गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

स्वार्थ को हावी न होने दें

स्वार्थ को हावी न होने दें 

अपने झूठे अहं के कारण जो मनुष्य दूसरों की सहायता नहीं करता, वह अन्ततः खाली हाथ रह जाता है। वह चाहे कितनी ही सुख-समृद्धि जुटा ले पर उसे मानसिक सन्तोष नहीं मिलता। वह सदा ही किसी-न-किसी कारण से भटकता रहता है। यह भटकाव उसे आजीवन परेशान करता रहता है। वह उसके सुख-चैन पर सदा घात लगाए बैठा रहता है। मनुष्य यदि दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से तत्पर हो जाए तो उसके बिना माँगे ही उसकी झोली में सब कुछ आ जाता है।
               एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक बार देवताओं और असुरों दोनों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया। जब वे दोनों आ गए तो उन दिनों गुटों को अलग-अलग मेज पर भोजन करने के लिए बिठा दिया गया। उनके सामने एक शर्त रखी गई, "उनकी बाहों में खप्पचियाँ बाँधी जाएँगी और उन सबको बॅंधे हुए हाथों से ही उन्हें भोजन समाप्त करना है।" 
           फिर उनको खप्पचियाँ बाँध दी गईं और फिर उनके समक्ष भोजन को परोस दिया गया। उन्हें खाना खाने के लिए आदेश देते हुए कहा गया, "अब आप सब भोजन कीजिए।"
            देवताओं और असुरों दोनों ने बहुत प्रयास किया परन्तु बाहें न मोड़ पाने के कारण वे खाना खाने में सफल नहीं हो पाए। वे चम्मच में खाना भरकर मुँह की ओर ले जाते तो बॅंधे हाथों के कारण खाना उनके मुँह में न जाकर जमीन पर गिर जाता। अब वे दोनों ही परेशान होने लगे, उनके समक्ष एक ही समस्या थी, "अब खाना कैसे खाया जाए?"
             असुरों की प्रकृति होती है कि वे कभी मिल-जुलकर रह नहीं पाते, अपने अहं के कारण सदा झगड़ते ही रहते हैं। यहाँ भी मिलकर खाने के विषय में वे असुर सोच ही नहीं पाए। उनका भोजन नीचे धरती पर गिरकर बिखरता हुआ समाप्त हो गया और वे बिनखाए भूखे ही उठ गए।
              दूसरी ओर देवता थे जो सहिष्णु और सबके हितचिन्तक होते हैं। उन्होंने बहुत विचार किया। फिर उन लोगों ने मिलकर एक उपाय सोचा और उस पर अमल करने लगे। सभी देवता गण आमने-सामने होकर बैठ गए। चम्मच में भोज्य लेते और सामने वाले के मुँह में डालते। इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते हुए ही उन्होंने भरपेट भोजन का आनन्द लिया। इस प्रकार देवताओं की बुद्धिमानी और परोपकार की भावना के कारण उनका भोजन बिल्कुल व्यर्थ में नष्ट नहीं हुआ और अपनी मेज से वे तृप्त होकर उठे। 
              यह कथा हमें यही समझाती है कि दूसरों के हित की चिन्ता करने पर अपना हित स्वयं ही सिद्ध हो जाता है। ईश्वर का न्याय है - 
           इस हाथ दो और उस हाथ लो।
बार-बार हम इस सत्य को भूल जाते है और स्वार्थ के हाथों विवश हो जाते हैं। यह स्वार्थ हमारी कामनाओं की पूर्ति का मात्र साधन नहीं है अपितु हमें मूर्ख बनाकर दिन-रात हमें ठगता रहता है। इस तरह हम भी अनजान बनकर अपना तमाशा स्वयं ही बन जाते हैं।
             मनुष्य जितना अधिक 'स्व' तक ही सीमित रहता है, उसे परेशानियो का सामना करना पड़ता है। परन्तु जब वह 'स्व' से ऊपर उठकर 'पर' यानी दूसरों के बारे में सोचना आरम्भ करने लगता है तो उसे सहज ही वह सब प्राप्त हो जाता है जिसे वह अपनी कल्पना में ही पाता रहता है। 
            इसीलिए हमारे मनीषी व्यष्टि(एक) से समष्टि(समूह या अनेक) की ओर चलने की बात करते हैं। यही कारण रहा होगा कि हमारे शास्त्रों में विश्व बन्धुत्व की परिकल्पना ककी गई। इसीलिए कहा जाता है- 
               वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् सारी पृथ्वी अपना घर है। 
             इस विचारधारा में सबको साथ लेकर चलने और मिल-जुलकर रहने की भावना बलवती होती है। हर मनुष्य को अपने घर-परिवार के आगे कुछ भी नहीं दिखाई देता। उन्हीं के लिए ही वह जीता है और सारा जीवन खटता रहता है। 
              स्वार्थ को हावी न होने देने के लिए परोपकार को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। सन्तुलित जीवन के लिए जरूरी है कि निजी स्वार्थ को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए।  जिससे 'मैं' और 'हम' के बीच सन्तुलन बना रहेजब मन में स्वार्थपरक विचार आने लगें तो वहीं रुक जाना चाहिए और रिश्तों की अहमियत को समझने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य को सदा यह समझना चाहिए कि  समाज के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है जिससे स्वार्थ स्वतः ही परोपकार में बदल जाएगा। 
           अतः सम्पूर्ण संसार को यदि मनुष्य अपना परिवार ही मान ले तो सारे फसाद की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। तब हर ओर से हम शुभ की ही कामना करेंगे। तब कोई स्वार्थ किसी पर हावी नहीं होगा। सब एक दूसरे का हित साधेंगे और सहायता करेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

दुख और सुख अभिन्न मित्र

दुख और सुख अभिन्न मित्र

दुख और सुख मनुष्य के अभिन्न मित्र हैं। कभी सुख साथ निभाने आता है तो कभी दुख दनदनाते हुए आ जाता है। इन दोनों पर मनुष्य का कोई वश नहीं चलता। उसके चाहने अथवा न चाहने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। ये तो यथासमय आकर अपना मधुर और रौद्र रूप दिखा जाते हैं। इन दोनों के चक्र व्यूह में फंसा हुआ बेचारा मनुष्य मात्र मूक दर्शक बना हुआ सब कुछ सहन करने के लिए विवश हो जाता है। 
            सुख और दुःख जीवन के अनिवार्य पहलू हैं जो मन की स्थिति और कर्मों के अनुसार आते-जाते रहते हैं, जैसे धूप-छाँव। सुख जहाँ सन्तोष देता है, वहीं दुःख जीवन के गहरे सबक सिखाता है। इन दोनों में सन्तुलन बनाए रखना और हर स्थिति को समान रूप से स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता और सच्ची शान्ति का मार्ग है। सुख का अर्थ है अनुकूल स्थिति, और दुःख का अर्थ है प्रतिकूल स्थिति है। ये दोनों हमारे मन के भाव हैं।सुख-दुःख सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। न तो सुख हमेशा रहता है, न ही दुःख सदा रहता है। महाभारत के अनुसार सुख और दुःख हमारे अपने कर्मों का ही परिणाम हैं।
            सुख का समय आने पर मनुष्य के साथी अपने-पराए सभी लोग बनना चाहते हैं। उसकी समृद्धि को देखकर उसके इर्द-गिर्द गुड़ पर मक्खियों की तरह मंडराने वाले बहुत से लोग भी आ जाते हैं। उसका प्रशस्ति गान करके उसके दिमाग को वे सातवें आसमान पर चढ़ा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बाद में उसकी निन्दा करने से बाज नहीं आते कि सुख-समृद्धि के आ जाने पर इसका दिमाग खराब हो गया है अथवा घमण्डी हो गया है। यह तो अपने बराबर किसी को नहीं समझता।
            उनकी परीक्षा केवल दुख के समय की जा सकती है। तभी कहा है-
        विपद कसौटी जो कसें ते ही साँचे मीत।
अर्थात् मुसीबत में जो साथ निभाते हैं, वही वास्तव में अपने होते हैं। इसलिए इनकी परख दुख की कसौटी पर की जाती है।
            उस समय वे स्वार्थी लोग अपना  समय व्यर्थ गॅंवाए बिना शीघ्र किनारा कर लेते हैं। फिर वे लोग ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उनसे कभी जान-पहचान भी नहीं थी। वे हमारे सामने से नजरें चुराकर, कन्नी काटकर निकल जाते हैं। ऐसे स्वार्थी बन्धु-बान्धवों से सावधान रहना मनुष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक होता है। आँखों से मोह-माया आदि की पट्टी हटा करके इन सबको पहचानने की आवश्यकता होती है ताकि कभी भी कोई उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ न कर सकें, उसका शीशे की तरह नाजुक हृदय टूटकर चकनाचूर न हो सके।
        जीवन में दुख को रोकने का एकमात्र उपाय यही है कि समय रहते यदि इस सच को स्वीकार कर लिया जाए कि इस असार संसार में सदा के लिए हमारा कुछ भी नहीं है, पहले भी हमारा कुछ भी नहीं था और भविष्य में भी हमारा कुछ नहीं रहेगा। यदि इस भाव को अपने अन्तस् में आत्मसात् कर लिया जाए तो फिर मन को कम कष्ट होता है। अन्यथा मनुष्य ऐसी विपरीत परिस्थितियों के आने पर अपनों द्वारा किए गए ऐसे अकल्पनीय व्यवहार से मानो टूटने लगता है।
            इस प्रकार अपने विवेक का सहारा लेकर मनुष्य यह समझ जाता है कि संसार के ये सभी पदार्थ उसे केवल भोगने के लिए मिले हैं, दिल से लगाने के लिए नहीं मिले। जिसके ये सकल पदार्थ है वह कभी भी उन्हें वापिस ले सकता है। जैसे यात्रा करते समय हम उस स्थान विशेष का ध्यान रखते हैं और यात्रा समाप्त होते ही उससे निस्पृह होकर अपने रास्ते चल पड़ते हैं। तब उस स्थान अथवा वहाँ की वस्तुओं के प्रति हमें मोह नहीं रहता। उन्हें बिना किसी परेशानी के छोड़ देते हैं।
            ओशो का कहना है कि दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दरअसल तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी पूँजी है।
      ओशो के इस कथन का तात्पर्य है कि हम जिसको बारबार याद करते हैं, वह हमें मिल जाता है। यदि दुखों को पुन: पुन: स्मरण करेंगे तो वे रूलाने के लिए हमारे पास आएँगे। इसके विपरीत यदि सुखों का स्मरण करेंगे तो सुख हमें खुशियाँ देने आ जाएँगे। अत: ध्यान हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। यदि हम उठते-बैठते, सोते-जागते चौबीसों घण्टे ही ईश्वर का ध्यान करेंगे तो उसे पा लेंगे। फिर चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होकर मुक्त हो जाएँगे।
             सार रूप में हम कह सकते हैं कि सुख में इतराना नहीं चाहिए और दुःख में घबराना नहीं चाहिए। जो इन्सान अपने मन की स्थिति को नियन्त्रित कर लेता है, वह सुख-दुःख से विचलित नहीं होता। सुख और दुख के क्रम को दिन और रात की तरह मानते हुए सहन करना चाहिए। मन में सदा यह विश्वास बनाए रखना चाहिए कि दुख के बाद सुख भी आएँगे। इसलिए सुख की आशा में दुख की काली घनी अन्धेरी रात के बीत जाने की परीक्षा धैर्यपूर्वक करनी चाहिए और ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

माता-पिता ईश्वर के समान

माता-पिता ईश्वर के समान

माता-पिता इस संसार में मनुष्य के लिए ईश्वर के समान होते हैं। मनुष्य यदि जीवन पर्यन्त उनकी सेवा-सुश्रुषा करता रहे तब भी उनके वह उनके उस ऋण से उऋण नहीं हो सकता जो उसे इस धरा पर लाने का उपकार वे उस पर करते हैं। ईश्वर हमारे समक्ष स्वयं को प्रस्तुत नहीं करता, उसने‌ अपना प्रतिनिधि बनाकर‌ माता-पिता को हमारे लिए भेजा है। इसलिए वे मनुष्य के लिए साक्षात ईश्वर का रूप होते हैं।
           माता-पिता चाहे अमीर हों अथवा गरीब, पढ़े-लिखें हों या अनपढ़, समाज में ऊच्च स्थान रखने वाले हों या नहीं पर वे अपने बच्चों के लिए आदर्श होते हैं। केवल योग्य बच्चे ही माता-पिता का मान नहीं होते, माता-पिता भी बच्चों का मान होते हैं। उनका यथोचित सम्मान करना सन्तान का कर्त्तव्य है। जो बच्चे माता-पिता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं करते उन्हें समाज में वह सम्मान नहीं मिलता, जो उन्हें उनकी योग्यता और प्रतिभा के लिए मिलना चाहिए।
          कोई भी सभ्य समाज ऐसे नालायक बच्चों को सम्मानित नहीं करता जो स्वयं तो जीवन की सभी सुविधाओं का भोग करें, गुलछर्रे उड़ाएँ और उनके बेचारे माता-पिता दरबदर की ठोकरें खाएँ, बदतर जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाएँ, पैसे-पैसे के मोहताज होकर दो जून के खाने के लिए तरसें अथवा अपने ही नाती-पोतों से मिलने के लिए तड़पते रहें। ऐसे जीवन की कल्पना कोई नहीं करत
            माता-पिता का सम्मान करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। भगवान गणेश की तरह उनके चरणों में सारे संसार को नाप लेने वाले और भगवान राम की तरह उनके आदेश को पत्थर पर लकीर की तरह मानने वाले श्रवण कुमार ही इस संसार में वास्तव में सुखी और समृद्ध कहलाते हैं। उन्हीं का यश चहुॅं ओर फैलता है।
          उनके सुख के लिए वे क्या कह रहे हैं, इस बात पर ध्यान देते हुए उनकी राय को सम्मान पूर्वक स्वीकार करें। यदि अपने बच्चे उन्हें सम्मान नहीं देंगे तो अन्य लोग भी उनकी अवहेलना करेंगे। इसे किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
            यथासम्भव अपने समय में से थोड़ा समय निकालकर उनसे बातचीत करके उनकी परेशानियों को जानने का यत्न करना चाहिए। उनके दोस्त और प्रियजन यदि उनसे मिलने के लिए घर पर आएँ तो उनसे अच्छी तरह का व्यवहार करना चाहिए। उनके साथ अवांच्छित मेहमान की तरह कभी व्यवहार नहीं करना चाहिए। 
            वृद्धावस्था में हर मनुष्य अपने अनुभवों या जीवन में घटित घटनाओं को बारबार साझा करना चाहता है। वह चाहता है कि सभी उसके अतीत से प्रेरणा लें, कुछ सीखें। इसलिए यदि वे एक ही कह बात को बारबार दोहराएँ तो भी ऐसे सुनना चाहिए जैसे पहली बार सुन रहे हैं। इसके लिए उनकी उनकी हमेशा प्रशंसा करने में कंजूसी नहीं दिखानी चाहिए। माता-पिता सदा ही सन्तान के भले के लिए कार्य करते हैं। बच्चों का दायित्व बनता है कि वे उनके उपकारों को हमेशा याद रखें।
            इस आयु में उन्हें उदास कर देने वाले बुरे समाचारों को उनसे साझा नहीं करना चाहिए बल्कि उनको अच्छे समाचार सुनाने चाहिए ताकि वे प्रसन्न रहें। उनके अतीत में घटित दुखदायी यादों को यदि वे याद भी करें तो उन्हें उन यादों से बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए। उन्हें बहलाने के लिए रिश्तेदारों या मित्रों से मिलवाना चाहिए। उन्हें बारबार अहसास कराना चाहिए कि वे उनके जीवन में महत्त्व रखते हैं। यदि वे निराश हों और स्वयं को किसी लायक न समझें तो भी उन्हें गौरवान्वित करना चाहिए। उनकी अमूल्य सलाह और निर्देश को स्वीकार करते हुए उन्हे घर के मुखिया ही मानते रहना चाहिए।
            माता-पिता की आयु का सम्मान करते हुए उनके साथ ऊँची आवाज में बात नहीं करनी चाहिए। उनसे चर्चा करते समय फोन दूर रखना चाहिए और कानाफूसी नहीं करेनी चाहिए। उनकी बात काटकर या उनके विचारों को न घटिया बताकर उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। न उनकी बुराई करने से बचना चाहिए और किसी अन्य यदि बुराई करे तो प्रतिरोध करना चाहिए। इसी तरह माता-पिता को भी किसी के सामने अपने बच्चो की बुराई नहीं करनी चाहिए। उन्हें घूरना या उनके सामने पैर नहीं पटकने चाहिए, अपने पैर या पीठ उनकी ओर करके भी नहीं बैठना चाहिए। ये सभी अवगुण बड़ों के अपमान करने के कारक कहलाते हैं
            माता-पिता हमारे अपने हैं, हम उन्हीं का अंश हैं। इसलिए उन्हें अपने सुख, दुख और अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करना चाहिए। चाहे वे हमारे लिए कुछ कर पाएँ या नहीं परन्तु उनको सम्मान देने का यह भी एक तरीका है। उनके शुभाशीषों से ही मनुष्य को यश और आत्मिक सुख मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

नाशुकरा इन्सान

नाशुकरा इन्सान 

वह इन्सान जो हर समय कभी ईश्वर से और कभी उसकी बनाई हुई दुनिया से सदा शिकायत करता रहता है। वह तो मानो धन्यवाद करना ही भूल गया है। आज तक मुझे समझ नहीं आया कि मनुष्य इतना नाशुकरा कैसे हो सकता है?
           नाशुक्रा इन्सान का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो उपकार, भलाई या ईश्वर द्वारा दी गई नेमतों (सौगातों) को पाकर भी नहीं मानता। उसे अकृतज्ञ, एहसान फरामोश या कृतघ्न भी कहते हैं। नाशुक्रा व्यक्ति हर बात पर हमेशा शिकायत करता है। अपनी मुश्किलों को सदा याद रखता है और दोहराता रहता है। वह सुख-सुविधाओं के रहते हुए भी कभी सन्तुष्ट नहीं होता। 
            ऐसा व्यक्ति सब कुछ होने के बावजूद लालची और स्वार्थी स्वभाव दिखाता है। ईश्वर की कृपा का शुक्रिया न करने वाले को नाशुक्रा कहा जाता है। उसका स्वभाव ही ऐसा होता है जो हर हाल में दुखी रहता है और औरों की खुशियों को देखकर और अधिक दुखी हो जाता है। ऐसे व्यक्ति किए गए उपकार या भलाई को नहीं मानता।
            मनुष्य हर समय किसी-न-किसी वस्तु की कामना करता रहता है। यदि वह उसे मिल जाती है तो यही कहता है यह उसके परिश्रम का फल है। उसके पूर्ण हो जाने पर फिर वह दूसरी कामना के पीछे भागने लगता है। उसके बाद भी कामनाओं का यह सिलसिला समाप्त नहीं हो जाता अथवा थमता नहीं है अपितु एक के बाद एक इच्छाएँ सिर उठाती रहती हैं। उसका सारा सुख-चैन उससे छीनकर उसे बेचैन बना देती हैं। उनके चक्रव्यूह में फंसा वह दिन-रात कोल्हू का बैल बना रहता है।
             इसके विपरीत उसकी मनोकामना जब पूर्ण नहीं होती तब उसका दोषारोपण वह कभी अपने भाग्य पर करता है, कभी अपनी परिस्थितियों पर करता है और कभी दूसरे लोगों पर करता है। उस समय उसे ऐसा लगता है मानो सारी दुनिया ही उसके विरूद्ध हो गयी है। सारी कायनात उसे हराने के लिए लामबद्ध हो गई है। वह हर किसी पर झल्लाने लगता है चाहे वह उसका अपना हो या पराया। उसे हर उस व्यक्ति से वितृष्णा होने लगती है जो भी अपने जीवन में दिन-प्रतिदिन सफलताओं की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं।
            उसका यह भटकाव आयुपर्यन्त बना रहता है। यह संसार असार है, इसमें रत्ती भर भी सन्देह नहीं है। जब तक यह मनुष्य नश्वर से अनश्वर, असत्य से सत्य की ओर तथा अंधकार से प्रकाश की ओर नहीं लौटता तब तक वह चौरासी लाख योनियों के आवागमन भटकता रहता है।
          इस सबसे उसे शान्ति और मुक्ति तभी मिल पाती है जब वह इस संसार के बन्धनों को काटने के लिए कटिबद्ध हो जाता है। वह उस प्रभु का स्मरण करता है, उसके ध्यान में मन लगाता है और अन्तत: उसका शरणागत हो जाता है।
              ईश्वर की संगति का प्रभाव ही ऐसा है कि मनुष्य का अहं सदा के लिए दूर हो जाता है और स्वयं ही विनम्र बन जाता है। उसका सारा अभिमान काफूर हो जाता है। वह स्वयं को ईश्वर के पास जाने से रोक नहीं पाता। तब ईश्वर के साथ एकाकार होने के लिए वह व्याकुल होने लगता है। 
             उसके दर पर जाने से पहले मनुष्य हर दुख-तकलीफ में मायूस हो जाता है, रोता है, चीखता-चिल्लाता है, हाय-तौबा करता है। उसकी साधना करते हुए वह दुनिया से मिलने वाले थपेड़ों का बिना घबराए डटकर सामना करता है। उसके मन में यह प्रबल भाव आ जाता है कि वह अकेला नहीं है मालिक उसके साथ है, वह हर कदम पर उसकी रक्षा करेगा। वह हिचकोले खाती हुई अपनी जीवन की नौका उसके हवाले करके निश्चिंत हो जाता है।
            मनुष्य जिस भी वस्तु की कामना करता है उसके न मिलने पर हताश और निराश हो जाता है। तब वह उस परम न्यायकारी परमात्मा पर पक्षपात करने का आरोप लगते हुए लानत-मलानत करता है। जब परमात्मा के साथ उसकी लगन लग जाती है तब वह हर बात में उसकी इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए प्रसन्न रहता है। तब उसे कोई शिकायत नहीं रहती। वह समझ जाता है कि उसे अपने कर्मफल का भुगतान करना पड़ेगा तभी, उसकी मुक्ति सम्भव है।
            प्रयास यही करना चाहिए शिकवा अथवा शिकायत करने के स्थान पर उस मालिक का धन्यवाद करना चाहिए। जो मनुष्य उस प्रभु की शरण में सच्चे मन से चला जाता है वह उसका शुकराना करना सीख जाता है।
          ज्यों ज्यों मनुष्य उस परमेश्वर के साथ लौ लगा लेता है तब वह उसकी दी हुई सारी नेमतों के लिए उसका कोटिश: धन्यवाद करता है। इस ससार में रहने वाले उन सब लोगों के प्रति भी कृतज्ञता का ज्ञापन करता है जो उसके इस सफर में उसका साथ निभाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 5 अप्रैल 2026

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा भारतीय संविधान हर भारतवासी को देता है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने विचार और भावनाओं को स्वतन्त्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। यह अधिकार लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस स्वतन्त्रता को संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है। हालॉंकि, इस स्वतन्त्रता पर कुछ समुचित प्रतिबन्ध भी लगाए जा सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसका दुरुपयोग न हो। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की मानहानि करना, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालना, या समाज में हिंसा भड़काना ऐसे कार्य हैं जिन पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।
            अपने विचारों का अदान-प्रदान करना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में आवश्यक होता है। यदि अपने विचारों को दूसरों के समक्ष न रख सकें तो कोई हमारे विषय में जान नहीं सकेगा। सूचनाओं को स्वतन्त्र रूप से बोलने, लिखने, साझा करने या प्रसारित करने की अनुमति देता है। यह अधिकार मीडिया की स्वतन्त्रता, कलात्मक अभिव्यक्ति और शन्तिपूर्ण विरोध को भी शामिल करता है। 
            स्वतन्त्रता का अर्थ उच्छ्रंखलता कदापि नहीं होता। मर्यादित विचारों की अभिव्यक्ति जहाँ मन को प्रफुल्लित करती है वहीं श्रोता को भी अभिभूत करती है। यहाँ आत्मानुशासन की लगाम का होना बहुत अनिवार्य होता है। जब तक सद् बुद्धि का चाबुक न पकड़ा जाए तब तक विचारों के प्रदूषित होने का खतरा मण्डराता रहता है। यह दूषण सहृदय जनों के कष्ट का कारण बनता है। इससे हर बुद्धिमान व्यक्ति को बचना चाहिए।
              बोलने से पहले मनुष्य को दस बार सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा कुछ न कह दिया जाए जो सामने वाले को आहत कर दे अथवा उसके आत्मसम्मान को ठेस लग जाए। शब्द रूपी बाणों से यदि किसी को घायल कर दिया जाए तो मर्मान्तक पीड़ा होती है। इसीलिए हमारे मनीषी कहते हैं 
              पहले तोलो फिर बोलो।'
            जिस मनुष्य को अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं है वह इन्सान कहलाने के योग्य ही नहीं है। यही वाणी मनुष्य को सबके सिरों पर बिठाकर यश और मान देती है। दूसरी ओर सबकी नजरों से गिराकर अपमान का दंश झेलने के लिए विवश करती है।
            जिस देश में हम रहते हैं, जिसका अन्न खाते है, जिसका जल पीते हैं, उसके प्रति हमारा दायित्व बढ़ जाता है। जिस मातृभूमि की गोद में खेलकर बड़े हुए हैं, उसका सम्मान करना बहुत ही आवश्यक है। विश्व के किसी भी व्यक्ति को अथवा किसी भी देशवासी को यह अधिकार नहीं है कि वह उसका अपमान करे। चाहे जननी हो अथवा जन्मभूमि हो, इन दोनों का निरादर करने वालों को किसी भी सूरत में क्षमा नहीं किया जा सकता।
          अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए देश का सौदा करने वालों और  उसके साथ द्रोह करने वालों को नरक में भी स्थान नहीं मिलता। ईश्वर भी ऐसे अहसानफरामोशों से नाराज हो जाता है।
          सोशल मीडिया, समाचार पत्रों, टी.वी. चैनलों और रेडियो सबका नैतिक दायित्व है कि वे सभी एकजुट होकर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के विरूद्ध जनजागरण की मुहिम चलाकर उन देशद्रोहियों को उनके अंजाम तक पहुँचाने में सरकार की सहायता करें।
          राजनेताओं का दायित्व बनता है कि वे अपने देश के प्रति वफादारी निभाएँ और जन साधारण को भी जागरूक बनाएँ। देशद्रोहियों को अनावश्यक प्रश्रय न दें। तुच्छ राजनैतिक लाभ के लिए देश को हानि पहुँचाने के बारे में स्वप्न में भी न सोचें। 
            जो भी व्यक्ति देश में अलगाव की स्थितियाँ पैदा कर रहे हैं अथवा देश की अखण्डता पर प्रहार कर रहे हैं, उन सब देशद्रोहियों को किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान न करके उन्हें अविलम्ब कानून के हवाले करके राजद्रोह का अभियोग चलाना चाहिए। किसी भी तरह की रियायत न देकर उन लोगों को कठोर-से-कठोर दण्ड देकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति हमारे देश भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का दुस्साहस न कर सकें।
          जो लोग केवल अपने अधिकारों की दुहाई देते हैं और उन्हें कर्त्तव्यों का भान नहीं है, उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से वंचित कर देना चाहिए। जो सब लोग स्वतन्त्रता पाने के इच्छुक हैं, उनके समक्ष उसका सदुपयोग करने की शर्त रखी जानी चाहिए ताकि कोई भी उसका दुरूपयोग न कर सके। 
             भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भारत में यह एक मौलिक अधिकार है लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत तार्किक प्रतिबन्धों के अधीन है। केवल सरकार या कानून को इसके लिए कभी भी चाबुक न चलाना पड़े बल्कि आत्मानुशासन का पालन करके बोलने की स्वतन्त्रता का आनन्द उठाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

रिश्तों की अपनी गरिमा

रिश्तों की अपनी ही गरिमा

रिश्तों की अपनी ही एक गरिमा होती है। उनकी अनुपालना करना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होता। जहाँ कभी थोड़ी-सी चूक हुई वहीं रिश्ते लहुलूहान हो जाते हैं। उन्हें बड़ी ही नजाकत से सम्हालना होता है। जितना सम्हल-सम्हलकर अपना कदम बढ़ाया जाएगा,‌ उतनी ही उनमें गर्माहट बनी‌ रहती है। यदि रिश्तों को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाए तो वे अपने नहीं रहते। वे बेगाने हो जाते हैं। हमारी पहुॅंच से दूर चले जाते हैं। इसका पश्चाताप हमें उस समय होता है जब हमें उनकी आवश्यकता होती है।
        रिश्ते हमें जीवन में ईश्वर की ओर से दिया गया उपहार होते हैं। वे जन्म से ही हमारे पूर्वकृत कर्मों के अनुसार हमारे साथ जुड़े हुए होते हैं। उनके साथ जितना लेनदेन का सम्बन्ध होता है, उसी के अनुरूप उन रिश्तों का हमसे जुडाव होता है। ये सभी हमारे सुखों और दुखों में हमारे साथी बनते हैं। जितना जिसके साथ सम्बन्ध निश्चित होता है, उसे भोगकर वह रिश्ता हमसे विदा लेकर सदा के लिए बिछुड़ जाता है। उस समय उनका जाना हमारे लिए बहुत कष्टकारी होता है।
          मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। हमें उन्हें अपने विवेक से परखना होता है। बातचीत सबसे होनी चाहिए परन्तु अपनापन या मन से जुड़ाव कुछ ही लोगों के साथ हो पाता है। वास्तव में वही मित्रता की श्रेणी में आते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि रिश्ते वो बड़े नहीं होते जिनका सम्बन्ध जन्म से होता है। बल्कि रिश्ते वो बड़े कहलाते हैं जो दिल से जुड़ते हैं। ऐसे सम्बन्ध कुछ दूर तक साथ देते हैं। जहाँ दिलों में दरार आती है वहीं वे रिश्ते भी मन से उतर जाते हैं और वहाँ नफरत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। उन दीवारों के पार कुछ नहीं दिखाई देता।
          आज के भौतिकतावादी युग से  पहले लोग भावुक होते थे और रिश्तों का महत्त्व समझते थे। वे यही मानते थे कि मनुष्य अपने रिश्तेदारों से सुशोभित होता है। इसलिए वे उन्हें सहृदयता से निभाते थे। उसके बाद धीरे-धीरे लोग प्रैक्टिकल होने लगे, तब वे अपने रिश्तों से लाभ उठाने में दक्ष होने लगे। वहाँ उनके बीच स्वार्थ हावी होने लगे। आज इस भौतिक युग के लोग प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे केवल उन लोगों के साथ अपना रिश्ता बनाना चाहते हैं जिनसे भविष्य में फायदा उठाया जा सकता है। 
              दूसरे शब्दों में आज स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते बनाए जाने लगे हैं। यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि ऐसे रिश्ते बहुत सीमित समय तक जीवित रहते हैं। हमें उनका अन्त समीप ही मानकर चलना चाहिए। रिश्तों को निभाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, जरा-सी चोट लगने पर चटककर टूट जाते हैं और चकनाचूर हो जाते हैं। रिश्ते और शीशे दोनों ही में अन्तर होता है। शीशा हमारी मूर्खता अथवा लापरवाही से टूटता है परन्तु रिश्तों के टूटने में हम लोगों की गलतफहमी कारण होती हैं।
          रिश्ते अन्त तक हमारा साथ न छोड़ें उसके लिए हमें सबके साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहिए। जब हम इनसे असमानता बरतते हैं तब मनमुटाव होने लगते हैं और दूरिया बढ़ने लगती हैं। इसलिए रिश्तों में यथायोग्य व्यवहार करना हमारे लिए आवश्यक होता है। अपनों को साथ लेकर चलने में ही मनुष्य की शोभा होती है। चाहे सुख का समय हो अथवा सुख का समय, मनुष्य अपने बन्धु-बान्धवों के साथ ही सुशोभित होता है। अन्यथा अकेले तो न सुख अच्छा लगता है और न ही दुख की घड़ी कटती है।
          रिश्तों में एक-दूसरे की कभी परीक्षा भी नहीं लेनी चाहिए। इससे सम्बन्धों की गरमाहट घटने लगती है। तब वे रिश्ते मात्र औपचारिक बनकर रह जाते हैं। हर रिश्ते में विश्वास होना आवश्यक होता है। माता-पिता का बच्चों पर विश्वास होना चाहिए और बच्चों का माता-पिता पर। पति-पत्नी के रिश्ते में परस्पर विश्वास ही उन्हें जोड़कर रखता है। इसी प्रकार भाई-बहन में आपसी विश्वास की डोर उन्हें आजन्म बाँधे रखती है। बन्धु-बान्धवों के प्रति विश्वास उन्हें अपने से दूर नहीं जाने देते।
        ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से अलग तरह का होता है। वहाँ हम उस मालिक से गिला-शिकवा करते हैं और उससे नाराज हो जाने पर लानत-मलानत भी करते हैं। उस पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। फिर भी ईश्वर का और हमारा रिश्ता बना रहता है। हम उसके बिना नहीं रह सकते। कुछ दिन की नाराजगी के बाद हम फिर उसकी शरण में चले जाते हैं। यह रूठने और मानने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है। यह सब करतब हमारी ओर से होते हैं। वह सदा हमारे ऊपर अपना वरद हाथ रखता है।
        सांसारिक अथवा भौतिक रिश्तों में ऐसा नहीं होता। मनमुटाव या शिकवा-शिकायत की स्थिति में रिश्तों के टूटने में समय नहीं लगता। फिर सबका अहं आड़े लगता है और रिश्ते मृतप्राय: हो जाते हैं। अर्थात् केवल नाम के या दिखावे के रिश्ते रह जाते हैं। इसलिए प्रेम, विश्वास, आपसी भाईचारे और अपने सद् व्यवहार से और मन से सभी रिश्तों को निभाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

आत्मीय सम्बन्धों को लॉन्च पर न लगाऍं

आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर न लगाऍं

बहुत विचार करने पर भी मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आज एक भाई अपने दूसरे भाई के खून का प्यासा क्यों होता जा रहा है? क्या वे सब प्यार से मिल-जुलकर नहीं रह सकते? क्या आज सबके खून सफेद हो रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि रिश्तों के मायने ही बदलते जा रहे हैं?
          मुझे ऐसा लगता है कि हमारे स्वार्थ शायद इतने अधिक टकराने लगे है कि हम असहिष्णु होते जा रहे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए अनावश्यक ही हम लोग दिन-रात अपना सुख-चैन गँवाकर निरन्तर रेस में शामिल हो रहे हैं। आज विदेशियों की तर्ज पर मैं, मेरा परिवार और मेरे बच्चे बस यहीं तक हम सभी सीमित होते जा रहे हैं। इनके अतिरिक्त न हमें कोई दिखाई देता है और न ही हम किसी अन्य भाई-बन्धु के विषय में सोचना चाहते हैं। इसीलिए रिश्ते सिकुड़ने लगे हैं। समाज के लिए यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
           हमारा अहंकार इतना अधिक प्रबल होता जा रहा है जो किसी शर्त पर, किसी के साथ भी समझौता नहीं करना चाहता। सारी दुनिया को देख लेने अथवा उसमें आग लगा देने की बढ़ती युवाओं की मानसिकता समाज का बहुत अहित कर रही है। हमारा यही अहं हमें अपने रिश्तों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं करने दे रहा। इसलिए हमें सबसे कटकर अलग-थलग करने में सफल हो रहे हैं। हम लोग अनजाने में इस षड्यन्त्र का सरलतापूर्वक शिकार हो रहे हैं।
        ये स्वार्थ और अहंकार दोनों ही घर-परिवार के बिखराव में अहं रोल निभा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि का उनके जीवन काल में ही बटवारा करके सुख की साँस लेना चाहते हैं। उन्हें सदा यही लगता है कि दूसरे भाई या बहन को माता-पिता कहीं उनसे अधिक न दे दें। यदि ऐसा हो गया तो वे घाटे में रह जाएँगे। सबसे बड़ी बात कि घाटे का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता। जबकि माता-पिता के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं। वे अपनी धन-सम्पत्ति को सबमें बराबर बॉंटना चाहते हैं।
               अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए युवा पीढ़ी के ये बच्चे अनावश्यक ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। जायज-नाजायज हथकण्डे अपनाकर वे अपने माता-पिता की मेहनत की धन-दौलत को धोखे से हथिया लेने में अपनी शान समझते हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि आज के बच्चे बहुत ही प्रेक्टिल हो गए हैं। अपने माता-पिता को धोखा देने में भी उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास नहीं होता। अपने दूसरे भाई-बहनों का हक छीनते हुए वे जरा-सा भी संकोच नहीं करते। उन्हें न समाज का डर है और न ही ईश्वर का।
        आज के बच्चे अपने अधिकारों के विषय में तो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं परन्तु वे अपने दायित्वों से अनजान बने रहना चाहते हैं। माता-पिता की सेवा करना तो वे प्राय: भूल जाते हैं। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो अपने माता-पिता का सब कुछ हथिया कर उन्हें बोझ समझने लगते हैं। अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धावस्था में ओल्डहोम भेज देते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ उन्हें अच्छा व्यवहार करना भी उन्हें याद नहीं रहता। यदि उनके साथ कोई गलत व्यवहार कर दे तो वे तिलमिला जाते हैं।
          अपने पैतृक घर में ऊपर-नीचे के तल अथवा मंजिल में बच्चे नहीं रह सकते परन्तु उन घरों को बेचकर, फ्लैटों में जाकर दूसरे अनजान लोगों के साथ रहना पसन्द करते हैं। वहाँ रहकर समझौता कर सकते हैं पर अपने भाई-बहनों की शक्ल तक वे देखना पसन्द नहीं करते। उन्हें लगता है कि परायों के साथ रहकर वे सुखी रहेंगे पर जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। वहॉं पर जाकर भी अनेक कठिनाइयों से उन्हें दो-चार होना पड़ता है।
           इन्सानी कमजोरी है कि जिस किसी वस्तु की वह कामना करता है और जब वह उसे उपलब्ध हो जाती है तब वह उससे ऊब जाता है और कुछ नया पाना चाहता है। यही उसके भटकाव का कारण है जो उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता। ऐसे बच्चे जो रिश्तों की अहमियत जानना-समझना ही नहीं चाहते वे कहीं भी रह लें, परेशान ही रहते हैं। यह जीवन का कटु सत्य है कि समझौता तो हरपल और हर स्थान यानी कदम-कदम पर करना ही पड़ता है। इससे कोई बच नहीं सकता।
        सम्बन्धों में आपसी मनमुटाव के कारण ही शायद खून सफेद होने की बात कह दी जाती है। भाई-बहन धन-सम्पत्ति के लालच में इतने अन्धे हो जाते हैं कि एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की हत्या करने या करवाने के लिए षडयन्त्र तक रच डालते हैं। फिर जीवन पर्यन्त घर-परिवार, समाज और न्याय के दुश्मन बन जाते हैं। जिनके लिए ऐसा जघन्य अपराध करते हैं, वे उन्हें दुनिया की भीड़ में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
        हमारे सयाने कहते हैं- 'अपना यदि मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा।' कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर प्रदत्त अपने सम्बन्धों की कद्र करनी चाहिए। वह मालिक नहीं चाहता कि अपने भाई-बन्धुओं से अनुचित व्यवहार किया जाए। यह धन-वैभव तो आना-जाना है, इसके लिए आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर लगाने से बचना चाहिए। हम सभी को चाहिए कि अपने भाई-बहनों के साथ शत्रुता का भाव न रखकर यथासम्भव भाईचारा बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद