नश्वर मानव देह
मानव देह की नश्वरता के विषय में कोई सन्देह नहीं है। इस संसार को असार कहा जाता है। हमारे ग्रन्थों का कहना है कि जिस जीव का जन्म इस संसार में होता है, उसकी मृत्यु निश्चित होती है। यह शरीर जीव को अपने पूर्वकृत कर्मो के अनुसार कुछ निश्चित समयावधि के लिए मिला है। जब भी यह समय सीमा समाप्त हो जाती है तो उसे इस भौतिक शरीर को त्यागना पड़ता है। इसके लिए उसकी राय का कोई मूल्य नहीं होता। वह चाहे अथवा न चाहे, कितना रोना-धोना कर ले, मिन्नतें कर ले उसे एक क्षण की भी मोहलत नहीं मिलती।
नश्वर मानव देह का अर्थ है कि मानवीय शरीर जिसका अन्त या नाश निश्चित है। मनुष्य का यह भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पंचतत्वों से बना हुआ है। एक दिन जब यह मृत हो जाता है तो उसे अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। उस समय वे पांचों तत्व उन उन तत्त्वों में जाकर मिल जाते हैं। इस शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा अजर, अमर और शाश्वत है। यही सार तत्त्व है।
वेद, उपनिषद् आदि महान ग्रन्थ हमें बार-बार चेतावनी देते हुए कहते हैं, 'हे मानव, इस नश्वर देह का मोह बिल्कुल मत करो। यथाशीघ्र शुभकर्मो की ओर प्रवृत्त हो जाओ।'
यजुर्वेद का निम्न मन्त्र शरीर की नश्वरता और शुभकर्मों की शुचिता के प्रति यह उद् घोष करता है-
वायुरनिलममृतमवेदं भस्मान्तँ शरीरम्।
ऊँ ऋतो स्मर कृतँ स्मर ऋतो स्मर कृतं स्मर।
अर्थात् प्राणवायु शरीर में रहता है, वह मृत्यु के समय विश्व के प्राण में लीन हो जाता है। यह शरीर तभी तक है जब तक वह भस्म नहीं हो जाता। हे मनुष्य! सत्कर्म को स्मरण कर, जो कर्म अब तक कर चुका है उन्हें भी स्मरण कर।
यह मन्त्र हमें स्पष्ट आदेश देता है कि मनुष्य का यह शरीर नश्वर है। अपने भूतकाल में किए गए कर्म या जो कर्म वर्तमान में कर रहे हैं अथवा जो कर्म भविष्य में करने वाले हैं, उन सब कर्मों की ओर मनुष्य को ध्यान देना चाहिए।
यदि मनुष्य तन पाकर वह शुभकर्म नहीं करता तो निश्चित ही उसे अपने आगामी जन्मों में मनुष्येतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है। वे सभी केवल भोग योनियाँ ही कहलाती हैं जहाँ जीव मात्र अपने किए गए दुष्कर्मों का भोग करके उनसे मुक्त होता है। उसे उन योनियों में सुकर्म करने की बुद्धि ईश्वर नहीं देता। वहाँ उसे अपने कर्मो के अधीन रहने की विवशता होती है।
भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में शरीर के नाशवान होने और कर्म करने पर बल देते हैं। उनका कथन है कि सृष्टि के आदि से लेकर आज तक जीव ने विभिन्न रूपों में अनेक जन्म लिए हैं। आत्मा अपने पुराने, रोगी और कटे-फटे शरीर ऐसे बदलती है जैसे हम लोग फटे-पुराने या बदरंग हुए वस्त्रों को फैंककर नए कपड़े पहनते हैं। सरल शब्दों में कहें तो शरीर का यह परिवर्तन आत्मा का स्वभाव है। यही भाव निम्न श्लोक में है-
जीर्णानि वासांसि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
कहने का तात्पर्य है कि शरीर को परिवर्तित करना आत्मा के लिए एक सतत प्रक्रिया है जिससे गुजरते समय इस आत्मा को जरा भी दुख नहीं होता। वह तो परम पिता परमात्मा का ही एक अंश है। इसलिए आत्मा को उससे मिलने की इच्छा बलवती होती रहती है।
श्रीकृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म पर बल दिया है। वे कहते हैं-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्मा ते संगोSस्त्वकर्मणि।।
अर्थात् कर्म करो पर कर्त्तापन का भाव न रखो। यदि मनुष्य स्वयं को कर्त्ता मानने लगता है तो उसका अहं भाव प्रबल होने लगता है। वही अहं भाव उसके पतन का निमित्त बनता है। कर्म करके उसे ईश्वर को समर्पित कर देने से मनुष्य निरहंकार हो जाता है। तब वह आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उस समय ईश्वर प्राप्ति की ओर वह अपने कदम बढ़ाने लगता है।
भगवान श्रीकृष्ण 'श्रीमद्भगवद्गीता' में स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें वही भक्त प्रिय है जो अपने कर्त्ता होने के मिथ्याभिमान को त्याग करके उनकी यानी ईश्वर की शरण में आ जाता है।
इस संसार में हर जीव और पदार्थ विनाशी या नश्वर है, केवल एक ईश्वर ही है जो अविनाशी है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इसी ईश्वर रूपी धुरी के इर्दगिर्द चक्कर लगाता रहता हैं।
इसी कारण हर जीव का यह भौतिक शरीर भस्म होने वाला है। मानव का चोला प्राप्त करके यदि मनुष्य सकाम कर्म करता है तो उससे उसकी भौतिक उन्नति होती है। इसके विपरीत निष्काम कर्म करता हुआ वह आध्यात्मिक उन्नति करके मालिक का कृपा पात्र बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद