स्वार्थ को हावी न होने दें
अपने झूठे अहं के कारण जो मनुष्य दूसरों की सहायता नहीं करता, वह अन्ततः खाली हाथ रह जाता है। वह चाहे कितनी ही सुख-समृद्धि जुटा ले पर उसे मानसिक सन्तोष नहीं मिलता। वह सदा ही किसी-न-किसी कारण से भटकता रहता है। यह भटकाव उसे आजीवन परेशान करता रहता है। वह उसके सुख-चैन पर सदा घात लगाए बैठा रहता है। मनुष्य यदि दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से तत्पर हो जाए तो उसके बिना माँगे ही उसकी झोली में सब कुछ आ जाता है।
एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक बार देवताओं और असुरों दोनों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया। जब वे दोनों आ गए तो उन दिनों गुटों को अलग-अलग मेज पर भोजन करने के लिए बिठा दिया गया। उनके सामने एक शर्त रखी गई, "उनकी बाहों में खप्पचियाँ बाँधी जाएँगी और उन सबको बॅंधे हुए हाथों से ही उन्हें भोजन समाप्त करना है।"
फिर उनको खप्पचियाँ बाँध दी गईं और फिर उनके समक्ष भोजन को परोस दिया गया। उन्हें खाना खाने के लिए आदेश देते हुए कहा गया, "अब आप सब भोजन कीजिए।"
देवताओं और असुरों दोनों ने बहुत प्रयास किया परन्तु बाहें न मोड़ पाने के कारण वे खाना खाने में सफल नहीं हो पाए। वे चम्मच में खाना भरकर मुँह की ओर ले जाते तो बॅंधे हाथों के कारण खाना उनके मुँह में न जाकर जमीन पर गिर जाता। अब वे दोनों ही परेशान होने लगे, उनके समक्ष एक ही समस्या थी, "अब खाना कैसे खाया जाए?"
असुरों की प्रकृति होती है कि वे कभी मिल-जुलकर रह नहीं पाते, अपने अहं के कारण सदा झगड़ते ही रहते हैं। यहाँ भी मिलकर खाने के विषय में वे असुर सोच ही नहीं पाए। उनका भोजन नीचे धरती पर गिरकर बिखरता हुआ समाप्त हो गया और वे बिनखाए भूखे ही उठ गए।
दूसरी ओर देवता थे जो सहिष्णु और सबके हितचिन्तक होते हैं। उन्होंने बहुत विचार किया। फिर उन लोगों ने मिलकर एक उपाय सोचा और उस पर अमल करने लगे। सभी देवता गण आमने-सामने होकर बैठ गए। चम्मच में भोज्य लेते और सामने वाले के मुँह में डालते। इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते हुए ही उन्होंने भरपेट भोजन का आनन्द लिया। इस प्रकार देवताओं की बुद्धिमानी और परोपकार की भावना के कारण उनका भोजन बिल्कुल व्यर्थ में नष्ट नहीं हुआ और अपनी मेज से वे तृप्त होकर उठे।
यह कथा हमें यही समझाती है कि दूसरों के हित की चिन्ता करने पर अपना हित स्वयं ही सिद्ध हो जाता है। ईश्वर का न्याय है -
इस हाथ दो और उस हाथ लो।
बार-बार हम इस सत्य को भूल जाते है और स्वार्थ के हाथों विवश हो जाते हैं। यह स्वार्थ हमारी कामनाओं की पूर्ति का मात्र साधन नहीं है अपितु हमें मूर्ख बनाकर दिन-रात हमें ठगता रहता है। इस तरह हम भी अनजान बनकर अपना तमाशा स्वयं ही बन जाते हैं।
मनुष्य जितना अधिक 'स्व' तक ही सीमित रहता है, उसे परेशानियो का सामना करना पड़ता है। परन्तु जब वह 'स्व' से ऊपर उठकर 'पर' यानी दूसरों के बारे में सोचना आरम्भ करने लगता है तो उसे सहज ही वह सब प्राप्त हो जाता है जिसे वह अपनी कल्पना में ही पाता रहता है।
इसीलिए हमारे मनीषी व्यष्टि(एक) से समष्टि(समूह या अनेक) की ओर चलने की बात करते हैं। यही कारण रहा होगा कि हमारे शास्त्रों में विश्व बन्धुत्व की परिकल्पना ककी गई। इसीलिए कहा जाता है-
वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् सारी पृथ्वी अपना घर है।
इस विचारधारा में सबको साथ लेकर चलने और मिल-जुलकर रहने की भावना बलवती होती है। हर मनुष्य को अपने घर-परिवार के आगे कुछ भी नहीं दिखाई देता। उन्हीं के लिए ही वह जीता है और सारा जीवन खटता रहता है।
स्वार्थ को हावी न होने देने के लिए परोपकार को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। सन्तुलित जीवन के लिए जरूरी है कि निजी स्वार्थ को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए। जिससे 'मैं' और 'हम' के बीच सन्तुलन बना रहेजब मन में स्वार्थपरक विचार आने लगें तो वहीं रुक जाना चाहिए और रिश्तों की अहमियत को समझने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य को सदा यह समझना चाहिए कि समाज के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है जिससे स्वार्थ स्वतः ही परोपकार में बदल जाएगा।
अतः सम्पूर्ण संसार को यदि मनुष्य अपना परिवार ही मान ले तो सारे फसाद की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। तब हर ओर से हम शुभ की ही कामना करेंगे। तब कोई स्वार्थ किसी पर हावी नहीं होगा। सब एक दूसरे का हित साधेंगे और सहायता करेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद