मंगलवार, 28 जुलाई 2026

स्वस्थ्य शरीर मात्र साधन

स्वस्थ शरीर मात्र साधन

स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का परम कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता। यह स्वास्थ्य मनुष्य की अमूल्य निधि है। जैसे धन-वैभव को सम्हालकर रखा जाता है, उसी प्रकार अपने इस स्वास्थ्य को भी सम्हालकर रखना चाहिए। परन्तु बहुत दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हम इसी ईश्वरीय नेमत के साथ दिन-रात खिलवाड़ करते हैं।
           हमारे शास्त्रों के द्वारा जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। उन सबको धत्ता दिखाते हुए हम किसी दूसरे ही युग में जाते जा रहे हैं। हमारा आहार-विहार बिल्कुल उलट-पुलट हो चुका है। आज हमारे किसी भी कार्य को करने का कोई समय नहीं होता। हम न समय पर सोते हैं और न ही समय पर जागते है। हमारी सभी पार्टियाँ, शादी-ब्याह आदि देर रात तक चलते रहते हैं। देर रात तक क्लबों में मौज-मस्ती चलती है। इसलिए प्रातः देर से उठते हैं। परिणामस्वरूप सभी कार्य देर से होते‌ हैं।
           जिस रोजी-रोटी को कमाने के लिए हम अथक परिश्रम करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं और कोल्हू का बैल तक बन जाते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। हम पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक भोजन न खाकर अधिक मसालेदार और तले हुए खाद्यान्न खाना पसन्द करते हैं। डिब्बाबन्द पदार्थ और जंकफूड खाकर हम बहुत इतराते हैं। घर का खाना हमें नहीं भाता, यह कहकर हम अपनी शान बघारते हैं।
           फिर एक समय ऐसा आता है जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है यानी हमारा यह स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। उस समय जब हम असहाय हो जाते हैं तब रो-रोकर ईश्वर से स्वस्थ करने की या इस दुनिया से उठा लेने की प्रार्थना करते हैं। हमें अपनी गलती तब भी समझ नहीं आती कि हमने स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। 
         अस्वस्थ हो जाने पर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हुए अपना बहुमूल्य समय व मेहनत की गाढ़ी कमाई बर्बाद करते हैं। वह एक समय जीवन में ऐसा होता है जब डाक्टरों की सलाह पर सादा खाना खाना हमारी लाचारी बन जाती है। तब डायटिशियन के बनाए हुए चार्ट के अनुसार अपना खानपान सन्तुलित करने के लिए हम विवश हो जाते हैं और तब हमारी सारी हेकड़ी निकल जाती है। उस समय कमाया हुआ सारा धन धरा रह जाता है। 
           अपने प्रिय से प्रिय और जान छिड़कने वाला भी कोई सहायता नहीं कर सकता। रुग्ण शरीर के कष्ट को कोई भी न बॉंट सकता है और न ही दूर कर सकता है। अपने प्रियजन मात्र दर्शक बनकर रह जाते हैं। उस समय कितना भी पैसा खर्च लो किन्तु यह स्वास्थ्य पलटकर वापिस नहीं आ सकता और न ही मुँह में कोई एक निवाला डाल सकता है।
          हमारे मनीषी इसलिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने पर बल देते हैं। हम ऐसे नालायक हैं जो उनकी महत्त्वपूर्ण बातों को अनदेखा करके कष्ट पाते हैं। महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा था-
        शरीरमाध्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् हमारा यह शरीर धार्मिक कार्यों अथवा हमारे दायित्वों को पूरा करने का साधन है।
        शरीर जब स्वस्थ होता है तो मनुष्य अपने सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो वह दूसरों का मुॅंह देखने लगता है। मनुष्य घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। इन कारणों से उसके मन को बहुत कष्ट होता है। 
        समस्या हमारे सामने तब आती है जब हम इस साधन शरीर को साध्य मान लेते हैं। दिन-रात इसे सजाने-सँवारने में लगे रहते हैं। इस पर सदा घमण्ड करते रहते हैं। अपने सामने दूसरों को हीन समझते हैं। बड़े दुख की बात है कि इसे स्वस्थ रखने का प्रयास मनुष्य नहीं करता। अस्वस्थ होने पर दूसरों को दोष देते हैं। ईश्वर को उलाहना देते हैं और लानत-मलामत करते हैं।
          मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य है कि वह चौरासी लाख योनियों के साथ-साथ जन्म-जन्मान्तरों के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना। ईश्वर की उपासना अपना प्रमुख कर्त्तव्य मानकर करे। लेकिन इस दुनिया के आकर्षणों में फँसकर वह सब भूल जाता है और आजन्म कष्ट भोगता रहता है।
          इस स्वस्थ शरीर में ही अपने विचारों को शुद्ध व पवित्र रख सकते हैं और अपने मन को साध सकते हैं। कठोपनिषद् ने इस शरीर को रथ माना है। यदि यह रथ अपनी गति से चलेगा तभी तो हमें अपनी मंजिल मुक्ति तक पहुँचाएगा। इसलिए इस शरीर की देखभाल करनी अत्यन्त आवश्यक है। शेष अन्य दायित्वों की भाँति इसका निर्वहण भी करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर लो दुनिया मुट्ठी में

कर लो दुनिया मुट्ठी में

प्रत्यक्ष रूप से समक्ष न होने पर हमारी आपसी बातचीत का माध्यम टेलीफोन होता है। पहले लोग पत्रों के सहारे अपने बन्धु-बान्धवों से सम्पर्क साधा करते थे। वह प्रक्रिया पूर्ण होने में बहुत समय लग जाता था। आज हम सभी अपने विचारों का आदान-प्रदान एक-दूसरे के साथ फोन के द्वारा करते हैं। इस वैज्ञानिक आविष्कार को हम एक चमत्कार कह सकते हैं।आधुनिक तकनीक की यह बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। इससे आपसी दूरी का अहसास भी नहीं होता।
        देश-विदेश में हम बहुत कम पैसों में अपने बन्धु-बान्धवों से अपने सुख-दुख साझा कर सकते हैं, उनका हालचाल जान लेते हैं। कुछ दशक पहले लैण्डलाइन टेलीफोन बहुत वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिला करते थे क्योंकि उस समय फोन घर में लगवा लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था। जिसके घर पर टेलीफोन होता था, उसे लोग बड़ा आदमी कहते थे। शायद टेलीफोन के कठिनता से उपलब्ध होने के कारण ही एक फिल्म में यह गाना फिल्माया गया था जिसकी बहुत अधिक धूम मची थी और बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह गाना था-
    मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से  
      टेलीफून तुम्हारी याद सताती है।
ये बहुत ही प्रसिद्ध पुराने गाने के बोल हैं। यह सदाबहार गीत 1949 में आई फिल्म 'पतंगा' का है। इसे दिग्गज गायिका शमशाद बेगम और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने गाया था। इसके बोल राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखे थे। 
        कुछ समय पूर्व अपने प्रदेश से बाहर या विदेश में रहने वाले किसी से बात करनी होती थी तो एस. टी. डी. अथवा आई. एस. डी. बुक करवानी पड़ती थी। उन दिनों ऐसे फोन यदि दिन में किए जाते थे तो बिल बहुत अधिक आया करता था। इसलिए लोग रात दस के बजे के बाद फोन करते थे। उस समय फोन का रेट बहुत कम हो जाया करता था। उस समय काल बुक कराई जाती थी किन्तु यह कोई गारण्टी नहीं होती थी कि बात हो ही जाएगी।
         आज वाकई दुनिया हमारी मुट्ठी में हो गई है। वैज्ञानिक चमत्कारों के कारण दूरियों के कम हो जाने से दुनिया सिमटकर रह गई हैं। किसी भी समय बाजार से मोबाइल फोन खरीदो और अपने बन्धु-बान्धवों से पलक झपकते ही देश-विदेश में कहीं भी, किसी भी समय बहुत ही कम पैसों में बात कर लो। रात में काल रेट कम होने का इन्तजार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। इससे भी बढ़कर स्काईप, वाट्सअप, फेसबुक आदि से भी मुफ्त में काल करके बात कर सकते हैं।
          जिस प्रकार दूर बैठा व्यक्ति जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, उससे टेलीफोन के माध्यम से बातचीत करते हैं। उसी प्रकार ईश्वर जो हमसे बहुत दूर है, उससे बात करने के लिये मौन रहने की आवश्यकता होती है। वह इन भौतिक चर्म चक्षुओं से हमें प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता परन्तु हम मौन रहकर, ध्यान लगाकर और प्रार्थना के माध्यम से जब चाहें उससे बातचीत कर सकते हैं।
        जैसे हम मालिक से अपनी प्रार्थना के माध्यम से बात करते हैं उसी प्रकार वह दाता भी हमसे बात करता है। अन्तरात्मा की आवाज के माध्यम से वह हमारे साथ संवाद करता है। जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं तो हमारे मन में उत्साह होगा यानी वह शाबाशी देता है। इसके विपरीत गलत कार्य करने पर मन से आवाज आती है कि यह काम गलत है अथवा कोई देख न ले या किसी को पता चलेगा तो क्या होगा ? यानी हमें गलत कार्य न करने की चेतावनी देता है। उस परमपिता का हमारे साथ संवाद करने का यही तरीका है।
