बुधवार, 25 मार्च 2026

धन के पीछे दीवाना होकर भागना

धन के पीछे दीवाना होकर भागना

मनुष्य जीवन भर अपने खाने-पहनने की और अपनी स्वयं की सुध बिसराकर पैसे के पीछे दीवाना होकर भागता रहता है। वह भूल जाता है कि यह मृगतृष्णा उसे बस यहाँ-वहाँ भटकाती रहेगी और फिर कहीं का भी नहीं छोड़ेगी। मनुष्य इस विषय पर कभी विचार ही नहीं करना चाहता कि इस संसार में क्या यह धन-दौलत किसी की अपनी बन पाई है? यह उसे क्या-क्या दे सकती है? उसके बदले में उससे क्या-क्या छीनने में सफल हो सकती है? ये प्रश्न वास्तव में विचारणीय हैं।
             यह पैसा, यह धन-दौलत मनुष्य को सुन्दर मखमली बिस्तर दिलवा सकती है परन्तु उसे  प्रफुल्लतादायक अच्छी और गहरी नींद कभी नहीं दे सकती। इसी तरह यह दौलत भोजन तो दे सकती है पर भूख को मिटा पाना उसके बूते से बाहर की बात है। व्यवहार में देखा जाए तो दौलत हमें पहनने के लिए अच्छे-से-अच्छे कपड़े खरीदकर दे सकती है परन्तु हमारे लिए सुन्दरता नहीं खरीद सकती। यह पैसा ऐशो-आराम के साधन दे सकता है परन्तु सुकून के दो पल हमारे जीवन के लिए नहीं जुटा सकता।
            इसी प्रकार धन-दौलत जिस पर हम इतना गर्व करते हैं, वह हमें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ दे सकती है परन्तु अच्छा स्वास्थ्य अथवा जीवन खरीदकर नहीं दे सकती। बच्चों को यह बिगाड़ सकती है, उन्हें हठी और मानी बना सकती है पर सन्तान को आज्ञाकारी नहीं बना सकती। यह मनुष्य को ऐशो-आराम के साधन दे सकती है परन्तु सुख-सौभाग्य नहीं दे सकती। उसकी पसन्द के नाते-रिश्तेदार देना उसके बस की बात नहीं है। ईश्वर ने जो नाते-रिश्तेदार दे दिए सो दे दिए। 
           किसी से प्यार अथवा किसी का विश्वास आदि कुछ भी तो नहीं दिला सकती यह दौलत। यह मनुष्य के घर कुव्यसनों का डेरा बना सकती है पर उसे सन्मार्ग पर चलाने के लिए उसका हाथ नहीं थामती। उसे गर्त में गिरते देखती रहती है परन्तु उसे सम्भलने के लिए प्रेरित नहीं करती। अत: इस पर इतना इतराना या मान करना उचित नहीं है। हम यह भी जानते हैं कि यह माया बहुत ही चंचल है, ठगिनी है। हमारे विवेक को भ्रमित कर देती है। यह दौलत भले-चंगे इन्सान को अपने जाल में फंसाकर उसे भ्रष्ट बना देती है। 
            कबीरदास जी का एक बहुत प्रसिद्ध सब्द या पद  है - 
           माया महा ठगनी हम जानी
इसमें उन्होंने माया को 'महाठगिनी' यानी बहुत बड़ी धोखेबाज कहा है जो त्रिगुण यानी सत्व, रज और तम की फाँसी लेकर मीठी बोली बोलती है। यह माया संसार के सभी प्राणियों को मोह और इच्छाओं के जाल में फंसाकर परम सत्य सत्य ईश्वर से दूर कर देती है।
            यह धन-दौलत उसे अपनों से दूर अकेला कर देने का षडयन्त्र करती रहती है। जब वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है तब धत्ता बताकर चल देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि जब मनुष्य उसके मायाजाल में पूरी तरह उलझ जाता है तब उसे ठोकर मार देती है तथा इठलाते हुए शान से किसी और के पास चली जाती है। बेचारे मनुष्य को तो पता भी नहीं चलता और उसका सब कुछ लुट जाता है और वह नष्ट हो जाता है। वह कंगाल बनकर अपने दुर्भाग्य को कोसता रहता है। 
            मनुष्य इस धन के हाथ की कठपुतली बना बस सोचता ही रह जाता है कि यह सब कैसे हो गया? क्यों हो गया? वह है कि मुस्कुराते हुए दूर खड़ी होकर उसकी इस बर्बादी का आनन्द लेती रहती है। पलक झपकते ही यह माया राजा को रंक बना देती है और रंक को राजा के सिंहासन पर विराजमान कर देती है।  इसके खेल बहुत निराले हैं जो आम आदमी की समझ से बाहर हैं।
            इसलिए सयाने कहते हैं कि पैसा हाथ का मैल है। इस पर गर्व नहीं करना चाहिए। आज यह यहॉं है तो देखते-ही-देखते कल कहीं और चली जाएगी। यह किसी को कलम पकड़ाकर वारा न्यारा कर देती है। दूसरी ओर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले से जीवन भर आँख मिचौली का खेल खेलती रहती है। इसकी आशा में संसार में आया हुआ मनुष्य अपने जीवन से हार जाता है पर यह उसका साथ नहीं निभाती।
           इस आने-जाने वाली धन-दौलत पर मनुष्य को कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए। इसे देश, धर्म और समाज के हित के लिए खर्च करना चाहिए। घर-परिवार के सदस्यों को भौतिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करते हुए इस धन को परोपकार के कार्यों में लगा देना चाहिए। दानवीर कर्ण की भॉंति इसे दान देने वाले इतिहास में अमर हो जाते हैं। समय-समय पर यथोचित दान देने में ही इस धन-दौलत की सार्थकता होती है। इस तरह इस धन का सदुपयोग करने से मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 24 मार्च 2026

मिल-जुलकर सौहार्दपूर्वक रहना

मिल-जुलकर और सौहार्दपूर्हवक रहना

सभी मनुष्यों को सदा परस्पर मिल-जुलकर और  प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। इससे उनमें एकता की भावना बढ़ती है और चारों ओर सौहार्द फैलता है। यह मानवता के लिए बहुत आवश्यक होता है। यदि किसी के भी साथ घृणा या ईर्ष्या की जाए तब चारों ही ओर परस्पर नफरत की आग भड़कने लगती है जिसकी चपेट में आकर बहुत कुछ जलकर खाक हो जाता हैं। इससे हम सबको हानि होती है। चाहे उसे हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकें अथवा नहीं।
              ईश्वर ने मनुष्य को सहृदय प्राणी बनाकर इस संसार में भेजा है। वह नहीं चाहता कि उसके बनाए हुए जीवों से कोई भी नफरत करे। वह स्वयं सबसे प्रेम करता है और किसी से कभी नाराज नहीं होता। इसलिए वह चाहता है कि उसके बनाए हुए सभी लोग मिल-जुलकर रहें। उनमें परस्पर भाईचारा बना‌ रहना‌ चाहिए। कहीं विरोध या अलगाव की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
            यदि किसी व्यक्ति की कोई बात पसन्द न आए तो यह आवश्यक नहीं कि उसी समय बदला ले लिया जाए। होना तो चाहिए कि उसे शान्ति पूर्वक इस बात का अहसास करवा दिया जाए कि उसकी अमुक बात अच्छी नहीं लगी। उसके बाद फिर अपने-अपने मन को एक-दूसरे की ओर से साफ कर लेना चाहिए। अपने मन में कलुषित भाव लाकर अनावश्यक ही पिष्टपेषण करने से सदा बचना चाहिए और स्वयं को परेशान करने से बचना चाहिए।
            अपनी नाराजगी को केवल शब्दों  तक रखना चाहिए, दिल की गहराई में बसाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। कुछ कह लिया और कुछ सुन लिया, मन की भड़ास निकल गई। फिर ऐसे हिसाब बराबर करके हाथ मिला लेना चाहिए। दुश्मनी पालने से किसी का भला नहीं होता। अपनों को यदि इस तरह हम दिन-प्रतिदिन नाराज करते जाएँगे तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाते जाएँगे। उस समय अपना कहने के लिए हमारे पास कोई नहीं रहेगा। हम अकेले होकर सबसे कट जाऍंगे।
            धीरे-धीरे अकेले हो जाने से जीवन यात्रा दुष्वार हो जाती है। कहते हैं-
         अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
अर्थात् अकेला मनुष्य तो कुछ भी नहीं कर सकता। हर कार्य को करने के लिए उसे बहुत से लोगों की आवश्यकता पड़ती है।
          'एकता में बल है' कहकर इसीलिए मिलकर रहने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसी भाव को इस तरह भी कहकर समझाया जाता है कि  'एक अकेला और दो ग्यारह।' यानी सामाजिक प्राणि यह मनुष्य समाज से कटकर अलग-थलग होकर कभी अकेला नहीं रह सकता। अकेले रहना किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए अभिशाप से कम नहीं होता। ऐसा व्यक्ति सब परिजनों से कटकर मात्र दुखी ही रहता है। माना कि ऋषि-मुनि अकेले रह सकते हैं पर केवल तब, जब वे साधना कर रहे हों। हमेशा के लिए तो वे भी अकेले नहीं रह सकते।
           मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भी अकेला नहीं रह सकता। यदि उसे अकेलापन न सताता तो वह इस सृष्टि की रचना करके स्वयं को व्यस्त न रखता। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा है - 
                एकोहं बहुस्याम' 
अर्थात् मैं एक हूॅं, मैं अनेक‌ हो जाऊॅं कहकर इस बात की पुष्टि की है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कि एक ही ब्रह्म अपने संकल्प से कई रूपों में विस्तृत हो गया।
           वह बस बैठा हुआ दुनिया के लोगों के खेल देखकर अपना मनोरंजन करता रहता है। दूसरों को आकर्षित करने अथवा अपना बनाने का एकमात्र जादू है प्रेम का व्यवहार करना। इससे शेर जैसे खूँखार, हाथी जैसे शक्तिशाली और साँप जैसे जहरीले जीवों को वश में किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि संसार के सभी जीव इस प्यार की भाषा को बखूबी समझते हैं। इसलिए किसी को भी अपना बनाना हो तो उससे प्यार और अपनत्व का ही व्यवहार करना चाहिए।
             मन को थोड़ा-सा विशाल बनाने से उसमें छिपे घृणा, द्वेष आदि शत्रु स्वयं ही निकलकर भाग जाते हैं। उस समय मनुष्य की मन की वृत्तियाँ सात्विक हो जाती हैं। उसके पास आने वाला हर जीव स्वाभाविक रूप से स्वयं ही उसके प्यार से सराबोर हो जाता है। प्यार से सब कुछ सरल और सहज हो जाता है। मनुष्य के सभी कार्य स्वत: ही सिद्ध हो जाते हैं। इसका कारण यही  है कि प्यार करने वाले व्यक्ति के बहुत से साथी अपने आप बन जाते हैं। 
             इस तरह उसके अपनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो जाती है। जब बहुत से हाथ एकसाथ आगे बढ़ने लगते हैं  तब दुनिया का कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरा नहीं हो सकता। जहाँ तक हो सके चारों ओर प्यार की वर्षा होती रहनी चाहिए। इस दुनिया से नफरत, आतंक और अन्य बुराइयों को दूर करने के लिए और स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए इसकी महती आवश्यकता है। इसलिए प्रेम की गंगा बहाते रहिए और धरती पर ही स्वर्ग जैसी सुख एवं शान्ति का आनन्द लेते रहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 23 मार्च 2026

रिश्तों की अहमियत समझें

रिश्तों की अहमियत समझें

रिश्तों की अहमियत समझने वाले जानते हैं कि वे कितने महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन्सान हमेशा अपने भाई, बन्धुओं, सम्बन्धियों और मित्रों  के साथ ही सुशोभित होता है। सुख-दुख के समय मनुष्य के कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़े होने वाले ये सभी आत्मीय जन उसके जीवन का बहुत बड़ा सम्बल होते हैं। इनका साथ किसी मनुष्य के लिए बहुत गौरव की बात होता है। उन्हीं के भरोसे वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता है। उसे पता होता है उसके पीछे अपनों का साथ है।
          जीवन चलाने के लिए ये रिश्ते-नाते उसे ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलते हैं जिन्हें वह किसी भी शर्त पर बदल नहीं सकता। वह चाहे या न चाहे उनका साथ निभाना उसका नैतिक दायित्व बन जाता है। रिश्तों को 'मजबूरी में ढो रहे हैं' ऐसा कहना उन रिश्तों का अपमान करना ही कहलाता है। परमेश्वर को मनुष्य का यह व्यवहार कभी पसन्द नहीं आता। इसीलिए मनुष्य को अपनी मूर्खता से रिश्तों को खोने पर पीड़ित होना पड़ता है। उसे हर कदम पर सचेत रहने की आवश्यकता होती है।
        केवल मित्रों का चुनाव करने में हम स्वतन्त्र होते हैं। उनका चुनाव स्वयं अपने विवेक से हमें करना होता है। यदि मनुष्य गलत मित्रों का चुनाव करता है तो उसे उसके परिणाम स्वरूप दण्ड भोगना पड़ता है अर्थात् कष्टों का सामना करके व्यथित होना पड़ता है। यदि सौभाग्य से सन्मित्रों के सम्पर्क में वह आ जाता है तो दुनिया का भाग्यशाली व्यक्ति बन जाता है। तब उसे अपनी समझदारी पर गर्व होता है कि उसने बहुत सोच-समझकर मित्रों का चुनाव किया है।
        इस सृष्टि का यह बहुत कठोर नियम है- 
            इस हाथ दो और उस हाथ लो' 
                         या 
             जैसी करनी वैसी भरनी
                       अथवा
            जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
इन सभी मुहावरों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, बदले में उसे वैसा ही मिलता है। यदि वह सबके साथ समानता, प्यार, विश्वास, भाईचारे अथवा सदाशयता का व्यवहार करता है तो उसे भी आजन्म सबसे प्यार और विश्वास मिलता है। सभी उसे अपना समझते हैं और उसके व्यवहार से किसी को कभी कोई शिकायत नहीं होती। इस प्रकार जीवन अपनी गति से और शान्ति से चलता रहता है।
           हर रिश्ते को मन की गहराई से निभाना चाहिए। शब्दों से कह देने मात्र से रिश्ते नहीं निभते। कहने मात्र से रिश्ता दूर तक साथ नहीं दे पाता चाहे वह पति-पत्नि का हो या भाई-बहन का। हमारे माता-पिता की तो मजबूरी होती है कि वे अपने बच्चो को मरते समय तक नहीं छोड़ सकते। बशर्ते बच्चे स्वार्थ में अन्धे होकर अनुचित व्यवहार करते हुए उनके साथ कुछ बुरा न करें। अथवा धोखा देकर अपने माता-पिता की धन-दौलत आदि अपने नाम करवा न लें।
           जो लोग अपने धन, वैभव, ज्ञान आदि के झूठे अहं के शिकार हो जाते हैं, वे अपने जीवन में कभी रिश्तों की अहमियत नहीं समझ पाते। सबको अपने दुर्व्यवहार से ठोकर मारकर वे उन्हें अपने से दूर कर देते हैं। एक आयु के पश्चात जब अकेलापन उन पर हावी होने लगता है तब वे सबको पानी पी-पीकर कोसते हैं और फिर परेशान होते रहते हैं। उस समय वे रिश्तों को न निभाने के लिए लानत भेजते हैं। रिश्तों में खून सफेद होने का सबको दोष देते हैं। अपने गिरेबान में झॉंकने का प्रयास नहीं करना चाहते।
          जो लोग अपने सम्बन्धियों के साथ मधुर सम्बन्ध रखते हैं, वे हमेशा ही प्रसन्न रहते हैं। जब कुटुम्ब या परिवार के सभी जन किसी अवसर विशेष पर एकत्रित होते हैं तो वहीं त्योहार जैसा आनन्ददायक वातावरण बन जाता है। मस्ती में झूमते वे दूसरों की ईर्ष्या का कारण भी बन जाते हैं। उस समय वे भी सोचते हैं कि काश उनके साथ भी इसी तरह सभी अपने होते।
        अपने परिवार में यदि एकता हो तो किसी की क्या मजाल है कि कोई उनकी ओर टेढ़ी आँख से देखने की हिमाकत कर सके। यदि कोई गलती से कोई ऐसा दुस्साहस करता है तो उसे कोई नहीं बचा सकता। तब तो फिर ईश्वर ही उसका मालिक बन सकता है। जहॉं तक हो सके अपने परिवार की एकजुटता को बनाए रखने का प्रयास चाहिए। उसे कभी खण्डित नहीं होने देना चाहिए। यदि रिश्तों को  बचाने के लिए किसी को थोड़ा झुकना भी पड़े तो कोई हानि नहीं है। इसीलिए हमारे सयाने कहते हैं - 
        ‌ ‌        एकता में बल है।
         सभी रिश्ते बहुत ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें उसी तरह से सहृदयता से निभाना चाहिए। रिश्तों की बुनियाद समानता और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार पर टिकी होती है। अपने रिश्तों की न कभी बुराई नहीं करनी चाहिए और न ही सुननी चाहिए।बात को मिर्च-मसाला लगाकर लोग दूसरों को बताते हैं। कभी-न-कभी बात उस व्यक्ति तक पहुॅंच ही जाती है। इससे सम्बन्धों में कड़वाहट आ जाती है। इसलिए रिश्तों का निर्वहण करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए जिससे उनकी गरिमा और गर्माहट बनी रहती है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 22 मार्च 2026

नी पीढ़ी को संस्कारित करने का दायित्व

नई पीढ़ी को संस्कारित करने का दायित्व

अपनी आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करना हम सभी का दायित्व होता है। यदि सभी माता-पिता यह दायित्व पूरी तरह निभा पाएँ तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपने सस्कारों को, अपनी मर्यादाओं को भली-भाँति समझेगी और उनका पालन अवश्य करेगी। यह सत्य है कि जाने वाली पीढ़ी अपनी थाती संस्कारों के रूप में आने वाली पीढ़ी को सौंपती है। नई पीढ़ी अपनी समझदारी से उन मूल्यों को आत्मसात करती है। आने वाली समझदार पीढ़ी कभी अपनी राह से नहीं भटकेगी।
             छोटे बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जैसा भी आकार हम देना चाहेंगे, वे वैसे ही बन जाएँगे। हम देखते हैं कि कुम्हार बड़ी ही लगन से गीली मिट्टी से मनचाहे आकार देकर अनेक सुन्दर वस्तुएँ गढ़ता है। उन्हें हम देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते नही थकते। हम उनको खरीदकर अपने घर की शोभा बढ़ाते हैं। उसी प्रकार अपने माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव बच्चों के जीवन में प्रत्यक्ष झलकता है।
            किसान उचित समय पर हल जोतकर खेत तैयार करता है और उसमें बीज बोता है। उस खेत को यदि समय पर तैयार न किया जाए तो फसल के लिए बीज नहीं हो सकते। कभी-कभी दुर्भाग्यवश वर्षा नहीं होती तो फसल तबाह हो जाती है। उससे किसान का नुकसान तो होता ही है और साथ ही देश में खाद्यान्न का अभाव भी हो जाता है। उस स्थिति में महंगाई बढ़ जाती है। जनता में त्राहि-त्राहि मच जाती है।
            इसी प्रकार यदि बच्चों को समय रहते संस्कार न दिए जाएँ तो वे बिगड़ जाते हैं। इसलिए समाज उन माता-पिता का तिरस्कार करता है। ऐसे संस्कारहीन बच्चे भी अपने माता-पिता के लिए भी जीवन भर का अभिशाप बन जाते हैं। समाज में कभी उन्हें यथोचित सम्मान भी नहीं मिलता। ऐसे बच्चों को कोई बन्धु-बान्धव अपने घर बुलाना पसन्द नहीं करते। उनके मित्र उनके साथ खेलना नहीं चाहते। वे उनसे किनारा कर लेते हैं। ऐसे संस्कार हीन बच्चे अलग-थलग पड़ जाते हैं।
           अच्छे संस्कारों से वंचित रहने वाले बच्चे हठी, मनमानी करने वाले, उद्दण्ड और छोटे-बड़े किसी का लिहाज न करने वाले होते हैं। ऐसे बच्चों को कोई भी पसन्द नहीं करता। उनसे दोस्ती करना भी बुरा माना जाता है। अपने घर में भी उन्हें कोई बुलाना नहीं चाहता। इसका कारण लोगों के मन में एक डर रहता है कि वे उनके घर पर आकर तोड़फोड़ या उठापटक करेंगे। उसे अस्त-व्यस्त कर देंगे और मना करने पर वे सभी लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करेंगे जिसका कुप्रभाव उनके अपने बच्चों पर पड़ सकता है।
           अपने बच्चों को सद्संस्कार देना हर माता-पिता का नैतिक कर्त्तव्य होता है। यदि अपने अहंकारवश अथवा आपसी वैमनस्य के कारण इस महत्त्वपूर्ण दायित्व को निभाने से वे चूक जाते हैं तो अपने और अपने बच्चों के दुर्भाग्य के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार कहलाते हैं। शायद उस समय वे चेत जाऍं और दूसरों को सही सुझाव देने का कार्य कर सकें। हो सकता है उनके इस प्रयास से कुछ बच्चों का भविष्य संवर‌ जाए।
            ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों को किसी भी कारण से संस्कार देने में चूक जाते हैं, वे अपने बच्चों का जीवन बर्बाद करने के लिए वास्तव में उनके शत्रु कहलाते हैं। बड़े होकर ये बच्चे जब उन्हें दोष देते हैं तब उन्हें अपार कष्ट होता है। उस समय अपने उन ऐसे बच्चों को दोष देते रहना अथवा दुत्कारना समझदारी नहीं कहलाती। समय रहते यदि सावधानी बरती होती तो बाद में पश्चाताप करने की आवश्यकता न पड़ती। समय बीत जाने पर सब व्यर्थ होता है।
          एक ही कार्य हो सकता है चाहे तो बच्चों को संस्कारी बनाकर घर, परिवार, समाज और देश का सबल स्तम्भ बनाएँ अथवा अपने सुख-आराम को सर्वोपरि मानकर बच्चों संस्कार न देकर उनका भविष्य बिगाड़ दें। बच्चे चाहे कहें या न कहें पर घर में होने वाली सभी गतिविधियों को वे बड़ी बारीकी से देखते हैं। उन सबका असर भी बच्चों के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है, इसका प्रभाव उन पर आजीवन रहता है। उसी के अनुरूप वे सबके बारे में अपनी राय बना लेते हैं। घर के सभी सदस्यों को छोटों और बड़ों के साथ मर्यादित व्यवहार करना चाहिए। यह भी संस्कार ही कहलाता है।
          ‌‌  संस्कार कोई ऐसा खिलौना नहीं है जिसे धन के मद में चूर माता-पिता बाजार से खरीदकर बच्चे को सौंप सकें। उसके लिए माता और पिता को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उन्हें तथा परिवार के अन्य सदस्यों को अपने आचार-व्यवहार की शुद्धता पर ध्यान देना पड़ता है तब जाकर उनके बच्चे संस्कारवान बनते हैं। यही बच्चे बड़े होकर समाज में अपने माता-पिता का नाम रौशन करते हैं। ये बच्चे ही देश और समाज की वास्तविक धरोहर होते हैं। इन पर सब लोग गर्व करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 21 मार्च 2026

मन की सोच के अनुसार संसार

मन की सोच के अनुसार संसार 

मानव मन की सोच जैसी होती है, उसे यह संसार वैसा ही दिखाई देता है। यदि उसकी सोच का दायरा विस्तृत होगा यानी वह अच्छी, भली अथवा सुन्दर होगी तो उसे सारा संसार अच्छा, भला और सुन्दर नजर आएगा। उस समय उसे सारी प्रकृति मनोरम दिखाई देती है। नदियॉं, पर्वत, झरने, आकाश, पृथ्वी और सागर आदि सभी उसे लुभावने लगते हैं। वह इन सबमें खोकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहता है। वह मन से प्राणिमात्र से प्यार करता है। किसी के भी प्रति अपने मन में दुर्भावना नहीं रखता।
           दूसरी ओर जब उसके मन के भाव विपरीत होते हैं, उस समय उसे सब बदरंग दिखाई देने लगता है। उसे चारों ओर की खूबसूरती में अच्छाई कम और बुराई अधिक दिखाई देती है। उस समय उसे यह संसार बिल्कुल भी रहने लायक प्रतीत नहीं होता। उसे ऐसा लगता है जैसे सारा संसार उस पर हंस रहा है, व्यंग्य कर रहा है। प्रकृति उसके जीवन को कोई आनन्द नहीं दे पाती। अपने बन्धु-बान्धवों को स्वार्थी कहकर वह उनसे किनारा करने लगता है। यानी उसे कुछ भी नहीं सुहाता।
        मनुष्य के मन में जब खुशी अथवा उल्लास होता है तब वह चाहता है कि हर व्यक्ति उसके साथ उसकी खुशी बाँटे और उसकी खुशी में शामिल हो। उस समय वह अपने परिजनों से घिरा रहना चाहता है। तब उसे सारी कायनात अपनी तरह प्रसन्न होती हुई प्रतीत होती है। उसे लगता है कि सारी प्रकृति उसका साथ दे रही है, उसकी खुशियों में शामिल हो रही है। वह उसके साथ रो रही है, हँस रही है, नाच-गा रही है अथवा चारों ओर अपनी खुशबू बिखेर रही है। 
      इसके विपरीत जब मनुष्य का मन दुखों और परेशानियों से घिरा होता है तो उसे लगता है कि सारा जमाना उसका दुश्मन हो गया है। ईश्वर भी उससे नाराज होकर परेशान कर रहा है। उससे उसकी खुशी देखी नहीं जाती। इसलिए वह उसे दुखी ही दुख दे रहा है। तब सारी प्रकृति उसे उदास और बदरंग दिखाई देने लगती है। उस समय उसे ऐसा लगता है मानो उसके साथ ही वह उत्साह से रहित निर्जीव-सी हो गई है। उसके मन में जीवन के प्रति मोह ही नहीं रह जाता।
      मनुष्य के मन में जब ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि भाव अपना बसेरा कर लेते हैं तो उसे चारों ओर नफरत का व्यापार होता दिखाई देता है। तब उसे लगने लगता है कि आपसी भाईचारा, प्यार, मुहब्बत सब खत्म हो गया है और सभी एक-दूसरे की टाँग खींचने में लगे हुए हैं। इस संसार में परस्पर नफरत के कारण कोई भी किसी को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता, सबका खून सफेद हो गया है। उसके मन में अनजाना-सा भय व्याप्त होने लगता है। यह स्थिति वास्तव में भयावह होती है।
        मन में क्रोध की अधिकता हो जाने पर मनुष्य इस दुनिया को आग लगा देना चाहता है। किसी की शक्ल नहीं देखना चाहता। इस दुनिया को छोड़कर कहीं भाग जाना चाहता है। परन्तु जब उसके मन में प्यार का भाव आता है तब सभी उसे अपने लगने लगते हैं। उसे लगता है यह संसार मानो प्यार का सागर है जिसमें नहाकर सभी सराबोर हो रहे हैं। सब कुछ अच्छा और भला प्रतीत होता है। वह स्वयं भी सबसे प्रेम से मिल-जुलकर रहना चाहता है।
        चोर को सभी लोग चोर दिखते हैं। हेराफेरी व चालबाजी करने वाले को सभी हेराफेरी करने वाले और चालबाज दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचारी, चोरबाजारी करने वाले को सब भ्रष्ट लगते हैं। इसके विपरीत सरल व सहज स्वभाव वालों को सभी सरल और सीधे लगते हैं। सज्जनों  को सब सज्जन लगते हैं और मूर्खों को सब मूर्ख। पागल पूरी दुनिया को ही पागल समझते हैं। वीरों के लिए सभी वीर होते हैं और कायरों के लिए सब कायर होते हैं। सच्चे लोगों को सब सच्चे और झूठों को सब झूठे लगते हैं। इसीलिए असत्यवादी किसी पर विश्वास नहीं करते।
      रैदास जी ने कहा था-
      मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मन शुद्ध पवित्र हो तो उनके पास जो कठौती है, उसमें रखा हुआ पानी गंगाजल हो सकता है।
      तुलसीदास जी ने भी मन के इन्हीं  भावों के विषय में कहा था-
  जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अर्थात् जैसी मनुष्य की भावना होती है, उसे ईश्वर उसी रूप में दिखाई देता है।
        तुलसीदास जी के कथन के अनुसार यदि हम विश्लेषण करें तो मनुष्य के मन के भावों के अनुसार ही उसे संसार और संसार के लोग दिखाई देते हैं।
        इन सबसे अलग हटकर अन्य जीवों के विषय में देखें तो कह सकते हैं कि पशु-पक्षी आदि अन्य जीव भी प्रेम, घृणा और हिंसा की भावना को समझते हैं। प्रेम की बदौलत शेर जैसे खूँखार जानवर, हाथी जैसे शक्तिशाली जीव और साँप जैसे जहरीले प्राणी पालतू बनाए जा सकते हैं।
        साररूप में हम यही कह सकते हैं कि हमारे मन के भावों का बहुत गहरा प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के ऊपर पड़ता है। फिर वह उसी के अनुसार ही व्यवहार करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र के इस पावन पर्व में हम माँ दुर्गा के नौ रूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्धमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं।
        हाँ, यहाँ तान्त्रिकों की तन्त्र साधना के विषय में चर्चा करना हमारा उद्देश्य नहीं है जो इन दिनों श्मशान में जाकर साधना करते हैं और फिर अपनी मनचाही सिद्धियाँ प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। फिर उनके अनुरूप कार्य करते हैं।
           प्रश्न यह उठता है कि अपने जीवन में इन रूपों को ढालने की हमने कभी कोशिश की है क्या? मात्र नौ दिन माँ की पूजा करके हम अपने सभी कर्त्तव्यों से मुक्त हो पाएँगे क्या? दुष्टों का दलन करने वाली माँ के इस बलिदान को क्या हम यूँ ही व्यर्थ में गॅंवा देंगे?
            इन प्रश्नों का सीधा-सा उत्तर है नहीं। केवल कथन मात्र से समस्याओं का अन्त नहीं होगा। जब तक हम माँ के इन रूपों को अपने में आत्मसात नहीं करेंगे अथवा उन पर आचरण नहीं करेंगे तब तक सब अधूरा ही रहेगा। केवल कहने मात्र से बात नहीं बनती। उसे जीवन में क्रियान्वित करना पड़ता है। तभी वास्तव में हम मॉं के इन रूपों के अनुसार जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
          माँ दुर्गा ने संसार की भलाई करने के लिए कठोर कदम उठाया था। अपना सुख-चैन सब छोड़कर उसने उन असुरों से युद्ध करने की ठानी थी। उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करके माँ ने हम सबके समक्ष एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था। माँ भगवती ने जनसाधारण की भलाई के लिए दुष्टों का संहार करके हमें चमत्कृत किया हैं।
          उस सबके विषय में बस किस्से-कहानियों की तरह पढ़कर हम चटखारे नहीं ले सकते। उसकी शूरवीरता को हमें अपने अन्तस् में अनुभव करना होगा। उचित समय आने पर उसी तरह आचरण भी करना होगा। समाज में दुष्प्रवृत्ति के लोगों का संहार तो हम नहीं कर सकते परन्तु उनके कुकृत्यों के लिए न्याय व्यवस्था का सहारा लेकर उन्हें दण्ड अवश्य दिलवा सकते हैं। यह हमारा मौलिक दायित्व भी है और उसे निभाना चाहिए।
          आज मैं अपनी सभी बहनों से आग्रह करना चाहती हूँ कि एक माँ के सभी करुणा, कोमलता, दयालुता आदि गुणों के साथ-साथ माँ दुर्गा के वीरता और दुष्टदलन वाले गुणों को आगे बढ़कर अपनाएँ। इस प्रकार करके हर प्रकार के अत्याचार का मुँहतोड़ जवाब देने की सामर्थ्य माँ स्वयं ही हम सबको देगी।
            माँ दुर्गा के सभी अस्त्रों-शस्त्रों यानी त्रिशूल, शंख, तलवार, धनुष-बाण, चक्र, गदा आदि  का प्रयोग करते समय साम, दाम, दण्ड और भेद का सहारा लेने में किंचित भी हिचकिचाना नहीं है। तभी हम मॉं के सच्चे भक्त कहला सकेंगे।
           हमें स्वयं ही अपने मनोबल को ऊपर उठाते हुए स्वेच्छा से यह प्रण लेना होगा कि माँ दुर्गा की तरह बुराई के कारण को जड़ से उखाड़कर हमें फैंकना है। तभी नवरात्र को मनाने की सार्थकता है अन्यथा अन्य रस्मों अथवा उत्सवों की तरह यह पूजन भी मात्र एक दिखावे की रस्म बनकर निरर्थक रह जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 मार्च 2026

महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह

महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह

सज्जनों या महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह होता है। वे अपना सब सुख-चैन किनारे करके दिन-रात दूसरों के जीवन में प्रकाश करते रहते हैं। किसी के जीवन को प्रकाशित करने वाला मनुष्य हमेशा महान कहलाता है।
          दीपक सदा अन्धकार को दूर करके प्रकाश देता है। ऐसा करके दीपक को तो कुछ नहीं मिलता। उसका जलना उसकी प्रकृति है जो महत्त्वपूर्ण होती है। कितने भी आँधी-तूफान आ जाएँ, दीपक की लौ थरथरा सकती है परन्तु वह बुझती नहीं है। स्वयं कष्ट सहन करके भी वह दूसरों का हित साधता है और प्रकाश देता है। यही उस छोटे से दीपक की विशेषता होती है जो उसे अन्य सभी से विशेष बना देती है।
            छोटे से दीपक का जीवन इसलिए महान अथवा पूज्य नहीं होता कि वह जलता रहता है अपितु वह इसलिए वन्दनीय होता है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए जलता है। ऐसा कार्य कोई विरला ही कर सकता हैं। अपनी जलने की पीड़ा को अनदेखा करते हुए वह मनुष्यों पर महान परोपकार करता है।
             सोचने की बात यह है कि दीपक जैसी छोटी-सी वस्तु जब ऐसा महान कार्य कर सकती है तो हम मनुष्य क्यों पीछे रह जाते हैं? 
            इसका कारण है हमारा स्वार्थ। वह हमें अपना कदम पीछे लौटा ले जाने के लिए विवश कर देता है। हम अपने घर-परिवार तक सीमित होते जा रहे हैं। हमारी संवेदनाएँ शायद शून्य होती जा रही हैं। बहुधा अपनी समस्याओं के चलते चाहकर भी हम दूसरों के बारे में सोच नहीं पाते। इसीलिए हम जरूरतमन्दों का सान्त्वना नहीं दे पाते और उनकी सहायता नहीं कर पाते।
          परोपकारी जीव अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को अनदेखा करके भी दूसरों के प्रति चिन्तित रहते हैं, उनके कष्टों को दूर करने का उपाय करते रहते हैं। जहाँ तक हो सके उनका सम्बल बनने का प्रयास करते हैं। उनका एकमात्र ध्येय होता है, दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव रखना। उनके कष्टों और परेशानियों का यथासम्भव निदान करना‌ होता है।
            परोपकारी सज्जन जो भी इस ब्रह्माण्ड से लेते है, बादलों की तरह उसे समाज की भलाई के कार्यो में लगा देते हैं। उनके अपने पास कुछ बचे या नहीं, वे अपने इस महान उद्देश्य से पीछे नहीं हटते। तन, मन और धन से वह माता प्रकृति की तरह सभी जीवों पर उपकार करते हैं।
           इनके पास जो भी व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आते हैं, उसका समाधान निकालकर उनकी सहायता करते हैं। ये सभी के विश्वासपात्र होते हैं। कैसी भी समस्या व्यक्ति के जीवन में आ जाए,  इनके साथ बिना हिचकिचाए साझा की जा सकती है। इनका हृदय इतना विशाल और गम्भीर होता है कि वे अपने भीतर सागर की तरह सब कुछ समेट लेते हैं। किसी के भी रहस्य को दूसरों के समक्ष किसी भी स्थिति में चटखारे लेकर न सुनाना उनका स्वभाव होता है।
            उनके साथ कोई कैसा भी व्यवहार क्यों न करे, वे किसी का भी तिरस्कार नहीं करते हैं। वे अपने अथवा पराए सभी लोगों का खुले दिल से स्वागत करते हैं। इसका कारण है कि उनकी नजर में कोई भी पराया नहीं होता। वे प्राणिमात्र को अपना समझते हैं। 
            हर रिश्ते का सम्मान करना उनका स्वभाव होता है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, रंग-रूप, जात-पात आदि किसी भी कारण से भेदभाव करना उनकी प्रकृति में नहीं होता। वे सभी के साथ समानता और अपनेपन का व्यवहार करते हैं। किसी का अहित करने के विषय में वे स्वप्न में भी नहीं सोचते। 
            महापुरुषों का जीवन संघर्ष, त्याग, तपस्या और जन-कल्याण का एक आदर्श स्तम्भ होता है। वे अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों से ऊपर उठकर समाज, देश और मानवता के लिए अपना जीवन जीते हैं। उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बनते हैं। उनका सादा जीवन, उच्च विचार और निष्काम सेवा का प्रतीक होता है। 
            महापुरुषों के चरित्र पढ़ना चाहिए और उसका मनन करना करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो सके उनसे शिक्षा ग्रहण करके उन पर अमल करना चाहिए। जन साधारण के लिये उन्नति तथा कल्याण का एक सहज साधन होता है। जिस देश में महापुरुषों का मान नहीं किया जाता उसे मृत प्रायः समझना चाहिए। महापुरुषों के चरित्र और कार्य ही हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक होते हैं।
            ऐसे महत् जन ही संसार के दीपक होते हैं। सबका हित साधने वाले महापुरुष देश, धर्म और समाज के अमूल्य रत्न होते हैं जो इतिहास में अमर हो जाते हैं। युगों तक उनकी चर्चाएँ होती रहती हैं। इन्हें सहेजकर रखना सबका दायित्व होता है। जिस मार्ग पर ये चलते हैं, वही आने वाली पीढ़ियों का रास्ता बन जाता है। उस पथ का अनुसरण करके अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद