गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं है। कोई भी मनुष्य सफलता की उँचाइयों को छू सकता है। सफलता अमीर-गरीब, ऊॅंच-नीच और जात-पात को नहीं देखती। मानव को अपने जीवन में सफल होने तथा सबका प्रिय बनने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें यदि अपने जीवन में ढाल लिया जाए तो दुनिया की ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो उसे उसका मनचाहा पाने से रोक सके। 
         यह सर्वथा सत्य है कि सफलता न किसी की मोहताज है‌और न ही किसी की बपौती है। यह केवल अटूट संकल्प, निरन्तर परिश्रम और धैर्य का परिणाम होती है। यह किसी व्यक्ति की आयु नहीं देखती।‌ यह उचित समय पर आरम्भ की गई योजना और मनुष्य की लगन का परिणाम होती है। मनुष्य की प्रतिभा और उसके कार्य स्वयं उसका परिचय देते हैं। इतिहास गवाह है कि इस संसार में अनेक महान हस्तियों ने अपने सीमित संसाधनों तथा विपरीत परिस्थितियों से बिना घबराए अपनी पहचान बनाई है।
         सफलता का मुख्य मूल मन्त्र है अनवरत परिश्रम करना। अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण रखना, असफलता से सीखकर आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति और समय का सही प्रबन्धन करना। ये गुण किसी भी क्षेत्र में सफलता की नींव रखते हैं।यह मानकर चलना चाहिए कि असफलताऍं अस्थायी होती हैं। महान नेताओं और विचारकों के सफलता के मूल मन्त्र को देखकर धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम फलदाई होता है। यह भी सत्य है कि मनुष्य को सदा आशावादी बनना चाहिए। सकारात्मक ऊर्जा ही मनुष्य को चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देती है। 
        समाज में रहते हुए मनुष्य हर प्रकार के लोगों से सम्पर्क में रहता है। कभी वह दूसरों की सहायता करता है और कभी अन्य लोग उसकी। उसे किसी के उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए। जो कष्ट के समय अपना साथ दे उसका कृतज्ञ होना चाहिए। उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
          इसके विपरीत दूसरों के प्रति किये गए परोपकार के कार्यो को भूल जाना चाहिए। सयाने कहते हैं- 'नेकी कर दरिया में डाल।' हमें कभी यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि जिसका भला हमने किया है, वह व्यक्ति आजन्म हमारे समक्ष नजरें झुकाकर रहे अथवा जिन्दगी भर के लिए गुलाम बनकर हमारी चाकरी करता रहे। 
          किए गए उपकार का यदि हर समय बखान करते रहने से उसका महत्त्व समाप्त हो जाता हैं। उसके बदले में हमें किसी से कुछ मिलने की आशा नहीं रखनी चाहिए। हालाँकि यह बहुत कठिन कार्य है क्योंकि इन्सानी कमजोरी है कि वह सदा अपनी प्रशंसा चाहता है। मनुष्य को स्वयं पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। अपने बाहुबल, अपनी मेहनत, अपनी लग्नशीलता पर उसे सदा विश्वास रखना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास नहीं होगा तो वह एक कामयाब इन्सान नहीं बन सकता। वह दुनिया की रेस में पिछड़ जाता है।
          इसी प्रकार अपने भाई-बन्धुओं एवं अपने सहयोगियों पर भी विश्वास करना चाहिए। परस्पर विश्वास से ही दुनिया के सभी कार्य व्यवहार चलते हैं। दूसरों पर सन्देह करने से जीना दुष्वार हो जाता है। यह अविश्वास घुन या दीमक की तरह जीवन को खोखला कर देता है। स्वयं पर और अपने स्वजनों पर विश्वास के साथ-साथ परमपिता परमात्मा पर भी मनुष्य को अटूट विश्वास होना चाहिए। सदा यही मानना चाहिए कि वह जो भी करेगा हमारे हित के लिए ही होगा।
        'क्षमा बड़न को चाहिए' ऐसा कहकर मनीषियों ने क्षमा के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। मनुष्य को सदा क्षमाशील होना चाहिए। यह गुण मनुष्य को सृष्टि के अन्य जीवों से अलग तथा विशेष बनाता है। यह ईश्वरीय गुण है। किसी को उसकी गलती के लिए क्षमा कर देना वास्तव में विशालहृदयता का परिचायक होता है। 
          वे लोग बहुत ही संकीर्ण मानसिकता के होते हैं जो किसी की गलती होने पर उसे सबके समक्ष तिरस्कृत करते हैं, उसका उपहास करते हैं। उनकी ऐसी हरकत के कारण कोई भी उन्हें पसन्द नहीं करता। इसलिए क्षमा रूपी दिव्य गुण को अपनाने से मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सकता है। लोग ऐसे व्यक्ति का साथ पाने के‌ लिए सदैव लालायित रहते हैं।
          मनुष्य के मन में सदा ही यह भाव रहना चाहिए कि इस संसार में वह अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के लिए आया है। जिस भी जीव का जन्म यहाँ होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। यह वैराग्य भाव जब मनुष्य के मन में आता है तब वह जल में कमल की तरह सांसारिक कार्य कलापों में लिप्त हुए बिना जीवन व्यतीत करता है। 
          यदि मनुष्य इस अटल सत्य को आत्मसात कर ले तो किसी कार्य को करने से पहले दस बार सोचेगा। तब वह कोई भी अनुचित कार्य नहीं कर सकता। उचित मार्ग पर चलता हुआ मानसिक सुखानुभूति कर सकता है। एवंविध इन सूत्रों को जीवन में अपना करके मनुष्य सही मायने में अपना इहलोक और परलोक दोनों ही सुधार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 जुलाई 2026

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते हम इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है।
          हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन्दगी जी रहे हैं। हम सहज और सरल नहीं बन पआ रहे हैं। हमारी कथनी, करनी और सोच में बहुत अन्तर है। हम जो सोचते हैं उसे व्यवहार में नहीं लाते और न ही मन में सोचे भावों को अपनी वाणी से यथावत प्रकट करते हैं।
         दिखावे और मुनाफे की इस दुनिया में न केवल खाने-पीने की चीजों में बल्कि इन्सान के व्यवहार और रिश्तों में भी मिलावट आ गई है। आज व्यक्ति बाहर से जितना आकर्षक और सच्चा दिखता है, भीतर से उतना ही स्वार्थी और बनावटी हो गया है। लोग अपनी वास्तविकता छिपाकर झूठी छवि दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते है। 
        सोशल मीडिया की इस दुनिया में यह और भी स्पष्ट हो जाता है जहाँ हर व्यक्ति एक परफेक्ट और खुशहाल जिन्दगी का मुखौटा पहनकर घूमता रहता है। यद्यपि असलियत इससे कोसों दूर होती है। जिस प्रकार मिलावटी खाना स्वास्थ्य को हानि पहुॅंचाता है, उसी प्रकार स्वार्थी रिश्ते और झूठे वादे मनुष्य के मानसिक सुकून को समाप्त कर देते हैं।
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में किसी के पास दो पल का समय नहीं है कि दो मिनट रुककर थकने वाले को सान्त्वना दे सके। जो रेस में पीछे छूट जाता है अथवा गिर जाता है, हम उसकी ओर हाथ बढ़ाकर उसे नहीं उठाते। बस उसे हालात से लड़ने के लिए यूँही छोड़ देते हैं।
        अपने स्वार्थो को सर्वोपरि समझने वाले लोग गधे को भी बाप बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अद्ययुगीन मनुष्य की यही विडम्बना है कि वह पैसे को महत्त्व देता है। सभी सम्बन्ध उसके स्वार्थ के सामने बौने हो जाते हैं क्योंकि वह उन्हें पैसे की कसौटी पर ही तौलता है। वह इस सत्य को भूल जाना चाहता है कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं होती। आज वह उसके पास है तो कल उसे छोड़कर किसी दूसरे का वरण कर लेगी। उस पर मान करके दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मानना सर्वथा अनुचित है। ईश्वर न करे ऐसी विपन्नावस्था आ जाने पर अपनी स्थिति के विषय में विचार करते हुए अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखें।
        हमारी सोच और हमारा व्यवहार दोनों परस्पर मेल नहीं खाते। जिन लोगों को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं, पानी पी-पीकर कोसते हैं, जब वे प्रत्यक्ष सामने उपस्थित हो जाते हैं तो उनकी मनुहार करते हैं। तब उन्हें यह अहसास कराते हैं कि उनके सबसे प्रिय वही हैं।
        इस मानसिकता के चलते अपने सगे रिश्तों के साथ भी ऐसा कृत्रिम व्यवहार करने को भी हम बुरा नहीं मानते। इसलिए 'मुँह में राम बगल में छुरी' वाली उक्ति कही गई है। 
          मन में प्रेम नहीं परन्तु उसका जी जान से प्रदर्शन करते हैं। धन का अभाव होने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो सारी दुनिया को खरीद सकते हैं। अल्प ज्ञान होने पर भी सबके हृदयों में विद्वत्ता की ऐसी धाक जमाना चाहते हैं कि सब हमारा लौहा मानने लगें। 
          असामाजिक कार्य यानि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरबाजारी आदि करते हुए भी स्वय को शुद्ध व पवित्र आत्मा होने कआ दावा करते हैं। अधार्मिक कृत्य करते हुए सबसे बड़े धार्मिक होने का प्रपंच करते हैं। बात-बात पर झूठ बोलने वाले कसमें खाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देने का यत्न करते हैं।
          माता-पिता बच्चों के समक्ष और बच्चे माता-पिता के सामने मुखौटों में रहते हैं। भाई-बन्धुओं के साथ भी बस पाक-साफ बनने का ढोंग किया जाता है।
        राजनेता तो जनता के बीच जाकर अपनी नाकाम उपलब्धियों का बखान करते नहीं अघाते। वे ऐसा जाल फैंकने का प्रयास करते हैं कि हर कोई उनके वश में हो जाएँ। 
        कोई भी यह समझने-बूझने के लिए तैयार नहीं होता कि 'काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।' इसी तरह जब मुखौटा चेहरे से उतर जाता है तब वह विकृत चेहरा बहुत ही भयावह दिखाई देता है। 
          मनुष्य का चेहरा एक आईना होता है जिसमें उसके मन के सभी भाव दूसरों को सरलता से दिख जाते हैं। ईश्वर को भी किसी तरह का दिखावा पसन्द नहीं है। अतः अपने मुखौटानुमा मिलावटी आचरण को छोड़कर हम सभी लोगों को अपने स्वभाविक रूप में रहना चाहिए। इसी में मनुष्य का बड़प्पन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जीवन जीने के बदलते मायने

जीवन जीने के बदलते मायने 

जीवन को जीने के हमारे मायने बदलते जा रहे हैं। हमारी जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन हो चुका है। हमारा आहार-विहार जीवनोपयोगी नहीं रह गया। मनीषियों का कथन है कि हमें जीने के लिए खाना चाहिए परन्तु हम खाने के लिए जीने लगे हैं।विचार का यह अन्तर हमारे लिए एक चुनौती बन सकता ‌है।‌ 
          ‌हमारे आहार-विहार में बहुत बदलाव हो गया है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में युवाओं के पास अपने लिए समय नहीं निकल पाता। इसलिए सामाजिक कार्यों में चाहकर भी भाग नहीं ले पाते। सही लोगों के पास आज गाड़ियॉं हैं। इस कारण आवागमन में कठिनाई नहीं होती। शायद यही कारण है कि आज शादी-ब्याह और पार्टियॉं देर रात तक चलती हैं। इसलिए नींद पूरी नहीं हो पाती। पूरा दिन शरीर पर आलस्य छाया रहता है।
          कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तुलित और सुपाच्य भोजन के स्थान पर हम मिर्च-मसालों वाला और जंक फूड खाना पसन्द करते हैं। परिणाम स्वरूप हम अनेक बिमारियों को न्यौता दे बैठते हैं। कुछ लोग लाचार हैं, मजबूर हैं इसलिए बीमार होते है किन्तु कुछ दूसरे लोग अपनी बिमारियों की वजह से लाचारी का जीवन ढो रहे है।
          सारा दिन टेबल वर्क करने से भी शरीरिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। फिर जिम संस्कृति के चक्कर में पड़कर और परेशान होते हैं। डाक्टर परामर्श देते हैं सैर करिए। उस समय अमीर लोग खाना पचाने के लिए मीलों चलते हैं। इसके विपरीत गरीब व्यक्ति खाना खाने के लिए पता नहीं कितने मील पैदल चल लेता है। 
          आज महँगाई के समय घर के सभी लोग कमाने में लगे हुए हैं। दिन-रात काम की धुन में खाने-पीने की सुध नहीं रहती। जिस भोजन को पाने के लिए इतने जतन करते हैं उसी खाने के लिए समय नहीं निकल पाता। दूसरी ओर संसार में ऐसे भी असहाय लोग हैं जिनको खाने के लाले पड़े हुए हैं। उन बेचारों को कितने वक्त का खाना नसीब हो पाएगा, यह भी कुछ निश्चित नहीं होता।
          अपनी गरीबी की लाचार अवस्था में माता-पिता अपने बच्चों को रोटी खिला देते हैं और स्वयं भूखे रह जाते हैं। उधर साधन सम्पन्न होते हुए भी बच्चे माता-पिता को असहाय छोड़ देते हैं। वे बेचारे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं और दरबदर की ठोकरें खाते हैं। इस समय स्थिति बड़ी विकट बनती जा रही है। दो वक्त की रोटी न खिलानी पड़ जाए इसलिए लोग अपने ही प्रियजनों से मुँह मोड़ने में लगे हुए हैं।
          दिन-प्रतिदिन हम अपने संकुचित विचारों के कारण इस दुनिया को भी संकीर्ण बनाते जा रहे हैं। ईश्वर ने तो हमें ऐसा कभी नहीं बनाया था फिर ऐसा नकारात्मक परिवर्तन क्योंकर हो गया। यह हमारी समझ से परे है।
          कुछ समय पहले जब हम बच्चे थे तब प्रतिदिन छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते थे, तकरार करते थे और फिर थोड़े समय बाद एक-दूसरे को मना भी लिया करते थे। एक-दूसरे के गले मे गलबहियाँ डालकर मुस्कुराते थे। अब जब हम बड़े हो गए हैं तो हमारे अहं परस्पर टकराने लगे हैं। हम अपने बचपन जैसी सहजता औऱ सरलता कहीं पीछे छोड़ आए हैं। इसलिए स्थितियाँ बहुत खराब हो गई हैं। अब यदि हम एक बार लड़ते है तो रिश्तों को ही खत्म करने के बहाने ढूँढने लगते हैं। आपसी प्यार और विश्वास तो मानो पता नहीं कहॉं खोते जा रहे हैं।
     ‌   जिन्दगी ने हमें बहुत अनुभवी बना दिया है। हम आवश्यकता से अधिक सीखकर बुद्धिमान हो गए हैं। अब हम इतने बड़े होते जा रहे हैं कि बाकी सब लोग हमें बौने दिखाई देने लगे हैं। किसी दूसरे के कष्ट को देखकर हमारा मन बिल्कुल नहीं पसीजता। हम हाथ बढ़ाकर किसी भी ‌व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहते। हम लोग दूसरों को परेशान देखकर अपनी ऑंखें मूॅंद लेते हैं। हमें सिर्फ और सिर्फ अपनी समस्याएँ दिखाई देती हैं। 
          हम लोगों पर आज केवल स्वार्थ हावी होता जा रहा है जो बहुत ही गलत है। न तो हमें अपने दोस्तों में कोई दिलचस्पी है और न ही अपने भाई-बन्धुओं में। जिससे हमारे स्वार्थ पूरे होते हैं वही हमें अपना-सा प्रतीत होता है। स्वार्थ पूरे होने के बाद सबके रास्ते अलग हो जाते हैं। लोग मिलने पर नजरें चुराकर या कन्नी काटकर निकली जाते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो वे एक-दूसरे को पहचानते ही नहीं हैं।
        अपने हृदयों को थोड़ा विशाल बनाकर और सकारात्मक रूख अपनाकर हम इस संसार को अपना बना सकते हैं। इस जीवन यात्रा में हमें बहुत से हमसफर मिलते हैं। उनके साथ यदि कदम मिलाकर चलने की मानसिकता हम बना लें तो तभी बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। हम सब लोग मिलकर ही सम्बन्धों में परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

इक्कीसवीं सदी का यह युग टेक्नोलॉजी का है। बच्चे और युवा इस तकनीक का सफलतापूर्वक भरपूर प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। आज हर छोटे-बड़े ऑफिस में हम कर्मचारियों को कम्प्यूटर और लेपटाप पर काम करते हुए देख सकते हैं। बैंक भी आनलाइन हो गए हैं। उनकी एप्लिकेशन डाउनलोड करके बिना समय गॅंवाए शीघ्रता से हम ट्रांजेक्शन कर सकते हैं। आजकल यूपीआई आदि से पैसों का लेन-देन प्रायः सभी लोग करते हुए दिखाई देते हैं।
         छोटे-छोटे बच्चे भी आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और आईपेड का प्रयोग सुविधा से करते हैं। बच्चों को इन उपकरणों पर सहजता से कार्य करते हुए देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। बच्चों की अंगुलियॉं इन उपकरणों पर बहुत तेजी से भागती हुई सी दिखाई देती हैं। बच्चे अपने मन पसन्द प्रोग्राम बिना किसी की सहायता के स्वयं ही देख लेते हैं। उनके ज्ञानवर्धक बहुत से प्रोग्राम मोबाइल आदि में मिल जाते हैं। उनके विद्यालय के प्रोजेक्ट्स भी इनकी सहायता से बनाए जाते हैं। बच्चों की आधी पढ़ाई तो इन्हीं उपकरणों के माध्यम से हो जाती है।
        प्रायः आयुप्राप्त होते लोगों से भी मिलना होता रहता है। वे स्वयं को जब इस तकनीक के प्रयोग के लिए मिसफिट समझ लेते हैं तो मन को कष्ट होता है। सारी आयु नित नूतन प्रयोग करने वालों से ऐसी सोच की आशा वास्तव में बहुत निराश करने वाली होती है। 
          मोबाइल फोन अपनी जेब में रखकर जब लोग कहते हैं कि हमें तो बस फोन मिलाना और किसी से बात करने के अलावा कुछ नहीं आता तब झटका-सा लगता है। न वे फोन में कोई नम्बर फीड कर सकते हैं और न ही मैसेज तक कर सकते हैं। फेसबुक और वाट्सअप या अन्य एप्लीकेशन की जानकारी होना उनके लिए मानो बहुत दूर की कौड़ी होती है। यद्यपि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। घर में रहने वाले युवाओं और बच्चों का यह दायित्व बनता है कि अपने बुजुर्गों को इस नई टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दें।
          रिटायर होने के बाद सभी बुजुर्गों को समय व्यतीत करने की समस्या होने लगती है। उसका कारण है कि वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते हुए उनका शरीर अशक्त होने लगता है। इसलिए वे भागदौड़ करने वाले काम नहीं कर पाते। सभी लोगों के पास कुछ करने के लिए काम नहीं होता। तभी वे प्रायः खाली बैठे रहते हैं। बच्चे अपने कामों में व्यस्त रहते हैं, उनके पास बुजुर्गों के पास बैठने के लिए सीमित समय निकल पाता है। स्वयं को अपेक्षित समझने के कारण वे हर समय अनमने और चिड़चिड़े से रहने लगते हैं।
        इस तरह की परेशानियों से अपने घर के बुजुर्गों को मोबाइल का उपहार देकर उन्हें व्यस्त रहने का अवसर दें। उन्हें फेसबुक और वाट्सअप आदि चलाना भी सिखाएँ। वे जब इस नई तकनीक का सही ढंग से प्रयोग करना सीख जाएँगे तो उनका मन भी लगा रहेगा। उन्हें घर बैठे काम करने की जानकारी समझानी चाहिए।
        उन्हें सिखा देना चाहिए कि वे पोस्ट पढ़ें, उन पर कमेण्ट करे, मन करे तो कुछ लिखकर पोस्ट कर दें, कभी चाहें तो फोटो भी लोड कर सकते हैं। उन्हें अपने मित्रों के साथ चैट करना भी सीखा सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका काफी समय व्यतीत हो जाएगा। जब वे इस प्रकार व्यस्त हो जाएँगे तो उनकी समय बिताने की समस्या का समाधान हो जाएगा। वे खुश रहेंगे तो घर की शान्ति भी बनी रहेगी। 
        अपने बुजुर्गों या माता-पिता को यह अवश्य बता दें कि फेसबुक मित्रता का अखाड़ा नहीं है अपितु उसका उपयोग रचनात्मक होना चाहिए। यदि कोई अवांछित पोस्ट करे अथवा कोई पसन्द न आए तो उसे ब्लॉक करना अथवा अनफ्रैण्ड करना भी सिखाएँ। 
        जिस भी विषय में उनकी जानकारी है अथवा अपने जीवनभर प्राप्त अनुभवों को सबके साथ साझा कर सकते हैं। लाइक वाले बटन पर वे क्लिक करके अपनी सहमति दर्ज कर सकते हैं। यह बात उन्हें समझानी भी आवश्यक है कि यदि वहाँ उनकी पोस्ट पर लाइक न भी आ सकें तो निराश न होकर अपने अनुभवों को साझा करते रहें। यह ऐसा माध्यम है जहाँ सभी लोग निस्सकोच अपने मन की बात या सुख-दुख भी शेयर करके अपने दिल का बोझ कम कर सकते हैं। इस माध्यम से लाभ-हानि की अपेक्षा करना उचित नहीं हो सकता।
        युवाओं को चाहिए कि जहाँ भी उन्हें कोई कठिनाई आए तो उनके पास बैठकर तसल्ली से उसके निवारण का उपाय बताएँ। उनकी व्यस्तता के इस बहाने की सराहना करते रहें, इससे उनका उत्साह बना रहेगा। प्रयास करिए कि वे इस नई तकनीक से बोर न हों बल्कि उसमें अपना मन लगाए रहें। यदि बुजुर्ग अपने फालतू समय का सदुपयोग इस तरह करेंगे तो प्रसन्न रहेंगे और आप स्वयं भी उनकी ओर से निश्चिन्त हो जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 जुलाई 2026

मनुष्य का ‌क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना अति आवश्यक है। कोई कुछ भी कहे या अहित कर दे तो भी उसके कृत्यों को अपने दिल से लगाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। अनावश्यक रूप से पिष्टपेषण करते रहने से अपने मन में उस व्यक्ति के लिए नफरत की भावना बढ़ने लगती है। उसका बिगाड़ तो समय पर होगा किन्तु अपना ही मन अनावश्यक ही ‌कलुषित हो जाएगा और उसमें ईर्ष्या-क्रोध आदि की अधिकता हो जाती है। इस कारण मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है।
          प्रतिकार करने से किसी का भला नहीं होता। किसी को माफ कर देने से बड़ा और कोई गुण नहीं होता। जितने भी महापुरुष इस भारतभूमि पर हुए हैं उन सबने इसे अस्त्र के रूप में अपनाया। तभी उन सबको हम याद करते हैं।
        यह भी सच है कि दूसरों को क्षमा करने वालों को लोग बहुधा कायर समझ लेते हैं। यह क्षमा दूसरों के हृदयों में अपना स्थान बनाने का ब्रह्मास्त्र है जिसका सन्धान करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। यह क्षमा रूपी गुण सज्जनों का अमूल्य आभूषण होता है।
              राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक प्रसिद्ध कविता है 'शक्ति और क्षमा' उसकी निम्न पंक्ति का अर्थ है कि क्षमा उसी व्यक्ति को शोभा देती है, जो शक्तिशाली हो -
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।।
अर्थात् कवि का कथन है कि शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी कमजोर व्यक्ति को क्षमा कर दे तो उसकी उदारता और महानता दिखाई देती है। सर्प का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक विषैले और शक्तिशाली सॉंप में यदि डसने की क्षमता या उसके पास विष हो और फिर भी वह किसी को न काटे तो उसका यह संयम महान माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कवि का मुख्य सन्देश यही है कि दया, त्याग और क्षमा जैसे गुण तभी सार्थक और प्रभावशाली बन सकते हैं जब एक व्यक्ति भीतर से शक्तिशाली और समर्थ हो।
          राजा रंजीत सिंह के जीवन की एक घटना की चर्चा करते हैं। उनकी एक आँख नहीं थी। एक बार वे अपने सिपाहियों के साथ शहर की व्यवस्था देखने के लिए भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में एक बाग में थोड़ी देर विश्राम करने के लिए रुके।
        तभी कहीं से एक पत्थर आकर उन्हें लगा। सिपाहियों को बहुत क्रोध आ गया और पत्थर मारने वाले बालक को पकड़कर वे राजा के सामने ले आए। राजा ने कड़ककर उससे पत्थर मारने का कारण पूछा, "बच्चे तुमने पत्थर क्यों मारा?"
          उस बालक ने बड़ी निडरता से उत्तर दिया, "महाराज, वह फल तोड़ने के लिए वृक्ष पर पत्थर मारा था। मेरी कोई गलती नहीं है कि वह पत्थर आपको लग गया।"
          बालक के इस निर्भीक उत्तर को सुनकर राजा ने सिपाहियों को आदेश देते हुए कहा, "इस बालक को मेरी ओर से एक पुरस्कार दिया जाए।"
          वे सभी सिपाही राजा के इस निर्णय को सुनकर हैरान हो गए।
          तब राजा रंजीत सिंह ने उनसे कहा, "वृक्ष को पत्थर मारो तो वह फल देता हैं और मैं राजा होकर यानी इन्सान होकर भी इस बालक को पुरस्कार नहीं दे सकता। समर्थ होकर भी क्या मैं इतना गया गुजरा हूँ कि फल पाने की आस से पेड़ पर पत्थर मारने वाले को वह फल देता है और मैं इस बालक को निराश करूँ।"
          ऐसी होती हैं महान् लोगों की बातें जिन्हें युगों तक याद किया जाता है। इसीलिए कहा है कि क्षमा से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं होता। सामने वाला व्यक्ति बिना मोल अपना बन जाता है। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन दूसरों को क्षमा कर देने से अपना मन कलुषित नहीं होता। दिल पर से बोझ उतर जाता है और हृदय सदा प्रसन्न रहता है।
          कुछ लोगों का मानना है कि दुर्बल व्यक्ति की क्षमा कोई मायने नहीं रखती। वह क्षमा नहीं करेगा तो क्या करेगा? इसके लिए वे कहते हैं कि क्षमा उसे सुशोभित करती है जिसके पास दूसरे को दण्ड देने की सामर्थ्य हो। मेरे विचार से यह कहना अनुचित है क्योंकि क्षमा करने का गुण उसी में होगा जिसमें आत्मिक व मानसिक बल होगा। 
          शारीरिक दुर्बलता की बात करना बेमायने हो जाती है। यदि शरीर से व्यक्ति दुबला-पतला हो किन्तु उसमें आत्मिक बल हो तो वह संसार की किसी शक्ति से नहीं डरता। सबका डटकर मुकाबला करता है व हर चुनौती से भिड़ने की सामर्थ्य रखता है। शरीर से कमजोर होने पर महात्मा गान्धी की तरह व्यक्ति अपने व्यवहार से सिद्ध कर सकता है कि वह अच्छे अच्छों की हवा टाइट करके उन्हें उखाड़कर फैंक सकता है।
          क्षमा को अपनाने वाला व्यक्ति हमेशा प्रथम पंक्ति में रहता है। ऐसे सज्जन की चाहे कोई बुराई कर ले परन्तु उसका यह एक गुण सब पर भारी पड़ता है। ईश्वर को भी विनयी और क्षमाशील लोग पसन्द आते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

बगुला भगत

बगुला भगत 

'बगुला भगत' एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है - कपटी व्यक्ति, झूठा इन्सान, ढोंगी मनुष्य, पाखण्डी आदमी, धूर्त या चालाक व्यक्ति। इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो बाहर से बहुत सीधे-सादे, धार्मिक और सज्जन दिखाई देते हैं परन्तु असल में वे बहुत चालाक, दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के होते हैं। बगुला भक्तों के लिए हमें प्रायः यह उक्ति सुनने को मिलती है-
              मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
        बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इन्सान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? 
         वास्तव में 'बगुला भगत' यह शब्द बगुला (पक्षी) के स्वभाव से लिया गया है। कहते हैं कि जब बगुला मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। 
          दूसरे शब्दों में बगुला पानी में एक टाँग पर खड़ा होकर ऐसा ध्यान लगाता है जैसे कोई बहुत बड़ा तपस्वी हो लेकिन मौका मिलते ही वह झट से मछली पर झपट्टा मार देता है। उन्हें अपना शिकार बना लेता है। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकतीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगती हैं। अब बगुले की तो मौज हो जाती है। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
         मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। केवल जौहरी ही स्वयं उसका मूल्य लगा सकता है।
          जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय वे ही भयभीत रहते हैं।
         कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
अर्थात् जिस प्रकार का अन्न मनुष्य खाता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। इसलिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का सभी दुरूपयोग ही करते हैं।
        मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम पर लाखों रुपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
         पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
          कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। उनका यह जप-तप सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं-     
    अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है, उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
         अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से सदा बचकर रहना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर मनुष्य सारे आडम्बर कर रहा है, वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर यदि डरकर अपनी ऑंखें बन्द कर लेता है तो बिल्ली वहॉं से भाग नहीं जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत  दुष्कर्मों का फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर वह कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है। अतः बगुला भक्त न बनकर मनुष्य को प्रभु का सच्चा भक्त बनना चाहिए।

हम मिलावटी युग में जी रहे

हम मिलावटी युग में जी रहे

समय परिवर्तनशील है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। कुछ दशकों पूर्व तक सभी प्राकृतिक संसाधन यानी जल, वायु सभी शुद्ध मिलते थे। उसी प्रकार सभी  खाद्यान्न भी शुद्ध मिलते थे। परन्तु आज की वास्तविकता यही है कि हम लोग मिलावट वाले युग में जी रहे हैं। जिस भी चीज में देखा जाए कुछ-न-कुछ मिला हुआ ही होता है। न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। हम लोगों को कोई भी खाद्य पदार्थ अपने शुद्ध रूप में नहीं मिल पाता जिनको पाना हम सबका अधिकार है। 
           हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे जीवन के साथ यह मिलावट का खेल चल रहा है। प्रायः टीवी और समाचार पत्रों ये खाद्यान्नों में मिलावट के समाचार सुर्खियाँ बनती रहती हैं। यूरिया आदि मिलाकर सिन्थेटिक दूध बनाना, मिलावटी खोया व पनीर बिकना, फलों और सब्जियों पर आर्टिफिशयल रंग करना व उनको आकार में बड़ा करने के लिए अथवा मिठास के लिए इन्जेकशन लगाना, काली मिर्च में पपीते के बीज डालना, चीनी में हड्डियों का चूरा, बहुत से खाद्य तेलों में जानवरों की चर्बी मिलना आदि।
       हम लोग फल और सब्जियों को इस उम्मीद में बाजार से खरीदकर लाते हैं कि वे स्वास्थ्यवर्धक हैं।पर बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि घर में सब्जियों को जब धोने लगो तो उन पर लगा अप्राकृतिक रंग निकलने लगता है। हैरानी की बात यह है कि फल खाने लगो तो एक ही फल का कुछ हिस्सा अजीब तरह से मीठा होता है और कुछ फीका। इन पर पता नहीं किसका लेप लगाते हैं जिसके कारण ये सब एकदम चमकते हुए और आकर्षक दिखाई देते हैं। उन्हें देखते ही खरीदने का मन कर जाता है।
          सुन्दरता में चार चाँद लगाने की सलाह देने वाले विज्ञापनों के अनुसार यदि उनका इस्तेमाल किया जाए तो उन सौन्दर्य प्रसाधनों में की गई मिलावट त्वचा को हानि पहुँचा रही है। इसी प्रकार कुछ समय पहले मैगी, कोक और टूथपेस्ट आदि में हानिकारक तत्त्वों की चर्चा टीवी और समाचार पत्रों में प्रमुखता से कवरेज दी गई।
         खेती में पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक आदि भी मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं। और तो और जल को फैक्टरियों का केमिकल युक्त वेस्ट और सीवर की गन्दगी दूषित कर रही है। वायु को हम पेड़ काटकर और गाड़ियों, एसी, फैक्टरियों के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। यानी कि प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है।इनके कारण कई रोग बढ़ते जा रहे हैं।
         ईश्वर ने हमें हर पदार्थ शुद्धरूप में दिया है परन्तु मुट्ठी भर स्वार्थी लोग अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण पूरे भारत देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसा कुकृत्य करते समय न उनका जमीर उन्हें कचोटता है और न ही उनके हाथ काँपते हैं। पता नहीं पर शायद ऐसे लोग मोटी चमड़ी के बन जाते हैं। इसीलिए उन लोगों पर कोई असर नहीं होता।
        आज स्थिति यह हो गई है कि न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। फल-सब्जियाँ तथा खाद्यान्न भी हमें पुष्ट नहीं करते। इस प्रकार अपनी मूर्खताओं के कारण हम अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं। समझ नहीं आता कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या खिला रहे हैं? हमारे बच्चे ऐसे मिलावटी पदार्थों को खाकर कैसे स्वस्थ रहेंगे?
          इन प्रदूषित खाद्यों का सेवन करके हम स्वयं ही अनेकानेक बिमारियों को न्योता देते जा रहे हैं। इसी कारण ही कुकुरमुत्ते की तरह मल्टीस्पेशैलिटी वाले हस्पलात नित्य प्रति खुलते जा रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। ये दुनिया भर के टेस्ट करवाते हैं फिर भी कोई गारण्टी नहीं कि इलाज सही हो सकेगा। कितने ही ऐसे उदाहरणों की चर्चा सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर होती रहती है।
        देश में कई प्रदेशों में टेस्टिंगलेब हैं जहाँ इन खाद्यान्नों के सैम्पल चैक किए जाते हैं। अब समस्या यही है कि यदि इन समाजविरोधियों को सजा मिल सके तो शायद इस समस्या से किसी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। केवल सरकार के आधे-अधूरे प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला। बस ऐसे ही ये खबरें सुर्खियाँ बटोरती रहेंगी और फिर सब टाँय-टाँय फिस्स होता रहेगा।
           सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों को भी आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा। जन साधारण के भी जागरूक रहने की बहुत आवश्यकता है। यदि आमजन इन अशुद्ध वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे तो शायद भविष्य में कुछ राहत मिलने की सम्भावना बन सकती है।
          यदि समय रहते हम न जागे तो पता नहीं हम सबके स्वास्थ्य का कितना और विनाश होगा और इस विनाशलीला के लिए किसी ओर को दोष नहीं दे सकेंगे, इसके जिम्मेदार हम खुद ही होंगे। यह हमारे लिए खतरे की घण्टी है। यदि शीघ्र ही कोई ठोस कदम न उठाया गया तो जनसाधारण के स्वास्थ्य की रक्षा किसी तरह नहीं की जा सकेगी।
चन्द्र प्रभा सूद