बुधवार, 15 जुलाई 2026

अपने हित के लिए रास्ता निकालना

अपने हित के लिए रास्ता निकालना 

बुद्धिमान व्यक्ति हर स्थिति में अपने हित के लिए रास्ता निकाल लेता है। मनीषियों का कथन है कि किसी से बदला लेने के स्थान पर सदा बदलाव लाने पर विचार करना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से देना कोई महानता का कार्य नहीं होता। दूसरे को शय देना अथवा उससे डरकर जीवन जीना एक नकारात्मक तरीका कहलाता है। इससे बचना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।
           जीवन को व्यहारिकता से चलने वाला मनुष्य कभी जीवन की रेस में पिछड़ता नहीं है। समझदारी इसी में है कि यदि कोई ईंट फैंके तो उसका जवाब पत्थर से न दिया जाए। उस व्यर्थ जाती हुई ईंट को नष्ट न करके उससे अपना घर बना लेना चाहिए। इस प्रकार शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को मुँहतोड़ उत्तर देना ही बुद्धिमत्ता की निशानी होती है। यह सकारात्मक तरीका है जिससे अपनी मानसिक शान्ति भंग नहीं होती और दूसरे को भी मुँह की खानी पड़ जाती है।
          मनुष्य का भाग्य बड़ा ही प्रबल होता है। जब  किस्मत के सिक्के को हवा में उछला जाता है तभी तक हार-जीत का अनुमान लगाए जाता है। जब वह नीचे जमीन पर आकर गिर जाता है तब उसके भाग्य का फैसला सुना दिया जाता है कि वह हार गया है या जीत उसकी झोली में आई है।
          हम लोग अपने कर्मों के द्वारा अपना भाग्य लिखते हैं। यहाँ हम कागज और पत्थर के नसीब की चर्चा करते हैं। वही कागज होता है जिस पर हम लिखते हैं और कुछ समय पश्चात उसकी पुड़िया बनाकर उसमें सामान बेचा जाता है। लोग उस सामान का उपयोग करके उसे कूड़ेदान में फैंक देते हैं। दूसरी ओर उसी कागज पर हमारे धर्म ग्रन्थ लिखे जाते हैं जिन्हें लोग अपने सिर माथे पर रखते हैं, उनका नित्य पाठ करके उनकी पूजा करते हैं। उसके पश्चात उसे सुन्दर से वस्त्र में लपेटकर सम्हाल देते हैं।
          इसी तरह सड़क पर पड़े हुए पत्थर सबके पाँव से ठोकर खाते रहते हैं। लोग उसे अपने पैर से ठोकर मारकर एक किनारे कर देते हैं। इसके विपरीत कुछ भाग्यशाली पत्थर ऐसे होते हैं जिन्हें सुघड़ हाथों से तराशकर भगवान की मूर्ति बनाई जाती है। उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है। लोग प्रात:काल और सायंकाल वहॉं आकर उस मूर्ति की पूजा करते हैं।
           मनुष्य को हर परिस्थिति में अपना आत्मसम्मान बचाकर रखना चाहिए। उसे कुचलकर वह निर्जीव जैसा हो जाता है। सहनशीलता रूपी बहुमूल्य गुण का उसे पालन करना चाहिए। निसन्देह महात्मा बुद्ध आदि महापुरुषों की तरह सहनशीलता के अस्त्र से किसी को भी परास्त किया जा सकता है। सबका यथायोग्य सम्मान करना चाहिए परन्तु आत्मसम्मान की शर्त पर कभी नहीं। इसलिए सम्मानपूर्वक जीवन जीकर अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाना हर व्यक्ति के लिए बहुत आवश्यक होता है। अतः अपने आत्माभिमान को कभी दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
          जितनी खुशियाँ मनुष्य जीवन पथ पर चलते हुए बाँटता जाता है उतना ही उसका कद बढ़ता रहता है। एक मोमबत्ती से हजारों मोमबत्तियों को जलाया जा सकता है, फिर भी उसके प्रकाश में कहीं कोई कमी नहीं आती। उसी तरह दूसरों को खुशियाँ बाँटने वाले मनुष्य की खुशियाँ भी कभी कम नहीं होतीं बल्कि मोमबत्ती के प्रकाश की तरह बढ़ती रहती हैं। अपने पास आने वाले सभी लोगों को वह आनन्दित करता रहता हैं।
          महत्त्व इस बात का नहीं होता कि मोमबत्ती अमीर व्यक्ति के महल में जल रही है अथवा किसी गरीब व्यक्ति की झोंपड़ी में जल रही है। उसकी सार्थकता मात्र उसके प्रकाशित होने में होती है, अन्धेरे से मुक्ति दिलाने में होती है। इसी प्रकार मनुष्य के खुशनुमा व्यवहार की चर्चा हमेशा करनी चाहिए। उसकी जाति, रंग रूप आदि अन्य बातों को नजरंदाज कर देना चाहिए।
          किसी भी कीमत पर इस जीवन के मूल उद्देश्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए। संसार में स्वाभिमान के साथ सहनशील रहकर अपने चारों ओर खुशियाँ बिखेरने वाला ही वातावरण को सुगन्धित कर सकता है। अपने लिए, अपने घर-परिवार और अपने बन्धु-बान्धवों के लिए तो सभी जी लेते हैं। इसीलिए वास्तव में जो दूसरों के लिए जीता है, उसी को इन्सान कहते हैं और वही महान होता है। उसका यश चारों दिशाओं में फैलता है। लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

उस मनुष्य से बढ़कर इस संसार में बड़भागी अथवा सौभाग्यशाली व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता जिसके घर पर बन्धु-बान्धवों अथवा आगन्तुकों की चहल-पहल रहती है। मनुष्य वही बड़ा होता है जिसके द्वार पर कोई सहायता माँगने के लिए आता है। उसे अपने ऊपर मान होना चाहिए पर घमण्ड नहीं कि उसे किसी ने इस योग्य समझा कि उसके पास आकर वह अपनी समस्या का वह निदान कर सकता है।
          कोई भी व्यक्ति किसी के पास बहुत आशा लेकर आता है। कोई मनुष्य किसी के पास तीन कारणों से आता है- भाववश, अभाववश अथवा प्रभाववश।
           व्यक्ति यदि सच्चे मन से किसी भावना से आया है तो उसे उस समय प्रेम की आवश्यकता होती। इसलिए उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हो सकता है वह अपनी मूर्खता से या अपनी किसी मजबूरी के कारण समाज से कटकर अलग-थलग पड़ गया हो। उसे अनचाहे अवसाद के समय शायद किसी अपने के भावनात्मक सहारे की जरूरत हो। यदि मनुष्य ऐसा कर सके तो वह व्यक्ति उस सहारा देने वाले का सदा के लिए अपना बन जाता है।
          समय और परिस्थितियों के कारण कोई अभावग्रस्त व्यक्ति किसी पास जाता है तो यथासम्भव उसकी मदद अवश्य ही करनी चाहिए। उसे इन्कार करके निराश नहीं करना चाहिए। पता नहीं वह व्यक्ति कितना मजबूर होगा जो अपने जमीर को मारकर सामने वाले से सहायता माँगने आया है। कबीरदास जी कहते हैं-  
       मॉंगन गये सो मर रहे, मरै जु मॉंगन जाहि।
        तिनते पहिले वे मरे, होत करत है नाहि।।
अर्थात् यदि कोई किसी से कुछ मॉंगने जाता है तो समझ लो कि वह मर गया। परन्तु उसके पहले वह व्यक्ति मर चुका होता है जो दान देने की स्थिति में होकर भी देने से इन्कार कर देता है।
            रहीमदास का यह दोहा द्रष्टव्य है, इसमें उन्होंने ने भी इसी भाव को व्यक्त किया है -
     रहिमन वे नर मर चुके, जो कहुॅं मॉंगने जाहिं।
     उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि जो मॉंगने जाते हैं, वे मरे हुए के समान होते हैं। परन्तु उनसे पहले वे मर जाते हैं जो होते हुए भी न कह देते हैं।
         इसलिए अपने पास आए उस मजबूर व्यक्ति की आशा को निराशा में न बदलते हुए एक अच्छे सामाजिक इन्सान होने का परिचय देना चाहिए। इसी प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते रहने से संसार के सभी व्यवहार चलते हैं। समृद्ध व्यक्ति की सहायता कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। वहाँ तो इस प्रकार के लेनदेन का व्यापार होता ही रहता है।
            यदि किसी प्रभावशाली के पास कोई मनुष्य उसके प्रभाव के कारण से आया है तो इस बात के लिए प्रसन्न होना चाहिए कि परमात्मा ने उसे इतनी सामर्थ्य दी है कि वह किसी के काम आ सकता है। ऐसी स्थिति में किसी की सहायता करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसे अपना सौभाग्य ही समझना चाहिए कि सारा शहर छोड़कर वह व्यक्ति आपके पास आया है किसी और के पास नहीं गया। उसे आपसे कुछ अच्छाई की उम्मीद होगी, तभी तो आपकी शरण में सहायता लेने आया है।
          इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किस्मत की एक आदत है कि वो पलटती जरुर है और जब पलटती है तब सब कुछ उलट-पलट करके रख देती है। जीवन में ऐसी विपरीत स्थिति किसी भी व्यक्ति की हो सकती है। इसलिए अच्छा समय आने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और कष्टदायी समय में धैर्य रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके अपनी उन्नति के समय अपने हाथों से कुछ ऐसे काम कर लेने चाहिए जिससे मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सके।
          दूसरा व्यक्ति किसी के पास चाहे भाव के कारण, अभाव से त्रस्त होकर अथवा रुतबे से प्रभावित होकर आया है, यानी किसी भी परिस्थिति के वशीभूत होकर आया है, उसे निराश नहीं करना चाहिए। समय पर उसके सिर हाथ रख देने से वह कृतज्ञ होकर उसका मुरीद बन जाता है। इस प्रकार मनुष्य के हितचिन्तकों की संख्या बढ़ती रहती है। मनुष्य की पहचान उसके बन्धु-बान्धवों और मित्रों से होती है। वे उसके अपने बन गए तो मानो वह जिन्दगी की जंग जीत गया अन्यथा कुचलने के लिए तो जमाना तैयार ही बैठा हुआ है।
          बस शर्त एक ही है कि मनुष्य को किसी की सहायता करने का घमण्ड नहीं करना चाहिए, उसे केवल अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। उसे अपने किए गए परोपकार के कार्यों को यहाँ वहाँ गाते नहीं फिरना चाहिए। ऐसा करने से सम्मान के स्थान पर उसे लोगों की अपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
          मनुष्य को सदा इस बात के लिए परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने इस संसार में भेजकर उसे इस योग्य बनाया है कि वह किसी दूसरे के काम आ रहा है।      
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

धन्य है आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता

धन्य हैं आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता  

धन्य हैं वे माता-पिता जिनकी आज्ञाकारी सन्तान आजन्म उनका मान-सत्कार करती है। ईश्वर के तुल्य समझते हुए जिन्दगी के हर मोड़ पर मन से उनकी देखभाल करती है, बिना कहे उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। कभी उनके मन में यह विचार तक नहीं आने देती कि उनके माता-पिता यह सोचने पर विवश हो जाएँ कि काश यह हमारी सन्तान न होती। ऐसी सुयोग्य सन्तान पर हर माता-पिता को बहुत गर्व का अनुभव होता है।
           अपने बच्चों से बढ़कर माता-पिता के लिए और कोई नहीं होता। वे उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बना हुआ देखना चाहते हैं। वे यह भी कामना करते हैं कि उनके बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में एक सफल व्यक्ति बनें। दुनिया की सारी नेमते उनके कदमों में हो, किसी प्रकार का कोई अभाव अथवा परेशानी उनके पास फटकने भी न पाए। बच्चे का भविष्य बनाने के लिए वे सभी तरह के कष्ट हंसते हुए झेल लेते हैं।
           वाट्सअप पर यह बोधकथा पढ़ी थी। मुझे अच्छी लगी। सबके साथ इसे साझा करने की इच्छा हुई। कुछ संशोधनों के साथ आपके समक्ष यह कथा प्रस्तुत है। 
           सभी माता-पिता की तरह एक पिता ने भी अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की, उसे खूब पढ़ाया, लिखाया व उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा किया। पुत्र सफल इन्सान बनकर एक मल्टी नेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्य करने लगा। कम्पनी की ओर से उसे उच्च पद के साथ-साथ अच्छा वेतन व सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की गईं। 
          समय बीतते उसका विवाह एक सुन्दर व सुघड़ कन्या से हुआ। उसके घर एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। समय बीतते पिता भी बूढ़ा हो गया। बूढ़े पिता को एक दिन पुत्र से मिलने की उत्कट इच्छा हुई। वह उससे मिलने शहर उसके ऑफिस में गया। वहाँ पुत्र का शानदार ऑफिस देख पिता का सीना गर्व से फूल गया। उसके मातहत सैंकड़ों कर्मचारी कार्य कर रहे थे। 
            उसके चैम्बर में जाकर पीछे से उसके कन्धे पर हाथ रखकर प्यार से पुत्र से पूछा, "इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
            पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए यह कहा, "मेरे आलावा कौन हो सकता है?" 
           पिता पुत्र के उत्तर से निराश हो गया। उसे यह विश्वास था कि बेटा गर्व से कहेगा, "सबसे भाग्यशाली इन्सान आप है जिन्होंने मुझे योग्य बनाया।"
           उसकी आँखे छलछला गईं। दफ्तर से बाहर निकलने से पहले पुनः उन्होंने पीछे मुड़कर बेटे से पूछा, "बताओ  इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
          पुत्र ने इस बार अपने पिता से बार कहा, "पिताजी, वह तो आप हैं।"
          पिता आश्चर्यचकित हो गया और उसने पुत्र से‌ कहा, "अभी तो तुम स्वयं को इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान बता रहे थे।"
         पुत्र ने हंसते हुए कहा, "पिताजी उस समय आपका हाथ मेरे कन्धे पर था। जिस पुत्र के कन्धे पर या सिर पर पिता का वरद हस्त होता है, वह पुत्र दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है।" 
       ‌  पिता की आँखे नम हो आईं, उसने अपने पुत्र को गले लग लिया।
          सच बात है यह कि जिसके कन्धे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है वह इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है। पिता का वरद हस्त उसी इन्सान के सिर पर हो सकता है जो माता-पिता का आज्ञाकारी बच्चा होता है। जिसे उनकी परवाह होती है और उनके सुख-दुख का ध्यान रखता है। उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा का मान रखता है। तभी वह उनका आशीर्वाद भी पाने का अधिकारी बन पाता है।
         इसके विपरीत अपने माता-पिता का जो सन्तान वृद्धावस्था में बिल्कुल ध्यान नहीं रखती, उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना देती है, उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देती है, ऐसी सन्तान को न तो ईश्वर कभी क्षमा करता है और न ही घर-परिवार, बन्धु-बान्धवअथवा समाज। ऐसे नालायक बच्चों के लिए दुखी होकर माता-पिता के मुँह से यही बात निकलती है कि 'काश ये पैदा होते ही मर जाते।'
          भगवान श्रीराम और श्रवण कुमार जैसी पितृभक्त सन्तानों को ही संसार युगों-युगों तक स्मरण करता है और उनके उदाहरण दिए जाते हैं। ऐसे बच्चे सबकी ईर्ष्या का भाजन बनते हैं। यही समाज व देश की धरोहर होते हैं। माता-पिता के साथ सभी लोग उन पर मान करते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 12 जुलाई 2026

विश्व की प्राचीनतम भाषा

विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ 

संस्कृत भाषा निर्विवाद रूप से सम्पूर्ण विश्व की एक सम्मानित भाषा है। अन्य किसी भी भाषा पर विवाद हो सकता है परन्तु इस भाषा को सभी भाषाविद् एकमत से विश्व की प्राचीनतम भाषा मानते हैं। 
          सभी विद्वान् एकमत से 'ऋग्वेद' को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ मानते हैं। यह सनातन धर्म का सबसे पुराना वेद है। यह न केवल भारत का बल्कि विश्व का भी सबसे पुराना जीवित यानी पढ़ा जाने वाला साहित्यिक ग्रन्थ है। 'ऋग्वेद' की पुरानी पाण्डुलिपियों को यूनेस्को के 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर' में शामिल किया गया है। 'ऋग्वेद' को मौखिक परम्परा के माध्यम से सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किया गया था।
              संस्कृत भाषा को भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु संसार की सभी भाषाओं की जननी माना जाता है। उत्तराखंड प्रदेश की आधिकारिक भाषा इसे बनाया गया है।
            कुछ शताब्दियों पूर्व संस्कृत भाषा आधिकारिक तौर पर भारत की राष्ट्रीय भाषा थी। इसीलिए हमारे सभी ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गए हैं। बेशक लोगों को आज संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं है, फिर भी पूजा करते समय कुछ संस्कृत में श्लोक या मन्त्र गा लेते हैं। वैसे कर्नाटक प के मुत्तुर गांव के लोग केवल संस्कृत में ही बात करते है।
         नासा के अनुसार संस्कृत भाषा धरती पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है। संस्कृत भाषा का शब्दकोष बहुत समृद्ध है। इसमें 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है। संस्कृत भाषा में अनेक शब्द हैं जिनके लिए अनेक पर्यायवाची उपलब्ध हैं। आज नासा के वैज्ञानिक संस्कृत भाषा में ताड़पत्रों पर लिखी गई 60,000 पांडुलिपियों पर रिसर्च का कार्य कर रहे हैं।
          संस्कृत भाषा एक वैज्ञानिक भाषा है जो आधुनिक कमप्यूटर के लिए भी उपयुक्त भाषा है। फोर्बस मैगजीनन ने जुलाई1987 में संस्कृत को Computer Software के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था। किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे कम शब्दों में वाक्य पूरा हो जाता है। यानी कभी कर्त्ता और कभी क्रिया के बिना भी वक्ता अपनी बात को स्पष्ट कर सकता है।
          मजे की बात है कि इस भाषा में कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रम यदि बदल भी दिया जाए तो भी उस वाक्य के अर्थ में परिवर्तन नहीं होता।
          संस्कृत भाषा दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसका उच्चारण करते समय में  जीभ मुँह के अन्दर के सभी अवयवों का स्पर्श करती है। इस तरह मुँह की सभी मांसपेशियों की एक्सरसाइज हो जाती है। संस्कृत भाषा में वार्तालाप करने से मनुष्य का शरीरिक तन्त्रिका तन्त्र सक्रिय रहता है जिससे व्यक्ति का शरीर सकारात्म ऊर्जा के साथ सक्रिय हो जाता है। इसीलिए यह भाषा स्पीच थेरेपी में भी बहुत सहायक है। इस भाषा का प्रयोग करने से एकाग्रता बढ़ती है।
          आज भी संस्कृत  भाषा में कई पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। सुधर्मा नामक संस्कृत का पहला अखबार 1970 में आरम्भ हुआ था। आजकल इसे ऑनलाइन भी प्रकाशित किया जाता है।
           संस्कृत भाषा सीखने से दिमाग तेज हो जाता है और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए लंदन और आयरलैण्ड के कई स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य विषय बना दिया गया है। इस समय विश्व के सत्तरह से अधिक देशों के कम-से-कम एक विश्वविद्यालय में तकनीकी शिक्षा के कोर्स में संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है। जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियों की माँग है। वहाँ चौदह विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है। भारत के प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत विषय पढ़ाया जाता है। 
            अमेरिकन हिन्दू युनिवर्सिटी के विद्वानों का कथन है कि संस्कृत भाषा में यदि बातचीत की जाए तो मनुष्य बी.पी., मधुमेह, कोलेस्ट्रोल आदि रोगों से मुक्त हो जाता है। 
          हम भारतीय केवल अपनी भाषा के गौरव का गुणगान करते नहीं अघाते। परन्तु जहाँ बच्चों को इसे पढ़ाने की बारी आती है तो उन्हें विदेशी भाषा का मोह सताने लगता है।
           मैं यह नहीं कहती कि बच्चे दूसरी भाषाएँ न पढ़ें। ज्ञान तो जितना आत्मसात किया जाए उतना ही कम है। आयुपर्यन्त मनुष्य ज्ञानार्जन कर सकता है यदि उसमें ज्ञान पिपासा हो। इसे पढ़ने का अर्थ पण्डित बनना नहीं होता है। अपनी मिट्टी और जड़ों से जुड़े रहने के लिए इस देववाणी संस्कृत को भाषा बच्चों को अवश्य पढ़ाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 11 जुलाई 2026

धन-सम्पत्ति का संग्रह किसके लिए?

धन-सम्पत्ति का संग्रह किसके लिए ?

जीवनभर मनुष्य एक-एक पाई करके धन-सम्पत्ति का संग्रह करता है। जैसे बूँद-बूँद जल से घट भरता है, उसी प्रकार पैसा-पैसा जोड़कर वह अपने खजाने की वृद्धि करता है। अपने ऐशो-आराम के लिए दुनिया के सभी साधन जुटाता है। वह मन से चाहता है कि उसके परिवारी जन सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत करें। किसी भी दुख की काली परछाई तक उन्हें छू न सके।
          इसीलिए वह बच्चों को अच्छे-से-अच्छे स्कूल में पढ़ाता है। उच्च शिक्षा भी दिलाता है। देश में अन्यत्र अथवा विदेश में बच्चों को पढ़ने के लिए भेजता है। खुशी-खुशी उनके सारे खर्चों को वहन करता है। उन्हें योग्य बनता देखकर मन-ही-मन वह प्रसन्न होता है। अपने आपको वह दुनिया का सबसे सौभाग्यशाली इन्सान समझकर इतराता फिरता है। हर किसी से अपने बच्चों का परिचय बड़े गर्व से करवाता है। उसे अपने ऊपर मान होता है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा पिता या अच्छा पति है। चारों दिशाओं में सदा उसकी कर्मठता के डंके बजते रहते हैं।
          मनुष्य सोचता है कि उसने यह धन-दौलत अपनी आंखें आने वाली कई पीढ़ियों के लिए जमा कर ली है। बच्चे कोई काम न करें और बैठकर भी खाएँ तो समाप्त नहीं होगी। इतना सब होने के बाद भी उसके मन के किसी कोने में यह कसक रह जाती है कि मैंने जो इतना सब इकट्ठा कर लिया है क्या वह अपने साथ अपनी धन-दौलत अगले जन्म में लेकर नहीं जा सकता?
          उसकी इस पीड़ा को इस कहानी के माध्यम से समझते हैं। एक दौलतमन्द इन्सान ने अपने बेटे के लिए वसीयत करते हुए लिखा कि मरने के बाद उसके पैरों मे उसके फटे हुऐ मोजे (जुराबें) पहना देना। उसने अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए आग्रह किया। पिता के मरने के बाद उसे नहलाया गया। बेटे ने पण्डित से अपने पिता की अन्तिम इच्छा बताई। 
            पण्डित ने कहा, "हमारे शास्त्रों के विधान के अनुसार केवल कफन पहनाने की अनुमति है।"
          बेटा आज्ञाकारी था और जिद पर अड़ा हुआ था, "उसे पिता की अन्तिम इच्छा हर हाल में पूरी करनी है।" 
       ‌ बहस इतनी अधिक बढ़ गई की शहर के अन्य विद्वानों को जमा किया गया लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला।
          इसी समय एक व्यक्ति आया और आकर उसने बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ पत्र रख दिया। उस पत्र में पिता ने अपने पुत्र के लिए यह नसीहत लिखी हुई थी-
            'मेरे प्यारे बेटे, तुम देख रहे हो? धन-दौलत, बंगला, गाड़ी, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियॉं और फॉर्म हाउस होने के बाद भी मैं एक फटा हुआ मोजा तक अपने साथ नहीं ले जा सकता। एक दिन मौत तुम्हारे लिए भी आएगी। इसलिए तुम्हें सावधान कर रहा हूँ कि तुम्हें भी एक कफन में ही इस संसार से विदा होना पड़ेगा। प्रयास यही करना कि इस धन-दौलत का सही इस्तेमाल हो।'
          इस कहानी से उस पिता के मन की व्यथा छलकती है जो धन के अम्बार एकत्र करके रख गया। वह अपनी धन-दौलत तो छोड़ो अपने फटे हुए मोजे तक साथ नहीं ले जा सका। कहने का तात्पर्य यही है कि इस भौतिक संसार के सारे खजाने यहीं रह जाते हैं। हमारे अगले जन्म की यात्रा फिर खाली हाथ से ही आरम्भ होती है क्योंकि मनुष्य खाली हाथ इस दुनिया में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाता है।
          ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण ही इस प्रकार किया है कि जो भी जीव इस संसार में जन्म लेता है उसे अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार प्राप्त आयु को भोगकर यहाँ से विदा होना पड़ता है। यहाँ मनुष्य की इच्छा नहीं चलती। उसे तो बस अपने कर्मों पर ध्यान देना है, यही शुभाशुभ कर्म ही उसके साथ अगले जन्मों में जाते हैं। उन्हीं के अनुसार उसे अगला जन्म मिलता है। 
          हमारे मनीषियों का कथन है कि शुभकर्मों की अधिकता होने पर मनुष्य को पुनः मानव योनि मिलती है। इसी तरह पापकर्मों की अधिकता होने पर मनुष्य को चौरासी लाख योनियों में क्रमशः भटकना पड़ता है। अपने दुष्कृत्यों के फल को भोगना बहुत कठिन होता है। उन्हें भोगने के बाद ही जीव पुन: यह मानव शरीर मिल पाता है।
          इस संसार में रहकर मनुष्य ने जो भी कमाया है, उसे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाना चाहिए। कुछ धन परोपकार के कार्यों  में भी खर्च करना चाहिए। उसे बेसहारा लोगों का सहारा बनना चाहिए। मरने के पश्चात मनुष्य के साथ धन-वैभव नहीं जाता। सिर्फ उसके सत्कर्म अथवा दुष्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए अपने सुकर्मों की पूँजी अगला मानव जन्म लेकर सुखों को भोगने के लिए एकत्र करते रहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

पत्नी सारा दिन क्या करती है?

पत्नी सारा दिन करती क्या है? 

पुरुष प्रायः अपनी पत्नी के कार्यों को लेकर एक गलत धारणा बना लेते हैं। उनकी दृष्टि में नौकरी न करने वाली पत्नी बस बैठे-बिठाए मौज करती है और उनका पैसा उड़ाती है।‌ घर में रहने वाली गृहकार्यों को दक्षता से निपटाने वाली पत्नी के विषय पुरुष प्रायः सोचते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन घर में निठल्ली बैठी रहती है। घर का काम भी कोई काम होता है। वे हर समय बस यही राग अलापते रहते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन करती ही क्या है? 
           पुरुषों को इस मानसिकता को बदलना बहुत कठिन है। उन्हें बस यही लगता है कि नौकरी या व्यवसाय करने वाली महिलाएँ ही सिर्फ काम करती हैं। घरेलू स्त्रियाँ तो बस केवल अपने पति के कमाए हुए पैसों पर मौज-मस्ती करती हैं। वे नहीं जानते कि घर का काम करना कितना उबाऊ और थका देने वाला होता है। 
            एक गृहिणी सवेरे मुॅंह अन्धेरे उठती है और रात को सबसे बाद में अपने बिस्तर पर जाती है। उसी की बदौलत पति अपने आफिस में चिन्तामुक्त होकर कार्य करता है। बच्चों की जरूरतों को वही पूरा करती है। घर के बुजुर्गों की देखभाल भी उसी के जिम्मे होती है। घर आने वाले मेहमानों का वह प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करती है। उसके ये सभी कार्य पुरुषों की नजर में नहीं आते। वे तो बस पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। उन्हें शायद यही लगता है कि ये सभी कार्य अपने आप चुटकी बजाते ही हो जाते हैं।
            आज हम एक ऐसे मनुष्य की चर्चा करते हैं जो ईश्वर से नाराज था कि उसने सारे सुख स्त्री की झोली में डाल दिए हैं। वह तो बस पैसा कमाने की मशीन भर है।
            एक आदमी ने भगवान से नाराज होते हुए प्रश्न किया, "हे प्रभु! मैं सारा दिन खटता रहता हूँ, जीतोड़ मेहनत करता हूँ, अपने परिवार के लिए परिश्रम करके कमाता हूँ। मेरी पत्नी पूरा दिन घर में रहकर आराम करती है, मजे करती है और फरमाइशें करती रहती है? उसकी जिन्दगी तो बहुत मजे से बिना किसी कष्ट से कट रही है, ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यों हो रहा है?"
          भगवान ने उसकी शिकायत सुनकर सुझाव दिया, "ऐसा करते हैं केवल दो दिन के लिए तुम अपनी पत्नी के साथ उसकी जिन्दगी बदलकर देखो और सब कुछ स्वयं जान लो।"
            वह आदमी खुशी से प्रभु की सलाह मान गया। अगले दिन प्रातः पाँच बजे जब अलार्म बजा तब उसने उठकर बच्चों का लंच बनाया और फिर उन्हें तैयार करके स्कूल भेजा। फिर पति बनी पत्नी को उठाकर उसका नाश्ता बनाया। फिर उसके जाने के बाद घर साफ किया।अभी नाश्ता करने बैठा ही था कि कामवाली आ गयी। वो गई तो बच्चों के स्कूल से आने का टाइम हो गया। उन्हें खाना खिलाकर होमवर्क करने बिठाया। 
        शाम के खाने की तैयारी करके बच्चों को ट्यूशन क्लास में ले गया। शाम को पत्नी के आने पर खाना परोसा तो उसने उसमें से चार कमियाँ निकाल दीं। उसकी नुकताचीनी से उसे गुस्सा तो बहुत आया पर वह चुप रहा। अन्त में थके होने के बावजूद रात को पति बनी पत्नी को सन्तुष्ट भी किया।
            इस सारी दिनचर्या के बाद ही उस आदमी को पता चला कि पत्नी के बारे में वह कितना गलत सोचता था। उसके किए गए कार्यों की बराबरी नहीं की जा सकती। पत्नी बिना कोई वेतन लिए सारे कार्य बिना शिकन लाए खुशी-खुशी करती है।
           उसे  अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई। उसे समझ आ गया था कि सारा दिन उसकी पत्नी चक्करघिन्नी बनी कभी पति की आवश्यकताओं को पूरा करती और कभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करती इधर से उधर घूमती रहती है। अपने लिए उसके पास समय ही नहीं होता। वह यदि बीमार भी हो जाए तो दवाई खाकर फिर से घर-गृहस्थी के कामों में जुट जाती है।
            वह बिना किसी से शिकायत किए अपने सारे दायित्व बखूबी निभाती है। उसके बाद भी सभी आने-जाने वालों का स्वागत अपनी प्यारी-सी मुस्कान से करती है। पुरुष किसी भी मायने में उसकी बराबरी नहीं कर सकता।
          तब दो दिन बाद प्रातः उठकर सबसे पहले उसने भगवान से प्रार्थना की कि वे उसे वापिस आदमी बना दें क्योंकि अब उसे समझ आ गया कि घर में रहने वाली एक औरत को कितना अधिक काम करना पड़ता है। उसके बराबर मैं भी काम नहीं कर सकता।   
          जिस पुरुष ने ईश्वर से शिकायत की थी उसे जिस प्रकार सब कुछ समझ में आ गया उसी तरह शेष अन्य पुरुषों को भी यह समझ में आ आना चाहिए। स्त्री के प्रति उनका व्यवहार सहृदयता पूर्ण होना चाहिए। हर समय पत्नी की शिकायत न करके उसकी समस्याओं की ओर ध्यान देना चाहिए। उस पर व्यंग्य करना या उस पर चुटकले बनाकर उसके स्वाभिमान को आहत नहीं करना चाहिए। अपने पुरुष होने के मिथ्या अहं का त्याग करके उसकी ओर सहायता करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

दिल के धड़कने से मनुष्य का अस्तित्व

दिल के धड़कने से मनुष्य का अस्तित्व 

मनुष्य के शरीर में एक धड़कने वाला एक अनमोल दिल है जो ईश्वर ने उसे उपहार स्वरूप दिया है। जब तक यह दिल ठीक से कार्य करता रहता है यानी धड़कता रहता है तब तक मनुष्य का इस धरती पर अस्तित्व बना रहता है। यदि यह हृदय काम करना बन्द कर दे तो शरीर बेजान हो जाता है अर्थात् तब मनुष्य के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। उस समय वह इस लोक को छोड़कर कही अन्यत्र दूसरे लोक में चला जाता है। अपने प्रिय बन्धु-बान्धव कुछ समय के लिए भी उस मृत शरीर को सहन नहीं कर पाते। उसका संस्कार करने के लिए शीघ्रता करने लग जाते हैं।
           इस हृदय का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। जरा-सी लापरवाही परेशानी का कारण बन जाती है। यदि किसी के हृदय का एक वाल्व ब्लाक हो जाए तो डाक्टर एंजियोग्राफी करके स्टन डाल देते हैं जो कुछ समय के बाद बदलना पड़ता है। उसके लिए लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। यदि दिल का दौरा पड़ जाए तो डाक्टर बिना समय गँवाए आपरेशन कर देते हैं। उस आपरेशन पर भी लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। 
            एक घटना का यहॉं वर्णन करते हैं। ऐसा हुआ कि एक बार अस्सी वर्षीय एक बुजुर्ग को दिल का दौरा पड़ा। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया। वहाँ डाक्टर ने उस बुजुर्ग के हृदय का शीघ्र ही का ऑपरेशन कर दिया।
          उस आपरेशन का आठ लाख रूपए बिल का आया। बिल देखते ही उस बुजुर्ग की आँखों में आँसू आ गए। यह देखकर डॉक्टर ने सोचा कि शायद इनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि ये आठ लाख रूपयों का भुगतान कर सकें।
            डाक्टर ने साँत्वना देते हुए उन बुजुर्ग से कहा, "रोइए मत, मैं इस राशि को कहकर कम करवा देता हूँ।"
          डाक्टर की बात सुनकर उस बुजुर्ग ने उत्तर दिया, "बिल की राशि की कोई समस्या नहीं है। यदि बिल दस लाख का भी होता तो मैं उसे देने में समर्थ हूॅं।"
             डॉक्टर ने उनसे पूछा, "फिर आपकी ऑंखों में ऑंसू किसलिए आए?"
             उन्होंने कहा, "आँसू तो इसलिए आए कि जिस प्रभु ने अस्सी वर्षों तक इस दिल को सम्भाला, उसने कोई बिल नहीं भेजा। आपने केवल तीन घण्टे ही इसे सम्भाला और आठ लाख रूपये का बिल आ गया।"
           फिर ईश्वर को धन्यवाद करते उस वृद्ध ने कहा, "धन्य है वह मालिक जो सब लोगों का कितना ध्यान रखता है।" 
           इस हृदय को स्वस्थ रखने के लिए हमें स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना चाहिए। उचित आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। यानी निश्चित समय पर सोना-जागना चाहिए, सन्तुलित  और पौष्टिक भोजन खाना चाहिए। योगासन करने चाहिए और नियमित सैर करनी चाहिए।
          हममें से प्रायः सभी लोग इन नियमों का बड़े धड़ल्ले से उल्लंघन करते हैं और फिर सफाई भी देते हैं कि क्या करें? बहुत व्यस्त रहते हैं, इन सबके लिए समय ही नहीं निकाल पाते। आजकल हम सबको होटलों का तैल-मसाले वाला खाना अधिक रुचिकर लगता है।
          दोष शत-प्रतिशत हमारी जीवन शैली का है। हमें डिब्बा बन्द व जंक फूड खाना पसन्द आता है। दूध और फल हम खाना नहीं चाहते। अधिक चिकनाई वाला और तला हुआ भोजन खाकर सन्तुष्ट होते हैं। जिस भोजन को कमाने के लिए सारे प्रपंच करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। न हम सैर करते हैं और न ही व्यायाम। लेट नाइट पार्टियाँ करना हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन गई हैं। इसी प्रकार शादियों से भी रात देर से लौटते हैं। इससे हमारी बाडी क्लाक डिस्टर्ब होती है। तब हम लोगों का शिकार बन जाते हैं।
          हर छोटी या बड़ी बात हम अपने दिल पर ले लेते हैं। अनावश्यक तनाव में रहते हैं। चौबीसों घण्टे योजनाएँ बनाते रहते हैं। इसके साथ ही ईर्ष्या-द्वेष, क्रोध आदि को भी अपने दिल में स्थान दे देते हैं। इसीलिए परिणाम स्वरूप यह हमारा दिल धीरे-धीरे निराश हो जाता है। इसमें रूकावट आने लगती है। जिससे साँस फूलने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
           समय रहते इसका चैकअप कराते रहना चाहिए। जहॉं जरा-सी भी कमी दिखाई दे, तुरन्त उपचार करवा लेना चाहिए। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए। मद्यपान, धूम्रपान जैसे दुर्व्यसनों से बचना चाहिए। साथ ही अनावश्यक तनाव को दूर करते हुए उस मालिक का धन्यवाद करना चाहिए जिसने हमें यह अनमोल दौलत बिना कोई मूल्य लिए उपहार में दी है।
चन्द्र प्रभा सूद