बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

कर्मफल का‌ विधान

कर्मफल का विधान 

मनुष्य किसी भी समय खाली नहीं बैठ सकता। वह कुछ-न-कुछ करता रहता है। उनमें कुछ शुभ कर्म होते और कुछ अशुभ कर्म होते हैं। इन्हीं शुभाशुभ कर्मों के चक्र में मनुष्य उलझता रहता है। हमारे महान शास्त्रों में तीन प्रकार के कर्मों का उल्लेख किया गया है- संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म।
          संचित कर्म - जन्म-जन्मान्तरों में जो भी कर्म मनुष्य करता है, उन सबका योग संचित कर्म कहलाते हैं। इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि जिस प्रकार बैंक में पैसे जमा करते हैं तो चक्रवृद्धि ब्याज उसमें जुड़ता रहता है। इस प्रकार वह संचित धन प्रतिवर्ष बढ़ता रहता है। उसी प्रकार संचित कर्म भी वृद्धि को प्राप्त होते हैं। 
         यानी जो शुभाशुभ कर्म हम करते हैं, उनमें से कुछ को हम उसी जीवन में भोग लेते हैं। जो कर्म भोगने से बच जाते हैं, वे पुराने जन्मों के बचे हुए कर्मों में जाकर मिल जाते हैं। इस प्रकार इन सभी कर्मों का संचय होता रहता है।
      प्रारब्ध कर्म-  संचित कर्म का ही एक भाग होते हैं। ये संचित कर्म ही मनुष्य का प्रारब्ध बनते हैं।इन्हीं कर्मों के अनुसार मनुष्य को अगला नया शरीर मिलता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं-
        पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर।
अर्थात् पहले जीव का प्रारब्ध या भाग्य बनता है और फिर उसके अनुसार उसे नया शरीर मिलता है।
            पूर्वजन्मों का बहुत बड़ा संग्रह बने ये सभी संचित कर्म एक ही जन्म में नहीं भोगे जा सकते। इसलिए वर्तमान जीवन में भोगे गए प्रारब्ध कर्म संचित कर्म में से घटा दिए जाते हैं। इस प्रकार केवल प्रारब्ध कर्म ही मनुष्य अपने नएजीवन में भोगता है। ये कर्म संचित कर्मों का एक भाग मात्र होते है।
        क्रियमाण कर्म-  मनुष्य इस जीवन में प्रतिदिन जो कर्म करता है वे क्रियामाण कर्म कहलाते हैं। उनसे ही संचित कर्मों का निर्माण होता है। इस प्रकार जमा-घटा का यह खेल मनुष्य के जीवन में अनवरत चलता रहता है।
            मनुष्य अपने विवेक को नकारते हुए लक्ष्यहीन होकर जब कर्म करता है तो उसके संचित कर्मों में वृद्धि हो जाती है। एक उदाहरण लेते है कि यदि किसी के अपमान करने पर मनुष्य क्रोधित होता है तो उसके संचित कर्म बढ़ते हैं।  कोई अपमान करे और मनुष्य उस पर क्रोध न करे तो निश्चित ही उसके संचित कर्म कम होते हैं।
        यदि मनुष्य अपनी चेतना को जागृत करके प्रतिक्रिया न करें तो अपने संचित कर्मों को नष्ट कर सकता है। इसके लिए सबसे पहली शर्त है अन्तर्मन की शान्ति। मनुष्य को केवल क्रोध का शमन ही नहीं करना है, क्रोध उत्पन्न ही न हो इसके लिए भी प्रयास करना होता है। इस प्रकार धीरे-धीरे संचित कर्म कम होते हुए एक दिन शून्य हो जाते हैं। 
          जब वे समाप्त हो जाते हैं तब मनुष्य को फिर जीवन मरण के चक्र में पड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती। 
          ये प्रश्न हमारे समक्ष मुँह बाए खड़े रहते हैं जिनका उत्तर विद्वानों ने समय-समय हमें पर दिया है। ये प्रश्न हैं- जीव जन्म क्यों लेता है? वह पुनः पुनः शरीर धारण क्यों करता है? उसे मुक्ति कब और कैसे मिलती है?
            यह चक्र तब तक चलता रहता है और मनुष्य क्रियमाण कर्मों के द्वारा अपने कर्मों का संचय करता रहता है। अपने संचित कर्मों को भोगने के लिए जीव का बारम्बार जन्म होता है। जब तक उसके कर्मो का हिसाब पूर्ण नहीं हो जाता तब तक जीव को जन्म-मरण के चक्र में आवागमन करना पड़ता है।
          महर्षि पातंजलि ने 'योगशास्त्र' नामक अपने ग्रन्थ के तीसरे अध्याय में कर्म के इस जटिल विषय को स्पष्ट करते हुए आश्चर्यचकित कर देने वाली सत्य बात कही है - 'यदि मनुष्य अपने कर्मों को जान लेता है तो वह उसे अपनी मृत्यु का समय भी ज्ञात हो सकता है।'
          वर्तमान जन्म में किए जा रहे कुछ कर्मों का फल मनुष्य इसी जन्म मे भोग लेता है। जिनका फल वह नहीं भोग पाता वे उसके सचित कर्मो में जाकर जुड़ जाते हैं जिनका भुगतान उसे आगामी जन्मों में करना पड़ता है। उस समय बड़ा ही कष्ट होता है। कर्म करते समय मनुष्य जरा भी विचार नहीं करता परन्तु उनको भोगते समय वह परमपिता परमात्मा से शिकवा-शिकायत करता है।
        वह मालिक तो समय-समय पर मनुष्य को चेतावनी देता रहता है पर इन्सान उसे अनसुना कर देता है। उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता। ऐसा करते करते उसे वह चेतावनी सुननी बन्द हो जाती है। फिर वह उसी परम न्यायकारी प्रभु पर पक्षपात करने का आरोप लगाता रहता है। अपने इहलोक और परलोक को सुधारने के लिए समय रहते हुए मनुष्य को अपने क्रियमाण कर्मों की शुचिता की ओर ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

स्वैच्छिक एकान्तवास सुखदायी

स्वैच्छिक एकान्तवास सुखदायी

एकान्तवास यदि स्वैच्छिक हो तो उसमें मनुष्य आनन्द का अनुभव करता है। स्वैच्छिक एकान्तवास मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यन्त सुखदायक और शान्तिदायक होता है। इसके विपरीत किसी मजबूरी या दबाव में किया गया एकान्तवास कष्टदायक बन जाता है। 
         हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन को चार आश्रमों में बॉंटा गया है -
1 ब्रह्मचर्याश्रम - पच्चीस वर्ष तक
2 गृहस्थाश्रम - पच्चीस से पचास वर्ष तक 
3 वानप्रस्थाश्रम - पचास से पिचहतर वर्ष तक
4 संन्यासाश्रम - पिचहतर से शेष जीवन 
          स्वैच्छिक एकान्तवास को हम वानप्रस्थाश्रम कह सकते हैं। हमारे देश में ऐसी परिपाटी थी कि जब घर-परिवार के दायित्वों को मनुष्य पूर्ण कर लेता था यानी बच्चों को पढ़ा-लिखाकर योग्य बना देता था और बच्चों का कैरियर बना जाता था तथा उनकी शादियाँ भी कर दी जाती थीं तब लोग वानप्रस्थ आश्रम में रहना पसन्द करते थे। इसका अर्थ यही था कि अपने दायित्व पूर्ण हो गए, अब हरि भजन की वेला आ गई है। उन्होंने ने अपना जीवन जी लिया है अब अगली पीढ़ी के लिए स्थान खाली कर दिया जाना चाहिए।
          वानप्रस्थाश्रम तीसरा आश्रम है। वानप्रस्थी बनकर जीवन व्यतीत करने के लिए लोग जंगलों की शरण लेते थे ताकि उनके और उनकी प्रभुभक्ति के मध्य आकर कोई व्यवधान न डाल सके। यह एकान्तवास उनकी आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनता था। इस प्रकार चारों आश्रमों का विधिवत पालन करने से सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चलती थी। 
        जो एकान्तवास इन्सान के लिए विवशता का कारण बन जाता है, वह उसे जीवन में निराश और हताश कर देता है। इस अकेलेपन के कई कारण हो सकते हैं। जीवन साथी की मृत्यु के बाद कुछ लोग अकेले हो जाते हैं। तलाक के बाद स्त्री या पुरुष पुनः विवाह नहीं करते तो अकेले रह जाते हैं। वृद्धावस्था में बच्चों के द्वारा देखभाल न करने के कारण भी बहुत से लोगों को अकेलेपन का दंश झेलना पड़ता है।
        बहुत-सी विधवाएँ घर-परिवार के द्वारा दुत्कारे जाने पर काशी, हरिद्वार आदि धार्मिक स्थानों में बहुत यातनाएँ सहन करने करने के लिए विवश हो जाती हैं। वहाँ न उनके खाने की कोई व्यवस्था होती है और न ही रहने की। उनके घर-परिवार की घटिया सोच पर शर्म आती है कि जिन्हें अपने घर की महिलाओं की दुर्दशा पर जरा भी दुख नहीं होता। बहुत ही बेशर्मी से उन्हें वे दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश करते हैं।
        अकेलेपन की इस त्रासदी को बहुत से लोग झेल नहीं पाते तो वे चिड़चिड़े होने लगते हैं।  बात-बात पर क्रोध करना उनका स्वभाव बन जाता है। कुछ लोग मानसिक अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं और अनेक बिमारियाँ उन्हें घेर लेती हैं।
          इस प्रकार विवशता से अपनाया गया यह एकान्त मनुष्य को काटने को दौड़ता है। उस समय इन्सान को समझ ही नहीं आता कि पहाड़ जैसा दिन वह कैसे व्यतीत करे? 
        उस समय यदि मनुष्य अकेलेपन को अपने ऊपर हावी न होने दे तो बहुत कुछ सम्हल सकता है। उसे चाहिए कि अपने खाली समय का सदुपयोग करे। सामाजिक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखे। अपने सद् ग्रन्थों का पारायण करे। अपने जैसे लोगों का एक क्लब बना ले जिससे अकेलेपन से मुक्ति मिल सके। वे लोग मिल-बैठकर चर्चा कर सकते हैं, कोई खेल खेल सकते हैं, कभी पार्टी कर सकते हैं अथवा ग्रुप बनाकर कहीं देश-विदेश में घूमने जा सकते हैं। इस तरह समय का सदुपयोग हो जाता है और पहाड़ जितना दिन रौनक में गुजर जाता है।
          आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो एकान्त में रहकर शान्ति का अनुभव करते हैं। लोग चाहे उन्हें सनकी, खपती अथवा पागल कहें, उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं होती। लोग उनके बारे में क्या कहते हैं, वे जानना ही नहीं चाहते। वे तो बस अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं। 
        अनेक लोग अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए जप-तप आदि करते हैं। इसके लिए उन्हें एकान्त की आवश्यकता होती है। कुछ लोग एकान्त में रहकर अपनी मौन साधना भी करते है। तब उन्हें संसार और सांसारिक कार्य-कलापों से परे ईश्वर की शरण में रहना अच्छा लगने लगता है।
          इस प्रकार एकान्तवास को ढोना कुछ लोगों के लिए मजबूरी बन जाता है। वे अपने इस एकान्त से घबराकर अजीब-सा व्यवहार करने लगते हैं। कुछ लोगों के लिए यह वरदान बन जाता है।
            जिनके लिए यह एकान्तवास स्वैच्छिक होता है, वे अपने इस एकान्त का सदुपयोग अपनी आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाने अथवा सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए करते हैं। यही लोग परमानन्द को प्राप्त करते हैं। मानव मन आदिकाल से ही कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ है। यह अबूझ पहेली की तरह उसे सदा उलझाए रहता है। ऋषि-मुनियों ने इस उलझन को सुलझाने का बहुत प्रयत्न किया।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

हर स्थिति का सामना करना

हर स्थिति का सामना करना 

जीवन में मनुष्य को हर प्रकार की स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्थिति चाहे बुरी-से-बुरी हो या अच्छी-से-अच्छी हो, उसे अपना सन्तुलन बनाए रखना चाहिए। उसे उम्मीद का दामन कभी नहीं छोडना चाहिए। आशा की एक किरण के सहारे निस्सन्देह मनुष्य अपने जीवन में कुछ भी कर गुजरता है।
          मुझे अकबर और बीरबल का एक किस्सा याद आ रहा है। सर्दी के दिन थे। एक बार अकबर ने कहा, "जो व्यक्ति तालाब में सारी रात खड़ा रहेगा उसे मैं ईनाम दूँगा।"
          शहर मे मुनादी करवा दी गई और शर्त बता दी गई। ईनाम की बात सुनकर कई लोगों ने प्रयास किया पर असफल रहे।
          एक साहसी युवक ने ईनाम जीतने का निर्णय किया और राजा के पास गया। उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं अपनी किस्मत आजमाना चाहता हूॅं।"
          युवक की बात सुनकर राजा ने उसे अनुमति दे दी। रात को जब तालाब में खड़ा था तो दूर उसे जलता हुआ दीया दिखाई दिया। यही जलता हुआ दीपक उसकी प्रेरणा का स्त्रोत बन गया और उसने राजा की लगाई हुई शर्त जीत ली।
          कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? इस साहसी नवयुवक की तरह सदैव आशा का दीपक अपने मन में जलाए रखना चाहिए। तभी मनुष्य अपने जीवन में सफल हो सकता है।
          हर मनुष्य सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ महान बनना चाहता है किन्तु स्वयं परिश्रम नहीं करना चाहता। इस प्रकार निकम्मे बनने से कुछ भी हाथ में नहीं आता। केवल असफलता ही उसे मुँह चिढ़ाती है। मनीषी कहते हैं-
                   अपने हाथ जगन्नाथ।
                        और
         जितना गुड़ डालो उतना मीठा होता है।'
                       और भी
       मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।
यानी सीधा-स्पष्ट-सा गणित है कि मनुष्य जितनी मेहनत कर लेगा, वह उतनी ही कामयाबी हासिल कर लेगा। अन्यथा ठन-ठन गोपाल रहेगा यानी उसे कुछ भी प्राप्ति नहीं होगी।।
        इन्सान की हार्दिक इच्छा होती है कि कोई उसके लिए कुछ कर दे और वह बैठा-बैठा उसके मजे लूटता रहे। वह स्वयं हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे और दूसरे उसकी जी हजूरी करते रहें। ऐसा आखिर कब तक चलता रहेगा? 
        दूसरों से कुछ पाने की आशा रखने पहले मनुष्य को अपने मन में यह विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि जिनसे पाना चाहता है उसने उन सबकी भलाई के लिए कभी कुछ किया है क्या? 
        पहले अपनी ओर से समाज या दूसरों के लिए कुछ त्यागना पड़ता है, तभी उसे कुछ पाने के लिए सोचना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो  कामचोर, नालायक, स्वार्थी आदि उपाधियाँ पाता है जो उसे अपमानित करती रहती हैं।
        हम यदि कुछ लेने जाते हैं तो पहले उसका मूल्य चुकाते हैं तभी मनचाही वस्तु खरीद सकते हैं। उस समय मनुष्य को - 
              इस हाथ दे उस हाथ ले
वाला नियम अपनाना पड़ता है। अन्यथा शोकेस में सजी वस्तुओं को देखकर मन को बहलाना पड़ता है। फिर जीवन में इस सिद्धान्त को हम सब कैसे भूल जाते हैं?
          जीवन में विद्यमान कुछ अच्छी बातें होती हैं जिनका मूल्य हमारी नजर में होता है। ये अच्छी बातें किसी के लिए ज्ञान हो सकती हैं, किसी के लिए प्रेम हो सकती हैं या फिर किसी और के लिए पैसा हो सकती हैं। इन्हें कुछ भी कह सकते हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिए पहले मनुष्य को अपनी ओर से डटकर पुरुषार्थ करना होता है। निस्सन्देह उसके पश्चात ही मनुष्य को अपने स्वयं के योगदान के बदले उससे अधिक प्राप्त हो सकता है। अन्यथा वह दूसरों का मुॅंह ताकता रह जाता है। 
          वे मूर्ख जिन्हें अपने बाहुबल पर विश्वास नहीं होता वही दूसरों से आशा रखते हैं और उसके न पूर्ण होने पर निराश होते हैं। उसी हताशा में वे अन्य लोगों को गाली-गलौच करते हैं और उन्हें कोसते हुए अपने मन की भड़ास निकालते हैं। इससे किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, बस इन्सान अपने कर्मों से अपना कद छोटा कर लेता है।
          अपनी उड़ान, अपनी आकाँक्षाएँ, अपनी सीमाएँ मनुष्य को स्वयं ही निर्धारित करनी चाहिए। उसी के अनुरूप कर्म करते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। सब अच्छा-अच्छा तो किसी मनुष्य के जीवन में नहीं हो सकता। कठिनाइयों का सामना भी उसे जीवन में करना पड़ता है। हम अवश्य सफल होंगे, यह कहकर आशा का दामन कसकर पकड़े रहना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

धन साधन मात्र है, साध्य नहीं

धन साधन मात्र है, साध्य नहीं

हम नित्य प्रातः उठकर दिन की शुरूआत करते समय सोचते हैं कि जीवन में पैसा ही सब कुछ है। इसका कारण है यह भौतिकवादिता। मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि धन केवल साधन मात्र है, साध्य नहीं। दूसरों की होड़ करते समय मनुष्य अपनी क्षमताओं को अनदेखा कर देता है। फिर बाद में परेशान होता रहता है।
          मनुष्य बस कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात अथक परिश्रम करके अपने और‌ अपनों के लिए सारी सुख-सुविधाएँ जुटा लेना चाहता है। परन्तु जब सन्ध्या के समय दुनिया के थपेड़े खाकर थका-हारा घर लौटकर आता है तब उसे लगता है कि अब बह सुकून के दो पल मिल जाएँ और कुछ नहीं चाहिए। उस समय उसे धन से अधिक शान्ति ही सब कुछ प्रतीत होने लगती है।
        धन मनुष्य के जीवन में अन्तिम लक्ष्य अथवा साध्य नहीं हो सकता। यह जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। धन का उपयोग हम किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए करते हैं। धन से भोजन, वस्त्र और मकान जैसी जरूरतें खरीदी जा सकती हैं। जीवन का अन्तिम उद्देश्य वास्तविक लक्ष्य, आन्तरिक शान्ति, ज्ञान और अच्छे मानवीय सम्बन्ध होते हैं। 
         धन से हम दवा खरीद सकते हैं स्वास्थ्य नहीं। इसी प्रकार हम पुस्तकें खरीदी जा सकते हैं ज्ञान नहीं। मनुष्य जब धन को ही सब कुछ मान लेता है तो उसके जीवन में भय, तनाव और अहंकार बढ़ने लगते हैं। पैसे के पीछे भागने से अपनेपन और पारिवारिक रिश्तों की मिठास कम होने लगती है। हम कह सकते हैं कि धन मनुष्य के रिश्तों से बढ़कर कभी नहीं हो सकता।
        जो रिश्तों का मान रखना जानते हैं, वे उनके लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने में कभी नहीं हिचकिचाते। यह आवश्यक नहीं है कि उनके पास बहुत अधिक धन हो या समय हो। अपने प्रिय मित्र जो आगे बढ़कर होटल आदि के बिल का भुगतान करते हैं, उन्हें मित्र पैसों से अधिक प्रिय होते हैं। अन्यथा वे भी अपने हाथ जेब में रखकर दूसरों का मुँह ताक सकते हैं।
          जो बन्धु-बान्धव हर काम में आगे रहते हैं, उन्हें कभी मूर्ख समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।  उन्हें इस बात का सदा अहसास रहता है कि उन्हें भी किसी को जवाब देना है। इस भौतिक संसार के लोगों के प्रति तो वे उत्तरदायी हैं ही पर मृत्यु के पश्चात परमात्मा को भी उन्हें उत्तर देना है। वे यही मानते हैं कि हर इन्सान को एक दिन उस मालिक के सामने अपनी सच्चाई और ईमानदारी का हिसाब देना होता है, दुनिया को नहीं।
          वास्तव में महान वही लोग होते हैं जो किसी प्रियजन से मनमुटाव हो जाने की स्थिति में गलती न होने पर भी पहले क्षमा याचना कर लेते हैं। इसका कारण अपनी हेठी करवाना कदापि नहीं होता। इसका अर्थ होता है कि वे अपने प्रियजनों को बहुत चाहते हैं, उनकी परवाह करते हैं। वे उन्हें किसी भी मूल्य पर खोना नहीं चाहते, अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं। यह केवल व्यक्ति विशेष की सोच पर निर्भर करता है।
          पूरा शहर बसता रहे पर कोई किसी की मदद नहीं करने के लिए नहीं आता। जो लोग बिनमाँगे सहायता करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते हैं, वास्तव में वही अपने होते हैं। उन लोगों का सदा उपकार मानना चाहिए जो जरूरत के समय आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी हील-हुज्जत के सहायक बने। अपने मन में यह संकल्प करना चाहिए कि वे भी लोगों की सहायता बिना अहसान जताए करेंगे। 
          यदि परेशानी के समय कोई हमारी सहायता बिना किसी कामना के करता है तो हमें बहुत अच्छा लगता है, वैसे ही दूसरों को भी बहुत प्रसन्नता होगी। किसी की दुख-तकलीफ को यदि इन्सान निस्वार्थ भाव से कम कर सके तो इससे बढ़कर और कोई पुण्य नहीं हो सकता।
          मनुष्य को अपने बन्धु-बान्धवों से सदा मिल-जुलकर प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। प्रेम एक ऐसा पौधा है जो मनुष्य को कभी मुरझाने नहीं देता बल्कि सदैव प्रसन्नता प्रदान करता है। इससे आपसी सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं और अकेलेपन का अहसास नहीं होता।
          इसके विपरीत यदि मनुष्य अपनों से नफरत का रिश्ता बना लेता है तब वह न कभी खिल पाता है और न कभी प्रसन्नता उसकी संगिनी बनती है। यह घृणा का भाव उसे सबसे अलग करके अकेला छोड़ देता है। समय आने पर उसका साथ देने वाला अपना कोई प्रियजन उसे नहीं दिखाई देता। यह उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है कि अपनी मूर्खताओं के कारण अपनों के होते हुए भी इस दुनिया की भीड़ में स्वयं को नितान्त अकेला पाता है।
          मनुष्य को धन कमाना चाहिए पर उसके लिए पागल नहीं बनना चाहिए। धन से भी अधिक अपने प्रियजनों की ओर ध्यान देना चाहिए। वही इस संसार में अपने साथी बनते हैं, शेष तो सब प्रदर्शन मात्र ही कहा जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश 

मनुष्य जब इस संसार में आता है तो एक कोरी स्लेट की तरह होता है। जैसे जैसे उसे समझ आने लगती है तो वह स्वयं को सबसे बुद्धिमान समझने की भूल करने लगता है। उस समय वह अपने झूठे दम्भ के कारण अथवा अज्ञानतावश अपने ही प्रियजनों को अपना शत्रु बना बैठता है। जिन लोगों को उसकी ढाल बनना चाहिए था, वे उससे अपना मुॅंह मोड़ लेते हैं।
         अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों को यत्नपूर्वक विश्वास में लेना चाहिए। यदि अपनों का साथ किसी मनुष्य को मिल जाए तो समझिए उस इन्सान ने जिन्दगी की जंग जीत ली है। इस विश्वास को जीतने के लिए मनुष्य को अपने स्वार्थ को त्याग देना चाहिए। अपने साथ-साथ अपनों को भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता भी करनी चाहिए।
       परस्पर शत्रुता के कारण संवाद की कमी हो जाती है जो रिश्तों में दरार पैदा करती है। अहंकार यानी मैं और मेरे की भावना मनुष्य को अपनों को दूर कर देती है। अपनों का विरोध इन्सान को अन्दर से तोड़ देता है। इससे उसे मानसिक तनाव होने लगता है। इस प्रकार प्रियजनों अथवा अपनों के बीच की शत्रुता मनुष्य के रिश्तों, मानसिक शान्ति और पारिवारिक सौहार्द का विनाश कर सकती है। यह उसके परिवेश के लिए घातक होता है।
        यदि मनुष्य अपनों से द्रोह करता है तो आज नहीं तो कल बाहर वाले मूर्ख उस पर राज करने लग जाते हैं। अपने जब धोखा देते हैं तो बहुत कष्ट होता है। शायद यह मुहावरा इसीलिए बना हैं कि- 
            घर का भेदी लंका ढाए।
यानी विभीषण रावण का भाई था। उसने अपने भाई का त्याग करके देकर भगवान श्रीराम का साथ दिया था। यदि विभीषण भाई की मृत्यु का रहस्य भगवान श्रीराम को न बताता तो शायद युद्ध का रुख बदला हुआ होता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब अपने ही अपनों की बर्बादी का कारण बन जाते हैं तो फिर उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। 
          यह तो सर्वविदित है कि लोहा केवल लोहे से ही काटा जाता है। यदि लोहा लोहे को न काटे तो उसे दुनिया की कोई वस्तु नहीं काट सकती। इसी तरह पेड़ों की लकड़ी से माचिस की तीलियॉं बनाई जाती हैं। पेड़ों से बनने वाली माचिस की तीलियों से ही लकड़ी को आग लगाई जाती है। इसी प्रसंग में कहना चाहूँगी कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि अपने प्रियजन जब शत्रुता निभाने पर आ जाएँ तो अपने ही विनाश का कारण बन जाते हैं।
        एक बोधकथा की यहॉं पर चर्चा करते हैं। आशा है इसे आप सबने इसे पढ़ा होगा। कहते हैं कि एक बार एक कुत्ते और एक गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी दौड़ते हुए दो गाँव आगे रखे हुए एक सिंहासन पर पहले बैठेगा, वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जाएगा और राज्य करेगा। 
          जैसा कि निश्चित हुआ था दौड़ शुरू हुई। कुत्ते को पूरा विश्वास था कि वही जीतेगा और सिंहासन पर बैठेगा। इसका कारण था कि गधा कभी भी उससे तेज नहीं भाग सकता। उसका भाग्य किस करवट बैठने वाला है यानी उसके भाग्य में क्या लिखा है यह उस कुत्ते को अभी बिल्कुल भी ज्ञात नहीं था।
          शर्त के अनुसार कुत्ता तेजी से दौड़ने लगा। ज्योंहि वह थोडा-सा ही आगे गया था कि स्वभावत: गली के कुत्ते मिलकर उसे अपनी गली से खदेड़ने के लिए लपकने लगे तथा नोचने लगे। उन्होंने उस पर भौंकना शुरू किया। ऐसा ही व्यवहार उसके साथ हर गली और हर चौराहे पर होता रहा। जैसे तैसे कुत्ता हाँफते हुए जब सिंहासन के पास पहुँचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि गधा पहले से ही सिंहासन पर विराजमान है। वह उससे पहले ही वहाँ पहुँच चुका था। शर्त के अनुसार बाजी जीतकर वह राजा बन चुका था।
          यह सब देखकर निराश हो चुका कुत्ता बोल पड़ा, "यदि मेरे ही लोगों ने मुझे पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता।"।  
         इस घटना को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह बेचारा कुत्ता अपनी खुशफहमी में ही बर्बाद हो गया।
        लोहे की चर्चा एक बार पुनः करते हैं। लोहे से उत्पन्न जंग ही बस उसे नष्ट करता है। उसी तरह मनुष्य को भी कोई और नहीं बल्कि उसके विचार ही नष्ट करने में अहं भूमिका निभाते हैं। 
        मनुष्य यदि सहृदय होगा और सबको साथ लेकर चलने वाला बनेगा तो वे सभी उसके सहायक बनते हैं। इस तरह उसका बल बढ़ जाता है। तब कोई बाहरी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती। इसके विपरीत सबके साथ विपरीत व्यवहार करने वाले से उसके अपने विमुख हो जाते हैं। निश्चित मानिए कि उस समय मनुष्य उस समय मूर्खों के वश में होता है। यदि विद्वानों के संसर्ग में हो तो वे उसे ऐसी मूर्खता नहीं करने देंगे।
        मनुष्य को सदा अपनी सोच का दायरा विस्तृत रखना चाहिए। तभी उसका शुभ सम्भव हो सकता है। उसे सदा आत्म मन्थन करते रहना चाहिए जिससे वह अपने लिए उचित मार्ग का चयन कर सकता है और पथभ्रष्ट होने से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

पितरों को श्रद्धा से तृप्त करें, श्राद्ध से नहीं

पितरों  को श्रद्धा से तृप्त करो, श्राद्ध से नहीं 
      
संसार में हर व्यक्ति अपने जीवन में कल्याण की कामना करता है। वह अपने परिवारों जनों तथा समाज  में एक अच्छी सन्तान होने का मेडल पहनना चाहता है। इस प्रसिद्धी को पाने का एकमात्र यही उपाय है कि अपने बुजुर्ग होते माता-पिता को श्रद्धापूर्वक अपने आचार-व्यवहार से प्रसन्न करना चाहिए। 
           जहॉं तक हो सके उनके जीवनकाल में ही उनकी सेवा कर ली जाए। उनके खान-पान का समुचित ध्यान रखा जाए। उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न बरती जाए। उनके वस्त्रों के प्रति सजग रहा जाए। उनके साथ कुछ समय व्यतीत किया जाए ताकि वे अकेलेपन से घबरा न जाऍं। जो बच्चे ऐसा करते हैं उनका घर ही मन्दिर बन जाता है और वहॉं पत्थर की मूर्तियों का स्थान जीवित मूर्तियॉं यानी उनके माता-पिता ले लेते हैं।
          गुरु नानक देव जी के जीवन से ‌जुड़ी एक घटना कहीं पढ़ी थी, उसे यहॉं उद्धृत करना‌ चाहती‌ हूॅं। एक बार गुरू नानक देव जी भ्रमण करते हुए शिष्यों सहित तीर्थराज हरिद्वार गए । वहाॅं उन्होनें देखा कि हजारों भावुक अन्ध विश्वासी श्रद्धालु लोग गंगा में खड़े होकर मरे हुए माता-पिता आदि को पानी द्वारा तर्पण व पिण्ड दान कर रहे हैं।   
       नानक देव जी ने सोचा कि इन भोले लोगों कैसे समझाया जाय, अतः वे भी गंगा की धारा में खड़े होकर पंजाब की तरह मुॅंह करके दोनों हाथों से गंगा का पानी फैंकने लगे। स्वयं से विपरीत दिशा में जल फैंकते देख लोगों को आश्चर्य हुआ तो उन्होनें नानक देव जी से पूछा महाराज! आप ये क्या कर रहे हैं? 
            सरल स्वभाव गुरु नानक जी बोले, "भाइयो, मैं अपने खेत को पानी दे रहा हूँ।"  
         यह सुनकर सब लोग हंसने लगे और गुरु नानक जी से कहने लगे, "महाराज इस प्रकार आपके खेतों में पानी पहुॅंचना सम्भव है क्या?" 
       तब महात्मा नानक देव जी बोले, "ओ भोले लोगो! मेरा पानी मेरे पंजाब प्रान्त के खेतों में नहीं पहुँचेगा तो तुम्हारे मरे हुए माता-पिता जो किस योनि में किस देश में और अपने कर्मानुसार क्या फल भुगत रहे हैं, उन्हें तुम्हारा ये तर्पण पिण्ड दान कैसे पहुँचेगा ?" 
        लोगों को समझाते हुए गुरु नानक देव जी ने फिर कहा, "अतः इस पर विचार करो और अपने जीवित माता पिता और गुरुजनों को श्रद्धा व भक्ति भाव से तृप्त करो तभी तुम्हारा कल्याण होगा अन्यथा आप दुःख सागर में गोते ही खाते रहोगे।"
           इस घटना को पढ़कर यही प्रतीत होता है कि महापुरुषों के समझाने का‌ तरीका बड़ा विचित्र होता है। वे अपनी क्रियात्मकता से जन साधारण के मन में अपनी बात को बड़ी‌ सरलता से पहुॅंचा देते हैं। गुरु नानक देव जी के उपदेश के‌ बाद मेरे कहने के लिए कुछ नहीं बचता। यह अब आप सुधीजनों पर निर्भर करता है कि आप महापुरुषों का अनुसरण करना चाहते हैं या अन्धविश्वासों एवं रुढ़ियों में फसे रहना चाहते हैं।
           मैं बस इतना ही‌ कहना चाहती हूॅं कि अपने माता-पिता का ऋण जीवनभर उनकी सेवा करके भी नहीं चुका सकते। इसलिए उनके जीवनकाल में ही उन्हें इतना सन्तुष्ट कर दीजिए ताकि उनके परलोक सिधारने पर आपको किसी ढकोसले की आवश्यकता ही न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

मन से पार पाना कठिन

मन से पार पाना कठिन 

मानव मन से पार पाना बहुत कठिन कार्य कहलाता है। यह मन उसे बड़े ही नाच नचाता है। यह सदा आगे-ही-आगे भागता रहता है। इसकी गति बहुत तीव्र होती है। इसे बॉंधकर रखना मनुष्य के बस की बात नहीं है। मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है। यदि यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और चाहे तो गर्त में ढकेल सकता है।
        हमारा यह मन नित नए मूड पर आधारित रहता है। जिसे भी देखो वह यही कहता सुनाई पड़ता है कि मेरा मूड नहीं है। यह कभी प्रसन्न हो जाता है तो कभी उदास रहता है। कभी-कभी यह बच्चों की तरह चहकने लगता है। उस समय ऐसा लगता है मानो इन्सान के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे। कभी उदास या मायूस हो जाता है और फिर निराशा के सागर में गोते खाने लगता है यानी डूबने-उबरने लगता है। कभी ऐसा उखड़ जाता है कि इन्सान कहने लगता है कि मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा।
        ये सब इस मन की विभिन्न अवस्थाएँ हैं जो समय-समय पर मनुष्य को अपना रंग दिखाती रहती हैं। ईर्ष्या-द्वेष, हर्ष-विषाद, क्रोध-प्यार, आश्चर्य आदि भावनाएँ भी इसी मन में निवास करती हैं। ये भाव उसके चरित्र का एक अहं हिस्सा बन जाते हैं। जिस भी भाव की अधिकता समय विशेष पर होती है, उसी के अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगता है। 
        मन को मौजी इसीलिए कहते हैं कि यह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। कोई कुछ भी कहता रहे, यह उसे अनसुना कर देता है। मानो इसे किसी भी व्यक्ति से कोई लेना-देना ही नहीं हैं। मनीषी कहते हैं-
      मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
अर्थात् यदि मनुष्य अपने मन की बात मानकर, निराश होकर, थक-हारकर बैठ जाए तो असफलता ही उसके हाथ लगेगी। परन्तु यदि मनुष्य अपने मन की निराशा को दरकिनार करके साहसिक कार्य कर जाता है तो कोई ऐसा कारण नहीं कि वह सफलता की सीढ़ियाँ न चढ़ सके। अब यह निर्णय तो उसका अपना ही होता है कि वह अपने जीवन को किस ओर ले जाना चाहता है।
           मन को हम चमत्कारी शब्द कह सकते हैं। भाषा की दृष्टि से यदि मन के बाद 'न' शब्द जोड़ दिया जाए तो एक नया शब्द मनन बन जाता है। इसके विपरीत यदि मन से पूर्व न शब्द को जोड़ा जाए तो नया शब्द 'नमन' बन जाता है। मनुष्य यदि अपने जीवन में यथायोग्य प्रणाम अथवा नमन करे और मनन करने का अभ्यास कर ले तो निस्सन्देह उसका यह जीवन सार्थक हो जाएगा।
        यह मन हमारे शरीर रूपी रथ की लगाम है। इस लगाम को अनुशासन में रखना बहुत आवश्यक होता है। इस पर विवेक या बुद्धि का नियन्त्रण होना बहुत आवश्यक होता है। यदि लगाम न कसी जाए तो इन्द्रियाँ रूपी घोडे यहाँ वहाँ भागने लगते हैं। यदि वह इसे चलाने में कोताही करेगा तो मानव शरीर में बैठा यात्री रूपी आत्मा अपने गन्तव्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। 
          हमारा यह मन आकर्षक और लुभावने रास्तों पर चलकर बड़ा खुश रहता है, उसे शार्टकट भाते हैं। चाहे आगे जाकर उस गलती का कितना ही भयंकर परिणाम क्यों न हो। इस मन का क्या? वह तो अपने बचाव में सौ बहाने गढ़ लेगा और स्वयं को सन्तुष्ट कर लेगा। लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भुगतना तो मनुष्य को ही पड़ता है। चारों ओर से प्रश्नों की बौछार को उसे ही सहना होता है।
       गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि
मन बहुत चंचल है इसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।
    मनीषी समझाते हुए कहते हैं-
      मन साडे आखे नहीं लगदा 
    अस्सी मन दे आखे क्यों लगिए
इस उक्ति का तात्पर्य है कि जब मन हमारे कहने पर नहीं चलता तो हम उसके कहने पर क्यों चलें? यदि इसके कहने पर चलेंगे तो हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनने से कतराने लगेंगे। इसका कारण स्पष्ट है कि मन पंख लगाकर उड़ना चाहता है। इसलिए जब बिना मेहनत के सब कुछ पाना चाहेगा है तो प्रायः शार्टकट का सहारा लेगा। उस समय वह हमें कुमार्ग पर चलने के लिए विवश करेगा ओर हम खुशी-खुशी उसके सुझाए मार्ग पर चल पड़ेंगे। फिर वहाँ से लौटकर आना हमारे लिए बहुत ही कठिन हो जाएगा।
        यह मन भी सच्चाई और ईमानदारी की कठिन डगर पर चलने के लिए मनुष्य को हमेशा हतोत्साहित करता है। हालाँकि यह मार्ग कठिन भी होता है और लम्बा भी होता है पर इस पर चलने से हमेशा शुभ ही होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य को सफलता इसी राह पर चलकर मिलती है।
          मन के कहने पर यदि मनुष्य चलने लगें तो अनेकश: परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है। इसलिए उन्नति अथवा सफलता की कामना करने वाले लोगों को मन के अनुसार चलने के बजाय अपने तरीके से उसे चलाना चाहिए। उसे यत्नपूर्वक साधकर अपनी मर्जी से चलाना ही श्रेयस्कर होता है। इससे मनुष्य का जीवन भटकाव से बचा रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद