मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

सौ वर्षों तक जीवन

सौ वर्षों तक जीवन

मनीषी ऋषियों ने ईश्वर से सौ वर्ष तक का जीवन देने की कामना की है। इन्हीं सौ वर्षों के आधार पर आश्रमों का विभाजन किया गया था। जो इस प्रकार होता था -
1 ब्रह्मचर्य आश्रम - जन्म से पच्चीस वर्ष 
2 गृहस्थ आश्रम - पच्चीस से पचास वर्ष 
3 वानप्रस्थाश्रम - पचास से पिचहतर वर्ष 
4 संन्यासाश्रम - पिचहतर से शेष आयु
           इस सौ वर्ष की आयु में हमारा शरीर कैसा होना चाहिए यह महत्त्वपूर्ण बात है। निम्न वेदमन्त्र के माध्यम से वे कहते हैं-
      पश्येम शरद: शतं  जीवेम शरद: शतम्
     श्रृणुयां शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना:   
    स्याम शरद:शतं भूयश्च शरद: शतात्।
अर्थात् हम सौ वर्ष की आयु तक भली-भाँति देख सकें। सौ वर्ष तक स्वस्थ होकर जी सकें। सौ सालों तक ठीक से सुन सकें और सौ वर्षो तक अच्छे से बोल सकें। हम सौ वर्षों तक दीन न बनें। ऐसा जीवन हम जी सकें।
            ऋषियों द्वारा इस मन्त्र में की गई प्रार्थना का तात्पर्य यही है कि सौ वर्षों तक हमारी सारी इन्द्रियाँ अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहे। हम स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट रहें। कोई रोग हमारे पास न आने पाए। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा सम्भव हो सकता है क्या? 
              यदि हम लोग अपने जीवन को संयमित कर सकें तो यह सब सम्भव हो सकता है। आधुनिक जीवनशैली के अनुसार हमारा आहार-विहार दोनों सन्तुलित नहीं हैं। हमें अपनी जीभ पर बिल्कुल भी नियन्त्रण नहीं है। तला-भुना, मिर्च-मसाले वाला जो भोजन है, उसे खाकर हम सब आनन्दित होते हैं। अपने शरीर को किसी तरह का कष्ट न देना पड़े, इसलिए दुनिया भर का जंक फूड खाते हैं। होटलों का खाना खाने के लिए हम मचलते रहते हैं। हम इसलिए अभोज्य पदार्थों का सेवन बहुत आनन्द पूर्वक करते हैं। 
          सादा और सन्तुलित भोजन खाने के नाम पर हमें बहुत कष्ट होता है। हम नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, मुँह बनाते हैं। घर में झगड़ा तक कर बैठते हैं। अब आप खुद ही बताइए कि ऐसी अवस्था में हमारा पेट बेचारा क्या करेगा? यह किसी एक व्यक्ति की बात नहीं है, हम सभी ऐसा ही करते हैं। फिर दोष दूसरों को देते हैं। ऐसे दोषपूर्ण और अमर्यादित खान-पान के कारण बिमारियाँ शरीर को गाहे-बगाहे घेरती ही रहेंगी। हमारी जीभ स्वाद के लालच में आकर लपलपाती रहती है। हम बस उसी के चक्कर में पड़कर स्वय को लाचार और रोगी बना लेते हैं।
             हमारे सोने-जागने का कोई समय नहीं है। आज जीवन  शैली ऐसी बन गई है कि सारी पार्टियॉं रात देर तक चलती हैं। हम रात को देर से सोते है और फिर प्रात: देर से उठते हैं। जो उल्टा-सीधा मिला, बस उसे ही खाकर अपने काम पर निकल जाते हैं। इसी तरह खाना खाने का भी कोई समय नहीं बनता। जिस भोजन के लिए सारे पाप-पुण्य, भ्रष्टाचार, कदाचार सब करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय का सदा अभाव रहता है। शेष सभी सांसारिक कार्य हमारे लिए इससे ज्यादा आवश्यक हो जाते हैं।
             आजकल अन्न, फल और सब्जियों आदि में डलने वाले कीटनाशक भी हमारे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को और अधिक कमजोर कर रहे हैं। इससे भी अनेक रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है।
                इन सबसे अधिक दूषित होता हुआ पर्यावरण है जो हमारी सबकी लापरवाही का परिणाम है। नदियों के जल में हम सीवर की गंदगी फेक्ट्रियों का कचरा डालकर दूषित करते हैं। उस जल का उपयोग भी हमारे बहुत से रोगों का कारण है। इसी प्रकार वायु को हर तरह से दूषित करके लोगों को न्योता देते हैं।
            जब हमारा खान-पान और रहन-सहन ऐसा हो जाएगा तो हम डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपनी मेहनत की कमाई और पैसा व्यर्थ बर्बाद करते रहेंगे। मैं यह तो नहीं कहूँगी कि सभी लोग 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली नीति का जबरदस्ती पालन करें। स्वेच्छा से इसका अनुकरण करना ही श्रेयस्कर होता है।
          सौ वर्ष की आयु तक जीने के लिए आँख, नाक, कान आदि सभी इन्द्रियों का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। यदि ये सभी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाएँगी और शरीर रोगी हो जाएगा तब तो जीवन भार बन जाएगा। जीने का आनन्द भी नहीं आएगा। उस समय मनुष्य बस दिन-रात, उठते-बैठते ईश्वर से मृत्यु की कामना करता रहेगा। अपने जीवन का शतक पूरा करने के लिए जीवन में सबसे पहले आत्मसंयम और आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। शेष सब ईश्वर पर छोड़ देना ही बेहतर है क्योकि वह सब जानता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों की चर्चा प्राय: होती रहती है। पुरातन वैदिक परम्परा में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण थे। शिष्य गुरु के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्रवत मानते थे। गुरु अपने शिष्यों का सम्पूर्ण व्यय वहन करते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके शिष्य अपने घर वापिस लौटते थे। 
              आधुनिक काल में गुरु-शिष्य परम्परा के मायने बदल गए हैं। आज के इस भौतिक युग में जहाँ अर्थ प्रधान हो गया है, वहाँ इस रिश्ते में भी स्वार्थपरता बढ़ गई है। ये सम्बन्ध भी अब धन की कसौटी पर कसे जाने लगे हैं। जिस गुरु के पास बेहिसाब धन-दौलत व सम्पत्ति का अम्बार है, वह बड़ा गुरु कहलाता है। इसी तरह जो जितना मनुष्य धनवान है, वह उतना बड़ा शिष्य कहलाता है। उस धनिक को रिझाने के लिए गुरु भी नानाविध उपाय करते रहते हैं।
           धन और स्वार्थ के कारण जुड़े गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में कहीं पारदर्शिता नहीं दिखाई देती। मुझे इसका यही कारण समझ में आता है कि जब तक इन दोनों के स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है, वे परस्पर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं और जहाँ स्वार्थ खत्म हो जाता है, वहीं उनके सम्बन्धों को भी धत्ता दिखा दिया जाता है। फिर आरम्भ होता है एक नए गुरु और एक नए शिष्य की तलाश का खेल। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यहॉं समर्पण की भावना नहीं होती, मात्र प्रदर्शन होता है।
               वे गुरु तो आज चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलते, जिनके विषय में हमारे ग्रन्थों में कहा गया था-
         गुरुर्बह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
    गुरु: साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥
अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। गुरु साक्षात् परम ब्रह्म है, उसे हम प्रणाम करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस श्लोक के अनुसार गुरु को ईश्वर से भी महान बना दिया गया।
            और भी बहुत कुछ गुरु की प्रशस्ति में गाया गया। बड़े दुख का विषय है कि ऐसे गुरु अब शायद ही उपलब्ध हैं जो शिष्य को अपनी सन्तान के  समान मानते थे, वे उसकी उन्नति में प्रसन्न होते थे। उनका प्रयास यही होता था कि जितना ज्ञान उनके पास है वे अपने शिष्य को सौंप दें। वे अपने शिष्य का स्वार्थ रहित होकर सर्वांगीण विकास करते थे। ऐसे वे महान गुरु शायद विरल ही हैं। ऐसी महान गुरु-शिष्य परम्परा को हम शीश नवाकर प्रणाम करते हैं।
              गुरु का नाम लेते ही उन तथाकथित धर्मगुरुओं की ओर आज बरबस ध्यान चला जाता है, जिनके आश्रमों में दुराचार व कदाचार धड़ल्ले से होता है। अपने भक्तों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले ऐसे गुरुओं के आश्रमों में आप सब देश-विदेश से नाजायज तरीके से आई हुई दौलत के अम्बार देख सकते हैं। हिरण्यकश्यप के शायद वे वंशज हैं जिन्हें स्वयं को ईश्वर कहने में भी उन्हें रंचमात्र भी संकोच नहीं होता। धर्म, समाज और न्याय व्यवस्था की नजर में दोषी कुछ आज सलाखों के पीछे भी बन्द हैं।
              गुरु के नाम पर वे कलंक है जो अपनी बेटी कही जाने वाली शिष्या से दुराचार अथवा बलात्कार जैसे घिनौने कर्म करने से नहीं घबराते। अपने शिष्यओं का अपहरण व उनकी हत्या करते हुए उनके हाथ नहीं काँपने और न ही उनका मानस उन्हें कचोटता है।
              जहाँ तक मेरा विचार है यह सारी गिरावट महामारत काल से आरम्भ हुई। उस समय अन्य मर्यादाओं के साथ इस मर्यादा का भी हनन हुआ। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने एकनिष्ठ शिष्य भील पुत्र एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा दक्षिणा में इसलिए माँग लिया कि वे राजाश्रित गुरु थे। वे नहीं चाहते थे कि राजकुमार अर्जुन से बड़ा कोई और धनुर्धर इस विश्व में हो।
               महारथी कर्ण ने धोखे से अपने गुरु से युद्धकौशल सीखा और गुरु ने उसे क्षमा करने के स्थान पर श्राप दे दिया, 'जब तुझे मेरी सिखाई हुई इस विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तेरा यह ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा।' इस अभिशाप का परिणाम महान दानवीर कर्ण की मृत्यु के रूप में हमारे समक्ष आया।
             गुरु गोरखनाथ जैसे शिष्य किसी गुरु को चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे। उन्होंने संसार की वासना से ग्रस्त अपने गुरु को सन्मार्ग दिखाया। फिर उन्हें सांसारिक वासनाओं से मुक्त करवाकर वैराग्य की ओर लौटाकर ले आए।
              आर्यसमाज के प्रवर्तक प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी का नाम इतिहास में अमर कर दिया। 
आधुनिक काल के ये दोनों गुरु-शिष्य परम्परा का सटीक उदाहरण कहे जा सकते हैं।
             ऐसे महान, सद् गुणी गुरु और ऐसे महान शिष्य तो बस अब किस्से कहानियों में सुनने व पढ़ने के लिए रह गए हैं। अब तो ऐसी आशा नहीं दिखाई देती कि फिर कभी महान गुरु-शिष्य परम्परा हमें भविष्य में दिखाई देगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर में समा जाना होता है। सागर तक पहुँचने की उसकी तड़प ही उसे सफल बनाती है। अपने रास्ते में आने वाली सारी बाधाओं को बिना रुके पार करते हुए वह अपने लक्ष्य को भेद लेती है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को पाना चाहे तो वह सहजता से उसे प्राप्त कर सकता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होता है। जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता वह जन्म और मरण के चक्र में भटकता रहता है। 
             मनुष्य इस असार संसार में आकर सब भूल जाता है। वह मोह-माया का दामन थाम लेता है। इसलिए वह अपने लक्ष्य से दूर होता जाता है। यदि वह अपने लक्ष्य का सन्धान करने का मन बना ले तो उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। परमपिता परमात्मा से एकाकार होने की उसकी तड़प उसे अपने उद्देश्य से भटकाने में सफल नहीं हो सकती। अपने लक्ष्य की ओर उसका बढ़ता हुआ कदम ही उसे इच्छित सफलता दिला सकता है।
             नदी को सागर से मिलने की और उसमें एकाकार होने की बहुत जल्दी होती है। वह अपने उद्गम स्थल से निकलते हुए वह रास्ता रोकने वाली चट्टानों की परवाह किए बिना, उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अन्ततः सागर में जाकर समा जाती है। दिन-रात का उसे कोई ख्याल नहीं रहता। हर मौसम के वारों को झेलती हुई वह निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली जाती है। कोई भी बाधा ऐसी नहीं होती जो उसे अपने लक्ष्य से भटका सके। उसकी एकाग्रता ही उसकी सफलता की कसौटी होती है।
             हम मनुष्य बाँध बनाकर उसके प्रवाह को रोकते हैं। जगह-जगह उसमें हम कचरा डालते हैं। कभी-कभी आँधी और तूफान भी उसका रास्ता रोकने का यत्न करते हैं। फिर भी वह इन सभी व्यवधानों को सदा ही अनदेखा करके अन्त में अपने गन्तव्य सागर तक पहुँच जाती है। सबसे मुख्य बात यह है कि वह बिना विश्राम किए अनवरत मीलों लम्बी यात्रा करती चली जाती है। उसके लिए  दिन-रात, मौसम और सबसे बढ़कर हम इन्सानों की बाधाऍं उसे नहीं रोक सकतीं।
              इस सत्य से हम इन्कार नहीं कर सकते कि सागर में मिल जाने के बाद से उसका मीठा जल भी खारा हो जाता है। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। वह सागर का ही एक रूप बन जाती है। उसका अपना नाम, उसकी पहचान समाप्त हो जाती है। फिर भी उसकी तड़प सागर के साथ उसे एकरूप कर देती है।
             मनुष्य के मन में भी यदि ईश्वर को पा लेने की तड़प बलवती हो जाए तो वह भी मीराबाई की तरह संसार सागर के अगणित थपेड़ों को झेलता हुआ, उनसे बिना डरे और बिना रुके अपनी निश्चित डगर पर चल पड़ता है। सुखों की नरम मुलायम छाँव और दुखों के पहाड़ कदापि उसका रास्ता नहीं रोक सकते। ये सब रूकावटें उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। इस दुनिया के प्रलोभन उसके लिए मिट्टी के ढेले के समान व्यर्थ हो जाते हैं। वह इन प्रलोभनों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करता। वह बस अपने लक्ष्य की ओर टकटकी लगाए देखता रहता है।
             संसार के लुभावने यह मोह-माया के जाल उसके पैरों की बेड़ियाँ नहीं बन सकते। वह महात्मा बुद्ध की तरह एक ही पल में, एक ही झटके में उन सब जंजीरों को तोड़कर मुक्त हो जाने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे ही लोग युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं। इनके मार्गदर्शन का लाभ अनेक लोग उठाते हैं।
              अब पतंगे को ही देख लीजिए। लौ का दीवाना, उसे पाने की चाहत में वह अपने प्राणों की आहुति तक दे डालता है। पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। ऐसा दिव्य समर्पण भाव अन्यत्र कहाँ मिल सकता है? अपने प्राणों की परवाह किए बिना पतंगा अपने लक्ष्य को पाने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है। पतंगे जैसी दीवानगी यदि हो तो मनुष्य का लक्ष्य उसे शीशे की तरह साफ-साफ चमकता हुआ दिखाई दे सकता है। जिसे वह चाहे तो सरलता से हाथ बढ़ाकर पा सकता है।
             नदी और पतंगे दोनों के उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करते हैं कि जब तक प्रेम की तड़प न हो तो मनुष्य इस संसार के सम्बन्धों को नहीं निभा सकता। क्योंकि माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र, नाते-रिश्ते यानी हर भौतिक सम्बन्ध प्यार के बिना अधूरा रहता है। जितना प्रेम का खिंचाव होता है, सम्बन्ध उतना ही प्रगाढ़ बनता है। तो फिर प्रभु को प्रेम की तड़प के बिना किस प्रकार पाया जा सकता है? 
             मालिक को पाने के लिए सच्ची तड़प का होना बहुत आवश्यक है। तभी मनुष्य उसके पास जाने, उससे मिलने, उसे जानने, उसमें एकाकार हो जाने के सभी प्रयत्न कर सकता है और फिर अन्तत: अपने इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा के पीछे भागना

मृगतृष्णा एक प्रकार का दृष्टि भ्रम होता है। दूर या रेगिस्तान में पानी होने का आभास होता है परन्तु वास्तव में वहॉं पानी नहीं होता है। यह गर्म दिनों में प्रकाश के अपवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। जहाँ जमीन के पास की गर्म हवा प्रकाश की किरणों को मोड़ देती है और आकाश का प्रतिबिम्ब जमीन पर दिखने लगता है, उसे पानी समझ लिया जाता है।वास्तव में मृग का अर्थ हिरण और तृष्णा का अर्थ प्यास होता है। यह उस मिथ्या विश्वास को दर्शाता है कि प्यासा हिरण पानी समझकर चकाचौंध वाली रेत के पीछे भागता है।
             जीवन में किसी ऐसी चीज की खोज करना या चाहना जो वास्तव में वहॉं होती नहीं है या जिसे प्राप्त करना नामुमकिन है। मृगतृष्णा के पीछे मनुष्य आखिर कब तक भागता रहेगा। इस भटकन का कहीं कोई अन्त तो होना चाहिए न। सीमित समय के लिए मिले इस मानव जीवन को मनुष्य मानो रेस में भागते हुए बिता देता है। अपना सारा सुख-चैन गँवाकर भी यदि उसे शान्ति मिल जाए तब गनीमत समझो। 
              वह न्यायकारी परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं करता। वह ईश्वर चींटी जैसे छोटे से जीव से लेकर हाथी जैसे बड़े, हर जीव के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। मनुष्य को भी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार बिन माँगे ही सब दे देता है। ज्ञानी जन कहते हैं-  
           जिसने यह जीवन दिया है,
           भोजन की व्यवस्था भी वही करेगा।
          जीवन चलाने के लिए आवश्यक साधनों को मनुष्य सरलता से जुटा सकता है। परन्तु जब महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर उठाने लगती हैं, तब समस्याएँ मुस्कुराती हुई उसे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। उस समय मनुष्य उन असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। दिन-रात एक करता हुआ जी-तोड़ मेहनत करता है। इस पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे सदा ही सफलता मिल जाएगी।
            जिनके लिए वह ये सब यत्न करता है वे तो उसे अपनी इच्छा पूर्ति का एक साधन मात्र समझने लगते हैं। जब तक उनकी जरूरतें वह पूरी करता रहेगा तब तक तो उसके बराबर उनका और कोई प्रिय नहीं होता है। सभी उसकी प्रशंसा करेंगे और मिन्नत-चिरौरी भी करेंगे। 
               इसके विपरीत जब मनुष्य दूसरों की आकाँक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता तब उससे बुरा और कोई नहीं होता। सबसे अधिक उसका बुरा तब होता है जब उसे नालायक और कामचोर कहकर अपमानित किया जाता है। उसके नाम के आगे एक असफल या नाकामयाब व्यक्ति होने का ठप्पा लग जाता है। फिर वह कितनी भी कोशिश कर ले स्थितियों को सुधारने में वह सफल नहीं हो पाता।
              एक के बाद एक भौतिक वस्तुओं को जुटाने की फिराक में भागता हुआ मनुष्य इतनी दूर निकल जाता है कि उसका सब कुछ छूटता चला जाता है। जब पीछे की ओर मुड़कर देखता है तब वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। फिर चाहकर भी अपनों के बीच नहीं जा पाता। यही वह समय होता है जब मनुष्य जीवन के उस मोड़ पर पहुँच जाता है जहाँ उसे अपनों के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए वह अशक्त होने लगता है। उस वक्त उसे अपनों के सशक्त कन्धों की जरूरत स्वाभाविक रूप से होती है।
             यही उसके सन्ताप का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। उस समय वह बस कलपता है, अपना मन मसोसकर रह जाता है कि जिनके लिए सारा जीवन भागदौड़ की, अपना सुख-चैन खो दिया, इससे भी बढ़कर स्वयं को भी भूल गया, वही नजरें मिलाकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। उससे कहीं दूर बेगानों की तरह हो गए हैं। उस स्थिति में भी इन्सान चेत जाए तब भी अच्छा है। एकाकी बैठकर आत्मचिन्तन करने पर ही समझ आती है कि अपने इस जीवन में क्या खोया और क्या पाया? मनुष्य जब तक खोये-पाये का लेखा-जोखा सुलझाता है तब तक इस संसार को अलविदा कहने का उसका समय आ जाता है।
                मनुष्य को अपनी असीम इच्छाओं को कुछ हद तक सीमित करना चाहिए। अनावश्यक ऐष्णाओं के पीछे भागने से कोई हल नहीं निकलने वाला। जितने भोगों को एकत्र करते जाओ, उतना ही मानसिक सन्ताप बढ़ता जाता है। इसलिए मृगतृष्णा के इस मायाजाल से यथासम्भव बचते हुए अपने जीवन में सुखोपभोग करना चाहिए अन्यथा इसके चंगुल से बच निकलना असम्भव तो नहीं बहुत ही कठिन अवश्य हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जिजीविषा

जिजीविषा

जिजीविषा एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ होता है जीने की प्रबल इच्छा अथवा जीवन के प्रति गहरा लगाव होता है। जीवन जीने की चाह, जीवन जीने की कला अथवा दीर्घायु की महत्वाकांक्षा। यह शब्द उस मानवीय जजबे को व्यक्त करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को न छोड़ने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन जीने की तीव्र लालसा, उत्साह और जीवटता को दर्शाता है।
            जिजीविषा शब्द का प्रयोग प्रायः उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह शब्द दर्शाता है कि मनुष्य अपने जीवन से कितना प्यार करता है और उसे बनाए रखने के लिए उसमें कितनी अदम्य इच्छाशक्ति है। जिजीविषा का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
            जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती तो वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े,  दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर प्रतिदिन ईश्वर से मृत्यु की कामना करता है। उसकी स्थिति को देखते हुए उसकी मनःस्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं।
           यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात लगती है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे मनुष्य के रूप में अवतरित हुए तब उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बस बैठा-बैठा कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
              जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ होना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह व्यक्ति मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई दे जाती हैं।
            हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी मनुष्य का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
             मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य या विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
          ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है। इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उबर जाता है। उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
            हम देखते हैं कि प्रकृति में भी जिजीविषा होती है। तभी सूखे और ठूॅंठ हो चुके पेड़ों में भी हरियाली देखी जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य की जिजीविषा असम्भव को भी सम्भव बना देती है। जिजीविषा मानव मन की अद्भुत शक्ति का प्रतीक होती है जो हमें हर परिस्थिति में जीवन को अपनाने और उसका जश्न मनाने की प्रेरणा देती है।
           कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे बिना डगमगाए खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही मनुष्य आकाश की बुलन्दियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

अग्नि का गुण

अग्नि का गुण

अग्नि का स्वाभाविक गुण जलाना होता है। हम इसे छू नहीं सकते। हम जानते हैं कि यदि इस पर हाथ रखेंगे तो वह जल जाएगा और तब हाथ पर फफोले पड़ जाऍंगे। फिर बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा। अग्नि का मुख्य गुण रूपान्तरण होता है जो उष्णता, तेज और प्रकाश प्रदान करना है। यह पंचतत्वों में से एक है। यह गर्म करने, पचाने और किसी भी पदार्थ को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। इसके अन्य गुणों में तीक्ष्णता, गतिशीलता, शुष्कता, हल्कापन और प्रकाश फैलाना शामिल है जो शारीरिक व मानसिक दोनों स्तरों पर क्रियाशील हैं। 
          अग्नि से हमारा जीवन चलता है। हम हर प्रकार के अन्न को इसी के माध्यम से पकाकर खाते हैं और स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं। यदि यह अग्नि न होती तो हम आज भी आदि मानव की तरह पेड़ों से तोड़कर सब कच्चा ही खाते। इसी अग्नि के कारण हम जीवन में सभी प्रकार की सुख और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। हमारे घर और बाहर हर ओर रौशनी होती है।
             अग्नि तीन प्रकार की मानी जाती है- दावानल, बड़वानल और जठराग्नि। दावानल जंगल में लगने वाली आग को कहते हैं जो जरा-सी हवा चलने पर बड़े-बड़े जगलों को जलाकर राख कर देती है। उसमें बड़े-बड़े वृक्ष, पशु और पक्षी जलकर खाक हो जाते हैं। बड़वानल समुद्र में लगने वाली आग को कहते हैं। पानी की यही आग है जिससे हम बिजली बनाते हैं और अपने जीवन में सारी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं।
           जठराग्नि मनुष्य के शरीर में होती है। यह भोजन को अच्छे से पचाने में सहायता करती है। शरीर की अग्नि जब सुचारू रूप से काम करती है तब मनुष्य के चेहरे पर तेज चमकता है उसकी रौनक ही अलग दिखाई देती है। युवावस्था में प्राय: लोगों के चेहरों पर हम देख सकते हैं। अपने जीवन को संयमित रखने वालों के चेहरों पर तेज हमेशा दिखाई देता है।
           शरीर में जठराग्नि सही स्थिति, मन की स्पष्टता, तीक्ष्ण बुद्धि और साहस प्रदान करती है।यदि यह अग्नि शरीर में बढ़ जाए तो बहुत-सी परेशानियों को जन्म देती है। मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है। पसीना भी बहुत अधिक आने लगता है। एसिडिटी और रक्त सम्बन्धी दोष शरीर में हो जाते हैं। शरीर में जलन होने लगती है। जरा-सी ठण्ड लग जाने पर खाँसी-जुकाम जैसी परेशानी हो जाती है। बारबार छींकते रहना पड़ता है। आवाज भारी हो जाती है और गला बैठने लगता है। 
            यदि शरीर की अग्नि मन्द हो जाती है तो मनुष्य का चेहरा कान्तिहीन हो जाता है। उस समय उसे बहुत से रोग घेर लेते हैं। उसकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे उसका भोजन पच नहीं पाता। पेट की बहुत-सी बिमारियों से मनुष्य घिर जाता है। पेट खराब हो जाने से खाने-पीने में परहेज करना पड़ता है।
            कभी घरों, बाजारों या फैक्टरियों आदि में आग लग जाए तो कितना नुकसान कर देगी पता नहीं। न जाने कितने ही लोगों की जान भी चली जाती है। यह अग्नि किसी को भी क्षमा नहीं करती जो इसमें घिर जाता है, वह फिर भस्म हो जाता है। परन्तु जब यह अग्नि तेजहीन होकर बुझ जाती है तो चींटियाँ भी इस पर चलने लगती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब रोगों से घिर जाता है तो वह भी तेजहीन हो जाता है। उसका चेहरा पीला या सफेद पड़ जाता है। उस समय वह सामर्थ्यहीन होकर ईश्वर से अपनी मृत्यु की गुहार लगाता है।
              अग्नि के प्रभाव से विभिन्न पदार्थ रूप परिवर्तित करते हैं। अग्नि हमेशा ही शुद्ध होती है। इसमें कैसा भी कचरा डाल दो, वह उसे भस्म कर देती है। इसी अग्नि में ही हम शव का दाह संस्कार भी करते हैं। किसी वस्तु अथवा विचार की शुद्धता की परीक्षा अग्नि में तपने के बाद ही होती है। यह रूक्ष होती है। अग्नि संयोग और वियोग दोनों का ही कारण भी होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम का आधार अग्नि तत्त्व होता है। इसी के कारण सृष्टि की सर्जना होती है। इसके मन्द पड़ जाने पर अलगाव की स्थिति बन जाती है।
            अग्नि का सबसे महत्वपूर्ण गुण भोजन, भावनाओं और विचारों को पचाकर उन्हें ऊर्जा में रूपान्तरित करना है। यह शरीर को पोषक तत्व अवशोषित करने में सहायता करती है। शारीरिक क्रियाओं को यह तेज और सुचारू बनाती है।अग्नि तीखी और तेज होती है जो बहुत तेजी से जल सकती है या धीमी गति से भी सुलग सकती है। अग्नि अपने सम्पर्क में आने वाली हर वस्तु को अपने में समाहित करने, भस्म करने या पवित्र करने का गुण रखती है।
            अग्नि का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व भी है। वेदों में अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है जो यज्ञ, हवन के द्वारा को विभिन्न देवताओं का भाग उन तक पहुँचाती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में इसके असन्तुलित हो जाने पर अग्नि विषमाग्नि यानी कभी तेज, कभी धीमी हो जाती है। कभी यह तीक्ष्णाग्नि यानी बहुत तेज हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में यह मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। 
            अग्नि हर स्थान पर अपनी शुद्धता को दर्शाती है। इसके होने पर तेज, प्रकाश और ताप से ही इस सृष्टि का जीवन है। इसके न होने पर चारों ओर अन्धकार तथा शीत का प्रकोप हो जाएगा जिसके कारण इस जीव जगत का अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वायु का प्रकोप

वायु का प्रकोप

वायु के प्रकोप पर हम चर्चा करते हैं। वैसे तो वायु हमारी जीवनी शक्ति है। इसके बिना हम एक पल भी नहीं रह सकते। यदि वायु के कुछ पल के लिए न होने की स्थिति में सब समाप्त हो जाता है, ब्रह्माण्ड में कुछ भी शेष नहीं बचता। वायु जहाँ हमें सुख देती है वहीं बहुत सारे कष्ट भी देती है चाहे वह हमारे शरीर के अन्दर की वायु हो अथवा ब्रह्माण्डीय वायु हो। इसके साथ की गई छेड़छाड़ हमें हमेशा बहुत मंहगी पड़ती है। फिर भी हम नहीं सुधरते, इसे दूषित करने का दुस्साहस करते हैं।
          वायु शरीर रूपी यन्त्र और शरीर के अव्ययों को धारण करती है। इस वायु का गुण सुखाना होता है। यह शरीर में रुक्षता पैदा करती है। यही वायु मन को भी चंचल बनाती है। शरीर से जब प्राणवायु निकल जाती है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है अर्थात मृत हो जाता है। इसे अग्नि को समर्पित करने में हम शीघ्रता करते हैं। कुछ समय के लिए इस शरीर को घर में नहीं रख सकते। यदि कुछ दिनों तक शरीर को सम्हालकर रखने का प्रयास किया जाए तो चारों ओर वातावरण में दुर्गन्ध आने लगती है। इससे बिमारियॉं फैलने का डर बढ़ जाता है।
           जब हमारे शरीर के भीतर की वायु बिगड़ने लगती है तब पेट में अफारा हो जाता है, पेट फूल जाता है। डकारें और पाद आने लगते हैं। अर्थात् ऊपर और नीचे से हवा निकलने लगती है। इस कारण कभी-कभी मनुष्य को हिचकियाँ आने लगती हैं। इसी प्रकार शरीर के अंग यानी हाथ, पैर और गर्दन आदि हिलने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो पार्किन्सन नामक रोग मनुष्य को हो जाता है। कुछ लोगों की आँख, कुछ के गाल और कुछ के होंठ भी चलने लगते हैं।
              इन सबसे भी अधिक कष्टकारी वह स्थिति होती है जब मनुष्य के शरीर में लकवा मार जाता है जिससे वह अपाहिज की तरह बिस्तर पर पड़ जाता है। स्वय कुछ भी नहीं कर पाता बल्कि वह दूसरों की कृपा का मोहताज हो जाता है। उस समय वह ईश्वर से अपने लिए मौत की गुहार लगता है। परन्तु समय से पहले उसे मौत भी नहीं आती। इस वायु के ही कारण मनुष्य को हृदय रोग तथा मस्तिष्क रोग भी होते हैं।
             प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर वायु बिगड़ जाती है जिसके कारण से झंझावात आते हैं। तब सब तहस-नहस होने लगता है। आँधी-तूफान बर्बादी मचाने लगते हैं। हर ओर प्रलंयकारी स्थिति बनने लगती है। ब्रह्माण्ड में वायु तब बिगड़ती है जब हम उसे प्रदूषित करते हैं। तब उसी प्रदूषित वायु का सेवन करने से हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। साँस की बिमारियाँ इसी प्रदूषित वायु का उपहार हैं। श्वास नली के कैंसर जैसे भयंकर रोगों तक की चपेट में आ जाते हैं।
             हमारे शरीर की वायु हो या हमारे ब्रह्माण्ड की वायु उन दोनों को दूषित करने के दोषी हम स्वयं हैं। गलत खान-पान का परिणाम होता है शरीर की वायु का दूषण जो समय-समय पर रोग के रूप में आकर हम लोगों को चेतावनी देती रहती है। पहले हम जीभ के चटोरेपन के कारण आवश्यकता से अधिक खा लेते हैं या फिर वे खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनका हमें परहेज करना चाहिए। उन्हें खाकर बीमार पड़ते हैं। हमें स्वास्थ्यवर्धक भोजन रुचिकर नहीं लगता। हम लोग जंक फूड अथवा अधिक तला-भुना भोजन खाकर प्रसन्न होते हैं, उसमें हमें अधिक स्वाद आता है। यही स्वाद हमारे शरीर को रोगी बना देता‌ है।
           हमारे गलत रहन-सहन का कारण होता है वायु प्रदूषण। हम अपने सुविधापूर्वक आवागमन के लिए विभिन्न प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण नित्य‌ प्रति वायुप्रदूषण बढ़ता रहता है। अपनी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए फैक्टरियाँ लगाते हैं जिनका धुँआ भी वायु को दूषित करता है। अपने घरों और दफ्तरों आदि को सुरक्षित करने और उन्हें सजाने तथा दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु कागज के लिए हम पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करते जाते हैं जो वायु को दूषित करने का प्रमुख कारण बन जाता है। इस प्रदूषित वायु से हम अनेक रोगों को आमन्त्रण दे बैठते हैं।
             इस प्रकार शरीर और वायुमण्डल दोनों ही प्रकार की वायु को दूषित करके हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। तब हम डाक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों बर्बाद करते हैं।इनके कुपित हो जाने के फलस्वरूप हम जीवन में कष्ट पाते हैं। ऋतुओं के क्रम को वायु ही बिगाड़ती है। इसी कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि का दंश हमें झेलना पड़ता है। तेज चलने वाले ऑंधी और तूफानों का हमें सामना करना पड़ता है। किसी स्थान विशेष पर लगने वाली आग अथवा‌ जंगल की आग को भी यही वायु भड़काती है। इससे कितने ही जान और माल की हमें हानि उठानी पड़ती है। 
              वायु का स्थान ईश्वर के समान है। यह अव्यय भी है और अविनाशी है। यही वायु प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का कारण बनती है। इस प्रकार वायु सुख और दुख का कारण होती है।
चन्द्र प्रभा सूद