शुक्रवार, 29 मई 2026

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़ होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
         बुजुर्ग परिवार के अनुभव और ज्ञान के अनुपात होते हैं। वे अपने जीवन के गुणों से बच्चों को शिक्षित करते हैं। ये परिवार में संस्कार और परम्परा को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। पूर्वजों का आदर और सम्मान करने से परिवार में द्विपक्षीय प्रेम और लाभ प्राप्त होता है।
          बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी, "बारात में किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे।"
            अब लड़के वाले परेशान हो गए, "बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी?"
           तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन लोगों को परामर्श दिया, "बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।"
          इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया।
          तब दुल्हन पक्ष वालों ने दूल्हे पक्ष वालों से पूछा, "उन रस्मों को उन्होंने किस प्रकार निभाया।" 
         उस समय उन्होंने ने बताया' "वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं।"
           उस समय सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
          बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से मनुष्य कभी नहीं ऊबता। जिस प्रकार नमक से भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, उसी प्रकार बजुर्गों के होने से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं। भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है, उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
          परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, नियमित स्वास्थ्य जॉंच करवानी चाहिए। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयॉं सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन देना सबसे जरूरी है। उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और स्वतन्त्रता देनी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर महसूस कराना चाहिए। घर में उन्हें चलने-फिरने की जगह को सुलभ बनाना चाहिए।साथ ही घर में जरूरी सुरक्षा बदलाव करके और उनके साथ समय व्यतीत करके उनके एकाकीपन को दूर किया जा सकता है।
          माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते पर माता-पिता उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात् सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैं, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती। 
          इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैं, वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन करना सदा ही कल्याणकारी होता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है।
          बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 28 मई 2026

दोषारोपण करना सबसे सरल

दोषारोपण करना सबसे सरल 

दूसरों पर दोषारोपण करना सबसे सरल कार्य है। मनुष्य सोचता है कि दूसरे को फंसाकर वह बच जाएगा परन्तु ऐसा होता नहीं है। स्वयं का बचाव करने के लिए कभी भी दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। सच्चाई कभी-न-कभी तो प्रकट हो ही जाती है। उस समय मनुष्य की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। तब बगलें झाँकने के अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं शेष बचता।
           दोषारोपण करना वास्तव में सबसे सरल और तात्कालिक प्रतिक्रिया है जो अक्सर अपनी गलतियों या जिम्मेदारियों से बचने के लिए अपनाई जाती है। यह व्यवहार क्षणिक राहत देता है। अन्ततः व्यक्तिगत विकास को बाधित करता है। इससे रिश्तों में खटास आती है और नकारात्मकता बढ़ती है। 
           हम सब मानते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। उसके पास सत्य को प्रकट करने के लिए अपने ही तरीके हैं। कभी-कभी मनुष्य का अपना जमीर ही उसे बार-बार कचोटने लगता है। तब वह अपराधबोध से बहुत अधिक ग्रसित हो जाता है और फिर वह मानसिक दबाव झेल नहीं पाता। इस कारण वह स्वयं ही उस सत्य को सबके समक्ष प्रकट कर देता है जिसे वह एक अर्से से छिपाता चला आ रहा होता है।
          हमारे सयाने हमें चेतावनी देते हुए कहते हैं -
         झूठ को सात पर्दों में भी छिपाकर रख लो
         वह सामने आ ही जाता है। 
जैसे सुगन्ध चारों ओर बिना प्रयास के फैलती है। इसी प्रकार दुर्गन्ध भी हर तरफ फैल जाती है। और भी कहा जाता है - 
             झूठ के पाँव नहीं होते।
कहने का तात्पर्य है कि झूठे दूसरों के कन्धों पर चढ़कर वह बहुत समय तक सवारी नहीं कर सकता। उसे वास्तविकता के धरातल पर आना ही होता है।
            बचपन से ही दोषारोपण की यह बीमारी आरम्भ हो जाती है। शैतानी करने पर अपने दूसरे भाई-बहन अथवा मित्र-पडौसी के बच्चे पर अपना दोष मढ़ने का कार्य बच्चे बखूबी करते हैं। पढ़ाई ठीक से न करने पर जब परीक्षा में कम अंक आते हैं तब अपनी खाल बचाने के लिए अध्यापक पर पक्षपात का दोष लगाना सबसे सरल कार्य होता है। अध्यापक ने जबरदस्ती अंक काटे हैं, उसे मेरे साथ पता नहीं क्या दुश्मनी है?
            ज्यों ज्यों इन्सान बड़ा होता जाता है त्यों त्यों दोषारोपण के इस अनुचित कार्य में वह अधिक दक्षता प्राप्त करता जाता है। समय और स्थितियों के अनुसार वह अपने बचाव के लिए बकरे ढूँढता ही रहता है। कार्यालय में गड़बड़ी करने पर कभी अपने बास को दोष देता है तो कभी अपने ही  साथियों को कटघरे में खड़ा कर देता है। जब और कोई न मिले तो उस समय बस सरकार को ही कोसकर अपनी भड़ास निकाल लो।
              अपने घर में ही देखिए, पति अपनी पत्नी पर किसी भी प्रकार की गलती का दोष मढ़कर, उसे भलाबुरा कहकर अपने अहं को तुष्ट कर लेता है। इसी तरह पत्नी भी अपने पति को गाहेबगाहे दोषी ठहराकर सबकी सहानुभूति बटोरने का प्रयास करती रहती है।
            जन साधारण हर समस्या को बढ़ावा देने और उसका निदान न करने के लिए अपने चुने हुए नेताओं को दोष देते हैं, सारा समय उनकी आलोचना करते रहते हैं। सभी राजनैतिक दल अपने विरोधियों पर प्रतिदिन परेशानियाँ बढ़ाने का दोषारोपण करते हैं।
           सड़क पर चलते हुए कोई भी व्यक्ति अपनी गलती न मानकर सामने वाले को ही दोष देता है, गाली-गलौच करता है और मारपीट करने के लिए उतावला हो जाता है।
          यदि सभी मनुष्य अपने अनतस् में या अपने गिरेबान में झाँक ले तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। तब उन्हें अपने ऊपर शर्म आने लगेगी कि वे किस हद तक गिर सकते हैं। 
          सन्त  कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा आत्म-निरीक्षण और विनम्रता का सन्देश देता है। यह दोहा भी यही सच्चाई प्रकट कर रहा है -
       बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई।
       जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोई।।
अर्थात् जब हम दूसरों में कमियॉं ढूंढते हैं तो हमें कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिलता। लेकिन जब हम अपने मन के भीतर झॉंकते हैं तो हमें एहसास होता है कि हमसे बुरा कोई नहीं है। 
           कबीरदास जी के अनुसार हमें दूसरों की गलतियॉं खोजने के स्थान पर अपनी कमियों को सुधारना चाहिए। सच्चा ज्ञान खुद को जानने और आत्म-सुधार करने से ही आता है। दूसरों के दोष ढूँढते हुए हम छिद्रान्वेषी बन जाने का अपराध करते हैं। यदि हम स्वयं को खोजने लगें तब पता चलेगा कि हमारे भीतर दोषों की कोई कमी नहीं है।
        अतः दोषारोपण करना छ़ोड़कर यदि अपने दोषों का सुधार कर लें तो यह मानव जीवन धन्य हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 27 मई 2026

जिन्दगी जीना एक कला

जिन्दगी जीना एक कला

जिन्दगी जीना एक कला है। मनुष्य आयुपर्यन्त नई-नई बातें सीखता है। मनुष्य द्वारा प्राप्त हर नई सीख उसे दिशा दिखाती है और कमियों को दूर करने में सहायता करती है। यही जीवन है और सफलतापूर्वक जीवन जीने को हम जीवन जीने की कला कह सकते हैं।
           वास्तव में अपने जीवन को समझदारी, रचनात्मकता और सकारात्मकता के साथ जीना एक कला है। केवल अस्तित्व बनाए रखना जीने की कला नहीं कहलाती। जीवन जीना एक साधना है जिसमें आत्म-सुधार, तनाव-मुक्त रहना और विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहकर कर्म करना शामिल होता है। 
             वैसे तो अपना-अपना जीवन सभी चराचर जीव जीते हैं। कुछ लोग जिन्दगी में ऐसे कार्य कर जाते हैं कि वे युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। उनके विपरीत ऐसे भी लोग हैं जो एड़िया घिसते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं। कीड़े-मकौड़ों की जीना कोई जीना नहीं कहलाता। 
           जीवन की चुनौतियों और संघर्षों के बीच भी मानसिक शान्ति कैसे बनाए रखी जाए, यह महत्त्वपूर्ण है। जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं अपितु दूसरों के काम आने और निस्वार्थ कर्म करने का नाम है। अपनी कमजोरियों को दूर करना और अच्छी आदतों को अपनाकर अपनी प्रगति सुनिश्चित करना होता है। दुखों से विचलित न होकर धैर्य के साथ जीवन का आननद लिया जाना चाहिए। यानी कि जीवन को एक कलाकार की तरह रचनात्मक और सार्थक बनाना ही सच्ची कला है।
          जीवन उसी का सफल है जिसके जाने के बाद लोग उसे श्रद्धा और प्रेम से याद करें। जिन्दगी उसकी सफल है जिसकी मौत पर जमाना अफसोस करे। वरना इस असार संसार में हर किसी का जन्म मरने के लिए ही होता है।
            जिन्दगी को जीना कभी भी किसी के लिए आसान नहीं होती। इसे आसान बनाने के लिए अथक प्रयास करना पड़ता है। सौ पापड़ बेलने पड़ते हैं। दूसरों की गलतियों को नजरअंदाज करना होता है और कुछ लोगों को न चाहते हुए बर्दाशत करना पड़ता है। जीवन में जीतोड़ मेहनत करनी आवश्यक होती है। इसके साथ ही सही वक्त पर सही फैसले लेने होते हैं।
           जीवन में हर किसी को खुश कर पाना टेढ़ी खीर होती है। जिन्दगी बीत जाती है सबको खुश रखने के प्रयास करने में। जो लोग खुश हुए वे अपने नहीं थे। जो लोग अपने थे वे लाख कोशिशों के बाद भी खुश नहीं हो सके। आजकल रिश्ते रोटी की तरह गोल हो गए हैं, उनका ओरछोर ही समझ में नहीं आता। जरा-सी भी आँच बढ़ाने पर जैसे रोटी जल जाती है उसी प्रकार यदि रिश्ते न सम्हाले जाएँ तो तुरन्त बिखर जाते हैं।
          जीवन फूलों की सेज नहीं हैं, कदम-कदम पर यहॉं काँटे बिछे रहते हैं। जीवन के हर मोड़ पर बहुत-सी कठिनाइयॉं रास्ता रोककर खड़ी रहती हैं। मनुष्य को इसके लिए कभी शिकायत नहीं करनी चाह। भगवान ऐसा कुशल डायरेक्टर है जो सबसे कठिन रोल बेस्ट एक्टर को ही देता है। यानी कि हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार रोल देकर इस दुनिया में भेजता है।
           यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा जीवन एक नाटक है। यदि हम दिए गए कथानक को ठीक से समझ लेंगे तो सदैव खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं। कोई भी व्यक्ति यहाँ किसी का अहसान नहीं लेना चाहता। उसे यही लगता है कि सारी जिन्दगी नजरें झुकाकर चलने से अच्छा है कि किसी का अहसान ही न लिया जाए। अपनी या दूसरों की नजरों से गिरकर कोई भी नहीं जीना चाहता। 
          जिन्दगी हर मोड़ पर परीक्षा लेती है। यहाँ मुझे 1972 की प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म 'सीता और गीता' के लोकप्रिय गीत पंक्ति याद आ रही है। इसे आशा भोसले और मन्ना डे ने गाया है, संगीत आर.डी. बर्मन ने दिया है और बोल आनन्द बख्शी ने लिखे हैं -
      जिन्दगी है खेल, कोई पास कोई फेल
      खिलाड़ी है कोई अनाड़ी है कोई।
जीवन में हार-जीत की चिन्ता किए बिना खेल भावना से लेते हुए निरन्तर गतिशील रहना चाहिए।यही फलसफा है कि कोई चाहे या न चाहे मनुष्य को सबका साथ निभाना ही पड़ता है। इसका कारण है मनुष्य का सामाजिक प्राणी होना। वह पलभर के लिए भी अकेला रह नहीं सकता। उसे हर समय किसी-न-किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती रहती है।
           जिन्दगी में क्या खोया क्या पाया, इसका हिसाब कभी रखा नहीं जा सकता। जो कुछ भी हम जीवन में खोते हैं, उसमें अपनी नादानी होती है और जो पाते हैं वह प्रभु की कृपा ही होती है। इन्सान और ईश्वर के बीच बहुत ही खूबसूरत रिश्ता है। मनुष्य हर समय कुछ-न-कुछ माँगता रहता है और वह हम पर बिना अहसान किए बिनमाँगे ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। वह हमें मालामाल करता रहता है।
          जिन्दगी वही अच्छी होती है जिसके हर पृष्ठ पर प्रेम की प्रेरणा होती है। कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य हर जीव से प्रेम करे। अपने सद्ज्ञान तथा विवेक से मार्गदर्शन लेते हुए इस जीवन को सफल बनाए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 26 मई 2026

मरणधर्मा है यह संसार

मरणधर्मा है यह संसार

मानव के इस शरीर का स्वभाव मरणशील है। यह संसार इसलिए मरणधर्मा कहलाता है क्योंकि जो भी जड़-चेतन जीव यहाँ जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित होती है। यानी यहाँ जन्म लेने वाली हर वस्तु और प्राणी का अन्त निश्चित है। यह नश्वरता शरीर और सांसारिक विषयों तक सीमित है जबकि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। यह विचार ज्ञान और अनासक्ति की ओर ले जाता है। इसीलिए इस संसार को असार भी कहा जाता है।
         इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ समय के साथ बदलता रहता है और मिटता रहता है। देह मरणधर्मा है, इसलिए देह से जुड़े सुख-दुःख और प्रारब्ध भी क्षणभंगुर हैं। शरीर का जन्म होना और फिर मरण होना धर्म है। शरीर में रहने वाली आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नए रूप में बदलती रहती है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। प्रायः यह कहा जाता है कि इस जगत में मुख्य रूप से अहंकार ही नष्ट होने वाला है। यह दार्शनिक दृष्टिकोण हमें जीवन की अनित्यता को स्वीकार करके फल की इच्छा के बिना कर्म पर ध्यान केन्द्रित करने की प्रेरणा देता है। 
          'हितोपदेश' ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने इस विषय में कहा है -
      काय: सन्निहितापाय: सम्पद: पदमापदाम्।
      समागमा: सापगमा: सर्वमुत्पदि भङ्गुरम्॥
अर्थात् शरीर का स्वभाव विनाश है। सम्पत्तियों और आपत्तियों का स्थान हैं। संयोग-वियोग वाले हैं और सम्पूर्ण उत्पन्न पदार्थ क्षणभंगुर हैं।
        इस श्लोक में कवि का कथन है कि शरीर का स्वभाव विनाश है। मनुष्य परिश्रम करके सम्पत्तियाँ जुटाता है। फिर उन एकत्रित किए गए ऐश्वर्यो का भोग करता है। उसके जीवन में क्रमानुसार विपत्तियाँ आती हैं जो उसे दुखों के भंवर में छोड़ देती हैं। उनसे त्रस्त मनुष्य को कहीं ठौर नही मिलता। उस कष्टकारी समय को बिताने में उसे नानी याद आ जाती है। उस समय उसके अपने भी उससे किनारा कर लेते हैं। तब वह इस संसार सागर में निपट अकेला रह जाता है
          अपने बन्धु-बान्धवों से उसका संयोग होता है और कुछ समय पश्चात उनसे वियोग भी हो जाता है। उसका कोई-न-कोई प्रियजन इस असार संसार में पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोगकर सदा के लिए यहाँ से विदा ले लेता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न सभी जीव क्षणभंगुर कहलाते हैं।
            इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आचार्य चाणक्य के इस कथन पर विचार करते हैं -
      नासातो निर्गमस्यापि श्वासस्य च महामुने।
      प्रवेशे प्रत्ययो नास्ति प्रातरागमनं कुत:॥
अर्थात् हे महामुने! नाक से निकला श्वास पुन: प्रवेश कर पाएगा या नहीं, इसका भी भरोसा नहीं है। तब प्रात:काल के आने की बात ही क्या?
          आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हम जो श्वास दिन के चौबीसों घण्टे लेते हैं, उसका कुछ भी भरोसा नहीं है। अभी जो श्वास ले लिया है, उसके बाद का श्वास हमें लेने के लिए मिलेगा अथवा नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं। यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। इस विषय में उस ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता।
          यह संसार जीव की कर्मभूमि है। यहाँ मनुष्य के रूप में जन्म लेकर वह अपने कर्मों को बीजरूप में बोता है और जन्म-जन्मान्तर तक उसके कड़वे-मीठे फल खाता रहता है। चौरासी लाख कही जाने वाली योनियों में केवल मनुष्य योनि ही कर्मयोनि कहलाती है, शेष अन्य योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। वहाँ जीव मात्र अपने कर्मों का फल भोगता है परन्तु कर्म कर नहीं सकता। इसलिए मनुष्य का अपने कर्मों के प्रति सदा सजग रहना आवश्यक है।
          मनीषियों का मानना है कि जीव संसार में रहते हुए यदि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के बनाए नियमों के अनुसार कर्म करता है तो वे श्रेष्ठ कर्म करता है। इसके विपरीत किए गए कर्म निम्न कहलाते हैं। शुभकर्मों का फल उसे इस जन्म में और आगामी जन्म में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य देते हैं। इसके विपरीत उसके दुष्कर्म उसे इहलोक और परलोक में महान् कष्ट और परेशानियाँ देते हैँ। उन्हें भोगने में मनुष्य को बहुत कष्ट होता है।
           मनुष्य चाहे तो अपना लोक और परलोक दोनों सुधारकर उस मालिक का प्रिय बन सकता है अन्यथा वह जन्म-जन्मान्तरों तक अपने कर्मो का भुगतान दुखों और कष्टों के रूप में करता रहेगा। यह संसार उसकी बपौती नहीं है, यहाँ से उसकी विदाई निश्चित है। चाहे वह कितना ही विरोध कर ले, वह सब व्यर्थ रहता है। उसे नियति के समक्ष सिर झुकाना ही पड़ता है।
          इस क्षणभंगुर नश्वर शरीर से जिन सत्कर्मों की वृद्धि करनी है कर लीजिए। यदि यह समय निकल गया तो फिर हाथ नहीं आएगा। अन्तकाल में यदि पश्चाताप कर भी लिया तो कुछ भी सुधार नहीं हो सकेगा। अत: अपने साथ मित्रता निभाना बहुत आवश्यक हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 25 मई 2026

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश परस्पर विरोधी होते हुए भी एक सिक्के के दो पासों की तरह जुड़े रहते हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ निर्माण है वहाँ विनाश भी अवश्यम्भावी होता है। विनाश और निर्माण दोनों साथ-साथ चलते हैं। यहॉं हम वसन्त ऋतु और पतझड़ का उदाहरण लें सकते हैं। एक ओर पतझड़ के कारण वृक्षों के पत्ते और फूल गिरकर पेड़ों को ठूॅंठ बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर वसन्त ऋतु चारों ओर हरियाली और सुगन्ध लेकर आती है।
            यानी निर्माण एक रचनात्मक, योजनाबद्ध और समय लेने वाली प्रक्रिया है जो नई वस्तुओं को बनाती है। दूसरी ओर विनाश एक शीघ्र घटने वाली, बेतरतीब और नकारात्मक प्रक्रिया है जो मौजूद संरचनाओं को नष्ट कर देती है। निर्माण का उद्देश्य विकास है जबकि विनाश का परिणाम ह्रास या समाप्ति होता है।          
           इसीलिए इस संसार को मरणधर्मा कहा जाता है। इसका अर्थ यही है कि जो भी चराचर जीव इस दुनिया में आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। उसके चाहने या न चाहने का कोई औचित्य नहीं होता। उसे इस धरा से जाना ही होता है, उसके पास इसका कोई विकल्प नहीं होता। सदा के लिए कोई भी यहाँ नहीं रह सकता।
          निर्माण का उद्देश्य सृजन, उपयोगिता और वृद्धि करना होता है। निर्माण सकारात्मक होता है जो संरचना का निर्माण करता है। जबकि विनाश का उद्देश्य प्रायः वस्तुओं को मिटाना अथवा ऊर्जा को नष्ट करना होता है। वह विनाशकारी और नकारात्मक होता है जो संरचना का ह्रास या क्षरण करता है।
            बीज का वृक्ष बनना रूप परिवर्तन होता है, निर्माण नहीं कहलाता। परन्तु वृक्ष को काटकर उससे अपनी आवश्यकता की अथवा आकर्षक वस्तुएँ बनाना निर्माण कहलाता है। उस काष्ठ को नष्ट कर देना या ईंधन के रूप में उसका प्रयोग करना ही विनाश कहलाता है। 
           यह समस्त चराचर जगत् उस प्रभु की रचना है अथवा निर्माण है। जब भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं तब वे स्थान-स्थान पर विनाश का ताण्डव करती हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि मचने लगती है। वे किसी भी चराचर जीव का पक्षपात नहीं करतीं। सभी पर उस विनाश का प्रभाव पड़ता है।
          किसी भी निर्माण में वर्षों लगते हैं किन्तु उसका विनाश करने में अधिक समय नहीं लगता। जैसे एक बहुमंजिला भवन बनाने में वर्ष भर या इससे भी अधिक समय लग सकता है परन्तु उसे तोड़ने के लिए कुछ दिन ही बहुत हो जाते हैं। मैं यही कहना चाहती हूँ कि निर्माण करना बहुत कठिन कार्य होता है और विध्वंस करना अपेक्षाकृत बहुत सरल होता है। 
          'सूक्तिमुक्तावली' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव का वर्णन किया है-
        दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तुनिमेष-
                     मात्रेण भजेद् विनाशम्।
        कृतं कुलालस्य तु वर्षमैक नेतुं हि 
                       दण्डस्य मुहुर्तमात्रम्॥
अर्थात् लम्बी अवधि में परिश्रम से प्रस्तुत की गई वस्तु का विनाश क्षणभर में ही किया जा सकता है। कुम्भकार को जिस वस्तु को तैयार करने में एक वर्ष का समय लगता है, उसी को डण्डे ने क्षणभर में ही विध्वस्त कर दिया।
             इस श्लोक के माध्यम से कवि हमें यही समझाना चाहता है कि निर्माण की अपेक्षा विध्वंस सरलता से, बिना समय गॅंवाए पलभर में किया जा सकता है। कुम्हार का उदाहरण देकर अपनी बात को कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रस्तुत किया है। इसके माध्यम से सरलता से कवि का आशय समझा जा सकता है।
            इतिहास के पन्ने खंगालने पर हम जान सकते हैं कि कितने शहर, कितनी सभ्यताएँ समय बीतते पृथ्वी के गर्त में  समा गईं। आज जब कभी उन स्थानों की खुदाई की जाती है तो वहाँ से उन प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष मिलते रहते हैं। वे किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होते। यह उन सबकी विनाश लीला को दर्शाती है। आखिर कभी तो वहाँ इतना निर्माण हुआ होगा।
          विद्वानों का मानना है कि रेगिस्तान के स्थान पर नदियाँ अथवा समुद्र आ जाते हैं और समुद्रों अथवा नदियों के स्थान पर शहर बस जाते हैं। इसी प्रकार पर्वत धरती में बदल जाते हैं और पृथ्वी पहाड़ों अथवा टीलों में बदल जाती है। यह भी निर्माण और विनाश की ही कहानी कही जा सकती है। इसी तरह समुद्र से भी यदा कदा खोई वस्तुओं के अवशेष मिलते रहते हैं जिसके विषय में जानकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
            मनुष्य को सदा निर्माण कार्य करते रहना चाहिए जो देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए उपयोगी हों। उसे आतंकवादी तथा तोड़फोड़ की अन्य सभी गतिविधियों से यथासम्भव दूर हो रहना चाहिए। निर्माण सदा-सर्वदा श्रेयस्कर होता है और विनाश की ओर कदम बढ़ाना पतन का कारण बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 24 मई 2026

तन्हाइयॉं

'तन्हाइयाँ' मेरी पहली कविता है। इसे मैंने‌अक्टूबर 2014 में बंगलौर में लिखा था। मैं और सूद साहब प्रतिवर्ष बच्चों के पास अक्टूबर माह में बंगलौर जाया करते थे। एक दोपहर को वहॉं बैठे हुए उन लोगों के विषय में विचार आया जो इस दुनिया में बिल्कुल अकेले हैं या भरापूरा परिवार होते हुए भी अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं अथवा सामाजिक परिस्थतिवश निपट अकेले हैं।
        मैं कविता नहीं लिखती थी परन्तु मन में आए इन विचारों को सूत्र में पिरोने से स्वयं को रोक नहीं पाई। इसलिए इस विषय पर लिखे मेरे कुछ उदगार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। आशा है मेरी इस पहली कविता को पढ़कर सुधीजन अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे।
                  तन्हाइयाँ

मेरे पीछे-पीछे दबे पाँव अचानक कोई
घर में घुसने की कोशिश में शायद अब
जोर से दरवाजे की साँकल खटका रहा है
समझ नहीं पाई वह कौन हो सकता है?

उफ, अब तो उठकर जाना ही होगा मुझे
दरवाजा भी खोलना पड़ेगा न चाहते हुए
चलो, चलकर देखते हैं कौन है वहाँ पर?
क्यों मुझे वह अधीरता से पुकार रहा है?

उसकी बैचेनी का आखिर कारण क्या है?
उठती हूँ, बाहर जाती हूँ उसे देखने हेतु
सोचती हूँ कौन-सा मेहमान आया है यहाँ
यह क्या? द्वार खोलते ही एक अजनबी।

मुझे एकटक निहारती हुई यह कौन है?
अपनी दोनों बाहें फैलाए सामने से आती
मेरी ओर खुले मन से बढ़ती यह कौन है?
मैंने घर के द्वार पर खड़े ही उससॆ पूछा।

कौन हो तुम? मैं नहीं पहचानती तुम्हें
बड़ी जोर से हँसकर बोली थी मुझसे
मैं तेरी सखी हूँ, भूल गई हो क्या मुझे?
मैं तो हर पल ही तेरे साथ थी पगली।

कुछ दिन तेरे घर में चहल-पहल देख
दूर चली गई थी घूमने-फिरने के लिए
परन्तु अब तो मैं तेरे पास लौट आई हूँ
तुझे थामने औ प्यार से बचाने के लिए।

मैंने फिर उससे तमतमा कर पूछ लिया
यह बता दो मुझे तुम आखिर हो कौन?
मुझसे लिपटकर बड़े प्यार से बोली वो
मैं तेरी सखी हूँ, तेरी तन्हाई हूँ बावली।

तुझ से दूर रहकर जी नहीं सकती थी
इसीलिए तेरे पास आई हूँ अरी सखी
किसी साथी के न होने का यह गम 
नहीं सतायेगा तुझे अकेलापन उम्रभर।

मेरे साथ साँझे कर लो री सखी तुम
अपने सभी हसीन कमसिन से पल
सारी खुशी अपने सारे गम जानेमन
समेटकर अपने दिल में बसा ले मुझे।

तेरे आँगन में हरपल मैं इठलाऊँगी
घर में अन्दर-बाहर सदा-सर्वदा ही
चारों तरफ तुझे नजर आऊँगी सखी
प्रिये! अपना बना ले मुझे सोच मत।

अपनी यादों के झरोखों से तुम अब
मत निकालो मुझे घर से और दिल से
बहुत पछताओगी रोवोगी गिड़गिड़ोगी
अपने इस मन में बसा ले सदा के लिए।

उसका इतना कहना बहुत था मेरे लिए
उसे अपने मन में, अपने घर में बसाया
तो बसा ही लिया हमेशा-हमेशा के लिए
अब बस मैं हूँ और है मेरी मेरी तन्हाई।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 23 मई 2026

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता यानी आज का कार्य कल पर टालने की हमारी प्रवृत्ति के कारण ही हम कदम-कदम पर असफलता का मुँह देखते हैं। जिस कल की हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, वह कल तो कभी आता ही नहीं है। किसी कार्य को करने की योजना जब एक बार बना ली तो फिर इस आलस्य का कारण समझ में नहीं आता। दीर्घसूत्रता यानी काम को कल पर टालना केवल समय की बर्बादी नहीं है अपितु अपने सपनों और सफलता को जानबूझकर पीछे धकेलने की प्रक्रिया है।
             दीर्घसूत्रता या काम को टालने की आदत, सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसका अर्थ है महत्वपूर्ण कार्यों को बिना किसी ठोस कारण के भविष्य के लिए छोड़ देना। यह असफलता का मूल कारण है क्योंकि यह समय बर्बाद करती है, अवसरों को नष्ट करती है और व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करके दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधक बनती है। 
             सही समय पर निर्णय न लेने या कार्य न करने से अच्छे-अच्छे अवसर मनुष्य के हाथ से निकल जाते हैं। महत्वपूर्ण कार्यों को अन्तिम समय के लिए छोड़ने के कारण चिन्ता बढ़ती है। इससे कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जब कार्यों को बार-बार टालने की आदत बन जाती है तो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। 
          सन्त कबीरदास द्वारा रचित एक प्रसिद्ध दोहा है जो समय के महत्व और कार्यों को तुरंत पूरा करने की प्रेरणा देता है -
      कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
     पल में परलय  होएगी  बहुरि  करेगा कब॥
अर्थात् जिस कार्य को कल करना चाहते हो उसे आज ही कर लेना चाहिए। जिस कार्य को आज करना चाहते हो उसे अभी कर लेना चाहिए। पलभर में प्रलय आ जाती है यानि प्राकृतिक आपदा के आ जाने पर जब  विनाश हो जाएगा तब फिर वह सोचा हुआ कार्य कब कर सकोगे?
           दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भविष्य के लिए काम नहीं टालना चाहिए क्योंकि जीवन अनिश्चित है। 'पल में प्रलय' का अर्थ है कि कल कभी नहीं आता। इसलिए आज का काम शीघ्र ही अभी पूरा कर लेना चाहिए। हमें चेतावनी देते हुए कवि ने इस दोहे में समझाने का प्रयास किया है।
          'लोकानन्दम्' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव के विषय में कहा है-
      श्व:  कार्यमेतदिदमद्य  परं   मुहुर्ताद्।
      एतत् क्षणादिति जनेन विचिन्त्यमाने॥
      तिर्यग्निरीक्षणपिशङ्गितकालदण्ड:।
      शङ्के हसत्यसहन: कुपित: कृतान्त:॥
अर्थात् यह कल करूँगा, इसे आज ही थोड़ी देर बार करूँगा और इसे तो क्षणभर में कर लूँगा। लोगों को इस तरह विचार करते हुए देखकर मैं सोचता हूँ कि असहनशील क्रुद्ध यमराज हाथ में काल का दण्ड लिए हुए और कटाक्ष निरीक्षण करते हुए उन पर हंसते हैं।
           कवि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के जीवन का समय उसके पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार ईश्वर की ओर से मिलता है। हमारी नादानी या टालमटोल करने के स्वभाव के कारण हम लोग आजकल, आजकल करता रहते हैं और पल-पल करके उसका जीवन कम होता जा रहा है। मृत्यु का देवता मनुष्य की इस मूर्खता पर हंसता है।
            हम सभी मनुष्य अपने आलस्य के कारण कार्य अभी करते हैं क्या जल्दी है? प्रात:काल कर लेंगे, सायंकाल करेंगे अथवा कल कर लेंगे, बस यही करते हुए अपना अमूल्य समय नष्ट करते नहीं थकते। समय बीत जाने के बाद सिर धुनने का लाभ नहीं होता। कहते हैं- 
            का वर्षा या कृषि सुखाने।
अर्थात् जब फसल खराब हो गई तब वर्षा हो भी जाए तब उसका कोई लाभ नहीं अथवा बेकार हो जाती है। समय रहते यदि वर्षा हो जाती तो किसान का नुकसान न होता।
          बच्चा स्कूल में पढ़ता है तब वह वहाँ पढ़ाए गए पाठ को यदि प्रतिदिन दोहरा ले तो परीक्षा के समय उसे अतिरिक्त पढ़ाई करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। पर वह तो मस्ती करता रहता है। सोचता है अभी खेल लूँ या अभी टी. वी. देख लूँ या दोस्तों के साथ चैटिंग कर लूँ या थोड़ा घूम लूँ, फिर पढूँगा। ऐसा करते रहने पर पढ़ाई पिछड़ जाती है और परीक्षा के समय जब पुस्तक खोलता है तो उसे कुछ समझ नहीं आता।
          इसी प्रकार हम उत्साह से योजनाएँ बनाते रहते हैँ और आज क्रियान्वित करेंगे या कल कर लेंगे ऐसा सोचते रहते है और फिर रेस में पिछड़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। फिर जब हानि उठाते हैं तब फिर दूसरों को कोसते हैं।
          दीर्घसूत्री सदा ही अपनी इस आदत के कारण परेशान रहता है। बस पकड़नी हो या रेल या जहाज हर स्थान पर भागते हुए पहुँचता है और कभी-कभी उसकी बस, रेल या जहाज छूट भी जाते हैं। अपने कार्यस्थल पर देर से पहुँचकर वह बास की डाँट खाता है। शादी-ब्याह व पार्टियों में देर से पहुँचकर लोगों के कटाक्ष सहन करता है।
          अपनी दीर्घसूत्रता का त्याग करके यदि हम लोग समय पर बीज बो सकें तो कोई कारण नहीं कि हमें असफलता का मुँह देखना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद