शनिवार, 4 जुलाई 2026

बहू से बेटी बनने की प्रक्रिया

 बेटी से बहू बनने की प्रक्रिया 

माता-पिता अपने बेटे के लिए एक सुशील और सुघड़ बहू की आवश्यकता पर बल देते हैं। कोई भी व्यक्ति अच्छी पत्नी के स्थान पर ऐसी खूबसूरत वस्तु की कामना नहीं करता जिसे किसी के घर के किसी कोने में अथवा शोकेस में सजाकर रख दिया जाए। सभी माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वे अपनी बेटी को सर्वगुण सम्पन्न बनाएँ। वे उसकी सभी छोटी-छोटी बातों पर अवश्य ध्यान दें। 
           अपनी सन्तान सबको प्रिय होती है। बेटियाँ अपने माता-पिता की बहुत दुलारी होती हैं। बेटी कितनी भी प्यारी क्यों न हो, उससे घर का काम-काज अवश्य आना चाहिए। हमारा सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है जिसमें लड़की के कन्धों पर ही घर-गृहस्थी और बच्चों को सम्हालने का दायित्व होता है। हर माता का यह दायित्व है कि वह अपनी रानी बिटिया के लाड़ लड़ाने के साथ-साथ उसे गृहकार्यों में भी दक्ष करे जिससे उसे ये काम करने में कभी परेशानी न हो। माता अपनी राजकुमारी को व्यवहार कुशल भी बनाए ताकि जीवन में उसे कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
          ऐसा नहीं है कि ससुराल में जाकर ही वह घर-गृहस्थी को अच्छी तरह सम्हाले बल्कि अपने माता-पिता के घर में किसी के अस्वस्थ होने पर माता का हाथ बटाए। यदि कभी माता रुग्ण हो जाए तो घर को ठीक से सम्हाल सके। ताकि किसी बाहर वाले को घर की देखरेख के लिए बुलाने की कभी आवश्यकता न पड़े।
          माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी की गलतियों पर पर्दा न डालकर उसको समय-समय पर डाँट-डपट भी करें, जिससे उसे अपनी गलती को सुधारने की समझ पैदा हो सके। दूसरों के सामने अपने बच्चों की सदा प्रशंसा करें परन्तु घर में अनुशासन आवश्यक है। हर परिस्थिति का डटकर सामना करने की सूझबूझ उसे दें। ससुराल में कभी ज्यादा काम पड़ने या कभी डाँट मिलने पर वह कोई गलत कदम उठाने की कोशिश न करे। उस समय मन में यह मलाल न हो कि काश हमारे घर बेटी पैदा ही न हुई होती।
            समय रहते अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाएँ। इस तरह वह योग्य बनकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी। उसके जीवन में आर्थिक स्वतन्त्रता का होना बहुत ही आवश्यक है। अन्यथा उसे हर कदम पर दूसरों का मुँह देखना पड़ेगा। बेटी नौकरी या व्यवसाय करती होगी तो उसे घर में किसी कारण से ऊॅंच-नीच होने की स्थिति को मैनेज करने में सरलता रहेगी। पढ़ी-लिखी बेटी दोनों परिवारों का मान बढ़ाती है। अपनी बेटी को उसके अधिकारों और कर्त्तव्यों की जानकारी भी कराएँ।
              बेटी से बहु बनाने की प्रक्रिया से हर लड़की को गुजरना पड़ता है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी को संस्कारित करें। यदि किसी कारणवश माता-पिता इस दायित्व से चूक जाते हैं तो उनकी बेटी को इसका खामियाजा जीवन भर भुगतना पड़ता है। उसके साथ-साथ माता-पिता को भी जिन्दगी भर अपमानित होता पड़ता है। हर कोई यही कहता है कि बेटी को क्या सिखाया है? 
            सभी माता-पिता यदि अपनी बेटियों में एक अच्छी बेटी और एक सुघड़ बहू बनने के संस्कार देंगे तभी तो हर घर को संस्कारित बहू मिलेगी? इस कटु सत्य को हर माता और पिता को समझ लेना चाहिए।
          यदि ऐसा होने लगे तो किसी घर में बिखराव अथवा टकराव नहीं होगा। तब किसी बहन के मन में यह कसक नहीं रहेगी कि उसका भाई और उसकी भाभी उसके माता-पिता की सेवा नहीं करते, उनका ध्यान नहीं रखते। उन्हें वृद्धाश्रम या ओल्ड होम में छोड़ना चाहते हैं। माता-पिता की होती अवहेलना का दोषी सभी लोग बेटों को ही मानकर कोसते हैं। 
             सोचने की बात यह है कि बेटे अपने माता-पिता को शादी के पहले वृद्धाश्रम क्यों नही भेजते? शादी के बाद ही उन्हें वहॅं क्यों भेजते हैं? माता-पिता भूल जाते हैं कि यदि उन्होंने अपने बच्चों को संस्कारित करने का दायित्व ठीक से निभाया होता तो आज हमारे देश में एक भी ओल्ड होम न होता। किसी की बेटी यदि उनकी बहू है तो निश्चित ही उनकी अपनी बेटी भी किसी के घर की बहू है। 
             मैं यह नहीं कह रही कि सारी बेटियॉं शादी के पश्चात ससुराल वालों के प्रति अपने दायित्व नहीं निभाती अथवा अपने सास-ससुर को ओल्डहोम भेज देती हैं। अपने ससुराल में सामंजस्य नहीं बिठाना चाहती। ऐसी हृदयहीन बेटियॉं अपवाद स्वरूप मिल जाती हैं जिन्हें घर की जिम्मेदारी उठाने से अधिक अपनी आजादी, पार्टी या घूमना-फिरना ही प्रिय होता है।
            सभी माता-पिता से अनुरोध है कि जब तक अपरिहार्य परिस्थितियाँ न हों, बेटी के ससुराल मे जाकर अनावश्यक रूप से दखलअंदाजी न करें और बच्चों को घर में तालमेल बिठाने का परामर्श दें। इसी से दोनों घरों की इज्जत बनी रहती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

मौन और मुस्कान

मौन और मुसकान

इस ससार में आते समय ईश्वर ने हर मनुष्य को आत्मरक्षा के लिए मौन और मुसकान नामक दो शस्त्र दिए हैं। इन दोनों का वार कभी खाली नहीं जा सकता। अब यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह उनका उपयोग किस प्रकार करता है।
           हमारे ऋषि-मुनि आत्मबल बढ़ाने के लिए मौन धारण किया करते हैं। इसकी शक्ति को वही पहचान सकता है जो इसे साध लेता है। हम कह सकते हैं कि यदि मनुष्य मौन रहने की आदत को अपना लेता है तो बहुत से झगड़े स्वयं ही समाप्त हो सकते हैं और कुछ को टाला भी जा सकता हैं। घर-परिवार में किसी की बात नापसन्द होने पर यदि प्रतिकार किया जाता है तो वह पलक झपकते ही विवाद का रूप ले लेती है। 
          कभी-कभी ये झगड़े इतने बढ़ जाते हैं कि परिवार में विघटन तक की स्थिति बन जाती है अथवा पति-पत्नी में अलगाव हो जाता है। सदियों पुरानी मित्रता भी विवाद के चलते होम हो जाती है। कभी-कभी शत्रुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है जिससे किसी का भला नहीं होता। इस दुश्मनी के किस्से हम फिल्मों और टीवी सीरियलों में  प्रायः देखते रहते हैं। समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में पढ़ते रहते हैं।
        इसी प्रकार अपने कार्यक्षेत्र में भी चुप के शस्त्र से अपने विरोधियों को सरलता से परास्त किया जा सकता है और अपना दबदबा बनाकर रखा जा सकता है। 
        यदि ठण्डे दिमाग से यदि विशलेषण कर लिया जाए तो समझ आ जाता है कि मामले को अकारण तूल दी गई। उस समय सब हाथ से निकल चुका होता है। जो हानि होनी थी वह हो चुकी होती है। फिर उसकी भरपाई करना कठिन हो जाता है। उस समय मनोमालिन्य इतना बढ़ चुका होता है कि कोई भी एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। ये स्थितियाँ कभी भी अच्छी नहीं कही जा सकतीं।
          मौन से जो कहा जा सकता है उसे शब्दों से नहीं कहना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 
              एक चुप सौ को हराए। 
                       अथवा 
                 एक चुप सौ सुख। 
         चुप रहना वास्तव में हमारे सस्कारों का प्रतीक है लेकिन कुछ लोग ऐसे संस्कारी जनों को कायर या मूर्ख समझने की भूल करते हैं। यदि मौन रहकर अपरिहार्य स्थितियों से बचा जा सके तो यह सौदा किसी भी तरह से मनुष्य के लिए महँगा नहीं कहा जा सकता।
          एक प्यारी-सी मनमोहक मुस्कान से मनुष्य किसी भी पराए को अपना बना सकता है। यदि मुस्कान सरल व सहज है तो उसी प्रकार सरलता से सबका दिल जीत लेती है जैसे एक बच्चे की निश्छल मुस्कान। परन्तु कुटिल मुस्कान मनुष्य को सबसे काटकर अलग-थलग कर देती है। इसका कारण है कि वह कुटिल मुस्कान बर्बरता का प्रतीक होती है। हर आततायी के चेहरे पर यही दिल दहला देने वाली क्रूर मुस्कान ही होती है। इसको देखकर सभी को भयभीत होते हैं।
            एक बार गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से पूछा था, "प्रभु मौन और मुस्कान में क्या अन्तर है?"
          भगवान महावीर ने बहुत ही सुन्दर जवाब दिया था, "मौन और मुस्कान" दो शक्तिशाली हथियार हैं। मुस्कान से कई समस्याओं को हल किया जा सकता है और मौन रहकर कई समस्याओं को दूर रखा जा सकता है।"
          जहाँ तक हो सके इस मौन की साधना करने का यत्न करना चाहिए। ईश्वर का ध्यान लगाने के लिए अथवा उसकी उपासना करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। अपने दैनन्दिन कार्यो को करते हुए, घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण करते हुए और कार्यालयीन कार्यों को दक्षता से निपटाते हुए प्रतिदिन थोड़ा से समय के लिए मौन रखें। इससे आत्मबल तो बढ़ता ही है साथ ही अपने कार्यों के सुचारु रूप से सम्पादन के लिए ऊर्जा भी मिलती है।
          कितने भी कष्ट व परेशानियाँ क्यों न हों, मनुष्य को अपनी मोहक मुस्कान को कभी खोना नहीं चाहिए। उसकी बदौलत हम अपने कष्टों को कुछ समय तक भूल जाते हैं और हम अपने बन्धु-बान्धवों के चहेते बन जाते हैं।
          अतः मौन और मुस्कान को अपनाने वाले की कभी हार नहीं हो सकती। शारीरिक रूप से शक्तिहीन होने पर भी मनुष्य का मानसिक बल व आत्मिक बल बढ़ता है। उसके चाहने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती रहती है। सबको साथ लेकर चलने वाले मनुष्य का यश चहुँ दिशाओं में फैलने लगता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 1 जुलाई 2026

याद करना और याद आना अलग

याद करना और याद आना अलग

किसी को याद करना और किसी को याद आना दोनों अलग-अलग बातें हैं। हम प्रायः उन सबको याद करते हैं जो हमारे अपने होते हैं और जिनसे हमारा कोई-न-कोई सम्बन्ध होता है। कभी हम उन्हें अपने प्यार के कारण याद कर लेते हैं और कभी स्वार्थ के वशीभूत होकर याद करते रहते हैं।
         याद करने को  हम एक सक्रिय क्रिया कह सकते हैं जहाँ मनुष्य जानबूझकर किसी के विषय में सोचता है। पुरानी बातों अथवा घटनाओं को याद करता है। अथवा वह किसी व्यक्ति की कमी महसूस करता है। किसी को याद करना मनुष्य के नियन्त्रण में हो सकता है। याद करना प्यार या स्मृतियों की गहराई प्रदर्शित करता है। 
            इसके विपरीत याद आना एक अनैच्छिक प्रक्रिया है जहाँ कोई बात या व्यक्ति अचानक दिमाग में आ जाता है। याद आना भावनात्मक जुड़ाव का संकेत होता है। यह प्रायः भावनात्मक यादों से जुड़ा होता है। यह एक अनैच्छिक क्रिया होती है। यह याद आना अचानक और बिना सोचे हो जाता है। उन लोगों को हम सदा याद आते हैं जो हमें अपना समझते हैं। पलक पाँवड़े बिछाकर वे हमारी प्रतीक्षा करते रहते हैं। हमारी पीठ पीछे भी कभी निन्दा नहीं करते बल्कि प्रशंसा करते हैं। उन पर आँख मूँदकर विश्वास किया जा सकता है। ये हमारे लिए अपनों से भी बढ़कर होते हैं। इनके सच्चे प्यार पर हर प्रकार से भरोसा किया जा सकता है।
            मनुष्य को यथासम्भव उन लोगों की संगति से बचने का यत्न करना चाहिए जो किसी के पास जाकर हमेशा दूसरों की बुराई करते हैं। कहने का अर्थ है कि उन्हें बस दूसरों की निन्दा-चुगली करने में ही आनन्द आता है। इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं कि ऐसे लोग जो हमारे सामने दूसरों की बखिया उधेड़ते हैं, वे दूसरों के पास जाकर हमारी बुराई भी अवश्य करते होंगे। 
          उन लोगों का बस एक ही उद्देश्य होता है, बिना कारण किसी की छिछालेदार करना। ऐसे लोग बहुत खतरनाक होते हैं। ये न तो कभी किसी के सगे होते हैं और न ही किसी के दिल में अपना स्थान बना पाते हैं। ऐसे लोगों को कोई भी याद नहीं करना चाहता। यदि ये कभी-कभी याद आ ही जाते हैं तो सबके मुँह का मानो स्वाद ही बिगड़ने लगता है।
            इन्सान गलतियों का पुतला है। यदि वह गलती नहीं करेगा तो साक्षात भगवान बन जाएगा। होना तो यह चाहिए कि जिसकी गलती है, उसे विश्वास में लेकर प्यार से समझा दिया जाए और दूसरे किसी को इसकी कानोंकान खबर न होने दी जाए। कारण यही है कि अपनी गलतियों अथवा कमियों को उस व्यक्ति विशेष ने सुधारना है किसी अन्य ने नहीं। इस प्रकार मनुष्य यदि विशाल हृदयता का परिचय देता है तो वास्तव में वह सबका अपना बन जाता है। ऐसे लोग प्रायः मनुष्य की यादों में बसे रहते हैं।
             इसीलिए सयाने कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा लगता है उसे बहुत अधिक गौर से या बारीकी से न देखो और न परखो। हो सकता है कि उसमें कोई बुराई दिखाई दे जाए। इससे मनमुटाव बढ़ जाता है और आपसी सम्बन्धों में खटास आने की सम्भावना बनी रहती है।
           इसके विपरीत जो व्यक्ति बुरा लगता है, उसे गहराई से देखो और परखो। हो सकता है उसकी कोई ऐसी अच्छाई दिखाई दे जाए जो सचमुच प्रशंसनीय हो। फिर वह व्यक्ति अपने मन को भाने लग जाए और उसकी यादें मधुर बन जाएँ।
          यह दुनिया एक रैन बसेरे की तरह है। पता नहीं कितने दिन तक यहाँ रहना है। इसका किसी को भी ज्ञान नहीं कि कौन पहले जाएगा और कौन बाद में। यह सब तो उस मालिक को ज्ञात है जिसने इस सम्पूर्ण माया की रचना की है। जहाँ तक हो  सके लोगों के दिलों को जीत लो और उनके मनों में अपनी पैठ बना लो। तब चाहकर भी ऐसे व्यक्ति को कोई भी अपने दिल से नहीं निकाल पाएगा।
        जहाँ तक हो सके सबमें प्यार बाँटते चलो। अपने मन में आने वाली कटुताओं को दरकिनार करते हुए उसमें भरने वाले जहर को निकाल फैंक सकें तो समाज में चारों ओर प्यार की नदियाँ बहाई जा सकती हैं। तब हम सबको निश्छल प्यार करेंगे और सभी हमें प्यार कर सकेंगे। उस समय प्यार करना और प्यार होने वाली रेखा समाप्त हो जाएगी। तब किसी को याद करना और किसी को याद आना दोनों का भेद मिट जाएगा, दोनों बातें अलग-अलग नहीं एक हो जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 30 जून 2026

कुछ रह तो नहीं गया?

कुछ रह तो नहीं गया?

हम मनुष्य हैं और यदा कदा गलती कर ही बैठते हैं। फिर बाद में पछताना पड़ता है। इसलिए बार-बार सोचते रहते हैं, चेक करते रहते हैं कि कुछ रह तो नहीं गया? कुछ पीछे छूट तो नहीं गया? अथवा कोई गलती तो नहीं हो गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हम सभी को जीवन के हर मोड़ पर चलते हुए हमेशा परेशान करते रहते हैं। यदि विचार किया जाए तो हम दिन में न जाने कितनी बार इन प्रश्नों से दो-चार होते रहते हैं। 
           छोटे बच्चे को आया के पास अथवा क्रच में छोड़कर नौकरी पर जाने वाली माँ दस बार अपना और बच्चे का सामान चैक करती है और बार-बार यही सोचती है कि कुछ रह तो नहीं गया? यदि यहाँ कुछ छूट गया तो फिर दिनभर बच्चे के लिए परेशानी हो जाएगी। मॉं अपने बच्चे को कभी भी परेशान होते हुए नहीं देख सकती। इसलिए वह पूरी तैयारी करती है।
            रसोई में खाना बनाकर निकलने से पहले सब कुछ सम्हालने और गैस बन्द कर देने के बाद गृहिणी जब कमरे में आकर बैठ जाती है। उस समय उसके मन में आशंका उठती है कि मैंने गैस बन्द कर दिया था क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि सब्जी जल जाए और परेशानी हो जाए?
           किसी भी कारण से घर से बाहर निकलने वाले हम सभी अपने पर्स, गाड़ी की चाबी, घर की चाबी आदि रख लेने के बाद फिर इन चीजों को जाँचते रहते हैं कि उन्हें रख लिया या नहीं? समस्या तब आती है कि जब भागमभाग कुछ छूट जाता है तो बाहर जाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसी तरह घर के सारे स्विच तथा ताले बार-बार चैक कर लेते हैं। फिर भी मन के किसी कोने में एक अनजाना-सा डर बना रहता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? यदि कुछ छूट जाएगा तो फिर बहुत झंझट हो जाएगा।
          शादी में दुल्हन को बिदा करने के बाद दुल्हन के माता-पिता घर के सभी सदस्यों से कहते हैं कि अपना सामान अच्छे से देख लो, कुछ रह तो नहीं गया न? कहीं घर जाने पर कोई परेशानी न हो जाए? वहाँ कुछ छूटे-न-छूटे पर बचपन से आज तक जिस नाम वे अपनी बेटी को पुकारते थे, वह नाम पीछे रह जाता है। जब भी लाडली बिटिया को याद करेंगे उनकी आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहेंगे। बेटी की बचपन से अब तक की यादें, उसका रूठना-मानना यानी कि उसकी हर बात माता-पिता के हृदयों में याद बनकर पीछे रह जाती है।
          माता-पिता, बहन-भाई अपनी जुबान से चाहे कुछ न बोलें परन्तु उनके दिल में एक कसक तो रह ही जाती है। विदा होते समय दुल्हन का मन भी यही कहता है कि सब कुछ तो यहीं छूट गया। अपने नाम के आगे गर्व से जो सरनेम लगाती थी वह भी पीछे छूट गया। उस घर से उसका नाता छूट रहा है। माता-पिता का प्यार, उनसे की जाने वाली जिद, सखी-सहेलियाँ और बाबुल का  आँगन  सब पीछे छूट रहे हैं।
          इन्सान बड़ी हसरत से अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजता है और वे पढ़कर वहीं सैटल हो जाते हैं। उनसे मिलने के लिए बड़ी ही मुश्किल से उन्हें अधिकतम छह महीने का वीजा मिला पाता है। वापिस लौटते समय जब बच्चे पूछते हैं कि सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया? उस समय बच्चों से बिछुड़ते समय सब तो वहीं छूट जाता है। ऐसा लगता है मानो हृदय की गहराइयों से कुछ-कुछ छीजता जा रहा है। इससे अधिक और छूटने के लिए क्या बचा रह जाता है? 
              साठ वर्ष पूर्ण करने के उपरान्त जब सेवानिवृत्ति की शाम जब दोस्त याद दिलाते हैं कि सब चेक कर लो, कुछ रह तो नही गया। तब मन में एक टीस उठती है कि सारी जिन्दगी तो यहीं आने-जाने में बीत गई, अब क्या रह गया होगा? उस समय मन उदास हो जाता है।
            किसी अपने बन्धु-बान्धव की अन्तिम यात्रा के समय शमशान में उसका संस्कार करके लौटते समय लगता है कि कुछ छोड़कर जा रहे हैं। एक बार पीछे देखने पर चिता की सुलगती आग को देखकर मन भर आता है। अपने से वियोग के समय उससे पुनः न मिल पाने की पीड़ा में सब पीछे रह जाता है। भरी आँखों से इन्सान कुछ बोल तो नहीं  पाता पर कुछ तो पीछे छूट जाता है। उस प्रिय की वे यादें उसके अन्तस् में सदा उसके साथ रहती हैं। ये यादें यदा कदा उसके दिल में टीस दे देती हैं।
              आत्मचिन्तन करना हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है। हमें अपने पूरे जीवन में झाँकना चाहिए। यह जानकारी लेने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसा तो नहीं है कि कुछ पीछे छूट रहा हो? जिसे हम अपने साथ लेकर चल सकते थे। इस मलाल को जीवन भर ढोने के बजाय समय रहते यदि ध्यान दे दिया जाए तो उचित होता है, बाद में तो बस हमारे मन में पश्चाताप ही शेष बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 29 जून 2026

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक, उसकी समझदारी, उसका अच्छा स्वभाव, उसकी संगति और उसके प्रगाढ़ सम्बन्ध हमेशा साथ निभाते हैं। यद्यपि उसका समय कभी सदा एक-सा नहीं रह पाता, उसकी सत्ता का दबदबा भी हमेशा कायम नहीं रह सकता। उसकी धन-सपत्ति आदि भी सदा‌ उसका साथ नहीं निभा पाते। और तो और उसका अपना यह शरीर भी एक निश्चित समय के बाद अशक्त हो जाने के कारण साथ नहीं दे पाता। समय बीतने के पश्चात वह भी उसका साथ छोड़ देता है।
            मनुष्य एक विवेकशील और विचारशील प्राणी है जो उचित-अनुचित और भविष्य के परिणामों को समझने की क्षमता रखता है। यह क्षमता उसे अन्य जीवधारियों से श्रेष्ठ बनाती है और स्वयं के उत्थान या पतन के लिए जिम्मेदार बनाती है। विवेकशीलता का अर्थ है अपनी बुद्धि का सही उपयोग करना, आत्म-नियन्त्रण करना और सोच-समझकर कोई भी निर्णय लेना। 
          अपने विवेक से, अपनी समझदारी से मनुष्य यदि अपने जीवन का निर्वहण करता है तो यह उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात कही जा सकती है। इस प्रकार वह सफल व्यक्ति बनता है। अपने सम्पर्क में आने वालों का मार्गदर्शन करता है। 
          तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मनुष्य को सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और निरन्तर आत्म-चिन्तन करना चाहिए। तात्कालिक सुख के स्थान पर मनुष्य को स्थायी भलाई और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
          अपने अच्छे स्वभाव के कारण वह सबको अपना बना लेता है। उससे कोई भी नाराज नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा करता भी है तो उसके अच्छे स्वभाव के कारण अधिक दिन उससे रूठा नहीं रह सकता। इसी तरह सहृदयता का परिचय देते हुए वह सबको उनकी गलतियों के लिए उन्हें क्षमा कर देता है। इसलिए उसके सम्बन्ध सबके साथ लम्बे समय तक बने रहते हैं।
            मनुष्य को सदा यही प्रयास करना चाहिए कि वह यथासम्भव दूसरों की दुआओं अथवा आशीर्वाद को अपने जमा खाते में जोड़ता जाए। कहा जाता है कि दूसरों द्वारा दी गई बददुआओं का असर मनुष्य के जीवन पर अवश्य पड़ता है। यदि अभिशाप का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है तो दूसरों के मन से निकलने वाले आशीर्वाद भी अपनी छाप छोड़ते हैं। जितने अधिक आशीर्वाद उसे मिलेंगे उतनी ही उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में प्रसरित होगी।
          सदा याद रखना चाहिए कि धन, दौलत और प्रसिद्धि का कोई भरोसा नहीं कि वे सदा‌ साथ निभाएँगे अथवा नहीं। इसका कारण है कि ये दोनों अपने साथ अनेक बुराइयों को साथ लेकर आते हैं। इनके चंगुल में फंसकर मनुष्य धोखा खाकर अपनी हानि कर बैठता है।
            जो मनुष्य इन्हें सम्हाल पाता है या इनके मिलने पर अहंकारी न होकर विनम्र बना रहता है, वही सबका प्रिय भाजन बनता है। उसकी सर्वत्र जय जयकार होती है।
          अपनों पर भरोसा करना मनुष्य की बहुत बड़ी पूँजी है। यह यूँ ही नहीं बाँट दी जाती। पहले मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए तभी उसे आत्मविश्वास की शक्ति मिलती है। इसके विपरीत दूसरों पर अन्धविश्वास करना उसकी कमजोरी बन जाता है।
         मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब वह सफलता की ऊँचाइयों को छू रहा होता है तो उसकी सफलता के गुब्बारे में सबसे पहले पिन चुभाने वाला व्यक्ति कोई अपना ही होता है जिस पर वह आँख मूँदकर विश्वास कर रहा होता है। पीठ पर छुरा भौंकने वालों से सावधानी रखना बहुत ही आवश्यक होता है।
          हम अपने जीवन में बहुत सारे सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हमारी जिन्दगी बहुत ही चालाक है, हमें ठगती रहती है। यह हर रोज एक नया कल देने का वादा करके हमारी उम्र छीनती रहती है। इसलिए समय रहते इरादे मजबूत करके अपने देखे हुए सपनों को सच कर लेना चाहिए।
          मनुष्य को आत्मोन्नति के लिए सदा सत्संगति में रहना चाहिए और ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ईश्वर की राह पर जब कोई एक कदम बढ़ाता है तो ईश्वर उसे थामने के लिए सौ कदम आगे बढ़ाता है। हम इन्सानों की ही तरह वह मालिक भी अपनी सन्तानों से बहुत प्यार करता है। उनकी परेशानियों के समय उन्हें सहारा देता है। 
           वह हमेशा चाहता कि उसकी सन्तानें हम मानव शुभ कर्म करें जिससे हमें कष्टों का सामना न करना पड़े। हम मालिक की ऐसी नालायक सन्तानें बन जाते हैं जो इस संसार में आने के बाद अपने सही रास्ते से भटककर गलत मार्ग पर चल पड़ते हैं। तभी कष्टों और परेशानियाँ झेलते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 28 जून 2026

लक्ष्य निर्धारित करना

लक्ष्य निर्धारित करना

मनुष्य को अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए तभी वह अपने जीवनकाल में सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है। लक्ष्य को पाने की कामना करने वाले के लिए आत्मानुशासन (self discipline) की आवश्यकता होती है। जब वह अपने लक्ष्य को पाने के प्रयास में परिश्रम करता है, दिन-रात एक कर देता है तभी अपने अनथक श्रम से वह लक्ष्य पाकर ही चैन लेता है। छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने से आत्मविश्वास बढ़ाता है और अन्ततः बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर मनुष्य कदम बढ़ाता है। 
          दूसरे शब्दों में कहें तो वह मनुष्य भाग्यशाली है जो एक निश्चित लक्ष्य की ओर अपने कदम बढ़ाता है। उसका जीवन किसी विशेष उद्देश्य के लिए होता है। ऐसे ही अनुशासित लोग घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के लिए कुछ गुजरने का माद्दा रखते हैं।
           लक्ष्य निर्धारण जीवन में सफलता पाने और दिशा निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। इसमें  प्रासंगिक और समयबद्ध लक्ष्यों को परिभाषित किया जा सकता है। यह टालमटोल को कम करके मनुष्य के फोकस बढ़ाता है और उपलब्धियों की निगरानी करने में मदद करता है। लक्ष्य हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में काम करता है। इससे अपने विकास को प्रबन्धित करना और आवश्यक बदलावों की शुरूआत करना आसान हो जाता है। लक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो प्रेरित करें। मनुष्य को अपनी प्रगति की नियमित समीक्षा करनी चाहिए।
            लक्ष्य मनुष्य के जुनून से जुड़े होने चाहिए और उन्हें हासिल करने के लिए एक चरणबद्ध योजना बनाने की आवश्यकता होती है। लक्ष्यहीन व्यक्ति कटी हुई पतंग की तरह केवल इधर-उधर भटकता रहता है। जब तक मनुष्य यह निर्धारित नहीं करेगा कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है अथवा क्या करना चाहता है? तब तक वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकता। 
          यदि हमें कही जाना हो तो पहले हम स्थान निर्धारित करते हैं। फिर वहाँ तक पहुँघने का मार्ग सुनिश्चित करते हैं। जब हम पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाते हैं तभी यात्रा के लिए निकलते हैं और निश्चित ठिकाने पर पहुँच जाते हैं। उसी प्रकार जीवन की यात्रा भी करनी होती है। वहाँ किन्तु अथवा परन्तु से काम नहीं चलता। जीवन में एक स्पष्ट रूपरेखा की आवश्यकता होती है। तब जाकर मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। अन्यथा मानव जन्म पाकर भी वह उस जीवन को वृथा गँवा देता है। 
          मनीषी कहते हैं कि लक्ष्यहीन जीवन बिना पता लिखे लिफाफे की तरह होता है जो कहीं भी नहीं पहुँच सकता, उसे बस रद्दी की टोकरी में फैंक दिया जाता है। उसे भेजने वाला और पाने वाला दोनों ही उसके लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में लक्ष्य पाने के लिए यदि दूसरों का मुँह ताकता रहेगा तो वह जीवन की इस रेस में पिछड़ जाएगा।
              हर किसी के कहने पर यदि मनुष्य चलेगा तो वह थाली के बैगन की तरह इधर-उधर लुड़कता रहेगा। सभी लोग अपने-अपने जीवन में भागमभाग में लगे हुए हैं। इसलिए किसी की ओर देखने का समय उनके पास नहीं है। जब तक मनुष्य स्वयं भागकर उन भागने वालों के साथ कदम नहीं मिलाएगा तब तक वह बस निराशा का सामना ही करता रहेगा। फिर ऐसे पिछड़े हुए का साथ देना कौन चाहेगा?
             हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था, "इन्तजार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते है।"
          स्वामी विवेकानन्द का कथन है, "आप जैसे विचार रखोगे वैसे ही बन जाओगे। अगर अपने आपको को निर्बल मानोगे तो निर्बल बन जाओगे।यदि अपने आपको समर्थ मानोगे तभी तो समर्थ बन पाओगे।"
           अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह विचार करे कि आखिर वह अपने जीवन में क्या चाहता है? क्या वाले वह दूसरों को हसरत भरी निगाहों से निहारता रहना चाहता है? अथवा वह कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य रखने वाला बनना चाहता‌ है?
          इसलिए विवेकपूर्वक मनन करते हुए जीवन को सही दिशा की ओर ले जाना ही समझदारी है। नदी में प्रायः वही किश्तियाँ डूबती हैं जो बिना योग्य मल्लाह के केवल आनन्द के लिए बस यूँ ही दिशाहीन दौड़ाई जाती हैं।
          उसी प्रकार जिनके जीवन लक्ष्यहीन होकर डगमगाते हैं वे इस संसार सागर में डूब जाते हैं। जिनके दिल में कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य होती है वे ही हरदम झूमते-गाते हैं, मस्त रहते हैं। सफलता इन्हीं महानुभावों के चरण चूमती है। दुनिया भी इन लोगों को अपनी सिर आँखों पर बिठाती है। ऐसे उद्यमी समाज को दिशा  देते हैं। 
        अतः जीवन को लक्ष्यहीन होकर नहीं भटकने देना चाहिए, अपने लक्ष्य का निर्धारण करके वहीं बाण का अनुसन्धान करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 27 जून 2026

मनुष्य का वास्तविक धन

मनुष्य का वास्तविक धन

आजन्म मनुष्य धन की कामना करता है।यह धन उसकी आवश्यकता होता है और वह इसे पाने के लिए अनथक प्रयास भी करता है। दिन-रात अपना सुख-चैन गॅंवाकर वह‌ इस धन को कमाने का प्रयास करता है। सोचने वाली बात यह है कि क्या मनुष्य परिश्रम से अर्जित धन को प्राप्त करके सन्तुष्ट हो जाता है? यदि नहीं तो फिर मनुष्य का वास्तविक धन क्या है? यह एक गहन विषय है। आज हम इसी विषय पर चर्चा करते हैं।
            मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक धन उसका उत्तम स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच, सन्तोष, बन्धु-बान्धवों के साथ मधुर सम्बन्ध और शुभकर्म होते‌ हैं। भौतिक धन-वैभव नश्वर है जबकि अच्छा स्वास्थ्य और सत्चरित्र जीवन भर साथ निभाते हैं। यही जीवन को भी सार्थक बनाते हैं। 
          हम सांसारिक लोग हैं, हमारे घरों में यदा कदा अतिथि आते रहते हैं। कुछ अतिथि थोड़े समय के लिए आते हैं और कुछ अतिथि हमारे साथ कुछ दिन व्यतीत करते हैं। हम सबकी आवभगत अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हैं। जब कोई अतिथि हमारे घर कुछ दिन रहता है और जाते समय प्रसन्न मन यह से कहता है कि आपके घर में आकर मेरा मन रम गया है, यहाँ से जाने का दिल नहीं कर रहा। यह घर नहीं एक मन्दिर है तो यह मनुष्य का सबसे बड़ा धन होता है।
          जब माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार से, उनकी सेवा सुश्रुषा से प्रसन्न होते हैं तब उनके मन से अपने आप ही आशीर्वाद निकलते हैं। वे अनायास ही यह कहते हैं कि ये बच्चे हमारे कलेजे का टुकड़ा हैं। मेरे विचार में किसी भी मनुष्य के लिए इससे बढ़कर और कोई धन हो ही नहीं सकता।
          घर-परिवार में सामञ्जस्य का वातावरण हो। बच्चे माता-पिता की आज्ञाकारी सन्तान हों, उनका आदेश बच्चों के लिए ब्रह्मवाक्य हो। ऐसे माहौल में यदि कोई बेटा या बेटी यह कहे कि मेरे माँ-बाप ही मेरे भगवान हैं तो यह मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी कहलाएगी।
            पति-पत्नी में परस्पर प्यार और विश्वास हो और वे दोनों एक बन्द मुट्ठी की तरह मिलकर रहते हों, उनके बच्चे भी संस्कारी हों तो ऐसा घर स्वर्ग से भी बढ़कर सुखी होता है। शादी के बीस साल के बाद भी पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति लगाव कम न होकर बढ़ता रहे तो उनके इस प्रेमधन के समक्ष अन्य सभी धन फीके पड़ जाते हैं। 
           घर-परिवार में प्रायः सास और बहू की नोकझोंक चलती रहती है। यदि वहाँ सभी को यथोचित सम्मान देने की परम्परा हो तो इस समस्या से बचा जा सकता है। बहू अपनी सास को सास नहीं माँ माने और इसी प्रकार सास भी अपनी बहू को बहू नहीं बेटी मान लें तो अधिकतर झगड़े समाप्त हो जाएँ। दोनों ही एक-दूसरे की गलतियों को अनदेखा करके यदि परस्पर सौहार्द बनाए रखें तो वहाँ टकराव होगा ही नहीं। उस घर की खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। यही गृहस्थी का सबसे बड़ा धन है।
           जिस घर में घर में बड़ों को मान और छोटों को प्यार भरी नजरों से देखा जाता है वहाँ सुख-शान्ति का वास होता है। बड़ों को चाहिए कि वे अपना हृदय विशाल बनाकर बच्चों को उनके किसी भी दोष के लिए क्षमा कर दें। इसी प्रकार बच्चों का दायित्व भी बनता है कि वे बड़ों की कोई बात रुचिकर न लगने की स्थिति में घर में बवाल न मचाकर प्यार से समाधान करें। छोटे-बड़े सभी को हठधर्मिता छोड़कर रिश्तों में तालमेल बनाए रखना चाहिए। ऐसा करने पर घर के सभी सदस्यों का आपसी व्यवहार सन्तुलित रहता है। बाहर जाने पर घर में भागकर आने का मन करता है। अब आप ही बताइए कि इससे बड़ा कोई और धन मनुष्य के लिए हो सकता है?
           भाई-बन्धुओं अथवा घर-परिवार के किसी सदस्य की यदि जरूरत के समय आप अपना फर्ज समझकर प्रसन्नतापूर्वक, बिना अहसान जताए सहायता कर सकें और वह आपको अपने दिल की गहराई से दुआ दे तो यह सबसे धन होगा। यह धन आत्मसन्तुष्टि का भाव देता है।
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि जो वस्तुऍं मनुष्य को मानसिक शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करें, वही सच्चा कहलाता धन है। अच्छा स्वास्थ्य मनुष्य का मनोबल बढ़ाता है, उसे ऊर्जावान बनाता है और जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके खुशियॉं तलाशना और मन की शान्ति को वास्तविक सम्पत्ति माना जाता है। अपने भाई-बन्धुओं के साथ समय व्यतीत करना सुकून देता है। 
            यदि अपने विवेक से ऐसा धन मनुष्य पा सके तो उससे बढ़कर भाग्यशाली व्यक्ति कोई और हो ही नहीं सकता। मनुष्य को अपने घर को यत्नपूर्वक ऐसा बनाना चाहिए कि उसके मन में कोई और कामना न रह जाए। ईश्वर की कृपा से हर किसी व्यक्ति को ऐसे परम धन की प्राप्ति हो और वह अपना खुशहाल जीवन जी सके।
चन्द्र प्रभा सूद