बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

मर्यादा का पालन करना आवश्यक

मर्यादा का पालन करना आवश्यक 

स्त्री हो अथवा पुरुष मर्यादा का पालन करना सबके लिए आवश्यक होता है। घर-परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, बच्चों और सेवक आदि सबको अपनी-अपनी मर्यादा में रहना होता है। यदि मर्यादा का पालन न किया जाए तो बवाल उठ खड़ा होता है, तूफान आ जाता है।
        मर्यादा शब्द भगवान श्रीराम के साथ जुड़ा हुआ है। संसार उन्हें आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारता है। उसका कारण है उन्होंने अपने जीवनकाल में पुत्र, पति, भाई, पिता, मित्र और राजा‌ आदि की सभी मर्यादाओं का पालन किया। इसीलिए आजतक उन्हें संसार में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है।
        बच्चे यदि अपनी मर्यादा में न रहें और अनुशासनहीन हो जाएँ, अपने से बड़ों का सम्मान न करें, अपने भाई और बहनों के साथ दुर्व्यवहार करें, मित्रों के साथ अभद्रता करें, जरा-सा क्रोध आने पर घर में तोड़फोड़ करने लगें, हर किसी के साथ बदतमीजी करें, किसी का आदर न करें तो उन्हें कोई भी अच्छा या संस्कारी बच्चा नहीं कहेगा।
        उन्हें बिगडैल बच्चों की श्रेणी में रखा जाएगा। घर-बाहर कहीं भी उन्हें प्यार और मान नहीं मिलेगा। हर ओर से वे दुत्कारे जाते हैं। कोई ऐसे उद्दण्ड बच्चों के साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहता और न ही उन्हें अपने घर में देखकर किसी को प्रसन्नता होती है। माता-पिता अपने बच्चों को इनसे से दूरी बनाकर रखने के लिए कहते हैं। 
        भाई-बहन यदि अपनी मर्यादा भूल जाएँ और एक-दूसरे की भावनाओं को न समझें और परस्पर अमर्यादित व्यवहार करें तो सम्बन्धों में दरार आने लगती है। उनमें अपनेपन की भावना समाप्त हो जाती है। वे जिन्दगी भर एक-दूसरे की शक्ल देखना पसन्द नहीं करते। उनमें जीने-मरने के मानो सारे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं।
        माता-पिता यदि परस्पर अमर्यादित व्यवहार करते हैं यानी सदैव एक-दूसरे से झगड़ा करते हैं, मारपीट करते हैं अथवा बच्चों से पक्षपात करते हैं तो उनका सम्मान उनके अपने बच्चे भी नहीं करते। ऐसे घरों के बच्चे अपने माता-पिता से घृणा करने लगते हैं। वे बस अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के उनसे सम्बन्ध रखते हैं।
         कितनी ही धन-सम्पत्ति उनके पास हो वे उसका सुख नहीं भोग पाते। ऐसे घरों से सुख-शान्ति मुॅंह मोड़कर विदा हो जाती है। घर में हर समय अशान्ति का वातावरण बना रहता है। वहाँ ऐसा लगता है मानो मरघट-सी शान्ति रहती हो। वहॉं घर के सभी सदस्य एक-दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं। मेहमान भी वहॉं आकर सहज नहीं हो पाते।
          पति-पत्नी का अमर्यादित व्यवहार घर का समूल नाश कर देता है। उन दोनों में से किसी का भी विवाहेत्तर सम्बन्ध मान्य नहीं होता। यदि किसी घर में ऐसा हो जाता है तो वहाँ पति-पत्नी में आपसी प्यार समाप्त हो जाता है। उनमें एक-दूसरे के लिए घृणा का भाव पनपने लगता है जो उन्हें एक-दूसरे से दूर कर देता है।
          इसके अतिरिक्त दोनों में से कोई एक झगड़ालू हो, अपने घर-परिवार के रिश्तों को अहमियत न दे तो भी वहाँ मनमुटाव होने लगता है। ऐसे सम्बन्ध लम्बे समय तक नहीं चलते। फिर उनमें अबोलापन आ जाता है। जब सहनशक्ति जवाब दे जाती है तो अन्त में उनमें अलगाव हो जाता है। यह स्थिति किसी के लिए भी कष्टदायक होती है। उनके झगड़ों में निरपराध बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
          चोरी, डकैती, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, इन्सानियत का कत्ल करना आदि भी मर्यादा का पालन न करने के दुष्परिणाम हैं। इन सबसे बढ़कर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध भी मर्यादा हीनता की श्रेणी में आते हैं। ये किसी भी सभ्भ समाज के लिए ये कोड़ के समान होते हैं।
          एक नदी जब अपने तटबन्धों को तोड़कर मर्यादाहीन हो जाती है तो उसका नुकसान जनमानस को भुगतना पड़ता है। भयंकर बाढ़ आती है और चारों ओर जल-थल हो जाता है। गाँव के गाँव और शहर नष्ट हो जाते हैं। चारों ओर हाहाकार मच जाता है। कितनी ही धन-सम्पत्ति, जान और माल की हानि होती है।
          इसी प्रकार समुद्र जब अपनी हदों को छोड़कर पानी को बहुत ऊपर उछालने लगता है तब वहाँ पर विद्यमान बड़े-बड़े जहाज डूब जाते हैं और अनिर्वर्णनीय क्षति होती है। उसके पास रहने वाले जनमानस को भी त्रासदी झेलनी पड़ती है।
        चाहे मनुष्य हो अथवा प्रकृति सभी को अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करना होता है। जहाँ मर्यादा का उल्लंघन किया जाता है वहीं विनाश का ताण्डव हो जाता है। इसलिए किसी को भी मर्यादा की सीमा रेखा को पार नहीं करना चाहिए। यही स्थिति प्रशंसनीय होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

जीने के लिए सहारा खोजना व्यर्थ

अपना जीवन जीने के लिए आखिर किसी दूसरे के सहारे की कल्पना करना व्यर्थ है। किसी अन्य को बैसाखी बनाकर कब तक चला जा सकता है? दूसरों का मुँह ताकने वाले व्यक्ति को एक दिन धोखा खाकर, लड़खड़ाकर गिर जाना पड़ता है। उस समय उसके लिए सम्हलना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए किसी सहारे को खोजने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए।
         मनुष्य का वास्तविक सहारा उसका उसके अन्तस् में विद्यमान होता है। जब वह बैसाखियों के भरोसे चलना आरम्भ करते है तो उसके अपने पैर अपनी ताकत खो देते हैं। आत्मनिर्भरता ही जीवन का असली आधार है। इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए।
         दूसरों से सहारे की उम्मीद करने से सदा मानसिक निर्भरता बन जाती है। अन्तत:  निराशा ही मनुष्य के हाथ लगती है। समय और परिस्थितियॉं कभी एक जैसी नहीं रहतीं, हमेशा बदलती हैं। इसलिए बाहरी सहारे कभी भी स्थायी नहीं हो सकते। दूसरों पर निर्भर होने पर मनुष्य अपनी क्षमताओं को पहचानना भूल जाता है। जीवन के सबसे कठिन दौर में अपना हौंसला और धैर्य ही व्यक्ति का  सबसे बड़ा साथी बनते हैं।
          बचपन की बात अलग कही जा सकती है। उस समय बच्चा सदा माता-पिता की अँगुली थामकर चलता है। वह उनके बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। उनकी नजरों से ही बच्चा इस दुनिया को देखने और समझने की कोशिश करता है। उस समय यदि वह उनका हाथ छोड़ दें तो वह लड़खड़ाकर गिर सकता है।
          बड़ा होने पर जब वह योग्य बनकर इस संसार सागर में तैरने के लायक हो जाता है तब उसे मजबूत और स्वावलम्बी बन जाना चाहिए। उस समय मनुष्य को किसी के भी कन्धे को बैसाखी बनाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। उसे स्वावलम्बी बनकर, अपने ऊपर पूरी तरह से विश्वास रखना चाहिए।
        यह सत्य है कि एक लता बहुत नाजुक और कमजोर होती है। उसे किसी सहारे की आवश्यकता होती है, तभी वह फलती फूलती है। इसीलिए उसे अपनी सुरक्षा के लिए किसी मजबूत वृक्ष का सहारा लेना पड़ता है।
          मनुष्य को यह बात हमेशा ही याद रखनी चाहिए कि जो बेल बड़े वृक्ष का सहारा लेकर बहुत इतराती फिरती है और समझती है कि उसमेँ आकाश छूने की सामर्थ्य आ गई है तो वह गलत सोचती है। वृक्ष के कटते ही वह धड़ाम से जमीन पर औंधे मुँह गिर जाती है। फिर उसे मुँह की खानी पड़ जाती है। तब उसे सहारा देने के लिए कोई नहीं आता। उसकी सहायता कोई नहीं करता। 
            परावलम्बी मनुष्य स्वयं को बहुत कमजोर समझता है। वह कभी भी अपने जीवन में सिर उठाकर नहीं चल पाता। उसे हमेशा यही लगता है कि वह अपने जीवन में अकेले या बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता। इसलिए वह ऐसे व्यक्ति की तलाश करता रहता है जो उसका सहारा बन सके और हाथ पकड़कर, थामकर उसे आगे ले जाए। ऐसे मनुष्य को यदा कदा अपमान का कड़वा घूँट पीना ही पड़ता है। 
          जिसे वह अपना सब कुछ मान लेता है, जिसका मुँह ताकता है, जिसके निर्देश के बिना वह एक कदम भी नहीं चलता, वही समय आने पर उसे उसकी औकात बता देता है। उस समय वह स्वयं को बहुत ही असहाय और बौना महसूस करता है। अपनी कल्पना के विपरीत मिले आघात को सहन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। 
            ऐसी दुखद स्थितियों से बचने के लिए मनुष्य में आत्मविश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। मनुष्य को यथासम्भव अपने विवेक पर भरोसा करना चाहिए उसे यत्नपूर्वक अपना मानसिक और आत्मिक बल बढ़ाना चाहिए। तभी वह इन दुखदायी स्थितियों से बच सकने में सफल हो सकता है।
          जब तक मनुष्य अपने में साहस नहीं जुटा पाता और दूसरों की ओर देखना नहीं छोड़ता तब तक उसका हृदय चकनाचूर होता ही रहता है। उसका स्वाभिमान आहत होता रहता है। हर कोई उसे दो बात सुनाकर चल देता है। वह बेचारा बना हुआ असहाय-सा देखता रह जाता है।
          किसी का सहारा लेने वाले व्यक्ति को सहारा देने वाला धीरे-धीरे अपना गुलाम ही समझने लगता है। वह चाहता है कि उसका सहारा लेने वाला उसे खुदा समझे। उसकी हर सही-गलत बात पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाए। उसके हर कथन को ब्रह्मवाक्य माने। उसकी इच्छा से सोए, जागे और अपने सारे कार्य करे। यानी बिना मोल के अपनी गुलामी उसके नाम लिख दे।
          यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार न चलना चाहे तो उससे सम्बन्ध विच्छेद करने की धमकी देता है। ऐसे में वह बेचारा घबराकर उसका साथ पाने के लिए उपाय करने लगता है।
          उचित यही है कि मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए। अपने अन्तस् की शक्ति को पहचानना चाहिए। किसी का सहारा लेने से बचना चाहिए ताकि उसे जीवन में कभी असफलता का मुँह न देखना पड़े। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

सन्तान से हारने के स्थान पर योग्य बनाऍं

सन्तान से हारने के स्थान पर योग्य बनाऍं

प्रत्येक मनुष्य में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह सम्पूर्ण जगत को जीत सकता है। सारे संसार पर आसानी से अपनी धाक जमा सकने वाला मजबूत इन्सान भी अपनी औलाद से हार जाता है। उसके समक्ष वह बेबस हो जाता है। 
          यहाँ प्रश्न यह उठता है कि सर्वसमर्थ होते हुए भी आखिर मनुष्य अपनी सन्तान के समक्ष क्यों हथियार डाल देता है? इसका कारण क्या है?
        सन्तान के प्रति होने वाला उसका अन्धा मोह ही इसका प्रमुख कारण होता है। उसकी ममता उसे झुकने के लिए विवश कर देती है और न चाहते भी हार मानकर वह अपने घुटने टेक देता है।
          रामायण काल में पुत्रमोह में अन्धी हुई कैकेयी ने भरत को राज्य दिलाने के विषय में विचार किया। अपनी योजना को साकार करने के लिए उसने महाराज दशरथ से भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का बनवास मॉंगा और अपने पुत्र को राजा बनाने पर बल दिया। उस समय भगवान श्रीराम भगवती सीता और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वन में चले गए। इस सबसे दुखी राजा दशरथ की मृत्यु जैसा जघन्य अपराध हो गया।
         महाभारत काल में पुत्रमोह में अन्धे हुए महाराज धृतराष्ट्र ने अपने मृत भाई पाण्डु के बच्चों का हक मार लिया। अपने पुत्र दुर्योधन को उन्होंने राज्य सौंपा। फलस्वरूप महाभारत जैसा भीषण युद्ध हुआ जिसने उस काल में तबाही मचा दी। अनेक महारथी व विद्वान इस युद्ध की भेंट चढ़ गए। आज भी हम उस विभीषिका के विषय में पढ़कर दुखी हो जाते हैं।
        राजा अकबर ने अपने बेटे सलीम के हठ के कारण हार मान ली थी। कहीं माता और कहीं पिता ने लाचार होकर दूसरों का हक छीना। इस प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास के पन्नों में कैद हैं। बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
        आज भी समाचार पत्रों, टी वी चैनलों और सोशल मीडिया पर ऐसे समाचार देखने और सुनने को मिलते रहते हैं जहाँ उच्च पदासीन अफसरों, नेताओं और बड़े-बड़े व्यापारियों के बच्चे चोरी, डकैती, कार चोरी, स्मगलिंग, हेराफेरी, मर्डर, बलात्कार आदि गलत कार्य करते हुए पकड़े जाते हैं। उस स्थिति में भी उनके माता-पिता उनके मोह के कारण उन्हें बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं और पानी की तरह पैसा बहाते हैं। यद्यपि उन लोगों को अपने बच्चों को संस्कारित करके समाज में एक आदर्श स्थापित करना चाहिए परन्तु होता इसके विपरीत होता है।
          बचपन में एक घटना सुनी थी कि एक चोर था। जब वह पकड़ा गया तो उसे न्यायाधीश ने सजा सुनाई और जेल में भेज दिया। परेशानियों का सामना करते हुए एक दिन उसकी माँ उसे मिलने के लिए वहाँ जेल में गई। अपने बेटे को उस स्थिति में देखटर उस माँ का कलेजा काँप गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए।
        जेल में जब माँ-बेटे की बातचीत हो रही थी तो उस चोर ने अपनी माँ को अपने बहुत करीब आने के लिए कहा। माँ ने सोचा कि बेटा उदास हो रहा है और उसके गले लगाना चाहता है। वह बेटे के एकदम पास जाती है। उसी समय बेटे ने माँ का कान काट लिया। सिपाही ने उसे मारते हुए उस कुकृत्य के विषय में उससे पूछा।
        उसके उत्तर ने सबको हैरान कर दिया। उसने कहा, "बचपन में जब मैं कुछ चुराकर लाता था तो मेरी माँ ने कभी मना नहीं किया। यदि पहली बार चोरी करने पर मुझे माँ ने दो तमाचे लगाकर चोरी वाला सामान लौटाने के लिए कहा होता तो आज 
मेरी यह स्थिति न होती। मैं जेल की सलाखों के पीछे कैद न होता।"
        यह कथा यही समझा रही है कि अनावश्यक लाड़-प्यार करके माता-पिता बच्चों को बिगाड़ देते हैं। उनकी जायज-नाजायज सारी माँगे पूरी करके उन्हें हठी बना देते हैं। जब ये बच्चे उनके हाथ से निकल जाते हैं और समाज में उनके कारण शर्मिंदा होना पड़ता है तो उन्हें कोसते हैं। तब कहते हैं ऐसी औलाद के होने से अच्छा था कि वे निस्सन्तान रह जाते। बड़े अफसोस की बात है कि उस समय भी उन्हें अपनी गलती समझ नहीं आती।
         बच्चों को सही-गलत का अन्तर बताना माता-पिता का कर्तव्य होता है। वे अपनी रोजी-रोटी कमाने में व्यस्त रहते हैं, अपने में मस्त रहते हैं, पार्टियाँ करते रहते हैं पर बच्चों को समय नहीं दे पाते। यदि बच्चों को समय रहते पास बिठाकर संस्कार दिए जाएँ तो ऐसी अनहोनी घटनाओं से बचा जा सकता है। 
         बच्चे बहुत भोले होते हैं। वे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। उन्हें जैसा भी चाहो आकार दिया जा सकता है। उन्हें समय रहते संस्कार देने चाहिए। अपने बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं। उनके अतिमोह में पढ़कर माता-पिता को उनका भविष्य चौपट नहीं करना चाहिए। सन्तान से हारने के स्थान पर उन्हें इतना योग्य बनाना चाहिए कि वे समाज के लिए एक अमूल्य खजाना बन जाएँ, न की दुनिया पर बोझ बन जाऍं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

हॅंसते चेहरे के पीछे भी गम

हँसते चेहरे के पीछे भी गम

किसी व्यक्ति के हँसते-मुस्कुराते हुए चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कदापि उचित नहीं है कि उसे अपने जीवन में कोई गम नहीं है अथवा कष्ट या परेशानी नहीं है। इसके विपरीत यह सोचना अधिक समीचीन होता है कि उसमें सहन करने की शक्ति दूसरों से कुछ अधिक है। वह मानसिक रूप से इतना सक्षम है, तभी वह अपनी असहाय अवस्था को सहजता‌ से छिपा पा रहा है। 
        पता नहीं अपनी कितनी मजबूरियों और परेशानियों को अपने सीने में छिपाकर कोई व्यक्ति दूसरों के चेहरे पर हँसी ला पाता है। ऐसे साहसी लोग इस दुनिया में बहुत कम मिलते हैं। 
        प्रायः लोग यही सोचते हैं कि जिसके पास भी वे बैठें, वह उनके दुखों की दास्तान को दत्तचित्त होकर सुने और अपनी सहानुभूति उसके लिए प्रकट करे। उसे यह पता चलना चाहिए कि उसका वह साथी मनुष्य कितनी पीड़ा भोग रहा है।
        वह अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों से सताया हुआ है। उसे नौकरी या व्यापार में बहुत बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वह धन की कमी या अस्वस्थता के कारण हताश है, जीवन से निराश है। इन सबसे बढ़कर उसे किसी अपने से सदा के लिए बिछुड़ जाने का दर्द है।
          यह सब सोचते समय मनुष्य भूल जाता है कि हर मनुष्य किसी-न-किसी पीड़ा से गुजर रहा होता है। किसी के पास उसके दुखों-परेशानियों पर मलहम लगाने का समय नहीं है। इस मँहगाई के चलते सभी लोग अपने जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास समय का अभाव रहता है। आज हर इन्सान को जीवन जीने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है अन्यथा वह जीवन की रेस में पिछड़ जाता है।
      अपने हिस्से के दुखों, तकलीफों और परेशानियों को मनुष्य को स्वयं ही भोगना पड़ता है। कोई भी उन्हें उसके साथ भोगते हुए साझा नहीं कर सकता। जिन लोगों को वह अपना हमदर्द समझता है, वह उनसे ही अपने दुख और तकलीफ साझा करने का यत्न करता है।
        पहली बात तो यह है कि कोई उसकी बात को ध्यान से सुनना ही नहीं चाहता। दूसरी बात यह है कि कोई सुनता है और प्रत्यक्ष में सहानुभूति का प्रदर्शन करता है तो पीठ पीछे उसकी छिछालेदार करने का अवसर तलाशता है। नमक-मिर्च लगाकर, बढ़ा-चढ़ाकर और चटखारे लेकर सबके सामने उसका उपहास करता है। जहाँ तक हो सके अपने दुख और अपनी परेशानियों को अपने हृदय में ही समेट लेना चाहिए। 
        यहाँ हम सर्कस के जोकर की चर्चा कर सकते हैं। वह बहुत ही सफाई से अपने जीवन की परेशानियों को अपने अन्तस् में दफन कर देता है। जब वह स्टेज पर आता है तो अपनी अदाओं से सबको हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देता है। किसी को भी उसके जीवन के दुखों और कष्टों का भान ही नहीं हो पाता। जोकर के इस व्यवहार को हम उसकी कलाकारी कह सकते हैं।
    एक गुमनाम-सी जिन्दगी जीता हुआ जोकर सबको खुश करने का भरसक प्रयास करता है। वहाँ सर्कस में बैठे हुए वे लोग उसके मसखरेपन का आनन्द लेते हैं। वहाँ से बाहर निकलकर दो-चार मिनट उसके बारे में बात करते हैं। उसके बाद अपने-अपने कामों में व्यस्त होकर उसे भूल जाते हैं। फिर उन्हें उसका परिश्रम भूल जाता हैं।
        जोकर की तरह यदि मनुष्य अपने अन्तस् में अपनी सारी व्यथाओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मान ले तो उसे किसी के सामने उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती। मनुष्य स्वयं ही उन पर विचार करता हुआ उनसे बाहर निकलने का मार्ग खोज लेता है।
        मनुष्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि चन्द्रमा को भी अमावस्या का दंश झेलना पड़ता है। सूर्य को ताप से जलना पड़ता है। दिन को अन्धेरे से मुक्त होने के लिए संघर्ष करना होता है। सोने को खरा बनने के लिए आग में तपना पड़ता है। इससे भी बढ़कर सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहण का दोष भी झेलना पड़ता है।
        संसार में हितचिन्तक बहुत कम हैं। अधिकतर लोग दूसरों का मजाक बनाने में लगे रहते हैं। यही उनका मनोरंजन होता है। इसलिए वे ऐसे अवसर की तलाश करते रहते हैं और अपना शिकार ढूँढते ही लेते हैं। ऐसे लोगों को पहचानाने की कोशिश करनी चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो उनसे किनारा करना ही श्रेयस्कर होता है।
          सज्जनों की सगति, स्वाध्याय और ईश्वर की उपासना से मनुष्य कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी नहीं हारता। उसे अपने कष्ट भी फूल की तरह लगने लगते हैं। हँसने वाले के सभी मीत बनते हैं और बिसूरते रहने वाले से किनारा कर लेते हैं। उसे स्वयं ही भान हो जाता है कि सदा फूलों की तरह मुस्कुराने और खुशियों की सुगन्ध चारों ओर बिखेरनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

अपने बाहूबल पर भरोसा रखिए

अपने बाहूबल पर भरोसा रखिए 

मनुष्य को अपने बाहूबल पर पूरा भरोसा होना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास होगा तो वह किसी भी तूफान का सामना बिना डरे या बिना घबराए कर सकता है। वैसे तो ईश्वर मनुष्य को वही देता है जो उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उसके भाग्य में लिखा होता है। परन्तु फिर भी जो व्यक्ति स्वयं ही अपनी शक्ति पर भरोसा करता है, ईश्वर देर-सवेर उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके मालामाल कर देता है।
        अपने बाहूबल यानी शारीरिक और मानसिक शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। इसका अर्थ होता है अपनी क्षमताओं, अपने परिश्रम और अपने आत्मविश्वास पर अटूट भरोसा करना। स्वयं पर यकीन रखने से मनुष्य का मन मजबूत होता है और कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है। दूसरों से आशा रखने के स्थान पर‌ स्वयं प्रयास करने से असफलता का डर कम होता है। यह यत्न व्यक्ति को जीवन की हर चुनौती का डटकर सामना करने की शक्ति देता है।
          मनुष्य यदि थक-हारकर बैठ जाए अथवा रोता रहे तो न उसका भाग्य बदल सकता है और न ही उसका जीवन सफल हो सकता है। उद्यम तो उसे करना ही होता है। जिस प्रकार ताश के पत्तों से कभी घर नहीं बनाया जा सकता। उसी प्रकार अनावश्यक प्रलाप करने या शेखचिल्ली की तरह मात्र दिवास्वप्न देखने से जीवन में कभी उन्नति नहीं की जा सकती।
          दुनिया को जीतने का हौंसला रखने वाले अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते। वे साहसी अपने विवेक का सहारा लेते हुए शेर की तरह अकेले ही दुनिया में आगे कदम बढ़ाते रहते हैं। यद्यपि एक बार असफल हो जाने पर यह दुनिया समाप्त नहीं हो जाती और न ही कोई मनुष्य हमेशा के लिए हार जाता है। इसी प्रकार एक बार अपने जीवन में सफल हो जाने वाले को सदा के लिए ही विजयी नहीं माना जाता। 
          मानव जीवन में हार-जीत अथवा सफलता-असफलता का चक्र हमेशा चलता रहता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि असफल हो जाने पर मनुष्य सदा के लिए जीवन की बाजी हार गया है। अथवा एक बार उसे सफलता मिल गई तो उसने जीवन में सभी ऊँचाइयों को सदा के लिए छू लिया है।
          युद्ध यदि मात्र दिखावे के लिए भी हो अथवा सफलता निश्चित हो तो कायर-से-कायर व्यक्ति भी उसे लड़कर जीत जाता है। फिर वह विजयी होने का झूठा दम्भ भर सकता है और असत्य ही सही, सिर ऊँचा उठाकर चलने का साहस कर सकता है।
         साहसी व्यक्ति वही होता है जो असफलता निश्चित होने पर भी युद्ध के मैदान में डटा रहता है, अपनी पीठ दिखाकर नहीं भागता और किसी भी परिस्थिति में वह अपने धैर्य का दामन नहीं छोड़ता। 
          कहने का तात्पर्य यही है कि हारने के डर से आगे बढ़ा हुआ कदम पीछे खींच लेने वाला मनुष्य तो मानो बिना लड़े ही युद्ध हार जाता है। ऐसा कापुरुष समाज में हमेशा तिरस्कार का पात्र बनता है। कितनी भी विशेषताएँ उसमेँ विद्यमान हों फिर भी कायरता के कारण उसे सम्माननीय स्थान नहीं मिलता। हर कोई उसे हिकारत की नजर से देखता है।
        शारीरिक शक्ति के न होने पर भी जो मानसिक बल से सशक्त होते हैं वे किसी से भी भिड़ जाते हैं और सफल हो जाते हैं। शरीरिक बल हो पर व्यक्ति मन से सामना करने के लिए तैयार न हो तो सफलता सन्दिग्ध होती है। इसलिए ऋषि-मुनि ईश्वर से सदा मानसिक बल प्रदान करने के लिए प्रार्थना करते हैं। 
          आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए मनुष्य को अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए अपनी छोटी-छोटी सफलताओं को मान्यता देनी चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। यह बात अपने मन में अच्छी तरह बिठा लेनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता। अतः अपनी गलतियों और कमजोरियों को खुले मन से स्वीकार करेना चाहिए। अपने अन्तस् की नकारात्मकता को दूर करके सकारात्मकता को अपनाना चाहिए।
          मन के मजबूत होने पर इन्सान हर प्रकार की चुनौतियों को ललकार सकता है। ऐसा मनुष्य किसी भी व्यक्ति के समक्ष अथवा कैसी भी परिस्थिति हो अडिग रहता है। ऐसे उच्च मनस्थिति वाले साहसी ही चमत्कार करते हैं। यही लोग दुनिया में अग्रणी रहते हैं। समाज को दिशा-निर्देश देते हैं। लोग इनका अनुकरण करके गौरव का अनुभव करते हैं।
            मनुष्य को सदा साहसिक कदम उठाना चाहिए। उसे अपना आत्मविश्वास किसी भी मूल्य पर नहीं खोना चाहिए। जहाँ तक हो सके माँ को बचपन से ही बच्चे को स्वावलम्बी बनाना चाहिए। उसके मन में किसी प्रकार का डर हावी नहीं होने देना चाहिए। यदि बचपन से ही मन में डर घर कर जाए तो इन्सान आयु पर्यन्त साहसिक कार्य नहीं कर सकता।
        मनुष्य को जीवन की चुनौतियों के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए बल्कि उससे टक्कर लेकर उसे मात देनी चाहिए। अपने मनोबल को बढ़ाने के लिए वीरों की गाथाएँ पढ़नी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

इन्सानियत से उठता विश्वास

इन्सानियत से उठता विश्वास

इन्सानियत से दिन-प्रतिदिन मनुष्य का विश्वास उठता जा रहा है। संसार में प्रायः लोग अपना हित साधने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए वे आज संवेदना शून्य होते जा रहे हैं। उनकी यह प्रवृत्ति निस्सन्देह समाज में चिन्ता का विषय बनती जा रही है। माना जाता है कि जिस व्यक्ति में संवेदना नहीं है, वह तो मृतप्राय होता है। 
         समाज में लगातार घटने वाली अमानवीय और हिंसक घटनाओं को देखते हुए इन्सानियत से जनमानस का विश्वास उठता जा रहा है। अपनों और करीबी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले धोखे और व्यक्ति का बढ़ता हुआ अकेलापन भी इसके लिए जिम्मेदार है। टीवी चैनल सारा दिन इन नकारात्मक समाचारों को बार-बार दिखाते रहते हैं। समाचारपत्रों में भी इन समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। सोशल मीडिया भी इस रेस में पीछे नहीं है। इस कारण समाज की एकतरफा और डरावनी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है।
          ऐसे मनुष्य को लोग पत्थर दिल इन्सान कहते हैं यानी वे समाज में क्रूर कहे जाते हैं क्योंकि उनके सीने में दिल नाम की चीज नहीं होती। वे पत्थर की तरह कठोर माने जाते हैं। उनके हृदय में दया, ममता, करुणा और सहृदयता आदि गुण बिल्कुल नहीं होते। 
          कुछ समय से संसार के कितने ही देश युद्ध की विभीषिका से झुलस रहे हैं। न जाने कितने ही निर्दोष लोग काल कवलित हो रहे हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि हो रही है। पता नहीं कब इस सबका अन्त होगा, कहा नहीं जा सकता।
          आज के समय में चारों तरफ फैली हिंसा, स्वार्थ और अपराध की घटनाओं को देखकर कई बार इन्सानियत पर से विश्वास उठने लगता है। इस श्रेणी में आतंकवादी, चोर, डाकू, समाज विरोधी गतिविधियाँ करने वाले नृशंस लोग आते हैं। इसलिए कोई भी इनके सामने नहीं आना चाहता। लोग उनसे भयभीत रहते हैं और उनके साथ सम्बन्ध बनाने में रुचि नहीं रखते।
          सत्य यही है कि कुछ बुरे लोगों या घटनाओं से पूरी इन्सानियत खत्म नहीं होती। आज भी संकट के समय लोग बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद के लिए आगे आते हैं। दुनिया में नेकी, प्यार और करुणा आज भी जीवित है, जो इस समाज को थामे हुए है। इन्हीं लोगों के कारण संसार बचा हुआ है। बुरे लोग संख्या में कम होते हैं परन्तु उनका शोर अधिक होता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि इन्सानियत समाप्त हो गई है।
          आज लोग ईश्वर की भक्ति भी अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। जो दाता सदा सबके लिए अपने भण्डार खोले बैठा रहता है, उससे अपना काम करवाने के लिए, उसे रिश्वत देने का असफल प्रयास करते हैं। मनुष्य को जब कुछ चाहिए होता है अथवा कष्ट-परेशानी में होता है तो वह मालिक से प्रार्थना करता है परन्तु फिर बाद में उसे भूल जाता है। 
        कहा जाता है कि पत्थर की मूर्तियों को लोग इसीलिए पूजने लगे हैं क्योंकि आज विश्वास करने लायक इन्सान बहुत कम मिलते है। यह सत्य है कि पत्थर से यदि प्रहार किया जाए तो वह सामने आने वाले सबको समान रूप से चोट पहुँचाता है अर्थात् घायल कर देता है। 
        पत्थर की यही तारीफ है कि कुछ भी उपाय कर लो वह पिघलता नहीं है। उसकी अन्य विशेषता यह भी है कि वह स्वयं कभी नहीं बदलता। उसे आकार विशेष देने के लिए मूर्तिकार को अथक प्रयास करना पड़ता है।
          पत्थर को जिस प्रकार सधे हुए हाथ तराशते हैं तो वे उसमें मानो प्राण डाल देते हैं। उसे मनचाहा आकार देने में कलाकार समर्थ होते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की संगति और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से मनुष्य को भी मनचाहा आकार दिया जा सकता है। 
          सुप्रसिद्ध रामचरित के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि (रत्नाकर डाकू ) और बौद्धधर्म के सन्यासी (अंगुलिमाल डाकू) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण कहे जा सकते हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास की खोज करने पर मिल जाएँगे।
          मनुष्य में जब तक मानवोचित गुणों का समावेश नहीं होता तब तक उसका कद ऊँचा नहीं होता। इन्सानियत से ही इन्सान का कद बढ़ता है केवल चौखटों की ऊँचाई बढ़ा लेने से कुछ नहीं होता। मनुष्य की महानता का बखान तभी होता है जब वह मानवता की भलाई के लिए कार्य करता है। अन्यथा उसे भूल जाने में इस जमाने को बिल्कुल भी समय नहीं लगता।
          इस संसार में इन्सान सब कुछ बन सकता है, दुनिया के सारे कार्य-व्यवहार कर सकता है किन्तु एक सच्चा इन्सान बनना वास्तव में उसके लिए सबसे कठिन कार्य होता है। इस ओर उसे प्रयास करना चाहिए।
          मनुष्य अपने इस जीवन में यदि सफलता की बुलन्दियों को छू लेता है तो उसे सबके साथ विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। तभी वह लम्बे समय तक उस स्थान पर बना रह सकता है। उसे सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि समाज में इस पद को पाने के लिए उसे कितना संघर्ष करना पड़ता है। 
        परन्तु इसके विपरीत यदि वह उस मुकाम पर पहुँचने के बाद इन्सानियत को भूलकर अहंकारी अथवा स्वार्थी हो जाता है तो शीघ्र ही सबकी आँखों की किरकिरी बन जाता है। तब उसे पटकनी देने के लिए बहुत लोग तैयार हो जाते हैं। यथा सम्भव प्रयास यही करना चाहिए कि इन्सान कभी अपनी इन्सानियत को न छोड़े।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

जिन्दगी का गणित बहुत ही‌ विचित्र

जिन्दगी का गणित बहुत ही विचित्र

मनुष्य की जिन्दगी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वह किसके लिए जी रहा है? यद्यपि वह स्वयं और अपने परिवार की खुशहाली के लिए अपनी सारी ताकत झौंक देता है तथापि सारी आयु इस सत्य से अनजान रहता है कि उसके लिए कौन जी रहा है? उसकी असली ताकत कौन लोग हैं?
        जिन्दगी कदम-कदम पर मनुष्य की कड़ी परीक्षा लेती है। इस परीक्षा में उसे नम्बर तो नहीं मिलते पर उसमें उसका उत्तीर्ण होना आवश्यक होता है। उस समय उसे अनेक प्रकार के कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लोग यदि सच्चे मन से उस परमात्मा को याद करते रहें तो यह निश्चित है कि वे जीवन की कठोर परीक्षा में अवश्य पास हो जाता है।
          इस धरती पर कोई भी ऐसा इन्सान नहीं है जिसे किसी समस्या से दो-चार न होना पड़े। इसी तरह इस पृथ्वी पर कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न किया जा सके। मनुष्य को समस्या के बारे में सोचते रहने पर बहुत से अनावश्यक बहाने मिल जाते हैं। इसके विपरीत इसके समाधान पर विमर्श करने से कोई-न-कोई हल अवश्य निकल आता है। 
          जीवन का मार्ग बहुत ही कठिन है, काँटों से भरा हुआ है। इसे सरल नहीं बनाया जा सकता। परन्तु स्वयं को मजबूत बना लेने से मनुष्य को उसका सामना करने की शक्ति मिलती है। जिन्दगी में ऐसा समय कम ही आता है जिसे हम बहुत अच्छा (golden period) कह सकते हैं। समय को अपने अनथक प्रयास व परिश्रम से अपने अनुकूल बनाना पड़ता है।
          जब मनुष्य जीवन में संघर्ष के पथ पर चल रहा होता है, उस समय वह निपट अकेला होता है। जब उसे सफलता मिलती है तब बहुत से लोग उसके साथ चलने लगते हैं। वह उनका आदर्श बन जाता है। परन्तु जब उसे मूर्ख समझकर संसार उस पर हँसने लगता है तब वह हिम्मत करके चमत्कार करता है और नए इतिहास की रचना करता है। ऐसे बहुत से लोगों के उदाहरण इतिहास के पन्नों में छिपे हुए हैं। उन्हें खोजना आवश्यक है।
        इस जिन्दगी का गणित बहुत ही विचित्र है। जितना हो सके अपने व्यवहार से मित्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए और शत्रुओं को कम करना चाहिए। अपने दुखों को दूर करने के लिए दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने पर मनुष्य को मानसिक सुख और शान्ति मिलती है। इस प्रकार परोपकार के कार्य करके वह अपने अच्छे समय का भी सदुपयोग कर सकता है। समाज में अपना सम्माननीय स्थान बना सकता है।
        यथासम्भव अपने अहंकार को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से मनुष्य को अपनों का प्यार और सहारा मिलता है। यही उसकी पूॅंजी होते हैं। इससे उसका शेष जीवन बड़ी सुविधा से व्यतीत होता है।
          मनुष्य की यह जिन्दगी दो पल की है अर्थात् कुछ ही समय के लिए उसे यह जीवन मिला है। इसलिए उसे कोशिश यही करनी चाहिए कि वह कुछ ऐसे कार्य अपने जीवन में कर जाए जिससे फूलों की तरह उसकी सुगन्ध चारों ओर बिखरती रहे। लोग उसके इस संसार से चले जाने के बाद भी उसे याद करते रहें। समस्या यह है कि मनुष्य जब जीना आरम्भ करता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उस समय वह अपने करणीय कार्यों को चाहकर भी पूर्ण नहीं कर पाता।
        मनुष्य को अपने रिश्तों को मोतियों की तरह सदा सहेजकर रखना चाहिए। यदि कोई सम्बन्धी रूठकर अलग हो जाए तो उसे मनाकर अपने करीब लेकर आना चाहिए। उनके किसी भी व्यवहार से मनुष्य को अपनी शान्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। इन्सान दुनिया से लड़ सकता है पर अपनों से नहीं। इसका कारण है कि अपनों से उसे होड़ नहीं लगानी होती बल्कि उनके साथ अपना जीवन बिताना होता है। रिश्तों की डोर गलतफहमी होने के कारण कमजोर पड़ती है।
        जिन्दगी में भी तूफान की सी हलचल मचाने दुख, कष्ट, परेशानियाँ आदि आते रहते हैं। इनका आना भी जरूरी है, नहीं तो एक ही ढर्रे पर जीवन को सीधा-सीधा चलता हुआ इन्सान उकता जआता है। इसी समय यह पहचान हो पाती है कि कौन हाथ छुड़ाकर भागता है और कौन हाथ पकड़कर चलता है। यानी कौन अपना है, कौन अपनेपन का दिखावा कर रहा है और कौन पराया है। जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो मनुष्य को लाभ तो नहीं पहुँचाते पर अपने साथ से उसे अमीर अवश्य बना देते हैं।
          जीवन जीने के लिए अपनों का साथ और सच्चे सहयोगियों की आवश्यकता होती है। प्रयास यही करना चाहिए कि हितचिन्तकों को अपने से दूर न किया जाए और अपने मित्रों की सूची बड़ी करते हुए अपने शत्रुओं को भी अपना प्रिय बना लिया जाए। 
       शब्द शब्द से ज़िन्दगी को जोड़ते चले जाने से एक दिन किनारा मिल ही जाता है। रास्ता कठिन अवश्य है और चुभन भी असहनीय होती है । अपनी कदमो का इस्तेमाल करते हुए मनुष्य इस भाव सागर को पार कर ही जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद