भारतीय संस्कृति में विवाह के प्रकार
भारतीय संस्कृति में विवाह पद्धति मूल में है। इसका कारण यह है कि विवाह के पश्चात नवयुवक और नवयुवती ब्रह्मचर्याश्रम से निकलकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं। यह गृहस्थाश्रम शेष तीनों आश्रमों- ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम का पालन करता है।
हिन्दू धर्म शास्त्रों और धर्मसूत्रों के अतिरिक्त मुख्य रूप से 'मनुस्मृति:' के अध्याय 3, श्लोक 21 में विवाह के आठ प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त 'महाभारत' के आदि पर्व और अनुशासन पर्व में भीष्म और दुष्यन्त द्वारा इन आठों प्रकार के विवाहों का वर्णन मिलता है। ये आठ प्रकार हैं - ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच।
1 ब्राह्म विवाह - भारतीय समाज में सबसे उत्तम विवाह माना जाता है। ब्राह्म विवाह में पितृपक्ष से सात पीढ़ी और मातृपक्ष की पाँच पीढ़ी में विवाह सम्बन्ध वर्जित हैं। पहले समय में वेदों के ज्ञाता और शीलवान वर को स्वयं बुलाकर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित करके माता-पिता यह विवाह सम्पन्न करवाते थे।
आज भी शादी के समय कन्या का परिवार बेटी के लिए सुयोग्य वर की तलाश करता है और बेटे के लिए सुयोग्य कन्या की। दोनों परिवार के एक-दूसरे से मिलकर अपनी तसल्ली करते हैं और फिर दोनों की सहमति से विवाह तय कर दिया जाता है। आज के समय के अनुसार इसे हम 'अरेंज्ड मैरिज' कह सकते हैं। इस विवाह में दोनों बच्चों की भी सहमति ली जाती है।
2 दैव विवाह - धार्मिक अनुष्ठान के बदले में पिता का अपनी कन्या का कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता था।
3 आर्ष विवाह- ऋषि-मुनि जब गार्हस्थ जीवन जीना चाहते थे, तब कन्या के पिता को दान में गो मिथुन यानी गाय और बैल देते थे। कन्या पक्ष यदि गोदान स्वीकार कर लेता था तो ऋषि से कन्या की शादी हो जाती थी। कन्या पक्ष की इच्छा न होने पर ऋषि को सादर वह गो मिथुन वापिस कर देना होता था।
4 प्रजापत्य विवाह - प्रजापत्य विवाह में पितृपक्ष से पाँच पीढ़ी और मातृपक्ष से केवल तीन पीढ़ी तक विवाह वर्जित माने जाते है। इस विवाह में कन्या की सहमति आवश्यक नहीं मानी जाती है। कन्या पक्ष कोई भी अभिजात्य वर देखकर उससे अपनी पुत्री का विवाह तय कर देता थे।
'तुम दोनों मिलकर धर्म का आचरण करो' ऐसा कहकर जोड़े को आशीर्वाद देते हुए कन्या का विवाह किया जाता था।
5 गन्धर्व विवाह - इस विवाह में युवक एवं युवती दोनों अपने-अपने परिवार की स्वीकृति के बिना विवाह कर लेते हैं। इसे भागकर विवाह करना भी कह सकते हैं। प्रेम विवाह का नाम भी दे सकते हैं। दूसरे शब्दों में वर और वधू का आपसी प्रेम और सहमति से बिना औपचारिक रीति-रिवाजों के विवाह करना गन्धर्व विवाह कहलाता है।
6 असुर विवाह - पैसे आदि का लेन-देन करके विवाह करना असुर विवाह की श्रेणी में आता है। इस विवाह में वर द्वारा कन्या के परिवार व पिता को अपनी इच्छा से धन या मूल्य देकर स्वेच्छा के विरुद्ध विवाह करना आता है।
यानी पहले कन्या को खरीदा जाता है फिर उससे विवाह किया जाता था। पिता अपनी पुत्री का मूल्य लगाता था और इच्छित युवक उतना धन देकर कन्या से विवाह कर लेता था।
7 राक्षस विवाह - किसी युवती का बलात् अपहरण करके, जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने को राक्षस विवाह कहा जाता है। राजा या योद्धाओं द्वारा बलपूर्वक युद्ध करके या कन्या की इच्छा के विरुद्ध उसका अपहरण करके जबरदस्ती घर में लाकर विवाह करना, राक्षस विवाह कहलाता है।
8 पिशाच विवाह - युवती की मानसिक दशा या धोखे से नशा पिलाकर छलपूर्वक या बलपूर्वक शारीरिक सम्बन्ध बना लिया जाए यानी बलात्कार आदि के बाद सजा आदि से बचने के लिए उस पीड़ित युवती से विवाह किया जाए। यानी अन्तिम विकल्प के रूप में विवाह कर लिया जाए। ऐसा आजकल भी होता है जो अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिलता है। इसे विवाह को सबसे निन्दनीय माना गया है।
रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में स्वंयवर विवाह का वर्णन है। इसे विवाह के प्रकारों में नहीं लिया गया। शायद इसे ब्राह्म विवाह माना जा सकता है। इस प्रकार के विवाह में माता-पिता और कन्या सबकी सहमति होती थी।
नारद पुराण ब्राह्म विवाह को सर्वश्रेष्ठ मानता है। दूसरे नम्बर पर दैव विवाह को रखते हैं। आर्य विवाह को भी उत्तम माना है। प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच विवाह को अशुभ माना है। परन्तु कुछ विद्वान प्राजापत्य विवाह को भी उचित मानते है। शुभ मुहूर्त में अग्नि को साक्षी मानकर, विधि-विधान से मन्त्रोच्चारण करके विवाह सम्पन्न कराया जाता है। इन विवाहों के समय सभी बन्धु-बान्धव उपास्थित रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद