शनिवार, 14 मार्च 2026

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का वरदान ईश्वर ने मनुष्य को दिशा है। यह बुद्धि मनुष्य के जीवन को दिशा देने का कार्य करती है। यह हमें अच्छे बुरे का ज्ञान कराती है। हमारी बुद्धि तब कुण्ठित होती है जब हम अपने सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय नहीं करते और सत्संगति में जाकर उसे पैना नहीं करते अथवा उसे सुविचारों से पोषित नहीं करते। हम जितना अधिक अध्ययन करेंगे, हमारी बुद्धि को उतना ही अधिक भोजन मिलेगा। तभी हमारे विचारों में भी परिपक्वता आ सकती है। इसकी बदौलत हम मनुष्य सफलता के सोपानों पर चढ़ते हैं।
           मनीषी कहते हैं कि ज्ञानार्जन की कोई आयु नहीं होती। किसी भी आयु में मनुष्य, किसी भी जीव से कुछ सीख सकता है। मनुष्य का यह सौभाग्य है कि वह आजन्म कुछ-न-कुछ सीखकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त कर सकता है। अपने जीवन को ऊॅंचाइयों पर ले जा सकता है।
               हमारी बुद्धि को भी जंग लग सकता है। यद्यपि हमारी यह बुद्धि लोहा नहीं है। परन्तु फिर भी कभी-कभी मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने वालों को अथवा दूसरे की कही हुई बात को उस समय न समझ सकने वालों को हम कह देते हैं -
         1 तुम्हारी बुद्धि को जंग लग गया है 
         2 तुम्हारी मति मारी गई है 
         3 तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है
         4 तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। इत्यादि। 
          इन सबको कहने का मात्र यही अर्थ होता है कि उस समय विशेष पर वे अपनी बुद्धि का वैसा प्रयोग नहीं कर रहे होते जैसा किसी समझदार मनुष्य को उस परिस्थिति में करना चाहिए।
            कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यदि लम्बे समय तक बुद्धि को सुविचारों से पोषित न किया जाए तो इसमें मोह-माया व स्वार्थपरक भावों का जंग लग जाता है। तब ये भाव मनुष्य को चैन से नहीं बैठने देते बल्कि उसे भटकने के लिए विवश कर देते हैं। उस समय वह अनावश्यक ही पिष्टपेशन करता रहता है। अपने मन को दुविधा की स्थिति में पहुॅंचा देता है। मनुष्य के लिए यह स्थिति कभी भी सुखदायक नहीं हो सकती। 
             मनुष्य जब खाली बैठकर सोचता है तो उसके मन के विचारों का ताना-बाना उसे परेशान करता रहता है। इसका प्रभाव उसके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। उसकी विवेकशील बुद्धि उसे विचलित कर देती है।
         यदि अपनी बुद्धि का उपयोग हम अपने परिवार, देश, समाज और धर्म के लिए करते हुए सकारात्मक कार्य करते हैं तो यह बुद्धि का सदुपयोग करना कहलाता है। अर्थात् उस समय हम बुद्धिमान कहलाते हैं। समाज में अग्रणी बनकर हम पूज्य हो जाते हैं।
        इसके विपरीत यदि हम इस बुद्धि को अपने देश, धर्म, परिवार अथवा समाज के विरुद्ध नकारात्मक कार्यों में लगाने लगते हैं तो इसका दुरूपयोग करते हैं। तब मनुष्य तोड़फोड़, भ्रष्टाचार, अनाचार व कदाचार के कार्य करते हैं। उस समय वह मनुष्य विशेष विघटनकारी बनकर द्रोही कहलाते हैं। समाज के लिए एक अभिशाप बन जाते हैं। उन्हें हर तरफ हिकारत की नजर से देखा जाता है। हो सकता है अपनी कुटिल चालों से कुछ समय तक वे दूसरों को प्रभावित कर सकें, परन्तु अन्तत: उन सब कृत्यों के दुष्परिणामों को उन्हें भोगना ही पड़ता है।
            ये लोग देश, धर्म व न्याय के शत्रु बन जाते हैं। सब कुछ होते हुए भी इधर-उधर भागते हुए और छिपते-छिपाते हुए, ये सारा जीवन गुमनाम रहकर बिता देते हैं। उनसे किनारा कर लेने में ही सबको अपना भला दिखाई देता है। कोई भी उनके साथ सम्पर्क रखकर स्वयं को मुसीबत में डालना नहीं चाहता।
              लोमड़ी जैसी चालाक बुद्धि किसी भी व्यक्ति को पसन्द नहीं आती है। सबका प्रिय वही मनुष्य बनता है जिसकी बुद्धि का सरल और सहज हो। उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से दूसरे लोगों के हृदयों को छू जाए।
          सदैव सकारात्मक कार्यों में अपनी बुद्धि को नियोजित करना बुद्धिमानी होती है। इसे हम सद् बुद्धि कहते हैं। नकारात्मक सोच रखने से बुद्धि कुटिल बन जाती है। इसलिए यथासम्भव बुद्धि को कुटिलता से बचते हुए इसे सरल और सहज बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को लोग अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

भाग्य व्यक्तिगत बैंक बैलेंस

भाग्य व्यक्तिगत बैक बैलेंस 

प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य उसका अपना व्यक्तिगत बैक बेलैंस होता है जो जन्म-जन्मान्तरों तक सभी लोगों के खाते में मल्टीप्लाई होता रहता है। हम सबका वास्ता बैंक से पड़ता रहता है। इसलिए हम बैंक की कार्यप्रणाली के विषय में भली-भॉंति जानते-समझते हैं। हम‌ अपने-अपने बैंक अकाऊँट में पैसा जमा करवाते हैं अथवा निकालते हैं। जो धन हम जमा करवाते हैं, उस पर ब्याज मिलता है। इससे हमारा धन बढ़ता जाता है। इसके विपरीत धन निकालने से कोई ब्याज नहीं मिलता बल्कि हमारा उतना धन कम हो जाता है।
              उसी प्रकार हम अपने सुकर्मों की कमाई को अपने भाग्य के खाते में जमा करते हैं तो हमारे शुभकर्म बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब हम अपने कुकर्मों की कमाई करते हैं तो हम उस पूँजी को अपने खाते में जमा करवाते हैं। सद्कर्मों के फलस्वरूप उन शुभ  फल मिलता है। हम हर प्रकार से सुविधा सम्पन्न बनकर सुख भोगते हैं। जब हम अशुभ कर्मों का  कुफल हम भोगते हैं तो हमें जीवन में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।‌इसका अर्थ यही होता है कि हमने अपने खाते में से उन उतने कर्मो की पूँजी निकालकर खर्च कर ली है। इस प्रकार लेन और देन का यह क्रम अनवरत चलता रहता है।
             हम कुछ जान भी नहीं पाते परन्तु हमारा यह खाता नित्य ही आटोमेटिकली कम अथवा अधिक होता रहता है। शुभकर्मों की इस खाते में यदि अधिकता होती है तभी जीव को मानव के रूप में जन्म मिलता है। उसमें भी हमारे कर्मानुसार हमें सुख-शान्ति, भौतिक सम्पत्ति, अच्छा घर-परिवार, रिश्ते-नाते, बन्धुजन, रूप-सौन्दर्य और सामाजिक रुतबा आदि मिलते हैं। शुभकर्मौं के कम होने मानव जन्म तो मिलता है पर जीवन अभावों में गुजरता‌ रहता है।
               इसके विपरीत यदि हमारे अशुभ कर्मों की अधिकता होती है तो जीव को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मानुसार चौरासी योनियों के भयावह चक्र से गुजरना पड़ता है। मनुष्य योनि को छोड़कर ये सभी योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगकर जीव को फिर से मानव जन्म की प्राप्ति होती है। 
              यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है पर उनका फल भोगने में नहीं। अपने किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का फल उसे भुगतना ही पड़ता है, उसे किसी भी तरह इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। चाहे वह कितने ही उपाय क्यों न कर ले। वह अपनी इच्छा से तीर्थों की यात्रा करे, तन्त्र या मन्त्र का सहारा या तथाकथित धर्मगुरुओं के पास चला जाए, उनसे किसी भी तरह से मुक्ति सम्भव नहीं होती।
             इन्सान कहता है कि जब वह गलत काम करता है अथवा कुमार्ग पर चलता है तब ईश्वर उसे उस समय सन्मार्ग क्यों नहीं दिखाता, चुप क्यों रहता है? सोचिए, यह तो हुई चोरी और सीनाजोरी वाली बात। जब भी मनुष्य शुभकर्म करता है तब वह मालिक उसे उत्साहित करता है। जब वह अशुभकर्म करता है तब वह उसे चेतावनी भी देता है। सुकर्म करते समय मन से प्ररेणादायक आवाज आती है और दुष्कर्म करते समय अन्तस से समझाने जैसी आवाज आती है। उसके अपने मन में विचारों का अन्तर्द्वन्द्व होने लगता है।
            यह मनुष्य है कि अपने स्वार्थों को पूर्ण करने में इतना अन्धा हो जाता है कि वह बार-बार उस अन्तरात्मा की आवाज को अनसुना करता रहता है। सन्मार्ग पर चलने के स्थान पर कुमार्ग पर चलने लगता है। फिर बाद में वह दोषारोपण करने से भी बाज नहीं आता।
               सुख-ऐश्वर्य का समय जीवन में आने पर वह गर्व से इतराता फिरता है कि मेरे परिश्रम के फलस्वरूप मुझे यह सब मिला है। तब उसे ईश्वर को याद करने का ध्यान ही नहीं आता। इसके विपरीत जब उसके जीवन में दुख और परेशानियाँ आती हैं तब वह ईश्वर को दोष देता है। उसे अपनी की गई गलतियों की जरा भी याद नहीं आती। वह सारा समय मालिक को और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
             उसे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि उसका तो भाग्य ही खराब है अथवा मेरा भाग्य ही मुझसे रूठ गया है। उसे स्मरण करना चाहिए कि। यह भाग्य अथवा यह किस्मत हमारी सखी नहीं है जो बार-बार हमसे रूठ जाती है और फिर जब मनाएँगे तब मान जाएगी। हर जन्म यदि मानव जीवन का चाहिए तो अभी से अपने कर्मों पर लगाम लगानी आरम्भ कर देनी चाहिए। सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जहाँ तक हो सके ईश्वर को साक्षी मानकर अपने जीवन की डोर उसके हाथ में सौंप देनी चाहिएओ भोगना उतना ही कठिन होता है। मित्रता करना और उसे निभाना दोनों ही कठिन कार्य कहे जाते हैं। अपने अतिप्रिय मित्र को भी पलभर में अपना दुश्मन बनाया जा सकता है पर दुश्मन को अपना बनाना टेढ़ी खीर होता है। उन दोनों में परस्पर विश्वास हो जाना असम्भव नहीं पर कठिन अवश्य होता है क्योंकि अविश्वास की एक रेखा उनके मनों में छुपी रहती है। इसलिए उन दोनों में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आ सकता है।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

आत्मसम्मान

आत्मसम्मान

अपना आत्मसम्मान हर मनुष्य को बहुत प्रिय होता है। आत्मसम्मान मनुष्य की वह थाती होती है जिसके कारण वह समाज में सिर उठाकर चलता है। उस पर होने वाले तनिक से प्रहार को भी वह सहन नहीं कर पाता। यह आत्मसम्मान न हुआ मानो कोई शीशा है जो जरा-सी चोट लग जाने पर किरच-किरच होकर बिखर जाता है। यद्यपि यह आत्मसम्मान कोई शरीर नहीं है परन्तु फिर भी हर बात पर घायल हो जाने के लिए बेताब रहता है। कोई भी चोट यह सहन नहीं कर पाता।
             यह सत्य भी है कि आत्मसम्मान मनुष्य के लिए बहुत ही आवश्यक है। उसके बिना उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वैसे देखा जाए तो जिस व्यक्ति को अपने सम्मान की चिन्ता नहीं रहती वह जीवित होते हुए भी मृत के समान है। वास्तव में सम्मान की कामना हर व्यक्ति करता है। कहते हैं कि जहाँ मान व सम्मान न मिले वहाँ भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। फिर आत्मसम्मान की बात कुछ अलग ही है। जिस व्यक्ति को अपना आत्मसम्मान प्रिय नहीं है, वह तो इन्सान कहलाने के योग्य भी नहीं है। इसीलिए मनीषी कहते हैं- 
          मानो हि महतां धनम्।
अर्थात् मान ही महान लोगो का धन है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनस्वी लोग अपने जीवन को अभावों में जी लेंगे पर अपने स्वाभिमान को ठेस नहीं लगने देते। उनके लिए उनका मान यानी स्वाभिमान या आत्मसम्मान ही सर्वोपरि होता है, अन्य शेष कुछ भी उन्हें चाहिए नहीं होता।
             इसे हम नाक का प्रश्न भी कह सकते है। स्वाभिमानी व्यक्ति किसी को भी अपनी पगड़ी उछालने नहीं देते। वे स्वयं भी सावधान रहते हैं कि उनके द्वारा किसी का सम्मान न रौंदा जाए। यहॉं हम एक उदाहरण लेते हैं। अग्नि जब अपने उत्कर्ष पर होती है यानी उसमें सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य होती है। उसमें तेज में होता है तो सभी जीव-जन्तु उससे डरते हैं, उसके पास जाने से कतराते हैं। जब वही आग जब राख बन जाती है तो चींटियाँ भी उस पर चलने लगती हैं।
              स्वाभिमानी व्यक्ति टूट सकते हैं पर किसी के आगे अनावश्यक रूप से झुकते नहीं है। वे चाहते है कि उन्हें कोई खाने के लिए दे चाहे न दे परन्तु उनके आत्मसम्मान को ठेस न लगाए। वे दुनिया के हर सुख व ऐश्वर्य को इसके लिए बलिदान कर सकते हैं। महाराणा प्रताप, गुरु गोबिन्द सिंह आदि स्वाभिमानी व्यक्तियों के बलिदानों से इतिहास के पन्ने भरे हुए हैं जिन्होंने अपने देश, धर्म व समाज के लिए अपनी व अपने बच्चों तक की परवाह नहीं की। इसीलिए वे आदरणीय हमारे हृदयों में बसते हैं। हम उनके लिए प्रात:स्मरणीय विशेषण का प्रयोग करते हैं।
             इसके विपरीत ऐसे लोग भी दुनिया में होते हैं जो अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर अपने तुच्छ स्वार्थो को महत्त्व देते हैं। उन्हें कोई कुछ भी कह ले, चिकने घड़े की तरह उन पर कोई असर नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है -
      बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैय्या।
अर्थात् वे हर रिश्ते या सम्बन्ध को केवल पैसे के तराजू पर तौलते हैं। इसीलिए उनके मायने अलग ही होते हैं। उन्हें लोग डीठ, चापलूस, चिकना घड़ा अथवा चाटूकार आदि विशेषणों से नवाजते हैं। ये लोग अपनी तथाकथित प्रशंसा को सुनकर बस दाँत निपोरकर रह जाते हैं। 
            ऐसे लोगों का यही मन्त्र होता है कि दुनिया भाड़ में जाए, बस इनके स्वार्थों की पूर्ति किसी भी तरह से होती रहनी चाहिए। ये किसी भी हद तक गिरकर अपना काम्य पाना चाहते हैं। रिश्वतखोरी, हेराफेरी, लूटपाट करने में इन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे ही लोग अपने स्वार्थ पूर्ति करने में इतने अन्धे हो जाते हैं कि अपने देश व धर्म का सौदा करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग अपने ही देश के गुप्त दस्तावेजों को चन्द टुकड़े लेकर शत्रु देश को बेच देने का दुस्साहस करते हैं। 
            उन्हें इस बात का तनिक भी भय नहीं लगता कि शत्रु देश यदि अपने देश पर आक्रमण करेगा तब न जाने कितने वीरों को उनके कारण अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। देश पर युद्ध का अनावश्यक बोझ बढ़ जाने से उन्नति के कार्य प्रभावित हो जाएँगे। चारों ओर त्राहि-त्राहि होने लगेगी। ऐसे देशद्रोही लोग पकड़े जाने पर अपना सारा जीवन सलाखों के पीछे ही व्यतीत करते हैं। अपने कुत्सित कर्मों के कारण ही वे‌ अपने देश और अपनों के लिए कलंक बन जाते हैं।
             मनुष्य को अपनी इच्छाओं को अपने मेहनत के बलबूते पर पूर्ण करना चाहिए। स्वार्थों को अपने ऊपर इतना अधिक हावी नहीं होने देना चाहिए कि वह कुमार्ग पर चलकर तिरस्कार का पात्र बन जाए। अपना आत्मसम्मान बचाए रखने का सदा प्रयत्न करना चाहिए। उसे किसी भी मूल्य पर गँवाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 10 मार्च 2026

जीव की पहचान अपनी जाति से

जीव की पहचान अपनी जाति से  

हर जीव अपनी जाति से पहचाना जाता है। इसका अर्थ यही है कि हम मनुष्य हैं, वे पशु हैं, पक्षी हैं अथवा जलचर और नभचर हैं इत्यादि। ईश्वर ने यही वर्गीकरण करके जीवों को इस संसार मे भेजा है। उसके विभाजन में बिल्कुल स्पष्टता है। शेष सब मानव मस्तिष्क की खुराफात है। इसी मानव ने अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करके अनावश्यक ही मनुष्यों को विभिन्न जातियों में बॉंटने का अपराध किया है।
        न्यायदर्शन का कथन है -
          समान प्रसवात्मिका जाति:।
अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में समान बुद्धि पैदा करने वाली जाति है।
           न्यायदर्शन हमें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि एक समान बुद्धि वालों की एक ही जाति होती है। इस तथ्य को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि विद्वान, मूर्ख आदि के प्रकार से यदि जातियों का विभाजन किया जाए तो शायद अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा।
            ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि जातियों का विभाजन उनके गुण और कर्म के आधार पर किया गया। यह विभाजन कोई रूढ़ नहीं था। चारों जातियों के लोग यदि अपना कर्म परिवर्तित कर लेते थे तो उस कर्म के अनुसार ही उनकी जाति भी बदल जाती थी। 
            संस्कृत भाषा के कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक 'राजतरंगिनी' में लिखा है कि दुनिया में प्राय: देखा गया है कि सब जीवों को अपनी ही अपनी ही जाति वालों से भय होता है। वे कहते हैं कि बाज पक्षियों को मारता है, शेर वन में पशुओं को मारकर खा जाता है, मणियाँ हीरों के द्वारा भेदी जाती हैं, कुदाल से पृथ्वी खोदी जाती है, वायु के द्वारा पुष्प गिराए जाते हैं और सूर्य के द्वारा नक्षत्र निस्तेज कर दिए जाते हैं।
           कवि कल्हण का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वे कहते हैं, 'हम मनुष्यों की बात करें तो वे जाति के नाम पर जो भी अत्याचार और अनाचार करते हैं, वे किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं। हर दूसरे दिन ऐसे हृदय विदारक समाचार सोशल मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। एक-दूसरे के सिर पर दोष मढ़कर सभी लोग अपना पल्लू झाड़कर बचकर निकल जाना चाहते हैं। उच्च जाति का यह घमण्ड मानव समाज को रसातल की ओर ले जा रहा है।' 
         भगदत्त जल्हण ने 'सुक्तिमुक्तावली' नामक अपने ग्रन्थ में कहा है -
          शुनक: स्वर्णपरिष्कृतगात्र: 
              नृपपीठे विनिवेशित: एव।
          अभिषिक्तश्च जलै: सुमुहुर्ते
                न जहात्येव गुणं खलु पूर्णम्॥
अर्थात् कुत्ते को स्वर्ण अलंकारों से विभूषित करके राजसिंहासन पर बैठाकर यदि अच्छे मुहुर्त में जल से अभिषेक कर दिया जाए तो भी कुत्ता अपना जातिगत गुण नहीं छोड़ता।
          हर मनुष्य को बराबर समझने वाले विचार तो न जाने कहीं खोते जा रहे हैं। इसका खमियाजा समस्त मानव जाति को भुगतना पड़ रहा है। 
          जैन आचार्य और दार्शनिक वाचकवर श्री उमास्वाति (उमास्वामी) महाराज ने अपने ग्रन्थ 'प्रशमरतिप्रकरण' में हमें समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है, 'ससार में परिभ्रमण करते हुए लाखों-करोड़ों बार जन्म लेकर असंख्य बार प्राप्त हुई नीच, ऊँच और मध्यम अवस्थाओं को  जानकर कौन बुद्धिमान जातिमद करेगा? कर्मवश संसारी प्राणी इन्द्रियों की रचना से उत्पन्न होने वाली विभिन्न जातियों में जन्म लेता रहता है। यहाँ पर किसकी, कौन-सी जाति स्थायी रह सकती है? इसलिए जाति का घमण्ड नहीं करना चाहिए।'
             पता नहीं कितने जन्मों में हम अपने कृत कर्मों के अनुसार किस-किस जाति में जन्म लेकर आए हैं तो फिर यह ऊँच-नीच का भेद करने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। छोटे या बड़े किसी भी मनुष्य के बिना हम अपने जीवन में आगे नहीं चला सकते। हमें अपने दैनिक जीवन में हर प्रकार के व्यवसाय के व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके बिना हम स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। उस समय मानो चक्का जाम हो जाता है और हम परेशान हो जाते हैं।
          निम्न मन्त्र विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' के प्रथम मण्डल का 25वाँ सूक्त से है। इसके ऋषि शुनःशेप आजीगर्ति हैं और देवता वरुण हैं। यह मन्त्र पापमुक्ति और जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना का प्रतीक है -
          उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पांश माध्यम चृत।
          अवाधमानि जीवसे।
अर्थात् हे वरुण! देव हमें ऊपरी बन्धनों (पापों) से मुक्त करो, मध्य के बन्धनों को खोल दो और निचले बन्धनों को भी ढीला कर दो ताकि हम जीवित रह सकें और धर्म के मार्ग पर चल सकें। 
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 9 मार्च 2026

बालसुलभ चेष्टाऍं

बालसुलभ चेष्टाऍं

बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं को देखते हुए हम सभी बहुत आनन्दित होते हैं। बालसुलभ चेष्टाऍं बच्चों की स्वाभाविक, मासूम और निश्छल प्रवृत्तियाँ होती हैं जो निस्वार्थ खुशी और चंचलता दर्शाती हैं। खिलखिलाकर हँसना, जिद्द करना, निर्भीकता से जिज्ञासु प्रश्न पूछना, रंगों से प्रेम, शरारत करना और हर छोटी-बड़ी बात पर खुश होना शामिल है। ये व्यवहार बच्चों की मासूमियत का ऐसा प्रतीक होता हैं जो बड़े लोगों में भी आनन्द भर देता है। 
        प्रतिदिन उनकी किसी भी माँग को माता-पिता के न मनाने पर रूठना और मानना, बात-बात पर जिद करना आदि अच्छा लगता है। इन सभी मौकों पर हम मुस्कुराकर रह जाते हैं। उनके ये सभी क्रिया-कलाप हमें मानसिक सन्तोष देते हैं। एक प्रकार से हम उन क्षणों में स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं। कभी-कभी हम बड़े भी बच्चों की प्रसन्नता के लिए जान-बूझकर उनसे वैसा ही रूठने, मानने या जिद करने का अभिनय करते हैं। इस प्रकार जीवन अपनी ही गति से निरन्तर चलता रहता है।
        छोटे बच्चे गिरते-पड़ते जब ठुमकते हुए चलते हैं तो वे हर किसी के आकर्षण का पात्र बन जाते हैं। इनके गिरने पर कष्ट भी होता है। चोट लगने पर जब ये रोते हैं तब बड़े इन्हें बहला देते हैं कि फर्श टूट गया है अथवा चींटी मर गई है। उसी पल वे रोना भूलकर उठ खड़े होते हैं और पहले की ही तरह बर्ताव करने लगते हैं। उनकी ये मासूम हरकतें बड़ी मनमोहक होती हैं। घर के सब लोग इसका आनन्द लेते हैं।
           छुपन-छुपाई का खेल जब वे खेलते हैं तब उनका अलग ही रूप दिखाई देता है। एक ही स्थान पर बैठे हुए बड़े जब यह कहते हैं, "हमें तो वह दिखाई ही नहीं दे रहा, पता नहीं कहाँ चला गया है? चलो उसे ढूँढो।"
           यह सुनते ही वह हँसते हुए आकर कहने लगता है, "मैं तो यहाँ हूँ।"
            बच्चों की ये सभी सरल क्रीड़ाएँ अनायास ही मन्त्रमुग्ध कर लेती हैं। उनकी इन मनोहारी चेष्टाओं पर माता-पिता व अन्य सभी बलिहारी होते रहते हैं।
            हर अवसर पर उनका बात-बात पर उन्मुक्त होकर खिलखिलाना, हर किसी को आनन्दित करता है। इन्सान चाहे कितना भी परेशानियों में क्यों न घिरा हो पर छोटे बच्चे जब गोद में बैठकर प्यार करते हैं तब कुछ समय के लिए मनुष्य अपने सारे कष्ट और परेशानियॉं भूल जाता है। तब वह बच्चे के साथ बच्चा बन जाता है। बच्चे जब बड़ों के साथ खेलते हैं तो हार जाने पर रोने लगते हैं, चीटिंग करने का आरोप लगाते हैं और फिर भाग जाते हैं। उनकी ये हरकतें मन को मोह लेती हैं।
           कितनी ही सख्या में बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों, वहाँ उतनी रौनक और खुशगवार माहौल नहीं बन पाता जितना एक बच्चे के आने पर हो जाता है। सभी लोग उस बच्चे के साथ बच्चा बनकर आनन्दित होने लगते हैं। उस समय सारा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। सभी लोग उन पलों को सहेज लेना चाहते हैं।
             किसी भी बात को न समझ पाने पर इनके भोले-से मुखड़े पर आया आश्चर्य का भाव वाकई देखने लायक होता है। इनके बालसुलभ प्रश्नों की बौछार का उत्तर देते हुए सब थक जाते हैं। ये बच्चे हैं कि नित नए प्रश्नों के साथ बार-बार हाजिर हो जाते हैं। डाँट खाने के बाद थोड़े समय के लिए अवश्य चुप लगाते हैं। फिर बिना बुरा माने, बिना नाराज हुए उनका वही क्रम पुन: आरम्भ हो जाता है। यानी फिर से प्रश्नों की झड़ी।
             बच्चों में छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, तेरे-मेरे आदि की सभी भावनाएँ नहीं होतीं। हम समझदार लोग ही उनके निष्कपट हृदयों में इन बुराइयों को भरते हैं। उन्हें सरल से विषाक्त बनाने का कार्य हम बखूबी निभाते हैं। हम अपने गिरहबान में झाँकने के बजाय फिर बाद में यह कहने से भी नहीं चूकते कि आजकल के बच्चे बहुत चालाक अथवा घाघ हो गए हैं। इन लोगों को छोटे-बड़े का लिहाज करना ही नहीं आता।
               इन्हें हम बड़े अपने स्वार्थ के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। कोई भी लालच देकर घर में एक-दूसरे की जासूसी इन मासूमों से करवाते हैं जो एकदम गलत है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उनमें लालच बनकर पनपने लगती है। बड़े होकर जब वे किसी माँग को पूरा करने के लिए पैसा या अपनी जरूरत की कोई वस्तु माँगते हैं तब उस समय हमें बहुत बुरा लगता है। उस समय हमें याद नहीं आता कि यह गलत संस्कार हमीं ने उसे दिए हैं।
              ये बाल सुलभ चेष्टाऍं बच्चों के बचपन की मासूमियत को जीवित रखती हैं। ये बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य कही जाती हैं। हम बड़ों की सच्ची-झूठी बातों को अक्षरश: सत्य मानने वाले इन बच्चों को यदि हम सरल हृदय ही रहने दें तो समाज का ढाँचा ही कुछ और हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 8 मार्च 2026

माता-पिता की बादशाही

माता-पिता की बादशाही

सुनने और पढ़ने में शायद सबको यह वाक्य कुछ अटपटा-सा लग सकता है परन्तु यह बहुत सारगर्भित है। हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे -     
       माता-पिता की बादशाही होती है
       और भाई-बहनों का व्यापार।
इसके समर्थन में हम यह कह सकते हैं कि जब तक माता-पिता अथवा उनमें से एक भी जीवित होता है तब तक मनुष्य अधिकार पूर्वक उनके समक्ष अपनी इच्छा रख सकता है। वे भी ऐसे होते है जो बच्चों की इच्छाओं को यथासम्भव पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बच्चों की माँग उनकी सामर्थ्य से परे की हो जाती है। फिर भी बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, ऐसा सोचकर वे उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
            बच्चे माता-पिता से कभी रूठते हैं और कभी मानते हैं। उनसे जिद करके वे अपनी बातें मनवा लेते हैं। वे यह भी ध्यान नहीं रखते कि जिस वस्तु के लिए वे जिद कर रहे हैं, उसे लाकर देना उनके माता-पिता के बूते की बात है या नहीं। वे माता-पिता भी अपने बच्चों की मुँह से निकली बात को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। न वे दिन देखते हैं और न ही रात की परवाह करते हैं। बस उन्हें एक ही धुन होती है कि कैसे भी करके बच्चे की मॉंग को पूरा करना है।
            दुर्भाग्यवश यदि अभाव का समय आ जाए तब वे अपने मुँह का निवाला भी बच्चों को दे देते हैं, ताकि उनके बच्चे भूखे न सोएँ। सारा जीवन अपने बच्चों के होठों पर मुस्कान बनाए रखने के लिए स्वयं दिन-रात खटते रहते हैं। उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने के लिए किए गए अपने श्रम को वे कुछ मानते ही नहीं हैं। वे बस अपने बच्चों को जीवन में सफल देखकर मुस्कुराना चाहते हैं। उनका बस चले तो दुनिया की सारी खुशियाँ अपने बच्चों की झोली में डाल दें। हम अपने आसपास देखते हैं कि शारीरिक अक्षमता वाले बहुत से बच्चे उच्च पदों पर कार्यरत हैं। यह असम्भव कार्य माता-पिता के परिश्रम का फल है।
           अपने बच्चों के शादी-ब्याह आदि शुभकार्यों को सम्पन्न करते समय उनके चेहरों पर आए हुए सन्तुष्टि के भाव देखते ही बनते हैं। ऐसे माता-पिता बच्चों से कोई आशा नहीं रखते। वे बस अपने बच्चों के जीवन की मंगल कामना करते नहीं अघाते।
          यदि कोई बच्चा शारीरिक या आर्थिक रूप से कमजोर होता है तो उस पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि रहती है। उनकी यही सोच होती है कि उनका वह कमजोर बच्चा भी ऐसी स्थिति में आ जाए ताकि उसे किसी का मुॅंह न देखना पड़े। वे चुनौतियों का सामना करते हुए थकते नहीं हैं। उसे भी अपने गुजर-बसर लायक बना ही लेते हैं।
            माता-पिता का स्थान इस संसार में कोई नहीं ले सकता। बच्चों के प्रति उनके ऐसे त्याग और समर्पण के कारण ही उनके लिए बादशाही शब्द का प्रयोग हमारे सयानों ने किया है। वे बच्चों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भी अनदेखा करके उनकी मंगल की कामना करते हैं। वे दुनिया की नजरों से छुपाकर भी बच्चों को यथाशक्ति देते रहते हैं। बेटियों के प्रति उनका विशेष ममत्व होता है। वे कितनी भी बड़ी हो जाऍं माता-पिता उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से देते ही रहते हैं।
          उनके अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते लेन-देन के व्यवहार पर चलते हैं। चाहे वह सम्बन्ध भाई-बहन का हो, दोस्तों का हो अथवा अन्य रिश्तेदारों का हो। जितना प्यार और सम्मान उनको दोगे, उतना ही पाओगे। उनके साथ न जिद की जा सकती है और न ही अपनी माँग को दृढ़तापूर्वक मनवाया जा सकता है। जितना दूसरों के बरतोगे उतना ही वे बरतेंगे। यदि उन लोगों के साथ कदम मिलाकर चलोगे तभी वे भी साथ निभाएँगे अन्यथा वे किनारा कर लेने में पलभर की देरी नहीं करते। इसका कारण यही है कि कोई भी व्यक्ति अपनी अवहेलना सहन नहीं कर सकता। हर व्यक्ति स्वयं को ईश्वर से कम नहीं समझता।
              इसीलिए माता-पिता के सम्बन्ध के अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हुए होते हैं। जहाँ तक स्वार्थ पूरे होते रहते हैं, वहीं तक सम्बन्ध बने रहते हैं। जहाँ पर जरा-सी लापरवाही हुई, वहाँ वे टूटकर बिखर जाते हैं। उस समय परस्पर दूरियाँ बढ़ जाती हैं। यदि इन सम्बन्धों को बचाए रखना चाहते हैं तो रिश्तों की गरिमा का ध्यान रखना आवश्यक होता है। माता-पिता के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं होती। वे सदैव अपने बच्चों का हित साधते रहते हैं।
             माता-पिता की महानता और उनकी बच्चों के प्रति सहृदयता के कारण ही उनके काल को बादशाही का समय कहा गया है। उनके निस्वार्थ व्यवहार के आगे दुनिया के सभी सम्बन्ध बौने हैं। इसीलिए माता-पिता को ईश्वर का रूप कहा जाता है। उनकी जितनी भी सेवा की जाए कम होती है। उनके आशीर्वाद भी स्वार्थ रहित होते हैं। उन्हें अपने जीवन काल में लेते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 मार्च 2026

हृदय ही ब्रह्म

हृदय ही ब्रह्म

हृदय शब्द की यह व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहती है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन सन्तानें हैं- देव, मनुष्य और असुर। 
          हृदय शब्द तीन अक्षरों से बना है- हृ+द+य। वैदिक व्याकरण में इनका अर्थ बताया है- हृ का अर्थ है 'हरति' अर्थात् लाना। द का अर्थ है 'ददाति' अर्थात् देना और य का अर्थ है 'याति' अर्थात् जाना।
           जो इस रहस्य को समझ लेते हैं कि हृदय ही सब कुछ है यानी कि वही ब्रह्मा है, वही प्रजापति है। अपने और पराए सभी उसे उपहार लाकर देते हैं। जो इसे पूरी तरह जान लेता है वही स्वर्गलोक को जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वह सभी प्रकार से सुखी रहता है।
              हमारे भीतर का आध्यात्मिक केन्द्र यानी आत्मा ही परम सत्य, सर्वोच्च चेतना या ब्रह्म है। इससे स्पष्ट होता है कि हृदय मात्र एक शारीरिक अंग नहीं बल्कि वह असीम, शुद्ध, शान्त और अमर दिव्य शक्ति है। वह ब्रह्माण्ड का मूल है। स्वयं को जानने-समझने और परमात्मा से एक होने की यह अनुभूति है। हृदय में सर्वोच्च चेतना वास करती है और सम्पूर्ण अस्तित्व को बनाए रखती है। यह आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) की ओर ले जाती है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य सार को अनुभव करता है। 
          मेडिकल की भाषा में कहें हम तो सब जानते है कि हृदय मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है। यह जब तक  ठीक से कार्य करता रहता है तब तक ही मनुष्य स्वस्थ रहता है। जहाँ इसमें विकार आया वहीं से परेशानी आरम्भ हो गई। यह लेता है, देता है और चलता है। इसका कार्य रुधिर का लेना और देना होता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को लेकर फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को वापिस लौटा देता है। इसी उद्देश्य को लेकर यह निरन्तर गतिमान रहता है। यह न दिन देखता है और न रात, बस चलता ही रहता है। इस प्रकार हृदय शब्द के अर्थ से रुधिर की गति अथवा बल्ड सर्कुलेशन का भाव आ जाता है।
             यदि यह हमारी तरह सोचने लगे कि वह वर्षों से चलते-चलते, अपना काम करते हुए थक गया है। अब उसे भी आराम करना चाहिए तो वहीं, उसी पल इस मनुष्य के जीवन का अन्त हो जाता है। जिसे डॉक्टर लोग कहते हैं कि मृतक का हार्ट फेल हो गया है और वह इस दुनिया में विदा लेकर जा चुका है।
          अभी ऊपर इसकी तीन सन्तानों की हमने चर्चा की थी। पहली सन्तान है देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते है, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खानपान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को सन्तुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं उन्हें दुखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खानपान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं।
          दूसरी सन्तान है मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर बन जाते हैं। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है। जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु यदा कदा असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। उस समय शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ निश्चित ही धन व समय की बर्बादी करता है।
              इसकी तीसरी सन्तान हैं असुर। वे हर नियम को, हर बन्धन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं। उनका वश चले तो सारे एक्सपेरिमेंट इसी जीवन में अपने शरीर पर कर डालें। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियन्त्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है।
              खाने-पीने, सोने-जागने यानी कि आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक बन जाती है। यह शरीर दिन-प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे। वह अब इन रोगों से और अधिक लड़ने में समर्थ नहीं है। 
           अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे सदा बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद