सोमवार, 28 सितंबर 2026

श्राद्ध किसका करना चाहिए

श्राद्ध किसका करना चाहिए?

पितृपक्ष में  श्राद्ध करने का विधान पुराणों  में बताया गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर श्राद्ध किसका करना चाहिए? मरे हुए परिवारी जनों का अथवा जीवित माता-पिता का? यह एक गम्भीर चिन्तन का विषय है।
        मुझे श्राद्ध का अर्थ यही समीचीन लगता है कि अपने जीवित माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, गुरु-आचार्य और अन्य वृद्धजनों तथा तत्ववेत्ता विद्वानों की श्रद्धापूर्वक सेवा करनी चाहिए।
        जीवित व्यक्ति ही अपनी सन्तान को उपदेश दे सकता है और अपने जीवन के अनुभव से संसार के व्यवहारों का ज्ञान करा सकता है। हर प्रकार से रक्षा कर सकता है। मरने के पश्चात कोई पितर नहीं होता क्योंकि पितर न तो आत्मा है और न ही शरीर है। आत्मा अविनाशी है। मृत्यु जब आत्मा और शरीर दोनों का सम्बन्ध छुड़ा देती है तब पितर नहीं रह जाते हैं। यदि ऐसा नहीं  माना जाता तब पितर शब्द का सम्बन्ध आत्मा से नहीं जुड़ सकता फिर श्राद्ध किया किसका किया जाएगा?
         वास्तव में जीव से माता-पिता आदि का सम्बन्ध नहीं होता, जीव और शरीर का संयोग विशेष से सम्बन्ध है। सारे भौतिक नाते-रिश्ते इस संसार में ही सम्बन्ध रखते हैं। मरने के पश्चात न कोई किसी का पितर रहता है और न कोई किसी की सन्तान। सब जीव अपना-अपना कर्म-फल भोगने के लिए इस संसार में आते है।
        कहते हैं पितर सूक्ष्म शरीर धारण करके श्राद्ध के दिनों में आते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन करते हैं। यदि ऐसा हो कि वे कभी पितृलोक से न आ सकें तो क्या ब्राह्मणों को खिलाया हुआ भोजन उन्हें मिल सकेगा? दूसरी बात क्या बिना स्थूल शरीर के वे भोजन कर सकते हैं?     
        यहाँ एक और प्रश्न मन में आता है कि  ब्राह्मणों के साथ जब पितर भोजन करते हैं तो पहले कौन खाता है? यदि वे एक-दूसरे के बाद खाते हैं तो झूठा खाते हैं जो शास्त्र व सिद्धान्त के अनुसार गलत है।
         मनुष्य किन लोगों का श्राद्ध करना चाहता है जिनका जन्म चौरासी लाख योनियों में से किसी एक में हो चुका है। यह भी पता नहीं कि उसका पितर पुनः मनुष्य बना है या कोई खूँखार जंगली जानवर या फिर कोई कीट-पतंगा।
        मनुष्य को यह भी तो नहीं पता होता कि उसका पितर इस समय किस अवस्था में है? वह रोगी है या स्वस्थ। यदि वह रोगी है तो ब्राह्मणों को हलवा, पूरी खीर आदि गरिष्ठ भोजन क्यों खिलाया जाए। उन्हें तो कड़वी दवा पिलानी चाहिए और मूँग की दाल खिलानी चाहिए।
        क्या यह सम्भव है कि पितर के नाम पर खिलाया जाने वाला भोजन उसे ही मिल रहा है? यदि भोजन पितर के पास पहुँच रहा है तो फिर ब्राह्मण का पेट नहीं भरना चाहिए, उसे तो भूखा ही रह जाना चाहिए।  
         यह तो वही बात हो गई कि किसी आदमी के पास पत्र भेजने के लिए लैटरबाक्स में दिया परन्तु उसका पता नहीं लिखा। अब बताइए क्या वह पत्र उस आदमी के पास पहुँचेगा? इसी तरह पितरों के पते के बिना ब्राह्मणों को खिलाने से भोजन पितरों के पास कैसे पहुँच जाएगा? यह तो कोरा अन्धविश्वास है।
        घर पर ब्राह्मणों को खिला देने से परदेश या परलोक जाने वाले का पेट नहीं भरता फिर तथाकथित मृत पितरों का पेट भरना भी असम्भव है। अत: मृतक व्यक्ति के नाम पर का श्राद्ध करना व्यर्थ है। इस तरह करके मनुष्य स्वयं को धोखा देता है।
        यदि श्राद्ध दान देने की भावना से किया जाए तो सुपात्र को दान देना चाहिए। इन तथाकथित समाज के ठेकेदारों को नहीं जो नौकरी या व्यापार करके अपनी आजीविका चलाते हैं। भोजन खिलाना ही है तो किसी अनाथालय में, वृद्धाश्रम में अन्धविद्यालय में या किसी भूखे-लाचार को खिलाइए। उनका पेट भरेगा तो दुआएँ देंगे।
        यदि अपने जीवनकाल में जीवित माता-पिता की सारी आवश्यकताओं को यथासमय पूरा किया जाए और उनकी यथाशक्ति सेवा की जाए तो ऐसे व्यक्ति को इन सब ढकोसलों को करने की कोई जरूरत नहीं होती। समय रहते सच्चे मन से जीवित पितरों का श्राद्ध करें अर्थात् श्रद्धापूर्वक अपने हाथों से उनकी सुख-सुविधा की सारी व्यवस्थाएँ करनी चाहिए। जीते जी उनकी खोज-खबर न लेकर मरे पीछे आडम्बर करने का न कोई लाभ होता है 
और न ही उसे कोई पुण्य मिलता है।
          शायद कबीरदास जी ने इसी लिए मृत्युभोज की कुप्रथा पर लिखा होगा। उनके शब्दों से ही लेख को समाप्त करना चाहती हूॅं -
        जियत हाड़ में दंगम-दंगा, 
        मरे पिता पहुंचाए गंगा।
        जिया पिता की न पूछी बात, 
        मरे पिता को खीर और भात।
        जिया पिता को घूंसे लात, 
        मरे पिता को श्राद्ध करात।
        जिया पिता को डंडा लठिया, 
        मरे पिता को तोसक तकिया। 
        जिया पिता को कछु न मान,
        भरत पिता की पिंड दान।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 27 सितंबर 2026

पुनर्जन्म सम्भव होता है

पुनर्जन्म सम्भव होता है 

पुनर्जन्म का अर्थ पुनः या फिर से जन्म। हम कह सकते हैं कि इस संसार में जीव के जन्म लेने के अनन्तर अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त समयावधि के पश्चात उसकी मृत्यु होती है। फिर उस मृत्यु के बाद जीव एक बार पुनः जन्म लेता है। यही पुनर्जन्म कहलाता है। पुनर्जन्म की इन घटनाओं की यदा कदा जानकारी हमें अपने आसपास से मिलती ही रहती है।
         सनातन धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसी कई प्राचीन मान्यताओं और दर्शनों में पुनर्जन्म को एक सत्य और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया माना गया है। इनके अनुसार यह शरीर नश्वर है परन्तु आत्मा अजर और अमर है। मृत्यु के बाद आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करती है। जब कोई जीव अपने संचित कर्मों और मोह-माया से मुक्त होकर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है तब वह जन्म-मृत्यु के इस चक्र से निश्चित समय के लिए छूट जाता है।
         भारतीय संस्कृति में ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के अन्तिम क्षणों में व्यक्ति के मन में जो तीव्र इच्छा या विचार होते हैं, वही उसकी अगली योनि या जन्म का आधार बनते हैं। जीव का अगला जन्म तुरन्त भी हो सकता है और इसमें सैकड़ों या हजारों वर्ष का समय भी लग सकता है। 
          मनीषियों का कथन है कि जन्म के कुछ समय तक जीव को अपना पिछला जन्म याद रहता है। जब जीव अपना होश सम्हालता है और नए जन्म में रचने-बसने लगता है तो पुराने जन्म को भूलने लगता है। परन्तु कुछ जीव ऐसे होते हैं कि जिन्हें बड़े होने तक भी अपना बीता जन्म याद रहता है। वे अपने इस जन्म के परिजनों को पिछले जन्म के घर-परिवार, साथियों व स्थान के विषय में बताते हैं। उनकी जाँच-परख करने पर उनकी सच्चाई का ज्ञान हो जाता है।
          टीवी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर ऐसी खबरों को हम पढ़ते और सुनते रहते हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने इस विषय पर लेख, सत्य घटनाएँ / कथाएँ या कहानियाँ प्रकाशित की हैं। हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी ऐसी घटनाएँ घटित होती रहती हैं। कई टीवी सीरियलों में भी इस विषय को कथानक बनाया जाता रहा है।
          हमारी भारतीय संस्कृति के दो आधार स्तम्भ हैं- कर्म सिद्धान्त और पुनर्जन्म। दोनों ही अन्योन्य आश्रित हैं। कर्म तो मनुष्य को करना ही पड़ता है, उसके बिना वह रह नहीं सकता। वह चाहे सुकर्म करे या कुकर्म, कुछ तो करता ही रहता है। वह निठल्ला नहीं बैठ सकता।
        अपने इन्हीं शुभाशुभ कर्मो के ही अनुसार जीव का पुनर्जन्म चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनि में हो सकता है। मनीषी इन सब योनियों में मानव जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। मानव योनि में जीव कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है, इसलिए इसे कर्मयोनि कहते हैं जबकि अन्य सभी केवल भोग योनियाँ कहलातीं हैं। उनमें जीव को कर्म करने की स्वतन्त्रता नहीं है।
          उपनिषदों का सार कही जाने वाली 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में इस पुनर्जन्म पर प्रकाश डाला है। वे कहते कि हमारे शरीर में जो आत्मा विद्यमान है वह बार-बार जन्म लेती है। सृष्टि के आदि से अब तक वह अगणित जन्म ले चुकी है। न जाने कितने रूपों में वह इस धरा पर उसका जन्म हो चुका है। वह उसी प्रकार अपना शरीर परिवर्तित करती है जैसे मनुष्य अपने वस्त्र बदलता है।
          रीतिकाल के सुप्रसिद्ध कवि रसखान जो भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे, उन्होंने इस विषय में अपनी आस्था प्रकट करते हुए लिखा था-
          मानुष हौं तो वही रसखानि 
          बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन।
          जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो 
         चरौं नित नन्द की धेनु मझारन।।
          पाहन हो तो वही गिरि को जो 
          धारयो कर छत्र पुरन्धर धारन। 
          जो खग हौं तो बसेरो करौ मिल     
          कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।
अर्थात् इस पद में रसखान जी कहते हैं कि यदि उन्हें अगला जन्म मिले तो उन्हें गोकुल का ग्वाला बनाना जो भगवान श्रीकृष्ण के मित्र थे। कर्मानुसार यदि पशु का जन्म मिलना हो तो मुझे नन्द बाबा की गाय बनाना जिसे प्रभु स्वयं चराते थे। यदि निर्जीव बनाना हो तो उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनाना जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने छत्र की तरह धारण किया था। अन्त में रसखान जी कहते हैं कि यदि मुझे पक्षी बनाना हो तो यमुना जी के किनारे उस कदम्ब वृक्ष पर मेरा बसेरा रखना जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाएँ किया करते थे। 
          इससे अधिक पुनर्जन्म का और कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। हो सकता है कुछ धर्म अथवा लोग इस सिद्धान्त को न मानते हुए इसका उपहास कर सकते हैं परन्तु वे भारतीय सस्कृति और सभ्यता में गहरे पैठे इसके अस्तित्व को नकार नहीं सकते। 
        मानव के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त करने के लिए मनुष्य को उसी के अनुरूप अपने किए जाने वाले कर्मों की शुचिता और शुभता पर ध्यान देना बहुत आवश्यक होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 26 सितंबर 2026

अपनी अच्छाई को कभी न त्यागें

अपनी अच्छाई को कभी न त्यागें

मनुष्य को स्वयं यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि वह बहुत अच्छा इन्सान है। आओ और उसकी उसकी अच्छाई देख लो। उसकी अच्छाई या उसके सद् गुण कभी-न-कभी दूसरों के सामने प्रकट हो ही जाते हैं। समय अवश्य लगता है परन्तु एक दिन वह अपना प्रभाव दिखा ही देती है। इसके लिए मनुष्य को धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जब उसक समय आएगा तो निश्चित ही लोग उसे पहचानेंगे।
        अच्छा व्यवहार मनुष्य की खुद की पहचान और आन्तरिक शान्ति का प्रतीक होता है। कठिन समय में ही व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव की परख होती है। संकट को देखकर अच्छाई छोड़ देना व्यक्ति को असफलता की ओर ले जाता है। लोग मनुष्य की अच्छाई को उसकी कमजोरी समझ सकते हैं। ईश्वर सदैव मनुष्य की नीयत को देखता है। मनुष्य को अपनी अच्छाई को कभी नहीं त्यागना चाहिए। अन्त में जीत हमेशा उसकी सच्चाई और अच्छे कर्मों की ही होती है। 
        अपनी अच्छाई रूपी गुणों का एक-एक तिनका चुनकर पक्षियों की तरह कठोर परिश्रम करके मनुष्य अपने जीवन का घरौंदा बनाता है। जहाँ वह गलत रास्ते पर चलकर बुराई को अपनाने लगता है तो वही एक पल उसे मिट्टी में मिला देने के लिए पर्याप्त होता है।
          अहंकार रूपी दानव जब राहू-केतु की भाँति उसे ग्रसने लगता है तब वह इस बात को भूल जाता है कि वस्तुत: प्रशंसा  उसके गुणों की हो रही है उसकी नहीं। उस समय वह अपने भले-बुरे का या अपने-पराए में अन्तर करने का मानो विवेक ही खो देता है।
        मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह अपनी चापलूसी भरी झूठी तारीफ सुनकर बहुत प्रसन्न होता है। दूसरों के स्वार्थ पूरे करने के लिए बर्बाद होना पसन्द कर लेता है। यदि कोई हितैषी उसकी सच्ची आलोचना करे तो वह आग बबूला हो जाता है। सम्हलना तो बड़े दूर की बात है, वह अपने ही हाथों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेता है।
          उसे चाहिए कि इस अभिमान को अपने जीवन में स्थान न दे। इसका यह अर्थ नहीं कि अपने स्वाभिमान को ताक पर रख दे। हमेशा याद रखना चाहिए कि अभिमान पतन का कारक है वह मनुष्य को सम्हलने का अवसर नहीं देता जबकि उसका स्वाभाविक उसे महान बनाता है और गिरने नहीं देगा। संसार में उन्नति वही मनुष्य करता है जिसकी योजनाएँ फलदायी होती हैं।   
        मनुष्य को इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि कौन क्या कर रहा है? कैसे कर रहा है? अथवा क्यों कर रहा है? वह जितना इन चक्करों से दूर रहेगा उतना ही उसका भला होगा और फिर वह खुश रहेगा।
        किसी भी व्यक्ति की कोई बात यदि बुरी लगे तो उसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने का प्रयास करना चाहिए। परन्तु यदि किसी सयाने ने कोई बात कही है तो निश्चित ही वह महत्वपूर्ण होगी, तब उसे हितोपदेश समझकर उस पर मनन करना चाहिए उसे कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
          मनुष्य जब चुप रहकर भगवान शिव की तरह विषपान करता है तब वह दुनिया को पसन्द आता है। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि जब तक मनुष्य बिना प्रतिकार किए दूसरे लोगों की कटु आलोचनाओं को सहन करे, तभी वह भला मानस कहा जाता है।
          इसके विपरीत यदि एक बार भी कोई मनुष्य सच्ची बात कह दे तो उससे बुरा कोई और होता ही नहीं है। वास्तविकता यही है कि कोई भी इन्सान अपनी कमियों को इंगित करने वाले को पसन्द नहीं करता। ऐसा व्यक्ति सबको जहर की तरह कड़वा लगता है। उसे किनारे कर देने में लोग कोई परहेज नहीं करते।
        जहाँ हम व्यक्ति की पहचान की चर्चा कर रहे हैं तो मैं यह भी जोड़ना चाहती हूँ कि मनुष्य को किसी की चापलूसी करके सफलता मिलती है तो वह बहुत समय तक प्रसन्नता नहीं दे सकती। अपने कठोर परिश्रम से यदि उसे सफलता मिलती है तो वह चिरस्थायी होती है।
          मनुष्य जीवन में क्या घटने वाला है यह भविष्य के गर्भ में छिपा रहता है। कोई कितना भी प्रयत्न कर ले उसे बदल नहीं सकता। किन्तु जब मानव अपने व्यवहार व अपनी आदतें बदलने के लिए कटिबद्ध हो जाता है तब उसका भविष्य बदलने से कोई नहीं रोक सकता।
        अतः हम यह कह सकते हैं कि जब लोग अपनी बुराई को नहीं छोड़ते तो मनुष्य को अपनी अच्छाई को कभी त्यागना नहीं चाहिए। उसकी यही अच्छाई ही उसकी ताकत बनकर उसका मनोबल बढ़ाती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य अपनी उन्हीं अच्छाइयों की बदौलत समाज में एक सम्मानित स्थान प्राप्त कर लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान

हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान

हर व्यक्ति की इस संसार में अपनी एक पहचान होती है। जीव का जन्म इस धरा पर उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार होता है। इसलिए हर व्यक्ति दूसरे से अलग होता है। उसी के अनुरूप उसका व्यवहार तथा चरित्र होता है। मनुष्य का जैसा चरित्र होता है, उसके मित्र भी वैसे ही होते हैं। यानी मनुष्य अपने चरित्र और आचार-व्यवहार के अनुसार ही अपने मित्रों का चयन कर लेता है।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सज्जन व्यक्ति को सज्जन लोग मिल जाते हैं और दुर्जन को दुर्जन का साथ मिल जाता है। नेता को अपने साथी नेता और अभिनेता को अभिनेता मिल जाते हैं। चोर को चोरी करने वाले बन्धुओं का साथ मिल जाता है। भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचार करने वाले मिल जाते हैं। रिश्वतखोर व्यक्ति रिश्वत लेने वाले लोगों का ग्रुप बना लेता है। इसी प्रकार धोखेबाज को धोखा देने वाले मित्र मिल जाते हैं। व्यवसायी को व्यवसाय करने वाले, नौकरी करने वाले को नौकरी करने लोग वाले मिल जाते हैं।
          कहने का मात्र इतना ही अर्थ है कि इस संसार में अरबों-खरबों लोग विद्यमान हैं। वे सभी भिन्न-भिन्न प्रकृति के या आचार-विचार के होते हैं। मनुष्य अपने आचार-व्यवहार के अनुरूप ही अपने मित्रों का चुनाव कर लेता है। जैसा वह स्वयं होता है वैसे ही उसके संगी-साथी बन जाते हैं। अपने उन साथियों की संगति से ही वह समाज में पहचाना जाता है। 
         हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष पहचान उसके अच्छे या बुरे कर्मों, विचारों और व्यवहार से बनती है। मनुष्य के महंगे कपड़ों या बाहरी रूप-रंग से उसकी पहचान नहीं बनती बल्कि उसके अच्छे संस्कारों और कार्यों से होती है। व्यक्ति की सोच और उसकी नीयत समाज में उसका वास्तविक स्थान तय करती है। सच्चा मनुष्य वही होता है जो अपने पैरों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भरता के साथ अपना जीवन जीता है।
          शुद्धता या पवित्रता सदा मनुष्य के विचारों में परखी जा सकती है। यदि वह सहृदय व परोपकारी है तो उसके व्यवहार से स्वयं ही ये सद् गुण प्रकट हो जाते हैं। वह जहाँ भी रहेगा जनहित के कार्य ही करेगा। दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करता रहेगा। वह दिन-रात की परवाह किए बिना ही समाप्त में परहित के कार्यों को करने में व्यस्त रहता है।
         इसके विपरीत यदि वह स्वार्थी, कठोर अथवा असहिष्णु होगा तो अपने व्यवहार से उन अवगुणों को समय-समय पर प्रकट करता रहेगा। यही अवगुण उसकी पहचान बन जाते हैं। यानी लोग कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति बड़ा क्रोधी है या लालची है अथवा स्वार्थी है इत्यादि। गाहेबगाहे उसके ये दुर्गुण सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं और उसके तिरस्कार का कारण बनते हैं। 
          मनुष्य को अपने आचरण से किसी को ऐसा सोचने पर विवश नहीं करने देना चाहिए कि वह है तो फूलों की तरह सुगन्ध फैलाने वाला पर अवगुण रूपी कीट उसे घुन की तरह खोखला कर रहा है। उसे ज्ञात ही नहीं हो पाता कि वह विनाश की ओर कब झुक गया? 
          ऐसा होना असम्भव-सा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति विशेष है तो बहुत गुणवान पर उसके साथी दुष्प्रवृत्ति वाले लोग हैं। हाँ, अपवाद स्वरूप कोई ऐसा हीरा मिल जाए पर यह स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। प्रायः होता यही है कि दुर्जन अपने सम्पर्क में आने वाले सभी को अपने जैसा ही बना लेते हैँ। वे अपने व्यवहार से इतने लालच और आकर्षक उन्हें दिखाते हैं कि न चाहते हुए भी लोग उनके चंगुल में फँस जाते हैं।
          यह सर्वथा सत्य है कि महापुरुष कुमार्गगामी व्यक्तियों को अपने सुचरित्र से ऐसे लोगों को दुष्कर्म करने से विमुख करके सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं और उनका कायाकल्प कर देते हैं। महर्षि वाल्मीकि और अगुलीमाल डाकू सहित अनेक महापुरुषों के उदाहरणों से इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं। बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
          वैसे देखा जाए तो हीरा कोयले की खदान में पाया जाता हैं। हीरे को लोग अपने सिर के ताज मे जड़ते हैं, उससे बने आभूषण पहनकर इतराते हैं।उपयोग करने के उपरान्त उसे सम्हालकर रखते हैं जबकि कोयले को जलाने के काम में लाते हैं। यही अन्तर सज्जनों और दुर्जनों के साथ किए जाने वाले व्यवहार में  स्पष्ट देखा जा सकता है।
        मनीषी कहते हैं जिस प्रकार हर नर में नारायण विद्यमान रहता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में सद् गुणों का भण्डार भी रहता है। उसे उन गुणों को यूँ ही बुराइयों में परिवर्तित नहीं करना चाहिए। यह मनुष्य का परम सौभाग्य होता है कि उसके सिर पर मालिक का वरद हस्त सदा बना रहता है, बस उसे स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। ईश्वर कहता है कि मैं हमेशा आप सबके साथ हूँ। इसलिए मनुष्य को सदा ही सावधान रहना चाहिए। उसे बुराई के रास्ते को छोड़कर अच्छाई के मार्ग को यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

बिनमॉंगे परामर्श न दें

बिनमाँगे परामर्श न दें 

मनुष्य को बिनमाँगे किसी को परामर्श नहीं देना चाहिए अथवा कभी भी अनावश्यक रूप से किसी के कार्य में दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। जन साधारण की आम भाषा में इसे कहते हैं -
            किसी के फटे में टाँग अड़ाना 
यदि मनुष्य ऐसा करता है तो उसे अपनी अवमानना के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मनीषी सदैव हमें समझाते हुए कहते हैं - 
        अपनी इज्जत अपने आप हाथ में होती है। 
       मनुष्य को जहाँ ऐसा प्रतीत हो कि उसकी वहाँ जरूरत नहीं है तो बिना कुछ कहे अथवा बिना कोई विशेष टीका-टिप्पणी किए हुए उसे स्वयं को चुपचाप वहाँ से अलग कर लेना चाहिए। बुद्धिमानी यही कहलाती है कि मनुष्य समय और परिस्थिति को पहचानकर उसके अनुसार ही सबके साथ यथोचित व्यवहार करे।
         बिनमॉंगे सलाह या परामर्श न देना एक बहुत ही समझदारी की और सम्मानजनक आदत है।
मनुष्य जब बिना पूछे किसी को सलाह नहीं देता तो लोग उसकी बातों और विचारों की कीमत समझते हैं। लोग प्रायः बिनमॉंगे दी गई सलाह को सुनना ही नहीं चाहते। वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं या फिर गम्भीरता से नहीं लेते। जब सामने वाला खुद अपनी इच्छा से सलाह मॉंगता है तब वह व्यक्ति की बात का पूरा सम्मान करता है। 
          जरूरत पड़ने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं परन्तु स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर दुल्लती मारकर किनारे भी हो जाते हैं। उसके बाद वे उस सहायता करने वाले को पहचानने तक से भी इन्कार कर देते हैं। सामने पड़ जाने पर वे कन्नी काटकर निकली जाते हैं। निस्सन्देह यह मनुष्य की चरित्रगत विशेषता को प्रकट करता है।
        इन्हीं भावों को रहीमदास जी ने निम्न दोहे में एक उदाहरण के साथ बड़े ही सुन्दर शब्दों में स्पष्ट किया है-
        काज पड़े कछु और हैं काज सरे कछु और।
        रहिमन भँवरी के भये नदी सिरावत मौर।।
अर्थात् जब मनुष्य को किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है तब उसका व्यवहार अलग होता है और स्वार्थ पूर्ण हो जाने पर उसके तेवर ही बदल जाते हैं। जैसे विवाह के समय आवश्यकता होने पर मुकुट को दूल्हे के सिर पर सजाया जाता है और फिर जब फेरे हो जाते हैं तो उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
          इसी प्रकार जिन सोने, चाँदी और हीरे के आभूषणों से लोग श्रृंगार करके पार्टियों में वाहवाही लूटते हैं, उन्हीं को वापिस लौटकर उतार देते हैँ। फिर उन्हें तिजोरी में अथवा बैंक के लाकर में बन्द करके रख देते है। यानी आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद उनको किनारे करके तिजोरी या लाकर में बन्द कर दिया जाता है। इसे ही इन्सानी फितरत कहते हैं, जिसकी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं।
          यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि समय और समझ दोनों ही एक साथ भाग्यशाली लोगों के हिस्से में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब समझदारी दिखाने का समय आता है तो उस समय मनुष्य चूक जाता है। घबराहट के मारे उसके हाथ-पैर फूलने लग जाते हैं। वह अपने बचाव में न कुछ कह पाता है और न ही अपने विवेक पर भरोसा कर पाता है। वह मानो असहाय-सा अनुभव करने लगता है।
          जब समय निकल जाता है तब वह समझदार बन जाता है। अपने मन ही में सोचने लगता है कि काश उसने उस समय यह, यह सब कह दिया होता तो वह बच जाता। उसकी हेठी होने से बच जाती। यह तो वही बात हुई- 
  अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।      
                          अथवा 
               का वर्षा जब कृषि सुखाने।
        जब कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ जाता है तो मनुष्य को तुरन्त ही उत्तर देना चाहिए। स्वीकारोक्ति सूचक हाँ या नकारात्मक न जैसे शब्दों का उपयुक्त समय पर उपयोग करने में दुविधा नहीं होनी चाहिए। ये दोनों शब्द छोटे होते हैं पर बड़े ही खोटे होते हैं। जरा-सी लापरवाही हो जाने पर ये उसे मुसीबत में डालने से जरा भी परहेज नहीं करते।
        यदि इन शब्दों का प्रयोग उपयुक्त समय पर न किया जाए तो मनुष्य को बहुत ही हानि उठानी पड़ सकती है। बहुत सोच-समझकर इनका प्रयोग करना चाहिए। जल्दबाजी में न कहकर और समय से चूक जाने पर हाँ बोलने पर मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ हार जाता है। इनका दूरगामी परिणाम कभी-कभी उसकी काया कल्प भी कर देता है।
          इसलिए समय का सही उपयोग करते हुए मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिए। दूसरों को अनावश्यक परामर्श देने के स्थान पर उसे अपने पर इस जीवन की पहेलियों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जब तक अच्छी तरह से तसल्ली न हो जाए उसे न तो अपनी स्वीकृति देनी चाहिए और न ही इन्कार करना चाहिए। अपने विवेक पर विश्वास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 23 सितंबर 2026

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

परमात्मा सज्जनों की, अपने भक्तों की बहुत कड़ी परीक्षा लेता है किन्तु उनका साथ कभी नहीं छोड़ता। भगवान परीक्षा अवश्य लेते हैं पर सीमा से बाहर नहीं। हमारी सीमा वहीं तक होती है, जहाँ तक हमारा विश्वास टूटता है। ईश्वर उस विश्वास को मजबूत करने के लिए हमें कसौटी पर कसते हैं।
          भारतीय संस्कृति के अनुसार भगवान किसी भी जीव की क्षमता से अधिक परीक्षा नहीं लेते। गीता में स्पष्ट संकेत मिलता है कि ईश्वर मनुष्य को उसके कर्म, संस्कार और सामर्थ्य के अनुसार ही परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। यदि परीक्षा कठिन लगती है तो वह हमारी दृष्टि का दोष होता है, ईश्वर की योजना का कदापि नहीं होता।
           विद्यालय या कालेज में जब भी विद्यार्थियों की परीक्षा ली जाती है तो उसका अर्थ यही होता है कि विद्यार्थी उस परीक्षा में सफल होकर अगली परीक्षा के लिए तैयार हो रहा है। स्कूल की परीक्षाओं में सफल होने के पश्चात कालेज की परीक्षाओं से उसे गुजरना पड़ता है। उसके बाद नौकरी पाने की परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती है। फिर जीवन की भागदौड़ में आयुपर्यन्त उसे एक के बाद एक समस्याओं से जूझना पड़ता है, उसे उनसे छुटकारा नहीं मिलता।
        इसी तरह जीवन की इन परीक्षाओं का क्रम निरन्तर चलता रहता है। मनुष्य एक परीक्षा में सफल होता है तो फिर एक नई परीक्षा उसकी प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाए तैयार बैठी होती है। उसे जीवन भर इनसे दो-चार होते रहना होता है और फिर निश्चित ही सफल भी होना होता है।    
        इसीलिए इस जीवन को युद्धभूमि कहा जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य बस कभी स्वयं से तो कभी अपनी परिस्थितियों से अनवरत संग्राम करता ही रहता है। शायद मानव जीवन की यही त्रासदी कहलाती है।
          बार-बार इन परीक्षाओं में उलझने का कारण है कि वह मालिक मनुष्य को सोने की तरह खरा बनाना चाहता है। जैसे सोने को शुद्ध करने के लिए उसे अग्नि में तपाया जाता है, उसी प्रकार ईश्वर अपने भक्त को दोषमुक्त तथा शुद्ध-पवित्र बनाने के लिए कठिन परीक्षाओं में डालता है यानी कष्टों और परेशानियों की अग्नि में तपाता है। ताकि वह कुन्दन की तरह निखरकर सबके समक्ष आ सके।
        यह शुद्धता केवल मात्र शरीर या मन की नहीं होती बल्कि मन, वचन और कर्म तीनों प्रकार की होती है। ईश्वर चाहता है कि उसका प्रियजन जो भी विचार अपने मन में करे, वैसा ही अपनी वाणी से बोले और फिर उसी के अनुसार आचरण भी करे। इन तीनों से वह अलग-अलग न रहे।
          मनुष्य मन में कुछ और सोचे तथा वाणी से कुछ अलग बोले और आचरण सर्वथा विपरीत करे तो यह उसके व्यवहार की कुटिलता होती है, सरलता या सहजता नहीं कहलाती। जब तक मन, वचन और कर्म से वह एक नहीं होगा तब तक उसके कथन का स्थायी प्रभाव दूसरे लोगों पर नहीं पड़ सकता। यह बात उस मालिक को बिल्कुल पसन्द नहीं है।
        दुखों और परेशानियों की भट्टी में तपकर मनुष्य जब खरे सोने की तरह विशुद्ध और चमकदार बन जाता है। तब इस खरे सोने को वह मालिक फिर वैसे ही अपने पास सम्हालकर रख लेता है जैसे अपने स्वर्णाभूषणों को हम तिजोरी में, बैंक के लाकर आदि में सुरक्षित रख देते हैं।
          इसके विपरीत दुर्जनों को भगवान देता तो बहुत कुछ है परन्तु उन्हें अपना साथ नहीं देता। अर्थात् वह उन्हें अपने से विमुख कर देता है। उनके मन में रहता हुआ, उन्हें चेतावनी देता हुआ भी उनकी पहुँच से दूर हो जाता है। उस समय उन दुर्जनों की पूजा-अर्चना, दान आदि सब मात्र प्रदर्शन के लिए ही रह जाते हैं क्योंकि उस प्रभु को दूसरों को कष्ट देने वाले, मारकाट, चोरी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी आदि अनैतिक कार्य करने वालों की तथाकथित भक्ति नहीं चाहिए होती।
          वे जब तक अपने सभी कुकृत्यों को त्यागकर सहृदय, परोपकारी, दयालु नहीं बन जाते तब तक वह दर्शक की तरह बना रहता है। वह मालिक तब तक उनका हाथ नहीं थामता जब तक वे अपने सच्चे मन से प्रायश्चित नहीं करते। 
        सज्जनों की महानता कर्मठता, सहृदयता, दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव ही उन्हें दुर्जनों से अलग बनाते हैं। यही कारण है कि वे जन साधारण में लोकप्रिय बन जाते हैं। समाज उन्हें हृदय से सच्चा हितैषी व मार्गदर्शक स्वीकार करता है। दुष्ट सबकी आँखों की किरकिरी बनते हैं। मजबूरी में उनके साथ कोई सम्बन्ध रख सकता है पर मन से उनके साथ जुड़ाव नहीं कर पाते। उनके मुँह के सामने वे डर के मारे कुछ न कह पाएँ पर पीठ पीछे सदा उनकी अवमानना ही करते हैं।
         मनुष्य को स्वयं ही यह निश्चित करना होता है कि वह ईश्वर का कृपा पात्र बनना चाहता है अथवा मालिक से दूरी बनकर अपयश की भागीदार बनना चाहता है। निश्चित ही उसे उसी के अनुरूप परमेश्वर की परीक्षाओं में सफल होकर उसका प्रिय भक्त बनना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे हम पूर्ण कह सकें क्योंकि उसमें अच्छाई और बुराई दोनों का ही समावेश होता है। इसीलिए कभी वह गलतियाँ या अपराध कर बैठता है तो कभी महान कार्य करके अमर हो जाता है। यानी कि उसमें हमेशा स्थायित्व की कमी रहती है। यदि वह पूर्ण हो जाए तो भगवान ही बन जाएगा तथा ईश्वर कहलाने लगेगा। 
          केवल और केवल वह परमपिता परमात्मा ही इस जगत में पूर्ण है। इसीलिए उसकी यह सृष्टि भी पूर्ण है। उसमें से कोई कमी नहीं निकाली जा सकती। वह मालिक सभी भौतिक गुण-दोषों से परे है। उसमें किसी प्रकार की कोई कलुषता नहीं हो ही सकती। इसीलिए हम सब उसे पूर्णब्रह्म कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करके सदा ही उससे कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं। परमात्मा के विषय में निम्न प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र 'ईशोपनिषद्' और 'बृहदारण्यकोपनिषद्' से लिया गया है। मन्त्र कहता है-
       ऊॅं पूर्णमिद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदुच्यते।   
       पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
अर्थात् वह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
         हम कह सकते हैं कि वह जो दिखाई नहीं देता है पर वह पूर्ण है। वह दृश्यमान जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण है। क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण से उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए तब भी पूर्ण ही शेष बचता है।
        यह पूर्णता कहलाती है जहाँ अपूर्ण होने का कोई भाव ही नहीं है। सब तरह से हमें उसकी पूर्णता का साक्षात्कार होता है। उसमें से कुछ ले भी लिया जाए तब भी सागर के जल की तरह वह सदा पूर्ण ही रहता है।
        यह सर्वथा सत्य है कि इन्सान पूर्ण नहीं हो सकता पर पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास अवश्य कर सकता है। इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हर मनुष्य की अपनी एक शक्ति होती है और उसी प्रकार उसकी कोई-न-कोई कमजोरी भी होती है। उसी के आधार पर समाज में उसकी एक निश्चित पहचान बन जाती है।
          इस असार संसार के किसी मनुष्य के पास धन का बल होता है, किसी अन्य व्यक्ति के पास विद्या का बल होता है, दूसरे किसी के पास सत्ता का बल होता है और कुछेक के पास शारीरिक बल होता है। कुछ ऐसे सन्त प्रकृति के लोग भी होते हैं जिनके पास आत्मिक शक्ति होती है। इन सबके अतिरिक्त वे लोग होते हैं जो अपने घमण्ड में सदा ही चूर रहते हैं। वे उसे ही अपनी शक्ति मानकर इतराते रहते हैं।
         बल या शक्ति की ही भाँति हर मनुष्य की अपनी-अपनी कमजोरी भी होती है। शारीरिक बल या आत्मिक बल अथवा मानसिक बल किसी की भी कमी मनुष्य में हो सकती है। इनके अतिरिक्त धन, विद्या, अनुभव जन्य ज्ञान, अनुशासन में से किसी एक की भी कमी उसकी कमजोरी बन जाती है। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी मनुष्य की कमजोरियाँ हो सकती हैं यथा पानी को देखकर डरना, ऊँचाई से घबराहट, अग्नि से भय, किसी पशु विशेष से डर जाना, कहीं भी भीड़ को देखकर परेशान हो जाना आदि।    
          समझदार मनुष्य वही है जो अपनी ताकत या शक्तियों का अनावश्यक प्रदर्शन न करे। जिससे लोग उसकी ताकत का दुरूपयोग करने के लिए उसे उकसाने न लग जाएँ। यदि मनुष्य उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों के झाँसे में आ गया तो उसका विनाश निश्चित समझ लीजिए। इसका कारण है कि अपनी चाटुकारिता होती देखकर वह जीवन की वास्तविकता से विमुख होने लगता है। वह उसे ही सच्चाई मान लेता है।
        अपनी कमजोरियों को भी दूसरों के सामने प्रकट न होने दे जिससे किसी को उसका उपहास उड़ाने का अवसर न मिल सके। इससे उसका मनोबल कमजोर नहीं पड़ेगा।
        जिस प्रकार मछली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती और पशु, पक्षी या इन्सान पानी में अपना घरौंदा नहीं बना सकते। सबके लिए उपयुक्त स्थान निश्चित हैं। उसी प्रकार मनुष्य की शक्ति अथवा कमजोरी उसके गले की हड्डी नहीं बनने चाहिए। उसे अपनी शक्ति का उपयोग देश, धर्म, परिवार, समाज की भलाई के लिए करना चाहिए। इसी तरह अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके चमत्कार करने उसे निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्र प्रभा