गुरुवार, 4 जून 2026

मनोबल सदा ऊॅंचा रखना

मनोबल सदा ऊँचा रखना

परिस्थितियाँ जीवन में कैसी भी आ जाएँ मनुष्य को अपना मनोबल सदा ऊँचा ही रखना चाहिए। उसे किसी भी स्थिति में गिरने नहीं देना चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव पहिए के अरों की तरह की कभी ऊपर और कभी नीचे होते रहते हैं। यह गति ही जीवन का अभिन्न अंग है। यदि पहिए की भाँति जीवन की गति थम जाए तो सब स्थिर हो जाएगा। तब जीने का आनन्द ही धीरे-धीरे समाप्त होता जाएगा।
           मनोबल ऊँचा रखने के लिए हर स्थिति में सकारात्मक पहलू खोजना चाहिए। नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए क्योंकि एक नकारात्मक विचार सकारात्मक विचारों को नष्ट कर सकता है। ध्यान करने से विचारों में स्पष्टता आती है और मनोबल बढ़ता है। व्यायाम तनाव को कम करता है।  स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए। कठिन समय में भी शान्त रहकर निर्णय लेना चाहिए और साहस बनाए रखना चाहिए।
          उन लोगों की तरफ जरा अपनी नजर दौड़ाइए जिनका जीवन एक निश्चित ढर्रे पर चलता है। उनसे कभी चर्चा करेंगे तो पता चलेगा कि वे कितने परेशान रहते हैं। उनका कहना है कि जिन्दगी से दुखी हैं। सवेरे से शाम तक बस वही घिसी-पिटी बदरंग जिन्दगी है, इसमें कोई आकर्षण नहीं है। वे लोग स्वयं को एक मशीन से अधिक और कुछ भी नहीं मानते। उन्हें लगता है कि उनका जीवन एक बोझ है जिसे वे उठाकर घूम रहे हैं। अपने पास सब सुख-सुविधाएँ होते हुए भी ऐसे लोग  डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। बिना किसी विशेष रोग के प्रतिदिन डाक्टरों के पास चक्कर काटते रहते हैं।
          अब अपने आहार को ही ले लो। एक जैसा यानि रूटीन खाना खाकर हम बोर हो जाते हैं। प्रतिदिन  केवल बिना मसाले का फीका, कम नमक का खाना हम नहीं खा पाते। इसी तरह हररोज केवल मीठे खाद्य नहीं खा सकते। हमें भोजन में वैरायटी चाहिए। हमें मीठा, तीखा, चटपटा, दाल, सब्जी, सलाद, आचार, चटनी, पापड़ आदि सब खाद्य पदार्थ भोजन करते समय थाली में चाहिए। अत्यधिक मिर्च-मसालेदार भोजन मनोबल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सात्विक आहार अपनाना चाहिए।
          इसी तरह एक ही ढर्रे में हम जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यहाँ भी हमें विविधता चाहिए। इसीलिए ईश्वर ने हमारे जीवन को विविध रंगों से ही सराबोर कर दिया है। जीवन के आरम्भ में यानी कि बाल्यकाल बालसुलभ चेष्टाओं से रंगीन बना दिया। वहाँ सब कुछ समझने-बूझने का उतावलापन होता है। अपनी सम्पूर्ण योग्यताओं को निखारने और सेटल होने की ललक होती है।
          उसके बाद यौवनकाल में घर-गृहस्थी, बच्चों और नौकरी-व्यापार आदि की सभी जिम्मेदारियों से लदकर मनुष्य कोल्हू के बैल की तरह बन जाता है। आयु बढ़ने के साथ बच्चों को सेटल करना, उनके विवाह करना और अपनी रिटायरमेंट की समस्याएँ उसके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
          इसके बाद वृद्धावस्था में बिमारियाँ, शरीर का अशक्त होना, खर्चो में वृद्धि की परेशानियाँ मुँह बाए खड़ी हो जाती हैं। पति-पत्नी का साथ बना रहे तो जीवन सरल हो जाता है। बच्चों का साथ मिले तो बहुत अच्छा और यदि किसी कारणवश न मिल पाए तो उदासी और दुखों की पराकाष्ठा।
        जीवन के इन इन्द्रधनुषी रंगों को यहाँ उकेरने का मात्र यही उद्देश्य है कि हर मोड़ पर मानव की स्थतियाँ भिन्न होती हैँ। कभी-कभी जीवन नदी की धारा की तरह बाधारहित निरन्तर गतिशील रहता है और कभी उसमें बाढ़ भी आ जाती है जो सारे तटबन्धों को तोड़कर तबाही मचा देती है। 
          दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन में सुख के पलों हम मानो जी उठते हैं। दुख की घड़ियों में भी जीते हैं पर मर-मरकर, डरते हुए, उदास-निराश होकर अथवा जीवन से हार मानने लगते हैं। सब कुछ सहन कर लेना चाहिए पर जिन्दगी से हारना नहीं चाहिए। उससे डटकर मुकाबला करना चाहिए। चुनौतियों का सामना करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।
        जिस प्रकार काले घने बादलों में छुपा सूर्य उनके बरसने पर मुस्कुराता हुआ आ जाता है, दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, उसी प्रकार परेशानियों की घनी काली रात के बाद फिर खुशियाँ का सवेरा आता है। दुख की बदली भी छट जाती है।
          मनोबल मानसिक शक्ति का प्रतीक है जो जीवन की चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। जीवन पर्यन्त आने वाले सभी सुख-दुख कोई नया पाठ पढ़ाकर जाते हैं। इसीलिए यह संसार उस प्रभु की पाठशाला है जिसके हम सभी जीव विद्यार्थी हैं। हर पाठ को पढ़कर परीक्षा देनी पड़ती है और योग्यता से उत्तीर्ण भी होना होता है। इस सबके लिए हमारा अपना मनोबल ही हमारा सच्चा मित्र होता है जो जीवन में कभी लड़खड़ाने नहीं देता।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 3 जून 2026

बच्चों का भोलापन

बच्चों का भोलेपन

बच्चे अपने भोलेपन में ऐसे कार्य कर जाते हैं जिनसे उनके अपने कोमल मन को ही ठेस लग जाती है। बच्चों के मन में छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष नहीं होता। वे ईमानदार, सच्चे, सरल हृदय और भावुक होते हैं। इसीलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। इन मासूम बच्चों के मन में हम बड़े लोग जहर घोलकर इन्हें समय से पहले बड़ा बनाने का अपराध अनायास ही करते हैं। छोटे बच्चे बिना सोचे-समझे किसी की भी बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेते हैं यानी दूसरों की कही गई बात को सच मान लेते हैं।
          अपनी बात मनवाने के लिए वे हठ अवश्य करते हैं। यदि उनकी इच्छा को न पूरा किया जाए तो वे आहत हो जाते हैं। कुछ समय तक वे रूठे भी रहते हैं और थोड़े समय के बाद फिर पहले की तरह मस्त हो जाते हैं। तब उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ पल पहले वे नाराज थे। यही बच्चों की चरित्रगत विशेषता है। इसी कारण वे सबका मन मोह लेने में सफल रहते हैं, उन्हें अपना बना लेते हैं। शीघ्र ही हरेक के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं मानो उनका साथ बरसों पुराना है।
            घर में माता को काम करते देखते हैं तो अपनी माँ का हाथ बटाने के लिए कभी वे झाड़ू लगाने लगते हैं तो कभी डस्टर लेकर डस्टिंग करने लगते हैं। कभी रसोई में जाकर रोटी बनाने की जिद करते हैं। पिता को गाड़ी साफ करते देखकर उनकी सहायता के लिए भागे आते हैं। दादा-दादी के आवाज लगाने पर भागकर उनका काम खुशी-खुशी करते हैं।
             घर में यदि कोई बीमार हो जाए तब उनका काम बढ़ जाता है। वे उसकी तिमारदारी में जुट जाते हैं। बार-बार उन्हें छूकर देखते हैं। उन्हें पानी देते हैं, दवा पकड़ाते हैं और उनके पास सारा समय बैठकर व गप्पे लगाते हैं। जिससे बिमारी की अवस्था में उनका मन बहल सके। ये काम बच्चे 
बखूबी करते हैं। जिससे बिमारी की उस अवस्था में भी उन्हें सुकून मिलता है।
            पापा-मम्मी सवेरे ऑफिस जाते हैं और शाम को लौटकर घर वापिस आते हैं। बच्चे समय बीतते उनके आने की प्रतीक्षा करते हैं। उनकी घर आते ही भागकर उनकी चप्पल लेकर आ जाते हैं। उनके लिए फ्रिज में से पानी निकालकर लाने का प्रयास करते हैं। उनके पास बैठकर अपनी दिनभर की कहानियॉं सुनाते हैं। अपने प्रति उनकी चिन्ता देखकर माता-पिता उन पर बलिहारी जाते हैं। बच्चे से बात करके वे अपनी थकान भूल जाते हैं।
            इस तरह घर में हर किसी सदस्य के लिए फिक्रमन्द रहने वाले बच्चे अपनी नासमझी के कारण प्रायः कुछ-न-कुछ गड़बड़ कर देते हैं। दिन में दसियों बार काम फैला देते हैं। इसके लिए उन्हें डाँट भी लगा दी जाती है। फिर भी वे अपने परोपकारी स्वभाव को नहीं छोड़ते और अपनी ही धुन में खोए रहते हैं। थोड़ी देर के बाद फिर आ जाते हैं कोई दूसरा काम करने के लिए। जरा-सी शाबाशी मिलने पर इतराने लगते हैं।
           अपने अल्पज्ञान के कारण यदा कदा वे अकरणीय कार्य कर जाते हैं। घर के पालतू जीवों को खेल-खेल में तंग करने लगते हैं। कभी-कभी अनजाने में उन जीवों को चोट लग जाती है तब अपनी गलती समझकर वे उदास हो जाते हैं। फिर जब घर के बड़े लोग उन्हें समझाते हैं तब वे दुबारा अपनी गलती न दोहराने के लिए प्रामिस करके प्रसन्नतापूर्वक खेलने लग जाते हैं।
           कभी घर में कोई चिड़िया अण्डे देती है तो उन्हें ज्ञिज्ञासा रहती है कि उसमें से बच्चे कब निकलेंगे? वे कैसे दिखाई देंगे? उन्हें खाना कौन खिलाएगा? आदि प्रश्न उन्हें उद्वेलित करते रहते हैं। इसलिए कभी वे उन अण्डों को सबकी नजर बचाकर छू लेते हैं तो अगले दिन वे उन्हें टूटे हुए मिलते हैं। तब वे व्यथित होकर माता-पिता से इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं। जब उन्हें यह पता चलता है कि उनके छूने से चिड़िया ने अण्डों को तोड़ डाला है तो आहत हुआ बालमन फिर भविष्य में उस गलती को न दोहराने की कसम खाता है।
            अपने मंहगे अथवा सस्ते सभी प्रकार के खिलौनों को तोड़कर प्रायः बच्चे उसका मेकेनिज्म समझने का यत्न करते हैं कि वे किस प्रकार बने हैं अथवा उसमें किन-किन वस्तुओं का प्रयोग किया गया है। अपनी इस आदत के कारण उन्हें अक्सर अपने बड़ों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। फिर भविष्य में खिलौनों को न तोड़ने की कसम खाकर वे दुबारा उसी काम में मशगूल हो जाते हैं। यही उनका बचपन है।
             बच्चों को उनके बचपन में ही जीने देने का यत्न करना चाहिए। आयु से पहले उन्हें बड़ा बनकर उनका बचपन नहीं छीनना चाहिए। हो सके तो कुछ पल के लिए उनके साथ बच्चा बनकर अपने बचपन के हसीन पलों को याद कर लेना चाहिए। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो अपने में मस्त हो जाते हैं। फिर इन पलों का आनन्द नहीं आ सकता। 
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 2 जून 2026

विद्यार्थी जीवन की सफलता

विद्यार्थी जीवन की सफलता 

विद्यार्थी जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए सावधान रहना बहुत आवश्यक होता है। एक ओर यही समय योग्यता अर्जित करके आगे बढ़ने का होता है और दूसरी ओर मौज-मस्ती करने का भी यही समय होता है। विद्यार्थी जीवन में बुलन्दियों को छूने का मूलमन्त्र निम्न श्लोक हमें बता रहा है, इस पर ध्यान देना चाहिए-
      काक चेष्टा बको ध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
      अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्च  लक्षणम्।
अर्थात् विद्यार्थी के पाँच लक्षण होते हैं- कौए की तरह प्रयत्न, बगुले की भाँति ध्यान, कुत्ते के समान निद्रा, कम खाने वाला और घर को छोड़ने वाला।
           यह श्लोक विद्यार्थियों को सफलता पाने के लिए एकाग्रता, सतर्कता, अनुशासन और मेहनत करने की प्रेरणा देता है। इस श्लोक के माध्यम से कवि स्पष्ट करना चाहता है कि एक विद्यार्थी के प्रयत्न कौए की तरह होने चाहिए। एकसाथ घण्टों बैठकर पढ़ने के स्थान पर थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल से पढ़ना चाहिए। इससे थकावट भी नहीं होती और याद करने में सुविधा होती है। 
          बगुला जिस प्रकार अपना शिकार यानी मछली पकड़ने के लिए ध्यान मुद्रा में एक पैर पर तालाब में खड़ा हो जाता है, उसी प्रकार विद्यार्थी को अपना ध्यान लक्ष्य पर केन्द्रित करना चाहिए। उसका उद्देश्य केवल योग्यता अर्जित करना होना चाहिए। दुनिया के सभी आकर्षणों से अपने मन को हटाकर अपनी पढ़ाई पर केन्द्रित करना चहिए। ये सभी खाली समय के चोंचले होते हैं। इनके चक्कर में फंसने वाले विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। आगे जाकर वे अच्छी नौकरी नहीं प्राप्त कर सकते। अपने परिवार के भरण-पोषण में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
          विद्यार्थी जीवन में नींद कुत्ते की तरह होनी चाहिए, जरा-सी आहट हुई नहीं कि खुल गई। इस अवस्था में यदि अधिक सोया जाए तो पढ़ाई करने का समय नहीं मिल पाता। सोने से पहले जागने का जो समय निश्चित कर लेना चाहिए।‌ उस समय बिना कष्ट के अपनी जिम्मेदारी से जागकर पढ़ना चाहिए। ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि मम्मी जगाएगी तो तभी जागेंगे और पढ़ेंगे। यदि दूसरों का मुॅंह देखते रहेंगे तो समस्या हो सकती है।
            पढ़ने वाले बच्चों को अपने आहार पर नियन्त्रण रखना चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन खाना चाहिए ताकि उनका स्वस्थ ठीक रहे। यदि वे जंक फूड अधिक खाएँगे तो उनका स्वस्थ अवश्य ही प्रभावित होगा। आवश्यकता से अधिक खाएँगे तो नींद अधिक आएगी और शरीर रोगी भी हो सकता है। तब डॉक्टरों के चक्कर लगाने पड़े जाते हैं ।इसके कारण पढ़ाई का नुकसान होने का डर बना रहता है। जो चेप्टर विद्यालय न जाने के कारण छूट जाते हैं, उनके लिए साथियों से नोट्स मॉंगने पड़ते हैं। उन्हें समझने के लिए अधिक समय लगाना पड़ता है।
              विद्यार्थी को विद्या ग्रहण करने के लिए यदि अपने घर से दूर किसी अन्य शहर या विदेश जाना पड़े तो कदापि संकोच नहीं करना चाहिए। ज्ञानार्जन करने और अपने जीवन को उचित दिशा देने के लिए उसे अपने घर का मोह त्यागना देना चाहिए। अपना मनचाहा कोर्स जहॉं भी मिले, वहॉं जाने के लिए आनाकानी नहीं करनी चाहिए।
            विद्यार्थी जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए स्पष्ट रूप से लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। इस समय कठोर अनुशासन का पालन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करना सफलता की पहली सीढ़ी है। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही नहीं करनी चाहिए। अपने पाठ को रटने के स्थान पर विषयों को समझने पर ध्यान देना चाहिए। सुबह जल्दी उठकर पढ़ने पाठ जल्दी याद होते हैं। नियमित मेहनत करनी चाहिए। सकारात्मक सोच और एकाग्रता सफलता के मुख्य आधार हैं।
           विद्यार्थी जीवन में मुख्य उद्देश्य ज्ञानार्जन होना चाहिए। इस समय पर बच्चा यदि योग्यता ग्रहण कर लेता है तो अपने जीवन में सेटल होने में उसे परेशानी नहीं होती। उच्च पद पर आसीन होकर वह जीवन का आनन्द ले सकता है।
          इसके विपरीत जो विद्यार्थी अपने जीवन में मौज-मस्ती में डूबे रहते हैं, उन बच्चों को भविष्य में अपना कैरियर बनाने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है। सारा जीवन उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। बीता हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आ सकता। बड़े होने पर जब मनोनुकूल नौकरी नहीं मिल पाती तो उस समय फिर पश्चाताप करने का कोई लाभ नहीं होता।
            विद्यार्थियों को अपने पढ़ने और खेलने के समय में तालमेल बिठाने के लिए समय सारिणी (time table) बना लेनी चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि उसके अनुसार अपने दिन कार्यक्रम चले, बाधित न होने पाए। यदि किसी कारणवश दिन का कार्यक्रम बाधित हो जाए तो उस दिन का बचा हुआ कार्य आने वाले दिनों में पूर्ण कर लिया जाए।
            विवेकपूर्ण आचरण से ही विद्यार्थी अपने जीवन में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता है। वह दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 1 जून 2026

परिवार की परिकल्पना

परिवार की परिकल्पना

परिवार की परिकल्पना भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है। वास्तव में परिवार एक ऐसी संस्था है जहाँ व्यक्ति जन्म लेता है, विकसित होता है और सामाजिक नियमों को सीखता है। परिवार केवल साथ रहने वाले लोगों का समूह नहीं है अपितु भावनात्मक जुड़ाव और आपसी विश्वास का केन्द्र भी है। यह समाज का एक ऐसा आधारभूत ढॉंचा है जो विवाह और आत्मीयता के नियमों के माध्यम से सामाजिक स्थिरता बनाए रखता है। परिवार का प्राथमिक कार्य बच्चों का समाजीकरण करना, उन्हें शिक्षा और संस्कार देना तथा भोजन, वस्त्र और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करना होता है।
            परिवार में जितना अधिक आपसी विश्वास और तालमेल बना रहेगा उतना ही घर के सदस्यों का आपसी सद्भाव दूसरों के लिए उदाहरण बनता है। ऐसे घर की महक चारों दिशाओं में फैलती है।सन्त कबीरदास जी के जीवन का एक प्रसंग बताना चाहती हूँ। 
           कबीरदास जी प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। दूर-दूर से लोग उनके पास सुनने के लिए आते थे। एक दिन सत्संग खत्म होने के बाद भी एक आदमी बैठा ही रहा। कबीर दास जी ने उससे पूछा' "भाई, सब लोग चले गए। तुम अभी तक बैठे हुए हो। तुम्हें जाना नहीं है क्या?"
            उसने बताया, "घर के सभी सदस्यों से उसका झगड़ा होता रहता है।"
          उसने कबीरदास जी से आगे कहा, "मुझे बताइए कि मेरे घर में ही क्लेश क्यों होता है? वह उसे कैसे दूर कर सकता है?"
            कबीर जी ने थोड़ी देर चुप रहे। फिर  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, "लालटेन जलाकर ले आओ।" 
             उस बात को सुनकर उनकी पत्नी लालटेन जलाकर ले आई और बोली, "यह लीजिए।"
            वह आदमी हैरान होकर सोचने लगा इतनी दोपहर में इन्होंने लालटेन क्यों मंगवाई? थोड़ी देर बाद कबीर जी ने पत्नी से कहा, "कुछ मीठा लेकर आओ।"
           यह क्या ? मंगवाया तो मीठा था परन्तु उनकी पत्नी नमकीन देकर चली गई। उस आदमी ने सोचा कि यह तो शायद पागलों का घर है। मीठा के बदले नमकीन और दिन में लालटेन।
         उस व्यक्ति ने कबीरदास से जब जानने के लिए पूछा तब उन्होंने ने कहा, "आपकी समस्या का समाधान हो गया?
          उस व्यक्ति ने अनभिज्ञता प्रकट की तब कबीर जी ने कहा, "लालटेन मंगवाने पर मेरी पत्नी कह सकती थी कि तुम क्या सठिया गए हो। इतनी दोपहर में लालटेन की क्या जरूरत है। लेकिन उसने सोचा कि किसी काम के लिए लालटेन मंगवाई होगी। मीठा मंगवाया तो नमकीन देकर चली गई। मैं चुप रहा कि हो सकता है घर में कोई मीठी वस्तु न हो। इसमें तकरार कैसा? आपसी विश्वास बढ़ाने और तकरार न करने से विषम परिस्थितियाँ स्वयं दूर हो गईं।"
           तब उस व्यक्ति को समझ आया कि कबीर जी ने उसे समझाने के लिए ऐसा किया था। कबीर जी ने फिर कहा, "गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है। आदमी से गलती हो जाए तो औरत सम्हाल ले और औरत से कोई त्रुटि हो जाए तो पति उसे नजरअंदाज कर दे।" 
           सुखी गृहस्थी का मूल मन्त्र सिख धर्म के गुरु नानक देव जी ने इस प्रकार बताया है - 
          एक ने कही दूजे ने मानी 
           नानक कहे दोवें ज्ञानी।
अर्थात् घर में एक व्यक्ति ने कोई बात कही और दूसरे व्यक्ति ने उसे मान लिया तो वे दोनों ज्ञानी या समझदार कहलाते हैं।
           हम कह सकते हैं कि घर में बिना विरोध किए एक-दूसरे की बात को मान लेना समझदारी होती है। अनावश्यक विरोध से टकराव की स्थिति बनती है। हाँ, पहले बात मान लो और फिर माहौल देखकर अपनी राय को भी रखना चाहिए। इससे दूसरे को उसकी गलती का अहसास भी हो जाता है और घर का वातावरण भी नहीं बिगड़ता। ऐसा करने में मनुष्य का अहं आड़े आ सकता है पर घर की सुख-शान्ति बनाए रखने के लिए यह बहुत कारगर उपाय है। तभी घर स्वर्ग के समान बन सुन्दर बन जाता है।
          इस तथ्य को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि परिवार से बड़ा कोई धन इस संसार में नहीं है। पिता से बड़ा सलाहकार इस दुनिया में कोई नहीं मिल सकता। माता के आँचल की छाया से बड़ा स्थान दुनिया में अन्य कोई नहीं हो सकता। उसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। 
          अपने भाई से अच्छा साथी कोई नहीं हो सकता। बहन से बड़ा कोई शुभचिन्तक नहीं हो सकता। अपने भाई-बहनों से ही मनुष्य संसार में सुशोभित होता है। पत्नी से बड़ा कोई मित्र इस संसार में नहीं हो सकता। वही मनुष्य के सुख-दुख का सच्चा साथी होती है। उसके बिना वह अधूरा रहता है। पत्नी के साथ होने से ही मनुष्य की गृहस्थी सुखपूर्वक चलती है।
            परिवार के बिना हम लोग जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते। यदि अपने जीवन में सुख-समृद्धि चाहिए तो परिवार में सामंजस्य बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 31 मई 2026

सुन्दरता आन्तरिक हो बाह्य नहीं

सुन्दरता आन्तरिक हो बाह्य नहीं

सुन्दरता आन्तरिक होनी चाहिए बाह्य नहीं। यह सुन्दरता केवल देखने में अच्छी लगने वाली वस्तु नहीं होती। जब कोई व्यक्ति अन्दर से सुन्दर होता है तो उसका व्यवहार और आचरण भी सुन्दर हो जाते हैं। सच्चा सौन्दर्य हमारे गुणों में होता है रंग-रूप में नहीं होता। भौतिक अथवा शारीरिक सौन्दर्य क्षणिक होता है। मनुष्य का रंग-रूप, उसका शारीरिक सौष्ठव, उसकी कद-काठी, उसके नैन-नक्श आदि बाह्य सौन्दर्य को दर्शाने वाले होते हैं।
           हम अपने भारत देश को एक छोटे विश्व के रूप में देख सकते हैं। यहाँ गोरे-से-गोरे और काले-से-काले, मोटे-पतले, लम्बे-नाटे आदि सभी प्रकार के लोग मिल जाएँगे। अब प्रश्न यह उठता है कि जब इतनी विविधता है तो सुन्दरता का पैमाना क्या होगा? 
           सभी लोगों का सुन्दरता को जाँचने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। जिन देशों में लोग काले होते हैं, वे उसी के अनुरूप सुन्दरता को देखते हैं। जिन देशों में लोग गोरे होते हैं, उनका पैमाना तथावत् बन जाता है। इसी प्रकार लम्बे या नाटे होने की भी कसौटी हो सकती है।
           ये सब लिखने का तात्पर्य मात्र यही है कि शारीरिक सौन्दर्य को मापने का निकष सबका अपना-अपना होता है। फिर भी यदि हम यह कह सकते हैं कि आकर्षक व्यक्तित्व सभी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। ईश्वर ने हर प्रजाति में मादा को सुन्दर बनाया है। इसका अपवाद केवल मोर पक्षी है जो अपनी मादा मोरनी से कहीं अधिक सुन्दर होता है।
          सच्ची सुन्दरता बाहरी दिखावे, रूप-रंग या पहनावे में नहीं अपितु मन की शुद्धता, अच्छे विचारों, दयालुता और चरित्र में निहित होती है। बाहरी सौन्दर्य अस्थायी होता है जबकि लेकिन आन्तरिक गुण हमेशा बने रहते हैं और समाज में सम्मान दिलाते हैं। आन्तरिक सुन्दरता ही किसी व्यक्ति को वास्तव में आकर्षक और भरोसेमन्द बनाती है।
           इस संसार में बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने रूप-सौन्दर्य पर गर्व करते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह भौतिक सौन्दर्य सदा साथ नहीं निभाता। शरीर के रोगी हो जाने पर अथवा चेचक आदि बिमारी के आ जाने पर चेहरा पूर्ववत् सुन्दर नहीं रह सकता। एक आयु के बाद जब इन्सान वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है तब झुरियाँ आ जाने के कारण भी सुन्दरता कहीं खो सी जाती है।
          इसलिए अस्थायी सुन्दरता पर घमण्ड करना मनुष्य को कदापि शोभा नहीं देता। अपने बाहरी रूप-सौन्दर्य का गर्व न करके मनुष्य को अपने आन्तरिक गुणों को बढ़ाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। अपने गुणों को अथवा योग्यता का मनुष्य जितना अधिक विस्तार करता है उतना ही वह सबका प्रिय बनता है। मनुष्य के पास भरपूर सौन्दर्य हो परन्तु वह मूर्ख हो तो कोई उससे मित्रता करना पसन्द नहीं करेगा। इसी प्रकार मनुष्य के मुँह खोलते ही उसका फूहड़पन सामने आ जाए तब भी वह किसी का प्रिय कभी नहीं बन सकता।
            बाहरी सौन्दर्य का आकर्षण तभी तक रहता है जब तक मनुष्य के अवगुण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। यदि उसमें योग्यता है और शारीरिक सुन्दरता नहीं है तब भी लोग उसके दीवाने बन जाएँगे। बालक अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था पर बालपन से ही वह प्रकाण्ड पण्डित था, उसकी कुरूपता को अनदेखा करके लोग उसकी विद्वत्ता का लोहा मानते थे।
           मेरे कथन का यही अर्थ है कि भौतिक सुन्दरता भले ही सबको आकर्षित करती है परन्तु उसी सौन्दर्य को मान्यता तभी मिल पाती है जब उसमें गुणों का सम्मिश्रण होता है अन्यथा उस सुन्दरता का कोई मोल नहीं रह जाता। उस व्यक्ति को कोई घास नहीं डालता। उसके व्यवहार और बोलने के लहजे के कारण उससे दूरी बनाना लोग अधिक पसन्द करते हैं।
            मनुष्य के आन्तरिक गुण यानी दया, सहानुभूति, परोपकार, सहृदयता और ज्ञान आदि गुण उसे सबका सिरमौर बनाते हैं। ये गुण ही मनुष्य का वास्तविक सौन्दर्य कहलाते हैं जो भौतिक सौन्दर्य को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। बाह्य भौतिक सौन्दर्य के साथ यदि आन्तरिक सौन्दर्य भी हो तो वह सोने पर सुहागे का कार्य करता है। ऐसे व्यक्ति को लोकप्रिय होने से कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती।
          अन्त में इतना ही कहना है कि अपने अन्तस् में मानवोचित गुणों और सदाचरण का इतना विस्तार कर लेना चाहिए कि हर व्यक्ति मित्रता करने के लिए अथवा साथ जुड़ने के लिए लालायित हो जाए। तभी आन्तरिक सौन्दर्य बाहरी सौन्दर्य पर भारी पड़ सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 30 मई 2026

दिन बदलने की आशा

दिन बदलने की आशा

मनुष्य इस आशा में सारा जीवन व्यतीत देता है कि कभी तो उसके दिन बदलेंगे और वह भी सुख की साँस ले सकेगा। वह उस दिन की प्रतीक्षा व्यग्रता से करता है जब उसका भी अपना आसमान होगा और वहाँ वह लम्बी उड़ान भर सकेगा। उसकी अपनी जमीन होगी जहाँ वह पैर जमाकर खड़ा हो पाएगा। तब कोई उसकी ओर चुभती नजरों से देखने की हिमाकत नहीं करेगा।
           दिन बदलने की आशा इन्सान को विपरीत परिस्थितियों में शक्ति, धैर्य और नई ऊर्जा देती है। यह टूटी हुई भावनाओं को जोड़ती है, मन में सकारात्मकता लाती है और कठिन समय में भी आगे बढ़ने का हौसला बनाए रखती है। यह एक तपस्या की तरह है जिसमें सुबह एक नई किरण के साथ जीने का साहस मिलता है। 
           आशा ही जीवन की फिसलन भरी राहों पर चलने के लिए एकमात्र सहारा होती है। यह जीवन में सुधार की उम्मीद के साथ एक नई शुरूआत करने की प्रेरणा देती है। यह दिन भर की तपस्या की तरह है जो विश्वास दिलाती है कि हमारा कल बेहतर होगा। यह मन की टूटी हुई भावनाओं को धीरे-धीरे ठीक करती है। इससे निराशा को उत्साह और अन्धेरे को रोशनी में बदलने का विश्वास जागता है। यह जीवन के कठिन समय में भी संघर्ष करने की मानसिक ताकत देती है।
           हिन्दी की एक प्रसिद्ध लोकोक्ति या
 कहावत है -
      बारह वर्ष बाद तो घूरे के भी दिन बदलते हैं  अर्थात् समय सदा एक जैसा नहीं रहता। बहुत बुरा समय, कष्ट या परेशानी अथवा गरीबी की स्थिति भी हमेशा नहीं रहती। कभी-न-कभी मनुष्य के अच्छे दिन अवश्य आते हैं। 'घूरा'  यानी कूड़े के ढेर जैसी उपेक्षित जगह का भाग्य अगर बदल सकता है तो इन्सान की स्थिति भी एक-न-एक दिन अवश्य सुधर जाती है। 
          इन्सान के अपने भाग्य में भी परिवर्तन होगा, ऐसे सपने तो वह देख ही सकता है। संसार में कुछ लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन में समय बीतते बदलाव आ जाता है। परन्तु कुछ दुर्भाग्यपूर्ण लोग ऐसे भी संसार में होते हैं जो जन्म से मृत्यु तक एड़ियाँ घिसते रहते हैं। उनके लिए 'सावन हरे न भादों सूखे' वाली स्थिति रहती है।
          उम्मीद वर्षो से घर की दहलीज पर खड़ी वो मुस्कान है जो हमारे कानों में धीरे से कहती है- 
             जीवन में सब अच्छा होगा 
और इसी सब अच्छा होने की आशा में हम अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देते हैं। अपने जीवन को अधिक और अधिक खुशहाल बनाने के लिए अनथक श्रम करते हुए भी मुस्कुराते रहते हैं। अपने उद्देश्य को पाने में जुटा मनुष्य हसी-खुशी कोल्हू का बैल बन जाता है।
           घर-परिवार के दायित्वों को यदि मनुष्य सफलतापूर्वक निभा सकता है तो उससे अधिक सौभाग्यशाली कोई और हो नहीं सकता। किन्तु जब उनको पूरा करने की कवायद करता हुआ वह, बस जोड़तोड़ तक सीमित रह जाता है तब यह मानसिक सन्ताप उसे पलभर भी जीने नहीं देता। धीरे-धीरे उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। तब उसके कुमार्गगामी बन जाने की सम्भावना बढ़ जाती है। 
          उस समय मनुष्य भूल जाता है कि समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी भी किसी को कुछ नहीं मिलता। यदि इस सूत्र का स्मरण उस समय कर लिया जाए तो वह सदा सन्मार्ग का पथिक ही रहेगा। तब मनुष्य अपने जीवन को इस तरह नरक की भट्टी में झोंककर और अधिक कष्टों को न्यौता नहीं देगा। यदि वह अपने विवेक का सहारा ले सके तो सब बन्धु-बान्धवों का जीवन बर्बाद होने से बचा सकता है।
           मनुष्य को सदा आशा का दामन थामकर रखना चाहिए। इस बात को उसे स्मरण रखना चाहिए कि जब काले घने बादल आकाश पर छा जाते हैं तब वे शक्तिशाली सूर्य को भी आक्रान्त कर लेते हैं। दिन में ही रात होने का अहसास होने लगता है। यानी घटाटोप अन्धकार छा जाता है। उस समय बादलों के बरस जाने के बाद सूर्य मुस्कुराता हुआ फिर से आकाश में चमकने लगता है। तब सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है।
            मनुष्य के जीवन में भी कठिनाइयों के पल यदा कदा आते रहते हैं। उसे निराश और हताश करते हैं। सब बन्धु-बान्धवों से उसे अलग-थलग कर देते हैं। उसका अपना साया ही मानो पराया हो जाता है। अपने चारों ओर उसे निराशा के बादल घिरते हुए दिखाई देते हैं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी सुख की चाह में मनुष्य को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। अपने समय पर स्थितियाँ फिर से अनुकूल हो जाती हैं और मनुष्य की झोली में पड़े हुए काँटे फूलों में बदल जाते हैं।
          उस समय मुरझाया हुआ मनुष्य पुनः फूलों की तरह महकने लगता है। तब मनुष्य को कर्तापन के वृथा अहंकार को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहिए। जीवन की हर परीक्षा में तपकर कुन्दन की तरह और निखरकर सामने आना चाहिए। हर परिस्थिति में उसे उस मालिक का अनुगृहीत होना चाहिए। तभी मनुष्य को मानसिक और आत्मिक बल तथा शान्ति मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 29 मई 2026

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़ होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
         बुजुर्ग परिवार के अनुभव और ज्ञान के अनुपात होते हैं। वे अपने जीवन के गुणों से बच्चों को शिक्षित करते हैं। ये परिवार में संस्कार और परम्परा को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। पूर्वजों का आदर और सम्मान करने से परिवार में द्विपक्षीय प्रेम और लाभ प्राप्त होता है।
          बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी, "बारात में किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे।"
            अब लड़के वाले परेशान हो गए, "बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी?"
           तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन लोगों को परामर्श दिया, "बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।"
          इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया।
          तब दुल्हन पक्ष वालों ने दूल्हे पक्ष वालों से पूछा, "उन रस्मों को उन्होंने किस प्रकार निभाया।" 
         उस समय उन्होंने ने बताया' "वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं।"
           उस समय सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
          बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से मनुष्य कभी नहीं ऊबता। जिस प्रकार नमक से भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, उसी प्रकार बजुर्गों के होने से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं। भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है, उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
          परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, नियमित स्वास्थ्य जॉंच करवानी चाहिए। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयॉं सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन देना सबसे जरूरी है। उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और स्वतन्त्रता देनी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर महसूस कराना चाहिए। घर में उन्हें चलने-फिरने की जगह को सुलभ बनाना चाहिए।साथ ही घर में जरूरी सुरक्षा बदलाव करके और उनके साथ समय व्यतीत करके उनके एकाकीपन को दूर किया जा सकता है।
          माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते पर माता-पिता उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात् सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैं, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती। 
          इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैं, वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन करना सदा ही कल्याणकारी होता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है।
          बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है। 
चन्द्र प्रभा सूद