अग्नि शरीर के लिए आवश्यक
अग्नि इस मानव शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक है। पाचक अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है और शेष सभी अग्नियों की तुलना में यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रुप से पेट और आंतों के बीच नाभि के आस पास रहती है। यह अग्नि अपनी गर्मी से बहुत जल्दी ही भोजन को पचा देती है। हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे यह अग्नि छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर उन्हें शरीर के अनुरूप बना देती है। फिर ये शरीर को पुष्ट करते हैं।
इस अग्नि को विद्वान मनीषी जठराग्नि कहते हैं। यह अग्नि मनुष्य को ओजस्वी बनाती है। उसके तेज से ही हम सबका चेहरा दमकता है। उसकी गरमी से ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है। सभी कामों को करने के लिए अग्नि का सन्तुलित अवस्था में होना बहुत आवश्यक होता है।
यदि शरीर की यह अग्नि मन्द हो जाए यानी मन्दाग्नि हो जाए तब मनुष्य का शरीर रोगी होने लगता है। उस पर सर्दी का प्रकोप बार-बार होता है। मनुष्य का पाचनतन्त्र प्रभावित हो जाता है। तब उसे भोजन पचाने में भी असुविधा होती है। उसका लीवर प्रभावित हो जाता है। यह लीवर मानव शरीर में महत्त्वपूर्ण रोल निभाता है।
यदि शरीर में अग्नि न हो तो मनुष्य के द्वारा किया गया भोजन पचेगा नहीं और शरीर में धातुऍं भी नहीं बनेंगी। आयुर्वेद में बताया गया है कि शरीर की जठराग्नि जब शान्त हो जाती है अर्थात् समाप्त हो जाती है तो मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। शरीर का तापमान भी इसी अग्नि द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के कुछ ही समय पश्चात ही मनुष्य शरीर एकदम ठण्डा हो जाता है।
'सन्यासोपनिषद्' का कथन है कि-
मय्यग्रेsग्नि गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन।
मयि प्रज्ञां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्।।
अर्थात् मैं अपने सम्मुख अग्नि को क्षमा, तेज, बल और ओज के साथ ग्रहण करता हूँ।
हम कह सकते हैं कि क्षमा, तेज, बल और ओज आदि सभी गुणों के साथ अग्नि को ग्रहण करना चाहिए। अग्नि के साथ अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ की जाए तो वह बच्चों तक को भी नहीं छोड़ती। सबको जलाकर राख कर देती है। मनुष्य भी क्रोध की अधिकता में सारी दुनिया को जलाकर राख कर देने का दावा करता है। दूसरों की हानि तो समय बीतते हो पाती है परन्तु अपने पैर पर वह कुल्हाड़ी अवश्य मार लेता है।
इसलिए मनुष्य से क्षमाशील होने की आशा की जाती है। दूसरों को क्षमा कर देने वाले तेजस्वी व्यक्ति संसार के अमूल्य रत्न होते हैं। उनका बल असहायों की रक्षा और सहायता करने के लिए होना चाहिए, उनका दमन करने वाला कदापि नहीं होना चाहिए।
इस अग्नि के बल पर हम साहसी बने रहते हैं। इसके अभाव में मनुष्य का चेहरा तेजहीन दिखाई देता है। वह स्वयं को बलहीन अनुभव करता है। निर्बल व्यक्ति जरा-सी समस्या आने पर घबरा जाता है और उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं। उसे कम्पकपी छूटने लगती है। वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। उस समय अपने लिए सहारा खोजने लगता है और बहाने बनाने लगता है।
जब तक मनुष्य स्वास्थ्य के नियमों का पालन करता रहता है तब तक उसके शरीर में ऊर्जा तत्त्व बना रहता है। शरीर में अग्नि ठीक तरह से अपना काम करती रहती है।
जंगलों में जब आग यानी दावानल भड़कती है तब वह किसी से पक्षपात नहीं करती अपितु सभी प्रकार के हरे-भरे या ठूँठ हुए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों आदि सभी को जलाकर राख कर देती है। उसकी चपेट में आने से कोई मनुष्य अथवा कोई जीव नहीं बच सकता। सबको समान रूप से भस्मसात् कर देती है। घने जंगलों को पलभर में पलक झपकते ही राख के ढेर में बदल देती है।
इसी तरह समुद्र में लगने वाली आग यानी बड़वानल समुद्री जीवों को अपनी चपेट में लेती है। 'रघुवंशम्' महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने अग्नि के विषय में कहा है-
पावकस्य महिमा स गणयते
कक्षवज्ज्वलति सागरेSपि य:॥
अर्थात् अग्नि का यही महत्त्व गिना जाता है कि वह समुद्र में घास की तरह जलती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि समुद्र के पानी में लगने वाली अग्नि को बड़वानल कहते हैं जो वहाँ कभी भी, किसी भी स्थान पर जलने लगती है।
यह अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसके बिना हम अपना भोजन सुपाच्य नहीं बना सकते। यह भी एक प्रकार से हमारी जीवनी शक्ति है। इससे छेड़छाड़ की जाए तो फिर यह बच्चे तक को क्षमा नहीं करती, सबको अपनी चपेट में ले लेती है। अत: सावधान रहना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद