सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

हर स्थिति का सामना करना

हर स्थिति का सामना करना 

जीवन में मनुष्य को हर प्रकार की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्थिति चाहे बुरी-से-बुरी हो या अच्छी-से-अच्छी हो, उसे अपना सन्तुलन बनाए रखना चाहिए। उसे उम्मीद का दामन कभी नहीं छोडना चाहिए। आशा की एक किरण के सहारे निस्सन्देह मनुष्य अपने जीवन में कुछ भी कर गुजरता है।
          मुझे अकबर और बीरबल का एक किस्सा याद आ रहा है। सर्दी के दिन थे। एक बार अकबर ने कहा, "जो व्यक्ति तालाब में सारी रात खड़ा रहेगा उसे मैं ईनाम दूँगा।"
          शहर मे मुनादी करवा दी गई और शर्त बता दी गई। ईनाम की बात सुनकर कई लोगों ने प्रयास किया पर असफल रहे।
          एक साहसी युवक ने ईनाम जीतने का निर्णय किया और राजा के पास गया। उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं अपनी किस्मत आजमाना चाहता हूॅं।"
          युवक की बात सुनकर राजा ने उसे अनुमति दे दी। रात को जब तालाब में खड़ा था तो दूर उसे जलता हुआ दीया दिखाई दिया। यही जलता हुआ दीपक उसकी प्रेरणा का स्त्रोत बन गया और उसने राजा की लगाई हुई शर्त जीत ली।
          कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? इस साहसी नवयुवक की तरह सदैव आशा का दीपक अपने मन में जलाए रखना चाहिए। तभी मनुष्य अपने जीवन में सफल हो सकता है।
          हर मनुष्य सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ महान बनना चाहता है किन्तु स्वयं परिश्रम नहीं करना चाहता। इस प्रकार निकम्मे बनने से कुछ भी हाथ में नहीं आता। केवल असफलता ही उसे मुँह चिढ़ाती है। मनीषी कहते हैं-
                   अपने हाथ जगन्नाथ।
                        और
         जितना गुड़ डालो उतना मीठा होता है।'
                       और भी
       मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।
यानी सीधा-स्पष्ट-सा गणित है कि मनुष्य जितनी मेहनत कर लेगा, वह उतनी ही कामयाबी हासिल कर लेगा। अन्यथा ठन-ठन गोपाल रहेगा यानी उसे कुछ भी प्राप्ति नहीं होगी।।
        इन्सान की हार्दिक इच्छा होती है कि कोई उसके लिए कुछ कर दे और वह बैठा-बैठा उसके मजे लूटता रहे। वह स्वयं हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे और दूसरे उसकी जी हजूरी करते रहें। ऐसा आखिर कब तक चलता रहेगा? 
        दूसरों से कुछ पाने की आशा रखने पहले मनुष्य को अपने मन में यह विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि जिनसे पाना चाहता है उसने उन सबकी भलाई के लिए कभी कुछ किया है क्या? 
        पहले अपनी ओर से समाज या दूसरों के लिए कुछ त्यागना पड़ता है, तभी उसे कुछ पाने के लिए सोचना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो  कामचोर, नालायक, स्वार्थी आदि उपाधियाँ पाता है जो उसे अपमानित करती रहती हैं।
        हम यदि कुछ लेने जाते हैं तो पहले उसका मूल्य चुकाते हैं तभी मनचाही वस्तु खरीद सकते हैं। उस समय मनुष्य को - 
              इस हाथ दे उस हाथ ले
वाला नियम अपनाना पड़ता है। अन्यथा शोकेस में सजी वस्तुओं को देखकर मन को बहलाना पड़ता है। फिर जीवन में इस सिद्धान्त को हम सब कैसे भूल जाते हैं?
          जीवन में विद्यमान कुछ अच्छी बातें होती हैं जिनका मूल्य हमारी नजर में होता है। ये अच्छी बातें किसी के लिए ज्ञान हो सकती हैं, किसी के लिए प्रेम हो सकती हैं या फिर किसी और के लिए पैसा हो सकती हैं। इन्हें कुछ भी कह सकते हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिए पहले मनुष्य को अपनी ओर से डटकर पुरुषार्थ करना होता है। निस्सन्देह उसके पश्चात ही मनुष्य को अपने स्वयं के योगदान के बदले उससे अधिक प्राप्त हो सकता है। अन्यथा वह दूसरों का मुॅंह ताकता रह जाता है। 
          वे मूर्ख जिन्हें अपने बाहुबल पर विश्वास नहीं होता वही दूसरों से आशा रखते हैं और उसके न पूर्ण होने पर निराश होते हैं। उसी हताशा में वे अन्य लोगों को गाली-गलौच करते हैं और उन्हें कोसते हुए अपने मन की भड़ास निकालते हैं। इससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, बस इन्सान अपने कर्मों से अपना कद छोटा कर लेता है।
          अपनी उड़ान, अपनी आकाँक्षाएँ, अपनी सीमाएँ मनुष्य को स्वयं ही निर्धारित करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कर्म करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। सब अच्छा-अच्छा तो किसी मनुष्य के जीवन में नहीं हो सकता। कठिनाइयों का सामना भी उसे जीवन में करना पड़ता है। हम अवश्य सफल होंगे, यह कहकर आशा का दामन कसकर पकड़े रहना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

धन साधन मात्र है, साध्य नहीं

धन साधन मात्र है, साध्य नहीं

हम नित्य प्रातः उठकर दिन की शुरूआत करते समय सोचते हैं कि जीवन में पैसा ही सब कुछ है। इसका कारण है यह भौतिकवादिता। मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि धन केवल साधन मात्र है, साध्य नहीं। दूसरों की होड़ करते समय मनुष्य अपनी क्षमताओं को अनदेखा कर देता है। फिर बाद में परेशान होता रहता है।
          मनुष्य बस कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने और‌ अपनों के लिए सारी सुख-सुविधाएँ जुटा लेना चाहता है। परन्तु जब सन्ध्या के समय दुनिया के थपेड़े खाकर थका-हारा घर लौटकर आता है तब उसे लगता है कि अब बह सुकून के दो पल मिल जाएँ और कुछ नहीं चाहिए। उस समय उसे धन से अधिक शान्ति ही सब कुछ प्रतीत होने लगती है।
        धन मनुष्य के जीवन में अन्तिम लक्ष्य अथवा साध्य नहीं हो सकता। यह जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। धन का उपयोग हम किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए करते हैं। धन से भोजन, वस्त्र और मकान जैसी जरूरतें खरीदी जा सकती हैं। जीवन का अन्तिम उद्देश्य वास्तविक लक्ष्य, आन्तरिक शान्ति, ज्ञान और अच्छे मानवीय सम्बन्ध होते हैं। 
         धन से हम दवा खरीद सकते हैं स्वास्थ्य नहीं। इसी प्रकार हम पुस्तकें खरीदी जा सकते हैं ज्ञान नहीं। मनुष्य जब धन को ही सब कुछ मान लेता है तो उसके जीवन में भय, तनाव और अहंकार बढ़ने लगते हैं। पैसे के पीछे भागने से अपनेपन और पारिवारिक रिश्तों की मिठास कम होने लगती है। हम कह सकते हैं कि धन मनुष्य के रिश्तों से बढ़कर कभी नहीं हो सकता।
        जो रिश्तों का मान रखना जानते हैं, वे उनके लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने में कभी नहीं हिचकिचाते। यह आवश्यक नहीं है कि उनके पास बहुत अधिक धन हो या समय हो। अपने प्रिय मित्र जो आगे बढ़कर होटल आदि के बिल का भुगतान करते हैं, उन्हें मित्र पैसों से अधिक प्रिय होते हैं। अन्यथा वे भी अपने हाथ जेब में रखकर दूसरों का मुँह ताक सकते हैं।
          जो बन्धु-बान्धव हर काम में आगे रहते हैं, उन्हें कभी मूर्ख समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।  उन्हें इस बात का सदा अहसास रहता है कि उन्हें भी किसी को जवाब देना है। इस भौतिक संसार के लोगों के प्रति तो वे उत्तरदायी हैं ही पर मृत्यु के पश्चात परमात्मा को भी उन्हें उत्तर देना है। वे यही मानते हैं कि हर इन्सान को एक दिन उस मालिक के सामने अपनी सच्चाई और ईमानदारी का हिसाब देना होता है, दुनिया को नहीं।
          वास्तव में महान वही लोग होते हैं जो किसी प्रियजन से मनमुटाव हो जाने की स्थिति में गलती न होने पर भी पहले क्षमा याचना कर लेते हैं। इसका कारण अपनी हेठी करवाना कदापि नहीं होता। इसका अर्थ होता है कि वे अपने प्रियजनों को बहुत चाहते हैं, उनकी परवाह करते हैं। वे उन्हें किसी भी मूल्य पर खोना नहीं चाहते, अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं। यह केवल व्यक्ति विशेष की सोच पर निर्भर करता है।
          पूरा शहर बसता रहे पर कोई किसी की मदद नहीं करने के लिए नहीं आता। जो लोग बिनमाँगे सहायता करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते हैं, वास्तव में वही अपने होते हैं। उन लोगों का सदा उपकार मानना चाहिए जो जरूरत के समय आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी हील-हुज्जत के सहायक बने। अपने मन में यह संकल्प करना चाहिए कि वे भी लोगों की सहायता बिना अहसान जताए करेंगे। 
          यदि परेशानी के समय कोई हमारी सहायता बिना किसी कामना के करता है तो हमें बहुत अच्छा लगता है, वैसे ही दूसरों को भी बहुत प्रसन्नता होगी। किसी की दुख-तकलीफ को यदि इन्सान निस्वार्थ भाव से कम कर सके तो इससे बढ़कर और कोई पुण्य नहीं हो सकता।
          मनुष्य को अपने बन्धु-बान्धवों से सदा मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। प्रेम एक ऐसा पौधा है जो मनुष्य को कभी मुरझाने नहीं देता बल्कि सदैव प्रसन्नता प्रदान करता है। इससे आपसी सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं और अकेलेपन का अहसास नहीं होता।
          इसके विपरीत यदि मनुष्य अपनों से नफरत का रिश्ता बना लेता है तब वह न कभी खिल पाता है और न कभी प्रसन्नता उसकी संगिनी बनती है। यह घृणा का भाव उसे सबसे अलग करके अकेला छोड़ देता है। समय आने पर उसका साथ देने वाला अपना कोई प्रियजन उसे नहीं दिखाई देता। यह उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है कि अपनी मूर्खताओं के कारण अपनों के होते हुए भी इस दुनिया की भीड़ में स्वयं को नितान्त अकेला पाता है।
          मनुष्य को धन कमाना चाहिए पर उसके लिए पागल नहीं बनना चाहिए। धन से भी अधिक अपने प्रियजनों की ओर ध्यान देना चाहिए। वही इस संसार में अपने साथी बनते हैं, शेष तो सब प्रदर्शन मात्र ही कहा जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश 

मनुष्य जब इस संसार में आता है तो एक कोरी स्लेट की तरह होता है। जैसे जैसे उसे समझ आने लगती है तो वह स्वयं को सबसे बुद्धिमान समझने की भूल करने लगता है। उस समय वह अपने झूठे दम्भ के कारण अथवा अज्ञानतावश अपने ही प्रियजनों को अपना शत्रु बना बैठता है। जिन लोगों को उसकी ढाल बनना चाहिए था, वे उससे अपना मुॅंह मोड़ लेते हैं।
         अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों को यत्नपूर्वक विश्वास में लेना चाहिए। यदि अपनों का साथ किसी मनुष्य को मिल जाए तो समझिए उस इन्सान ने जिन्दगी की जंग जीत ली है। इस विश्वास को जीतने के लिए मनुष्य को अपने स्वार्थ को त्याग देना चाहिए। अपने साथ-साथ अपनों को भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता भी करनी चाहिए।
       परस्पर शत्रुता के कारण संवाद की कमी हो जाती है जो रिश्तों में दरार पैदा करती है। अहंकार यानी मैं और मेरे की भावना मनुष्य को अपनों को दूर कर देती है। अपनों का विरोध इन्सान को अन्दर से तोड़ देता है। इससे उसे मानसिक तनाव होने लगता है। इस प्रकार प्रियजनों अथवा अपनों के बीच की शत्रुता मनुष्य के रिश्तों, मानसिक शान्ति और पारिवारिक सौहार्द का विनाश कर सकती है। यह उसके परिवेश के लिए घातक होता है।
        यदि मनुष्य अपनों से द्रोह करता है तो आज नहीं तो कल बाहर वाले मूर्ख उस पर राज करने लग जाते हैं। अपने जब धोखा देते हैं तो बहुत कष्ट होता है। शायद यह मुहावरा इसीलिए बना हैं कि- 
            घर का भेदी लंका ढाए।
यानी विभीषण रावण का भाई था। उसने अपने भाई का त्याग करके देकर भगवान श्रीराम का साथ दिया था। यदि विभीषण भाई की मृत्यु का रहस्य भगवान श्रीराम को न बताता तो शायद युद्ध का रुख बदला हुआ होता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब अपने ही अपनों की बर्बादी का कारण बन जाते हैं तो फिर उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। 
          यह तो सर्वविदित है कि लोहा केवल लोहे से ही काटा जाता है। यदि लोहा लोहे को न काटे तो उसे दुनिया की कोई वस्तु नहीं काट सकती। इसी तरह पेड़ों की लकड़ी से माचिस की तीलियॉं बनाई जाती हैं। पेड़ों से बनने वाली माचिस की तीलियों से ही लकड़ी को आग लगाई जाती है। इसी प्रसंग में कहना चाहूँगी कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि अपने प्रियजन जब शत्रुता निभाने पर आ जाएँ तो अपने ही विनाश का कारण बन जाते हैं।
        एक बोधकथा की यहॉं पर चर्चा करते हैं। आशा है इसे आप सबने इसे पढ़ा होगा। कहते हैं कि एक बार एक कुत्ते और एक गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी दौड़ते हुए दो गाँव आगे रखे हुए एक सिंहासन पर पहले बैठेगा, वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जाएगा और राज्य करेगा। 
          जैसा कि निश्चित हुआ था दौड़ शुरू हुई। कुत्ते को पूरा विश्वास था कि वही जीतेगा और सिंहासन पर बैठेगा। इसका कारण था कि गधा कभी भी उससे तेज नहीं भाग सकता। उसका भाग्य किस करवट बैठने वाला है यानी उसके भाग्य में क्या लिखा है यह उस कुत्ते को अभी बिल्कुल भी ज्ञात नहीं था।
          शर्त के अनुसार कुत्ता तेजी से दौड़ने लगा। ज्योंहि वह थोडा-सा ही आगे गया था कि स्वभावत: गली के कुत्ते मिलकर उसे अपनी गली से खदेड़ने के लिए लपकने लगे तथा नोचने लगे। उन्होंने उस पर भौंकना शुरू किया। ऐसा ही व्यवहार उसके साथ हर गली और हर चौराहे पर होता रहा। जैसे तैसे कुत्ता हाँफते हुए जब सिंहासन के पास पहुँचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि गधा पहले से ही सिंहासन पर विराजमान है। वह उससे पहले ही वहाँ पहुँच चुका था। शर्त के अनुसार बाजी जीतकर वह राजा बन चुका था।
          यह सब देखकर निराश हो चुका कुत्ता बोल पड़ा, "यदि मेरे ही लोगों ने मुझे पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता।"।  
         इस घटना को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह बेचारा कुत्ता अपनी खुशफहमी में ही बर्बाद हो गया।
        लोहे की चर्चा एक बार पुनः करते हैं। लोहे से उत्पन्न जंग ही बस उसे नष्ट करता है। उसी तरह मनुष्य को भी कोई और नहीं बल्कि उसके विचार ही नष्ट करने में अहं भूमिका निभाते हैं। 
        मनुष्य यदि सहृदय होगा और सबको साथ लेकर चलने वाला बनेगा तो वे सभी उसके सहायक बनते हैं। इस तरह उसका बल बढ़ जाता है। तब कोई बाहरी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती। इसके विपरीत सबके साथ विपरीत व्यवहार करने वाले से उसके अपने विमुख हो जाते हैं। निश्चित मानिए कि उस समय मनुष्य उस समय मूर्खों के वश में होता है। यदि विद्वानों के संसर्ग में हो तो वे उसे ऐसी मूर्खता नहीं करने देंगे।
        मनुष्य को सदा अपनी सोच का दायरा विस्तृत रखना चाहिए। तभी उसका शुभ सम्भव हो सकता है। उसे सदा आत्म मन्थन करते रहना चाहिए जिससे वह अपने लिए उचित मार्ग का चयन कर सकता है और पथभ्रष्ट होने से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

पितरों को श्रद्धा से तृप्त करें, श्राद्ध से नहीं

पितरों  को श्रद्धा से तृप्त करो, श्राद्ध से नहीं 
      
संसार में हर व्यक्ति अपने जीवन में कल्याण की कामना करता है। वह अपने परिवारों जनों तथा समाज  में एक अच्छी सन्तान होने का मेडल पहनना चाहता है। इस प्रसिद्धी को पाने का एकमात्र यही उपाय है कि अपने बुजुर्ग होते माता-पिता को श्रद्धापूर्वक अपने आचार-व्यवहार से प्रसन्न करना चाहिए। 
           जहॉं तक हो सके उनके जीवनकाल में ही उनकी सेवा कर ली जाए। उनके खान-पान का समुचित ध्यान रखा जाए। उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न बरती जाए। उनके वस्त्रों के प्रति सजग रहा जाए। उनके साथ कुछ समय व्यतीत किया जाए ताकि वे अकेलेपन से घबरा न जाऍं। जो बच्चे ऐसा करते हैं उनका घर ही मन्दिर बन जाता है और वहॉं पत्थर की मूर्तियों का स्थान जीवित मूर्तियॉं यानी उनके माता-पिता ले लेते हैं।
          गुरु नानक देव जी के जीवन से ‌जुड़ी एक घटना कहीं पढ़ी थी, उसे यहॉं उद्धृत करना‌ चाहती‌ हूॅं। एक बार गुरू नानक देव जी भ्रमण करते हुए शिष्यों सहित तीर्थराज हरिद्वार गए । वहाॅं उन्होनें देखा कि हजारों भावुक अन्ध विश्वासी श्रद्धालु लोग गंगा में खड़े होकर मरे हुए माता-पिता आदि को पानी द्वारा तर्पण व पिण्ड दान कर रहे हैं।   
       नानक देव जी ने सोचा कि इन भोले लोगों कैसे समझाया जाय, अतः वे भी गंगा की धारा में खड़े होकर पंजाब की तरह मुॅंह करके दोनों हाथों से गंगा का पानी फैंकने लगे। स्वयं से विपरीत दिशा में जल फैंकते देख लोगों को आश्चर्य हुआ तो उन्होनें नानक देव जी से पूछा महाराज! आप ये क्या कर रहे हैं? 
            सरल स्वभाव गुरु नानक जी बोले, "भाइयो, मैं अपने खेत को पानी दे रहा हूँ।"  
         यह सुनकर सब लोग हंसने लगे और गुरु नानक जी से कहने लगे, "महाराज इस प्रकार आपके खेतों में पानी पहुॅंचना सम्भव है क्या?" 
       तब महात्मा नानक देव जी बोले, "ओ भोले लोगो! मेरा पानी मेरे पंजाब प्रान्त के खेतों में नहीं पहुँचेगा तो तुम्हारे मरे हुए माता-पिता जो किस योनि में किस देश में और अपने कर्मानुसार क्या फल भुगत रहे हैं, उन्हें तुम्हारा ये तर्पण पिण्ड दान कैसे पहुँचेगा ?" 
        लोगों को समझाते हुए गुरु नानक देव जी ने फिर कहा, "अतः इस पर विचार करो और अपने जीवित माता पिता और गुरुजनों को श्रद्धा व भक्ति भाव से तृप्त करो तभी तुम्हारा कल्याण होगा अन्यथा आप दुःख सागर में गोते ही खाते रहोगे।"
           इस घटना को पढ़कर यही प्रतीत होता है कि महापुरुषों के समझाने का‌ तरीका बड़ा विचित्र होता है। वे अपनी क्रियात्मकता से जन साधारण के मन में अपनी बात को बड़ी‌ सरलता से पहुॅंचा देते हैं। गुरु नानक देव जी के उपदेश के‌ बाद मेरे कहने के लिए कुछ नहीं बचता। यह अब आप सुधीजनों पर निर्भर करता है कि आप महापुरुषों का अनुसरण करना चाहते हैं या अन्धविश्वासों एवं रुढ़ियों में फसे रहना चाहते हैं।
           मैं बस इतना ही‌ कहना चाहती हूॅं कि अपने माता-पिता का ऋण जीवनभर उनकी सेवा करके भी नहीं चुका सकते। इसलिए उनके जीवनकाल में ही उन्हें इतना सन्तुष्ट कर दीजिए ताकि उनके परलोक सिधारने पर आपको किसी ढकोसले की आवश्यकता ही न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

मन से पार पाना कठिन

मन से पार पाना कठिन 

मानव मन से पार पाना बहुत कठिन कार्य कहलाता है। यह मन उसे बड़े ही नाच नचाता है। यह सदा आगे-ही-आगे भागता रहता है। इसकी गति बहुत तीव्र होती है। इसे बॉंधकर रखना मनुष्य के बस की बात नहीं है। मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है। यदि यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और चाहे तो गर्त में ढकेल सकता है।
        हमारा यह मन नित नए मूड पर आधारित रहता है। जिसे भी देखो वह यही कहता सुनाई पड़ता है कि मेरा मूड नहीं है। यह कभी प्रसन्न हो जाता है तो कभी उदास रहता है। कभी-कभी यह बच्चों की तरह चहकने लगता है। उस समय ऐसा लगता है मानो इन्सान के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे। कभी उदास या मायूस हो जाता है और फिर निराशा के सागर में गोते खाने लगता है यानी डूबने-उबरने लगता है। कभी ऐसा उखड़ जाता है कि इन्सान कहने लगता है कि मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा।
        ये सब इस मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं जो समय-समय पर मनुष्य को अपना रंग दिखाती रहती हैं। ईर्ष्या-द्वेष, हर्ष-विषाद, क्रोध-प्यार, आश्चर्य आदि भावनाएँ भी इसी मन में निवास करती हैं। ये भाव उसके चरित्र का एक अहं हिस्सा बन जाते हैं। जिस भी भाव की अधिकता समय विशेष पर होती है, उसी के अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगता है। 
        मन को मौजी इसीलिए कहते हैं कि यह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। कोई कुछ भी कहता रहे, यह उसे अनसुना कर देता है। मानो इसे किसी भी व्यक्ति से कोई लेना-देना ही नहीं हैं। मनीषी कहते हैं-
      मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
अर्थात् यदि मनुष्य अपने मन की बात मानकर, निराश होकर, थक-हारकर बैठ जाए तो असफलता ही उसके हाथ लगेगी। परन्तु यदि मनुष्य अपने मन की निराशा को दरकिनार करके साहसिक कार्य कर जाता है तो कोई ऐसा कारण नहीं कि वह सफलता की सीढ़ियाँ न चढ़ सके। अब यह निर्णय तो उसका अपना ही होता है कि वह अपने जीवन को किस ओर ले जाना चाहता है।
           मन को हम चमत्कारी शब्द कह सकते हैं। भाषा की दृष्टि से यदि मन के बाद 'न' शब्द जोड़ दिया जाए तो एक नया शब्द मनन बन जाता है। इसके विपरीत यदि मन से पूर्व न शब्द को जोड़ा जाए तो नया शब्द 'नमन' बन जाता है। मनुष्य यदि अपने जीवन में यथायोग्य प्रणाम अथवा नमन करे और मनन करने का अभ्यास कर ले तो निस्सन्देह उसका यह जीवन सार्थक हो जाएगा।
        यह मन हमारे शरीर रूपी रथ की लगाम है। इस लगाम को अनुशासन में रखना बहुत आवश्यक होता है। इस पर विवेक या बुद्धि का नियन्त्रण होना बहुत आवश्यक होता है। यदि लगाम न कसी जाए तो इन्द्रियाँ रूपी घोडे यहाँ वहाँ भागने लगते हैं। यदि वह इसे चलाने में कोताही करेगा तो मानव शरीर में बैठा यात्री रूपी आत्मा अपने गन्तव्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। 
          हमारा यह मन आकर्षक और लुभावने रास्तों पर चलकर बड़ा खुश रहता है, उसे शार्टकट भाते हैं। चाहे आगे जाकर उस गलती का कितना ही भयंकर परिणाम क्यों न हो। इस मन का क्या? वह तो अपने बचाव में सौ बहाने गढ़ लेगा और स्वयं को सन्तुष्ट कर लेगा। लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भुगतना तो मनुष्य को ही पड़ता है। चारों ओर से प्रश्नों की बौछार को उसे ही सहना होता है।
       गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि
मन बहुत चंचल है इसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।
    मनीषी समझाते हुए कहते हैं-
      मन साडे आखे नहीं लगदा 
    अस्सी मन दे आखे क्यों लगिए
इस उक्ति का तात्पर्य है कि जब मन हमारे कहने पर नहीं चलता तो हम उसके कहने पर क्यों चलें? यदि इसके कहने पर चलेंगे तो हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनने से कतराने लगेंगे। इसका कारण स्पष्ट है कि मन पंख लगाकर उड़ना चाहता है। इसलिए जब बिना मेहनत के सब कुछ पाना चाहेगा है तो प्रायः शार्टकट का सहारा लेगा। उस समय वह हमें कुमार्ग पर चलने के लिए विवश करेगा ओर हम खुशी-खुशी उसके सुझाए मार्ग पर चल पड़ेंगे। फिर वहाँ से लौटकर आना हमारे लिए बहुत ही कठिन हो जाएगा।
        यह मन भी सच्चाई और ईमानदारी की कठिन डगर पर चलने के लिए मनुष्य को हमेशा हतोत्साहित करता है। हालाँकि यह मार्ग कठिन भी होता है और लम्बा भी होता है पर इस पर चलने से हमेशा शुभ ही होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य को सफलता इसी राह पर चलकर मिलती है।
          मन के कहने पर यदि मनुष्य चलने लगें तो अनेकश: परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है। इसलिए उन्नति अथवा सफलता की कामना करने वाले लोगों को मन के अनुसार चलने के बजाय अपने तरीके से उसे चलाना चाहिए। उसे यत्नपूर्वक साधकर अपनी मर्जी से चलाना ही श्रेयस्कर होता है। इससे मनुष्य का जीवन भटकाव से बचा रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 30 सितंबर 2026

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन

वृद्धावस्था में सुखमय जीवन व्यतीत करने के लिए हर व्यक्ति को बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए। यद्यपि इस अवस्था में हर मनुष्य शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है। शारीरिक अस्वस्थता के कारण वह किसी प्रकार का कठोर परिश्रम नहीं कर पाता। चलने-फिरने और काम-काज करने उसे में असुविधा होने लगती है। इस समय उसे अपनों के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है। 
         वृद्धावस्था  में व्यक्ति को स्वतन्त्रता की भी आवश्यकता होती है। वे पूर्ववत खाना-पीना, सोना-जागना, उठना-बैठना, घूमना-फिरना आदि अपनी इच्छानुसार करना चाहते हैं। जीवन के इस पड़ाव में ये सुविधाएँ मिल जाएँ तो उनका जीवन सुखद हो सकता है। इस अवस्था में  कुछ लोगो में खाने-पीने की ललक बढ़ जाती हैं। उन्हें अपनी इच्छा से जीवन यापन की सुविधा मिलना बहुत जरूरी है।
        इस आयु में व्यक्ति बहुत संवेदनशील हो जाता है। उसे सभी अपनों से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार की अपेक्षा होती है। यदि ऐसे हालात में अपने बच्चे उपेक्षा करने लगें तो बुजुर्ग व्यक्ति टूटने लगता है। उसे यही लगता है कि जिन बच्चों के लिए उसने अपना सारा सुख-आराम छोड़कर उनकी जिन्दगी बनाई, वही विमुख हो रहे हैं। यह बात उन्हें पच नहीं पाती।
        अपनी वृद्धावस्था का समय बिना कष्ट के सुविधापूर्वक व्यतीत हो, उसके लिए सबसे पहले अपने आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा। सबसे पहले अपने बच्चों पर निर्भर रहने का विचार त्याग देना चाहिए। यदि बच्चे अपना कर्तव्य समझकर वृद्धावस्था में माता-पिता की सेवा करें तो बहुत अच्छा है अन्यथा उनसे किसी प्रकार की कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। समय के साथ-साथ उनकी प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं।
          अपने व्यवहार को यथासम्भव सन्तुलित रखने का प्रयास करना चाहिए। कभी यह विचार मन में नहीं रखना चाहिए कि अपनी वृद्धावस्था को आधार बनाकर किसी से सेवा करवा ली जाए अथवा सम्मान प्राप्त कर लिया जाए। यदि किसी सेवक से अपने कार्य करवाएँ तो उसे पूरा पारिश्रमिक देना चाहिए ताकि दोबारा उसे कोई काम कहा जाए तो वे कभी आनाकानी न करें।
          बड़ों को चाहिए कि वे अपने बच्चों के जीवन में दखलअंदाजी न करें। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने अपना जीवन जब अपनी इच्छाओं व शर्तो पर जिया है तो बच्चों को भी उनका जीवन अपने तरीके से जीने देना चाहिए।
        अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों के साथ नहीं करनी चाहिए और अपने बच्चों, बन्धु-बान्धवों किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ऐसा करने से निराशा हाथ लगती है और मन उदास होने लगता है। सबसे वितृष्णा होने लगती है जो मनुष्य को नकारात्मक बनाती है।
        यदि बच्चे साथ न रहना चाहें तो उन पर दबाव नहीं डालना चाहिए और न ही उन्हें भला-बुरा कहकर अपने मन को व्यथित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए, अपने उसी घर में रहा जाए जहाँ जीवनभर की यादें जुड़ी हुई हों। वहाँ जीवन सुविधा से जिया जा सकता है।
          इस आयु में उन लोगों को अपना मित्र बनाना चाहिए जो उनकी मनोस्थिति को भली-भाँति समझते हों तथा उनके जीवन के कठिन पलों में सहयोगी बन सकें। सब लोगों की बातें सुन लेने में कोई हर्ज नहीं है। पर निर्णय सदा अपने विवेक को ही आधार बनाकर लेना चाहिए।
      अपने जीवन में थककर कभी हारना नहीं चाहिए। अकेले रहते हुए स्वयं ही सदा अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। समय-समय पर डाक्टर के पास जाकर स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श लेते रहना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो चिकित्सीय परीक्षण भी करवाते रहना चाहिए। जहाँ तक हो सके पौष्टिक भोजन खाना चाहिए और हर सम्भव प्रयास करना चाहिए कि अपने काम अपने हाथों से करने चाहिए, किसी पर भी निर्भर नहीं रहना चाहिए।
        यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अपनी जिजीविषा को बनाए रखें ताकि जीवन में उत्साह बना रहे। निराशा को किसी भी कारण से अपने मन में स्थान नहीं देना चाहिए। किसी के भी समक्ष अपनी असहायता का रोना रोकर सम्बन्धों की भीख नहीं माँगनी चाहिए। 
      सबसे अहं बात यह है कि बच्चों को अपना व्यापार, अपनी धन-सम्पति अवश्य सौंपिए परन्तु अपने पास इतना बैंक बेलेंस और भौतिक संपत्ति रख लेनी चाहिए जिससे अपनी वृद्धावस्था का समय अपने साथी के साथ सुविधापूर्वक व्यतीत हो सके। किसी के भी समक्ष अपनी जरूरतों को पूरा करने हेतु पैसे के लिए हाथ न पसारना पड़े।
         अपने समय का सदुपयोग सामाजिक कार्यो, ईश्वर भजन, स्वाध्याय, योग आदि में करना चाहिए। उस जगज्जननी माता यानी ईश्वर से अपने कुशल-क्षेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। वही रक्षक है और हर कदम पर सहयता करने वाला है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

नश्वर मानव देह

नश्वर मानव देह

मानव देह की नश्वरता के विषय में कोई सन्देह नहीं है। इस संसार को असार कहा जाता है। हमारे ग्रन्थों का कहना है कि जिस जीव का जन्म इस संसार में होता है, उसकी मृत्यु निश्चित होती है। यह शरीर जीव को अपने पूर्वकृत कर्मो के अनुसार कुछ निश्चित समयावधि के लिए मिला है। जब भी यह समय सीमा समाप्त हो जाती है तो उसे इस भौतिक शरीर को त्यागना पड़ता है। इसके लिए उसकी राय का कोई मूल्य नहीं होता। वह चाहे अथवा न चाहे, कितना रोना-धोना कर ले, मिन्नतें कर ले उसे एक क्षण की भी मोहलत नहीं मिलती।
         नश्वर मानव देह का अर्थ है कि मानवीय शरीर जिसका अन्त या नाश निश्चित है। मनुष्य का यह भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पंचतत्वों से बना हुआ है। एक दिन जब यह मृत हो जाता है तो उसे अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। उस समय वे पांचों तत्व उन उन तत्त्वों में जाकर मिल जाते हैं। इस शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है। यही सार तत्त्व है। 
          वेद, उपनिषद् आदि महान ग्रन्थ हमें बार-बार चेतावनी देते हुए कहते हैं, 'हे मानव, इस नश्वर देह का मोह बिल्कुल मत करो। यथाशीघ्र शुभकर्मो की ओर प्रवृत्त हो जाओ।'
         यजुर्वेद का निम्न मन्त्र शरीर की नश्वरता और शुभकर्मों की शुचिता के प्रति यह उद् घोष करता है-
       वायुरनिलममृतमवेदं    भस्मान्तँ     शरीरम्।
       ऊँ ऋतो स्मर कृतँ स्मर ऋतो स्मर कृतं स्मर।
अर्थात् प्राणवायु शरीर में रहता है, वह मृत्यु के समय विश्व के प्राण में लीन हो जाता है। यह शरीर तभी तक है जब तक वह भस्म नहीं हो जाता। हे मनुष्य! सत्कर्म को स्मरण कर, जो कर्म अब तक कर चुका है उन्हें भी स्मरण कर।
        यह मन्त्र हमें स्पष्ट आदेश देता है कि मनुष्य का यह शरीर नश्वर है। अपने भूतकाल में किए गए कर्म या जो कर्म वर्तमान में कर रहे हैं अथवा जो कर्म भविष्य में करने वाले हैं, उन सब कर्मों की ओर मनुष्य को ध्यान देना चाहिए। 
        यदि मनुष्य तन पाकर वह शुभकर्म नहीं करता तो निश्चित ही उसे अपने आगामी जन्मों में मनुष्येतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। वे सभी केवल भोग योनियाँ ही कहलाती हैं जहाँ जीव मात्र अपने किए गए दुष्कर्मों का भोग करके उनसे मुक्त होता है। उसे उन योनियों में सुकर्म करने की बुद्धि ईश्वर नहीं देता। वहाँ उसे अपने कर्मो के अधीन रहने की विवशता होती है।
          भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में शरीर के नाशवान होने और कर्म करने पर बल देते हैं। उनका कथन है कि सृष्टि के आदि से लेकर आज तक जीव ने विभिन्न रूपों में अनेक जन्म लिए हैं। आत्मा अपने पुराने, रोगी और कटे-फटे शरीर ऐसे बदलती है जैसे हम लोग फटे-पुराने या बदरंग हुए वस्त्रों को फैंककर नए कपड़े पहनते हैं। सरल शब्दों में कहें तो शरीर का यह परिवर्तन आत्मा का स्वभाव है। यही भाव निम्न श्लोक में है-
            जीर्णानि वासांसि यथा विहाय
            नवानि   गृह्णाति   नरोपराणि।
            तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
            न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
कहने का तात्पर्य है कि शरीर को  परिवर्तित करना आत्मा के लिए एक सतत प्रक्रिया है जिससे गुजरते समय इस आत्मा को जरा भी दुख नहीं होता। वह तो परम पिता परमात्मा का ही एक अंश है। इसलिए आत्मा को उससे मिलने की इच्छा बलवती होती रहती है। 
        श्रीकृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म पर बल दिया है। वे कहते हैं-
        कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
        मा कर्मफलहेतुर्मा ते संगोSस्त्वकर्मणि।।
अर्थात् कर्म करो पर कर्त्तापन का भाव न रखो। यदि मनुष्य स्वयं को कर्त्ता मानने लगता है तो उसका अहं भाव प्रबल होने लगता है। वही अहं भाव उसके पतन का निमित्त बनता है। कर्म करके उसे ईश्वर को समर्पित कर देने से मनुष्य निरहंकार हो जाता है। तब वह आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उस समय ईश्वर प्राप्ति की ओर वह अपने कदम बढ़ाने लगता है।
          भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें वही भक्त प्रिय है जो अपने कर्त्ता होने के मिथ्याभिमान को त्याग करके उनकी यानी ईश्वर की शरण में आ जाता है। 
        इस संसार में हर जीव और पदार्थ विनाशी या नश्वर है, केवल एक ईश्वर ही है जो अविनाशी है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी ईश्वर रूपी धुरी के इर्दगिर्द चक्कर लगाता रहता हैं।
        इसी कारण हर जीव का यह भौतिक शरीर भस्म होने वाला है। मानव का चोला प्राप्त करके यदि मनुष्य सकाम कर्म करता है तो उससे उसकी भौतिक उन्नति होती है। इसके विपरीत निष्काम कर्म करता हुआ वह आध्यात्मिक उन्नति करके मालिक का कृपा पात्र बन जाता है। 
चन्द्र प्रभा सूद