मंगलवार, 5 मई 2026

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाने का अर्थ होता है अपने अहंकार को त्याग करके पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ प्रभु पर भरोसा करना। परमात्मा ने सभी जीवों को इस संसार में भेजा है। सदा उसका धन्यवाद करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारी परेशानियाँ धीरे-धीरे खुशियों में बदल जाती हैं। खामोशी से यदि उनका सामना किया जाए तो वे सामान्यत: कम हो जाती हैं। इससे सांसारिक तनाव कम हो जाता है। धैर्य धारण करने पर समय बीतते-बीतते वे समाप्त होने लगती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की शरण में किस प्रकार जा सकते हैं? 
              इसका कारण है कि भक्त को भरोसा होता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है। जीवन में परेशानियाँ चाहे कितनी भी क्यों न आ जाएँ यदि उनके बारे में सदा चिन्ता ही करते रहो अथवा सोचते रहो तो वे कम होने के स्थान पर बढ़ने लगती हैं। ऐसा करके मनुष्य अपने ही चारों ओर उदासियों का एक घेरा बना लेता है। फिर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता हुआ हार-पैर मारता रहता है। मनुष्य सदा सफल हो जाएगा, ऐसा आवश्यक नहीं होता।
          मनुष्य के जीवन में अनेकानेक परेशानियाँ एक के बाद एक करके आती रहती हैं। वह अपने गिरते स्वस्थ्य या किसी बीमारी से आक्रान्त होने पर जिसका इलाज सम्भव नहीं से व्यथित होता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के आपसी वैमनस्य या दुर्व्यवहार को देखकर दुखी होता है। कभी वह अवज्ञा करने वाले बच्चों के कुमार्गगामी हो जाने के कारण टूटने लगता है। अपने आर्थिक हालातों के कारण मनुष्य अनमना-सा रहता है। 
             अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली कठिनाइयों को सहने में अक्षम हो जाता है। ऐसे हालात जब बन जाते हैं तब उस गम के कारण उसके होंठ सिल जाते हैं और वह अपनी परेशानी को किसी से कह नहीं पाता। उसके मन में यह डर घर कर जाता है कि लोग उसके विषय में जानकर क्या सोचेंगे? यदि वह अपनी  परेशानी किसी को बताएगा तो लोग पीठ पीछे उसका उपहास करेंगे। यदि मनुष्य अपनी सभी परेशानियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे उनके बारे में हमेशा सोचने के स्थान पर, उनका डटकर सामना करते हुए, उन्हें दूर करने का उपाय करना चाहिए।
            मनुष्य को किसी इन्सान के दुख का कारण नहीं बनना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को दुख के सागर में धकेलने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए। इन्सान कितना भी अच्छा क्यों न हो उससे कभी-कभी भूल तो हो ही जाती है। उसे उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए और दूसरे के दुख को कुछ हद तक कम करने के लिए क्षमायाचना अवश्य कर लेनी चाहिए।
          दूसरे के मन में इससे कितना गहरा घाव हो जाएगा इसका अनुमान भी लगाया नहीं जा सकता। जैसे समुद्र में पत्थर फैंकने पर यह कोई भी नहीं जान सकता कि वह फैंका गया पत्थर वहाँ कितनी गहराई में उतर गया होगा। उसी प्रकार मनुष्य के मन की टीस का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। पीड़ित व्यक्ति के मन से निकलने वाली आह किसी को भी नष्ट कर सकती है।
          परेशानियों से बचने के लिए हमेशा अच्छे कार्य करने का यत्न करना चाहिए। भलाई के कार्य करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। मनुष्य की चाहे प्रशंसा हो या न हो उसे अपने सच्चाई के रास्ते से दूर नहीं जाना चाहिए। इस तरह करने से मन को शान्ति मिलती है और वह अपने दुखों को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। ऐसा करने से मनुष्य को अपने जीवन को समझ आती है।
             हमें नित्य ईश्वर के साथ संवाद करना चाहिए और प्रतिदिन उसे स्मरण करते हुए उसके साथ समय बिताना चाहिए। अपने अहंकार का त्याग करके नि:स्वार्थ भाव से प्रभु को सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। अपने जीवन, सुख-दुख और चिन्ताओं को भगवान को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है। जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं तो हमारा हृदय प्रेम और शान्ति से भर जाता है। ईश्वर को अपना मानने वाले कभी निराश नहीं होते। दुख और विपत्ति के समय में भी हम मनुष्य सुरक्षित अनुभव करते हैं। भगवान की शरण में जाने पर जीवन से मृत्यु और असफलता का भय दूर हो जाता है।
              दुखों और परेशानियों को दूर करने के लिए ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए मनुष्य को सदा अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहकर अपने कष्टों को भोगने के लिए उचित मार्ग की तलाश करनी चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को सहारा मिलता है। उचित मार्गदर्शन और आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त करने का यह एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 4 मई 2026

बार-बार चेतावनी देता शरीर

बार-बार चेतावनी देता शरीर 

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना इस प्रकार की है कि इसमें कोई कमी ढूँढने से भी नहीं मिल सकती। इसे इस प्रकार से मालिक ने बनाया है कि अपनी आवश्यकता के सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों का निर्माण यह स्वयं कर लेता है। जिन-जिन तत्त्वों की इसे जरूरत नहीं होती उन्हें इस शरीर से बाहर निकाल फैंकता है। यह स्वयं ही अपना सुधार कार्य करने में समर्थ है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब नीरोग रहने के लिए यह सारा निर्माण कार्य कर सकता है तो फिर यह बार-बार रोगी क्यों होने लगता है?
            इस प्रश्न के उत्तर में मात्र यही कह सकते हैं कि यह स्वयं रोगी नहीं होता। इसे हम अपनी मूर्खता से रुग्ण बना देते हैं। अब आप कह सकते हैं कि मैंने कितनी हास्यास्पद बात कही है। कौन व्यक्ति होगा जो रोगी बनकर कष्ट उठाना चाहता है? कौन अपने धन और समय दोनों ही की बर्बादी करना चाहता है? कौन डाक्टरों के चक्कर लगाना चाहता है?
            इन सभी प्रश्नों के उत्तर में मैं फिर वही कहूँगी कि हम स्वयं ही इस सबके उत्तरदायी हैं। हम अपनी नादानी के कारण रोगी बनकर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हैं और अपना समय व धन दोनों ही को व्यर्थ गंवाते हैं।
             हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सदा लापरवाह रहते हैं। अथवा यूँ कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हम उसकी ओर बिल्कुल ही ध्यान ही नहीं देते हैं। हम स्वयं ही अपने सबसे बड़े दुश्मन बनते हैं। हमारा आहार-विहार, हमारे तौर-तरीके अथवा हमारी जीवन शैली सभी पूर्णरूपेण दोषपूर्ण है। इसके लिए कोई अन्य नहीं, हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
            स्वस्थ रहने के बेसिक नियम हैं कि समय पर सोओ और जागो, समय पर भोजन करो, प्रतिदिन सैर करने जाओ और व्यायाम करो। हम इन मूलभूत नियमों को अपनी व्यस्तता का बहाना बनाते हुए अनदेखा कर देते हैं।
              जिस रोटी को कमाने के लिए सारे प्रपंच रचते हैं, झूठ-सच करते हैं, पाप-पुण्य के कार्य करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। समय-असमय खाने से भोजन ठीक से नहीं पचता और हम परेशानी में आ जाते हैं। हमारी सारी पार्टियाँ रात देर तक चलती हैं, शादियों में बारातें भी आधी रात में पहुँचती है। स्वाभाविक है कि हम देर रात घर लौटेंगे और देर से ही सोएँगे। इसलिए प्रात: भी देर से ही जागेंगे। नाइट शिफ्ट वाली नौकरी भी इसका एक कारण कही जा सकती है। सारा दिन शरीर अलसाया-सा टूटता हुआ रहेगा। उसमें स्फूर्ति नहीं रह सकती।
            अपनी व्यस्त जीवनचर्या में हम अपने खान-पान को सुधार नहीं पाते। न चाहते हुए भी मोटापे के शिकार होते जाते हैं जो सब बिमारियों का मूल कारण है। इन सबके अतिरिक्त हमारे शौक अथवा अपनी शान बघारने के लिए पार्टियों में पी जाने वाली शराब अथवा अन्य किसी प्र्कार के नशीले पदार्थों का सेवन भी शरीर को खोखला बनाता जा रहा है। सारा समय की जाने वाली टेंशन भी शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है।
            हमें अपनी ऋतुचर्या के विषय में तो शायद ज्ञान ही नहीं है। हम नहीं जानते कि किस मौसम में क्या खाना चाहिए और क्या पहनना चाहिए? यह अज्ञानता भी हमारे अस्वस्थ होने का एक प्रमुख कारण हैं। जंक फूड भी हमारी अस्वस्थता का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। सभी समझदार और डाक्टर लोग हमें समय-समय पर चेताते रहते हैं पर हम हैं कि उस शिक्षा पर अमल न करने की कसम खाए बैठे हैं। तब इसका खामियाजा हम बीमार पड़कर चुकाना पड़ता है।
          हमारा शरीर हमें बार-बार चेतावनी देता रहता है और हम अपनी शान बघारते हुए उसे अनदेखा करते रहते हैं। तब फिर उसका परिणाम हमें रोगों से आक्रान्त हो करके भुगतना पड़ता है। यदि वास्तव में हम अपना मित्र बनना चाहते हैं तब हमें स्वयं से शत्रुता निभाना छोड़कर स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना पड़ेगा अन्यथा रोगो की चपेट में आकर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपने बहुमूल्य समय और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को व्यर्थ ही गंवाना पड़ेगा।
            कभी-कभी पर्याप्त आराम के बाद भी महसूस होने वाली थकान एनीमिया, थायराइड या हृदय रोग का संकेत हो सकता है। इसी प्रकार बिना कोशिश किए वजन का तेजी से घटना या बढ़ना थायराइड या कैंसर की चेतावनी हो सकता है। सीने में जकड़न या सॉंस का फूलना हृदय सम्बन्धी समस्याओं के गम्भीर संकेत हो सकते हैं। मखमली काले धब्बे, नए या बदलते तिल और त्वचा का पीला पड़ना त्वचा में बदलाव के संकेत होते हैं।
          बार-बार पेट फूलना, कब्ज, या दस्त होना पाचनतन्त्र की गड़बड़ी से होते हैं। अत्यधिक चिन्ता, तनाव या अनिद्र मानसिक और भावनात्मक संकेत होते हैं। धुंधली दृष्टि, आँखों में लगातार खुजली होना या लाली हो जाना आंखों की समस्या के कारण होते हैं। शरीर से मिलने वाले इन संकेतों को 'फायर अलार्म' की तरह समझना चाहिए। यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाकर जॉंच करवानी चाहिए।
           संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शरीर हमें बार-बार थकान, अनिद्रा, अचानक वजन में गिरावट, सिरदर्द, त्वचा की समस्याओं या सीने में दर्द जैसे संकेतों के माध्यम से गम्भीर बिमारियों की चेतावनी देता है। इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि ये तनाव, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, या हृदय रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। समय पर जॉंच और डॉक्टर से परामर्श करके बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 3 मई 2026

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

भारतीय संस्कृति में गृहस्थ जीवन का बहुत महत्त्व है। दो युवा मिलकर जब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं तब उसे चलाने का दायित्व उन दोनों पर होता है यानी पति और पत्नी दोनों का होता है। परन्तु पति प्राय: यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयत्न करता है कि यह तुम्हारा अपना घर है, बच्चे भी तो तुम्हारे हैं और मैं भी तुम्हारा हूँ, तुम जैसे चाहो अपने इस घर को चला सकती हो।
            पति-पत्नी का मुख्य धर्म एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान, विश्वास और सहयोग के साथ गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाना होता है। दोनों का कर्तव्य है कि वे विपरीत परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहारा बनें, सही मार्ग पर चलने में सहायता करें, और नैतिक मूल्यों को बनाए रखते हुए परिवार व समाज के कल्याण के लिए साथ मिलकर कार्य करें। पति को गलत रास्ते पर जाने से रोकना और पतित या गलत रास्ते पर जाने से बचाना पत्नी का दायित्व होता है। 
            पति के साथ सम्मानपूर्वक रहना और घर-परिवार को सुखी रखना भी पत्नी का कर्तव्य होता है। दोनों के निस्वार्थ प्रेम और समर्पण की भावना से घर-परिवार में स्वर्गिक सुख-शान्ति का वातावरण बनता है। वैवाहिक जीवन में प्रेम और सम्मान के साथ एक-दूसरे की जरूरतों को समझना आवश्यक होता है। पति-पत्नी का काम सुख-दुःख में साथ रहकर अपनी जिम्मेदारियों का साझा करना होता है। यह एक-दूसरे को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने का आपसी सम्बन्ध कहलाता है। 
            घर के मुखिया के रूप में परिवार के प्रति अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना चाहिए। पत्नी और बच्चों की शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा करना पति की जिम्मेदारी होती है। पत्नी के विचारों को आदर देना और उससे पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए। पति नामक प्राणी का पत्नी को तथाकथित रूप से महिमा मण्डित करके अपनी जिम्मेदारियों से भागने का यह बहुत अच्छा उपाय है। उस समय का उपयोग वे घर से बाहर जाकर दोस्तों से गपशप करके, मौजमस्ती करके बिताते हैं। घर में क्या हो रहा है? इससे वे अनजान रहना चाहते हैं अथवा बेखबर रहने का ढोंग करते हैं।
            जहाँ तक घर चलाने की बात है, उसके लिए यही कहा जा सकता है कि पति और पत्नी दोनों की समान सहभागिता की आवश्यकता होती है। आज यह ज्वलन्त प्रश्न है कि घर और बाहर दोनों मोर्चों को स्त्री सम्हाल सकती है तो पुरुष क्यों नहीं?आज मंहगाई के दौर में यदि दोनों कार्य न करें तो जरूरतों को पूरा करना कठिन हो जाता है। दोनो घर से एक ही समय पर जाते हैं और संध्या समय भी एक ही समय पर वापिस लौटते हैं। 
            उस समय भी कुछ अपवाद छोड़ दीजिए, प्राय: पुरुष चहते हैं कि वे महाराजा की तरह बैठे रहें और पत्नी उसकी तिमारदारी में जुट जाए। एक गिलास पानी वह खुद होकर न लें और एक कप चाय भी उन्हें टेबल पर बैठे हाजिर हो जाए। यदि ऐसा न हो पाए तब तकरार होने से कोई नहीं रोक सकता। उस समय पुरुष भूल जाता है कि पत्नी भी उसकी ही तरह थकी-हारी आई है। वह भी एक इन्सान है, उसे भी एक गिलास पानी या एक कप चाय की इच्छा हो रही होगी। 
            पत्नी की कमाई पर ऐश करना या हक जताना तो पुरुष का अधिकार है परन्तु उसे उसी के अनुरूप सुख-सुविधा देने के दायित्व से वह भागता फिरता है। यह दोहरा मापदण्ड किसलिए? हमारी समझ से बाहर की बात है। घर की औरत यदि दफ्तर से आकर किचन का कार्य देख रही है तो उसे भी उसका हाथ बटाना चाहिए, इससे उसके सम्मान को कोई आँच नहीं आती। बच्चों को उनकी पढ़ाई में सहायता करना भी उसका उतना ही दायित्व है। पढ़ी-लिखी पत्नी का क्या लाभ यदि वह यह सब काम न कर सके? ऐसा कहकर पुरुष फिर अपने कर्त्तव्यों से पलायन करना चाहता है।
            पति बीमार हो तो चाहता है पत्नी उसकी तिमारदारी करे, उसके आगे-पीछे चक्करघिनी बनी घूमती रहे। परन्तु यदि पत्नी बिमार हो जाए तो वह सोचता है कि वह नाटक कर रही है। उस समय भी पत्नी की ओर से प्राय: पुरुष लापरवाह हो जाते हैं। ऐसे कष्ट के समय वे उसकी सहायता नहीं करते। यदि वह कुछ कह दे तो फिर घर में महाभारत का युद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता। 
             हम सब जानते हैं कि विदेशों में जहाँ काम करने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए वहाँ जाकर दोनों मिल-जुलकर कार्य कर लेते हैं। परन्तु अपने देश में पुरुष घर के कार्य करने में अपनी हेठी समझते हैं। वे बड़े गर्व से कहते हैं कि हमें तो घर का कोई काम करना नहीं आता। देखा जाए तो यह कोई घमण्ड करने वाली बात नहीं। वास्तव में इस विषय पर सीरियस होकर सोचने की बहुत ही आवश्यकता है।
            विशेष रूप से विचार्य है कि जब घर आप दोनों का है तो सभी दायित्व भी आप दोनों के साझे हैं। किसी एक पक्ष को दूसरे का शोषण करते हुए उसे मानसिक आघात नहीं देना चाहिए। पुरुष को अपने श्रेष्ठ होने के पूर्वाग्रह को त्यागकर अपने घर-परिवार के लिए पूर्णरूप से समर्पित रहना चाहिए। तभी गृहस्थी की गाड़ी के दोनों पहिए ठीक से चल पाते हैं अन्यथा मनमुटाव बढ़ते-बढ़ते अबोलापन होने लगता है। धीरे-धीरे अलगाव होने की स्थिति बनने लगती है जो किसी भी तरह समाज में स्वीकार्य नहीं हो पाती।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 2 मई 2026

झूठे अहं से किसी का भला नहीं

झूठे अहं से किसी का भला नहीं 

मनुष्य के मानस पर यह निर्भर करता है कि वह अपने रास्ते में फूल बिछाना चाहता है अथवा काँटे। फूलों की कोमलता, सुन्दरता, आकर्षण और सुगन्ध के कारण हर व्यक्ति उनकी कामना करता है। परन्तु कठोर और दम्भी काँटों से लहुलूहान हो जाने के डर से सभी लोग उनसे बचते हुए किनारा करना चाहते हैं। इसलिए लोग फूलों और कॉंटों में से फूलों का चुनाव करते हैं। वे उन्हें सुगन्ध देते हैं और उनका मन मोह लेते हैं।
             मंगल की कामना करने वाला हर मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य कर जाता है जिनका नुकसान उसे अपने जीवनकाल में उठाना ही पड़ जाता है। कार्य करते समय तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु उसका फल भोगते समय उसे कष्ट होता है।
           बचपन में एक कहानी पड़ी थी जो आज भी उतनी ही सटीक है। एक हाथी प्रतिदिन नदी में स्नान करने के लिए जाता था। उसके रास्ते में एक दर्जी की दुकान पड़ती थी। हाथी को अपनी दुकान के सामने से हर रोज गुजरते हुए देखकर दर्जी के मन में शरारत सूझी। अब इन्सानी दिमाग है तो कभी-न-कभी कोई खुराफात कर ही बैठता है। इस तरह वह अनजाने में अपने लिए परेशानी मोल ले लेता है। उसका परिणाम भोगते समय उसे नानी याद आने लगती है।
           उसने एक दिन अपनी सुई ली और दुकान के सामने से जाते हुए उस हाथी को चुभो दी। अब तो यह नित्य का क्रम बन गया कि हाथी वहाँ से गुजरता और दर्जी उसे सुई चुभो देता। अकारण पीड़ित होते हुए हाथी को उस दर्जी पर क्रोध आने लगा। एक दिन हाथी ने उस शरारत करने वाले दर्जी को सबक सिखाने की सोची।
           फिर क्या था, वह हाथी नदी पर स्नान करने के लिए गया और अपनी सूँड में पानी भरकर ले आया। वापसी पर जब दर्जी की दुकान आई तो उसने सूँड में भरा हुआ सारा पानी वहाँ उड़ेल दिया। हाथी के ऐसा करने पर उस दर्जी की दुकान पर रखे हुए बहुत सारे ग्राहकों के कपड़े खराब हो गए और उसे बहुत नुकसान हो गया। तब उसे पश्चाताप हुआ कि उसने व्यर्थ ही हाथी जैसे शक्तिशाली जीव से पंगा ले लिया।
            तीर जब कमान से निकल जाता है तो उसे लौटाकर नहीं लाया जा सकता। उस समय मात्र पश्चाताप ही शेष बचता है। यही स्थिति उस दर्जी की भी हो गई। अब उसके पछताने से कुछ भी बदलने वाला नहीं था। अपने नुकसान की भरपाई करने के अतिरिक्त उसके पास अब और कोई चारा नहीं बचा था।
          यह कहानी हमें यही समझा रही है कि दर्जी की तरह ही कभी ईर्ष्या से, कभी मौज-मस्ती के कारण और कभी अपनी मजबूरी में हम दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाते रहते हैं। फिर दर्जी की भाँति हानि उठाकर दुखी हो जाते हैं और तत्पश्चात पश्चाताप करते हैं।
            यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि वह जो व्यवहार वह दूसरों के साथ कर रहा है क्या वही व्यवहार वह अपने लिए चाहता है? यदि उसे वह व्यवहार अपने लिए पसन्द है तो फिर सब ठीक है। परन्तु यदि उसे अपने लिए वह व्यवहार नहीं चाहिए तो कहीं-न-कहीं गड़बड़ है। तब उसे दूसरों के साथ ऐसा कोई बरताव नहीं करना चाहिए जो दूसरे के हृदय को तार-तार कर दे।
            इस प्रकार मनुष्य जानते-बूझते गलत रास्ते पर चल रहा है और दूसरों के रास्ते में काँटे बिछा रहा है। यही काँटे समय बीतते उसके मार्ग पर बिछकर उसे घायल कर देते हैं। इसलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि बबूल का पेड़ बोकर आम का फल नहीं पाया जा सकता।
            इसके विपरीत दूसरों के लिए फूल बरसाने वालों को सर्वत्र सुगन्ध ही मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि फूलों की तरह उनका यश चारों ओर फैलता है।
            अपने झूठे अहं और अनावश्यक पूर्वाग्रह पालने से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। ये सदा ही विनाश का कारण होते हैं। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
    जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
    तोको फूल के फूल हैं वाको हैं तिरसूल।।
अर्थात् जो हमारे लिए काँटे बोता है, उसके लिए भी फूल बोने चाहिए। हमें तो जीवन में फूल रूपी सुख मिल जाएँगे पर उसे दुख ही मिलेंगे।
           इस दोहे का आशय यह है कि बदले की भावना न रखकर, शत्रु के प्रति भी क्षमा और प्रेम का भाव रखना चाहिए। इसका कारण है कि भलाई का फल सुख और बुराई का फल दुख यानी त्रिशूल होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें क्षमा, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार की शिक्षा देता है। 
         ‌‌   बुराई को प्रेम से जीता जा सकता है और ईर्ष्या-द्वेष का उत्तर प्रेम से देना चाहिए। साथ रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने अहं का परित्याग करना चाहिए। इससे हमारा मन शान्त रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 1 मई 2026

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता बेशक बूढ़े हो जाएँ पर वे घर के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होते हैं। वे घर में रहते हुए चाहे शारीरिक कार्य पूर्ववत दक्षता से न कर सकें परन्तु फिर भी वे बहुत सारे कार्य संवारते रहते हैं। हालाँकि वृद्धावस्था में किसी भी कार्य के सम्पादन में उन्हें कठिनाई होती है पर फिर भी घर में बैठे हुए ही वे उस घर की रौनक होते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र ही अपने बच्चों के मन को यह विश्वास दिला देती है कि वे एकल परिवार के बच्चों की तरह अकेले नहीं हैं। 
             छतनार वृक्ष का अर्थ ऐसे घने और फैले हुए पेड़ से है जिनकी शाखाऍं और टहनियॉं छाते यानी छतरी की भॉंति दूर तक फैली होती हैं। ये वृक्ष घनी छाया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए महुआ, नीम और पीपल जैसे वृक्षों को उनके फैलाव के कारण छतनार कहा जाता है। ये वृक्ष एक विशाल छत्र की तरह दिखाई देते हैं। ये पेड़ भीषण गर्मी में भी अपने नीचे बैठने वालों को ठण्डी और सघन छाया प्रदान करते हैं। साहित्य में 'छतनार वृक्ष' का उपयोग सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैसे एक मॉं का अपने बच्चे को प्यार और सुरक्षा देना।
           बच्चे अपनी हर छोटी-मोटी समस्या को अपने बुजुर्ग होते हुए माता-पिता से शेयर करके चिन्ता मुक्त हो सकते हैं। बड़ों के रहते हुए मनुष्य बिना टेंशन के कहीं भी आ जा सकता है। उन्हें अपने बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। वे चिन्ता मुक्त होकर अपने आफिस में ध्यानपूर्वक कार्य कर सकते हैं। बड़ों के रहते उन्हें अपने घर में ताला तक लगाने की आवश्यकता नहीं होती। बहुत से घरों में तो उनकी मृत्यु के पश्चात जब ताले ढूँढे जाते हैं तो वे नहीं मिलते।
          जिस प्रकार पेड़ बेशक बूढ़ा हो जाए तो भी उसे अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए। वह फल तो शायद नहीं दे पाएगा पर छाया अवश्य ही देगा। उस वृक्ष पर आकर जब विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं तब उस घर का प्रकृति के साथ जुड़े रहने का एक सुखद अहसास होता है। उसी प्रकार घर के वयोवृद्ध माता-पिता को यथोचित सम्मान देना बच्चों का नैतिक दायित्व है।
            यद्यपि अपनी ढलती हुई आयु के कारण वे धन-दौलत नहीं कमा सकते परन्तु बच्चों को अवश्य संस्कार दे सकते हैं। उनके संस्कार और जीवन के अनुभव से संस्कारित हुए बच्चे ही घर, परिवार, देश और समाज के लिए बहुमूल्य रत्न बनते हैं। इन्हें हर स्थान पर सम्मान मिलता है और चारों दिशाओं में इनका यश फैलता है।
            माता-पिता मनुष्य के लिए जीते-जागते भगवान होते हैं जो उन्हें इस दुनिया में लाने का महान् कार्य करते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में सिर उठाकर शान से चल सके। अपने जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटा सकें। अपने निस्वार्थ प्यार और सेवा के साथ-साथ वे अपना सर्वस्व बच्चों को सौंप देते हैं।जो भी धन-सम्पत्ति परिश्रम से उन्होंने अपने जीवन में कमाई होती है, उसे सहर्ष अपने बच्चों को सौंप‌ देते हैं।
              बच्चों का भी यह दायित्व बनता है कि वृद्धावस्था में उन्हें असहाय न छोड़ें। बच्चे भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का सम्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं। उन बच्चों को यह शोभा नहीं देता कि वे तो अपने जीवन में ऐश्वर्य भोगें और उनके माता-पिता दर-बदर की ठोकरें खाएँ, दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ अथवा बिना उचित इलाज के इस दुनिया से विदा ले लें। अपने को असहाय मानकर दूसरों के रहमो कर्म पर जीवित रहें अथवा बच्चों के होते हुए किसी ओल्ड होम की शरण लें।
             बच्चे को अंगुली थामकर चलाते समय हर माता-पिता का सपना होता है कि बड़ा होकर उनका बच्चा कभी उनसे अंगुली छुड़ाकर उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ेगा। वे सदा अपने नाती-पोतों की मोहिनी मुस्कुराहटों और बाल सुलभ चंचल अदाओं के बीच जीना चाहते हैं। हर मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि माता-पिता का अनादर करने वाला सब कुछ होते हुए भी कंगाल होता है। उसे जीवन भर सुख-चैन नहीं मिलता। उसके मन का कोई कोना सदा ही रीता या खाली रह जाता है। उसे भरने के सारे भौतिक प्रयास असफल रह जाते हैं।
          भगवान गणेश ने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माँ भगवती की परिक्रमा करके संसार के समक्ष उदाहरण रखा था कि माता-पिता ही उनका सम्पूर्ण संसार हैं। उन्हीं के चरणों में ही मनुष्य का वास्तविक स्वर्ग होता है। चारों धामों की यात्रा मनुष्य करे अथवा न करे परन्तु अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा करने वाले को सारे तीर्थों का फल घर में  बैठे हुए ही मिल जाता है। इसीलिए भगवान राम और श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों की कामना सभी माता-पिता ईश्वर से करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

बातचीत का रास्ता बन्द न करें

बातचीत का रास्ता बन्द न करें 

लड़-झगड़कर मुँह फुलाकर अलग-थलग होकर बैठ जाना अथवा अपने-अपने रास्ते चल देना किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान आपस में मिल-बैठकर किया जाता है। यानी कोशिश यही रहनी चाहिए कि बातचीत का रास्ता बन्द न हो। बातचीत अक्सर किसी रिश्ते में तनाव, नाराजगी या मतभेदों के कारण बन्द होती है। इसे खत्म करने के लिए सामने वाले की पसन्द की बातों में रुचि लेना, बोरिंग बातें शुरू कर उन्हें ऊबा देना, या शान्त माहौल में सीधे संवाद शुरू करना जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं। 
            यदि सम्भव हो तो सामने वाले व्यक्ति से सीधे पूछना चाहिए कि क्या हुआ है? और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाए। कभी-कभी 'ओह ठीक है' जैसी संक्षिप्त प्रतिक्रियाऍं बातचीत को बन्द करने का संकेत दे सकती हैं जो वास्तव में कभी-कभी अशिष्ट लग सकता है। बातचीत बन्द होने पर उसे फिर से शुरू करना या उसे खत्म करना मनुष्य की स्थिति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके सम्बन्धों पर निर्भर करता है। जब परिवार में कोई सदस्य बातचीत बन्द कर देता है तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। धैर्य से उसे सुलझाया जा सकता है।
          सम्बन्धों में कितनी भी कटुता क्यों न आ जाए उनसे किनारा नहीं किया जा सकता। देर-सवेर उन्हें सुधारना ही पड़ता है। जब सब कुछ बिगड़ जाता है तब उन्हें जोड़ने पर एक गाँठ-सी पड़ जाती है। बाद में यही कहकर उन्हें भूलना होता है कि 'पुरानी बातों पर मिट्टी डालो और उन्हें भूल जाओ।' बड़े-बुजुर्ग गलत नहीं कहते। मिल-जुलकर, एक होकर रहने की शक्ति से हम सभी परिचित हैं।
          समाज में, अपने आस-पड़ोस में, अपने कार्यक्षेत्र में अर्थात् हर स्थान पर यदाकदा मनमुटाव हो जाते हैं। हर व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका सब अलग-अलग होते हैं। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक होता है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि तब उस व्यक्ति विशेष से हम शत्रुता मोल ले बैठें। समय बीतते हमारी यही कटुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी की दुश्मनी बन जाए, जिसका अन्त सुखद कम और दुखद अधिक होता है। इससे किसी का हित नहीं साधा जा सकता है। प्राय: प्राय: व्यवहार में हम देखते हैं।
             दो लोगों या समूहों में भी यदि कभी झगड़े की स्थिति बनती है और थाना-पुलिस अथवा कोर्ट-कचहरी में जाने की नौबत आ जाती है तब भी अन्तत: समझौता ही करना पड़ता है। दोनों पक्षों को शेक हेंड करके ही मुक्ति मिलती है।
              अपने घर में बच्चों के झगड़े होते ही रहते हैं। तब हम उन्हें गले मिलवाकर एक-दूसरे सॉरी कहलवा देते हैं। यानि कि उनमें समझौता हो जाता है और बच्चों के साथ-साथ हम भी खुश हो जाते हैं। उन्हें हम यही शिक्षा देते हैं कि झगड़ा मत करो, प्यार से रहो, गलती हो जाने पर माफी माँग लो और मिलकर रहो। बच्चों को हम सीख दे देते हैं और उनका कोमल मन हमारे प्रति सम्मान के कारण उसे मान लेता है। 
            जब हम बड़ों की बारी आती है तो हमारा अहं आड़े आ जाता है। हम दूसरों को दी हुई अपनी ही सीख को भूलकर अक्खड़ या हठी बन जाते हैं। बच्चे यदि हमारी बात को अनसुनी करना चाहते हैं तो उन्हें डपटकर, हम अपनी बात मनमवाते हैं। उनके समक्ष स्वयं क्या उदाहरण रखते हैं?
             घर-परिवार में होने वाले झगड़े प्राय: गलतफहमियों अथवा गलत फैसलों के कारण होते हैं। जिस प्रकार नाखूनों से माँस को कभी अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भाई-बन्धुवों से पूर्वाग्रह के कारण किनारा नहीं करना चाहिए। सयाने कहते हैं 'अपना मारेगा भी तो छाया में फैंकेगा।' रिश्तों के धागों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए, उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए। फिर जब जोड़ने का समय आता है तो मन में एक कसक रह जाती है। कभी-कभी यह अहसास हो जाता है कि बिना किसी की खास गलती के इतने समय तक हम एक-दूसरे को दोषी मानकर कोसते रहे। 
            हम राजनैतिक कूटनीति पर नजर डालें तो देखते हैं कि युद्ध के बाद भी दो देशों को आखिर समझौता ही करना पड़ता है। वहाँ पर दुश्मनी के बाद भी बातचीत बन्द नहीं की जाती।
             अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि उससे किसी का अहित न हो। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। अपनी हठधर्मिता को त्यागकर और मिल-बैठकर सदा ही सकारात्मक समझौते होते हैं। उनका मान रखने से सबको प्रसन्नता होती है जो अमूल्य होती है। अपनों का साथ बड़े ही भाग्यशालियों को मिलता है। इस सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने से सबको बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

प्राणों का महत्त्व

प्राणों का महत्त्व

हमारे शरीर में रहने वाले प्राण जीव के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्राणों के बिना हमारा शरीर राख की ढेरी के समान बन जाता है। शरीर से प्राणों के निकल जाने के बाद अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति को भी मनुष्य घर में नहीं रहने देता। शीघ्र ही वे उसे अग्नि को समर्पित कर देता है। यदि ऐसा न किया जाए तो कुछ दिनों पश्चात उस शव में से दुर्गन्ध आने लगती है। 
           'छान्दोग्योपनिषद्' में  एक कथा के माध्यम से प्राणों का महत्त्व समझाया गया है। कथा इस प्रकार है कि प्राचीन काल में एक बार सभी इन्द्रियॉं अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगीं। यानी आँख, नासिका, कान (श्रवण शक्ति), जिह्वा(बोलने की शक्ति), मन और प्राण सभी अपने आप को दूसरी इन्द्रियों से श्रेष्ठ बता रहे थे। इसलिए उनमें विवाद होने लगा और फिर उनका झगड़ा बहुत बढ़ने लगा। सभी इन्द्रियॉं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुॅंच पा रही थीं। सभी इन्द्रियॉं अपनी इस समस्या का समाधान चाहती थीं।
            अन्त में वे सभी अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास गईं और उन्हें अपने विवाद का कारण बताया। उन्होंने उन सबको कहा, "जिसके शरीर से बाहर चले जाने के बाद सब समाप्त हो जाए वही श्रेष्ठ है।" 
         सभी इन्द्रियों ने इस सुझाव को मान लिया और उस पर अमल करने का फैसला किया।
          सबसे पहले आँखें शरीर से एक वर्ष के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसने उन सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
          उन सबने उत्तर दिया, "जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कानों से सुनता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ और मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           फिर नासिका (सूँघने की शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने  वापिस लौटकर सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे न सूँघते हुए व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, वाणी से बोलता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           उसके पश्चात कान (श्रवण शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"  
            उन सब ने उत्तर दिया, "जैसे एक बहरा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
            फिर वाक्(बोलने की शक्ति) बाहर चली गई। उसने भी लौटकर वही पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
          उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे एक गूॅंगा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
           फिर उसी तरह से मन ने भी एक साल के पश्चात लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे? 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे बिना मन के बच्चा आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
         अन्त में जब प्राण शरीर को छोड़कर बाहर निकलने लगे तो पल भर में ऐसा लगने लगा मानो सब कुछ समाप्त हो रहा है। उस समय सभी इन्द्रियाँ एकसाथ चिल्लाने लगीं, "मत जाओ, मत जाओ। तुम्हारे बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। तुम चले जाओगे तो सब समाप्त हो जाएगा। हमें समझ आ गया है कि तुम्हीं हम सब में श्रेष्ठ हो।"
            यह उपनिषद् कथा हमें प्राणों का महत्त्व समझा रही है कि उनके बिना इस शरीर का कोई मूल्य नहीं। नश्वर शरीर में रहने वाली अनश्वर आत्मा को हम संसार की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हम सारा समय इस शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। इसी को सदा सजाते-संवारते रहते हैं और इतराते रहते हैं। हम इस बात को भी नजरअंदाज कर देते हैं कि जब यह रूप-यौवन जल्दी ही ढल जाएगा तो फिर क्या होगा? 
            हमारी यह आत्मा अविनाशी ईश्वर का एक अंश मात्र है। परमात्मा की भॉंति यह भी नित्य और नूतन है। हमारे इस भौतिक शरीर के मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी यह सदैव विद्यमान रहती है। यह युगों-युगों तक रूप बदल-बदलकर इस संसार में जन्म लेती रहती है। हमारी आत्मा अपने पुराने, रोगी अथवा कटे-फटे शरीरों का त्याग करके नए शरीर को धारण करती रहती है। अत: आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद