शनिवार, 8 अगस्त 2026

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना करने का अर्थ है, उसको नित्य प्रति स्मरण करना। मनुष्य किसी भी रूप में चाहे प्रभु की भक्ति कर सकता है। यानी चाहे उसकी साधना साकार रूप में की जाए अथवा निराकार रूप में की जाए। उसे किसी भी नाम से याद किया जा सकता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। किसी को उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इस संसार में भेजने वाले उस मालिक का नाम उसे प्रतिदिन भजना चाहिए।
           समस्या यह है कि इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उस ईश्वर की उपासना करने में मनुष्य का मन रमता ही नहीं है। यह एक मनुष्य की बात नहीं है परन्तु प्रायः सभी लोगों की यही समस्या है। इन्सान केवल ऐशो-आराम में मस्त रहना चाहता है। उसे लगता है कि वह यहॉं पर मौज-मस्ती करने आया है। इसलिए उसका ध्यान उस मालिक की ओर जाता ही नहीं है जिसने उसे इस संसार में मनुष्य के रूप में भेजा है।
        ईश्वर की उपासना करना सबसे कठिन कार्य है। यह मैंने इसलिए कहा कि उसकी भक्ति का प्रदर्शन अधिक होता है जिसका कोई लाभ मनुष्य को नहीं होता। जो लोग सच्चे मन से उसकी उपासना करना चाहते हैं जब उनका मन उस समय दुनिया के कारोबार में भटकने लगता है तो वे परेशान रहते हैं।
          ईश्वर का यदि सच्चे मन से भजन किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है यानी मनुष्य ईश्वर के करीब हो जाता है। उसका प्रिय बन जाता है। ये मात्र अड़चनें है जो इन्सान को डिगाने के लिए आती हैं। वह प्रभु भी परीक्षा लेता रहता है कि मनुष्य की लगन कितनी सच्ची है, उसमें कितनी ईमानदारी है। निश्चित समय पर और मन से सोचा गया जप मनुष्य को अवश्य करते रहना चाहिए।
          कहते हैं जब राम कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का मन साधुओं के उपदेश के कारण बदल गया तो वे साधना में लीन हो गए। तपस्या करते हुए उनके ऊपर चींटियों ने बाम्बी बना ली थी। इसलिए उन्हें वाल्मीकि कहते हैं।। वे राम नाम के स्थान पर मरा शब्द का जप करते हुए तर गए। उन्हें तब भी इसका फल मिला और वे विश्व विख्यात हुए वे रामकथा लिखकर इस संसार में सदा के लिए अमर हो गए।
            एक बार तुलसीदास से किसी व्यक्ति ने पूछा था, "कभी-कभी भक्ति करने में मन नहीं लगता। फिर भी जप करने बैठ जाते हैं, क्या उसका फल मिलता है?"
      इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास ने उसे मुस्कुराते हुए कहा था - 
    तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
    भौम पड़ा जा में सभी, उल्टा सीधा बीज।।
अर्थात् जब भूमि में बीज बोए जाते हैं तो यह नहीं पता चलता कि वे उल्टे पड़े हैं या सीधे। पर फिर भी कालान्तर में फसल  तैयार हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु के नाम का सुमिरन कैसे भी किया जाए, उसके सुमिरन का फल अवश्य मिलता है।
        यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि जप कैसे किया बल्कि इसकी उपयोगिता है कि जप करने का जो नियम बनाया था उसे भार तो नहीं समझ रहे। कहीं मन में यही विचार हावी हो रहा हो कि बेकार ही मुसीबत मोल ले ली। यदि ऐसी भवना मन में कभी आ जाए तो अपने ऊपर किए गए उस प्रभु के उपकारों का स्मरण कर लीजिए। फिर मन स्वयं ही उसकी आराधना करने के लिए नतमस्तक हो जाएगा।
        कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर किसी ने भेजा था कि ईश्वर को स्मरण करने के लिए उसे एस. एम.एस. करो। ईश्वर को एस.एम.एस. करने के विषय में लिखे गए ये विचार बहुत ही सुन्दर लगे, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         एक बार कोई भक्त ने किसी सन्त के पास गया और उनसे पूछा, 'मुझे आज तक भगवान नहीं मिले, कैसे मिलेंगे बताइए?"
        सन्त बोले, "भगवन तो हर स्थान पर विद्यमान हैं, वह कण-कण में वास करते हैं। इसीलिए उन्हें सर्वव्यापी कहते हैं। तुमने भगवान को एस.एम. एस. नहीं किया होगा। एक बार उन्हें एस.एम. एस. करना शुरू कर दो फिर निस्सन्देह वे स्वयं ही तुम्हें मिल जाएँगे।" 
        भक्त ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए फिर उनसे पूछा, "मैं एस.एम.एस. कहाँ पर करूँ? भगवन का नम्बर तो मेरे पास नहीं है।" 
          सन्त ने कहा, "अच्छा एक बार इसका अर्थ समझ लो। इसके हर शब्द का अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं- एस- सच्चे,  एम- मन से,  एस - स्मरण।
अर्थात् सच्चे मन से उसका स्मरण कर तो वह तुरन्त मिल जाता है।"
          इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर को मनुष्य से कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो बस मनुष्य के भाव को परखता है। उसकी उपासना करने के लिए मनुष्य को सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए, उसका मन चाहे लगे अथवा न लगे। अपने नियम का पालन सच्चे मन से करने का ईमानदार प्रयास करते रहना चाहिए। कभी तो उसकी उपासना में मन लगने लगेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

धनवान बनने की बलवती कामना

धनवान बनने की बलवती कामना

जीवन को सुविधापूर्वक जीने के लिए मनुष्य के लिए धन एक बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए उसकी सबसे पहली और बलवती कामना होती है धनवान बनने की। यह ऐसा धन है कि बहुत कठिनाइयों और प्रयत्नों से पकड़ में आता है। हाथ में आते ही फिर यह फिसलने के लिए मचलने लगता है। इसका कारण है कि जब इन्सान जी तोड़ श्रम करके धन एकत्र का लेता है तो फिर वह संसार की समस्त सुख-सुविधाएँ भोगना चाहता है। अतः वह अपने और अपनों के लिए उन्हें जुटाने का प्रयास करता है।
        यानी रहने के लिए एक बड़ा घर, घूमने के लिए मँहगी गाड़ी, अच्छे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, ऐशो-आराम के सभी साधन अपने जीवन काल में जुटा लेना चाहता है। उसकी यही इच्छा होती है कि वह और उसका घर-परिवार किसी भी तरह के कष्ट का सामना न करे। यदि घर में कभी कोई अस्वस्थ हो जाए तो अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाना चाहता है। उसकी यही हार्दिक इच्छा होती है कि उसके घर का कोई भी सदस्य अपना मन मारकर न रहे। 
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका कमाया हुआ पैसा बोलने लगता है। यदि वह स्वयं पर नियन्त्रण रख लेता है तो सब सुविधाओं को भोगता है। परन्तु यदि उस पैसे को न सम्हाल सके तो उसका सारा कमाया हुआ धन बर्बाद हो जाता है। इसके पीछे केवल यही कारण है कि पैसा अपने साथ बहुत से दुर्व्यसन लेकर आता है। इन कुटेवों में यदि वह पड़ जाता है तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। सब कुछ हारकर फिर वह सिर धुनकर पश्चाताप करता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसलिए सयाने कहते हैं -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
          जब वह दौलत एकत्रित कर लेता है तब समाज में अपना एक विशेष स्थान भी चाहता है। उसके मन में यश पाने की आशा जागने लगती है। वह चाहता है कि उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले, लोग उसे पहचानें। उसका सर्वत्र समाना हो। इस चक्कर में वह उस समय सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगता है। खूब दान देता है, अपने नाम के पत्थर भी लगवाता है।
         जब वह प्रभूत धन अर्जित कर लेता है और चारों ओर उसका यश फैलने लगता है तब फिर उसके मन में एक शक्तिशाली इन्सान बनने की उत्कट लालसा बलवती होने लगती है। उस समय कुछ लोग स्वयं को सिद्ध करने के लिए अनायास ही असामाजिक तत्वों से साँठ-गाँठ कर बैठते हैं। दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए अपने साथ हथियारबन्द गार्ड रखता है ताकि लोग उसका लौहा मानें और उससे डरकर रहें। 
        समय बीतते वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाता है। तब वहाँ से निकलने के लिए वह छटपटाने लगता है परन्तु उसके सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। वह चाहकर भी अपने जाल को काटकर मुक्त नहीं हो पाता।
        धन कमाने, यश पाने और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए मनुष्य भटकता रहता है। फिर अन्त में वह मन की शान्ति पाने के लिए तलाश में दर-बदर भटकने लगता है। वह तीर्थों, जंगलों की खाक छानता है। यदा कदा तथाकथित धर्मगुरुओं के चंगुल में फंस जाता है। 
         इन सभी स्थानों पर भी जब उसे शान्ति नहीं मिल पाती तब उसकी खोज अधूरी रह जाती है। इस तरह भटकते हुए उसका अन्तकाल आ जाता है और वह मिट्टी में मिल जाता है। उसके सारे-के-सारे ठाठ-बाठ इसी धरा पर धरे रह जाते हैं। वह खाली हाथ इस संसार से विदा हो जाता है।
        मनुष्य अपने जीवन की इस यात्रा में बहुत-सी उम्मीदें पल लेता है। आशा ऐसी होनी चाहिए जो उसे उसके लक्ष्य तक ले जाए। अपने लक्ष्यों को पाने की होड़ में वह अपने रिश्तों से दूर होता जाता है। जब सबसे ऊबकर उसे उनकी आवश्यकता होती है तब तक वे पीछे छूट गए होते हैं। ये वही लोग होते हैं जो उसके अपने होते हैं किन्तु समय की ठोकर लगने से पराए हो गए होते हैं।
          इन्सान का यह दुर्भाग्य है कि जरा-सा ऐश्वर्य, कीर्ति, शक्ति पाकर वह घमण्ड से फूल नहीं समाता और अपनी औकात भूल जाता है। दूसरी और इतनी विशाल जलराशि का स्वामी होकर भी सागर सदा अपनी सीमा में रहता है। 
          बड़े दुःख की बात है कि मनुष्य अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। धन के मद में चूर वह हर किसी को देख लेने की धमकी देता हुआ स्वयं को ईश्वर से भी महान समझने की भूल करने लगता है। उसकी सत्ता को चुनौती देने लगता है जिसका अन्त अच्छा नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहिए की सब सुखों को देने वाले उस प्रभु को सदा स्मरण करते हुए उसका धन्यवाद करे। अपने अन्तस् में अहं को स्थान न देकर सबसे सहृदयता का व्यवहार करके वास्तविक पूँजी का संग्रह करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

आयु‌ में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

आयु में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। वह बच्चे के रूप में जन्म लेता है। फिर वर्षों वर्ष व्यतीत होते रहते हैं और मनुष्य रिटायर हो जाता है। यानी एक आयु के पश्चात उसे वृद्ध मान लिया जाता है। वयोवृद्ध व्यक्ति समाज में सम्माननीय होता है। परन्तु वास्तव में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मात्र आयु में वृद्ध होने से ही कोई भी मनुष्य बड़ा कहला सकता है?
         इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि आयु में वृद्ध होने पर मनुष्य को बड़ा अथवा समझदार नहीं कहा जा सकता। हम यह भी कहा सकते हैं कि मनुष्य का अपना व्यवहार जो वह दूसरों के प्रति करता है, उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं। बड़ा वही व्यक्ति कहलाता है जो अपनी विद्वत्ता और अपने अनुभवजन्य ज्ञान का उपयोग देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए करे। 
          बड़प्पन उसी मनुष्य का माना जाता है जो अपने छोटों के प्रति सहृदय हो। उन्हें पूरा प्यार व सम्मान दे। उनकी समस्याओं को सुलझाने की सामर्थ्य रखता हो। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति उसकी शीतल छाया का आनन्द ले सके। उसके ज्ञान और उसके सद्वयवहार की छाप लेकर ही विदा हो। बार-बार उनसे सम्पर्क साधने के लिए उसका मन लालायित रहे।
          आयु में बड़े होने के उपरान्त यदि मनुष्य में ओछापन हो, चरित्रहीन हो या अहंकारी हो तब भी कोई उसका आदर नहीं करता। लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यदि वह क्रोधी हो तो कोई उसके पास नहीं जाना चाहता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं। यदि वृद्ध व्यक्ति मूर्ख हो तब भी उसका कोई सम्मान नहीं करता।
          जिस बड़े व्यक्ति को अपने पद, ज्ञान, धन-दौलत आदि का घमण्ड हो, वह दूर की कौड़ी जैसा व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं बन पाता बल्कि सबके द्वारा नकार दिया जाता है। उस मनुष्य की स्थिति खजूर के पेड़ की तरह होती है। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में हमें समझाते हुए कहा है-
     बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
     पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर।।
अर्थात् यह दोहा हमें यही समझ रहा है कि खजूर के पेड़ के बड़े होने का लाभ न किसी इन्सान को होता है और न किसी पक्षी को होता है। खजूर के पेड़ की लम्बाई क्योंकि बहुत अधिक होती है। इसलिए वह धूप में तपे हुए किसी भी यात्री को छाया नहीं दे सकता। उस पर लगने वाला फल इतनी ऊँचाई पर होता है जिसे कोई भी तोड़कर नहीं खा सकता और न ही अपनी भूख मिटा सकते हैं। 
        इस दोहे का भावार्थ और इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। केवल आकार या धन-दौलत में बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता। यदि आपका बड़प्पन किसी जरूरतमन्द के काम न आए तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती।
         जो लोग ज्ञान या धर्मचर्चा में योग्य होते हैं, उनके विषय में मनीषी कहते हैं-
        धर्मवृद्धेषु वयः न समीक्षते।
अर्थात् धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती।
          इस सूक्ति के अनुसार यदि धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती तो फिर क्या देखा जाता है? उन लोगों की आयु न देखकर केवल ज्ञान ही परखा जाता है। इस विषय में हम कह सकते हैं कि साधु-सन्त या विद्वान चाहे छोटी आयु के हों या बड़ी आयु के सभी उनके चरण छूते हैं। यहाँ उनका ज्ञान ही महत्वपूर्ण होता है, उनकी आयु नहीं।
          जो मनुष्य बड़े होने पर भी अपने छोटों को अपनी छाया में सुरक्षित नहीं रख सकता, उनका समुचित ध्यान भी नहीं रख सकता, उसे कोई पसन्द नहीं करता। हर इन्सान उससे दूरी बनाए रखने का प्रयत्न करता है, कोई भी व्यक्ति उससे अपना रिश्ता नहीं रखना चाहता। उस समय वह मनुष्य बरगद के विशाल वृक्ष की तरह इस संसार में निपट अकेला ही रह जाता है।
          बरगद के पेड़ की तरह मनुष्य को महान नहीं बनना चाहिए। वह बहुत विशाल होता है। उसकी छाया में कोई और पौधा नहीं पनप सकता। ऐसे उस बरगद की बहुत अधिक आयु होने का किसी को कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण है कि अपनी छाया में अन्य पौधों के न होने से वह बड़ा होने पर भी निपट अकेला ही रह जाता है।
          यदि कोई वयोवृद्ध दुर्वासा ऋषि की तरह क्रोधी हो तो भी वह पूज्य नहीं होता। क्रोधी व्यक्ति यदि गुणवान हो तब भी वह लोकमान्य नहीं बन पाता। जब तक उसके स्वभाव में मधुरता नहीं होगी तब तक कोई उसे नहीं पूछता। इसीलिए कहते हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है।
          इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य का सम्मान उसकी योग्यता, उसके ज्ञान, उसके जीवनभर के अर्जित अनुभवों के आधार पर होता है, उसके वयोवृद्ध होने से नहीं होता।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

माना यही जाता है कि बुरे व्यक्ति अथवा दुष्ट के साथ सहृदयता बरतनी चाहिए। उसे यथासम्भव सुधारने का प्रयास करना चाहिए। उसे सन्मार्ग दिखाया जाए तो वह शायद अपने बुराई के रास्ते को छोड़ सकता है और निस्सन्देह एक अच्छा इन्सान बनने का प्रयत्न सकता है। समस्या यह है कि आज के इस आपा-धापी वाले युग में किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि वह उन्हें सुधारने का कार्य करे।
          आज प्रायः लोग इस तर्क को न मानकर यही कहते हैं कि एक बार जो व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़ता है उसकी वहाँ से वापिसी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होती है। इसका कारण है कि उसका मन वहाँ रमता है और वह समझता है कि उसका लौहा सभी मानते हैं। उसकी तूती बोलती है तथा लोग उससे डरते हैं। इसलिए वह वापिस नहीं लौट सकता। यदि वह लौटना चाहे भी तो उसके साथी उसे वैसा नहीं करने देते। उन पर अपना कीमती समय नष्ट न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए।
          तथाकथित धर्मगुरु अपने धन-वैभव को बढ़ाने में लगे रहते हैं। उन्हें किसी दुष्ट को सुधारने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। कुछ सरकारी और गैर सरकारी संस्थाऍं इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। सोचने की बात यह है कि उनकी सफलता का ऑंकड़ा सन्तोषजनक है क्या? जब घर-परिवार और बन्धुजनों की कही हुई बात वे नहीं मानना चाहते तो फिर किसी अन्य से क्या उम्मीद रखी जा सकती है?
          अपराधिक प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को कितना भी सुधारगृह में भेज दो, उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का कितना भी यत्न क्यों न किया जाए पर परिणाम वही होगा यानी 'ढाक के तीन पात।' तब उन पर की गई मेहनत की जाए व्यर्थ हो जाती है।
          किसी विद्वान का कहना है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए-
            शठे शाठ्यं समाचरेत्।
या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि-
        'शईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए। 
अर्थात यदि कोई ईंट मारे तो उस पर पत्थर से वार तो कर ही देना चाहिए।
        उनका कथन यह है कि उन्हें  कोई और भाषा समझ ही नहीं आती। वे इसके लिए तर्क देते हैं कि दुष्ट व्यक्ति साँप की तरह होता है। उसे कितना भी दूध पिलाओ वह डंक जरूर मारता है। इसी तरह दुष्ट के साथ कितना भी अच्छा करो, मौका आने पर वह अपनी हरकतों से बाज हीं आता। वह हानि करा ही देता है। इसलिए वह कभी विश्वास के योग्य नहीं बन सकता। इसलिए उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होता है।
        यदि दुष्ट व्यक्ति के साथ नरमी का बर्ताव किया जाए तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। वह दूसरों को मूर्ख समझने लगता है। इसलिए उसके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए। उनका कथन है कि- 
          आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति:।
अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के साथ सरलता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। 
          उसे ऐसा व्यवहार रास नहीं आता। मनुष्य को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे उसे यह न लगे कि सामने वाला कमजोर हैं या उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। अतः उसको दबाया न सकता है अथवा डरा-धमकाकर उससे अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है।
      ‌  वैसे तो हम सब चाहते हैं कि उन दुष्ट लोगों को सुधारने का एक मौका दिया जाना चाहिए। पर वास्तव में एक अवसर मिलने पर उनमें सुधार हो सकता है क्या? यदि हाँ तो यह समाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी अन्यथा समय की बर्बादी ही मानी जाएगी।
         दुष्ट को यदि हम क्षमा करेंगे तो वह हमारा मजाक उड़ायेगा और कहेगा कि हम में हिम्मत ही नहीं है उसका सामना करने की। हमारी क्षमाशीलता को वह हमारी कमजोरी समझकर और अधिक अत्याचार करेगा। इसिलए उसका प्रतिकार करना आवश्यक हो जाता है।
          अपवाद हर स्थान पर मिल जाते हैं। सन्यासियों की संगति में आकर पूर्व का रत्नाकर डाकू लोकप्रसिद्ध रामायण का रचियता महर्षि वाल्मीकि बन गया। इसी प्रकार महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आने पर अंगुलिमाल डाकू उनका प्रिय शिष्य बन गया। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है जहाँ सज्जनों की संगति में दुष्ट अपनी बुराइयों को दूर करके महापुरुष बन गए। बस केवल खोजने भर की देर है। महर्षि वाल्मीकि और अंगुलीमाल डाकू दोनों ही महात्माओं की संगति में महान बने तथा उन्होंने समाज को दिशा देने का कार्य किया। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
         यहाँ मैंने विद्वानों की उक्तियों को आपके समक्ष रखा है। अब आप अपनी तर्क बुद्धि और विवेक से विचार करें कि हम इन दुष्ट लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें?
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। इसके लिए उसे किसी के परामर्श कर्त्ता अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए वह किसी मैनेजर आदि के सहारे नहीं रहता। उसने इस ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की। उसकी इस सुन्दर रचना में यानी सृष्टि में कहीं भी कोई कमी नहीं है। हम मनुष्य चाहे जितना भी परिश्रम कर लें, यह हमारे बूते की बात नहीं है।
          परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्त्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा, अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानी वह नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जब से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इस क्रम में कहीं भी, किसी प्रकार की त्रुटि की कोई भी गुॅंजाइश नहीं है।
         सूर्य, चन्द्र आदि सभी ग्रह-नक्षत्रों का क्रम निश्चित है। कोई प्रातः आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद् गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलय हो जाती हैं। नदियॉं अबाध गति से अपने इस नियम का पालन करती हैं।
        सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की जिससे सबको अपने भोज्य पदार्थ मिलते रहें। पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की।
          पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चट्टानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है जिसे वे अपनी जरूरत के समय खा सकें।
         पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि नारायण पण्डित ने 'हितोपदेश' में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
      न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः।
अर्थात् सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता, उसे परिश्रम करना पड़ता है।
       कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए हर जीव को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने ऐसा सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी। 
        कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अतः शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे कहीं बदबू न फैल सके। पेड-पौधों का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए शाकाहारी जीवों को बना दिया।
        इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानी सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके आलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।
      ‌    अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मारने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है जब वह बुझ जाती है तो हर कोई उसे रौंद देता है। चींटियॉं भी उस पर चलने लगती हैं।
         मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने सभी प्रबन्ध स्वयं अपने हाथों में लिए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।
        अतः उसके विधान में मनुष्य को अपनी टाँग अड़ानी छोड़ देनी चाहिए। वह बहुत ही समर्थ है उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। बस यह याद रखिए कि वह स्वयं सब सम्हाल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 3 अगस्त 2026

दान का महत्त्व

दान का महत्त्व

दान के महत्त्व को हमारे मनीषी भली-भाँति समझते थे। इसीलिए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हर शुभकार्य को करते समय दान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी भी दुःख-तकलीफ से उभरने के पश्चात् भी दान देना चाहिए। अपने मन की शान्ति के लिए भी हर मनुष्य को अपनी शुद्ध कमाई में से कुछ धन अलग निकालकर रखना चाहिए और उसे दान में भी देना चाहिए।
        समाज में रहते हुए मनुष्य दूसरों से बहुत कुछ ग्रहण करता है क्योंकि सदा से ही वह एक समाजिक प्राणी है। उसके बदले में उसे समाज के हितार्थ कुछ-न-कुछ अपना योगदान करते रहना चाहिए। उनमें दान देना भी प्रमुख है। दान देने के विषय में मुझे कबीरदास जी का निम्न दोहा याद आ रहा है-
          चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
          दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर।।
अर्थात् नदी में जल का भण्डार होता है। यदि चिडिया उसमें से कुछ बूँदे जल की ले लेती है तो उस नदी के जल में कोई कमी नहीं आती, वह खाली नहीं होती।
        इस प्रकार अपनी कमाई में से कुछ राशि यदि समाजिक और धार्मिक कार्यो पर व्यय कर दी जाए तो वह धन सार्थक हो जाता है। धन का दान किसी प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर नहीं करना चाहिए अथवा न ही किसी के दबाव में आकर करना चाहिए। साथ ही किसी की होड़ में आकर भी दान नहीं करना चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धाभाव होना चाहिए और अपना कर्तव्य मानकर दान देना ही‌श् श्रेयस्कर होता है।
        दान देते समय यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि दान सुपात्र को ही देना चाहिए ताकि वह उसका सदुपयोग करे। यदि दान कुपात्र को दिया जाए तो वह उसका दुरुपयोग करता है। इस तरह दिया गया धन व्यर्थ हो जाता है। उस समय अपने मन को भी कष्ट होता है।
        दान देते समय कर्त्तापन का अभिमान मन में कदापि नहीं आना चाहिए। हालाँकि यह इन्सानी कमजोरी है कि वह चाहता है कि सभी लोग उसके इस कार्य को महत्त्व दें, उसकी सराहना करे और सम्मान दे। जिसकी सहायता की है वह सारी आयु उससे नजरें न मिला सके अथवा हमेशा उसके सामने सिर झुककर रहे। ऐसी सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए और यथासम्भव अहं से बचने का प्रयास करना चाहिए।
        यदि मनुष्य इस बात को आत्मसात कर लेता है कि देने वाला तो वह ईश्वर है, इन्सान तो बस दान देने का एक माध्यम है। तब कभी उसके मन में कर्त्तापन का यह मिथ्या अभिमान नहीं आ सकेगा कि दान उसने दिया है या उसने किसी व्यक्ति की सहायता की है।
         दान देने का लाभ तभी होता है जब अपना कर्त्तव्य समझकर दान दिया जाए। हमारे मनीषी कहते हैं कि दाएँ हाथ से दान दो तो बाएँ हाथ को पता न चले। दूसरे शब्दों में कहें तो दान को गुप्त रूप से देना चाहिए और स्वयं भी उसके बारे में भूल जाना चाहिए।
           यहॉं मैं एक बात कहना अपना धर्म समझती हूॅं कि तथाकथित गुरुओं के कहने पर अपने खून-पसीने की कमाई को गंवाना नहीं चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिसके पास अकूत धन है उसे हमारे कुछ पैसों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वही धन किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जिसे उसकी आवश्यकता सचमुच है। तभी हमारा दिया धन सार्थक होता है।
         इसी भाव को रहीम जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखते हैं-
        देन हार कोई और है भेजत जो दिन रैन।
        लोग भरम हम पर करें तासो नीचे नैन।।
अर्थात् देने वाला तो कोई ओर है जो हमें दिन-रात देता रहता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो जाता है कि हम देने वाले हैं। इसीलिए दान देते समय उनकी नजरें झुक जाती थीं।
         देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों का दान करने वाले महर्षि दधिचि को हम सब जानते हैं।दानवीर कर्ण को कौन भूल सकता है? राजा हरिश्चन्द्र से बड़ा दानी कौन हो सकता है? उनके दान के फलस्वरूप उनकी पत्नी को दासी बनना पड़ा। उन्हें स्वयं भी एक चाण्डाल के यहॉं नौकरी करनी पड़ी। इतिहास भरा हुआ है ऐसे महापुरुषों की गाथाओं से। 
    धन के दान को सर्वाधिक महत्त्व इसलिए दिया जाता है कि उसके बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं होता। अन्न, वस्त्र, श्रम आदि के दान का भी महत्त्व कम नहीं है। मनुष्य यदि नए वस्त्र नहीं दान कर सकता तो ऐसे वस्त्र देने चाहिए जिन्हें कोई पहन सके और कुछ समय के लिए वह अपना तन ढक सके।
        विद्या के दान का शास्त्रों में सबसे अधिक महत्त्व माना जाता है। इससे एक भावी पीढ़ी संस्कारित होती है जो देश का भविष्य होती है। इसलिए निस्वार्थ भाव से दान देते रहना चाहिए। इससे मनुष्य के इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 2 अगस्त 2026

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता प्राप्ति के लिए हर मनुष्य अपने हाथ-पैर मारता है। उसके बाद भी यदि ऐसा लगे कि पास आती हुई सफलता रूठकर कहीं दूर चली जा रही है और हाथ नहीं आ रही तब उसे अपने प्रयासों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता होती है। इसके लिए निराश नहीं होना चाहिए। असफलता अन्त नहीं होता। यह सीखने और खुद को बेहतर बनाने का एक अवसर होती है। अपनी गलतियों की समीक्षा करनी चाहिए और फिर आगे बढ़ना चाहिए। 
         जीवन की सफलता का कोई एक जादुई पैमाना नहीं होता बल्कि यह स्पष्ट लक्ष्य, कठोर साधना और अनवरत सीखने का परिणाम होती है। इसके लिए सबसे आवश्यक है कि मनुष्य स्वयं की भूमिका निश्चित करे और पूरी लगन से उस दिशा में अपने कदम बढ़ाए। मनुष्य को स्वयं पर यह विश्वास रखना चाहिए कि वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है। यह उसे विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
       भाग्य पर अन्धविश्वास न करके अपने उद्देश्यों को मजबूत बनाना चाहिए और अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए और स्वयं की सामर्थ्य पर ही विश्वास करना चाहिए। जीवन में कुछ बातें या घटनाएँ अवश्य ही संयोगवश हो जाती हैं पर हमेशा ऐसा नहीं होता। 
       दृढ़ विश्वास और अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने वालों को कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। समय का सही उपयोग ही महान लोगों की सफलता का रहस्य रहा है। असफलता से कभी क्षणिक अवसाद अवश्य हो सकता है परन्तु उसका परिणाम सदा ही सुखदायी और परिवर्तन लाने वाला होता है। सकारात्मक सोच मनुष्य को ऊर्जावान बनाए रखती है। समस्याओं के स्थान पर‌ समाधान की ओर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करती है।
      अपने लक्ष्य को पाने के इच्छुक साहसी लोग असफलताओं से निराश नहीं होते। जब तक मन-मस्तिष्क सुनियोजित रहेगा यानी उनमें तालमेल बना रहेगा तो तब तक मनुष्य की भावनाएँ उसी के अनुरूप ही जन्म लेंगी। 
      मनुष्य की उर्जा, उसकी शक्ति का यदि सही दिशा में उपयोग होगा तो शरीर भी अपनी गति में आ जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता स्वयं होता है। यह सर्वथा उचित है। मनुष्य जब अपने मजबूत इरादों, दृढ़ विश्वास, सुनियोजित मन-मस्तिष्क और एक निश्चित गति से आगे बढ़ेगा तो ब्रह्माण्ड की कोई भी ताकत उसे पछाड़ नहीं सकती।
         मनुष्य के विचारों में, उसकी सोच में स्पष्टता और परिपक्वता का होना बहुत आवश्यक होता है। उसका आत्मविश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मनुष्य को एकान्त में बैठकर धैर्य से विवेकपूर्वक योजना बनानी चाहिए और उसे उचित समय पर क्रियान्वित कर देना चाहिए।
         यदि उसकी योजना में ही कमी रह जाएगी तो उसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। मनुष्य को उत्साही बनना चाहिए पर अति उत्साही नहीं होना चाहिए। ऐसा करके वह अपने ही दुर्भाग्य को स्वयं न्यौता दे बैठता है जिसके लिए आयुपर्यन्त उसे हाथ मलते ही रह जाना पड़ता है।
      मनुष्य को चाहिए की वह उन सबको अपने साथ लेकर चले जिन्हें वह पसन्द हैं। जो उसे नापसन्द हैं उनका त्याग न करके ऐसा कुछ करे कि वे स्वेच्छा से उसके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाएँ। जीवन में पता नहीं कब किस मोड़ पर उसे उनकी भी जरूरत पड़ जाए। उस समय वह स्वयं को सबसे भाग्यशाली इन्सान समझेगा।
      किसी को भी अपने जीवन मैं सदा एक जैसी परिस्थितियाँ नहीं मिलतीं। जीवन पर्यन्त धूप-छाँव का खेल चलता रहता है। उन सभी परिस्थितियों को सम रहकर सहन करना ही बुद्धिमत्ता कहलाती है। भगवन श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसे द्वन्द्व सहन करना कहा है। 
      मनुष्य को व्यपरियों की तरह जमा-घटा का पहाड़ा नहीं पढ़ना चाहिए। उसके ये विचार उसकी सोच को संकुचित बना देते हैं। उसे महान बनने के स्थान पर सबका प्रिय बनने का प्रयत्न करना चाहिए। महान तो वह अपने सत्कार्यो से बन ही जाता है।
    अपनी क्षमताओं के अनुसार यदि वह अपनी उन्नति की ओर ध्यान देगा तो उसका व्यक्तित्व स्वयं ही निखरकर दुनिया के सामने आ जाएगा। उसे संसार सधारण से असाधारण या महान बना देता है। तब वह महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है। उसके दिशा-निर्देशों की अनुपालना करके लोग स्वयं को धन्य मानते हैं।
           बिना रुके लगातार प्रयास करना सफलता की कुंजी होती है। सोचने मात्र से कुछ नहीं होता, उसे पाने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है। मनुष्य यदि कछुए की तरह कर्मठता, आत्मविश्वास, निष्ठा व लग्न से आगे बढ़ने लगे तो तरह खरगोश जैसे तीव्रगामी लोगों को पछाड़कर अपनी सफलता के झण्डे गाड़ सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद