बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

लेन-देन का सम्बन्ध

लेन-देन का सम्बन्ध

जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त ऐसी अनेक घटनाएँ मनुष्य के जीवन में घटती रहती हैं जिनका कारण उसका प्रारब्ध होता है। प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। प्रारब्ध कर्म तीन प्रकार के होते हैं -  मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम ।
        कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं। तब वे अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इस प्रारब्ध कर्म को सामान्य जीवन के क्रम में बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है। 
           मनुष्य के कर्म से ही उसका प्रारब्ध बनता है। प्रारब्ध कर्म को अपने वर्तमान जन्म में भोगना होता है। दूसरे शब्दों में हम इसे उत्पति कर्म भी कह सकते हैं जिसे व्यक्ति के जींस तय करते हैं कि उसका प्रारब्ध क्या होगा। मनुष्य जब माता के गर्भ में आता है, उसी समय से ही उसका प्रारब्ध निर्धारित हो जाता है। प्रारब्ध कर्म इस जन्म के भोगों का निर्धारण करते हैं। प्रारब्ध कर्म के अनुसार ही मनुष्य की जाति, आयु, गुण और उसके भोग का निर्धारण होता है। ज्योतिषी कुण्डली में प्रारब्ध को नवम भाव या नवमेश से देखते है। प्रारब्ध कर्म के विषय में सन्त तुलसीदास जी 'रामचरितमानस' में हमें समझाते हुए कहते हैं-
        प्रारब्ध  पहले रचा, पीछे  रचा  यह  शरीर।
        तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्रीरघुबीर।। 
अर्थात् इस प्रसिद्ध दोहे में सन्त तुलसीराम जी ने बताया है कि भगवान ने मनुष्य के जन्म लेने से पहले ही उसके भाग्य (प्रारब्ध) और जीवन के भरण-पोषण की व्यवस्था कर दी है और इस शरीर का निर्माण बाद में होता है। इसलिए हमें अपने भविष्य या अपने जीवन निर्वाह की चिन्ता को छोड़कर ईश्वर का भजन करना चाहिए।
        कर्मसिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक सकारात्मक कर्म मनुष्य के पुण्य का कारक होता है और उसका सकारात्मक फल अर्थात सुख उसे प्राप्त होता है। इसी तरह प्रत्येक नकारात्मक कर्म से मनुष्य पाप को उत्पन्न करता है। उसे नकारात्मक फल यानी दु:ख के रूप में उसे ही भुगतना पडता है। यह कर्मसिद्धान्त अपरिवर्तनशील है, अटल है। 
        व्यक्ति का वर्तमान जन्म उस परिवार में होता है जिसकी परिस्थिति उसका प्रारब्ध भोगने के लिए अनुकूल हो। उस परिवार के सदस्यों के साथ उसका पूर्वजन्म का लेन-देन का सम्बन्ध होता है। अपने जीवन की सम्पूर्ण यात्रा में मनुष्य किसी पुराने लेन-देन को चुका रहा होता है या फिर कोई नया लेन-देन कर रहा होता है। यदि यह लेन-देन इस वर्तमान जन्म में न निपट सके तो उसे आगामी जन्मों में बराबर करना पड़ता है। 
         मनीषियों के अनुसार यह सम्भव है कि आने वाले जन्म में वर्तमान जन्म के परिवार वालों के साथ होने वाला उसका सम्बन्ध और लिंग बदल जाए। हो सकता है कि इस जन्म का पिता है अगले जन्म में उसके बेटे, बेटी या अन्य सम्बन्धी के रूप में जन्म ले।
         मनुष्य का शरीर किसी दिन किस प्रकार व्यवहार करेगा, वह इस बात पर निर्भर करता है कि उस दिन उसका प्रारब्ध किस तरह का है। ज्ञानी जन ही यह रहस्य जान सकते हैं। 
        कई बार साधारण प्रतिभा वाले लोगों को उस दिन घटने वाली किसी घटना का ज्ञान हो जाता है। कभी-कभी मनुष्य जब प्रात:काल जागता है तो कुछ विचित्र-सा अनुभव करता हैं। पर वह उसमें छिपे हुए अर्थ को समझ नहीं पाता। स्वप्न में उसे कुछ ऐसे लोग दिखाई देते हैं जिन्हें वह पहचानता है और कुछ लोग ऐसे दिखाई देते हैं जिन्हें वह जानता तक नहीं।
        कुछ स्वप्न भी प्रारब्ध से जुड़े होते हैं। इसका अर्थ यह है कि उस तन्त्र में बहुत बड़ी मात्रा में यादें जमा रहती हैं। ये सभी यादें यदि एक साथ मनुष्य के स्वप्न में आ जाएँ तो दिमाग की नसें मानो फटने लगती हैं। ये यादें इतनी अधिक होती हैं कि इन्हें सम्हाल पाना मनुष्य के लिए बहुत कठिन हो जाता है। स्वप्नों में हर प्रकार की अजीबोगरीब घटनाएँ शामिल होती हैं।
        इसलिए प्रकृति ने एक ऐसा रास्ता निकाला है कि याददाश्त के एक हिस्से से मनुष्य को एक ही एक बार में निपटना होता है। यह प्रारब्ध का ही एक रूप है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रारब्ध में जो यादें अपना काम कर रही होती हैं, वे मनुष्य के अन्तस् में ही विद्यमान होती हैं। जब वे सामने उभर कर आती हैं तो यदा कदा भविष्य की घटनाओं का संकेत भी दे जाती हैं।
        यदि कोई समझ सके तो प्रारब्ध के स्वप्न कई बातों की ओर संकेत करते हुए बहुत-सी गुत्थियों को सुलझा देते हैं। जो लोग अपने जीवन को बहुत बारीकी से देखते हैं, वे नशीले और उत्तेजक पदार्थों से दूर रहते हैं। अगर ऐसे पदार्थों का सेवन किया जाए तो मनुष्य कोई भी चेतावनी समझ नहीं सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

प्राणशक्ति से जीव का जीवन

प्राणशक्ति से जीव का जीवन 

प्राणशक्ति जीव के शरीर में विद्यमान रहती है। यद्यपि यह हमें दिखाई नहीं देती। इसके कारण ही जीव का यह जीवन होता है। जब यह प्राण शरीर से बाहर निकल जाता है तो जीव की मृत्यु हो जाती है। तब उस निर्जीव शरीर का संस्कार कर दिया जाता है। कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसे विदा करना ही पड़ता है। यही ईश्वरीय विधान है। हम सभी मोटे तौर पर शरीर में विद्यमान प्राणवायु के विषय में मात्र इतना ही जानते हैं।
         आयुर्वेद और योग विज्ञान के अनुसार प्राण वायु शरीर की मुख्य पॉंच वायुओं  में से एक है जो हमारे जीवन और अस्तित्व का आधार होती है। प्राण वायु बाहर की ताजी हवा (ऑक्सीजन) को अन्दर लेने (निःश्वास) और क्रिया को संचालित करने का कार्य करती है। भोजन, पानी और ऊर्जा को शरीर के भीतर ग्रहण करने में मदद करती है। यह मस्तिष्क, हृदय, बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय और सन्तुलित रखती है। यह शरीर को जीवित रखती है और सम्पूर्ण तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) को ऊर्जा प्रदान करती है।
प्राण वायु का मुख्य स्थान मूर्धा या सिर, मस्तिष्क, छाती या उर और कण्ठ (गला) है। 
          आज हम शरीर में रहने वाले दस प्रकार के प्राणों की चर्चा करते हैं। शास्त्रों में प्राण को दस भागों में विभक्त किया है। जिनमें पाँच मुख्य प्राण हैं और पाँच उपप्राण हैं। पाँच महाप्राणों को ‘ओजस’ और पाँच लघुप्राणों को रेतस’ कहते हैं। 
पाँच मुख्य प्राण हैं - प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। 
पाँचों उपप्राण हैं -  नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।  
          जिस प्रकार शरीर में विद्यमान दोनों कान, दोनों आँखें, दोनों नथुने, दोनों हाथ और दोनों पैर एक-दूसरे की सहायता करते हैं, उसी प्रकार ये महाप्राण और लघुप्राण परस्पर एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक होते हैं। ये दसों प्राण मिलकर हमारे शरीर का संचालन करते हैं-
1 प्राण- हृदय में रहकर श्वास को बाहर-भीतर करने की प्रक्रिया करती है। है। अन्न पानादि को पचाती है। प्राण वायु मुख, नासिका, हृदय, नाभि, कुण्डलिनी के चारों ओर तथा पादाँगुष्ठ में रहती है। 
2 अपान-  मूलाधार में स्थित स्थूल मलों का विसर्जन करता है। देह के भीतर पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, कफ, कीचड़, विष आदि विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकालता है। यह क्रिया न हो सके तो अपच, जुकाम आदि अनेक रोग पैदा हो जायेंगे। अपान पर नियन्त्रण न जानते हुए भी जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्राय: रोगों में ग्रसित हो जाते हैं।
3 समान- नाभि में शरीर को यथा स्थान रखने का काम करता है। उदाराग्नि के कला को लेकर सर्वांग में समान रहता है।
4 उदान-  कण्ठ में रह कर शरीर की वृद्धि करता है। सभी संधियों(जोड़ों) तथा हाथों और पैरों में उदान रहता है। उदान विविध वस्तुएँ बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है।
5 व्यान- व्यान का काम रक्त-संचार है। सम्पूर्ण शरीर में लेने और छोड़ने आदि का धर्म करता है। कर्ण, नेत्र, कण्ठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबँध में व्यान रहता है । 
6 नाग- मनुष्य के मुँह से डकार के रूप में निकालता है। 
7 कूर्म-  नेत्रों की पलकों को बन्द करने और खोलने का कार्य कूर्म करता है। कूर्म यदि सुषुप्त अवस्था में होता है तो शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भधारण नहीं हो सकता।
8 कृकल- छींक मारने का कार्य कृकल करता है।
9 देवदत्त- जम्हाई लेने का कार्य करता है।
10 धनञ्जय- सारे शरीर में व्याप्त रहता है। शरीर के मृत हो जाने पर यह चार घण्टे तक वहाँ विद्यमान रहता है।
          प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है। प्राण के द्वारा ही हृदय की धड़कन होती है, रक्त संचार होता है और साँस आती-जाती है। इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती हैं। प्राण में जब शिथिलता आने लगती है , उस समय जीवनी शक्ति का ह्रास होने लगता है। उसके बिल्कुल कम हो जाने पर हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है। जिसे जीव की मृत्यु कहा जाता है।
          समाधि की अवस्था में योगी प्राण को नियन्त्रित करते हैं। इन्हें जीते बिना हृदय में स्थित कमल पर ध्यान नहीं लगाया जा सकता। योगी प्राणों का निरोध करके जब चाहें तब शरीर में प्राण का स्पन्दन बढ़ा सकते हैं। जब तक उनका प्राण ब्रह्माण्ड में संचित रहता है तब तक उनके हृदय की धड़कन बन्द रहती है और शरीर मृततुल्य प्रतीत होता है। इसीलिए उन्हें दीर्घकालीन समाधि सुख मिलता है।
        इन प्राणों का संयम करके ही दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखकर भीष्म पितामह की तरह इच्छा मृत्यु पाना सम्भव होता है। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

अन्न का निरादर ब्रह्म का निरादर

अन्न का‌ निरादर ब्रह्म का अनादर

अपनी थाली में मनुष्य को उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना वह आराम से खा सकता है। यदि आवश्यकता से अधिक अन्न थाली में डाल लिया जाए तो मनुष्य उसे खाने में असमर्थ हो जाता है। अतः वह बच जाता है और फिर उस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान में फैंक दिया जाता है। इस तरह यह अनमोल अन्न बरबाद होता रहता है।
          अन्न का एक-एक दाना बहुत ही मूल्यवान होता है। उस एक दाने को जब बीज के रूप में किसान बोता है तब वह उस बीज को बहुत-से अनाज में बदल लेता है। इस अन्न के हर दाने को उपजाने के लिए किसान हर मौसम में दिन-रात अथक परिश्रम करता है। 
        किसान सर्दी, गर्मी, बरसात की परवाह नहीं करता। जीवन भर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, भूकम्प, जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भी सहन करता है। अपना सारा आराम छोड़कर, अपना खून-पसीना एक करके हम सबके लिए अनाज उपजाता है। बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारा अन्नदाता किसान स्वयं भूखा रह लेता है परन्तु हम सबको पोषित करने का दायित्व बखूबी निभाता है। हम उसके इस परिश्रम का कभी मूल्य नहीं लगा सकते।
        अन्न को बर्बाद करके हम अन्न की बर्बादी तो करते ही हैं और किसान के खून-पसीने के साथ ही उसके सपनों को भी चकनाचूर करते हैं। फिर भी वह धर्म नहीं त्यागता।
        इस अन्न का मूल्य उन लोगों से अधिक कौन जान सकता है जिनके घरों में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता। बड़े दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अपने आसपास हम बच्चों को कचरे से बीनकर खाते हुए देखते हैं। जिन स्थानों में दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है या बाढ़, भूकम्प, तूफान आदि दैवी आपदाओं के कारण लोगों को घर से बेघर होकर विस्थापितों सा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। दो जून रोटी कमाने के लिए मनुष्य कितने पापड़ बेलता है, स्याह-सफेद करता है। सभी पाप-दुराचार करता है। संस्कृत भाषा के 'पंचतन्त्र' नामक ग्रन्थ में कवि विष्णु दत्त ने कहा है -
             बुभुक्षित:किं न करोति पापम्।
अर्थात् भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप है जो नहीं करता यानी वह क्या कुछ नहीं कर गुजरता?
      ‌  भूख से व्याकुल इन्सान भगवान से यहाँ तक कह देता है-
        भूखे भजन न होई गोपाला, 
        ले ले अपनी कण्ठी माला।
        यदि मनुष्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के विषय मे सोच ले, कचरे से खाते और भूख से बिलबिलाते बच्चों के बारे में सोच ले तो कभी अन्न की बर्बादी नहीं कर सकेगा। उसे बर्बाद करने से पहले दस बार सोचेगा।
        यदि मनुष्य भोजन को ईश्वरीय प्रसाद के रूप में मान ले तो वह अनाज को इस तरह कभी बर्बाद नहीं कर सकता। जब उसके मन में यह भाव आ जाएगा कि अन्न भगवान का प्रसाद है तब वह अपनी थाली में उतना ही भोजन लेगा जितना वह खा सकेगा। इस तरह करने से अनाज व्यर्थ नहीं जाएगा। जिसकी बर्बादी का कारण भोजन थाली में भर-भरकर लेना हैं और न खा सकने की स्थिति में झूठा छोड़ देना है। 
        इसके विपरीत प्रसाद को लोग हाथ में लेकर खाते हैं और यदि गलती से वह कभी जमीन पर गिर जाए तो उसे उठाकर अपने माथे से लगाते हैं और फिर उसे खा लेते हैं। प्रसाद का एक भी दाना बरवबाद नहीं कर सकते। इसे हम धर्मभीरूता भी कह सकते हैं। 
        यदि अन्न को प्रसाद मान लेने से उसे बर्बाद होने से बचाया जा सकता है तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है। हर हाल में अन्न का संरक्षण किया जाना चाहिए।
          यह अहं कदापि नहीं करना चाहिए कि हमारे पास पैसा है तो हम मँहगा-सस्ता कैसा भी हो अनाज खरीद कर अपना पेट भर सकते हैं। अब यह अन्न हमारा है हम चाहे इसे खाएँ या बर्बाद करें किसी को हमसे क्या लेनादेना?
        यह प्रवृत्ति बहुत कष्टप्रद है। हम शादी-ब्याह या पार्टियों में अन्न को बर्बाद होते हुए देखते हैं। मन को पीड़ा होती है। यही भोजन यदि किसी भूखे व्यक्ति को खाने के लिए दिया जाए तो उसका पेट भर जाए और उसके मन से कितनी ही दुआएँ निकलेंगी। बड़े ही जब इस ओर ध्यान नहीं देते तो बच्चों को वे अन्न को सुरक्षित रखने के लिए क्या समझाएँगे?
          भारतीय सस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहते हैं। अन्न का अनादर करना ईश्वर का अपमान करना माना जाता है। इसीलिए भोजन खाने के समय जब थाली में अन्न परोसा जाता है तो पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना की जाती है।
          उपनिषद का यह कथन है -  
       जो अन्न को नष्ट करता है, अन्न उसे ही 
       नष्ट कर देता है।
         इसलिए अन्न को न सही स्वयं को बचाने के लिए ही उसका सम्मान कर लेना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

ईश्वरीय न्याय को बदला नहीं जा सकता

ईश्वरीय न्याय को बदला नहीं जा सकता

ईश्वर की न्याय व्यवस्था बहुत कठोर है। इसे हम विधि का विधान भी कह सकते हैं। उसके न्याय में फेर-बदल करवाना हम मनुष्यों के बस की बात नहीं है। वह मालिक किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। सभी जीवों के लिए उसकी व्यवस्था एकसमान है। किसी जीव विशेष को छूट देने का वहॉं कोई विधान नहीं है। जैसे ही शुभाशुभ कर्म मनुष्य करता है, उसे उन्हीं के अनुरूप फल की प्राप्ति होती है।
       अपने किसी प्रियजन को जब इस असार संसार से विदा करना पड़ता है तब मन उस अकथनीय पीड़ा से विदीर्ण होने लगता है। यह दुख सहन करना बहुत ही कठिन होता है। जैसे किसी भी कारण से शाखा से टूटा हुआ फूल वापिस उसी टहनी पर नहीं लगाया जा सकता, उसी प्रकार इस दुनिया से विदा हुए मनुष्य को पुनः लौटाकर उसी रूप में वापिस नहीं लाया जा सकता।
        पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार जितना भी समय जीव को वर्तमान जीवन में ईश्वर की ओर से मिलता है, उसे भोगने के पश्चात मनुष्य को एक पल की भी मोहलत नहीं मिल पाती। अपनी सारी धन-सम्पत्ति और भौतिक रिश्ते-नातों को इसी धरा पर छोड़कर उसे खाली हाथ परलोक गमन करना पड़ता है।
        संसार मे ऐसा कोई भी एक घर नहीं मिलेगा जहाँ से आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। यदि ऐसा हो पाता तो सभी राजा-महाराजा, महापुरुष और शक्तिशाली लोग तो सृष्टि के आदि से आज तक जीवित होते। तब इस धरती पर तिल रखने जितनी जगह भी हमें न मिल पाती। इस मरणधर्मा संसार में किसी भी जीव के स्थायित्व की कल्पना कर लेना नितान्त असम्भव है। यदि कोई सदा के लिए जीवित रहने का वादा करता है तो वह असत्य कह रहा होता है। उस पर विश्वास करना सरासर मूर्खता कहीं जाएगी।
        इस विषय में मुझे एक कथा स्मरण हो रही है। बहुत लोगों ने इसे पढ़ा और सुना होगा। अनेक महात्माओं के साथ जोड़कर यह कथा समझाने के लिए सुनाई जाती है।
         एक स्त्री के इकलौते बेटे की मृत्यु हो गई। वह बहुत दुखी थी और रो-रोकर उसका बहुत बुरा हाल था। फिर कुछ सोचकर और निर्णय करके अपने गाँव में पधारे हुए सन्त के पास अपने बच्चे के शव को लेकर गई।
        महात्मा जी के पास जाकर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने बेटे के शव को उनके चरणों में रख दिया। उनसे बार-बार आग्रह करने लगी, "महात्मा जी, मेरे जीवन के एकमात्र सहारे इस बेटे को जीवित कर दीजिए।"
      सन्त ने कहा, "जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे जीवित करना किसी के वश की बात नहीं है।"
         यह सच है कि ईश्वर के इस न्याय को कोई भी नहीं बदल सकता। परन्तु वह स्त्री हठ ठानकर बैठ गई कि उसे उसका बेटा जीवित चाहिए। उसने कहा, "सन्त-महात्मा चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं।"
        महात्मा के लाख समझाने पर भी वह स्त्री नहीं मानी।अन्त में महात्मा ने उस स्त्री से कहा, "ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आओ, जिस घर में किसी की मौत न हुई हो। तभी मैं तुम्हारे बेटे को जीवित करूँगा।"
        वह स्त्री महात्मा जी के कहने के अनुसार एक मुट्ठी चावाल लेने गाँव में चली गई। वह आश्वस्त हो गई थी कि अब उसका बेटा अवश्य जीवित हो जाएगा। वह अपने सारे गाँव का चक्कर लगाकर आ गई। पर यह क्या, उसे ऐसा कोई भी घर वहाँ नहीं मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो। 
        तब उसे समझ में आ गया कि कुदरत के फैसले को बदला नहीं जा सकता। यह तो सृष्टि का नियम है कि जो इस संसार में आया है उसे यहाँ से विदा लेनी ही पड़ती है। लौटकर उसने महात्मा जी के चरण पकड़ लिए और अपने किए पर पश्चाताप करने लगी।
        यह कथा मनुष्य को मात्र यही शिक्षा देती है कि इस संसार में ईश्वरीय नियम अटल हैं। उन्हें बदलने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मनुष्य तो बस भोक्ता मात्र है, वह मूक दर्शक है। वह अपने पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिए इस संसार में आता है। सभी रिश्ते-नाते, भाई-बन्धु उसे जीवन यात्रा पूर्ण करने के लिए मिलते हैं। वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है अथवा उनकी कितनी सहायता लेता है, उस पर निर्भर करता है।
          हमारा प्रिय-से-प्रिय जन भी एक-न-एक दिन अपना हाथ छुड़ाकर हमें रोता-बिलखता छोड़कर परलोक की यात्रा के लिए अकेला ही चला जाता है। हालाँकि अपने प्रियजनों का वियोग सहन कर पाना इतना सहज नहीं होता परन्तु कोई और चारा भी तो नहीं होता। ईश्वर के इस न्याय के आगे सिर झुका देना ही समझदारी है। उस परम न्यायकारी परमात्मा को कोसने या गाली देने से उसका न्याय नहीं बदल सकता। हमें अपनी मानसिकता को ही बदलना पड़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

शारदीय नवरात्र

शारदीय नवरात्र 

आज से शारदीय नवरात्र प्रारम्भ हो गए हैं। 'नवरात्र' संस्कृत भाषा का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है नौ रातों का समय। इन नौ दिनों और रातों के दौरान शक्ति या देवी दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों की आराधना करने का विधान है।
     प्रथमा शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
     तृतीया चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
     पंचमं स्कन्धमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
     सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
     नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता:।
अर्थात् पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघण्टा, चौथी कूष्माण्डा, पांचवी स्कन्दमाता, छटी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौंवी सिद्धिदात्री  - ये नौ नाम 'नवदुर्गा' के रूप में प्रसिद्ध हैं।
         हिन्दू वर्ष में कुल चार बार नवरात्र आते हैं। इनमें दो प्रकट नवरात्र होते हैं यानी चैत्र और शारदीय नवरात्र और दो गुप्त नवरात्र होते हैं यानी माघ और आषाढ़ के नवरात्र। इनमें से चैत्र नवरात्र और आश्विन माह के शारदीय नवरात्र सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। ये दोनों नवरात्र व्यापक रूप से मनाए जाती हैं। 
         इस नवरात्र पर्व का प्रभाव देश के विभिन्न भागों में दिखाई देता है। इन नौ दिनों में लोग व्रत रखकर और पूजा करके देवी को विभिन्न तरीकों से प्रसन्न करने का यत्न करते हैं। 
          नवरात्रि में खेतरी या खेतड़ी बोने की परम्परा बहुत शुभ मानी जाती है। इसे ज्वारे या जयंती भी कहते हैं। यह घर में सुख, समृद्धि, हरियाली और मॉं दुर्गा की कृपा का प्रतीक होती है। नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि को एक साफ मिट्टी के बर्तन, कसोरे या गमले में गंगाजल और थोड़ी साफ मिट्टी डाली जाती है। इसके बाद जौ या गेहूॅं के बीज बोए जाते हैं और उस पर हल्का पानी छिड़का जाता है। नौ दिनों तक सुबह और शाम माता की पूजा के साथ खेतड़ी पर भी जल छिड़का जाता है। इसका विसर्जन अष्टमी के दिन किया जाता है। 
          उस दिन यानी अष्टमी के ही दिन कन्याओं का पूजन किया जाता है। उनके पैर धोकर उन्हें भोजन, वस्त्र व दक्षिणा दी जाती है। कुछ लोग यह कन्या पूजन नवमी के दिन भी करते हैं।
         बंगाल में दुर्गापूजा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और दशहरे पर मॉं दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। गुजरात में इन दिनों गरबे की धूम होती रहती है। इन दिनों में कुछ श्रद्धालु भक्त मॉं वैष्णो देवी के दरबार में जाकर अपनी हाजिरी लगाते हैं।
        तान्त्रिकों के लिए नवरात्र बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। नवरात्रि में तान्त्रिक आदिशक्ति की गुप्त और तीव्र ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए साधना करते हैं। प्रकट नवरात्रि में देवी की सात्विक पूजा की प्रधानता होती है। दूसरी ओर गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से तीव्र तन्त्र साधना और सिद्धियों के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। 
        यद्यपि तन्त्र पूजा को लेकर समाज में कई भ्रॉंतियॉं हैं। वास्तव में यह यन्त्र, यन्त्र और कठोर अनुशासन के माध्यम से आत्म-कल्याण और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जुड़ने का एक पवित्र मार्ग है।
नवरात्रों में तान्त्रिक लोग कठोर साधना करते हैं और सिद्धियॉं प्राप्त करने का यत्न करते हैं।
         व्रत रखने वाले लोग इन दिनों प्रायः फलाहार लेते हैं। व्रतधारी स्वांक के चावल और कुट्टू के आटे का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग केवल एक समय भोजन खाते हैं और कुछ अन्य लोग केवल जल पीकर ही भगवती की अराधना करते हैं।
       नवरात्र में मांसाहार त्यागने का विधान है। कारण है मन की पवित्रता। इन दिनों मन को साधने के लिए व्रत और नियम का पालन किया जाता है। मांसाहार तामसिक भोजन कहलाता है। इसलिए इसके प्रयोग का लोग अपने घर में नहीं करते। बहुत से ऐसे लोग भी मिलेंगे जो इन दिनों लहसुन और प्याज भी नहीं खाते। 
           मनीषी कहते हैं -
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन। 
कई लोग इन नौ दिनों में बाल नहीं काटते। बहुत से पुरुष अपनी दाढ़ी नहीं बनाते।
        हर ओर मन्दिरों में चहल पहल रहती है। वहाँ प्रतिदिन भण्डारे किए जाते हैं। लोग अपने-अपने क्षेत्र में भी भण्डारे करते हैं। इन दिनों कुछ लोग माता की चौकी रखवाते हैं और कुछ लोग जागरण कराते हैं। इस प्रकार देवी को मनाने का हरसम्भव प्रयत्न किया जाता हैं। लोग अपने-अपने तरीके से नवरात्र बड़ी श्रद्धा व उल्लास से मनाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

भौतिक चक्षुओं से ईश्वर नहीं दिखाई देता

भौतिक चक्षुओं से ईश्वर नहीं दिखाई देता 

ईश्वर को हम सर्वव्यापक मानते हैं। वह इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त है। उस परमात्मा की सत्ता का हम अनुभव तो कर सकते हैं पर उसे इन भौतिक चक्षुओं से देख नहीं सकते। उसका दर्शन करने के लिए मनुष्य को साधना करनी पड़ती है। तब कहीं उस ईश्वर को साधक अपने अन्तर्चक्षुओं से प्रकाश के रूप में देख सकता है।
          उसकी इस व्याप्ति का अर्थ हम कर सकते हैं - व्याप्त होने की अवस्था या भाव, विस्तार या फैलाव और सभी अवस्थाओं में प्रायः व्याप्त होने का भाव।
          व्याप्ति के हम दो भेद कर सकते है- संयोग व्याप्ति  और स्वरूप व्याप्ति
          संयोग व्याप्ति-  इसमें अलग-अलग चीजों का मिलना संयोग होता है। हम दूध और चीनी दो अलग-अलग पदार्थ लेते हैं। यदि दूध में चीनी को मिला दो तो वह दूध में घुल-मिलकर उसी का ही भाग बन जाती है। तब उन दोनों को पृथक करना किसी के लिए भी नामुमकिन हो जाता है।
        स्वरूप व्याप्ति-  इसका तात्पर्य यह है कि एक ही पदार्थ का स्वरूप परिवर्तित हो जाना। स्वर्ण से यदि हम आभूषण बनाते हैं तो सोने का मात्र रूप बदलता है, इस समय भी वही सोना उन आभूषणों में ही रहता है।
          इसी प्रकार ईश्वर और प्रकृति दोनों वैसे तो अलग-अलग हैं पर प्रकृति भी उसी ईश्वर का ही रूप है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, नदियाँ, पर्वत, सागर, पेड़-पौधे सभी उसके ही रूप हैं। इसीलिए इनकी समय-समय पर इनकी उपासना भी की जाती रहती है।
       सृष्टि की रचना से पहले केवल अद्वितीय और निराकार परमात्मा ही विद्यमान था। तब ब्रह्म के भीतर यह इच्छा या संकल्प जागृत हुआ कि वह एक से अनेक बन जाए। यह सम्पूर्ण संसार, जीव-जन्तु, प्रकृति बन गए। इसी भाव को 'छान्दोग्योपनिषद्' में एक अत्यन्त प्रसिद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक महावाक्य से प्रकट किया है -
               एकोsहं बहुत स्याह
अर्थात् मैं एक हूॅं और मैं बहुत हो जाऊॅं।
        कहने का तात्पर्य यह है कि जब ईश्वर ने कामना की तो उसने अपनी परम आत्मा में से अनेक अंश बनाकर जीवों की सृष्टि कर दी। जलचर, नभचर और भूचर सभी जीवों की मालिक ने रचना की। हम मनुष्यों को भी उसने रचा। इन सभी जीवों में व्याप्त उस परमपिता परमात्मा की छवि को हम चाहें तो देख सकते हैं।
        यहाँ तर्कशास्त्र का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहती हूँ। वहॉं कह गया है- 
              'यत्र यत्र धूम: तत्र तत्र वह्नि:।'
अर्थात् जहाँ जहाँ धुआँ होता है वहाँ वहाँ पर अग्नि होती है।
        कहने का तात्पर्य यही है कि दूर बैठे व्यक्ति को जलती हुई आग नहीं दिखाई दे रही, उसे केवल उड़ता हुआ धुआँ दिखाई दे रहा है। इसका यह अर्थ तो नहीं हो सकता कि सिर्फ धुआँ ही है, आग नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो बिना आग के धुआँ हो ही नहीं सकता।
          व्याप्ति का पूर्ण रूपेण ज्ञान हो गया है यह नहीं माना जा सकता। व्याप्ति का अन्तर अर्थात् मन से प्रत्यक्ष होता है, यह मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अन्त:करण या मन बाह्य इन्द्रियों के सर्वथा अधीन होता है। इसीलिए कभी भी मन स्वतन्त्र रूप से बाह्य विषयों को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं देखा जाता है। व्याप्ति के इस अनुमान का प्रमाण से साक्षात्कार सम्भव नहीं होता।
        अन्य पदार्थों का विश्लेषण न करके हम अपने बारे में विवेचना करते हैं। हम सारा समय साँस लेते हैं, यह वायु हमारी जीवनी शक्ति कहलाती है। फिर भी हम उस वायु को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, केवल उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि हम किसी कारण से सॉंस न ले सकें तो पलक झपकते ही यह जीवन ही समाप्त हो जाएगा।
        मन को भी हम नहीं देख सकते, बस यही जानते हैं कि वह है जो हम सबको अपने वश मे करके रखता है। हम उसी के कहे अनुसार उठते हैं और जागते हैं। यानी दुनिया के सारे कार्य-व्यापार हम करते हैं। चाहकर भी हम उसे कभी नकार नहीं सकते।
        जीव के गुण-दोष आदि सभी स्वभाव के अंश हैं जिन्होंने मात्र अनुभव किया जा सकता है, उन्हें अपनी इन आँखों से देख या छूकर परख नहीं सकते। इसी प्रकार एक नन्हें से बीज में कहीं भी विशाल वृक्ष दिखाई नहीं देता परन्तु समय रहते वह बीज उस महान वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है। परिणाम को देखकर हम ये सब अनुमान लगाते रहते हैं। लकड़ी में व्याप्त अग्नि को भी हम देख नहीं सकते पर उसे जलाकर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।
          उसी प्रकार  ब्रह्माण्ड के इस विस्तार को देखकर उस प्रभु के अस्तित्व का स्वतः ही बोध हो जाता है। इस पर भी कोई व्यर्थ ही विवाद करे अथवा उसकी परम सत्ता को स्वीकार न करते हुए उसे चुनौती दे तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में और कौन हो सकता है?
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

जीवन और मृत्यु की जंग जीतना

जीवन और मृत्यु की जंग जीतना

हर मनुष्य अपने जीवन और मृत्यु की जंग को सुविधापूर्वक जीत लेना चाहता है। वह इस जन्म-मरण के रहस्य को जानने और समझने के लिए हर समय उत्सुक रहता है। यह कुण्डली मारकर उसके जीवन में बैठा हुआ है। सारा जीवन बीत जाता है पर यह सार उसकी समझ में नहीं आ पाता। इन्सान क्या करे और क्या न करे की कशमकश से उभर नहीं पाता।
        शरीर क्षणभंगुर है और इसमें विद्यमान आत्मा अमर है। इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना ही वास्तविक शक्ति है। जीवन और मृत्यु की जंग जीतना केवल शारीरिक अस्तित्व की लड़ाई नहीं है बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक रूप से जागरूक रहने का नाम है।
         भौतिक शरीर और संसार के दृष्टिकोण से मृत्यु जीवन का एक अटल और शाश्वत सत्य है। इस संसार में जिसने भी जन्म लिया है, उसका अन्त निश्चित है। इसे कोई भी ताकत टाल नहीं सकती। यह भी सच्चाई है कि इस संसार में परिवर्तन ही एकमात्र नियम है। यहाँ पर कुछ भी स्थायी नहीं रहता। अमीर, गरीब, राजा या रंक, कोई भी मौत से बच नहीं सकता। 
       मृत्यु जीवन का अन्तिम सत्य है यह भ्रम है। मृत्यु जीवन की गाड़ी की दिशा के परिवर्तन के लिए एक जंक्शन मात्र है जहॉं से जीवन किसी अन्य जीवन के लिए परिवर्तित हो जाता है। 
          भारतीय संस्कृति में बहुत ही गहरी जड़े जमाकर बैठे हुए हैं कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म। इनके बिना हम जीवन मे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। इन दोनों के विषय में हर व्यक्ति जानना चाहता है, समझना चाहता है। जितना गहरे उतरता जाता है, उतना ही उलझता जाता है।
        मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि इस ब्रह्माण्ड का हर जीव आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। हर सम्बन्ध कर्म पर आधारित है। जीव जन्म लेने के पश्चात उन सभी लोगों के सम्पर्क में स्वतः ही आ जाता है जिनके साथ उसका लेनदेन का सम्बन्ध होता है। 
        दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पूर्वजन्म में जिसका उसने किसी भी रूप में ऋण चुकाना होता है उससे उसका संयोग हो जाता है। वह व्यक्ति उसका माता, पिता, भाई, बहन, चाचा, मामा आदि परिवारी जन हो सकता है। कोई पड़ौसी, बन्धु-बान्धव, मित्र, कार्यालयीन साथी या बास कुछ भी हो सकता है। 
        कभी-कभी राह चलते अनजाने व्यक्ति से मधुर सम्बन्ध बन जाते हैं और वह उसकी सहायता कर जाता या वही उसकी कोई मदद कर देता है। इसके विपरीत अचानक मिले अनजान व्यक्ति से गाली-गलौच हो जाती है अथवा उसके कारण कोई हानि हो जाती है। 
        इसका अर्थ यही निकलता है कि उस व्यक्ति विशेष के साथ पूर्वजन्म का इतना ही सम्बन्ध था कि ऐसा शुभाशुभ व्यवहार हो गया। उसके पश्चात शायद सारा जीवन उस व्यक्ति से कभी सम्पर्क भी नहीं होता। यह यही सिद्ध करता है कि उन दोनों के पूर्वजन्म के वे विशेष कर्म अब समाप्त हो गए हैं।
          एक बोधकथा की हम चर्चा करते हैं। एक योगी किसी वृक्ष के नीचे अपने ध्यान में मग्न बैठे थे। उसी समय एक व्यक्ति वह आया और उसने उनका बहुत अपमान किया। वे शान्त रहे और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें उसके दुर्व्यवहार पर क्रोध नहीं आया।   
          उनके शिष्य यह सब कुछ देख और सुन रहे थे, उन्होंने अपने गुरु से उस व्यक्ति पर क्रोध न करने का कारण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि संभवतः पूर्वजन्म में उन्होंने उसका अपमान किया होगा। शायद इसी कारण उसने मेरा अपमान किया। अब मेरा और उसका हिसाब बराबर हो गया है।
        यह घटना प्रत्यक्ष रूप से हमारी भारतीय कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म की प्रतिपादक है जिसे समझने का हम प्रयास कर रहे हैं।
        यहाँ मैं एक और सत्य को उद्घाटित करना चाहती हूँ कि पूरे विश्व में अरबों-खरबों मनुष्य और जीव-जन्तु रहते हैं परन्तु हमारा सम्बन्ध उन मुट्ठी भर लोगों या जीवों के साथ ही क्यों होता है? इतने बड़े भारत देश अथवा संसार के उस स्थान विशेष में जन्म क्यों होता है?
        इन प्रश्नों के उत्तर में मनीषियों के विचार बिल्कुल स्पष्ट हैं कि उनमें से किसी की मनुष्य ने सेवा करनी होती है अथवा किसी से सेवा करवानी होती है। इसी तरह किसी सै धन लेना होता है अथवा किसी पर धन व्यय करना होता है।
        एवंविध धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचारी, पीठ मे छुरा भौंकने जैसे कार्य नाक का बाल बनकर भी कर जाते हैं। ये सब भी व्यक्ति लेनदेन के ही भाग हैं। इसलिए किसी से शिकवा-शिकायत न करके यही मानना चाहिए कि यदि हमने पूर्वजन्म में उस व्यक्ति का कुछ अनिष्ट किया है तो हमारे कर्मों का निपटान हो गया। यदि उस व्यक्ति का हमने पूर्वजन्म में अहित नहीं किया तो आगामी जन्म वह अपना कर्ज चुकाएगा।
       इस प्रकार गहन-गम्भीर कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म विषय को वेदादि ग्रन्थों के स्वाध्याय के अनुसार जितना मैं समझ पाई हूँ, स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
चन्द्र प्रभा सूद