बालसुलभ चेष्टाऍं
बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं को देखते हुए हम सभी बहुत आनन्दित होते हैं। बालसुलभ चेष्टाऍं बच्चों की स्वाभाविक, मासूम और निश्छल प्रवृत्तियाँ होती हैं जो निस्वार्थ खुशी और चंचलता दर्शाती हैं। खिलखिलाकर हँसना, जिद्द करना, निर्भीकता से जिज्ञासु प्रश्न पूछना, रंगों से प्रेम, शरारत करना और हर छोटी-बड़ी बात पर खुश होना शामिल है। ये व्यवहार बच्चों की मासूमियत का ऐसा प्रतीक होता हैं जो बड़े लोगों में भी आनन्द भर देता है।
प्रतिदिन उनकी किसी भी माँग को माता-पिता के न मनाने पर रूठना और मानना, बात-बात पर जिद करना आदि अच्छा लगता है। इन सभी मौकों पर हम मुस्कुराकर रह जाते हैं। उनके ये सभी क्रिया-कलाप हमें मानसिक सन्तोष देते हैं। एक प्रकार से हम उन क्षणों में स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं। कभी-कभी हम बड़े भी बच्चों की प्रसन्नता के लिए जान-बूझकर उनसे वैसा ही रूठने, मानने या जिद करने का अभिनय करते हैं। इस प्रकार जीवन अपनी ही गति से निरन्तर चलता रहता है।
छोटे बच्चे गिरते-पड़ते जब ठुमकते हुए चलते हैं तो वे हर किसी के आकर्षण का पात्र बन जाते हैं। इनके गिरने पर कष्ट भी होता है। चोट लगने पर जब ये रोते हैं तब बड़े इन्हें बहला देते हैं कि फर्श टूट गया है अथवा चींटी मर गई है। उसी पल वे रोना भूलकर उठ खड़े होते हैं और पहले की ही तरह बर्ताव करने लगते हैं। उनकी ये मासूम हरकतें बड़ी मनमोहक होती हैं। घर के सब लोग इसका आनन्द लेते हैं।
छुपन-छुपाई का खेल जब वे खेलते हैं तब उनका अलग ही रूप दिखाई देता है। एक ही स्थान पर बैठे हुए बड़े जब यह कहते हैं, "हमें तो वह दिखाई ही नहीं दे रहा, पता नहीं कहाँ चला गया है? चलो उसे ढूँढो।"
यह सुनते ही वह हँसते हुए आकर कहने लगता है, "मैं तो यहाँ हूँ।"
बच्चों की ये सभी सरल क्रीड़ाएँ अनायास ही मन्त्रमुग्ध कर लेती हैं। उनकी इन मनोहारी चेष्टाओं पर माता-पिता व अन्य सभी बलिहारी होते रहते हैं।
हर अवसर पर उनका बात-बात पर उन्मुक्त होकर खिलखिलाना, हर किसी को आनन्दित करता है। इन्सान चाहे कितना भी परेशानियों में क्यों न घिरा हो पर छोटे बच्चे जब गोद में बैठकर प्यार करते हैं तब कुछ समय के लिए मनुष्य अपने सारे कष्ट और परेशानियॉं भूल जाता है। तब वह बच्चे के साथ बच्चा बन जाता है। बच्चे जब बड़ों के साथ खेलते हैं तो हार जाने पर रोने लगते हैं, चीटिंग करने का आरोप लगाते हैं और फिर भाग जाते हैं। उनकी ये हरकतें मन को मोह लेती हैं।
कितनी ही सख्या में बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों, वहाँ उतनी रौनक और खुशगवार माहौल नहीं बन पाता जितना एक बच्चे के आने पर हो जाता है। सभी लोग उस बच्चे के साथ बच्चा बनकर आनन्दित होने लगते हैं। उस समय सारा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। सभी लोग उन पलों को सहेज लेना चाहते हैं।
किसी भी बात को न समझ पाने पर इनके भोले-से मुखड़े पर आया आश्चर्य का भाव वाकई देखने लायक होता है। इनके बालसुलभ प्रश्नों की बौछार का उत्तर देते हुए सब थक जाते हैं। ये बच्चे हैं कि नित नए प्रश्नों के साथ बार-बार हाजिर हो जाते हैं। डाँट खाने के बाद थोड़े समय के लिए अवश्य चुप लगाते हैं। फिर बिना बुरा माने, बिना नाराज हुए उनका वही क्रम पुन: आरम्भ हो जाता है। यानी फिर से प्रश्नों की झड़ी।
बच्चों में छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, तेरे-मेरे आदि की सभी भावनाएँ नहीं होतीं। हम समझदार लोग ही उनके निष्कपट हृदयों में इन बुराइयों को भरते हैं। उन्हें सरल से विषाक्त बनाने का कार्य हम बखूबी निभाते हैं। हम अपने गिरहबान में झाँकने के बजाय फिर बाद में यह कहने से भी नहीं चूकते कि आजकल के बच्चे बहुत चालाक अथवा घाघ हो गए हैं। इन लोगों को छोटे-बड़े का लिहाज करना ही नहीं आता।
इन्हें हम बड़े अपने स्वार्थ के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। कोई भी लालच देकर घर में एक-दूसरे की जासूसी इन मासूमों से करवाते हैं जो एकदम गलत है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उनमें लालच बनकर पनपने लगती है। बड़े होकर जब वे किसी माँग को पूरा करने के लिए पैसा या अपनी जरूरत की कोई वस्तु माँगते हैं तब उस समय हमें बहुत बुरा लगता है। उस समय हमें याद नहीं आता कि यह गलत संस्कार हमीं ने उसे दिए हैं।
ये बाल सुलभ चेष्टाऍं बच्चों के बचपन की मासूमियत को जीवित रखती हैं। ये बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य कही जाती हैं। हम बड़ों की सच्ची-झूठी बातों को अक्षरश: सत्य मानने वाले इन बच्चों को यदि हम सरल हृदय ही रहने दें तो समाज का ढाँचा ही कुछ और हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद