संविधान में महिलाऍं बराबर
महिलाओं को मन्दिर में जाना चाहिए अथवा नहीं यह एक ज्वलन्त मुद्दा है। इस विषय पर कुछ वर्षों पूर्व ऐसी बहस प्राय: हर न्यूज चैनल पर आयोजित की जा गई थी। शेष अन्य विवादों की तरह इस समस्या का भी कोई समाधान नहीं निकला था। सभी विद्वान अपने-अपने विचार रख रहे थे, तीखी टीका-टिप्पणियाँ कर रहे थे परन्तु परिणाम वही रहा था यानी ढाक के तीन पात।
7 मार्च 2016 को न्यूज24 पर शाम 7 बजे तीखी बहस में हो रही थी, उसी को देखते-सुनते हुए यह आलेख लिखने का मन बनाया था।
आज यह ज्वलन्त प्रश्न एक मुद्दा बनता जा रहा है कि यदि पूजा करने के लिए महिलाओं को मन्दिर में जाने की अनुमति नहीं है तो पुरुषों को भी नहीं होनी चाहिए। इसका कारण है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यह कहना बिल्कुल गलत है कि पुरुष स्त्री से अधिक श्रेष्ठ है। हाँ, शारीरिक रूप से वह अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर आज ज्ञान, विज्ञान, उद्योग, राजनीति आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ महिलाएँ पुरुषों से कमतर सिद्ध हो रही हैं।
पुरुष को अपने जीवन में हर कदम पर स्त्री के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। जन्म लेने के लिए एक माता की जरूरत होती है और फिर एक बहन चाहिए होती है। बाद में पत्नि की आवश्यकता होती है जिसके काल कवलित हो जाने पर वह अपना घर अकेले नहीं चला सकता और अपने बच्चों को भी अकेले नहीं पाल-पोसकर बड़ा नहीं कर सकता। जबकि पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को इन सब समस्याओं से दो-चार नहीं होना पड़ता। वह पुरुष के सहारे के बिना भी सभी दायित्वों को सरलता से निभा लेती है।
यदि हम बात करें वेदों की तो उनमें ऐसा कोई विधान किसी के लिए भी नहीं है कि वे मन्दिरों में नहीं जा सकते। वहाँ पर तो पूजा करने के लिए मन्दिरों की कल्पना ही नहीं की गई थी। वैसे वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों से कम अधिकार नहीं दिए गए थे। वे हर क्षेत्र में अपनी पैठ रखती थीं। यह तो कुछ तथाकथित विद्वानों के पूर्वाग्रह युक्त दिमाग की उपज है जिन्होंने नारी को पुरुषों से कमतर समझा। इस प्रकार धर्म और समाज को दोषमुक्त बनाने का अपराध किया।
हमारे मनीषी समझाते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए किसी मन्दिर यानी धर्म स्थानों या तीर्थों में जाने, जंगलों में खोजने, तथाकथित गुरुओं अथवा तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के पास जाकर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे पाना बहुत ही सरल होता है। वह तो मनुष्य के मन में ही रहता है और वहीं पर ही मिलता है। वह केवल मनुष्य के मन के भाव में रहता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि स्त्री घर में बैठकर ईश्वर की उपासना करे तो फिर यही नियम पुरुषों पर क्यों लागू नहीं होता? वह घर बैठकर साधना क्यों नहीं कर सकता?
किसी-किसी क्षेत्र में आज महिलाएँ पुरुषों से भी आगे निकल गई हैं। उनके अधीनस्थ पुरुष कर्मचारी इस बात को पचा नहीं पाते कि उन्हें किसी महिला अधिकारी के अधीन कार्य करना पड़ रहा है। इक्कसवीं सदी में आज के युग में भी पुरुषों की मानसिकता यही है कि स्त्री उनके अँगूठे के नीचे दबकर रहे। उसे सिर उठाकर चलने का अधिकार वे नहीं देना चाहते। स्वयं वे चाहे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएँ परन्तु यदि बहन या पत्नि किसी साथी पुरुष से बात भी कर ले तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, उसे खरी-खोटी सुनाई जाती है।
यदि वह पुरुष प्रधान समाज में अपना एक स्थान विशेष बनाने के लिए संघर्ष करना चाहती है तो उसके पैरों में बेड़ियाँ डालने का प्रयास किया जाता है। उसे कभी तो घर-परिवार का वास्ता दिया जाता है और फिर कभी परम्पराओं के नाम की दुहाई देकर उसके बढ़ते हुए कदमों को पलटने के लिए विवश किया जाता है। पुरुष अपने झूठे अहं के कारण अपना वर्चस्व त्यागकर स्त्री को कभी भी महत्त्वपूर्ण बनने नहीं देना चाहते।
मन्दिर प्रवेश तो मात्र एक बहाना है। इस बहाने पुरुष कुत्सित राजनैतिक चालें चल रहे हैं। टी वी पर होने वाली चर्चाओं में उन पर कटाक्ष भी किए जाते हैं। पुरुष आज अपनी पत्नी को धन कमाने का माध्यम तो बनाना चाहता है पर उसकी वैचारिक स्वतन्त्रता में बाधक बनता है। स्त्री यदि आगे बढ़ती है तो उस पर लाँछन लगाने से भी बाज नहीं आता। वह नहीं चाहता कि स्त्री उससे आगे बढ़ जाए। बहुत से पुरुष आज भी अपनी पत्नी की उन्नति में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आते।
हमारा भारतीय संविधान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है। अपने इन अधिकारों को महिलाओं को निस्सन्देह आगे बढ़कर को प्राप्त करना चाहिए पर वहीं उन्हें अपने दायित्वों से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। नारी मुक्ति के नाम पर की जाने वाली उच्छ्रँखता असहनीय है। इससे बचने का हर सम्भव प्रयास हर महिला को करना चाहिए। इसके नाम पर परिवार को छोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कही जा सकती।
चन्द्र प्रभा सूद