मंगलवार, 16 जून 2026

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई क्या है? यदि इस विषय पर विचार करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि जिस धन-दौलत और ऐश्वर्य-समृद्धि को पाने के लिए मनुष्य ने कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात एक करके अथक परिश्रम किया, वह तो कभी उसका था ही नहीं। जीवन के अन्तिम समय आने पर उस सारे भौतिक धन-वैभव को उसे इस पृथ्वी पर ही छोड़कर परलोक जाना पड़ता है। वह तो मात्र एक ही भ्रम था जिसने उसे अपने जाल में सारा जीवन उलझाए रखा।
           हमारे महान् ग्रन्थ और मनीषी एक ही बात कहते हैं और अनुभवजन्य सच्चाई भी यही है कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और अपनी आयु भोगकर खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। उसके सभी साजो-समान, उसकी सारी धन-दौलत यहीं रह जाती है। गठरी बाँधकर वह कुछ भी अगले जन्म के लिए नहीं ले जा सकता। अपने जीवन काल में कृत केवल अच्छे अथवा बुरे कर्म ही वह साथ लेकर जा सकता है। फिर उनका मीठा या कड़वा फल वह जन्म-जन्मान्तरों तक भोगता रहता है।
             एक दृष्टान्त से इस सत्य को समझने का प्रयास करते हैं। एक बार एक सन्त ने अपने दो भक्त को बुलाया और कहा आप दोनों को यहाँ से पचास कोस तक पैदल जाना है। एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते में मिले उसे ये बाँटते जाना और दूसरे भक्त को खाली बोरी दी उससे कहा रास्ते में जो उसे अच्छा सामान मिले उसे बोरी में भर लेना। दोनों सन्त द्वारा निर्दिष्ट यात्रा के लिए अपना सिर झुकाकर निकल पड़े।
          जिसके कन्धे पर सामान था वह धीरे-धीरे चल रहा था पर खाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर उसे सोने की एक ईंट मिली, उसने उसे बोरी मे डाल लिया। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे फिर एक ईंट मिली। उसे भी उसने उठा लिया। जैसे-जैसे चलता गया, उसे सोना मिलता गया और वह बोरी मे भरता हुआ चलता गया। बोरी का वजन बढता चला गया और अब उसका चलना मुश्किल होने लगा। उसकी साँस भी फूलने लगी। उसका एक-एक कदम बढ़ाना कठिन होने लगा।
          दूसरे भक्त को रास्ते में जो भी मिलता, उसे बोरी में से खाने का कुछ समान दे देता। धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंजिल तक पहुँचना आसान हो गया और जो इकट्ठा करता रहा, उसने अतिभार के कारण रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
           कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जो मनुष्य आयुपर्यन्त दूसरों को बाँटता रहता है, अन्तकाल तक पहुँचते-पहुॅंचते वह हल्का हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के दुख-दर्द, परेशानियों को बाँटने, निस्वार्थ परोपकार करने वाले मनुष्य को यात्रा पूरी करने तक सन्तुष्टि मिलती है, वह प्रसन्न रहता है। अपने शुभकर्मों के कारण उसके पापकर्मों की गठरी नहीं बनती। उसे इहलोक और परलोक हर स्थान पर पुण्यों के सुख का अहसास होता है।
          इसके विपरीत अपनी स्वार्थ वृत्ति के कारण जो मनुष्य दूसरों को कष्ट देते हैं, ऐसे अत्याचार करने वालों के दुष्कर्मों की गठरी भारी होती जाती है, उसे उठाकर चलना उनके लिए कठिन हो जाता है। जीव उस बोझ को सम्हाल नहीं पाता। फिर भी जन्म- जन्मान्तरों तक उसे वह गठरी उठाकर चलना पड़ता है जो बहुत कष्टदायी होता है।
          मनन करने पर यह पता चलता है कि हमने सारे जीवन में क्या बाँटा? क्या इकट्ठा किया? हम मंजिल तक कैसे पहुँच सकेंगे?
          हमारे जीवन का कड़वी सच्चाई यही है कि 60 साल की आयु के बाद कोई बैंक बैलेन्स के विषय में नहीं पूछता है और न ही मँहगी गाड़ियों के बारे में जानना चाहता है। मिलने वाले सभी लोग उससे उसके स्वास्थ्य और बच्चों के बारे में ही जानकारी लेना चाहते हैं।
        जीवन के अन्तिम दौर में धन-समृद्धि अथवा गाड़ियाँ सुविधा दे सकती हैं परन्तु वृद्धावस्था के कष्टों को कदापि दूर नहीं कर सकती। उस समय मनुष्य यही प्रार्थना करता है कि बेशक उसकी धन-दौलत ले लो पर उसके बदले सुकून के दो पल दे दो। समय रहते मनुष्य को सावधान हो जाना चाहिए।
        'अथर्ववेद' का कथन है-  
        शतहस्तं समाहार सहस्त्र हस्त संकिर:।
अर्थात्  सैंकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से सद्कार्यों में खर्च करो। यानी यह मन्त्रॉंश कठोर परिश्रम करने, प्रचुर धन कमाने और फिर उसे समाज की भलाई के लिए उदारतापूर्वक व्यय करने का सन्देश देता है। 
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य की वास्तविक कमाई वही है जिसे वह निस्वार्थ रहकर समाज की भलाई के‌ लिए खर्च करता है। यही पुण्य कर्म उसके साथ-साथ अगले जन्मों में भी जाते हैं। इन पुण्यों का भोग वह इहलोक और परलोक दोनों में करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 15 जून 2026

अध्यापक का कार्य

अध्यापक का कार्य

शिक्षक अथवा अध्यापक का कार्य अपने विद्यार्थियों को सुसंस्कारित करना होता है। ताकि वे देश और समाज का गौरव कहला सकें। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समाज के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत करें और अपने उच्च चरित्र का परिचय दें। उसके लिए पहली शर्त है उन शिक्षकों का चरित्रवान होना और उन विद्यार्थियों का आज्ञाकारी होना। शिक्षक को अपने छात्रों को सन्तान तुल्य मानकर एक पिता के समान उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ रहता है तो वह इस गौरवशाली पद के कदापि योग्य नहीं है।
          एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को जीवन में सफलता के सोपानों पर चढ़ते देखता है तो उसे वैसी ही प्रसन्नता मिलती है जैसी उस बच्चे के माता-पिता को। वह  स्वयं तो अपने उसी स्थान पर मील के पत्थर की तरह खड़ा रहता है परन्तु अपने छात्रों को ऊँचाइयों पर पहुँचाने का कार्य बखूबी निभाता है। जिस प्रकार सड़क अपने स्थान पर स्थित रहकर यात्रियों को उनके गन्तव्य, उनकी मंजिल तक पहुँचा ही देती है। इसीलिए शिक्षक को भगवान का दर्जा दिया जाता है।
            हमारी भारतीय सभ्यता ने गुरु और शिष्य दोनों को जहाँ संस्कार दिए हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें मर्यादाओं में भी बाँधा है। एक ओर जहाँ छात्रों को सिखाया कि अपने गुरु का सम्मान ईश्वर की तरह करो तो वहीं दूसरी ओर गुरु को भी शिक्षित किया कि अपने सभी शिष्यों के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उन पर पुत्रवत् स्नेह रखे। उसके पास जो भी ज्ञान है, उसे अपने छात्रों में बाँट देने में हिचकिचाए नहीं। माता-पिता जैसे आगे बढ़ते हुए अपने बच्चों पर गर्व करते हैं, उसी प्रकार एक अध्यापक को भी अपने छात्रों को उन्नति करते हुए देखकर गौरवान्वित होना चाहिए। उनसे स्पर्धा अथवा ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए।
          यद्यपि आज इस भौतिक युग में कुछ अध्यापक दुराचरण में लिप्त होकर इस पद की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। कुछेक ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी अन्जाम दे दिया है। छात्रों के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार की घटनाएँ भी यदा कदा सुनने को मिल जाती हैं। उन मुट्ठी भर लोगों के कारण इस गौरवशाली गुरु-शिष्य परम्परा को कलंकित करके कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने सभी छात्रों के साथ समान रूप से व्यवहार करे। किसी बच्चे के माता-पिता के पद या धन-वैभव से प्रभावित होकर उस तथाकथित छात्र के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
        आजकल प्राइवेट सेक्टर की स्वार्थी प्रकृति और महत्त्वाकाँक्षा के कारण इस शिक्षक वर्ग का बहुत ही शोषण हो रहा है। जिसके कारण कम तनख्वाह पर भी काम करना उनकी मजबूरी बनती जा रही है। इसलिए अपना व परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें प्राइवेट ट्यूशन का सहारा भी लेना पड़ रहा है। कक्षा में वे लोग कैसा भी पढ़ाऍं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। उनका ट्यूशन का धन्धा अच्छा चलना चाहिए। शिक्षा के इस पावन क्षेत्र में यद्यपि नई पीढ़ी की कोई रुचि नहीं है। वे शिक्षक बनने के स्थान पर दफ्तरों में अधिक वेतन पर कार्य करना चाहते हैं। अतः यहाँ इस क्षेत्र में गुणवत्ता की कमी बहुत अखरती है।
            कुछ सरकारी नीतियों के चलते अभी तक साक्षरता दर का आँकड़ा अपेक्षाकृत कम है। देश में निरक्षर लोग अभी भी बहुत बड़ी संख्या में हैं। पूरे देश में लाखों विद्यालय आज भी बिना अध्यापक के चल रहे हैं अथवा उनकी संख्या नगण्य है। इस इक्कीसवीं सदी में आज भी हमारे देश में लाखों बच्चे ऐसे मिल जाएँगे जिन्होंने दुर्भाग्यवश कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उन बच्चों के भविष्य के विषय में भी अध्यापकों को आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
          जमीनी सच्चाई तो यही है कि एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को सदा ही अपना बेस्ट यानी सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता है। अपने मार्गदर्शन से उसके भावी कैरियर को बनाने में यथासम्भव प्रयास करता है। दूसरी ओर बहुत से अध्यापक ऐसे भी हैं जिन्हें महीने के आखिर में आने वाली बस अपनी तनख्वाह से मतलब होता है। वे अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकों को पढ़कर अथवा समाचारपत्र को पढ़कर अपने ज्ञान की वृद्धि नहीं करना चाहते। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे कूपमण्डूक की तरह बनकर रह जाते हैं।
          सब विपरीत स्थितियों के चलते हुए भी शिक्षक वर्ग को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उसे अपने ज्ञान का समुचित उपयोग करना ही चाहिए और समय-समय पर उसे स्वयं को अपग्रेड भी करना होगा। जिससे अपने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में उनकी भूमिका पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह महत्त्वपूर्ण रहे। वे अपने छात्रों के जीवन में एक मील के पत्थर की तरह सिद्ध हो सकें।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 14 जून 2026

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार 

महान भारतीय संस्कृति की सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार है। परिवार समाज की सबसे छोटी, प्राथमिक और मूलभूत इकाई है। यह सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तम्भ है। यह न केवल बच्चों का समाजीकरण और पालन-पोषण करता है बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित करता है। इससे सामाजिक स्थिरता, अनुशासन और भावात्मक सुरक्षा बनी रहती है। 
        भारतीय परम्परा में परिवार को एक सामाजिक संरचना की धुरी माना जाता है। संयुक्त परिवार की व्यवस्था ने पारम्परिक रूप से आर्थिक सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा दिया है। वर्तमान समय में किसी भी कारण से एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। फिर भी परिवार के आधारभूत कार्यों में कोई अन्तर नहीं होता। ये व्यक्ति और समाज को जोड़ने का कार्य बखूबी करता है। 
           परिवार बच्चे पहली पाठशाला होती है जहाँ वह सामाजिक व्यवहार, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्य और परम्पराओं के विषय में जानकारी प्राप्त करता है। परिवार अपनी विरासत, भाषा और संस्कृति को जीवित रखता है। यह अपने सदस्यों को सुरक्षा, प्यार और आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है जो व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक होता है।
          परिवार को एकसूत्र में बाँधकर रखना एक कुशल गृहिणी बखूबी जानती और समझती है। घर को स्वर्ग बनाने के लिए एक स्त्री अकेले ही समर्थ है, उसे किसी अन्य सहारे की आवश्यकता नहीं होती। वह सदा अपनी सूझबूझ से घर-गृहस्थी की समस्याओं का निदान करके परिवार में समरसता का माहौल बना सकती है।
          इसीलिए ऐसी व्यवहार कुशल गृहिणी की प्रशस्ति में शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। 'गृहिणी गृहमुच्यते' अर्थात् गृहिणी ही घर है कहकर उसके महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। पुरुष से भी अधिक मान उसे इसीलिए दिया गया कि वह परिवार का केन्द्रबिन्दु यानी धुरी होती है। सबको यथोचित सम्मान देना, सबके साथ वर्तना या व्यवहार करने में उसका कोई सानी नहीं होता। वह अतिथियों और देवों का यथोचित सम्मान करके अपने घर-परिवार को सुरभित करती है। ऐसे घरों में ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा सदा ही होती रहती है।
        कहते हैं कि एक माला बनाने के लिए बहुत से मनकों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एक आरती को सजाने के लिए भी अनेक दीपक चाहिए होते हैं। एक खाली समुद्र को भरने के लिए हजारों बूँद जल की आवश्यकता होती है। परन्तु इन सबसे बढ़कर कठिन कार्य यानी घर को संचालित करने का कार्य एक स्त्री बहुत ही खूबसूरती से निभा लेती है। यहाँ अनेक की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
          ओशो रजनीश ने अपनी पुस्तक 'शिक्षा में क्रान्ति' में लिखा है कि ‘स्त्री के जीवन में यदि कोई चीज सक्रिय हो जाती है तो एक परिवार के प्राणों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। एक स्त्री को बदल लेना पचास पुरुषों को बदलने के बराबर होता है। इतनी बड़ी शक्ति जिनके  हाथ में हो, इतनी बड़ी सामर्थ्य जिनके हाथ मे हो, अगर जीवन के लिए कुछ भी नहीं करती तो निश्चित ही अपराधी है।’ 
          इस कथन का वास्तव में यही अर्थ है कि यदि स्त्री अपनी शक्ति को विस्मृत करती है और अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं करती तो वह बहुत बड़ा अपराध करती है। उसके कन्धों पर घर-परिवार का महान् दायित्व है। 
          संस्कार देकर वह भावी पीढ़ियों का निर्माण करती है जो राष्ट्र की धरोहर हैं। यदि हमारा युवावर्ग उच्छ्रँखल और दिशाहीन होगा तो उसका दोष घर की स्त्री का होता है। यदि नींव ही कमजोर रह जाएगी तो निर्माण कार्य ठीक से नहीं होगा। इसी प्रकार यदि नव पीढ़ी को संस्कार नहीं दिए गए तो देश, धर्म और समाज की रक्षा नहीं हो सकेगी। एवंविध इसके दूरगामी परिणाम हम सबको भुगतने पड़ेंगे।
            संस्कृत भाषा और हिन्दी भाषा में पवित्र विवाह सम्बन्ध का विच्छेद करने के लिए कोई शब्द नहीं है। विवाहोपरान्त अपने जीवन साथी का त्याग करने के लिए पहला Divorce शब्द अंग्रेजी भाषा में है जिसे ईसाई धर्मानुयायियों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। दूसरा 'तलाक' शब्द उर्दू भाषा में इस्लाम मतावलम्बियों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
            हमारी महान् भारतीय हिन्दू सभ्यता में ऐसी परिकल्पना ही नहीं की गई कि विवाह के पश्चात दोनों जीवन साथियों में अलगाव हो। यहाँ यह पवित्र बन्धन सात जन्मों के लिए माना जाता है। हमारा धर्म केवल एक होना या जोड़ना सिखाता है अलग करना नहीं। 
          भारतीय वैवाहिक संस्था विवाह के समय सप्तपदी के समय एक-दूसरे को दिए गए वचनों को निभाने पर बल देता है। पति-पत्नी दोनों का यह बराबर का दायित्व बनता है कि वे अपने पूर्वाग्रहों और झूठे अहं का त्याग करके सामंजस्यपूर्वक अपनी गृहस्थी की गाड़ी को बाधारहित चलाएँ और आदर्श स्थापित करें।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 12 जून 2026

आत्मा परमात्मा का अंश

आत्मा परमात्मा का अंश

हर मनुष्य में परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में विद्यमान होता है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि जब उसमें ईश्वर का अंश है तो वह ईश्वर स्वरूप ही होगा। बस उसे अपने अन्तस् में विद्यमान इस ईश्वरीय शक्ति को पहचानना होता है। भारतीय वेदान्त दर्शन के अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश या प्रतिबिम्ब है। अद्वैत सिद्धान्त का मानना है कि आत्मा और परमात्मा वास्तव में एक ही हैं। माया यानी अज्ञान के कारण वे अलग प्रतीत होते हैं।
          यहॉं समुद्र और उसकी लहरों की बात करते हैं। जिस प्रकार समुद्र की हर लहर पानी ही होती है, उसी प्रकार हर जीव में निवास करने वाली यह आत्मा निरावरण होकर परमात्मा का ही रूप होती है। आत्मा परमात्मा का आंशिक ज्ञान है जो ज्ञान प्राप्त होने पर ईश्वरमय हो जाती है।
        आत्मा सर्वोच्च सत्ता का ही एक सूक्ष्म रूप है। मनुष्य अज्ञानतावश स्वयं को शरीर मान लेता है। परमात्मा और आत्मा को हम‌ सूर्य और उसकी किरण के समान मान सकते हैं। किरण सूर्य का ही अंश होती है परन्तु पूर्ण सूर्य नहीं होती। जीवात्मा शरीर और कर्मों से बॅंधी होती है जबकि परमात्मा मुक्त और सर्वव्यापी होता है। ज्ञान और योग के द्वारा आत्मा कका परमात्मा में लीन होना ही मोक्ष कहलाता है। मोक्ष प्राप्त करने के उपरान्त निश्चित समय तक जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।
          जब मनुष्य का जन्म इस धरा पर होता है तो उसे पृथ्वी पर अवतरित होना कहा जाता है। उसका यह अवतार रूप उसे ब्रह्माण्ड के अन्य सभी जीवों से अलग करता है। अवतार लेने के बाद उसे अपने चरित्र से दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। वह महापुरुषों के समान देवता भी बन सकता है और आतंकवादियों की भाँति दानव भी। वह मर्यादा पुरुषोततम राम भी बन सकता है और अहंकारी रावण भी। इसी प्रकार अपने जीवन के लिए मानक उसे स्वयं तय करने होंगे।
          जब मनुष्य एक इन्सान के स्थान पर ईश्वर के रूप में अपना जीवन जीना प्रारम्भ करेगा तब इस संसार में और उसके इस जीवन में कोई उथल-पुथल नहीं होगी। वह शान्त व संयमी जीवन जी पाएगा। तब किसी जीव अथवा किसी पदार्थ की अवस्था और गतिविधि में भी कोई बदलाव नहीं आएगा। इन्सानी गुणों, क्षमताओं और कार्यों में कोई कतर-ब्यौंत नहीं होगी। जब मनुष्य अपने भीतर स्वयं ही ईश्वरीय गुणों को समझने लगेगा तब केवल एक चीज बदलेगी, वह है उसका दृष्टिकोण या नजरिया। उसके बदलते ही मनुष्य का जीवन सहज, सरल, निष्कपट हो जाएगा, वहाँ ईर्ष्या-द्वेष, मारकाट, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति आदि आसुरी भावनाएँ दूर हो जाएँगी। ईश्वर तथा इन्सान के रूप में अपनी दोहरी भूमिका को मनुष्य बिना किसी कष्ट के आसानी से निभा सकेगा।
           मनुष्य के मन में ईश्वर का वास होता है। इसीलिए मनीषी जन मन को मन्दिर बनाने पर बल देते हैं। जब हमारा मन मन्दिर बन जाएगा तब हमारा घर स्वयं ही तीर्थस्थल कहलाएगा। उस घर में रहने वाले स्वर्ग के समान शान्ति का अनुभव करेंगे। उस घर के पास से गुजरने वालों को भी सुगन्धित बयार का झौंका प्रफुल्लित करेगा।
            ईश्वर तीर्थों, जंगलों, पर्वतों की गुफाओं में भटकने से नहीं मिलता बल्कि अपने घर में रहकर सांसारिक दायित्वों को निभाते हुए मिलता है। दुनिया के दुख-कष्टों से भागकर भगवा चोला पहनने वाले भगोड़ों अथवा तथाकथित गुरुओं को तो वह कदापि नहीं मिलता।
          गुरुडम फैलाने वाले तथाकथित गुरु सवालों-जबावों के चक्कर में अपने अनुयायियों को उलझाए रखते हैं। ये गुरु अलग-अलग सवालों के अलग-अलग उत्तर बताते हैं लेकिन सारे सवालों को हल करने का एक सूत्र कभी नहीं बता सकते। यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी? वे तो बस भ्रमजाल फैलाए रखना चाहते हैं। दूसरों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले धन-सम्पत्तियों का संग्रह करते रहते हैं। अपने चरित्रों से अनुयायियों को प्रभावित नहीं कर पाते। इसलिए अपने वजूद को बचाने के लिए वे संघर्ष करते रहते हैं। 
          मनुष्य को स्वयं ही अपनी खोज करनी होगी कि वह ईश्वर तुल्य आचरण किस प्रकार कर सकता है? अपने अतस् में ईश्वरीय गुणों को प्रकाशित करने लिए उसे सबसे पहले स्वयं संयमित आचरण करना होगा। फिर अपने अन्तस् में ध्यान लगाकर  ईश्वर रूपी प्रकाश को पाने का यत्न करना होगा। इस सम्पूर्ण साधना के लिए ईश्वर की आराधना और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करना उसके लिए बहुत आवश्यक होता है।
          यदि मनुष्य केवल सच्चाई और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहण करता हुआ ईश्वरीय शक्ति को अपने अन्तस् में अनुभव करने लगेगा तब वह उस प्रभु के गुणों अपने भीतर महसूस कर सकता है। विचारों की शुद्धता और सच्चरित्रता से ईश्वरत्व के गुण मनुष्य में स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 11 जून 2026

जीवन नदी की तरह

जीवन नदी की तरह

मनुष्य का जीवन नदी की तरह निरन्तर प्रवाहमान है। गत्यात्मकता ही उसकी जीवनदायिनी शक्ति है। जब कभी उसकी यह गति बाधित होने लगती है तभी सारी समस्याओं का जन्म होता है। जैसे नदी की गति चट्टानों के आ जाने से सहज नहीं रह पाती उसी प्रकार मानव जीवन में दुखों और परेशानियों के आ जाने से रुकावट होने लगती है।
         जीवन नदी की तरह है जो लगातार बहती रहती है, कभी शान्त तो कभी उतार-चढ़ाव यानी दुख-सुख के साथ। जैसे नदी अपनी मंजिल समुद्र की ओर बिना रुके चलती है, वैसे ही जीवन भी समय के साथ आगे बढ़ता है। यह निरन्तर प्रवाह, परिवर्तन और संघर्ष के बीच आगे बढ़ने का सन्देश देता है जहाँ बाधाओं रूपी पत्थर नदी के वेग को बढ़ाती हैं। 
          जीवन यात्रा की तुलना नदी से की जाती है। इसका कारण है कि नदी की तरह जीवन कभी नहीं रुकता, यह लगातार बदलता रहता है। जीवन में सुख-दुख, आशा-निराशा नदी की लहरों की तरह आते-जाते रहते हैं। नदी की तरह इन्सान को भी हर परिस्थिति में ढलना और आगे बढ़ना सीखना चाहिए। जैसे नदी का अन्तिम लक्ष्य समुद्र है, वैसे ही जीवन का लक्ष्य मोक्ष तक की उद्देश्यपूर्ण यात्रा है। जीवन के अनुभव नदी में पत्थरों के साथ संघर्ष की तरह इन्सान को समय-समय पर अधिक निखारते हैं और गहरा बनाते हैं। 
          रुके हुए शान्त जल में कंकड़ मारने से उसमें हलचल होने लगती है और कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई देता। उसी प्रकार जब जीवन में ठहराव आता है और उस समय उसमें दुख या परेशानी का कंकर फैंका जाता है तो जीवन में भी उथल-पुथल होने लगती है। जीवन की आशाएँ निराशा में बदल जाती हैं। निराशाजनक स्थिति में भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगता है। कोई रास्ता नहीं सूझता। इन्सान केवल बेबस होकर रह जाता है और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
        समय बीतने पर सारी परेशानियाँ स्वयं ही दूर होने लगती हैं। तब जीवन में आनन्द और उल्लास फिर से लौट आता है। इन्हीं विचारों को महात्मा बुद्ध के जीवन में घटी इस घटना के माध्यम से समझते हैं। यह कथा फेसबुक पर किसी मित्र ने पोस्ट की थी। मुझे बहुत प्रेरणादायक प्रतीत हुई। इसलिए मैंने इसे अपने आलेख लिखने क प्रयास किया है।
           महात्मा बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ बौद्ध धर्म का प्रचार करते हुए भ्रमण कर रहे थे। एक गाँव में घूमते हुए उन्हें काफी देर हो गयी और उन्हें बहुत प्यास लगी। उन्होनें अपने एक शिष्य को पानी लाने का आदेश दिया। शिष्य पानी लेने गया तो उसने देखा कि नदी में कुछ लोग कपड़े धो रहे थे, कुछ लोग नहा रहे थे और नदी का पानी काफी गन्दा दिखाई दे रहा था।
            शिष्य ने ऐसा गन्दा पानी ले जाना उचित नहीं समझा और वापिस आ गया। महात्मा बुद्ध ने फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा। कुछ देर बाद वह शिष्य पानी लेकर लौटा। महात्मा जी  ने शिष्य से पूछा कि नदी का पानी तो गन्दा था फिर तुम साफ पानी कैसे लेकर आए। शिष्य बोला कि नदी का पानी तो वास्तव में गन्दा था। लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इन्तजार किया और जब मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी ऊपर आ गया तब मैं शुद्ध पानी लेकर आया।
           यह सुनकर महात्मा बुद्ध बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने शिष्यों को यह शिक्षा दी कि हमारा यह जीवन भी पानी की तरह है। जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है। जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आती हैं जिससे जीवन रूपी पानी गन्दा लगने लगता है। 
            कुछ लोग पहले शिष्य की तरह मुसीबत को देखकर घबरा जाते हैं और वापिस लौट जाते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते और उन्नति नहीं कर सकते। वहीं दूसरी ओर कुछ धैर्यशील लोग किसी भी परिस्थिति में व्याकुल नहीं होते। समय बीतने पर गन्दगी रूपी सभी समस्याएँ और दुख स्वयं ही समाप्त हो जाते है।
            यह कहानी हमें समझाती है कि समस्याएँ और दुख कुछ समय के पश्चात स्वयं ही समाप्त हो जाते है। समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गन्दा कर सकती है। यदि धैर्य से काम लिया जाए तो दुख और कष्ट खुद ही कुछ समय बाद साथ छोड़ देते है। फिर निर्मल जल में आईने की तरह सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है।
          सार रूप में हम कह सकते हैं कि जीवन को एक नदी की तरह मानकर, इसकी गति को स्वीकार करना और हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है। मनुष्य को घबराकर हाथ-पैर नहीं छोड़ देने चाहिए। समय सदा एक-सा नहीं रहता। अपनी विपरीत परिस्थितियों के समय मनुष्य को कुमार्गगामी न बनकर ईश्वर की उपासना, सज्जनों की संगति और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हुए सही समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। 
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 10 जून 2026

समय बहुत मूल्यवान

समय बहुत मूल्यवान

समय बहुत ही मूल्यवान होता है। एक बार जो समय बीत जाता है, वह लौटकर नहीं आता। समय का मूल्य पहचानते हुए मनुष्य को इसकी कद्र करनी चाहिए। जो लोग समय की कीमत नहीं पहचानते उन्हें बाद में सिर धुनकर पछताना पड़ता है। इसे व्यर्थ गॅंवाने वाले व्यक्ति समय की रेस में पिछड़े जाते हैं। उन्हें उसका मूल्य चुकाते समय बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
          संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास विरचित 'रघुवंशम्' महाकाव्य से निम्न श्लोकांश उद्धृत है जो समय के महत्व और सही प्रबन्धन की सफलता पर जोर देती है। कवि ने हमें समझाने का प्रयास किया है कि- 
          काले खलु समारब्धा नीतय: फलन्ति।
अर्थात् यथासमय आरम्भ की गई नीतियाँ ही सदा फलदायी होती हैं। 
          कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी नीति या योजना की सफलता केवल योजना बनाने पर निर्भर नहीं करती बल्कि उसे सही समय पर लागू करने पर निर्भर करती है। यदि कार्य सही समय किया जाए तो सफलता सुनिश्चित होती है। समय बीत जाने के बाद लकीर पीटते रहने का कोई लाभ नहीं होता। वे नीतियाँ हमारे लिए अनुपयोगी होकर मात्र कागजों में कैद होकर रह जाती हैं। चाहकर भी वे हमारे लिए कुछ नहीं कर सकती।
         न जाने विश्व की कितनी ही महान संस्कृतियाँ इस काल के गाल में समा गई हैं जिनके बारे में आज शायद ही कोई जान पाता होगा। इसी प्रकार बड़े-बड़े साम्राज्यों को भी समय ने सम्हलने के लिए मोहलत नहीं दी। फिर हम लोग किस खेत की मूली हैं? जो समय हमारे साथ ही सहानुभूति रखेगा। इसीलिए मनुष्य को समय का मूल्य पहचानकर उसके अनुसार कार्य करना चाहिए।
          समय पलक झपकते ही एक राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। यह वक्त नूर को भी बेनूर बना देता है और बेनूर को नूर दे देता है। समय कोयले को भी कोहिनूर बना देता है। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        वक्त बलवान तो गधा पहलवान।
यानी मनुष्य का समय यदि अनुकूल हो तो मूर्खों की भी पौ बारह हो जाती है। अन्यथा यह समय बड़े-बड़े पहलवानों को भी पटखनी दे देता है। अर्थात् इन्सान देखता रह जाता है और यह समय चुटकियों में उन्हें मसलकर रख देता है।
           हर मनुष्य को जिन्दगी बदलने के लिए एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस मौके का लाभ उठा लेते हैं, वे समाज के सफल व्यक्तियों में गिने जाते हैं। जो लोग मिले हुए अवसर को गँवा देते हैं वे सारी उम्र अच्छे समय के आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं पर उनका मनचाहा पुनः उन्हें कभी नहीं मिल पाता। यदि मिलता है तो लम्बा इन्तजार। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें समय बदलने के लिए जिन्दगी दोबारा नहीं मिल सकती। यदि समझदारी से वक्त को पहचान करके मनुष्य अपनी योजनाओं को क्रियान्वित कर सके तो उसे ऊँचाइयाँ छूने से कोई नहीं रोक सकता।
           इसके विपरीत समय को किसी भी कारण से अथवा आलस्यवश गँवाने वाले रेस में पिछड़कर नाकामयाबी का तमगा अपने माथे पर लगाकर घूमते हैं। सयाने प्रायः निम्न उक्ति कहते हैं - 
            का वर्षा या कृषि सुखाने
अर्थात् उस वर्षा का क्या लाभ? जब खेती सूख गई तब हो जाए।
           इसका यही अर्थ है कि जुते हुए खेत वर्षा के अभाव में सूख गए, वहाँ अब खेती नहीं हो सकती और आकाल पड़ना निश्चित हो गया है। यदि उस समय  छमाछम करती मूसलाधार बारिश हो भी जाए तो सब व्यर्थ है। जो जान-माल का नुकसान होना था, सो तो हो गया।
         समय पर वृक्ष फल देते हैं, माली चाहे सैंकड़ों घड़े पानी क्यों न डाल दे। एक छोटा बच्चा जिसने अभी विद्यालय में प्रवेश लिया है, वह अपनी चौदह वर्ष की अवधि के बाद ही स्कूल की पढ़ाई करके वहाँ से बाहर निकलेगा। उसके बाद उच्च शिक्षा, फिर नौकरी या व्यापार और तब शादी करके अपने जीवन को व्यवस्थित करता है।
          सारे जीवन का आधार निश्चित ही समयावधि की गणना है। इतने वर्ष पश्चात एल. आई. सी. या एफ. डी. परिपक्व हो जाएगी, हम अपना घर बना लेंगे, बच्चों की शादियाँ करके हम फ्री हो जाएँगे, मकान या गाड़ी का लोन चुक जाएगा, रिटायर हो जाएँगे आदि। इसी तरह मनुष्य का सारा जीवन समय की गणना करते हुए बीत जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
          इसीलिए हमारे मनीषी समय के महत्त्व को पहचानने पर बल देते हैं। इस वक्त को अपनी मुट्ठी में कोई भी कैद नहीं कर सकता। यह रेत पर पड़ी मछली की तरह मनुष्य के हाथ से फिसल जाता है। यदि इसकी कद्र की जाए तो यह मनुष्य को आसमान छूने में सहायक बनता है और इसे बर्बाद करने वालो को मसलकर रख देता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 9 जून 2026

शरीर अनमोल खजाना

शरीर अनमोल खजाना

हमारा यह शरीर बहुत ही अनमोल खजाना है। इसकी हम कद्र नहीं करते और न ही उस ईश्वर का धन्यवाद करते हैं जिसने हमें यह अमूल्य रत्न दिया है। यह वह शरीर है जिस पर मनुष्य इतराता फिरता है। इसे सजाने-संवारने के लिए अनेक यत्न करता रहता है। मेडिकल की भाषा में यदि इस शरीर के एक-एक अंग का मूल्य लगाने लगें तो हम स्वयं ही आश्चर्यचकित हो जाएँगे। इसका कारण है कि यह वह मूल्य होगा जिसकी हम कल्पना हम स्वप्न में भी नहीं कर सकते।
             इस शरीर में विद्यमान मस्तिष्क, आँखें, हाथ, पैर, हृदय, किडनी, गाल ब्लेडर, लीवर, घुटने आदि जितने भी अंग हैं, यदि अकेले-अकेले उन सबका मूल्य चिकित्सक की दृष्टि से लगाया जाए तो करोड़ों-अरबों रुपए होगा। इसी प्रकार इनके अस्वस्थ हो जाने की स्थिति में एक-एक अंग पर लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। इस शरीर में सीमित मात्रा में धातुऍं भी विद्यमान हैं।
          इतना सब जानते-समझते हुए और अपने आसपास देखते हुए भी हम ईश्वर प्रदत्त अपने इस खजाने से सदा अनजान बने रहते हैं। जब भी मौका मिलता है, बिना सोचे-समझे उस मालिक पर दोष लगाते हैं कि उसने हमें दिया क्या है? हम उस परम न्यायकारी मालिक पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकते।
          हमारी अवस्था वास्तव में एक भिखारी जैसी है जो किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। उसे यदि सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात या राजपाट सब दे दिया जाए परन्तु फिर भी उसे सन्तोष नहीं मिलता। उसे तो बस गन्दी नाली में गिरा हुआ, भिक्षा में पहले मिला हुआ ताँबे का सिक्का ही चाहिए होता है।
          इसी आशय को यह कथा स्पष्ट करती है। एक राजा का जन्मदिन था। उसने सोचा, "सवेरे उठते ही जो व्यक्ति सबसे पहले उसे मिलेगा, उसे वह खुश कर देगा।"
          प्रातः उठने के पश्चात सबसे पहले उसे एक भिखारी दिखाई दिया। राजा ने उस भिखारी को बुलाया और कहा, "यह लो ताँबे का एक सिक्का।"   
          यह क्या? तॉंबे का वह सिक्का भिखारी के हाथ सें छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी परेशान हो गया और नाली में हाथ डालकर ताँबे का वह सिक्का ढूँढने लगा। 
         राजा ने उसे बुलाकर कहा, "यह लो ताँबे का दूसरा सिक्का और नाली में हाथ मत डालो।"
           भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा हुआ वह सिक्का ढूँढने लगा। 
          राजा को ऐसा लगा, "यह भिखारी बहुत ही गरीब है। इसलिए नाली से तॉंबे का गिरा हुआ सिक्का निकाल रहा है।" 
        उसने भिखारी को फिर बुलाया, "उसे एक चाँदी का सिक्का दे दिया।"
          उस समय भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुए चाँदी का अपनी जेब में सिक्का रख लिया और फिर नाली में ताँबे वाला सिक्का ढूँढने लगा। राजा ने उसे फिर बुलाकर, उसकी हालत देखकर एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढाने लगा। 
        राजा को बहुत ही बुरा लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को उसे आज खुश एवं सन्तुष्ट करना है। उसने भिखारी को फिर बुलाया और कहा, "मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ। अब तो खुश और सन्तुष्ट हो जाओ तुम।"
           भिखारी ने कहा, "वह खुश और सन्तुष्ट तभी हो सकेगा, जब नाली में गिरा हुआ ताँबे का वह सिक्का भी उसे मिल जाएगा।"
           हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। आधा राजपाट, सोने-चाँदी के सिक्कों के मिल जाने के बाद भी वह गन्दी नाली में हाथ डालने से बाज नहीं आ रहा। हमें परमात्मा ने मानव शरीर रूपी यह अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में से ताँबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं।
            इस अनमोल मानव जीवन रूपी उपहार के लिए उस प्रभु का कोटि-कोटि धन्यवाद हमें करते रहना चाहिए। यदि इस शरीर का एक भी अंग किसी कारण से भंग हो जाए अथवा ठीक से अपना कार्य न कर सके तो हमारा यह जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। उसके द्वारा दिए गए इस बेशकीमती खजाने का यदि हम उचित प्रकार से इस्तेमाल कर सकें, तभी हमारा यह जीवन धन्य हो सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद