गुरुवार, 24 सितंबर 2026

बिनमॉंगे परामर्श न दें

बिनमाँगे परामर्श न दें 

मनुष्य को बिनमाँगे किसी को परामर्श नहीं देना चाहिए अथवा कभी भी अनावश्यक रूप से किसी के कार्य में दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। जन साधारण की आम भाषा में इसे कहते हैं -
            किसी के फटे में टाँग अड़ाना 
यदि मनुष्य ऐसा करता है तो उसे अपनी अवमानना के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मनीषी सदैव हमें समझाते हुए कहते हैं - 
        अपनी इज्जत अपने आप हाथ में होती है। 
       मनुष्य को जहाँ ऐसा प्रतीत हो कि उसकी वहाँ जरूरत नहीं है तो बिना कुछ कहे अथवा बिना कोई विशेष टीका-टिप्पणी किए हुए उसे स्वयं को चुपचाप वहाँ से अलग कर लेना चाहिए। बुद्धिमानी यही कहलाती है कि मनुष्य समय और परिस्थिति को पहचानकर उसके अनुसार ही सबके साथ यथोचित व्यवहार करे।
         बिनमॉंगे सलाह या परामर्श न देना एक बहुत ही समझदारी की और सम्मानजनक आदत है।
मनुष्य जब बिना पूछे किसी को सलाह नहीं देता तो लोग उसकी बातों और विचारों की कीमत समझते हैं। लोग प्रायः बिनमॉंगे दी गई सलाह को सुनना ही नहीं चाहते। वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं या फिर गम्भीरता से नहीं लेते। जब सामने वाला खुद अपनी इच्छा से सलाह मॉंगता है तब वह व्यक्ति की बात का पूरा सम्मान करता है। 
          जरूरत पड़ने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं परन्तु स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर दुल्लती मारकर किनारे भी हो जाते हैं। उसके बाद वे उस सहायता करने वाले को पहचानने तक से भी इन्कार कर देते हैं। सामने पड़ जाने पर वे कन्नी काटकर निकली जाते हैं। निस्सन्देह यह मनुष्य की चरित्रगत विशेषता को प्रकट करता है।
        इन्हीं भावों को रहीमदास जी ने निम्न दोहे में एक उदाहरण के साथ बड़े ही सुन्दर शब्दों में स्पष्ट किया है-
        काज पड़े कछु और हैं काज सरे कछु और।
        रहिमन भँवरी के भये नदी सिरावत मौर।।
अर्थात् जब मनुष्य को किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है तब उसका व्यवहार अलग होता है और स्वार्थ पूर्ण हो जाने पर उसके तेवर ही बदल जाते हैं। जैसे विवाह के समय आवश्यकता होने पर मुकुट को दूल्हे के सिर पर सजाया जाता है और फिर जब फेरे हो जाते हैं तो उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
          इसी प्रकार जिन सोने, चाँदी और हीरे के आभूषणों से लोग श्रृंगार करके पार्टियों में वाहवाही लूटते हैं, उन्हीं को वापिस लौटकर उतार देते हैँ। फिर उन्हें तिजोरी में अथवा बैंक के लाकर में बन्द करके रख देते है। यानी आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद उनको किनारे करके तिजोरी या लाकर में बन्द कर दिया जाता है। इसे ही इन्सानी फितरत कहते हैं, जिसकी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं।
          यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि समय और समझ दोनों ही एक साथ भाग्यशाली लोगों के हिस्से में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब समझदारी दिखाने का समय आता है तो उस समय मनुष्य चूक जाता है। घबराहट के मारे उसके हाथ-पैर फूलने लग जाते हैं। वह अपने बचाव में न कुछ कह पाता है और न ही अपने विवेक पर भरोसा कर पाता है। वह मानो असहाय-सा अनुभव करने लगता है।
          जब समय निकल जाता है तब वह समझदार बन जाता है। अपने मन ही में सोचने लगता है कि काश उसने उस समय यह, यह सब कह दिया होता तो वह बच जाता। उसकी हेठी होने से बच जाती। यह तो वही बात हुई- 
  अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।      
                          अथवा 
               का वर्षा जब कृषि सुखाने।
        जब कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ जाता है तो मनुष्य को तुरन्त ही उत्तर देना चाहिए। स्वीकारोक्ति सूचक हाँ या नकारात्मक न जैसे शब्दों का उपयुक्त समय पर उपयोग करने में दुविधा नहीं होनी चाहिए। ये दोनों शब्द छोटे होते हैं पर बड़े ही खोटे होते हैं। जरा-सी लापरवाही हो जाने पर ये उसे मुसीबत में डालने से जरा भी परहेज नहीं करते।
        यदि इन शब्दों का प्रयोग उपयुक्त समय पर न किया जाए तो मनुष्य को बहुत ही हानि उठानी पड़ सकती है। बहुत सोच-समझकर इनका प्रयोग करना चाहिए। जल्दबाजी में न कहकर और समय से चूक जाने पर हाँ बोलने पर मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ हार जाता है। इनका दूरगामी परिणाम कभी-कभी उसकी काया कल्प भी कर देता है।
          इसलिए समय का सही उपयोग करते हुए मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिए। दूसरों को अनावश्यक परामर्श देने के स्थान पर उसे अपने पर इस जीवन की पहेलियों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जब तक अच्छी तरह से तसल्ली न हो जाए उसे न तो अपनी स्वीकृति देनी चाहिए और न ही इन्कार करना चाहिए। अपने विवेक पर विश्वास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 23 सितंबर 2026

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

परमात्मा सज्जनों की, अपने भक्तों की बहुत कड़ी परीक्षा लेता है किन्तु उनका साथ कभी नहीं छोड़ता। भगवान परीक्षा अवश्य लेते हैं पर सीमा से बाहर नहीं। हमारी सीमा वहीं तक होती है, जहाँ तक हमारा विश्वास टूटता है। ईश्वर उस विश्वास को मजबूत करने के लिए हमें कसौटी पर कसते हैं।
          भारतीय संस्कृति के अनुसार भगवान किसी भी जीव की क्षमता से अधिक परीक्षा नहीं लेते। गीता में स्पष्ट संकेत मिलता है कि ईश्वर मनुष्य को उसके कर्म, संस्कार और सामर्थ्य के अनुसार ही परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। यदि परीक्षा कठिन लगती है तो वह हमारी दृष्टि का दोष होता है, ईश्वर की योजना का कदापि नहीं होता।
           विद्यालय या कालेज में जब भी विद्यार्थियों की परीक्षा ली जाती है तो उसका अर्थ यही होता है कि विद्यार्थी उस परीक्षा में सफल होकर अगली परीक्षा के लिए तैयार हो रहा है। स्कूल की परीक्षाओं में सफल होने के पश्चात कालेज की परीक्षाओं से उसे गुजरना पड़ता है। उसके बाद नौकरी पाने की परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती है। फिर जीवन की भागदौड़ में आयुपर्यन्त उसे एक के बाद एक समस्याओं से जूझना पड़ता है, उसे उनसे छुटकारा नहीं मिलता।
        इसी तरह जीवन की इन परीक्षाओं का क्रम निरन्तर चलता रहता है। मनुष्य एक परीक्षा में सफल होता है तो फिर एक नई परीक्षा उसकी प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाए तैयार बैठी होती है। उसे जीवन भर इनसे दो-चार होते रहना होता है और फिर निश्चित ही सफल भी होना होता है।    
        इसीलिए इस जीवन को युद्धभूमि कहा जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य बस कभी स्वयं से तो कभी अपनी परिस्थितियों से अनवरत संग्राम करता ही रहता है। शायद मानव जीवन की यही त्रासदी कहलाती है।
          बार-बार इन परीक्षाओं में उलझने का कारण है कि वह मालिक मनुष्य को सोने की तरह खरा बनाना चाहता है। जैसे सोने को शुद्ध करने के लिए उसे अग्नि में तपाया जाता है, उसी प्रकार ईश्वर अपने भक्त को दोषमुक्त तथा शुद्ध-पवित्र बनाने के लिए कठिन परीक्षाओं में डालता है यानी कष्टों और परेशानियों की अग्नि में तपाता है। ताकि वह कुन्दन की तरह निखरकर सबके समक्ष आ सके।
        यह शुद्धता केवल मात्र शरीर या मन की नहीं होती बल्कि मन, वचन और कर्म तीनों प्रकार की होती है। ईश्वर चाहता है कि उसका प्रियजन जो भी विचार अपने मन में करे, वैसा ही अपनी वाणी से बोले और फिर उसी के अनुसार आचरण भी करे। इन तीनों से वह अलग-अलग न रहे।
          मनुष्य मन में कुछ और सोचे तथा वाणी से कुछ अलग बोले और आचरण सर्वथा विपरीत करे तो यह उसके व्यवहार की कुटिलता होती है, सरलता या सहजता नहीं कहलाती। जब तक मन, वचन और कर्म से वह एक नहीं होगा तब तक उसके कथन का स्थायी प्रभाव दूसरे लोगों पर नहीं पड़ सकता। यह बात उस मालिक को बिल्कुल पसन्द नहीं है।
        दुखों और परेशानियों की भट्टी में तपकर मनुष्य जब खरे सोने की तरह विशुद्ध और चमकदार बन जाता है। तब इस खरे सोने को वह मालिक फिर वैसे ही अपने पास सम्हालकर रख लेता है जैसे अपने स्वर्णाभूषणों को हम तिजोरी में, बैंक के लाकर आदि में सुरक्षित रख देते हैं।
          इसके विपरीत दुर्जनों को भगवान देता तो बहुत कुछ है परन्तु उन्हें अपना साथ नहीं देता। अर्थात् वह उन्हें अपने से विमुख कर देता है। उनके मन में रहता हुआ, उन्हें चेतावनी देता हुआ भी उनकी पहुँच से दूर हो जाता है। उस समय उन दुर्जनों की पूजा-अर्चना, दान आदि सब मात्र प्रदर्शन के लिए ही रह जाते हैं क्योंकि उस प्रभु को दूसरों को कष्ट देने वाले, मारकाट, चोरी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी आदि अनैतिक कार्य करने वालों की तथाकथित भक्ति नहीं चाहिए होती।
          वे जब तक अपने सभी कुकृत्यों को त्यागकर सहृदय, परोपकारी, दयालु नहीं बन जाते तब तक वह दर्शक की तरह बना रहता है। वह मालिक तब तक उनका हाथ नहीं थामता जब तक वे अपने सच्चे मन से प्रायश्चित नहीं करते। 
        सज्जनों की महानता कर्मठता, सहृदयता, दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव ही उन्हें दुर्जनों से अलग बनाते हैं। यही कारण है कि वे जन साधारण में लोकप्रिय बन जाते हैं। समाज उन्हें हृदय से सच्चा हितैषी व मार्गदर्शक स्वीकार करता है। दुष्ट सबकी आँखों की किरकिरी बनते हैं। मजबूरी में उनके साथ कोई सम्बन्ध रख सकता है पर मन से उनके साथ जुड़ाव नहीं कर पाते। उनके मुँह के सामने वे डर के मारे कुछ न कह पाएँ पर पीठ पीछे सदा उनकी अवमानना ही करते हैं।
         मनुष्य को स्वयं ही यह निश्चित करना होता है कि वह ईश्वर का कृपा पात्र बनना चाहता है अथवा मालिक से दूरी बनकर अपयश की भागीदार बनना चाहता है। निश्चित ही उसे उसी के अनुरूप परमेश्वर की परीक्षाओं में सफल होकर उसका प्रिय भक्त बनना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे हम पूर्ण कह सकें क्योंकि उसमें अच्छाई और बुराई दोनों का ही समावेश होता है। इसीलिए कभी वह गलतियाँ या अपराध कर बैठता है तो कभी महान कार्य करके अमर हो जाता है। यानी कि उसमें हमेशा स्थायित्व की कमी रहती है। यदि वह पूर्ण हो जाए तो भगवान ही बन जाएगा तथा ईश्वर कहलाने लगेगा। 
          केवल और केवल वह परमपिता परमात्मा ही इस जगत में पूर्ण है। इसीलिए उसकी यह सृष्टि भी पूर्ण है। उसमें से कोई कमी नहीं निकाली जा सकती। वह मालिक सभी भौतिक गुण-दोषों से परे है। उसमें किसी प्रकार की कोई कलुषता नहीं हो ही सकती। इसीलिए हम सब उसे पूर्णब्रह्म कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करके सदा ही उससे कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं। परमात्मा के विषय में निम्न प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र 'ईशोपनिषद्' और 'बृहदारण्यकोपनिषद्' से लिया गया है। मन्त्र कहता है-
       ऊॅं पूर्णमिद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदुच्यते।   
       पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
अर्थात् वह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
         हम कह सकते हैं कि वह जो दिखाई नहीं देता है पर वह पूर्ण है। वह दृश्यमान जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण है। क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण से उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए तब भी पूर्ण ही शेष बचता है।
        यह पूर्णता कहलाती है जहाँ अपूर्ण होने का कोई भाव ही नहीं है। सब तरह से हमें उसकी पूर्णता का साक्षात्कार होता है। उसमें से कुछ ले भी लिया जाए तब भी सागर के जल की तरह वह सदा पूर्ण ही रहता है।
        यह सर्वथा सत्य है कि इन्सान पूर्ण नहीं हो सकता पर पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास अवश्य कर सकता है। इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हर मनुष्य की अपनी एक शक्ति होती है और उसी प्रकार उसकी कोई-न-कोई कमजोरी भी होती है। उसी के आधार पर समाज में उसकी एक निश्चित पहचान बन जाती है।
          इस असार संसार के किसी मनुष्य के पास धन का बल होता है, किसी अन्य व्यक्ति के पास विद्या का बल होता है, दूसरे किसी के पास सत्ता का बल होता है और कुछेक के पास शारीरिक बल होता है। कुछ ऐसे सन्त प्रकृति के लोग भी होते हैं जिनके पास आत्मिक शक्ति होती है। इन सबके अतिरिक्त वे लोग होते हैं जो अपने घमण्ड में सदा ही चूर रहते हैं। वे उसे ही अपनी शक्ति मानकर इतराते रहते हैं।
         बल या शक्ति की ही भाँति हर मनुष्य की अपनी-अपनी कमजोरी भी होती है। शारीरिक बल या आत्मिक बल अथवा मानसिक बल किसी की भी कमी मनुष्य में हो सकती है। इनके अतिरिक्त धन, विद्या, अनुभव जन्य ज्ञान, अनुशासन में से किसी एक की भी कमी उसकी कमजोरी बन जाती है। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी मनुष्य की कमजोरियाँ हो सकती हैं यथा पानी को देखकर डरना, ऊँचाई से घबराहट, अग्नि से भय, किसी पशु विशेष से डर जाना, कहीं भी भीड़ को देखकर परेशान हो जाना आदि।    
          समझदार मनुष्य वही है जो अपनी ताकत या शक्तियों का अनावश्यक प्रदर्शन न करे। जिससे लोग उसकी ताकत का दुरूपयोग करने के लिए उसे उकसाने न लग जाएँ। यदि मनुष्य उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों के झाँसे में आ गया तो उसका विनाश निश्चित समझ लीजिए। इसका कारण है कि अपनी चाटुकारिता होती देखकर वह जीवन की वास्तविकता से विमुख होने लगता है। वह उसे ही सच्चाई मान लेता है।
        अपनी कमजोरियों को भी दूसरों के सामने प्रकट न होने दे जिससे किसी को उसका उपहास उड़ाने का अवसर न मिल सके। इससे उसका मनोबल कमजोर नहीं पड़ेगा।
        जिस प्रकार मछली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती और पशु, पक्षी या इन्सान पानी में अपना घरौंदा नहीं बना सकते। सबके लिए उपयुक्त स्थान निश्चित हैं। उसी प्रकार मनुष्य की शक्ति अथवा कमजोरी उसके गले की हड्डी नहीं बनने चाहिए। उसे अपनी शक्ति का उपयोग देश, धर्म, परिवार, समाज की भलाई के लिए करना चाहिए। इसी तरह अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके चमत्कार करने उसे निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्र प्रभा 

सोमवार, 21 सितंबर 2026

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

दबाव अथवा प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन है। आज सभी लोग भागमभाग की जिन्दगी जी रहे हैं। दूसरों की देखादेखी हर व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा के अधिक-से-अधिक साधन जुटाना चाहता है। उसके लिए बहुत सारे पैसों की आवश्यकता होती है। इस धन को कमाने के लिए दिन-रात एक करता हुआ वह कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। 
        बच्चे, युवा, बड़े-बुजुर्ग प्रायः सभी लोग किसी-न-किसी दबाव में रहते हैं। बच्चों के सिर पर पढ़ाई का और फिर कैरियर बनाने का दबाव रहता है। समय की माँग के कारण माता-पिता उनके परीक्षा परिणाम में अच्छे अंक लाने के लिए उन पर दबाव बनाए रहते हैं। यदि कहीं कमी रह जाए तो उनका भविष्य प्रभावित हो जाता है। यही कारण है कि बच्चों का बचपन मानो आज कहीं खो सा गया है।
        युवाओं के समक्ष अपने भावी जीवन और अच्छी नौकरी मिलने का दबाव होता है। दिनभर इतना दबाव रहता है कि उनके कार्यक्षेत्र में आने-जाने का कोई समय निश्चित नहीं रहता। इसी कारण वे अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों को पूर्ण करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके पास समय का प्रायः अभाव-सा रहता है। जिसके कारण उनकी सोशल लाइफ सिमटती जा रही है और वे अलग-थलग होते जा रहे हैं।
          अपने दायित्वों को निपटाने और रिटायरमेंट के पश्चात भी बड़े-बुजुर्ग आज के बदलते माहौल के चलते दबाव में रहते हैं। नौकरी के लिए बच्चों के बाहर चले जाने के कारण उनके खानपान, शरीरिक स्वास्थ्य, देखभाल, सुरक्षा, अकेलेपन आदि की समस्या के कारण उन पर मानसिक दबाव बना रहता है।
        कच्ची दाल को पकाने के लिए जब हम प्रैशर कुक्कर में डालकर गैस पर रखते हैं तो प्रैशर से वह पक जाती है। तब वह खाने लायक हो जाती है और हमें पुष्ट करती है।
          यह दबाव परिवर्तन लाता है। वह परिवर्तन कोई अनुभव कर पाता है और किसी को वह महसूस नहीं होता। सबमें इसे अनुभव करने की क्षमता अलग-अलग होती है। इस दबाव से एनर्जी या शक्ति के कारण शारीरिक अथवा मानसिक बदलाव होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी गुणवत्ता यानी क्वालिटी और क्वांटिटी पर निर्भर करता है।
        इस दबाव को सहन करने की क्षमता भी सबकी अलग-अलग होती है। कुछ लोग इसे किसी भी तरह सहन कर लेते हैं। वे अपने दुखों और परेशानियों से स्वयं को बचाकर निकाल लेते हैं। डटकर उनका सामना करते हुए विजयी हो जाते हैं।
          इसके विपरीत कुछ लोग इस दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे लोग अपने दुखों और परेशानियों से घबरा जाते हैं और कायरतापूर्ण मार्ग अपना लेते हैं। यानी आत्महत्या कर लेते हैं। 
          इन लोगों के विषय में हम प्रतिदिन समाचार पत्रों, टी वी व सोशल मीडिया पर हम पढ़ते व सुनते हैं। इनमें बाढ़, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि के कारण फसल के नष्ट हो जाने पर किसान हो सकते हैं। खराब परीक्षा परिणाम डर से घबराए छात्र हो सकते हैं। व्यापार में हानि अथवा अन्य कारणों से आर्थिक स्थिति के बिगड़ने का बोझ न सहने वाला कोई भी हो सकता है। कुछ लोग अपनी शारीरिक दुरावस्था से घबराकर भी इस मार्ग को अपना लेते हैं।
          कहने का तात्पर्य है कि पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक अथवा राजनैतिक  किसी भी तरह के दबाव को न झेल पाने के कारण नेता, अभिनेता, न्याय व्यवस्था का रक्षक या सामान्य जन कोई भी इस गलत मार्ग को अपनाने वाला हो सकता है।
          आजकल मनुष्य हमेशा ही तनाव में रहता है। उसकी भलाई के लिए कही गई किसी भी बात पर वह अनावश्यक ही भड़क उठता है। वह जाने-अनजाने असहनशील बनता जा रहा है। इस कारण उसका शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह दबाव या तनाव बहुत से रोगों को निमन्त्रण देता है। इसीलिए छोटी आयु से ही बच्चे दवाइयों पर निर्भर रहने लगे हैं।
       अनेक बुराइयों की जड़ इस तनाव को अपने सिर पर हावी नहीं होने देना चाहिए। अपने को यथासम्भव शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। दिन में थोड़ा समय निकालकर परिवार के साथ चर्चा करनी चाहिए। अवकाश का दिन बच्चों से मस्ती करनी चाहिए। योग का आश्रय लिया जा सकता है। मेडिटेशन या ध्यान लगाया जा सकता है। इससे दबाव या प्रैशर दूर होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 20 सितंबर 2026

अपनी तुलना किसी से न करें

अपनी तुलना किसी से न करें 

मनुष्य को अपनी तुलना कभी किसी दूसरे से नहीं करनी चाहिए। उसे इस बात को अपने मन में गहरे बिठा लेनी चाहिए कि वह ईश्वर की एक श्रेष्ठ रचना है। इसलिए वह जैसा भी है सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर के हर कार्य में अच्छाई होती है। उसे भी मालिक ने कुछ सोचकर ही इस संसार मे भेजा है। इसलिए उसे कोई विशेष कार्य करना चाहिए।
          उस प्रभु की हर रचना अपने आप में सर्वोत्तम और अद् भुत होती हैं। किसी भी इन्सान में इतनी सामर्थ्य नही है कि उसे समझ सके अथवा उसमें से कोई कमी नहीं निकालकर स्वयं को सर्व शक्तिमान सिद्ध सके। इसलिए अपने में विद्यमान कमियों अथवा आने वाली परेशानियों को देखते हुए सदा ही अपने आप को कोसते रहना उचित नहीं है। उस मालिक पर मनुष्य को पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए।
        यहाँ एक उदाहरण लेते हैं। हम एक बीज बोते हैं और उस छोटे से बीज से एक बहुत बड़ा वृक्ष बन जाता है। यदि जब हम उस बीज को खोलकर देखते हैं तो हमें कुछ भी ऐसा भी नहीं दिखाई देता। उस समय हम समझ ही नहीं पाते कि यह नन्हा-सा बीज महान वृक्ष का कारक बन जाएगा।
        एक छोटे से बीज में इतना बड़ा वट वृक्ष समाया होता है। उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में भी अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। आवश्यकता होती है तो बस उन्हें तलाशने की। अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को पहचानकर उसके अनुसार कार्य करने वाले को जीवन में कभी हार का स्वाद नहीं चखना पड़ता।
       हम अपना स्वयं का ही उदाहरण लेते हैं। हमारे अपने हाथ की पॉंचों अंगुलियॉं बराबर नहीं होती। जब हमारी अपनी अंगुलियों में समानता नहीं होती तो संसार के सभी जीवों की क्षमता एक जैसी कैसे हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती। इसलिए दूसरों को देखकर स्वयं को दोष नहीं देना चाहिए। जितनी अपनी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार कार्य करने चाहिए। दूसरों से तुलना करके अनावश्यक तनाव लेना उचित नहीं होता।
       मनुष्य जब अपनी दूसरों से तुलना करता है तो उस समय वह अपनी मेहनत की खुशी को भी खो देता है। हर व्यक्ति इस दुनिया में विशेष योग्ताऍं लेकर पैदा होता है। उसकी अपनी अलग पहचान होती है। इसी प्रकार हर किसी का जीवन और संघर्ष अलग-अलग होता है। इसलिए किसी और से बराबरी करना व्यर्थ है। 
          मनुष्य को वास्तव में अपनी तुलना केवल अपने बीते हुए कल से करनी चाहिए। दूसरों की नकल करने के स्थान पर उसे अपनी क्षमताओं को पहचानना और निखारना चाहिए। जो कुछ भी उसके पास है, उसकी सराहना करनी चाहिए।
        मनुष्य को यह सोचकर कभी दुखी नहीं होना चाहिए कि उसके पास कुछ नहीं है। उसके पास यह नहीं है या वह नहीं है, सोचने के स्थान पर उसे पुनः पुनः यह मनन करना चाहिए कि सीमित समय के लिए मिले हुए इस मानव जीवन में उसके पास क्या-क्या है? उसे अपने जीवन में क्या-क्या करना चाहिए? क्या वह अपने जीवन में कुछ नए मानकों की स्थापना कर सकता है?
         मनुष्य को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुनिया की कोई भी शक्ति उसे तब तक नहीं हरा सकती जब तक वह स्वयं ही हार न माने। अपना मनोबल उच्च रखते हुए मनुष्य को संसार सागर में छलाँग लगा लेनी चाहिए। यह निश्चित मानिए कि वह इसे पार करने की सामर्थ्य रखता है। चाहे तो सफलता अवश्य ही उसके कदम चूमेगी।
        इसमें कोई दोराय नहीं है कि यदि मनुष्य सही है, उसने कोई गलती नहीं की तो उसे क्रोध नहीं करना चाहिए। अपने बेगुनाह होने की बात को दृढ़तापूर्वक सबके समक्ष रखना चाहिए। 
          इसके विपरीत यदि मनुष्य ने गलती की हैं तो उसे गुस्सा करने का हक बिल्कुल नहीं है। तब तो यह चोरी और सीनाजोरी वाली बात हो जाएगी जिसकी सराहना किसी तरह नहीं की जा सकती। उस समय क्षमा याचना करने से उसे परहेज नहीं करना चाहिए। अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने वाला कभी छोटा नहीं हो जाता बल्कि उसे महत्त्व दिया जाता है।
          घर-परिवार के लोग तथा बन्धु-बान्धव सभी यही चाहते हैं कि उनका प्रियजन अपने जीवनकाल में कुछ अच्छा करे। लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वे कभी नहीं चाहते कि उनका वह प्रियजन उनसे बेहतर करें। जहाँ पर वह उनसे आगे बढ़ने लगता है, सभी उसकी टाँग खींचने में लग जाते हैं। उसे नीचा दिखाकर आत्मतुष्टि करते हैं।
            यदि मनुष्य अपने पूर्व निर्धारित दृष्टिकोण में किञ्चित मात्र परिवर्तन कर ले तो उसका काया कल्प सम्भव हो सकता है। इसलिए हर समय को उपयुक्त समय मानते हुए ही मनुष्य को सदा उत्साह और लग्न से अपने दायित्वों का निर्वहण करते रहना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद        

शनिवार, 19 सितंबर 2026

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मकता एक सोच है जो मनुष्य को सबसे अलग-थलग करने में अपनी विशेष भूमिका निभाती है। नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति की पहचान यह है कि उसे हर परिस्थिति में बुराई ही दिखाई देती है। ऐसे लोग लगातार शिकायत करते हैं और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं। 
         नकारात्मक सोच वाले लोग मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा को चूस लेते हैं और आपको हमेशा हताश करते हैं। उनकी लगातार की गई शिकायतें और निराशाजनक बातें सामने वाले के मन में भी बेचैनी पैदा करती हैं। नकारात्मक माहौल में रहने से बड़े लक्ष्यों को हासिल करने का हौसला कमजोर पड़ता है। नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूरी बनाना मानसिक शान्ति और सकारात्मकता के लिए बहुत जरूरी है।
          अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्य पर पहुँचने के लिए यदि मनुष्य कटिबद्ध हो गया हो तो उसे नकारात्मक लोगों की निराशाजनक बातों की ओर कदापि ध्यान नहीं देना चाहिए। उनके सामने उसे बहरा अथवा मूर्ख बन जाने का ढोंग करना चाहिए। उन्हें तब अनदेखा करके उसे अपने लक्ष्य का सन्धान कर लेना चाहिए।
          ये निराशावादी लोग कभी किसी को प्रोत्साहित कर ही नहीं सकते। इनके हर कार्य के साथ किन्तु, परन्तु जुड़ा रहता है। हर कार्य में सफलता या लाभ के विषय में न सोचकर ये हर समय असफलताओं की लम्बी लिस्ट लेकर बैठ जाते हैं। ये लोग हर समय रोते-झींकते रहते हैं। परेशानियों के साथ इनका चोली-दामन का साथ रहता है जिसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि जबरदस्ती गले गलाते हैं।
        इसीलिए न ये स्वयं कोई साहसिक कार्य कर सकते हैं और न किसी दूसरे को करने देना चाहते हैं। सबको  हतोत्साहित करके बस अपने दायित्व को पूरा कर लेते हैं। यही कारण है कि जीवन में सफलता इनके आगे-आगे भागती रहती है और ये उसे पाने के लिए उसके पीछे भरसक दौड़ लगाते रहते हैं। 
        साहसी मनुष्य को चाहिए कि जब भी वह किसी कार्य करने के बारे में ठोस योजना बनाए तब सकारात्मक विचार वाले सज्जनों से परामर्श ले। उनकी मूल्यवान सोच कभी उसे डूबने नहीं देती। वे सदा ऐसी सलाह देते हैं जिससे  दूसरों की उन्नति होती रहती है।
          एक बोध कथा की यहाँ चर्चा करना चाहती हूँ। एक मेंढक ने पेड़ की चोटी पर चढ़ने के विषय में विचार किया और फिर वह आगे बढ़ने लगता है। उसे उस पेड़ पर चढ़ता देखकर बाकी के सारे मेंढक शोर मचाने लगते हैं, "ये असम्भव कार्य है आज तक कोई भी मेंढक पेड़ पर नहीं चढ़ सका। यह नहीं हो सकता है, तुम पेड़ पर नहीं चढ़ पाओगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम लौटकर वापिस आ जाओ।" 
          मेंढक का संकल्प और दृढ़ निश्चय रंग लाया और आखिरकार वह पेड़ की चोटी पर पहुँच ही जाता है। इसका कारण यही है कि वह मेंढक बहरा होता है और अपने साथियों की बात नहीं सुन सका। सारे मेंढकों को चिल्लाते हुए देखकर उसने अपने मन में यही सोचा कि आज वह एक आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक कार्य करने जा रहा है। उसके सभी साथी उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं। इसलिए वह और अधिक जोश से भर जाता है। अन्ततः अथक संघर्ष करते हुए असम्भव कार्य को कर गुजरता है।
          यह बोधकथा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? उसकी संकल्पशक्ति दृढ होनी चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में डाँवाडोल नहीं होनी चाहिए। इस दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वह अनेकानेक साहसिक कार्य कर लेता है। विश्व में हुए सभी चमत्कार इन्हीं सकारात्मक विचारों के कारण सम्भव हो सके।
          ये कार्य कोई भी हो सकते हैं- चाहे आकाश को नापना हो, ग्रह-नक्षत्रों आदि की जानकारी जुटाना हो, ऊँचे पर्वतों का सीना चीरकर सुविधाजनक यातायात के लिए रेल या सड़क मार्ग बनाना हो, समुद्र पर पुल बनाना या जहाज चलाना हो, हिमालय की चढ़ाई करनी हो अथवा फिर खूँखार जंगली जानवरों अपने को वश में करना हो। 
          कैसा भी कठिन या असम्भव कार्य हो वे मानो चुटकी बजाते ही कर लेते हैं। वे मुसीबतों से कभी घबराते नहीं हैं। तभी तो सच्चे पराक्रमी कहलाते हैं। सकारात्मक सोच वाले यही लोग इतिहास रचते हैं और उन हैरतअँगेज कारनामों को आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ती हैं। उनमें से भी कुछ लोग उन्हीं के पदचिह्नों का अनुगमन करते हुए धारा के विपरीत चलते हुए इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
          इसीलिए मनीषियों का सद्परामर्श सभी सकारात्मक सोच वालों के लिए है कि यत्नपूर्वक नकारात्मक सोच वालों से किनारा कर लेना चाहिए। उनके विचारों को सुनने की यदि मजबूरी सामने आ जाए तो उसे अनसुना करते हुए आगे बढ़ते चलो। नकारात्मक विचारों का परित्याग करते हुए, अपनी सोच का दायरा विस्तृत करके उसे सकारात्मक बनाते हुए, दुनिया के साथ कदम ताल करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य 

किसी की आँख में आँख डालकर बात करना बड़े जीवट का काम है। ऐसा वही मनुष्य कर सकता है जो किसी से भी न डरता हो। यह तभी सम्भव हो सकता है जब मनुष्य का मनोबल उच्च हो और उसके पास आत्मिक बल हो। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आत्मिक बल उसी व्यक्ति के पास हो सकता है, जिसके साथ सच्चाई और ईमानदारी होती है।
       सच्चाई और ईमानदारी वे शक्तिशाली नैतिक बल होते हैं जो बड़े-बड़े और अहंकारी साम्राज्यों की नींव को भीतर से खोखला करके हिला देते हैं। साम्राज्य अपनी ताकत, सेना और धन के बल पर चलते हैं। उनके पास नैतिक बल नहीं होता। सच्चाई के आगे सत्ता का अहंकार टिक नहीं सकता। जब कोई व्यक्ति या समाज ईमानदारी और सत्य का मार्ग चुनता है, तो आम जनता में भी साहस आता है। यह सामूहिक एकता किसी भी बड़े शासन को झुकने के लिए मजबूर कर देती है।
        इस सच्चाई की शक्ति से तो बड़े-बड़े साम्राज्य तक हिल जाते हैं। शारीरिक बल न होते हुए भी मनुष्य आत्मिक बल के रहते किसी से भी लोहा ले सकता है। यहाँ हम महात्मा गांधी के जीवन का उदाहरण ले सकते हैं जिन्होंने कृशकाय होते हुए भी अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ली। उनकी एक आवाज पर हजारों लोग अपने सारे काम-काज छोड़कर भागे चले आते थे। विदेशी शासक के अत्याचारों को भी हँसकर सहन करते थे।
          इसी प्रकार के अनेक उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा हुआ है जहाँ केवल आत्मिक बल अथवा सच्चाई की ताकत के कारण लोग शक्तिशालियों से भिड़ गए और उनकी नाक में दम कर दिया।
         झूठ और अन्याय की एक सीमा होती है। जब सच्चाई सामने आ जाती है तो साम्राज्य का पर्दाफाश हो जाता है। ईमानदार आचरण बाहरी डर को समाप्त कर देता है। बिना डर के जीने वाला यह समाज किसी भी दमनकारी व्यवस्था को बदलने में सक्षम हो जाता है। 
        टीवी पर, सोशल मीडिया पर एवं समाचार पत्रों में भी आए दिन ऐसे समाचार देखने, सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं। दृढ़तापूर्वक प्रतिकार करने वालों की कमी नहीं है।
        आम व्यवहार में हम सभी प्रायः इन वाक्यों का प्रयोग करते रहते हैं- 'मेरी आँखों में देखकर बोल', 'नजरें क्यों चुरा रहे हो?', 'हिम्मत है तो नजर मिलाकर बात कर', 'आँखों में आँखें डालकर बात कर' आदि।
        इन सभी वाक्यों से पता चलता है कि कोई व्यक्ति स्वयं कितना ही धोखेबाज, मक्कार, हेराफेरी मास्टर क्यों न हो, उसे हर बात सच्ची ही सुननी होती है बस। असत्य भाषण अथवा अनर्गल प्रलाप कोई नहीं सुनना चाहता। झूठ और फरेब के कारण असामाजिक तत्त्व और आतंकवादी आदि अपने पुराने वफादारों तक को जान से मार देने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। इस विषय पर अनेक फिल्में तथा टीवी सीरियल बने हैं। जिन्हें देखकर इन लोगों का व्यवहार समझा जा सकता है
          कार्यक्षेत्र आदि में भी बॉस चाहता है कि उसके अधीनस्थ सत्य का व्यवहार करें। यदि कोई उसके समक्ष असत्य बोलता है तो वह अपना आपा खो देता है और उल्टा-सीधा बहुत कुछ सुना देता है। इस कृत्य के लिए सरकारी दफ्तरों में मेमो इश्यू कर दिए जाते हैं पर प्राइवेट में तो कर्मचारी को नौकरी से हाथ तक धोना पड़ जाता है। इससे उस व्यक्ति का कैरियर बर्बाद हो जाता है।
          अपने घर में यदि बच्चे बड़ों से किसी भी कारण से सच्चाई छिपाएँ तो उनके साथ डाँट-डपट की जाती है अथवा सजा भी दी जाती है। किन्तु यदि घर के सदस्य एक-दूसरे से पर्देदारी करने लगें तो वह परिवार टूटकर बिखर जाता है। कोई भी व्यक्ति दूसरे का असत्य आचरण सहन नहीं कर पाता।
          मनुष्य की जुबान की बड़ी कीमत होती है। इसकी सच्चाई और ईमानदारी के कारण लाखों करोडों के व्यापार उचन्ती में हो जाते हैं। जहाँ किसी के मन में धोखाधड़ी करने की भावना आ गई, वहाँ पर व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और तब व्यवसाय की साख गिर जाने से व्यापार में हानि होने लगती है।
          मनुष्य की आँखों की चमक से ही ज्ञात हो जाता है कि उसकी बात में कितनी सच्चाई है और कितनी धूर्तता है। उसकी बात विश्वसनीय है अथवा नहीं। ऐसा व्यक्ति किसी से नजर नहीं मिला सकता। बात करते समय वह या तो इधर-उधर देखेगा या नाखून दाँतों से कुतरेगा या पैर के अँगूठे से जमीन खोदेगा या फिर नजरें चुराने का प्रयास करता है अथवा हकलाने लगता है।
        सत्य की शक्ति इतनी अधिक होती है कि सत्यवादी के मुँह से निकलने वाला हर वचन ब्रह्मवाक्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति की बोलते समय न कभी जुबान लड़खड़ाती है और न ही वह किसी से डरता है। सबके सामने सिर उठाकर और दूसरों से आँखें मिलाकर वह बात कर सकता है।  
चन्द्र प्रभा सूद