मंगलवार, 10 मार्च 2026

जीव की पहचान अपनी जाति से

जीव की पहचान अपनी जाति से  

हर जीव अपनी जाति से पहचाना जाता है। इसका अर्थ यही है कि हम मनुष्य हैं, वे पशु हैं, पक्षी हैं अथवा जलचर और नभचर हैं इत्यादि। ईश्वर ने यही वर्गीकरण करके जीवों को इस संसार मे भेजा है। उसके विभाजन में बिल्कुल स्पष्टता है। शेष सब मानव मस्तिष्क की खुराफात है। इसी मानव ने अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करके अनावश्यक ही मनुष्यों को विभिन्न जातियों में बॉंटने का अपराध किया है।
        न्यायदर्शन का कथन है -
          समान प्रसवात्मिका जाति:।
अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में समान बुद्धि पैदा करने वाली जाति है।
           न्यायदर्शन हमें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि एक समान बुद्धि वालों की एक ही जाति होती है। इस तथ्य को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि विद्वान, मूर्ख आदि के प्रकार से यदि जातियों का विभाजन किया जाए तो शायद अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा।
            ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि जातियों का विभाजन उनके गुण और कर्म के आधार पर किया गया। यह विभाजन कोई रूढ़ नहीं था। चारों जातियों के लोग यदि अपना कर्म परिवर्तित कर लेते थे तो उस कर्म के अनुसार ही उनकी जाति भी बदल जाती थी। 
            संस्कृत भाषा के कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक 'राजतरंगिनी' में लिखा है कि दुनिया में प्राय: देखा गया है कि सब जीवों को अपनी ही अपनी ही जाति वालों से भय होता है। वे कहते हैं कि बाज पक्षियों को मारता है, शेर वन में पशुओं को मारकर खा जाता है, मणियाँ हीरों के द्वारा भेदी जाती हैं, कुदाल से पृथ्वी खोदी जाती है, वायु के द्वारा पुष्प गिराए जाते हैं और सूर्य के द्वारा नक्षत्र निस्तेज कर दिए जाते हैं।
           कवि कल्हण का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वे कहते हैं, 'हम मनुष्यों की बात करें तो वे जाति के नाम पर जो भी अत्याचार और अनाचार करते हैं, वे किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं। हर दूसरे दिन ऐसे हृदय विदारक समाचार सोशल मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। एक-दूसरे के सिर पर दोष मढ़कर सभी लोग अपना पल्लू झाड़कर बचकर निकल जाना चाहते हैं। उच्च जाति का यह घमण्ड मानव समाज को रसातल की ओर ले जा रहा है।' 
         भगदत्त जल्हण ने 'सुक्तिमुक्तावली' नामक अपने ग्रन्थ में कहा है -
          शुनक: स्वर्णपरिष्कृतगात्र: 
              नृपपीठे विनिवेशित: एव।
          अभिषिक्तश्च जलै: सुमुहुर्ते
                न जहात्येव गुणं खलु पूर्णम्॥
अर्थात् कुत्ते को स्वर्ण अलंकारों से विभूषित करके राजसिंहासन पर बैठाकर यदि अच्छे मुहुर्त में जल से अभिषेक कर दिया जाए तो भी कुत्ता अपना जातिगत गुण नहीं छोड़ता।
          हर मनुष्य को बराबर समझने वाले विचार तो न जाने कहीं खोते जा रहे हैं। इसका खमियाजा समस्त मानव जाति को भुगतना पड़ रहा है। 
          जैन आचार्य और दार्शनिक वाचकवर श्री उमास्वाति (उमास्वामी) महाराज ने अपने ग्रन्थ 'प्रशमरतिप्रकरण' में हमें समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है, 'ससार में परिभ्रमण करते हुए लाखों-करोड़ों बार जन्म लेकर असंख्य बार प्राप्त हुई नीच, ऊँच और मध्यम अवस्थाओं को  जानकर कौन बुद्धिमान जातिमद करेगा? कर्मवश संसारी प्राणी इन्द्रियों की रचना से उत्पन्न होने वाली विभिन्न जातियों में जन्म लेता रहता है। यहाँ पर किसकी, कौन-सी जाति स्थायी रह सकती है? इसलिए जाति का घमण्ड नहीं करना चाहिए।'
             पता नहीं कितने जन्मों में हम अपने कृत कर्मों के अनुसार किस-किस जाति में जन्म लेकर आए हैं तो फिर यह ऊँच-नीच का भेद करने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। छोटे या बड़े किसी भी मनुष्य के बिना हम अपने जीवन में आगे नहीं चला सकते। हमें अपने दैनिक जीवन में हर प्रकार के व्यवसाय के व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके बिना हम स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। उस समय मानो चक्का जाम हो जाता है और हम परेशान हो जाते हैं।
          निम्न मन्त्र विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' के प्रथम मण्डल का 25वाँ सूक्त से है। इसके ऋषि शुनःशेप आजीगर्ति हैं और देवता वरुण हैं। यह मन्त्र पापमुक्ति और जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना का प्रतीक है -
          उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पांश माध्यम चृत।
          अवाधमानि जीवसे।
अर्थात् हे वरुण! देव हमें ऊपरी बन्धनों (पापों) से मुक्त करो, मध्य के बन्धनों को खोल दो और निचले बन्धनों को भी ढीला कर दो ताकि हम जीवित रह सकें और धर्म के मार्ग पर चल सकें। 
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 9 मार्च 2026

बालसुलभ चेष्टाऍं

बालसुलभ चेष्टाऍं

बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं को देखते हुए हम सभी बहुत आनन्दित होते हैं। बालसुलभ चेष्टाऍं बच्चों की स्वाभाविक, मासूम और निश्छल प्रवृत्तियाँ होती हैं जो निस्वार्थ खुशी और चंचलता दर्शाती हैं। खिलखिलाकर हँसना, जिद्द करना, निर्भीकता से जिज्ञासु प्रश्न पूछना, रंगों से प्रेम, शरारत करना और हर छोटी-बड़ी बात पर खुश होना शामिल है। ये व्यवहार बच्चों की मासूमियत का ऐसा प्रतीक होता हैं जो बड़े लोगों में भी आनन्द भर देता है। 
        प्रतिदिन उनकी किसी भी माँग को माता-पिता के न मनाने पर रूठना और मानना, बात-बात पर जिद करना आदि अच्छा लगता है। इन सभी मौकों पर हम मुस्कुराकर रह जाते हैं। उनके ये सभी क्रिया-कलाप हमें मानसिक सन्तोष देते हैं। एक प्रकार से हम उन क्षणों में स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं। कभी-कभी हम बड़े भी बच्चों की प्रसन्नता के लिए जान-बूझकर उनसे वैसा ही रूठने, मानने या जिद करने का अभिनय करते हैं। इस प्रकार जीवन अपनी ही गति से निरन्तर चलता रहता है।
        छोटे बच्चे गिरते-पड़ते जब ठुमकते हुए चलते हैं तो वे हर किसी के आकर्षण का पात्र बन जाते हैं। इनके गिरने पर कष्ट भी होता है। चोट लगने पर जब ये रोते हैं तब बड़े इन्हें बहला देते हैं कि फर्श टूट गया है अथवा चींटी मर गई है। उसी पल वे रोना भूलकर उठ खड़े होते हैं और पहले की ही तरह बर्ताव करने लगते हैं। उनकी ये मासूम हरकतें बड़ी मनमोहक होती हैं। घर के सब लोग इसका आनन्द लेते हैं।
           छुपन-छुपाई का खेल जब वे खेलते हैं तब उनका अलग ही रूप दिखाई देता है। एक ही स्थान पर बैठे हुए बड़े जब यह कहते हैं, "हमें तो वह दिखाई ही नहीं दे रहा, पता नहीं कहाँ चला गया है? चलो उसे ढूँढो।"
           यह सुनते ही वह हँसते हुए आकर कहने लगता है, "मैं तो यहाँ हूँ।"
            बच्चों की ये सभी सरल क्रीड़ाएँ अनायास ही मन्त्रमुग्ध कर लेती हैं। उनकी इन मनोहारी चेष्टाओं पर माता-पिता व अन्य सभी बलिहारी होते रहते हैं।
            हर अवसर पर उनका बात-बात पर उन्मुक्त होकर खिलखिलाना, हर किसी को आनन्दित करता है। इन्सान चाहे कितना भी परेशानियों में क्यों न घिरा हो पर छोटे बच्चे जब गोद में बैठकर प्यार करते हैं तब कुछ समय के लिए मनुष्य अपने सारे कष्ट और परेशानियॉं भूल जाता है। तब वह बच्चे के साथ बच्चा बन जाता है। बच्चे जब बड़ों के साथ खेलते हैं तो हार जाने पर रोने लगते हैं, चीटिंग करने का आरोप लगाते हैं और फिर भाग जाते हैं। उनकी ये हरकतें मन को मोह लेती हैं।
           कितनी ही सख्या में बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों, वहाँ उतनी रौनक और खुशगवार माहौल नहीं बन पाता जितना एक बच्चे के आने पर हो जाता है। सभी लोग उस बच्चे के साथ बच्चा बनकर आनन्दित होने लगते हैं। उस समय सारा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। सभी लोग उन पलों को सहेज लेना चाहते हैं।
             किसी भी बात को न समझ पाने पर इनके भोले-से मुखड़े पर आया आश्चर्य का भाव वाकई देखने लायक होता है। इनके बालसुलभ प्रश्नों की बौछार का उत्तर देते हुए सब थक जाते हैं। ये बच्चे हैं कि नित नए प्रश्नों के साथ बार-बार हाजिर हो जाते हैं। डाँट खाने के बाद थोड़े समय के लिए अवश्य चुप लगाते हैं। फिर बिना बुरा माने, बिना नाराज हुए उनका वही क्रम पुन: आरम्भ हो जाता है। यानी फिर से प्रश्नों की झड़ी।
             बच्चों में छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, तेरे-मेरे आदि की सभी भावनाएँ नहीं होतीं। हम समझदार लोग ही उनके निष्कपट हृदयों में इन बुराइयों को भरते हैं। उन्हें सरल से विषाक्त बनाने का कार्य हम बखूबी निभाते हैं। हम अपने गिरहबान में झाँकने के बजाय फिर बाद में यह कहने से भी नहीं चूकते कि आजकल के बच्चे बहुत चालाक अथवा घाघ हो गए हैं। इन लोगों को छोटे-बड़े का लिहाज करना ही नहीं आता।
               इन्हें हम बड़े अपने स्वार्थ के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। कोई भी लालच देकर घर में एक-दूसरे की जासूसी इन मासूमों से करवाते हैं जो एकदम गलत है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उनमें लालच बनकर पनपने लगती है। बड़े होकर जब वे किसी माँग को पूरा करने के लिए पैसा या अपनी जरूरत की कोई वस्तु माँगते हैं तब उस समय हमें बहुत बुरा लगता है। उस समय हमें याद नहीं आता कि यह गलत संस्कार हमीं ने उसे दिए हैं।
              ये बाल सुलभ चेष्टाऍं बच्चों के बचपन की मासूमियत को जीवित रखती हैं। ये बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य कही जाती हैं। हम बड़ों की सच्ची-झूठी बातों को अक्षरश: सत्य मानने वाले इन बच्चों को यदि हम सरल हृदय ही रहने दें तो समाज का ढाँचा ही कुछ और हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 8 मार्च 2026

माता-पिता की बादशाही

माता-पिता की बादशाही

सुनने और पढ़ने में शायद सबको यह वाक्य कुछ अटपटा-सा लग सकता है परन्तु यह बहुत सारगर्भित है। हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे -     
       माता-पिता की बादशाही होती है
       और भाई-बहनों का व्यापार।
इसके समर्थन में हम यह कह सकते हैं कि जब तक माता-पिता अथवा उनमें से एक भी जीवित होता है तब तक मनुष्य अधिकार पूर्वक उनके समक्ष अपनी इच्छा रख सकता है। वे भी ऐसे होते है जो बच्चों की इच्छाओं को यथासम्भव पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बच्चों की माँग उनकी सामर्थ्य से परे की हो जाती है। फिर भी बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, ऐसा सोचकर वे उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
            बच्चे माता-पिता से कभी रूठते हैं और कभी मानते हैं। उनसे जिद करके वे अपनी बातें मनवा लेते हैं। वे यह भी ध्यान नहीं रखते कि जिस वस्तु के लिए वे जिद कर रहे हैं, उसे लाकर देना उनके माता-पिता के बूते की बात है या नहीं। वे माता-पिता भी अपने बच्चों की मुँह से निकली बात को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। न वे दिन देखते हैं और न ही रात की परवाह करते हैं। बस उन्हें एक ही धुन होती है कि कैसे भी करके बच्चे की मॉंग को पूरा करना है।
            दुर्भाग्यवश यदि अभाव का समय आ जाए तब वे अपने मुँह का निवाला भी बच्चों को दे देते हैं, ताकि उनके बच्चे भूखे न सोएँ। सारा जीवन अपने बच्चों के होठों पर मुस्कान बनाए रखने के लिए स्वयं दिन-रात खटते रहते हैं। उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने के लिए किए गए अपने श्रम को वे कुछ मानते ही नहीं हैं। वे बस अपने बच्चों को जीवन में सफल देखकर मुस्कुराना चाहते हैं। उनका बस चले तो दुनिया की सारी खुशियाँ अपने बच्चों की झोली में डाल दें। हम अपने आसपास देखते हैं कि शारीरिक अक्षमता वाले बहुत से बच्चे उच्च पदों पर कार्यरत हैं। यह असम्भव कार्य माता-पिता के परिश्रम का फल है।
           अपने बच्चों के शादी-ब्याह आदि शुभकार्यों को सम्पन्न करते समय उनके चेहरों पर आए हुए सन्तुष्टि के भाव देखते ही बनते हैं। ऐसे माता-पिता बच्चों से कोई आशा नहीं रखते। वे बस अपने बच्चों के जीवन की मंगल कामना करते नहीं अघाते।
          यदि कोई बच्चा शारीरिक या आर्थिक रूप से कमजोर होता है तो उस पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि रहती है। उनकी यही सोच होती है कि उनका वह कमजोर बच्चा भी ऐसी स्थिति में आ जाए ताकि उसे किसी का मुॅंह न देखना पड़े। वे चुनौतियों का सामना करते हुए थकते नहीं हैं। उसे भी अपने गुजर-बसर लायक बना ही लेते हैं।
            माता-पिता का स्थान इस संसार में कोई नहीं ले सकता। बच्चों के प्रति उनके ऐसे त्याग और समर्पण के कारण ही उनके लिए बादशाही शब्द का प्रयोग हमारे सयानों ने किया है। वे बच्चों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भी अनदेखा करके उनकी मंगल की कामना करते हैं। वे दुनिया की नजरों से छुपाकर भी बच्चों को यथाशक्ति देते रहते हैं। बेटियों के प्रति उनका विशेष ममत्व होता है। वे कितनी भी बड़ी हो जाऍं माता-पिता उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से देते ही रहते हैं।
          उनके अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते लेन-देन के व्यवहार पर चलते हैं। चाहे वह सम्बन्ध भाई-बहन का हो, दोस्तों का हो अथवा अन्य रिश्तेदारों का हो। जितना प्यार और सम्मान उनको दोगे, उतना ही पाओगे। उनके साथ न जिद की जा सकती है और न ही अपनी माँग को दृढ़तापूर्वक मनवाया जा सकता है। जितना दूसरों के बरतोगे उतना ही वे बरतेंगे। यदि उन लोगों के साथ कदम मिलाकर चलोगे तभी वे भी साथ निभाएँगे अन्यथा वे किनारा कर लेने में पलभर की देरी नहीं करते। इसका कारण यही है कि कोई भी व्यक्ति अपनी अवहेलना सहन नहीं कर सकता। हर व्यक्ति स्वयं को ईश्वर से कम नहीं समझता।
              इसीलिए माता-पिता के सम्बन्ध के अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हुए होते हैं। जहाँ तक स्वार्थ पूरे होते रहते हैं, वहीं तक सम्बन्ध बने रहते हैं। जहाँ पर जरा-सी लापरवाही हुई, वहाँ वे टूटकर बिखर जाते हैं। उस समय परस्पर दूरियाँ बढ़ जाती हैं। यदि इन सम्बन्धों को बचाए रखना चाहते हैं तो रिश्तों की गरिमा का ध्यान रखना आवश्यक होता है। माता-पिता के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं होती। वे सदैव अपने बच्चों का हित साधते रहते हैं।
             माता-पिता की महानता और उनकी बच्चों के प्रति सहृदयता के कारण ही उनके काल को बादशाही का समय कहा गया है। उनके निस्वार्थ व्यवहार के आगे दुनिया के सभी सम्बन्ध बौने हैं। इसीलिए माता-पिता को ईश्वर का रूप कहा जाता है। उनकी जितनी भी सेवा की जाए कम होती है। उनके आशीर्वाद भी स्वार्थ रहित होते हैं। उन्हें अपने जीवन काल में लेते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 मार्च 2026

हृदय ही ब्रह्म

हृदय ही ब्रह्म

हृदय शब्द की यह व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहती है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन सन्तानें हैं- देव, मनुष्य और असुर। 
          हृदय शब्द तीन अक्षरों से बना है- हृ+द+य। वैदिक व्याकरण में इनका अर्थ बताया है- हृ का अर्थ है 'हरति' अर्थात् लाना। द का अर्थ है 'ददाति' अर्थात् देना और य का अर्थ है 'याति' अर्थात् जाना।
           जो इस रहस्य को समझ लेते हैं कि हृदय ही सब कुछ है यानी कि वही ब्रह्मा है, वही प्रजापति है। अपने और पराए सभी उसे उपहार लाकर देते हैं। जो इसे पूरी तरह जान लेता है वही स्वर्गलोक को जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वह सभी प्रकार से सुखी रहता है।
              हमारे भीतर का आध्यात्मिक केन्द्र यानी आत्मा ही परम सत्य, सर्वोच्च चेतना या ब्रह्म है। इससे स्पष्ट होता है कि हृदय मात्र एक शारीरिक अंग नहीं बल्कि वह असीम, शुद्ध, शान्त और अमर दिव्य शक्ति है। वह ब्रह्माण्ड का मूल है। स्वयं को जानने-समझने और परमात्मा से एक होने की यह अनुभूति है। हृदय में सर्वोच्च चेतना वास करती है और सम्पूर्ण अस्तित्व को बनाए रखती है। यह आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) की ओर ले जाती है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य सार को अनुभव करता है। 
          मेडिकल की भाषा में कहें हम तो सब जानते है कि हृदय मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है। यह जब तक  ठीक से कार्य करता रहता है तब तक ही मनुष्य स्वस्थ रहता है। जहाँ इसमें विकार आया वहीं से परेशानी आरम्भ हो गई। यह लेता है, देता है और चलता है। इसका कार्य रुधिर का लेना और देना होता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को लेकर फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को वापिस लौटा देता है। इसी उद्देश्य को लेकर यह निरन्तर गतिमान रहता है। यह न दिन देखता है और न रात, बस चलता ही रहता है। इस प्रकार हृदय शब्द के अर्थ से रुधिर की गति अथवा बल्ड सर्कुलेशन का भाव आ जाता है।
             यदि यह हमारी तरह सोचने लगे कि वह वर्षों से चलते-चलते, अपना काम करते हुए थक गया है। अब उसे भी आराम करना चाहिए तो वहीं, उसी पल इस मनुष्य के जीवन का अन्त हो जाता है। जिसे डॉक्टर लोग कहते हैं कि मृतक का हार्ट फेल हो गया है और वह इस दुनिया में विदा लेकर जा चुका है।
          अभी ऊपर इसकी तीन सन्तानों की हमने चर्चा की थी। पहली सन्तान है देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते है, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खानपान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को सन्तुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं उन्हें दुखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खानपान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं।
          दूसरी सन्तान है मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर बन जाते हैं। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है। जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु यदा कदा असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। उस समय शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ निश्चित ही धन व समय की बर्बादी करता है।
              इसकी तीसरी सन्तान हैं असुर। वे हर नियम को, हर बन्धन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं। उनका वश चले तो सारे एक्सपेरिमेंट इसी जीवन में अपने शरीर पर कर डालें। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियन्त्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है।
              खाने-पीने, सोने-जागने यानी कि आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक बन जाती है। यह शरीर दिन-प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे। वह अब इन रोगों से और अधिक लड़ने में समर्थ नहीं है। 
           अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे सदा बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

हर व्यक्ति व स्थान का विशेष महत्त्व

 हर व्यक्ति व स्थान का विशेष महत्त्व 

हर व्यक्ति का अथवा हर स्थान विशेष का अपना एक महत्त्व होता है। उनकी पहचान उनके द्वारा किए गए कार्यों से ही बनती है। यदि वहाँ से उन विशेषताओ को हटा दिया जाए तो एक शून्य-सा हो जाता है। इसलिए उन पर ध्यान दिया जाना बहुत आवश्यक होता है।
        एक श्लोक का उदाहरण देते हुए इसे जानने का प्रयास करते हैं -
नागो भाति मदेन कं जलरूहैः पूर्णेन्दुना शर्वरी, शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवैर्मन्दिरम् । वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः, सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं विष्णुना।।
अर्थात् गजराज मद से, सरोवर खिले हुए कमलों से, रात्रि पूर्ण चन्द्रमा से, स्त्री चरित्र से, घोड़ा गति से, मन्दिर नित्य के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदी हंस के जोड़े से, सभा पण्डितों से, कुल सुपुत्र से, पृथ्वी राजा से और तीनों लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं।
             हाथी के शरीर से पसीने के रूप में एक सुगन्धित द्रव्य निकलता है। उसी से हाथी की सुन्दरता होती है। ऐसा कहा जाता है कि सुगन्धित स्राव विशेष रूप से नर हाथियों में परिपक्वता के दौरान सामाजिक संकेत के रूप में कार्य करता है। यह उन्हें अन्य हाथियों के साथ संवाद करने में मदद करता है। हालाँकि स्नान के पश्चात वह मिट्टी में लोटता है। शरीर से मोटे व्यक्ति को प्रायः हाथी कह कर चिढ़ाया जाता है। गजगामिनी कहकर स्त्री की चाल की तुलना हाथी की चाल से की जाती है। 
          तालाब में कितना भी स्वच्छ जल हो अथवा उसमें बहुत से सुगन्धित द्रव्य डाल दिए जाएँ परन्तु वह आकर्षण का केन्द्र नहीं बन पाता। जहाँ उस तालाब में कमल के फूल दिखाई देंगे, वहीं उसका सौन्दर्य कई गुणा बढ़ जाता है। उसे निहारने के लिए लोग वहाँ पर रुकते हैं। कमल के फूल की शोभा को देखते हैं जो पानी में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहता है। बच्चे, बड़े सभी उसके सौन्दर्य को देखकर प्रसन्नता से विभोर होते हैं।
        रात्रि का सौन्दर्य पूर्ण चन्द्रमा से होता है। उस समय चारों ओर अन्धकार का साम्राज्य होता है। रात कितनी भी घनी काली हो, वह मनमोहक नहीं होती। उसे हम दुखों और परेशानियों के रूप में मानते हैं। उससे बचने के लिए उपाय करते रहते हैं शायद इसीलिए बिजली का अविष्कार हो सका। जहाँ पूर्ण चन्द्र का उदय हुआ वहीं वह सब लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। जन साधारण के लिए तो वह सुन्दरता है ही, कवियों और लेखकों का भी प्रेरणा स्त्रोत है। कितनी ही रचनाएँ इसे लक्ष्य बनाकर लिखी गई हैं। पूर्ण चन्द्रमा के उदित होते ही चारों ओर प्रकाश फैल जाता है और सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है। बच्चे चन्दा मामा की कहानियॉं सुनते हैं।
            पुरुष प्रधान समाज में सदैव स्त्री के सच्चरित्र होने पर बल दिया जाता है। उनका अपना चरित्र कैसा भी हो, स्त्री चरित्र की कसौटी पर परखी जाती है। इसीलिए चरित्र को उसका आभूषण माना जाता है और उसे महत्त्व दिया जाता है। हर व्यक्ति सती सावित्री की कामना करता है। उसे भगवती सीता जैसी पत्नी चाहिए होती है पर वह स्वयं भगवान राम जैसा नहीं बनना चाहता।
          घोड़ा अपनी गति से मूल्यवान होता है। घोड़े की गति जितनी अधिक होती है, उतना ही अधिक उसका मूल्य होता है। जिस घोड़े की चाल सुस्त होगी या मरियल होगी, उतना ही उसका मूल्य कम होता है।
          मन्दिर या धार्मिक स्थानों पर नित्य उत्सव होते रहें तभी उनकी पहचान होती है। लोग भी तभी वहाँ आते हैं और रौनक रहती है। धार्मिक स्थलों की जीवन्तता बनाए रखने के लिए वहाँ धार्मिक अनुष्ठान अथवा कथा-वार्ता होते रहने चाहिए। तभी लोग उनसे जुड़ते हैं। इससे अपने धर्म की पहचान बनती है। लोगों को अपने धर्म से जोड़े रखने का कार्य मन्दिरों में होने वाले उत्सव करते हैं।
        आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करने और अपने धर्म से जोड़ने का यह सशक्त माध्यम होता है। उन्हें तभी अपने धर्म से जोड़ा जा सकता है, जब वे वहाँ श्रद्धा से जाते रहें और वहाँ से उन्हें सदा कुछ-न-कुछ नया मिलता रहे।
           वाणी व्याकरण से सुशोभित होती है। यदि व्याकरण का चाबुक वाणी पर न हो तो भाषा अशुद्ध हो जाती है। जिसका जैसा मन करेगा, वह वैसा ही उच्चारण करेगा। इस प्रकार करने से भाषा की गरिमा ही समाप्त हो जाएगी। नदी हंस के जोड़े से सुन्दर लगती है। यदि हंस नदी में किल्लोल करेंगे तो लोग अनायास ही उनकी ओर आकर्षित होंगे। ऐसे नदी की शोभा में चार चॉंद लगा जाऍंगे।
            सभा में  विद्वान हों तो श्रोताओं को उन्हें सुनने का अवसर मिलेगा। वे उनसे बहुत कुछ सीख सकेंगे। कुल में यदि सुपुत्र का जन्म होता है तो वह कुल को तार देता है। यदि देश में सुयोग्य और प्रजा वत्सल राजा होगा तो देश नित्य प्रति उन्नति करता है। वहॉं प्रजा खुशहाल रहती है।
            इसमें कोई दोराय नहीं कि तीनों ही लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं। ईश्वर की महिमा का जितना भी बखान किया जाए वह कम ही होता है। भगवान विष्णु के अवतारों के विषय में हम जानते हैं। जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा तब ईश्वर ने किसी भी रूप में आकर धरा का उद्धार किया और धर्म की स्थापना की।
            सभी वस्तुओं की उपादेयता उनके गुण और कर्म से होती है। कवि ने हाथी, जल, रात्रि, स्त्री, घोड़े और मन्दिर इन सबके बारे में बहुत ही सुन्दर और मौलिक विचार प्रकट किए हैं। इन सबके बारे में कवि का बहुत समय पहले का यह कथन आज भी उतना ही सत्य है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

प्रेम का रास्ता बहुत संकरा

प्रेम का रास्ता बहुत संकरा

प्रेम का रास्ता बहुत ही कष्टकर होता है। इसके साथ-साथ बहुत तग अथवा संकरा भी होता है। एक समय में इसमें से एक ही व्यक्ति गुजर सकता है, दो नहीं। आत्मसमर्पण और निस्वार्थ रहना ही प्रेम का मार्ग बताता है। प्रेम की भावना बहुत उच्च कहीं जाती है। ईश्वर से सच्चा प्रेम करना बहुत कठिन होता है। मनुष्य किसी से भी प्रेम कर सकता है। वह प्रेम अपने बन्धु-बान्धवों से, जीव-जन्तुओं से तथा प्रकृति आदि से भी हो सकता है।
           सन्त कबीर दास जी ने इसी भाव को निम्न दोहे के माध्यम से कहा है-
         प्रेम गली अति संकरी, तामें दाऊ न समाई।
       जब में था तब हरी नहीं, अब हरी है में नाहीं।। 
अर्थात् प्रेम का मार्ग अत्यन्त तंग या संकरा है। इसमें 'मैं' यानी अहंकार और 'ईश्वर' या प्रियतम दोनों एक साथ नहीं रह सकते। सच्ची भक्ति या प्रेम के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
             कबीरदास जी का यह दोहा ईश्वर के लिए लिखा गया है। सामान्य जीवन में हम जिस किसी से भी प्यार करते हैं अथवा किसी का प्यार पाना चाहते हैं, उस पर भी उतना भी सटीक बैठता है। इसमें मैं से मतलब अहंकार से है। जब तक इन्सान में मैं होता है तब तक वह प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम केवल और केवल समर्पण से ही सम्भव हो पाता है। समर्पण के लिए अहंकार का त्याग करना आवश्यक होता है।
            जब तक दो व्यक्तियों में तेरा और मेरा का भाव रहेगा तब तक प्रेम नहीं हो ही नहीं सकता। जब वे दो जिस्म और एक जान बन जाते हैं तब सही मायने में प्यार होता है। यह बहुत ही गूढ़ विषय है। जब दो लोगों में ऐसा प्यार हो जाता है तो वहाँ समर्पण की भावना होती है। वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को बिनकहे और बिनसुने समझ जाते हैं। मीलों दूर बैठे हुए भी एक-दूसरे की खैर-खबर रख सकते हैं जिसे हम टेलीपैथी कहते हैं। वह उनमें स्वत: विकसित हो जाती है।
            यह सब दुधारी तलवार की धार पर चलने के समान होता है। जहाँ चूक हो गई वहाँ मनुष्य चोट खा लेता है। फिर उसे सुधारने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। प्रेम की यह गहरी परिभाषा है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार से दो अलग-अलग शख्सियत बनकर इस मार्ग में नहीं रहा जा सकता है। सच्चा प्रेम अपने अस्तित्व को अर्थात् स्व को मिटाकर दूसरे में एक हो जाना होता है। यह सम्बन्ध प्रतिदान नहीं माँगता बल्कि पूर्ण समर्पण भाव इसमें होता है। 
        प्रेम कुछ लेना नहीं जानता, वह तो बस देना ही जानता है। इसीलिए सबको अपना बना लेता है। यदि लेनदेन की या बदले की भावना यहाँ हावी गई तो फिर वह प्रेम नहीं रह जाता बल्कि व्यापार बन जाता है। इस प्रेम को विशुद्ध ही रहने दें, इसमें विष न घोलें।
         पति-पत्नि का प्रेम भी सही मायने में ऐसा ही होना चाहिए। दोनों में तेरा-मेरा न होकर हमारा होना चाहिए। दोनों के सुख-दुख सब एक होने चाहिए। जब तक तन, मन और धन से वे दोनों एक नहीं होंगे उनका प्रेम अधूरा रहेगा। परस्पर का यह अधूरापन हमेशा नुकसान देता है। 
        दोनों में समझौता हो जाना कोई शुभ लक्षण नहीं है। जहाँ समझौता टूटा वहीं पर बिखराव होने लगता है। तब परिवार टूटने लगते हैं और आपसी सम्बन्ध दरकने लगते हैं। लम्बे समय तक दोनों को साथ निभाना होता है। इसलिए जीवन में परस्पर प्रेम और  विश्वास को बनाए रखना पति-पत्नि दोनों का कर्त्तव्य है। 
          आज युवा पीढ़ी ने इस प्यार को एक व्यापार बना दिया है। उनके लिए इस प्यार के मायने केवल मौज-मस्ती है। प्यार के नाम पर वे उच्छृंखल बनते जा रहे हैं। जहाँ तक उनका स्वार्थ पूरा होता रहता है, बस वहीं तक प्यार होता है। उसके बाद फिर तू कौन और मैं कौन? वे इस बात को बिल्कुल भूल गए हैं कि प्यार देने और समर्पण का नाम है। इसमें स्वार्थ का कोई काम नहीं होता।
              एकपक्षीय प्रेम सदा ही घातक होता है। इसके चक्कर में हत्याएँ व आत्महत्याएँ भी हो जाती हैं। एसिड अटैक भी इसी का ही परिणाम होता है। यथासम्भव इससे बचना चाहिए और दूसरों को भी बचाना चाहिए।
          ईश्वर से प्रेम का आधार पूर्ण समर्पण है। उससे लौ लगाने का अर्थ है उसमें एकाकार हो जाना। यह वही प्यार है जो मीराबाई ने दुनिया की परवाह न करके अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर भगवान कृष्ण से किया। राधा ने भी सच्चे मन से भगवान कृष्ण से नाता जोड़ा। हमारे ऋषि-मुनि इसी प्यार की बदौलत असार संसार के सारे कारोबार से स्वयं को विलग कर लेते हैं।
            जब तक इस प्यार में सच्ची तड़प न हो तब तक मनुष्य इस संकरे रास्ते पर चल ही नहीं सकता। दोनों के मैं को छोड़े बिना यह पवित्र प्रेम सम्भव नहीं हो सकता। अपने अहं का परित्याग करके ही हम वास्तव में प्रेम को प्राप्त कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 4 मार्च 2026

ईश्वर का निवास हमारा हृदय

ईश्वर का निवास हमारा हृदय 

परमपिता परमात्मा जिसे हम सब लोग ऊपरवाला
कहते हैं, वह वास्तव में हमारे हृदयों में निवास करता है। बस हम उसे अपने इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख पाते। इसलिए उससे हम दूरी बना लेते हैं। उसे पाने की यदि ललक सच्ची हो तो वह हमें मिल जाता है। पंजाबी सूफी कवि बुल्लेशाह जी ने प्रभु को पाने के विषय में कहा है -
        बुल्लिआ रब दा की पौणा। 
       एत्थों पुटणा ओत्थे लाउणा।
अर्थात् बुल्लेशाह जी का कहना है कि रब यानी ईश्वर को पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस इस क्यारी से उखाड़ कर उस क्यारी में लगा देना है। दूसरे शब्दों में कहें तो मन को सांसारिक वस्तुओं से हटाकर ईश्वर में लगा दो और रब मिल जाएगा।
            वह मालिक बैठा-बैठा बस हम लोगों को देखता रहता है और मजे लेता रहता है। कभी-कभी हम उससे बिना कारण रूठ जाते हैं तो कभी मान जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में जब हमें अपरिहार्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है तो हम उससे रूठ जाते हैं और उससे शिकायत करते हुए कहते हैं कि उसने सारे दुख और कष्ट सिर्फ हमारी झोली में ही डाल दिए हैं। हमें ऐसा लगता है कि उसे कोई और नहीं मिलता। बस हमीं उसे दिखाई देते हैं।
            इसलिए उसे हम यह धमकी भी दे देते हैं कि अब तुझे याद नहीं करेंगे और न ही तेरी पूजा करेंगे। समय बीतते-बीतते जब सब स्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं तो फिर हम बच्चों की तरह उससे अब्बा कर लेते हैं अर्थात् उसकी शरण में चले जाते हैं। सच तो यह है कि हम बहुत समय तक उससे दूर नहीं रह सकते। हम सभी उसी का अंश हैं तो फिर उससे अधिक दिनों तक रूठना सम्भव नहीं हो पाता।
              जब हम अपनी मनोनुकूल वस्तुओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब यह आवश्यक नहीं रह जाता कि हम उसका स्मरण कर लें या उसका धन्यवाद कर दें। उस समय भी हमारी कृतघ्नता पर वह न हमसे नाराज होता है और न ही रूठता है। यदि वह कभी हमसे रूठ जाए या नाराज हो जाए तब हम पलभर भी चैन से जी नहीं सकेंगे, यह बिल्कुल निश्चत है।
             ईश्वर की सन्तान मनुष्य छोटे बच्चों की तरह अलग-अलग रोल करते दिखाई देते हैं। कभी बन्दूक उठा लेते हैं और अपने मुँह से ठॉय-ठॉय बोलते हुए उसे चलाने लगते हैं। कभी हम गाड़ियाँ चलाते हैं, कभी गुड्डे-गुड्डियों के खेल की तरह हम इन्सानों के जीवन से खिलवाड़ करने लग जाते हैं। हम भाँति-भाँति के खेल खेलते रहते हैं।
               हम कभी नेता-अभिनेता के पात्रों में ढलकर अभिनय करते हैं। कभी हम राजा, चोर और सिपाही के खेल खेलते दिखाई देते हैं। कभी हम जज-वकील बनकर न्याय करते हैं। अध्यापक बनकर कभी हम खेल-खेल में दूसरों को पढ़ाने का उपक्रम करते हैं। हम कभी सेवाकार्य करके उसे और दूसरे लोगों को रिझाते हैं। कभी पण्डे-पुजारी के रूप आ जाते हैं। तब पूजा-पाठ कराने का खेल खेलने लगते हैं। कभी कार्टून पात्रों की तरह हम व्यवहार करते हैं। कभी अच्छे व सज्जन लोगों के रोल निभाते हैं और कभी दुर्जन बनकर मस्ती करते हैं। कभी हम‌ ज्ञानी-ध्यानी बनते हुए सबको संस्कार देते हैं तो कभी अत्याचारी बन जाते हैं। 
              कहने का तात्पर्य यही है कि हम अपने जीवन में सदा अदाकारी दिखाते रहते हैं। वह बस हमारी कलाकारियों को निरखता रहता है और मुग्ध होता रहता है। जब हम अपनी सीमाएँ पार करने लगते हैं तब वह हमें चेतावनी देता है कि यह कार्य मत करो। पर जब हम डीठ बन जाते हैं या चिकने घड़े बन जाते हैं, उस चेतावनी को अनसुना कर देते हैं तब वह हमें सजा के रूप में कष्ट और परेशानियाँ देता है।
            जब हम उसकी चेतावनी के अनुसार कार्य करते हैं तब वह हमारी मनोकामनाएँ पूरी करके हमें खुशियों और समृद्धि का उपहार देता है। शाबाशी के तौर पर वह हमें यश देता है, सहृदय परिवारी जन व मित्र देता है। वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर  चलाता हुआ हमें सफलता देता है।
             परमपिता परमात्मा हमारे भौतिक संसार के माता-पिता की ही तरह हमारे साथ व्यवहार करता है। उन्हीं की तरह हमारे सुख-दुख आदि में हमारा साथ देता है। परेशानी से उभरने के लिए हमें रास्ता दिखाता है। जैसे हम उनके इशारों पर चलते हैं वैसे ही हमें उस मालिक के इशारों को अथवा चेतावनी को समझना चाहिए। वास्तव में इसी में हमारा लाभ निहित है।
               वह परमपिता हमारा माता, पिता, भाई, बन्धु, मित्र सब कुछ है। उससे बड़ा और कोई हमारा हितैषी नहीं हो सकता। वह हमारी बालकोचित क्रीडाओं पर हँसता और मुस्कुराता है। उसे इसी रूप में रखना हमारा दायित्व बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद