बगुला भगत
'बगुला भगत' एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है - कपटी व्यक्ति, झूठा इन्सान, ढोंगी मनुष्य, पाखण्डी आदमी, धूर्त या चालाक व्यक्ति। इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो बाहर से बहुत सीधे-सादे, धार्मिक और सज्जन दिखाई देते हैं परन्तु असल में वे बहुत चालाक, दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के होते हैं। बगुला भक्तों के लिए हमें प्रायः यह उक्ति सुनने को मिलती है-
मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इन्सान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है?
वास्तव में 'बगुला भगत' यह शब्द बगुला (पक्षी) के स्वभाव से लिया गया है। कहते हैं कि जब बगुला मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
दूसरे शब्दों में बगुला पानी में एक टाँग पर खड़ा होकर ऐसा ध्यान लगाता है जैसे कोई बहुत बड़ा तपस्वी हो लेकिन मौका मिलते ही वह झट से मछली पर झपट्टा मार देता है। उन्हें अपना शिकार बना लेता है। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकतीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगती हैं। अब बगुले की तो मौज हो जाती है। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। केवल जौहरी ही स्वयं उसका मूल्य लगा सकता है।
जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय वे ही भयभीत रहते हैं।
कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं-
जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
अर्थात् जिस प्रकार का अन्न मनुष्य खाता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। इसलिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का सभी दुरूपयोग ही करते हैं।
मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम पर लाखों रुपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। उनका यह जप-तप सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है, उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से सदा बचकर रहना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर मनुष्य सारे आडम्बर कर रहा है, वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर यदि डरकर अपनी ऑंखें बन्द कर लेता है तो बिल्ली वहॉं से भाग नहीं जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत दुष्कर्मों का फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर वह कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है। अतः बगुला भक्त न बनकर मनुष्य को प्रभु का सच्चा भक्त बनना चाहिए।