शनिवार, 2 मई 2026

झूठे अहं से किसी का भला नहीं

झूठे अहं से किसी का भला नहीं 

मनुष्य के मानस पर यह निर्भर करता है कि वह अपने रास्ते में फूल बिछाना चाहता है अथवा काँटे। फूलों की कोमलता, सुन्दरता, आकर्षण और सुगन्ध के कारण हर व्यक्ति उनकी कामना करता है। परन्तु कठोर और दम्भी काँटों से लहुलूहान हो जाने के डर से सभी लोग उनसे बचते हुए किनारा करना चाहते हैं। इसलिए लोग फूलों और कॉंटों में से फूलों का चुनाव करते हैं। वे उन्हें सुगन्ध देते हैं और उनका मन मोह लेते हैं।
             मंगल की कामना करने वाला हर मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य कर जाता है जिनका नुकसान उसे अपने जीवनकाल में उठाना ही पड़ जाता है। कार्य करते समय तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु उसका फल भोगते समय उसे कष्ट होता है।
           बचपन में एक कहानी पड़ी थी जो आज भी उतनी ही सटीक है। एक हाथी प्रतिदिन नदी में स्नान करने के लिए जाता था। उसके रास्ते में एक दर्जी की दुकान पड़ती थी। हाथी को अपनी दुकान के सामने से हर रोज गुजरते हुए देखकर दर्जी के मन में शरारत सूझी। अब इन्सानी दिमाग है तो कभी-न-कभी कोई खुराफात कर ही बैठता है। इस तरह वह अनजाने में अपने लिए परेशानी मोल ले लेता है। उसका परिणाम भोगते समय उसे नानी याद आने लगती है।
           उसने एक दिन अपनी सुई ली और दुकान के सामने से जाते हुए उस हाथी को चुभो दी। अब तो यह नित्य का क्रम बन गया कि हाथी वहाँ से गुजरता और दर्जी उसे सुई चुभो देता। अकारण पीड़ित होते हुए हाथी को उस दर्जी पर क्रोध आने लगा। एक दिन हाथी ने उस शरारत करने वाले दर्जी को सबक सिखाने की सोची।
           फिर क्या था, वह हाथी नदी पर स्नान करने के लिए गया और अपनी सूँड में पानी भरकर ले आया। वापसी पर जब दर्जी की दुकान आई तो उसने सूँड में भरा हुआ सारा पानी वहाँ उड़ेल दिया। हाथी के ऐसा करने पर उस दर्जी की दुकान पर रखे हुए बहुत सारे ग्राहकों के कपड़े खराब हो गए और उसे बहुत नुकसान हो गया। तब उसे पश्चाताप हुआ कि उसने व्यर्थ ही हाथी जैसे शक्तिशाली जीव से पंगा ले लिया।
            तीर जब कमान से निकल जाता है तो उसे लौटाकर नहीं लाया जा सकता। उस समय मात्र पश्चाताप ही शेष बचता है। यही स्थिति उस दर्जी की भी हो गई। अब उसके पछताने से कुछ भी बदलने वाला नहीं था। अपने नुकसान की भरपाई करने के अतिरिक्त उसके पास अब और कोई चारा नहीं बचा था।
          यह कहानी हमें यही समझा रही है कि दर्जी की तरह ही कभी ईर्ष्या से, कभी मौज-मस्ती के कारण और कभी अपनी मजबूरी में हम दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाते रहते हैं। फिर दर्जी की भाँति हानि उठाकर दुखी हो जाते हैं और तत्पश्चात पश्चाताप करते हैं।
            यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि वह जो व्यवहार वह दूसरों के साथ कर रहा है क्या वही व्यवहार वह अपने लिए चाहता है? यदि उसे वह व्यवहार अपने लिए पसन्द है तो फिर सब ठीक है। परन्तु यदि उसे अपने लिए वह व्यवहार नहीं चाहिए तो कहीं-न-कहीं गड़बड़ है। तब उसे दूसरों के साथ ऐसा कोई बरताव नहीं करना चाहिए जो दूसरे के हृदय को तार-तार कर दे।
            इस प्रकार मनुष्य जानते-बूझते गलत रास्ते पर चल रहा है और दूसरों के रास्ते में काँटे बिछा रहा है। यही काँटे समय बीतते उसके मार्ग पर बिछकर उसे घायल कर देते हैं। इसलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि बबूल का पेड़ बोकर आम का फल नहीं पाया जा सकता।
            इसके विपरीत दूसरों के लिए फूल बरसाने वालों को सर्वत्र सुगन्ध ही मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि फूलों की तरह उनका यश चारों ओर फैलता है।
            अपने झूठे अहं और अनावश्यक पूर्वाग्रह पालने से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। ये सदा ही विनाश का कारण होते हैं। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
    जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
    तोको फूल के फूल हैं वाको हैं तिरसूल।।
अर्थात् जो हमारे लिए काँटे बोता है, उसके लिए भी फूल बोने चाहिए। हमें तो जीवन में फूल रूपी सुख मिल जाएँगे पर उसे दुख ही मिलेंगे।
           इस दोहे का आशय यह है कि बदले की भावना न रखकर, शत्रु के प्रति भी क्षमा और प्रेम का भाव रखना चाहिए। इसका कारण है कि भलाई का फल सुख और बुराई का फल दुख यानी त्रिशूल होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें क्षमा, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार की शिक्षा देता है। 
         ‌‌   बुराई को प्रेम से जीता जा सकता है और ईर्ष्या-द्वेष का उत्तर प्रेम से देना चाहिए। साथ रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने अहं का परित्याग करना चाहिए। इससे हमारा मन शान्त रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 1 मई 2026

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता बेशक बूढ़े हो जाएँ पर वे घर के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होते हैं। वे घर में रहते हुए चाहे शारीरिक कार्य पूर्ववत दक्षता से न कर सकें परन्तु फिर भी वे बहुत सारे कार्य संवारते रहते हैं। हालाँकि वृद्धावस्था में किसी भी कार्य के सम्पादन में उन्हें कठिनाई होती है पर फिर भी घर में बैठे हुए ही वे उस घर की रौनक होते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र ही अपने बच्चों के मन को यह विश्वास दिला देती है कि वे एकल परिवार के बच्चों की तरह अकेले नहीं हैं। 
             छतनार वृक्ष का अर्थ ऐसे घने और फैले हुए पेड़ से है जिनकी शाखाऍं और टहनियॉं छाते यानी छतरी की भॉंति दूर तक फैली होती हैं। ये वृक्ष घनी छाया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए महुआ, नीम और पीपल जैसे वृक्षों को उनके फैलाव के कारण छतनार कहा जाता है। ये वृक्ष एक विशाल छत्र की तरह दिखाई देते हैं। ये पेड़ भीषण गर्मी में भी अपने नीचे बैठने वालों को ठण्डी और सघन छाया प्रदान करते हैं। साहित्य में 'छतनार वृक्ष' का उपयोग सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैसे एक मॉं का अपने बच्चे को प्यार और सुरक्षा देना।
           बच्चे अपनी हर छोटी-मोटी समस्या को अपने बुजुर्ग होते हुए माता-पिता से शेयर करके चिन्ता मुक्त हो सकते हैं। बड़ों के रहते हुए मनुष्य बिना टेंशन के कहीं भी आ जा सकता है। उन्हें अपने बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। वे चिन्ता मुक्त होकर अपने आफिस में ध्यानपूर्वक कार्य कर सकते हैं। बड़ों के रहते उन्हें अपने घर में ताला तक लगाने की आवश्यकता नहीं होती। बहुत से घरों में तो उनकी मृत्यु के पश्चात जब ताले ढूँढे जाते हैं तो वे नहीं मिलते।
          जिस प्रकार पेड़ बेशक बूढ़ा हो जाए तो भी उसे अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए। वह फल तो शायद नहीं दे पाएगा पर छाया अवश्य ही देगा। उस वृक्ष पर आकर जब विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं तब उस घर का प्रकृति के साथ जुड़े रहने का एक सुखद अहसास होता है। उसी प्रकार घर के वयोवृद्ध माता-पिता को यथोचित सम्मान देना बच्चों का नैतिक दायित्व है।
            यद्यपि अपनी ढलती हुई आयु के कारण वे धन-दौलत नहीं कमा सकते परन्तु बच्चों को अवश्य संस्कार दे सकते हैं। उनके संस्कार और जीवन के अनुभव से संस्कारित हुए बच्चे ही घर, परिवार, देश और समाज के लिए बहुमूल्य रत्न बनते हैं। इन्हें हर स्थान पर सम्मान मिलता है और चारों दिशाओं में इनका यश फैलता है।
            माता-पिता मनुष्य के लिए जीते-जागते भगवान होते हैं जो उन्हें इस दुनिया में लाने का महान् कार्य करते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में सिर उठाकर शान से चल सके। अपने जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटा सकें। अपने निस्वार्थ प्यार और सेवा के साथ-साथ वे अपना सर्वस्व बच्चों को सौंप देते हैं।जो भी धन-सम्पत्ति परिश्रम से उन्होंने अपने जीवन में कमाई होती है, उसे सहर्ष अपने बच्चों को सौंप‌ देते हैं।
              बच्चों का भी यह दायित्व बनता है कि वृद्धावस्था में उन्हें असहाय न छोड़ें। बच्चे भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का सम्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं। उन बच्चों को यह शोभा नहीं देता कि वे तो अपने जीवन में ऐश्वर्य भोगें और उनके माता-पिता दर-बदर की ठोकरें खाएँ, दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ अथवा बिना उचित इलाज के इस दुनिया से विदा ले लें। अपने को असहाय मानकर दूसरों के रहमो कर्म पर जीवित रहें अथवा बच्चों के होते हुए किसी ओल्ड होम की शरण लें।
             बच्चे को अंगुली थामकर चलाते समय हर माता-पिता का सपना होता है कि बड़ा होकर उनका बच्चा कभी उनसे अंगुली छुड़ाकर उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ेगा। वे सदा अपने नाती-पोतों की मोहिनी मुस्कुराहटों और बाल सुलभ चंचल अदाओं के बीच जीना चाहते हैं। हर मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि माता-पिता का अनादर करने वाला सब कुछ होते हुए भी कंगाल होता है। उसे जीवन भर सुख-चैन नहीं मिलता। उसके मन का कोई कोना सदा ही रीता या खाली रह जाता है। उसे भरने के सारे भौतिक प्रयास असफल रह जाते हैं।
          भगवान गणेश ने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माँ भगवती की परिक्रमा करके संसार के समक्ष उदाहरण रखा था कि माता-पिता ही उनका सम्पूर्ण संसार हैं। उन्हीं के चरणों में ही मनुष्य का वास्तविक स्वर्ग होता है। चारों धामों की यात्रा मनुष्य करे अथवा न करे परन्तु अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा करने वाले को सारे तीर्थों का फल घर में  बैठे हुए ही मिल जाता है। इसीलिए भगवान राम और श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों की कामना सभी माता-पिता ईश्वर से करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

बातचीत का रास्ता बन्द न करें

बातचीत का रास्ता बन्द न करें 

लड़-झगड़कर मुँह फुलाकर अलग-थलग होकर बैठ जाना अथवा अपने-अपने रास्ते चल देना किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान आपस में मिल-बैठकर किया जाता है। यानी कोशिश यही रहनी चाहिए कि बातचीत का रास्ता बन्द न हो। बातचीत अक्सर किसी रिश्ते में तनाव, नाराजगी या मतभेदों के कारण बन्द होती है। इसे खत्म करने के लिए सामने वाले की पसन्द की बातों में रुचि लेना, बोरिंग बातें शुरू कर उन्हें ऊबा देना, या शान्त माहौल में सीधे संवाद शुरू करना जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं। 
            यदि सम्भव हो तो सामने वाले व्यक्ति से सीधे पूछना चाहिए कि क्या हुआ है? और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाए। कभी-कभी 'ओह ठीक है' जैसी संक्षिप्त प्रतिक्रियाऍं बातचीत को बन्द करने का संकेत दे सकती हैं जो वास्तव में कभी-कभी अशिष्ट लग सकता है। बातचीत बन्द होने पर उसे फिर से शुरू करना या उसे खत्म करना मनुष्य की स्थिति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके सम्बन्धों पर निर्भर करता है। जब परिवार में कोई सदस्य बातचीत बन्द कर देता है तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। धैर्य से उसे सुलझाया जा सकता है।
          सम्बन्धों में कितनी भी कटुता क्यों न आ जाए उनसे किनारा नहीं किया जा सकता। देर-सवेर उन्हें सुधारना ही पड़ता है। जब सब कुछ बिगड़ जाता है तब उन्हें जोड़ने पर एक गाँठ-सी पड़ जाती है। बाद में यही कहकर उन्हें भूलना होता है कि 'पुरानी बातों पर मिट्टी डालो और उन्हें भूल जाओ।' बड़े-बुजुर्ग गलत नहीं कहते। मिल-जुलकर, एक होकर रहने की शक्ति से हम सभी परिचित हैं।
          समाज में, अपने आस-पड़ोस में, अपने कार्यक्षेत्र में अर्थात् हर स्थान पर यदाकदा मनमुटाव हो जाते हैं। हर व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका सब अलग-अलग होते हैं। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक होता है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि तब उस व्यक्ति विशेष से हम शत्रुता मोल ले बैठें। समय बीतते हमारी यही कटुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी की दुश्मनी बन जाए, जिसका अन्त सुखद कम और दुखद अधिक होता है। इससे किसी का हित नहीं साधा जा सकता है। प्राय: प्राय: व्यवहार में हम देखते हैं।
             दो लोगों या समूहों में भी यदि कभी झगड़े की स्थिति बनती है और थाना-पुलिस अथवा कोर्ट-कचहरी में जाने की नौबत आ जाती है तब भी अन्तत: समझौता ही करना पड़ता है। दोनों पक्षों को शेक हेंड करके ही मुक्ति मिलती है।
              अपने घर में बच्चों के झगड़े होते ही रहते हैं। तब हम उन्हें गले मिलवाकर एक-दूसरे सॉरी कहलवा देते हैं। यानि कि उनमें समझौता हो जाता है और बच्चों के साथ-साथ हम भी खुश हो जाते हैं। उन्हें हम यही शिक्षा देते हैं कि झगड़ा मत करो, प्यार से रहो, गलती हो जाने पर माफी माँग लो और मिलकर रहो। बच्चों को हम सीख दे देते हैं और उनका कोमल मन हमारे प्रति सम्मान के कारण उसे मान लेता है। 
            जब हम बड़ों की बारी आती है तो हमारा अहं आड़े आ जाता है। हम दूसरों को दी हुई अपनी ही सीख को भूलकर अक्खड़ या हठी बन जाते हैं। बच्चे यदि हमारी बात को अनसुनी करना चाहते हैं तो उन्हें डपटकर, हम अपनी बात मनमवाते हैं। उनके समक्ष स्वयं क्या उदाहरण रखते हैं?
             घर-परिवार में होने वाले झगड़े प्राय: गलतफहमियों अथवा गलत फैसलों के कारण होते हैं। जिस प्रकार नाखूनों से माँस को कभी अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भाई-बन्धुवों से पूर्वाग्रह के कारण किनारा नहीं करना चाहिए। सयाने कहते हैं 'अपना मारेगा भी तो छाया में फैंकेगा।' रिश्तों के धागों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए, उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए। फिर जब जोड़ने का समय आता है तो मन में एक कसक रह जाती है। कभी-कभी यह अहसास हो जाता है कि बिना किसी की खास गलती के इतने समय तक हम एक-दूसरे को दोषी मानकर कोसते रहे। 
            हम राजनैतिक कूटनीति पर नजर डालें तो देखते हैं कि युद्ध के बाद भी दो देशों को आखिर समझौता ही करना पड़ता है। वहाँ पर दुश्मनी के बाद भी बातचीत बन्द नहीं की जाती।
             अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि उससे किसी का अहित न हो। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। अपनी हठधर्मिता को त्यागकर और मिल-बैठकर सदा ही सकारात्मक समझौते होते हैं। उनका मान रखने से सबको प्रसन्नता होती है जो अमूल्य होती है। अपनों का साथ बड़े ही भाग्यशालियों को मिलता है। इस सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने से सबको बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

प्राणों का महत्त्व

प्राणों का महत्त्व

हमारे शरीर में रहने वाले प्राण जीव के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्राणों के बिना हमारा शरीर राख की ढेरी के समान बन जाता है। शरीर से प्राणों के निकल जाने के बाद अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति को भी मनुष्य घर में नहीं रहने देता। शीघ्र ही वे उसे अग्नि को समर्पित कर देता है। यदि ऐसा न किया जाए तो कुछ दिनों पश्चात उस शव में से दुर्गन्ध आने लगती है। 
           'छान्दोग्योपनिषद्' में  एक कथा के माध्यम से प्राणों का महत्त्व समझाया गया है। कथा इस प्रकार है कि प्राचीन काल में एक बार सभी इन्द्रियॉं अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगीं। यानी आँख, नासिका, कान (श्रवण शक्ति), जिह्वा(बोलने की शक्ति), मन और प्राण सभी अपने आप को दूसरी इन्द्रियों से श्रेष्ठ बता रहे थे। इसलिए उनमें विवाद होने लगा और फिर उनका झगड़ा बहुत बढ़ने लगा। सभी इन्द्रियॉं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुॅंच पा रही थीं। सभी इन्द्रियॉं अपनी इस समस्या का समाधान चाहती थीं।
            अन्त में वे सभी अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास गईं और उन्हें अपने विवाद का कारण बताया। उन्होंने उन सबको कहा, "जिसके शरीर से बाहर चले जाने के बाद सब समाप्त हो जाए वही श्रेष्ठ है।" 
         सभी इन्द्रियों ने इस सुझाव को मान लिया और उस पर अमल करने का फैसला किया।
          सबसे पहले आँखें शरीर से एक वर्ष के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसने उन सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
          उन सबने उत्तर दिया, "जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कानों से सुनता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ और मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           फिर नासिका (सूँघने की शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने  वापिस लौटकर सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे न सूँघते हुए व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, वाणी से बोलता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           उसके पश्चात कान (श्रवण शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"  
            उन सब ने उत्तर दिया, "जैसे एक बहरा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
            फिर वाक्(बोलने की शक्ति) बाहर चली गई। उसने भी लौटकर वही पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
          उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे एक गूॅंगा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
           फिर उसी तरह से मन ने भी एक साल के पश्चात लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे? 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे बिना मन के बच्चा आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
         अन्त में जब प्राण शरीर को छोड़कर बाहर निकलने लगे तो पल भर में ऐसा लगने लगा मानो सब कुछ समाप्त हो रहा है। उस समय सभी इन्द्रियाँ एकसाथ चिल्लाने लगीं, "मत जाओ, मत जाओ। तुम्हारे बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। तुम चले जाओगे तो सब समाप्त हो जाएगा। हमें समझ आ गया है कि तुम्हीं हम सब में श्रेष्ठ हो।"
            यह उपनिषद् कथा हमें प्राणों का महत्त्व समझा रही है कि उनके बिना इस शरीर का कोई मूल्य नहीं। नश्वर शरीर में रहने वाली अनश्वर आत्मा को हम संसार की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हम सारा समय इस शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। इसी को सदा सजाते-संवारते रहते हैं और इतराते रहते हैं। हम इस बात को भी नजरअंदाज कर देते हैं कि जब यह रूप-यौवन जल्दी ही ढल जाएगा तो फिर क्या होगा? 
            हमारी यह आत्मा अविनाशी ईश्वर का एक अंश मात्र है। परमात्मा की भॉंति यह भी नित्य और नूतन है। हमारे इस भौतिक शरीर के मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी यह सदैव विद्यमान रहती है। यह युगों-युगों तक रूप बदल-बदलकर इस संसार में जन्म लेती रहती है। हमारी आत्मा अपने पुराने, रोगी अथवा कटे-फटे शरीरों का त्याग करके नए शरीर को धारण करती रहती है। अत: आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह


किसी के दिल में जगह बना लेना बहुत ही आसान होता है। दूसरे के मन को मोह लेने की सबसे पहली शर्त होती है विनम्रता। मन में यदि स्वार्थ, दिखावा या छल-फरेब न हो तो किसी को भी अपना बनाया जा सकता है। विनम्र व्यक्ति अपने सरल व सहज व्यवहार से सबको अपना बना लेता है और सबका प्रिय बन जाता है। विनम्र हृदय वाले लोग अधिक आकर्षक और विश्वसनीय होते हैं जो सदा मजबूत सम्बन्ध बनाते हैं।

            विनम्रता दूसरों के दिलों में जगह बनाने का सबसे अनमोल गुण है जो अहंकार को त्यागकर रिश्तों में सौहार्द्र और सम्मान लाता है। यह व्यवहार में नरमी, वाणी में मिठास और दूसरों के विचारों का सम्मान करने से आती है। इस तरह करने से मनुष्य न केवल दूसरों का विश्वास जीतता है बल्कि अपनी महानता भी स्थापित करते हैं। विनम्रता का अर्थ झुकना नहीं होता अपितु अपने अहंकार को त्यागकर दूसरों के प्रति सम्मान दिखाना होता है। विनम्र वाणी और व्यवहार से लोग जुड़ते हैं और रिश्तों में दरार नहीं आती।

             किसी दूसरे के दिल में उतरने के लिए अपने रिश्तों में विश्वास और सच्चाई का होना आवश्यक होता है। अपने प्रिय जन के रंग में रंग जाना ही अपनेपन की सीढ़ी है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरे को उसी रूप में अपना लेना होता है जैसा वह है। उसकी अच्छाइयों को बढ़ाते हुए कमियों को अनदेखा कर देना चाहिए। तभी सम्बन्ध दूर तक साथ निभाते हैं। यह दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायता करती है और जीवन में शान्ति लाती है। 

            यदि किसी व्यक्ति की कमियों को लेकर सदा उसे कोसते रहेंगे, उस पर टीका-टिप्पणी करते रहेंगे तो सम्बन्ध कितने भी प्रगाढ़ रहे हों, टूटकर बिखर जाते हैं। व्यक्ति विशेष की कमियों को अपनी अच्छाई से दूर करने का यत्न करना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करना चाहिए।‌ हमेशा यही सोचना चाहिए कि कोई भी इन्सान सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। यदि वह पूर्ण हो जाएगा तब वह मनुष्य नहीं रह जाएगा अपितु ईश्वर तुल्य होकर हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।

            मनुष्य जब विनत होता है तब उसमें सबको मन्त्र मुग्ध करने की सामर्थ्य होती है। लोहे जैसी कठोर धातु जब नरम हो जाती है तो उससे मनचाहे पदार्थ बनाए जा सकते हैं। इसी तरह सोने जैसी ठोस धातु को अग्नि में पिघलाकर जब नरम कर देते हैं तब उससे मनभावन आभूषण बनाए जाते हैं। उन आभूषणों को पहनकर सभी इतराते फिरते हैं। उसी प्रकार अगर इन्सान भी नरम हो जाए तो उसके हृदय से कठोरता अथवा निर्दयता के भाव तिरोहित हो जाते हैं और वह मोम की तरह कोमल बन जाता है। वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है। वह हर व्यक्ति का प्रिय बन जाता है और फिर किसी के लिए भी पराया नहीं रह जाता।

          इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को महत्त्व देते हैं, थोड़े समय पश्चात उनका असली  चेहरा सबके सामने आ जाता है। लोग उनसे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। उन्हें पराया बनाने में वे समय नष्ट नहीं करते। अपनी इन्हीं गलतियों से मनुष्य दूसरों से कटकर अकेला हो जाता है। जहाँ तक हित साधने की बात है, वह तो स्वयं ही हो जाता है। इसके लिए छल-फरेब का सहारा लेने की कदापि आवश्यकता नहीं होती।

          कठोर मिट्टी पर हल चलाकर किसान उसे नरम बना देता है। तब वह खेत बन जाती है और उसमें विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। ये अनाज सभी जीवों का पेट भरते हैं। यही धरती की विशेषता है कि उसे हम सबकी चिन्ता रहती है। यदि वह स्वार्थी हो जाए तब उसके लिए अपनी जान गंवा देने हेतु कोई भी रणबाँकुरा आगे नहीं आएगा। उस समय इस जीव जगत में चहुॅं ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी।

          गेहूँ को पीसकर जब नरम आटा बना लिया जाता है तब उसमें पानी मिलाकर ही रोटी बनाई जाती है। जो सभी जीवों को पुष्ट करती है। यानी सारी प्रकृति 'स्व' से परे रहकर 'पर' को महत्त्व देती है। तभी हम जीवों का अस्तित्व इस धरा पर सुरक्षित रहता है। 

            दूध में शक्कर की तरह घुलमिल जाने और आटे में नमक की तरह एकरूप होकर दूसरों को सुख देने वाले विनयशील व्यक्ति ही वास्तव में अपनी पहचान बनाए रखते हुए भी सबके अपने बनते हैं। यही उनका सबसे बड़ा गुण होता है, इन गुणों को अपनाने में कभी भी परहेज नहीं करना चाहिए।

           विनम्रता सफलता की गारण्टी है क्योंकि यह संघर्षों को सुलझाती है और लोगों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध बनाती है। यह हमारे चरित्र को निखारती है और अहंकार को गलाकर व्यक्तित्व को महान बनाती है। अपने अहं को किनारे करके ही दूसरों के हृदय में अपना स्थान बनाया जा सकता है। स्वार्थ के वायरस को भी नगण्य करते हुए एक-दूसरे के दिल में घर बनाया जा सकता है। इन छोटी-छोटी बातों को यदि अपने ध्यान में खा जाए तभी किसी के दिल में सरलता से अपना स्थान बनाया जा सकता है।

चन्द्र प्रभा सूद 


सोमवार, 27 अप्रैल 2026

जब शब्द साथ नहीं दें

जब शब्द साथ नहीं दें

बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य बहुत कुछ कहना चाहता है परन्तु उसके अपने शब्द ही उसका साथ नहीं देते। वह अपने भावों को शब्दों में ढालना चाहता है पर असफल हो जाता है। इसलिए वह बस मूक बनकर एकटक ताकता रह जाता है अथवा फिर पैर के नाखूनों से धरती को खोदने लग जाता है। यदा कदा वह दूसरों से नजरें भी चुराने लगता है। उस समय उसका मौन अथवा उसके अश्रु उसकी मुखर भाषा बन जाते हैं।
          मनुष्य जब बहुत अधिक भावुक होता है तब वह बोल नहीं पाता। सहज होने पर ही वह अपनी बात बता सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक कष्ट के समय भी मनुष्य के बोल उसका साथ छोड़ देते हैं। अधिक प्रसन्नता के आवेग में, भय या विस्मय की स्थिति में, पश्चाताप होनेआदि के समय भी उसकी आवाज नहीं निकल पाती। उसके चेहरे के भावों से उसके हृदय को पढ़ा जा सकता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य का चेहरा ही उसका आईना कहलाता है जो उसके सभी प्रकार के मनोगत भावों को बिना कहे प्रकट कर देता है।
          इन सबके अतिरिक्त कई बार दूसरों के प्रति सम्मान भाव के कारण भी मनुष्य चाहते हुए भी प्रतिकार स्वरूप नहीं बोल पाता कि उसे अमुक बात पसन्द नहीं आई। कभी-कभी अपने प्रियजन को परेशानी न हो सोचकर भी मनुष्य चुप्पी लगा जाता है। चुप की भी अपनी एक आवाज होती है जो बिना कुछ बोले दूसरे के हृदय को चीर कर रख देती है। मनुष्य के हावभाव से उसका हर्षोल्लास झलकता है जो हर किसी को दिखाई देता है। 
          ऐसा भी कहा जाता है कि घमण्डी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उसके बिना कुछ कहे ही उसके व्यवहार से ही सब ज्ञात हो जाता है। मौन रहते हुए मनुष्य की सफलता-असफलता उसके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं। अहंकार में चूर रहने वाले व्यक्ति के सामने कोई मनुष्य नहीं पड़ना चाहता। तब वह धीरे-धीरे अकेला हो जाता है। जब उसे किसी की आवश्यकता होती है तो वह अपने विचारों को स्पष्ट करने में असमर्थ हो जाता है। इसका कारण निश्चित ही पूर्व में किया गया उसका व्यवहार होता है।
            पैसे के लिए यह उचित प्रसिद्ध है कि वह बोलता है। पर पैसा तो निर्जीव है, वह बोल नहीं सकता। परन्तु इसका यही अर्थ है कि जब किसी भी स्त्रोत से पैसा मनुष्य के पास अधिकता से आता है तब उसकी सद्य: खरीदी जाने वाली सुविधाएँ उसके पास पैसा होने के रहस्य की पोल खोल देती हैं। यहाँ पर भी वाणी के व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। उसके हाव-भाव ही उसकी चुगली कर देते हैं।
            बिना शब्दों का उच्चारण किए भी मनुष्य अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ हो सकता है। यहाँ मैं याद दिलाना चाहती हूँ कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म पाकर भी जब दुर्भाग्यवश मनुष्य को ईश्वर की ओर से वाणी का उपहार नहीं मिलता तब वह गूँगा कहलाता है। वह अपने विचारों को बोलकर प्रकट नहीं कर सकता परन्तु उसके व्यवहार से अथवा चेहरे के भावों से या हाथ के इशारों से ही उसके घर-परिवार के लोग अथवा बन्धु-बान्धव उसके सारे भावों को सहजता से समझ लेते हैं।
             हम अपने घर में मूक पालतू पशुओं को रखते हैं। वे तो हमारी तरह बोल नहीं सकते पर अपने स्पर्श से, अपने हावभाव से मौन रहते हुए अपने प्यार, क्रोध या जिद आदि भावों को बखूबी समझा देते हैं। इसी प्रकार अपनी भूख-प्यास आदि दैनिक आवश्यकताओं के बारे में भी वे अच्छी तरह अवगत करवा देते हैं।
             एक छोटा बच्चा जो बोल नहीं सकता, वह भी अपनी माता को अपनी सब समस्याओं के विषय में समझा‌ देता है। उसके रोने के तरीके से मॉं समझ लेती है कि अब बच्चे को भूख लगी है, अब उसने सू सू कर लिया है या पोटी कर ली है। वह बिमार‌ है अथवा उसे कोई शारीरिक कष्ट है। इस प्रकार माता अपने बच्चे की सारी बातों को उसके बोले बिना जान-समझ लेती है। यहॉं‌ पर शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
           इन्सान जितने भी घण्टे-घड़ियाल बजा ले पर ईश्वर उसे नहीं मिलता। वह तो उसके शुद्ध और पवित्र मन-मन्दिर में ही मिलता है। मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भाव में रहता है। कहते हैं जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही हम उस प्रभु का वर्णन नहीं कर सकते। उसका चित्रण करते समय हमारी वाणी मौन रह जाती है। हमारे शास्त्र 'नैति नैति' कहते है। अर्थात् ईश्वर यह भी नहीं है, वह भी नहीं है।
          चारों ओर पसरा सन्नाटा मनुष्य की कहानी बिनकहे सुना देता है। किसी सज्जन के प्रति किए गए अभद्र व्यवहार की क्षमा न माँगने पर भी उसके अविरल बहते आँसू उसकी क्षमायाचना का कारण बन जाते हैं। मौन रहते हुए भी माता-पिता बच्चों को बहुत-सा व्यावहारिक ज्ञान दे देते हैं। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि सारा समय हो-हल्ला करके ही अपनी बात रखी जाए या सान्त्वना दी जाए। मौन रहकर समझाई गई बात भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उसकी मारक शक्ति अधिक होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

आजकल लोगों में अपनापन कम होने लगा है। हर रिश्ते से लोग दूरी बनाने लगे हैं। अपनेपन में आने वाली यह दूरी मनुष्य के क्रोध को बढ़ाने का कार्य करने लगी है। भौतिक युग में जहाँ मनुष्य जीवन के बाकी सारे मायने बदलते जा‌ रहे हैं, वहाँ इसके साम्राज्य का भी विस्तार होने लगा है। कोई मनुष्य अपने जीवन की रेस में पिछड़ना नहीं चाहता, वह सदा अग्रणी बने रहना चाहता है। शायद यही कारण है कि उसे अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और फिर उसे अनावश्यक ही बात-बेबात पर क्रोध आने लगता है।
            वैस यह क्रोध मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। राहू ग्रह की तरह उसके विवेक को ग्रसकर ग्रहण लगा देता है। उसे अपने बन्धु-बान्धवों से दूर कर देने में यह अहं भूमिका निभाता है। इस क्रोध का कोई सानी नहीं है क्योंकि यह हमारी सोच से भी अधिक चालबाज या चतुर होता है। इसे अच्छी तरह पता है कि कहाँ अपना जोर आजमाना है और किस के सामने खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना है। किसी भी क्षेत्र में अपने से अधिक बलशाली व्यक्ति के सामने यह मिमियाने लगता है।
            यह क्रोध अक्सर कमजोर पर ही निकलता है क्योंकि केवल उन असहाय दुर्बलों पर ही हमारा वश चलता है। हम अपनी कामवाली बाई, सब्जी वाला, धोबी, माली आदि पर ही अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं अथवा बहस कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी वाला अपने से बड़ी गाड़ी वाले से हाथ जोड़कर माफी माँग लेता है, परन्तु आटो वाले, रिक्शा चालक, साईकिल सवार अथवा पैदल चलने वालों पर ही वह अपना गुस्सा निकालने का यत्न करता हैं। 
            किसी पहलवान या गैंगस्टर के सामने तो सबकी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाती है। कार्यालय में अपने बॉस के सामने पैर पटकने की हिम्मत कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। पता होता है कि यदि वहाँ क्रोध दिखाया तो नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाएगा। तब घर-परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए वहॉं अपमान सहन कर भी वह चुप्पी साध लेता है।‌ सभी लोग अपने अधीनस्थों पर ही क्रोध कर सकते हैं बस। उन पर क्रोध करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
            इस तरह हम देखते हैं कि यह क्रोध कैसे-कैसे गुल खिलाता है। यह मनुष्य के अन्तस् में छुपी हुई कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर देता है। इन्सान को पता भी नहीं चलता और यह क्रोध अपनी चाल चल देता है। उसे अहंकारी होने का मेडल दिला‌ देता है। लोग ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं पड़ना चाहते। उसे दूर से देखकर वे किनारा कर लेते हैं। अपने इस क्रोध रूपी शत्रु के कारण धीरे-धीरे वह अकेला रह जाता है।
            प्रकृति को हम इन्सान अपने स्वार्थ के लिए बहुत अधिक हानि पहुँचाते हैं। नदियों के जल में कचरा और फेक्ट्रियों की गन्दगी डालकर उन्हें दूषित करते हैं। पेड़ों को काटते हैं, वायु प्रदूषित करते हैं। इस कारण वर्षा पर प्रभाव पड़ता है। मौसम चक्र में परिवर्तन होने लगता है। वातावरण को हम गाड़ियों के धुऍं से दूषित करते हैं। जब यह प्रकृति हम लोगों पर क्रोध करती है तो इस धरती पर विनाश हो जाता है। हम सब परेशान हो जाते हैं, उससे उभरने के लिए उपाय सोचते हैं।
           नदियों में बाढ़ आने से लोगों और पशुओं की मृत्यु हो जाती है, बड़े-बड़े भवन तक टूट जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। जब सुनामी जैसी आपदाएँ आती है तो दूर-दूर तक विनाश हो जाता है। भूकम्प आ जाने पर भी जान-माल की बहुत हानि होती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और ओलावृष्टि सभी धरती पर कहर बरसाती हैं। हमारे दोष के कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचने लगता है। ये सभी प्रकृतिक आपदाएँ हमारी मूर्खता का परिणाम हैं। जब-जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं तब-तब ये सब तो झेलना ही पड़ता है। इससे बचना असम्भव हो जाता है।
            अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। जब वह तैश में आती है तो सारे भेदभाव भूलकर महलों और झोंपड़ियों सबको समान रूप से खाक में मिला देती है। शहरों और जंगलों को राख के ढेर में बदल देती है। लोहे जैसी कठोर धातु को भी पिघला देती है। उस समय वह किसी के प्रति सहानुभूति नहीं रखती। सब लोगों को उसका प्रकोप झेलना पड़ता है।
            इसी प्रकार पशुओं को जब क्रोध आता है तो वे भी किसी का लिहाज नहीं करते। पलटकर वार कर देते हैं। चाहे वह साँप हो, कुत्ता हो, हाथी हो अथवा कोई अन्य पशु। हम समझ सकते हैं कि क्रोध चाहे मनुष्य का हो, पशु-पक्षी का हो अथवा प्रकृति का हो सदैव विनाशकारी होता है। इसका दुष्परिणाम किसी एक मनुष्य को नहीं अपितु बहुतों को भुगतना पड़ता है।
      ‌      इस नामुराद क्रोध को शान्त करने की महती आवश्यकता होती है। इसके लिए गहरी सांस लेनी चाहिए। हो सके तो 10 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हट जाना चाहिए।मौन रहना चाहिए, ध्यान लगाना चाहिए और अपनी पसन्द का संगीत सुनना गुस्से को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। इनके अतिरिक्त सकारात्मक सोच और नियमित दिनचर्या से भी क्रोध पर काबू पाया जा सकता है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और सद् ग्रन्थों का वाचन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद