शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

नीतिज्ञ तक पहुॅंचना कठिन

नीतिज्ञ तक पहुँचना कठिन 

नीतिज्ञ महान होते हैं, उन तक पहुँच पाना बहुत कठिन कार्य होता है। ये लोग अपने आचार-व्यवहार से सबके प्रिय बन जाते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु नहीं होते और यदि ईर्ष्यावश कोई बन भी जाए तो वे संख्या में नगण्य होते हैं। वे ऊपरी तौर से चाहे उनका विरोध करते रहें पर मन से उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। निम्न श्लोक में ऐसे गुणज्ञों के विषय में कहा है-
       शस्त्रो नीतिहीनानां यथापथ्याशिनां गदा:।
      सद्य: केचिच्च कालेन भवन्ति न भवन्ति च॥
अर्थात् जिस प्रकार अपथ्य खाने वालों को कभी-न-कभी रोग ग्रस्त कर लेते हैं जबकि संयमी लोगों को कोई रोग नहीं होता। उसी प्रकार नीति विहीन व्यक्तियों के कभी शीघ्र और कभी विलम्ब से अनेक शत्रु बन जाते हैं। जबकि नीति का अनुसरण करने वालों के शत्रु नहीं होते अर्थात् सभी उनके मित्र बन जाते हैं।
             यह श्लोक हमें समझा रहा है कि जो लोग खाने-पीने में परहेज नहीं करते, वे कई रोगों की चपेट में आते हैं। अपनी जीभ पर उनका नियन्त्रण नहीं होता। जहाँ स्वादिष्ट, मसालेदार या चटपटा भोजन देखा वहीं उनकी लार टपकने लगती है। वे यह भी नहीं सोचते कि उनकी आयु के अनुसार वह भोजन उनके लिए लाभप्रद होगा या शरीर के लिए हानिकारक रहेगा। इसलिए रोग शीघ्र इन्हें अपना मित्र बना लेते हैं।
             इसी प्रकार अपनी वाणी पर भी इन लोगों का नियन्त्रण नहीं होता। जरा-जरा-सी बात पर भड़ककर लाल-पीले हो जाते हैं। बिना सोचे-समझे और बिना किसी का लिहाज किए हर किसी को जो मुँह में आया कह देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु अधिक और मित्र कम होते हैं।
              संयमी व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं। अपने जीवन को सदा ही नियमपूर्वक चलाते हैं। रोग इन्हें अपना मित्र बनाने से कतराते हैं।
        नीतिज्ञ नीति को जानने वाले एवं बुद्धिमान होते हैं। नीतिज्ञ व्यक्ति सभी कार्य सुनियोजित नीतियों के अनुसार ही करता है। ये लोग प्रायः निर्णय लेने में निपुण होते हैं और विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने की क्षमता रखते हैं। वे अक्सर शासन, कूटनीति या प्रबन्धन के क्षेत्रों में काम करते हैं। 
          नीति विहीन लोग सदा बेपेन्दे लोटे होते हैं अथवा कहें तो थाली के बैंगन की तरह होते हैं। वे इधर-उधर अनावश्यक रूप से ही भटकते रहते हैं। अपनी निजी कोई सोच-समझ न रखने के कारण वे प्राय: भेड़चाल में विश्वास रखते हैं। इनके लिए यही कह सकते हैं - 
        'गंगा गए तो गंगा दास और यमुना  
        गए तो यमुना दास।'
अर्थात् जिस भी माहौल में जाते हैं, वहीं के होकर रच बस गए, उनका अपना कुछ भी मौलिक नहीं होता।
             हर किसी की बात पर ये जल्द ही आँख मूँदकर विश्वास करने वाले होते हैं। ऐसे लोग अक्सर दूसरे के झाँसे में आकर धोखे और ठगी के शिकार हो जाते हैं। जब अपना नुकसान जब कर बैठते हैं तब उन धोखेबाजों को कोसते हैं। उस समय फिर पश्चाताप करते हैं कि काश वे धोखे का शिकार होने से पहले चेत जाते, तो अपनी हानि न होने देते। मुझे एक गीत स्मरण आ रहा है। उस गीत की एक पंक्ति यहॉं उद्धृत कर रही हूॅं जो सन 1957 की फिल्म 'एक साल' का एक प्रसिद्ध दर्दभरा गीत है -
   सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ।
इसका अर्थ है कि जब सब कुछ बर्बाद हो जाने के  बाद या मौका हाथ से निकल जाने के बाद यदि समझदारी आती है तो उस समझदारी का कोई फायदा नहीं होता।           
            इसके विपरीत संयमी लोग सबके मित्र बन जाते हैं। उन महान् आत्माओं का अनुसरण बहुत से लोग करने  लगते हैं। उनके आचार-व्यवहार में एक अनुशासन होता है। वे किसी व्यक्ति का अहित करने के विषय में सोच ही नहीं सकते, बल्कि निस्वार्थ परोपकार के कार्य करते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भी छोटा अथवा बड़ा मनुष्य नहीं होता। वे सदा धर्म, जाति, व्यवसाय, रग-रूप आदि मुद्दों से परे रहते हुए सब लोगों के साथ ही समानता का व्यवहार करते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समाज निर्माण में सक्रिय योगदान रहता है।
          हमें स्वयं को निर्णय लेना है कि हम नीतिज्ञ एव संयमी बनकर स्वस्थ और समाज के दिग्दर्शक बनना चाहते हैं अथवा नीति-विहीन एवं इन्द्रियों के वश में रहने वाले बनकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारकर मूर्ख बनना पसन्द करेंगे।  
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

त्रिया हठ

त्रिया‌ हठ

त्रिया हठ के विषय में बहुत कुछ कहा और सुना गया है। अपने घर में अथवा अपने आसपास कहीं भी यह शब्द अवश्य ही आपको सुनने को मिला होगा। इस त्रिया हठ पर मैं अपने विचार रख रही हूॅं। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप सब सुधी जनों को यह आलेख रुचिकर प्रतीत होगा।
            त्रिया हठ अथवा किसी स्त्री हठ। इसका अर्थ है किसी स्त्री द्वारा अपनी किसी विशेष इच्छा या जिद को पूरा करने के लिए अड़ जाना। चाहे वह इच्छा उचित हो या अनुचित हो। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ महिला अपनी बात मनवाने पर अड़ जाती है। इसके लिए कई बार भावुकता, रूठना या विशेष अभिनय के द्वारा उसका काम निकलवाना शामिल माना जाता है। यानी स्त्री यदि अपने हठ पर आ जाए तो परिवार की चूलें तक हिल जाती हैं। इससे उसकी चतुराई, उसका रहस्यमय स्वभाव अथवा उसके कपटपूर्ण व्यवहार ज्ञाऐ होता है। 
             महान कवि और नीतिज्ञ भर्तृहरि ने स्त्री के चरित्र के विषय में 'नीतिशतकम्' में बताया है -
         नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तम्।
           मनोरथाः दुर्जनमानवानाम्।।
           त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम्।
           देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
अर्थात् राजा का चित्त, कंजूस का धन, दुर्जनों का मनोरथ, पुरुष का भाग्य और स्त्रियों का चरित्र देवता तक नहीं जान पाते तो मनुष्यों की तो बात ही क्या है?
            इस श्लोक से हम स्त्रियों के चरित्र के विषय में कहा गया है कि देवता भी उनके चरित्र के बारे में नहीं जान सकते तो हम मनुष्य उन्हें समझने में असफल हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उनका चरित्र बहुत जटिल होता है। उसे समझना मनुष्यों के बस की बात नहीं है।
             यह जीवन की अनिश्चितता को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि नारी की सोच, व्यवहार और पुरुष का भाग्य, ये कर्म इतने जटिल और रहस्यमय होते हैं कि उन्हें समझना मानवीय क्षमता से परे है। यहॉं तक कि ईश्वर भी इन्हें पूरी तरह से नहीं समझ सकते। यह श्लोक यह सन्देश देता है कि हमें किसी के चरित्र या भाग्य के बारे में बिना सोचे-समझे, कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। लोक मान्यता में त्रियाचरित्र यानी स्त्री के चरित्र को समझ पाना कठिन माना गया है।
           अब हम इस विषय पर कुछ उदाहरण लेते हैं। मॉं सती भगवान शिव की पत्नी और राजा दक्ष की पुत्री थीं। महाराज दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें शिव और सती को उन्होंने आमन्त्रित नहीं किया। भगवान शिव के समझाने पर भी वे नहीं मानीं और पिता के यज्ञ में पहुॅंचा गईं।वहॉं पिता के यज्ञ में शिवजी का अपमान न सह पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।
           रामायण काल की कैकेई का हठ सर्वविदित है। वहॉं आपने पुत्र भरत को राजगद्दी पर बैठाने के लिए कैकेई ने भगवान के लिए चौदह वर्षों का वनवास मॉंगा था। फलस्वरूप भगवान, भगवती सीता और लक्ष्मण वन में चले गए। उनके वियोग‌ में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई। वनवास में उनके कठोर जीवन और कठिनाइयों के विषय में हमने पढ़ा है।
           रामायण का ही दूसरा उदाहरण लेते हैं जहॉं भगवती सीता ने स्वर्णिम हिरण की पाने का हठ किया। लक्ष्मण को भगवान राम की सहायता करने के लिए विवश किया। फिर लक्ष्मण द्वारा खींची गई रेखा का उल्लघंन किया। तत्पश्चात उनका रावण द्वारा अपहरण हुआ, उनकी खोज में भगवान राम और लक्ष्मण का भटकना, राम-रावण युद्ध हुआ। मॉं सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। अन्ततः उन्हें गर्भावस्था में जंगल में जाना पड़ा।
           अब महाभारत काल के उदाहरण लेते हैं। गान्धरी के पति महाराज धृतराष्ट्र अन्धे थे। गान्धारी ने स्वयं की ऑंखों पर पट्टी बाॉंध ली यानी की खुद भी अन्धी हो गई। यह नहीं किया कि पति की ऑंखें बने। दुर्याधन का पापाचार सहन करती रही परन्तु युद्ध के समय उसे ‘विजयी भव’ नहीं कहा। अपने ही पुत्र को विजेता होने का आशीर्वाद नहीं दिया। जब श्रीकृष्ण सामने आये तो सौ मृत पुत्रों की मॉं ने भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया। शाप देने के उपरान्त पश्चाता लगी कि मैने यह क्या कर दिया। 
             महाभारत का ही दूसरा उदाहरण देखते हैं। महारानी कुन्ती कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाकर रखा। उसे अपने सामने प्रतिदिन प्रताडित होते हुए देखती रही। जब पाण्डवों पर युद्ध में कर्ण के हाथें सम्भावित मृत्यु का संकट आया तो उसी परितयक्त पुत्र के पास याचना के लिए चली गई। पाण्डवों के लिए अभय दान माॉंग लिया। 
            ये इतिहास के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं। अपने आसपास भी हम ऐसी स्त्रियों को देख सकते हैं जिनके हठ के कारण परिवार बर्बाद हो गए। घर-परिवार की भलाई के लिए भी स्त्रियों ने अवश्य ही हठ किया होगा पर वे उदाहरण शायद नगण्य होंगे। इसीलिए वे चर्चा में नहीं आ सके होंगे। यह भी हो सकता है कि कोई इस विषय पर ध्यान ही नहीं देना चाहता।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

सौ वर्षों तक जीवन

सौ वर्षों तक जीवन

मनीषी ऋषियों ने ईश्वर से सौ वर्ष तक का जीवन देने की कामना की है। इन्हीं सौ वर्षों के आधार पर आश्रमों का विभाजन किया गया था। जो इस प्रकार होता था -
1 ब्रह्मचर्य आश्रम - जन्म से पच्चीस वर्ष 
2 गृहस्थ आश्रम - पच्चीस से पचास वर्ष 
3 वानप्रस्थाश्रम - पचास से पिचहतर वर्ष 
4 संन्यासाश्रम - पिचहतर से शेष आयु
           इस सौ वर्ष की आयु में हमारा शरीर कैसा होना चाहिए यह महत्त्वपूर्ण बात है। निम्न वेदमन्त्र के माध्यम से वे कहते हैं-
      पश्येम शरद: शतं  जीवेम शरद: शतम्
     श्रृणुयां शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना:   
    स्याम शरद:शतं भूयश्च शरद: शतात्।
अर्थात् हम सौ वर्ष की आयु तक भली-भाँति देख सकें। सौ वर्ष तक स्वस्थ होकर जी सकें। सौ सालों तक ठीक से सुन सकें और सौ वर्षो तक अच्छे से बोल सकें। हम सौ वर्षों तक दीन न बनें। ऐसा जीवन हम जी सकें।
            ऋषियों द्वारा इस मन्त्र में की गई प्रार्थना का तात्पर्य यही है कि सौ वर्षों तक हमारी सारी इन्द्रियाँ अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहे। हम स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट रहें। कोई रोग हमारे पास न आने पाए। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा सम्भव हो सकता है क्या? 
              यदि हम लोग अपने जीवन को संयमित कर सकें तो यह सब सम्भव हो सकता है। आधुनिक जीवनशैली के अनुसार हमारा आहार-विहार दोनों सन्तुलित नहीं हैं। हमें अपनी जीभ पर बिल्कुल भी नियन्त्रण नहीं है। तला-भुना, मिर्च-मसाले वाला जो भोजन है, उसे खाकर हम सब आनन्दित होते हैं। अपने शरीर को किसी तरह का कष्ट न देना पड़े, इसलिए दुनिया भर का जंक फूड खाते हैं। होटलों का खाना खाने के लिए हम मचलते रहते हैं। हम इसलिए अभोज्य पदार्थों का सेवन बहुत आनन्द पूर्वक करते हैं। 
          सादा और सन्तुलित भोजन खाने के नाम पर हमें बहुत कष्ट होता है। हम नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, मुँह बनाते हैं। घर में झगड़ा तक कर बैठते हैं। अब आप खुद ही बताइए कि ऐसी अवस्था में हमारा पेट बेचारा क्या करेगा? यह किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है, हम सभी ऐसा ही करते हैं। फिर दोष दूसरों को देते हैं। ऐसे दोषपूर्ण और अमर्यादित खान-पान के कारण बिमारियाँ शरीर को गाहे-बगाहे घेरती ही रहेंगी। हमारी जीभ स्वाद के लालच में आकर लपलपाती रहती है। हम बस उसी के चक्कर में पड़कर स्वय को लाचार और रोगी बना लेते हैं।
             हमारे सोने-जागने का कोई समय नहीं है। आज जीवन  शैली ऐसी बन गई है कि सारी पार्टियॉं रात देर तक चलती हैं। हम रात को देर से सोते है और फिर प्रात: देर से उठते हैं। जो उल्टा-सीधा मिला, बस उसे ही खाकर अपने काम पर निकल जाते हैं। इसी तरह खाना खाने का भी कोई समय नहीं बनता। जिस भोजन के लिए सारे पाप-पुण्य, भ्रष्टाचार, कदाचार सब करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय का सदा अभाव रहता है। शेष सभी सांसारिक कार्य हमारे लिए इससे ज्यादा आवश्यक हो जाते हैं।
             आजकल अन्न, फल और सब्जियों आदि में डलने वाले कीटनाशक भी हमारे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को और अधिक कमजोर कर रहे हैं। इससे भी अनेक रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है।
                इन सबसे अधिक दूषित होता हुआ पर्यावरण है जो हमारी सबकी लापरवाही का परिणाम है। नदियों के जल में हम सीवर की गंदगी फेक्ट्रियों का कचरा डालकर दूषित करते हैं। उस जल का उपयोग भी हमारे बहुत से रोगों का कारण है। इसी प्रकार वायु को हर तरह से दूषित करके लोगों को न्योता देते हैं।
            जब हमारा खान-पान और रहन-सहन ऐसा हो जाएगा तो हम डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपनी मेहनत की कमाई और पैसा व्यर्थ बर्बाद करते रहेंगे। मैं यह तो नहीं कहूँगी कि सभी लोग 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली नीति का जबरदस्ती पालन करें। स्वेच्छा से इसका अनुकरण करना ही श्रेयस्कर होता है।
          सौ वर्ष की आयु तक जीने के लिए आँख, नाक, कान आदि सभी इन्द्रियों का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। यदि ये सभी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाएँगी और शरीर रोगी हो जाएगा तब तो जीवन भार बन जाएगा। जीने का आनन्द भी नहीं आएगा। उस समय मनुष्य बस दिन-रात, उठते-बैठते ईश्वर से मृत्यु की कामना करता रहेगा। अपने जीवन का शतक पूरा करने के लिए जीवन में सबसे पहले आत्मसंयम और आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। शेष सब ईश्वर पर छोड़ देना ही बेहतर है क्योकि वह सब जानता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों की चर्चा प्राय: होती रहती है। पुरातन वैदिक परम्परा में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण थे। शिष्य गुरु के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्रवत मानते थे। गुरु अपने शिष्यों का सम्पूर्ण व्यय वहन करते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके शिष्य अपने घर वापिस लौटते थे। 
              आधुनिक काल में गुरु-शिष्य परम्परा के मायने बदल गए हैं। आज के इस भौतिक युग में जहाँ अर्थ प्रधान हो गया है, वहाँ इस रिश्ते में भी स्वार्थपरता बढ़ गई है। ये सम्बन्ध भी अब धन की कसौटी पर कसे जाने लगे हैं। जिस गुरु के पास बेहिसाब धन-दौलत व सम्पत्ति का अम्बार है, वह बड़ा गुरु कहलाता है। इसी तरह जो जितना मनुष्य धनवान है, वह उतना बड़ा शिष्य कहलाता है। उस धनिक को रिझाने के लिए गुरु भी नानाविध उपाय करते रहते हैं।
           धन और स्वार्थ के कारण जुड़े गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में कहीं पारदर्शिता नहीं दिखाई देती। मुझे इसका यही कारण समझ में आता है कि जब तक इन दोनों के स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है, वे परस्पर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं और जहाँ स्वार्थ खत्म हो जाता है, वहीं उनके सम्बन्धों को भी धत्ता दिखा दिया जाता है। फिर आरम्भ होता है एक नए गुरु और एक नए शिष्य की तलाश का खेल। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यहॉं समर्पण की भावना नहीं होती, मात्र प्रदर्शन होता है।
               वे गुरु तो आज चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलते, जिनके विषय में हमारे ग्रन्थों में कहा गया था-
         गुरुर्बह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
    गुरु: साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥
अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। गुरु साक्षात् परम ब्रह्म है, उसे हम प्रणाम करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस श्लोक के अनुसार गुरु को ईश्वर से भी महान बना दिया गया।
            और भी बहुत कुछ गुरु की प्रशस्ति में गाया गया। बड़े दुख का विषय है कि ऐसे गुरु अब शायद ही उपलब्ध हैं जो शिष्य को अपनी सन्तान के  समान मानते थे, वे उसकी उन्नति में प्रसन्न होते थे। उनका प्रयास यही होता था कि जितना ज्ञान उनके पास है वे अपने शिष्य को सौंप दें। वे अपने शिष्य का स्वार्थ रहित होकर सर्वांगीण विकास करते थे। ऐसे वे महान गुरु शायद विरल ही हैं। ऐसी महान गुरु-शिष्य परम्परा को हम शीश नवाकर प्रणाम करते हैं।
              गुरु का नाम लेते ही उन तथाकथित धर्मगुरुओं की ओर आज बरबस ध्यान चला जाता है, जिनके आश्रमों में दुराचार व कदाचार धड़ल्ले से होता है। अपने भक्तों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले ऐसे गुरुओं के आश्रमों में आप सब देश-विदेश से नाजायज तरीके से आई हुई दौलत के अम्बार देख सकते हैं। हिरण्यकश्यप के शायद वे वंशज हैं जिन्हें स्वयं को ईश्वर कहने में भी उन्हें रंचमात्र भी संकोच नहीं होता। धर्म, समाज और न्याय व्यवस्था की नजर में दोषी कुछ आज सलाखों के पीछे भी बन्द हैं।
              गुरु के नाम पर वे कलंक है जो अपनी बेटी कही जाने वाली शिष्या से दुराचार अथवा बलात्कार जैसे घिनौने कर्म करने से नहीं घबराते। अपने शिष्यओं का अपहरण व उनकी हत्या करते हुए उनके हाथ नहीं काँपने और न ही उनका मानस उन्हें कचोटता है।
              जहाँ तक मेरा विचार है यह सारी गिरावट महामारत काल से आरम्भ हुई। उस समय अन्य मर्यादाओं के साथ इस मर्यादा का भी हनन हुआ। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने एकनिष्ठ शिष्य भील पुत्र एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा दक्षिणा में इसलिए माँग लिया कि वे राजाश्रित गुरु थे। वे नहीं चाहते थे कि राजकुमार अर्जुन से बड़ा कोई और धनुर्धर इस विश्व में हो।
               महारथी कर्ण ने धोखे से अपने गुरु से युद्धकौशल सीखा और गुरु ने उसे क्षमा करने के स्थान पर श्राप दे दिया, 'जब तुझे मेरी सिखाई हुई इस विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तेरा यह ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा।' इस अभिशाप का परिणाम महान दानवीर कर्ण की मृत्यु के रूप में हमारे समक्ष आया।
             गुरु गोरखनाथ जैसे शिष्य किसी गुरु को चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे। उन्होंने संसार की वासना से ग्रस्त अपने गुरु को सन्मार्ग दिखाया। फिर उन्हें सांसारिक वासनाओं से मुक्त करवाकर वैराग्य की ओर लौटाकर ले आए।
              आर्यसमाज के प्रवर्तक प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी का नाम इतिहास में अमर कर दिया। 
आधुनिक काल के ये दोनों गुरु-शिष्य परम्परा का सटीक उदाहरण कहे जा सकते हैं।
             ऐसे महान, सद् गुणी गुरु और ऐसे महान शिष्य तो बस अब किस्से कहानियों में सुनने व पढ़ने के लिए रह गए हैं। अब तो ऐसी आशा नहीं दिखाई देती कि फिर कभी महान गुरु-शिष्य परम्परा हमें भविष्य में दिखाई देगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर में समा जाना होता है। सागर तक पहुँचने की उसकी तड़प ही उसे सफल बनाती है। अपने रास्ते में आने वाली सारी बाधाओं को बिना रुके पार करते हुए वह अपने लक्ष्य को भेद लेती है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को पाना चाहे तो वह सहजता से उसे प्राप्त कर सकता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होता है। जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता वह जन्म और मरण के चक्र में भटकता रहता है। 
             मनुष्य इस असार संसार में आकर सब भूल जाता है। वह मोह-माया का दामन थाम लेता है। इसलिए वह अपने लक्ष्य से दूर होता जाता है। यदि वह अपने लक्ष्य का सन्धान करने का मन बना ले तो उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। परमपिता परमात्मा से एकाकार होने की उसकी तड़प उसे अपने उद्देश्य से भटकाने में सफल नहीं हो सकती। अपने लक्ष्य की ओर उसका बढ़ता हुआ कदम ही उसे इच्छित सफलता दिला सकता है।
             नदी को सागर से मिलने की और उसमें एकाकार होने की बहुत जल्दी होती है। वह अपने उद्गम स्थल से निकलते हुए वह रास्ता रोकने वाली चट्टानों की परवाह किए बिना, उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अन्ततः सागर में जाकर समा जाती है। दिन-रात का उसे कोई ख्याल नहीं रहता। हर मौसम के वारों को झेलती हुई वह निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली जाती है। कोई भी बाधा ऐसी नहीं होती जो उसे अपने लक्ष्य से भटका सके। उसकी एकाग्रता ही उसकी सफलता की कसौटी होती है।
             हम मनुष्य बाँध बनाकर उसके प्रवाह को रोकते हैं। जगह-जगह उसमें हम कचरा डालते हैं। कभी-कभी आँधी और तूफान भी उसका रास्ता रोकने का यत्न करते हैं। फिर भी वह इन सभी व्यवधानों को सदा ही अनदेखा करके अन्त में अपने गन्तव्य सागर तक पहुँच जाती है। सबसे मुख्य बात यह है कि वह बिना विश्राम किए अनवरत मीलों लम्बी यात्रा करती चली जाती है। उसके लिए  दिन-रात, मौसम और सबसे बढ़कर हम इन्सानों की बाधाऍं उसे नहीं रोक सकतीं।
              इस सत्य से हम इन्कार नहीं कर सकते कि सागर में मिल जाने के बाद से उसका मीठा जल भी खारा हो जाता है। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। वह सागर का ही एक रूप बन जाती है। उसका अपना नाम, उसकी पहचान समाप्त हो जाती है। फिर भी उसकी तड़प सागर के साथ उसे एकरूप कर देती है।
             मनुष्य के मन में भी यदि ईश्वर को पा लेने की तड़प बलवती हो जाए तो वह भी मीराबाई की तरह संसार सागर के अगणित थपेड़ों को झेलता हुआ, उनसे बिना डरे और बिना रुके अपनी निश्चित डगर पर चल पड़ता है। सुखों की नरम मुलायम छाँव और दुखों के पहाड़ कदापि उसका रास्ता नहीं रोक सकते। ये सब रूकावटें उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। इस दुनिया के प्रलोभन उसके लिए मिट्टी के ढेले के समान व्यर्थ हो जाते हैं। वह इन प्रलोभनों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करता। वह बस अपने लक्ष्य की ओर टकटकी लगाए देखता रहता है।
             संसार के लुभावने यह मोह-माया के जाल उसके पैरों की बेड़ियाँ नहीं बन सकते। वह महात्मा बुद्ध की तरह एक ही पल में, एक ही झटके में उन सब जंजीरों को तोड़कर मुक्त हो जाने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे ही लोग युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं। इनके मार्गदर्शन का लाभ अनेक लोग उठाते हैं।
              अब पतंगे को ही देख लीजिए। लौ का दीवाना, उसे पाने की चाहत में वह अपने प्राणों की आहुति तक दे डालता है। पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। ऐसा दिव्य समर्पण भाव अन्यत्र कहाँ मिल सकता है? अपने प्राणों की परवाह किए बिना पतंगा अपने लक्ष्य को पाने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है। पतंगे जैसी दीवानगी यदि हो तो मनुष्य का लक्ष्य उसे शीशे की तरह साफ-साफ चमकता हुआ दिखाई दे सकता है। जिसे वह चाहे तो सरलता से हाथ बढ़ाकर पा सकता है।
             नदी और पतंगे दोनों के उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करते हैं कि जब तक प्रेम की तड़प न हो तो मनुष्य इस संसार के सम्बन्धों को नहीं निभा सकता। क्योंकि माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र, नाते-रिश्ते यानी हर भौतिक सम्बन्ध प्यार के बिना अधूरा रहता है। जितना प्रेम का खिंचाव होता है, सम्बन्ध उतना ही प्रगाढ़ बनता है। तो फिर प्रभु को प्रेम की तड़प के बिना किस प्रकार पाया जा सकता है? 
             मालिक को पाने के लिए सच्ची तड़प का होना बहुत आवश्यक है। तभी मनुष्य उसके पास जाने, उससे मिलने, उसे जानने, उसमें एकाकार हो जाने के सभी प्रयत्न कर सकता है और फिर अन्तत: अपने इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा एक प्रकार का दृष्टि भ्रम होता है। दूर या रेगिस्तान में पानी होने का आभास होता है परन्तु वास्तव में वहॉं पानी नहीं होता है। यह गर्म दिनों में प्रकाश के अपवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। जहाँ जमीन के पास की गर्म हवा प्रकाश की किरणों को मोड़ देती है और आकाश का प्रतिबिम्ब जमीन पर दिखने लगता है, उसे पानी समझ लिया जाता है।वास्तव में मृग का अर्थ हिरण और तृष्णा का अर्थ प्यास होता है। यह उस मिथ्या विश्वास को दर्शाता है कि प्यासा हिरण पानी समझकर चकाचौंध वाली रेत के पीछे भागता है।
             जीवन में किसी ऐसी चीज की खोज करना या चाहना जो वास्तव में वहॉं होती नहीं है या जिसे प्राप्त करना नामुमकिन है। मृगतृष्णा के पीछे मनुष्य आखिर कब तक भागता रहेगा। इस भटकन का कहीं कोई अन्त तो होना चाहिए न। सीमित समय के लिए मिले इस मानव जीवन को मनुष्य मानो रेस में भागते हुए बिता देता है। अपना सारा सुख-चैन गँवाकर भी यदि उसे शान्ति मिल जाए तब गनीमत समझो। 
              वह न्यायकारी परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं करता। वह ईश्वर चींटी जैसे छोटे से जीव से लेकर हाथी जैसे बड़े, हर जीव के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। मनुष्य को भी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार बिन माँगे ही सब दे देता है। ज्ञानी जन कहते हैं-  
           जिसने यह जीवन दिया है,
           भोजन की व्यवस्था भी वही करेगा।
          जीवन चलाने के लिए आवश्यक साधनों को मनुष्य सरलता से जुटा सकता है। परन्तु जब महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर उठाने लगती हैं, तब समस्याएँ मुस्कुराती हुई उसे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। उस समय मनुष्य उन असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। दिन-रात एक करता हुआ जी-तोड़ मेहनत करता है। इस पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे सदा ही सफलता मिल जाएगी।
            जिनके लिए वह ये सब यत्न करता है वे तो उसे अपनी इच्छा पूर्ति का एक साधन मात्र समझने लगते हैं। जब तक उनकी जरूरतें वह पूरी करता रहेगा तब तक तो उसके बराबर उनका और कोई प्रिय नहीं होता है। सभी उसकी प्रशंसा करेंगे और मिन्नत-चिरौरी भी करेंगे। 
               इसके विपरीत जब मनुष्य दूसरों की आकाँक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता तब उससे बुरा और कोई नहीं होता। सबसे अधिक उसका बुरा तब होता है जब उसे नालायक और कामचोर कहकर अपमानित किया जाता है। उसके नाम के आगे एक असफल या नाकामयाब व्यक्ति होने का ठप्पा लग जाता है। फिर वह कितनी भी कोशिश कर ले स्थितियों को सुधारने में वह सफल नहीं हो पाता।
              एक के बाद एक भौतिक वस्तुओं को जुटाने की फिराक में भागता हुआ मनुष्य इतनी दूर निकल जाता है कि उसका सब कुछ छूटता चला जाता है। जब पीछे की ओर मुड़कर देखता है तब वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। फिर चाहकर भी अपनों के बीच नहीं जा पाता। यही वह समय होता है जब मनुष्य जीवन के उस मोड़ पर पहुँच जाता है जहाँ उसे अपनों के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए वह अशक्त होने लगता है। उस वक्त उसे अपनों के सशक्त कन्धों की जरूरत स्वाभाविक रूप से होती है।
             यही उसके सन्ताप का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। उस समय वह बस कलपता है, अपना मन मसोसकर रह जाता है कि जिनके लिए सारा जीवन भागदौड़ की, अपना सुख-चैन खो दिया, इससे भी बढ़कर स्वयं को भी भूल गया, वही नजरें मिलाकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। उससे कहीं दूर बेगानों की तरह हो गए हैं। उस स्थिति में भी इन्सान चेत जाए तब भी अच्छा है। एकाकी बैठकर आत्मचिन्तन करने पर ही समझ आती है कि अपने इस जीवन में क्या खोया और क्या पाया? मनुष्य जब तक खोये-पाये का लेखा-जोखा सुलझाता है तब तक इस संसार को अलविदा कहने का उसका समय आ जाता है।
                मनुष्य को अपनी असीम इच्छाओं को कुछ हद तक सीमित करना चाहिए। अनावश्यक ऐष्णाओं के पीछे भागने से कोई हल नहीं निकलने वाला। जितने भोगों को एकत्र करते जाओ, उतना ही मानसिक सन्ताप बढ़ता जाता है। इसलिए मृगतृष्णा के इस मायाजाल से यथासम्भव बचते हुए अपने जीवन में सुखोपभोग करना चाहिए अन्यथा इसके चंगुल से बच निकलना असम्भव तो नहीं बहुत ही कठिन अवश्य हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जिजीविषा

जिजीविषा

जिजीविषा एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ होता है जीने की प्रबल इच्छा अथवा जीवन के प्रति गहरा लगाव होता है। जीवन जीने की चाह, जीवन जीने की कला अथवा दीर्घायु की महत्वाकांक्षा। यह शब्द उस मानवीय जजबे को व्यक्त करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को न छोड़ने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन जीने की तीव्र लालसा, उत्साह और जीवटता को दर्शाता है।
            जिजीविषा शब्द का प्रयोग प्रायः उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह शब्द दर्शाता है कि मनुष्य अपने जीवन से कितना प्यार करता है और उसे बनाए रखने के लिए उसमें कितनी अदम्य इच्छाशक्ति है। जिजीविषा का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
            जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती तो वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े,  दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर प्रतिदिन ईश्वर से मृत्यु की कामना करता है। उसकी स्थिति को देखते हुए उसकी मनःस्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं।
           यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात लगती है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे मनुष्य के रूप में अवतरित हुए तब उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बस बैठा-बैठा कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
              जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ होना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह व्यक्ति मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई दे जाती हैं।
            हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी मनुष्य का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
             मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य या विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
          ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है। इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उबर जाता है। उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
            हम देखते हैं कि प्रकृति में भी जिजीविषा होती है। तभी सूखे और ठूॅंठ हो चुके पेड़ों में भी हरियाली देखी जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य की जिजीविषा असम्भव को भी सम्भव बना देती है। जिजीविषा मानव मन की अद्भुत शक्ति का प्रतीक होती है जो हमें हर परिस्थिति में जीवन को अपनाने और उसका जश्न मनाने की प्रेरणा देती है।
           कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे बिना डगमगाए खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही मनुष्य आकाश की बुलन्दियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद