सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बाल हठ

बाल हठ 

सामान्यतः तीन प्रकार के हठ माने जाते हैं - बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ। त्रिया हठ और राज हठ की अपेक्षा बाल हठ को सबसे खतरनाक अथवा गम्भीर माना गया है। इसका कारण है कि बच्चों की जिद का परिणाम बहुत कष्टदायक होता है। बाल हठ का अर्थ है बच्चे की जिद या अपनी बात मनवाने के लिए अड़ जाना। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चा अक्सर अपनी जिद पूरी करवा ही लेता है। इसे ठिनक या हठधर्मिता भी कहा जाता है
             बाल हठ सबके लिए परेशानी का कारण बनता है। बच्चे प्राय: जिद करते हैं। वे किसी भी चीज को लेकर हठ कर सकते हैं। यदि उनकी जिद को पूरा न किया जाए तो वे फर्श पर लेट जाएँगे, चीखे-चिल्लाएँगे, तोड़-फोड़ करेंगे और घर में खूब शोर मचाएँगे। बच्चे के ऐसे व्यवहार से घर का वातावरण अशान्त हो जाता है। उनके ऐसा व्यवहार करने के उपरान्त यदि माता-पिता उनके हठ को मान लेते हैं तो समझ लीजिए कि बच्चा सौ प्रतिशत हठी बन जाएगा।
            इसके विपरीत यदि उसके ऐसे व्यवहार के बदले उसे थोड़ी देर के लिए उसी हालत में अकेला छोड़ दिया जाए तो उसे समझ आ जाएगा कि उसकी दाल नहीं गलने वाली। तब वह थक-हारकर स्वयं चुप हो जाएगा और माता-पिता को मनाने का यत्न करेगा। यदि बच्चा हठ करने लगे तब उसे प्यार से समझाइए अथवा कोई मजबूरी हो तो बताइए, वह अवश्य मान जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता कि वह फिर से कोई ऐसी माँग आपके सामने रखेगा कि आप इन्कार कर दें।
            आदर्श स्थिति यही है कि बच्चे के कुछ माँगने से पहले ही उसकी जरूरतों को पूरा कर दिया जाए। एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप अपने लिए नित नई वस्तुएँ घर में लाएँगे और बच्चे की माँग पूरी नहीं करेंगे तो बच्चा आपको ताना देने से बाज नहीं आएगा। वह अवश्य कहेगा कि अपने लिए पैसे हैं, बस मेरे लिए ही पैसे खत्म हो जाते हैं। इसलिए बड़ों के लिए सावधानी और संयम दोनों ही बरतना बहुत आवश्यक है।
             इतिहास गवाह है कि दुनिया को झुकाने की सामर्थ्य रखने वाले बड़े-बड़े साम्राज्य तक बाल हठ के समक्ष हार जाते हैं। रामायण में एक प्रसंग आया है कि लव और कुश अपनी माता भगवती सीता को बताए बिना हठ ठान लेते हैं कि वे भगवान राम द्वारा छोड़े गए अश्वमेध के घोड़े को पकड़ेंगे। उन्होनें भगवान राम की चतुरंगिनी सेना की परवाह नहीं की और अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए उस अश्व को पकड़ लिया। उस समय उन दोनों के अदम्य साहस को अयोध्या की सारी शक्तिशाली सेना देखती रह गई।
             रामचरितमानस के अनुसार इसी प्रकार बाल हनुमान जी ने तो भगवान सूर्य को निगल लेने का हठ कर लिया था और उन्होंने अपने हठ को पूरा भी किया।
               हठी बच्चे किसी को भी अच्छे नहीं लगते। किसी के घर जाने पर उन्हें वह सम्मान और प्यार नहीं मिल पाता जो उन्हें मिलना चाहिए। लोग उन्हें यह कहकर तिरस्कृत करते है कि 'बड़े ही डीठ बच्चे है, मानेंगे नहीं।' यही जब बड़े होते हैं तो उनके माता-पिता स्वयं ही ऐसे बच्चों से डरने लगते हैं। बताइए, ऐसी औलाद का क्या लाभ जो हमेशा सिर पर ही सवार रहे।  
              बच्चों के हठ यानी जिद को यदि हम सकारात्मक कार्यों में जुनून अथवा धुन के रूप में  परिवर्तित कर सकें तो वह हमेशा आश्चर्यचकित कर देने वाले कार्य करते हैं। इस जुनून की बदौलत ज्ञान, विज्ञान, खेल आदि किसी भी क्षेत्र में वे आशातीत सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उसका परिणाम हमारे समक्ष वैज्ञानिक चमत्कारों के रूप में हैं। निस्सन्देह हमारे सभी महापुरुष भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
             यदि बाल हठ को हम हौव्वा मानकर चलेंगे तो अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का कार्य करेंगे। आतंकवाद ऐसे ही हठी बच्चों की जिद का परिणाम है जिसकी चपेट में आज पूरा विश्व है। सभी इससे छुटकारा पाना चाहते हैं। बच्चों को ऐसे संस्कार देने की महती आवश्यकता है जिससे वे हठी, जिद्दी या डीठ न बनकर समझदार बच्चे बन सकें। अपना तथा अपने माता-पिता का नाम समाज में रौशन कर सकें। लोग उन्हें हिकारत की नजर से न देखें बल्कि उनके उदाहरण दूसरों के सामने रखने के लिए मजबूर हो जाएँ।
            माता-पिता का दायित्व है कि बचपन से ही अपने बच्चों को आपसी सामंजस्य से रहने की और सहनशील बनने की शिक्षा दें। इससे वे अपने माता-पिता का मान बनेंगे और अपने लिए समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकेंगे। इन्हीं भावी कर्णधारों के कन्धों पर हमारे देश तथा समाज का दायित्व निर्भर करता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

माता-पिता साक्षात भगवान

माता-पिता साक्षात भगवान 

निर्विवाद सत्य है कि माता-पिता का स्थान संसार में सबसे ऊपर है। ईश्वर को हम लोगों ने कभी नहीं देखा परन्तु हाँ, उसकी उपस्थिति को हम हर कदम पर अनुभव करते हैं। माता-पिता साक्षात ईश्वर का स्वरूप हैं जो मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने का महान कार्य करते हैं। आजन्म उनकी सेवा करके भी मनुष्य उनके इस ऋण से उऋण नहीं नहीं हो सकता। जो मनुष्य उन्हें ईश्वर की तरह मानते हुए उनका हर प्रकार से ध्यान रखता है और उनका सम्मान करता है उसे सभी प्रकार के सुख-साधन ईश्वर उन्हें देता है।
           अपने माता-पिता का दिल दुखाने के विषय में तो सोचना भी अपराध है। वे मनुष्य सारा जीवन परेशान रहते हैं जो अपने माता-पिता की अवहेलना करते हैं। मात्र दिखावा करने से उनकी सेवा नहीं की जा सकती। उसके लिए मन में पूर्ण श्रद्धा रखनी आवश्यक होती है। यहाँ मुझे एक कथा याद आ रही है।
              इस विषय से सम्बन्धित एक कथा मुझे स्मरण हो रही है। कथा कहती है कि कभी किसी समय देवताओं के मध्य यह विवाद उत्पन्न हुआ, "किस देवता की सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए?"
           देवों के मध्य कोई स्वीकृति नहीं बन रही थी। इसलिए सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनके कहा, "पितामह, आप बताइए कि सबसे पहले किस देवता की उपासना की जानी चाहिए?"
            उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा, "जो देवता समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटकर आएगा, सभी देवों में उसकी उपासना पहले की जाएगी।"
            सभी देवगण अपने लक्ष्य का सन्धान करने के लिए चल पड़े। गणेश जी अपने वाहन मूषक के साथ वहीं रुके रहे। यह देखकर देवर्षि नारद परेशान हो गए थे उन्होंने पूछा, "गणेश, तुम परिक्रमा के लिए क्यों नहीं जा रहे? आपका वाहन मूषक है जो धीरे-धीरे चलता है फिर भी आपको कोई चिन्ता नहीं है हारने की।" 
             नारद जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो गणेश जी ने अपने माता-पिता यानी कि भगवान शंकर और भगवती पार्वती की परिक्रमा की और कहा, "मेरी परिक्रमा तो पूर्ण हो गई।"
            पूछने पर उन्होंने बताया, "माता-पिता के चरणों में ही मेरा सारा संसार है। अतः मुझे अन्यत्र कहीं भी जाने की आवश्यकता ही नहीं है।"
             अपने माता-पिता की परिक्रमा करके गणेश जी सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। सभी देवता जब लौटे तो गणेश जी के वाहन मूषक के पैरों के निशान देखकर वे हैरान हो गए और कहा, "गणेश जी सबसे पहले परिक्रमा करके कैसे लौट आए?"
              तब ब्रह्मा जी ने बताया, "गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके मानो सारे संसार की परिक्रमा कर ली हैं।"
            उनकी इसी मातृ-पितृ भक्ति के कारण ही किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान का सम्पादन करते समय सब देवताओं में सबसे पहले गणेश जी वन्दना की जाती है।
            यह कथा हमें समझाती है कि माता-पिता के चरणों में सम्पूर्ण जगत है जो इस सत्य का मनसा पालन करता है, उस जैसा मनुष्य तो इस धरा पर कोई और हो नहीं सकता। माता-पिता घर-परिवार का आधार स्तम्भ होते हैं। ये वह धुरी होते हैं जिनके ईर्दगिर्द परिवार का पहिया घूमता रहता है। इसीलिए कहा जाता है- 
        माता-पिता की बादशाही होती है और    
       भाई-बहनों का व्यापार होता है।
          माता-पिता की सेवा और अर्चना को  महत्त्व को समझाते हुए संस्कृत भाषा का निम्न श्लोक कहता है- 
          येन माता पिता सेव्या पूजिता वा।
         मन्दिरे  तेन पूजा  कृता वा न वा।।
अर्थात् जो मनुष्य माता-पिता की सेवा और पूजा करता है, वह मन्दिर जाकर पूजा करे अथवा न करे।
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे माता-पिता जीवित देवता हैं। उनकी सेवा करना सबसे बड़ी पूजा है। ईश्वर मन्दिर से ज्यादा उन लोगों के हृदय में रहते हैं जो अपने माता-पिता की सेवा मन लगाकर करते हैं। यदि माता-पिता की सेवा नहीं करते और सिर्फ मन्दिर में पूजा करते है  तो वह पूजा अधूरी रह जाती है। माता-पिता का सम्मान और सेवा-सुश्रुषा ही सबसे बड़ा तीर्थ और सबसे बड़ी पूजा है
            हमारे शास्त्र भी यही मानते हैं कि मन्दिर में मूर्तियों के आगे माथा टेको या नहीं पर घर में जीवित विद्यमान साक्षात ब्रह्म स्वरूप माता और पिता की पूजा-अर्चना अवश्य करो। पूजा-अर्चना का अर्थ थाली सजाकर पूजा करना नहीं बल्कि उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करना और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देना है। अपने लोक-परलोक को सुधारने के लिए कृत संकल्प हो जाएँ तो श्रेयस्कर होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

नकारात्मक बयार

नकारात्मक बयार

वायुमण्डल में चारों ओर ही नकारात्मक बयार बह रही है। हर वो चीज जो हमारी आत्मा के स्तर को उठाने के स्थान पर नीचे गिराती है, उसे हम  नकारात्मकता है। वह कुछ भी हो सकता है - जैसे बुरे विचार, डर, लोभ, मोह, आलस, घृणा, अन्याय, बुरे संस्कार, गलत कार्य आदि। ऐसे सभी कार्य, वस्तुऍं अथवा भाव जो हमें जीवन में नीचे गिराते हैं, नकारात्मकता का ही रूप होते हैं। नकारात्मकता का गहरा प्रभाव हम सबके तन यानी हमारे स्वास्थ्य, मन, धन और मस्तिष्क सब पर  होता है।
              सबसे पहले हम तन की चर्चा करते हैं। पर्यावरण के दूषित होने कारण हमारे शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है। गाड़ियों, ए सी, फेक्टरियों आदि के धुँए के कारण दूषित वायु के चलने से साँस सम्बन्धी बिमारियों से बहुत से लोग झूझ रहे हैं। हमारी नदियों के जल को कारखानों का कचरा और सीवर का गन्दा पानी दूषित कर रहा है। इससे पेट सम्बन्धी बिमारियों से लोगों को न चाहते हुए लड़ना पड़ रहा है।
             हमारे खाद्यान्नों, सब्जियों और फलों आदि पर इस दूषित जल का कुप्रभाव पड़ता है। खेती में किसानों द्वारा डाले गए उन जहरीले कीटनाशक रासायनिकों के कारण ये सब खाने योग्य नहीं रह जाते परन्तु फिर भी हम खा रहे हैं। इसलिए जन साधारण को कैंसर जैसे अनेकानेक असाधारण रोग दिन-प्रतिदिन पीड़ित कर रहे हैं।
           सड़कों पर वाहनों के बढ़ते शोर और उनके बजने वाले हार्न परेशान करते हैं। शादी-विवाह में समय-असमय बजने वाले डीजे व बैंड-बाजे की कनफाड़ू धुनों से हम लोगों को कानों से सम्बन्धित बिमारियाँ हो रही हैं।
             ईश्वर ने हमारे चंचल मन को बहुत ही संवेदनशील बनाया है। जरा से भी नकारात्मक विचार इसे मथने लगते हैं और यह व्याकुल हो जाता है। चारों ओर ही निराशा का माहौल पसरा हुआ है। समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अपहरण, लूट, बलात्कार, हत्या जैसी जघन्य घटनाएँ निराशा को जन्म देती हैं। राजनैतिक उठा-पटक भी नित्य ही विचलित करने में पीछे नहीं रहती। ऐसे माहौल में जीवन यापन करना बड़े जीवट का काम है। कुछ लोग ऐसे माहौल को देखकर डिप्रेशन के शिकार होने लगते हैं।
        इन सब घटनाओं को पढ़कर और सुनकर मन तार-तार होने लगता है। दूसरा कारण मन के पीड़ित होने का है बिमारियों की चपेट में आना। शरीर जब किसी भी कारण से अशक्त हो जाता है तब मनुष्य लाचार हो जाता है और दूसरों पर आश्रित हो जाता है। ऐसी स्थिति में मन में निराशा के भाव आना स्वाभाविक होता है। धन और समय की हानि अलग होती है।
          इस सबके अतिरिक्त कुछ फिल्मी गीतों में भी निराशा के भाव झलकते रहते हैं। कमप्यूटर पर खेले जाने वाले साहसिक खेल बच्चों को आत्महत्या करने के लिए उकसाते हैं जिनकी चर्चा टीवी सीरियलों, समाचार पत्रों आदि में समय-समय पर होती रहती है। ये सभी कारण मानव मन को विचलित करने के लिए पर्याप्त होते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को ताबड़तोड़ बढ़ती मंहगाई के कारण पूर्ण न कर पाना भी मानसिक अवसाद का एक बड़ा कारण बन जाता है। इस तरह मन का अस्वस्थ होना अनेक मनोरोगों को जन्म देता है।
          धन बेचारा क्या-क्या करे? मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करे या हर रोज बिमार पड़ जाने पर डाक्टरों के पास जाकर व्यय हो जाए। अब शरीरिक और मानसिक रोगों का इलाज करवाना भी तो जरूरी है। दिन-रात एक करके और खून-पसीने से कमाए धन को और समय को डाक्टरों के पास जाकर खर्च करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। फिर भी कोई गारण्टी नहीं है कि मनुष्य पूर्णरूपेण स्वस्थ हो ही जाएगा।
          सरकार कितने ही कड़े कानून क्यों न बना ले उससे कोई हल नहीं निकल सकता जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे। बहुत-सी समाजसेवी संस्थाएँ अपने-अपने स्तर पर हमें जगाने का प्रयास करती रहती हैं। सरकार भी विज्ञापनों के माध्यम से भी जन जागरण का यत्न करती है। फिर भी इच्छाशक्ति और विश्वास की शायद कहीं कमी रह जाती है। इसीलिए ये परेशानियाँ हम सब लोगों को झेलनी पड़ती हैं।
             एवंविध वायुमण्डल व पर्यावरण को दूषित करने के दोषी हम सभी लोग हैं। इसका निदान भी हम सबको मिलकर ही खोजना होगा। अपने तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचना ही वास्तव में मानवता कहलाती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

हरि भजन आवश्यक कार्य

हरि भजन आवश्यक कार्य

निम्नलिखित लोकोक्ति को पढ़कर हम अन्तस की पीड़ा का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं-
     आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
अर्थात् मानव का यह चोला मनुष्य को ईश्वर की भक्ति करने के लिए मिला था पर इस संसार की हवा लगते ही मनुष्य यहॉं की चकाचौंध में खो जाता है। ईश्वर से किए हुए अपने सब वायदे भूलकर यहाँ के कारोबार में व्यस्त हो जाता है। फिर धीरे-धीरे उस मालिक की ओर से अपनी नजरें फेर लेता है।
           इस लोकोक्ति का हम यह अर्थ भी कर सकते हैं कि किसी महान अथवा उच्च उद्देश्य को छोड़कर किसी तुच्छ या साधारण काम में लग जाना है। यह लोकोक्ति मूल काम से भटककर अनावश्यक कार्यों में समय बर्बाद करने के सन्दर्भ में प्रयोग की जाती है। 
            मनीषियों का कथन है कि जब जीव माता के गर्भ में होता है तो उस समय वह कष्ट उससे सहन नहीं होता। ईश्वर को उस अन्धकार से बाहर निकालने के लिए वह गुहार लगता है। तब वह कसमें खाता है कि वह जन्म लेने के पश्चात उस मालिक की आराधना करेगा, उसे हर पल याद स्मरण करेगा और क्षण भर के लिए भी उसे नहीं भूलेगा।
             इस संसार में जब वह जन्म लेने के कुछ समय तक उसे अपनी सारी कसमें याद रहती हैं और उस प्रभु का स्मरण करता है। फिर धीरे-धीरे दुनिया के झमेलों में घिरता हुआ वह ईश्वर की ओर से विमुख होने लगता है। तब वह सोचता है कि सारी उम्र पड़ी है हरि का भजन करने के लिए, उसका नाम जपने की। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वह नित नए बहाने गढ़ने लगता है। 
            इस तरह करते हुए सारी आयु बीत जाती है और अन्तकाल आ जाता है परन्तु हरि भजन की आयु नहीं आ पाती। काल को सामने देखकर वह हाथ जोड़कर क्षमा याचना करता है परन्तु उस उस समय तक तीर निशाने से निकल चुका होता है और बचते हैं वही ढाक के तीन पात। कहने का तात्पर्य है कि तब प्रायश्चित करना ही शेष बचता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण यही है कि तब उस समय मालिक मनुष्य को पश्चाताप करने के लिए पलभर का समय भी मोहलत के रूप में उधार नहीं देता।
            हम भी यदि किसी को समय सीमा निश्चित करके कोई काम देते हैं और वह तय समय में उस कार्य को नहीं कर पाता तो हम भी दूसरे व्यक्ति पर दया नहीं दिखाते बल्कि उसे लताड़ते हैं। एकाध बार तो हम उसे क्षमा कर सकते हैं परन्तु जब यह उसकी आदत बन जाती है तो हम उसे कदापि नहीं छोड़ते। और वह कार्य उससे छीन लेते हैं। यदि हम ऐसा व्यवहार दूसरे लोगों से करते हैं तो उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह बारबर हमें अपने काम में कोताही करने पर हमारी पुकार पर द्रवित हो जाए। हमें माफ करके थोड़ा और समय उपहार में दे।
            इस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उस मालिक निश्चित समय देकर हमें इस संसार में भेजता है। उसी समय के अनुसार हमें सौंपा गया कार्य निपटाना होता है। हम न जाने कितने जन्मों से अपने लिए निर्धारित कार्यों को पूरा नहीं कर रहे होते तो हम उस मालिक से आँख मिलाने का साहस ही नहीं जुटा पाते। हमारी बारबार याचना करने पर भी वह अनसुना करता है क्योंकि वह हमारी आदतों को भली-भाँति जानता है।
             इसीलिए मनीषियों के मन में यह क्षोभ रहता है कि मनुष्य दुनिया के बेकार के कामों में उलझे रहते हैं जिनके बिना उनका जीवन बड़ी आसानी से सुविधापूर्वक चल सकता था। जिस कार्य को करने का लक्ष्य लेकर वे इस धरा पर अवतरित हुए थे, उसे पूरा करने में सफल नहीं हो पाए। इसलिए वे नाकामयाबी का कलंक अपने माथे पर लेकर इस दुनिया से विदा हो रहे हैं।
            जब हम अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में होते हैं तब हम यह विचार करते हैं कि हम अच्छे कर्मों के साथ विदा लेंगे। यदि इस दुनिया में वापिस आना पड़े तो हम एक ऐसा इन्सान बनकर आऍं जो अपने अच्छे कर्मों के साथ आया है। बड़े दुख की बात है कि फिर से वही चक्र चलता है और हम वही गलतियॉं दोहराते हैं। हम एक दूसरे की बुराइयॉं करते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि  विशेष कार्य को छोड़कर हम अनावश्यक कार्य में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं। अपने को बुरे कर्मों के कारण फिर से उनका हिसाब अपने सिर पर खड़ा कर लेते हैं।
          उचित समय तो हमेशा ही रहता है। इसलिए उसकी प्रतीक्षा न करते हुए अपने लक्ष्य यानी ईश्वर की उपासना करते हुए मोक्ष प्राप्त करने की ओर मात्र ध्यान लगाना चाहिए। ऐसा करते हुए हम उस मालिक के प्रिय पात्र बनेंगे और उससे मुँह छिपाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। तब उसके पास जाने के लिए प्रसन्नता से समय की प्रतीक्षा करेंगे। उस समय मन में यह दुख नहीं होगा कि अपने लक्ष्य को भूलकर संसार के चक्रव्यूह में फंसे रहे।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

अपने बच्चों को जहाँ तक हो सके बचपन से ही स्वावलम्बी (independent) बनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से छोटे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। उस समय उन्हें ऐसा लगता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। इसलिए माता-पिता उन पर विश्वास करने लग गए हैं।
               बच्चे हर काम को स्वयं करना चाहते हैं। हम देखते हैं कि बहुत छोटे बच्चे दूध पीते समय बोतल को स्वय पकड़ना चाहते हैं। उन्हें खाना होता है तो चम्मच अपने हाथ से पकड़ने की जिद करते हैं, चाहे वे खा पाएँ या बिखेरते रहें। सबके बीच में बैठा हुआ बच्चा यही कोशिश करता है कि अपनी प्लेट से खाना खुद ही खाए। जो भी दाल-सब्जी वगैरह बड़ों की प्लेट में हैं, वे सब पदार्थ उनकी प्लेट में भी होने चहिए।
             बच्चे जब थोड़े और बड़े होते हैं तब बड़ों की देखा-देखी वे भी स्वयं ही अपना खाना परोसना चाहते हैं। हर बात पर उनका यही उत्तर होता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। उनके इस कथन का मान रखते हुए थोड़े-थोड़े काम उन्हें सौंपने चाहिए। सच मानिए बच्चे बहुत खुश होते हैं जब उन्हें यह अहसास होता है कि वे बड़े हो गए हैं। इसलिए उन्हें काम करने के लिए कहा गया है।
              पापा घर से दफ्तर जाते है या दफ्तर से वापिस घर आते हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चा भाग-भागकर पापा की सेवा में हाजिर हो जाता है। वह उनके कहे कामों को करके और उनसे शाबाशी पाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। इसी तरह अपनी माँ को घर का काम करते देख बच्चा भागकर हाथ बटाने चला आता है। कभी वह डस्टिंग करने लगता है तो कभी झाड़ू उठा लेता है। कभी-कभी तो वह रोटी बनाने तक की जिद कर बैठता है। वह बात अलग है कि ऐसा करते समय काम कुछ अधिक फैल जाता है।
              इसी तरह घर में रहने वाले पालतू जीव को खिलाना, उसके साथ खेलना और उसे घूमाना भी वह पसन्द करता है। पौधो को पानी देने में भी उसे मजा आता है। उसका खेल भी हो जाता है और काम भी हो जाता है। बच्चे को प्रोत्साहित करते हुए उसे काम करने की आदत डालिए। हो सकता है कि निकट भविष्य में विदेशों की तरह यहाँ हमारे देश में भी काम करने वाले नहीं मिलें। उस समय बच्चों के साथ मिल-जुलकर बिना परेशान हुए आप सभी कार्य कर सकेंगे।
             बच्चा जब चलना शुरू करता है और बात को समझने लगता है तभी से उसे स्वावलम्बी बनाने की ट्रेनिंग देनी पड़ती है। छोटा-छोटा सामान रसोई में रखकर आना, खिलौने सम्हालने में मदद करना, अपने जूते व कपड़े पहनना, कचरा इधर-उधर न फैंकर कूड़ेदान में डालकर आना आदि कार्य करने के लिए बच्चे को सिखाया जाना चाहिए।
             जब और बड़ा हो तब उसे उसकी आयु के अनुसार घर में कार्य दिए जाने चाहिए। बाजार से दूध, ब्रेड, आइसक्रीम या और जरूरत का छोटा-मोटा सामान लाने के लिए सिखाया जाए। एकाध बार यदि कोई गलती हो जाए तो उसे डाँटने के बजाय प्यार से समझाएँ ताकि उसका उत्साह बना रहे। उसे यह कभी नहीं लगना चाहिए कि उसके हर काम में मीनमेख निकालकर उसे लताड़ा जाता है। दो-चार बार ऐसा हो जाने पर उसका आत्मविश्वास डगमगा जाएगा।
               ज्यो-ज्यों बच्चे बड़े होते हैं त्यों-त्यों वे स्वावलम्बी बनते जाते हैं। उन्हें इतनी ट्रेनिंग अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपना पेट भरने लायक कुछ भी बना सकें। ऐसा करने पर उनके भूखे रहने की चिन्ता नहीं रहती और माता-पिता भी निश्चिन्त होकर अपने कार्य कर पाते हैं।
              बच्चों को स्वावलम्बी बनाने के लिए उन्हें छोटी आयु से ही उनके निजी काम करने देने  चाहिए। जैसे कपड़े पहनना, अपना बैग पैक करना आदि। उम्र के अनुसार घरेलू जिम्मेदारियॉं यानी पौधों को पानी देना, मेज साफ करना आदि कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को  विकसित करना चाहिए। अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही खोजने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि वे गलती करें तो उन्हें निराश नहीं करना चाहिए। उन्हें गलतियों से सीखने में माता-पिता को सहायता करनी चाहिए। वे अपनी ओर से जो भी प्रयास करें, उनकी सराहना करनी चाहिए।
             माता-पिता का यह दायित्व बनता है कि बच्चों को अनावश्यक ही प्रोटेक्ट न करके उन्हें बचपन से ही स्वावलम्बी बनाएँ। उन्हें सही और गलत की शिक्षा भी देनी चाहिए जिससे बच्चे अपने भले-बुरे की पहचान कर सकें। अपने लिए फैसले लेने की समझ उनमें आ सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

जीवन की डोर

जीवन की डोर 

हम सबके मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से बार-बार उठती है कि क्या मनुष्य के जीवन की डोर उसके हाथ में है? यदि उसके हाथ में डोर नहीं तो किसके हाथ में  है? क्या सारा जीवन वह ऊपर वाले के इशारों पर ही नाचता रहेगा?
             इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि मनुष्य इस रंगमंच रूपी संसार में अपने चरित्र अथवा निर्धारित पात्र का अभिनय करने आया है। जो भी रोल उसे डायरेक्टर ईश्वर ने दिया है, उसे दक्षता से निभाना ही उसका दायित्व है। यदि वह अपना किरदार बखूबी निभाता है तो उसे लोगो की सराहना रूपी तालियाँ मिलती रहती हैं। चारों ओर उसका यश फैलता है। लोग उस मंझे हुए अभिनेता को अपनी सिर-आँखों पर बिठाते हैं। उसका मूल्य इस संसार रूपी रंगमंच पर बढ़ जाता है। सभी लोग उसे अपने पक्ष में करने के लिए मिन्नतें करने लगते हैं अथवा जुगाड़ करते रहते हैं।
             इसके विपरीत यदि मनुष्य अपना किरदार निभाने में चूक हो जाता है तब उस पर सड़े-गले टमाटर व अंडे फैंके जाते हैं। यानी जीवन में उसे अपमान के घूँट कदम-कदम पर पीने पड़ते हैं। जीवन की बाजी हारे हुए ऐसे अभिनेता का मूल्य लोगों की नजर में कम हो जाता है। उसे इस रंगमंच पर अभिनय करने के लिए अच्छा रोल नहीं मिलता। यूँ कहें तो वह नाकारा घोषित कर दिया जाता है। ऐसे अभिनेता को फिर कोई अच्छा रोल नहीं मिल पाता।
              जीवन सिनेमा की तरह नहीं होता। यहॉं उसे रंगमंच पर द्रष्टाओं के समक्ष अभिनय करना पड़ता है। वास्तविकता यही है कि यह संसार एक रंगमंच है। हम सभी जीव यहाँ अपना एक विशेष किरदार निभाने के लिए भेजे जाते हैं। कोई राजा तो कोई रंक, कोई अमीर तो कोई गरीब, कोई पुलिस तो कोई चोर, कोई जज तो कोई अपराधी, कोई साधु और कोई फरेबी, कोई नेता तो कोई अभिनेता। इस तरह अच्छे और बुरे सभी तरह के चरित्र वाले पात्र इस रंगमंच पर वह मालिक भेजता है। पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों के अनुसार ही वह हमारा रोल इस जन्म मे निर्धारित करता है।
             हमें साथी कलाकार यानी नाते-रिश्तेदार व भाई-बन्धु वही मिलते हैं जिनके साथ कभी हमारा पूर्वजन्मों के सुकर्मों अथवा कुकर्मों का बकाया शेष होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिनके साथ हमारा लेन-देन का सम्बन्ध होता है, उनके साथ ही हमें रिश्ता निभाना होता है। यह हमारी विवशता होती है कि हम उनसे अपनी नजरें चुराकर दूर नहीं भाग सकते। उनके साथ रहते हुए हमें जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों को  इच्छा अथवा अनिच्छा से सॉंझा‌‌ करना पड़ता है।
              यदि हम उस ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो अगले जन्म के लिए मालिक हम सबको और अधिक अच्छा रोल देकर पुनः इस संसार में भेजता है। जिसमें हमें सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और बन्धु-बान्धव मिलते हैं। जीवन में यश मिलता है, चारों ओर से हमें वाहवाही मिलती रहती है।
              इसके विपरीत यदि हम उस प्रभु की अपेक्षाओं पर किसी भी कारणवश खरे सिद्ध नहीं होते अथवा नाकारा सिद्ध हो जाते हैं तो वह आने वाले जन्म में अच्छा पात्र बनाकर नहीं भेजता। तब वह ऐसे-ऐसे रोल देता है जो सारा समय दुखों और परेशानियों में जीने वाले होते हैं। चारों ओर अपेक्षा, और तानों-उलाहनों को सहन करना पड़ता है। सारा जीवन अच्छा समय आने की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है।
              मनुष्य का जन्म या मरण कब होगा, उसे सुख अथवा समृद्धि मिलेगी या नहीं, उसके जीवन में कब सुख अथवा दुख आएँगे ये सब वही ईश्वर निर्धारित करता है। वह चाहे तो मनुष्य घर से बाहर कदम निकाल सकता है अथवा हाथ में पकड़ा हुआ रोटी का निवाला मुँह तक ले जाकर खा सकता है। मनुष्य चाहे भी तो कहीं छुपकर नहीं बैठ सकता क्योंकि वह हर क्षण, हर पल उस मालिक की नजर में रहता है।
             मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है। यदि वह इस स्वतन्त्रता का सदुपयोग करता है तो आगामी जन्म पुण्य कर्मों से भरा होता है। यदि मनुष्य उसका दुरुपयोग करते है तो सजा के रूप में निम्न योनियों में भेजता है। जैसे हम अपने बच्चों को अच्छा काम करने पर शाबाशी और पुरस्कार देते हैं और गलत काम करने पर सजा देते हैं। हम अपने बच्चों को कोई भी काम करने से पहले सदा चेतावनी देते रहते हैं, इसी प्रकार वह भी हमें अन्तरात्मा के द्वारा चेतावनी देता रहता है। यदि हम मान जाते हैं तब गलत काम नहीं करते और अगर सुनकर अनसुना करते हैं तो कष्ट पाते हैं।
             निष्कर्ष से स्वरूप में हम कह सकते हैं कि निश्चित ही मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है परन्तु उसका फल भोगने में नहीं। जहाँ तक हो सके जीवन में नियमानुसार जीने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

धन और बिमारी की चाल

धन और बिमारी की चाल

कुछ समय पूर्व विशाल वर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
             यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैं। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और उसे दिन-रात ही परेशान करते हैं। उस समय हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं, उसी तरह पलक झपकते ही वे चले भी जाएँ। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और पहले हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं । हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ते हैं। फिर हमने समय और धन को खर्च करवाकर वापिस लौटते हैं।
          बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में प्रत्येक मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा या अनिच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को हम स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है। परिवार हमारे साथ होता है। सभी परिवारी जन हमारे कष्ट में हमारे साथ खड़े होते हैं, वे चिन्ता करते हैं। वे अच्छे से अच्छा इलाज करवाते हैं। वे धन और समय भी व्यय करते हैं। पर हमारा दुख, हमारी तकलीफ नहीं बॉंटे सकते।
             सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्वजन्मों में बोयी होती है, वैसी ही तो काटनी पड़ती है। यानी उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होते हैं। इन सबसे बचना किसी भी तरह से सम्भव ही नहीं होता। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
        बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है, वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है। उस कष्ट के समय हम कितना भी रोना-धोना कर लें अथवा चिल्ला लें, उससे कुछ भी नहीं होता। उस समय बस अपने सभी जनों को हम परेशान करने का कारण मात्रा बन जाते हैं।
            अब हम धन की बात करते हैं। धन कमाने के लिए सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। वह रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह अथक परिश्रम करता है तब कहीं जाकर वह अपना और अपने घर-परिवार का पालन-पोषण कर पाता है। 
             कहते हैं पानी की एक-एक बूँद को डालते रहने से मटका भर जाता है, उसी प्रकार एक-एक पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात् कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है तब जाकर मनुष्य अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर पाता है। उस धन से वह अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा के बारे साधन जुटाने में समर्थ होता है।
           खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान को किसी भी तरह के नशे अथवा रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बर्बादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं। वैसे भी सयाने कहते हैं कि यदि धन गलत तरीकों से कमाया जाए तो वह लम्बे समय तक मनुष्य के पास टिकता नहीं है। अनुचित साधनों से कमाया हुआ धन अपने साथ बहुत-सी बुराइयों को लेकर आता है।
          अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली तो हम इस जीवन में नहीं बना सकते परन्तु अपने वर्तमान जीवन में हमें ऐसा प्रयास अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें दबोचने न पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस जन्म में हमें अपने साधनों की शुचिता की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।
           इस प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए। इसके अतिरिक्त खरगोश की चाल से आई हुई बिमारी हमें नैतिक और शारीरिक तौर पर तोड़ने में समर्थ नहीं हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद