शनिवार, 18 अप्रैल 2026

मृत्यु का विधान

मृत्यु का विधान 

मृत्यु एक अटल सत्य है। यह विधि का एक कठोर विधान है। इसमें किसी भी जीव को छूट नहीं मिल सकती। इस चराचर जगत में जिस भी जीव का जन्म होता है, चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो अथवा पेड़-पौधे हों, उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। हर जीव अपने कृत कर्मों के अनुसार निश्चित समय के लिए इस संसार में आता है। मनुष्य स्वयं चाहे अथवा न चाहे परन्तु समयावधि पूर्ण होने के पश्चात उसे इस दुनिया से विदा लेनी ही पड़ती है। इसमें उसकी राय नहीं पूछी जाती और न ही उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती।
             उसके इहलोक के प्रस्थान के समय उसके निकटस्थ सम्बन्धी, परिवारी जन, बन्धु-बान्धव रोते-बिलखते रह जाते हैं और वह दूसरे लोक की यात्रा के लिए निपट अकेले ही प्रस्थान कर जाता है। अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति को साथ लेकर जाने की अनुमति उसे ईश्वर की ओर से नहीं मिलती। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही यहॉं से विदा लेकर चला जाता है। वह अपनी सारी धन-दौलत और अपने महल-चौबारे इसी धरती पर छोड़कर खाली हाथ मुट्ठी बॉंधे चला जाता है।
          प्राण जब इस शरीर का त्याग कर देते हैं तब जीव की आँखें सदा के लिए मुँद जाती हैं। उस समय सभी भौतिक रिश्ते-नाते इसी संसार में छूट जाते हैं। कोई भी सम्बन्धी उसका अपना नहीं रह जाता और न ही वह भी किसी का नहीं रहता है। जिन परिवारी जनों के लिए वह अपना सारा जीवन स्याह-सफेद कार्य करता रहता है, वे सभी भाई-बन्धु केवल जीते जी की माया होते हैं और सिर्फ श्मशान तक ही वे उसका साथ निभाते हैं। उसके पश्चात की यात्रा जीव को स्वयं अकेले ही तय करनी होती है। वहॉं उसका कोई साथी नहीं होता।
           मनुष्य का जब जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता। जब वह इस संसार को छोड़कर जाता है तब उसके पास नाम तो होता है पर शरीर दंगा दे जाता है। अब हमें यहाँ यह भी विचार करना है कि क्या सिर्फ साँसे बन्द होने से ही कोई मुर्दा हो जाता है? जिसे अपने प्रियजन भी कुछ समय के लिए अपने घर रखने के लिए तैयार नहीं होते। बस शीघ्र ही उसे घर से निकाल देने के लिए उत्सुक रहते हैं। यही रह जाती है बस मनुष्य के जीवन की कहानी। 
            यह चिरन्तन सत्य है कि श्वासों की डोर थमने या टूट जाने से जीव मृत हो जाता है। उसे हम आम बोलचाल में शव या मुर्दा कहते हैं। फिर उस शव को उसी के ही परिवारी जन और बन्धु-बान्धव जुलूस बनाकर, श्मशान में ले जाकर अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं। उसके जल जाने की थोड़ी-सी प्रतीक्षा किए बिना ही अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। यदि अधिक समय तक उसे रखा जाए तो उस मृत शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है जो बिमारी का कारण बन जाती है।
            यह भी सत्य है कि जब मनुष्य से उसकी इन्सानियत निकल जाती है या फिर उसकी आँखों का पानी मर जाता है, उस समय भी वह मृतप्राय होता है। मनुष्य के लिए यही आवश्यक है कि सबसे पहले वह एक अच्छा इन्सान बने। एक मनुष्य में सबसे पहले मानवोचित गुणों का होना जरूरी है। उन गुणों के बिना इस मनुष्य को राक्षस या हैवान कहते हैं। ये दुष्ट प्रकृति के लोग मनुष्यता के नाम पर कलंक होते हैं, जो इन्सानियत की कब्र खोदते हैं। इन्हें न तो घर-परिवार में स्थान मिलता है और न ही देश-समाज में। नैतिक, धार्मिक और सामाजिक नियमों के विरुद्ध चलने वाले ये लोग देश, धर्म और समाज के शत्रु कहलाते हैं। 
              इसलिए ये लोग न्याय व्यवस्था के साथ आँखमिचौली खेलते हुए, अन्तत: कानून की बेड़ियों में जकड़कर सलाखों के पीछे जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाते है। किसी भी व्यक्ति के जीवित रहते हुए उसे मिलने वाली यह एक ऐसी मृत्यु होती है जो स्वयं उसके लिए और उसके अपनों के लिए बहुत कष्टकारी होती है। वह व्यक्ति तो दुष्कर्म कर लेता है परन्तु उसके बन्धु-बान्धवों को भी दारुण कष्ट भोगना पड़ता है और समाज में अपमानित होना पड़ता है।
            वैसे तो जरा-सा कष्ट आने पर हम सब लोग मृत्यु को पुकारने लगते हैं पर वह क्षणिक रोष होता है। कभी-कभी लम्बी या असाध्य बीमारी की अवस्था में भी मनुष्य जीवन से हारकर मृत्यु का दामन थामना चाहता है परन्तु यह उसके वश में नहीं होता। ईश्वरीय इच्छा के समक्ष मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है। जब वह पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोग लेता है तभी उसे अपने जीवन से छुटकारा मिलता है, उसकी कामना करने के कारण पहले नहीं।
            ईश्वर के प्राकृतिक न्याय के अनुसार मृत्यु होना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है परन्तु अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने वाली यह मृत्यु मनुष्य की स्वयं की बुलाई हुई होती है। मनुष्य को अपनी मृत्यु को इस प्रकार अनावश्यक रूप से कष्टदायक नहीं बनाना चाहिए। उसे सही रास्ते का चुनाव करके उस मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सुखद बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

संसार में जन्म लेने के पश्चात मनुष्य दिन-दिन करके बड़ा होता है। धीरे-धीरे समय बीतते वह आयुप्राप्त हो जाता है। उसके पास ग्रहण की गई शिक्षा की योग्यता के साथ-साथ अनुभवों का भी एक विशाल खजाना(भण्डार) एकत्रित हो जाता है। अपने इस संग्रहालय से मोती चुन-चुनकर वह उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में सौंपना चाहता है। वह चाहता है कि उसके ज्ञान और अनुभव से सीखकर कठिनाइयों से लोग बच जाएँ और वे गलतियॉं न दोहराऍं। बच्चे अपने जीवन में उत्तोरत्तर उन्नति करते चलें।
          सागर में छिपे खजाने किनारों पर स्वयं नहीं आ जाते। उन्हें पाने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ता है। समुद्र में गहरे पैठना पड़ता है। उसी प्रकार वयोवृद्ध जनों के हृदयों से ऐसे अनुभवजन्य खजानों को उनके पास बैठकर पाकर उनका लाभ उठाया जा सकता है। खड़े-खड़े, भागते-भागते उनसे वह खजाना प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए धैर्य पूर्वक पास बैठकर ही जाना-समझा जा सकता है। यह सत्य है कि उनके अनुभव से लाभ ही होगा, हानि नहीं।
            इसी तरह आयु बीतने पर उनका जीवन यादों का एक ग्रन्थ बन जाता है। उसमें कटु और मधुर दोनों ही तरह की स्मृतियाँ कैद हो जाती हैं। जीवन के ये खट्टे-मीठे अनुभव उन्हें समय-समय पर याद आते रहते हैं। मधुर यादों को याद करके वे प्रसन्न होते हैं और जीवन में आई कटुताओं को याद करके उनका मानस कुछ समय के लिए व्यथित हो जाता है। उस समय यदि कोई उन्हें सहारा दे सके तो वे उन कड़वी यादों से सरलता से बाहर आ सकते हैं।
            किसी व्यक्ति विशेष की याद उन्हें बहुत तड़पाती है। कभी-कभी मनुष्य यादों के सहारे जिन्दगी काट लेता है। यह भी सम्भव है कि उसके प्रियजन अथवा बन्धु-बान्धव उससे जीवन काल में ही दुनिया से बिछुड़ गए हों। उनके वापिस लौटा लाने की हर कोशिश व्यर्थ हो गई होती है पर उनके साथ बिताए गए जीवन के पल हमेशा ही स्मृति में कैद होकर रह जाते हैं। वे चलचित्र की भॉंति मनुष्य के मानस पर चलते हुए यदा कदा उसे मायूस कर जाते हैं। 
            इसी तरह यद्यपि दोस्ती के जमाने भी लौटकर नहीं आते पर निश्चित ही हृदय में कसक छोड़ जाते हैं। जहाँ तक हो सके उन सुखद पलों को याद करके उदास होने के स्थान पर उन मधुर यादों को प्रसन्नतापूर्वक जी लेना चाहिए। युवाओं को अपनी योग्यता पर मान होना चाहिए, अभिमान कदापि नहीं। उन्हें इस सत्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि उन वयोवृद्ध माता-पिता के कारण ही वे योग्य बनकर सफलता के सोपानों को छू पाए हैं।अब उन्हें उनका तिरस्कार न करके उनका सम्मान करना चाहिए।
            युवावर्ग को बुजुर्गों के ज्ञान का उपहास करते हुए यह नहीं कहना चाहिए कि आप चुप रहो आपको क्या पता? आपको समझ नहीं आएगा?इस तरह के अपमान से से वे बहुत आहत होते हैं। उनका हृदय व्यथित होता है। उन्हें लगने लगता है कि अब वे अपने बच्चों के लिए अनुपयोगी हो गए हैं। उनके जीवन में उनकी कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि वे उन पर एक बोझ बनते जा रहे हैं। इस व्यवहार से वे टूटने लगते हैं। इस तरह से जब वे अनावश्यक सोचते रहते हैं तो उनके स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।
            यहाँ यह कहने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही कि जिन माता-पिता की मेहनत की कमाई और धन-समृद्धि को वे युवा बच्चे किसी भी तरह प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं तो वे मूर्ख कैसे हो सकते हैं? उस सबको उन्होंने अपनी समझ-बूझ से ही बनाया होता है। माता-पिता का सब कुछ चाहने वाले बच्चे उनके प्रति असहिष्णु नहीं हो सकते। उनसे किनारा करके उन्हें ओल्डहोम जैसे स्थानों पर नहीं भेज सकते। बाल्यावस्था और युवावस्था में जिस प्रकार उन्होंने अपने बच्चों को सहारा दिया था, अब उनकी बारी है। बच्चे अपने दायित्वों से मुॅंह नहीं मोड़ सकते।
            इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आयु बढ़ने पर मनुष्य धीरे-धीरे शारीरिक रूप से अशक्त होने लगते हैं। इस कारण वे उस समय अधिक बोलने लगते हैं, रूठने-मानने लगते हैं, अनावश्यक क्रोध और जिद करने लगते हैं। उनका व्यवहार बच्चों की तरह हो जाता है। एक ही बात को वे कई बार दोहराने लगते हैं। तब उन्हें बच्चों के प्यार और विश्वास की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। उन्हें यह अहसास करवाना चाहिए कि वे हर स्थिति में बच्चों के लिए उपयोगी हैं और वे उनके परामर्श के बिना एक भी कदम नहीं चल सकते। यदाकदा किसी विषय पर उनसे सलाह लेकर उनको सन्तुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।
          सार रूप में यही कहा जा सकता है कि बच्चों को बिना किसी पूर्वाग्रह के वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। यदि वे ऐसा कर सकें तो बड़ों को भी उन बच्चों पर गर्व होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों की राह में काँटे बिछाने वालों को जीवन में फूल नहीं मिला करते, यह एक शाश्वत सत्य है। यदि मनुष्य दूसरों के लिए फूल बोता है तो बदले में उसे सुख यानी फूल ही मिलेंगे।इसके विपरीत बुराई करने वाले मनुष्य को उसके कर्मों का दण्ड त्रिशूल की तरह पीड़ादायक फल के रूप में वापस मिलता है। इसलिए यथासम्भव यही प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य जाने-अनजाने किसी के भी दुख का कारण न बने। 
          यह संसार एक सुन्दर बगीचे की तरह है। इसमें जैसी खेती की जाती है, फसल भी वैसी ही काटी जाती है। प्यार, मुहोब्बत, भाईचारे, विश्वास आदि के बीज बोने वाले लोगों को सत्यता: प्यार आदि मिलते हैं। सब लोग ऐसे सज्जनों पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं और उनका साथ देने के लिए सदा तैयार रहते हैं। यही उन लोगों की एक ऐसी विशेषता होती है जिसके कारण वे संसार में पूजनीय बन जाते हैं।
           इसके विपरीत ईर्ष्या, द्वेष आदि की फसल बोने वाले मनुष्यों को दुनिया से नफरत ही मिलती है। दूसरों का अहित करने वाले उन लोगों का साथ कोई भी पसन्द नहीं करता। लोग ऐसे नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों को छोड़ देने में जरा भी देर नहीं करते। ऐसे लोग धीरे-धीरे समाज से काट दिए जाते हैं। फिर वे अकेले होने लगते हैं।
           दूसरों को दुख देकर खुश होने वाले अपने जीवन में कभी भी सुख नहीं प्राप्त कर सकते। कभी-न-कभी तो उन लोगों का अन्तस् उन्हें झकझोरता ही है कि सारा जीवन उन्होंने षडयन्त्र करते हुए बिता दिया है। अपने जीवन के अन्तिम समय में जब उनका कोई भी सहायक नहीं बनता तब उन्हें इस बात का अहसास होता है। उस समय प्रायश्चित करने से भी कुछ हल नहीं निकल पाता। जो हानि हो जाती है, उसे फिर बदल पाना सम्भव नहीं हो सकता।
           जिस प्रकार कमान से निकला हुआ तीर वापिस नहीं आता, उसी प्रकार उन कुविचार रखने वालों की भी स्थिति होती है। सुख और दुख तो मनुष्य के पास उसके जीवन में कर्मभोग फल होते हैं जिन्हें भोगे बिना उनसे छुटकारा सम्भव नहीं होता। बड़े दुख की बात है कि कुछ लोग उस स्थिति में भी अपना हित साधने में लगे रहते हैं। शायद उन्हें कोई डर नहीं बताता। 
            मनीषी जन मानते हैं कि दुख और कष्ट भगवान की बनाई हुई ऐसी प्रयोगशाला हैं जहाँ मनुष्य की योग्यता और आत्मविश्वास को परखा जाता है। दुख-तकलीफ के समय मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को डिगने नहीं देना चाहिए बल्कि दृढ़तापूर्वक कुमार्ग का सहारा लिए बिना कष्टदायक समय को विनयपूर्वक ईश्वर की उपासना करते हुए और स्वाध्याय करते हुए गुजर जाने देना चाहिए जैसे तूफान आने पर पेड़ झुककर अपने ऊपर से उसे गुजर जाने देते हैं। मनुष्य दुखों की अग्नि में तपकर ही कुन्दन बनकर उभरता है।
            यह बात हर व्यक्ति को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुख भोगने वाला समय बीतने के बाद आगे जाकर मनुष्य फिर से सुखी हो जाता है परन्तु दूसरों को दुख देने वाला मनुष्य अपने जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकता। दुखी व्यक्ति के मन से निकलने वाली हाय उसे कभी चैन से नहीं बैठने देती। कबीरदास जी के निम्न दोहे को भी झुठलाया नहीं जा सकता -
       जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
     तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं तिरसूल॥
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति आपके जीवन में कष्ट उत्पन्न करता है तो आप प्रतिशोध लेने के बजाय उसके साथ प्यार और विनम्रता का व्यवहार करें। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रास्ते में काँटे बोने वालों के लिए अपनी ओर से फूल बोने चाहिए। कबीरदास जी का कहना है कि तुम्हें इस नेक कार्य के बदले फूल मिलेंगे और उसे काँटे मिलेंगे। मनीषी इसीलिए समझाते हैं -
          जैसा करोगे वैसा भरोगे
                  अथवा 
         जैसी करनी वैसी भरनी
 इसके अतिरिक्त भी कहते हैं-
      बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाए।
अर्थात् इन उक्तियों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, उसके बदले में वैसा ही पाता है। बबूल का पेड़ बोकर आम के फल की आशा करना व्यर्थ है। 
           दूसरों को कष्ट की सौगात देने वालों को रिटर्न गिफ्ट में कष्ट और परेशानियाँ ही मिलेंगी। इसके विपरीत अपने जीवन में दूसरों को खुशियाँ बाँटने वालों को बदले में खुशियाँ ही मिलती हैं। इस सत्य को अपने जीवन में ढाल लेना चाहिए।
            एक सज्जन व्यक्ति और एक दुर्जन व्यक्ति की वैचारिकता में यही अन्तर होता है। दुर्जनों के चेहरे पर कठोरता का तथा मन में क्रूरता का भाव होता है और सज्जनों के चेहरे व हृदय में सरलता का भाव होता है।
          सार रूप में हम कह सकते हैं कि दूसरों को कष्ट की भट्टी में धकेलकर उनके शत्रु बनने के स्थान पर वास्तव में हमें उनके आँसू पौंछने वाला एक सच्चा मददगार बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत हर मनुष्य को होती है। इसीलिए वह अपने व्यक्तित्व को निखारने में जुटा रहता है। हर प्रकार के उपाय करता है। विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करता है। यह रंग-रूप मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिलता है। उसमें उसकी मर्जी शामिल नहीं होती। वह चाहकर भी अपनी इच्छानुसार अपने शरीर को नहीं बना सकता।
         एक आकर्षक व्यक्तित्व का अर्थ मात्र सुन्दर दिखना नहीं होता। यह शारीरिक हाव-भाव, संवाद कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सकारात्मक सम्बन्ध बनाने की क्षमता का समग्र मिश्रण होता है। मनुष्य की ऊर्जा और व्यवहार उसके बोलने से पहले ही उसका परिचय करा सकते हैं जिससे हर बातचीत का माहौल तय हो जाता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, सक्रिय रूप से सुनने की क्षमता, मुस्कान और अपनी गलतियों को स्वीकार करने के साहस से यह निर्मित होता है। इसकी व्यक्तिगत और पेशेवर सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यकता होती है। 
           यद्यपि कुछ लोग शरीरिक दोषों को सुधारने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं परन्तु वह तो कोई स्थायी हल नहीं है। केवल शारीरिक सौन्दर्य के कारण मनुष्य इठलाता फिरता है। उसे इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ये रूप-सौन्दर्य क्षणिक होता है। कहने का तात्पर्य है यह कि सुन्दरता नश्वर है, अनश्वर नहीं। 
           रोग से आक्रान्त होने पर शरीर बदसूरत हो सकता है। आयु के एक पड़ाव पर शरीर पर झुरियाँ आ जाने से उसका वह रूप खो जाता है जिस पर वह गर्व करता है। इससे भी बढ़कर किसी रोग के कारण भी शरीर बेडौल हो सकता है। इसमें अपना कोई दोष न होते हुए भी तब वह दूसरों से नजरें चुराने लगता है।
            इसलिए मात्र शरीर के सौन्दर्य को देखने के स्थान पर मनुष्य की आन्तरिक सुन्दरता परखी जानी चाहिए। अपने ज्ञान, अपनी योग्यता के बल पर अग्रणी रहने वाले व्यक्तित्व देश अथवा विदेश सर्वत्र पूजनीय होते है। वास्तव में सुदर्शन व्यक्तित्व उन्हीं लोगों का ही माना जाता है और वही समाज के प्रेरणास्त्रोत और आदर्श होते हैं।
            इस महत्त्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचने के लिए वे समय रहते अथक परिश्रम करके ज्ञानार्जन करते रहते हैं। फिर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन होते हैं। बहुत से लोग उनके सज्जन और दुश्मन बन जाते हैं। उनकी योग्यता की परख करने वाले उनके मित्र बनते हैं।
            इसके विपरीत उनकी उन्नति से ईर्ष्या करने वाले उनके साथ अपनी शत्रुता निभाते हैं। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने जीवन में वे स्वयं तो कुछ नहीं कर पाते यानी असफल रहते हैं। इसलिए उच्च पदासीन मेधावी लोगों की ओर देखकर, उनकी बुराई करके चर्चा में बने रहने के लिए अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। अन्यथा इन बुरे लोगों की ओर किसका ध्यान जाएगा? 
             ये लोग फलदायी वृक्ष की भाँति होते हैं जिनका संसर्ग पाकर हर व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ समझता है। फलों से लदे हुए वृक्षों पर लोग पत्थर फैंककर मारते हैं और स्वादिष्ट फल खाकर आनन्द लेते हैं। इन पर कटाक्ष करने वाले उन लोगों को छोड़कर अन्य बुद्धमान इनसे मार्गदर्शन रूपी मधुर फल को पाकर लोग लाभान्वित होते हैं।
           दुष्ट लोग सूखे पेड़ की तरह होते हैं। ठूँठ बने वृक्ष जरा-सी चिन्गारी गिर जाने जल जाते हैं। इसी तरह वे दुर्जन सफल लोगों से केवल ईर्ष्या ही करके अपने आप को जलाने का कार्य करते हैं। जैसे उन सूखे वृक्षों पर पत्थर मारने का कोई लाभ नहीं होता, उनसे न फल मिलते हैं और न ही छाया। उसी प्रकार इनकी संगति में लाभ न के बराबर मिलता है पर हानि अधिक होती है।
           मनुष्य को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति दयालु व सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। सक्रिय रूप से दूसरों की बातें सुनने की क्षमता होनी चाहिए और समझना चाहिए कि केवल अपने बोलने पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य को विनम्रता से बात करनी चाहिए, शालीन रहना चाहिए और मुस्कुराते रहना चाहिए। मनुष्य को अपनी स्वच्छता, पहनावे और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अपने काम के प्रति उत्साहित रहना चाहिए। मनुष्य के मन में निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।
            हर मनुष्य को उसके जीवन काल में अपने आप को साबित करने का एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस अवसर का लाभ उठा लेते हैं वे अपने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा लेते हैं। उस अवसर को किसी भी कारण से चूकने वाले रेस में पिछड़कर आयु पर्यन्त नाकामयाबी का कलंक ढोते हैं। हर व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह अपने व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

परिवार की एकसूत्रता

परिवार की एकसूत्रता

परिवार जब तक एकसूत्र में बॅंधा रहता है तब तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी टिक नहीं सकता। कोई भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी लोग उस परिवार की एकता से घबराते हैं। उस समय उसमें सेंध लगा पाना बहुत कठिन होता है। दूसरे लोगों को पता होता है कि यदि वे इस परिवार का किसी भी प्रकार अहित करना चाहेंगे तो सभी परिवारी जन उन पर टूट पड़ेंगे। तब उनका वहॉं से बचकर निकलना बहुत कठिन हो जाएगा।
            इसके विपरीत परिवार के टूटकर बिखरते ही स्वार्थी लोगों की बन आती है। वे उन सभी को अलग-अलग बहला-फुसलाकर अपना हित साधने में जुट जाते हैं। इसके लिए वे उन सबको हानि पहुँचाने से बाज नहीं आते। इसलिए वे नए-नए तरीके खोजने‌ लगते हैं। इस प्रकार कभी-न-कभी वे उनके चंगुल में फंसे जातै हैं और अनावश्यक ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर बैठते हैं। जिसका बाद में उन्हें पश्चाताप भी होता है।‌ परन्तु जब हानि हो जाती है तो उसके बाद उसका कोई लाभ नहीं होता।
           इसी विषय में एक दृष्टान्त देखते हैं। किसी समय में एक व्यक्ति के चार बेटे थे। उसे सभी भाग्यशाली मानते थे। वह अपने बच्चों के नित्य के लड़ाई-झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। समय बीतते जब वह मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी तब वह उदास हो गया। तब उस मरणासन्न अवस्था में भी बच्चों के आपसी व्यवहार के कारण उसे चैन नहीं मिल रहा था। उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा, "जाओ, जाकर कुछ लकड़ियाँ लेकर आओ।" 
            चारों बेटे पिता के आदेश के अनुसार ही लकड़ियाँ लेकर उपस्थित हो गए। उन्होंने पूछा, "पिताजी, इन लकड़ियों का क्या करना है?"
           पिता ने उनसे कहा, "इन लकड़ियों को तोड़ दो।"
             वे लोगबहुत ही सरलता से वे उन्हें तोड़ने लगे। तब पिता ने उन चारों बेटों से कहा, "इन सारी लकड़ियों का एक गट्ठर बना दो।"
            बच्चों ने पिता के आदेश का पालन किया और उन लकड़ियों का एक गट्ठर बना दिया। पिता ने उनसे कहा, "अब इस गट्ठर को तोड़ दो।"
           चारों बेटों ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उस गट्ठर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए।
           उस समय पिता ने चारों को समझाया और मिल-जुलकर रहने के लाभ बताते हुए कहा, "यदि तुम चारों  भाई मिल-जुलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हारा अहित करने के लिए तुम लोगों में फूट नहीं डाल सकता। जब तक वे चारों एक बॅंधी हुई मुट्ठी की तरह रहेंगे तो दूसरे उनका बुरा करने के लिए दस बार सोचेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि चारों मिलकर उसे परास्त कर देंगे।यदि वे चारों जीवन में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो दूसरे इस बात का लाभ उठाएँगे।"
           बच्चों को यह बात समझ आ गई और तब उन्होंने अपने पिता को वचन दिया कि वे भविष्य में मिलकर रहेंगे।
          इसी प्रकार जब तक झाडू एक सूत्र में बॅंधी रहती है तब तक वह कचरा साफ करती है। परन्तु जब वही झाडू सूत्र के टूट जाने से बिखर जाती है तब खुद ही कचरा बन जाती है। उस समय उस अनावश्यक कचरे को उठाकर लोग कूड़ेदान में फैंक देते हैं। यानी वही बिखरे तिनके सबके लिए असह्य हो जाते हैं।
          इसलिए हमें हमेशा परिवार में एक मुट्ठी की तरह बॅंधकर, मिल-जुलकर रहना चाहिए। आपसी द्वन्द्वों के कारण बिखरकर दूसरों की नजर में आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला शिकार बनने से बचना चाहिए। इसी में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा होती है।
         अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। यह मानना चाहिए कि परिवार का हित साधने में ही सबका भला होता है। मन की शुद्धता के लिए लोग सप्ताह के किसी भी दिन उपवास रखते हैं और अन्न का त्याग करते हैं। होना यही चाहिए कि अपने मन की शुद्धि के लिए अपने परिवार को तोड़ने वाले कुविचारों का त्याग करके उसे तोड़ने के स्थान पर जोड़कर रखने का यत्न करना चाहिए। 
          परिवारी जनों के प्रति मन से ईर्ष्या और द्वेष के भावों को दूर करके अपने हृदय को सरल और सहज बनाना चाहिए। सभी सदस्यों को अपने अहं का बलिदान करके परिवार की एकजुटता को बनाए रखना चाहिए। इससे बुजुर्गों और बच्चों में होने वाली अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है। अत: अपने परिवार हितों को सर्वोपरि मानते हुए थोड़ा-सा धैर्य रखना चाहिए। इसके लिए विवेकी बनकर यदि अपने स्वार्थों की बलि भी देनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

भौतिक पूॅंजी के साथ सुविचारों की पूॅंजी बढ़ाऍं

भौतिक पूँजी के साथ सुविचारों की पूँजी बढ़ाऍं

मनुष्य जीवन भर अपनी पूँजी बढ़ाने की फिराक में रहता है। ऐसा कोई अवसर नहीं चूकता जिससे उसकी पूँजी में बढ़ोत्तरी हो सके और उसका धन दिन-प्रतिदन द्विगुणित होता रहे। इसके लिए अपने धन को बैक में फिक्सड कराता है, स्वर्ण आदि के बाँड खरीदता है, उसे शेयर मार्किट में लगाता है, नए व्यापार में उसे इन्वेस्ट करता है। और भी न जाने क्या-क्या उपाय अपने जीवन काल में करता रहता है?
    मनुष्य हर हाल में दूसरों से आगे निकलकर विजयी कहलाना चाहता है। इसके लिए घर-परिवार की परवाह किए बिना दिन-रात का सुख-चैन होम कर देता है। माता-पिता, पत्नी-बच्चों, बन्धु-बान्धवों तक सबको भुलाकर पूँजी को बढ़ाने के लिए अपने एकसूत्री मिशन पर आगे-आगे बढ़ता ही जाता है। तब उसके पास पीछे मुड़कर देखने के लिए भी कोई समय नहीं होता।
      उस संघर्ष काल में उसका अपना समय भी उसके हाथ से फिसल जाता है। उसके जीवन में फिर एक समय भी ऐसा आ जाता है जब अथक परिश्रम से कमाई हुई मनचाही दौलत उसके पास एकत्र हो जाती है पर अपनों का साथ छूट जाता है। तब वह हैरान रह जाता है और पश्चाताप करता है कि यह उसने क्या कर डाला? उसके हाथ में उस समय कुछ भी नहीं बच पाता। वह मानो खाली हाथ रहकर दूसरों का मुँह ताकता रह जाता है।
      उस भागमभाग में वह इस सत्य को भी भूल जाता है कि उसकी वास्तविक पूँजी उसके अपने बन्धु-बान्धव हैं। उनसे भी बढ़कर उसके अपने सद् विचार हैं, उसकी नेक करनी है। धन-दौलत और ऐश्वर्य तो सब इस लोक की कमाई है जो परलोक में उसके साथ नहीं जाते। जहाँ आँखे बन्द हुईं सब कुछ मानो समाप्त हो जाता है। उसके सत्कर्म और उसके विचार रूपी पूँजी जन्म-जन्मान्तरों तक उसके साथ रहती है। उन्हीं के अनुसार ही मृत्यु के पश्चात उसे पुनर्जन्म मिलता है।
      जैसे-जैसे कर्म मनुष्य करता रहता है वैसा-ही-वैसा फल उसे मिलता है। न उससे कम और न उससे ज्यादा। ईश्वर के न्याय में किसी प्रकार की हेराफेरी अथवा भाई-भतीजा वाद नहीं होता। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। इसलिए वहाँ पर बस केवल फेयर गेम होती है।
      इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह धन-वैभव मोहिनी माया है। वह आज एक के पास है तो कल दूसरे के पास चली जाती है। उसके लिए राजा और रंक सब एक समान हैं। आज पैसा जेब से निकालो तो वह दूसरे की जेब में चला जाता है और उसकी पूँजी को बढ़ाता है।
      इसलिए मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन न होकर उसके अपने विचार होते हैं। धन तो खरीददारी करते समय दूसरों के पास चला जाता है। उसके सद् विचार तब तक उसका साथ नहीं छोड़ते जब तक वह स्वयं कुमार्ग पर चलने के लिए उन्हें न छोड़ दे। ये उसके अपने पास उसकी जमा पूँजी बनकर ही रहते हैं। यह पूँजी केवल इसी जन्म में शेष नहीं रह जाती बल्कि जन्म-जन्मान्तरों में कमाई हुई पूँजी के जुड़कर उसमें वृद्धि करती है। इस तरह हमारे सद् विचार हमारी आध्यात्मिक उन्नति करते हुए हमें महान बनाते हैं।
      ज्यों ज्यों वह अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करके, सज्जनो की संगति करके और ईश्वर की आराधना करके उनका संचय करता जाता है, त्यों त्यों वे उसे आम साधारण जन से ऊपर उठाकर महामानव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं। फिर वह समाज में शिरोमणि पद प्राप्त कर लेता है। दुनिया उसके पीछे चलती है। 
      अत: अपनी भौतिक पूँजी अवश्य बढ़ाइए पर साथ ही अपने सुविचारों की पूँजी बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 12 अप्रैल 2026

ईश्वर वहीं देता है जो हमारे लिए अच्छा है

ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा है 

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। उसे हम लोगों की यह साधारण बुद्धि नहीं समझ सकती। पता नहीं उसके कितने हाथ हैं जो पूरे संसार के असंख्य जीवों को झोली भर-भरकर देता है। यानी छप्पर फाड़कर देता है। जब लेने पर आता है तो घर के दाने भी बिक जाते हैं।
          वह परम न्यायकारी है। किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। उसकी अदालत में जो फैसले किए जाते हैं, उनकी अन्यत्र कहीं सुनवाई नहीं होती। सत्कर्म करने वालों को वह हर तरह से मालामाल कर देता है। दुष्कर्म करने वालों को माफ नहीं करता।उन्हें दुखों और तकलीफों में तपाकर कुन्दन बनाता है। इसीलिए उसकी लाठी की आवाज नहीं होती।
           वह बारबार हमें हर काम को करने से पहले चेतावनी अथवा प्रोत्साहन देता रहता है पर हम कानों में रुई डालकर बैठे रहते हैं। उसके समझाने अथवा इन्कार करने का हम लोगों पर कोई असर नहीं होता। तभी हम हर समय बौखलाए हुए से रहते हैं।
           एक बच्चा हर उस वस्तु के लिए अपने माता-पिता से जिद करता है जिसे वह अपने मित्र, पडौसी अथवा किसी दुकान पर देखता है। यह तो आवश्यक नहीं कि माता-पिता उसकी माँगी हुई सारी वस्तुएँ खरीद दें। कुछ ही वस्तुएँ वे उसे लेकर देते हैं शेष के लिए मन कर देते हैं या बहला देते हैं। वे वही वस्तुएँ उसे खरीदकर देते हैं जिनकी उसके जीवन के लिए वाकई उपयोगिता होती है।
           बच्चों की तरह हम लोगों को भी हर वह वस्तु चाहिए होती है जो दुनिया में किसी के भी पास होती है, चाहे उसकी हम आवश्यकता हो अथवा न हो। वह परम पिता परमेश्वर भी हमारी सारी जायज-नाजायज माँगों में से वही हमें देता है जो हमारे पूर्वजन्म कृत हमारे कर्मों के अनुसार हमें मिलनी चाहिए। उससे न कम और न ज्यादा। हम है कि अनावश्यक हठ करते हुए परेशान रहते हैं।
         ईश्वर वह कभी नहीं देता जो हम सबको अच्छा लगता है। हमारा क्या है? हमें हर चीज अच्छी लगती है। मनुष्य का वश चले तो वह चाँद को लाकर अपनी दीवार पर सजा ले। सूर्य के प्रकाश को अपने घर में कैद करके उसे आगे न जाने दे। बाकी सारी दुनिया चाहे अंधेरे में ठोकरें खाती रहे। इसी तरह नदियों का सारा पानी भी किसी को न लेने दे। यानि सारी प्रकृति पर अपनी सत्ता कायम कर ले। वह स्वार्थी बनकर दूसरे के मुँह में जाता हुआ निवाला भी छीनकर खा ले और उसे भूखा मरने के लिए छोड़ दे।
            ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। हमारी योग्यता और भाग्य के अनुसार ही वह हमें देता है। यदि हमारे भाग्य में नहीं हो तो वह किसी-न-किसी रूप से हमारे हाथ से निकल जाएगा। जैसे बन्दर के गले में मोतियों का मूल्यवान् हार डाल दिया जाए तो वह उसे तोड़कर फैंक देगा। उसी प्रकार हम सभी अज्ञ मनुष्य अपनी मूर्खताओं के कारण उस मालिक द्वारा प्रदत्त नेमतों का लाभ नहीं उठा पाते। अपने दुर्भाग्य के कारण उन्हें व्यर्थ गंवा देते हैं।
          यहाँ मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक लकड़हारे की ईमानदारी और उपकार पर प्रसन्न होकर राजा ने उपहार स्वरूप उसे चन्दन का वन दे दिया। उस मूर्ख को उस चन्दन का मूल्य ही ज्ञात नहीं था। इसलिए अमूल्य चन्दन भी उसके भाग्य को नहीं पलट सका। यानि उसकी गरीबी को दूर करने में सफल नहीं हो सका। वह वहीं-का-वहीं रह गया। जब राजा को उसकी मूर्खता का पता चला तो उसने माथा पीट लिया।
            यह उसकी दयानतदारी है जो हमें जीवन में मायूस नहीं करता। वह बिना माँगे नित्य ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। यह हमारी सूझबूझ पर निर्भर करता है कि हम अपनी झोली में मालिक के द्वारा दिया गया कितना खजाना समेट सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद