गुरुवार, 20 अगस्त 2026

संस्कार से बढ़कर कोई दौलत नहीं

संस्कार से बढ़कर कोई दौलत नहीं 

संस्कार से बढ़कर कोई भी और दौलत इस संसार में नहीं हो सकती। जिन लोगों में संस्कार एवं सदाचरण की कमी होती हैं वे लोग ही दूसरे को अपने घर पर बुलाकर अपमानित करने का यत्न करते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति हमें यही शिक्षा देती है कि अतिथि को देवता मानते हुए उसका सदा सम्मान करो।      
            यह शत-प्रतिशत सत्य है कि संस्कारों से बड़ी कोई दौलत नहीं हो सकती। धन-दौलत आज है और कल समाप्त हो सकता है परन्तु मनुष्य के अच्छे संस्कार और उसका अच्छा व्यवहार हमेशा उसके साथ रहते हैं। यानी जीवन काल में भी और उसके इस संसार से विदा लेने के पश्चात भी उसके संस्कारों की प्रशंसा होती है। यही उसकी असली पूंजी है जो उसके जीवन के हर मोड़ पर काम आती है। 
          मनुष्य की पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं होती बल्कि उसके बात करने के ढंग और बड़ों के प्रति आदर से होती है। धन की चोरी हो सकती है पर संस्कारों की दौलत को कोई नहीं चुरा सकता। जब मनुष्य का कठिन समय आता है उस समय उसका धन साथ छोड़े या न छोड़े, उसके अच्छे संस्कार उसे को टूटने नहीं देते। संस्कारी व्यक्ति अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों और समाज में अपना नाम रोशन करता है।
        मनुष्य के जीवन में संस्कारों का अर्थ व्यक्तित्व का शुद्धिकरण और सही आचरण सीखना होता है। ये व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं, उसे सही और गलत का भेद समझाते हैं और समाज का एक अच्छा व जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद करते हैं।संस्कारों से मन और विचारों में अच्छे गुणों का विकास होता है। 
        अगर किसी व्यक्ति को धोखा देने में मनुष्य सफल हो जाता है तो उसे अपनी जीत का जश्न नहीं मानना चाहिए। यदि उसके धोखे का उत्तर ऊपर वाले ने दिया तो वह सहन करना कठिन हो जाता है। मनीषी कहते हैं कि वह प्रभु परम न्यायकारी है। उसके यहाँ हर बुराई का भी फैसला अवश्य होता है। उसकी अदालत में देर तो हो सकती है पर अंधेर कभी नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहने वाला उससे हर तरह की बात करता है। उसकी अच्छाइयों पर शाबाशी देता है और बुराइयों में उसको परामर्श देता है। वह हर मामले पर चर्चा करके विचारों का आदान-प्रदान करता रहता है। इसके विपरीत धोखा देने की प्रवृत्ति वाला मनुष्य तो सिर्फ चिकनी-चुपड़ी बात करके अपना हित साधता है। वह मन से उसका हितचिन्तक नहीं होता।
      योग्य व्यक्ति न किसी से दबते हैं और न ही किसी को दबाते हैं। संसार का दस्तूर बहुत अलग तरह का हैं, जहाँ वह असफल लोगों का तिरस्कार करता हैं और सफल लोगों से ईर्ष्या करता है।
        समाज की बहुत बड़ी विडम्बना यह है कि कुछ लोग अपनी विवशताओं के कारण जीते-जी मर जाते हैं, सारा जीवन अभावों में जीते हैं। उनका इस धरती पर होना अथवा न होना कोई मायने नहीं रखता। इसके विपरीत कुछ लोग अपने सत्कार्यों की बदौलत मरने के पश्चात अमर हो जाते हैं। युगों-युगों तक इतिहास उन्हें स्मरण करता रहता है। समय-समय पर उनके उदाहरण दिए जाते रहते हैं।
          इस संसार में बहुत काम ऐसे लोग हैं जो किसी से हमदर्दी रखते हैं या उनके बारे में अच्छा सोचते हैं। हर कोई अपने बारे में सोचना चाहता है इसीलिए वह दूसरों को तिरस्कृत कर देता है।
        इस धरती पर लोग एक-दूसरे के साथ केवल अपनी आवश्यकताओं के लिए जुड़ते हैं और याद करते हैं। जिसने इस संसार की रचना की उस दाता को भी याद नहीं करना चाहते। जब जरूरत होती है तभी उसे याद करते हैं।
          मनुष्य अपने अहं में इतना डूबा हुआ है कि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है। अतः किसी को सम्मान नहीं देना चाहता। यदि मान देता भी है तो पहले अपनी जरूरत के विषय में सोचता है। किसी और की उसे कोई चिंता नहीं होती। जहाँ स्वार्थ टकराने लगते हैं तो  वहाँ प्यार, अपनापन आदि नहीं हो सकते। जब काम निकल जाता है तो किसी को पहचानते ही नहीं हैं।
          इन्सानी चरित्र में इतना परिवर्तन आता जा रहा है कि यदि कभी कारणवश मनुष्य को श्मशान में जाना पड़ जाता है तो वह वहाँ पर भी ऊबने लगता है। किसी को मृतक के साथ सहानुभूति रखना या उसके विषय में सोचने, चर्चा करने का समय ही नहीं होता। उन्हें तो बस वहाँ भी अपने कार्य ही याद आते हैं। अपने सगे लोग ही पूछ्ने लग पड़ते हैं कि बहुत देर हो गयी है अभी और कितना समय लगेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि धीरे-धीरे मनुष्य अपनी सम्वेदनाएँ खोता जा रहा है।
          यह हद दर्जे की सोच है कि किसी को अपने दिल में स्थान मत दो और यदि किसी कारण से जगह देनी पड़ जाए तो उतनी ही देनी चाहिए जितनी वह देता हैं। हमारे मन संकुचित होते जा रहे हैं, उसे हम विशाल बनाना ही नहीं चाहते। यदि सभी लोग यही सोच रखने लगें तो संसार का क्या होगा?
        सार रूप में हम यह कह सकते हैं कि सच्ची सम्पत्ति धन-दौलत नहीं बल्कि अच्छे संस्कार और ईमानदारी हैं। यही जीवन की सबसे मूल्यवान विरासत है जो व्यक्ति को सर्वत्र सम्मान, विश्वास और सफलता दिलाती है।
          ईश्वर का अंश होते हुए भी मनुष्य उन ईश्वरीय गुणों से दूर भागता रहता है। अपनी आँखों से तब तक स्वार्थ का चश्मा नहीं उतरेगा तब तक उसे सृष्टि के सौन्दर्य का बोध नहीं होगया। हृदय को विशाल बनाने पर सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

ईश्वर हमारी बेलेन्सशीट का ऑडिटर

ईश्वर हमारी बैलेन्सशीट का ऑडीटर

हम सभी अपने व्यापर-व्यवसाय में अथवा जमा पूँजी यानी धन-सम्पत्ति का ब्यौरा रखते हैं। हर वर्ष की समाप्ति पर अकाऊंटेंट से उसकी बैलेंसशीट तैयार करवाते हैं। उसका उद्देश्य यही होता है कि पूरा वर्ष हमने क्या कमाया और क्या खर्च किया? सारे खर्चों को निकालकर हमारी शुद्ध बचत कितनी हुई। फिर उसी बची हुई राशि को हम आगामी वर्ष के लिए अपनी ओपनिंग स्टॉक बनाकर भविष्य के लिए योजनाएँ बनाते हैं।
          कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर जिन्दगी की बैलेंसशीट को किसी ने सूत्र रूप में लिखा था। आज हम उसी का विश्लेषण करते हैं।
          जीवन का ओपनिंग स्टाक मनुष्य का जन्म होता है। मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों के फल को भोगने के लिए भाग्य के रूप में उसके साथ ईश्वर भेजता है। निश्चित ही उसी के अनुसार मनुष्य अपने जीवन में सुख-दुख के मीठे और कड़वे फल भोगता है।
        मनुष्य के क्रेडिट या जमा क्या होता है? जो उसके खाते से क्या कम होता है अथवा डेबिट या घटाया जाता है?
          इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि हमारे शुभाशुभकर्मों की राशि हमारे खाते में जमा होती रहती है जिनका फल हम सुख-दुःख के रूप में भोगते हैं। भोगने के पश्चात वह राशि हमारे खाते से घटा दी जाती है। जो शुभाशुभकर्म हम इस जन्म में करते हैं, वे उस चली आ रही राशि में जुड़ जाते है।
          जीव की मृत्यु उसका क्लोजिंग स्टॉक होता है। यानी नया जन्म लेने तक वह अब वह कोई कमाई नहीं कर सकेगा। मनुष्य के सुविचार अथवा कुविचार उसका एसेट होते हैं। उन्हीं के अनुसार जीवन में उसे सफलता या असफलता मिलती है। उसके मित्र बनते हैं और समाज में उसका स्थान निर्धारित होता है। यही सब विचार उसकी देनदारी भी बनते हैं।
        मनुष्य का लाभ उसकी प्रसन्नता होती है और दुःख उसकी हानि होती है। किसी तरह वह जीवन में इन सबसे बच नहीं पाता। उसे ये भोगने ही पड़ते हैं, उनसे छुटकारा किसी भी तरह सम्भव नहीं होता। मनुष्य की आत्मा उसकी गुडविल होती है। उसकी आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसे अपने शुद्ध व पवित्र विचारों से सात्विक बनाए रखना उसका परम कर्तव्य बनता है। जहाँ उसमें कलुषता के भाव आने लगते हैं, निस्सन्देह वहीं उसकी आध्यात्मिक उन्नति बाधित होने लगती है।
          मनुष्य का हृदय ही उसकी अचल सम्पत्ति होती है। यदि इसमें सद् विचार, सरलता, सहजता आदि गुणों का समावेश होता रहेगा तो मनुष्य सहृदय बन जाता है अन्यथा क्रूरता उसे दबोच लेती है। इसी से उसके संस्कारों और महानता का ज्ञान होता है। वह चाहे तो अपनी अचल सम्पत्ति में बढ़ोतरी कर सकता है अथवा उसे बर्बाद कर सकता है। यह उसकी समझदारी पर निर्भर करता है।
          उसके कर्तव्य उसकी आऊट स्टेंडिंगग होते हैं जिनका उसे सही तरीके से निर्वहण करना होता है। उसकी मित्रता उसका गुप्त समझौता होती है। इससे पता चल जाता है की मनुष्य कैसा होगा? उसके आचार-व्यवहार की झलक उसके मित्रों से मिल जाती है। संगति का प्रभाव मनुष्य पर बहुत अधिक होता है।
        मनुष्य का चरित्र उसकी वास्तविक पूँजी होती है। यही उसकी महानता की कसौटी होता है। यह सभी धनों से मूल्यवान होता है। इसकी रक्षा उसे यत्नपूर्वक करनी चाहिए।
         ज्ञान मनुष्य का वास्तविक इनवेस्टमेंट होता है जो जन्म-जन्मान्तर तक उसका साथ देता है। हर जन्म में जो भी ज्ञान वह अर्जित करता है, वह पहले वाले ज्ञान के साथ जुड़कर वृद्धि को प्राप्त करता है।यही ज्ञान नए जन्म में उसे भाग्यशाली बनाता है। इसलिए मनुष्य को यत्नपूर्वक ज्ञानार्जन करते रहना चाहिए।
        सहनशीलता उसका बैंक बैलेन्स होता है और उसके विचार करण्ट अकाऊण्ट होते हैं। इसी प्रकार उसका अपना व्यवहार सामान्य प्रविष्टि होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सहनशील व्यक्ति को हो सकता है कि लोग मूर्ख कहें परन्तु उससे अधिक समझदार कोई ओर नहीं हो सकता। 
          मनुष्य के विचारों की परिपक्वता ही उसकी महानता का प्रतीक होती है। वह अपने व्यव्हार से सबको अपना बना लेता है। ऐसे लोगों के शत्रु बहुत कम होते हैं।
         मनुष्य के मन में अवसाद का आना शुभ लक्षण नहीं  होता। अतः अपनी बैलेंसशीट को सदा अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। जहाँ तक हो सके उसमें झूठी एंट्रियाँ नहीं होनी चाहिएँ। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि ईश्वर हमारी इस बैलेन्स शीट का ऑडीटर है। इस दुनिया के ऑडीटर तो हेराफेरी करके गलत बैलेंसशीट बना सकते हैं पर वह मालिक ऐसा नहीं करेगा। उसे असत्य से घृणा है। जहाँ भी हम चूक करने का यत्न करेंगे वहीँ वह हमारी गलती पकड़ लेगा। तब उसकी सजा से मनुष्य को कोई नहीं बच सकता।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

ईश्वर भक्तों का वर्गीकरण

ईश्वर भक्तों का वर्गीकरण

परमपिता परमात्मा की इस सुन्दर सृष्टि में विभिन्न प्रकार के लोग विद्यमान हैं। वे अलग विचार और स्वभाव वाले होते हैं। सबके चारित्रिक गुण एवं दोष भी एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न होते हैं। ईश्वर के प्रति उनके कैसे भाव हैं? इसे आधार बनाकर यदि उनका वर्गीकरण किया जाए तो उन लोगों को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। यानी इस संसार में प्रभु के भक्त तीन तरह के लोग होते हैं - प्रथम कोटि, मध्यम कोटि और अन्य कोटि।
          प्रथम श्रेणी में वे लोग आते हैं जो परमपिता परमात्मा के प्रति अपने मन में अतिशय अनुराग रखते है। ऐसे मनुष्य ईशचर्चा के अतिरिक्त कभी कोई अन्य बात करना ही नहीं चाहते। सोते-जागते, उठते-बैठते वे प्रभु भक्ति में ही लीन रहना चाहते हैं। यही भक्त लोग ईश्वरमय कहलाते हैं। इस संसार में वे जल में कमल की भॉंति विचरण करते हैं। ऐसे लोगों को हम ईश्वर का सच्चे भक्त कहते हैं। 
          उन्हें लगता है कि यह  जीवन उस मालिक की अमानत है। इसलिए निस्वार्थ भाव से उसका ध्यान और स्मरण करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। ऐसा विचार करते हुए वे लोग सदा अपनी सच्ची साधना बिना किसी दिखावे के करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे ईश्वर की भक्ति में लीन रहने के कारण अपने दायित्वों से मुॅंह मोड़ लेते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वे अपने सभी कार्य ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। उनमें कर्त्तापन का भाव समाप्त हो जाता है।
          दुनिया के लोग उनके विषय में कुछ भी कहते रहें, वे अपनी धुन के पक्के होते हैं और अपने चुने हुए मार्ग पर बिना पीछे मुड़कर देखे आगे बढ़ते चले जाते हैं। ऐसे ही लग्नशील लोग अन्ततः प्रभु की शरण में जाते हैं और इस संसार के चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। निस्सन्देह यही लोग ईश्वर के उत्तम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
          दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो सदा ही सांसारिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते हैं। उनका मन संसार में रमता है। वे सदा ही भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते रहते हैं। वे ईश्वर नाम की किसी सत्ता को नहीं मानते। कभी भी उसकी सत्ता को चुनौती देने से परहेज नहीं करते। उन्हें स्वयं को भगवान कहलवाने में कोई संकोच नहीं होता बल्कि वे आनन्दित होते हैं।
        जो लोग उस मालिक के परमभक्त हैं, वे उनका उपहास करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग भी करते हैं। जब उन पर अत्यधिक कष्ट आते हैं तब मजबूरी में ही सही उसकी शरण में जाते हैं। उस समय मालिक को कोसने और गाली-गलौच करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग मध्यम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
        तीसरी श्रेणी में वे लोग आते है जो प्रभुचर्चा करते अवश्य हैं परन्तु उनकी वृत्ति उसमें नहीं लगाती। फिर भी वे चाहते हैं कि सभी लोग उनको ईश्वर का परम भक्त मानें, उनकी सराहना करें और भक्त होने का सम्मान दें। इसलिए वे दान-पुण्य का प्रदर्शन करते हैं और प्रभुभक्ति का ढोंग करते हैं। वे अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं। चर्चा में बने रहें, इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
          इसके साथ-साथ कालाबाजारी करना, हेराफेरी करना, भ्रष्टाचार में लिप्त होना, किसी का गला काटना आदि दुष्कार्य करने में भी परहेज नहीं करते। इस प्रकार उनकी भक्ति का दिखावा और दुर्व्यसनों में वृत्ति एकसाथ चलते रहते हैं। उनकी सफेदपोशी बनी रहे इसके लिए वे अनेकानेक तिकड़में भिड़ाते रहते हैं। समाज के लोग इनके सामने किसी भी कारण से कुछ न कहें पर उनकी पीठ पीछे उनका तिरस्कार करते हैं। उनके विषय में कभी अच्छा नहीं बोलते।
        ये अधम कोटि के लोग सदा ही दो नावों पर सवार होना चाहते हैं। परन्तु वे यह बात भूल जाते हैं कि दुनिया का दस्तूर यही है कि दो नावों पर सवार होने वाले व्यक्ति कभी तरते नहीं हैं, वे निश्चित ही डूब जाते हैं। उस समय उन लोगों का बचना कठिन हो जाता है। 
        उत्थान और पतन की एक सहज गति होती है। इन्हें हम एक ही सिक्के के दो पहलू कह सकते हैं। अब हमारा चुनाव है कि हम सिक्के की किस ओर का चयन करते हैं।‌ ईश्वरोन्मुख व्यक्ति सदा आध्यात्मिक उन्नति करते हैं और उससे विमुख रहने वाले पतन या अधोगति की ओर जाते हैं। अवचेतन मन की पाशविक ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य को पुनः पुनः अपने जाल में फंसाती रहती हैं। वे उसे विषय-भोगों की ओर प्रवृत्त करती रहती हैं। मनुष्य चाहकर भी स्वंय को उनसे विलग नहीं कर पाता और पतन के मार्ग पर चल पड़ता है।
        अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह किस और जाना चाहता है। अपनी मानवीय कमजोरियों पर अंकुश लगाकर जन्म-जन्मान्तरों के बन्धनों से मुक्त होकर वह सद् गति प्राप्त करना चाहता है अथवा विषय-भोगों में डूबकर चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ जन्म-मरण के बन्धन में बँधे रहना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 17 अगस्त 2026

ईश्वर के साथ मौन संवाद

ईश्वर के साथ मौन संवाद 

ईश्वर के साथ मनुष्य को प्रतिदिन कुछ समय निकालकर, मौन रहकर संवाद करने का अभ्यास करना चाहिए। मौन साधक की तपस्या का फल उसे अवश्य प्राप्त होता है। मौन एक बहुत बड़ा शस्त्र है यानी हथियार है। इसे हम ब्रह्मास्त्र भी कह सकते हैं। मौन की कोई भाषा नहीं होती किन्तु वह अपने मन की सारी बात समझा देता है। परन्तु जब कभी इसका विस्फोट होता है तब इस ज्वालामुखी की आँच से चारों ओर भयंकर तबाही मच जाती है। उस समय उस आँच से बच पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं होता।
         मौन साधना वह अद्भुत मानसिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें वाणी, मन और शरीर को शान्त रखकर असीम ऊर्जा संचित की जाती है। कम बोलने या पूर्ण चुप रहने से मानसिक भटकाव रुकता है, एकाग्रता बढ़ती है। इसके अभ्यास से व्यक्ति सीधे अपने आन्तरिक स्वरूप से जुड़ पाता है। 
          बोलने में खर्च होने वाली मानसिक और शारीरिक ऊर्जा मनुष्य के भीतर ही सुरक्षित रहती है। इससे विचारों का कोलाहल कम होता है और तनाव या बेचैनी से मुक्ति मिलती है। मन स्थिर होने से स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है। मनुष्य सार्थक संवाद कर सकने में समर्थ हो जाता है।
          मौन का महत्त्व समझती हुई एक घटना मुझे स्मरण हो रही है। एक बार कबीरदास जी ने और रैदास जी ने परस्पर मिलने का कार्यक्रम बनाया। उन दोनों के शिष्य बहुत प्रसन्न हुए और परस्पर कहने लगे, "गुरुजनों की इस विशिष्ट ज्ञानचर्चा का लाभ उन्हें भी मिलेगा।"
          तीन दिन तक कबीरदास जी और रैदास जी प्रातःकाल से सायंकाल तक एक कक्ष में बैठे रहते थे और उनके शिष्य दरवाजे पर कान लगाकर खड़े रहते थे, "शायद उनके कानों में इस ज्ञान चर्चा का कुछ अंश पड़ जाए और वे लोग भी लाभान्वित हो सकें।" 
         उनका सारा श्रम व्यर्थ चला गया क्योंकि इन तीन दिनों में उन दोनों ने कुछ बोला ही नहीं। तीन दिनों के पश्चात वे दोनों अपने शिष्यों के साथ वापिस लौटने लगे। तब शिष्यों ने उनसे पूछा, " तीन दिनों तक एक कमरे में आप लोग बैठे रहे परन्तु आप दोनों ने कोई बात नहीं की और अब बिना बात किए ही वापिस जाने लगे हैं।" 
        कबीर जी ने कहा, "हमने न बोलते  हुए भी एक-दूसरे से बहुत-सी बातें कर ली हैं। जो बातें मैंने अपने मन से रैदास जी को कहीं वे उन्होंने समझ लीं। इस प्रकार जो बातें उन्होंने मुझसे अपने मन के माध्यम से मुझे कहीं वे मैंने समझ ली हैं।" 
         तो यह है मौन की वास्तविक परिभाषा जो बिना कुछ कहे सब कुछ कह देती है। ज्ञानी इस मौन की महत्ता को समझ लेता है और अज्ञानी इस मौन की खिल्ली उड़ाकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता है। अपनी बात कहने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि ढेर सारे शब्दों का आदान-प्रदान ही किया जाए। 
        हम सब जानते हैं कि माँ जब बच्चे से नाराज होती है तो कहती मैं तुमसे बात नहीं करूँगी। उस समय बच्चा यह नहीं सहन कर सकता कि उसकी माँ उससे बात न करे। हम सबने अनुभव किया है कि कक्षा में जब शरारती बच्चे को सजा दी जाती है तो कहा जाता है, "मुँह पर अँगुली रखकर कक्षा के कोने में खड़े हो जाओ। "    
          पति-पत्नी में यदि मौन पसरने लगे तो उनके बीच होने वाले अबोलेपन के कारण उनमें अलगाव तक हो जाता है। इससे उनका परिवार बिखर जाता है। उसका भुगतान आयुपर्यन्त बच्चों को अकारण ही करना पड़ता है।
        मौन रहकर भी अपनी बात दूसरे तक पहुँचाई जा सकती है। इसे कहते हैं आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा। जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और मौन स्वयं ही मुखरित होने लगता है।
            मौन एक बहुत कठिन साधना है। इसका कारण है कि मनुष्य अधिक समय तक बिना बोले नहीं रह सकता। कुछ लोग तो एक वाक्य में अपनी बात न कह पाने जे कारण अनेक वाक्य एक साथ बोल जाते हैं। इस व्रत का पालन करना खाला जी का घर नहीं है। 
        ऋषि-मुनि आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए इस मौन की साधना किया करते हैं। मनुष्य जितना अधिक मौन रहता है, उतनी ही उसकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। अधिक बोलने वाला मनुष्य अनर्गल प्रलाप करने लगता है जो उसके तिरस्कार का कारण बनता है। 
          मौन से मनुष्य की वाणी अधिक धारदार हो जाती है। उसमें एक प्रकार का ओज आने लगता है और उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। सम्भव हो तो प्रतिदिन कुछ समय के लिए इसका अभ्यास हर व्यक्ति को करना चाहिए।
        इसी प्रकार यदि मनुष्य ईश्वर से मौन संवाद कर सके तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही संवर जाएँगे। तब उसके जन्म-मरण के बन्धनों को कटने से कोई नहीं रोक सकेगा। फिर यह संसार और उसके कार्य-व्यव्हार सब यहीं धरे रह जाएँगे। उसके साथ बस ईश्वर का साथ रह जाएगा यानी वह उसी परमात्मा में लीन होकर मुक्त हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 16 अगस्त 2026

निन्यानवे का फेर

निन्यानवे का फेर

'निन्यानवे का फेर' एक प्रसिद्ध हिन्दी भाषा का मुहावरा है। इसका अर्थ होता है धन को कमाने, जोड़ने या बढ़ाने का ऐसा लालच अथवा चक्कर है जिसके कारण मनुष्य हर समय बस पैसे जोड़ने की फिक्र में डूबा रहता है। यह ऐसी तृष्णा है जो कभी खत्म नहीं होती। यह फेर मनुष्य को बहुत परेशान करता है। इस फेर से न तो कोई आज तक बच पाया है और भविष्य में भी शायद ही कोई इससे बच सकेगा। इसके कारण मनुष्य सारा समय बस लाभ-हानि की फिक्र में फंसा रहता है।
        आखिर यह निन्यानवे का फेर है क्या? क्यों यह सबके दुःख का कारण बनता है? इससे बच पाना मनुष्य के लिए असम्भव क्यों है?
        ये कुछ प्रश्न हैं जिनकी हम विवेचना करेंगे। निन्यानवे (99) यानी गणितीय रूप से नब्बे (90) और नौ (9) का योग होता है जो सौ (100) से एक कम होता है। इसे अंकों में '99' लिखा जाता है।
           बचपन में एक दृष्टान्त सुना था। बहुत समय पहले एक गरीब दम्पत्ति बहुत कष्ट में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। पर वे दोनों बड़े सुकून से रहते थे। उनकी यह दुरावस्था किसी सहृदय सज्जन से देखी नहीं गई। उसने उनकी सहायता करने का विचार किया। यदि वे सामने से जाकर सहायता करते तो स्वाभिमानी दम्पत्ति आहत हो जाते। वे उन्हें दुखी नहीं करना चाहते थे।
         इसलिए उन्होंने ने एक निर्णय लिया। उन्होंने एक थैली में कुछ रुपए डाले और उसे उस दम्पत्ति के घर में चुपके से रख दिया। अब वे देखना चाहते थे कि वे दोनों उस धन को पाकर क्या प्रसन्न हो जाएँगे? उन्होंने उन दोनों पर अपनी नजर रखनी शुरू कर दी।
          उन दोनों ने जब अपने घर में अचानक रुपयों से भरी थैली देखी तो उनकी खुशी का पारावार न रहा। वे अपने सौभाग्य को सराहने लगे। जब उन्होंने ने थैली में से पैसे निकालकर गिने तो वे निन्यानवे सिक्के निकले। अब उनके मन में यह इच्छा बलवती हुई कि किसी तरह इस राशि को सौ तक पहुँचा दें। अब उनका सारा सुख-चैन खो गया। दिन-रात उन्हें बस एक ही धुन रहती कि किसी तरह उनकी धनराशि सौ रुपए हो जाए।
        वे खूब मेहनत करके कमाते रहते और जब उन्हें लगता कि अब उनके पास सौ रुपए हो जाएँगे तो ऐसे खर्च आ जाते कि उन्हें वे टाल न पाते। इस कारण वह राशि सौ के आंकडे तक पहुँच ही नहीं सक रही थी। कहते हैं कि इसीलिए यह 'निन्यानवे के फेर' वाली उक्ति बनी।
          यह केवल उस गरीब दम्पत्ति की व्यथा-कथा नहीं है बल्कि हम सब लोग भी इसी कमाने धुन में दिन-रात कठोर परिश्रम करते हुए कोल्हू का बैल बन जाते हैं। अपना सुख-चैन गंवा देते हैं पर मनचाहा धन नहीं कमा पाते।
         इन्सान इस धन को कमाने की होड़ में अपना-आपा तक भूल जाता है। उसका मस्तिष्क बस पैसे को कमाने की जुगाड़ में लगा रहता है। उसका हृदय सच-झूठ, भ्रष्टाचार, कालाबजारी, किसी का गला काटने से भी परहेज न करता हुआ सम्वेदना शून्य तक हो जाता है। जिनके लिए वह सारे पाप-पुण्य करता है, उन्हीं से दूर होकर एक समय के पश्चात अकेला रह जाता है।
          यह पैसा है कि इसकी हवस दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है। जितना मनुष्य इसके पीछे भागता है उतना ही वह उसे और नाच नाचता है। इन्सान सोचता है कि उसने इतना कमा लिया की उसकी सात पुश्तें आराम से बैठकर खा सकती हैं। पर वह भूल जाता है कि जो भी वस्तु मनुष्य को बिना मेहनत किए मिल जाती है, वह उसकी कद्र नहीं करता। 
        यही बात धन-सम्पत्ति के साथ भी होती है। अनायास मिले अकूत धन-वैभव को उसके उत्तराधिकारी सम्हाल नहीं पाते और उसे दुर्व्यसनों में बर्बाद कर देते हैं। फिर जायज-नाजायज तरीके से कमाया हुआ सारा धन तो व्यर्थ होता ही है और जिनको सताया था, उनकी बद्दुआएँ भी मनुष्य का पीछा नहीं छोड़तीं।
          इसीलिए सयाने कहते हैं-
            पूत सपूत तो का धन संचै
            पूत कपूत तो का धन संचै।
अर्थात् यदि पुत्र सुपुत्र है तो वह स्वयं ही काम लेगा, उसके लिए धन का संचय न करो। यदि पुत्र कुपुत्र है तो वह सारा धन उजाड़ देगा, उसके लिए धन संचय करना व्यर्थ है।
          इसके अतिरिक्त सुनामी, भूकम्प, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय यह अनैतिक कमाई नहीं दूसरों द्वारा दिए गए आशीर्वाद ही काम आते हैं। इस सत्य को कभी भी अपने मन से नहीं निकालना चाहिए।
          तात्पर्य यही है कि बच्चों को संस्कारी बनाएँ। धन तो वे काम ही लेंगे। स्वयं भी ईमानदारी और सच्चाई से धन कमाइए उसमें बहुत बरकत होती है। ईश्वर भी ऐसे सज्जनों से प्रसन्न रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 15 अगस्त 2026

मन को भटकने से बचाऍं

मन को भटकने से बचाऍं

अपने मन को सदा शान्त और प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उसे अनावश्यक ही इधर-उधर भटकने से बचाना अचाहिए। यदि मन ही भटकने लगेगा तब मनुष्य कभी सहज नहीं हो सकता। वह बैचेन होने लगता है। उसके लिए एक-एक पल व्यतीत करना बहुत कठिन हो जाता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता। न ही उसकी किसी से बात करने की इच्छा होती है। उस समय उसे किसी वस्तु में मन नहीं लगता। वह बस अकेला रहना चाहता है। 
          यहॉं हम चर्चा करते हैं कि बड़े शहरों में प्रायः सारा दिन बिजली रहती है। यदि थोड़ी देर के लिए न भी रहे तो महसूस नहीं होता। इसका कारण है कि वहॉं पर प्रायः सबने अपने घरों में इन्वर्टर लगाए हुए होते हैं। इसके विपरीत छोटे शहरों और दूर-दराज के इलाकों में बिजली की समस्या बहुत विकट होती है। बिजली कब जाती है और कब आती है, इसका कुछ भी ठिकाना नहीं होता। इसलिए वहॉं पर रहने वाले लोग परेशान होने लगते हैं। वे बिजली विभाग को कोसने लगते हैं।
      किसी दूर के इलाके में बिजली न होने के कारण एक व्यक्ति बहुत परेशान हो गया। रात का समय हो गया था पर लाइट नहीं आई थी। उसे अपना कोई बहुत जरूरी कार्य निपटाना था। इसलिए उसने अपने कमरे में रात के समय रौशनी करने के लिए एक छोटा-सा दीया जला दिया। अपने हाथ में लिए गए उस आवश्यक कार्य को उसने निपटा दिया। आधी रात का समय हो गया था और  वह बहुत थक भी गया था। उसने सोचा कि अब सो जाना चाहिए। 
        उसने फूँक मारकर वह दीया बुझा दिया तो उस कमरे में अंधेरा हो गया है। उसे यह देख कर हैरानी हुई कि जब तक दीया कमरे में जल रहा था तब तक चाँद कमरे के बाहर खड़ा होकर दीये के बुझने की प्रतीक्षा कर रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि कमरे में अंधेरा होते ही उसे बाहर चन्द्रमा की रौशनी दिखाई देने लगी। इसी प्रकार प्रातः कालीन सूर्य हमारे घर के दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा में बाहर खड़ा रहता है। ज्यों ही दरवाजा खुलता है वह मुस्कुराता हुआ अपनी रौशनी घर के अन्दर और बाहर चारों ओर बिखेर देता है। उसी प्रकार दीये के बुझते ही चन्द्रमा की किरणें उस अंधेरे कमरे में फैल गईं। उसने अपनी शीतल चाँदनी हर तरफ बिखेर दी। 
      प्रकृति का यह अलौकिक रूप देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव आ गया। उसके मन में यह विचार आया कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार का मुकाबला डटकर सकता है, अपना प्रकाश फैला सकता है। जब तक चाहे उसकी राह का रोड़ा बन सकता है। मनुष्य उस छोटे से दीये की तरह दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी क्यों नही बन सकता? वह अपने मन को उत्साहित क्यों नहीं कर सकता?
          सूर्य और चन्द्रमा के समान परम तेजस्वी परमात्मा को स्वयं से दूर करने के लिए हमने भी अपने जीवन में इसी तरह के बहुत से छल-प्रपंच किए हुए हैं। उसकी सुन्दर छवि यानी उसके दिव्य प्रकाश को निहारने की हम बिल्कुल भी कोशिश नहीं करते। उससे सब कुछ पा जाना चाहते हैं पर उसको पाने के लिए कोई परिश्रम नहीं करना चाहते।
      हम अपने मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण व्यर्थ ही के दुराग्रह पाले रहते हैं। अपने स्वार्थ में हम अन्धे हो जाते हैं, इस कारण हमें कुछ भी नहीं दिखाई देता। हम अपने मन के अंधेरों में घिरे रहते हैं।‌ उस समय अपने ऊपर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं रहता। बिना सोचे-समझे हम अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं। हर जीव को तुच्छ समझने की हमारी प्रवृत्ति ही हमारे विनाश का कारण बन जाती है।
        इसलिए हम हर समय अशान्त रहते हैं। हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। उसका दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। हमारी कार्यक्षमता दिनों-दिन प्रभावित होती है। इस सबसे बढ़कर हमारे ही स्वजन सारा दिन घर के बोझिल माहौल के कारण परेशान होते रहते हैं। घर में नकारात्मक ऊर्जा अपने पैर पसारने लगती है। देखते ही देखते घर में अशान्ति का साम्राज्य हो जाता है। यह वातावरण घर के किसी भी सदस्य के लिए भी सुखदायी नहीं होता।
        सबसे अधिक खलबली हमारी वाणी मचाती है। उसका बेलगाम हो जाना खतरे की घण्टी बन जाती है। यही वाणी राज कराती है और यही दर-दर की ठोकरें खिलाती है। इसकी कटुता को कोई भी सहन नहीं कर सकता। इसको नियन्त्रण में रखना बहुत आवश्यक होता है अन्यथा जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपनी वाणी को विश्राम नहीं देता तब तक उसका मन शान्त नहीं रह सकता। अशान्त मन में तो ईश्वर का वास नहीं हो सकता। 
          अपने मन को पवित्र बनाना बहुत आवश्यक होता है। तभी उस शुद्ध मन में ईश्वर का निवास बन सकता है। जहाँ तक हो सके अपने मन को भटकने से बचाना चाहिए। जब तक मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आ पाएगी तब तक वह अपने अन्तस में विद्यमान परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर सकता।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर 

मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए विभिन्न प्रकार के आडम्बर रचता रहता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर का तात्पर्य है अपने मतलब या लाभ को पूरा करने के लिए झूठा दिखावा करना या पाखण्ड करना। लोग समाज में खुद को बड़ा, ईमानदार या ज्ञानी दिखाने के लिए नकली रूप अपनाते हैं। वे अपनी वास्तविकता को छुपाकर बड़ा होने का नाटक करते हैं या झूठा दिखावा करते हैं। ऐसे लोग दूसरे लोगों से विश्वासघात करके, धोखा देकर अपना काम निकालते में सिद्ध होते हैं। इससे समाज में झूठ और दिखावे की आदत बढ़ती चली जाती है। 
          वैसे मनुष्य में आन्तरिक विनम्रता सहज होती है और उसके संस्कारजन्य होती है। विनम्रता का यह गुण अहंकार से रहित होता है। दूसरों का आदर करना, शिष्टाचार का पालन करना, मधुर भाषण करना,  लज्जा, संकोच, आज्ञाकारिता आदि गुण विनम्रता के सहचर हैं। ऐसे व्यक्ति को घर-परिवार, बन्धु-बान्धव और समाज शील-सदाचरण वाला मानता है।
        विनम्रता मनुष्य का चारित्रिक गुण है। मनुष्य के हाव-भाव और शारीरिक चेष्टाओं से उसकी विनम्रता सबके समक्ष प्रकट होती है। बड़ों के प्रति सम्मानभाव, छोटों की गलतियों पर उन्हें क्षमा कर देना विनम्र व्यक्ति की पहचान होती है। कभी अपने से कोई भूल हो जाए तो निसंकोच रूप से क्षमा याचना करना मनुष्य का एक बहुत बड़ा गन होता है। यह स्वाभाविक गुण विनम्र व्यक्तियों को एक अलग पहचान देता है।
          परन्तु जहाँ दूसरों की चापलूसी करना, उनके आगे बिछ जाना, किसी के पैर अपने मतलब के लिए पकड़ लेना, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेना आदि स्वार्थ की पराकाष्ठा है। यह किसी मनुष्य की चरित्रगत गिरावट को दर्शाती है। ऐसे व्यक्ति का समाज में कोई भी आदर नहीं करता। ऐसे स्वार्थी व्यक्ति से लोग एक समय के पश्चात किनारा करने लगते हैं ।
          शिष्य की अपने गुरु के प्रति सादर विनम्रता, सन्तान का अपने माता-पिता के प्रति विनयशील होना, पति-पत्नी का परस्पर विनययुक्त व्यवहार, कार्यालय में नम्रता आदि भौतिक सम्बन्धों का मूल होता है। विनयी की विनम्रता बिना किसी भेदभाव के अपने-पराए सभी के लिए ही होती है।
          भाग्य पर विश्वास करने वाले इस गुण को जन्मजात मानते हैं। उनका कथन है कि यह विलक्षण संस्कार अन्य गुणों की भाँति ही मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार पूँजी के रूप में मिलता है। कई बार अपने आसपास की या बाहरी परिस्थितियाँ भी उस पर अपना प्रभाव डालती हैं पर वह क्षणिक होता है। उनके घर-परिवार और भाग्य से मिले संस्कार उन्हें वापिस सन्मार्ग पर लेकर आ जाते हैं।
        वैसे दूसरों की दया पर निर्भर रहने वाले मनुष्यों में जबरदस्ती वाली विनम्रता  आती है। किसी की चाकरी करने वाले सेवक से, बॉस अपने अधीनस्थ कर्मचारी से हमेशा विनम्रता की अपेक्षा करते हैं। जहाँ उन्होंने पलटकर जवाब दिया वहीँ उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। कितना भी प्रिय व्यक्ति का भी उत्तर देना कोई सहन नहीं कर सकता।
          सज्जनों की संगति, स्वाध्याय और ईश्वर भजन  के कारण आने वाली विनम्रता  वास्तविक होती है। वैसे विद्यार्जन या विद्वत्ता की पहली शर्त होती है विनम्रता-
              विद्या ददाति विनयम्।
अर्थात् विद्या विनय को देती है।
          इसी कड़ी में निम्न श्लोक देखते हैं जिसमें कवि ने कहा है कि -
      नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः
     शुष्कवृक्षाः च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन।।
अर्थात् फल वाले वृक्ष झुकते हैं और गुणीजन झुकते हैं परन्तु दूसरी ओर मूर्ख व्यक्ति 
और ठूँठ हुए पेड़ कभी नहीं झुकते।
          कवि का स्पष्ट कथन है कि मूर्ख अपनी बेवकूफियों के कारण अकड़कर रहते हैं। दूसरी ओर ठूँठ हुए पेड़ भी तनकर खड़े रहते हैं और न झुक पाने के कारण टूट जाते हैं। पेड़ वही झुकते हैं जिन पर फल लगे होते हैं। उसी प्रकार मनुष्य वही विनम्र होते हैं जिनके पास गुण होते हैं।
          विनम्रता मनुष्य का आभूषण है। कुछ लोग इस गुण को मनुष्य की कमजोरी मान लेते हैं जो उचित नहीं है। संसार के प्रति सहिष्णुता या विनम्रता को अपनाने वालों को ईश्वर के प्रति भी विनम्र होना चाहिए। वही मनुष्य को सर्वविध सुख-सुविधाएँ देता है। उसका तिरस्कार करने का स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए।
          इस विनम्रता रूपी गुण को सदा यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए। स्वार्थपरता रूपी अवगुण का यथासम्भव त्याग कर देना चाहिए। इसे अपनाकर मनुष्य को हठी अथवा उद्दण्ड नहीं बनना चहिए। अपने सद् गुणों के प्रति मनुष्य को सदैव सजग रहना चाहिए। तभी वह सर्वत्र सम्मान का अधिकारी बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद