सोमवार, 2 मार्च 2026

अपनी जड़ों से जुड़ें

अपनी जड़ों से जुड़ें 

मनुष्य अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में विश्व के किसी भी देश में रहते हैं, यह उनका अपना चुनाव होता है। उन्हें उनकी अपनी जड़ें दूरी नहीं बनाने देती। उसके बचपन से लेकर आज तक के संस्कार, उसकी सांस्कृतिक विरासत उन्हें अपने से अलग नहीं होने देते। ये संस्कार उनके हृदय की गहराइयों में इतने गहरे पैठे होते हैं कि चाहकर भी वह उनको झटक नहीं सकते। ये सब उन्हें समय-समय पर याद दिलाते रहते हैं। मनुष्य बार-बार स्वयं को अपने अतीत में झॉंककर बैचेन होने लगते हैं।    
             यही कारण है कि परदेस में रहते हुए वे हर समय वहाँ के और अपने वातावरण की तुलना करते रहते हैं। वहाँ के उस नए माहौल में रच-बस जाना बहुत कठिन होता है। उन्हें अपना परिवेश रह-रहकर याद आता है। अपने तीज-त्योहार, अपने रस्मों-रिवाज उसे बार-बार अपनो से दूरी की याद दिलाते रहते हैं, जो उनके हृदय में एक टीस बनकर कसकते रहते हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है, वे अपनों को गले लगाने के लिए उत्साहित हो जाते हैं। अपने घर-परिवार से दूरी की विवशता पर उन्हें गाहे-बगाहे उदासी आ जाती है।
              विदेशों में रहने वाले लोग अपने त्योहारों को अपने परिवारी जनों के साथ नहीं मना पाने की उदासी को दूर करने के लिए वहाँ रहने वाले मित्रों के साथ मनाते हैं। इसी तरह वे यथासम्भव अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने का एक सार्थक प्रयास करते रहते हैं। उनका यह प्रयास वास्तव में सराहनीय है।
             समय और परिस्थितियों के कारण उनका अपने देश में लौटना सम्भव नहीं हो पाता, पर उनका मन सदा यही करता है कि वह किसी भी क्षण, किसी भी तरह उड़कर अपनों के बीच आ जाऍं। फिर से पुराने दिनों की तरह खूब मस्ती करें, धमाल करें, अपने सुख-दुख साझा करें। परन्तु वे अपनी इस चाह को अपनी मजबूरियों के कारण, अपने मन के किसी अज्ञात कोने में दफन कर देने के लिए विवश हो जाते हैं।
              हम देखते हैं कि प्रवासी पक्षी एक खास मौसम के आने पर दूसरे देशों में जाते हैं। वहाँ मौसम व्यतीत करके वे वापिस अपने स्थान पर लौट जाते हैं। अपने देश की मिट्टी की यही कसक शायद उन परिन्दों को वापिस लौटाकर ले जाती है। हर वर्ष वे आते हैं और फिर वापिस चले जाते हैं, वहीं के होकर नहीं रह जाते। बेजुबान पक्षियों के मन में यदि अपनी मिट्टी के प्रति इतनी कसक हो सकती है तो फिर इन्सानों के मन में ऐसा भाव आ जाना वास्तव में स्वाभाविक होता है।
             वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग है जहाँ भगवान राम रावण को युद्ध में परास्त कर देते हैं। वे लंका का राज्य रावण के भाई विभीषण को सौंप देते हैं। उस समय वे अपने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाते हुए कहते हैं कि उन्हें सोने से बनी लंका का कोई मोह नहीं है। उन्हें अपनी माता और अपनी जन्मभूमि से प्यार है -
        न मे स्वर्णमयी लंकाSपि रोचते लक्ष्मण।
        जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात् हे लक्ष्मण! मुझे सोने की यह लंका भी पसन्द नहीं है। मेरी माता और मेरी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
             इससे बढ़कर अपनी जन्मभूमि के प्रति लगाव का कोई अन्य उदाहरण नहीं हो सकता। यदि वे चाहते तो युद्ध में जीती हुई लंका पर शासन कर सकते थे। पर नहीं उन्होंने विभीषण को लंका सौंप दी और स्वयं चले आए अपनी जन्मभूमि अयोध्या में अपनों के बीच।
              हमारे मनीषी समझाते हुए कहते हैं कि मनुष्य को अपने देश, अपने वेष और अपनी संस्कृति से प्यार होना चाहिए। जिसे इनसे प्यार नहीं है, वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। शायद यही कारण है कि दशकों पूर्व विदेशों में जाकर बसे और वहाँ की नागरिकता लेकर रच-बस जाने वाले भारतीय, बरसों-बरस बीत जाने तथा पीढ़ियों के बदल जाने के बाद भी भारतीय ही कहलाते हैं। राजनैतिक भाषा में उन्हें भारतीय मूल का कह दिया जाता है।
              इतना सब हो जाने के बाद भी मृत्यु के समय अपने देश की मिट्टी न पा सकने की कसक उनके मनों में रहती है। इसलिए ही बहुत से लोग जब भी समय मिलता है, तब अपने भारत देश आते हैं और प्रियजनों की सम्हालकर रखी गई अस्थियाँ गंगा जी में प्रवाहित करते हैं। इससे उनके मन में यह सन्तोष का भाव रहता है कि उन्होंने अपने प्रियजन की अस्थियों को अपने देश की पवित्र गंगा नदी प्रवाहित करके अपनी जड़ों से जोड़ दिया है। यह अहसास उनकी कसक का प्रतीक है।
             परिस्थतियाँ और समय मनुष्य को अपने देश तथा परिवेश से दूर तो कर सकते हैं परन्तु उनके हृदयों को नहीं। यही कारण है कि परदेस की धरती पर रहने वाले भारतीय अपने देश की महक को भूल नहीं पाते बल्कि उसे बहुमूल्य नगीनों की तरह संजोकर रखते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 मार्च 2026

सफलता के लिए

सफलता के लिए

अपने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सदैव सफलता का व्रत करना चाहता है। कोई भी व्यक्ति असफल होने के विषय में विचार नहीं करना चाहता। किसी भी कार्य को सावधानी पूर्वक करना चाहिए। किसी भी कार्य की सफलता के लिए मनुष्य के पास दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता होता है शार्टकट वाला, यानी गलत मार्ग। जबकि दूसरा रास्ता लम्बा और सीधा होता है। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह कितना धैर्यशाली है? वह किस मार्ग का चुनाव करता है? 
             मनुष्य यदि धैर्यवान् एवं निष्ठावान् होगा तो वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए अथक प्रयास करेगा। दिन-रात मेहनत करता हुआ वह अपने उद्देश्य में अवश्य सफल होगा। उसे अपने रास्ते पर चलते हुए अनेक प्रलोभनों का सामना करना पड़ता है। अनेक कठिनाइयाँ उसका रास्ता रोक लेती हैं। वह लगनशील व्यक्ति उन प्रलोभनो से किनारा करता हुआ, सभी कठिनाइयों को सुलझाता हुआ अपने सीधे रास्ते पर चलकर मंजिल तक पहुँच जाता है। ऐसे ही कर्त्तव्यनिष्ठ पुरुषार्थियों का लक्ष्य उनका रास्ता बड़ी ही बेसब्री से देखता है।
               इनके विपरीत सुविधाभोगी लोग हमेशा सरल मार्ग ढूँढते रहते हैं। वे लम्बे मार्ग की अपेक्षा शार्टकट अपनाना पसन्द करते हैं। इस सरलता की खोज करते हुए वे यदा कदा अपने रास्ते से भटक जाते हैं और गलत हाथों में पड़ जाते हैं। समाज और न्याय व्यवस्था के अपराधी बनने में उनको देर नहीं लगती। ऐसे कार्य करके वे स्वयं को और अपनों को संकट में डाल देते हैं। उस समय वे अपने बन्धु-बान्धवों की शर्मिंदगी का कारण जाने-अनजाने बन जाते हैं।
              अधीरता सदा ही हानिकारक होती है। उसके दूरगामी भी परिणाम उतने ही निराशाजनक होते हैं। जल्दबाजी में भी जो कार्य किए जाते हैं वे सुलझने के स्थान पर उलझ जाते हैं। तब मनुष्य उनको सुलझाने में और अधिक दुखी हो जाता है। उसे समझ नहीं आता कि वह इस स्थिति में क्या करे और क्या न करे? यह दुविधा की स्थिति उसके लिए परेशानी का कारण बन जाती है।
              'महाभारत' के शान्तिपर्व में वेद व्यास जी कहते हैं -
      नासम्यक् कृतकारी स्यात् अप्रमत्त: सदा भवेत्।
      कण्टकोSपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम्॥
अर्थात् अनुचित तरीके से काम नहीं करना चाहिए, सदा सावधान रहना चाहिए। काँटा भी यदि सही ढंग से न निकाला जाए तो वह भी बहुत समय तक कष्टकारक होता है।
             इस श्लोक का यही कथन है कि हमेशा चौकस रहना चाहिए। गलत तरीके से किए गए कार्य का परिणाम दुखदायी होता है। यहाँ काँटे का उदाहरण देते हुए वे कह रहे है कि यदि काँटा चुभ जाए तो उसे ध्यान से निकालकर फैंक देना चाहिए। यदि उसका कुछ भी अंश शरीर में बचा रह जाए तो वह नासूर बन जाता है। तब आपरेशन करवा करके उसे निकलवाना पड़ता है। फिर कोई गारण्टी नहीं कि मनुष्य पूर्णरूपेण ठीक हो पाएगा। इसलिए ध्यान से अपना काम करना चाहिए।
          उसी प्रकार अपनी सुविधा के लिए पथभ्रष्ट होकर कुमार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति की भी कोई गारण्टी नहीं है कि वह समाज के लिए नासूर नहीं बन जाएगा। अथवा पूरे मन से सन्मार्ग का पुन: पथिक बन सकेगा। यदि वह मुख्य धारा का मन से अनुगामी बन जाए तो उसका सौभाग्य होगा। अन्यथा उसे सारा जीवन समाज में अभिशप्त जीवन जीना पड़ता है। यह परिस्थिति उसके लिए बहुत कठिन होती है।
             यदि मनुष्य अपने कुमार्ग का परित्याग नहीं करता तो समाज ही उसका बॉयकाट कर देता है। उसे सम्मान के स्थान पर तिरस्कार मिलता है। वह नासूर बनकर समाज को दूषित न करे इसलिए उसे अलग-थलग करके सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। उसके अपने प्रियजन भी समाज के डर से उस समय उससे किनारा कर लेते हैं। यह उसके दुख का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। वह जीवित रहते हुए, सबके साथ की कामना करता हुआ अकेलेपन का शिकार हो जाता है।
             गलत तरीके से कमाया हुआ धन-वैभव, अर्जित की गई विद्या अथवा अन्य कोई सम्मान समय बीतते सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। तब मनुष्य को अपनी पोल खुल जाने पर सबके सामने सिर नीचा करना पड़ता है। उसे जग हंसाई का सामना करना पड़ता है। तब वह अपना मुॅंह छिपाने के लिए विवश हो जाता है। उसके अपने परिवार के लोग उसे लानत-मलामत करने लगते हैं। उसका सम्मान नहीं करते।
              मनीषी जन इसीलिए उचित मार्ग से अपने कार्यों की सिद्धि और अनुचित मार्ग का त्याग करने का परामर्श देते हैं। जीवन में कल्याण की कामना करने वाले मनुष्य को इस आत्म अनुशासन का मन से पालन करना चाहिए। तभी उसे सर्वत्र मान-सम्मान मिलता है। इस प्रकार करने से उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक विशेष कला

चुगलखोरी एक कला विशेष है। इस कला में हर कोई निपुण नहीं हो सकता। वैसे व्यक्ति इस कला में निपुणता हासिल न ही करे तो अच्छा है। इस शब्द का प्रयोग लोग गाली के रूप में करते हैं। चमचा, चुगलखोर, बॉस का कुत्ता आदि कहकर लोग उनके सामने अथवा पीछे उनका उपहास उड़ाते हैं। इन चिकने घड़ों को इस विशेषण से कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे उल्टा खुश होते हैं। इस चुगलखोरी की नामुराद आदत को हम नकारात्मक सोच का नाम दे सकते हैं। प्राय: लोग इस आदत को पसन्द नहीं करते। 
             अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए ये चुगलखोर दूसरों की यानी अपने साथियों की पीठ में छुरा भौंकने जैसा निकृष्ट कार्य करते हैं। ऐसा दुष्कृत्य करने वालों से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उन्हें देखते ही प्रायः लोग अपनी बात का रुख मोड़ देते हैं। लोग उनके सामने ऐसी कोई भी बात करने से कतराते हैं जिसको तोड़-मरोड़कर वे अपने लाभ के लिए उपयोग कर सकें। जबान का यह कुटेव एक इन्सान को सबकी नजरों से गिरा देता है। 
              लोग यही सोचते हैं कि जब दूसरों की चुगली करके अमुक व्यक्ति हमारे सामने वाहवाही लूटना चाहता है तो फिर अन्यों के समक्ष अवश्य ही हमारी बुराई भी करता होगा। ऐसे लोग हमारे आसपास सर्वत्र ही उपलब्ध रहते हैं। कार्यालयों में कम्पनी के स्वामी अथवा बॉस ऐसे चुगलखोरों को पालते हैं जो आफिस में बैठे हुए उन्हें अपने साथियों के विषय में बताते रहें। 
             ग्यारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कश्मीरी कवि और विद्वान क्षेमेन्द्र हैं। 'नर्ममाला' उनके द्वारा रचित एक प्रमुख व्यंग्यात्मक काव्य है। इस ग्रन्थ में उन्होंने तत्कालीन समाज, भ्रष्ट अधिकारियों और  कर्मचारियों की बुराइयों पर तीखा प्रहार किया है। यह कृति सामाजिक व्यंग्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। चुगलखोर नामक प्राणि के विषय में 'नर्ममाला' में कहा गया है -
       पिशुनेभ्य:नमस्तेभ्य: यत्प्रसादान्नियोगिन:।
       दूरस्था अपि जायन्ते सहस्त्रश्रोत्रचक्षुष:॥
अर्थात् उन चुगलखोरों को नमस्कार है जिनकी कृपा से स्वामी दूर रहते हुए भी हजार आँख और कान वाले हो जाते हैं।
              इसका तात्पर्य यही है कि किसी भी कार्यालय में कार्य करने वाले स्वामी यदि दूर भी बैठे हों तब भी उनको ऑफिस की खबरें देने वाले उनके चमचे वहाँ विद्यमान रहते हैं। वे उन्हें आँखों देखी सारी खबरें देते रहते हैं। वे नमक-मिर्च लगाकर सारी झूठी-सच्ची खबरें बताने का अपना कार्य बड़ी कुशलता से निभाते हैं। इन चुगलखोरों को बॉस भी कोई महत्त्व नहीं देते। सिर्फ स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ही बॉस इनको मुँहलगा बनाते हैं। अपना काम पूरा हो जाने पर वे इन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फैंकने से भी परहेज नहीं करते।
          इस चुगलखोरी के दूरगामी परिणाम भयंकर होते हैं। ये लोग अपनी दुश्मनी निकालने के लिए बॉस के कान भरते हुए अनजाने में अपने साथियों का अहित कर बैठते हैं। पण्डित विष्णु शर्मा रचित 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक इसी भाव को स्पष्ट करती है -
        अहो खलभुजङ्गस्य विपरीतो वचक्रम:।
        कर्णे लगति चैकस्य प्राणैरन्यो वियुज्यते॥
अर्थात् यह आश्चर्य की बात है कि इस चुगलखोर रूपी सर्प के मारने का उपाय ही विपरीत प्रकार का है। वह एक के कान में डसता है पर प्राणों से कोई दूसरा ही वियुक्त होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि कवि चुगलखोर को साँप की संज्ञा दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि इनके मारने का तरीका बहुत विचित्र है। यह किसी एक व्यक्ति के कान में अपनी चुगली का विष उगलता है परन्तु उससे किसी दूसरे व्यक्ति का विनाश होता है।
            चुगलखोरी रूपी निन्दा पुराण दूसरे का अहित तो करता ही है, स्वयं अपने लिए भी गड्ढा खोदता है। दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में मनुष्य हर जगह अपनी हानि कर बैठता है। ऐसे व्यक्ति हमेशा ही अविश्वसनीय होते हैं। अत: उन पर कोई विश्वास नहीं करता। ऐसा कुकृत्य करता हुआ मनुष्य अपने अन्तस् के विचारों को दूषित करता है। इस चुगली रूपी मल से अपने अन्त:करण की शुद्धि करना बहुत कठिन हो जाता है। जीवन के अन्त अर्थात् मृत्यु के बाद भी ऐसे लोगों का नाम सभी हिकारत से लेते हैं।
            प्रयास यही करना चाहिए कि इस बुराई के घर से यथासम्भव दूर ही रहा जाए। अपने क्षणिक तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति करते हुए मनुष्य को अपना इहलोक और परलोक बिगड़ने नहीं देना चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत सावधान रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

स्वर्णिम अवसर

स्वर्णिम अवसर

उन्नति करने के लिए हर मनुष्य को उसके जीवन काल में एक स्वर्णिम अवसर ईश्वर की ओर से अवश्य मिलता है। समझदार मनुष्य उस अवसर को पहचान लेता है और उसका सदुपयोग कर लेता है। उस समय वह अपने जीवन में ऊँचाइयों को छू लेता है। मनुष्य वह सब प्राप्त कर लेता है जो उसे समाज में एक विशेष स्थान प्रदान करता है। परन्तु यदि वह किसी भी कारण से आया हुआ मौका अपने हाथ से गँवा देता है तो कोई गारण्टी नहीं कि वह पल फिर से उसके जीवन काल में कभी दुबारा आएगा भी अथवा नहीं।
            पण्डित विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्रम्' नामक पुस्तक में यह श्लोक लिखा है जो इसी सार को समझाता हुआ हमें कह रहा है  -
      कालोहि सकृदभ्येति यन्नरं कालाङ्क्षिणम्।
       दुर्लभ: स पुनस्तेन कालकर्माचिकीर्षता॥
अर्थात् सुअवसर के इच्छुक पुरुष को, वह उसके जीवन में एक ही बार प्राप्त होता है। उस समय जो पुरुष कार्य नहीं करता, पुन: वह उसे वह अवसर प्राप्त नहीं होता।
             ईश्वर हमें बारबार ऐसे अवसर नहीं देता। हमें स्वय ही अपने विवेक से उसका उपयोग करना होता है। यदि हम अपने अहं में चूर होकर अथवा आलस्यवश उस समय कोई योजना क्रियान्वित करके सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे तब हमारा भाग्य भी फलदायी नहीं होगा। इसका कारण यही है कि भाग्य से मिले सुअवसर के समय पुरुषार्थ नही किया, उसे गॅंवा दिया।
          'हरिवंश पुराण' भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुए कह रहा है-
           न मुह्यति प्राप्तकृतां कृती हि।
अर्थात् कुशल मनुष्य उचित अवसर पर कार्य करने से नहीं चूकते।
          हमारे मनीषी हमें समय-समय पर जगाते रहते हैं परन्तु हम हैं जो कान में तेल डालकर बैठे रहते हैं। उनके समझाने को हम अपने अहं में आकर अनदेखा कर देते हैं। अपने आराम में खलल हमें जरा भी पसन्द नहीं आता। 'हमारा मन होगा तो हम जाग जाएँगे नहीं तो सोते रहेंगे किसी के पेट में दर्द क्यों होता है' - हमारा यही रवैया हमें अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के लिए मजबूर करता है। अवसर चूक जाने पर यदि पश्चाताप करते हैं तो कोई लाभ नहीं होता।
            आजीवन हम उस एक पल के लिए तरसते रहते हैं जिसे पाकर हम सफल व्यक्ति बनकर वाहवाही लूट सकते थे। सबकी आँखों का तारा बन सकते थे। काश ऐसा हो सकता अथवा हम उस पल को ही वहीं रोककर रख पाते। हम तो बस सदा उस पल को कोसते रहते हैं जिसका हम किसी भी कारणवश सदुपयोग नहीं कर सके। उस समय हमारे किन्तु, परन्तु अथवा काश आदि कुछ भी काम नहीं आते।
            अवसर को चूकने वाले मनुष्य से बढ़कर मूर्ख और कोई नहीं होता। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य अपनी मूर्खता को ढकने के लिए सौ-सौ बहाने गढ़ता रहता है। और कुछ नहीं तो यह रटा-रटाया वाक्य तो बोल ही सकता है - 
        यदि दुर्भाग्य ही प्रबल हो तो मनुष्य क्या 
           कर सकता है?
              ऐसे ही व्यक्ति होते हैं जो अपने पूरे जीवन में नाकामयाबी का बोझ ढोते रहते हैं। अपने घर-परिवार और समाज में एक असफल व्यक्ति का टेग लगाकर घूमते हैं। उन्हें अपनी पत्नी, बच्चों और अन्य परिवारी जनों से कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता है। उनके जीवन के ये सबसे अधिक दुखदायी पल होते हैं। उनके अपने भी उन्हें कौंचने के बहाने ढूँढते रहते हैं।
          यदि उनसे यह पूछा लिया जाए कि 'क्या तुमने कुछ यत्न किया था, मौके का लाभ उठाने का, जिसे तुमने गँवा दिया है?' उनके पास इस प्रश्न का कोई सही उत्तर होता ही नहीं है। वे बस इधर-उधर की बातें करके टाल-मटोल करते रहते हैं। इसीलिए वे अपने जीवन से सदा मायूस रहते हैं। अपनी नाकामयाबी का ठीकरा ईश्वर पर फोड़ते हुए उसे लानत-मलानत करते हैं। उससे शिकवा-शिकायत करते नहीं अघाते।  
             मनुष्य को जीवन में हर समय सावधान रहना चाहिए। मिलने वाले सुअवसर का लाभ उठाने का मौका उसे मिल सके। उसे व्यर्थ गँवाकर मनुष्य को पश्चाताप न करना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

गुरुता और लघुकथा दो अवस्थाऍं

गुरुता और लघुता दो अवस्थाएँ

मनुष्य छोटा है अथवा बड़ा, यह हमारे मस्तिष्क की सोच है। हम लोग मनुष्य को उसके धन-वैभव से आँक लेते हैं कि अमुक व्यक्ति महान है अथवा अमुक व्यक्ति तुच्छ है। यदि व्यक्ति विपन्न अवस्था में है अथवा अपना गुजर-बसर मात्र कर सकता है, तो उसे छोटा कह दिया जाता है। इसके विपरीत यदि वह व्यक्ति जो सभी सुख-साधनों से सम्पन्न है और समय-समय पर अपने वैभव का प्रदर्शन करता है, दूसरों को उपकृत सकता है। उसे हम लोग आम बोलचाल में बड़ा आदमी कह देते हैं।
             महाराज भर्तृहरि ने 'नीतिशतक' में इस कथन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है -
        परिक्षीण: कश्चित्स्पृहति यवानां प्रसृतये।
       स पश्चात्सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसम्।।
       अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्षेषु धनिना-
       मवस्था वस्तूनी प्रथयति च सङ्कोचयति च॥
अर्थात् जो दरिद्र एक मुट्ठी भर जौं की इच्छा करता है, वही सम्पन्न होने पर सारे संसार को तुच्छ समझने लगता है। लघुता और गुरुता निश्चित नहीं हैं। ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा अथवा बड़ा बनाती हैं और वस्तुओं को संकुचित या विस्तृत बनाती हैं।
            इस श्लोक से हम यही समझ सकते हैं कि जब मनुष्य को खाने के लाले होते हैं तो वह दरिद्र कहलाता है। परन्तु जब दैवयोग से उसे ऐश्वर्य की प्राप्त हो जाती है तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। इसका कारण है कि वह धनवान या वैभवशाली बनकर देश, धर्म व समाज के लिए एक महत्त्वपूर्ण ईकाई बन जाता है। समाज में उसकी पूछ होने लगती है। लोग उसे सम्मानित करने लगते हैं। हर स्थान पर उसकी उपस्थिति की आकाँक्षा करते हैं।
              यहीं से मनुष्य की चारित्रिक गिरावट आरम्भ होने लगती है। भौतिक धन-दौलत पाकर मनुष्य फूला नहीं समाता। वह सारे संसार को हिकारत की नजर से देखने लगता है। अपने समक्ष उसे दूसरे लोग बौने दिखाई देने लगते हैं। वह स्वयं को भगवान मानकर अकड़ने लगता है। वह सारी दुनिया को देख लेने और आग लगा देने की बातें करने लगता है। जीवन के उस उत्कर्ष काल में वह यह बात भी भूल जाता है कि घमण्डी का सिर नीचा हो जाता है।
          भर्तृहरि जी ने कहा है कि लघुता और गुरुता निश्चित नहीं होतीं। छोटा होने या महान होने की ये दोनों अवस्थाएँ ही मनुष्य को छोटा या बड़ा बनाती हैं। वस्तुओं को देखने का मनुष्य का जो नजरिया है, वही उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाता है। यह संसार भी वही है और संसारी जन भी वही हैं। उन सबको हम वैसा ही देखते हैं जैसा देखना चाहते हैं। हमारा दृष्टिकोण ही उनमें धर्म, जाति, रंग, रूप आदि की  दीवारें खड़ी करते हैं। उन्हें संकुचित या विस्तृत बनाने का कार्य हम लोग ही करते हैं।
            अपनी इस नश्वर भौतिक सम्पदा पर कभी भी मनुष्य को वृथा अभिमान नहीं करना चाहिए। यह सब इसी संसार का है और यहीं शेष रह जाता है। मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाता है। उसके सभी महल-दोमहले जो इसी दुनिया की अमानत हैं, उसे मुस्कुराते हुए, मुँह चिढ़ाते हुए अन्तिम विदाई दे देते हैं। उसे यह अहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि हमें पाने के लिए जो भी जायज-नाजायज रास्ते तूने खोजे, वे सब व्यर्थ हैं। तू इनका भोग कितना कर पाया, तू ही जान। हम तो यहीं तक के तेरे साथी थे। अब तू अपने रास्ते चला जा और हम अपने इस जहान में रहेंगे।
             इसलिए जिस भी अवस्था में रहे उसे सारे संसार को तुच्छ समझने के बजाय यह भाव रखना चाहिए कि हम तो इस सारे ऐश्वर्य के रक्षक मात्र हैं। देने वाला तो वह मालिक है जो हमारी सारी मनोकामनाओं को देर-सवेर पूरा करता है। यही विचार करते हुए कर्त्तापन के भाव से मनुष्य को विमुख रहना चाहिए। ऐसा करता हुआ मनुष्य गुरुता और लघुता की भावना से मुक्त हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

कौन-सा शत्रु अवध्य

कौन-सा शत्रु अवध्य?

हमारे ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि हत्या बहुत बड़ा अपराध कहलाता है। किसी भी व्यक्ति को कारण-अकारण जान से मार देना कोई बड़ा बहादुरी का कार्य नहीं होता। किसी मनुष्य ने यदि गलती की है तो उसे सुधारना चाहिए। उसे जान से मार देना कोई हल नहीं होता। इसलिए प्रत्येक सामर्थ्यवान व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि वह यथासम्भव असहायों की रक्षा करे। यहाँ हम चर्चा करेंगे कि किन-किन मनुष्यों का वध न करके उनकी रक्षा करना कर्त्तव्य होता है।
              महर्षि वाल्मीकि ने 'वाल्मीकि रामायण' में इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-
       अयुद्धयमानं प्रच्छन्न प्राञ्जलिं शरणगतम्।
        पलायन्तं प्रमत्त वा न त्वं हन्तुमिहार्हसि॥
अर्थात् बिना शस्त्र के, छिपा हुआ, हाथ जोड़े हुए ,  शरण में आए हुए, पलायन करने वाले अथवा उन्मत्त (पागल) व्यक्ति का वध करना उचित नहीं होता है।
             इसी विषय पर 'हिंगुलप्रकरण' में प्रकाश डालते हुए कहा है-झ
       यो दधाति तृणं वक्त्रा प्रत्यनीकोSपि मानवो।
        सोSवध्य: सतां लोके कथं वध्यातृणादना:
अर्थात् जो शत्रु अपने मुख में तृण ले लेता है, वह अवध्य होता है। यानी उस व्यक्ति का वध नहीं किया जाता। 
            जो व्यक्ति निहत्था है, उस पर वार करना अनुचित कृत्य होता है। हथियारों से लैस व्यक्ति यदि निरपराधियों को मौत के घाट उतार देता है तो इसे कायरता ही कहा जाएगा। वास्तव में असहाय व्यक्ति की हत्या करने को कोई भी सही नहीं ठहरा सकता। अपने बराबर के लोगों से यदि युद्ध किया जाए तो उसका परिणाम द्रष्टव्य होता है।
            जो व्यक्ति छिपा हुआ है, उस पर भी वार नहीं करना चाहिए। प्राचीनकाल में युद्ध के मैदान में भी ऐसा न करने के लिए कहा जाता था। हो सकता है कि डर के कारण छिप जाने वाला निर्दोष हो। इसे हम इस प्रकार कह सकते हैं कि छिप जाने वाले व्यक्ति ने मानो बिना लड़े‌ ही अपने हथियार डाल दिए हैं। जो व्यक्ति पहले ही डरा हुआ है या अपनी हार स्वीकार कर रहा है तो उसका शव करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
             जो व्यक्ति हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा है, क्षमायाचना कर रहा है, उसे मारकर भी कोई तमगा नहीं मिल सकता। उसे यदि क्षमा कर दिया जाए तो वाह-वाही अवश्य मिल सकती है। ऐसा व्यक्ति महान कहलाता है।
            शरण में आए हुए यानी शरणागत की रक्षा करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य होता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिल जाएँगे, जहाँ शरणागत जीव की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों को भी संकट में डाल दिया गया। महाराज शिवि से बड़ा उदाहरण कोई और नहीं हो सकता। उन्होंने अपनी शरण में आए हुए एक निरीह कबूतर की रक्षा के लिए स्वयं को मांसाहारी बाज के हवाले कर दिया था।
             पलायन करने वाले का भी वध नहीं करना चाहिए। वह तो बेचारा स्वयं हालात का सामना नहीं कर पा रहा। इसीलिए वह पीठ दिखाकर भाग रहा है। उसे छोड़ देना चाहिए। दुर्भाग्यवश जो व्यक्ति उन्मत्त है, उसे मारकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। उसे अपने हाल पर ही छोड़ देना चाहिए। जो व्यक्ति पहले से ही हार मान ले या मुँह में तिनका डाल ले उसका भी वध नहीं करना चाहिए।
             ऐसे सभी शत्रु दया के पात्र होते हैं। उनका वध नहीं करना चाहिए। आज भी किसी अन्य देश में शरण लेने वाले किसी राजनायिक को या किसी मनुष्य को पूर्ण सुरक्षा दी जाती है। जो सेना युद्धक्षेत्र से पलायन करती है, उसे जाने दिया जाता है। दो देशों में सुरक्षा मुद्दों पर आवशकयक चर्चा होना भी इसी का ही एक रूप है। एक देश के नागरिक या मछुआरे आदि गलती से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, उनसे पूछताछ करके बाद में छोड़ दिया जाता है।
               प्राचीनकाल में युद्ध के भी नियम होते थे, जिनका पालन सभी राजा किया करते थे। बड़े दुख की बात है कि आजकल सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया हैं। आधुनिक हथियारों से लैस शस्त्र न दिन देखते हैं और न रात ही देखते हैं, बस हमला करके निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में या युद्ध के मैदान में शायद ये सारी बातें बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकें, परन्तु दैनन्दिन जीवन में इन सबकी हमें बहुत ही आवश्यकता होती है। मनुष्य जितना ही अधिक क्षमाशील बनता है, उतना ही उसे यश और मानसिक सन्तोष मिलता है, जो उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

ईश्वर की उपासना

ईश्वर की उपासना

सृष्टि के रचयिता परमपिता परमात्मा का हम पर बहुत उपकार है। उसने ही हमें इस धरा पर अवतरित किया। एक वही है जो हमें दुनिया की सभी सुख-सुविधाऍं प्रसन्नता से देता है। कभी वह हम पर अहसान नहीं दिखाता। हम यदि चौबीसों घण्टे उसकी महिमा का गुणगान कर सकें तो वह भी उसकी दी गई नेमतों से कम ही रहेगा।
           'द्वात्रिंशत् पुतलिकासिंहासनम्' नामक एक संस्कृत भाषा का ग्रन्थ है। इसका हिन्दी में 'सिंहासन बतीसी' नाम से अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में निम्न श्लोक कवि ने वर्षों पूर्व लिखा था, वह आज भी उतना ही सटीक है -
        देवे तीर्थे द्विजे मन्त्रे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
       यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥
अर्थात् देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर और गुरु में मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।
            हम ईश्वर की उपासना किस रुप में करते हैं अथवा जिस किसी भी नाम से उसे याद करते हैं, यह मायने नहीं रखता। असली मुद्दा यह है कि हमारे मन में अपने इष्ट को प्राप्त करने के लिए कितनी तड़प है। हम उसकी उपासना सच्चे मन से करते हैं अथवा केवल दिखावा करते हैं। ईश्वर के भजन का तभी फल मिलता है जब हम पूर्णरूपेण उसके प्रति समर्पित हो जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए या उनसे सबसे बड़ा भक्त होने का सर्टिफिकेट पाने के लिए किया गया प्रयास, उस परमेश्वर की नजर में शून्य होता है। 
           तीर्थ स्थान पर यदि हम मौज-मस्ती के लिए जाते हैं तो तीर्थ भ्रमण का हमें लाभ नहीं मिलता। न तो हमारे विचारों में कोई परिवर्तन आता है और न ही हम प्रभु के सच्चे और बड़े भक्त बन सकते हैं। तीर्थ करने की हमारे जीवन में तभी उपयोगिता होती है यदि वहाँ जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों से मन को विरक्त करके मालिक का स्मरण करते हैं। विद्वानों की सत्संगति करते हुए ज्ञानार्जन करते हैं। साधना करते हुए अपने अन्त:करण को शुद्ध-पवित्र बनाते हैं, तभी तीर्थ करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण होता है। अन्यथा तो पिकनिक मनाकर लौट आने वाली बात होती है।
          ब्राह्मण में यदि हमारा विश्वास होता है तभी उससे मार्गदर्शन लिया जाता है। हमें अपने संस्कारों को करवाने के लिए भी सदा योग्य ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। यदि उसमें आस्था नहीं होगी तो हमारे धार्मिक कृत्यों को करने का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकेगा।
           मन्त्रों में अपार शक्ति होती है। ये आत्मोन्नति करने में हमारी सहायता करते हैं। ये मन्त्र हमें अपने इष्ट तक पहुँचाने का सफल माध्यम बनते हैं। हम मन्त्र जाप करके ही तो अपने प्रभु का सानिध्य प्राप्त करते हैं। यदि मन्त्र पर हमें विश्वास नहीं होगी तो हमें कोई सिद्धि भी नहीं मिलेगी। यदि हम मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण करते हैं तो भी उसका फल नहीं मिलता। कभी-कभी उससे अनिष्ट भी हो जाता है।तब ये अमूल्य मन्त्र हमें अपने इष्ट से मिलाने में सफल नहीं हो पाएँगे।
           तान्त्रिक इन मन्त्रों को सिद्ध करके चमत्कार करते हैं। मैं उनकी इस पद्धति पर कोई आलोचना नहीं करना चाहती। यह व्यक्ति विशेष की मान्यता होती है। पर मैं इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि इन मन्त्रों से प्राप्त सिद्धियों का समाज के हित में उपयोग करना चाहिए। मारण-उच्चाटन आदि में इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।
             ज्योतिष एक वेदांग है। ज्योतिषीय गणना की विधा अपने आप में सम्पूर्ण है। उस पर मन से विश्वास करना आवश्यक है। हाँ, फलित ज्योतिष में जहाँ लालच व स्वार्थ हावी हो जाते हैं, वहाँ पर गलती की गुँजाइश बनी रहती है। फिर भी मनुष्य किसी ज्योतिषी के पास विश्वास होने पर ही जाता है। वह अपनी विकट समस्या का उपाय जानना चाहता है।
            डॉक्टर पर यदि विश्वास नहीं होगातो वह कितना ही योग्य क्यों न हो रोगी स्वस्थ नहीं हो पाता। इसलिए उस पर अपने मन से विश्वास करना चाहिए।
            गुरु पर विश्वास न हो तब उसकी शरण में जाना व्यर्थ होता है। प्राचीन काल में योग्य गुरु के पास लोग अपने बच्चों को विद्याध्ययन के लिए के लिए भेजते थे। उन्हें यही विश्वास होता था कि उनके बच्चे योग्य बनकर जीवन में यश कमाएँगे। गुरु का कार्य शिष्य की आध्यात्मिक उन्नति करना होता है। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव मनुष्य को इहलोक और परलोक के बन्धनों से मुक्त करवाता है।
              सार रूप में हम कह सकते हैं कि मन की सच्ची भावना होने से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, मन्त्र, ज्योतिषी, डाक्टर औ र गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखकर हम उनसे लाभ ले सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद