शनिवार, 29 अगस्त 2026

लोकप्रिय होना महानता का प्रतीक नहीं

लोकप्रिय होना महानता का प्रतीक नहीं 

लोकप्रियता की कामना हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है। लोग व्यक्ति विशेष के लोकप्रिय होने को महानता का प्रतीक मानते है। हर व्यक्ति की यह हार्दिक इच्छा होती है कि समाज में उसका अपना एक स्थान हो। लोग उसे इज्जत भरी नजरों से देखें। जब भी उन्हें कोई समस्या हो, तब अपनी परेशानी की अवस्था में वे उसके पास आकर निदान लिए उसका परामर्श लें।
          हम कह सकते हैं कि हर लोकप्रिय व्यक्ति महान नहीं होता और कई महान लोग अपने जीवनकाल में लोकप्रिय नहीं हुए। इसलिए केवल प्रसिद्ध होना महानता का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लोकप्रिय होना और महान होना दोनों अलग बातें हैं। लोकप्रियता केवल क्षणिक प्रसिद्धि या लोगों की नजरों में आना होता है जबकि महानता चरित्र, सत्यनिष्ठा, त्याग और समाज के लिए किए गए स्थायी कार्यों का परिणाम है।
          ऐसा सोचकर ही कितना अच्छा लगने लगता है कि वह समाज की नजरों में आम आदमी न रहकर एक खास व्यक्ति बन गया है। तब उसका मन मानो बल्लियों उछलने लगता है, प्रसन्नता के कारण वह हिरण की तरह कुलाँचे भरने लगता है। 
          इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि तब उसे पाने के लिए मनुष्य सस्ती लोकप्रियता हासिल करने लग जाए अथवा ओछे हथकण्डे अपनाने लगे। जैसे कि आजकल कुछ लोग ऐसा करते हैं। इस तरह करके वे स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर डालते हैं यानी वे स्वयं ही अपने शत्रु बन जाते हैं। अपनी हानि तो वे करते ही हैं, उस पर जग हँसाई जो होती है सो अलग।
        लोकप्रिय होने के लिए, लोक की भलाई के लिए कुछ विशेष कार्य करने होते हैं, लोकरंजन के नहीं। लोकरंजन करते समय मनुष्य को कई प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं। इसलिए ऐसे कार्य जन साधारण के हित के लिए न होकर स्वयं अपना हित साधने वाले अधिक बन जाते हैं। इन कार्यों को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
          हम कह सकते हैं कि लोकप्रियता स्थायी नहीं होती। यह कम समय के लिए होती है। इसमें केवल भीड़ का ध्यान आकर्षित करना होता है। यह अक्सर दिखावे या ट्रेंड पर निर्भर करती है। सस्ती लोकप्रियता कभी भी सम्मान नहीं दिलाती।
          दूसरी ओर महानता गहन मूल्यों और सिद्धान्तों पर टिकी होती है। इसमें जनहित और समाज की भलाई के कार्य शामिल होते हैं। इसका प्रभाव सदियों तक रहता है, भले ही व्यक्ति को तुरन्त प्रशंसा न मिले। 
          देश, धर्म और समाज की भलाई के कार्यों को निस्वार्थभाव से करने वाले ही वस्तुतः इस संसार में लोकप्रिय होते हैं। मोमबत्ती की तरह स्वयं को तपाकर गलाने वाले ही वास्तव में परोपकारी कार्य कर सकते हैं। अन्यथा प्रदर्शन कर्त्ताओं की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है जिन्हें देखते ही सबके मन में आक्रोश उत्पन्न होने लगता है। ये ढकोसला करने वाले समाज में कभी अपना स्थान नहीं बना पाते चाहे लाखों रुपए क्यों न खर्च कर दें। 
      उन लोगों की मानसिकता यही होती है कि पैसे से वे हर जिन्स की तरह यश, मान और लोकप्रियता खरीद सकते हैं। परन्तु यह उनकी सरासर भूल होती है। यदि पैसे से सब कुछ खरीद जा सकता तो यह सब धनवानों की ही जागीर बन जाते। साधारण मनुष्य तो कभी इन्हें कमा ही नहीं सकता था।
          लोकप्रिय बनने के लिए मनुष्य का व्यव्हार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि परोपकार करने वाला अहंकारी हो तो अपने सम्मान को बचाने के लिए लोग उससे कन्नी काटने लगते हैं। उसे व्यक्ति को दूसरों को भी मान देना चाहिए। सबको समदृष्टि से देखते हुए बिना पक्षपात किए, उन सबकी समस्याओं का निदान करना चाहिए। 
          दूसरों का हित साधने के नशे में आने के स्थान पर बादलों की तरह हमेशा नीचे देखते हुए देने वाला बनना चाहिए। उसके व्यवहार की सरलता, सहजता, मधुरता और उसकी सहृदयता आदि गुण ही सबको प्रभावित करते हैं। अपनी इन अच्छाइयों का त्याग मनुष्य को कभी नहीं करना चाहिए।
          बोलते समय भी उसे अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। ऐसा न हो की उसकी वाणी की अखड़ता किसी को भी आहत कर जाए और उसकी लोकनिन्दा का कारण बन जाए। ऐसे लोकप्रिय होते होते उसे अपमान का पात्र न बनना पड़े, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।
        दूसरों को सम्मानजनक शब्द आप या तुम से सम्बोधित करना चाहिए। अहं के द्योतक मैं शब्द का उपयोग यथासम्भव नहीं करना चाहिए। इस तरह वाणी और व्यवहार का संयम, दूसरों की चिन्ता और उनके प्रति सहानुभूति का भाव मनुष्य को दूसरों के हृदय में स्थान दिला देता है। फिर उसे लोकप्रिय बनने से संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

भाग्य के अनुसार समय पर मिलत

भाग्य के अनुसार समय पर मिलता

ईश्वर के साथ चाल चलने में किसी तरह का कोई आनन्द नहीं आता। अपने को मनुष्य कितना भी तीस मारखाँ क्यों न समझ ले हार तो उसी के खाते में ही आती है। उस मालिक से जीत जाना या पार पा सकना इस क्षुद्र मनुष्य नमक जीव के बस की बात नहीं है। मनुष्य तो गलतियों का पुतला है। वह कितना ही चौकस क्यों न रह ले, अवश्य ही वह कहीं-न-कहीं चूक कर देगा। यहाँ उसकी मात सौ प्रतिशत निश्चित होती है।
      मनुष्य को उसके भाग्य के अनुसार समय पर ही मिलता है। न उससे रत्ती भर कम और न ही उससे अधिक। उसके भाग्य में जो होता है, वह बिना कहे ही पता नहीं कैसे भी करके उसके पास आ जाता है। परन्तु जो उसके भाग्य में नही होता, वह उसके पास आकर भी उसके हाथ से निकल जाता है। वह बस मूक दर्शक की तरह देखता रह जाता है और बिलबिलाता रह जाता है।
          बचपन में एक कथा सुनी थी कि किसी राजा ने अपनी बेटियों से पूछा, "वे उसे कितना प्यार करती हैं?"
           एक बेटी ने उससे कहा था, "पिताजी मैं आपको नमक की तरह प्यार करती हूॅं।"
           उसकी यह बात सुनकर वह राजा नाराज हो गया था। उसने उस नाराजगी के फलस्वरूप उसे दण्ड देने का निश्चय किया। राजा ने उसकी शादी एक राह चलते भिखारी जैसे दिखने वाले किसी इन्सान से करवा दी। 
          माँ तो आखिर माँ होती है, उसे बेटी के दुर्भाग्य पर बहुत रोना आया। उसने राजा से छिपाकर कुछ धन उसे दे दिया। ताकि उसे शादी के एकदम बाद किसी तरह से परेशान न होना पड़े।
          वह राजकुमारी अपने पति के साथ नया जीवन आरम्भ करने के लिए निकल पड़ी। कोई ठिकाना नहीं था, कोई आसरा नहीं था। एक-दो दिन बाद ही माँ द्वारा दिया गया वह धन भी चोरी हो गया। अब उन दोनों के पास अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। 
        राजकुमारी बहुत हिम्मत वाली थी। उसने हार नहीं मानी और अपने पति के साथ मिलकर बहुत श्रम किया। अन्ततः उन्होंने अपना मनचाहा प्राप्त कर लिया। यानी एक सुन्दर-सा महल बना लिया और अपने राजसी ठाठ-बाठ जुटा लिए। फिर एक दिन बिना अपना परिचय दिए, पति को भेजकर अपने पिता को भोजन के लिए आमन्त्रण भिजवा दिया।
          पिता बेटी का वह ऐश्वर्य देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका। अब भोजन करने की बारी थी। सामने न आते हुए बेटी ने बहुत सारे व्यंजन खाने के लिए भेजे। उनमें एक भी नमकीन खाद्य नहीं था। राजा इतने सारे मीठे व्यंजन खाकर बहुत उकता गया और पूछ बैठा, "कोई नमकीन व्यंजन नहीं है क्या?
          तब वह बेटी बाहर आई और अपने पिता से बोली, "मैं आपकी वही बेटी हूँ जिसने आपको कहा था कि आप मुझे नमक की तरह अच्छे लगते हो तो आपने मुझे घर से बाहर निकल दिया था। केवल मीठा कोई नहीं खा सकता पर नमकीन कितना भी हो खाया जा सकता है। जब तक मीठे के साथ नमकीन न हो तो वह नहीं खाया जा सकता।" 
          उसकी बात सुनकर पिता को अपनी उस गलती का अहसास हुआ और पश्चाताप भी। उसने बेटी से अपने उस कुकृत्य के लिए क्षमा माँगी और उसे अपने गले से लगा लिया।
          कहने का तात्पर्य यही है कि जब राजकुमारी के भाग्य में नहीं था तो राजा की बेटी होते हुए भी सभी सुखों-ऐश्वर्यों से उसे वंचित होना पड़ा। इससे भी बढ़कर माँ के द्वारा की गई सहायता भी उसके काम न आ सकी। जब उसका भाग्य देने पर आया तो उसने उस राजकुमारी को सब कुछ दे दिया और मालामाल कर दिया।
          इसे हम भाग्य का फेर भी कह सकते हैं जिसने राजकुमारी को बैठे-बिठाए भिखारिन जैसी स्थिति में पहुँचा दिया। फिर समय बीतते-बीतते राजमहल के सारे ठाठ-बाट दे दिए। जैसे भगवान श्रीराम का अगली प्रातः राज्यतिलक होना था पर होनी ने उन्हें दरबदर कर चौदह वर्ष के लिए वनवास दे दिया। वे भगवती सीता और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अपने पिता के आदेश का पालन करने के लिए वन में चले गए।
        इसी प्रकार राजा हरिश्चन्द्र को अपनी पत्नी और अपने पुत्र सहित राज्य से बेदखल होकर चाण्डाल के यहाँ नौकरी करनी पड़ी। उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र को दास की तरह बेचना पड़ा। उनके इस कार्य का समर्थन मैं नहीं कर रही। परन्तु इतिहास में ऐसा ही विवरण प्राप्त होता है। 
          राजा हरिश्चन्द्र के जीवन की घटना लिखने का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि भाग्य कैसे-कैसे खेल इन्सान को खेलने के लिए विवश करता है। मनुष्य बस कठपुतली बना उसकी डोर पर नाचता रहता है। उसके पास इसके अतिरिक्त और कोई चारा भी तो नहीं है। वह चाहकर भी इसका प्रतिवाद नहीं कर सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

जीवन शतरंज के खेल की तरह

जीवन शतरंज के खेल की तरह

जीवन शतरंज के खेल की तरह है। इसमें उठाया गया हर कदम या चाल वापस नहीं ली जा सकती, और हर निर्णय भविष्य की दिशा तय करता है। शतरंज के खेल और जीवन में कई समानताऍं हैं।  शतरंज की तरह जीवन में भी हर फैसला दूरदृष्टि के साथ लेना चाहिए। संकट के समय धैर्य और सही योजना ही जीत दिलाती है। राजा से लेकर प्यादे तक सबका अपना योगदान होता है।
           कभी-कभी तो मनुष्य जल्दबाजी में अथवा भावनाओं में बहकर ऐसी चाल चल देता है जिसका प्रभाव पूरे खेल पर यानी उसके जीवन पर पड़ता है। शतरंज के खेल में भी अच्छे खिलाड़ी भविष्य की कई चालों को पहले से देखते हैं वैसे ही जीवन में भी विवेक, धैर्य और दूरदर्शिता मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
           खिलाड़ी शतरंज में अधिक मूल्यवान मोहरों का जोखिम उठाता है। तब वह किसी महत्वपूर्ण मोहरे को खो देता है।शतरंज में बादशाह को अपने आखिरी मोहरों से घेर लिया जाता है। उस समय शतरंज के राजा तक कोई नहीं पहुॅंच सकता। मनुष्य स्वयं को जीवन में एकान्त में रहकर सुरक्षित महसूस करता है। कोई भी उसके पास नहीं आ सकता। शतरंज में वह बादशाह को खो देता है। वास्तविक जीवन में वह अपनी जान गॅंवा देता है।
            निश्चित मानिए कि यह खेल आप ईश्वर के साथ ही खेलते रहते हैं। मनुष्य की हर सही या गलत चाल के बाद ही वह मालिक अपनी अगली चाल चलता है। अब देखना यह होता है कि मनुष्य की चली गई चाल के बदले में चली उस प्रभु की चाल से उसे कितनी हानि होती है अथवा कितना लाभ होता है।
        वास्तविक जीवन में कई अपने भाई-बन्धु मनुष्य के साथ शतरंज का खेल खेलते हुए दिखाई दे जाते हैं। जीवनकाल में मनुष्य को जाने-अनजाने उनकी सीधी या टेड़ी चालों का जवाब देना पड़ जाता है।
          इसलिए जो कुछ भी मन में आए उसे साफ-साफ शब्दों को दूसरे के समक्ष कह देना चाहिए। इससे अपने मन का सुकून बना रहता है। सच बोलने से हमेशा फैसले होते हैं और झूठ बोलने से फासले अधिक बढ़ जाते हैं। अतः दूसरों की प्रसन्नता के लिए अपने मन का चैन खोना उचित नहीं होता।
          इस प्रकार दुनिया के व्यवहारों को देखकर मनुष्य बहुत कुछ सीख जाता है। जीवन का वास्तविक पाठ यही होता है जिसे जिन्दगी हर कदम पर उसे पढ़ाती है। जीवन की आखरी साँस तक इन अनुभवों का संग्रह करना चाहिए। इन्हीं अनुभवों का खजाना अन्ततः उसकी पूँजी बनता है। इसी की बदौलत वह समाज में एक सफल और समझदार व्यक्ति कहलाता है। मनुष्य को इसलिए चाहे मंजिल मिले या अनुभव दोनों को ही जुटाने में रत्ती भर भी संकोच नहीं करना चाहिए। ये दोनों जीवन के लिए बहुत उपयोगी चीजें हैं। 
        आज स्वार्थ इतना हावी होता जा रहा है कि मनुष्य को अपने और अपने परिवार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दिखाई देता। जन्म-जन्मान्तरों से टूटे हुए रिश्ते भी उस समय जुड़ जाते हैं जब किसी का स्वार्थ आड़े आने लगता है। यदि किसी का कोई काम अटक जाए तो मनुष्य गधे को भी बाप बनाने में देर नहीं करता।
          इन्सान कुछ लोगों को अपनी जिन्दगी मानता हैं पर कुछ लोगों के कारण उसकी जिन्दगी होती है। इनके अतिरिक्त यदि कुछ और विशेष लोग होते हैं तभी तो उसकी जिन्दगी होती है। ये सब अपने जब किसी भी कारण से परायों जैसे बनने लगते हैं तब अपने और पराए का भेद ही समाप्त हो जाता है। मनुष्य दुनिया में स्वयं को निपट अकेला मानने लगता है।
        परन्तु जब ये सारी जिन्दगियाँ अपने-अपने अहं और स्वार्थ के कारण परस्पर गडमड होने लगती हैं तो सभी रिश्ते तार-तार हो जाते हैं। आपसी विश्वास दरकने लगते हैं। मनमुटाव बढ़ जाने के कारण उनमें शत्रुता तक पनपने लगती है। जो किसी भी तरह स्वस्थ रिश्तों को जन्म नहीं दे सकती। तब मनुष्य को यह दुनिया ही शतरंज की चालों की तरह टेढ़ी-टेढ़ी चलती हुई दिखाई देने लगती है।
          जीवन में मिलने वाले कटु अनुभवों के कारण उसे अपने अंतस में सब टूटता और बिखरता हुआ-सा लगता है। सारे सम्बन्धों के साथ ही दुनिया से भी उसे वितृष्णा होने लगती है। तब उसकी किसी से मिलने की, बात करने की इच्छा ही नहीं रह जाती।
          इस प्रकार मनुष्य दुनिया के साथ जीवन की शतरंज खेलते हुए बहुत कुछ सीख जाता है। दूसरों द्वारा चली जाने वाली सारी सीधी व टेढ़ी चालों को धीरे-धीरे समझने लग जाता है। समय बीतते-बीतते वह चाहे-अनचाहे उन चालों का माकूल जवाब देना भी सीख जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 26 अगस्त 2026

क्रोध में कोई अहं फैसला न लें

क्रोध में कोई अहं फैसला न लें

मनुष्य जब क्रोध में हो तब उस समय उसे कोई अहं फैसला नहीं लेना चाहिए। मनीषी कहते हैं कि क्रोध अन्धा होता है, वह मनुष्य के विवेक का हरण कर लेता है। तब वह कुछ भी सोचने-समझने के काबिल नहीं रहता। उस समय वह अपने-पराए का भेद करने में असमर्थ हो जाता है। 
          अतः क्रोध और अहंकार में लिया गया मनुष्य का फैसला अक्सर जीवनभर के पछतावे का कारण बनता है। गुस्से के समय मनुष्य की विवेक शक्ति कम हो जाती है जिससे सही और गलत का फर्क मिट जाता है। यानी गुस्से में दिमाग की स्पष्टता खत्म हो जाती है और गलत फैसले हो जाते हैं। गुस्से में निकले कड़वे शब्द अपनों को दूर कर देते हैं। आवेग में उठाया गया कदम बाद में भारी दुख देता है। इसलिए आवेश में आकर कोई भी बड़ा कदम उठाने से बचना चाहिए। 
          उस क्रोध की अधिकता के समय लिया गया कोई भी निर्णय मनुष्य के विरुद्ध जा सकता है। दुर्भाग्यपूर्ण लिए गए अपने उस निर्णय के कारण फिर उसे जीवन भर प्रायश्चित करना पड़ सकता है। यह स्थिति मनुष्य के लिए अपरिहार्य बन जाती है जो उसके अवसाद का कारण बन जाता है। 
          इसी प्रकार जब मनुष्य किसी विशेष उपलब्धि अथवा किसी कारण से प्रसन्न हो तब उसे किसी से कोई वादा नहीं करना चाहिए। अधिक खुशी में इन्सान के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। तब ऐसा लगता है कि मानो उसे पंख मिल गए हैं और वह उड़ता फिरता है। उस समय भावना में बहकर किया गया वही वादा ही उसके जी का जंजाल बन जाता है। 
          रामायणकाल में महाराजा दशरथ की अन्तकाल में हुई दुर्दशा को आज तक स्मरण किया जाता है। इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि सोच-समझकर वादा करने वाले को कभी किसी के सामने नीचा नहीं देखना पड़ता। न ही उन्हें किसी के समक्ष नजरें नहीं झुकाकर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। इस घटना से मनुष्य को शिक्षा लेनी चाहिए।
          यदि कोई व्यक्ति किसी भी कारण से क्रोध दिलाना चाहे तो उसके झाँसे में नहीं आना चाहिए। यदि वह अपने उद्देश्य यानी गुस्सा दिलाने मे सफल रहता हैं तो निश्चित मानिए कि वह व्यक्ति विशेष उसके हाथ की कठपुतली बनता जा रहा है। वह जब चाहे उसे नाच नचा सकता है। फिर वह नैतिक-अनैतिक कोई भी अपना मनचाहा कार्य उससे करवा सकता है।
          क्रोध और प्रसन्नता मानव मन की दो अवस्थाएँ हैं। क्रोध में मनुष्य को अपना आपा नहीं खोना चाहिए, होश में रहना चाहिए। क्रोध के कारण दुर्वासा ऋषि को आजतक सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। इसी क्रोध के कारण ही मनुष्य के मन में प्रतिशोध लेने की दुर्भावना बलवती होने लगती है। 
          इस भावातिरेक में वह अपना विरोध करने वाले किसी का भी कत्ल तक कर बैठता है और फिर कानून का मुजरिम बनकर सारी जिन्दगी सलाखों के पीछे बिता देता है। उसके घर-परिवार के लोग और उसके भाई-बन्धु उससे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। जिनके लिए वह अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देता है, वही उस कृत्य के लिए उसकी भर्त्सना करते हुए नहीं थकते।
        प्रसन्नता भी मनुष्य के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है। बहुत से लोग होते हैं जिन्हें खुशी भी रास नहीं आती। इन खुशी के पलों में उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वे पतंग की तरह ऊँचे उड़ने लगते हैं और सोचते हैं कि उनकी डोर को कोई काटने का साहस नहीं कर सकता।
          दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब मनुष्य गुब्बारे की तरह फूलकर कुप्पा हो जाता है तब वह भूल जाता है कि कोई अपना ही उसमें पिन चुभोकर उन्हें धराशाही कर देगा और वे केवल देखता ही रह जाएगा, कुछ कर नहीं पाएगा।
        इस प्रसन्नता के आवेग में भी गलत फैसले ले लिए जाते हैं जो निकट भविष्य में जी का जंजाल बन जाते हैं। उस समय मनुष्य भूल जाता है कि उसकी यह खुशी ही उसके दुःख का कारण बन जाती है और वह मूक दर्शक बना बस हाथ मलता रह जाता है, कोई उपाय करने के लिए उसकी बुद्धि नाकाम हो जाती है।
         क्रोध आने की स्थिति में कुछ देर रुक जाना  चाहिए। लम्बी सॉंस लेनी चाहिए। उस परिस्थिति या व्यक्ति से कुछ पलों के लिए दूर हो जाना चाहिए। क्रोध शान्त होने तक किसी भी तरह की प्रतिक्रिया या बहस से मनुष्य को बचना चाहिए।
          मनुष्य के जीवन में क्रोध का आवेग हो अथवा प्रसन्नता का अतिरेक हो दोनों ही स्थितियों में उसे स्वयं पर नियन्त्रण रखना चाहिए। क्रोध यमराज का दूसरा रूप होता है, वह सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। अति प्रसन्नता भी विनाश का कारण बनती है। इसलिए दोनों की अति से यत्नपूर्वक बचना चाहिए, इसी में समझदारी और सबका कल्याण है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

