मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। इसके लिए उसे किसी के परामर्श कर्त्ता अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए वह किसी मैनेजर आदि के सहारे नहीं रहता। उसने इस ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की। उसकी इस सुन्दर रचना में यानी सृष्टि में कहीं भी कोई कमी नहीं है। हम मनुष्य चाहे जितना भी परिश्रम कर लें, यह हमारे बूते की बात नहीं है।
          परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्त्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा, अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानी वह नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जब से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इस क्रम में कहीं भी, किसी प्रकार की त्रुटि की कोई भी गुॅंजाइश नहीं है।
         सूर्य, चन्द्र आदि सभी ग्रह-नक्षत्रों का क्रम निश्चित है। कोई प्रातः आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद् गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलय हो जाती हैं। नदियॉं अबाध गति से अपने इस नियम का पालन करती हैं।
        सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की जिससे सबको अपने भोज्य पदार्थ मिलते रहें। पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की।
          पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चट्टानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है जिसे वे अपनी जरूरत के समय खा सकें।
         पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि नारायण पण्डित ने 'हितोपदेश' में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
      न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः।
अर्थात् सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता, उसे परिश्रम करना पड़ता है।
       कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए हर जीव को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने ऐसा सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी। 
        कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अतः शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे कहीं बदबू न फैल सके। पेड-पौधों का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए शाकाहारी जीवों को बना दिया।
        इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानी सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके आलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।
      ‌    अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मारने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है जब वह बुझ जाती है तो हर कोई उसे रौंद देता है। चींटियॉं भी उस पर चलने लगती हैं।
         मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने सभी प्रबन्ध स्वयं अपने हाथों में लिए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।
        अतः उसके विधान में मनुष्य को अपनी टाँग अड़ानी छोड़ देनी चाहिए। वह बहुत ही समर्थ है उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। बस यह याद रखिए कि वह स्वयं सब सम्हाल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 3 अगस्त 2026

दान का महत्त्व

दान का महत्त्व

दान के महत्त्व को हमारे मनीषी भली-भाँति समझते थे। इसीलिए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हर शुभकार्य को करते समय दान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी भी दुःख-तकलीफ से उभरने के पश्चात् भी दान देना चाहिए। अपने मन की शान्ति के लिए भी हर मनुष्य को अपनी शुद्ध कमाई में से कुछ धन अलग निकालकर रखना चाहिए और उसे दान में भी देना चाहिए।
        समाज में रहते हुए मनुष्य दूसरों से बहुत कुछ ग्रहण करता है क्योंकि सदा से ही वह एक समाजिक प्राणी है। उसके बदले में उसे समाज के हितार्थ कुछ-न-कुछ अपना योगदान करते रहना चाहिए। उनमें दान देना भी प्रमुख है। दान देने के विषय में मुझे कबीरदास जी का निम्न दोहा याद आ रहा है-
          चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
          दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर।।
अर्थात् नदी में जल का भण्डार होता है। यदि चिडिया उसमें से कुछ बूँदे जल की ले लेती है तो उस नदी के जल में कोई कमी नहीं आती, वह खाली नहीं होती।
        इस प्रकार अपनी कमाई में से कुछ राशि यदि समाजिक और धार्मिक कार्यो पर व्यय कर दी जाए तो वह धन सार्थक हो जाता है। धन का दान किसी प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर नहीं करना चाहिए अथवा न ही किसी के दबाव में आकर करना चाहिए। साथ ही किसी की होड़ में आकर भी दान नहीं करना चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धाभाव होना चाहिए और अपना कर्तव्य मानकर दान देना ही‌श् श्रेयस्कर होता है।
        दान देते समय यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि दान सुपात्र को ही देना चाहिए ताकि वह उसका सदुपयोग करे। यदि दान कुपात्र को दिया जाए तो वह उसका दुरुपयोग करता है। इस तरह दिया गया धन व्यर्थ हो जाता है। उस समय अपने मन को भी कष्ट होता है।
        दान देते समय कर्त्तापन का अभिमान मन में कदापि नहीं आना चाहिए। हालाँकि यह इन्सानी कमजोरी है कि वह चाहता है कि सभी लोग उसके इस कार्य को महत्त्व दें, उसकी सराहना करे और सम्मान दे। जिसकी सहायता की है वह सारी आयु उससे नजरें न मिला सके अथवा हमेशा उसके सामने सिर झुककर रहे। ऐसी सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए और यथासम्भव अहं से बचने का प्रयास करना चाहिए।
        यदि मनुष्य इस बात को आत्मसात कर लेता है कि देने वाला तो वह ईश्वर है, इन्सान तो बस दान देने का एक माध्यम है। तब कभी उसके मन में कर्त्तापन का यह मिथ्या अभिमान नहीं आ सकेगा कि दान उसने दिया है या उसने किसी व्यक्ति की सहायता की है।
         दान देने का लाभ तभी होता है जब अपना कर्त्तव्य समझकर दान दिया जाए। हमारे मनीषी कहते हैं कि दाएँ हाथ से दान दो तो बाएँ हाथ को पता न चले। दूसरे शब्दों में कहें तो दान को गुप्त रूप से देना चाहिए और स्वयं भी उसके बारे में भूल जाना चाहिए।
           यहॉं मैं एक बात कहना अपना धर्म समझती हूॅं कि तथाकथित गुरुओं के कहने पर अपने खून-पसीने की कमाई को गंवाना नहीं चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिसके पास अकूत धन है उसे हमारे कुछ पैसों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वही धन किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जिसे उसकी आवश्यकता सचमुच है। तभी हमारा दिया धन सार्थक होता है।
         इसी भाव को रहीम जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखते हैं-
        देन हार कोई और है भेजत जो दिन रैन।
        लोग भरम हम पर करें तासो नीचे नैन।।
अर्थात् देने वाला तो कोई ओर है जो हमें दिन-रात देता रहता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो जाता है कि हम देने वाले हैं। इसीलिए दान देते समय उनकी नजरें झुक जाती थीं।
         देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों का दान करने वाले महर्षि दधिचि को हम सब जानते हैं।दानवीर कर्ण को कौन भूल सकता है? राजा हरिश्चन्द्र से बड़ा दानी कौन हो सकता है? उनके दान के फलस्वरूप उनकी पत्नी को दासी बनना पड़ा। उन्हें स्वयं भी एक चाण्डाल के यहॉं नौकरी करनी पड़ी। इतिहास भरा हुआ है ऐसे महापुरुषों की गाथाओं से। 
    धन के दान को सर्वाधिक महत्त्व इसलिए दिया जाता है कि उसके बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं होता। अन्न, वस्त्र, श्रम आदि के दान का भी महत्त्व कम नहीं है। मनुष्य यदि नए वस्त्र नहीं दान कर सकता तो ऐसे वस्त्र देने चाहिए जिन्हें कोई पहन सके और कुछ समय के लिए वह अपना तन ढक सके।
        विद्या के दान का शास्त्रों में सबसे अधिक महत्त्व माना जाता है। इससे एक भावी पीढ़ी संस्कारित होती है जो देश का भविष्य होती है। इसलिए निस्वार्थ भाव से दान देते रहना चाहिए। इससे मनुष्य के इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 2 अगस्त 2026

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता प्राप्ति के लिए हर मनुष्य अपने हाथ-पैर मारता है। उसके बाद भी यदि ऐसा लगे कि पास आती हुई सफलता रूठकर कहीं दूर चली जा रही है और हाथ नहीं आ रही तब उसे अपने प्रयासों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता होती है। इसके लिए निराश नहीं होना चाहिए। असफलता अन्त नहीं होता। यह सीखने और खुद को बेहतर बनाने का एक अवसर होती है। अपनी गलतियों की समीक्षा करनी चाहिए और फिर आगे बढ़ना चाहिए। 
         जीवन की सफलता का कोई एक जादुई पैमाना नहीं होता बल्कि यह स्पष्ट लक्ष्य, कठोर साधना और अनवरत सीखने का परिणाम होती है। इसके लिए सबसे आवश्यक है कि मनुष्य स्वयं की भूमिका निश्चित करे और पूरी लगन से उस दिशा में अपने कदम बढ़ाए। मनुष्य को स्वयं पर यह विश्वास रखना चाहिए कि वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है। यह उसे विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
       भाग्य पर अन्धविश्वास न करके अपने उद्देश्यों को मजबूत बनाना चाहिए और अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए और स्वयं की सामर्थ्य पर ही विश्वास करना चाहिए। जीवन में कुछ बातें या घटनाएँ अवश्य ही संयोगवश हो जाती हैं पर हमेशा ऐसा नहीं होता। 
       दृढ़ विश्वास और अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने वालों को कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। समय का सही उपयोग ही महान लोगों की सफलता का रहस्य रहा है। असफलता से कभी क्षणिक अवसाद अवश्य हो सकता है परन्तु उसका परिणाम सदा ही सुखदायी और परिवर्तन लाने वाला होता है। सकारात्मक सोच मनुष्य को ऊर्जावान बनाए रखती है। समस्याओं के स्थान पर‌ समाधान की ओर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करती है।
      अपने लक्ष्य को पाने के इच्छुक साहसी लोग असफलताओं से निराश नहीं होते। जब तक मन-मस्तिष्क सुनियोजित रहेगा यानी उनमें तालमेल बना रहेगा तो तब तक मनुष्य की भावनाएँ उसी के अनुरूप ही जन्म लेंगी। 
      मनुष्य की उर्जा, उसकी शक्ति का यदि सही दिशा में उपयोग होगा तो शरीर भी अपनी गति में आ जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता स्वयं होता है। यह सर्वथा उचित है। मनुष्य जब अपने मजबूत इरादों, दृढ़ विश्वास, सुनियोजित मन-मस्तिष्क और एक निश्चित गति से आगे बढ़ेगा तो ब्रह्माण्ड की कोई भी ताकत उसे पछाड़ नहीं सकती।
         मनुष्य के विचारों में, उसकी सोच में स्पष्टता और परिपक्वता का होना बहुत आवश्यक होता है। उसका आत्मविश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मनुष्य को एकान्त में बैठकर धैर्य से विवेकपूर्वक योजना बनानी चाहिए और उसे उचित समय पर क्रियान्वित कर देना चाहिए।
         यदि उसकी योजना में ही कमी रह जाएगी तो उसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। मनुष्य को उत्साही बनना चाहिए पर अति उत्साही नहीं होना चाहिए। ऐसा करके वह अपने ही दुर्भाग्य को स्वयं न्यौता दे बैठता है जिसके लिए आयुपर्यन्त उसे हाथ मलते ही रह जाना पड़ता है।
      मनुष्य को चाहिए की वह उन सबको अपने साथ लेकर चले जिन्हें वह पसन्द हैं। जो उसे नापसन्द हैं उनका त्याग न करके ऐसा कुछ करे कि वे स्वेच्छा से उसके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाएँ। जीवन में पता नहीं कब किस मोड़ पर उसे उनकी भी जरूरत पड़ जाए। उस समय वह स्वयं को सबसे भाग्यशाली इन्सान समझेगा।
      किसी को भी अपने जीवन मैं सदा एक जैसी परिस्थितियाँ नहीं मिलतीं। जीवन पर्यन्त धूप-छाँव का खेल चलता रहता है। उन सभी परिस्थितियों को सम रहकर सहन करना ही बुद्धिमत्ता कहलाती है। भगवन श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसे द्वन्द्व सहन करना कहा है। 
      मनुष्य को व्यपरियों की तरह जमा-घटा का पहाड़ा नहीं पढ़ना चाहिए। उसके ये विचार उसकी सोच को संकुचित बना देते हैं। उसे महान बनने के स्थान पर सबका प्रिय बनने का प्रयत्न करना चाहिए। महान तो वह अपने सत्कार्यो से बन ही जाता है।
    अपनी क्षमताओं के अनुसार यदि वह अपनी उन्नति की ओर ध्यान देगा तो उसका व्यक्तित्व स्वयं ही निखरकर दुनिया के सामने आ जाएगा। उसे संसार सधारण से असाधारण या महान बना देता है। तब वह महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है। उसके दिशा-निर्देशों की अनुपालना करके लोग स्वयं को धन्य मानते हैं।
           बिना रुके लगातार प्रयास करना सफलता की कुंजी होती है। सोचने मात्र से कुछ नहीं होता, उसे पाने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है। मनुष्य यदि कछुए की तरह कर्मठता, आत्मविश्वास, निष्ठा व लग्न से आगे बढ़ने लगे तो तरह खरगोश जैसे तीव्रगामी लोगों को पछाड़कर अपनी सफलता के झण्डे गाड़ सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शिकायत पुराण

शिकायत पुराण

हम इन्सानों को सदा ही हर दूसरे व्यक्ति से  शिकायत रहती है। हर मनुष्य को लगता है कि उसके बराबर इस संसार में कोई और बुद्धिमान हो नहीं सकता। वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं। इसीलिए हर किसी में कमियाँ ढूँढकर, उनका उपहास करके आत्मसन्तोष का अनुभव करता है। यदि उसमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो बहुत अच्छा होता। दूसरों के स्थान पर अपनी कमियाँ ढूँढकर यदि वह उन्हें सुधार पाता तो निश्चित ही इस संसार का भला हो जाता।
         मनुष्य को अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों, संगी-साथियों के साथ-साथ प्रकृति, मौसम और ईश्वर से भी शिकायत रहती है। पति-पत्नी को एक-दूसरे से, बच्चों को माता-पिता से, माता-पिता को बच्चों से, घर-परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों, शत्रुओं, पड़ोसियों, कार्यालयीन साथियों आदि सभी से हमेशा शिकायत रहती है। मनुष्य को यही लगता है कि हर कोई उसका अहित करना चाहता है। सब उससे और उसके ऐश्वर्य से जलते हैं। तरक्की करते हुए उसे देखकर उसकी टाँग खींचकर जमीन पर पटखनी देना चाहते हैं। उसे सदा यही चिन्ता सताती रहती है कि किस तरह सबको नीचा दिखाकर वह पतंग की तरह ऊँचा उड़ता रहे।
        इसी प्रकार दूसरों को कोसते हुए हम सभी अपने जीवन में अशान्ति खरीद लेते हैं। सब कुछ होते हुए भी परेशान रहते हैं। यही एक शंका मन में घुन की तरह लगा लेते हैं कि हमसे कोई भी व्यक्ति आगे न निकल जाए। यदि कोई अपने परिश्रम से आगे निकलने में सफल हो जाता है तब हमें सहन नहीं होता। बस फिर उसकी बुराइयाँ करने की कवायद शुरू होने लगती है।
         प्रकृति जिससे मनुष्य सब कुछ लेता है, उसे उससे विशेष रूप से शिकायत रहती है। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के उपरान्त भी उसका मन नहीं भरता और उसे दूषित करने से वह बाज नहीं आता। जब उसकी मूर्खता के कारण अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती है या भूकम्प आते हैं तब उनके कारण खेती और अन्य जानमाल की बर्बादी होती है। फिर प्रकृति की शिकायत करते हुए वह थकता नहीं है।
       नदियों पर बड़े-बड़े बाँध और पुल बनाकर मनुष्य सुविधाएँ भोगना चाहता है। उन्हें अपने यातायात के लिए प्रयोग करना चाहता है। पर उनकी सफाई और रख-रखाव पर ध्यान नहीं देना चाहता। इसलिए उनके द्वारा जब तबाही होने लगती है, उस समय वह बिसूरने लगता है। बड़े-बड़े भाषण देकर अपनी कमियॉं छुपाने का असफल प्रयास करता है।
       सागर से भी उसे परेशानी होती है। वह सोचता है कि समुद्र का पानी खारा न होकर मीठा होता तो पानी की समस्या स्वत: हल हो जाती। स्वयं तो वह ध्यान नहीं देता और हर समय पानी को बर्बाद करता रहता है। विद्वान कहते भी हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।
        पक्षियों से विशेषकर कोयल से उसे यह शिकायत है कि उसका रंग काला है। उसकी मधुर आवाज के साथ यदि रंग भी गोरा होता तो अच्छा होता। फूलों अर्थात् विशेषकर गुलाब से शिकायत रहती है कि उसमें काँटे होते हैं। यदि वे न होते तो बहुत अच्छा होता। जब वह उसे तोड़ना चाहता है, वे उसे चुभ जाते हैं। 
          पेड़-पौधों से शुद्ध वायु और सभी प्रकार के खाद्यान्न पाकर मुदित होता रहता है, फिर भी उन्हें काटकर अपने घर को सजाने तथा ईंधन के रूप में प्रयोग करने में जरा भी परहेज नहीं करता। उसे हर मौसम से भी शिकायत रहती है चाहे वह सर्दी हो, गर्मी हो, वर्षा हो या पतझड़ हो। सर्दी में उसे बहुत ठण्ड लगती है और उसे हीटर व गीजर जलाने पड़ते हैं। गर्मी में उसे गर्मी लगती है तो उसे ए.सी. चलाने पड़ते हैं। इस कारण इन दोनों मौसम में उसका बिजली का बिल बढ़ जाता है। वर्षा ऋतु में बाढ़ आने से घर से बाहर निकलने में परेशानी होती है। पतझड़ के समय गन्दगी बहुत हो जाती है। इसलिए सफाई अधिक करनी पड़ती है।
        इसी प्रकार पशुओं को अपने आराम और मनोरंजन के लिए पालतू बनाता है और अपने जीभ के स्वाद के लिए मारकर खा जाता है। जब वे इसके विपरीत कार्य करने लगते हैं तब उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है।
        ईश्वर जिसने उसे इस संसार में भेजा है और झोली भर-भरकर नेमते दीं हैं। चौबीसों घण्टे किसी-न-किसी बात पर उसी से शिकायत करता रहता है। उसे यही लगता है कि दुनिया को मालिक सुख देता है किन्तु सारे दुख, कष्ट और परेशानियाँ उसकी झोली में डाल देता है। अतः ईश्वर को लानत-मलामत करता है।
          ये सभी शिकायतें वास्तव में मनुष्य के नकारात्मक रवैए का परिणाम होता है। यदि इस शिकायत पुराण को तिलांजलि देकर मनुष्य सकारात्मक सोच अपना ले तो उसकी बहुत सारी स्थितियाँ स्वयं ही बदल जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

पुण्य कर्मों की पूॅंजी कैश करवाऍं

पुण्य कर्मो की पूँजी कैश करवाऍं

बैंक में हम अपना पैसा जमा करवाते हैं। जब हमें आवश्यकता होती है तब वहाँ से इच्छित राशि निकाल सकते हैं। उस पैसे से हम अपनी अनेक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यदि हम बैंक में अपना अकाउंट खुलवाकर पैसा जमा नहीं करेंगे तो आवश्यकता होने पर बैंक से हमें पैसा नहीं मिल सकेगा। इसका सीधा-सीधा यही अर्थ हुआ कि बैंक से पैसा निकालने के लिए वहॉं अकाउंट होना और धन होना आवश्यक होता है। अपना जमा किया हुआ पैसा भविष्य में हमारे काम आता है।
          इसी प्रकार अपने पुण्य कर्मो की पूँजी को यदि हम अपने भाग्य के खाते में जमा कराएँगे तभी अगले जन्म में उसे कैश करवा सकेंगे। उसी पुण्य कर्मों की पूॅंजी से हम उस जीवन में सुख भोग सकेंगे। यदि इस जीवन में हम इस पूॅंजी से वंचित रह जाऍंगे तो अगले जन्मों में हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। हमारे शास्त्र, हमारे बड़े-बुजुर्ग और मनीषी हमें अपने सत्कर्मों की पूॅंजी बढ़ाने पर बल देते हैं।
          बैंक में जमा करवाए हुआ धन के कारण हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद हम अपने जीवन के आड़े वक्त के लिए धन का संग्रह करने के लिए व्यघ्र रहते हैं।
        इस एक भौतिक जीवन को जीने के लिए हम इतने तामझाम करते हैं परन्तु जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे शरीर में रहने वाले जीव को अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी होती है, उसके विषय में हम कभी नहीं सोचते। जबकि यह विचार मन में अधिक हावी होना चाहिए। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि उसे हम अपने मन-मस्तिष्क में कभी आने ही नहीं देते। अपने आसपास रहने वाले लोगों को देखकर भी हम कुछ नहीं सीखते।
        एक दिन बैंक हमेशा की तरह पैसे निकालने वालों की भीड़ थी। भीड़ को देखकर एक व्यक्ति रुक गया। उसने वहाँ खड़े हुए एक व्यक्ति से सहज ही पूछा, "भाई, यहाँ भीड़ क्यों है?"
            दूसरे आदमी ने जवाब में कहा,"यह भीड़ पैसे लेने वालों की है।"
          वह आगन्तुक बैंक की प्रणाली से अनजान था। उसने फिर पूछा, "क्या सबको पैसे मिलते हैं?"
           दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हाँ।"
          उसकी हॉन् सुनकर वह व्यक्ति भी उसी लाइन में खड़ा हो गया।
        जब उसकी बारी आई तो बैंक के कैशियर ने उससे पूछा, "उसे कितने पैसे चाहिए, पर्ची भरी है क्या, तुम्हारा खाता बैंक में है क्या?" 
        अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित करते हुए उसने न में सिर हिला दिया और कहा, "तुम सबको पैसे दे रहे थे। मुझे भी पैसे चाहिए थे, इसलिए मैं भी लाइन में खड़ा हो गया।"
          उसका भोला-सा उत्तर सुनकर कैशियर ने उसे समझाया, "यह बैंक है। यहाँ पर लोग पैसे जमा करवाते हैं। फिर जब जितने पैसे की उनको जरूरत होती है तब पर्ची भरकर उतने पैसे ले लेते हैं और फिर अपनी पासबुक में एंट्री करवा लेते हैं।"
        कहने का अर्थ यही है कि बैंक में पहले पैसे जमा करवाने होते हैं तभी निकल पाते हैं। पासबुक में केवल तीन एंट्री होती हैं-  डिपाजिट यानी धनराशि जमा कराना, विड्राल अर्थात् पैसा निकालना और बैलेंस यानी खाते में कितना धन शेष बच गया है।
          बैंकिंग प्रणाली से अनजान उस व्यक्ति ने जब बैंक में अपना पैसा जमा ही नहीं करवाया था तो फिर उसे आवश्यकता होने पर भी वहाँ से पैसा नहीं मिल सकता था। वह व्यक्ति खाली हाथ ही रह गया।
        हम सब लोग जो इस बैंकिंग प्रणाली को भली-भाँति जानते हैं, वे भी भूल जाते हैं कि धन की तरह हमारे भाग्य का भी अपना एक अकाऊंट होता है। वहाँ भी जमा, घटा और शेष बची हुई राशि का हिसाब रखा जाता है।
        इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भाग्य एक बैंक है। हमारे पुण्यकर्म और हमारे पापकर्म हमारी जमाराशि है। पुण्य कर्मों के कारण हम अपने इस भौतिक जीवन में सुख-समृद्धि, शान्ति, सफलता, यश और स्वस्थ जीवन आदि का आनन्द ले सकते हैं।
        इसके विपरीत पापकर्मों के कारण हमें जीवन में अभाव, परेशानी, रोग, कलह-क्लेश और निराशा आदि भोगने पड़ते हैं। जब जीव अपने पापकर्मों को भोग लेता है तभी उसे उनसे मुक्ति मिलती है।
          पापकर्मों और पुण्यकर्मो को भोगने के बाद उनमें से जितने कर्म शेष बचते हैं, उन्हीं के अनुसार जीव को अगला जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों में से उसे अपने कर्मों के अनुसार कोई भी शरीर मिल सकता है।
        अतः अपने पुण्यकर्मो को अपने भाग्य के खाते में जोड़ने के लिए अभी से सन्नद्ध हो जाइए। ऐसा न हो कि पापकर्मों की अधिकता से न अगला जन्म अच्छा मिले और न ही इस जीवन में ही सुख-सुविधाएँ मिल सकें। उस समय सिर धुनकर पश्चाताप करने से अच्छा है कि हम अभी से चेत जाएँ। इसका कारण है कि हमारे इन पुण्यकर्मो और पापकर्मों के लेखे-जोखे के अनुसार ही हमें सब कुछ मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

आकर्षित करते मोहजाल

  आकर्षित करते मोहजाल 

इस संसार में रहने वाले मनुष्य को सदैव परेशानियाँ अथवा डर डराते रहते हैं। उनसे घिरा वह सुख की सॉंस नहीं ले पाता। सारा समय उनसे छुटकारा पाने का प्रयास करता रहता है। जब भी, जहाँ भी, उसे कहीं से थोड़ी-सी राहत मिल जाती है, वह वहीं सब कुछ भूल जाता है। उसे यह भी याद नहीं रह जाता कि वह इस संसार में सीमित समय के लिए ही आया है। तत्पश्चात तो उसे यहॉं से विदा हो होकर दूसरे लोक या परलोक जाना‌ है।
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संसार के आकर्षण और मोहमाया के जाल इतने अधिक लुभावने हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी उनके तिलस्म में उलझकर रह जाता है। वह जितना भी उनसे बाहर निकलने का प्रयत्न करता है, उतना ही गहरे उसमें फँसता चला जाता है। मजे की बात यह है कि उसे पता ही नहीं चलता।
          एक बोधकथा की यहाँ चर्चा करते है जिसे हममें से कई लोगों ने पढ़ा होगी। एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था। तभी एक शेर उसका शिकार करने के लिए उसके पीछे भागने लगता है। भागते हुए उसे एक कुँआ दिखाई देता है। उसके सामने विकट स्थिति आ जाती है। यह वही बात हो गई -
            आगे कुआँ और पीछे खाई 
इस स्थिति से बचने के लिए वह छटपटाने लगता है। उसे आगे एक कुऑं दिखाई देता है। वह डरा हुआ बेचारा अपनी जान बचाने के लिए उस कुएँ में के ऊपर लगे हुए चक्र में बंधी हुई रस्सी को पकड़कर लटक जाता है। 
          वह वहाँ लटक तो गया परन्तु जब उसकी नजर नीचे कुँए की गहराई में पड़ी तो उसके होश उड़ गए। वहॉं पर फन फैलाए हुए एक काले साँप बैठा होता है। उसे देखकर वह चौंक जाता है। मौत को साक्षात् अपने समक्ष देखकर वह बहुत घबरा जाता है। उसी समय उसकी नजर काले और सफेद रंग के दो चूहों पर पड़ती है जो उस रस्सी को काट रहे होते हैं, जिसको पकड़कर वह लटक रहा था। ऐसा भयावह दृश्य देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। 
          ईश्वर का चमत्कार देखिए कि कुँए में उसे एक शहद का छत्ता नजर आता है। उसे थोड़ी-सी राहत मिलती है। उस छत्ते से शहद की एक-एक बूँद उसके मुँह पर गिरने लगती है। अपनी जीभ से वह उस शहद को चाटने लगता है। शहद की मिठास में वह इतना खो जाता है कि उसे वहाँ मौजूद शेर, भयानक साँप और चूहों के डर को भूल जाता है। उस समय वह अपने सिर मंडराती मौत तक को नजरंदाज कर देता है। यही है इन्सानी फितरत कहीं जा सकती है कि क्षणिक सुख के सामने वह अपनी मौत को बिसरा बैठा।
           यह दुनिया जंगल की तरह है। कुआँ मौत का घर है और साँप मौत का कारण है जिसे हर हाल में डसना ही है। दोनों चूहे दिन और रात हैं जो हमारी जिन्दगी की डोर को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं। शहद इस संसार का रस-रंग है जिसे थोड़ा-सा भी चख लिया जाए तो मनुष्य भूल जाता है कि उसे इस असार संसार से विदा लेनी है।
          यह कथा हमें समझाती है कि काल रूपी सर्प मनुष्य को भयभीत करता रहता है। वह समझता है कि यही काल एक दिन उसे अपना ग्रास बना लेगा। फिर भी यह मनुष्य समय से न डरते हुए मस्त रहता है, मानो उसने रावण की तरह काल को बाँध लिया है। जो मनुष्य विषय-भोगों में अपना समय व्यतीत करता है, वह इस समय को व्यर्थ गँवा देता है। इसके विपरीत जो इस समय का सदुपयोग कर लेता है सफलता उसके कदम चूमती है और उस व्यक्ति को आम से खास बनाकर सबके सिरों पर बिठा देती है।
        हमारा यह जीवन पल-पल करके बीत रहा है। जन्म लेने के पश्चात से बीतता हुआ यह समय हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, यह क्रम अनवरत चलता रहता है। ये दोनों मिलकर हमारी जीवन की डोर को धीरे-धीरे काट रहे हैं यानी कम से और कम करते जा रहे हैं। इससे जीवन और मृत्यु के बीच का जो अन्तर है वह दिन-प्रतिदिन कम से कमतर होता जा रहा है। हम सब इस तथ्य को अनदेखा करते हुए इस अमूल्य जीवन को दुनिया के झंझटों में व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं।
          मनमोहक दुनिया के माध्यम से इस संसार सागर में वह प्रभु इन्सान को चारा डालकर ललचाता रहता है। मनुष्य को पता ही नहीं चलता कि कब वह उसके काँटे में मछली की तरह फँस जाता है और मालिक वह काँटा खींच लेता है। तब मनुष्य तड़पता रह जाता है। हाथ-पैर पटकता रहता है पर सब व्यर्थ हो जाता है।
          मौत को हमेशा प्रत्यक्ष खड़ा हुआ मानना चाहिए। व्यवहार ऐसा करना चाहिए जैसे आज का दिन ही अन्तिम दिन है और अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना है। इसी भावना के साथ मौत से बिना डरे निश्शंक होकर विचरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता 

मनुष्य निस्वार्थ भाव से जो भी परोपकार के कार्य करता है, वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे कार्य उसके शुभकर्मों में जुड़ जाते हैं और उसके पुण्यों की वृद्धि करते हैं। समयानुसार जैसे फलदार वृक्ष राहगीरों को मीठा फल देते हैं, उसी प्रकार परोपकारी जन अपने कर्मों से दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का यत्न करके उन्हें सुख पहुॅंचाते हैं। ऐसे मनुष्य की प्रसिद्धि कहाँ तक फैलेगी, यह सब ईश्वर ही जानता है। न तो वह स्वयं जानता है और न ही कोई अन्य लोग।
          उसके समीपस्थ अन्य दूसरे लोग चाहे उसकी कितनी ही आलोचना क्यों न करते रहें, उन्हें अनदेखा करते हुए वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। अपने द्वारा चुने हुए मार्ग पर सूर्य की तरह निरन्तर गतिमान रहता है।
        यहाँ हम एक कथा को लेते हैं जो इन्हीं विचारों की पोषक है। एक बहुत ही सज्जन मनुष्य थे जो हर आने-जाने वाले व्यक्ति को अपने पास बिठाकर पानी पूछते थे। आया हुआ कोई परदेसी यदि भूखा होता तो उसे पूछकर खाना भी खिलाते थे। वे बस यही कहते थे, "जो यहाँ दिया है तो वहीं वहाँ मिलेगा।"
         एक बार उन्हें किसी कार्यवश अपने घर से दूसरे शहर जाना पड़ गया। उन्होंने अपनी बहू से कहा, "बेटा, चार पराँठे बनाकर मेरे बैग में रख दो। जब भूख लगेगी तो किसी पेड़ की छाया में बैठकर खाना खा लूँगा।"
          उनकी बहू ने मन में विचार किया कि नित्य प्रति लोगों को खाना खिलाते रहते हैं और कहते हैं, "यहाँ दिया है तो वहाँ मिलेगा। इन्हें भोजन की क्या आवश्यकता आ पड़ी।"
          उसने खाना नहीं बनाया। जब वे सज्जन घर से जाने लगे तो उन्होंने बहू से पूछा, "बेटा, क्या तुमने भोजन रख दिया है।"
          उसने हाँ में उत्तर देते हुए कहा, "बाबू जी, रख दिया है, आगे जाकर मिल जाएगा।"
          वे अपने गन्तव्य पर थके-माँदे पहुँचे और एक चबूतरे पर बैठ गए। थोड़ी दूरी पर काम रहे युवक ने उन्हें देखा तो पहचान गया कि वे वही सज्जन हैं जिन्होंने थके और भूखे-प्यासे उसे खाना खिलाया था। वह उनके पास आया और उनसे हालचाल पूछा तथा फिर पूछा, "आपने भूखा का लिया है।"
           उन्होंने ने कहा, "नहीं, अभी नहीं खाया।"
          उन्हें भूखा जानकर उसने उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाया।
        तब उन सज्जन ने कहा,"मेरे बैग में मेरी बहू ने खाना रखा है, उसे भी खा लेते हैं।"
         परन्तु जब उन्होंने बैग खोला तो देखा कि उसमें बहू ने खाना रखा ही नहीं था। तभी उन्हें बहू के शब्द याद आ गए, "यहाँ जो खाना दिया है, वह आगे जाकर मिल जाएगा।"
          यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अपना खुद का पेट भर लेना और अन्य किसी के बारे में कभी न सोचना पशुवृत्ति कहलाती है। मनुष्य को मिल-बाँटकर खाना चाहिए। सम्पूर्ण प्रकृति यानी जल, पृथ्वी, वायु, पेड़-पौधे, सूर्य, बादल आदि अपने पास कुछ भी नहीं रखते। उनके पास जो भी है, वे उसे हम जीवों में बॉंट देते हैं। वे अपने स्वार्थ का त्याग करके परमार्थ का कार्य दिन-रात करते रहते हैं।
          स्वयं के हिस्से का भोजन खाना तो प्रकृति कहलाती है किन्तु दूसरों के हिस्से पर नजर रखना अथवा खा लेना विकृति कहलाती है। इन सबसे भी बढ़कर होता है किसी भूखे को अपना हिस्सा दे देना, यह उसके संस्कारों को बताता है। हमारी भारतीय संस्कृति सदा अतिथि की सेवा करने का निर्देश देती है और कहती है -
              अतिथि देवो भव।
अर्थात् अतिथि को ईश्वर की तरह मानो।
        जिन लोगों ने कभी भूख की ज्वाला का अनुभव नहीं किया उन्हें तो पता ही नहीं कि भूखा व्यक्ति क्या-क्या अनर्थ नहीं कर गुजरता? बहुत से लोग अपनी असह्य भूख के कारण गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। जिनके पेट भरे होते हैं उनके दिमाग खराब हो जाते हैं और नखरे अलग होते हैं। इसलिए उनके घर की रोटियाँ किसी जरूरतमन्द को देने के स्थान पर कूड़े में फैंक दी जाती हैं अथवा खाने लायक नहीं रहतीं। इससे बढ़कर और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।
          जरूरतमन्द इन्सान की सहायता यदि बिना उससे कुछ प्राप्ति की भावना से सहृदयतापूर्वक की जाए तो वह अवश्य ही फलदायी होती है। ऐसे ही महानात्मा लोगों के पुण्यों के कारण इस धरती पर आज तक मानवता का अस्तित्व आज बचा हुआ है। अन्यथा स्वार्थि लोगों ने इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे लोग अपने तुच्छ स्वार्थों को महत्त्व देते हुए दूसरे लोगों को गलत सन्देश देते हैं। इससे लोगों का मानवता पर विश्वास डगमगाने लगता है जिसे हम किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहरा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद