नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं
इक्कीसवीं सदी का यह युग टेक्नोलॉजी का है। बच्चे और युवा इस तकनीक का सफलतापूर्वक भरपूर प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। आज हर छोटे-बड़े ऑफिस में हम कर्मचारियों को कम्प्यूटर और लेपटाप पर काम करते हुए देख सकते हैं। बैंक भी आनलाइन हो गए हैं। उनकी एप्लिकेशन डाउनलोड करके बिना समय गॅंवाए शीघ्रता से हम ट्रांजेक्शन कर सकते हैं। आजकल यूपीआई आदि से पैसों का लेन-देन प्रायः सभी लोग करते हुए दिखाई देते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे भी आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और आईपेड का प्रयोग सुविधा से करते हैं। बच्चों को इन उपकरणों पर सहजता से कार्य करते हुए देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। बच्चों की अंगुलियॉं इन उपकरणों पर बहुत तेजी से भागती हुई सी दिखाई देती हैं। बच्चे अपने मन पसन्द प्रोग्राम बिना किसी की सहायता के स्वयं ही देख लेते हैं। उनके ज्ञानवर्धक बहुत से प्रोग्राम मोबाइल आदि में मिल जाते हैं। उनके विद्यालय के प्रोजेक्ट्स भी इनकी सहायता से बनाए जाते हैं। बच्चों की आधी पढ़ाई तो इन्हीं उपकरणों के माध्यम से हो जाती है।
प्रायः आयुप्राप्त होते लोगों से भी मिलना होता रहता है। वे स्वयं को जब इस तकनीक के प्रयोग के लिए मिसफिट समझ लेते हैं तो मन को कष्ट होता है। सारी आयु नित नूतन प्रयोग करने वालों से ऐसी सोच की आशा वास्तव में बहुत निराश करने वाली होती है।
मोबाइल फोन अपनी जेब में रखकर जब लोग कहते हैं कि हमें तो बस फोन मिलाना और किसी से बात करने के अलावा कुछ नहीं आता तब झटका-सा लगता है। न वे फोन में कोई नम्बर फीड कर सकते हैं और न ही मैसेज तक कर सकते हैं। फेसबुक और वाट्सअप या अन्य एप्लीकेशन की जानकारी होना उनके लिए मानो बहुत दूर की कौड़ी होती है। यद्यपि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। घर में रहने वाले युवाओं और बच्चों का यह दायित्व बनता है कि अपने बुजुर्गों को इस नई टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दें।
रिटायर होने के बाद सभी बुजुर्गों को समय व्यतीत करने की समस्या होने लगती है। उसका कारण है कि वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते हुए उनका शरीर अशक्त होने लगता है। इसलिए वे भागदौड़ करने वाले काम नहीं कर पाते। सभी लोगों के पास कुछ करने के लिए काम नहीं होता। तभी वे प्रायः खाली बैठे रहते हैं। बच्चे अपने कामों में व्यस्त रहते हैं, उनके पास बुजुर्गों के पास बैठने के लिए सीमित समय निकल पाता है। स्वयं को अपेक्षित समझने के कारण वे हर समय अनमने और चिड़चिड़े से रहने लगते हैं।
इस तरह की परेशानियों से अपने घर के बुजुर्गों को मोबाइल का उपहार देकर उन्हें व्यस्त रहने का अवसर दें। उन्हें फेसबुक और वाट्सअप आदि चलाना भी सिखाएँ। वे जब इस नई तकनीक का सही ढंग से प्रयोग करना सीख जाएँगे तो उनका मन भी लगा रहेगा। उन्हें घर बैठे काम करने की जानकारी समझानी चाहिए।
उन्हें सिखा देना चाहिए कि वे पोस्ट पढ़ें, उन पर कमेण्ट करे, मन करे तो कुछ लिखकर पोस्ट कर दें, कभी चाहें तो फोटो भी लोड कर सकते हैं। उन्हें अपने मित्रों के साथ चैट करना भी सीखा सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका काफी समय व्यतीत हो जाएगा। जब वे इस प्रकार व्यस्त हो जाएँगे तो उनकी समय बिताने की समस्या का समाधान हो जाएगा। वे खुश रहेंगे तो घर की शान्ति भी बनी रहेगी।
अपने बुजुर्गों या माता-पिता को यह अवश्य बता दें कि फेसबुक मित्रता का अखाड़ा नहीं है अपितु उसका उपयोग रचनात्मक होना चाहिए। यदि कोई अवांछित पोस्ट करे अथवा कोई पसन्द न आए तो उसे ब्लॉक करना अथवा अनफ्रैण्ड करना भी सिखाएँ।
जिस भी विषय में उनकी जानकारी है अथवा अपने जीवनभर प्राप्त अनुभवों को सबके साथ साझा कर सकते हैं। लाइक वाले बटन पर वे क्लिक करके अपनी सहमति दर्ज कर सकते हैं। यह बात उन्हें समझानी भी आवश्यक है कि यदि वहाँ उनकी पोस्ट पर लाइक न भी आ सकें तो निराश न होकर अपने अनुभवों को साझा करते रहें। यह ऐसा माध्यम है जहाँ सभी लोग निस्सकोच अपने मन की बात या सुख-दुख भी शेयर करके अपने दिल का बोझ कम कर सकते हैं। इस माध्यम से लाभ-हानि की अपेक्षा करना उचित नहीं हो सकता।
युवाओं को चाहिए कि जहाँ भी उन्हें कोई कठिनाई आए तो उनके पास बैठकर तसल्ली से उसके निवारण का उपाय बताएँ। उनकी व्यस्तता के इस बहाने की सराहना करते रहें, इससे उनका उत्साह बना रहेगा। प्रयास करिए कि वे इस नई तकनीक से बोर न हों बल्कि उसमें अपना मन लगाए रहें। यदि बुजुर्ग अपने फालतू समय का सदुपयोग इस तरह करेंगे तो प्रसन्न रहेंगे और आप स्वयं भी उनकी ओर से निश्चिन्त हो जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद