हर व्यक्ति व स्थान का विशेष महत्त्व
हर व्यक्ति का अथवा हर स्थान विशेष का अपना एक महत्त्व होता है। उनकी पहचान उनके द्वारा किए गए कार्यों से ही बनती है। यदि वहाँ से उन विशेषताओ को हटा दिया जाए तो एक शून्य-सा हो जाता है। इसलिए उन पर ध्यान दिया जाना बहुत आवश्यक होता है।
एक श्लोक का उदाहरण देते हुए इसे जानने का प्रयास करते हैं -
नागो भाति मदेन कं जलरूहैः पूर्णेन्दुना शर्वरी, शीलेन प्रमदा जवेन तुरगो नित्योत्सवैर्मन्दिरम् । वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः, सत्पुत्रेण कुलं नृपेण वसुधा लोकत्रयं विष्णुना।।
अर्थात् गजराज मद से, सरोवर खिले हुए कमलों से, रात्रि पूर्ण चन्द्रमा से, स्त्री चरित्र से, घोड़ा गति से, मन्दिर नित्य के उत्सवों से, वाणी व्याकरण से, नदी हंस के जोड़े से, सभा पण्डितों से, कुल सुपुत्र से, पृथ्वी राजा से और तीनों लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं।
हाथी के शरीर से पसीने के रूप में एक सुगन्धित द्रव्य निकलता है। उसी से हाथी की सुन्दरता होती है। ऐसा कहा जाता है कि सुगन्धित स्राव विशेष रूप से नर हाथियों में परिपक्वता के दौरान सामाजिक संकेत के रूप में कार्य करता है। यह उन्हें अन्य हाथियों के साथ संवाद करने में मदद करता है। हालाँकि स्नान के पश्चात वह मिट्टी में लोटता है। शरीर से मोटे व्यक्ति को प्रायः हाथी कह कर चिढ़ाया जाता है। गजगामिनी कहकर स्त्री की चाल की तुलना हाथी की चाल से की जाती है।
तालाब में कितना भी स्वच्छ जल हो अथवा उसमें बहुत से सुगन्धित द्रव्य डाल दिए जाएँ परन्तु वह आकर्षण का केन्द्र नहीं बन पाता। जहाँ उस तालाब में कमल के फूल दिखाई देंगे, वहीं उसका सौन्दर्य कई गुणा बढ़ जाता है। उसे निहारने के लिए लोग वहाँ पर रुकते हैं। कमल के फूल की शोभा को देखते हैं जो पानी में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहता है। बच्चे, बड़े सभी उसके सौन्दर्य को देखकर प्रसन्नता से विभोर होते हैं।
रात्रि का सौन्दर्य पूर्ण चन्द्रमा से होता है। उस समय चारों ओर अन्धकार का साम्राज्य होता है। रात कितनी भी घनी काली हो, वह मनमोहक नहीं होती। उसे हम दुखों और परेशानियों के रूप में मानते हैं। उससे बचने के लिए उपाय करते रहते हैं शायद इसीलिए बिजली का अविष्कार हो सका। जहाँ पूर्ण चन्द्र का उदय हुआ वहीं वह सब लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। जन साधारण के लिए तो वह सुन्दरता है ही, कवियों और लेखकों का भी प्रेरणा स्त्रोत है। कितनी ही रचनाएँ इसे लक्ष्य बनाकर लिखी गई हैं। पूर्ण चन्द्रमा के उदित होते ही चारों ओर प्रकाश फैल जाता है और सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगता है। बच्चे चन्दा मामा की कहानियॉं सुनते हैं।
पुरुष प्रधान समाज में सदैव स्त्री के सच्चरित्र होने पर बल दिया जाता है। उनका अपना चरित्र कैसा भी हो, स्त्री चरित्र की कसौटी पर परखी जाती है। इसीलिए चरित्र को उसका आभूषण माना जाता है और उसे महत्त्व दिया जाता है। हर व्यक्ति सती सावित्री की कामना करता है। उसे भगवती सीता जैसी पत्नी चाहिए होती है पर वह स्वयं भगवान राम जैसा नहीं बनना चाहता।
घोड़ा अपनी गति से मूल्यवान होता है। घोड़े की गति जितनी अधिक होती है, उतना ही अधिक उसका मूल्य होता है। जिस घोड़े की चाल सुस्त होगी या मरियल होगी, उतना ही उसका मूल्य कम होता है।
मन्दिर या धार्मिक स्थानों पर नित्य उत्सव होते रहें तभी उनकी पहचान होती है। लोग भी तभी वहाँ आते हैं और रौनक रहती है। धार्मिक स्थलों की जीवन्तता बनाए रखने के लिए वहाँ धार्मिक अनुष्ठान अथवा कथा-वार्ता होते रहने चाहिए। तभी लोग उनसे जुड़ते हैं। इससे अपने धर्म की पहचान बनती है। लोगों को अपने धर्म से जोड़े रखने का कार्य मन्दिरों में होने वाले उत्सव करते हैं।
आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करने और अपने धर्म से जोड़ने का यह सशक्त माध्यम होता है। उन्हें तभी अपने धर्म से जोड़ा जा सकता है, जब वे वहाँ श्रद्धा से जाते रहें और वहाँ से उन्हें सदा कुछ-न-कुछ नया मिलता रहे।
वाणी व्याकरण से सुशोभित होती है। यदि व्याकरण का चाबुक वाणी पर न हो तो भाषा अशुद्ध हो जाती है। जिसका जैसा मन करेगा, वह वैसा ही उच्चारण करेगा। इस प्रकार करने से भाषा की गरिमा ही समाप्त हो जाएगी। नदी हंस के जोड़े से सुन्दर लगती है। यदि हंस नदी में किल्लोल करेंगे तो लोग अनायास ही उनकी ओर आकर्षित होंगे। ऐसे नदी की शोभा में चार चॉंद लगा जाऍंगे।
सभा में विद्वान हों तो श्रोताओं को उन्हें सुनने का अवसर मिलेगा। वे उनसे बहुत कुछ सीख सकेंगे। कुल में यदि सुपुत्र का जन्म होता है तो वह कुल को तार देता है। यदि देश में सुयोग्य और प्रजा वत्सल राजा होगा तो देश नित्य प्रति उन्नति करता है। वहॉं प्रजा खुशहाल रहती है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि तीनों ही लोक भगवान विष्णु से सुशोभित होते हैं। ईश्वर की महिमा का जितना भी बखान किया जाए वह कम ही होता है। भगवान विष्णु के अवतारों के विषय में हम जानते हैं। जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ा तब ईश्वर ने किसी भी रूप में आकर धरा का उद्धार किया और धर्म की स्थापना की।
सभी वस्तुओं की उपादेयता उनके गुण और कर्म से होती है। कवि ने हाथी, जल, रात्रि, स्त्री, घोड़े और मन्दिर इन सबके बारे में बहुत ही सुन्दर और मौलिक विचार प्रकट किए हैं। इन सबके बारे में कवि का बहुत समय पहले का यह कथन आज भी उतना ही सत्य है।
चन्द्र प्रभा सूद