          भौतिक फोन से बात करने के लिए हमें निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। यानी उसके लिए हमें बिल देना होता है। यदि बिल का भुगतान न किया जाए तो कम्पनी के द्वारा फोन काट दिया जाता है। दूसरी ओर अपने प्रभु से बात करने के लिए अपने मन की भावना का समर्पण करना पड़ता है। वहाँ किसी प्रकार के धन का व्यय नहीं करना पड़ता और न ही फोन कटने या काल ड्राप होने का डर रहता है।
           आज तकनीक इतनी एडवांस हो गई है कि विडीयो कॉल करने पर हम सामने वाले का चेहरा भी देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हम आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हैं। इसी प्रकार उस मालिक से संवाद करने के हेतु सामने प्रत्यक्ष बैठकर बात करने के लिए हमें अपने अन्तस् में ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है। 
        हमें अपने जीवन में प्रतिदिन अपना थोड़ा-सा समय निकालकर अपने मालिक के साथ वार्तालाप करना चाहिए। सांसारिक रिश्ते जिनके साथ हम हमेशा बातचीत में व्यस्त रहते हैं, वे हमारे परलोक सिधारते ही समाप्त हो जाते हैं। केवल प्रभु का और हमारा साथ चिरन्तन है। अतः उससे चर्चा भी करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 जुलाई 2026

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य को ईश्वर ने इस सृष्टि का सबसे अधिक समझदार जीव बनाया है। बुद्धि का उपहार देकर इतनी उसे सामर्थ्य दे दी है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। यदि वह सकारात्मक रुख रखता है तो चमत्कार कर देता है। इसके विपरीत वह अपने नकारात्मक विचारों के कारण स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
        ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थीं। इन्हें आप सबके साथ कुछ वर्तनी संशोधन के पश्चात साझा कर रही हूँ। आशा है आप भी इन्हें आत्मसात करना चाहेंगे।
        'नजर रखो अपने विचार पर क्योंकि वे शब्द बनते हैं। नजर रखो अपने शब्द पर क्योंकि वे कार्य बनते हैं। नजर रखो अपने कार्य पर क्योंकि वे स्वभाव बनता है। नजर रखो अपने स्वभाव पर क्योंकि वह आदत बनता है। नजर रखो अपनी आदत पर क्योंकि वह चरित्र बनती है। नजर रखो अपने चरित्र पर क्योंकि वह जीवन का आदर्श बनता है।'
          इन पंक्तियों को पढ़ने के पश्चात यही समझ आता है कि मनुष्य जो भी विचार अपने मन में रखता है, उसी के अनुरूप बोलता है और फिर उसे अपने आचरण में ढाल लेता‌ है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह सबको प्रभावित करेगा। निश्चित ही उसे उन सबका समर्थन मिलेगा। उनका मार्गदर्शक बनकर वह समाज में अपना अहं किरदार निभाएगा।
          इसके विपरीत नकारात्मक सोच होने पर मनुष्य न सही ढंग से कोई कार्य कर पाता है और न ही किसी को उचित परामर्श दे सकता है। जीवन की बाजी हारने वाला वह इन्सान जीत का जश्न नहीं मना पाता। ऐसे व्यक्ति घर-परिवार और समाज के लिए बोझ के समान बन जाते हैं। उन्हें कहीं पर भी सम्मान नहीं मिल पाता।
          मनुष्य के क्रियाकलापों पर उसके विचारों की छाप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। उत्साही मनुष्य सदा सबको प्रेरित करेगा और निरुत्साही व्यक्ति सबको निराश ही करेगा। विवेकी व्यक्ति और अज्ञ व्यक्ति के कार्यो में जमीन और आकाश जैसा अन्तर होता है। जिसका अनुमान हम उनके कार्य-व्यवहार से भलीभॉंति लगा सकते हैं।
          चोर व्यक्ति चोरी करना सिखाएगा, भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टाचरण की शिक्षा देगा, धोखेबाज इन्सान धोखाधड़ी सिखाएगा, सदाचरी महापुरुष सदाचरण पर बल देगा। विद्वान व्यक्ति सदा दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य को अपने मन, वचन और कर्म पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसे हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य यही है कि जिसके पास जो गुण-अवगुण होंगे, उसीके अनुरूप ही उसका आचरण अथवा स्वभाव बन जाता है। भविष्य में मनुष्य का यह स्वभाव परिपक्व होकर अनजाने ही उसकी आदत बन जाता है। यदि उसमें अच्छी आदतें ढल गयी तो चारों ओर उसकी जय-जयकार होती है। ऐसा मनुष्य सफलता की सीढ़ियों पर सुगमता से चढ़ता जाता है।
          यदि गलत आदतें अपना ली गई हों तो लाख कोशिशों के बाद भी वह अपनी आदतों को बदल नहीं पाता। तब उसके कारण उसके भाई-बन्धुओं तथा परिवारी जनों को शर्मसार होना पड़ता है। उनके समझाने पर भी यदि वह अपनी गलत आदतें नहीं छोड़ता तो वे सब उससे किनारा करने लगते हैं। तब वह अकेला हो जाता है। उसके लिए यह बहुत दुखदाई स्थिति होती है।
        अपने जीवन का आदर्श ही मनुष्य का चरित्र बनाता है। उसके चरित्र की महानता उसे महान बनाकर ऊपर उठाती है और उसकी चारित्रिक विकृति उसे रसातल की ओर धकेल देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सदैव चरित्र निर्माण पर बल देती है।
          जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है तब व्यष्टि का यानी समाज का चरित्र बनता है। समाज के साथ-साथ देश के चरित्र का भी  निर्माण होता है। जिस देश का और उसके निवासियों का चरित्र उदात्त होता है, उस देश का गौरवशाली ध्वज सदा ही ऊँचा फहराता है। उस देश की ओर कितना ही शक्तिशाली शत्रु हो, आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। यदि किसी खुशफहमी के कारण ऐसा करने का दुस्साहस करता है तो उस शत्रु को मुँह की खानी पड़ती है।
        इस प्रकार विचार, शब्द, कार्य, स्वभाव, आदत, चरित्र और जीवन आदर्श ये सब एक चेन या कड़ी हैं। ये सभी एक ही सूत्र में पिरोए गए हैं। इनका परस्पर अन्तर्सम्बन्ध होता है। इसीलिए विचारों की शुद्धता, सरलता, सहजता पर सयाने बल देते हैं जो सर्वथा समीचीन है और आज भी उतने ही सटीक हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक 

नंगे पैर यानी जूता या चप्पल बिन पहने चलना हाईजीन और स्वास्थ्य दोनों ही के लिए लाभदायक होता है। विद्वानों  का मानना है कि हरी घास पर प्रातःकाल नंगे पैर चलने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसीलिए सुबह-सवेरे पार्क में बहुत से लोग यह क्रिया करते हुए दिखाई देते हैं।
            बहुत से घरों में आज आधुनिक सुविधाओं वाले माडर्न रसोईघर बन गए हैं, वहाँ सारा कार्य खड़े होकर किया जाता है। इसलिए वहाँ जूता या चप्पल ले जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। अभी भी बहुत से परिवार ऐसे मिल जाएँगे जिनके घर के रसोईघर में जूते-चप्पल ले जाने की मनाही है। वे मानते हैं कि जहाँ खाना बनता है वहाँ इन्हें ले जाने से शुद्धता नहीं रहती और इनके साथ कई कीटाणु घर में प्रवेश कर जाते हैं।
          इसी तरह आज भी अनेक घर ऐसे मिल जाएँगे जहाँ घर के भीतर जूते आदि नहीं लाए जाते बल्कि घर का हर सदस्य उन्हें मुख्य द्वार के बाहर ही उतारकर घर में प्रवेश करता है। इसका कारण है कि वे अपने घर को बाहर की गन्दगी से बचाकर शुद्ध रखना चाहते हैं।
        प्रायः सभी धर्मस्थलों में भी जूते-चप्पलों को बाहर उतारा जाता है। अधिकांश स्थानों पर उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। यहाँ भी उन स्थलों की पवित्रता और शुद्धता मुख्य कारण होती है। इसी प्रकार के अन्य सभी धार्मिक आयोजनों में चाहे वे घर पर हों अथवा कहीं अन्यत्र क्यों न हो रहे हों इन्हें बाहर ही उतारने का विधान है। घरों, दुकानों, फैक्टरी या किसी भी आयोजन में पूजा करते समय इन्हें उतार दिया जाता है। इस धार्मिक आस्था पर कोई भी प्रश्नचिह्न नहीं लगाता। 
        अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष यानी आई सी यू में रोगियों को बाहरी कीटाणुओं के आक्रमण से बचाने के लिए जूते-चप्पलों को उस कक्ष के बाहर ही उतारने का आदेश लिखा होता है।
           पुराने समय में लोग बगैर जूतों के ही पैदल चलते थे परन्तु समय के साथ-साथ जूते-चप्पल पहनना आम हो गया। वास्तव में गन्दगी या चोट से बचने के लिए ही जूते-चप्पलों का इस्तेमाल किया जाता है। यदि व्यक्ति किसी घास के मैदान या साफ जमीन पर पैदल चल रहा हो तो उसकी आवश्यकता नहीं होती। नंगे पैर चलने से बहुत से फायदे हो सकते हैं।
          धरती के सम्पर्क में आने से शरीर में मौजूद नकारात्मक तनाव कम होता है। इससे जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है। नंगे पैर घास पर चलने से मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बेहतर होता है। इससे मनुष्य गहरी और सुकून भरी नींद सो सकता है। जूते-चप्पल पहनने के कारण पैरों की कुछ मांसपेशियॉं निष्क्रिय हो जाती हैं। नंगे पैर चलने से पैर, टखने और पिण्डलियों की मांसपेशियॉं सक्रिय और मजबूत होती हैं। 
            नंगे पैर रहने से एनर्जी लेवल बढ़ता है और घुटनों एवं कूल्हों की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। खाली पैर चलना एक प्रकार की एक्सरसाइज है। रोजाना आधा घण्टा पैदल चलने से हार्ट की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति मिल सकती है। 
          कुछ लोग घर में भी खाली पैर घूमना पसन्द करने लगे हैं क्योंकि इससे कई तरह के पॉजिटिव एफेक्ट्स भी शरीर पर पड़ते हैं। सेहत के लिए गर्मी के दिनों में नंगे पैर चलना अधिक फायदेमन्द होता है। यह शरीर को ठण्डा रखता है। ऐसा भी देखा गया है कि बचपन में अधिक खाली पैर रहने से बड़े होने पर पैर की तकलीफें कम होती हैं। 
        नंगे पैर चलने से किसी प्रकार की हानि नहीं हो सकती। बस नंगे पाँव चलने से पैर अवश्य गन्दे हो सकते हैं। विचार यह है कि उससे कोई हानि नहीं होती अपितु उसके लाभ अधिक हैं।
          जैन साधु आज भी बिना जूता पहने रहते हैं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा नंगे पैर ही करते हैं। उनका विचार है कि जूतों के नीचे आकर मरने वाले कई जीवों की हत्या के पाप से बचा जा सकता है।
        कुछ लोग अपनी गरीबी या विपन्न अवस्था की लाचारी के कारण बिना जूते या चप्पल के सड़कों पर घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं। वे लोग भी प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं।
        हमारी पृथ्वी मे हर तरह की धातुएँ पाई जाती हैं जो हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं। नंगे पैर चलकर हमें वे धातुएँ स्वतः मिल जाती हैं जिनकी कमी हो जाने पर हम डाक्टरों के पास जाकर अपना अमूल्य समय व कमाया हुआ धन खर्च करते हैं और फिर उनके निर्देशानुसार उन्हें दवा के रूप में खाते हैं।
        नंगे पैर चलना चाहे धार्मिक कारण से हो अथवा स्वास्थ्य के लिए हो, उसके पीछे भावना मनुष्य के कल्याण की ही होती है। इससे कोई हानि नहीं होती। इसलिए इसे अपनी आदत में शामिल कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

जीवन साथी की कल्पना

जीवन साथी की कल्पना 

हर युवा अपने भावी जीवन की रूपरेखा बनाता है।इसी कड़ी में वह अपने जीवन साथी के विषय में भी सोचता है। जीवन साथी कैसा हो? इस विषय में हर मनुष्य की कल्पना अलग-अलग होती है। वह अपने मनोनुकूल साथी को पा लेने का हरसम्भव प्रयास भी करता है। यह निश्चित है कि कुछ गुण ऐसे हैं जो हर व्यक्ति अपने जीवन साथी में चाहता है। उनमें परस्पर विश्वास, आपसी प्रेम, सद्भाव, एक-दूसरे की परवाह आदि गुण प्रमुख हैं।
          जीवन साथी का चुनाव करते समय यह विचार अपने मन में रखना आवश्यक है कि यह साथ उम्रभर का है, केवल पलभर का नहीं है। यह जीवनसाथी है कोई खिलौना भी नहीं है जिसे मन भर जाने पर कहीं फैंक दिया जाए और फिर बाजार जाकर नया खरीदकर लाया जा सके। हमारे मनीषियों ने इस साथ को जन्म-जन्मान्तरों का साथ यानी सात जन्मों का माना है।
          मात्र गोरा रंग होना अथवा फिल्मी हीरो-हीरोइन जैसे हावभाव देखकर या उसके उन्मुक्त स्वभाव से प्रभावित होकर ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जो भविष्य में जी का जंजाल बन जाए। जिस कारण आयुपर्यन्त स्वयं को कोसने की स्थिति बनी रहे। उस एक पल के लिए जीवन भर पश्चाताप करना पड़ जाए कि उसने गलत साथी का चुनाव किया था।
          अपनी शिक्षा, आर्थिक स्थिति और अपनी कदकाठी के अनुरूप ही जीवन साथी का चुनाव करना चाहिए। दोनों में से एक के पास भी इनकी अधिकता अथवा कमी जीवन भर के लिए परेशानी‌ का कारण बना सकती है। ऐसी स्थिति में सारी आयु एक-दूसरे को ताने देने में ही गुजर जाती है। इस प्रकार के आचरण से मानसिक शान्ति खो जाती है, घर का माहौल बोझिल हो जाता है और फिर जो जग हँसाई होती है सो अलग।
          शारीरिक सौन्दर्य तो चार दिन की चाँदनी होता है परन्तु मनुष्य के गुण हमेशा परखे जाते हैं। रूप सौन्दर्य तो किसी एक्सीडेंट, बिमारी अथवा आयु ढलने पर फीका पड़ जाता है। इसके विपरीत आत्मिक सुन्दरता दिन-प्रतिदिन निखरती जाती है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि सुन्दर व्यक्ति को अपना हमसफर न बनाया जाए। यदि सुन्दरता के साथ गुणों का समावेश भी साथी में हो तो यह सम्मिलिन सौभाग्यदायी हो जाता है।
         इसका अर्थ है कि भौतिक सौन्दर्य के साथ ही अपने अन्तस् में सद् गुणों का विकास भी करना चाहिए। तभी सोने पर सुहागे वाली उक्ति चरितार्थ होती है।
          घर-गृहस्थी चलाने के लिए परस्पर सामंजस्य होना आवश्यक है। यदि दोनों अपने रंग-रूप, ऊँचे पद, अधिक वेतन आदि के नशे में चूर रहकर अपने साथी की अवहेलना करें तो इसे कोई भी उचित नहीं ठहराएगा। इस अहंकार से जीवन नहीं चल पाता। घर में सदा कलह-क्लेश बढ़ता‌ है और जीवन नरक के समान दुखदाई बन जाता है। उसका एकमात्र हल घर का विघटन होता है।
          घर में एक मटका भी यदि खरीदा जाता है तो ठोक बजाकर परखा जाता है। फिर यहाँ तो सारी आयु के साहचर्य की बात होती है। अपने जीवन साथी का चुनाव भी अच्छी तरह देख-परखकर और सोच-समझकर करना चाहिए। जब तक मन को पूरी तसल्ली न हो जाए तब तक सम्बन्ध के लिए हाँ नहीं करनी चाहिए।
          सबसे प्रमुख बात है साथी का चाल-चलन। उस पर पैनी नजर रखनी चाहिए। जिस भी साथी को घर के सदस्यों की अपेक्षा अपने दोस्तों का साथ अधिक पसन्द हो, वह अपने साथी के प्रति वफादार नहीं हो सकता। किसी भी साथी‌ के विवाहेत्तर सम्बन्ध समाज और घर-परिवार में मान्य नहीं होते।‌ऐसे सम्बन्धों के कारण पहले अबोलापन बढ़ता है और फिर तलाक हो जाता है।
             इसीलिए हमारे अनुभवी बुजुर्ग शादी-ब्याह लड़के और लड़की की आर्थिक स्थिति न देखकर उनके कुल या परिवार की ओर अधिक ध्यान देते थे। इसलिए कहते हैं कि यह सम्बन्ध दो परिवारों का होता है।‌ इसका कारण था युवाओं में घर-परिवार और समाज का डर व शर्म होना होता था। इसलिए उस समय प्रायः सही चुनाव होते थे और यदि कभी गलत हो भी जाते थे तो वे‌न के बराबर होते थे। 
          जीवन साथी वही होना चाहिए जो अपने दूसरे साथी के मनोभावों को समझने वाला हो। उसके सामने आप खुलकर हँस सकें और आवश्यकता पड़ने पर उसके कन्धे पर सिर रखकर रो भी सकें। उसका साथ आप आपको अच्छा लगता हो। पूरा दिन उसके साथ हँसते, खेलते और गप्पे लगाते बिताने पर भी ऊब न हो, ऐसा साथी जिसे सौभाग्य से मिल जाए तो उसका सम्मान करते हुए अपना पूरा जीवन बिताकर स्वयं को धन्य मानना चाहिए। साथ ही ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए कि उसने इतना अच्छा जीवन साथी दिया है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं है। कोई भी मनुष्य सफलता की उँचाइयों को छू सकता है। सफलता अमीर-गरीब, ऊॅंच-नीच और जात-पात को नहीं देखती। मानव को अपने जीवन में सफल होने तथा सबका प्रिय बनने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें यदि अपने जीवन में ढाल लिया जाए तो दुनिया की ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो उसे उसका मनचाहा पाने से रोक सके। 
         यह सर्वथा सत्य है कि सफलता न किसी की मोहताज है‌और न ही किसी की बपौती है। यह केवल अटूट संकल्प, निरन्तर परिश्रम और धैर्य का परिणाम होती है। यह किसी व्यक्ति की आयु नहीं देखती।‌ यह उचित समय पर आरम्भ की गई योजना और मनुष्य की लगन का परिणाम होती है। मनुष्य की प्रतिभा और उसके कार्य स्वयं उसका परिचय देते हैं। इतिहास गवाह है कि इस संसार में अनेक महान हस्तियों ने अपने सीमित संसाधनों तथा विपरीत परिस्थितियों से बिना घबराए अपनी पहचान बनाई है।
         सफलता का मुख्य मूल मन्त्र है अनवरत परिश्रम करना। अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण रखना, असफलता से सीखकर आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति और समय का सही प्रबन्धन करना। ये गुण किसी भी क्षेत्र में सफलता की नींव रखते हैं।यह मानकर चलना चाहिए कि असफलताऍं अस्थायी होती हैं। महान नेताओं और विचारकों के सफलता के मूल मन्त्र को देखकर धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम फलदाई होता है। यह भी सत्य है कि मनुष्य को सदा आशावादी बनना चाहिए। सकारात्मक ऊर्जा ही मनुष्य को चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देती है। 
        समाज में रहते हुए मनुष्य हर प्रकार के लोगों से सम्पर्क में रहता है। कभी वह दूसरों की सहायता करता है और कभी अन्य लोग उसकी। उसे किसी के उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए। जो कष्ट के समय अपना साथ दे उसका कृतज्ञ होना चाहिए। उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
          इसके विपरीत दूसरों के प्रति किये गए परोपकार के कार्यो को भूल जाना चाहिए। सयाने कहते हैं- 'नेकी कर दरिया में डाल।' हमें कभी यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि जिसका भला हमने किया है, वह व्यक्ति आजन्म हमारे समक्ष नजरें झुकाकर रहे अथवा जिन्दगी भर के लिए गुलाम बनकर हमारी चाकरी करता रहे। 
          किए गए उपकार का यदि हर समय बखान करते रहने से उसका महत्त्व समाप्त हो जाता हैं। उसके बदले में हमें किसी से कुछ मिलने की आशा नहीं रखनी चाहिए। हालाँकि यह बहुत कठिन कार्य है क्योंकि इन्सानी कमजोरी है कि वह सदा अपनी प्रशंसा चाहता है। मनुष्य को स्वयं पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। अपने बाहुबल, अपनी मेहनत, अपनी लग्नशीलता पर उसे सदा विश्वास रखना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास नहीं होगा तो वह एक कामयाब इन्सान नहीं बन सकता। वह दुनिया की रेस में पिछड़ जाता है।
          इसी प्रकार अपने भाई-बन्धुओं एवं अपने सहयोगियों पर भी विश्वास करना चाहिए। परस्पर विश्वास से ही दुनिया के सभी कार्य व्यवहार चलते हैं। दूसरों पर सन्देह करने से जीना दुष्वार हो जाता है। यह अविश्वास घुन या दीमक की तरह जीवन को खोखला कर देता है। स्वयं पर और अपने स्वजनों पर विश्वास के साथ-साथ परमपिता परमात्मा पर भी मनुष्य को अटूट विश्वास होना चाहिए। सदा यही मानना चाहिए कि वह जो भी करेगा हमारे हित के लिए ही होगा।
        'क्षमा बड़न को चाहिए' ऐसा कहकर मनीषियों ने क्षमा के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। मनुष्य को सदा क्षमाशील होना चाहिए। यह गुण मनुष्य को सृष्टि के अन्य जीवों से अलग तथा विशेष बनाता है। यह ईश्वरीय गुण है। किसी को उसकी गलती के लिए क्षमा कर देना वास्तव में विशालहृदयता का परिचायक होता है। 
          वे लोग बहुत ही संकीर्ण मानसिकता के होते हैं जो किसी की गलती होने पर उसे सबके समक्ष तिरस्कृत करते हैं, उसका उपहास करते हैं। उनकी ऐसी हरकत के कारण कोई भी उन्हें पसन्द नहीं करता। इसलिए क्षमा रूपी दिव्य गुण को अपनाने से मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सकता है। लोग ऐसे व्यक्ति का साथ पाने के‌ लिए सदैव लालायित रहते हैं।
          मनुष्य के मन में सदा ही यह भाव रहना चाहिए कि इस संसार में वह अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के लिए आया है। जिस भी जीव का जन्म यहाँ होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। यह वैराग्य भाव जब मनुष्य के मन में आता है तब वह जल में कमल की तरह सांसारिक कार्य कलापों में लिप्त हुए बिना जीवन व्यतीत करता है। 
          यदि मनुष्य इस अटल सत्य को आत्मसात कर ले तो किसी कार्य को करने से पहले दस बार सोचेगा। तब वह कोई भी अनुचित कार्य नहीं कर सकता। उचित मार्ग पर चलता हुआ मानसिक सुखानुभूति कर सकता है। एवंविध इन सूत्रों को जीवन में अपना करके मनुष्य सही मायने में अपना इहलोक और परलोक दोनों ही सुधार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 जुलाई 2026

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते हम इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है।
          हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन्दगी जी रहे हैं। हम सहज और सरल नहीं बन पआ रहे हैं। हमारी कथनी, करनी और सोच में बहुत अन्तर है। हम जो सोचते हैं उसे व्यवहार में नहीं लाते और न ही मन में सोचे भावों को अपनी वाणी से यथावत प्रकट करते हैं।
         दिखावे और मुनाफे की इस दुनिया में न केवल खाने-पीने की चीजों में बल्कि इन्सान के व्यवहार और रिश्तों में भी मिलावट आ गई है। आज व्यक्ति बाहर से जितना आकर्षक और सच्चा दिखता है, भीतर से उतना ही स्वार्थी और बनावटी हो गया है। लोग अपनी वास्तविकता छिपाकर झूठी छवि दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते है। 
        सोशल मीडिया की इस दुनिया में यह और भी स्पष्ट हो जाता है जहाँ हर व्यक्ति एक परफेक्ट और खुशहाल जिन्दगी का मुखौटा पहनकर घूमता रहता है। यद्यपि असलियत इससे कोसों दूर होती है। जिस प्रकार मिलावटी खाना स्वास्थ्य को हानि पहुॅंचाता है, उसी प्रकार स्वार्थी रिश्ते और झूठे वादे मनुष्य के मानसिक सुकून को समाप्त कर देते हैं।
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में किसी के पास दो पल का समय नहीं है कि दो मिनट रुककर थकने वाले को सान्त्वना दे सके। जो रेस में पीछे छूट जाता है अथवा गिर जाता है, हम उसकी ओर हाथ बढ़ाकर उसे नहीं उठाते। बस उसे हालात से लड़ने के लिए यूँही छोड़ देते हैं।
        अपने स्वार्थो को सर्वोपरि समझने वाले लोग गधे को भी बाप बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अद्ययुगीन मनुष्य की यही विडम्बना है कि वह पैसे को महत्त्व देता है। सभी सम्बन्ध उसके स्वार्थ के सामने बौने हो जाते हैं क्योंकि वह उन्हें पैसे की कसौटी पर ही तौलता है। वह इस सत्य को भूल जाना चाहता है कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं होती। आज वह उसके पास है तो कल उसे छोड़कर किसी दूसरे का वरण कर लेगी। उस पर मान करके दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मानना सर्वथा अनुचित है। ईश्वर न करे ऐसी विपन्नावस्था आ जाने पर अपनी स्थिति के विषय में विचार करते हुए अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखें।
        हमारी सोच और हमारा व्यवहार दोनों परस्पर मेल नहीं खाते। जिन लोगों को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं, पानी पी-पीकर कोसते हैं, जब वे प्रत्यक्ष सामने उपस्थित हो जाते हैं तो उनकी मनुहार करते हैं। तब उन्हें यह अहसास कराते हैं कि उनके सबसे प्रिय वही हैं।
        इस मानसिकता के चलते अपने सगे रिश्तों के साथ भी ऐसा कृत्रिम व्यवहार करने को भी हम बुरा नहीं मानते। इसलिए 'मुँह में राम बगल में छुरी' वाली उक्ति कही गई है। 
          मन में प्रेम नहीं परन्तु उसका जी जान से प्रदर्शन करते हैं। धन का अभाव होने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो सारी दुनिया को खरीद सकते हैं। अल्प ज्ञान होने पर भी सबके हृदयों में विद्वत्ता की ऐसी धाक जमाना चाहते हैं कि सब हमारा लौहा मानने लगें। 
          असामाजिक कार्य यानि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरबाजारी आदि करते हुए भी स्वय को शुद्ध व पवित्र आत्मा होने कआ दावा करते हैं। अधार्मिक कृत्य करते हुए सबसे बड़े धार्मिक होने का प्रपंच करते हैं। बात-बात पर झूठ बोलने वाले कसमें खाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देने का यत्न करते हैं।
          माता-पिता बच्चों के समक्ष और बच्चे माता-पिता के सामने मुखौटों में रहते हैं। भाई-बन्धुओं के साथ भी बस पाक-साफ बनने का ढोंग किया जाता है।
        राजनेता तो जनता के बीच जाकर अपनी नाकाम उपलब्धियों का बखान करते नहीं अघाते। वे ऐसा जाल फैंकने का प्रयास करते हैं कि हर कोई उनके वश में हो जाएँ। 
        कोई भी यह समझने-बूझने के लिए तैयार नहीं होता कि 'काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।' इसी तरह जब मुखौटा चेहरे से उतर जाता है तब वह विकृत चेहरा बहुत ही भयावह दिखाई देता है। 
          मनुष्य का चेहरा एक आईना होता है जिसमें उसके मन के सभी भाव दूसरों को सरलता से दिख जाते हैं। ईश्वर को भी किसी तरह का दिखावा पसन्द नहीं है। अतः अपने मुखौटानुमा मिलावटी आचरण को छोड़कर हम सभी लोगों को अपने स्वभाविक रूप में रहना चाहिए। इसी में मनुष्य का बड़प्पन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद