बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

गुरुता और लघुकथा दो अवस्थाऍं

गुरुता और लघुता दो अवस्थाएँ

मनुष्य छोटा है अथवा बड़ा, यह हमारे मस्तिष्क की सोच है। हम लोग मनुष्य को उसके धन-वैभव से आँक लेते हैं कि अमुक व्यक्ति महान है अथवा अमुक व्यक्ति तुच्छ है। यदि व्यक्ति विपन्न अवस्था में है अथवा अपना गुजर-बसर मात्र कर सकता है, तो उसे छोटा कह दिया जाता है। इसके विपरीत यदि वह व्यक्ति जो सभी सुख-साधनों से सम्पन्न है और समय-समय पर अपने वैभव का प्रदर्शन करता है, दूसरों को उपकृत सकता है। उसे हम लोग आम बोलचाल में बड़ा आदमी कह देते हैं।
             महाराज भर्तृहरि ने 'नीतिशतक' में इस कथन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है -
        परिक्षीण: कश्चित्स्पृहति यवानां प्रसृतये।
       स पश्चात्सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसम्।।
       अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्षेषु धनिना-
       मवस्था वस्तूनी प्रथयति च सङ्कोचयति च॥
अर्थात् जो दरिद्र एक मुट्ठी भर जौं की इच्छा करता है, वही सम्पन्न होने पर सारे संसार को तुच्छ समझने लगता है। लघुता और गुरुता निश्चित नहीं हैं। ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा अथवा बड़ा बनाती हैं और वस्तुओं को संकुचित या विस्तृत बनाती हैं।
            इस श्लोक से हम यही समझ सकते हैं कि जब मनुष्य को खाने के लाले होते हैं तो वह दरिद्र कहलाता है। परन्तु जब दैवयोग से उसे ऐश्वर्य की प्राप्त हो जाती है तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। इसका कारण है कि वह धनवान या वैभवशाली बनकर देश, धर्म व समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण ईकाई बन जाता है। समाज में उसकी पूछ होने लगती है। लोग उसे सम्मानित करने लगते हैं। हर स्थान पर उसकी उपस्थिति की आकाँक्षा करते हैं।
              यहीं से मनुष्य की चारित्रिक गिरावट आरम्भ होने लगती है। भौतिक धन-दौलत पाकर मनुष्य फूला नहीं समाता। वह सारे संसार को हिकारत की नजर से देखने लगता है। अपने समक्ष उसे दूसरे लोग बौने दिखाई देने लगते हैं। वह स्वयं को भगवान मानकर अकड़ने लगता है। वह सारी दुनिया को देख लेने और आग लगा देने की बातें करने लगता है। जीवन के उस उत्कर्ष काल में वह यह बात भी भूल जाता है कि घमण्डी का सिर नीचा हो जाता है।
          भर्तृहरि जी ने कहा है कि लघुता और गुरुता निश्चित नहीं होतीं। छोटा होने या महान होने की ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा या बड़ा बनाती हैं। वस्तुओं को देखने का मनुष्य का जो नजरिया है, वही उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाता है। यह संसार भी वही है और संसारी जन भी वही हैं। उन सबको हम वैसा ही देखते हैं जैसा देखना चाहते हैं। हमारा दृष्टिकोण ही उनमें धर्म, जाति, रंग, रूप आदि की  दीवारें खड़ी करते हैं। उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाने का कार्य हम लोग ही करते हैं।
            अपनी इस नश्वर भौतिक सम्पदा पर कभी भी मनुष्य को वृथा अभिमान नहीं करना चाहिए। यह सब इसी संसार का है और यहीं शेष रह जाता है। मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाता है। उसके सभी महल-दोमहले जो इसी दुनिया की अमानत हैं, उसे मुस्कुराते हुए, मुँह चिढ़ाते हुए अन्तिम विदाई दे देते हैं। उसे यह अहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि हमें पाने के लिए जो भी जायज-नाजायज रास्ते तूने खोजे, वे सब व्यर्थ हैं। तू इनका भोग कितना कर पाया, तू ही जान। हम तो यहीं तक के तेरे साथी थे। अब तू अपने रास्ते चला जा और हम अपने इस जहान में रहेंगे।
             इसलिए जिस भी अवस्था में रहे उसे सारे संसार को तुच्छ समझने के बजाय यह भाव रखना चाहिए कि हम तो इस सारे ऐश्वर्य के रक्षक मात्र हैं। देने वाला तो वह मालिक है जो हमारी सारी मनोकामनाओं को देर-सवेर पूरा करता है। यही विचार करते हुए कर्त्तापन के भाव से मनुष्य को विमुख रहना चाहिए। ऐसा करता हुआ मनुष्य गुरुता और लघुता की भावना से मुक्त हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

कौन-सा शत्रु अवध्य

कौन-सा शत्रु अवध्य?

हमारे ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि हत्या बहुत बड़ा अपराध कहलाता है। किसी भी व्यक्ति को कारण-अकारण जान से मार देना कोई बड़ा बहादुरी का कार्य नहीं होता। किसी मनुष्य ने यदि गलती की है तो उसे सुधारना चाहिए। उसे जान से मार देना कोई हल नहीं होता। इसलिए प्रत्येक सामर्थ्यवान व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि वह यथासम्भव असहायों की रक्षा करे। यहाँ हम चर्चा करेंगे कि किन-किन मनुष्यों का वध न करके उनकी रक्षा करना कर्त्तव्य होता है।
              महर्षि वाल्मीकि ने 'वाल्मीकि रामायण' में इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-
       अयुद्धयमानं प्रच्छन्न प्राञ्जलिं शरणगतम्।
        पलायन्तं प्रमत्त वा न त्वं हन्तुमिहार्हसि॥
अर्थात् बिना शस्त्र के, छिपा हुआ, हाथ जोड़े हुए ,  शरण में आए हुए, पलायन करने वाले अथवा उन्मत्त (पागल) व्यक्ति का वध करना उचित नहीं होता है।
             इसी विषय पर 'हिंगुलप्रकरण' में प्रकाश डालते हुए कहा है-झ
       यो दधाति तृणं वक्त्रा प्रत्यनीकोSपि मानवो।
        सोSवध्य: सतां लोके कथं वध्यातृणादना:
अर्थात् जो शत्रु अपने मुख में तृण ले लेता है, वह अवध्य होता है। यानी उस व्यक्ति का वध नहीं किया जाता। 
            जो व्यक्ति निहत्था है, उस पर वार करना अनुचित कृत्य होता है। हथियारों से लैस व्यक्ति यदि निरपराधियों को मौत के घाट उतार देता है तो इसे कायरता ही कहा जाएगा। वास्तव में असहाय व्यक्ति की हत्या करने को कोई भी सही नहीं ठहरा सकता। अपने बराबर के लोगों से यदि युद्ध किया जाए तो उसका परिणाम द्रष्टव्य होता है।
            जो व्यक्ति छिपा हुआ है, उस पर भी वार नहीं करना चाहिए। प्राचीनकाल में युद्ध के मैदान में भी ऐसा न करने के लिए कहा जाता था। हो सकता है कि डर के कारण छिप जाने वाला निर्दोष हो। इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं कि छिप जाने वाले व्यक्ति ने मानो बिना लड़े‌ ही अपने हथियार डाल दिए हैं। जो व्यक्ति पहले ही डरा हुआ है या अपनी हार स्वीकार कर रहा है तो उसका शव करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
             जो व्यक्ति हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा है, क्षमायाचना कर रहा है, उसे मारकर भी कोई तमगा नहीं मिल सकता। उसे यदि क्षमा कर दिया जाए तो वाह-वाही अवश्य मिल सकती है। ऐसा व्यक्ति महान कहलाता है।
            शरण में आए हुए यानी शरणागत की रक्षा करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य होता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिल जाएँगे, जहाँ शरणागत जीव की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों को भी संकट में डाल दिया गया। महाराज शिवि से बड़ा उदाहरण कोई और नहीं हो सकता। उन्होंने अपनी शरण में आए हुए एक निरीह कबूतर की रक्षा के लिए स्वयं को मांसाहारी बाज के हवाले कर दिया था।
             पलायन करने वाले का भी वध नहीं करना चाहिए। वह तो बेचारा स्वयं हालात का सामना नहीं कर पा रहा। इसीलिए वह पीठ दिखाकर भाग रहा है। उसे छोड़ देना चाहिए। दुर्भाग्यवश जो व्यक्ति उन्मत्त है, उसे मारकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। उसे अपने हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। जो व्यक्ति पहले से ही हार मान ले या मुँह में तिनका डाल ले उसका भी वध नहीं करना चाहिए।
             ऐसे सभी शत्रु दया के पात्र होते हैं। उनका वध नहीं करना चाहिए। आज भी किसी अन्य देश में शरण लेने वाले किसी राजनायिक को या किसी मनुष्य को पूर्ण सुरक्षा दी जाती है। जो सेना युद्धक्षेत्र से पलायन करती है, उसे जाने दिया जाता है। दो देशों में सुरक्षा मुद्दों पर आवशकयक चर्चा होना भी इसी का ही एक रूप है। एक देश के नागरिक या मछुआरे आदि गलती से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, उनसे पूछताछ करके बाद में छोड़ दिया जाता है।
               प्राचीनकाल में युद्ध के भी नियम होते थे, जिनका पालन सभी राजा किया करते थे। बड़े दुख की बात है कि आजकल सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया हैं। आधुनिक हथियारों से लैस शस्त्र न दिन देखते हैं और न रात ही देखते हैं, बस हमला करके निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में या युद्ध के मैदान में शायद ये सारी बातें बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकें, परन्तु दैनन्दिन जीवन में इन सबकी हमें बहुत ही आवश्यकता होती है। मनुष्य जितना ही अधिक क्षमाशील बनता है, उतना ही उसे यश और मानसिक सन्तोष मिलता है, जो उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

ईश्वर की उपासना

ईश्वर की उपासना

सृष्टि के रचयिता परमपिता परमात्मा का हम पर बहुत उपकार है। उसने ही हमें इस धरा पर अवतरित किया। एक वही है जो हमें दुनिया की सभी सुख-सुविधाऍं प्रसन्नता से देता है। कभी वह हम पर अहसान नहीं दिखाता। हम यदि चौबीसों घण्टे उसकी महिमा का गुणगान कर सकें तो वह भी उसकी दी गई नेमतों से कम ही रहेगा।
           'द्वात्रिंशत् पुतलिकासिंहासनम्' नामक एक संस्कृत भाषा का ग्रन्थ है। इसका हिन्दी में 'सिंहासन बतीसी' नाम से अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में निम्न श्लोक कवि ने वर्षों पूर्व लिखा था, वह आज भी उतना ही सटीक है -
        देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
       यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
अर्थात् देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु में मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
            हम ईश्वर की उपासना किस रुप में करते हैं अथवा जिस किसी भी नाम से उसे याद करते हैं, यह मायने नहीं रखता। असली मुद्दा यह है कि हमारे मन में अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिए कितनी तड़प है। हम उसकी उपासना सच्चे मन से करते हैं अथवा केवल दिखावा करते हैं। ईश्वर के भजन का तभी फल मिलता है जब हम पूर्णरूपेण उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए या उनसे सबसे बड़ा भक्त होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए किया गया प्रयास, उस परमेश्वर की नजर में शून्य होता है। 
           तीर्थ स्थान पर यदि हम मौज-मस्ती के लिए जाते हैं तो तीर्थ भ्रमण का हमें लाभ नहीं मिलता। न तो हमारे विचारों में कोई परिवर्तन आता है और न ही हम प्रभु के सच्चे और बड़े भक्त बन सकते हैं। तीर्थ करने की हमारे जीवन में तभी उपयोगिता होती है यदि वहाँ जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों से मन को विरक्त करके मालिक का स्मरण करते हैं। विद्वानों की सत्संगति करते हुए ज्ञानार्जन करते हैं। साधना करते हुए अपने अन्त:करण को शुद्ध-पवित्र बनाते हैं, तभी तीर्थ करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण होता है। अन्यथा तो पिकनिक मनाकर लौट आने वाली बात होती है।
          ब्राह्मण में यदि हमारा विश्वास होता है तभी उससे मार्गदर्शन लिया जाता है। हमें अपने संस्कारों को करवाने के लिए भी सदा योग्य ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यदि उसमें आस्था नहीं होगी तो हमारे धार्मिक कृत्यों को करने का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकेगा।
           मन्त्रों में अपार शक्ति होती है। ये आत्मोन्नति करने में हमारी सहायता करते हैं। ये मन्त्र हमें अपने इष्ट तक पहुँचाने का सफल माध्यम बनते हैं। हम मन्त्र जाप करके ही तो अपने प्रभु का सानिध्य प्राप्त करते हैं। यदि मन्त्र पर हमें विश्वास नहीं होगी तो हमें कोई सिद्धि भी नहीं मिलेगी। यदि हम मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करते हैं तो भी उसका फल नहीं मिलता। कभी-कभी उससे अनिष्ट भी हो जाता है।तब ये अमूल्य मन्त्र हमें अपने इष्ट से मिलाने में सफल नहीं हो पाएँगे।
           तान्त्रिक इन मन्त्रों को सिद्ध करके चमत्कार करते हैं। मैं उनकी इस पद्धति पर कोई आलोचना नहीं करना चाहती। यह व्यक्ति विशेष की मान्यता होती है। पर मैं इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि इन मन्त्रों से प्राप्त सिद्धियों का समाज के हित में उपयोग करना चाहिए। मारण-उच्चाटन आदि में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।
             ज्योतिष एक वेदांग है। ज्योतिषीय गणना की विधा अपने आप में सम्पूर्ण है। उस पर मन से विश्वास करना आवश्यक है। हाँ, फलित ज्योतिष में जहाँ लालच व स्वार्थ हावी हो जाते हैं, वहाँ पर गलती की गुँजाइश बनी रहती है। फिर भी मनुष्य किसी ज्योतिषी के पास विश्वास होने पर ही जाता है। वह अपनी विकट समस्या का उपाय जानना चाहता है।
            डॉक्टर पर यदि विश्वास नहीं होगातो वह कितना ही योग्य क्यों न हो रोगी स्वस्थ नहीं हो पाता। इसलिए उस पर अपने मन से विश्वास करना चाहिए।
            गुरु पर विश्वास न हो तब उसकी शरण में जाना व्यर्थ होता है। प्राचीन काल में योग्य गुरु के पास लोग अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए के लिए भेजते थे। उन्हें यही विश्वास होता था कि उनके बच्चे योग्य बनकर जीवन में यश कमाएँगे। गुरु का कार्य शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति करना होता है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव मनुष्य को इहलोक और परलोक के बन्धनों से मुक्त करवाता है।
              सार रूप में हम कह सकते हैं कि मन की सच्ची भावना होने से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर औ र गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखकर हम उनसे लाभ ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

पराई स्त्री माता समान

पराई स्त्री माता समान

भारतीय संस्कृति में माता के महत्त्व को स्थान-स्थान पर बताया गया है। अपनी मॉं का सदैव सम्मान करने के लिए अनुशासित किया गया है। पराई स्त्री के साथ मनुष्य को कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसके विषय में भी आदिष्ट किया गया है। हितोपदेश के रचयिता प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान नारायण पण्डित ने कहा है जो कहा है, वह हमारी संस्कृति का परिचायक है -
                  मातृवत् परदारेषु 
अर्थात् पराई स्त्री को माता समझो। कहने का तात्पर्य यह है कि पराई स्त्री पर कभी भी गलत नजर नहीं डालनी चाहिए और उसका अपनी माँ की तरह सम्मान करना चाहिए।
              यह नीति वचन पुरुषों के लिए मर्यादा निर्धारित करता है। मर्यादा और अमर्यादा के बीच मात्र एक झीनी-सी दीवार होती है। एक ओर  मर्यादित आचरण उसे देवतुल्य बना देता है। उसे समाज युगों-युगों तक याद रखता है। उसे ताज की तरह अपने सिर पर बिठाता है और उसके उदाहरण देता है।
              इसके विपरीत दूसरी ओर का अमर्यादित आचरण उसे दानव बना देता है। ऐसे मनुष्य को समाज के लोग हिकारत की नजर से देखते हैं। वह समाज व न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सारी आयु सजा भोगता है। उसके साथ ही उसके अपने निर्दोष होते हुए भी उसकी गलतियों की बलि चढ़ जाते हैं। कोई भी उससे सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। ऐसे लोगों को कहीं, किसी पार्टी आदि में भी बुलाना अपनी नैतिकता के विरुद्ध समझते है। एक व्यक्ति के ऐसे अमर्यादित आचरण के कारण उन सबका सामजिक बायकाट हो जाता है।
              स्त्री से सतीत्व की अपेक्षा रखने वाले पुरुष से भी यही आशा की जाती है कि वह अपने आचार-व्यवहार पर अंकुश रखे। यदि वह अपनी पत्नी में भगवती सीता का प्रतिरूप देखना चाहता है तो उसे स्वयं भी राम जैसा एकपत्नी व्रत धारण करना होगा। इसी तथ्य को निम्न श्लोकांश में इस प्रकार कहा है -
            सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च 
             धर्मस्तथार्थश्च रति:स्वदारै:।
अर्थात् गृहस्थ पुरुष सत्य और सरलता का पालन करे। अतिथिपूजा, धर्म, अर्थ के कार्य करे और अपनी स्त्री में अनुराग रखे।
             सत्य और सरलता का व्यवहार करना मात्र स्त्री का धर्म नहीं पुरुष का भी धर्म होता है। इसी प्रकार अतिथि सत्कार करना भी दोनों ही का दायित्व है। सभी धार्मिक कार्यों में पति-पत्नी दोनों की उपस्थिति अनिवार्य यानी जाती है। अश्वमेध यज्ञ के समय सीता जी की अनुपस्थिति की अवस्था में में भगवान राम ने उनकी स्वर्ण प्रतिमा रखी थी। एवंविध घर-गृहस्थी के आर्थिक मामलों में भी दोनों की स्वीकृति होने से बड़ा और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं होता।
            हमारे महान मनीषियों ने सदा ही यह उपदेश दिया है कि पुरुष केवल अपनी पत्नी का ही होकर रहे। इस प्रकार समाज में व्यभिचार नहीं फैलता। ऐसे व्यवहार से बलात्कार जैसे अपराधों से समाज को मुक्ति मिल सकती है। दूसरी ओर व्यक्ति बहुत-सी सम्भावित बिमारियों से ग्रसित होने से बच जाता है।
              अपनी पत्नी के लिए एक पुरुष बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की ओर नजर उठाकर देखे अथवा वह किसी अन्य से कोई सम्बन्ध रखे। फिर अपने लिए भी उसे ऐसा ही सोचना चाहिए कि यदि वह किसी अन्य महिला को नजर उठाकर देखेगा या उससे अनैतिक सम्बन्ध बनाएगा तो उसकी पत्नी को भी यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। तब उस पत्नी के मन में उसके लिए नफरत और क्रोध का होना स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
             पत्नी के अप्रत्याशित बदले हुए व्यवहार पर शिकायत करना अथवा उसे भला-बुरा कहने का ऐसे दुराचारी व्यक्ति को कोई हक नहीं होता। उसे सबसे पहले अपने गिरेबान में पहले झाँककर देखना चाहिए। उसके बाद ही उसे बोलने या कुछ कहने का अधिकार होता है।
          स्त्री के लिए यदि शास्त्र मर्यादाओं की रेखा खींचते हैं तो पुरुष के लिए भी उन्होंने संयमित और मर्यादित जीवन जीने का विधान बनाया है। अपनी सीमाओं को लाँघने का हक शास्त्र किसी व्यक्ति को नहीं देते, फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। उन नियमों का पालन करते हुए पुरुष को अपने जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। अपने एकनिष्ठ जीवन जीने की मर्यादा का निर्वहण पुरुष को सच्चाई और ईमानदारी से करना चाहिए। मनुष्य की मन की भावना सर्वोपरि होती है। उसकी श्रद्धा और उसका विश्वास उसे कहीं-का-कहीं पहुँचा सकते हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

चिकित्सा सुविधाऍं

चिकित्सा सुविधाएँ

विज्ञान की कृपा से आज आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध हैं। बहुत से सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों में विभिन्न रोगों की चिकित्सा कराई जा सकती है। इनमें प्रशिक्षित और स्पेशलिस्ट डॉक्टर विद्यमान रहते हैं। अब अनेकानेक मल्टी स्पेशिलटी अस्पताल बड़े-बड़े शहरों में खुल चुके हैं। उन्हें हम फाइव स्टार होटलों की श्रेणी में रख सकते हैं। जितना अधिक पैसा मनुष्य खर्च कर सकता है, वहॉं उतनी ही अधिक सुविधाएँ उसे उपलब्ध कराई जाती हैं।
           जितनी ऊपरी चमक-दमक ये हमें दिखाते हैं, उतनी ही अधिक जेब भी काटते हैं। ऐसा भी सुनने में आया है कि यहाँ कार्यरत डाक्टरों को अस्पताल की आय बढ़ाने के लिए टारगेट दिए जाते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है, कम-से-कम मैं तो नहीं कह सकती। इन अस्पतालों की सबसे बड़ी सुविधा यही है कि एक ही छत के नीचे सभी कार्य हो जाते हैं। रोगी को अपने विभिन्न टेस्ट, एक्स-रे, ईसीजी आदि करवाने के लिए कहीं अन्यत्र नहीं भागना पड़ता। वहीं पर टेस्ट करवाओ और डॉक्टर को दिखाकर परामर्श लें लो।
          आजकल वे डाक्टर बहुत ही कम रह गए हैं जो नब्ज पकड़ते ही रोग की जड़ तक पहुँच जाते थे। एक रोग को समझने के लिए आजकल के ये डॉक्टर न जाने कितने ही टेस्ट करवा लेते हैं। उस पर भी बिमारी ठीक से पकड़ में आ जाएगी कोई गारण्टी नहीं। इस विषय पर भी सोशल मीडिया टी. वी., समाचार पत्र प्रकाशित करते रहते हैं कि रोग कोई और था, इलाज कुछ और हो रहा था। होने वाली ऐसी लापरवाही रोगी का मनोबल तोड़ देती है। इसीलिए लोग परेशान होकर डॉक्टरों पर अदालत में केस दायर कर देते हैं।
          आज के समय की सबसे बड़ी समस्या यह है कि युवा डॉक्टरों की इस पीढ़ी में सहनशक्ति का बहुत अभाव है। इनकी सोच यही होती जा रही है कि जरा सी भी परेशानी हो जाए तो शरीर का वह अंग काटकर फैंक दो। उसके बाद होने वाले जो दुष्परिणाम रोगी को भोगने पड़ते हैं, उसके विषय में कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है। कष्ट से जूझ रहे असहाय व्यक्ति का धन और समय तो बर्बाद होता ही है, साथ में जीवन भर की परेशानी वह मोल ले लेता है।
             हो सकता है इसके पीछे यही कारण हो कि वे सोचते हैं कि लाखों रुपए खर्च करके पढ़ाई की है तो उस पैसे को जितनी जल्दी हो सके वसूल कर लिया जाए। वे भूल जाते हैं कि बहुत नोबल व्यवसाय है डॉक्टरी पेशा। डॉक्टर को हम भगवान के समान मानते हैं। उससे यही आशा की जाती है कि वह अपने मरीज को उचित परामर्श दे और उसका ध्यान बिना किसी लालच के करे। रुग्ण व्यक्ति बड़े विश्वास के साथ किसी डॉक्टर के पास जाता है। वह चाहता है कि उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय न किया जाए।
             बहुत से ऐसे किस्से हमने सुने हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं और टी.वी. के अनेक चैनलों पर दिखाए जाने वाले टॉक शो में भी देखते हैं, जहाँ रोगियों के साथ अन्याय किया जाता है। कभी-कभी किसी रोग का आपरेशन करते समय उसके शरीर के दूसरे अंग को निकालकर उसे महंगे दामों में भी बेच दिया जाता है। इस प्रकार के मानव अंगों की तस्करी के रेकेट चलते रहते हैं। उनके विषय में भी संचार माध्यमों पर प्रायः चर्चा होती रहती है। इस नोबेल प्रोफेशन में आने के पश्चात ऐसे कुकर्मों से बचना चाहिए। ऐसे दुष्कृत्य तो सीधे-सीधे 
            समय बीतने पर जब उसको कोई अन्य शारीरिक समस्या सामने आती है तब पता चलता है कि रोगी का कोई अंग विशेष निकाल लिया गया है। तब पीड़ित व्यक्ति ठगा-का-ठगा रह जाता है। फिर वह पुलिस में शिकायत करता है और अदालतों के चक्कर लगाता रह जाता है। ऐसे भी एपीसोड टी.वी. पर दिखाए गए हैं जिनमें नवजात शिशु को बेच दिया गया अथवा उन्हें पैसो के लालच में बदल दिया गया। यहाँ तक भी कह दिया गया कि उनके घर मृत बच्चे ने जन्म लिया है। ऐसा दुष्कर्म करते समय इन लोगों को उन बेचारे माता-पिता के दुख का भी ध्यान नहीं आता। दिल दहलाने वाले ये हादसे हैरान कर देते हैं।
           मेडिक्लेम के कारण रोगी आश्वस्त हो जाता है कि कोई भी रोग आ जाए उसके इलाज में कोई कमी नहीं रहेगी। शायद यही उसके जंजाल का कारण भी बनता जा रहा है। इस मेडिक्लेम का दुरुपयोग यही है कि आवश्यकता न होने पर भी रोगी को ऐसे डरा दिया जाता है कि उसे लगता है कि आप्रेशन के अतिरिक्त उसके पास कोई और उपाय नहीं है। इसका जिक्र भी टी.वी. व समाचार पत्रों में अक्सर होता रहता है।
            सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण लोग वहाँ इलाज के लिए जाना नहीं चाहते और इन लुभावने नामों के पीछे भागते हैं। इसी का फायदा उठाकर ये लोग बकरा हलाल करने वाली प्रवृत्ति के बनते जा रहे हैं। इसकी चर्चा भी समाचार पत्रों आदि में होती रहती है कि पैसे के लालच में ये इतने अन्धे हो गए हैं कि रोगी की मृत्यु हो जाने की सूचना एक-दो दिन बाद उसके परिजनों को दी गई। 
           जगमग चमकते हुए ये सभी अस्पताल लोगों के जीवन में कितनी रोशनी कर पाते हैं, बस यही देखना और समझना है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

नीतिज्ञ तक पहुॅंचना कठिन

नीतिज्ञ तक पहुँचना कठिन 

नीतिज्ञ महान होते हैं, उन तक पहुँच पाना बहुत कठिन कार्य होता है। ये लोग अपने आचार-व्यवहार से सबके प्रिय बन जाते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु नहीं होते और यदि ईर्ष्यावश कोई बन भी जाए तो वे संख्या में नगण्य होते हैं। वे ऊपरी तौर से चाहे उनका विरोध करते रहें पर मन से उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। निम्न श्लोक में ऐसे गुणज्ञों के विषय में कहा है-
       शस्त्रो नीतिहीनानां यथापथ्याशिनां गदा:।
      सद्य: केचिच्च कालेन भवन्ति न भवन्ति च॥
अर्थात् जिस प्रकार अपथ्य खाने वालों को कभी-न-कभी रोग ग्रस्त कर लेते हैं जबकि संयमी लोगों को कोई रोग नहीं होता। उसी प्रकार नीति विहीन व्यक्तियों के कभी शीघ्र और कभी विलम्ब से अनेक शत्रु बन जाते हैं। जबकि नीति का अनुसरण करने वालों के शत्रु नहीं होते अर्थात् सभी उनके मित्र बन जाते हैं।
             यह श्लोक हमें समझा रहा है कि जो लोग खाने-पीने में परहेज नहीं करते, वे कई रोगों की चपेट में आते हैं। अपनी जीभ पर उनका नियन्त्रण नहीं होता। जहाँ स्वादिष्ट, मसालेदार या चटपटा भोजन देखा वहीं उनकी लार टपकने लगती है। वे यह भी नहीं सोचते कि उनकी आयु के अनुसार वह भोजन उनके लिए लाभप्रद होगा या शरीर के लिए हानिकारक रहेगा। इसलिए रोग शीघ्र इन्हें अपना मित्र बना लेते हैं।
             इसी प्रकार अपनी वाणी पर भी इन लोगों का नियन्त्रण नहीं होता। जरा-जरा-सी बात पर भड़ककर लाल-पीले हो जाते हैं। बिना सोचे-समझे और बिना किसी का लिहाज किए हर किसी को जो मुँह में आया कह देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के शत्रु अधिक और मित्र कम होते हैं।
              संयमी व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं। अपने जीवन को सदा ही नियमपूर्वक चलाते हैं। रोग इन्हें अपना मित्र बनाने से कतराते हैं।
        नीतिज्ञ नीति को जानने वाले एवं बुद्धिमान होते हैं। नीतिज्ञ व्यक्ति सभी कार्य सुनियोजित नीतियों के अनुसार ही करता है। ये लोग प्रायः निर्णय लेने में निपुण होते हैं और विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने की क्षमता रखते हैं। वे अक्सर शासन, कूटनीति या प्रबन्धन के क्षेत्रों में काम करते हैं। 
          नीति विहीन लोग सदा बेपेन्दे लोटे होते हैं अथवा कहें तो थाली के बैंगन की तरह होते हैं। वे इधर-उधर अनावश्यक रूप से ही भटकते रहते हैं। अपनी निजी कोई सोच-समझ न रखने के कारण वे प्राय: भेड़चाल में विश्वास रखते हैं। इनके लिए यही कह सकते हैं - 
        'गंगा गए तो गंगा दास और यमुना  
        गए तो यमुना दास।'
अर्थात् जिस भी माहौल में जाते हैं, वहीं के होकर रच बस गए, उनका अपना कुछ भी मौलिक नहीं होता।
             हर किसी की बात पर ये जल्द ही आँख मूँदकर विश्वास करने वाले होते हैं। ऐसे लोग अक्सर दूसरे के झाँसे में आकर धोखे और ठगी के शिकार हो जाते हैं। जब अपना नुकसान जब कर बैठते हैं तब उन धोखेबाजों को कोसते हैं। उस समय फिर पश्चाताप करते हैं कि काश वे धोखे का शिकार होने से पहले चेत जाते, तो अपनी हानि न होने देते। मुझे एक गीत स्मरण आ रहा है। उस गीत की एक पंक्ति यहॉं उद्धृत कर रही हूॅं जो सन 1957 की फिल्म 'एक साल' का एक प्रसिद्ध दर्दभरा गीत है -
   सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ।
इसका अर्थ है कि जब सब कुछ बर्बाद हो जाने के  बाद या मौका हाथ से निकल जाने के बाद यदि समझदारी आती है तो उस समझदारी का कोई फायदा नहीं होता।           
            इसके विपरीत संयमी लोग सबके मित्र बन जाते हैं। उन महान् आत्माओं का अनुसरण बहुत से लोग करने  लगते हैं। उनके आचार-व्यवहार में एक अनुशासन होता है। वे किसी व्यक्ति का अहित करने के विषय में सोच ही नहीं सकते, बल्कि निस्वार्थ परोपकार के कार्य करते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भी छोटा अथवा बड़ा मनुष्य नहीं होता। वे सदा धर्म, जाति, व्यवसाय, रग-रूप आदि मुद्दों से परे रहते हुए सब लोगों के साथ ही समानता का व्यवहार करते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समाज निर्माण में सक्रिय योगदान रहता है।
          हमें स्वयं को निर्णय लेना है कि हम नीतिज्ञ एव संयमी बनकर स्वस्थ और समाज के दिग्दर्शक बनना चाहते हैं अथवा नीति-विहीन एवं इन्द्रियों के वश में रहने वाले बनकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारकर मूर्ख बनना पसन्द करेंगे।  
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

त्रिया हठ

त्रिया‌ हठ

त्रिया हठ के विषय में बहुत कुछ कहा और सुना गया है। अपने घर में अथवा अपने आसपास कहीं भी यह शब्द अवश्य ही आपको सुनने को मिला होगा। इस त्रिया हठ पर मैं अपने विचार रख रही हूॅं। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आप सब सुधी जनों को यह आलेख रुचिकर प्रतीत होगा।
            त्रिया हठ अथवा किसी स्त्री हठ। इसका अर्थ है किसी स्त्री द्वारा अपनी किसी विशेष इच्छा या जिद को पूरा करने के लिए अड़ जाना। चाहे वह इच्छा उचित हो या अनुचित हो। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ महिला अपनी बात मनवाने पर अड़ जाती है। इसके लिए कई बार भावुकता, रूठना या विशेष अभिनय के द्वारा उसका काम निकलवाना शामिल माना जाता है। यानी स्त्री यदि अपने हठ पर आ जाए तो परिवार की चूलें तक हिल जाती हैं। इससे उसकी चतुराई, उसका रहस्यमय स्वभाव अथवा उसके कपटपूर्ण व्यवहार ज्ञाऐ होता है। 
             महान कवि और नीतिज्ञ भर्तृहरि ने स्त्री के चरित्र के विषय में 'नीतिशतकम्' में बताया है -
         नृपस्य चित्तं, कृपणस्य वित्तम्।
           मनोरथाः दुर्जनमानवानाम्।।
           त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यम्।
           देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
अर्थात् राजा का चित्त, कंजूस का धन, दुर्जनों का मनोरथ, पुरुष का भाग्य और स्त्रियों का चरित्र देवता तक नहीं जान पाते तो मनुष्यों की तो बात ही क्या है?
            इस श्लोक से हम स्त्रियों के चरित्र के विषय में कहा गया है कि देवता भी उनके चरित्र के बारे में नहीं जान सकते तो हम मनुष्य उन्हें समझने में असफल हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उनका चरित्र बहुत जटिल होता है। उसे समझना मनुष्यों के बस की बात नहीं है।
             यह जीवन की अनिश्चितता को दर्शाता है। इसका अर्थ यह है कि नारी की सोच, व्यवहार और पुरुष का भाग्य, ये कर्म इतने जटिल और रहस्यमय होते हैं कि उन्हें समझना मानवीय क्षमता से परे है। यहॉं तक कि ईश्वर भी इन्हें पूरी तरह से नहीं समझ सकते। यह श्लोक यह सन्देश देता है कि हमें किसी के चरित्र या भाग्य के बारे में बिना सोचे-समझे, कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। लोक मान्यता में त्रियाचरित्र यानी स्त्री के चरित्र को समझ पाना कठिन माना गया है।
           अब हम इस विषय पर कुछ उदाहरण लेते हैं। मॉं सती भगवान शिव की पत्नी और राजा दक्ष की पुत्री थीं। महाराज दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें शिव और सती को उन्होंने आमन्त्रित नहीं किया। भगवान शिव के समझाने पर भी वे नहीं मानीं और पिता के यज्ञ में पहुॅंचा गईं।वहॉं पिता के यज्ञ में शिवजी का अपमान न सह पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।
           रामायण काल की कैकेई का हठ सर्वविदित है। वहॉं आपने पुत्र भरत को राजगद्दी पर बैठाने के लिए कैकेई ने भगवान के लिए चौदह वर्षों का वनवास मॉंगा था। फलस्वरूप भगवान, भगवती सीता और लक्ष्मण वन में चले गए। उनके वियोग‌ में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई। वनवास में उनके कठोर जीवन और कठिनाइयों के विषय में हमने पढ़ा है।
           रामायण का ही दूसरा उदाहरण लेते हैं जहॉं भगवती सीता ने स्वर्णिम हिरण की पाने का हठ किया। लक्ष्मण को भगवान राम की सहायता करने के लिए विवश किया। फिर लक्ष्मण द्वारा खींची गई रेखा का उल्लघंन किया। तत्पश्चात उनका रावण द्वारा अपहरण हुआ, उनकी खोज में भगवान राम और लक्ष्मण का भटकना, राम-रावण युद्ध हुआ। मॉं सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। अन्ततः उन्हें गर्भावस्था में जंगल में जाना पड़ा।
           अब महाभारत काल के उदाहरण लेते हैं। गान्धरी के पति महाराज धृतराष्ट्र अन्धे थे। गान्धारी ने स्वयं की ऑंखों पर पट्टी बाॉंध ली यानी की खुद भी अन्धी हो गई। यह नहीं किया कि पति की ऑंखें बने। दुर्याधन का पापाचार सहन करती रही परन्तु युद्ध के समय उसे ‘विजयी भव’ नहीं कहा। अपने ही पुत्र को विजेता होने का आशीर्वाद नहीं दिया। जब श्रीकृष्ण सामने आये तो सौ मृत पुत्रों की मॉं ने भगवान श्रीकृष्ण को श्राप दिया। शाप देने के उपरान्त पश्चाता लगी कि मैने यह क्या कर दिया। 
             महाभारत का ही दूसरा उदाहरण देखते हैं। महारानी कुन्ती कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाकर रखा। उसे अपने सामने प्रतिदिन प्रताडित होते हुए देखती रही। जब पाण्डवों पर युद्ध में कर्ण के हाथें सम्भावित मृत्यु का संकट आया तो उसी परितयक्त पुत्र के पास याचना के लिए चली गई। पाण्डवों के लिए अभय दान माॉंग लिया। 
            ये इतिहास के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं। अपने आसपास भी हम ऐसी स्त्रियों को देख सकते हैं जिनके हठ के कारण परिवार बर्बाद हो गए। घर-परिवार की भलाई के लिए भी स्त्रियों ने अवश्य ही हठ किया होगा पर वे उदाहरण शायद नगण्य होंगे। इसीलिए वे चर्चा में नहीं आ सके होंगे। यह भी हो सकता है कि कोई इस विषय पर ध्यान ही नहीं देना चाहता।
चन्द्र प्रभा सूद