में भी यदि मनुष्य स्थिर बुद्धि न हो तो वह यहाँ-वहाँ भटकता रहता है। कभी सज्जनों के सगति में उन्नति करता है। यदि दुर्भाग्यवश दुर्जनों की संगति में फंस जाए तो पिछड़ जाता है।
           जीवन में अनावश्यक घूमते हुए वह अपना अमूल्य समय बरबाद कर देता है पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता। ऐसा व्यक्ति जीवन की बाजी हारने लगते है। उसे कदम-कदम पर निराशा का सामना करना पड़ता है। अपने ढुलमुल रवैये के कारण वह चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाता बल्कि फिसलकर पीछे चला जाता है जो निश्चय ही उसकी निराशा का कारण बन जाता है। आगे चलकर ही ऐसा व्यक्ति सोचने की अधिकता के कारण मानसिक रोगों  का शिकार बन जाता है। 
            पुरुषार्थ यानी सीढ़ियॉं हमेशा साथ देती है जबकि भाग्य यानी लिफ्ट कभी भी बन्द हो सकती है। इसलिए सदा कर्म पर भरोसा करना श्रेयस्कर होता है। सीढ़ियों की तरह यदि हम एक कदम छोड़कर आगे बढ़ेंगे तो गिरने का डर रहेगा। इसलिए जीवन में क्रमिक उन्नति यानी एजुकेशन, करियर और लक्ष्य निर्धारण आवश्यक है। सफलता एक जटिल पहेली है जिसमें पुरुषार्थ और भाग्य दोनों का योगदान होता है।
            जहाँ तक हो सके अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। फिर उसके अनुसार परिश्रम करके उसे पाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सफलता शत-प्रतिशत मिलेगी। कभी-कभी मनुष्य को असफलता का मुँह भी देखना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि निराश होकर बैठा जाए। पुन: पुन: प्रयास करने पर ईश्वर अवश्य फल देता है।
         सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। परिश्रम हमें तैयार करता है और हमारे लिए अवसर उत्पन्न करता है। दूसरी ओर भाग्य हमें अप्रत्याशित लाभ प्रदान कर सकता है। यद्यपि केवल भाग्य पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ ही हम अपनी सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा सकते हैं। सीढ़ियों की तरह जीवन को ऊँचाई की ओर ले जाने का प्रयास करना हितकर होता है। इसके साथ ही यह भी याद रखना आवश्यक है कि यही सीढ़ियाँ ऊपर ले जाती हैं, नीचे भी लाती हैं और गोल-गोल भटकाती भी हैं। इसलिए अपनी उन्नति चाहने वाले मनुष्य के लिए सचेत रहना बहुत जरूरी है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

विशाल संसार सागर

विशाल संसार सागर

संसार रूपी सागर या भवसागर एक रूपक मात्र है। जीवन की तुलना एक अथाह, अशान्त समुद्र से की जाती है। संसार को सागर के समान कहा गया है क्योंकि यह अनन्त और वह पार करने में कठिन होता है, जैसे समुद्र होता है। इस संसार रूपी समुद्र में अच्छाई अमृत है तो बुराई जहर है। जो अच्छाई और बुराई को समाज के हित के लिए जो पीता है, उसे भगवान शिव कहते हैं। भगवान भोलेनाथ ने हमेशा इस सृष्टि का कल्याण चाहा है। इस सागर में मोह-माया, कर्मों और दुखों का गहरा पानी भरा हुआ है। 
            इस विशाल भवसागर को पार करने के लिए सत्संग, भक्ति और ज्ञान को एक नौका के समान माना जाता है जो जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति दिलाती है। धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से इस सागर को पार करने के लिए ईश्वर की भक्ति, ज्ञान या सत्संग को एक दृढ़ नौका अथवा पुल के रूप में वर्णित किया गया है। भवसागर से पार होने का अर्थ है सांसारिक मोह और दुखों से मुक्त होना। इस विशाल संसार सागर में हमारी छोटी-सी जीवन नैया हिचकोले खाती चलती है। यह हमारी अपनी जीवन रूपी नौका है तब इसके नाविक भी हमीं हैं। इसे सम्हालकर पार लगना हमारा कर्त्तव्य है।
           इतने विशाल समुद्र में एक छोटी-सी नाव के सहारे उसे पर करना बहुत ही कठिन हो जाता है । उसमें उठने वाली लहरों से नाव हिचकोले खाने लगती है। कभी-कभी बड़े-बड़े जहाजों से टकराकर इसके चूर-चूर होने का खतरा बन जाता है। यदा कदा यह डूबने-उतरने भी लगती है। इसी प्रकार इसे विशालकाय समुद्री जीवों का भी डर रहता है कि कहीं वे आक्रमण करके उसकी नाव को डूबो कर नाविक को खा न जाएँ। यह भी सम्भव है कि वह वहीं-कहीं उलझकर गायब हो जाए।
            इसी प्रकार यह संसार भी जीवों का सागर है। यहाँ पर फूँक-फूँककर हर कदम रखना पड़ता है। जरा-सी चूक हुई कि सब समाप्त हो जाता है। यहाँ मनुष्य सुखों और दुखों की लहरों पर सदा डूबता-तरता रहता है। कभी वह नीचे डूबता हुआ पटखनी खाता है तो फिर कभी ऊपर तरता हुआ सफलता के सोपानों को छू लेता है।
          ‌ जीवन के ये उतार-चढ़ाव उसे चाहे-अनचाहे भोगने पड़ते हैं। इन सब थपेड़ों को सहना उसकी नियति है। या यूँ कह सकते हैं कि उसकी मजबूरी है। अपने पूर्वजन्म कृत सुकर्मो अथवा कुकर्मों को भोगकर ही वह इस ससार के बन्धनों से मुक्त हो सकता है। उन्हीं के अनुसार ही उसे जीव योनि प्राप्त होती है।
          संसार में रहते हुए उसे सज्जनों का संसर्ग मिलता रहता है जो उसकी सर्वविध उन्नति करने में सहायक बनते हैं। फिर कभी दुर्जनों का साथ मिल जाता है जिनकी संगति उसके विनाश का कारण बनती है। मनुष्य स्वतन्त्र है जहाँ चाहे वह जा सकता  है। अब यह मनुष्य के स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस ओर जाना पसन्द करता है। वह अपना उत्थान चाहता है या पतन की राह पर चलना चाहता है।
           इस जगत में कदम-कदम पर विशालकाय मगरमच्छ रूपी मनुष्य भी हमें राह चलते मिल जाते हैं। जिनसे बचना बहुत कठिन होता है। समझदार मनुष्य कोई-न-कोई उपाय करके उनसे पार पा ही लेते हैं और दूसरे लोग उनके जाल में फंसकर छटपटाते रहते हैं। ऐसे हिंसक प्रकृति के लोगों से जितनी भी दूरी बनाकर रखी जाए उतना ही लाभदायक होता है। यत्न यही होना चाहिए कि हमारा फायदा कोई करे या न करे पर वह हमारा नुकसान न कर पाए।
            यह भौतिक जगत मनुष्य को पाप कर्मों के दलदल में बरबस खींचता है। उससे निकल पाना बहुतही कठिन होता है। इसलिए मनीषी इस दलदल में न फंसने की चेतावनी देते हैं। इस दुनिया में मोह माया भी हमें बराबर पीछे की ओर धकेलते हैं। इनको पीछे ठेलते हुए अपनी जीवन नैया को बचाकर दूसरे किनारे पर लेकर जाना है। यह कोई कठिन ऐसा कार्य नहीं है बस हमारी इच्छाशक्ति दृढ़ होनी चाहिए। तभी हम अपना बचाव करने में समर्थ हो सकते हैं अन्यथा यही सच है कि तब हमारी रक्षा कोई भी नहीं कर सकेगा।
              हमारी यह छोटी-सी जीवन नैया इस महासमुद्र में हिचकोले न खाए इसलिए उसे बाधारहित इस भवसागर से पार ले जाने के लिए हमें सत्कर्मों को करने की महती आवश्यकता है। ईश्वर का दामन थामकर, उस मालिक पर पूर्ण विश्वास करके और स्वयं को समर्पण भाव से उसे सौंपकर ही हम इस वैतरणी को पार कर सकते हैं। अन्यथा हम यहाँ हिचकोले खाते रहेंगे और अन्य लोग हमारा तमाशा देखते रहेंगे। इस संसार सागर में हमें डूबाने में लोग जरा-सी भी कसर नहीं छोड़ना चाहते।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा मनुष्य का अपने शरीर तक से मोहभंग करवा देती है। वह इस असार संसार के साथ-साथ स्वयं अपने को भी विस्मृत कर देना चाहता है। इसीलिए वह कह बैठता है-
  क्या तन मांजता रे आखिर माटी में मिल जाना।
अर्थात् इस शरीर को माँजने का क्या लाभ? यानी इस शरीर को सजाना-संवारना व्यर्थ है। इसका कारण है कि अन्त में तो इसने मिट्टी में ही मिल जाना होता है। फिर इसकी देखभाल करके  समय क्यों व्यर्थ गॅंवाना?
             ऐसे विचार रखने वालों की इस धरा के किसी भी कार्य-कलाप में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे सभी कार्यों को करते समय निर्लिप्त रहते हैं। परन्तु कभी-कभी कुछ लोग इन सांसारिक दायित्वों से किनारा भी कर लेते हैं। इस विचारधारा को हम पलायनवादी प्रवृत्ति कह सकते हैं। भौतिक संसार के सभी रिश्ते-नातों से स्वयं को दूर करते हुए मनुष्य ईश्वर के समीप होने लगता है। दिन-रात वह प्रभु का नाम जपने में स्वयं को व्यस्त रखने की कामना करता हैं। 
            यह शरीर हमें ईश्वर ने एक साधन के रूप में दिया है। जिसके माध्यम से हम इस संसार में अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण कर सकें। यदि हम इसकी सार-सम्हाल नहीं करेंगे तो यह रोगी बन जाएगा। तब न हम ईश्वर की भक्ति कर सकेंगे और न ही हम सांसारिक दायित्व पूरे कर पाएँगे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं- '
          दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम
हमारी यही स्थिति हो जाएगी। हम न तो इहलोक संवार सकेंगे और न ही परलोक को‌ सुधार सकेंगे। यह तो स्थिति बहुत विकट हो जाएगी।
            यदि घर में हम वाहन रखते है तो हमें समय-समय पर उसका परीक्षण करवाना पड़ता है, उसमें ईंधन डलवाना होता है, नित्य प्रतिदिन उसकी साफ-सफाई रखनी आवश्यक होती है अन्यथा वह कबाड़ होकर हम पर बोझ बन जाता है। इसी प्रकार शरीर को यदि साफ-सुथरा न रखा जाए, इसे समय पर भोजन न दिया जाए तो यह भी अपने और अपनों पर रोगी होकर बोझ बन जाता है। उस समय सब परेशान हो जाते हैं। इस शरीर को स्वस्थ करने के धन और‌ समय की हानि होती है।
            इसलिए इसका स्वस्थ रहना बहुत ही आवश्यक है। इस शरीर को बेशक आप साध्य न माने पर यह ईश्वर तक जाने का साधन तो है ही। महाकवि कालिदास कने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा है -
          शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
हमारे सभी ऋषि-मुनि इस शरीर को साधन मानकर इसका पूरा ध्यान रखने का परामर्श देते हैं। हम यह कह सकते हैं कि व्यक्ति अपने सभी कर्तव्य चाहे वे धार्मिक हों या सांसारिक, तभी पूरे कर सकता है जब उसका शरीर स्वस्थ और नीरोग हो। एक बीमार या कमजोर शरीर से कोई भी कार्य ठीक से नहीं किया जा सकता। इसलिए शरीर का स्वास्थ्य सबसे बड़ी प्राथमिकता है। 
         यह सच है कि हमें केवल इस शरीर के लिए ही नहीं जीना चाहिए। मात्र इसी को सजाते-संवारते रहें और इसकी देखरेख के लिए ही पानी की तरह पैसा बहाते रहें। सारा-सारा दिन ब्यूटी पार्लर में जाकर सजते रहें अथवा नित नए बालों के स्टाइल बनवाते रहें। उस पर विभिन्न प्रकार के इत्र या परफ्यूम या डियो डालकर इसे नकली सुगन्ध से महकाते रहें। इस तरह इसको खूबसूरत दिखाने के चक्कर में हम दीन-दुनिया भूल जाएँ। घर-परिवार के दायित्वों से मुँह मोड़कर नित्य ही कलह-क्लेश करते रहें।
          इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि शारीरिक सौन्दर्य कुछ सीमित समय के लिए ही रहता है। जहाँ मनुष्य आयु को प्राप्त करने लगता है अर्थात् वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है, वहीं उसके चेहरे पर झुरियाँ आने लगती हैं। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होने पर अथवा किसी रोग के आ जाने पर भी शरीर की सुन्दरता मुँह मोड़ने लगती है। 
          उस समय जिस शरीर की सुन्दरता पर हमें बड़ा मान था वह साथ निभाने से इन्कार कर देती है। तब हमारा यह सुन्दर शरीर सामान्य-सा रह जाता है। इसीलिए गुणीजन कहते है कि इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। हमारा यह सौन्दर्य स्थायी नहीं है। जब यह नहीं रहता तब हमें बहुत दुख होता है।
            अति वैराग्य की चर्चा को यदि हम छोड़ भी दें तो भी इस बात का विशेष ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह शरीर ही सब कुछ नहीं है। इसके पीछे भागते रहने का कोई लाभ नहीं होता। इसके अन्दर रहने वाली उस आत्मा के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। तभी हम सब अपने मानव होने के धर्म को सार्थक करके अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

पाप-पुण्य कर्मों का भुगतान

पाप-पुण्य कर्मों का भुगतान 

मनुष्य को स्वयं अकेले ही अपने सभी पाप-पुण्य कर्मों के लेखे-जोखे का भुगतान करना होता है। वहाँ कोई भी उसका साथी नहीं बनता। यहॉं यह विचार करना आवश्यक है कि आखिर ये पाप और पुण्य होते क्या हैं? इस गुत्थी को सुलझाना बहुत कठिन है। इस रहस्य पर बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उलझ जाते हैं तो फिर हम क्या चीज हैं? 
             मेरे विचार में पाप का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं कि पाप वह कर्म है जो स्वयं को या दूसरों को दुख दे। नैतिक रूप से गलत हो और आत्मा को अपवित्र करे जैसे झूठ, चोरी, हिंसा आदि। इसके विपरीत पुण्य वह कर्म है जो आत्मा को पवित्र करे, सुख दे और नैतिक व धार्मिक मूल्यों का पालन करे - जैसे दान, सेवा, सत्य बोलना जो इस लोक और परलोक में सुखदायी होता है। यानी जो कार्य करने से मन को शान्ति मिले और दूसरों का भला हो, वह पुण्य कर्म है और जो कार्य करने से मन अशान्त हो और दूसरों को कष्ट पहुँचे, वह पाप कर्म है। 
             भरी भीड़ में भी मनुष्य अपने आप को अकेला ही पाता है। गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर की निम्न पंक्ति सदा ही प्रेरणा देती है और मार्गदर्शन कराती है - 
               एकला चलो रे
यह पंक्ति हमें हमारा जीवन जीने के लिए महत्त्वपूर्ण सन्देश देती है कि अकेले चलने में घबराना नहीं चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुनिया में अकेले वही चलते हैं जो साहसी होते हैं। जैसे शेर को जंगल में अकेले चलने के लिए किसी भी सहारे की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार मनुष्य को भी सहारों की बैसाखी नहीं तलाशनी चाहिए।
              मनुष्य इस ससार में जब जन्म लेता है तो वह अकेला ही होता है। इसी प्रकार जब इस धरा से विदा लेता है तब भी अकेला होता है। न उसके साथ कोई आता है और न ही कोई जाता है। जब मृत्यु से जन्म की यात्रा मनुष्य एकाकी कर सकता है तो जन्म से मृत्यु तक की यात्रा अकेले करने में उसे कभी परेशानी होनी ही नहीं चाहिए। विचार कीजिए कि इस संसार में हम कब-कब अकेले होते हैं? यदि इसका हल हम कर लेते हैं तो फिर सारी समस्या ही हल हो जाती है।
              मनुष्य अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के फल स्वयं ही भोगता है। उसकी खुशी में तो सब शामिल हो सकते हैं पर उसके दुखों और परेशानियों को कोई नहीं बाँट सकता। यह सच है कि जो भी कष्ट उसके शरीर के होते हैं या उसके मन के अवसाद होते हैं उनमें चाहकर भी कोई भागीदारी नहीं कर सकता। उन सबको अकेले ही भोगता रहता है। अन्य सभी परिवारी जन, मित्र या बन्धु उससे सहानुभूति रख सकते हैं। उसके पास भी खड़े हो सकते हैं पर अपने भोगों का भुगतान तो अकेले ही करना पड़ता है।
        अपने पत्नी, बच्चों या अन्यों के लिए जो भी स्याह-सफेद वह करता है उसका जिम्मा केवल उसी का होता है किसी अन्य का नहीं। यहाँ मुझे महर्षि वाल्मीकि की घटना याद आ रही है। जंगल में राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से रत्नानाकर डाकू ने ऋषियों को रोका। तब ऋषियों ने रत्नाकर को समझाया कि यह पाप कर्म छोड़ दो। जब वह नहीं माने तो उन्होंने कहा, "घर जाओ। जिनके लिए तुम यह पापकर्म करते हो उनसे पूछो कि वे इसमें तुम्हारे साथी होंगे।" 
           उन्होंने कहा, "मुझे मूर्ख समझ रखा है? मैं घर जाऊॅंगा तो तुम यहॉं से भाग जाओगे।"
          ऋषियों ने कहा, "तुम हमें बॉंधकर चले जाओ। फिर तो हम यहीं रहेंगे।"
          रत्नाकर को यह सुनकर विचित्र लगा उसने कहा, "वे मेरे अपने हैं और मेरा ही साथ देंगे।"
            ऋषियों के जोर देने पर घर जाकर उसने अपने माता, पिता, पत्नी और बच्चों से वही प्रश्न किया। उन सबका का यही एक उत्तर था, "परिवार के पालन-पोषण का दायित्व उसका है। वह पैसा कैसे कमाता है उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं। इसलिए वे सब उसके पापकर्म में भागीदार कदापि नहीं बनेंगे।" 
         वे भागते हुए ऋषियों के पास गए और उनके पैर पकड़ लिए। उनसे माफी मॉंगी। यहीं से महर्षि के जीवन का एक नया अध्याय आरम्भ हुआ और वे युगों-युगों तक गाई जाने वाली पवित्र रामकथा के रचयिता बने।
              मनुष्य के सुख और दुख के समय के अतिरिक्त उसके अकेलापन की पीड़ा भी उसकी अपनी होती है। जितना वह जीवन की ऊँचाइयों पर पहुँचता जाता है उतना ही अकेला होता जाता है। उसके सभी साथी एक-एक करके पीछे छूटते जाते हैं। वे हाथ बढ़ाकर तब उसे छू भी नहीं पाते।
          हमारे ऋषि-मुनि इसीलिए पुण्यकर्मों को करने और पापकर्पमों को त्यागने पर बल देते हैं ताकि जब उन कर्मों को भोगने का समय आए तो मनुष्य को रोना न पड़े। इस उक्ति को सदा स्मरण रखना चाहिए- 
        सुख के सब साथी दुख में न कोई।
अर्थात् सुख में लोग साथी बनने के लिए तैयार हो जाते हैं परन्तु दुख की स्थिति में कोई साथ नहीं निभाता। यानी दुख उसे अकेले ही झेलना पड़ता है। मनुष्य को अकेले ही अपने सारे कृत शुभाशुभ कर्मों को भोगना होता है। अत: शीघ्र जाग जाएँ तो बहुत ही अच्छा है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

बच्चे प्रातःकालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह

बच्चे प्रात:कालीन सूर्य की तरह कोमल, ताजगी से भरपूर, मासूम और मनमोहक होते हैं। वे उस अवस्था में नव स्फूर्ति, नव जागृति, नव उल्लास आदि से भरे होते हैं। रात का स्याह अन्धेरा जो दुखों और कष्टों का प्रतीक हैं, उनसे मुक्त होकर मुस्कुराते हुए सूर्य पूर्व दिशा से उदित होता है। उसी प्रकार बच्चे अपने पूर्व जन्म के कर्मो को भोगकर, पुराने रोगी या वृद्ध शरीर को त्यागकर एक नए जीवन में प्रवेश करते हैं। जन्म से पूर्व बच्चा माता के गर्भ में यानी अन्धकार में रहता है और वहॉं से पोषण लेता है। उस अन्धकार से उसे तब मुक्ति मिलती है जब वह जन्म लेता है।
              बाल रवि की छवि सभी को बरबस आकर्षित करती है। प्रातः कालीन बाल रवि जब धरा पर अवतरित होता है, उस समय वह लालिमा लिए हुए होता है। लोग प्रातःकाल उठकर उसे अर्घ्य देकर अपने दिन का आरम्भ करते हैं। इस समय आकाश में उगता हुआ सूर्य सारी सृष्टि को दिन के आगमन का सन्देश देता है। सम्पूर्ण वातावरण में हलचल-सी मचने लगती है। सम्पूर्ण प्रकृति, मनुष्य, पशु और पक्षी आदि सभी अपने-अपने कार्यों में जुट जाते हैं।
             इसी प्रकार जब एक नन्हें शिशु का जन्म घर-परिवार में होता है तब सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास का वातावरण होता है। घर में आने वाले सभी आगन्तुकों को मिठाइयाँ खिलाई जाती हैं और एक-दूसरे को बधाई दी जाती है। वह नन्हा शिशु माता-पिता का एक सपना होता है जिसके माध्यम से वे अपने सभी अधूरे स्वप्नों को पूरा करना चाहते हैं। उसे उनकी विरासत सम्हालने वाला 'घर का चिराग' कहा जाता है। वह नन्हा-सा मेहमान सबकी नजरों का केन्द्र होता है। उससे सभी परिवारी जनों को बहुत-सी आशाएँ जुड़ी होती है।  
            जैसे-जैसे सूर्य प्रात: से दोपहर तक का सफर तय करता है, उसका मासूम-सा बालरूप मानों कहीं खो जाता है। उस समय वह किसी दूसरे ही नवीन रूप में दिखाई देता है। तब वह युवा सूर्य प्रचण्ड और तेजस्वी बन जाता है। उसकी ऊष्मा और तेज से सम्पूर्ण सृष्टि प्रभावित होती है। उसका ओज समस्त भूमण्डल पर दिखाई देता है। उसके उस विलक्ष्ण तेज से सबकी आँखे चुँधियाने लगती हैं। अर्थात् कोई भी उस युवा सूर्य से आँख नहीं मिला सकता।
             बच्चा भी जब अपने बचपन से आगे युवावस्था की ओर बढ़ता है तब उसके सरलता, स्वाभाविकता, सहजता आदि गुण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और वह एक दूसरे ही नए इन्सान के रूप में बदलने लगता है। इस यौवनकाल में बच्चे के चेहरे पर अलग ही तरह का नूर होता है। उसका उत्साह देखते ही बनता है। वह उत्साह और उमंग से भरा हुआ होता है। वह हर कार्य को करने की क्षमता रखता है। किसी भी कठिनाई में डटकर खड़े रहने का हौंसला रखता है।
            इस समय वह अपने जीवन को एक नया रूप देने के लिए संघर्ष कर रहा होता है। तब वह आत्मविश्वास से भरा हुआ होता है और उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार का तेज चमकता हुआ दिखाई देता है। उस समय वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार होता है। वह अपने जीवन को व्यवस्थित करके एक दिशा का चुनाव करता है।
             बाल रवि की तरह एक छोटा बच्चा सबको अपनी बालसुलभ चेष्टाओं से मोहित करता है। उसके भोलेपन से पूछे गए प्रश्न उसकी जिज्ञासा को प्रकट करते हैं। एक स्थान पर कितने ही बड़े लोग बैठे हों, वे सभी मिलकर भी वैसा खुशनुमा माहौल नहीं बना पाते जो एक बच्चा अपनी तोतली जुबान और मासूमियत से बनाता है। उसके चहकने से सब प्रसन्न होते है और उसके उदास हो जाने पर सब उसकी चिरौरी करते हैं और उसे मनाने का प्रयास करते हैं।
            बाल रवि की तरह अपने बच्चे को बच्चा ही रहने दीजिए। उसकी मासूमियत को उससे छीनकर अनावश्यक रूप से उसे बड़ा न बनाएँ। बड़ा होकर तो वह दुनिया के छल-प्रपंच देखा-देखी स्वयं ही सीख जाता है। जब तक वह भोला-भाला प्यारा-सा बच्चा है तभी तक वह राह चलतों को भी बरबस मोह लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद