शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा एक प्रकार का दृष्टि भ्रम होता है। दूर या रेगिस्तान में पानी होने का आभास होता है परन्तु वास्तव में वहॉं पानी नहीं होता है। यह गर्म दिनों में प्रकाश के अपवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। जहाँ जमीन के पास की गर्म हवा प्रकाश की किरणों को मोड़ देती है और आकाश का प्रतिबिम्ब जमीन पर दिखने लगता है, उसे पानी समझ लिया जाता है।वास्तव में मृग का अर्थ हिरण और तृष्णा का अर्थ प्यास होता है। यह उस मिथ्या विश्वास को दर्शाता है कि प्यासा हिरण पानी समझकर चकाचौंध वाली रेत के पीछे भागता है।
             जीवन में किसी ऐसी चीज की खोज करना या चाहना जो वास्तव में वहॉं होती नहीं है या जिसे प्राप्त करना नामुमकिन है। मृगतृष्णा के पीछे मनुष्य आखिर कब तक भागता रहेगा। इस भटकन का कहीं कोई अन्त तो होना चाहिए न। सीमित समय के लिए मिले इस मानव जीवन को मनुष्य मानो रेस में भागते हुए बिता देता है। अपना सारा सुख-चैन गँवाकर भी यदि उसे शान्ति मिल जाए तब गनीमत समझो। 
              वह न्यायकारी परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं करता। वह ईश्वर चींटी जैसे छोटे से जीव से लेकर हाथी जैसे बड़े, हर जीव के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। मनुष्य को भी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार बिन माँगे ही सब दे देता है। ज्ञानी जन कहते हैं-  
           जिसने यह जीवन दिया है,
           भोजन की व्यवस्था भी वही करेगा।
          जीवन चलाने के लिए आवश्यक साधनों को मनुष्य सरलता से जुटा सकता है। परन्तु जब महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर उठाने लगती हैं, तब समस्याएँ मुस्कुराती हुई उसे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। उस समय मनुष्य उन असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। दिन-रात एक करता हुआ जी-तोड़ मेहनत करता है। इस पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे सदा ही सफलता मिल जाएगी।
            जिनके लिए वह ये सब यत्न करता है वे तो उसे अपनी इच्छा पूर्ति का एक साधन मात्र समझने लगते हैं। जब तक उनकी जरूरतें वह पूरी करता रहेगा तब तक तो उसके बराबर उनका और कोई प्रिय नहीं होता है। सभी उसकी प्रशंसा करेंगे और मिन्नत-चिरौरी भी करेंगे। 
               इसके विपरीत जब मनुष्य दूसरों की आकाँक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता तब उससे बुरा और कोई नहीं होता। सबसे अधिक उसका बुरा तब होता है जब उसे नालायक और कामचोर कहकर अपमानित किया जाता है। उसके नाम के आगे एक असफल या नाकामयाब व्यक्ति होने का ठप्पा लग जाता है। फिर वह कितनी भी कोशिश कर ले स्थितियों को सुधारने में वह सफल नहीं हो पाता।
              एक के बाद एक भौतिक वस्तुओं को जुटाने की फिराक में भागता हुआ मनुष्य इतनी दूर निकल जाता है कि उसका सब कुछ छूटता चला जाता है। जब पीछे की ओर मुड़कर देखता है तब वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। फिर चाहकर भी अपनों के बीच नहीं जा पाता। यही वह समय होता है जब मनुष्य जीवन के उस मोड़ पर पहुँच जाता है जहाँ उसे अपनों के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए वह अशक्त होने लगता है। उस वक्त उसे अपनों के सशक्त कन्धों की जरूरत स्वाभाविक रूप से होती है।
             यही उसके सन्ताप का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। उस समय वह बस कलपता है, अपना मन मसोसकर रह जाता है कि जिनके लिए सारा जीवन भागदौड़ की, अपना सुख-चैन खो दिया, इससे भी बढ़कर स्वयं को भी भूल गया, वही नजरें मिलाकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। उससे कहीं दूर बेगानों की तरह हो गए हैं। उस स्थिति में भी इन्सान चेत जाए तब भी अच्छा है। एकाकी बैठकर आत्मचिन्तन करने पर ही समझ आती है कि अपने इस जीवन में क्या खोया और क्या पाया? मनुष्य जब तक खोये-पाये का लेखा-जोखा सुलझाता है तब तक इस संसार को अलविदा कहने का उसका समय आ जाता है।
                मनुष्य को अपनी असीम इच्छाओं को कुछ हद तक सीमित करना चाहिए। अनावश्यक ऐष्णाओं के पीछे भागने से कोई हल नहीं निकलने वाला। जितने भोगों को एकत्र करते जाओ, उतना ही मानसिक सन्ताप बढ़ता जाता है। इसलिए मृगतृष्णा के इस मायाजाल से यथासम्भव बचते हुए अपने जीवन में सुखोपभोग करना चाहिए अन्यथा इसके चंगुल से बच निकलना असम्भव तो नहीं बहुत ही कठिन अवश्य हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जिजीविषा

जिजीविषा

जिजीविषा एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ होता है जीने की प्रबल इच्छा अथवा जीवन के प्रति गहरा लगाव होता है। जीवन जीने की चाह, जीवन जीने की कला अथवा दीर्घायु की महत्वाकांक्षा। यह शब्द उस मानवीय जजबे को व्यक्त करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को न छोड़ने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन जीने की तीव्र लालसा, उत्साह और जीवटता को दर्शाता है।
            जिजीविषा शब्द का प्रयोग प्रायः उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह शब्द दर्शाता है कि मनुष्य अपने जीवन से कितना प्यार करता है और उसे बनाए रखने के लिए उसमें कितनी अदम्य इच्छाशक्ति है। जिजीविषा का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
            जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती तो वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े,  दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर प्रतिदिन ईश्वर से मृत्यु की कामना करता है। उसकी स्थिति को देखते हुए उसकी मनःस्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं।
           यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात लगती है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे मनुष्य के रूप में अवतरित हुए तब उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बस बैठा-बैठा कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
              जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ होना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह व्यक्ति मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई दे जाती हैं।
            हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी मनुष्य का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
             मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य या विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
          ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है। इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उबर जाता है। उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
            हम देखते हैं कि प्रकृति में भी जिजीविषा होती है। तभी सूखे और ठूॅंठ हो चुके पेड़ों में भी हरियाली देखी जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य की जिजीविषा असम्भव को भी सम्भव बना देती है। जिजीविषा मानव मन की अद्भुत शक्ति का प्रतीक होती है जो हमें हर परिस्थिति में जीवन को अपनाने और उसका जश्न मनाने की प्रेरणा देती है।
           कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे बिना डगमगाए खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही मनुष्य आकाश की बुलन्दियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

अग्नि का गुण

अग्नि का गुण

अग्नि का स्वाभाविक गुण जलाना होता है। हम इसे छू नहीं सकते। हम जानते हैं कि यदि इस पर हाथ रखेंगे तो वह जल जाएगा और तब हाथ पर फफोले पड़ जाऍंगे। फिर बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा। अग्नि का मुख्य गुण रूपान्तरण होता है जो उष्णता, तेज और प्रकाश प्रदान करना है। यह पंचतत्वों में से एक है। यह गर्म करने, पचाने और किसी भी पदार्थ को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। इसके अन्य गुणों में तीक्ष्णता, गतिशीलता, शुष्कता, हल्कापन और प्रकाश फैलाना शामिल है जो शारीरिक व मानसिक दोनों स्तरों पर क्रियाशील हैं। 
          अग्नि से हमारा जीवन चलता है। हम हर प्रकार के अन्न को इसी के माध्यम से पकाकर खाते हैं और स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं। यदि यह अग्नि न होती तो हम आज भी आदि मानव की तरह पेड़ों से तोड़कर सब कच्चा ही खाते। इसी अग्नि के कारण हम जीवन में सभी प्रकार की सुख और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। हमारे घर और बाहर हर ओर रौशनी होती है।
             अग्नि तीन प्रकार की मानी जाती है- दावानल, बड़वानल और जठराग्नि। दावानल जंगल में लगने वाली आग को कहते हैं जो जरा-सी हवा चलने पर बड़े-बड़े जगलों को जलाकर राख कर देती है। उसमें बड़े-बड़े वृक्ष, पशु और पक्षी जलकर खाक हो जाते हैं। बड़वानल समुद्र में लगने वाली आग को कहते हैं। पानी की यही आग है जिससे हम बिजली बनाते हैं और अपने जीवन में सारी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं।
           जठराग्नि मनुष्य के शरीर में होती है। यह भोजन को अच्छे से पचाने में सहायता करती है। शरीर की अग्नि जब सुचारू रूप से काम करती है तब मनुष्य के चेहरे पर तेज चमकता है उसकी रौनक ही अलग दिखाई देती है। युवावस्था में प्राय: लोगों के चेहरों पर हम देख सकते हैं। अपने जीवन को संयमित रखने वालों के चेहरों पर तेज हमेशा दिखाई देता है।
           शरीर में जठराग्नि सही स्थिति, मन की स्पष्टता, तीक्ष्ण बुद्धि और साहस प्रदान करती है।यदि यह अग्नि शरीर में बढ़ जाए तो बहुत-सी परेशानियों को जन्म देती है। मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है। पसीना भी बहुत अधिक आने लगता है। एसिडिटी और रक्त सम्बन्धी दोष शरीर में हो जाते हैं। शरीर में जलन होने लगती है। जरा-सी ठण्ड लग जाने पर खाँसी-जुकाम जैसी परेशानी हो जाती है। बारबार छींकते रहना पड़ता है। आवाज भारी हो जाती है और गला बैठने लगता है। 
            यदि शरीर की अग्नि मन्द हो जाती है तो मनुष्य का चेहरा कान्तिहीन हो जाता है। उस समय उसे बहुत से रोग घेर लेते हैं। उसकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे उसका भोजन पच नहीं पाता। पेट की बहुत-सी बिमारियों से मनुष्य घिर जाता है। पेट खराब हो जाने से खाने-पीने में परहेज करना पड़ता है।
            कभी घरों, बाजारों या फैक्टरियों आदि में आग लग जाए तो कितना नुकसान कर देगी पता नहीं। न जाने कितने ही लोगों की जान भी चली जाती है। यह अग्नि किसी को भी क्षमा नहीं करती जो इसमें घिर जाता है, वह फिर भस्म हो जाता है। परन्तु जब यह अग्नि तेजहीन होकर बुझ जाती है तो चींटियाँ भी इस पर चलने लगती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब रोगों से घिर जाता है तो वह भी तेजहीन हो जाता है। उसका चेहरा पीला या सफेद पड़ जाता है। उस समय वह सामर्थ्यहीन होकर ईश्वर से अपनी मृत्यु की गुहार लगाता है।
              अग्नि के प्रभाव से विभिन्न पदार्थ रूप परिवर्तित करते हैं। अग्नि हमेशा ही शुद्ध होती है। इसमें कैसा भी कचरा डाल दो, वह उसे भस्म कर देती है। इसी अग्नि में ही हम शव का दाह संस्कार भी करते हैं। किसी वस्तु अथवा विचार की शुद्धता की परीक्षा अग्नि में तपने के बाद ही होती है। यह रूक्ष होती है। अग्नि संयोग और वियोग दोनों का ही कारण भी होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम का आधार अग्नि तत्त्व होता है। इसी के कारण सृष्टि की सर्जना होती है। इसके मन्द पड़ जाने पर अलगाव की स्थिति बन जाती है।
            अग्नि का सबसे महत्वपूर्ण गुण भोजन, भावनाओं और विचारों को पचाकर उन्हें ऊर्जा में रूपान्तरित करना है। यह शरीर को पोषक तत्व अवशोषित करने में सहायता करती है। शारीरिक क्रियाओं को यह तेज और सुचारू बनाती है।अग्नि तीखी और तेज होती है जो बहुत तेजी से जल सकती है या धीमी गति से भी सुलग सकती है। अग्नि अपने सम्पर्क में आने वाली हर वस्तु को अपने में समाहित करने, भस्म करने या पवित्र करने का गुण रखती है।
            अग्नि का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व भी है। वेदों में अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है जो यज्ञ, हवन के द्वारा को विभिन्न देवताओं का भाग उन तक पहुँचाती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में इसके असन्तुलित हो जाने पर अग्नि विषमाग्नि यानी कभी तेज, कभी धीमी हो जाती है। कभी यह तीक्ष्णाग्नि यानी बहुत तेज हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में यह मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। 
            अग्नि हर स्थान पर अपनी शुद्धता को दर्शाती है। इसके होने पर तेज, प्रकाश और ताप से ही इस सृष्टि का जीवन है। इसके न होने पर चारों ओर अन्धकार तथा शीत का प्रकोप हो जाएगा जिसके कारण इस जीव जगत का अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वायु का प्रकोप

वायु का प्रकोप

वायु के प्रकोप पर हम चर्चा करते हैं। वैसे तो वायु हमारी जीवनी शक्ति है। इसके बिना हम एक पल भी नहीं रह सकते। यदि वायु के कुछ पल के लिए न होने की स्थिति में सब समाप्त हो जाता है, ब्रह्माण्ड में कुछ भी शेष नहीं बचता। वायु जहाँ हमें सुख देती है वहीं बहुत सारे कष्ट भी देती है चाहे वह हमारे शरीर के अन्दर की वायु हो अथवा ब्रह्माण्डीय वायु हो। इसके साथ की गई छेड़छाड़ हमें हमेशा बहुत मंहगी पड़ती है। फिर भी हम नहीं सुधरते, इसे दूषित करने का दुस्साहस करते हैं।
          वायु शरीर रूपी यन्त्र और शरीर के अव्ययों को धारण करती है। इस वायु का गुण सुखाना होता है। यह शरीर में रुक्षता पैदा करती है। यही वायु मन को भी चंचल बनाती है। शरीर से जब प्राणवायु निकल जाती है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है अर्थात मृत हो जाता है। इसे अग्नि को समर्पित करने में हम शीघ्रता करते हैं। कुछ समय के लिए इस शरीर को घर में नहीं रख सकते। यदि कुछ दिनों तक शरीर को सम्हालकर रखने का प्रयास किया जाए तो चारों ओर वातावरण में दुर्गन्ध आने लगती है। इससे बिमारियॉं फैलने का डर बढ़ जाता है।
           जब हमारे शरीर के भीतर की वायु बिगड़ने लगती है तब पेट में अफारा हो जाता है, पेट फूल जाता है। डकारें और पाद आने लगते हैं। अर्थात् ऊपर और नीचे से हवा निकलने लगती है। इस कारण कभी-कभी मनुष्य को हिचकियाँ आने लगती हैं। इसी प्रकार शरीर के अंग यानी हाथ, पैर और गर्दन आदि हिलने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो पार्किन्सन नामक रोग मनुष्य को हो जाता है। कुछ लोगों की आँख, कुछ के गाल और कुछ के होंठ भी चलने लगते हैं।
              इन सबसे भी अधिक कष्टकारी वह स्थिति होती है जब मनुष्य के शरीर में लकवा मार जाता है जिससे वह अपाहिज की तरह बिस्तर पर पड़ जाता है। स्वय कुछ भी नहीं कर पाता बल्कि वह दूसरों की कृपा का मोहताज हो जाता है। उस समय वह ईश्वर से अपने लिए मौत की गुहार लगता है। परन्तु समय से पहले उसे मौत भी नहीं आती। इस वायु के ही कारण मनुष्य को हृदय रोग तथा मस्तिष्क रोग भी होते हैं।
             प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर वायु बिगड़ जाती है जिसके कारण से झंझावात आते हैं। तब सब तहस-नहस होने लगता है। आँधी-तूफान बर्बादी मचाने लगते हैं। हर ओर प्रलंयकारी स्थिति बनने लगती है। ब्रह्माण्ड में वायु तब बिगड़ती है जब हम उसे प्रदूषित करते हैं। तब उसी प्रदूषित वायु का सेवन करने से हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। साँस की बिमारियाँ इसी प्रदूषित वायु का उपहार हैं। श्वास नली के कैंसर जैसे भयंकर रोगों तक की चपेट में आ जाते हैं।
             हमारे शरीर की वायु हो या हमारे ब्रह्माण्ड की वायु उन दोनों को दूषित करने के दोषी हम स्वयं हैं। गलत खान-पान का परिणाम होता है शरीर की वायु का दूषण जो समय-समय पर रोग के रूप में आकर हम लोगों को चेतावनी देती रहती है। पहले हम जीभ के चटोरेपन के कारण आवश्यकता से अधिक खा लेते हैं या फिर वे खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनका हमें परहेज करना चाहिए। उन्हें खाकर बीमार पड़ते हैं। हमें स्वास्थ्यवर्धक भोजन रुचिकर नहीं लगता। हम लोग जंक फूड अथवा अधिक तला-भुना भोजन खाकर प्रसन्न होते हैं, उसमें हमें अधिक स्वाद आता है। यही स्वाद हमारे शरीर को रोगी बना देता‌ है।
           हमारे गलत रहन-सहन का कारण होता है वायु प्रदूषण। हम अपने सुविधापूर्वक आवागमन के लिए विभिन्न प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण नित्य‌ प्रति वायुप्रदूषण बढ़ता रहता है। अपनी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए फैक्टरियाँ लगाते हैं जिनका धुँआ भी वायु को दूषित करता है। अपने घरों और दफ्तरों आदि को सुरक्षित करने और उन्हें सजाने तथा दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु कागज के लिए हम पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करते जाते हैं जो वायु को दूषित करने का प्रमुख कारण बन जाता है। इस प्रदूषित वायु से हम अनेक रोगों को आमन्त्रण दे बैठते हैं।
             इस प्रकार शरीर और वायुमण्डल दोनों ही प्रकार की वायु को दूषित करके हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। तब हम डाक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों बर्बाद करते हैं।इनके कुपित हो जाने के फलस्वरूप हम जीवन में कष्ट पाते हैं। ऋतुओं के क्रम को वायु ही बिगाड़ती है। इसी कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि का दंश हमें झेलना पड़ता है। तेज चलने वाले ऑंधी और तूफानों का हमें सामना करना पड़ता है। किसी स्थान विशेष पर लगने वाली आग अथवा‌ जंगल की आग को भी यही वायु भड़काती है। इससे कितने ही जान और माल की हमें हानि उठानी पड़ती है। 
              वायु का स्थान ईश्वर के समान है। यह अव्यय भी है और अविनाशी है। यही वायु प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का कारण बनती है। इस प्रकार वायु सुख और दुख का कारण होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

पल की खबर नहीं

पल की खबर नहीं 

पल की खबर नहीं कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व जन्म कृत कर्मों के अनुसार हम इस संसार में सीमित समय के लिए आए हैं। यहॉं से विदा होने के विषय में हम नहीं जानते। इसकी जानकारी तो केवल सृष्टि कर्ता ईश्वर को है, हम मनुष्यों को नहीं है। हम तो बस उस प्रभु के हाथ की कठपुतलियॉं हैं। जैसा वह चाहता है वैसा कार्य हम लोगों से करवा लेता‌ है। निम्न उक्ति हम सबने बहुत बार सुनी है और कहीं भी है -
          सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
यह उक्ति प्राय: हम सभी यदा-कदा दोहराते रहते हैं। परन्तु बड़े दुख की बात है कि जब इस पर आचरण करने का समय आता है तब हम सभी इसे भूल जाते हैं। हम अपने घर में एक के बाद एक सामानों के बिना सोचे-समझे अनावश्यक ढेर लगाते चले जाते हैं चाहे हमें उनकी आवश्यकता हो अथवा न हो। बस झूठे आत्मतोष के लिए अनावश्यक रूप से हम भटकते रहते हैं।
             कभी पड़ौसी की होड़ में लगकर तो कभी किसी नाते-रिश्तेदार की नकल में हम रेस लगा रहे हैं। यह तो वही बात हुई कि उसकी 'कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे?' पता नहीं यह अन्धी दौड़ कब तक और कहाँ तक जाकर रूकेगी? कोई भी किसी से छोटा नहीं कहलवाना चाहता। हमारे घर में दुनिया की हर चीज होनी चाहिए चाहे उसे खरीदने की हमारी हैसियत न हो या न हो। हमारे पास साधन हैं तो बहुत बढ़िया, नहीं तो हम कर्ज लेकर ही अपनी जिद पूरी कर लेना चाहते हैं। इसका परिणाम तो हम प्रतिदिन सड़क पर जाम के रूप में और बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के रूप में भोगते जा रहे हैं। फिर भी हम जाग नहीं रहे, बस मस्त हैं अपनी ही धुन में।
          अपने घर की ओर नजर दौड़ाइए जहाँ जगह ही नहीं हैं। घर की अल्मारियाँ कपड़ों से ठूँसी पड़ी हैं परन्तु हमारे पास किसी भी अवसर पर पहनने के लिए वस्त्र नहीं होते। क्राकरी सम्हाले नहीं सम्हल रही पर किसी के सामने हम उसमें सर्व नहीं कर सकते। घर के हमारे कमरे सामान रखते-रखते गोदाम की शक्ल के बनते जा रहे हैं। चलते समय शायद सामान से ठोकर ही लग जाती हो, उसकी हमें कोई चिन्ता नहीं होती। हम तो अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं।
               हम सब जानते हैं कि इस ससार में हम सीमित समय के लिए जन्म लेते हैं और फिर यहाँ से निश्चित जीवन व्यतीत करके, विदा लेकर अपने अगले पड़ाव के लिए चल पड़ते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच की इस दूरी को पार करते समय हम अपने लोभ और मोह के वशीभूत सब कर्म और कुकर्म करते चले जाते हैं। इस सत्य को हम भूल जाते हैं कि मृत्यु आने के बाद सब यहीं रह जाएगा। बस सदा अन्धाधुन्ध अनुकरण करते चले जाते हैं।
          कुछ महानुभाव ऐसे हैं जो जायज-नाजायज हर तरीके से धन कमाने में जुटे हुए हैं। वे कहते हैं हमारे पास इतना धन है कि हमारी सात पुश्तें बैठकर खा सकती हैं। फिर भी दूसरो का हक छीनने और गला दबाने में उन्हें कोई परहेज नहीं। वे लोग इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि यदि आज भूकम्प, बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आ जाएँ तो उनकी सारी लूट-खसौट धरी-की-धरी रह जाएगी। वह किसी काम नहीं आने वाली। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी के मन से निकलने वाली हाय कभी चैन नहीं लेने देती।
             जमाखोरी और हेराफेरी करने वाले लोग इतने हृदयहीन हो गए है कि जन साधारण के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए उन्हें ईश्वर से जरा भी डर नहीं लगता। बस पैसा और हाय पैसा यही उनके जीवन का मानो उद्देश्य रह गया है। समय आने पर यह पैसा भी काम नहीं आता। न यह स्वास्थ्य खरीद सकता है और न ही रिश्ते। ऐसे ही लोग एक समय आने पर निपट अकेले रह जाते हैं। उस समय पश्चाताप करते हैं पर तब तक सब साथ से निकल चुका होता है।
            आज वातावरण कुछ ऐसा दूषित होता जा रहा है कि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लूट-खसौट का बाजार बहुत गरम हो रहा है। हर शक्तिशाली कमजोर को दबाकर उसका सब हड़पना चाहता है। शायद सभी सोचते हैं कि वे पृथ्वी पर आ गए है तो यहाँ से कभी नहीं जाएँगे। उनका यह घमण्ड किस दिन टूट जाए कोई भी नहीं जानता। इस सबका परिणाम यह है कि इन्सान एक-दूसरे पर से अपना विश्वास खोता जा रहा है। हर एक को सन्देह की नजर से देखने लगा है। दया, ममता, सहनशीलता, करुणा, परोपकार आदि मानवोचित गुणों का ह्रास होता जा रहा है। 
            मनुष्य यदि यह याद रख सके कि वह सदा के लिए इस धरा पर रहने नहीं आया है तो शायद सौ बरस की जमाखोरी, हेराफेरी, चार सौ बीसी, रिश्वतखोरी की हवस कुछ कम हो जाए। इन्सान को हमेशा परमपिता से डरते रहना चाहिए। अपनी जरूरतों व इच्छाओं की पूर्ति मनुष्य को करनी चाहिए पर उन्हें अपने सिर पर सवार नहीं होने देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बाल हठ

बाल हठ 

सामान्यतः तीन प्रकार के हठ माने जाते हैं - बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ। त्रिया हठ और राज हठ की अपेक्षा बाल हठ को सबसे खतरनाक अथवा गम्भीर माना गया है। इसका कारण है कि बच्चों की जिद का परिणाम बहुत कष्टदायक होता है। बाल हठ का अर्थ है बच्चे की जिद या अपनी बात मनवाने के लिए अड़ जाना। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चा अक्सर अपनी जिद पूरी करवा ही लेता है। इसे ठिनक या हठधर्मिता भी कहा जाता है
             बाल हठ सबके लिए परेशानी का कारण बनता है। बच्चे प्राय: जिद करते हैं। वे किसी भी चीज को लेकर हठ कर सकते हैं। यदि उनकी जिद को पूरा न किया जाए तो वे फर्श पर लेट जाएँगे, चीखे-चिल्लाएँगे, तोड़-फोड़ करेंगे और घर में खूब शोर मचाएँगे। बच्चे के ऐसे व्यवहार से घर का वातावरण अशान्त हो जाता है। उनके ऐसा व्यवहार करने के उपरान्त यदि माता-पिता उनके हठ को मान लेते हैं तो समझ लीजिए कि बच्चा सौ प्रतिशत हठी बन जाएगा।
            इसके विपरीत यदि उसके ऐसे व्यवहार के बदले उसे थोड़ी देर के लिए उसी हालत में अकेला छोड़ दिया जाए तो उसे समझ आ जाएगा कि उसकी दाल नहीं गलने वाली। तब वह थक-हारकर स्वयं चुप हो जाएगा और माता-पिता को मनाने का यत्न करेगा। यदि बच्चा हठ करने लगे तब उसे प्यार से समझाइए अथवा कोई मजबूरी हो तो बताइए, वह अवश्य मान जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता कि वह फिर से कोई ऐसी माँग आपके सामने रखेगा कि आप इन्कार कर दें।
            आदर्श स्थिति यही है कि बच्चे के कुछ माँगने से पहले ही उसकी जरूरतों को पूरा कर दिया जाए। एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आप अपने लिए नित नई वस्तुएँ घर में लाएँगे और बच्चे की माँग पूरी नहीं करेंगे तो बच्चा आपको ताना देने से बाज नहीं आएगा। वह अवश्य कहेगा कि अपने लिए पैसे हैं, बस मेरे लिए ही पैसे खत्म हो जाते हैं। इसलिए बड़ों के लिए सावधानी और संयम दोनों ही बरतना बहुत आवश्यक है।
             इतिहास गवाह है कि दुनिया को झुकाने की सामर्थ्य रखने वाले बड़े-बड़े साम्राज्य तक बाल हठ के समक्ष हार जाते हैं। रामायण में एक प्रसंग आया है कि लव और कुश अपनी माता भगवती सीता को बताए बिना हठ ठान लेते हैं कि वे भगवान राम द्वारा छोड़े गए अश्वमेध के घोड़े को पकड़ेंगे। उन्होनें भगवान राम की चतुरंगिनी सेना की परवाह नहीं की और अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए उस अश्व को पकड़ लिया। उस समय उन दोनों के अदम्य साहस को अयोध्या की सारी शक्तिशाली सेना देखती रह गई।
             रामचरितमानस के अनुसार इसी प्रकार बाल हनुमान जी ने तो भगवान सूर्य को निगल लेने का हठ कर लिया था और उन्होंने अपने हठ को पूरा भी किया।
               हठी बच्चे किसी को भी अच्छे नहीं लगते। किसी के घर जाने पर उन्हें वह सम्मान और प्यार नहीं मिल पाता जो उन्हें मिलना चाहिए। लोग उन्हें यह कहकर तिरस्कृत करते है कि 'बड़े ही डीठ बच्चे है, मानेंगे नहीं।' यही जब बड़े होते हैं तो उनके माता-पिता स्वयं ही ऐसे बच्चों से डरने लगते हैं। बताइए, ऐसी औलाद का क्या लाभ जो हमेशा सिर पर ही सवार रहे।  
              बच्चों के हठ यानी जिद को यदि हम सकारात्मक कार्यों में जुनून अथवा धुन के रूप में  परिवर्तित कर सकें तो वह हमेशा आश्चर्यचकित कर देने वाले कार्य करते हैं। इस जुनून की बदौलत ज्ञान, विज्ञान, खेल आदि किसी भी क्षेत्र में वे आशातीत सफलता प्राप्त कर सकते हैं। उसका परिणाम हमारे समक्ष वैज्ञानिक चमत्कारों के रूप में हैं। निस्सन्देह हमारे सभी महापुरुष भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
             यदि बाल हठ को हम हौव्वा मानकर चलेंगे तो अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का कार्य करेंगे। आतंकवाद ऐसे ही हठी बच्चों की जिद का परिणाम है जिसकी चपेट में आज पूरा विश्व है। सभी इससे छुटकारा पाना चाहते हैं। बच्चों को ऐसे संस्कार देने की महती आवश्यकता है जिससे वे हठी, जिद्दी या डीठ न बनकर समझदार बच्चे बन सकें। अपना तथा अपने माता-पिता का नाम समाज में रौशन कर सकें। लोग उन्हें हिकारत की नजर से न देखें बल्कि उनके उदाहरण दूसरों के सामने रखने के लिए मजबूर हो जाएँ।
            माता-पिता का दायित्व है कि बचपन से ही अपने बच्चों को आपसी सामंजस्य से रहने की और सहनशील बनने की शिक्षा दें। इससे वे अपने माता-पिता का मान बनेंगे और अपने लिए समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकेंगे। इन्हीं भावी कर्णधारों के कन्धों पर हमारे देश तथा समाज का दायित्व निर्भर करता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

माता-पिता साक्षात भगवान

माता-पिता साक्षात भगवान 

निर्विवाद सत्य है कि माता-पिता का स्थान संसार में सबसे ऊपर है। ईश्वर को हम लोगों ने कभी नहीं देखा परन्तु हाँ, उसकी उपस्थिति को हम हर कदम पर अनुभव करते हैं। माता-पिता साक्षात ईश्वर का स्वरूप हैं जो मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने का महान कार्य करते हैं। आजन्म उनकी सेवा करके भी मनुष्य उनके इस ऋण से उऋण नहीं नहीं हो सकता। जो मनुष्य उन्हें ईश्वर की तरह मानते हुए उनका हर प्रकार से ध्यान रखता है और उनका सम्मान करता है उसे सभी प्रकार के सुख-साधन ईश्वर उन्हें देता है।
           अपने माता-पिता का दिल दुखाने के विषय में तो सोचना भी अपराध है। वे मनुष्य सारा जीवन परेशान रहते हैं जो अपने माता-पिता की अवहेलना करते हैं। मात्र दिखावा करने से उनकी सेवा नहीं की जा सकती। उसके लिए मन में पूर्ण श्रद्धा रखनी आवश्यक होती है। यहाँ मुझे एक कथा याद आ रही है।
              इस विषय से सम्बन्धित एक कथा मुझे स्मरण हो रही है। कथा कहती है कि कभी किसी समय देवताओं के मध्य यह विवाद उत्पन्न हुआ, "किस देवता की सबसे पहले किसकी पूजा की जानी चाहिए?"
           देवों के मध्य कोई स्वीकृति नहीं बन रही थी। इसलिए सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए और उनके कहा, "पितामह, आप बताइए कि सबसे पहले किस देवता की उपासना की जानी चाहिए?"
            उनका प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा, "जो देवता समस्त पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटकर आएगा, सभी देवों में उसकी उपासना पहले की जाएगी।"
            सभी देवगण अपने लक्ष्य का सन्धान करने के लिए चल पड़े। गणेश जी अपने वाहन मूषक के साथ वहीं रुके रहे। यह देखकर देवर्षि नारद परेशान हो गए थे उन्होंने पूछा, "गणेश, तुम परिक्रमा के लिए क्यों नहीं जा रहे? आपका वाहन मूषक है जो धीरे-धीरे चलता है फिर भी आपको कोई चिन्ता नहीं है हारने की।" 
             नारद जी ने जब उनसे इसका कारण पूछा तो गणेश जी ने अपने माता-पिता यानी कि भगवान शंकर और भगवती पार्वती की परिक्रमा की और कहा, "मेरी परिक्रमा तो पूर्ण हो गई।"
            पूछने पर उन्होंने बताया, "माता-पिता के चरणों में ही मेरा सारा संसार है। अतः मुझे अन्यत्र कहीं भी जाने की आवश्यकता ही नहीं है।"
             अपने माता-पिता की परिक्रमा करके गणेश जी सबसे पहले ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। सभी देवता जब लौटे तो गणेश जी के वाहन मूषक के पैरों के निशान देखकर वे हैरान हो गए और कहा, "गणेश जी सबसे पहले परिक्रमा करके कैसे लौट आए?"
              तब ब्रह्मा जी ने बताया, "गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा करके मानो सारे संसार की परिक्रमा कर ली हैं।"
            उनकी इसी मातृ-पितृ भक्ति के कारण ही किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान का सम्पादन करते समय सब देवताओं में सबसे पहले गणेश जी वन्दना की जाती है।
            यह कथा हमें समझाती है कि माता-पिता के चरणों में सम्पूर्ण जगत है जो इस सत्य का मनसा पालन करता है, उस जैसा मनुष्य तो इस धरा पर कोई और हो नहीं सकता। माता-पिता घर-परिवार का आधार स्तम्भ होते हैं। ये वह धुरी होते हैं जिनके ईर्दगिर्द परिवार का पहिया घूमता रहता है। इसीलिए कहा जाता है- 
        माता-पिता की बादशाही होती है और    
       भाई-बहनों का व्यापार होता है।
          माता-पिता की सेवा और अर्चना को  महत्त्व को समझाते हुए संस्कृत भाषा का निम्न श्लोक कहता है- 
          येन माता पिता सेव्या पूजिता वा।
         मन्दिरे  तेन पूजा  कृता वा न वा।।
अर्थात् जो मनुष्य माता-पिता की सेवा और पूजा करता है, वह मन्दिर जाकर पूजा करे अथवा न करे।
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे माता-पिता जीवित देवता हैं। उनकी सेवा करना सबसे बड़ी पूजा है। ईश्वर मन्दिर से ज्यादा उन लोगों के हृदय में रहते हैं जो अपने माता-पिता की सेवा मन लगाकर करते हैं। यदि माता-पिता की सेवा नहीं करते और सिर्फ मन्दिर में पूजा करते है  तो वह पूजा अधूरी रह जाती है। माता-पिता का सम्मान और सेवा-सुश्रुषा ही सबसे बड़ा तीर्थ और सबसे बड़ी पूजा है
            हमारे शास्त्र भी यही मानते हैं कि मन्दिर में मूर्तियों के आगे माथा टेको या नहीं पर घर में जीवित विद्यमान साक्षात ब्रह्म स्वरूप माता और पिता की पूजा-अर्चना अवश्य करो। पूजा-अर्चना का अर्थ थाली सजाकर पूजा करना नहीं बल्कि उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करना और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देना है। अपने लोक-परलोक को सुधारने के लिए कृत संकल्प हो जाएँ तो श्रेयस्कर होगा।
चन्द्र प्रभा सूद