धन दैनन्दिन आवश्यकता
धन हमारी सभी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत आवश्यक है। इसके बिना हम जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। कदम-कदम पर हमें धन की आवश्यकता का अनुभव होता है। इसे कमाना बहुत ही कठिन कार्य है। अपने सुख-चैन को तिलांजलि देकर दिन-रात अथक प्रयास करना पड़ता है। कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुते रहना पड़ता है। उस पर भी यह कोई गारण्टी नहीं होती कि मनुष्य को मनोवांच्छित सफलता मिल सकेगी।
एक मजदूर सर्दी-गर्मी की परवाह किए बिना दिन-रात मेहनत करता है फिर भी उसके घर का चूल्हा कितने दिन जल पाएगा? यह नहीं कहा जा सकता। यह धन, यह लक्ष्मी किसी की सगी नहीं है। यह बहुत ही चंचल कही जाती है। यह आज यहाँ है तो कल कहाँ होगी? इसका पता किसी को नहीं चल पाता। पलभर में यह राजा को रंक बना देती है और रंक को राजगद्दी पर बैठा देती है। इसकी महिमा अपरम्पार है, जिसका पार इस संसार में कोई नहीं पा सकता।
यह धन मनुष्य को कहता है कि मुझे इस हद तक पसन्द करो कि लोग आपको नापसन्द करने लग जाऍं। यदि इस धन के पीछे भागते रहे तो सभी संगी-साथी पीछे छूट जाते हैं। इसकी अधिकता होने पर मनुष्य में सबसे पहले अहंकार आता है जो सारे विनाश की जड़ है। फिर उसके साथ-साथ दुर्व्यसन भी मनुष्य को घेरने लगते हैं। तब सब लोग उस व्यक्ति से किनारा करने लगते हैं। वह मनुष्य सभी बन्धु-बान्धवों के रहते भी हुए निपट अकेला हो जाता है।
यही धन सारे फसाद की जड़ है। फिर भी न जाने क्यों सब लोग इसके पीछे पागल हुए रहते हैं। यह सारे रिश्तों को खोखला कर देता है। भाई को भाई के खून का प्यासा बना देता है। माना कि जीवन के लिए इसकी बहुत उपयोगिता है परन्तु यह सब कुछ नहीं कहा जा सकता। यह इन्सान के लिए न तो खुशियाँ खरीद सकता है और न ही उसके लिए स्वास्थ्य खरीद सकता है। न ही उसकी इस लोक में मृत्यु से रक्षा कर सकता है। इन स्थितियों में इसके होने का कोई लाभ नहीं मिल पाता।
मरने के बाद इसे ऊपर नहीं ले जा सकते। यह इसी लोक में रह जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही विदा लेता है। उसका सब साम्राज्य यहीं धरा रह जाता है। मनुष्य के अपने सच्चे साथी उसके अच्छे या बुरे कर्म होते हैं जो जन्म-जन्मान्तरों तक साथ निभाते हैं। यह धन जीते जी मनुष्य को ऊपर ले जा सकता है। यह मनुष्य को अपमानित कराने का कोई अवसर नहीं चूकता। धन के नशे में चूर व्यक्ति को कुकर्मों में फँसाने में तनिक भी देर नहीं करता।
इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनके पास बेशुमार धन-दौलत थी पर फिर भी जब वे मरे तब उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था। जब तक यह धन अपने पास है तभी तक ही अपना है। जब यह अपने पास नहीं है तब यह किसी का सगा नहीं रह जाता। इस धन की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि जब यह मनुष्य के पास होता है तब अपने-पराए सभी उसके अपने बन जाते हैं। स्वार्थ के कारण उस धनी को भगवान कहने लगते हैं और उसके सौ खून भी माफ कर देते हैं। वैसे तो धन भगवान नहीं है परन्तु लोग उसे भगवान से कम भी नहीं मानते।
धन नमक की तरह होता है जो भोजन का स्वाद बढ़ाता है परन्तु सब्जी में इसे यदि गलती से अधिक डाल दिया जाए तो मुँह का स्वाद बिगाड़ देता है। उसी प्रकार अपने पास धन आवश्यकता के अनुसार हो तो वह जीवन में आनन्द देता है। सही प्रकार की खुशियॉं देता है। लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो जिन्दगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
धन की मादकता के कारण बच्चे अपने माता-पिता के अहंकार को देखते हुए बिगड़ जाते हैं। वे भी अपने माता-पिता की तरह सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे। दुनिया को अपने पैरों तले कुचलने की बातें करने लगते हैं। ऐसे घमण्डी लोग दूसरों को हीन समझने की भूल करने लगते हैं। इसी नशे में वे गलत रास्ते पर चलकर न्याय व्यवस्था के दोषी बनने लगते हैं। इस विषय में समाचार पत्र, टीवी और सोशल मीडिया गाहे-बगाहे हमें बताते रहते हैं।
धन को जीवन में यदि साधन मानकर चला जाए तो श्रेयस्कर होता है। जहाँ मानव इसे साध्य मानने की भूल करता है, वहीं उसके पथभ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जाती है। खूब धन कमाइए और उसका सदुपयोग सत्कार्यों में लगाकर कीजिए। घर-परिवार की सभी आवश्यकताओं को और दायित्वों को पूरा करते हुए दान धर्म का निर्वहण भी करना चाहिए। वैसे यह कर पाना बहुत कठिन होता है। फिर भी प्रयास करना चाहिए कि उसे अपने सिर पर सवार न होने दिया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद