बुद्धि का कुण्ठित होना
बुद्धि का वरदान ईश्वर ने मनुष्य को दिशा है। यह बुद्धि मनुष्य के जीवन को दिशा देने का कार्य करती है। यह हमें अच्छे बुरे का ज्ञान कराती है। हमारी बुद्धि तब कुण्ठित होती है जब हम अपने सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय नहीं करते और सत्संगति में जाकर उसे पैना नहीं करते अथवा उसे सुविचारों से पोषित नहीं करते। हम जितना अधिक अध्ययन करेंगे, हमारी बुद्धि को उतना ही अधिक भोजन मिलेगा। तभी हमारे विचारों में भी परिपक्वता आ सकती है। इसकी बदौलत हम मनुष्य सफलता के सोपानों पर चढ़ते हैं।
मनीषी कहते हैं कि ज्ञानार्जन की कोई आयु नहीं होती। किसी भी आयु में मनुष्य, किसी भी जीव से कुछ सीख सकता है। मनुष्य का यह सौभाग्य है कि वह आजन्म कुछ-न-कुछ सीखकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त कर सकता है। अपने जीवन को ऊॅंचाइयों पर ले जा सकता है।
हमारी बुद्धि को भी जंग लग सकता है। यद्यपि हमारी यह बुद्धि लोहा नहीं है। परन्तु फिर भी कभी-कभी मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने वालों को अथवा दूसरे की कही हुई बात को उस समय न समझ सकने वालों को हम कह देते हैं -
1 तुम्हारी बुद्धि को जंग लग गया है
2 तुम्हारी मति मारी गई है
3 तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है
4 तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। इत्यादि।
इन सबको कहने का मात्र यही अर्थ होता है कि उस समय विशेष पर वे अपनी बुद्धि का वैसा प्रयोग नहीं कर रहे होते जैसा किसी समझदार मनुष्य को उस परिस्थिति में करना चाहिए।
कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यदि लम्बे समय तक बुद्धि को सुविचारों से पोषित न किया जाए तो इसमें मोह-माया व स्वार्थपरक भावों का जंग लग जाता है। तब ये भाव मनुष्य को चैन से नहीं बैठने देते बल्कि उसे भटकने के लिए विवश कर देते हैं। उस समय वह अनावश्यक ही पिष्टपेशन करता रहता है। अपने मन को दुविधा की स्थिति में पहुॅंचा देता है। मनुष्य के लिए यह स्थिति कभी भी सुखदायक नहीं हो सकती।
मनुष्य जब खाली बैठकर सोचता है तो उसके मन के विचारों का ताना-बाना उसे परेशान करता रहता है। इसका प्रभाव उसके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। उसकी विवेकशील बुद्धि उसे विचलित कर देती है।
यदि अपनी बुद्धि का उपयोग हम अपने परिवार, देश, समाज और धर्म के लिए करते हुए सकारात्मक कार्य करते हैं तो यह बुद्धि का सदुपयोग करना कहलाता है। अर्थात् उस समय हम बुद्धिमान कहलाते हैं। समाज में अग्रणी बनकर हम पूज्य हो जाते हैं।
इसके विपरीत यदि हम इस बुद्धि को अपने देश, धर्म, परिवार अथवा समाज के विरुद्ध नकारात्मक कार्यों में लगाने लगते हैं तो इसका दुरूपयोग करते हैं। तब मनुष्य तोड़फोड़, भ्रष्टाचार, अनाचार व कदाचार के कार्य करते हैं। उस समय वह मनुष्य विशेष विघटनकारी बनकर द्रोही कहलाते हैं। समाज के लिए एक अभिशाप बन जाते हैं। उन्हें हर तरफ हिकारत की नजर से देखा जाता है। हो सकता है अपनी कुटिल चालों से कुछ समय तक वे दूसरों को प्रभावित कर सकें, परन्तु अन्तत: उन सब कृत्यों के दुष्परिणामों को उन्हें भोगना ही पड़ता है।
ये लोग देश, धर्म व न्याय के शत्रु बन जाते हैं। सब कुछ होते हुए भी इधर-उधर भागते हुए और छिपते-छिपाते हुए, ये सारा जीवन गुमनाम रहकर बिता देते हैं। उनसे किनारा कर लेने में ही सबको अपना भला दिखाई देता है। कोई भी उनके साथ सम्पर्क रखकर स्वयं को मुसीबत में डालना नहीं चाहता।
लोमड़ी जैसी चालाक बुद्धि किसी भी व्यक्ति को पसन्द नहीं आती है। सबका प्रिय वही मनुष्य बनता है जिसकी बुद्धि का सरल और सहज हो। उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से दूसरे लोगों के हृदयों को छू जाए।
सदैव सकारात्मक कार्यों में अपनी बुद्धि को नियोजित करना बुद्धिमानी होती है। इसे हम सद् बुद्धि कहते हैं। नकारात्मक सोच रखने से बुद्धि कुटिल बन जाती है। इसलिए यथासम्भव बुद्धि को कुटिलता से बचते हुए इसे सरल और सहज बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को लोग अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद