कुछ रह तो नहीं गया?
हम मनुष्य हैं और यदा कदा गलती कर ही बैठते हैं। फिर बाद में पछताना पड़ता है। इसलिए बार-बार सोचते रहते हैं, चेक करते रहते हैं कि कुछ रह तो नहीं गया? कुछ पीछे छूट तो नहीं गया? अथवा कोई गलती तो नहीं हो गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हम सभी को जीवन के हर मोड़ पर चलते हुए हमेशा परेशान करते रहते हैं। यदि विचार किया जाए तो हम दिन में न जाने कितनी बार इन प्रश्नों से दो-चार होते रहते हैं।
छोटे बच्चे को आया के पास अथवा क्रच में छोड़कर नौकरी पर जाने वाली माँ दस बार अपना और बच्चे का सामान चैक करती है और बार-बार यही सोचती है कि कुछ रह तो नहीं गया? यदि यहाँ कुछ छूट गया तो फिर दिनभर बच्चे के लिए परेशानी हो जाएगी। मॉं अपने बच्चे को कभी भी परेशान होते हुए नहीं देख सकती। इसलिए वह पूरी तैयारी करती है।
रसोई में खाना बनाकर निकलने से पहले सब कुछ सम्हालने और गैस बन्द कर देने के बाद गृहिणी जब कमरे में आकर बैठ जाती है। उस समय उसके मन में आशंका उठती है कि मैंने गैस बन्द कर दिया था क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि सब्जी जल जाए और परेशानी हो जाए?
किसी भी कारण से घर से बाहर निकलने वाले हम सभी अपने पर्स, गाड़ी की चाबी, घर की चाबी आदि रख लेने के बाद फिर इन चीजों को जाँचते रहते हैं कि उन्हें रख लिया या नहीं? समस्या तब आती है कि जब भागमभाग कुछ छूट जाता है तो बाहर जाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसी तरह घर के सारे स्विच तथा ताले बार-बार चैक कर लेते हैं। फिर भी मन के किसी कोने में एक अनजाना-सा डर बना रहता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? यदि कुछ छूट जाएगा तो फिर बहुत झंझट हो जाएगा।
शादी में दुल्हन को बिदा करने के बाद दुल्हन के माता-पिता घर के सभी सदस्यों से कहते हैं कि अपना सामान अच्छे से देख लो, कुछ रह तो नहीं गया न? कहीं घर जाने पर कोई परेशानी न हो जाए? वहाँ कुछ छूटे-न-छूटे पर बचपन से आज तक जिस नाम वे अपनी बेटी को पुकारते थे, वह नाम पीछे रह जाता है। जब भी लाडली बिटिया को याद करेंगे उनकी आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहेंगे। बेटी की बचपन से अब तक की यादें, उसका रूठना-मानना यानी कि उसकी हर बात माता-पिता के हृदयों में याद बनकर पीछे रह जाती है।
माता-पिता, बहन-भाई अपनी जुबान से चाहे कुछ न बोलें परन्तु उनके दिल में एक कसक तो रह ही जाती है। विदा होते समय दुल्हन का मन भी यही कहता है कि सब कुछ तो यहीं छूट गया। अपने नाम के आगे गर्व से जो सरनेम लगाती थी वह भी पीछे छूट गया। उस घर से उसका नाता छूट रहा है। माता-पिता का प्यार, उनसे की जाने वाली जिद, सखी-सहेलियाँ और बाबुल का आँगन सब पीछे छूट रहे हैं।
इन्सान बड़ी हसरत से अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजता है और वे पढ़कर वहीं सैटल हो जाते हैं। उनसे मिलने के लिए बड़ी ही मुश्किल से उन्हें अधिकतम छह महीने का वीजा मिला पाता है। वापिस लौटते समय जब बच्चे पूछते हैं कि सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया? उस समय बच्चों से बिछुड़ते समय सब तो वहीं छूट जाता है। ऐसा लगता है मानो हृदय की गहराइयों से कुछ-कुछ छीजता जा रहा है। इससे अधिक और छूटने के लिए क्या बचा रह जाता है?
साठ वर्ष पूर्ण करने के उपरान्त जब सेवानिवृत्ति की शाम जब दोस्त याद दिलाते हैं कि सब चेक कर लो, कुछ रह तो नही गया। तब मन में एक टीस उठती है कि सारी जिन्दगी तो यहीं आने-जाने में बीत गई, अब क्या रह गया होगा? उस समय मन उदास हो जाता है।
किसी अपने बन्धु-बान्धव की अन्तिम यात्रा के समय शमशान में उसका संस्कार करके लौटते समय लगता है कि कुछ छोड़कर जा रहे हैं। एक बार पीछे देखने पर चिता की सुलगती आग को देखकर मन भर आता है। अपने से वियोग के समय उससे पुनः न मिल पाने की पीड़ा में सब पीछे रह जाता है। भरी आँखों से इन्सान कुछ बोल तो नहीं पाता पर कुछ तो पीछे छूट जाता है। उस प्रिय की वे यादें उसके अन्तस् में सदा उसके साथ रहती हैं। ये यादें यदा कदा उसके दिल में टीस दे देती हैं।
आत्मचिन्तन करना हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है। हमें अपने पूरे जीवन में झाँकना चाहिए। यह जानकारी लेने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसा तो नहीं है कि कुछ पीछे छूट रहा हो? जिसे हम अपने साथ लेकर चल सकते थे। इस मलाल को जीवन भर ढोने के बजाय समय रहते यदि ध्यान दे दिया जाए तो उचित होता है, बाद में तो बस हमारे मन में पश्चाताप ही शेष बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद