माता मनुष्य की प्रथम गुरु
माता मनुष्य की प्रथम गुरु कहलाती है। विद्यालय में बच्चा बाद में जाता है पर माता उससे पहले घर में ही बच्चे को सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान करवा देती है। उसका अपनी सन्तान से रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से नौ माह अधिक होता है। इस धरती पर लाने के कारण उसे भगवान का रूप कहा जाता है। वह बच्चे को संस्कारित करती है। इस कारण ऐसे बच्चे को सर्वत्र प्रशंसा मिलती है।
बच्चे का लालन-पालन वह बहुत ही ममता और प्यार से करती है। स्वयं गीले में सो जाती है परन्तु बच्चे को सदा सूखे में सुलाती है। अपना सारा सुख और आराम बच्चे के लिए कुर्बान कर देती है। उसकी ममता के समक्ष दुनिया के सभी सुख फीके पड़ जाते हैं। जब बच्चा पहली बार मॉं शब्द का उच्चारण करता है तो वह अपने बच्चे पर बलिहारी जाती है।
उसके चरणों में ही मनीषियों ने स्वर्ग की अवधारणा की है। भगवान गणेश ने माता पार्वती और पिता महादेव की परिक्रमा करके सारी पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर ली थी। देवताओं ने उनके इस कदम की सराहना की थी। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य आयुपर्यन्त उसकी सेवा करने के उपरान्त भी उसके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। जब वह अशक्त हो जाए तब बच्चे की तरह उसकी देखभाल करनी चाहिए। उसके खान-पान और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन की एक घटना है कि एक नवयुवक उनका शिष्य बनने की इच्छा से उनके पास आया और उनके चरणों में गिर गया। वहउनसे प्रार्थना करने लगा, "अपना शिष्य बनाकर मुझे दीक्षा दीजिए।"
युवक की बात सुनकर परमहंस जी ने मुस्कुराकर उससे पूछा, "परिवार में तुम्हारे अतिरिक्त और कौन-कौन लोग हैं? अथवा क्या वह अपने घर पर अकेला ही है?"
उनका यह प्रश्न सुनकर युवक ने उत्तर दिया, "उसके घर में सिर्फ उसकी बूढी माँ है और कोई नहीं है।"
युवक के उत्तर को सुनकर परमहंस जी को क्रोध आया। परन्तु अपने क्रोध को पीकर उन्होंने उससे पूछा, "तुम साधु क्यों बनना चाहते हो?"
युवक ने कहा, "वह मोह-माया और ऊँच-नीच से युक्त संसार को छोड़कर मुक्ति पाना चाहता है।"
इस उत्तर को सुनकर परमहंस जी ने उसे समझाते हुए कहा, "अपनी बूढ़ी माँ को असहाय छोड़कर तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकती। सच्ची मुक्ति तुम्हें माँ की सेवा करने से मिलेगी। मानव जीवन का यही सार है।"
विद्याध्ययन करने के पश्चात नव जीवन में प्रवेश करने वाले युवा शिष्य को आचार्य शिक्षा यही देते हैं-
मातृ देवो भव।
अर्थात माँ ईश्वर का रूप होते हैं। वही सबसे बड़ा देवता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने माता को अपना प्रतिनिधि बनाकर इस संसार में भेजता है। माता के प्रति अपने सारे दायित्वों का निर्वहण प्रसन्नता पूर्वक करने चाहिए।
माता को जीवन में कोई कष्ट न हो, उसके सुख-साधन का ध्यान रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना है। मन्दिर मे जाकर पत्थर की मूर्तियों के सामने माथा रगड़ने के स्थान पर यदि घर में बैठे जीवित माता-पिता रूपी भगवान की पूजा की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। यही माता का सच्चा श्राद्ध तभी कहलाता है जब सन्तान जीवित रहती माता की तन, मन और धन से सेवा करता है।
सारे रिश्ते-नाते और बन्धु-बान्धव मनुष्य को मझधार में छोड़ सकते हैं परन्तु ममता की छाया से वह कभी वंचित नहीं हो सकता। वहाँ आकर जो स्वर्गिक आनन्द उसे मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए सयाने कहते हैं-
माँवा ठण्डियाँ छावाँ कि छाँवा कौन करे?
अर्थात् माँ शीतल छाया की भाँति होती है। उसके अलावा और कहीं से इन्सान को ठण्डी छाया नहीं मिल सकती।
इसका सबसे बड़ा कारण है कि पुत्र कुपुत्र बन सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती। आवश्यकता होने पर वह अपने बच्चों की बुराइयों पर भी पर्दा डाल देती है। दुनिया की नजरों में उसे हमेशा ऊँचा उठा हुआ देखना चाहती है। सबसे बढ़कर वह सन्तान को गरम हवा भी नहीं लगने देना चाहती।
उसका वश चले तो अपने बच्चों के सारे दुख स्वयं झेल ले। इन्सान को दुनिया से चाहे दुत्कार मिले लेकिन माता के लिए वह सबसे श्रेष्ठ होता है। वह कभी अपनी सन्तान को अपमानित होते हुए नहीं देख सकती। सन्तान को यदि कष्ट होता है तो उसका कलेजा छलनी हो जाता है। माता के अतिरिक्त ऐसा निस्वार्थ प्रेम किसी और रिश्ते में नहीं मिल सकता। उसकी सेवा करने से चारों धामों की यात्रा के पुण्य का फल मिलता है तथा मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद