गुरुवार, 17 सितंबर 2026

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन और विश्वास इन तीनों का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व होता है। इनके बिना मनुष्य का कोई मूल्य नहीं होता। ये तीनों वास्तव में उसके प्रिय और सच्चे मित्र होते हैं जो चौबीसों घण्टे उसके साथ ही रहते हैं। ज्ञान उसका मार्गदर्शन करता रहता है, धन उसकी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूर्ण करता है और उसकी विश्वास की पूँजी हर कदम पर उसकी सहायक बनती है।
          यदि इन तीनों के विषय में विचार करें और इन्हें ढूँढने लगे जाऍं तो सोचिए ये सब हमें कहाँ पर मिल सकेंगे?
        आज की परिस्थितियों में ज्ञान धार्मिक स्थलों और विद्या का मन्दिर कहे जाने वाले स्कूलों में मिलता है। वहाँ उन स्थानों पर इसका व्यापार किया जाता है। धर्म स्थलों में धर्म के ठेकेदार अपने ज्ञान का दुरूपयोग करते हुए जन साधारण को गुमराह करते हैं। उन्हें धर्म के नाम पर जन साधारण को बाँटने का कार्य करते हैं और मारकाट करवाते हैं। अपने विरोध में सिर उठाने वालों पर अत्याचार करते हैं और समाज में अनाचार फैलाते हैं। लोगों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले ये तथाकथित ज्ञानी विद्वान समाज को उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं।
          बच्चों को विद्यालय में स्कूली शिक्षा यानी किताबी ज्ञान ही मिल सकता है। मोटी डोनेशन लेकर जहाँ दाखिला दिया जाता है और मोटी फीस लेकर पढ़ाई कराई जाती है। उन विद्यालयों और कालेजों में पढ़ने वाले छात्र सदा ही नियम-कानून को धत्ता दिखाते रहते हैं। अपने अध्यापकों का भी सम्मान नहीं करते। एक ओर व्यापारी मैनेजमेंट लूट-खसौट करने पर लगी रहती है। और दूसरी ओर शिक्षक अपने व्यवसाय के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ नहीं हैं। वे भी सदा अपना हितसाधक बने रहते हैं। 
         इन स्थानों पर ऐसे ज्ञान का दुरूपयोग खुल्लमखुल्ला किया जा रहा है जो मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों को संवारता है। ये सब देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को बहुत पीड़ा होती है। आम आदमी इस दुरूपयोग का प्रतिकार नहीं सकता।
        धन केवल अमीरों के पास मिलता है जो हर तरह की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इसके लिए वे ईमानदारी, सच्चाई और नियम-कानून को ताक पर रख देते हैं। वे चोरबाजारी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी आदि को प्रश्रय देते हैं। इस क्रम में यदि किसी की पीठ मे छुरा घोंपना पड़े या गला काटना पड़े तो गुरेज नहीं करते। जिस सीढ़ी से ये लोग ऊपर चढ़े होते हैं उसे ठोकर मारकर गिराना पड़े तो वे कदापि परहेज नहीं करते। इन लोगों का उद्देश्य मात्र धन कमाना होता है और कुछ नहीं। 
        जबकि यह धन मनुष्य के लिए केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ खरीद सकता है। उसके लिए यह स्वास्थ्य, शान्ति, संस्कारी या आज्ञाकारी सन्तान, सहृदय बन्धु-बान्धव और रिश्तों में परस्पर विश्वास आदि को जीवन में नहीं खरीद सकता। फिर भी वे इसके पीछे दीवानों की तरह पड़े रहते हैं। उन्हें न खाने की सुध रहती है और न ही अपने आराम की।अपने दिन-रात का सुख-चैन गॅंवाकर ये कोल्हू का बैल बन जाते हैं। 
          विश्वास मनुष्य के जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। एक बार यदि यह जीवन से निकल गया तो फिर कभी वापिस नहीं लौटकर नहीं आता। आज के भौतिक युग में मानो विश्वास बेचारा तोड़ने के लिए ही होता है। हर रिश्ते को निभाने के लिए विश्वास बहुत आवश्यक होता है। लोग उसका मान नहीं रख पाते। एक बार विश्वास खो जाए तो समाज में मनुष्य की साख प्रभावित होती है। उसे पुनः बनाने में बहुत समय लग जाता है। फिर भी कोई गारण्टी नहीं होती।
          आज बहुत से भाई, बहन, माता, पिता, पति, पत्नी, मित्र, पड़ौसी, नेता, अभिनेता आदि एक-दूसरे के साथ विश्वासघात करने में परहेज नहीं कर रहे। वे तो दूसरे की आँखों में धूल झौंककर बड़े खुश होते हैं। वचनबद्धता तो उनके लिए एक प्रकार से खिलवाड़ बनती जा रही है। माना यही जाता है कि दुनिया विश्वास पर चलती है। इस क्षेत्र में भी लोग पिछड़ने लगे हैं।
        यदि मनुष्य किसी का विश्वास तोड़ता है अथवा कोई अन्य व्यक्ति उसका विश्वास खण्डित करता है तो दोनों ही स्थितियों में उसे पुनः जमा पाना बहुत कठिन हो जाता है। यह विश्वास काँच की तरह बहुत नाजुक होता है। यदि यह एक बार टूटकर बिखर जाता है तो फिर उसे समेटना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य हो जाता है।मनुष्य की आयु बीत जाती है लोगों के हृदयों में पुनः इसे जमाने में।
          ज्ञान, धन और विश्वास मनुष्य के परम मित्र हैं किन्तु जहाँ सावधानी हटी वहीं पर दुर्घटना घट जाती है। यानी मनुष्य को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इन तीनों के भरोसे मनुष्य चमत्कार करता है। समाज में अपना स्थान बनाता है। इनमें से किसी एक की भी कमी उसे सबकी नजरों से गिरा देती है। तब वह हीरे सा मूल्यवान होते हुए भी सबकी नजरों मे काँच की तरह बेकार बन जाता है। उसे दूर फैंक देने में बिल्कुल परहेज नहीं किया जाता।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 16 सितंबर 2026

सुनो अधिक और बोलो कम

सुनो अधिक और बोलो कम

ईश्वर ने मनुष्य को कान दो दिए हैं पर मुँह एक दिया है। इससे यही अर्थ लगाया जा सकता है कि प्रभु का यह स्पष्ट सन्देश है कि सुनो अधिक और बोलो कम। सभी जानते हैं कि कानों का काम है सुनना और मुँह का काम है बोलना। 
         अधिक सुनना और कम बोलना एक महान गुण है जो आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली और समझदार बनाता है। इसके बहुत लाभ होते हैं। ध्यान से दूसरों की बात सुनने से नई चीजें सीखने और समझने का अवसर मिलता है। कम बोलने से आपकी मानसिक ऊर्जा सुरक्षित रहती है और अनावश्यक तनाव से बचाव होता है। कम बोलने और सोच-समझकर बात करने वाले लोग समाज में अधिक विश्वसनीय और सम्मानित माने जाते हैं।
          अब विचार इस विषय पर करना है कि मनुष्य को क्या सुनना चाहिए और क्या नहीं? इसी प्रकार क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं?
          मनुष्य को सदा ही अच्छा सुनना चाहिए और अच्छा बोलना चाहिए। अच्छा सुनने का तात्पर्य है अपने देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के हितकर शब्द सुनने चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों एवं महापुरुषों के उपदेशों तथा आदर्शों के विषय में सुनना चाहिए। उन पर आचरण करना चाहिए।
          महाजनों की सुसंगति में रहते हुए, उनके सुवचनों का लाभ उठाते हुए अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए। समष्टि का भला करने वाले या लाभ पहुँचाने वाले सद् वाक्यों को सुनना सदा ही सबको आनन्दित करता रहता है। 
          दुर्जनों से और उनके कठोर वचनों को सुनने से बचना चाहिए। उनके अपशब्द व गाली-गलौज सुनने से दूर रहना मनुष्य के लिए आवश्यक है। इनके अतिरिक्त ऐसे वचन भी नहीं सुनने चाहिए जिनमें किसी की निन्दा-चुगली की गई हो या तोड़फोड़ करने की बात हो।
          देश, धर्म, समाज तथा घर-परिवार को तोड़ने वाले दुर्वचनों को सुनने से बचना चाहिए। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले जिन वचनों में षडयन्त्र की बू आ रही हो, मनुष्य को उन्हें सुनने से सदा परहेज करना चाहिए।
          एवंविध बोलते समय वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 
             पहले तोलो फिर बोलो।
ऐसा बोलने से हमेशा बचने का प्रयास करना चाहिए जिससे किसी के मन को कष्ट हो या किसी का हृदय छलनी हो जाए। अपनी तरफ से सदा यही प्रयत्न करना चाहिए कि दूसरे के मन को हरने वाले बोल ही बोले जाएँ।
            वाणी की सरलता और सहजता का पुट उसमें होना चाहिए, छल-फरेब वाली भाषा का प्रयोग मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरों के जख्मों पर मलहम लगाने वाले वचन सबको पसन्द आते हैं।
          किसी मनुष्य के साथ यदि कोई भी व्यक्ति अपने रहस्यों को साझा करता है तो उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि जिसके पास जाकर वह अपना मन हल्का कर रहा है, वह उन्हें अपने अन्तस् में ही समाकर रख लेगा। उन्हें किसी दूसरे के सामने कभी भी, किसी भी परिस्थिति में प्रकट नहीं करेगा। वह उन्हें अपने तक ही सीमित रखेगा।
          उसे यह भी विश्वास होता है कि वह स्वयं लोगों के सामने न तो उसका उपहास करेगा और किसी दूसरे को भी उसकी छिछालेदार नहीं करने देगा। जिस व्यक्ति पर लोग इतना विश्वास करते हैं, उससे महान कोई और हो ही नहीं सकता। 
          इस प्रकार बोलने और सुनने में यदि अनुशासन का पालन किया जाए तो होने वाले बहुत से झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है। वाणी से किया गया प्रहार बहुत गहरा घाव करता है। इस प्रकार के तीक्ष्ण वारों को करने से मनुष्य को यथासम्भव बचना चाहिए।
         वास्तव में जब मनुष्य बात कर रहा होता है तो वह प्रायः अधिक सुनता नहीं हैं। इसलिए अक्सर बहुत कुछ सीखता भी नहीं है। इसलिए कम बोलने और अधिक सुनने से मनुष्य एक बेहतर वार्ताकार बन सकता है। अच्छे श्रोता बनने से बातचीत की गुणवत्ता बेहतर हो जाती है। दूसरे लोगों को व्यक्ति से बातचीत करने में आनन्द आता है। वे खुलकर अपनी बातें साझा करने लगते हैं।
          मन में दूसरों के गूढ़ रहस्यों को सदा छुपाकर रखने वाला और वाणी का संयम रखने वाला मनुष्य वास्तव में महान होता है। ऐसे महापुरुषों को समाज अपना नेता मानकर उसके बताए मार्ग पर चलने लगते हैं।
          इन सबसे भी बढ़कर प्रत्येक मनुष्य को उस परमपिता का यशोगान भी अपनी वाणी से सदैव करते रहना चाहिए और उसी की प्रार्थनाओं को अपने इन कानों से सुनना भी चाहिए। तभी इन दो कानों और इस मुँह की सार्थकता है। अपने अन्तस् में ईश्वरोचित गुणों का समावेश करने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 15 सितंबर 2026

पाप-पुण्य के विषय में जिज्ञासा

 पाप-पुण्य के विषय में जिज्ञासा

पाप क्या है और पुण्य क्या है? मानव के मन में इनक विषय में सदा से ही जिज्ञासा रही है। इस दुविधा का समाधान करते हुए विद्वान ऋषियों ने अपने-अपने ग्रन्थों के माध्यम से हमें अपने-अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया है। 
       सभी धर्म-ग्रन्थों की यही शिक्षा है कि हमें हमेशा सबकी सहायता करनी चाहिए। कभी भी किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट नहीं पहुॅंचाना चाहिए। महर्षि व्यास द्वारा हमें समझाया गया है -
       अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
       परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्।।
अर्थात् महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों में केवल दो ही मुख्य बातें कही हैं - दूसरों की भलाई करना या उपकार करना पुण्य का कार्य है। दूसरों को दुख या पीड़ा पहुॅंचाना पापकर्म है।
        महर्षि वेदव्यास के अनुसार मानव जीवन का मूल उद्देश्य दूसरों की सेवा करना होना चाहिए।  किसी भी जीव को मानसिक या शारीरिक रूप से पीड़ा पहुँचाना नहीं होना चाहिए।
        सार रूप में हम इतना कह सकते हैं कि देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए बनाए नियमों का पालन करते हुए जो कार्य किए जाते हैं वे पुण्य कहलाते हैं। इनके विपरीत किए जाने वाले सभी कार्य पाप की श्रेणी में आते हैं।
        यह स्पष्ट है कि जनहित में किए जाने वाले कार्य मनुष्य को सफलता और ख्याति देते हैं। इसके विपरीत मानवता विरोधी किए गए सभी कार्य उसे अपयश दिलाते हैं और अन्ततः उसे परेशानी में डाल देते हैं।
        वैसे तो क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो उसके विवेक का हरण कर लेता है। मनीषियों का कथन है कि किया गया क्रोध उस समय पुण्य बन जाता है जब धर्म व मर्यादा के लिए उसका उपयोग किया जाता है।
          यदि मनुष्य ऋषि के उपदेश के कारण साँप की तरह आवश्यकता पड़ने पर क्रोध का प्रदर्शन नहीं करेगा तो वह समाज में कायर कहलाएगा। उसका समाज में कोई सम्मान नहीं करेगा। सभी उसे अनदेखा करते रहेंगे। यह ठीक है कि क्रोध के वशीभूत वह किसी का अहित न करे किन्तु समय पड़ने पर उसे अन्याय का प्रतिकार तो अवश्य करना चाहिए।
          रामायण काल का एक उदाहरण देखते हैं। पक्षीराज जटायु के जीवन का पुण्य यही था कि भगवती सीता का हरण करके जाते हुए रावण पर उसने क्रोध किया। उसका मुकाबला यथाशक्ति किया। इस पुण्य के फलस्वरूप उसे प्रभु श्रीराम की गोद मिली।
          इसके विपरीत सहनशीलता जो मनुष्य का एक बहुत बड़ा गुण है परन्तु उस समय यह पाप बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा को बचाने में असफल होने लगता है। जब वह अपने स्वार्थ को सर्वोपरि मानने लगता है तब चाहकर भी वह अन्याय का विरोध नहीं कर सकता। इसीलिए अपने इस दोष के कारण वह समाज में सदा अपयश का भागीदार बन जाता है।
          महाभारत के इस उदाहरण के द्वारा इस तथ्य को समझने का प्रयास करते हैं। भीष्म पितामह ने अपने राज्य और परिवार की उन्नति व प्रसन्नता के लिए अनेक कार्य किए। इसी कारण आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर उसका पालन भी किया। परन्तु फिर भी उस पाप अथवा अत्याचार को न रोकने के दण्ड स्वरूप उन्हें अन्तिम समय में बाणों की शैय्या मिली। उसका कारण यही है कि जब द्रौपदी के साथ कौरव दुर्व्यवहार कर रहे थे तब उन्हें क्रोध करना चाहिए था। मोहवश वे ऐसा नहीं कर सके, बस मूकदर्शक बने रहे।
          ये दोनों उदाहरण इसलिए लिए हैं कि रामायण और महाभारत इन दोनों महाग्रन्थों के इन पात्रों से सभी भारतीय जनमानस भली-भाँति परिचित हैं। यहाँ यह चर्चा करना आवश्यक है कि यदि जटायु रावण का रास्ता रोककर उसे न ललकारता तो शायद भगवती सीता कहाँ गईं है, इस विषय में जानकारी न मिल पाती। इसी तरह यदि भीष्य पितामह ने अन्याय का विरोध दृढ़तापूर्वक किया होता और कौरवों को वहीं दण्ड दे दिया होता तो शायद महाभारत का युद्ध न होता।
          छुटपन में पढ़ा था और बड़ों के मुख से भी सुना था कि यदि किसी जीव की जान बचाने के कभी झूठ का सहारा लेना पड़ जाए तो वह पाप नहीं कहा जाता।
          यदि माता-पिता क्रोध न करें तो बच्चों का लालन-पालन नहीं कर सकते और न ही उन्हें अनुशासित कर सकते हैं। सहनशीलता आदि सभी गुण मनुष्य को महान बनाने के लिए बहुत आवश्यक होते हैं।
          इस तरह कुछ अपवाद स्वरूप कार्य को मनुष्य को यदा कदा न चाहते हुए भी दूसरों की भलाई के लिए करने पड़ जाते हैं। इन्हें फारग्रान्टेड नहीं लेना चाहिए। सदा यही प्रयास नकरना चाहिए कि जाने-अनजाने कोई गलत कार्य अपने हाथों से न होने पाए। इसके लिए सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 14 सितंबर 2026

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

हम भारतीयों के संस्कार में है कि अपनी जन्मभूमि को जन्मदात्री माता से कम नहीं मानते। जन्मभूमि हमारी अपनी ही जन्मदात्री माता की तरह सभी कष्ट सहन करके हमें जीवन की सारी खुशियाँ देती है। हमें स्वर्ग के समान सभी प्रकार के सुख-सुविधा के सारे साधन देती है। 
          स्वर्ग को केवल सुख और ऐश्वर्य का स्थान माना गया है। वहाँ मानवीय सम्वेदनाएँ और अपनापन नहीं होता। इसके विपरीत माता और मातृभूमि हमें जीवन में स्नेह और आत्मीयता देती हैं। इसलिए इनका स्थान समस्त लोकों और स्वर्ग से भी सर्वोच्च माना गया है।
         माँ मनुष्य को नौ महीने तक अपनी कोख में रखती है और अपने रक्त से उसे सींचती है। इस सुन्दर दुनिया में लेकर आती है। वह मनुष्य की पहली गुरु होती है। वही उसे चलना, बोलना सीखाती है और अच्छे-बुरे का ज्ञान देती है। हम माँ के निस्वार्थ प्रेम को किसी स्वार्थ या शर्त से नहीं बॉंध सकते। वह स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी सन्तान को दुनिया के सभी सुख देने का प्रयास करती है। 
          दूसरी ओर जन्मभूमि की वायु, उसके जल और अन्न से हमारा शरीर पुष्ट होता है और बढ़ता है। यह धरती हमें आश्रय, पहचान, भाईचारा और जीने का अधिकार देती है। जिस माटी पर हम लोग खेल-कूदकर बड़े होते हैं, उसके प्रति वफादारी करना और उसकी रक्षा करना हम लोगों का परम कर्त्तव्य होता है। 
          हम इस धरा पर अत्याचार करते रहते हैं अर्थात् अपने पैरों से इसे रौंदते हैं, जीभर कर कूड़ा-कचरा फैंकते हैं, अपना बोझ उस पर डालते हैं, अपनी सुविधा के लिए बड़े-बड़े भवन बनाकर बार-बार इस धरा की हरियाली को नष्ट करते रहते हैं, पर्यावरण और प्रदूषण की समस्याएँ पैदा करते हैं। फिर भी यह हमसे कभी नाराज नहीं होती बल्कि हमारा बोझ सहन करती रहती है। हमारे मार्ग को सदा सुगमतर ही करती रहती है।
        ऐसी मातृभूमि को छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाना उचित नहीं। अपनी धरती, अपने देश की मिट्टी, अपना देश हमें सदा प्रिय होने चाहिए। विश्व में कहीं भी रहने वालों को इसकी सौंधी सुगन्ध हमेशा याद रहती है। वे चाहकर भी अपनी इस देव तुल्य भारतभू का मोह नहीं छोड़ पाते। जब भी मौका मिले अपने देश चले आते हैं जहाँ पर जन्म लेने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं।
           'वाल्मीकि रामायणम्' में महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से यही आशय व्यक्त कर रहे हैं-
       न मे सुवर्णमयी लंकापि रोचते लक्ष्मण।
       जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। 
अर्थात् भगवान श्रीराम कहते हैं- हे लक्ष्मण मुझे सोने की लंका भी रुचिकर नहीं प्रतीत होती। जननी और जन्मभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान होती हैं।
          भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करके भी वहाँ राज्य करना अथवा वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया। उनके लिए सोने की लंका का कोई मोल नहीं था। वे अपनी मातृभूमि अयोध्या में वापिस जाना चाहते थे। उनके अनुसार जन्मदात्री माता के चरणों में मनुष्य का स्वर्ग है। उसी प्रकार अपनी जन्मभूमि में जो सुख-साधन हैं, वही स्वर्ग तुल्य हैं।
         यह प्रसिद्ध श्लोक हमें समझाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और कल्पना के स्वर्ग से बढ़कर माँ का आंचल और अपनी माटी का प्यार होता है। इसका कारण है कि यही हमारे जीवन, संस्कार और पहचान का आधार हैं।
        बहुत से ऐसे देश हैं जहाँ सारा साल गरमी रहती है या सरदी। वहाँ हमारे देश की तरह छह ऋतुएँ नहीं आतीं। वहाँ के निवासी अनेक कष्ट सहन करते हैं परन्तु फिर भी उस देश के वासी उसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते। 
        यही कारण है कि हमारे भारत के नवयुवकों ने निहत्थे भोले-भाले भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेजों को अपने देश से बाहर निकालने और उसे स्वतन्त्र करवाने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के अपने प्राणों की आहुति दी। हम सभी उनके बलिदान के फलस्वरूप इस धरा की स्वतन्त्र हवा में साँस ले रहे हैं। धन्य हैं वे स्वतन्त्रता सेनानी और उनकी वे माताएँ जिनकी तपस्या को उन युवाओं ने सार्थक कर दिया।
        यहाँ न जाने कितनी ही सभ्यताएँ धूल-धूसरित हो गई हैं। वहीं हमारी प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति फूलों की तरह मुस्कुराती हुई गर्व से सिर उठाए ब्रह्माण्ड के नीलाकाश में ध्रुवतारे की भाँति जगमगा रही है। वह विश्व के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही है।
        अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से हर व्यक्ति को प्यार होना चाहिए। जिस इन्सान को अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से प्यार नहीं वह सही अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नही। उनकी अवहेलना करने वाला हमेशा निन्दनीय होता है। हमें अपने इस अतुल्य भारत देश पर बहुत गर्व है। इकबाल जी पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं- 
            सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 13 सितंबर 2026

अपने ही देश में पराई

 अपने ही देश में पराई

हिन्दी के नाम पर आज छींटाकशी भी चल रही है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि तथाकथित हिन्दी प्रेमी केवल भाषणों का आदान-प्रदान करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। उससे ही उनका हिन्दी प्रेम छलककर सबको सम्मोहित करने का प्रयास करता है।
          यह सत्य है कि आज हिन्दी अपने ही देश में पराई हो रही है। उसकी इस स्थिति का श्रेय हम सभी भारतवासियों को है जो बड़ी शान से कहते हैं कि हिन्दी बहुत कठिन भाषा है।
          चाहे हिन्दी प्रेमी हों अथवा टीवी- सिनेमा के कलाकार हों सभी हिन्दी से रोटी कमाते हैं पर जब उनसे कुछ पूछा जाए तो उत्तर अंग्रेजी में देते हैं। ऐसा करके उनका सीना गर्व से फूल जाता है। उन्हें शायद हिन्दी में बोलने में शर्म महसूस होती है।
        मैं देश की राजधानी दिल्ली की बात करना चाहती हूँ जहाँ हिन्दी के नाम पर छोटे-छोटे गुट बने हुए हैं। हिन्दी भाषियों में हो रही यह गुटबन्दी भाषा का भला नहीं कर रही बल्कि उसे नित्य हानि ही पहुँचा रही है।
        तथाकथित साहित्यकार एक-दूसरे की पीठ सहलाकर ही महान रचनाकार कहलवाने का जुगाड़ कर रहे हैं। बिना ऐसी किसी महत्त्वपूर्ण रचना के लिखे ही सम्मान बाँटने अथवा बटोरने की होड़-सी मची हुई है। इनमें से बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिन्हें भाषा को शुद्ध लिखना व बोलना तक नहीं आता। 
          आपको फेसबुक पर ऐसे उदाहरण आसानी से मिल जाएँगे जिनकी लिखी हुई दो-चार पंक्तियों में भी भाषागत अशुद्धियाँ मिल जाएँगी। ऐसे लोगों को वर्तनी अथवा व्याकरण से कोई लेना देना नहीं है परन्तु हाँ  उन्हें सम्मान भी मिल रहे हैं और वाहवाही भी।
        मन को उस समय बहुत कष्ट होता है जब रचनाकारों की बिना स्वाध्याय के उथली रचनाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। 
         तब समझ में नहीं आता कि हम साहित्य में क्या योगदान कर रहे हैं? अपने आने वाली पीढ़ी को क्या ऐसा साहित्य थाती के रूप में सौंपेगे?
            फेसबुक पर प्रायः हिन्दी प्रेमियों की ऐसी व्यथा कथा पढ़ने के लिए मिल जाती है। कुछ समय पूर्व फेसबुक पर एक मित्र ने बड़े ही दुखी मन से पूछा है- 'क्या इस देश अथवा समाज में लेखक या कलाकार की कोई इज्जत नहीं होती?'
      इस प्रश्न के उत्तर में मैंने उन्हें लिखा है-  'इज्जत कमाई जाती है। यदि लेखक और कलाकार इज्जत कमाना चाहते हैं तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना छोड़कर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वहण करें। ऐसी रचनाएँ समाज को दें कि वह उनके समक्ष नतमस्तक हो जाए।' 
          कुछ लोगों को रातोंरात महाकवि बनने की शीघ्रता है। सबसे बड़ा मजाक यह हो रहा है कि कुछ महानुभाव अपने नाम से पूर्व कवि, कविराज अथवा महाकवि भी लिख रहे हैं। अरे मेरे भाई साहित्य प्रेमियों को निर्धारित करने दीजिए कि आप कितने पानी में हैं।
         हिन्दी की हो रही दुर्दशा को हम सब मिलकर सुधार सकते हैं। यह एक अकेले के बूते की बात नहीं है। अपनी भाषा को यथोचित स्थान दिलाने के लिए हम सबको साझा प्रयास करना होगा। अपने आपको स्वाध्यायशील बनाना होगा। जिससे जब कलम चले तो दूसरों  को झकझोर कर रख दे और सबके हृदयों पर राज करे। हिन्दी भाषा पर हमें अपनी पकड़ इतनी मजबूत करनी होगी जिससे यह समृद्ध भाषा हमें गौरवान्वित कर सके। उस समय हम अपना मस्तक शान से उठाकर कह सकें-
    हम हिन्दुस्तानी हैं और हमारी मातृभाषा हिन्दी     
     है। हमें अपने देश और अपनी भाषा पर गर्व है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 12 सितंबर 2026

सुसंस्कृत वाणी वास्तविक आभूषण

सुसंस्कृत वाणी यानी संस्कार युक्त वाणी ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण होती है। यदि बोलते समय भाषा का ध्यान न रखा जाए अथवा अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाए या बोलते समय गाली-गलौच किया जाए तो उसे वाणी का संस्कार कदापि नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि वाणी की सरलता और शुद्धता मनुष्य के संस्कारों पर निर्भर करती है। उसकी झलक उसके मुॅंह खोलते ही सामने वालों को दिखाई देने‌ लगती है।
          भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में सुसंस्कृत वाणी का महत्त्व बताते हुए व्याख्या की है -
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला।
न स्नानं न विलेपनं  न कुसुमं  नालंकृता  मूर्धजा।।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते।
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषमम्।।
अर्थात् न बाजूबन्द आदि आभूषण मनुष्य को सजाते हैं और न ही चन्द्रमा के समान चमकते हुए हार। सुगन्धित जल से स्नान करने, लेप लगाने, फूलों से बाल सजाने से भी कोई सुन्दर नहीं बन जाता। मनुष्य केवल संस्कारित वाणी से सुशोभित होता है जिसे वह धारण करता है। सभी भौतिक आभूषण नष्ट हो जाते हैं परन्तु वाणी रूपी आभूषण कभी नष्ट नहीं होता।
        यह श्लोक हमें चेतावनी दे रहा है कि सम्पूर्ण भौतिक ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति नश्वर हैं। इन सबका कुछ भी पता नहीं रहता कि ये कब तक साथ निभा सकेंगे। मनुष्य की वाणी चाहे कौए की तरह कर्कश हो अथवा कोयल की भाँति माधुर, हमेशा दूसरों को याद रहती है। उसी के अनुसार लोग उस व्यक्ति विशेष के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और फिर उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं।
          इसी भाव को दर्शाती हुई एक कथा को यहाँ साझा करना चाहती हूँ जो मूलरूप से संस्कृत भाषा में लिखी गई है।
          एक समय में एक राजा अपने मन्त्री और सेवकों के साथ जंगल में विहार के लिए गया। जब वे थक गए तब आराम करने लगे। राजा को बहुत जोर की प्यास लगी। सामने एक झोंपड़ी थी जिसमें एक अन्धा फकीर रहता था।
         राजा ने अपने सेवक को पानी लाने के लिए भेजा। उसने वहाँ जाकर उस फकीर से कहा, ‘‘अरे अन्धे, एक लोटा जल  देना।” 
        उसने कहा, ‘‘भाग जा, मैं तुझ जैसे मूर्ख सेवक को जल नहीं देता।” 
          सेवक यह सुनकर बहुत निराश होकर राजा के पास वापिस लौट गया। 
          फिर राजा का मन्त्री वहाँ जल लेने पहुँचा और कहा, ‘‘अन्धे, भाई एक लोटा जल शीघ्रता से दे दो राजा को प्यास लगी है।” 
         अन्धे ने उसे भी पानी देने से इन्कार करते हुए कहा, "मैं तुझ मन्त्री को भी जल नहीं दूँगा।"
          यह सुनकर राजा उन दोनों के साथ स्वयं उस झोपड़ी में पहुँचा और अभिवादन करते हुए बोला, ‘‘बाबा जी! बहुत प्यास लगी है, गला सूख रहा है, थोड़ा-सा जल दे सकते हैं।” 
         अन्धे फकीर ने कहा, "महाराज! बैठिये अभी जल पिलाता हूँ।"
          राजा ने पूछा, ‘‘महात्मन्, आपने चक्षुहीन होकर भी कैसे जान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री है और मैं तीसरा राजा हूँ।” 
          अन्धे फकीर ने हँसते हुए कहा, ‘‘महाराज, व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी से होती है। उसके लिये आँखों से देखने की आवश्यकता नहीं होती। आप तीनों के बोलने के तरीके से ही मैंने पहचान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री और तीसरे आप स्वय हैं।”
        इस कथा को सुनकर हमें समझ आ रही है कि मनुष्य बातचीत के माध्यम से अपनी पहचान और स्थान बनाता है। जितना वह उन्नति के शिखर पर चढ़ता जाता है, उतनी ही उसकी वाणी संयमित होनी चाहिए। अन्यथा वह दूसरों का स्वार्थ साधने के माध्यम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाता। अपने आसपास लोगों से बातचीत करके, उनके बोलने के लहजे से हम बहुत कुछ उनके विषय में जान सकते हैं।
          बच्चों को अनुशासन की शिक्षा देने के लिए वाणी की कठोरता आवश्यक होती है परन्तु आम व्यवहार में नहीं। मनुष्य की वाणी की मधुरता ही उसे सबके सिरों पर विराजमान कर देती है और उसकी कठोरता दूसरों की नजरों से उसे गिरा देती है। इसीलिए वाणी को मनुष्य का वास्तविक आभूषण माना गया है। 
         यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसे समाज में सम्माननीय स्थान चाहिए अथवा वह तिरस्कार का पात्र बनना चाहता है? जैसा भी व्यवहार वह दूसरे लोगों से अपने लिए चाहता है, उसे उसी के अनुरूप अपनी वाणी का प्रयोग करना चाहिए। इस वाणी के कारण वह संसार में अपना एक‌ विशेष स्थान बना सकता है। दुनिया से विदा लेने के पश्चात भी लोग उसके सद् व्यवहार के उदाहरण देते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

जन्म-मृत्यु नदी के दो किनारों की तरह

जन्म-मृत्यु नदी के दो किनारों की तरह

मनुष्य का जन्म जब इस संसार में होता है तब वह खाली हाथ मुठ्ठी बाँधे हुए आता है। और जब यहाँ से विदा लेने लगता है तब भी वह मुठ्ठी खोले खाली हाथ ही चला जाता है। इसका अर्थ यही कहा जा‌ सकता है कि मनुष्य इस दुनिया में न कुछ लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जाता है। तब यह मारकाट, हेराफेरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, उठापटक आदि मनुष्य किसके लिए करता है?
        मनुष्य का जन्म और उसकी मृत्यु नदी के दो छोरों की तरह हैं जो कभी आपस में नहीं मिल पाते। जन्म और मृत्यु के बीच की सुन्दर यात्रा ही हमारा वास्तविक जीवन है। जन्म इस दुनिया में मनुष्य की नई शुरूआत और आगमन का प्रतीक होता है। दूसरी ओर मृत्यु इस भौतिक यात्रा का अन्तिम छोर और विराम होता है। दोनों किनारों के बीच बहता हुआ पानी वह समय होता है जिसमें हम लोग बहुत कुछ सीखते हैं, अनुभव लेते हैं और अपने होने का अर्थ तलाशते हैं।
        धरती और आसमान की तरह ये दोनों बस एक दूसरे को निहारते रहते हैं। रस्सी के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी तक बड़ी सावधानी से चलते हुए पार करनी पड़ती है। जहाँ चूक हुई वहीं सब बर्बाद हो जाता है। 
          प्रातःकाल जब सूर्योदय होता है तो उस समय मानो नवसृष्टि का आह्वान होता है। प्रकृति में चारों ओर प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है, हर कोना सूर्य के प्रकाश में जगमगाने लगता है। पक्षियों का कलरव नवगीत बन जाता है। उसी प्रकार नव शिशु के जन्म पर घर-परिवार में आनन्द-मंगल छा जाता है। नन्हा शिशु नई उमंग और उत्साह का प्रतीक बनकर अपने परिवार में खुशियाँ बिखेरने का माध्यम बन जाता है।
        अपने उदय के पश्चात पल-पल करके सूर्य दिन का अपना चक्र पूर्ण करता हुआ फिर अपने अवसान यानी सूर्यास्त की ओर बढ़ता जाता है। यह क्रम एक दिन का अन्त होता है और आने वाले अगले दिन का प्रारम्भ होता है। उसी प्रकार मनुष्य क्षण-क्षण करके अपने इस जीवनक्रम को पूर्ण करता हुआ अपने अन्त अर्थात् मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता चलता है। उसका यह अन्त नहीं होता अपितु उसके नव जीवन का आरम्भ कहलाता है।
          सूर्य की उदय से अस्त तक की यात्रा यूँ ही सरलता से निर्विघ्न समाप्त नहीं हो जाती। उसके लिए उसे भी संघर्ष करना पड़ता है। कभी किसी ग्रह के उसके मार्ग में आ जाने से उसे ग्रहण लग जाता है और कभी-कभार काले घने बादल आकर उसे ढक लेते हैं। उस समय दिन में ही हमें रात्रि का आभास होने लगता है। तब भी सूर्य हार नहीं मानता बल्कि बादलों के बीच से निकालकर पुनः मुस्कुराता हुआ चमकने लगता है।
        मनुष्य की जन्म से मृत्यु तक की यात्रा भी कष्टों और संघर्षों से भरी रहती है। कदम-कदम पर उसके लिए काँटे बिछाने वालों की कमी नहीं होती। उसके दुःख और उसकी परेशानियाँ उसे चैन नहीं लेने देते। दुखों की बदली छँटने तक उसकी दयनीय दशा में उसे कोई सहारा नहीं देता बल्कि उसके भाई-बन्धुओं की तरह उसकी अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है।
          अपने और अपने परिवार के लिए तो सभी जी लेते हैं। वास्तव में जीना उन्हीं का सफल होता है जो दूसरों के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा देते हैं, समर्पित कर देते हैं। उन्हें ही संसार सदा स्मरण करता है। यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि मृत्यु अवश्यम्भावी है।  इससे कोई भी जीव इस कठोर नियम से नहीं बच सकता। इसे ही विधि का विधान कहा जाता है।
          सूर्य कष्टों का सामना करते हुए भी अपने अहं का त्याग नहीं करता। दोपहर यानी उसके यौवन काल के समय का उसका प्रचण्ड तेज असहनीय होता है। उसी प्रकार मनुष्य का अहं उसे ले डूबता है। काल की ओर बढ़ते हुए उसके लिए अहंकार उचित नहीं है।
          जिस प्रकार रात्रि सम्पूर्ण संसार के विश्राम के लिए होती है उसी प्रकार मृत्यु भी मनुष्य के लिए जन्म से अब तक की सारी थकान मिटाने के लिए माँ की गोद की तरह सुखदायिनी होती है। इस मृत्यु से घबराना नहीं चाहिए बल्कि प्रसन्नता से इसकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिए।
          इस दुनिया का चलन भी बहुत विचित्र है, वह जीवित रहते मनुष्य की सुध नहीं लेती। उसके कष्टों में उससे सहानुभूति भी नहीं रखती। एक इन्सान दूसरे इन्सान को सहारा देने से कतराता है। परन्तु जब उसकी मृत्यु हो जाती है तो फिर वही सब लोग कन्धा देने के लिए पहुँच जाते हैं। इसका कारण यही है कि मृतक को अन्तिम यात्रा के लिए कन्धा देना भारतीय परम्परा के अनुसार पुण्य का कार्य माना जाता है।
          जहाँ तक हो सके समाज में रहते हुए दूसरों की सहायता अवश्य करनी चाहिए। हो सकता है कि उनके दिए गए आशीषों के फलस्वरूप अपने बन्द ताले की चाबी मिल जाए और इससे मनुष्य का इहलोक-परलोक दोनों ही सुधर जाएँ। उसे चौरासी लाख योनियों वाले जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिल जाए।
चन्द्र प्रभा सूद