शनिवार, 15 अगस्त 2026

मन को भटकने से बचाऍं

मन को भटकने से बचाऍं

अपने मन को सदा शान्त और प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उसे अनावश्यक ही इधर-उधर भटकने से बचाना अचाहिए। यदि मन ही भटकने लगेगा तब मनुष्य कभी सहज नहीं हो सकता। वह बैचेन होने लगता है। उसके लिए एक-एक पल व्यतीत करना बहुत कठिन हो जाता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता। न ही उसकी किसी से बात करने की इच्छा होती है। उस समय उसे किसी वस्तु में मन नहीं लगता। वह बस अकेला रहना चाहता है। 
          यहॉं हम चर्चा करते हैं कि बड़े शहरों में प्रायः सारा दिन बिजली रहती है। यदि थोड़ी देर के लिए न भी रहे तो महसूस नहीं होता। इसका कारण है कि वहॉं पर प्रायः सबने अपने घरों में इन्वर्टर लगाए हुए होते हैं। इसके विपरीत छोटे शहरों और दूर-दराज के इलाकों में बिजली की समस्या बहुत विकट होती है। बिजली कब जाती है और कब आती है, इसका कुछ भी ठिकाना नहीं होता। इसलिए वहॉं पर रहने वाले लोग परेशान होने लगते हैं। वे बिजली विभाग को कोसने लगते हैं।
      किसी दूर के इलाके में बिजली न होने के कारण एक व्यक्ति बहुत परेशान हो गया। रात का समय हो गया था पर लाइट नहीं आई थी। उसे अपना कोई बहुत जरूरी कार्य निपटाना था। इसलिए उसने अपने कमरे में रात के समय रौशनी करने के लिए एक छोटा-सा दीया जला दिया। अपने हाथ में लिए गए उस आवश्यक कार्य को उसने निपटा दिया। आधी रात का समय हो गया था और  वह बहुत थक भी गया था। उसने सोचा कि अब सो जाना चाहिए। 
        उसने फूँक मारकर वह दीया बुझा दिया तो उस कमरे में अंधेरा हो गया है। उसे यह देख कर हैरानी हुई कि जब तक दीया कमरे में जल रहा था तब तक चाँद कमरे के बाहर खड़ा होकर दीये के बुझने की प्रतीक्षा कर रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि कमरे में अंधेरा होते ही उसे बाहर चन्द्रमा की रौशनी दिखाई देने लगी। इसी प्रकार प्रातः कालीन सूर्य हमारे घर के दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा में बाहर खड़ा रहता है। ज्यों ही दरवाजा खुलता है वह मुस्कुराता हुआ अपनी रौशनी घर के अन्दर और बाहर चारों ओर बिखेर देता है। उसी प्रकार दीये के बुझते ही चन्द्रमा की किरणें उस अंधेरे कमरे में फैल गईं। उसने अपनी शीतल चाँदनी हर तरफ बिखेर दी। 
      प्रकृति का यह अलौकिक रूप देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव आ गया। उसके मन में यह विचार आया कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार का मुकाबला डटकर सकता है, अपना प्रकाश फैला सकता है। जब तक चाहे उसकी राह का रोड़ा बन सकता है। मनुष्य उस छोटे से दीये की तरह दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी क्यों नही बन सकता? वह अपने मन को उत्साहित क्यों नहीं कर सकता?
          सूर्य और चन्द्रमा के समान परम तेजस्वी परमात्मा को स्वयं से दूर करने के लिए हमने भी अपने जीवन में इसी तरह के बहुत से छल-प्रपंच किए हुए हैं। उसकी सुन्दर छवि यानी उसके दिव्य प्रकाश को निहारने की हम बिल्कुल भी कोशिश नहीं करते। उससे सब कुछ पा जाना चाहते हैं पर उसको पाने के लिए कोई परिश्रम नहीं करना चाहते।
      हम अपने मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण व्यर्थ ही के दुराग्रह पाले रहते हैं। अपने स्वार्थ में हम अन्धे हो जाते हैं, इस कारण हमें कुछ भी नहीं दिखाई देता। हम अपने मन के अंधेरों में घिरे रहते हैं।‌ उस समय अपने ऊपर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं रहता। बिना सोचे-समझे हम अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं। हर जीव को तुच्छ समझने की हमारी प्रवृत्ति ही हमारे विनाश का कारण बन जाती है।
        इसलिए हम हर समय अशान्त रहते हैं। हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। उसका दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। हमारी कार्यक्षमता दिनों-दिन प्रभावित होती है। इस सबसे बढ़कर हमारे ही स्वजन सारा दिन घर के बोझिल माहौल के कारण परेशान होते रहते हैं। घर में नकारात्मक ऊर्जा अपने पैर पसारने लगती है। देखते ही देखते घर में अशान्ति का साम्राज्य हो जाता है। यह वातावरण घर के किसी भी सदस्य के लिए भी सुखदायी नहीं होता।
        सबसे अधिक खलबली हमारी वाणी मचाती है। उसका बेलगाम हो जाना खतरे की घण्टी बन जाती है। यही वाणी राज कराती है और यही दर-दर की ठोकरें खिलाती है। इसकी कटुता को कोई भी सहन नहीं कर सकता। इसको नियन्त्रण में रखना बहुत आवश्यक होता है अन्यथा जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपनी वाणी को विश्राम नहीं देता तब तक उसका मन शान्त नहीं रह सकता। अशान्त मन में तो ईश्वर का वास नहीं हो सकता। 
          अपने मन को पवित्र बनाना बहुत आवश्यक होता है। तभी उस शुद्ध मन में ईश्वर का निवास बन सकता है। जहाँ तक हो सके अपने मन को भटकने से बचाना चाहिए। जब तक मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आ पाएगी तब तक वह अपने अन्तस में विद्यमान परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर सकता।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर 

मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए विभिन्न प्रकार के आडम्बर रचता रहता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर का तात्पर्य है अपने मतलब या लाभ को पूरा करने के लिए झूठा दिखावा करना या पाखण्ड करना। लोग समाज में खुद को बड़ा, ईमानदार या ज्ञानी दिखाने के लिए नकली रूप अपनाते हैं। वे अपनी वास्तविकता को छुपाकर बड़ा होने का नाटक करते हैं या झूठा दिखावा करते हैं। ऐसे लोग दूसरे लोगों से विश्वासघात करके, धोखा देकर अपना काम निकालते में सिद्ध होते हैं। इससे समाज में झूठ और दिखावे की आदत बढ़ती चली जाती है। 
          वैसे मनुष्य में आन्तरिक विनम्रता सहज होती है और उसके संस्कारजन्य होती है। विनम्रता का यह गुण अहंकार से रहित होता है। दूसरों का आदर करना, शिष्टाचार का पालन करना, मधुर भाषण करना,  लज्जा, संकोच, आज्ञाकारिता आदि गुण विनम्रता के सहचर हैं। ऐसे व्यक्ति को घर-परिवार, बन्धु-बान्धव और समाज शील-सदाचरण वाला मानता है।
        विनम्रता मनुष्य का चारित्रिक गुण है। मनुष्य के हाव-भाव और शारीरिक चेष्टाओं से उसकी विनम्रता सबके समक्ष प्रकट होती है। बड़ों के प्रति सम्मानभाव, छोटों की गलतियों पर उन्हें क्षमा कर देना विनम्र व्यक्ति की पहचान होती है। कभी अपने से कोई भूल हो जाए तो निसंकोच रूप से क्षमा याचना करना मनुष्य का एक बहुत बड़ा गन होता है। यह स्वाभाविक गुण विनम्र व्यक्तियों को एक अलग पहचान देता है।
          परन्तु जहाँ दूसरों की चापलूसी करना, उनके आगे बिछ जाना, किसी के पैर अपने मतलब के लिए पकड़ लेना, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेना आदि स्वार्थ की पराकाष्ठा है। यह किसी मनुष्य की चरित्रगत गिरावट को दर्शाती है। ऐसे व्यक्ति का समाज में कोई भी आदर नहीं करता। ऐसे स्वार्थी व्यक्ति से लोग एक समय के पश्चात किनारा करने लगते हैं ।
          शिष्य की अपने गुरु के प्रति सादर विनम्रता, सन्तान का अपने माता-पिता के प्रति विनयशील होना, पति-पत्नी का परस्पर विनययुक्त व्यवहार, कार्यालय में नम्रता आदि भौतिक सम्बन्धों का मूल होता है। विनयी की विनम्रता बिना किसी भेदभाव के अपने-पराए सभी के लिए ही होती है।
          भाग्य पर विश्वास करने वाले इस गुण को जन्मजात मानते हैं। उनका कथन है कि यह विलक्षण संस्कार अन्य गुणों की भाँति ही मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार पूँजी के रूप में मिलता है। कई बार अपने आसपास की या बाहरी परिस्थितियाँ भी उस पर अपना प्रभाव डालती हैं पर वह क्षणिक होता है। उनके घर-परिवार और भाग्य से मिले संस्कार उन्हें वापिस सन्मार्ग पर लेकर आ जाते हैं।
        वैसे दूसरों की दया पर निर्भर रहने वाले मनुष्यों में जबरदस्ती वाली विनम्रता  आती है। किसी की चाकरी करने वाले सेवक से, बॉस अपने अधीनस्थ कर्मचारी से हमेशा विनम्रता की अपेक्षा करते हैं। जहाँ उन्होंने पलटकर जवाब दिया वहीँ उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। कितना भी प्रिय व्यक्ति का भी उत्तर देना कोई सहन नहीं कर सकता।
          सज्जनों की संगति, स्वाध्याय और ईश्वर भजन  के कारण आने वाली विनम्रता  वास्तविक होती है। वैसे विद्यार्जन या विद्वत्ता की पहली शर्त होती है विनम्रता-
              विद्या ददाति विनयम्।
अर्थात् विद्या विनय को देती है।
          इसी कड़ी में निम्न श्लोक देखते हैं जिसमें कवि ने कहा है कि -
      नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः
     शुष्कवृक्षाः च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन।।
अर्थात् फल वाले वृक्ष झुकते हैं और गुणीजन झुकते हैं परन्तु दूसरी ओर मूर्ख व्यक्ति 
और ठूँठ हुए पेड़ कभी नहीं झुकते।
          कवि का स्पष्ट कथन है कि मूर्ख अपनी बेवकूफियों के कारण अकड़कर रहते हैं। दूसरी ओर ठूँठ हुए पेड़ भी तनकर खड़े रहते हैं और न झुक पाने के कारण टूट जाते हैं। पेड़ वही झुकते हैं जिन पर फल लगे होते हैं। उसी प्रकार मनुष्य वही विनम्र होते हैं जिनके पास गुण होते हैं।
          विनम्रता मनुष्य का आभूषण है। कुछ लोग इस गुण को मनुष्य की कमजोरी मान लेते हैं जो उचित नहीं है। संसार के प्रति सहिष्णुता या विनम्रता को अपनाने वालों को ईश्वर के प्रति भी विनम्र होना चाहिए। वही मनुष्य को सर्वविध सुख-सुविधाएँ देता है। उसका तिरस्कार करने का स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए।
          इस विनम्रता रूपी गुण को सदा यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए। स्वार्थपरता रूपी अवगुण का यथासम्भव त्याग कर देना चाहिए। इसे अपनाकर मनुष्य को हठी अथवा उद्दण्ड नहीं बनना चहिए। अपने सद् गुणों के प्रति मनुष्य को सदैव सजग रहना चाहिए। तभी वह सर्वत्र सम्मान का अधिकारी बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

बच्चों जैसी निश्छल हंसी

बच्चों जैसी निश्छल हंसी

बच्चों की निश्छल हंसी हर किसी का मन मोह लेती है। जहाँ उसमें कुटिलता का भाव आया वहीं मात्र औपचारिकता रह जाती है। कुटिल हंसी वाले लोग न विश्वसनीय होते हैं और न ही हितचिन्तक। बड़े लोग भी यदि बच्चों की भॉंति निश्छल हंसी हंसने लगें तो उनका तनाव समाप्त हो सकता है।
         बच्चों की निश्छल हंसी स्वार्थ, दिखावे और तनाव से पूरी तरह मुक्त होती है। यह मासूमियत, पवित्रता और सच्ची खुशी का प्रतीक है जो बिना किसी कारण या बिना किसी मतलब के केवल दिल के आनन्द से फूट पड़ती है। ऐसी खिलखिलाहट से भरी हंसी बड़े से बड़े गम और तनाव को पल भर में दूर कर देती है। 
        इस हंसी में कोई छिपा हुआ उद्देश्य या लालच नहीं होता। यह मन को हल्का और तरोताजा कर देती है। इसे सुनकर आसपास के लोगों के चेहरे पर भी अपने आप मुस्कान आ जाती है। बच्चे बीती बातों या भविष्य की चिन्ता किए बिना सिर्फ उस पल का आनन्द लेते हैं।
          सयानों का कहना है कि दिन में एकबार जोर से खिलखिलाकर अवश्य ही हंसना चाहिए। इसके बहुत लाभ होते हैं। मनुष्य के अन्तस् में विद्यमान अवसाद दूर हो जाता है और शरीर के अंग-प्रत्यंगों को प्रभावित करता है।
          आज के भागमभाग वाले इस युग में सभी टेंशन में यानी परेशानी में रहते हैं। उनसे ऐसी हंसी हंसने की बात करना ही व्यर्थ हो जाता है। हंसने की मानसिकता यदि नहीं बन पाती तो मुस्कुराया भी जा सकता है। हंसने का यह वरदान ईश्वर ने केवल मनुष्यों को ही दिया है पशुओं को नहीं।
          हंसने के पैसे नहीं लगते। यह तो मनुष्य की प्रसन्नता और संपन्नता की पहचान है। उसकी उन्मुक्त हंसी कई चेहरों को मुरझाने से बचा सकती है और उन्हें खुशियाँ दे सकती है। एक बच्चा जब खिलखिलता हुआ सबके सामने आता हैं तो सब लोग अपनी परेशानी भूलकर उसके साथ खुश होने लगते हैं। उसकी भोली-भाली शरारतें हर किसी को गुदगुदा देती हैं। बड़े भी उस समय उसके साथ बच्चा बन जाते हैं और भूल जाते हैं कि वे बच्चा नहीं एक समझदार इन्सान हैं।
       भारत में यहाँ-वहाँ पार्को में लाफ्टर क्लब बने हुए हैं। वहॉं सदस्य अपनी हंसी का जलवा दिखाते हैं। उन्हें देखकर अनजान आदमी यही सोचेगा की ये सभी लोग पागल हो गए हैं जो अजीब-सी हरकते कर रहे हैं। 
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी और काम के बोझ के कारण हमें यह याद ही नहीं रहता कि खिलखिलाकर हम कब हंसे थे? हंसना बहुत महत्त्वपूर्ण है परन्तु हम उसे अनदेखा करके अपनी मजबूरियों का रोना रोते रहते हैं। जिन्दगी हंसने की बदौलत स्वस्थ एवं खुशनुमा बन सकती है।
         खुलकर हंसना व्यायाम की श्रेणी में आता है। यह व्यायाम मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, इमोशनल, आध्यात्मिक और सामाजिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है। इसी प्रकार उसके वैयक्तिक, कार्यक्षेत्र और समाज की सेहत में भी बहुत सुधार लाता है।
        हंसने से हृदय में रक्त का संचार होता है। शरीर से निकलने वाला एंडोर्फिन रसायन हृदय को मजबूत बनाता है। सबसे प्रमुख बात यह  होती है कि हंसने से हार्ट-अटैक की सम्भावना कम हो जाती है। मनुष्य स्वस्थ रहता है।
          हंसने से ऑक्सीजन अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षातन्त्र मजबूत हो जाता है। इससे कैंसर कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। 
        यदि प्रातः काल हास्य ध्यान योग किया जाए तो दिन भर प्रसन्नता रहती है। रात इस योग को करने से नींद अच्छी आती है। शरीर में कई प्रकार के हारमोंस का स्राव होता है, जिससे मधुमेह, पीठ-दर्द एवं तनाव से पीङित व्यक्तियों को लाभ होता है।
          हँसने से मनुष्य में सकारत्मक ऊर्जा बढती है। खुशहाल सुबह से कार्यक्षेत्र का माहौल भी खुशनुमा होता है। चुटकुले पढ़कर या सुनकर दिन की शुरूआत एक जोरदार हंसी के साथ की जा सकती है। 
        कहते हैं कि प्रतिदिन एक घण्टा हँसने से 400 कैलोरी ऊर्जा की खपत होती है और मनुष्य का मोटापा नियन्त्रित रहता है। 
        प्रकृति भी यही समझाती है कि जिस प्रकार वर्षा के बाद खिली धूप, खिले हुआ फूल और लहलहाते हरे भरे पेड़ अपनी प्रसन्नता को प्रकट करते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी समय-समय पर अपनी खुशी प्रकट करते रहना चाहिए।
           मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि अधिक हंसने वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। जापान के लोग अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही हंसते रहने की शिक्षा देते हैं।
          इस हंसने के लाभ बहुत हैं पर हानि कोई नही होती। इसलिए जब भी अवसर मिले खिलखिलाकर हंसना मत भूलिए। जब हम स्वयं खुश एवं स्वस्थ रहेंगे तभी अपने आसपास का वातावरण भी खुशनुमा बना सकेंगे। इससे स्वयं को तो आनन्द आता ही हैं दूसरे भी आनन्दित होते हैं। हास-परिहास दुःख और कष्ट का दुश्मन है, निराशा और चिन्ता का अचूक इलाज यानी रामबाण औषधि है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 12 अगस्त 2026

परमात्मा शक्तियॉं किसे देता

परमात्मा शक्तियाँ किसे देता

परमात्मा सारी शक्तियाँ उसी व्यक्ति को देता हैं जो सच्चे मन से उसकी पूजा-अर्चना करता है। यदि हम मन की गहराई से उसे याद करें तो मनुष्य को कुछ भी माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वह मालिक तो स्वयं ही सब कुछ दे देता है। परमात्मा से कुछ माँगो नहीं और उससे दूरी भी मत बनाओ। बल्कि उसे सदा अपने हृदय में बसाकर याद करो। 
         परमात्मा शक्तियाँ किसी विशेष व्यक्ति को छॉंटकर नहीं देता। वह सच्चे मन से  उपासना करने वाले भक्त, पवित्र मन वाले और परोपकारी स्वभाव वाले मनुष्यों को देता है। जो लोग ध्यान, प्रार्थना और अच्छे कर्मों से खुद को योग्य बनाते हैं, परमात्मा उन्हें आन्तरिक शक्ति, शान्ति और ज्ञान का वरदान देता है। 
        जो लोग बिना किसी स्वार्थ के ईश्वर का स्मरण करते हैं। उनका मन बुरे विचारों और विकारों से साफ होता है। वे अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता करने के लिए करते हैं। उन्हें ईश्वर कठिन समय में अडिग रहने के लिए सहनशक्ति देता है। मन को बिखरने से बचाने की उन्हें क्षमता प्रदान करता है। साथ ही उन्हें सही और गलत की पहचान करने की बुद्धि देता है।
          दुःख आने पर तो उस मालिक को सभी याद करते हैं परन्तु सुख के समय तो उसे भूल जाते हैं। उसका हर स्थिति में स्मरण करते रहना चाहिए। कबीरदास बहुत सुन्दर शब्दों में इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- 
    दुःख में सिमरन सब करें सुख में करे न कोय।
   जो सुख में सिमरन करें तो दुःख कहे को होय।।
अर्थात् कबीरदास जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि दुःख में तो ईश्वर को सब याद करते हैं पर सुख के समय कोई स्मरण नहीं करता। यदि सुख के समय परमपिता परमात्मा का पूजन-अर्चन किया जाए तो दुःख अपनी दाल गलती न देखकर मनुष्य के पास फटकते ही नहीं हैं, दूर भाग जाते हैं। ईश्वर उन्हें इतनी आत्मिक शक्ति देता है कि वे दुख मनुष्य को पीड़ित नहीं करते।
        दुःख मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अवश्य मिलते अवश्य हैं। ईश्वर का स्मरण करते रहने से मनुष्य में बहुत अधिक आत्मशक्ति आ जाती है। तब  उसे दुःख शूलों या काँटों की तरह नहीं प्रतीत होते बल्कि वे फूलों की तरह लगने लगते हैं। इन्सान के मन से सुख और दुःख दोनों का ही भेद मिट जाता है। वह सुख-दुःख के द्वन्द्व को एक समान रूप से मानने लगता है।
          एक छोटा बच्चा जब किसी कारण से परेशान होता है तब अपनी माँ के पास जाता है। माँ अपने बच्चे के बिना कुछ कहे ही, केवल उसका चेहरा देखकर समझ जाती है कि उसका बच्चा किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट से गुजर रहा है। वह उसे बड़े प्यार से अपने पास बैठाकर उसके सिर पर अपना हाथ रखती है। उसका निस्वार्थ प्रेम बच्चे के दुःख-दर्द को दूर करने में सहायक बनता है।
           ईश्वर जो जगज्जननी है, उसकी भी अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएँ होती है। वह भी तो अपनी सन्तान मनुष्य को हर परिस्थिति में अपनी शरण में लेने के बाहें फैलाए प्रतीक्षा करता रहता है। जिस प्रकार सागर नदी को उसके उदगम से वहाँ पहुँचने तक की यात्रा के सारे कष्टों से मुक्त करने के लिए, उसकी प्रतीक्षा अपनी बाहें फैलाकर करता है।
          इस भौतिक संसार के माता-पिता के पास हम अपनी सभी समस्याओं को लेकर जाते हैं। इसी तरह उस मालिक की भी इच्छा होती है कि उसके बच्चे सदा अपनी हर समस्या को उससे साझा करें। उसके पास आकर वे अपनी व्यथा-कथा का बखान करें। उससे उस कष्ट से मुक्त करने के लिए गुहार लगाएँ।
          गर्मी के ताप से तपा हुआ मनुष्य पंखे से हवा माँगता नहीं है अपितु बटन दबाता है और उसके सामने बैठ जाता है। उस समय स्वयं ही हवा उसे मिलने लगती है और उस ताप से मुक्ति देती है।
          उसी तरह दुनिया के सन्तापों से तपे हुए मनुष्य यदि बिना आडम्बर के उसका ध्यान करते हुए बैठ जाएँ तो वह निश्चित ही उनके त्रिविध तापों -  आधिभौतिक (सांसारिक वस्तुओं या जीवों से प्राप्त कष्ट), आधिदैविक (दैवीं आपदाएँ या पूर्व में स्वयं के किए गए कर्मों से प्राप्त कष्ट) और आध्यात्मिक (अज्ञानजनित) को दूर करता है।
        संसार के सभी कार्यव्यवहार करते हुए, उनमें जल में कमल की तरह लिप्त न होते हुए, प्रभु को पाने की स्वाभाविक तड़प ही मनुष्य को उस मालिक के करीब ले जाती है। तब वह उसी का चिन्तन करता है और उसी का भजन करता है। तभी मनुष्य की ऐसी स्थिति बनती है कि वह आगे-आगे चलता है और सिद्धियाँ उसके पीछे-पीछे भागती हैं।
          परमात्मा की निष्काम उपासना का यही सार है कि मनुष्य को बिना माँगे ही वह सब कुछ मिल जाता है जो उसके हर प्रकार के अज्ञान को दूर करके उसे भवसागर से पार तर जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

अन्तस् की प्रतिच्छाया चेहरे पर

अन्तस् की प्रतिच्छाया चेहरे पर

हमारे अन्तस् में जो भी विचार होते हैं, उनकी प्रतिच्छाया हमारे चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देती है और हमारे हाव-भाव फिर उसे मूर्त रूप दे देते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य प्रसन्न होता है तो खुशी उसके चेहरे पर छलकती है। जब वह हताश या निराश होता तब उसका चेहरा मुर्झाया हुआ होता है। इसी प्रकार कठोर, नृशंस व्यक्ति के चेहरे पर कठोरता दिखाई देती है। सरल व सहज हृदय व्यक्ति के चेहरे पर अलग ही ओज होता है।
        इसीलिए अंग्रेजी भाषा में यह निम्न उक्ति कही जाती है-       
      face is the index of mind.
        विद्वान यदि ऐसा कहते हैं तो इसमें सार अवश्य ही होगा। हमारे मन के भाव चेहरे पर आते हैं, इसका अनुभव हम सब ने बहुधा किया है। आज इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है? मनुष्य में अपने भावों को छिपाने की महारत हासिल क्यों नहीं कर सका? क्यों चेहरे के हावभाव देखकर उसके मन की बात पढ़ ली जाती है?
          इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले हम इस बोधकथा पर विचार करते हैं। हो सकता है इसे पढ़कर हमारी जिज्ञासा का कुछ समाधान हमें मिल जाए।
          एक व्यक्ति ने अपने गुरु से पूछा, "मेरे कर्मचारी मेरे प्रति ईमानदार नहीं है। मेरी पत्नी, मेरे बच्चे और सभी दुनिया के लोग स्वार्थी हैं, कोई भी सही नहीं हैं।"
        गुरु थोडा मुस्कुराए और उन्होंने उसे एक कहानी सुनाई, "एक गाँव में एक अलग-सा कमरा था, उसमें एक हजार शीशे लगे हुए थे। एक छोटी लड़की उस कमरे में गई और खेलने लगी। उसने देखा एक हजार बच्चे उसके साथ खेल रहे है। उसे उन बच्चों को देखकर आनन्द आने लगा। जैसे ही उसने अपने हाथ से ताली बजाई, सभी बच्चे उसके साथ ताली बजाने लगे। उसने सोचा यह दुनिया की सबसे अच्छी जगह है और यहाँ वह सबसे अधिक प्रसन्न रह सकती है। वह बार बार इस स्थान पर आना चाहेगी।"
          इसी जगह पर एक उदास आदमी आया। उसने अपने चारों ओर हजारों दुखी और रोष से भरे हुए चेहरे देखे। वह बहुत दुखी हुआ और उसने हाथ उठा कर सभी को धक्का लगाना चाहा, उसने देखा हजारों हाथ उसे धक्का मार रहे है। उसने कहा दुखी होते हुए कहा, "यह दुनिया की सबसे खराब जगह है। वह यहाँ दुबारा नहीं आना चाहता और उसने वह जगह छोड़ दी।"
           इसी तरह यह दुनिया भी एक कमरा है जिसमें हजारों आईने यानी शीशे लगे हुए हैं। जो कुछ भी हमारे अन्दर भरा होता है, वही हमें सर्वत्र दिखाई देता है। हम अपने मन को बच्चों की तरह सरल, सहज और निश्छल रख सकें तो यह दुनिया हमारे  लिए स्वर्ग की तरह ही आनन्ददायी हो जाएगी। 
          हमें अपने मन को बस संकुचित नहीं बनने देना है बल्कि उसे विशाल बनाना है। यह कोई ऐसा कठिन कार्य नहीं है जो हम कर नहीं सकते। बस मन में सोई हुई इच्छाशक्ति को जगाना है।
          हृदय में जो भाव होते हैं वे मनुष्य के चेहरे पर स्पष्टतः दिखाई देते हैं। वह उनको छिपा नहीं सकता क्योंकि उसके चेहरे के हावभाव देखकर उसके मन को आसानी से पढ़ा जा सकता है।
        सज्जनों की स्वभावगत सरलता और जनमानस के प्रति उनका अगाध प्रेम उनके चेहरे से छलकता है। सन्तों के मुख पर उनकी भक्ति का तेज दिखाई दे जाता है। मनुष्य का भोलापन भी किसी से छिप नहीं सकता।
        इसके विपरीत दुर्जनों की कठोरता, उनकी क्रूरता की झलक उनके चेहरों पर प्रत्यक्ष देखी जा सकती है जिससे सभी समझदार लोग बचकर निकलना चाहते हैं। यही कहते हैं कि इनके मुँह कौन लगे।
          इसी प्रकार दुःख-तकलीफ और कष्ट-परेशानी को भी चेहरे की रेखाओं में पढ़ा जा सकता है। मानवोचित गुण दया, ममता, करुणा, सहृदयता आदि गुण मनुष्य की पहचान बनते हैं। इनके अतिरिक्त क्रोध, ईर्ष्या, नफरत, लालच (लार टपकना), असहायता, दयनीयता आदि भावों को चाहकर भी मनुष्य किसी से छुपाने में सफल नहीं हो सकता।
          कुछ लोग इस कला में दक्ष होते हैं उनके मन की बात जोर देने पर भी कोई नहीं जान पाता। उनका हृदय सभी प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने में समर्थ होता है। इसलिए वे हर स्थिति में एकसमान रहते हैं। 
          इस तरह मनुष्य का चेहरा उसकी चुगली कर देता है। यदि वह नहीं चाहता कि उसकी चोरी पकड़ी जाए तो उसे अपने मन को साधना होगा। तभी उसके मजबूत हृदय के भाव किसी दूसरे को नहीं दिखाई देंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

विद्वत्ता की कसौटी

विद्वत्ता की कसौटी

मनुष्य पढ़-लिखकर जब योग्य बनता है तो उसके घर-परिवार और बंधु-बान्धवों में उसे  सम्मान मिलता है। वैसे प्रत्येक मनुष्य की हार्दिक इच्छा होती है कि वह बुद्धिमान व्यक्ति कहलाए। विद्वान उसकी बुद्धिमत्ता का लौहा मानें। किसी सभा में यदि वह जाए तो उस विद्वत सभा में उसकी ही चर्चा हो। सभी उससे अपना सम्बन्ध बनाने के लिए इच्छुक रहें। सर्वत्र उसे एक विशेष स्थान मिले। 
          अब हम विचार करते हैं कि विद्वत्ता की कसौटी क्या है? मनुष्य को बुद्धिमान बनने के लिए कुछ तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक हैं- 
          सबसे पहली अथवा प्रमुख बात यह है कि मनुष्य का विचरवान होना आवश्यक होता है। उसे मननशील होना चाहिए। जब वह एकान्त में बैठकर विचार करता है तो उसे करणीय और अकरणीय का बोध हो जाता है। उसी के अनुरूप अकरणीय कार्यों का परित्याग करता हुआ और करणीय कार्यों के आलम्बन से दिन-प्रतिदिन उन्नति करता हुआ वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है।
          सज्जनों का अनुकरण करना और विद्वानों की संगति में रहना बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य में एक प्रकार का ठहराव आता है। उसका व्यवहार सब लोगों के साथ प्रायः सन्तुलित होने लगता है। उसके मन में व्यष्टि (एक) के स्थान पर समष्टि (सबका) का भाव आने लगता है। तभी वह सबको अपने साथ लेकर चल पाता है।
        जब वह ज्ञानार्जन करता है तब वह अपने नकारात्मक विचारों के जंजाल से मुक्त होकर सकारात्मक मनोवृत्ति वाला हो जाता है। इस तरह ईर्ष्या-द्वेष आदि दुर्भावनाओं के परित्याग करने से वह महापुरुषों की श्रेणी में आ जाता है। हर स्थान पर उसे यथोचित मान-सम्मान मिलने लगता है। इस तरह वह अग्रणी बनकर समाज में दिशा देने का कार्य करने लग जाता है।
          मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपनी योग्यता और अनुभव को देश, समाज, घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में बाँटे। इससे उसे अपना जीवन संवारने के साथ-साथ दूसरों को भी मार्गदर्शन करना चाहिए। समाज को ऐसे मनीषियों की बहुत आवश्यकता है जो निस्वार्थ होकर उसकी भलाई के कार्य कर सकें। इन समाज सुधारकों को युगों-युगों तक स्मरण किया जाता है।
        आजकल राजाओं का युग नहीं है फिर भी हम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति को इस श्रेणी में मान सकते हैं। मनीषियों का विद्वानों के सम्मान के विषय में यह मानना है - 
        स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
अर्थात् राजा का सम्मान उसके अपने देश में होता है। इसके विपरीत विद्वान को हर स्थान पर मान दिया जाता है।
          हम देखते हैं कि हमारे देश के उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर आदि विश्व के किसी भी देश में चले जाएँ, उन्हें सर्वत्र सिर-आँखों पर बिठाया जाता है और उन्हें समान रूप से सम्मान दिया जाता है। उनकी नियुक्तियाँ अच्छे वेतनमान पर होती हैं। इन लोगों को अपने देश में भी उतना‌ ही पुरस्कृत किया जाता है।
          कहने का तात्पर्य यही है कि विद्वान किसी भी आयु अथवा जाति का हो वह सदा पूजनीय होता है। विद्वत्ता के समक्ष आयु की सीमा कोई मायने नहीं रखती, वह गौण हो जाती है। जाति का बन्धन भी गौण हो जाता है। सीखने की जहॉं तक बात है, एक बच्चे से भी ज्ञान लिया जा सकता है। इसमें हेठी जैसी कोई बात नहीं होती।
          यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि विद्वत्ता न होने पर, उसका ढोंग कर लेने से वह विद्वानों की श्रेणी में आ जाएगा तो यह उस मनुष्य की सरासर भूल है। मूर्ख व्यक्ति जब भी मुँह खोलेगा तो उसकी पोल खुल जाएगी। इस तरह तब दूसरों से तिरस्कृत होने पर उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है। इसके लिए हम कह सकते हैं कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, बार-बार नहीं चढ़ती।
          यहॉं संस्कृत भाषा के विश्व सुप्रसिद्ध विद्वान् महाकवि कालिदास की चर्चा करना चाहती हूॅं। अपने पूर्व काल में वे निपट मूर्ख थे। विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए उनका विवाह परम विदुषी विद्योतमा से करवा दिया था। अशुद्ध 'उष्ट्र' शब्द सुनकर उनकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया था। विद्वानों की संगति और ईश्वर की उपासना से वे विद्वान बने।
          विद्वानों को यह सिद्ध करने की या प्रचार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वे बहुत जानकार हैं। लोग उनके प्रचारतन्त्र से प्रभावित होकर उनसे कुछ सीखें। होता इसके विपरीत है, लोग ढूँढते हुए उनके पास आकर अपनी ज्ञान पिपसा को शान्त करते हैं।
          विद्वानों की विद्वत्ता कस्तूरी की गन्ध की भाँति होती है जिसे चाहे सात पर्दों में भी छुपाकर क्यों न रखा जाए, वह चारों ओर के वातावरण को सुगन्धित कर ही देती है।
          विद्वत्ता मनुष्य को ईश्वर का दिया हुआ उपहार है। वह उसे अपने पुण्य कर्मों की बदौलत प्राप्त करता है। मनुष्य भाग्य के भरोसे नहीं बैठ सकता। उसे फिर भी कठोर परिश्रम करना पड़ता है। दिन-रात एक करना पड़ता है। स्वाध्याय, मनन, सज्जनों की संगति और ईश्वर की उपासना करके ज्ञान को निस्सन्देह प्राप्त किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 9 अगस्त 2026

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता 

 मनुष्य के भाग्य में जो भी लिखा होता है वही उसे मिलता है। न उससे अधिक और न ही उससे कम। यह भाग्य हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार बनता है। यदि पूर्व जन्मों में हमारे शुभकर्मों की अधिकता होती है तो इस जन्म में सुख-सुविधा के सभी साधन उपलब्ध होते हैं। इसके विपरीत दुष्कर्मों की यदि अधिकता होती है तब इस जन्म में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक बेहद लोकप्रिय और गहरी सोच है -
        समय से पहले और भाग्य से ज्यादा 
        किसी को कुछ नहीं मिलता
यद्यपि इसका सही अर्थ यह है कि हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए। भाग्य और कर्म दोनों ही जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
          भाग्य मनुष्य को जीवन की परिस्थितियाँ और अवसर प्रदान करता है, लेकिन उन परिस्थितियों में वह कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या निर्णय लेता है, यह पूरी तरह से उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। मनुष्य की कामना या इच्छा ही उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। बिना इच्छा के कोई भी सार्थक प्रयास सम्भव नहीं हो सकता।
          भाग्य के भरोसे बैठने से सब कुछ मिल जाएगा, ऐसा नहीं होता। बिना पुरुषार्थ या मेहनत‌ के भाग्य का फल भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि सब कुछ भाग्य में ही लिखा है तो भी कर्म करना आवश्यक है क्योंकि भाग्य केवल पिछले कर्मों का परिणाम (बैंक बैलेंस) होता है।‌ मनुष्य की वर्तमान इच्छाऍं और पुरुषार्थ या परिश्रम ही मनुष्य 
के नए भाग्य का निर्माण करते हैं।‌ यदि वह आज कर्म नहीं करेगा तो भविष्य में उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा। 
          हमें समझाते हुए सयाने यह कहते हैं - 
         पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर
अर्थात् इस कथन का सीधा-सा अर्थ यही है कि मनुष्य का भाग्य उसके जन्म लेने से पूर्व ही निर्धारित हो जाता है। इसीलिए वर्तमान जीवन में मनुष्य को उसी के अनुसार समय-समय पर शुभाशुभ फल प्राप्त होता है।
        इसी विषय को उदाहरण सहित भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाया है -
  पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्?
 नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्    धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? 
  यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क क्षमः।अर्थात् करीर के वृक्ष में यदि पत्ते नहीं लगते तो इसमें वसन्त ऋतु का क्या दोष है? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? चातक पक्षी के मुँह में यदि वर्षा की धारा नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात उसे ब्रह्मण्ड की कोई ताकत भी नहीं मिटा सकती।
           करीर के वृक्ष पर पत्ते न लगने का कारण वसन्त ऋतु नहीं है। पतझड़ में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और वसन्त में तो सभी वृक्ष हरे-भरे दिखाई देते हैं। उन पर खिले रंग-बिरंगे फूल प्रकृति के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं।  चारों ओर हरियाली का साम्राज्य होता है जो बहुत ही मनमोहक होती है।
          कर्म के माध्यम से भाग्य को बदलने की शक्ति और उदाहरणों के बारे में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले 'श्रीमद्भगवद्गीता' के कर्म सिद्धान्त पर प्रकाश डाला गया है। वहॉं स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है। जैसा वह आज बोएगा, उसी का फल कल भाग्य बनकर उसके सामने आएगा।
        विश्व के सभी जीव-जन्तु सूर्य की रौशनी में दिन में देखते हैं। रात में उन्हें देखने में कठिनाई होती है। परन्तु उल्लू एक ऐसा पक्षी है जो दिन के उजाले में नहीं देख पाता बल्कि रात के अँधेरे में उसे दिखाई देता है। वह दिन में नहीं देख पाता तो हम इसके लिए सूर्य को दोष नहीं दे सकते।
          वर्षा की पहली बूँद चातक पक्षी के मुँह में यदि पड़ती है तो वह अपनी प्यास बुझाता है। यदि वर्षा की पहली बूँद उसके मुँह में न पड़े तो वह प्यास रह जाता है और फिर वर्षा की पहली बूँद के लिए वह पूरा वर्ष प्रतीक्षा करता है। सभी जीवों की प्यास बुझाने वाली वर्षा का इसमें कोई दोष नहीं होता।
          करीर वृक्ष, उल्लू और चातक पक्षी के इन सभी उदाहरणों से यही सिद्ध होता है कि विधाता ने जिसके ललाट पर या मस्तक पर उसके जन्म दे पहले ही जो लिख दिया, उसे इस संसार की कोई भी शक्ति नहीं मिटा सकती। न ही उसे बदलने की सामर्थ्य किसी में है।
          मनीषियों का यह भी कथन है कि अपने जीवन में मनुष्य जिस भी अंग का अधिक दुरुपयोग करता है, आगामी जीवन में ईश्वर उसे उस अंग से वंचित कर देता है। वर्तमान जीवन में वह एक अपाहिज का जीवन व्यतीत करता है और कष्ट पता है। वह सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाता है। हम अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों से मिलते रहते हैं।
          आगामी जन्म में अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए बिना समय व्यर्थ गॅंवाए सत्कर्मो की पूँजी को बढ़ाने के लिए हम सब प्रवृत्त हो जाएँ। इस प्रकार करने से सिर धुनकर रोने और पश्चाताप करने से हम बच सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद