रविवार, 25 अक्टूबर 2026

बच्चों से जासूसी न करवाऍं

बच्चों से जासूसी न करावाऍं

छोटे बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। उन बच्चों की सहजता, सरलता और भोलेपन का दुरूपयोग घर के बड़ों को किसी भी कारण से नहीं करना चाहिए। उनके बचपन को अपने स्वार्थ के लिए किसी सौदे में नहीं बदलना चाहिए। मेरे कथन पर टिप्पणी करते हुए आप लोग कह सकते हैं कि कोई भी अपने बच्चों का नाजायज उपयोग कैसे कर सकता है? 
          इस विषय में मेरा यही मानना है कि हम बड़े अपनी सुविधा के लिए अनजाने में ही बच्चों को गलत आदतें सिखाते हैं। घर में विद्यमान छोटे बच्चों से जासूसी जैसा घृणित कार्य बहुत से लोग करवाते हैं। वे लोग शायद यह समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते कि वे कितना अनर्थ कर रहे हैं। इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए।
          सास-बहू ने एक-दूसरे की बुराई करते हुए क्या कहा? पति-पत्नी में से किसी एक ने दूसरे साथी के विषय में क्या कहा? ननद-भाभी में से किसने और क्या चुगली की? भाई-बहन में से किसने किसे भला-बुरा कहा? इनके अतिरिक्त और भी कई विषय हो सकते हैं जिनके लिए वे लोग जानना चाहते हैं। यह कोई बुरी बात नहीं है। परन्तु यह जानकारी जुटाने के लिए छोटे बच्चों को मोहरा बनना बिल्कुल अनुचित है।
          छोटे बच्चे को विश्वास में लेकर या उसे किसी खिलौने, चाकलेट, पैसे आदि की रिश्वत देकर अथवा अनावश्यक प्यार जताकर बच्चे से कुरेद-कुरेदकर अपने मतलब की बात जानने की कोशिश लोग करते हैं। इस तरह बच्चे के मन में ताक-झाँक करके या छिपकर दूसरों की बातें सुनने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
          इसी प्रकार लालच या दबाव या प्यार के ब्लैकमेल के कारण बच्चा चुगली करना सीख जाता है। इसके विपरीत उसी कारण से दूसरों की बातें छिपाने लगता है। फिर धीरे-धीरे अपने स्कूल की, अपने घर की या दोस्तों से झगड़े की अपनी गलतियाँ सबसे छिपाने में महारत हासिल कर लेता है। बहुत दुखी की बात है कि इस तरह बड़ों की महत्वाकांक्षा के कारण धीरे-धीरे बच्चा झूठ बोलने में एक्सपर्ट होने लगता है।
        बच्चों को चोरी करना, दूसरे का हक छीनना भी हमीं सिखाते हैं। घर में माँ या दादी या नानी या कोई और सदस्य सबसे छिपाकर उसे खाने की या अन्य कोई चीज यह कहकर दे देते हैं कि किसी को बताना नहीं। इसका यह अर्थ हुआ कि घर के एक बच्चे को विशेष बना दिया जाता है।
        कभी बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए जिद करता है या रोता है तो घर के लोग उसकी इच्छा पूरी कर देते हैं। इस तरह हठ करके या रो-धोकर वह अपनी बात मनवाने का आदि हो जाता है। यदि उसकी बात को उसके जिद करने से पहले मान लिया जाए तो कितना ही अच्छा हो जाए।
        बच्चा झूठ बोलना घर से ही सीखता है। माता-पिता यदि बच्चे को कहीं नहीं ले जाना चाहते और घर छोड़कर जाना चाहते हैं तो कह देते हैं डाक्टर के पास जा रहे हैं या आफिस जा रहे हैं। बच्चा उनकी यह बात सच मान लेता है और वह चुप हो जाता है और उस समय उनके साथ जाने की जिद नहीं करता।
        इसके अतिरिक्त जब कोई अवांछित मित्र या सम्बन्धी घर मिलने आता है या उसका फोन आता है तो घर के सदस्य कहला देते हैं कि वे घर पर नहीं हैं। यहीं से बच्चे के झूठ बोलने की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है, आजन्म जिसका प्रयोग वह अपने बचाव के लिए करता है।
      घर के सदस्यों का व्यवहार छोटा बच्चा बहुत बारीकी से परखता है और उसके मन में सभी सदस्यों की एक छवि अंकित हो जाती है। वह यह देखता है कि उसके माता-पिता का अपने  माता-पिता, भाई-बहनों, सम्बन्धियों, मित्रों और सहकर्मियों के साथ कैसा व्यवहार है? उसी के अनुरूप ही वह भी व्यवहार करने लगता है। 
        बहुधा बच्चों को हम मुँहफट कह देते हैं। पर उस समय वे सच बोल रहे होते हैं। बड़े अपनी पोल खुल जाने को सहन नहीं कर पाते और बच्चों को दोषी मानकर उन्हें प्रताड़ित करते हैं। वे उस समय इस सत्य को भूल जाते हैं कि सब उन्हीं के बोए बीजों का परिणाम हैं।
        बच्चे बेचारे को तो पता ही नहीं होता कि वह क्या कर रहा है? हम बड़ों की साजिश ही उसे इस दलदल में धकेलने की दोषी बनती है। बड़ा होकर जब वह ये सब हरकतें करता हैं तो उसे घर के बड़े लोग डाँटते हैं, मारते हैं या सजा देते हैं पर अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखते।
          घर छोटे बच्चे की पाठशाला होता है जहाँ पर वह जीवन का ककहरा पढ़ता है। वहीं पर वह अच्छाई और बुराई को देखता है, समझता है और सीखता है। और फिर उसकी बुद्धि के अनुसार जो उसे सरल और सुविधाजनक मार्ग लगता है उस पर बिना परिणाम की चिन्ता किए चलने लगता है। बच्चों के समक्ष अपने व्यवहार को सन्तुलित रखें ताकि उन मासूमों को दोषी ठहराने की आवश्यकता ही न पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

ईश्वर की ओर से मिले उपहार

ईश्वर की ओर से मिले उपहार

ईश्वर की ओर से बहुत-से ऐसे गुण हैं जो हमें उपहार स्वरूप अर्थात् नि:शुल्क मिले हुए है। बहुत आश्चर्य की बात है कि उनके विषय में हम जानकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं। इस संसार में रहने वाले हम मनुष्य ऐसे कृतघ्न हैं जो सदा उनकी अवहेलना करते हैं, उन्हें अपने जीवन में ढालना ही नहीं चाहते। यदि उन्हें अपना लिया जाए तो मानव जीवन का नक्शा ही बदल सकता है।
          सबसे पहले ईश्वर ने हमारे लालन-पालन के लिए हमें माता-पिता का उपहार दिया। वे निस्वार्थ भाव से हमें योग्य बनाते हैं और संसार में सिर ऊॅंचा उठाकर चलने में सहायता करते हैं। उसने हमें सगे सम्बन्धी भेंट में दिए हैं जो हमारी भुजाऍं बनकर हमारी शक्ति बढ़ाते हैं। सुख-दुख में हमारे साथ खड़े रहकर हमारा सहारा बनते हैं।
          मनुष्य को सबसे बड़ा अनमोल उपहार बुद्धि के रूप में मिला है। यह बुद्धि उसे इस संसार के अन्य सभी जीवों से अलग बनाती है। यह बुद्धि उसकी सबसे बड़ी अपनी सम्पत्ति होती है। अपनी बुद्धि का सदुपयोग करके वह सर्वांगीण विकास कर सकता है। इसकी बदौलत मनुष्य समाज में अपना विशेष सम्माननीय स्थान बनाता है। निस्सन्देह बुद्धिमान व्यक्ति अपने बुद्धिबल के कारण लोगों का मार्गदर्शक बनता है।
          यदि मनुष्य बुद्धि का सकारात्मक प्रयोग करता है तो वह संसार में अपना एक स्थान बनाता है। मानुषी बुद्धि शेर जैसे खूँखार और हाथी जैसे शक्तिशाली जीवों को अपने वश में कर लेता है। मनुष्य विभिन्न पशुओं के उपयोग से अपने अनेक कार्य करवा लेता है जिससे उसका जीवन सरलता और सुगमता से चलता है। 
          ऐसे ही लोग चमत्कार करके विश्व को आश्चर्यचकित कर  देते हैं। सभी लोग अपने दाँतों तले अँगुली दबा लेते हैं। संसार में हुए वैज्ञानिक अविष्कार इसी बुद्धि की उपज हैं। महान लोग अपनी सद् बुद्धि के कारण ही समाज का नेतृत्व करते हैं और उसे दशा व दिशा प्रदान करते हैं। वै युग-युगान्तरों तक याद किए जाते हैं। 
      इसके विपरीत बुद्धि का दुरूपयोग मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है। यदि बुद्धि को नकारात्मक रास्ते पर चलाया जाए तो मनुष्य कुमार्गगामी बनता है। उसे समाज में सदा तिरस्कार मिलता है। हर कोई उसे तिरस्कृत करता है। समाज ऐसे व्यक्ति को अलग-थलग करने से नहीं चूकता। जब वह न्याय व्यवस्था का दोषी बन जाता है तो वह उसके कुकृत्यों के लिए उसे कुफल यानी सजा सुना देती है।
        मनुष्य का सुरक्षा कवच उसका दूसरों के प्रति विश्वास है। परस्पर विश्वास करके ही वह सुखी रह सकता है। हाँ, सावधान रहना बहुत ही आवश्यक होता है। किसी पर अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि दूसरा व्यक्ति कभी भी विश्वासघात कर सकता है।
          वैसे तो दुनिया विश्वास पर ही चलती हैं। करोड़ों का व्यापार इसी विश्वास के भरोसे उचन्ती में किया जाता है। यदि मनुष्य हर किसी पर सन्देह करने लगेगा तो वह पागल हो जाएगा। तब फिर वह किसी के साथ कभी व्यवहार ही नहीं कर पाएगा। इस तरह से वह समाज से कटकर रह जाएगा जिससे उसका जीना दुश्वार हो जाएगा।       
          मनुष्य की निश्छल हँसी ही उसकी सबसे बढ़िया औषधि है जो अनेक रोगों की दवा है। सामने वाला कितना भी दुखी क्यों न हो उसका स्वागत यदि निश्छल हँसी से किया जाए तो वह कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाता है। तब वह स्वयं को तरोताजा महसूस करने लगता है।
        मनुष्य का सबसे अच्छा शस्त्र उसका धैर्य है। इसकी बदौलत वह सबके हृदयों में अपना स्थान बना लेता है। ऐसे धैर्यशाली व्यक्ति अपने धैर्य से किसी को भी अपना प्रिय बना लेते हैं। ये लोग धैर्य से दूसरे की परेशानी सुनकर उन्हें सद्परामर्श देते हैं। स्वयं भी विपत्ति में घबराते नहीं है।
        ये हर परिस्थिति में एक समान रहते हैं। कैसी भी दुख-परेशानी जीवन में आ जाए अपना आपा नहीं खोते। किसी भी समस्या का समाधान धैर्य धारण करके सूझबूझ द्वारा किया जा सकता है। अफरा-तफरी मचाकर या घबराकर कोई हल नहीं निकलता बल्कि समस्याएँ और अधिक उलझ जाती हैं। उन्हें सुलझाने में मनुष्य परेशान हो जाता है।
         इन उपहारों के साथ-साथ ईश्वर की बनाई यह सारी प्रकृति हमारी सेवा में तत्पर रहती है। पृथ्वी पर हम अपना घर बनाकर रहते हैं। यह हमारे जीवन के लिए अन्न, फल आदि देती है। वायु के बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते। उसके बिना हमारे प्राण हमारा साथ नहीं दे सकते। शरीर में विद्यमान अग्नि हमारे पाचन तन्त्र को मजबूत बनाती है। 
         नदियॉं और समुद्र से हमें जल प्राप्त होता है। जल हमारी जीवनी शक्ति है। इनसे हमारा आवागमन सरल होता है। सुन्दर वन हमारा मन मोह लेते हैं। अनेक पशु-पक्षियों की सृष्टि ईश्वर ने की है। ये हमारा जीवन सरल बनाते हैं। सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रह-नक्षत्र हमें बहुत कुछ देते हैं। 
         कहने का तात्पर्य यही है कि ईश्वर ने हमें इतने सारे उपहार भेंट स्वरूप दिए हैं। हम मनुष्यों के लिए ईश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है। ताकि हम लोगों को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो सके। फिर भी हम यदि उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट न करें तो हमसे अधम कोई और नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

स्त्री और पुरुष दोनों समाज के अभिन्न अंग

 स्त्री और पुरुष दोनों समाज के अभिन्न अंग

स्त्री और पुरुष दोनों का अपना अलग अस्तित्व है। दोनों ही समाज के अभिन्न अंग हैं। इन दोनों में से किसी एक के बिना इस समाज की परिकल्पना नहीं की जा सकती। पति-पत्नी के रूप में ये दोनों घर, परिवार और समाज में एक अहं किरदार निभाते हैं। इन्हें एक ही सिक्के के दो पहलू कहना उपयुक्त होगा, जिन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता। 
        पति और पत्नी दोनों के लिए एक ही शब्द 'दम्पत्ति' का प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यही निकलता है कि ये दोनों एक ही इकाई हैं, कोई अलग-अलग नहीं हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दोनों दो जिस्म और एक जान होते हैं। वास्तव में हम किसी एक को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन नहीं कह सकते।
           महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य 'रघुवंशम्' में भगवान शिव और भगवती पार्वती की वन्दना करते हुए इसी सत्य को उद्घाटित किया था। इस विषय में उनका कथन हैं-
          वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
           जगत: पितरौ वन्दे  पार्वतीपरमेश्वरौ।।
अर्थात जिस प्रकार शब्द और अर्थ परस्पर मिले होते हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार शिव और पार्वती को भी अलग नहीं किया जा सकता। शब्द और अर्थ की तरह परस्पर मिले हुए उन दोनों की मैं वन्दना करता हूँ। इसीलिए भगवान शिव या पुरुष एवं स्त्री या शक्ति का एका होने के कारण भगवान शिव नर भी हैं और नारी भी हैं। अतः वे अर्धनरनारीश्वर  कहलाते हैं।
          इस श्लोक को यहाँ लिखने का तात्पर्य केवल यही है कि शब्द और अर्थ में से किसी एक का उच्चारण करने पर दूसरे का स्मरण स्वाभाविक ही दृष्टि पटल पर आ जाता है। इसी तरह पति-पत्नी को भी परस्पर मिल-जुलकर रहना चाहिए। उनमें टकराव की कोई गुँजाइश ही नहीं होनी चाहिए। यदि व्यवहार में वे लडाई-झगड़ा करते हैं तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कहलाती है।
        नारी को त्याग, समर्पण और ममता की मूर्ति कहा जाता है। पुरुष को संघर्ष का दूसरा रूप माना जाता है। दोनों में से कौन अधिइन्हें हम दोनों गाड़ी के दो पहिए कह सकते हैं। जब तक दोनों पहिया समान रूप से न हों तो गाड़ी चल नहीं सकती।क महान है, यह कहना अनुचित होगा। दोनों को सदा एक-दूसरे की आवश्यकता रहती है। इसलिए वे एक-दूसरे के पूरक कहे जाते हैं अन्यथा वे दोनों ही अधूरे रह जाते हैँ। इस सत्य को हम झुठला नहीं सकते।
         पति और पत्नी गृहस्थी रूपी रथ या गाड़ी के दो पहिए माने जाते हैं। दोनों पहिए समान रूप से गाड़ी चलाते हैं। एक के खराब हो जाने पर वह गाड़ी डगमगाने लगती है। उस समय गृहस्थी रूपी रथ को सुचारू रूप से चलाने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। 
          घर को चलाने, अतिथियों का सत्कार, सुख-दुख में सहयोग आदि सभी कार्य दोनों को मिलकर करने होते हैं। एक अकेला इन सारे कामों को दक्षतापूर्वक नहीं कर सकता। बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए दोनों के परस्पर मेल-मिलाप या सामंजस्य की आवश्यकता होती है। एक छोटे बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसे माता और पिता दोनों की समान रूप से आवश्यकता होती है।
      उन बच्चों का व्यवहार बहुत असन्तुलित होता है जिनके माता और पिता का आपस में टकराव होता रहता है अथवा किसी कारण से उनका अलगाव हो जाता है। वे जिसके साथ भी रहते हैं, उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। 
        हर बच्चे को उसकी माता और उसके पिता दोनों चाहिए होते हैं। एक के भी अपने से दूर रहने को वह पचा नहीं पाता है। अतः विचलित होकर वह उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए अनाप-शनाप कार्य करता रहता है जिससे वे दुखी हों।
        हमारा सामाजिक परिवेश इस प्रकार का है कि दोनों में यदि आपसी सामंजस्य न हो और किसी कारण से अलगाव हो जाए तो समाज में उन्हें सम्मान नहीं मिल पाता। उनके लिए बेचारेपन का एक भाव सबके मन में रहता है। अपने परिवार में स्थायित्व बनाए रखने वालों को ही समाज में उचित स्थान मिलता है।
        जिस घर में पति और पत्नी एक-दूसरे को यथायोग्य सम्मान देते हैं, समाज में उनकी सराहना होती है। इसके विपरीत आचरण करने वालों को समाज तिरस्कृत करता है।
          स्त्री महान है या पुरुष महान है कहना अनुचित है। दोनों का ही अस्तित्व समाज के लिए आवश्यक है। ईश्वर ने दोनों को विशिष्ट गुणों और कार्यों के लिए इस संसार में भेजा है। इसलिए यह विवाद ही निर्मूल है। अतः व्यर्थ के पूर्वाग्रह को छोड़कर एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। किसी को भी हेय नहीं मानना चाहिए। समाज को अपनी मानसिकता में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की महती आवश्यकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

ईश्वर की आराधना मॉं के रूप में

ईश्वर की आराधना माँ के रूप में

परमपिता परमात्मा की उपासना हर व्यक्ति अपने-अपने तरह से करता है। मेरा यह मानना है कि ईश्वर के किसी भी रूप की उपासना यदि माँ के रूप में की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। माँ से बढ़कर ऐसा और कौन है जो सन्तान के विषय उससे अधिक भली-भाँति समझता है। 
          भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा में ईश्वर को माता के रूप में देखना और उनकी आराधना करना अत्यन्त प्राचीन एवं पवित्र भाव है। माँ के रूप में ईश्वर की पूजा करने की अवधारणा है। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में भी ईश्वरीय शक्ति यानी दुर्गा, महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि देवियों को जगज्जननी यानी दिव्य माता के रूप में पूजा करने का विधान है। 
         माता न केवल जीवन देती है अपितु बच्चे का लालन-पोषण, रक्षा और मार्गदर्शन भी करती है। ईश्वर का यह पालनहार रूप माता के ही समान है। जिस प्रकार एक माता अपने बच्चे से बिना किसी स्वार्थ के असीम प्रेम करती है। उसकी हर गलती को क्षमा कर देती है। उसी प्रकार ईश्वर भी समस्त जीवों पर अपनी करुणा की वर्षा करते हैं।
          इसलिए यदि मनुष्य परमेश्वर से अपनी निकटता और घनिष्ठता को बढ़ाना चाहता है तो उसे माँ के रूप में उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
        माँ अपनी सन्तान से बहुत अधिक स्नेह रखती है जिसे मापने का कोई पैमाना आज तक बना ही नहीं है। यद्यपि पिता भी बच्चे से बहुत प्यार करता है परन्तु किसी बात पर असहमत हो जाने पर वह बच्चे के साथ कठोर व्यवहार कर सकता है परन्तु माता कभी ऐसा नहीं कर पाती। 
        माता की कोमल भावनाएँ और सन्तान के प्रति उसका मोह उसे ऐसा नहीं करने देता। उसका भावुक हृदय सन्तान के लिए सदा पसीज जाता है और वह उसकी बड़ी-से-बड़ी गलती को भी क्षमा करके उसे अपने गले से लगा लेती है।
          घर-परिवार में सभी सदस्यों के होते हुए भी बच्चा माता के सबसे अधिक करीब होता है। वह चाहता है कि उसकी माँ हमेशा उसके आसपास रहनी चाहिए। वह स्वयं चाहे दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से बाहर जाए,  कहीं घूमने जाए अथवा विद्यालय जाए पर जब घर वापिस लौटे तो सबसे पहले उसे अपनी माँ ही दिखाई देनी चाहिए। यदि वह उसे न दिखाई दे तो वह अनमना हो जाता है, खाना भी नहीं खाएगा और किसी काम में उसका मन नहीं लगेगा।
          माँ और बच्चे का सम्बन्ध ही ऐसा होता है कि माँ की अनुपस्थिति उसे बहुत खलती है। वह उसे अपनी आँखों के सामने न पाकर रोने लगता है। एक माँ भी अधिक समय तक अपने बच्चे से दूर नहीं रह सकती। यदि मजबूरी में कभी ऐसा करना पड़े तो उसका मन अपने बच्चे में ही लगा रहता है। उसकी की चिन्ता में परेशान रहती है।
        माता का अपनी सन्तान से रिश्ता ही ऐसा होता है। शायद यही कारण है कि इन्सान आयु में कितना भी बड़ा हो जाए किसी भी समस्या के आने पर 'हाय माँ' ही कहता है। उसकी माता चाहे परलोक भी सिधार जाए तब भी माँ को याद करना नहीं भूलता।
        बच्चे नालायक हो सकते हैं पर माता नहीं। वह उनसे अपना रिश्ता समाप्त नहीं कर सकती और न ही उनसे मुँह नहीं मोड़ सकती। इसीलिए शायद कहा है - 
       पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर 
      माता कुमाता नहीं हो सकती।
        यह विश्लेषण हमने इस भौतिक संसार की माता और उसकी सन्तान के सम्बन्ध में किया है। इस सम्पूर्ण संसार की जननी वह है जिसे हम जगज्जननी कहते हैं। यदि भौतिक माता की तरह हमारा जुड़ाव उस जगज्जननी से हो जाए तो हमारे इस जीवन की रूपरेखा ही बदल जाए।
        उससे मिलने की तड़प ही हमें उसके करीब ले जा सकती है। इसका कारण यह है कि वह सारे संसार की माता है। इसलिए वह स्वयं ही अपने सारे बच्चों का ध्यान रखती है। चाहे वे जलचर, नभचर, भूचर या फिर मनुष्य किसी भी रूप में हों। उसके लिए सभी जीव समान हैं। उसे यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है। ये तो हम इन्सान ही हैं जो अपने दायित्वों को ठीक से नहीं निभा पाते, कोताही बरतते रहते हैं।
          उस मालिक के बच्चे हम मनुष्य यदि उसका साथ सच्चे मन से चाहते हैं तो अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा। उस प्रभु के पास जाने के लिए अपने मानस को तैयार करना होगा। दुनिया के सारे व्यापार जब निस्पृह होकर, अपना दायित्व मानकर करेंगे, तब उनमें लिप्त नहीं होंगे और उसके प्रिय बन सकेंगे।
        इस संसार में आने से पहले जीव उस मालिक से प्रार्थना करता है कि अन्धेरे से मुक्ति दे दो, दुनिया में जाकर तुम्हें नहीं भूलूँगा। पर होता इसके विपरीत है। संसार की चकाचौंध में जीव खो जाता है और उसे भूल जाता है। यदि हम इस दुनिया में आने के बाद उसे उसी तड़प से याद कर सकें तो इहलोक से विदा होने के बाद मुक्ति का मार्ग सुगम हो जाएगा। तब हमारे शरीर में विद्यमान आत्मा को उस परमात्मा में लीन होने से कोई नहीं रोक सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

मर्यादा का पालन करना आवश्यक

मर्यादा का पालन करना आवश्यक 

स्त्री हो अथवा पुरुष मर्यादा का पालन करना सबके लिए आवश्यक होता है। घर-परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, बच्चों और सेवक आदि सबको अपनी-अपनी मर्यादा में रहना होता है। यदि मर्यादा का पालन न किया जाए तो बवाल उठ खड़ा होता है, तूफान आ जाता है।
        मर्यादा शब्द भगवान श्रीराम के साथ जुड़ा हुआ है। संसार उन्हें आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारता है। उसका कारण है उन्होंने अपने जीवनकाल में पुत्र, पति, भाई, पिता, मित्र और राजा‌ आदि की सभी मर्यादाओं का पालन किया। इसीलिए आजतक उन्हें संसार में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है।
        बच्चे यदि अपनी मर्यादा में न रहें और अनुशासनहीन हो जाएँ, अपने से बड़ों का सम्मान न करें, अपने भाई और बहनों के साथ दुर्व्यवहार करें, मित्रों के साथ अभद्रता करें, जरा-सा क्रोध आने पर घर में तोड़फोड़ करने लगें, हर किसी के साथ बदतमीजी करें, किसी का आदर न करें तो उन्हें कोई भी अच्छा या संस्कारी बच्चा नहीं कहेगा।
        उन्हें बिगडैल बच्चों की श्रेणी में रखा जाएगा। घर-बाहर कहीं भी उन्हें प्यार और मान नहीं मिलेगा। हर ओर से वे दुत्कारे जाते हैं। कोई ऐसे उद्दण्ड बच्चों के साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहता और न ही उन्हें अपने घर में देखकर किसी को प्रसन्नता होती है। माता-पिता अपने बच्चों को इनसे से दूरी बनाकर रखने के लिए कहते हैं। 
        भाई-बहन यदि अपनी मर्यादा भूल जाएँ और एक-दूसरे की भावनाओं को न समझें और परस्पर अमर्यादित व्यवहार करें तो सम्बन्धों में दरार आने लगती है। उनमें अपनेपन की भावना समाप्त हो जाती है। वे जिन्दगी भर एक-दूसरे की शक्ल देखना पसन्द नहीं करते। उनमें जीने-मरने के मानो सारे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं।
        माता-पिता यदि परस्पर अमर्यादित व्यवहार करते हैं यानी सदैव एक-दूसरे से झगड़ा करते हैं, मारपीट करते हैं अथवा बच्चों से पक्षपात करते हैं तो उनका सम्मान उनके अपने बच्चे भी नहीं करते। ऐसे घरों के बच्चे अपने माता-पिता से घृणा करने लगते हैं। वे बस अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के उनसे सम्बन्ध रखते हैं।
         कितनी ही धन-सम्पत्ति उनके पास हो वे उसका सुख नहीं भोग पाते। ऐसे घरों से सुख-शान्ति मुॅंह मोड़कर विदा हो जाती है। घर में हर समय अशान्ति का वातावरण बना रहता है। वहाँ ऐसा लगता है मानो मरघट-सी शान्ति रहती हो। वहॉं घर के सभी सदस्य एक-दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं। मेहमान भी वहॉं आकर सहज नहीं हो पाते।
          पति-पत्नी का अमर्यादित व्यवहार घर का समूल नाश कर देता है। उन दोनों में से किसी का भी विवाहेत्तर सम्बन्ध मान्य नहीं होता। यदि किसी घर में ऐसा हो जाता है तो वहाँ पति-पत्नी में आपसी प्यार समाप्त हो जाता है। उनमें एक-दूसरे के लिए घृणा का भाव पनपने लगता है जो उन्हें एक-दूसरे से दूर कर देता है।
          इसके अतिरिक्त दोनों में से कोई एक झगड़ालू हो, अपने घर-परिवार के रिश्तों को अहमियत न दे तो भी वहाँ मनमुटाव होने लगता है। ऐसे सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं चलते। फिर उनमें अबोलापन आ जाता है। जब सहनशक्ति जवाब दे जाती है तो अन्त में उनमें अलगाव हो जाता है। यह स्थिति किसी के लिए भी कष्टदायक होती है। उनके झगड़ों में निरपराध बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
          चोरी, डकैती, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, इन्सानियत का कत्ल करना आदि भी मर्यादा का पालन न करने के दुष्परिणाम हैं। इन सबसे बढ़कर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी मर्यादा हीनता की श्रेणी में आते हैं। ये किसी भी सभ्भ समाज के लिए ये कोड़ के समान होते हैं।
          एक नदी जब अपने तटबन्धों को तोड़कर मर्यादाहीन हो जाती है तो उसका नुकसान जनमानस को भुगतना पड़ता है। भयंकर बाढ़ आती है और चारों ओर जल-थल हो जाता है। गाँव के गाँव और शहर नष्ट हो जाते हैं। चारों ओर हाहाकार मच जाता है। कितनी ही धन-सम्पत्ति, जान और माल की हानि होती है।
          इसी प्रकार समुद्र जब अपनी हदों को छोड़कर पानी को बहुत ऊपर उछालने लगता है तब वहाँ पर विद्यमान बड़े-बड़े जहाज डूब जाते हैं और अनिर्वर्णनीय क्षति होती है। उसके पास रहने वाले जनमानस को भी त्रासदी झेलनी पड़ती है।
        चाहे मनुष्य हो अथवा प्रकृति सभी को अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करना होता है। जहाँ मर्यादा का उल्लंघन किया जाता है वहीं विनाश का ताण्डव हो जाता है। इसलिए किसी को भी मर्यादा की सीमा रेखा को पार नहीं करना चाहिए। यही स्थिति प्रशंसनीय होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

अपना जीवन जीने के लिए आखिर किसी दूसरे के सहारे की कल्पना करना व्यर्थ है। किसी अन्य को बैसाखी बनाकर कब तक चला जा सकता है? दूसरों का मुँह ताकने वाले व्यक्ति को एक दिन धोखा खाकर, लड़खड़ाकर गिर जाना पड़ता है। उस समय उसके लिए सम्हलना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए किसी सहारे को खोजने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए।
         मनुष्य का वास्तविक सहारा उसका उसके अन्तस् में विद्यमान होता है। जब वह बैसाखियों के भरोसे चलना आरम्भ करते है तो उसके अपने पैर अपनी ताकत खो देते हैं। आत्मनिर्भरता ही जीवन का असली आधार है। इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए।
         दूसरों से सहारे की उम्मीद करने से सदा मानसिक निर्भरता बन जाती है। अन्तत:  निराशा ही मनुष्य के हाथ लगती है। समय और परिस्थितियॉं कभी एक जैसी नहीं रहतीं, हमेशा बदलती हैं। इसलिए बाहरी सहारे कभी भी स्थायी नहीं हो सकते। दूसरों पर निर्भर होने पर मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानना भूल जाता है। जीवन के सबसे कठिन दौर में अपना हौंसला और धैर्य ही व्यक्ति का  सबसे बड़ा साथी बनते हैं।
          बचपन की बात अलग कही जा सकती है। उस समय बच्चा सदा माता-पिता की अँगुली थामकर चलता है। वह उनके बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। उनकी नजरों से ही बच्चा इस दुनिया को देखने और समझने की कोशिश करता है। उस समय यदि वह उनका हाथ छोड़ दें तो वह लड़खड़ाकर गिर सकता है।
          बड़ा होने पर जब वह योग्य बनकर इस संसार सागर में तैरने के लायक हो जाता है तब उसे मजबूत और स्वावलम्बी बन जाना चाहिए। उस समय मनुष्य को किसी के भी कन्धे को बैसाखी बनाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। उसे स्वावलम्बी बनकर, अपने ऊपर पूरी तरह से विश्वास रखना चाहिए।
        यह सत्य है कि एक लता बहुत नाजुक और कमजोर होती है। उसे किसी सहारे की आवश्यकता होती है, तभी वह फलती फूलती है। इसीलिए उसे अपनी सुरक्षा के लिए किसी मजबूत वृक्ष का सहारा लेना पड़ता है।
          मनुष्य को यह बात हमेशा ही याद रखनी चाहिए कि जो बेल बड़े वृक्ष का सहारा लेकर बहुत इतराती फिरती है और समझती है कि उसमेँ आकाश छूने की सामर्थ्य आ गई है तो वह गलत सोचती है। वृक्ष के कटते ही वह धड़ाम से जमीन पर औंधे मुँह गिर जाती है। फिर उसे मुँह की खानी पड़ जाती है। तब उसे सहारा देने के लिए कोई नहीं आता। उसकी सहायता कोई नहीं करता। 
            परावलम्बी मनुष्य स्वयं को बहुत कमजोर समझता है। वह कभी भी अपने जीवन में सिर उठाकर नहीं चल पाता। उसे हमेशा यही लगता है कि वह अपने जीवन में अकेले या बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता। इसलिए वह ऐसे व्यक्ति की तलाश करता रहता है जो उसका सहारा बन सके और हाथ पकड़कर, थामकर उसे आगे ले जाए। ऐसे मनुष्य को यदा कदा अपमान का कड़वा घूँट पीना ही पड़ता है। 
          जिसे वह अपना सब कुछ मान लेता है, जिसका मुँह ताकता है, जिसके निर्देश के बिना वह एक कदम भी नहीं चलता, वही समय आने पर उसे उसकी औकात बता देता है। उस समय वह स्वयं को बहुत ही असहाय और बौना महसूस करता है। अपनी कल्पना के विपरीत मिले आघात को सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। 
            ऐसी दुखद स्थितियों से बचने के लिए मनुष्य में आत्मविश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। मनुष्य को यथासम्भव अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए उसे यत्नपूर्वक अपना मानसिक और आत्मिक बल बढ़ाना चाहिए। तभी वह इन दुखदायी स्थितियों से बच सकने में सफल हो सकता है।
          जब तक मनुष्य अपने में साहस नहीं जुटा पाता और दूसरों की ओर देखना नहीं छोड़ता तब तक उसका हृदय चकनाचूर होता ही रहता है। उसका स्वाभिमान आहत होता रहता है। हर कोई उसे दो बात सुनाकर चल देता है। वह बेचारा बना हुआ असहाय-सा देखता रह जाता है।
          किसी का सहारा लेने वाले व्यक्ति को सहारा देने वाला धीरे-धीरे अपना गुलाम ही समझने लगता है। वह चाहता है कि उसका सहारा लेने वाला उसे खुदा समझे। उसकी हर सही-गलत बात पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाए। उसके हर कथन को ब्रह्मवाक्य माने। उसकी इच्छा से सोए, जागे और अपने सारे कार्य करे। यानी बिना मोल के अपनी गुलामी उसके नाम लिख दे।
          यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार न चलना चाहे तो उससे सम्बन्ध विच्छेद करने की धमकी देता है। ऐसे में वह बेचारा घबराकर उसका साथ पाने के लिए उपाय करने लगता है।
          उचित यही है कि मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए। अपने अन्तस् की शक्ति को पहचानना चाहिए। किसी का सहारा लेने से बचना चाहिए ताकि उसे जीवन में कभी असफलता का मुँह न देखना पड़े। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

सन्तान से हारने के स्थान पर योग्य बनाऍं

सन्तान से हारने के स्थान पर योग्य बनाऍं

प्रत्येक मनुष्य में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह सम्पूर्ण जगत को जीत सकता है। सारे संसार पर आसानी से अपनी धाक जमा सकने वाला मजबूत इन्सान भी अपनी औलाद से हार जाता है। उसके समक्ष वह बेबस हो जाता है। 
          यहाँ प्रश्न यह उठता है कि सर्वसमर्थ होते हुए भी आखिर मनुष्य अपनी सन्तान के समक्ष क्यों हथियार डाल देता है? इसका कारण क्या है?
        सन्तान के प्रति होने वाला उसका अन्धा मोह ही इसका प्रमुख कारण होता है। उसकी ममता उसे झुकने के लिए विवश कर देती है और न चाहते भी हार मानकर वह अपने घुटने टेक देता है।
          रामायण काल में पुत्रमोह में अन्धी हुई कैकेयी ने भरत को राज्य दिलाने के विषय में विचार किया। अपनी योजना को साकार करने के लिए उसने महाराज दशरथ से भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का बनवास मॉंगा और अपने पुत्र को राजा बनाने पर बल दिया। उस समय भगवान श्रीराम भगवती सीता और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वन में चले गए। इस सबसे दुखी राजा दशरथ की मृत्यु जैसा जघन्य अपराध हो गया।
         महाभारत काल में पुत्रमोह में अन्धे हुए महाराज धृतराष्ट्र ने अपने मृत भाई पाण्डु के बच्चों का हक मार लिया। अपने पुत्र दुर्योधन को उन्होंने राज्य सौंपा। फलस्वरूप महाभारत जैसा भीषण युद्ध हुआ जिसने उस काल में तबाही मचा दी। अनेक महारथी व विद्वान इस युद्ध की भेंट चढ़ गए। आज भी हम उस विभीषिका के विषय में पढ़कर दुखी हो जाते हैं।
        राजा अकबर ने अपने बेटे सलीम के हठ के कारण हार मान ली थी। कहीं माता और कहीं पिता ने लाचार होकर दूसरों का हक छीना। इस प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास के पन्नों में कैद हैं। बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
        आज भी समाचार पत्रों, टी वी चैनलों और सोशल मीडिया पर ऐसे समाचार देखने और सुनने को मिलते रहते हैं जहाँ उच्च पदासीन अफसरों, नेताओं और बड़े-बड़े व्यापारियों के बच्चे चोरी, डकैती, कार चोरी, स्मगलिंग, हेराफेरी, मर्डर, बलात्कार आदि गलत कार्य करते हुए पकड़े जाते हैं। उस स्थिति में भी उनके माता-पिता उनके मोह के कारण उन्हें बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं और पानी की तरह पैसा बहाते हैं। यद्यपि उन लोगों को अपने बच्चों को संस्कारित करके समाज में एक आदर्श स्थापित करना चाहिए परन्तु होता इसके विपरीत होता है।
          बचपन में एक घटना सुनी थी कि एक चोर था। जब वह पकड़ा गया तो उसे न्यायाधीश ने सजा सुनाई और जेल में भेज दिया। परेशानियों का सामना करते हुए एक दिन उसकी माँ उसे मिलने के लिए वहाँ जेल में गई। अपने बेटे को उस स्थिति में देखटर उस माँ का कलेजा काँप गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
        जेल में जब माँ-बेटे की बातचीत हो रही थी तो उस चोर ने अपनी माँ को अपने बहुत करीब आने के लिए कहा। माँ ने सोचा कि बेटा उदास हो रहा है और उसके गले लगाना चाहता है। वह बेटे के एकदम पास जाती है। उसी समय बेटे ने माँ का कान काट लिया। सिपाही ने उसे मारते हुए उस कुकृत्य के विषय में उससे पूछा।
        उसके उत्तर ने सबको हैरान कर दिया। उसने कहा, "बचपन में जब मैं कुछ चुराकर लाता था तो मेरी माँ ने कभी मना नहीं किया। यदि पहली बार चोरी करने पर मुझे माँ ने दो तमाचे लगाकर चोरी वाला सामान लौटाने के लिए कहा होता तो आज 
मेरी यह स्थिति न होती। मैं जेल की सलाखों के पीछे कैद न होता।"
        यह कथा यही समझा रही है कि अनावश्यक लाड़-प्यार करके माता-पिता बच्चों को बिगाड़ देते हैं। उनकी जायज-नाजायज सारी माँगे पूरी करके उन्हें हठी बना देते हैं। जब ये बच्चे उनके हाथ से निकल जाते हैं और समाज में उनके कारण शर्मिंदा होना पड़ता है तो उन्हें कोसते हैं। तब कहते हैं ऐसी औलाद के होने से अच्छा था कि वे निस्सन्तान रह जाते। बड़े अफसोस की बात है कि उस समय भी उन्हें अपनी गलती समझ नहीं आती।
         बच्चों को सही-गलत का अन्तर बताना माता-पिता का कर्तव्य होता है। वे अपनी रोजी-रोटी कमाने में व्यस्त रहते हैं, अपने में मस्त रहते हैं, पार्टियाँ करते रहते हैं पर बच्चों को समय नहीं दे पाते। यदि बच्चों को समय रहते पास बिठाकर संस्कार दिए जाएँ तो ऐसी अनहोनी घटनाओं से बचा जा सकता है। 
         बच्चे बहुत भोले होते हैं। वे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। उन्हें जैसा भी चाहो आकार दिया जा सकता है। उन्हें समय रहते संस्कार देने चाहिए। अपने बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं। उनके अतिमोह में पढ़कर माता-पिता को उनका भविष्य चौपट नहीं करना चाहिए। सन्तान से हारने के स्थान पर उन्हें इतना योग्य बनाना चाहिए कि वे समाज के लिए एक अमूल्य खजाना बन जाएँ, न की दुनिया पर बोझ बन जाऍं।
चन्द्र प्रभा सूद