संयुक्त परिवार और एकल परिवार के बच्चे

संयुक्त परिवार और एकल परिवार के बच्चे 

कुछ दशक पूर्व हमारे भारत देश में जब संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलन में थी तब घर-परिवार के सब लोग मिल-जुलकर रहते थे। सबके सुख-दुःख साझा होते थे और आपसी सौहार्द और भाईचारे के चलते वे सरलता से कट जाया करते थे। इसी प्रकार शादी-ब्याह आदि सभी शुभकार्य और त्यौहार भी भरपूर मस्ती से, आनन्द से मनाए जाते थे।
         संयुक्त परिवार और एकल परिवार दोनों में बच्चों का विकास अलग तरह से होता है। संयुक्त परिवार में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और चचेरे भाइयों का साथ मिलता है जिससे वे जल्दी मिलनसार बनते हैं। वहीं, एकल परिवार में माता-पिता का पूरा ध्यान मिलने से बच्चे अधिक स्वतन्त्र और आत्मविश्वासी होते हैं। 
         संयुक्त परिवारों की संख्या कम होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आज अधिकांश लोग रोजगार, व्यवसाय, शिक्षा या अन्य कारणों से अलग-अलग शहरों में रहने लगे हैं। बड़ी संख्या में लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। इसके कारण सभी सदस्यों का एक ही स्थान पर रहना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।
          आधुनिक संचार और परिवहन सुविधाओं ने भी संयुक्त परिवार की आवश्यकता को काफी हद तक कम कर दिया है। मोबाइल, संचार, इंटरनेट, वीडियो कॉल तथा बेहतर सड़क, रेल और हवाई यात्रा जैसी सुविधाओं के कारण परिवार के सदस्यों से सम्पर्क बनाए रखना और सप्ताहान्त में उनसे मिलकर वापस आना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है।
        आज के समय की तरह बेशक बहुत अधिक लोग तब पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, फिर भी परिवार एक सूत्र में बंधा हुआ होता था। आज की पीढ़ी उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपने योग्य होने के अहं का शिकार हो रही है। वे मात्र अपने स्वार्थ पूर्ण करना चाहते हैं। उन्हें उससे आगे कुछ सूझता ही नहीं है।
          शायद युवावर्ग के इस स्वार्थी रवैये के कारण ही संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं। उनके स्थान पर विदेशों की नकल करते हुए एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इन एकल परिवारों की ऊपरी चमक-दमक मन को अवश्य ही ललचाती  है। यह भी लगता है कि हम स्वतन्त्र हैं और जैसा चाहें अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं। किसी का कोई बन्धन नहीं है, न ही कोई रोकटोक है। 
          यह आजादी लगती तो बहुत अच्छी है परन्तु उससे होने वाली परेशानियाँ कहीं अधिक होती हैं। संयुक्त परिवारों के होते हुए किसी माता-पिता को अपने बच्चों की खाने-पीने, आराम करने, खेलने आदि की  चिन्ता नहीं रहती है। 
        माता-पिता अपना सारा ध्यान अपने कार्य पर लगा सकते हैं। जहाँ बड़े भाई-बहन होते हैं वहाँ बच्चों की गृहकार्य और पढ़ाई की चिन्ता भी समाप्त हो जाती है। लड़ते-झगड़ते बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता भी नहीं चलता। इन परिवारों के बच्चों को परस्पर मिलकर रहना, दूसरों को सहन करना, मिल-बाँटकर खाना, दूसरों के साथ सामञ्जस्य स्थापित करना आदि गुण बड़ों की देखादेखी अपने आप आ जाते हैं।
         जबकि एकल परिवार के बच्चे अत्यधिक ध्यान दिए जाने के कारण असहिष्णु, जिद्दी और नकचड़े हो जाते हैं। प्रायः उन बच्चों को किसी से भी मिलना पसन्द नहीं आता। यदि दो दिन के लिए भी मेहमान घर आ जाएँ तो वे परेशान हो जाते हैं। इसलिए वे किसी पार्टी या रिश्तेदारी में जाना नहीं चाहते। उन्हें सिर्फ अपने से मतलब होता है किसी दूसरे से नहीं।
        संयुक्त परिवार में रहते हुए घर में ताला लगाकर जाने की आवश्यकता नहीं होती। कहीं जाना हो तो बच्चों को घर पर छोड़ देने पर भी उनकी चिंता से मुक्त रहा जा सकता है। ऐसे परिवार हर दृष्टि से सुरक्षित होते हैं। कहते हैं- ‘एकता में बल होता है।’
        जिस तरह बच्चों की परवरिश संयुक्त परिवार में सरलता हो जाती है उसी प्रकार घर में बीमार व्यक्ति की तीमारदारी, बड़े- बुजुर्गों की देखभाल, आने वाले अतिथियों का स्वागत सत्कार, घर में किसी सदस्य के साथ कोई अनहोनी घटना का घट जाना आदि के समय सभी परिवारी जनों के सहयोग से इनका निभाव सरलता से हो जाता है। किसी एक को सारा समय खटना नहीं पड़ता। 
        एकल परिवार में रहते हुए यह सारी समस्याएँ सुलझाने में बहुत कठिनाई होती है। सबसे बड़ी बच्चों की चिन्ता सताती रहती है। जितनी अधिक बाजुएँ होंगीं, कार्य उसी अनुपात में होगा। वैसे आज का युवा अपना भला-बुरा अच्छी तरह समझता है। इसलिए वे संयुक्त परिवार की ओर लौट रहा है।
        हाँ, जो युवा रोजी-रोटी के चक्कर में घर से दूर रहते हैं, उनकी बात अलग है। वहाँ दूरी से अधिक उनकी मजबूरी होती है जिसके लिए उन्हें सदा कोसते नहीं रहना उचित नहीं होता।
          जहाँ तक सम्भव हो सके अपने निजी स्वार्थो और झूठे अहं को आड़े नहीं आने देना चाहिए । मनुष्य को परिवार का सुरक्षा कवच अपनाना चाहिए। इस प्रक्रिया में यदि अपने मन को मारकर बच्चों की सुरक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए समझौता भी करना पड़े तो यह सौदा किसी भी तरह से मँहगा नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 23 अगस्त 2026

माता की ममता और पिता की क्षमता

माता की ममता और पिता की क्षमता

इस असार संसार में दो ही असम्भव काम हैं - पहला है अपनी माता की ममता का मूल्य आँकना और दूसरा है अपने पिता की क्षमता का अनुमान लगा सकना।
       माँ का प्यार निस्वार्थ होता है जो बच्चे के जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। हर दुख और तकलीफ में बच्चा सबसे पहले 'माँ' को ही पुकारता है। माँ की ममता चुपचाप हर दर्द को सहन करके बच्चे को संवारती है। माँ की ममता एक ऐसी शक्ति है जिसका कोई मोल नहीं होता। यह एक ऐसी अनमोल कहानी है जिसमें एक माँ बिना किसी स्वार्थ के अपने बच्चे की खुशी के लिए अपना पूरा जीवन, अपने सपने और अपनी हर खुशी कुर्बान कर देती है। 
          पिता अपनी जी-तोड़ मेहनत और क्षमता से परिवार की हर जरूरत को पूरा करता है। पिता की मौजूदगी बच्चों को बाहर की दुनिया से लड़ने का हौसला और संबल देती है। पिता की क्षमता केवल कमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बच्चों को सही राह दिखाने की ताकत भी है। 
        आज की युवा पीढ़ी यह समझती है कि वह बड़ी हो रही हैं तो उसे समझदार कहलाने का लाइसेंस मिल गया है। परन्तु यह सोच तो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराई जा सकती। बच्चे भूल जाते हैं कि जीवन के जिस पायदान पर वे खड़े हैं उनके माता-पिता उसे पार करके वहाँ से कहीं आगे निकल आए हैं।
        उन्हें शायद अपनी इस बेतुकी सोच पर अधिक गर्व होता है कि वे बहुत योग्य हैं और दुनिया के बाकी सभी लोग उनके सामने हुक्का भरते हैं यानी मूर्ख हैं। यह कथन सर्वथा सत्य है कि पैदा होते ही वे बच्चे अपने बूते पर पूरी तरह से योग्य नहीं बन गए थे। उन्हें योग्यता के सोपानों पर सफलता से चढ़ने की ट्रेनिंग इन्हीं माता-पिता ने दी थी जिनका सम्मान करने में उनकी हेठी होती है।
        बच्चों को सदा यह बात याद रखनी चाहिए कि माता-पिता ने इस संसार में उन्हें जन्म देकर, उन्हें पढ़ा-लिखकर इस योग्य बनाया है कि वे आज सिर उठाकर समाज में जी रहे हैं। जो बच्चे माता-पिता को मान नहीं दे सकते उन्हेँ न समाज क्षमा करता है और न ही ईश्वर। उनकी सारी पूजा-अर्चना भी ईश्वर की दृष्टि में व्यर्थ हो जाती है यदि वे अपने माता-पिता का दिल दुखाते हैं या उनकी अवहेलना करते हैं।
        दुनिया में सिर्फ माता-पिता ही ऐसे हितचिन्तक होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ अपने बच्चों से प्यार करते हैं। माता-पिता बच्चों के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं। वे उनके लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी बच्चों को भूखे नहीं सोने देते। उनके सुख-दुःख को अपना मानते हुए सब स्वयं झेल जाते हैं, उन्हें गर्म हवा तक नहीं लगने देना चाहते।
          उनके लिए सब प्रकार साधन जुटाकर वे प्रसन्न होते हैं। इसलिए उनके प्यार और उनकी ममता की परीक्षा लेने के लिए उन बेचारों का अनावश्यक लाभ नहीं उठाना चाहिए और न ही उसका मोल नहीं लगाना चाहिए।   
        अपनी सफलता का रौब अपने माता-पिता को कभी नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि उन्होनें अपनी जिंदगी को हारकर ही अपनी सन्तान को जिताया होता है। इसीलिए कहा जाता है की जीतने वाले से जिताने वाले का महत्त्व अधिक होता है। 
        जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ो उसी को ही धक्का मरकर गिरा देने वाली प्रवृत्ति से बच्चों को बचना चाहिए। उन्हें अपने लिए बस यही सोचना चाहिए कि जीवन के किसी मोड़ पर यदि उनके साथ ऐसा हो गया तो वे क्या करेंगे?
          समय रहते बच्चों को चेत जाना चाहिए कि माता-पिता से बढ़कर कोई और उनका शुभ चाहने वाला नहीं हो सकता। दुनिया तो स्वार्थ की बुनियाद पर चलती है। मित्रों, सम्बन्धियों, भाई, बन्धुओं से जितना व्यवहार करोगे उतना करवा लोगे। यदि उसमें कभी कुछ कोर-कसर रह गयी अथवा किसी अवसर पर उनका मनचाहा उन्हें न दे सके तो उन सम्बन्धों में दरार आने लगती हैं।
        इसके विपरीत माता-पिता की बादशाही होती है। उनके साथ व्यवहार रखो चाहे न रखो, उनकी तरफ से सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होते। उनका मन भी यदि बच्चे दुखाते हैं तो भी उनके मन से कभी बददुआ नहीं निकलती। वे सदा ही अपने बच्चों को आशीर्वाद देते हैं। इसीलिए शास्त्र उन्हें भगवान मानते हैं और उनकी पूजा करने का परामर्श देते हैं।
          वे बच्चे बड़े अभागे होते हैं जिनके माता-पिता उनके होते हुए दरबदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। दो जून खाने, बीमारी में इलाज के लिए और बच्चों से अपनेपन के अहसास के लिए तरसते हैं। बच्चों के पास चाहे लाखों-करोड़ों हों पर यदि माता-पिता के लिए कुछ नहीं तो सब व्यर्थ है। ऐसे निर्लज्ज और दुष्ट बच्चे ईश्वर किसी को न दे।
          यह बात हमेशा गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि उन्हें जिन्दगी का ककहरा पढ़ाने वाले माता-पिता अपने प्यार में सन्तान से चाहे हर जाएँ किन्तु उन्हें मूर्ख अथवा जाहिल समझने की भूल वे कभी न करें। वे चाहें तो उन्हें नाकों चने चबवा सकते हैं। यदि बच्चों को समाज और घर-परिवार का डर नहीं है तो बैंक उनके बुढ़ापे का सहारा बनने और उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ देने के लिए बाहें फैलाए बैठे हैं। कानून उनकी सुरक्षा करने के लिए हर प्रकार से सन्नद्ध है।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 22 अगस्त 2026

धन और खुशियॉं सम्हाल कर रखें

धन और खुशियॉं सम्हाल कर रखें 

मनुष्य को अपनी खुशियों और धन को सदा सम्हालकर रखना चाहिए। मनुष्य को ऐसा लगता है कि खुशियों के पल उसके जीवन में बहुत कम समय के लिए आते हैं। यद्यपि ऐसा नहीं होता। खुशियों के आने पर वह खो जाता है और वे पल हाथ में पकड़े रेत की तरह फिसल‌ जाती है।इन्हें सहेज कर रखना चाहिए, किसी भी मूल्य पर अपने हाथ से इन्हें गँवाना नहीं चाहिए। मनुष्य को अपने व्यवहार और अपनी सोच पर नियन्त्रण रखना चाहिए। 
         यदि कोई व्यक्ति उसकी सत्ता को न मानकर उसे चुनौती देता है तो तब भी उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए। मनुष्य को सदा प्रसन्न रहना चाहिए और अपनी जिन्दगी से निराश नहीं होना चाहिए। जीवन में सफल व्यक्ति कहलाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। परन्तु पैसे को सदा अपनी जेब में रखना चाहिए। उसे अपने मन-मस्तिष्क पर सवार नहीं होने देना चाहिए। यदि ऐसा हो जाता है तो फिर धन के मद में चूर मनुष्य पतन के गर्त में गिरने लगता है।
        यदि मनुष्य इस धन का उपयोग घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करने और दान आदि कार्यों में व्यय करता है तो उसका सदुपयोग होता है। उस समय घर आए आगन्तुक का सम्मान करने से उसे पीछे नहीं हटना चाहिए। हमारे शास्त्र अतिथि को देव मानते हुए कहते हैं -
              अतिथि देवो भव।
       निम्न दोहे में कबीरदास जी कहते हैं -
     साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए।
     मैं भी भूखा न रहूॅं और साधु भूखा न जाए।।
अर्थात् कबीर जी इस दोहे के माध्यम से भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे ईश्वर! मुझे केवल उतना ही धन या अन्न दें जिसमें मेरे पूरे परिवार का पेट भर सके। मुझे बहुत अधिक धन नहीं चाहिए, बस इतना दे दीजिए कि मेरा परिवार भी भूखा न रहे और मेरे द्वार पर आने वाला कोई मेहमान या साधु भी भूखा न लौटे।
        इसके विपरीत यदि यह धन मनुष्य केसिर पर चढ़कर बोलने लगे तो इन्सान का दिमाग खराब होने लगता है। वह अपने बराबर किसी दूसरे को नहीं समझता। उसके बच्चे भी उसकी देखादेखी घमण्डी बनने लगते हैं जो किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता। वह हर किसी को देख लेने की धमकी देने लगता है। हर स्थान पर आग लगाने की धमकी देने लगता है। यहाँ तक कि स्वयं को भी खुदा समझने लगता है। ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देने से परहेज नहीं करता।
        यहाँ एक बात बताना चाहती हूँ कि मनुष्य अपनी कमाई से गरीब नही होता बल्कि अपनी जरूरतों को बढ़ा लेने से गरीब होता है। जब जक मनुष्य अपनी कामनाओं को असीम बनाता जाता है तब तक वह चैन से नहीं बैठ सकता। यही उसकी परेशानी का कारण बन जाता है। इसलिए वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है।
          इसी भाव को हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि इन्सान अपनी कमाई से अधिक पैर फैलता है तो दुःख-तकलीफों का सामना करता है। यानी वह न चाहते हुए भी कर्जों के बोझ तले दबकर रह सकता है। तब उसकी परेशानियों का चक्र घूमने लगता है और उसका जीवन नरक बन जाता है।
          इस सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक इन्सान के पास पैसा है तभी तक यह दुनिया पूछती है और सम्मान देती है। अन्यथा मिट्टी के मोल भी नहीं पूछती। इसलिए धन-दौलत पर अभिमान करना व्यर्थ है। उसे केवल साधन मानना उचित है, उसे साध्य मान लेने से जीवन में भटकाव होने लगता है। फिर उसके जीवन में स्थिरता नहीं रह पाती।
        जीवन की दूसरी सच्चाई यह है कि माया महाठगिनी और बहुत चंचल है। इस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए। इसके खेल बड़े निराले हैं। यह पलक झपकते ही देखते-ही-देखते राजा को रंक बनाकर रुला देती है और रंक को राजा बनाकर उसे मालामाल कर देती है।
          जब लोग हमारी परेशानी होने पर बुराई करते हैं तो निराश नहीं होना चाहिए। पीठ पीछे बुराई करने वालों की कमी नहीं होती। यह मानना चाहिए कि वे कायर हैं, उनमें सामने से आकर कुछ बोलने की सामर्थ्य नहीं है। अतः उन दोगले लोगों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
          दुनिया की परवाह तभी तक करनी चाहिए तब तक वे आपके और आपके सपनों के बीच दीवार बनकर न आएँ। जब तक मनुष्य में सामर्थ्य है, उसे सफलता प्राप्ति के सपनों को साकार कर लेना चाहिए। 
          हर समस्या का समाधान हम दृढ़ प्रतिज्ञ बनकर या डटकर कर तभी कर सकते हैं यदि उसमें हमारी भी सक्रिय भागीदारी होगी। उससे मुँह मोड़कर या पीठ दिखाकर भाग जाने से किसी भी समस्या का निदान कर पाना वास्तव में बहुत असम्भव होता है। 
          दुनिया के सब अनुराग-विराग की परवाह छोड़कर प्रसन्न रहने का अभ्यास कीजिए। अपनी इच्छाओं को समेटते हुए अपनी मेहनत की कमाई में सन्तुष्ट रहने का यत्न कीजिए। यकीन मानिए ईश्वर की कृपा से सब शुभ होगा।
चन्द्र प्रभा सूद