बुधवार, 26 अगस्त 2026

क्रोध में कोई अहं फैसला न लें

क्रोध में कोई अहं फैसला न लें

मनुष्य जब क्रोध में हो तब उस समय उसे कोई अहं फैसला नहीं लेना चाहिए। मनीषी कहते हैं कि क्रोध अन्धा होता है, वह मनुष्य के विवेक का हरण कर लेता है। तब वह कुछ भी सोचने-समझने के काबिल नहीं रहता। उस समय वह अपने-पराए का भेद करने में असमर्थ हो जाता है। 
          अतः क्रोध और अहंकार में लिया गया मनुष्य का फैसला अक्सर जीवनभर के पछतावे का कारण बनता है। गुस्से के समय मनुष्य की विवेक शक्ति कम हो जाती है जिससे सही और गलत का फर्क मिट जाता है। यानी गुस्से में दिमाग की स्पष्टता खत्म हो जाती है और गलत फैसले हो जाते हैं। गुस्से में निकले कड़वे शब्द अपनों को दूर कर देते हैं। आवेग में उठाया गया कदम बाद में भारी दुख देता है। इसलिए आवेश में आकर कोई भी बड़ा कदम उठाने से बचना चाहिए। 
          उस क्रोध की अधिकता के समय लिया गया कोई भी निर्णय मनुष्य के विरुद्ध जा सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण लिए गए अपने उस निर्णय के कारण फिर उसे जीवन भर प्रायश्चित करना पड़ सकता है। यह स्थिति मनुष्य के लिए अपरिहार्य बन जाती है जो उसके अवसाद का कारण बन जाता है। 
          इसी प्रकार जब मनुष्य किसी विशेष उपलब्धि अथवा किसी कारण से प्रसन्न हो तब उसे किसी से कोई वादा नहीं करना चाहिए। अधिक खुशी में इन्सान के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। तब ऐसा लगता है कि मानो उसे पंख मिल गए हैं और वह उड़ता फिरता है। उस समय भावना में बहकर किया गया वही वादा ही उसके जी का जंजाल बन जाता है। 
          रामायणकाल में महाराजा दशरथ की अन्तकाल में हुई दुर्दशा को आज तक स्मरण किया जाता है। इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि सोच-समझकर वादा करने वाले को कभी किसी के सामने नीचा नहीं देखना पड़ता। न ही उन्हें किसी के समक्ष नजरें नहीं झुकाकर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। इस घटना से मनुष्य को शिक्षा लेनी चाहिए।
          यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से क्रोध दिलाना चाहे तो उसके झाँसे में नहीं आना चाहिए। यदि वह अपने उद्देश्य यानी गुस्सा दिलाने मे सफल रहता हैं तो निश्चित मानिए कि वह व्यक्ति विशेष उसके हाथ की कठपुतली बनता जा रहा है। वह जब चाहे उसे नाच नचा सकता है। फिर वह नैतिक-अनैतिक कोई भी अपना मनचाहा कार्य उससे करवा सकता है।
          क्रोध और प्रसन्नता मानव मन की दो अवस्थाएँ हैं। क्रोध में मनुष्य को अपना आपा नहीं खोना चाहिए, होश में रहना चाहिए। क्रोध के कारण दुर्वासा ऋषि को आजतक सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। इसी क्रोध के कारण ही मनुष्य के मन में प्रतिशोध लेने की दुर्भावना बलवती होने लगती है। 
          इस भावातिरेक में वह अपना विरोध करने वाले किसी का भी कत्ल तक कर बैठता है और फिर कानून का मुजरिम बनकर सारी जिन्दगी सलाखों के पीछे बिता देता है। उसके घर-परिवार के लोग और उसके भाई-बन्धु उससे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। जिनके लिए वह अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देता है, वही उस कृत्य के लिए उसकी भर्त्सना करते हुए नहीं थकते।
        प्रसन्नता भी मनुष्य के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है। बहुत से लोग होते हैं जिन्हें खुशी भी रास नहीं आती। इन खुशी के पलों में उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे पतंग की तरह ऊँचे उड़ने लगते हैं और सोचते हैं कि उनकी डोर को कोई काटने का साहस नहीं कर सकता।
          दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब मनुष्य गुब्बारे की तरह फूलकर कुप्पा हो जाता है तब वह भूल जाता है कि कोई अपना ही उसमें पिन चुभोकर उन्हें धराशाही कर देगा और वे केवल देखता ही रह जाएगा, कुछ कर नहीं पाएगा।
        इस प्रसन्नता के आवेग में भी गलत फैसले ले लिए जाते हैं जो निकट भविष्य में जी का जंजाल बन जाते हैं। उस समय मनुष्य भूल जाता है कि उसकी यह खुशी ही उसके दुःख का कारण बन जाती है और वह मूक दर्शक बना बस हाथ मलता रह जाता है, कोई उपाय करने के लिए उसकी बुद्धि नाकाम हो जाती है।
         क्रोध आने की स्थिति में कुछ देर रुक जाना  चाहिए। लम्बी सॉंस लेनी चाहिए। उस परिस्थिति या व्यक्ति से कुछ पलों के लिए दूर हो जाना चाहिए। क्रोध शान्त होने तक किसी भी तरह की प्रतिक्रिया या बहस से मनुष्य को बचना चाहिए।
          मनुष्य के जीवन में क्रोध का आवेग हो अथवा प्रसन्नता का अतिरेक हो दोनों ही स्थितियों में उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। क्रोध यमराज का दूसरा रूप होता है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। अति प्रसन्नता भी विनाश का कारण बनती है। इसलिए दोनों की अति से यत्नपूर्वक बचना चाहिए, इसी में समझदारी और सबका कल्याण है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

संयुक्त परिवार और एकल परिवार के बच्चे

संयुक्त परिवार और एकल परिवार के बच्चे 

कुछ दशक पूर्व हमारे भारत देश में जब संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलन में थी तब घर-परिवार के सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। सबके सुख-दुःख साझा होते थे और आपसी सौहार्द और भाईचारे के चलते वे सरलता से कट जाया करते थे। इसी प्रकार शादी-ब्याह आदि सभी शुभकार्य और त्यौहार भी भरपूर मस्ती से, आनन्द से मनाए जाते थे।
         संयुक्त परिवार और एकल परिवार दोनों में बच्चों का विकास अलग तरह से होता है। संयुक्त परिवार में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और चचेरे भाइयों का साथ मिलता है जिससे वे जल्दी मिलनसार बनते हैं। वहीं, एकल परिवार में माता-पिता का पूरा ध्यान मिलने से बच्चे अधिक स्वतन्त्र और आत्मविश्वासी होते हैं। 
         संयुक्त परिवारों की संख्या कम होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आज अधिकांश लोग रोजगार, व्यवसाय, शिक्षा या अन्य कारणों से अलग-अलग शहरों में रहने लगे हैं। बड़ी संख्या में लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। इसके कारण सभी सदस्यों का एक ही स्थान पर रहना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।
          आधुनिक संचार और परिवहन सुविधाओं ने भी संयुक्त परिवार की आवश्यकता को काफी हद तक कम कर दिया है। मोबाइल, संचार, इंटरनेट, वीडियो कॉल तथा बेहतर सड़क, रेल और हवाई यात्रा जैसी सुविधाओं के कारण परिवार के सदस्यों से सम्पर्क बनाए रखना और सप्ताहान्त में उनसे मिलकर वापस आना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है।
        आज के समय की तरह बेशक बहुत अधिक लोग तब पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, फिर भी परिवार एक सूत्र में बंधा हुआ होता था। आज की पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपने योग्य होने के अहं का शिकार हो रही है। वे मात्र अपने स्वार्थ पूर्ण करना चाहते हैं। उन्हें उससे आगे कुछ सूझता ही नहीं है।
          शायद युवावर्ग के इस स्वार्थी रवैये के कारण ही संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। उनके स्थान पर विदेशों की नकल करते हुए एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इन एकल परिवारों की ऊपरी चमक-दमक मन को अवश्य ही ललचाती  है। यह भी लगता है कि हम स्वतन्त्र हैं और जैसा चाहें अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं। किसी का कोई बन्धन नहीं है, न ही कोई रोकटोक है। 
          यह आजादी लगती तो बहुत अच्छी है परन्तु उससे होने वाली परेशानियाँ कहीं अधिक होती हैं। संयुक्त परिवारों के होते हुए किसी माता-पिता को अपने बच्चों की खाने-पीने, आराम करने, खेलने आदि की  चिन्ता नहीं रहती है। 
        माता-पिता अपना सारा ध्यान अपने कार्य पर लगा सकते हैं। जहाँ बड़े भाई-बहन होते हैं वहाँ बच्चों की गृहकार्य और पढ़ाई की चिन्ता भी समाप्त हो जाती है। लड़ते-झगड़ते बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता भी नहीं चलता। इन परिवारों के बच्चों को परस्पर मिलकर रहना, दूसरों को सहन करना, मिल-बाँटकर खाना, दूसरों के साथ सामञ्जस्य स्थापित करना आदि गुण बड़ों की देखादेखी अपने आप आ जाते हैं।
         जबकि एकल परिवार के बच्चे अत्यधिक ध्यान दिए जाने के कारण असहिष्णु, जिद्दी और नकचड़े हो जाते हैं। प्रायः उन बच्चों को किसी से भी मिलना पसन्द नहीं आता। यदि दो दिन के लिए भी मेहमान घर आ जाएँ तो वे परेशान हो जाते हैं। इसलिए वे किसी पार्टी या रिश्तेदारी में जाना नहीं चाहते। उन्हें सिर्फ अपने से मतलब होता है किसी दूसरे से नहीं।
        संयुक्त परिवार में रहते हुए घर में ताला लगाकर जाने की आवश्यकता नहीं होती। कहीं जाना हो तो बच्चों को घर पर छोड़ देने पर भी उनकी चिंता से मुक्त रहा जा सकता है। ऐसे परिवार हर दृष्टि से सुरक्षित होते हैं। कहते हैं- ‘एकता में बल होता है।’
        जिस तरह बच्चों की परवरिश संयुक्त परिवार में सरलता हो जाती है उसी प्रकार घर में बीमार व्यक्ति की तीमारदारी, बड़े- बुजुर्गों की देखभाल, आने वाले अतिथियों का स्वागत सत्कार, घर में किसी सदस्य के साथ कोई अनहोनी घटना का घट जाना आदि के समय सभी परिवारी जनों के सहयोग से इनका निभाव सरलता से हो जाता है। किसी एक को सारा समय खटना नहीं पड़ता। 
        एकल परिवार में रहते हुए यह सारी समस्याएँ सुलझाने में बहुत कठिनाई होती है। सबसे बड़ी बच्चों की चिन्ता सताती रहती है। जितनी अधिक बाजुएँ होंगीं, कार्य उसी अनुपात में होगा। वैसे आज का युवा अपना भला-बुरा अच्छी तरह समझता है। इसलिए वे संयुक्त परिवार की ओर लौट रहा है।
        हाँ, जो युवा रोजी-रोटी के चक्कर में घर से दूर रहते हैं, उनकी बात अलग है। वहाँ दूरी से अधिक उनकी मजबूरी होती है जिसके लिए उन्हें सदा कोसते नहीं रहना उचित नहीं होता।
          जहाँ तक सम्भव हो सके अपने निजी स्वार्थो और झूठे अहं को आड़े नहीं आने देना चाहिए । मनुष्य को परिवार का सुरक्षा कवच अपनाना चाहिए। इस प्रक्रिया में यदि अपने मन को मारकर बच्चों की सुरक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए समझौता भी करना पड़े तो यह सौदा किसी भी तरह से मँहगा नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 23 अगस्त 2026

माता की ममता और पिता की क्षमता

माता की ममता और पिता की क्षमता

इस असार संसार में दो ही असम्भव काम हैं - पहला है अपनी माता की ममता का मूल्य आँकना और दूसरा है अपने पिता की क्षमता का अनुमान लगा सकना।
       माँ का प्यार निस्वार्थ होता है जो बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। हर दुख और तकलीफ में बच्चा सबसे पहले 'माँ' को ही पुकारता है। माँ की ममता चुपचाप हर दर्द को सहन करके बच्चे को संवारती है। माँ की ममता एक ऐसी शक्ति है जिसका कोई मोल नहीं होता। यह एक ऐसी अनमोल कहानी है जिसमें एक माँ बिना किसी स्वार्थ के अपने बच्चे की खुशी के लिए अपना पूरा जीवन, अपने सपने और अपनी हर खुशी कुर्बान कर देती है। 
          पिता अपनी जी-तोड़ मेहनत और क्षमता से परिवार की हर जरूरत को पूरा करता है। पिता की मौजूदगी बच्चों को बाहर की दुनिया से लड़ने का हौसला और संबल देती है। पिता की क्षमता केवल कमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बच्चों को सही राह दिखाने की ताकत भी है। 
        आज की युवा पीढ़ी यह समझती है कि वह बड़ी हो रही हैं तो उसे समझदार कहलाने का लाइसेंस मिल गया है। परन्तु यह सोच तो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराई जा सकती। बच्चे भूल जाते हैं कि जीवन के जिस पायदान पर वे खड़े हैं उनके माता-पिता उसे पार करके वहाँ से कहीं आगे निकल आए हैं।
        उन्हें शायद अपनी इस बेतुकी सोच पर अधिक गर्व होता है कि वे बहुत योग्य हैं और दुनिया के बाकी सभी लोग उनके सामने हुक्का भरते हैं यानी मूर्ख हैं। यह कथन सर्वथा सत्य है कि पैदा होते ही वे बच्चे अपने बूते पर पूरी तरह से योग्य नहीं बन गए थे। उन्हें योग्यता के सोपानों पर सफलता से चढ़ने की ट्रेनिंग इन्हीं माता-पिता ने दी थी जिनका सम्मान करने में उनकी हेठी होती है।
        बच्चों को सदा यह बात याद रखनी चाहिए कि माता-पिता ने इस संसार में उन्हें जन्म देकर, उन्हें पढ़ा-लिखकर इस योग्य बनाया है कि वे आज सिर उठाकर समाज में जी रहे हैं। जो बच्चे माता-पिता को मान नहीं दे सकते उन्हेँ न समाज क्षमा करता है और न ही ईश्वर। उनकी सारी पूजा-अर्चना भी ईश्वर की दृष्टि में व्यर्थ हो जाती है यदि वे अपने माता-पिता का दिल दुखाते हैं या उनकी अवहेलना करते हैं।
        दुनिया में सिर्फ माता-पिता ही ऐसे हितचिन्तक होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ अपने बच्चों से प्यार करते हैं। माता-पिता बच्चों के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं। वे उनके लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी बच्चों को भूखे नहीं सोने देते। उनके सुख-दुःख को अपना मानते हुए सब स्वयं झेल जाते हैं, उन्हें गर्म हवा तक नहीं लगने देना चाहते।
          उनके लिए सब प्रकार साधन जुटाकर वे प्रसन्न होते हैं। इसलिए उनके प्यार और उनकी ममता की परीक्षा लेने के लिए उन बेचारों का अनावश्यक लाभ नहीं उठाना चाहिए और न ही उसका मोल नहीं लगाना चाहिए।   
        अपनी सफलता का रौब अपने माता-पिता को कभी नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि उन्होनें अपनी जिंदगी को हारकर ही अपनी सन्तान को जिताया होता है। इसीलिए कहा जाता है की जीतने वाले से जिताने वाले का महत्त्व अधिक होता है। 
        जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ो उसी को ही धक्का मरकर गिरा देने वाली प्रवृत्ति से बच्चों को बचना चाहिए। उन्हें अपने लिए बस यही सोचना चाहिए कि जीवन के किसी मोड़ पर यदि उनके साथ ऐसा हो गया तो वे क्या करेंगे?
          समय रहते बच्चों को चेत जाना चाहिए कि माता-पिता से बढ़कर कोई और उनका शुभ चाहने वाला नहीं हो सकता। दुनिया तो स्वार्थ की बुनियाद पर चलती है। मित्रों, सम्बन्धियों, भाई, बन्धुओं से जितना व्यवहार करोगे उतना करवा लोगे। यदि उसमें कभी कुछ कोर-कसर रह गयी अथवा किसी अवसर पर उनका मनचाहा उन्हें न दे सके तो उन सम्बन्धों में दरार आने लगती हैं।
        इसके विपरीत माता-पिता की बादशाही होती है। उनके साथ व्यवहार रखो चाहे न रखो, उनकी तरफ से सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होते। उनका मन भी यदि बच्चे दुखाते हैं तो भी उनके मन से कभी बददुआ नहीं निकलती। वे सदा ही अपने बच्चों को आशीर्वाद देते हैं। इसीलिए शास्त्र उन्हें भगवान मानते हैं और उनकी पूजा करने का परामर्श देते हैं।
          वे बच्चे बड़े अभागे होते हैं जिनके माता-पिता उनके होते हुए दरबदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। दो जून खाने, बीमारी में इलाज के लिए और बच्चों से अपनेपन के अहसास के लिए तरसते हैं। बच्चों के पास चाहे लाखों-करोड़ों हों पर यदि माता-पिता के लिए कुछ नहीं तो सब व्यर्थ है। ऐसे निर्लज्ज और दुष्ट बच्चे ईश्वर किसी को न दे।
          यह बात हमेशा गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि उन्हें जिन्दगी का ककहरा पढ़ाने वाले माता-पिता अपने प्यार में सन्तान से चाहे हर जाएँ किन्तु उन्हें मूर्ख अथवा जाहिल समझने की भूल वे कभी न करें। वे चाहें तो उन्हें नाकों चने चबवा सकते हैं। यदि बच्चों को समाज और घर-परिवार का डर नहीं है तो बैंक उनके बुढ़ापे का सहारा बनने और उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ देने के लिए बाहें फैलाए बैठे हैं। कानून उनकी सुरक्षा करने के लिए हर प्रकार से सन्नद्ध है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 22 अगस्त 2026

धन और खुशियॉं सम्हाल कर रखें

धन और खुशियॉं सम्हाल कर रखें 

मनुष्य को अपनी खुशियों और धन को सदा सम्हालकर रखना चाहिए। मनुष्य को ऐसा लगता है कि खुशियों के पल उसके जीवन में बहुत कम समय के लिए आते हैं। यद्यपि ऐसा नहीं होता। खुशियों के आने पर वह खो जाता है और वे पल हाथ में पकड़े रेत की तरह फिसल‌ जाती है।इन्हें सहेज कर रखना चाहिए, किसी भी मूल्य पर अपने हाथ से इन्हें गँवाना नहीं चाहिए। मनुष्य को अपने व्यवहार और अपनी सोच पर नियन्त्रण रखना चाहिए। 
         यदि कोई व्यक्ति उसकी सत्ता को न मानकर उसे चुनौती देता है तो तब भी उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए। मनुष्य को सदा प्रसन्न रहना चाहिए और अपनी जिन्दगी से निराश नहीं होना चाहिए। जीवन में सफल व्यक्ति कहलाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। परन्तु पैसे को सदा अपनी जेब में रखना चाहिए। उसे अपने मन-मस्तिष्क पर सवार नहीं होने देना चाहिए। यदि ऐसा हो जाता है तो फिर धन के मद में चूर मनुष्य पतन के गर्त में गिरने लगता है।
        यदि मनुष्य इस धन का उपयोग घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने और दान आदि कार्यों में व्यय करता है तो उसका सदुपयोग होता है। उस समय घर आए आगन्तुक का सम्मान करने से उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। हमारे शास्त्र अतिथि को देव मानते हुए कहते हैं -
              अतिथि देवो भव।
       निम्न दोहे में कबीरदास जी कहते हैं -
     साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए।
     मैं भी भूखा न रहूॅं और साधु भूखा न जाए।।
अर्थात् कबीर जी इस दोहे के माध्यम से भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर! मुझे केवल उतना ही धन या अन्न दें जिसमें मेरे पूरे परिवार का पेट भर सके। मुझे बहुत अधिक धन नहीं चाहिए, बस इतना दे दीजिए कि मेरा परिवार भी भूखा न रहे और मेरे द्वार पर आने वाला कोई मेहमान या साधु भी भूखा न लौटे।
        इसके विपरीत यदि यह धन मनुष्य केसिर पर चढ़कर बोलने लगे तो इन्सान का दिमाग खराब होने लगता है। वह अपने बराबर किसी दूसरे को नहीं समझता। उसके बच्चे भी उसकी देखादेखी घमण्डी बनने लगते हैं जो किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। वह हर किसी को देख लेने की धमकी देने लगता है। हर स्थान पर आग लगाने की धमकी देने लगता है। यहाँ तक कि स्वयं को भी खुदा समझने लगता है। ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने से परहेज नहीं करता।
        यहाँ एक बात बताना चाहती हूँ कि मनुष्य अपनी कमाई से गरीब नही होता बल्कि अपनी जरूरतों को बढ़ा लेने से गरीब होता है। जब जक मनुष्य अपनी कामनाओं को असीम बनाता जाता है तब तक वह चैन से नहीं बैठ सकता। यही उसकी परेशानी का कारण बन जाता है। इसलिए वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है।
          इसी भाव को हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि इन्सान अपनी कमाई से अधिक पैर फैलता है तो दुःख-तकलीफों का सामना करता है। यानी वह न चाहते हुए भी कर्जों के बोझ तले दबकर रह सकता है। तब उसकी परेशानियों का चक्र घूमने लगता है और उसका जीवन नरक बन जाता है।
          इस सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक इन्सान के पास पैसा है तभी तक यह दुनिया पूछती है और सम्मान देती है। अन्यथा मिट्टी के मोल भी नहीं पूछती। इसलिए धन-दौलत पर अभिमान करना व्यर्थ है। उसे केवल साधन मानना उचित है, उसे साध्य मान लेने से जीवन में भटकाव होने लगता है। फिर उसके जीवन में स्थिरता नहीं रह पाती।
        जीवन की दूसरी सच्चाई यह है कि माया महाठगिनी और बहुत चंचल है। इस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। इसके खेल बड़े निराले हैं। यह पलक झपकते ही देखते-ही-देखते राजा को रंक बनाकर रुला देती है और रंक को राजा बनाकर उसे मालामाल कर देती है।
          जब लोग हमारी परेशानी होने पर बुराई करते हैं तो निराश नहीं होना चाहिए। पीठ पीछे बुराई करने वालों की कमी नहीं होती। यह मानना चाहिए कि वे कायर हैं, उनमें सामने से आकर कुछ बोलने की सामर्थ्य नहीं है। अतः उन दोगले लोगों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
          दुनिया की परवाह तभी तक करनी चाहिए तब तक वे आपके और आपके सपनों के बीच दीवार बनकर न आएँ। जब तक मनुष्य में सामर्थ्य है, उसे सफलता प्राप्ति के सपनों को साकार कर लेना चाहिए। 
          हर समस्या का समाधान हम दृढ़ प्रतिज्ञ बनकर या डटकर कर तभी कर सकते हैं यदि उसमें हमारी भी सक्रिय भागीदारी होगी। उससे मुँह मोड़कर या पीठ दिखाकर भाग जाने से किसी भी समस्या का निदान कर पाना वास्तव में बहुत असम्भव होता है। 
          दुनिया के सब अनुराग-विराग की परवाह छोड़कर प्रसन्न रहने का अभ्यास कीजिए। अपनी इच्छाओं को समेटते हुए अपनी मेहनत की कमाई में सन्तुष्ट रहने का यत्न कीजिए। यकीन मानिए ईश्वर की कृपा से सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

टूटते तारे से विश मॉंगना

टूटते तारे से विश माँगना

हमारे मन में यह अवधारणा घर कर गई है कि जब टूटता हुआ तारा दिखाई दे तो उसी समय कोई विश माँग लो अथवा कामना करो तो वह पूरी हो जाती है। कहते हैं कि यह टूटता हुआ तारा है जो सब लोगों की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है।‌ लोगों को लगता है कि इस विशेष पल में भगवान उनकी पुकार आसानी से सुन लेता है। शायद यह उम्मीद और सकारात्मक सोच का एक तरीका है। 
         मेरे विचार से इसका कारण शायद यही है कि उसे टूटने और अपने भाई-बन्धुओं से बिछुड़ने का दर्द ज्ञात होता है। तभी तो वह सब लोगों को उनके हिस्से की सारी खुशियाँ देना चाहता है।
            इसके विपरीत विज्ञान के अनुसार यह केवल अन्तरिक्ष में होने वाली एक प्राकृतिक घटना होती  है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वास्तव में कोई तारा टूटता नहीं है। अन्तरिक्ष के धूल और पत्थर के टुकड़े पृथ्वी के वायुमंडल में आते हैं। हवा के साथ रगड़ खाने से इनमें चमक और आग पैदा होती है।
         प्राचीन यूनान के खगोलशास्त्री टॉलेमी ने माना था कि भगवान कभी-कभी आसमान से झॉंकते हैं और तारे नीचे गिर जाते हैं।
        कभी हम किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं और कभी निरुद्देश्य भटकते रहते हैं। जिन्दगी की कड़वी सच्चाई हमें तब ज्ञात होती है जब पेड़ों से टूटकर गिरे हुए फूलों ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि दूसरों को खुशबू देने वाले प्रायः कुचल दिए जाते हैं।
        यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि जो निःस्वार्थ महापुरुष दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहते हैं उन्हें स्वामी दयानन्द की तरह विषपान करना पड़ता है और ईसा की तरह सूली पर चढ़ जाना पड़ता है।फिर भी ये महानुभाव अपने साथ अत्याचार करने वालों को कोई सजा दिए बिना क्षमा करके अपनी सहृदयता और महानता का परिचय देते रहे हैं।
        हमारे परतन्त्र भारत देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलवाने वाले रणबॉंकुरों ने उन विदेशियों के अत्याचारों का विरोध करने के लिए अपनी आहुति दे दी और हंसते-हंसते फॉंसी के फंदे का वरण कर लिया।        
        यदि कोई नजरअंदाज करता है तो निश्चिन्त रहिए, उसका बुरा मत मानिए। इस संसार में जो भी मूल्यवान लोग होते हैं, उन सब हीरों का सम्मान करने की बात यह जनसाधारण नहीं समझ सकता। इसी प्रकार मंहगी वस्तुएँ जो लोगों की पहुँच से बाहर होती हैं, उसे दूर की कौड़ी कहकर वे उन्हें नजरंअदाज कर देते हैं।
        जब अपनी गलती का पता लग जाए उसी समय क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। साथ ही अपने दुष्कमों अथवा दुर्व्यसनों का अविलम्ब त्याग कर देना चाहिए। उसमें की गई देर कष्टदायक होती है। इसके पीछे सार यही है कि हम यात्रा करते हुए जितनी अधिक दूर चले जाते हैं, वापिस लौटने में हमें उतना ही अधिक समय लगता है। 
        इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं है कि इस संसार में दूसरों पर हँसने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं पर हँसते रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा कर पाता है तो दुनिया उसके पीछे-पीछे चलने लगती है। अन्यथा दुखों और परेशानियों के कारण हर समय आँसू बहाते रहने वालों के आँसू सूख जाते हैं। फिर उन आँसुओं को मनुष्य की आँखो में भी जगह नहीं मिल पाती। यानी चाहकर भी व्यक्ति की आँखों में आँसू नहीं आते।
          जो भी अपने साथ अच्छा या बुरा हो रहा है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सन्तोष कर लेना चाहिए। उसके न्याय पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि वह सबसे बड़ा न्यायाधीश है। उसका न्याय बड़ा ही विचित्र होता है। वह स्वयं ही दुनिया में सन्तुलन बनाकर रखता है। 
          सयाने कहते हैं कि जब दाँत थे तो चबाने के लिए दाने खरीदने की सामर्थ्य नहीं थी और अब जब खाने के लिए दाँत नहीं हैं तो मनुष्य के पास दाने खरीदने की हैसियत हो गई है।
         इसी कड़ी में यह उदाहरण भी ले सकते हैं कि जो व्यक्ति हाड़तोड़ परिश्रम करता है और सौ-सौ किलो अनाज के बोरे उठा लेता हैं, उसके पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं होता। इसके विपरीत जो नाजों से, शानो-शौकत में पला-बड़ा है, वह सौ किलो अनाज खरीद सकता है पर उसे उठा नहीं सकता।
        इसलिए कोई भी कार्य करने से पहले मनुष्य को दस बार उसके परिणाम के विषय में सोच लेना चाहिए। इस बार में कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य जैसी करनी करेगा, उसका भुगतान उसे वैसा ही करना पड़ेगा।
          इसीलिए मनीषी हम लोगों को सदैव यह सद् परामर्श देते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन काल में ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु के बाद इन्सान हँसते हुए इस दुनिया से विदा ले सके। समाज के अन्य लोग उसकी अच्छाइयों और सद् गुणों को याद करके रोते रहें।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

संस्कार से बढ़कर कोई दौलत नहीं

संस्कार से बढ़कर कोई दौलत नहीं 

संस्कार से बढ़कर कोई भी और दौलत इस संसार में नहीं हो सकती। जिन लोगों में संस्कार एवं सदाचरण की कमी होती हैं वे लोग ही दूसरे को अपने घर पर बुलाकर अपमानित करने का यत्न करते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति हमें यही शिक्षा देती है कि अतिथि को देवता मानते हुए उसका सदा सम्मान करो।      
            यह शत-प्रतिशत सत्य है कि संस्कारों से बड़ी कोई दौलत नहीं हो सकती। धन-दौलत आज है और कल समाप्त हो सकता है परन्तु मनुष्य के अच्छे संस्कार और उसका अच्छा व्यवहार हमेशा उसके साथ रहते हैं। यानी जीवन काल में भी और उसके इस संसार से विदा लेने के पश्चात भी उसके संस्कारों की प्रशंसा होती है। यही उसकी असली पूंजी है जो उसके जीवन के हर मोड़ पर काम आती है। 
          मनुष्य की पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं होती बल्कि उसके बात करने के ढंग और बड़ों के प्रति आदर से होती है। धन की चोरी हो सकती है पर संस्कारों की दौलत को कोई नहीं चुरा सकता। जब मनुष्य का कठिन समय आता है उस समय उसका धन साथ छोड़े या न छोड़े, उसके अच्छे संस्कार उसे को टूटने नहीं देते। संस्कारी व्यक्ति अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों और समाज में अपना नाम रोशन करता है।
        मनुष्य के जीवन में संस्कारों का अर्थ व्यक्तित्व का शुद्धिकरण और सही आचरण सीखना होता है। ये व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं, उसे सही और गलत का भेद समझाते हैं और समाज का एक अच्छा व जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद करते हैं।संस्कारों से मन और विचारों में अच्छे गुणों का विकास होता है। 
        अगर किसी व्यक्ति को धोखा देने में मनुष्य सफल हो जाता है तो उसे अपनी जीत का जश्न नहीं मानना चाहिए। यदि उसके धोखे का उत्तर ऊपर वाले ने दिया तो वह सहन करना कठिन हो जाता है। मनीषी कहते हैं कि वह प्रभु परम न्यायकारी है। उसके यहाँ हर बुराई का भी फैसला अवश्य होता है। उसकी अदालत में देर तो हो सकती है पर अंधेर कभी नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहने वाला उससे हर तरह की बात करता है। उसकी अच्छाइयों पर शाबाशी देता है और बुराइयों में उसको परामर्श देता है। वह हर मामले पर चर्चा करके विचारों का आदान-प्रदान करता रहता है। इसके विपरीत धोखा देने की प्रवृत्ति वाला मनुष्य तो सिर्फ चिकनी-चुपड़ी बात करके अपना हित साधता है। वह मन से उसका हितचिन्तक नहीं होता।
      योग्य व्यक्ति न किसी से दबते हैं और न ही किसी को दबाते हैं। संसार का दस्तूर बहुत अलग तरह का हैं, जहाँ वह असफल लोगों का तिरस्कार करता हैं और सफल लोगों से ईर्ष्या करता है।
        समाज की बहुत बड़ी विडम्बना यह है कि कुछ लोग अपनी विवशताओं के कारण जीते-जी मर जाते हैं, सारा जीवन अभावों में जीते हैं। उनका इस धरती पर होना अथवा न होना कोई मायने नहीं रखता। इसके विपरीत कुछ लोग अपने सत्कार्यों की बदौलत मरने के पश्चात अमर हो जाते हैं। युगों-युगों तक इतिहास उन्हें स्मरण करता रहता है। समय-समय पर उनके उदाहरण दिए जाते रहते हैं।
          इस संसार में बहुत काम ऐसे लोग हैं जो किसी से हमदर्दी रखते हैं या उनके बारे में अच्छा सोचते हैं। हर कोई अपने बारे में सोचना चाहता है इसीलिए वह दूसरों को तिरस्कृत कर देता है।
        इस धरती पर लोग एक-दूसरे के साथ केवल अपनी आवश्यकताओं के लिए जुड़ते हैं और याद करते हैं। जिसने इस संसार की रचना की उस दाता को भी याद नहीं करना चाहते। जब जरूरत होती है तभी उसे याद करते हैं।
          मनुष्य अपने अहं में इतना डूबा हुआ है कि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है। अतः किसी को सम्मान नहीं देना चाहता। यदि मान देता भी है तो पहले अपनी जरूरत के विषय में सोचता है। किसी और की उसे कोई चिंता नहीं होती। जहाँ स्वार्थ टकराने लगते हैं तो  वहाँ प्यार, अपनापन आदि नहीं हो सकते। जब काम निकल जाता है तो किसी को पहचानते ही नहीं हैं।
          इन्सानी चरित्र में इतना परिवर्तन आता जा रहा है कि यदि कभी कारणवश मनुष्य को श्मशान में जाना पड़ जाता है तो वह वहाँ पर भी ऊबने लगता है। किसी को मृतक के साथ सहानुभूति रखना या उसके विषय में सोचने, चर्चा करने का समय ही नहीं होता। उन्हें तो बस वहाँ भी अपने कार्य ही याद आते हैं। अपने सगे लोग ही पूछ्ने लग पड़ते हैं कि बहुत देर हो गयी है अभी और कितना समय लगेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि धीरे-धीरे मनुष्य अपनी सम्वेदनाएँ खोता जा रहा है।
          यह हद दर्जे की सोच है कि किसी को अपने दिल में स्थान मत दो और यदि किसी कारण से जगह देनी पड़ जाए तो उतनी ही देनी चाहिए जितनी वह देता हैं। हमारे मन संकुचित होते जा रहे हैं, उसे हम विशाल बनाना ही नहीं चाहते। यदि सभी लोग यही सोच रखने लगें तो संसार का क्या होगा?
        सार रूप में हम यह कह सकते हैं कि सच्ची सम्पत्ति धन-दौलत नहीं बल्कि अच्छे संस्कार और ईमानदारी हैं। यही जीवन की सबसे मूल्यवान विरासत है जो व्यक्ति को सर्वत्र सम्मान, विश्वास और सफलता दिलाती है।
          ईश्वर का अंश होते हुए भी मनुष्य उन ईश्वरीय गुणों से दूर भागता रहता है। अपनी आँखों से तब तक स्वार्थ का चश्मा नहीं उतरेगा तब तक उसे सृष्टि के सौन्दर्य का बोध नहीं होगया। हृदय को विशाल बनाने पर सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

ईश्वर हमारी बेलेन्सशीट का ऑडिटर

ईश्वर हमारी बैलेन्सशीट का ऑडीटर

हम सभी अपने व्यापर-व्यवसाय में अथवा जमा पूँजी यानी धन-सम्पत्ति का ब्यौरा रखते हैं। हर वर्ष की समाप्ति पर अकाऊंटेंट से उसकी बैलेंसशीट तैयार करवाते हैं। उसका उद्देश्य यही होता है कि पूरा वर्ष हमने क्या कमाया और क्या खर्च किया? सारे खर्चों को निकालकर हमारी शुद्ध बचत कितनी हुई। फिर उसी बची हुई राशि को हम आगामी वर्ष के लिए अपनी ओपनिंग स्टॉक बनाकर भविष्य के लिए योजनाएँ बनाते हैं।
          कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर जिन्दगी की बैलेंसशीट को किसी ने सूत्र रूप में लिखा था। आज हम उसी का विश्लेषण करते हैं।
          जीवन का ओपनिंग स्टाक मनुष्य का जन्म होता है। मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों के फल को भोगने के लिए भाग्य के रूप में उसके साथ ईश्वर भेजता है। निश्चित ही उसी के अनुसार मनुष्य अपने जीवन में सुख-दुख के मीठे और कड़वे फल भोगता है।
        मनुष्य के क्रेडिट या जमा क्या होता है? जो उसके खाते से क्या कम होता है अथवा डेबिट या घटाया जाता है?
          इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि हमारे शुभाशुभकर्मों की राशि हमारे खाते में जमा होती रहती है जिनका फल हम सुख-दुःख के रूप में भोगते हैं। भोगने के पश्चात वह राशि हमारे खाते से घटा दी जाती है। जो शुभाशुभकर्म हम इस जन्म में करते हैं, वे उस चली आ रही राशि में जुड़ जाते है।
          जीव की मृत्यु उसका क्लोजिंग स्टॉक होता है। यानी नया जन्म लेने तक वह अब वह कोई कमाई नहीं कर सकेगा। मनुष्य के सुविचार अथवा कुविचार उसका एसेट होते हैं। उन्हीं के अनुसार जीवन में उसे सफलता या असफलता मिलती है। उसके मित्र बनते हैं और समाज में उसका स्थान निर्धारित होता है। यही सब विचार उसकी देनदारी भी बनते हैं।
        मनुष्य का लाभ उसकी प्रसन्नता होती है और दुःख उसकी हानि होती है। किसी तरह वह जीवन में इन सबसे बच नहीं पाता। उसे ये भोगने ही पड़ते हैं, उनसे छुटकारा किसी भी तरह सम्भव नहीं होता। मनुष्य की आत्मा उसकी गुडविल होती है। उसकी आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसे अपने शुद्ध व पवित्र विचारों से सात्विक बनाए रखना उसका परम कर्तव्य बनता है। जहाँ उसमें कलुषता के भाव आने लगते हैं, निस्सन्देह वहीं उसकी आध्यात्मिक उन्नति बाधित होने लगती है।
          मनुष्य का हृदय ही उसकी अचल सम्पत्ति होती है। यदि इसमें सद् विचार, सरलता, सहजता आदि गुणों का समावेश होता रहेगा तो मनुष्य सहृदय बन जाता है अन्यथा क्रूरता उसे दबोच लेती है। इसी से उसके संस्कारों और महानता का ज्ञान होता है। वह चाहे तो अपनी अचल सम्पत्ति में बढ़ोतरी कर सकता है अथवा उसे बर्बाद कर सकता है। यह उसकी समझदारी पर निर्भर करता है।
          उसके कर्तव्य उसकी आऊट स्टेंडिंगग होते हैं जिनका उसे सही तरीके से निर्वहण करना होता है। उसकी मित्रता उसका गुप्त समझौता होती है। इससे पता चल जाता है की मनुष्य कैसा होगा? उसके आचार-व्यवहार की झलक उसके मित्रों से मिल जाती है। संगति का प्रभाव मनुष्य पर बहुत अधिक होता है।
        मनुष्य का चरित्र उसकी वास्तविक पूँजी होती है। यही उसकी महानता की कसौटी होता है। यह सभी धनों से मूल्यवान होता है। इसकी रक्षा उसे यत्नपूर्वक करनी चाहिए।
         ज्ञान मनुष्य का वास्तविक इनवेस्टमेंट होता है जो जन्म-जन्मान्तर तक उसका साथ देता है। हर जन्म में जो भी ज्ञान वह अर्जित करता है, वह पहले वाले ज्ञान के साथ जुड़कर वृद्धि को प्राप्त करता है।यही ज्ञान नए जन्म में उसे भाग्यशाली बनाता है। इसलिए मनुष्य को यत्नपूर्वक ज्ञानार्जन करते रहना चाहिए।
        सहनशीलता उसका बैंक बैलेन्स होता है और उसके विचार करण्ट अकाऊण्ट होते हैं। इसी प्रकार उसका अपना व्यवहार सामान्य प्रविष्टि होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि सहनशील व्यक्ति को हो सकता है कि लोग मूर्ख कहें परन्तु उससे अधिक समझदार कोई ओर नहीं हो सकता। 
          मनुष्य के विचारों की परिपक्वता ही उसकी महानता का प्रतीक होती है। वह अपने व्यव्हार से सबको अपना बना लेता है। ऐसे लोगों के शत्रु बहुत कम होते हैं।
         मनुष्य के मन में अवसाद का आना शुभ लक्षण नहीं  होता। अतः अपनी बैलेंसशीट को सदा अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। जहाँ तक हो सके उसमें झूठी एंट्रियाँ नहीं होनी चाहिएँ। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि ईश्वर हमारी इस बैलेन्स शीट का ऑडीटर है। इस दुनिया के ऑडीटर तो हेराफेरी करके गलत बैलेंसशीट बना सकते हैं पर वह मालिक ऐसा नहीं करेगा। उसे असत्य से घृणा है। जहाँ भी हम चूक करने का यत्न करेंगे वहीँ वह हमारी गलती पकड़ लेगा। तब उसकी सजा से मनुष्य को कोई नहीं बच सकता।
चन्द्र प्रभा सूद