रविवार, 8 मार्च 2026

माता-पिता की बादशाही

माता-पिता की बादशाही

सुनने और पढ़ने में शायद सबको यह वाक्य कुछ अटपटा-सा लग सकता है परन्तु यह बहुत सारगर्भित है। हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे -     
       माता-पिता की बादशाही होती है
       और भाई-बहनों का व्यापार।
इसके समर्थन में हम यह कह सकते हैं कि जब तक माता-पिता अथवा उनमें से एक भी जीवित होता है तब तक मनुष्य अधिकार पूर्वक उनके समक्ष अपनी इच्छा रख सकता है। वे भी ऐसे होते है जो बच्चों की इच्छाओं को यथासम्भव पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बच्चों की माँग उनकी सामर्थ्य से परे की हो जाती है। फिर भी बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, ऐसा सोचकर वे उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
            बच्चे माता-पिता से कभी रूठते हैं और कभी मानते हैं। उनसे जिद करके वे अपनी बातें मनवा लेते हैं। वे यह भी ध्यान नहीं रखते कि जिस वस्तु के लिए वे जिद कर रहे हैं, उसे लाकर देना उनके माता-पिता के बूते की बात है या नहीं। वे माता-पिता भी अपने बच्चों की मुँह से निकली बात को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। न वे दिन देखते हैं और न ही रात की परवाह करते हैं। बस उन्हें एक ही धुन होती है कि कैसे भी करके बच्चे की मॉंग को पूरा करना है।
            दुर्भाग्यवश यदि अभाव का समय आ जाए तब वे अपने मुँह का निवाला भी बच्चों को दे देते हैं, ताकि उनके बच्चे भूखे न सोएँ। सारा जीवन अपने बच्चों के होठों पर मुस्कान बनाए रखने के लिए स्वयं दिन-रात खटते रहते हैं। उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने के लिए किए गए अपने श्रम को वे कुछ मानते ही नहीं हैं। वे बस अपने बच्चों को जीवन में सफल देखकर मुस्कुराना चाहते हैं। उनका बस चले तो दुनिया की सारी खुशियाँ अपने बच्चों की झोली में डाल दें। हम अपने आसपास देखते हैं कि शारीरिक अक्षमता वाले बहुत से बच्चे उच्च पदों पर कार्यरत हैं। यह असम्भव कार्य माता-पिता के परिश्रम का फल है।
           अपने बच्चों के शादी-ब्याह आदि शुभकार्यों को सम्पन्न करते समय उनके चेहरों पर आए हुए सन्तुष्टि के भाव देखते ही बनते हैं। ऐसे माता-पिता बच्चों से कोई आशा नहीं रखते। वे बस अपने बच्चों के जीवन की मंगल कामना करते नहीं अघाते।
          यदि कोई बच्चा शारीरिक या आर्थिक रूप से कमजोर होता है तो उस पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि रहती है। उनकी यही सोच होती है कि उनका वह कमजोर बच्चा भी ऐसी स्थिति में आ जाए ताकि उसे किसी का मुॅंह न देखना पड़े। वे चुनौतियों का सामना करते हुए थकते नहीं हैं। उसे भी अपने गुजर-बसर लायक बना ही लेते हैं।
            माता-पिता का स्थान इस संसार में कोई नहीं ले सकता। बच्चों के प्रति उनके ऐसे त्याग और समर्पण के कारण ही उनके लिए बादशाही शब्द का प्रयोग हमारे सयानों ने किया है। वे बच्चों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भी अनदेखा करके उनकी मंगल की कामना करते हैं। वे दुनिया की नजरों से छुपाकर भी बच्चों को यथाशक्ति देते रहते हैं। बेटियों के प्रति उनका विशेष ममत्व होता है। वे कितनी भी बड़ी हो जाऍं माता-पिता उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से देते ही रहते हैं।
          उनके अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते लेन-देन के व्यवहार पर चलते हैं। चाहे वह सम्बन्ध भाई-बहन का हो, दोस्तों का हो अथवा अन्य रिश्तेदारों का हो। जितना प्यार और सम्मान उनको दोगे, उतना ही पाओगे। उनके साथ न जिद की जा सकती है और न ही अपनी माँग को दृढ़तापूर्वक मनवाया जा सकता है। जितना दूसरों के बरतोगे उतना ही वे बरतेंगे। यदि उन लोगों के साथ कदम मिलाकर चलोगे तभी वे भी साथ निभाएँगे अन्यथा वे किनारा कर लेने में पलभर की देरी नहीं करते। इसका कारण यही है कि कोई भी व्यक्ति अपनी अवहेलना सहन नहीं कर सकता। हर व्यक्ति स्वयं को ईश्वर से कम नहीं समझता।
              इसीलिए माता-पिता के सम्बन्ध के अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हुए होते हैं। जहाँ तक स्वार्थ पूरे होते रहते हैं, वहीं तक सम्बन्ध बने रहते हैं। जहाँ पर जरा-सी लापरवाही हुई, वहाँ वे टूटकर बिखर जाते हैं। उस समय परस्पर दूरियाँ बढ़ जाती हैं। यदि इन सम्बन्धों को बचाए रखना चाहते हैं तो रिश्तों की गरिमा का ध्यान रखना आवश्यक होता है। माता-पिता के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं होती। वे सदैव अपने बच्चों का हित साधते रहते हैं।
             माता-पिता की महानता और उनकी बच्चों के प्रति सहृदयता के कारण ही उनके काल को बादशाही का समय कहा गया है। उनके निस्वार्थ व्यवहार के आगे दुनिया के सभी सम्बन्ध बौने हैं। इसीलिए माता-पिता को ईश्वर का रूप कहा जाता है। उनकी जितनी भी सेवा की जाए कम होती है। उनके आशीर्वाद भी स्वार्थ रहित होते हैं। उन्हें अपने जीवन काल में लेते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 मार्च 2026

हृदय ही ब्रह्म

हृदय ही ब्रह्म

हृदय शब्द की यह व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहती है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन सन्तानें हैं- देव, मनुष्य और असुर। 
          हृदय शब्द तीन अक्षरों से बना है- हृ+द+य। वैदिक व्याकरण में इनका अर्थ बताया है- हृ का अर्थ है 'हरति' अर्थात् लाना। द का अर्थ है 'ददाति' अर्थात् देना और य का अर्थ है 'याति' अर्थात् जाना।
           जो इस रहस्य को समझ लेते हैं कि हृदय ही सब कुछ है यानी कि वही ब्रह्मा है, वही प्रजापति है। अपने और पराए सभी उसे उपहार लाकर देते हैं। जो इसे पूरी तरह जान लेता है वही स्वर्गलोक को जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वह सभी प्रकार से सुखी रहता है।
              हमारे भीतर का आध्यात्मिक केन्द्र यानी आत्मा ही परम सत्य, सर्वोच्च चेतना या ब्रह्म है। इससे स्पष्ट होता है कि हृदय मात्र एक शारीरिक अंग नहीं बल्कि वह असीम, शुद्ध, शान्त और अमर दिव्य शक्ति है। वह ब्रह्माण्ड का मूल है। स्वयं को जानने-समझने और परमात्मा से एक होने की यह अनुभूति है। हृदय में सर्वोच्च चेतना वास करती है और सम्पूर्ण अस्तित्व को बनाए रखती है। यह आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) की ओर ले जाती है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य सार को अनुभव करता है। 
          मेडिकल की भाषा में कहें हम तो सब जानते है कि हृदय मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है। यह जब तक  ठीक से कार्य करता रहता है तब तक ही मनुष्य स्वस्थ रहता है। जहाँ इसमें विकार आया वहीं से परेशानी आरम्भ हो गई। यह लेता है, देता है और चलता है। इसका कार्य रुधिर का लेना और देना होता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को लेकर फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को वापिस लौटा देता है। इसी उद्देश्य को लेकर यह निरन्तर गतिमान रहता है। यह न दिन देखता है और न रात, बस चलता ही रहता है। इस प्रकार हृदय शब्द के अर्थ से रुधिर की गति अथवा बल्ड सर्कुलेशन का भाव आ जाता है।
             यदि यह हमारी तरह सोचने लगे कि वह वर्षों से चलते-चलते, अपना काम करते हुए थक गया है। अब उसे भी आराम करना चाहिए तो वहीं, उसी पल इस मनुष्य के जीवन का अन्त हो जाता है। जिसे डॉक्टर लोग कहते हैं कि मृतक का हार्ट फेल हो गया है और वह इस दुनिया में विदा लेकर जा चुका है।
          अभी ऊपर इसकी तीन सन्तानों की हमने चर्चा की थी। पहली सन्तान है देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते है, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खानपान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को सन्तुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं उन्हें दुखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खानपान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं।
          दूसरी सन्तान है मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर बन जाते हैं। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है। जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु यदा कदा असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। उस समय शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ निश्चित ही धन व समय की बर्बादी करता है।
              इसकी तीसरी सन्तान हैं असुर। वे हर नियम को, हर बन्धन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं। उनका वश चले तो सारे एक्सपेरिमेंट इसी जीवन में अपने शरीर पर कर डालें। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियन्त्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है।
              खाने-पीने, सोने-जागने यानी कि आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक बन जाती है। यह शरीर दिन-प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे। वह अब इन रोगों से और अधिक लड़ने में समर्थ नहीं है। 
           अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे सदा बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

हर व्यक्ति व स्थान का विशेष महत्त्व

 हर व्यक्ति व स्थान का विशेष महत्त्व 

हर व्यक्ति का अथवा हर स्थान विशेष का अपना एक महत्त्व होता है। उनकी पहचान उनके द्वारा किए गए कार्यों से ही बनती है। यदि वहाँ से उन विशेषताओ को हटा दिया जाए तो एक शून्य-सा हो जाता है। इसलिए उन पर ध्यान दिया जाना बहुत आवश्यक होता है।
        एक श्लोक का उदाहरण देते हुए इसे जानने का प्रयास करते हैं -
नागो भाति मदेन कं जलरूहैः पूर्णेन्दुना शर्वरी, शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवैर्मन्दिरम् । वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः, सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं विष्णुना।।
अर्थात् गजराज मद से, सरोवर खिले हुए कमलों से, रात्रि पूर्ण चन्द्रमा से, स्त्री चरित्र से, घोड़ा गति से, मन्दिर नित्य के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदी हंस के जोड़े से, सभा पण्डितों से, कुल सुपुत्र से, पृथ्वी राजा से और तीनों लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं।
             हाथी के शरीर से पसीने के रूप में एक सुगन्धित द्रव्य निकलता है। उसी से हाथी की सुन्दरता होती है। ऐसा कहा जाता है कि सुगन्धित स्राव विशेष रूप से नर हाथियों में परिपक्वता के दौरान सामाजिक संकेत के रूप में कार्य करता है। यह उन्हें अन्य हाथियों के साथ संवाद करने में मदद करता है। हालाँकि स्नान के पश्चात वह मिट्टी में लोटता है। शरीर से मोटे व्यक्ति को प्रायः हाथी कह कर चिढ़ाया जाता है। गजगामिनी कहकर स्त्री की चाल की तुलना हाथी की चाल से की जाती है। 
          तालाब में कितना भी स्वच्छ जल हो अथवा उसमें बहुत से सुगन्धित द्रव्य डाल दिए जाएँ परन्तु वह आकर्षण का केन्द्र नहीं बन पाता। जहाँ उस तालाब में कमल के फूल दिखाई देंगे, वहीं उसका सौन्दर्य कई गुणा बढ़ जाता है। उसे निहारने के लिए लोग वहाँ पर रुकते हैं। कमल के फूल की शोभा को देखते हैं जो पानी में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहता है। बच्चे, बड़े सभी उसके सौन्दर्य को देखकर प्रसन्नता से विभोर होते हैं।
        रात्रि का सौन्दर्य पूर्ण चन्द्रमा से होता है। उस समय चारों ओर अन्धकार का साम्राज्य होता है। रात कितनी भी घनी काली हो, वह मनमोहक नहीं होती। उसे हम दुखों और परेशानियों के रूप में मानते हैं। उससे बचने के लिए उपाय करते रहते हैं शायद इसीलिए बिजली का अविष्कार हो सका। जहाँ पूर्ण चन्द्र का उदय हुआ वहीं वह सब लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। जन साधारण के लिए तो वह सुन्दरता है ही, कवियों और लेखकों का भी प्रेरणा स्त्रोत है। कितनी ही रचनाएँ इसे लक्ष्य बनाकर लिखी गई हैं। पूर्ण चन्द्रमा के उदित होते ही चारों ओर प्रकाश फैल जाता है और सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है। बच्चे चन्दा मामा की कहानियॉं सुनते हैं।
            पुरुष प्रधान समाज में सदैव स्त्री के सच्चरित्र होने पर बल दिया जाता है। उनका अपना चरित्र कैसा भी हो, स्त्री चरित्र की कसौटी पर परखी जाती है। इसीलिए चरित्र को उसका आभूषण माना जाता है और उसे महत्त्व दिया जाता है। हर व्यक्ति सती सावित्री की कामना करता है। उसे भगवती सीता जैसी पत्नी चाहिए होती है पर वह स्वयं भगवान राम जैसा नहीं बनना चाहता।
          घोड़ा अपनी गति से मूल्यवान होता है। घोड़े की गति जितनी अधिक होती है, उतना ही अधिक उसका मूल्य होता है। जिस घोड़े की चाल सुस्त होगी या मरियल होगी, उतना ही उसका मूल्य कम होता है।
          मन्दिर या धार्मिक स्थानों पर नित्य उत्सव होते रहें तभी उनकी पहचान होती है। लोग भी तभी वहाँ आते हैं और रौनक रहती है। धार्मिक स्थलों की जीवन्तता बनाए रखने के लिए वहाँ धार्मिक अनुष्ठान अथवा कथा-वार्ता होते रहने चाहिए। तभी लोग उनसे जुड़ते हैं। इससे अपने धर्म की पहचान बनती है। लोगों को अपने धर्म से जोड़े रखने का कार्य मन्दिरों में होने वाले उत्सव करते हैं।
        आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करने और अपने धर्म से जोड़ने का यह सशक्त माध्यम होता है। उन्हें तभी अपने धर्म से जोड़ा जा सकता है, जब वे वहाँ श्रद्धा से जाते रहें और वहाँ से उन्हें सदा कुछ-न-कुछ नया मिलता रहे।
           वाणी व्याकरण से सुशोभित होती है। यदि व्याकरण का चाबुक वाणी पर न हो तो भाषा अशुद्ध हो जाती है। जिसका जैसा मन करेगा, वह वैसा ही उच्चारण करेगा। इस प्रकार करने से भाषा की गरिमा ही समाप्त हो जाएगी। नदी हंस के जोड़े से सुन्दर लगती है। यदि हंस नदी में किल्लोल करेंगे तो लोग अनायास ही उनकी ओर आकर्षित होंगे। ऐसे नदी की शोभा में चार चॉंद लगा जाऍंगे।
            सभा में  विद्वान हों तो श्रोताओं को उन्हें सुनने का अवसर मिलेगा। वे उनसे बहुत कुछ सीख सकेंगे। कुल में यदि सुपुत्र का जन्म होता है तो वह कुल को तार देता है। यदि देश में सुयोग्य और प्रजा वत्सल राजा होगा तो देश नित्य प्रति उन्नति करता है। वहॉं प्रजा खुशहाल रहती है।
            इसमें कोई दोराय नहीं कि तीनों ही लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं। ईश्वर की महिमा का जितना भी बखान किया जाए वह कम ही होता है। भगवान विष्णु के अवतारों के विषय में हम जानते हैं। जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा तब ईश्वर ने किसी भी रूप में आकर धरा का उद्धार किया और धर्म की स्थापना की।
            सभी वस्तुओं की उपादेयता उनके गुण और कर्म से होती है। कवि ने हाथी, जल, रात्रि, स्त्री, घोड़े और मन्दिर इन सबके बारे में बहुत ही सुन्दर और मौलिक विचार प्रकट किए हैं। इन सबके बारे में कवि का बहुत समय पहले का यह कथन आज भी उतना ही सत्य है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

प्रेम का रास्ता बहुत संकरा

प्रेम का रास्ता बहुत संकरा

प्रेम का रास्ता बहुत ही कष्टकर होता है। इसके साथ-साथ बहुत तग अथवा संकरा भी होता है। एक समय में इसमें से एक ही व्यक्ति गुजर सकता है, दो नहीं। आत्मसमर्पण और निस्वार्थ रहना ही प्रेम का मार्ग बताता है। प्रेम की भावना बहुत उच्च कहीं जाती है। ईश्वर से सच्चा प्रेम करना बहुत कठिन होता है। मनुष्य किसी से भी प्रेम कर सकता है। वह प्रेम अपने बन्धु-बान्धवों से, जीव-जन्तुओं से तथा प्रकृति आदि से भी हो सकता है।
           सन्त कबीर दास जी ने इसी भाव को निम्न दोहे के माध्यम से कहा है-
         प्रेम गली अति संकरी, तामें दाऊ न समाई।
       जब में था तब हरी नहीं, अब हरी है में नाहीं।। 
अर्थात् प्रेम का मार्ग अत्यन्त तंग या संकरा है। इसमें 'मैं' यानी अहंकार और 'ईश्वर' या प्रियतम दोनों एक साथ नहीं रह सकते। सच्ची भक्ति या प्रेम के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
             कबीरदास जी का यह दोहा ईश्वर के लिए लिखा गया है। सामान्य जीवन में हम जिस किसी से भी प्यार करते हैं अथवा किसी का प्यार पाना चाहते हैं, उस पर भी उतना भी सटीक बैठता है। इसमें मैं से मतलब अहंकार से है। जब तक इन्सान में मैं होता है तब तक वह प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम केवल और केवल समर्पण से ही सम्भव हो पाता है। समर्पण के लिए अहंकार का त्याग करना आवश्यक होता है।
            जब तक दो व्यक्तियों में तेरा और मेरा का भाव रहेगा तब तक प्रेम नहीं हो ही नहीं सकता। जब वे दो जिस्म और एक जान बन जाते हैं तब सही मायने में प्यार होता है। यह बहुत ही गूढ़ विषय है। जब दो लोगों में ऐसा प्यार हो जाता है तो वहाँ समर्पण की भावना होती है। वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को बिनकहे और बिनसुने समझ जाते हैं। मीलों दूर बैठे हुए भी एक-दूसरे की खैर-खबर रख सकते हैं जिसे हम टेलीपैथी कहते हैं। वह उनमें स्वत: विकसित हो जाती है।
            यह सब दुधारी तलवार की धार पर चलने के समान होता है। जहाँ चूक हो गई वहाँ मनुष्य चोट खा लेता है। फिर उसे सुधारने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। प्रेम की यह गहरी परिभाषा है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार से दो अलग-अलग शख्सियत बनकर इस मार्ग में नहीं रहा जा सकता है। सच्चा प्रेम अपने अस्तित्व को अर्थात् स्व को मिटाकर दूसरे में एक हो जाना होता है। यह सम्बन्ध प्रतिदान नहीं माँगता बल्कि पूर्ण समर्पण भाव इसमें होता है। 
        प्रेम कुछ लेना नहीं जानता, वह तो बस देना ही जानता है। इसीलिए सबको अपना बना लेता है। यदि लेनदेन की या बदले की भावना यहाँ हावी गई तो फिर वह प्रेम नहीं रह जाता बल्कि व्यापार बन जाता है। इस प्रेम को विशुद्ध ही रहने दें, इसमें विष न घोलें।
         पति-पत्नि का प्रेम भी सही मायने में ऐसा ही होना चाहिए। दोनों में तेरा-मेरा न होकर हमारा होना चाहिए। दोनों के सुख-दुख सब एक होने चाहिए। जब तक तन, मन और धन से वे दोनों एक नहीं होंगे उनका प्रेम अधूरा रहेगा। परस्पर का यह अधूरापन हमेशा नुकसान देता है। 
        दोनों में समझौता हो जाना कोई शुभ लक्षण नहीं है। जहाँ समझौता टूटा वहीं पर बिखराव होने लगता है। तब परिवार टूटने लगते हैं और आपसी सम्बन्ध दरकने लगते हैं। लम्बे समय तक दोनों को साथ निभाना होता है। इसलिए जीवन में परस्पर प्रेम और  विश्वास को बनाए रखना पति-पत्नि दोनों का कर्त्तव्य है। 
          आज युवा पीढ़ी ने इस प्यार को एक व्यापार बना दिया है। उनके लिए इस प्यार के मायने केवल मौज-मस्ती है। प्यार के नाम पर वे उच्छृंखल बनते जा रहे हैं। जहाँ तक उनका स्वार्थ पूरा होता रहता है, बस वहीं तक प्यार होता है। उसके बाद फिर तू कौन और मैं कौन? वे इस बात को बिल्कुल भूल गए हैं कि प्यार देने और समर्पण का नाम है। इसमें स्वार्थ का कोई काम नहीं होता।
              एकपक्षीय प्रेम सदा ही घातक होता है। इसके चक्कर में हत्याएँ व आत्महत्याएँ भी हो जाती हैं। एसिड अटैक भी इसी का ही परिणाम होता है। यथासम्भव इससे बचना चाहिए और दूसरों को भी बचाना चाहिए।
          ईश्वर से प्रेम का आधार पूर्ण समर्पण है। उससे लौ लगाने का अर्थ है उसमें एकाकार हो जाना। यह वही प्यार है जो मीराबाई ने दुनिया की परवाह न करके अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर भगवान कृष्ण से किया। राधा ने भी सच्चे मन से भगवान कृष्ण से नाता जोड़ा। हमारे ऋषि-मुनि इसी प्यार की बदौलत असार संसार के सारे कारोबार से स्वयं को विलग कर लेते हैं।
            जब तक इस प्यार में सच्ची तड़प न हो तब तक मनुष्य इस संकरे रास्ते पर चल ही नहीं सकता। दोनों के मैं को छोड़े बिना यह पवित्र प्रेम सम्भव नहीं हो सकता। अपने अहं का परित्याग करके ही हम वास्तव में प्रेम को प्राप्त कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 4 मार्च 2026

ईश्वर का निवास हमारा हृदय

ईश्वर का निवास हमारा हृदय 

परमपिता परमात्मा जिसे हम सब लोग ऊपरवाला
कहते हैं, वह वास्तव में हमारे हृदयों में निवास करता है। बस हम उसे अपने इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख पाते। इसलिए उससे हम दूरी बना लेते हैं। उसे पाने की यदि ललक सच्ची हो तो वह हमें मिल जाता है। पंजाबी सूफी कवि बुल्लेशाह जी ने प्रभु को पाने के विषय में कहा है -
        बुल्लिआ रब दा की पौणा। 
       एत्थों पुटणा ओत्थे लाउणा।
अर्थात् बुल्लेशाह जी का कहना है कि रब यानी ईश्वर को पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस इस क्यारी से उखाड़ कर उस क्यारी में लगा देना है। दूसरे शब्दों में कहें तो मन को सांसारिक वस्तुओं से हटाकर ईश्वर में लगा दो और रब मिल जाएगा।
            वह मालिक बैठा-बैठा बस हम लोगों को देखता रहता है और मजे लेता रहता है। कभी-कभी हम उससे बिना कारण रूठ जाते हैं तो कभी मान जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में जब हमें अपरिहार्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है तो हम उससे रूठ जाते हैं और उससे शिकायत करते हुए कहते हैं कि उसने सारे दुख और कष्ट सिर्फ हमारी झोली में ही डाल दिए हैं। हमें ऐसा लगता है कि उसे कोई और नहीं मिलता। बस हमीं उसे दिखाई देते हैं।
            इसलिए उसे हम यह धमकी भी दे देते हैं कि अब तुझे याद नहीं करेंगे और न ही तेरी पूजा करेंगे। समय बीतते-बीतते जब सब स्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं तो फिर हम बच्चों की तरह उससे अब्बा कर लेते हैं अर्थात् उसकी शरण में चले जाते हैं। सच तो यह है कि हम बहुत समय तक उससे दूर नहीं रह सकते। हम सभी उसी का अंश हैं तो फिर उससे अधिक दिनों तक रूठना सम्भव नहीं हो पाता।
              जब हम अपनी मनोनुकूल वस्तुओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब यह आवश्यक नहीं रह जाता कि हम उसका स्मरण कर लें या उसका धन्यवाद कर दें। उस समय भी हमारी कृतघ्नता पर वह न हमसे नाराज होता है और न ही रूठता है। यदि वह कभी हमसे रूठ जाए या नाराज हो जाए तब हम पलभर भी चैन से जी नहीं सकेंगे, यह बिल्कुल निश्चत है।
             ईश्वर की सन्तान मनुष्य छोटे बच्चों की तरह अलग-अलग रोल करते दिखाई देते हैं। कभी बन्दूक उठा लेते हैं और अपने मुँह से ठॉय-ठॉय बोलते हुए उसे चलाने लगते हैं। कभी हम गाड़ियाँ चलाते हैं, कभी गुड्डे-गुड्डियों के खेल की तरह हम इन्सानों के जीवन से खिलवाड़ करने लग जाते हैं। हम भाँति-भाँति के खेल खेलते रहते हैं।
               हम कभी नेता-अभिनेता के पात्रों में ढलकर अभिनय करते हैं। कभी हम राजा, चोर और सिपाही के खेल खेलते दिखाई देते हैं। कभी हम जज-वकील बनकर न्याय करते हैं। अध्यापक बनकर कभी हम खेल-खेल में दूसरों को पढ़ाने का उपक्रम करते हैं। हम कभी सेवाकार्य करके उसे और दूसरे लोगों को रिझाते हैं। कभी पण्डे-पुजारी के रूप आ जाते हैं। तब पूजा-पाठ कराने का खेल खेलने लगते हैं। कभी कार्टून पात्रों की तरह हम व्यवहार करते हैं। कभी अच्छे व सज्जन लोगों के रोल निभाते हैं और कभी दुर्जन बनकर मस्ती करते हैं। कभी हम‌ ज्ञानी-ध्यानी बनते हुए सबको संस्कार देते हैं तो कभी अत्याचारी बन जाते हैं। 
              कहने का तात्पर्य यही है कि हम अपने जीवन में सदा अदाकारी दिखाते रहते हैं। वह बस हमारी कलाकारियों को निरखता रहता है और मुग्ध होता रहता है। जब हम अपनी सीमाएँ पार करने लगते हैं तब वह हमें चेतावनी देता है कि यह कार्य मत करो। पर जब हम डीठ बन जाते हैं या चिकने घड़े बन जाते हैं, उस चेतावनी को अनसुना कर देते हैं तब वह हमें सजा के रूप में कष्ट और परेशानियाँ देता है।
            जब हम उसकी चेतावनी के अनुसार कार्य करते हैं तब वह हमारी मनोकामनाएँ पूरी करके हमें खुशियों और समृद्धि का उपहार देता है। शाबाशी के तौर पर वह हमें यश देता है, सहृदय परिवारी जन व मित्र देता है। वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर  चलाता हुआ हमें सफलता देता है।
             परमपिता परमात्मा हमारे भौतिक संसार के माता-पिता की ही तरह हमारे साथ व्यवहार करता है। उन्हीं की तरह हमारे सुख-दुख आदि में हमारा साथ देता है। परेशानी से उभरने के लिए हमें रास्ता दिखाता है। जैसे हम उनके इशारों पर चलते हैं वैसे ही हमें उस मालिक के इशारों को अथवा चेतावनी को समझना चाहिए। वास्तव में इसी में हमारा लाभ निहित है।
               वह परमपिता हमारा माता, पिता, भाई, बन्धु, मित्र सब कुछ है। उससे बड़ा और कोई हमारा हितैषी नहीं हो सकता। वह हमारी बालकोचित क्रीडाओं पर हँसता और मुस्कुराता है। उसे इसी रूप में रखना हमारा दायित्व बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 2 मार्च 2026

अपनी जड़ों से जुड़ें

अपनी जड़ों से जुड़ें 

मनुष्य अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में विश्व के किसी भी देश में रहते हैं, यह उनका अपना चुनाव होता है। उन्हें उनकी अपनी जड़ें दूरी नहीं बनाने देती। उसके बचपन से लेकर आज तक के संस्कार, उसकी सांस्कृतिक विरासत उन्हें अपने से अलग नहीं होने देते। ये संस्कार उनके हृदय की गहराइयों में इतने गहरे पैठे होते हैं कि चाहकर भी वह उनको झटक नहीं सकते। ये सब उन्हें समय-समय पर याद दिलाते रहते हैं। मनुष्य बार-बार स्वयं को अपने अतीत में झॉंककर बैचेन होने लगते हैं।    
             यही कारण है कि परदेस में रहते हुए वे हर समय वहाँ के और अपने वातावरण की तुलना करते रहते हैं। वहाँ के उस नए माहौल में रच-बस जाना बहुत कठिन होता है। उन्हें अपना परिवेश रह-रहकर याद आता है। अपने तीज-त्योहार, अपने रस्मों-रिवाज उसे बार-बार अपनो से दूरी की याद दिलाते रहते हैं, जो उनके हृदय में एक टीस बनकर कसकते रहते हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है, वे अपनों को गले लगाने के लिए उत्साहित हो जाते हैं। अपने घर-परिवार से दूरी की विवशता पर उन्हें गाहे-बगाहे उदासी आ जाती है।
              विदेशों में रहने वाले लोग अपने त्योहारों को अपने परिवारी जनों के साथ नहीं मना पाने की उदासी को दूर करने के लिए वहाँ रहने वाले मित्रों के साथ मनाते हैं। इसी तरह वे यथासम्भव अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने का एक सार्थक प्रयास करते रहते हैं। उनका यह प्रयास वास्तव में सराहनीय है।
             समय और परिस्थितियों के कारण उनका अपने देश में लौटना सम्भव नहीं हो पाता, पर उनका मन सदा यही करता है कि वह किसी भी क्षण, किसी भी तरह उड़कर अपनों के बीच आ जाऍं। फिर से पुराने दिनों की तरह खूब मस्ती करें, धमाल करें, अपने सुख-दुख साझा करें। परन्तु वे अपनी इस चाह को अपनी मजबूरियों के कारण, अपने मन के किसी अज्ञात कोने में दफन कर देने के लिए विवश हो जाते हैं।
              हम देखते हैं कि प्रवासी पक्षी एक खास मौसम के आने पर दूसरे देशों में जाते हैं। वहाँ मौसम व्यतीत करके वे वापिस अपने स्थान पर लौट जाते हैं। अपने देश की मिट्टी की यही कसक शायद उन परिन्दों को वापिस लौटाकर ले जाती है। हर वर्ष वे आते हैं और फिर वापिस चले जाते हैं, वहीं के होकर नहीं रह जाते। बेजुबान पक्षियों के मन में यदि अपनी मिट्टी के प्रति इतनी कसक हो सकती है तो फिर इन्सानों के मन में ऐसा भाव आ जाना वास्तव में स्वाभाविक होता है।
             वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग है जहाँ भगवान राम रावण को युद्ध में परास्त कर देते हैं। वे लंका का राज्य रावण के भाई विभीषण को सौंप देते हैं। उस समय वे अपने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाते हुए कहते हैं कि उन्हें सोने से बनी लंका का कोई मोह नहीं है। उन्हें अपनी माता और अपनी जन्मभूमि से प्यार है -
        न मे स्वर्णमयी लंकाSपि रोचते लक्ष्मण।
        जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात् हे लक्ष्मण! मुझे सोने की यह लंका भी पसन्द नहीं है। मेरी माता और मेरी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
             इससे बढ़कर अपनी जन्मभूमि के प्रति लगाव का कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। यदि वे चाहते तो युद्ध में जीती हुई लंका पर शासन कर सकते थे। पर नहीं उन्होंने विभीषण को लंका सौंप दी और स्वयं चले आए अपनी जन्मभूमि अयोध्या में अपनों के बीच।
              हमारे मनीषी समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य को अपने देश, अपने वेष और अपनी संस्कृति से प्यार होना चाहिए। जिसे इनसे प्यार नहीं है, वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। शायद यही कारण है कि दशकों पूर्व विदेशों में जाकर बसे और वहाँ की नागरिकता लेकर रच-बस जाने वाले भारतीय, बरसों-बरस बीत जाने तथा पीढ़ियों के बदल जाने के बाद भी भारतीय ही कहलाते हैं। राजनैतिक भाषा में उन्हें भारतीय मूल का कह दिया जाता है।
              इतना सब हो जाने के बाद भी मृत्यु के समय अपने देश की मिट्टी न पा सकने की कसक उनके मनों में रहती है। इसलिए ही बहुत से लोग जब भी समय मिलता है, तब अपने भारत देश आते हैं और प्रियजनों की सम्हालकर रखी गई अस्थियाँ गंगा जी में प्रवाहित करते हैं। इससे उनके मन में यह सन्तोष का भाव रहता है कि उन्होंने अपने प्रियजन की अस्थियों को अपने देश की पवित्र गंगा नदी प्रवाहित करके अपनी जड़ों से जोड़ दिया है। यह अहसास उनकी कसक का प्रतीक है।
             परिस्थतियाँ और समय मनुष्य को अपने देश तथा परिवेश से दूर तो कर सकते हैं परन्तु उनके हृदयों को नहीं। यही कारण है कि परदेस की धरती पर रहने वाले भारतीय अपने देश की महक को भूल नहीं पाते बल्कि उसे बहुमूल्य नगीनों की तरह संजोकर रखते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 मार्च 2026

सफलता के लिए

सफलता के लिए

अपने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सदैव सफलता का व्रत करना चाहता है। कोई भी व्यक्ति असफल होने के विषय में विचार नहीं करना चाहता। किसी भी कार्य को सावधानी पूर्वक करना चाहिए। किसी भी कार्य की सफलता के लिए मनुष्य के पास दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता होता है शार्टकट वाला, यानी गलत मार्ग। जबकि दूसरा रास्ता लम्बा और सीधा होता है। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह कितना धैर्यशाली है? वह किस मार्ग का चुनाव करता है? 
             मनुष्य यदि धैर्यवान् एवं निष्ठावान् होगा तो वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए अथक प्रयास करेगा। दिन-रात मेहनत करता हुआ वह अपने उद्देश्य में अवश्य सफल होगा। उसे अपने रास्ते पर चलते हुए अनेक प्रलोभनों का सामना करना पड़ता है। अनेक कठिनाइयाँ उसका रास्ता रोक लेती हैं। वह लगनशील व्यक्ति उन प्रलोभनो से किनारा करता हुआ, सभी कठिनाइयों को सुलझाता हुआ अपने सीधे रास्ते पर चलकर मंजिल तक पहुँच जाता है। ऐसे ही कर्त्तव्यनिष्ठ पुरुषार्थियों का लक्ष्य उनका रास्ता बड़ी ही बेसब्री से देखता है।
               इनके विपरीत सुविधाभोगी लोग हमेशा सरल मार्ग ढूँढते रहते हैं। वे लम्बे मार्ग की अपेक्षा शार्टकट अपनाना पसन्द करते हैं। इस सरलता की खोज करते हुए वे यदा कदा अपने रास्ते से भटक जाते हैं और गलत हाथों में पड़ जाते हैं। समाज और न्याय व्यवस्था के अपराधी बनने में उनको देर नहीं लगती। ऐसे कार्य करके वे स्वयं को और अपनों को संकट में डाल देते हैं। उस समय वे अपने बन्धु-बान्धवों की शर्मिंदगी का कारण जाने-अनजाने बन जाते हैं।
              अधीरता सदा ही हानिकारक होती है। उसके दूरगामी भी परिणाम उतने ही निराशाजनक होते हैं। जल्दबाजी में भी जो कार्य किए जाते हैं वे सुलझने के स्थान पर उलझ जाते हैं। तब मनुष्य उनको सुलझाने में और अधिक दुखी हो जाता है। उसे समझ नहीं आता कि वह इस स्थिति में क्या करे और क्या न करे? यह दुविधा की स्थिति उसके लिए परेशानी का कारण बन जाती है।
              'महाभारत' के शान्तिपर्व में वेद व्यास जी कहते हैं -
      नासम्यक् कृतकारी स्यात् अप्रमत्त: सदा भवेत्।
      कण्टकोSपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम्॥
अर्थात् अनुचित तरीके से काम नहीं करना चाहिए, सदा सावधान रहना चाहिए। काँटा भी यदि सही ढंग से न निकाला जाए तो वह भी बहुत समय तक कष्टकारक होता है।
             इस श्लोक का यही कथन है कि हमेशा चौकस रहना चाहिए। गलत तरीके से किए गए कार्य का परिणाम दुखदायी होता है। यहाँ काँटे का उदाहरण देते हुए वे कह रहे है कि यदि काँटा चुभ जाए तो उसे ध्यान से निकालकर फैंक देना चाहिए। यदि उसका कुछ भी अंश शरीर में बचा रह जाए तो वह नासूर बन जाता है। तब आपरेशन करवा करके उसे निकलवाना पड़ता है। फिर कोई गारण्टी नहीं कि मनुष्य पूर्णरूपेण ठीक हो पाएगा। इसलिए ध्यान से अपना काम करना चाहिए।
          उसी प्रकार अपनी सुविधा के लिए पथभ्रष्ट होकर कुमार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति की भी कोई गारण्टी नहीं है कि वह समाज के लिए नासूर नहीं बन जाएगा। अथवा पूरे मन से सन्मार्ग का पुन: पथिक बन सकेगा। यदि वह मुख्य धारा का मन से अनुगामी बन जाए तो उसका सौभाग्य होगा। अन्यथा उसे सारा जीवन समाज में अभिशप्त जीवन जीना पड़ता है। यह परिस्थिति उसके लिए बहुत कठिन होती है।
             यदि मनुष्य अपने कुमार्ग का परित्याग नहीं करता तो समाज ही उसका बॉयकाट कर देता है। उसे सम्मान के स्थान पर तिरस्कार मिलता है। वह नासूर बनकर समाज को दूषित न करे इसलिए उसे अलग-थलग करके सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। उसके अपने प्रियजन भी समाज के डर से उस समय उससे किनारा कर लेते हैं। यह उसके दुख का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। वह जीवित रहते हुए, सबके साथ की कामना करता हुआ अकेलेपन का शिकार हो जाता है।
             गलत तरीके से कमाया हुआ धन-वैभव, अर्जित की गई विद्या अथवा अन्य कोई सम्मान समय बीतते सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। तब मनुष्य को अपनी पोल खुल जाने पर सबके सामने सिर नीचा करना पड़ता है। उसे जग हंसाई का सामना करना पड़ता है। तब वह अपना मुॅंह छिपाने के लिए विवश हो जाता है। उसके अपने परिवार के लोग उसे लानत-मलामत करने लगते हैं। उसका सम्मान नहीं करते।
              मनीषी जन इसीलिए उचित मार्ग से अपने कार्यों की सिद्धि और अनुचित मार्ग का त्याग करने का परामर्श देते हैं। जीवन में कल्याण की कामना करने वाले मनुष्य को इस आत्म अनुशासन का मन से पालन करना चाहिए। तभी उसे सर्वत्र मान-सम्मान मिलता है। इस प्रकार करने से उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद