सोमवार, 7 सितंबर 2026

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें 

मनुष्य इस संसार में शत्रु अथवा मित्र लेकर पैदा नहीं होता बल्कि यहाँ रहते हुए उनका चयन करता है। अपनी सहृदयता से, अपने सद् व्यवहार से वह किसी भी पराए को जीवन भर के लिए अपना बना सकता है। कठोर-से-कठोर व्यक्ति को वह मोम की तरह पिघला सकता है। उसे शीघ्र ही अपना प्रिय बना सकता है।
          इसके विपरीत नाक के बाल के सामान अपने किसी प्रियजन अथवा किसी भी मित्र को क्षण भर में शत्रु बना सकता है। यह सब उसकी मानसिकता और सूझबूझ पर निर्भर करता है। मनुष्य को समझते हुए कबीरदास जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
          जो तोको काँटे बोए ताको दीजो फूल।
          तोको फूल के फूल हैं वा को हैं तिरसूल।।
इस दोहे का सार यही है कि दूसरों का शुभ करते चलो। जो रास्ते में काँटे बिछाने का काम करता है, उसे फूल दो। इसका कारण है कि परोपकारी मनुष्य को अन्ततः फूल मिलते हैं। इसके विपरीत दूसरे व्यक्ति को कुदरत के न्याय के अनुसार त्रिशूल जैसे कष्ट मिलते हैं।
          ऐसा ही भाव हमने एक फिल्म में भी देखा था जहाँ अपने साथ शत्रुता करने वाले लोगों को संजय दत्त अपने साथियों के साथ जाकर फूल भेंट करते हैं। 
        कहने का तात्पर्य यही है कि यदि मनुष्य थोड़ा-सा सहनशील होकर दूसरे की बुराई का उत्तर उसकी भाषा में न देकर, उसे क्षमा करता हुआ उसके साथ अच्छा व्यवहार करता है तो उसे उसका सुफल अवश्य मिलता है। इसीलिए ऐसे महापुरुषों को इस समाज में युगों-युगों तक याद किया जाता है। वे समाज के दिग्दर्शक बनते हैं।
        दूसरों का हित चाहने वाले को वक्ती तौर पर दुःख या परेशानी का सामना करना पड़ सकता है अथवा दूसरों के कोप का भजन बनना पड़ सकता है परन्तु अन्ततः जीत अच्छाई और सच्चाई की ही होती है। लोगों को समय बीतते स्वयं ही यह अहसास हो जाता है कि उन्होंने उस व्यक्ति विशेष को पहचानने में भूल कर दी है। अपनी इस गलती के लिए तब वे क्षमा याचना करने के लिए उसके पास आते हैं।
          इसी भाव को प्रकट करती हुए एक घटना जो वाट्सअप पर पढ़ी थी, उसे अपने अनुसार लिख रही हूँ।
        किसी व्यक्ति ने अपने लिए एक नया घर खरीदा जिसमें फलों के पेड़ लगे हुए थे। उसके पड़ौस में एक पुराना-सा मकान था जिसमें बहुत लोग रहते थे। एक दिन उसने देखा कि पड़ोस के मकान से किसी ने ढेर सारा कूड़ा उसके घर के बाहर दरवाजे पर डाल दिया है। उसने उनसे जाकर झगड़ा नहीं किया। बल्कि शाम को वह व्यक्ति एक टोकरी में ताजे फल रखकर उस पड़ोसी के घर पर चला गया।
          पड़ोसी उसे देखकर परेशान हो गए कि वह शायद उनसे सुबह की उस घटना के लिये झगड़ा करने आया होगा। दरवाजा खोलते ही वे हैरान हो गये कि जिसे वे भला-बुरा कह रहे थे, वही व्यक्ति चेहरे पर मुस्कान लिए रसीले ताजे फलों की भरी टोकरी के साथ सामने खडा था। 
         उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "अपने पेड़ों के ताजे फल मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपया इन्हें स्वीकार करें।"
          इसमें कोई दोराय नहीं है कि मनुष्य अपने व्यवहार से किसी के हृदय में अपना स्थान बना सकता है। यदि मनुष्य के पास किसी को देने के लिए कुछ भी नहीं है पर अपनी गलतियों की माफी उसे स्वयं से ही माँग लेनी चाहिए। इस जीवन का कोई भी भरोसा नहीं है कि अगले पल उसकी ये आँख खुले-न-खुले।
        मनुष्य इस संसार में रहते हुए जो भी दूसरों को देता है, वही उसे ब्याज सहित वापिस मिल जाता है। फिर चाहे वह प्यार हो या घृणा, खुशी हो या गम, नेकी हो या बदी। अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह समाज से क्या पाना चाहता है और क्या नहीं?
        अपने हृदय को यदि विशाल बना लिया जाए तो सामने वाले की ओछी हरकत पर गुस्सा नहीँ आता अपितु उससे सहानुभूति होती है। मन ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि अमुक व्यक्ति को वह सद् बुद्धि दे। 
        हमारी भारतीय परम्परा में तो काटने से मौत देने वाले विषधर यानी साँप को भी दूध पिलाने का विधान है। नागपंचमी के दिन लोग उसकी पूजा करके उसे दूध पिलाते हैं।
        यदि बुरे लोग अपनी बुराई नहीं छोड़ते तो अच्छे लोगों को अपनी अच्छाई किसी भी शर्त पर नहीं छोड़नी चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति सदैव यत्नपूर्वक सावधान रहना चाहिए। मनुष्य के अच्छे व्यवहार के कारण वह समाज में लोकप्रिय और सम्मानित बन जाता है। उसके इस संसार से प्रस्थान करने के पश्चात भी लोग उसके सद् व्यवहार के कारण उसे स्मरण करते रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 6 सितंबर 2026

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते 

रिश्ते मनुष्य की धन-सम्पत्ति की तरह ही बहुत मूल्यवान होते हैं। उन्हें यत्नपूर्वक सहेजकर रखना पड़ता है। धन को यदि बैंक में जमा करवा दो तो उस पर ब्याज मिलता है और वह बढ़ता रहता है। उसी प्रकार रिश्तों की जमा पूँजी भी तभी बढ़ती है जब मनुष्य उनका कद्र करता है, उन सबके साथ वह समानता का व्यवहार करता है और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देता है। बढ़ती हुई रिश्तों की यह पूॅंजी उसका सम्बल बनती है। उनके रहते उसे कभी अकेलापन नहीं सताता।
          यदि हम बैंक में जमा अपने धन को बार-बार निकालते रहते हैं, उसमें कुछ जमा नहीं करते तो धीरे-धीरे वह धन समाप्त होने लगता है। उसी प्रकार अपने रिश्तों की पूॅंजी को हम अपने झूठे अहं के कारण गॅंवाते जाऍंगे तो वे भी हमसे दूर होते जाऍंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा जब हम अकेले पड़ जाऍंगे। हमारे पास अपना कहने के लिए कोई नहीं होगा। उस समय हमें उनकी कमी अखरने लगेगी। उस पछताना व्यर्थ होगा।
        वह सम्पत्ति जो अपने या किसी परिवारी जन के नाम पर हो तो वास्तव में वही अपनी होती है। यदि बेनामी सम्पत्ति हो और उसके विषय में किसी को पता न हो तो कोई गारण्टी नहीं होती कि वह अपनी रहेगी भी या नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि जिसके नाम पर वह सम्पत्ति है, वही कल को धोखा दे जाए और वह अपने हाथ से निकल जाए। उस समय मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। तब उसे समझ आता है कि सम्पत्ति अपने नाम ली होती तो अच्छा होता।
       उसी तरह रिश्ते भी होते हैं, वे तभी तक अपने बने रहते हैं जब तक उनकी पहचान होती है। यानी कि माता, पिता भाई, बहन, चाचा, बेटा, बेटी, मित्र आदि कोई भी नाम उनका हो सकता है। यदि उनकी पहचान खोने लगो तो उनके खो जाने का डर हमेशा बना रहता हैं। जब इन रिश्तों से दूरी बनने लगती है तो ये मनुष्य से विलग हो जाते हैं। तब मनुष्य की पूॅंजी में कटौती होने‌ल लगती है।
        यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि जिन्दगी के बैंक में जब प्रेम और सौहार्द का बैलेंस कम होने लगता है तभी सुख और रिश्तों के चैक बाउंस होने लगते हैं। मनुष्य सदा अपने रिश्तेदारों से ही सुशोभित होता है। किसी भी खुशी या गम में यदि अपनों का साथ न हो तो जीवन नीरस हो जाता है। उनके बिना मनुष्य को अपना अस्तित्व शून्य जैसा प्रतीत होने लगता है।
         मनुष्य का रिश्ता ऐसा होना चाहिए जिस पर उसे नाज हो। उन पर उसे सदा मान और भरोसा होना चाहिए। रिश्ता वही होता अपना होता है जो सदा अपनेपन की अहसास देता हो। सुख या दुःख में साथ निभाने वाले रिश्ते शीघ्र ही सिमटकर रह जाते हैं, उनमें दूरी अधिक होती है और सम्बन्ध केवल दिखावे भर के होते हैं। उनमें उतनी गर्माहट नहीं होती जितनी किसी एक रिश्ते में वास्तव में होनी चाहिए।
         मनुष्य का यह जीवन और रिश्ते दोनों मौसम की तरह होते हैं कभी सर्द और कभी गर्म। पेड़-पौधों को यदि समय पर खाद और पानी देते रहो तो वे अपने समय पर हमें छाया तथा फल देते हैं। यदि उनको नजरअंदाज कर दो तो वे पनपते ही नहीं हैं, मुरझा जाते हैं। ऐसे ही पतझड़ के मौसम में जब पेड़ों के पत्ते सूख जाते हैं और वे ठूँठ होकर बदसूरत दिखाई देने लगते हैं, उस समय प्रकृति भी नीरस लगने लगती है।
         उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में जब अहं रूपी पतझड़ आ जाता है तब रिश्ते मुरझा जाते हैं यानी उनमें दूरियाँ बढ़ जाती हैं। वे मनुष्य को बोझ की तरह लगने लगते हैं। मनुष्य की पहुँच से दूर होकर वे उसे संसार सागर में हिचकोले खाने के लिए अकेला छोड़ देते हैं। जब उसे इस सबका होश आता है तो वह स्वयं को बिल्कुल अकेला पाता है। यह उसके लिए कष्टकारी स्थिति बन जाती है।
        अच्छे और  सच्चे रिश्ते उन्हें ही कहा जा सकता है जो हमेशा हवा की तरह खामोशी से मनुष्य की जीवनीशक्ति की तरह उसके आसपास बने रहें। उसे कभी अकेलेपन का अहसास न होने दें। उनके साथ से वह खिल जाए। उनके बिना तो मानो उसका जीना ही दुश्वार हो जाए।
         एक सार की बात यहॉं बताना चाहती हूँ कि धनवान व्यक्ति वह नहीं होता जिसकी तिजोरी सदा नोटों या सोने-चाँदी के आभूषणों से भरी रहे अथवा ईश्वर की कृपा से वह बहुत ही सुख-सुविधाओं का भोग करता हो।
         मेरे विचार में उसी व्यक्ति को हम धनी कह सकते हैं जिसकी तिजोरी धन के बजाय सच्चे रिश्तों की पूँजी से भरी हुई होती है। दूसरे शब्दों में मनुष्य के रिश्ते जितने अधिक मजबूत होते हैं, उतना ही उसकी भुजाऍं होती हैं। ऐसा व्यक्ति भौतिक रूप से शक्तिशाली बन जाता है।
        अपने रिश्तों की पूँजी को व्यर्थ ही अपने अहं के कारण गॅंवाना नहीं चाहिए अपितु उन्हें अपने साथ लेकर चलते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 5 सितंबर 2026

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज के माथे पर लगने वाला यह बहुत बड़ा कलंक है कि यदि उसके आयुप्राप्त बुजुर्गों के लिए घर में स्थान न हो। वह घर-परिवार एक श्मशान की तरह है जहाँ उनके वृद्ध हुए माता-पिता की सुरक्षा अथवा देखभाल नहीं की जा सकती। उन्हें घर पर सम्मान देने के स्थान पर ओल्ड होम में भेजने की योजना बनाई जाए। वास्तव में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जा सकती है।
       माता-पिता अपना सारा जीवन बच्चों के लालन-पालन में व्यतीत कर देते हैं। उनकी खुशी में खुश होते हैं और उनके कष्ट में दुखी हो जाते हैं। साधन सम्पन्न लोगों की तो खैर बात ही अलग है। वे अपने बच्चों की सारी आवश्यकताएँ सुविधा से पूरी करते हैं। परन्तु जिनके पास उतनी सुविधाएँ नहीं हैं, वे माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए कोई कमी नहीं छोड़ते।
        आजकल लोग घर में कुत्ते-बिल्लियाँ पालते हैं और उनकी देखभाल के लिए नौकरों की फौज भी रखते हैं। उन पर वर्षभर में लाखों रुपए हँसी-खुशी खर्च देते हैं किन्तु माता-पिता को देने के लिए कुछ थोड़ी-सी राशि उनके पास नहीं बचती। यानी सारी कटौती उन्हीं के लिए की जाती हैं। इसे हम उन बच्चों का दुर्भाग्य ही कहा सकते हैं।
       धन्य हैं ऐसी नालायक सन्तान जिसे इतनी भी तमीज नहीं कि वे रत्तीभर भी अपने माता-पिता की परवाह कर लें। यह देख लें कि उन्होंने भोजन खाया है या नहीं, कहीं उनका स्वास्थ्य तो खराब नहीं है, उन्हें दवा की आवश्यकता तो नहीं, उनके पास पहनने के लिए वस्त्र तो हैं। ऐसे घरों में किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान, दिए जाने वाले दान आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ से सुख-शान्ति कब उड़न छू हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
       इन्हीं कपूतों को पाने के लिए माता-पिता ईश्वर से हाथ जोड़कर पुत्र की कामना करते हैं। जो उनके जीते जी सेवा नहीं कर सकता, उनका ध्यान नहीं रख सकता वह उन्हें कौन से तथाकथित नरक से उभारेगा, जैसी कि मान्यता है।
        इन्हीं कपूतों के लिए बेटियों को जन्म लेने से पहले ही माता के गर्भ में मार दिया जाता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकॉंश बेटियों को अपने माता-पिता की परवाह बेटों से अधिक होती है। वे आजन्म उनकी चिन्ता करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनका सहारा भी बनती हैं।
        बहुत दुर्भाग्य की बात है कि अपने माता-पिता के लिए चिन्तित रहने वाली यही बेटियाँ जब बहु बनकर ससुराल जाती हैं तो वहाँ जाकर सास-ससुर को ही भार मानने लगती हैं। उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने में कोताही बरतती हैं। वहाँ जाकर उन्हें सारी नैतिकता भूल जाती है। उन्हीं माता-पिता समान सास-ससुर से उन्हें उनकी सारी धन-सम्पत्ति चाहिए होती है। उनके सारे कर्त्तव्य तो उन्हें बड़ी अच्छी तरह से याद रहते हैं परन्तु अपने दायित्वों से वे मुॅंह मोड़ लेती हैं। यानी उन्हें अपने कर्त्तव्य बिल्कुल भूल जाते हैं।
          यही कारण है कि आवश्यकता से अधिक पढ़ी-लिखी आज की यह युवा पीढ़ी अपने सारे कर्त्तव्यों को ताक पर रखकर मात्र अपने ही स्वार्थ को साधने में लगी रहती है। जिसका परिणाम बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। जिनकी पूजा करनी चाहिए थी, वे ईश्वर तुल्य माता-पिता उन्हें बहुत बड़ा बोझ लगने लगे हैं।
        घर के बुजुर्गों को या तो कोने में किया जा रहा है या फिर परेशान होकर उन्हें किसी वृद्धाश्रम की शरण में जाना पड़ रहा है। यहाँ भी धन प्रधान है। यदि वह है तो मनचाही सुविधाएँ मिल जाएँगी अन्यथा पूछ नहीं होती। कितने दुर्भाग्य की बात है कि अकेले माता-पिता दस बच्चों को पाल सकते हैं परन्तु दस बच्चों के होते हुए वे दरबदर की ठोकरें खाने को विवश हैं।
         कभी वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिले तो वहाँ विद्यमान वृद्धों से यह अवश्य पूछना कि आपका बेटा क्या करता है? उनमें से अधिकॉंश बजुर्गों का यही उत्तर होगा कि उनका बेटा बड़ा अफसर है या नामी डॉक्टर है या सुप्रसिद्ध वकील है या योग्य इंजीनियर है या मजिस्ट्रेट है अथवा किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। इन सभी पढ़े-लिखों को क्यों और किसलिए कोई उनके कर्त्तव्य का बोध कराए।
         इसके विपरीत शायद ही कोई वृद्ध वहाँ पर ऐसा मिलेगा जिसका बेटा अनपढ़ है या गरीब है। इसका कारण है कि अनपढ़ या गरीब व्यक्ति को समाज और ईश्वर का डर होता है। उसके मन में कभी यह बात कभी नहीं आएगी कि माता-पिता को कभी वृद्धाश्रम भेजा जा सकता है।
       यदि पाश्चात्य जगत के अन्धानुकरण के कारण यही आधुनिक युग का सत्य बनता जा रहा है तो इस सच्चाई पर सौ बार धिक्कार है। ऐसी सन्तान के लिए तो अन्ततः माता-पिता यही कह बैठते हैं ऐसी सन्तान के न होने पर वे निस्सन्तान रह जाते तो अच्छा था। ईश्वर तथाकथित शिक्षित और सभ्य कहलाने वाली ऐसी नालायक पीढ़ी को सद् बुद्धि प्रदान करे।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 2 सितंबर 2026

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय किसी मनुष्य के बाँधने से थम नहीं जाता। वह तो निरन्तर अपनी गति से प्रवाहित होता रहता है। कहते हैं कि महाबली रावण ने अपने समय में काल को अपने सिरहाने बाँधकर रखा था। फिर भी काल ने उसका पक्ष नहीं लिया। न ही उसे उसकी गलतियों के लिए बख्शा। समय किसी को क्षमा नहीं करता चाहे वह व्यक्ति स्वयं को कितना शक्तिशाली समझने की भूल क्यों न करता रहे।
          समय के इसी फेर बदल में इन्सान सदा उलझा रहता है पर इसका रहस्य वह आयुपर्यन्त नहीं जान पाता। मनुष्य का समय कभी अच्छा होता है और कभी वह पटकनी खाने लगता है। यानी कभी वह उन्नति करता है और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसके विपरीत वह कभी अनथक दुखों और परेशानियों में घिरकर लाचार हो जाता है। उस समय उसका किया गया परिश्रम इच्छानुसार फलदायी नहीं हो पाता।
          समय के इस फेर से बचने के लिए मनुष्य विभिन्न उपाय करता रहता है। धर्मस्थानों में जाता है, तीर्थ यात्राएँ करता है, तन्त्र-मन्त्र वालों के जाल में फंस जाता है, जंगलों की खाक छानता है और कभी-कभी तथाकथित धर्मगुरुओं की शरण में भी चला जाता है। फिर भी समय के इस दुस्सह फेर से बाहर निकालने में वह स्वयं को असमर्थ पाकर सिर धुनने लगता है।
          ग्रन्थों में एक प्रसंग ऐसा भी आता है कि एक बार धनुर्धारी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध किया, "प्रभु! इस दीवार पर कुछ ऐसा लिख दीजिए कि जब खुशी में पढूँ तो दुख हो और जब दुख में पढूँ तो मुझे प्रसन्नता हो।"
         प्रभु ने अर्जुन के आग्रह पर बस यह वाक्य लिखा, "यह समय व्यतीत हो जाएगा।"
          इस प्रसंग का तात्पर्य यही है कि यह समय हर परिस्थिति में बदल जाता है। जब मनुष्य सुखों का भोग कर रहा होता है तो वह समय भी बीत जाता है। इसी प्रकार दुखों-कष्टों का समय भी सदा नहीं रहता, वह भी बदल जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य का अच्छा या बुरा कैसा भी समय हो, अन्ततः वह समय बदल ही जाता है। 
        समय कभी अच्छा या बुरा नहीं होता बल्कि अच्छी या बुरी इन्सान की वे सभी परिस्थितियाँ होती हैं जो उस समय विशेष पर मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। उनके कारण ही वह कभी-कभी विचलित भी होने लगता है और उससे बचने के लिए कुमार्ग को अपना लेता है। समय बीतते जब उसे होश आता है तो पश्चाताप करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचता। उस समय वह सोचता है कि काश उसने वह कुमार्ग कभी चुना ही न होता।
        मनुष्य जब प्रसन्न होता है तो कह दिया जाता है कि फलाँ व्यक्ति का समय अच्छा चल रहा है तभी तो वह जीवन की ऊँचाइयों को छू रहा है। इसके विपरीत जब वह कष्ट में होता है तब आम भाषा में कह दिया जाता है कि उस व्यक्ति विशेष का समय खराब चल रहा है, तभी उसकी ऐसी दुर्दशा हो रही है। ईश्वर न जाने उस बेचारे पर कब अपनी मेहरबानी करेंगे? 
        इसी बात को हम इन शब्दों में कह सकते हैं कि आदिकाल से ही समय अपनी गति से समान रूप से चलता जा रहा है। न वह किसी की भलाई करता है और न ही वह किसी का अनिष्ट करता है। उसके लिए सभी जीव एक सामान हैं। इसीलिए सबके ही साथ वह समान रूप से व्यवहार करता है। ईश्वर का यह कठोर नियम है कि दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन आता है। सही ऋतुऍं अपने समयानुसार परिवर्तित होती रहती हैं। किसी के भी कहने से समय का यह क्रम कभी बदलता नहीं है।
          मनुष्य के जीवन में पहिए के अरों की तरह समय ऊपर-नीचे होता रहता है। अर्थात् सुख और दुःख उसके जीवन में क्रम से आते रहते हैं। जीवन की धूप-छॉंव का यह सम्पूर्ण क्रम उसे उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलता है। जैसे भी सुकर्म या दुष्कर्म उसने किए होते हैं, उनसे उसे किसी भी तरह छुटकारा नहीं मिल पाता। 
          जब तक मनुष्य अपने किए गए शुभाशुभ कर्मों का फल भोग नहीं लेता तब तक वह जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन में जकड़ा हुआ चौरासी लाख योनियों के फेर में ही भटकता रहता है। इससे उसकी मुक्ति सम्भव नहीं हो सकती। 
          समय को सदा दोष देते रहने का कभी कोई औचित्य नहीं होता। समय का वरद हस्त हम सब पर हमेशा बना रहता है। बस हम अज्ञ लोग समझ नहीं पाते। उसका सदुपयोग करता हुआ मनुष्य इस संसार सफल हो जाता है और दुरुपयोग करता हुआ व्यक्ति अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य कर बैठता है। इसलिए समय के साथ यदि मनुष्य कदम मिलाकर चल सके तो यह उसका सौभाग्य बन जाता है। फिर उसे अपने जीवन में कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 31 अगस्त 2026

संजीवनी बूटी है मुस्कुराहट

संजीवनी बूटी है मुस्कराहट

मुस्कराहट एक ऐसी संजीवनी बूटी है जो सामने वाले को जीवन दान देने का कार्य करती है। उसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। यह तो मनुष्य की प्रसन्नता और सम्पन्नता की पहचान है। उसकी मुस्कराहट कई चेहरों को मुरझाने से बचा सकती है और उन्हें खुशियाँ दे सकती है। मुस्कुराहट चेहरे पर आने वाला एक बहुत सुन्दर भाव है। यह सच्ची खुशी, प्यार और शान्ति का एक प्रतीक है। एक छोटी-सी मुस्कान मनुष्य के तनाव को कम करने में सहायक होती है। सामने वाले का दिल जीतने में यह सफल हो जाती है।
        प्रातःकाल पूर्व दिशा से मुस्कुराते हुए जब सूर्य देवता का उदय होता है, उस समय ब्रह्माण्ड में चारों ओर ही खुशियाँ छा जाती हैं। उस समय पक्षियों का कलरव वातावरण को जीवन्त कर देता है। प्रकृति जब रंग-बिरंगे फूलों के रूप में मुस्कुराती है तब उनके पास से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इसी प्रकार नदियों की कलकल ध्वनि मानो एक संगीत में सबसे बॉंध देती है। ये सभी प्रकृति की प्रसन्नता के द्योतक कहे जाते हैं।
        एक मधुर मुस्कान युक्त किसी व्यक्ति किसी के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। अपने समक्ष आने वाले हर इन्सान के लिए वह जादू का काम करती है, उसके दुःख-दर्द पालक झपकते ही मानो छूमन्तर हो जाते हैं। यह मुस्कान मनुष्य के लिए जादू की झप्पी का काम करती है।
          हम सबने अनुभव किया है कि कष्ट और परेशानी से तड़पता हुआ मरीज यदि डॉक्टर के पास जाता है और वह मुस्कराते हुए उस मरीज की परेशानी को सुनकर कर उसका इलाज करता है। उसके दर्द पर अपना स्नेहासिक्त हाथ रखता है तो मरीज को ऐसा लगता मानो उसकी आधी बिमारी वहीं दूर हो गयी। रोगी का डॉक्टर के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह शीघ्र ही स्वस्थलाभ करेगा।
          अपना सामान खरीदने के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी मॉल या दुकान में जाता है और वहाँ पर मौजूद सेल्समेन अथवा दुकानदार उसका मुस्कुराकर स्वागत करता है, ध्यान देते हुए उसकी इच्छित वस्तुएँ दिखाता है तो मनुष्य प्रसन्न हो जाता है। उस स्थान को वह अपने लिए निर्धारित कर लेता है। फिर बार-बार वहाँ आकर ही अपना मनचाहा सामान खरीदता है।
          एवंविध कोई व्यापारी हैं अथवा बॉस प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए अपने दफ्तर में प्रवेश करता है तो कर्मचारियों के मन में रहने वाला प्रेशर कम हो जाता है। आफिस का माहौल खुशनुमा होने से सभी कार्य सुचारू रूप से और व्यवस्थित होने लगते हैं। इस प्रकार वह कम्पनी या कार्यालय सबके लिए एक आदर्श बन जाता है। वहॉं कार्य करने का एक अच्छा माहौल बन जाता है। इससे कर्मचारियों के काम करने की क्षमता में अपेक्षाकृत सुधार होने लगता है।
            एक अध्यापक यदि मुस्कुराते हुए अपनी कक्षा में प्रवेश करता है तो वहाँ विद्यमान सभी विद्यार्थियों के चेहरों पर स्वयं ही मुस्कान खिलने लगती है। उस कक्षा का वातावरण खुशनुमा बन जाता है, छात्रों का मन भी पढ़ने में लगने लगता है। पढ़ने-पढ़ाने का आनन्द कई गुणा बढ़ जाता है। वह अध्यापक छात्रों का प्रिय बन‌जाता है।
        जब हम अपनी फोटो खिंचवाते है तो फोटो खींचने वाला यही कहता है- smile please. यदि जरा-सा मुस्कुरा देने से हमारी फोटो अच्छी आ सकती है तो फिर खुलकर हँसने से जिन्दगी की सारी तस्वीर बहुत ही सुन्दर हो सकती है।
        सदा ही मुस्कुराहटें बिखेरने वाला व्यक्ति यदि उदास हो जाए तो किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा। उससे लोग पूछने लग जाते हैं कि भाई क्या बात है आज उदास क्यों हो गए? इसका कारण यही है कि सदा मुस्कान बिखेरने वाले लोग अपने आसपास बहुत कम मिलते हैं। इसका दूसरों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
          यदि इन्सान दिन भर के काम की थकान के बावजूद शाम को मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश करता है तो पूरा परिवार आनन्दित हो जाता है। ऐसे खुशगवार माहौल में आकर व्यक्ति की अपनी थकावट भी दूर हो जाती है और परिवारी जनों के साथ की जाने वाली गपशप से मन बहलने के साथ-साथ घर-परिवार की कई समस्याएँ भी सुलझ जाती हैं।
          कुटिल मुस्कान वालों से बचकर रहना बहुत आवश्यक होता है। बात वही है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। यानी जहाँ हमने इन्सान को समझने की भूल की वहीं उसके जाल में उलझकर दलदल में फंसने जैसी बात हो जाती है। सावधानी रखने से ऐसे लोगों को देख-परखकर किनारे किया जा सकता है।
          हँसने और मुस्कुराने का वरदान ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही दिया है। छोटे बच्चे की एक मुस्कान पर सारा घर बलिहारी होने लगता है। उसी प्रकार किसी भी भी मनुष्य की सरल और सहज मुस्कान सबको हरने वाली होती है। 
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 30 अगस्त 2026

मनुष्य का गुणग्राही होना

मनुष्य का गुणग्राही होना

गुणग्राही होना मनुष्य का स्वभाव होता है। आपने अन्तस् में सद् गुणों का समावेश करते हुए वह गुणों का पारखी बन जाता है। उसे लोग हंस की तरह नीरक्षीर विवेकी मानने लगते हैं। विश्व के अन्य जीव-जन्तुओं से अलग यही गुण उसकी एक विशेष पहचान बनाते हैं।
       मनुष्य का गुणग्राही होना उसका श्रेष्ठ स्वभाव होता है। इसमें व्यक्ति दूसरों के दोषों को नजरअंदाज करके उनके अच्छे गुणों को देखता और अपनाता है। यह उदार सोच इन्सान को जीवन में तेजी से आगे बढ़ाती है और समाज में आदर दिलाती है। दूसरों में कमियॉं खोजने के स्थान पर वे उनकी खूबियों को पहचानते हैं। 
         हर व्यक्ति और परिस्थिति से कुछ-न-कुछ अच्छी बात ग्रहण करते हैं। ये लोग ईर्ष्या-द्वेष और अहंकार से दूर रहते हैं। लोग ऐसे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति का सम्मान करते हैं और उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर स्वयं को गौरवान्वित समझते हैं।
       रामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था कि मक्खियाँ दो प्रकार की होती हैं। एक शहद की मक्खियाँ होती हैं जो शहद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं खाती। दूसरी साधारण मक्खियाँ होती हैं जो शहद पर भी बैठती हैं और यदि सड़ता हुआ घाव दिखाई दे जाए तो तुरन्त शहद को छोड़कर उस पर भी जाकर बैठ जाती हैं।
        मक्खी का यह उदाहरण मनुष्यों पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है। शहद वाली मक्खी की तरह गुणग्राही लोग सदा शहद यानी अच्छाई के ही पक्षधर होते हैं। ये लोग हर स्थान पर कुछ-न-कुछ शुभ तलाश ही लेते हैं। 
          ऐसे महानुभाव गन्दगी में से अपने मतलब की अच्छाई को खोज निकालते हैं। कितनी भी गन्दगी क्यों न हो उसमें से जैसे हीरे को निकाल लेना समझदारी कही जाती है, उसी प्रकार ये पारखी लोग अपना हित कहीं भी रहते हुए साध लेते हैं। इसके लिए उन लोगों को किसी तरह का कोई भी अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता बल्कि यह उनके स्वभाव की विशेषता और दृढ़ता का परिचायक ही कहलाता है। 
          ऐसे महानुभाव दुर्जनों के संग नहीं करते, इन्हें केवल सज्जनों की संगति ही रास आती है। सद् ग्रन्थों का परायण और स्वाध्याय करते हैं। बस उसी में उनका मन रमता है। इसीलिए अपने जीवन में भौतिक साधनों के स्थान पर सदा आत्मोन्नति को प्रश्रय देते हैं। 
        दिन-रात उसी के बारे में सोचते रहते हैं और उसी मस्ती में डूब जाते हैं। ये सन्त प्रकृति के लोग दूसरों के लिए उदाहरण बन जाते हैं और समाज का दिशादर्शन करते हैं। समाज इन्हें सदा आदरणीय व्यक्ति का मान देता है। 
          इसके विपरीत दूसरे प्रकार के अन्य लोग मक्खियों की तरह इधर-उधर हर स्थान पर भिनभिनाते रहते हैं। जहाँ उन्हें अपना लाभ दिखाई देता है, वे वहीं के हो जाते हैं। इन्ही लोगों के लिए शायद कहा गया है- 
   जहाँ देखि तवा-परात वहीँ बिताई सारी रात।
        यानी जहाँ उनके स्वार्थ पूर्ण होते हैं वे वहीं के होकर रह जाते हैं। उन्हें किसी से कोई लेना देना नहीं होता। ये लोग अच्छाई की ओर जाते अवश्य हैं, अच्छा बनना भी चाहते हैं परन्तु जहाँ अधिक लाभ होता हुआ प्रतीत होता है, उस ओर आकृष्ट होकर अच्छाई की ओर से मुँह मोड़ लेते हैं।
        ये लोग अच्छाई का लबादा ओढ़कर गलत कार्य करने से परहेज नहीं करते। अपनी सफेदपोशी बनाए रखने के लिए तरह-तरह के षडयन्त्र रचते रहते हैं। 
          ऐसे लोग जो केवल अपने भौतिक स्वार्थो को अधिक महत्त्व देते है, वे कभी भी किसी धोखेबाज या चालबाज के धोखे या चाल का आसानी से शिकार बन जाते हैं। इसका कारण है कि वे इन्हें अपने जल में फँसाने के लिए आकर्षक जाल या चारा डालते रहते हैं। अपने मस्तिष्क से विचार न कर पाने और किसी सयाने से परामर्श न करने के कारण ये उन शातिर लोगों के झाँसे में आकर अपना बहुत कुछ गँवा बैठते हैं।
        कुछ समय पश्चात जब परेशानी में फँस जाते हैं तो हैरान रह जाते हैं कि उन्होंने क्या कर डाला? तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है तो वे इतनी दूर निकल गए होते हैं कि वहाँ से उनकी वापिसी सम्भव नहीं हो पाती।
        अपने तुच्छ भौतिक स्वार्थों का मोह छोड़कर इन्सान को विचारशील बनना चाहिए ताकि कोई उसे आसानी से न छल सके। अपने आस्तीन के साँपों से सावधान रहना चाहिए और शहद की मक्खी की भाँति अपने निर्धारित लक्ष्य पर डटे रहना चाहिए। न अपने जीवन मूल्यों का कभी त्याग करना चाहिए और न ही स्वयं को सन्तापों की भट्टी में झोंक देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 29 अगस्त 2026

लोकप्रिय होना महानता का प्रतीक नहीं

लोकप्रिय होना महानता का प्रतीक नहीं 

लोकप्रियता की कामना हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है। लोग व्यक्ति विशेष के लोकप्रिय होने को महानता का प्रतीक मानते है। हर व्यक्ति की यह हार्दिक इच्छा होती है कि समाज में उसका अपना एक स्थान हो। लोग उसे इज्जत भरी नजरों से देखें। जब भी उन्हें कोई समस्या हो, तब अपनी परेशानी की अवस्था में वे उसके पास आकर निदान लिए उसका परामर्श लें।
          हम कह सकते हैं कि हर लोकप्रिय व्यक्ति महान नहीं होता और कई महान लोग अपने जीवनकाल में लोकप्रिय नहीं हुए। इसलिए केवल प्रसिद्ध होना महानता का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लोकप्रिय होना और महान होना दोनों अलग बातें हैं। लोकप्रियता केवल क्षणिक प्रसिद्धि या लोगों की नजरों में आना होता है जबकि महानता चरित्र, सत्यनिष्ठा, त्याग और समाज के लिए किए गए स्थायी कार्यों का परिणाम है।
          ऐसा सोचकर ही कितना अच्छा लगने लगता है कि वह समाज की नजरों में आम आदमी न रहकर एक खास व्यक्ति बन गया है। तब उसका मन मानो बल्लियों उछलने लगता है, प्रसन्नता के कारण वह हिरण की तरह कुलाँचे भरने लगता है। 
          इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि तब उसे पाने के लिए मनुष्य सस्ती लोकप्रियता हासिल करने लग जाए अथवा ओछे हथकण्डे अपनाने लगे। जैसे कि आजकल कुछ लोग ऐसा करते हैं। इस तरह करके वे स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर डालते हैं यानी वे स्वयं ही अपने शत्रु बन जाते हैं। अपनी हानि तो वे करते ही हैं, उस पर जग हँसाई जो होती है सो अलग।
        लोकप्रिय होने के लिए, लोक की भलाई के लिए कुछ विशेष कार्य करने होते हैं, लोकरंजन के नहीं। लोकरंजन करते समय मनुष्य को कई प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं। इसलिए ऐसे कार्य जन साधारण के हित के लिए न होकर स्वयं अपना हित साधने वाले अधिक बन जाते हैं। इन कार्यों को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
          हम कह सकते हैं कि लोकप्रियता स्थायी नहीं होती। यह कम समय के लिए होती है। इसमें केवल भीड़ का ध्यान आकर्षित करना होता है। यह अक्सर दिखावे या ट्रेंड पर निर्भर करती है। सस्ती लोकप्रियता कभी भी सम्मान नहीं दिलाती।
          दूसरी ओर महानता गहन मूल्यों और सिद्धान्तों पर टिकी होती है। इसमें जनहित और समाज की भलाई के कार्य शामिल होते हैं। इसका प्रभाव सदियों तक रहता है, भले ही व्यक्ति को तुरन्त प्रशंसा न मिले। 
          देश, धर्म और समाज की भलाई के कार्यों को निस्वार्थभाव से करने वाले ही वस्तुतः इस संसार में लोकप्रिय होते हैं। मोमबत्ती की तरह स्वयं को तपाकर गलाने वाले ही वास्तव में परोपकारी कार्य कर सकते हैं। अन्यथा प्रदर्शन कर्त्ताओं की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है जिन्हें देखते ही सबके मन में आक्रोश उत्पन्न होने लगता है। ये ढकोसला करने वाले समाज में कभी अपना स्थान नहीं बना पाते चाहे लाखों रुपए क्यों न खर्च कर दें। 
      उन लोगों की मानसिकता यही होती है कि पैसे से वे हर जिन्स की तरह यश, मान और लोकप्रियता खरीद सकते हैं। परन्तु यह उनकी सरासर भूल होती है। यदि पैसे से सब कुछ खरीद जा सकता तो यह सब धनवानों की ही जागीर बन जाते। साधारण मनुष्य तो कभी इन्हें कमा ही नहीं सकता था।
          लोकप्रिय बनने के लिए मनुष्य का व्यव्हार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि परोपकार करने वाला अहंकारी हो तो अपने सम्मान को बचाने के लिए लोग उससे कन्नी काटने लगते हैं। उसे व्यक्ति को दूसरों को भी मान देना चाहिए। सबको समदृष्टि से देखते हुए बिना पक्षपात किए, उन सबकी समस्याओं का निदान करना चाहिए। 
          दूसरों का हित साधने के नशे में आने के स्थान पर बादलों की तरह हमेशा नीचे देखते हुए देने वाला बनना चाहिए। उसके व्यवहार की सरलता, सहजता, मधुरता और उसकी सहृदयता आदि गुण ही सबको प्रभावित करते हैं। अपनी इन अच्छाइयों का त्याग मनुष्य को कभी नहीं करना चाहिए।
          बोलते समय भी उसे अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। ऐसा न हो की उसकी वाणी की अखड़ता किसी को भी आहत कर जाए और उसकी लोकनिन्दा का कारण बन जाए। ऐसे लोकप्रिय होते होते उसे अपमान का पात्र न बनना पड़े, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।
        दूसरों को सम्मानजनक शब्द आप या तुम से सम्बोधित करना चाहिए। अहं के द्योतक मैं शब्द का उपयोग यथासम्भव नहीं करना चाहिए। इस तरह वाणी और व्यवहार का संयम, दूसरों की चिन्ता और उनके प्रति सहानुभूति का भाव मनुष्य को दूसरों के हृदय में स्थान दिला देता है। फिर उसे लोकप्रिय बनने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
चन्द्र प्रभा सूद