शुक्रवार, 15 मई 2026

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल 

हमारे मनीषी कहते हैं कि जीवन उसी व्यक्ति का सफल होता है जो इस ससार में अकेला नहीं है। उसके भाई-बन्धुओं के आवागमन से घर में रौनक रहती है, चहल-पहल रहती है। वह घर तो मानो भूतों के डेरे के समान होता है जहाँ पर कभी कोई नहीं आता। इसका सीधा-सा अर्थ यही निकलता है कि जिसके घर बहुत से लोग आते रहते हैं चाहे वे मिलने-जुलने हों अथवा चाहे किसी कार्य से आने वाले हों, उसका जीवन ही वास्तव में इस भूतल पर सफल माना जाता है।   
            सबके साथ सामंजस्य बनाकर चलना जीवन को सफल, शान्तिपूर्ण और सन्तोषजनक बनाता है। यह दृष्टिकोण न केवल रिश्तों को मजबूत करता है बल्कि व्यक्तिगत और पेशेवर विकास के लिए भी आवश्यक है। सहयोग से सफलता मिलने पर आप मानसिक शान्ति और खुशी अनुभव होती है। जीवन की दौड़ में केवल अकेले दौड़ने वाले को प्रतिस्पर्धा में प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
            'पञ्चतन्त्रम्' नामक ग्रन्थ में पण्डित विष्णु शर्मा ने इसी आशय को अपने शब्दों में बहुत सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है-
        य धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले।
       आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थं सुहृदो जना:।।
अर्थात् इस जगत में वे लोग धन्य, विवेकी और सभ्य हैं जिनके आवास स्थान पर मित्रगण काम के लिए आते हैं।
            इस श्लोक से कवि यही स्पष्ट करना चाहते हैं कि दूसरे की उम्मीदों पर जो लोग खरे उतरते हैं, संसार में उन्हीं को पूछा जाता है। उन्हें सभी अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं। सबके अपने वही कहलाते हैं जिनके पास कोई भी व्यक्ति बेझिझक होकर अपनी समस्याओं के साथ आ सकता है। ऐसे महानुभावों का जीना ही इस धरा पर वास्तव में जीना कहलाता है। ऐसे लोगो को धन्य और विवेकी कहा जाता है।
               अपने अहं के कारण दूसरों को हेय समझकर दुत्कारने वालों से सभी किनारा कर लेते हैं। सबको अपना बनाकर चलने वालों के साथियों की कतार बहुत लम्बी हो जाती है। इसी से ज्ञात होता है कि मनुष्य कितना सभ्य है? वह कितने लोगों को अपने साथ लेकर चल सकता है? उसे दूसरों की कितनी चिन्ता और परवाह है?
            आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में इस विषय पर लिखते हैं-
       जीवने यस्य जीवन्ति मित्राणीष्टा सबान्धवा।
       सफलं जीवितं तस्य आत्मर्थे को न जीवति।।
अर्थात् जिसके जीवन से इष्ट , मित्र, बन्धु-बान्धव जीवित रहते हैं, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए कौन नहीं जीता? यानी अपने लिए तो सभी लोग जीते हैं।
           जो मनुष्य अपने इष्टजनों और बन्धु-बान्धवों के जीने का कारण बनता है, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए यानी अपने घर-संसार के लिए तो सभी जीते हैं। यह जीना स्वार्थपरक होता है जहाँ मेरे और मेरे परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान ही नहीं होता। अपने और अपनों के लिए सब सुख-साधनों को जुटाना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। उनकी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करना मनुष्य का कर्त्तव्य होता है।
              इसका यह तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मनुष्य समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाए या अनदेखा करने लगे जिसके कारण ही उसका अपना यह अस्तित्व है। वह समाज में अकेला रहकर नहीं जी सकता। ‌‌भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में अन्यत्र इस विषय पर लिखते हैं- 
        स जीवति गुणो यस्यधर्मो यस्य सजीवति।
        गुणधर्म-विहीनो य: जीवितं तस्य निष्फलम्।।
अर्थात् वही जीवित रहता है जिसमें गुण हों अथवा धर्म हो। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निष्फल है।
           आचार्य चाणक्य ने मानव जीवन के लिए बहुत ही गूढ़ रहस्य बताया है। उनके अनुसार गुण और धर्म का मनुष्य में होना आवश्यक है। गुणों से रहित मूर्ख व्यक्ति का होना या न होना एक समान होता है। वह इस पृथ्वी पर बोझ के समान होता है। उसके होने से किसी को खुशी मिलती है और न ही उसके जाने का किसी को गम होता है।
            अपने धर्म यानी अपनी जिम्मेवारियों को सुचारू रूप से निर्वहण करने वाला ही मनुष्य ही सर्वत्र सम्मान प्राप्त करता है। इसके विपरीत आचरण करने वाला हर कदम पर तिरस्कृत होता है। उसे कोई घास नहीं डालता। धीरे-धीरे वह अन्धेरों में खो जाता है। इसलिए गुण और धर्म के बिना जीने वाले मनुष्य का जीवन संसार में व्यर्थ हो जाता है।
            मानव जीवन की ऊँचाइयों को छूने वाला सफल व्यक्ति सबका प्रिय बनता है। वह समाज को उचित मार्गदर्शन देता है। उसके दिखाए गए मार्ग पर चलकर आने वाली पीढ़िया भी स्वयं को धन्य मानती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 14 मई 2026

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति के लोग जब किसी को बर्बाद करने लग जाऍं तब विनाश होना निश्चित है। इस कथन का अर्थ है कि इन्सान इन्सान का शत्रु बन जाए या शेर ही शेर का दुश्मन जाए (यानी एक ही प्रकार या जाति का पशु) अथवा एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएँ तब उनका बच पाना वाकई कठिन हो जाता है। इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। यह कथन सर्वथा सत्य है। किसी जाति का विनाश दूसरे लोग कम करते हैं। अपने ही किसी से जाति का विनाश कर दिया जाता है।
             दूसरा कोई यदि अहित करने की सोचेगा तो अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार उसका प्रतिकार किया जा सकता है। परन्तु जब अपने ही लोग पीठ में खंजर घोंप दें यानी धोखा देने लग जाएँ तब बचना नामुमकिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि वे हमारी अच्छाइयों, बुराइयों और कमजोरियों को भली-भाँति जानते हैं।   
          'कामन्दकीयनीतिसार' ग्रन्थ में इसी तथ्य को कवि ने उदाहरण सहित हमें समझाया है-
        विषं  विषेण  व्यथते  वज्रं  वज्रेण  भिद्यते।
        गजेन्द्रो      दृष्टसारेण     गजेन्द्रेणैव     च॥
        मत्स्यो मत्स्यमुपादत्ते ज्ञातिर्ज्ञातिमसशयम्।
        रावणोच्छिद्यत्तये  रामो  विभूषणमपूजयत्॥
अर्थात् विष से विष का नाश होता है, वज्र से वज्र का भेदन होता है, गजेन्द्र गजेन्द्र के द्वारा बन्धन में आता है, मछली को मछली ही निगलती है। निस्सन्देह जाति का विनाश जाति के द्वारा ही होता है। राम ने रावण के विनाश के लिए विभीषण का ही सत्कार किया।
              दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह श्लोक हमें चेताने का यत्न कर रहा है कि जहर को जहर काटता है। वज्र को वज्र काटता है, इसे ऐसे भी कह सकते है कि लोहे को लोहा काटता है। हाथी को पकड़ने के लिए महावत हाथी का इस्तेमाल करता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। ये सभी जातियाँ अपनी दुश्मनी खुद ही निभाती हैं। इसी प्रकार एक कुत्ते के क्षेत्र में यदि कोई अन्य कुत्ता आ जाता है तो अपने एरिया से वे उसे बाहर निकाल कर ही चैन लेते हैं।
          आगे और भी सटीक उदाहरण देते हुए कवि ने कहा है कि अपने शत्रु रावण का वध करने के लिए भगवान राम को भी विभीषण की सहायता लेनी पड़ी। तभी तो बड़े-बजुर्ग कहते हैं घर का भेदी लंका ढाए। इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं इस प्रकार के उदाहरणों से जहाँ इन जैसे विभीषणों और जयचन्दों ने बड़े-बड़े साम्राज्यों का विनाश करवा दिया। तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने ही देश को शत्रुओं के हाथों सुपुर्द करने में उनकी सहायता की। उनके समक्ष सारे रहस्यों का उद्घाटन किया। अनेक मासूम लोगों को मौत की नींद सुलाते हुए न तो उन्हें किसी से डर लगा और न ही उनके मन ने उन्हें कचोटा। 
             सृष्टि की रचना करते समय उसमें सभी जीवों में तालमेल बना रहे, इसका ध्यान ईश्वर ने रखा था। जीव-जन्तुओं की अधिकता न हो जाए, इसलिए शायद यह विधान बनाया कि अपनी जाति ही उसके विनाश का कारण बन जाए। पशुओं की आबादी बहुत अधिक न हो जाए इसलिए शेर, लोमड़ी, सियार आदि मांसाहारी हिंसक पशु बनाए। इसी प्रकार समुद्र में जन्तुओं का सामंजस्य बना रहे इसलिए बड़ी हिंसक मछलियाँ बना दीं। इसी प्रकार सभी जीवो की बुद्धियों को बना दिया कि वे अपनी जाति के विनाश का कारण बन जाएँ।
          मनुष्य जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है उसकी बुद्धि को भी ऐसा बना दिया कि वह अवसर आते ही दूध की तरह फट जाती है और सभी अनर्थों का मूल (जड़) बन जाती है। अपनी मूर्खताओं के कारण शत्रु राज्यों को अपने गुप्त रहस्यों को देकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारता है। देशद्रोही बनकर सबकी नफरत और नाराजगी मोल लेता है। अन्ततः मनुष्य न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सलाखों के पीछे चला जाता है।
          प्रकृति का अत्यधिक दोहन करके और उसे दूषित करके मनुष्य अपने रास्ते में खड्डे खोदता है। समय बीतते भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता देकर वह अनेक मनुष्यों के विनाश और उनके दरबदर होने का कारण बन‌ जाता है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में मनुष्यों के साथ हम अन्य जीवों के विनाश का कारण भी बन जाते हैं। ऐसी आपदाओं के समय जान और माल की बहुत हानि होती है। उससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं।
          अपनी जाति को विनाश से बचाने के लिए मनुष्यों को सदा सकारात्मक कार्य करने चाहिए। उसे अपने विवेक का आश्रय लेकर मानव जाति की भलाई के कार्य करने चाहिए। पशु-पक्षियों की तो बुद्धि ऐसा नहीं सोच सकती। परन्तु मनुष्य को तो ईश्वर ने बुद्धि का वरदान दिया है, उसे तो सावधान होना चाहिए। अपनों से शत्रुता न करके उनके लिए सम्वेदनशील होना चाहिए। यथासम्भव उनकी भलाई के कार्य करने चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 13 मई 2026

सोने का ढोंग करने वाले

सोने का ढोंग करने वाले 

व्यक्ति यदि गहरी नींद में सो रहा हो तो उसे जगाया जा सकता है परन्तु जो सोने का ढोंग कर रहा हो (मचला बन जाए) तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी जगा नहीं सकती। उसके कानों के पास यदि ढोल भी बजाया तब भी उसकी नींद नहीं खुलेगी, वह नहीं जागेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि सोने वाले व्यक्ति को जगाया जा सकता है पर जो जाग रहा हो और जानते-बूझते सोने का दिखावा कर रहा हो तो उसे जगाना वाकई टेढ़ी खीर होती है। ईश्वर ही उसका मालिक होता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं किसी विषय की जानकारी न होना कोई अपराध नहीं होता। इस कारण अपने मन में हीन भावना नहीं आने देनी चहिए। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। जानकर या समझकर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और स्वयं को ज्ञानवान बनाया जा सकता है। उसके पश्चात सही रास्ते पर चलकर ही वास्तव में मनुष्य सफलता की ऊँचाइयों को छूने में समर्थ हो सकता है। इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
          इसके विपरीत जो मनुष्य किसी विषय को जानता है और समझता है पर फिर भी अज्ञानी बनने का प्रदर्शन करता है, गलत रास्ते का चुनाव करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में कोई और नहीं हो सकता। ऐसे लोगों से सदा ही सावधान रहना आवश्यक होता है। ये लोग स्वयं अपना नुकसान तो करते हैं पर दूसरों को बर्बाद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। इन‌ लोगों से दूरी बनाना मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। 
            हम सब जानते हैं कि घर, परिवार, धर्म, देश अथवा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण न करने वालों को सभी हेय समझते हैं। कदम-कदम पर उन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को अपने जीवन में नाकामयाब होने का मेडल मिलता है जिसे उन्हें सारा जीवन ढोना पड़ता है। उनके भाई-बन्धु भी ऐसे लोगों से नाराज होकर शीघ्र ही उनसे किनारा कर लेते हैं। वे स्वयं को उनके साथ रहकर तिरस्कृत होना पसन्द नहीं करते।
          समाज में रहते हुए जब सामाजिक व्यवस्था पर कुठाराघात किया जाता है तब वह चरमराने लगती है। उसका प्रभाव पूरे समाज पर ही पड़ता है। समाज में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का माहौल बनने लगता है। हर व्यक्ति दूसरे को सन्देह की नजर से देखने लगता है। इस प्रकार वातावरण दूषित हो जाता है, उसमें हर सहृदय व्यक्ति को बहुत घुटन महसूस होने लगती है। वह ऐसी स्थिति में अन्यत्र कहीं जाने के लिए बेचैन होने लगता है।
          जानते-बूझते हम दुनिया की अन्धी दौड़ में शामिल हो जाते हैं। जब अपनी आर्थिक, शारीरिक, बौद्धिक अथवा अन्य क्षमताओं में कमजोर होने को हम अनदेखा कर बैठते हैं तब हमें मुँह की खानी पड़ती है। उस समय चारों खाने चित्त होकर हम निराशा का लबादा ओढ़ लेते हैं। हम लोगों से सहानुभूति की आशा करते हैं पर वे हमारा उपहास करते हैं कि हमने अपनी क्षमताओं को जानते हुए भी कुँए में छलाँग लगा दी। तब हम दोषी करार किए हुए कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
            हम जानते हैं कि रात को जल्दी सोना और प्रात: जल्दी उठना स्वास्थ्यवर्धक होता है फिर भी हम लेट नाइट पार्टियाँ करते हैं। हर प्रकार के स्वास्थ्य के नियमों को धत्ता बताकर ऊल-जलूल खाते हैं। जब रोग हल्ला बोलते हैं तो डाक्टरों के पास जाकर मेहनत की कमाई और समय दोनों बरबाद करते हैं।
          हम सब इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि आलस्य करने से हम उन्नति नहीं कर सकते बल्कि पिछड़ जाते हैं पर फिर भी उसे गले लगाकर आनन्दित होते हैं। पढ़ने की आयु में जब कैरियर बनाने का समय होता है तब स्कूल-कालेज बंक करके हीरो बनते हैं। बताइए हो गया न सब गुड़ गोबर।
          अपने अन्तस् में विराजमान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी शत्रुओं और बाहरी शत्रुओं से हमारी गहरी छनती है। तब असफलताओं को हम अनजाने में ही दावत दे देते हैं और फिर अपनी हार पर रोते हैं। सारी दुनिया को पानी पी-पीकर कोसते हैं कि किसी से हमारी खुशी सहन नहीं होती। जब तक हम इन शत्रुओं के जाल से नहीं बचेंगे तब तक हमारा उद्धार नहीं हो सकता। इस बात को जितना जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम सुखी रहेंगे।
            हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं ही होते हैं। यदि हम जागते रहते है यानी कि सचेत रहते हैं तो हम निश्चित ही महान कार्य करते हुए विश्व में अपना एक स्थान बना सकते हैं। इसके विपरीत समझते हुए भी सोने का उपक्रम करते है यानी अनजान बनने का ढोंग करते हैं तो पतन निश्चित होता है। असफलता हमारा स्वागत करने के लिए तैयार बैठी रहती है। इसलिए सदा ही सावधानी बरतनी चाहिए। किसी के जगाने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 12 मई 2026

नीति वचन

नीति वचन 

नीति-कथाओं का संग्रह 'हितोपदेश' नामक ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने मनुष्यों के लिए नीतिपूर्ण बातें लिखी हैं। निम्नलिखित श्लोक में उन्होंने प्रिय व्यक्ति, सत्कर्म, अच्छी पत्नी, बुद्धिमान व्यक्ति, लक्ष्मी, मित्र और पुरुष इन सबके विषय में बहुत सुन्दर विवेचना की है-
      स स्निग्धोSकुशलान्निवारयति 
                    यस्तत्कर्म यन्निर्मलम्।
       सा स्त्री यानुविधायिनी स 
                ‌मतिमान्य: सद्भिरम्यर्च्यते॥
       सा धीर्या न मदं करोति स 
                 सुखी यस्तृष्णया मुच्यते।
        तन्मित्रं  यदकृत्रिमं  स  पुरुषो 
                   य:  खिद्यते  नैन्द्रियै:॥      
अर्थात् प्रिय व्यक्ति वही होता है जो अमंगल का निवारण करता है, सत्कर्म वही है जो निर्मल है, पत्नी वही है जो अनुगामिनी है, बुद्धिमान वही है जो सज्जनों के द्वारा पूजित होता है, लक्ष्मी वह है जो मद उत्पन्न न करे, सुख वही है जो तृष्णा से विमोचित करे, मित्र वही है जो अकृत्रिम (बिना दिखावे का) है और पुरुष वही है जो इन्द्रियों के वश में नहीं है।
            प्रिय व्यक्ति दूसरों का हित करने वाला होता है। वह अपने प्रियजनों की हर अमंगल से रक्षा करता है। वह नहीं चाहता कि उसके प्रियजन किसी भी कारण से दुख पाएँ या उनको जीवन में कभी गर्म हवा की तपिश सताए। वह सदैव उनके जीवन में खुशियाँ लाने का यथासम्भव प्रयास करता है। व्यक्ति प्रिय तभी बनता है जब वह निस्वार्थ भाव से अपने बन्धु-बान्धवों के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन-रात कार्य करता है। उनके मंगल की कामना करता हुआ उनके सुख-दुख में हर समय साथ निभाता है।
             सत्कर्म वही कहलाते‌ हैं जो निर्मल हैं यानी अन्त:करण को शुद्ध और पवित्र करने वाले हों। रैदास जी ने कहा था -
          मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मनुष्य का मन शुद्ध, पवित्र और निष्कपट है तो घर पर या अपने कार्यस्थल पर ही ईश्वर की प्राप्ति और पुण्य मिल सकता है, तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं। इसका भाव है कि आन्तरिक पवित्रता ही सबसे बड़ी भक्ति है, बाहरी आडम्बर नहीं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सत्कर्म करने वाला अपने इहलोक और परलोक दोनों को सुधारता है। उसके मन में कभी कुमार्ग की ओर प्रवृत्त होने के विषय में सोच ही नहीं सकता।
           पत्नी वही है जो अनुगामिनी है अर्थात् अपने जीवन साथी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चले। उसके सुख-दुख के समय उसकी परछाई बनकर रहे। अपने व्यवहार से कभी ऐसा प्रदर्शन न करे कि वह अपने पति के घर में सामंजस्य नहीं बिठा सकती। वही पत्नी भाती है जो गृहस्थी को कुशलता से चलाए। घर चलाने की उसकी कुशलता उसे ‌विशेष बनाती है। अपने परिवारी‌ जनों के साथ उसे सदा‌ यथायोग्य व्यवहार करना‌ चाहिए।
            बुद्धिमान वह मनुष्य कहा जाता है जो सदा सज्जनों के द्वारा पूजित होता है। अपने विवेक के कारण सदा सत्संगति में रहता है। हर प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ, उसे विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना भी बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं। उसे सभी लोगों के साथ सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखना चाहिए।
             लक्ष्मी के विषय में हम सभी जानते हैं कि वह एक स्थान पर टिककर नहीं रह सकती। आज यहाँ है तो पलक झपकते ही वहाँ यानी अन्यत्र पहुँच जाती है। राजा को रंक बनाने और रंक को राजा बनाने की भरपूर क्षमता रखती है। गलत तरीके से धन कमाने पर अपने साथ व्यसनों को भी लेकर आती है। मनुष्य को आसमन से जमीन पर पटकना इसे बखूबी आता है। इसलिए मनुष्य को अपने धन और वैभव पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी वही है जो मद उत्पन्न न करे।
          सुख वही कहलाता है जिससे तृष्णा दूर रहे। यदि एक के बाद एक तृष्णा मनुष्य को घेरे रखेंगी तो वह कोल्हू के बैल की तरह अपना सुख-चैन गॅंवाकर दिन-रात परिश्रम करता रहेगा। फिर भी कोई-न-कोई तृष्णा उसे भटकाती ही रहेगी। सुख की चाह रखनी हो तो तृष्णाओं का त्याग करना पड़ता है। यदि जीवन में सुख की कामना हो तो मनुष्य को सन्तोष रखना चाहिए। जो उसके पास है, उसी में सुख की तलाश करनी चाहिए।
             मित्र उसे कहते है जो आडम्बर रहित, सरल व निश्छल होता है। वह सदा अपने मित्र का हितचिन्तक होता है। उसके लिए हमेशा शुभ करने वाला और सोचने वाला होता है। सुख-दुख के समय अपने मित्र के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर वह खड़ा रहता है। वह पीठ पीछे भी अपने मित्र की बुराई नहीं करता। मित्र के विषय में मनीषी‌ कहते हैं कि वह श्मशान तक‌ साथ निभाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मित्रों की मित्रता जीवन भर चलती है। मृत्यु के अतिरिक्त उन्हें कोई अलग‌‌ नहीं कर सकता।
            मनीषियों का कथन है कि वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जिसे अपने ऊपर संयम है। वह कदापि इन्द्रियों के वश में नहीं होता। वह जानता है कि इन्द्रियों के वश में हो जाने का अर्थ है अपने लक्ष्य से भटक जाना। इनके अधीन होने वाले व्यक्ति को कभी शान्ति नहीं मिल सकती। मनुष्य एक अद्वितीय सामाजिक, बुद्धिमान और तर्कशील प्राणी है जो अपनी उच्च संज्ञानात्मक क्षमताओं के कारण अन्य जीवों से भिन्न है। वे आत्म-जागरूकता, नैतिक मूल्यों, जटिल उपकरणों के निर्माण और संस्कृति के विकास में सक्षम हैं। 
          ‌‌    हितोपदेश के इस श्लोक में बताए गए नीतिपूर्वक वचनों के अनुसार व्यवहार करने वाले ही वास्तव में जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। इन बातों का ध्यान रखने से मनुष्य सदा ऊँचाइयों को छूता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 11 मई 2026

पति-पत्नी के बीच अबोलापन

पति-पत्नी के बीच अबोलापन

पति और पत्नी का रक्त सम्बन्ध नहीं होता। उन दोनों में प्यार और विश्वास का रिश्ता होता है। अतः रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए दोनों को प्रयत्न करना होता है। एक के प्रयास से रिश्ते मजबूत नहीं होते बल्कि टूटने‌ लगते हैं। इस बात का दोनों हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जब उन दोनों में किसी भी कारण से झगड़े की स्थिति बन जाती है तब उनके मध्य घर कर जाने वाला अबोलापन बहुत ही घातक होता है। इसकी अति हो जाने पर अलगाव की स्थिति तक बन जाती है जो घर-परिवार को टूटने के कगार पर पहुँचा देती है।
            वास्तव में पति और पत्नी के मध्य किन्हीं भी कारणों से जब चुप्पी पसरने लगती है तब फिर यही चुप्पी धीरे-धीरे अबोलेपन को जन्म देती है। इसके चलते दोनों परस्पर एक-दूसरे से बात नहीं करना चाहते। यदि थोड़ी-बहुत बात उनके बीच होती भी है तो बहुत ही आवश्यक यानी जिसके बिना घर की गुजर-बसर नहीं हो सकती। जैसे बच्चों की कोई अहं समस्या अथवा किसी सम्बन्धी से सम्बन्धित चर्चा।
           ऐसी स्थिति में घर में फैली सन्नाटे की चादर बहुत त्रासदायक होती है। ऐसे माहौल में घर में रहने वालों का तो मानो दम ही घुटने लगता है। गम्भीर सोच को जन्म देता यह अबोलापन दिन-प्रतिदिन और और अधिक कड़वाहट घोलता रहता है। जो पक्ष अधिक सोचता है वह अधिक घुटन महसूस करता है। उसे घर का खालीपन मानो काटने को दौता है।
          अब हम इस दुखद परिस्थिति का विश्लेषण करते हैं। पति अथवा पत्नी में विचारों में, खान-पान में, विवाह से पूर्व के रहन-सहन में अन्तर होता है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इस वैभिन्नय के कारण अपनी गृहस्थी को ही नरक बना दिया जाए। ये बातें प्रमुख नहीं हैं, इन बातों को नजरंदाज किया जा सकता है।
              यह कहने से मेरा अभिप्राय है कि कुछ पत्नियों को शिकायत होती है कि उनके पति उन्हें बाहर घुमाने नहीं ले जाते, उन्हें खाना खिलाने के लिए किसी रेस्टोरेंट में नहीं ले जाते, शापिंग के लिए नहीं लेकर जाते, घर तथा बच्चों की ओर ध्यान नहीं देते। इसी तरह पतियों को भी ऐसी ही बहुत-सी शिकायतें अपनी पत्नियों से भी होती है। कभी वे इसे प्रकट कर देते हैं और कभी नहीं। फिर झल्लाहट भरा व्यवहार वे एक-दूसरे के साथ करने लगते हैं। जो किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया या जा सकता। इस तरह मन की दूरियाँ अधिक होने लगती हैं। जाने-अनजाने किए जाने वाले ऐसे व्यवहार से दोनों को यथासम्भव बचने का प्रयास करना चाहिए।
             इसका अर्थ यह कभी नहीं लगाया जा सकता कि उनमें आपस में प्यार नहीं है या वे एक-दूसरे को अनदेखा कर रहे हैं। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी प्रकृति होती है। कुछ लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर देते हैं और कुछ लोग अपनी भावनाओं को अपने मन में ही रखते हैं। इसे बदलना बहुत कठिन कार्य होता है। इस कारण अपने जीवन साथी को सदा अपने मित्रों और कार्यालय के साथियों सामने कोसते रहना अथवा लानत-मलानत करते रहना उचित नहीं होता।
            ऐसा व्यवहार करके दूसरे के समक्ष अपने साथी की छवि धूमिल कर रहे हैं। लोग इन स्थितियों का लाभ उठाने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।उन्हें तो बस मौके की तलाश रहती है। जहाँ मौका मिला वहीं वे क्रिकेट की बाल की तरह उसे लपक लेते हैं। ऐसे स्वार्थी मित्र या सम्बन्धी आग में घी डालने का कार्य करते हैं। इन घात लगाए बैठे लोगों से सावधान रहने के लिए अपने मन की बात इनसे नहीं करनी चाहिए।
          इस अबोलेपन का दुष्प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है। वे अपना उल्लू सीधा करने के लिए तत्पर रहने लगते हैं और उनके मन में बड़ों के प्रति आदर भाव कम होने लगता है। धीरे-धीरे वे माता-पिता के प्रति उदासीन होने लगते हैं और उन्हें बस अपने मनीबैंक से अधिक कुछ नहीं समझते। वे उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने का एक माध्यम मात्र समझने लगते हैं।
            पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। भावनात्मक रूप से उनमें टूटन न होने पाए, इसलिए उचित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। सत्य यह है कि शरीर के जख्म भर जाते है लेकिन मन के जख्म नहीं भरते, वे सदा हरे रहते है। अपनी जिम्मेदारियों को हर हालत मे निभाने की कोशिश करनी चाहिए। लापरवाही करने का परिणाम घातक हो सकता है। 
            अपने साथी या अपने घर की समस्याओं के विषय में आप स्वयं जानते हैं। बातचीत का रास्ता कभी भी, किसी भी स्थिति में बन्द नहीं करना चाहिए। जहाँ तक हो अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर आपसी मनमुटाव को यदि आपस में मिल-बैठकर सुलझाया जा सके तो बहुत अच्छा होता है। परन्तु यदि किसी कारण से अहं टकराने लगें और आपसी बातचीत से मामला न सुलझ पाए तब घर की सुख-शान्ति के लिए घर के बड़ों को विश्वास में लेकर चर्चा की जा सकती है। इससे उनको अपनी समस्या को सुलझाने में सहायता मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 10 मई 2026

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो 

बाड़ को खेत की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है परन्तु यदि यही बाढ़ किसी कारण से खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की सुरक्षा कोई नहीं कर सकता। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी कितना भी यत्न कर ले पर उस खेत को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सकता।
           बाड़ खेत को खा रही है, यह एक मुहावरा है। इसका प्रयोग अक्सर ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जहॉं कोई वस्तु किसी के संसाधनों या अवसरों को दूर ले जाई जा रही हो। यह किसी ऐसे व्यक्ति या स्थिति का भी उल्लेख हो सकता है जो रचनात्मकता या प्रगति को बाधित कर रहा है। इस मुहावरे का प्रयोग प्रायः एक बाधा के सामने हताशा या लाचारी की भावना व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
            इसी प्रकार जिस व्यक्ति को सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है यदि वही अमानत में खयानत करने लग जाए तब बहुत ही कठिनाई होने लगती है। हमने ऐसे कई काण्ड होते हुए देखे हैं जहाँ उसी के किसी सुरक्षाकर्मी ने ही हत्या कर दी हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गान्धी की हत्या का हैं।
          इसी प्रकार घर अथवा कार्यालय में नियुक्त किए गए सुरक्षाकर्मी स्वयं या किसी दूसरे की सहायता लेकर जरा-सी नाराजगी होने पर अपने स्वामी को मौत के घाट उतार देते हैं। घर के किसी मासूम बच्चे का अपहरण करके फिरौती में मोटी रकम तक वसूलते हैं। यदि उनका मनचाहा किसी कारण से न हो पाए तो उस बच्चे को मौत की नींद भी सुला देते हैं। ऐसे उदाहरण प्राय: सोशल मीडिया, टी.वी. एवं समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं।
          'हरिवंश पुराण' में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है -
          निर्वाप्यते ज्वलन्नग्निर्जलेन सुमहानपि।
       उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्ति: कुतोन्यत:॥ अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि कितनी ही विराट क्यों न हो, अन्त में जल के द्वारा शान्त कर दी जाती है। पर यदि जल से ही अग्नि उत्पन्न होने लगे तो अन्य किस पदार्थ से उसको शान्त किया जा सकता है? यानी उसे शान्त नहीं किया जा सकता।
            इस श्लोक में दर्शाए गए सत्य से हम सभी भली-भाँति परिचित है। कहीं भी आग लग जाए तो हम उस पर पानी डालकर बुझाते हैं। परन्तु यदि उसी पानी से बनी बिजली से आग भड़क जाए तो वहाँ पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। तब उस आग पर मिट्टी डाली जाती है। इसका कारण यह है कि आग पर पानी डालने से करेण्ट आ जाता है, इससे कई जानें जाने का डर होता है।
            इतिहास का अध्ययन करने पर भी हमें ऐसे अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ इस प्रकार के खूनी खेल खेलने में किसी-न-किसी विभीषण का ही हाथ होता था। अन्यथा विरोधी राजाओं को कहाँ पता होता था उस राजा विशेष में विद्यमान उनकी कमजोरियों का।
            खजाने का रक्षक ही यदि हेराफेरी मास्टर हों तो उस खजाने को लुटने में अधिक समय नहीं लगता। लोगों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बिना समय व्यर्थ हुए नष्ट हो जाती है। इस तरह लक्ष्मी के अपार भण्डार कुत्सित मानसिकता के कारण बर्बाद कर दिए जाते हैं।
            सबसे बढ़कर देश के शासक ही यदि देश को बर्बादी के कगार पर ले जाएँ तो ऐसी सम्भावना होती है कि वह देश किसी अन्य देश के कब्जे में शीघ्र आने वाला है । देश में उसके रक्षक नेता ही यदि भक्षक बन जाएँ अर्थात् नेता चोरबाजारी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त, रिश्वतखोरी को प्रश्रय देने वाले, हेराफेरी करने वाले, दूसरों का गला काटने, अपराधियों की शरणस्थली बनने जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त हो जाएँगे तो उस देश का ईश्वर ही मालिक है। 
          ऐसी स्थिति में उस देश में शासन नाम की कोई चीज नहीं रहती। वहाँ केवल स्वार्थ हावी होने लगते हैं। वहॉं अराजकता का वातावरण बन जाता है। सभी नेता जब देश से अधिक अपने स्वार्थों को महत्त्व देने लगते हैं तब वह देश रसातल की ओर जाने लगता है।
          यदि हम चाहते हैं कि बाड़ खेत को न खाए, हमारा खजाना सुरक्षित रहे अथवा हमारे देश का अहित करने वाला कोई भी मनुष्य न हो तो हम सबको मिलकर इसके लिए साझा प्रयास करना होगा। भीतरघात करने वाले जयचन्दों को शीघ्र पहचानकर उनका सामाजिक तौर से बहिष्कार करना होगा। तभी हर प्रकार से हमारे जान और माल की सुरक्षा हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 9 मई 2026

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

समाज में सदा से ही यह विषय चर्चा का रहा है कि हमारा भोजन शाकाहारी होना चाहिए अथवा मांसाहारी। कुछ लोग ऐसे हैं जो मांसाहार को पौष्टिक भोजन मानते हुए उसे मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य ऐसे लोग हैं जो शाकाहार को सात्विक भोजन कहते हुए मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता पर बल देते हैं। दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने मत को पुष्ट करने के लिए हमारे समक्ष तरह-तरह की दलीलें प्रस्तुत करते हैं। कुछ दलीलें हमारी बुद्धि को मान्य होती हैं और कुछ हमारे हमें नहीं भातीं। 
            शाकाहार निर्विरोध रूप से सभी को स्वीकार्य है। अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि शाकाहार ही मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन है। इसलिए बहुत से लोग स्वेच्छा से शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मांस भक्षण यानी मांसाहार के विषय में हमारे मनीषी अथवा हमारे ग्रन्थ हमें क्या समझाते हैं? इसकी हम आज विवेचना करते हैं। 'मनुस्मृति' में भगवान मनु कहते हों-
        मांसभक्षयिताSमत्र यस्य मांसमिहाद्भ्यहम्।
       एतन्मासस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिण:॥
अर्थात् मैं जिसके मांस को यहाँ (इस संसार में) खाता हूँ, वह भी परलोक में मुझे खाएगा। विद्वान मांस शब्द का यही मांसत्व बताते हैं।
          'मनुस्मृति' ही अन्यत्र मनु महाराज ने और भी कहा है-
       यावन्ति पशुरोमाणि तावन्कृतवोह मारणम्।
       वृथा पशुघ्न: प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि।।
अर्थात् जो मनुष्य निरपराध पशु का वध करता है, पशु की देह पर जितने रोम हैं, वह उतनी ही बार जन्म-जन्म में प्रतिघात प्राप्त करता है अर्थात् दूसरों के हाथों से मारा जाता है।
          'मनुस्मृति' के इन दोनों श्लोकों में भगवान मनु कहना चाहते हैं कि किसी भी पशु का वध करने वालों को बार-बार जन्म लेकर उसी प्रकार हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जब तक उनका प्रायश्चित न हो जाए उन्हें छुटकारा नहीं मिल पाता।
          श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
         भूतेषु बद्धवैरस्य न मन: शान्तिमृच्छति।
अर्थात् जीवों पर वैर का भाव मनुष्य के मन को कभी शान्ति नहीं देता।
        भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में  अन्यत्र कहा है-
        निर्वैर: सर्वभूतेषु य:स सामेति पाण्डव!
अर्थात् हे अर्जुन! जो सभी जीवों पर वैर रहित है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है।
          दोनों ही श्लोकाँशों में भगवान कृष्ण का कथन है कि किसी भी जीव से वैर भाव नहीं रखना चाहिए। किसी जीव का अहित करने पर मन में एक कसक सी रहती है। मनुष्य में बेचैनी रहती है। वे कहते हैं कि मुझे वही प्राप्त कर सकता है जो  मन, वचन व कर्म से भी किसी का अहित न करे।
            श्रीमद्भागवत् में बहुत ही सुन्दर शब्दों में आदेश दिया है किया है-
        मृगोष्ट्र खरमर्काखु सरीसृप्खगमक्षिका:।
       आत्मन: पुत्रवत् पश्येत् तैरेषामनन्तरं कियत्॥ 
अर्थात् हिरण, ऊँट, गधा, बन्दर, चूहा, सरीसृप, सर्प, पक्षी और मक्खी आदि को अपने पुत्र के समान ही समझना चाहिए वास्तव में उनमें और पुत्रों में अन्तर ही कितना है?
            श्रीमद्भागवद् ने व्याख्यायित किया है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी अपने पुत्र के समान मानकर उनकी रक्षा करे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जैसे मनुष्य अपने पुत्र का वध नहीं कर सकता उसी तरह अन्य जीवों को भी नष्ट नहीं करना चाहिए।
          शतपथ ब्राह्मण का कथन है-
        यदु वा आत्मसंमितं तदवति तन्न हिंसति।
       यद् भूयो हिनस्ति तत् यत्कनीयो न तदवति॥
अर्थात् जो आत्मानुकूल है वह रक्षा करता है हिंसा नहीं। और जो हिंसा करता है वह तुच्छ होता है।
              अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांत पर हमारी भारतीय संस्कृति आधारित है। इसका मूल मन्त्र है जो सभी जीवों के प्रति दया और सम्मान सिखाता है। मांसभक्षण को न केवल स्वास्थ्य बल्कि नैतिकता के विरुद्ध भी माना गया है। यह मान्यता इस विचार को पुष्ट करती है कि किसी निर्दोष प्राणी की हत्या करना या उसका मांस खाना नैतिक रूप से उचित नहीं है। यह कथन भी विचारणीय है -
          सर्वैषामपि मांसभश्रणमयुक्तम्
अर्थात् सभी के लिए मांस खाना अनुचित है।  
            साधु पुरुष दूसरे के शरीर को अपने समान ही मानते हैं और संसार के सभी प्राणियों में आत्मा का अंश देखते हैं। अतः अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। किसी भी प्राणी की हिंसा करके उसका मांस खाना अनुचित माना गया है। हिंसा चाहे जीभ के स्वाद के लिए हो अथवा शौक के लिए हो, कभी भी प्रशंसनीय नहीं होती। शेष सुधीजन स्वयं विचार करने में समर्थ हैं।
चन्द्र प्रभा सूद