शुक्रवार, 19 जून 2026

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

मनुष्य अपनी खुशी धन-वैभव में ढूँढता है। वह भूल जाता है कि दुनिया के सारे ऐश्वर्य मनुष्य के लिए केवल साधन मात्र हैं, वे साध्य कदापि नहीं बन सकते। हम अपने लिए दिन-रात एक करके परिश्रमपूर्वक साधन जुटाते जाते हैं, वे हमें क्षणिक सुख का अहसास देते हैं। उन्हें भोगने के पश्चात वे हमारे लिए सामान्य जैसे हो जाते हैं, विशेष नहीं रहते। कभी जिन्हें पाने के लिए हम मरे जा रहे होते हैं, अब उनकी परवाह भी नहीं करते।
            यह इन्सानी स्वभाव है कि वह हर वस्तु से शीघ्र ही उकता जाता है अर्थात् बोर हो जाता है। प्रसन्नता पाने के लिए या सुखी रहने के लिए केवल धन, दौलत, प्रापर्टी आदि की आवश्यकता नहीं होती, मनुष्य इनके अभाव में भी मस्त रह सकता है। सच्ची खुशी का कारण मन है जो सदा मनुष्य को इधर-उधर भटकाता रहता है।
           ‌ इसी बात को एक बोध कथा के माध्यम से समझते हैं। एक शहर में बहुत अमीर व्यक्ति रहता था। अत्यधिक धनी होने पर भी वह सदा दुखी रहता था। एक दिन वह महात्मा के पास गया और उन्हें कहा, "अपनी समस्या बताई कि उसके पास सब ऐश्वर्या हैं पर वह सुखी नहीं है।"
             उन्होने सेठ की बात ध्यान से सुनी और कहा, "आप कल मेरे पास इसी समय आना। मैं तुम्हारी सारी समस्या का हल बता दूँगा।"
             सेठ खुशी-खुशी घर गया। जब अगले दिन वह महात्मा के पास आया तो उसने देखा कि वे सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त हैं।
          सेठ ने उस खोई वस्तु के बारे में पूछा जिसे वे ढूँढ रहे हैं। उन्होंने बताया, "उनकी एक अंगूठी गिर गयी है और वे उसी ढूँढ रहे हैं पर वह अंगूठी मिल ही नहीं रही।"
             यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया। सेठ ने  महात्मा से कुछ समय बाद पूछा, "महात्मा जी, आपकी अंगूठी गिरी कहाँ थी?"
            उन्होंने जवाब दिया, "अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ बहुत अन्धेरा है। अतः वे उसे यहाँ सड़क पर ढूँढ रहे हैं।"
           सेठ ने चौंककर पूछा, "जब अंगूठी आश्रम में खोई है तो वहाँ कैसे मिल सकती है।"
            महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो अपने मन में छुपी रहती है लेकिन उसे धन में खोजने की कोशिश करते हैं। इसीलिए दुखी रहते हैं।"
           महात्मा जी की बात सुनकर सेठ उनके पैरों में गिर गया। सन्तुष्ट होकर महात्मा जी से विदा लेकर वह अपने घर चला गया।
           ‌यही बात हम सभी पर लागू होती है। जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इन्सान खुश नहीं रहता क्योंकि हम पैसा कमाने में इतना मस्त हो जाते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। बच्चा जैसे किसी खिलौने के लिए हठ करता है और जब उसे वह दिला दिया जाता है तब वह दीन- दुनिया भूल जाता है। कुछ ही समय उससे खेलने के बाद उस खिलौने से उसका मन भर जाता है तो उसे फैंक देता है। उसे इस बात का कोई मतलब नहीं होता कि वह कितना कीमती खिलौना था। वही हाल हम सभी का भी है।
          प्रयास यही करना चाहिए कि अपने बच्चों को धनवान होना सिखाने के स्थान पर खुश रहना सिखाना चाहिए ताकि बड़े होने पर वे रिश्तों की अहमियत समझ सकें और वस्तुओं की उपयोगिता को समझ सकें, न कि उनके मूल्य को।
          खुशियों के पल खोजने होते हैं। हम बड़ी-बड़ी खुशियों को पाने की फिराक में रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि बड़ी खुशियाँ तो जीवन मे गिनी-चुनी आती हैं। इसलिए छोटे-छोटे खुशियों के पल यत्नपूर्वक खोजने चाहिए। वे हमें प्रतिदिन के कार्य व्यवहार में मिल सकते हैं। शर्त यह है कि हम उन अमूल्य पलों को सहेजने का मन बना सकने में सफल हो‌ जाऍं।
            स्वामी विवेकानन्द जी का इस विषय में कथन है कि 'समस्त ब्रह्माण्ड हमारे इस शरीर के अन्दर ही विद्यमान है जबकि हम जीवनभर इधर-उधर भटकते रहते हैं। सत्य बोलना, परोपकार करना, अच्छी सोच रखना आदि जीवन के बहुत बड़े सुख हैं।'
          स्वामी विवेकानन्द जी का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वास्तविक सुख और शान्ति मनुष्य को शुभकार्य करके ही मिलती है। किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाने पर जो खुशी मिलती है वह करोड़ों रूपए खर्च करके भी नहीं मिल सकती। इसलिए सच्चा सुख खोजना हो तो शुभकर्म करते हुए मन को शुद्ध और पवित्र बनाना चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने पर परम मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 18 जून 2026

रिश्तों को फटने मत दो

रिश्तों को फटने मत दो

मनुष्य को अपने जीवनकाल में इस बात की चिन्ता छोड़ देनी चाहिए कि कौन उसे दुख पहुँचाता है या उससे नफरत करता है बल्कि उसकी चिन्ता करनी चाहिए कौन उसे प्यार करता है। क्योंकि मनुष्य की सारी खुशियाँ उसी प्यार से जुड़ी होती हैं यानी मौजूद होती हैं। जिन्दगी में जितना अधिक हसीन पलों को याद किया तो जीना उतना ही सुखद व सुगम हो जाता है। 
          परस्पर प्यार व आपसी विश्वास दुनिया का वह सबसे खूबसूरत पौधा है जो जमीन पर नहीं दिलों में उगता है। जिस प्रकार कड़वी गोलियाँ चबाई नहीं निगल ली जाती हैं। उसी प्रकार ही अपमान, धोखे, असफलता जैसी कड़वी बातों को भी सीधे गटक लिया जाए तो आपसी कड़वाहट समय रहते समाप्त हो जाती है। यदि उन्हें चबाते रहेंगे यानि पिष्टपेषण करते रहेंगे तो जीवन दुष्वार हो जाता है और जीने का आनन्द नहीं रहता। अपना मन ही कलुषित होता रहता है।
        मनुष्य यदि यही सोचता रहे कि फलाँ व्यक्ति ने उसको उस समय यथोचित मान-सम्मान नहीं दिया अथवा यही विचार करके हलकान होता रहे कि उसने मुझे नहीं पूछा तो मैं सम्बन्ध क्यों रखूँ, तो जीना मुहाल हो जाता है। 
          सम्बन्धों अथवा रिश्तों की सिलाई यदि भावनाओं के पक्के धागे से की जाए तो उनका टूटना मुश्किल होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई कितना भी यत्न कर ले उन रिश्तों को नहीं तोड़ सकता। यदि रिश्तों की बुनियाद स्वार्थ पर रखी गई है तो उनका लम्बे समय तक टिकना मुश्किल है। स्वार्थों की पूर्ति होते ही वे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। तब फिर वहाँ एक-दूसरे को पहचानना भी नागवार हो जाता है।
        इस  क्षणभंगुर जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कौन इस संसार से पहले विदा लेगा और कौन बाद में, इसके विषय में कोई नहीं जानता। सब भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। बाद में अपनों को खोकर बहुत आघात लगता है और मानसिक सन्ताप होता है। उस समय केवल हाथ मलते हुए रह जाना पड़ता है। इसलिए पश्चाताप करने से अच्छा है रिश्तों में अनावश्यक आने वाली दूरियों को पाट दिया जाए। सम्बन्धों की गरिमा को बनाए रखने के लिए सबसे सामञ्जस्य बनाए रखना चाहिए।
            मन को लघु अथवा उदार बनाना होता है। यदि मन को लघु बना दिया तो मनुष्य की चिन्तन शक्ति संकीर्ण हो जाती है। वह मैं, मेरा घर, मेरे परिवार आदि तक ही सिमटकर रह जाता है। उसकी स्वार्थी प्रवृत्ति उस पर हावी होने लगती है। उसमें किसी अन्य के लिए कोई जगह नहीं बच पाती। ऐसे लोग आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं और पूर्वाग्रहों को पाल लेते हैं। इनके लिए सभी रिश्ते-नाते बस नाममात्र के ही रह जाते हैं।
        इसके विपरीत मन को थोड़ा उदार या विशाल बना लेने से बहुत-समस्याएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं। सबको साथ लेकर चलने की इनकी प्रवृत्ति इन्हें सबका प्रिय बना देती है। रिश्तों को तोड़ने के बजाय उन्हें बनाए रखने में ये लोग अधिक विश्वास रखते हैं। दूसरों से होड़ करने के स्थान पर उन्हें साथ लेकर चलना ही समझदारी होती है। ऐसा व्यवहार करने से मनुष्य की आत्मा प्रफुल्लित रहती है और उसमें उत्साह बना रहता है।
          सकारात्मक सोच रखने वाले लोग हर हाल में अपेक्षाकृत अधिक सुखी रहते हैँ। नकारात्मक सोच रखने वालों को सदा ही मानसिक पीड़ा का अनुभव होता है। वे जीवन से हमेशा निराश रहते हैं।
        जहाँ तक हो सके रिश्तों को फटने मत दो और यदि दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो जाए तो उनको इतनी खूबसूरती से रफू कर दो कि किसी को कभी पता ही न चल सके कि कभी उनमें कभी पैबन्द लगाने की आवश्यकता हुई थी।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 17 जून 2026

अपनों से मिलता कष्ट

अपनों से मिलता कष्ट 

अपने बन्धु-बान्धवों से जब मनुष्य को जीवन में कष्ट मिलता है तब मानव मन तार-तार हो जाता है। वह अपनों से प्रेम, विश्वास, सहानुभूति, सहृदयता और अपनेपन की अपेक्षा करता है। इस कसौटी पर जब अपने बन्धु-बान्धव खरे नहीं उतरते और उसकी अवहेलना करते हैं, तब उसे लगता है कि उसके जीवन की कोई उपयोगिता नहीं रह गई।
          उसे संसार में रहते हुए ऐशो-आराम के सारे साधन व्यर्थ लगने लगते हैं। इसी प्रकार थाली में सजे छप्पन भोग भी उसे बेस्वाद प्रतीत होते हैं। किसी अंजान व्यक्ति से यदि ठोकर लग जाए तो उतना कष्ट नहीं होता जितना स्वजनों की बेरुखी मनुष्य को तोड़ देती है।
            अवमानना की इस अवस्था में होने की विवेचना को इस दृष्टान्त के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। 
            एक राजा के महल में एक स्त्री और उसका बेटा काम करते थे। एक दिन उस राजमहल में कामवाली के बेटे को हीरा मिला। 
           उसने माँ से कहा, "मॉं, देखो मुझे यह हीरा मिला है।" 
            काम वाली होशियारी से वह हीरा बाहर फैंककर कहती है, " बेटा, यह काँच का टुकड़ा है, हीरा नहीं है।"
           कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वह हीरा उठाकर ले जाती है। वह एक सुनार के पास जाती है और उसे कहती हैं, "भैया, इस हीरे को देखकर इसका मूल्य बता दो।"
          सुनार समझ जाता है कि इसे कहीं से मिला होगा। यह असली या नकली इसे पता नहीं है। इसलिए पूछने आई है। सुनार होशियारी से वह हीरा बाहर फैंककर कहता है, "बहन, यह एक काँच का टुकड़ा है हीरा नहीं है।"
          कामवाली लौट जाती है। सुनार वह हीरा चुपके सेे उठाकर जौहरी के पास जाता है और कहता है, "जौहरी भाई, इस हीरे का मूल्य बता दो।"
           जौहरी उस हीरे को पहचान लेता है। अनमोल हीरा देखकर उसकी नियत बदल जाती है। वह भी हीरा बाहर फैंककर कहता है, "ये एक काँच का टुकड़ा है हीरा नहीं है।"
           जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फैंकता है उसके टुकडे-टुकडे हो जाते है। एक राहगीर यह सब निहार रहा था उसने हीरे से जाकर पूछा, "कामवाली और सुनार ने दो बार तुम्हे फैंका तब तो तुम नहीं टूटे। फिर अब ऐसा क्या हुआ कि तुम टूट गए?"
            हीरा बोला, "कामवाली और सुनार ने मुझे फैंका क्योंकि वे वास्तव में मेरी वास्तविकता से अनजान थे। वे मेरे मूल्य को नहीं पहचानते थे। इसलिए मुझे उनके कृत्य पर अन्तर नहीं पड़ा। परन्तु जौहरी को तो मेरे बहुमूल्य होने का पूरा ज्ञान था, फिर भी उसने लालच के कारण मेरे साथ दुर्व्यवहार किया। यह दुःख मैं सहन नहीं कर सका और टूट गया।"
              ऐसा ही हम मनुष्यों के साथ भी होता है। जो लोग हमें जानते हैं, समझते हैं उसके बावजूद भी यदि हमारा दिल दुःखाते है, उस समय मनुष्य को भी यह बात सहन नही होती कि वह अपनों के द्वारा ठुकराया जाए। अपने इस तिरस्कार को जब मनुष्य सहन नहीं कर सकता तो वह धीरे-धीरे अकेला होता चला जाता है। मनुष्य की यह स्थिति बहुत भयावह होती है। उस समय वह डिप्रेशन में जाने लगता है। उसे डॉक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों को व्यय करना पड़ता है।
           प्रयास यही करनी चाहिए कि कभी अपने स्वार्थ के कारण स्वजनों को आहत न किया जाए और न ही उनका दिल ही तोड़ा जाना चाहिए। इसे उचित नहीं कहा जा सकता। यदि मनुष्य सच्चे मन से इस सच्चाई को स्वीकार कर ले कि सबके साथ उसे सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए तो बहुत सारी समस्याओं से बचा जा सकता है।
             हमारे आसपास बहुत से लोग हीरे जैसे अमूल्य होते है। उनके दिल को कभी नहीं दुखाना चाहिए। किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करना अच्छा नहीं होता और न ही उनके सद् गुणों के टुकड़े करके उन्हें बिखरने के लिए विवश करना चाहिए।
           अपने आसपास हीरे जैसे लोगों को लताश करना कोई कठिन कार्य नहीं है। वे तो लाखों की भीड़ में भी सरलता से पहचाने जाते हैं। अपने सहृदय व्यवहार और परोपकारी वृत्ति के कारण वे अनजाने में ही सबके हृदयों पर राज करने लग जाते हैं। सबके साथ समानता का व्यवहार करने वाले ये महानुभाव हर जीव के दुख-दर्द का सहभागी बन जाते हैं। विश्वसनीयता इनका विशेष गुण होता है जो इन्हें सबका प्रिय भाजन बना देता है।
          अपना व्यवहार मनुष्य को सदा ही ऐसा रखना चाहिए कि वह यदि किसी का अच्छा नहीं कर सकता तो कम-से-कम किसी का बुरा भी न करे। वह किसी के दुख, परेशानी अथवा अपमान का कारण न बने। यदि हर व्यक्ति ऐसा सोचने लगे तो दूसरे लोगों को मानसिक आघात देने के दोष से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 16 जून 2026

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई क्या है? यदि इस विषय पर विचार करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि जिस धन-दौलत और ऐश्वर्य-समृद्धि को पाने के लिए मनुष्य ने कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात एक करके अथक परिश्रम किया, वह तो कभी उसका था ही नहीं। जीवन के अन्तिम समय आने पर उस सारे भौतिक धन-वैभव को उसे इस पृथ्वी पर ही छोड़कर परलोक जाना पड़ता है। वह तो मात्र एक ही भ्रम था जिसने उसे अपने जाल में सारा जीवन उलझाए रखा।
           हमारे महान् ग्रन्थ और मनीषी एक ही बात कहते हैं और अनुभवजन्य सच्चाई भी यही है कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और अपनी आयु भोगकर खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। उसके सभी साजो-समान, उसकी सारी धन-दौलत यहीं रह जाती है। गठरी बाँधकर वह कुछ भी अगले जन्म के लिए नहीं ले जा सकता। अपने जीवन काल में कृत केवल अच्छे अथवा बुरे कर्म ही वह साथ लेकर जा सकता है। फिर उनका मीठा या कड़वा फल वह जन्म-जन्मान्तरों तक भोगता रहता है।
             एक दृष्टान्त से इस सत्य को समझने का प्रयास करते हैं। एक बार एक सन्त ने अपने दो भक्त को बुलाया और कहा आप दोनों को यहाँ से पचास कोस तक पैदल जाना है। एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते में मिले उसे ये बाँटते जाना और दूसरे भक्त को खाली बोरी दी उससे कहा रास्ते में जो उसे अच्छा सामान मिले उसे बोरी में भर लेना। दोनों सन्त द्वारा निर्दिष्ट यात्रा के लिए अपना सिर झुकाकर निकल पड़े।
          जिसके कन्धे पर सामान था वह धीरे-धीरे चल रहा था पर खाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर उसे सोने की एक ईंट मिली, उसने उसे बोरी मे डाल लिया। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे फिर एक ईंट मिली। उसे भी उसने उठा लिया। जैसे-जैसे चलता गया, उसे सोना मिलता गया और वह बोरी मे भरता हुआ चलता गया। बोरी का वजन बढता चला गया और अब उसका चलना मुश्किल होने लगा। उसकी साँस भी फूलने लगी। उसका एक-एक कदम बढ़ाना कठिन होने लगा।
          दूसरे भक्त को रास्ते में जो भी मिलता, उसे बोरी में से खाने का कुछ समान दे देता। धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंजिल तक पहुँचना आसान हो गया और जो इकट्ठा करता रहा, उसने अतिभार के कारण रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
           कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जो मनुष्य आयुपर्यन्त दूसरों को बाँटता रहता है, अन्तकाल तक पहुँचते-पहुॅंचते वह हल्का हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के दुख-दर्द, परेशानियों को बाँटने, निस्वार्थ परोपकार करने वाले मनुष्य को यात्रा पूरी करने तक सन्तुष्टि मिलती है, वह प्रसन्न रहता है। अपने शुभकर्मों के कारण उसके पापकर्मों की गठरी नहीं बनती। उसे इहलोक और परलोक हर स्थान पर पुण्यों के सुख का अहसास होता है।
          इसके विपरीत अपनी स्वार्थ वृत्ति के कारण जो मनुष्य दूसरों को कष्ट देते हैं, ऐसे अत्याचार करने वालों के दुष्कर्मों की गठरी भारी होती जाती है, उसे उठाकर चलना उनके लिए कठिन हो जाता है। जीव उस बोझ को सम्हाल नहीं पाता। फिर भी जन्म- जन्मान्तरों तक उसे वह गठरी उठाकर चलना पड़ता है जो बहुत कष्टदायी होता है।
          मनन करने पर यह पता चलता है कि हमने सारे जीवन में क्या बाँटा? क्या इकट्ठा किया? हम मंजिल तक कैसे पहुँच सकेंगे?
          हमारे जीवन का कड़वी सच्चाई यही है कि 60 साल की आयु के बाद कोई बैंक बैलेन्स के विषय में नहीं पूछता है और न ही मँहगी गाड़ियों के बारे में जानना चाहता है। मिलने वाले सभी लोग उससे उसके स्वास्थ्य और बच्चों के बारे में ही जानकारी लेना चाहते हैं।
        जीवन के अन्तिम दौर में धन-समृद्धि अथवा गाड़ियाँ सुविधा दे सकती हैं परन्तु वृद्धावस्था के कष्टों को कदापि दूर नहीं कर सकती। उस समय मनुष्य यही प्रार्थना करता है कि बेशक उसकी धन-दौलत ले लो पर उसके बदले सुकून के दो पल दे दो। समय रहते मनुष्य को सावधान हो जाना चाहिए।
        'अथर्ववेद' का कथन है-  
        शतहस्तं समाहार सहस्त्र हस्त संकिर:।
अर्थात्  सैंकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से सद्कार्यों में खर्च करो। यानी यह मन्त्रॉंश कठोर परिश्रम करने, प्रचुर धन कमाने और फिर उसे समाज की भलाई के लिए उदारतापूर्वक व्यय करने का सन्देश देता है। 
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य की वास्तविक कमाई वही है जिसे वह निस्वार्थ रहकर समाज की भलाई के‌ लिए खर्च करता है। यही पुण्य कर्म उसके साथ-साथ अगले जन्मों में भी जाते हैं। इन पुण्यों का भोग वह इहलोक और परलोक दोनों में करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 15 जून 2026

अध्यापक का कार्य

अध्यापक का कार्य

शिक्षक अथवा अध्यापक का कार्य अपने विद्यार्थियों को सुसंस्कारित करना होता है। ताकि वे देश और समाज का गौरव कहला सकें। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समाज के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत करें और अपने उच्च चरित्र का परिचय दें। उसके लिए पहली शर्त है उन शिक्षकों का चरित्रवान होना और उन विद्यार्थियों का आज्ञाकारी होना। शिक्षक को अपने छात्रों को सन्तान तुल्य मानकर एक पिता के समान उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ रहता है तो वह इस गौरवशाली पद के कदापि योग्य नहीं है।
          एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को जीवन में सफलता के सोपानों पर चढ़ते देखता है तो उसे वैसी ही प्रसन्नता मिलती है जैसी उस बच्चे के माता-पिता को। वह  स्वयं तो अपने उसी स्थान पर मील के पत्थर की तरह खड़ा रहता है परन्तु अपने छात्रों को ऊँचाइयों पर पहुँचाने का कार्य बखूबी निभाता है। जिस प्रकार सड़क अपने स्थान पर स्थित रहकर यात्रियों को उनके गन्तव्य, उनकी मंजिल तक पहुँचा ही देती है। इसीलिए शिक्षक को भगवान का दर्जा दिया जाता है।
            हमारी भारतीय सभ्यता ने गुरु और शिष्य दोनों को जहाँ संस्कार दिए हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें मर्यादाओं में भी बाँधा है। एक ओर जहाँ छात्रों को सिखाया कि अपने गुरु का सम्मान ईश्वर की तरह करो तो वहीं दूसरी ओर गुरु को भी शिक्षित किया कि अपने सभी शिष्यों के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उन पर पुत्रवत् स्नेह रखे। उसके पास जो भी ज्ञान है, उसे अपने छात्रों में बाँट देने में हिचकिचाए नहीं। माता-पिता जैसे आगे बढ़ते हुए अपने बच्चों पर गर्व करते हैं, उसी प्रकार एक अध्यापक को भी अपने छात्रों को उन्नति करते हुए देखकर गौरवान्वित होना चाहिए। उनसे स्पर्धा अथवा ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए।
          यद्यपि आज इस भौतिक युग में कुछ अध्यापक दुराचरण में लिप्त होकर इस पद की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। कुछेक ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी अन्जाम दे दिया है। छात्रों के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार की घटनाएँ भी यदा कदा सुनने को मिल जाती हैं। उन मुट्ठी भर लोगों के कारण इस गौरवशाली गुरु-शिष्य परम्परा को कलंकित करके कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने सभी छात्रों के साथ समान रूप से व्यवहार करे। किसी बच्चे के माता-पिता के पद या धन-वैभव से प्रभावित होकर उस तथाकथित छात्र के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
        आजकल प्राइवेट सेक्टर की स्वार्थी प्रकृति और महत्त्वाकाँक्षा के कारण इस शिक्षक वर्ग का बहुत ही शोषण हो रहा है। जिसके कारण कम तनख्वाह पर भी काम करना उनकी मजबूरी बनती जा रही है। इसलिए अपना व परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें प्राइवेट ट्यूशन का सहारा भी लेना पड़ रहा है। कक्षा में वे लोग कैसा भी पढ़ाऍं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। उनका ट्यूशन का धन्धा अच्छा चलना चाहिए। शिक्षा के इस पावन क्षेत्र में यद्यपि नई पीढ़ी की कोई रुचि नहीं है। वे शिक्षक बनने के स्थान पर दफ्तरों में अधिक वेतन पर कार्य करना चाहते हैं। अतः यहाँ इस क्षेत्र में गुणवत्ता की कमी बहुत अखरती है।
            कुछ सरकारी नीतियों के चलते अभी तक साक्षरता दर का आँकड़ा अपेक्षाकृत कम है। देश में निरक्षर लोग अभी भी बहुत बड़ी संख्या में हैं। पूरे देश में लाखों विद्यालय आज भी बिना अध्यापक के चल रहे हैं अथवा उनकी संख्या नगण्य है। इस इक्कीसवीं सदी में आज भी हमारे देश में लाखों बच्चे ऐसे मिल जाएँगे जिन्होंने दुर्भाग्यवश कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उन बच्चों के भविष्य के विषय में भी अध्यापकों को आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
          जमीनी सच्चाई तो यही है कि एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को सदा ही अपना बेस्ट यानी सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता है। अपने मार्गदर्शन से उसके भावी कैरियर को बनाने में यथासम्भव प्रयास करता है। दूसरी ओर बहुत से अध्यापक ऐसे भी हैं जिन्हें महीने के आखिर में आने वाली बस अपनी तनख्वाह से मतलब होता है। वे अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकों को पढ़कर अथवा समाचारपत्र को पढ़कर अपने ज्ञान की वृद्धि नहीं करना चाहते। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे कूपमण्डूक की तरह बनकर रह जाते हैं।
          सब विपरीत स्थितियों के चलते हुए भी शिक्षक वर्ग को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उसे अपने ज्ञान का समुचित उपयोग करना ही चाहिए और समय-समय पर उसे स्वयं को अपग्रेड भी करना होगा। जिससे अपने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में उनकी भूमिका पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह महत्त्वपूर्ण रहे। वे अपने छात्रों के जीवन में एक मील के पत्थर की तरह सिद्ध हो सकें।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 14 जून 2026

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार 

महान भारतीय संस्कृति की सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार है। परिवार समाज की सबसे छोटी, प्राथमिक और मूलभूत इकाई है। यह सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तम्भ है। यह न केवल बच्चों का समाजीकरण और पालन-पोषण करता है बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित करता है। इससे सामाजिक स्थिरता, अनुशासन और भावात्मक सुरक्षा बनी रहती है। 
        भारतीय परम्परा में परिवार को एक सामाजिक संरचना की धुरी माना जाता है। संयुक्त परिवार की व्यवस्था ने पारम्परिक रूप से आर्थिक सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा दिया है। वर्तमान समय में किसी भी कारण से एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। फिर भी परिवार के आधारभूत कार्यों में कोई अन्तर नहीं होता। ये व्यक्ति और समाज को जोड़ने का कार्य बखूबी करता है। 
           परिवार बच्चे पहली पाठशाला होती है जहाँ वह सामाजिक व्यवहार, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्य और परम्पराओं के विषय में जानकारी प्राप्त करता है। परिवार अपनी विरासत, भाषा और संस्कृति को जीवित रखता है। यह अपने सदस्यों को सुरक्षा, प्यार और आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है जो व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक होता है।
          परिवार को एकसूत्र में बाँधकर रखना एक कुशल गृहिणी बखूबी जानती और समझती है। घर को स्वर्ग बनाने के लिए एक स्त्री अकेले ही समर्थ है, उसे किसी अन्य सहारे की आवश्यकता नहीं होती। वह सदा अपनी सूझबूझ से घर-गृहस्थी की समस्याओं का निदान करके परिवार में समरसता का माहौल बना सकती है।
          इसीलिए ऐसी व्यवहार कुशल गृहिणी की प्रशस्ति में शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। 'गृहिणी गृहमुच्यते' अर्थात् गृहिणी ही घर है कहकर उसके महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। पुरुष से भी अधिक मान उसे इसीलिए दिया गया कि वह परिवार का केन्द्रबिन्दु यानी धुरी होती है। सबको यथोचित सम्मान देना, सबके साथ वर्तना या व्यवहार करने में उसका कोई सानी नहीं होता। वह अतिथियों और देवों का यथोचित सम्मान करके अपने घर-परिवार को सुरभित करती है। ऐसे घरों में ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा सदा ही होती रहती है।
        कहते हैं कि एक माला बनाने के लिए बहुत से मनकों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एक आरती को सजाने के लिए भी अनेक दीपक चाहिए होते हैं। एक खाली समुद्र को भरने के लिए हजारों बूँद जल की आवश्यकता होती है। परन्तु इन सबसे बढ़कर कठिन कार्य यानी घर को संचालित करने का कार्य एक स्त्री बहुत ही खूबसूरती से निभा लेती है। यहाँ अनेक की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
          ओशो रजनीश ने अपनी पुस्तक 'शिक्षा में क्रान्ति' में लिखा है कि ‘स्त्री के जीवन में यदि कोई चीज सक्रिय हो जाती है तो एक परिवार के प्राणों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। एक स्त्री को बदल लेना पचास पुरुषों को बदलने के बराबर होता है। इतनी बड़ी शक्ति जिनके  हाथ में हो, इतनी बड़ी सामर्थ्य जिनके हाथ मे हो, अगर जीवन के लिए कुछ भी नहीं करती तो निश्चित ही अपराधी है।’ 
          इस कथन का वास्तव में यही अर्थ है कि यदि स्त्री अपनी शक्ति को विस्मृत करती है और अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं करती तो वह बहुत बड़ा अपराध करती है। उसके कन्धों पर घर-परिवार का महान् दायित्व है। 
          संस्कार देकर वह भावी पीढ़ियों का निर्माण करती है जो राष्ट्र की धरोहर हैं। यदि हमारा युवावर्ग उच्छ्रँखल और दिशाहीन होगा तो उसका दोष घर की स्त्री का होता है। यदि नींव ही कमजोर रह जाएगी तो निर्माण कार्य ठीक से नहीं होगा। इसी प्रकार यदि नव पीढ़ी को संस्कार नहीं दिए गए तो देश, धर्म और समाज की रक्षा नहीं हो सकेगी। एवंविध इसके दूरगामी परिणाम हम सबको भुगतने पड़ेंगे।
            संस्कृत भाषा और हिन्दी भाषा में पवित्र विवाह सम्बन्ध का विच्छेद करने के लिए कोई शब्द नहीं है। विवाहोपरान्त अपने जीवन साथी का त्याग करने के लिए पहला Divorce शब्द अंग्रेजी भाषा में है जिसे ईसाई धर्मानुयायियों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। दूसरा 'तलाक' शब्द उर्दू भाषा में इस्लाम मतावलम्बियों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
            हमारी महान् भारतीय हिन्दू सभ्यता में ऐसी परिकल्पना ही नहीं की गई कि विवाह के पश्चात दोनों जीवन साथियों में अलगाव हो। यहाँ यह पवित्र बन्धन सात जन्मों के लिए माना जाता है। हमारा धर्म केवल एक होना या जोड़ना सिखाता है अलग करना नहीं। 
          भारतीय वैवाहिक संस्था विवाह के समय सप्तपदी के समय एक-दूसरे को दिए गए वचनों को निभाने पर बल देता है। पति-पत्नी दोनों का यह बराबर का दायित्व बनता है कि वे अपने पूर्वाग्रहों और झूठे अहं का त्याग करके सामंजस्यपूर्वक अपनी गृहस्थी की गाड़ी को बाधारहित चलाएँ और आदर्श स्थापित करें।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 12 जून 2026

आत्मा परमात्मा का अंश

आत्मा परमात्मा का अंश

हर मनुष्य में परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में विद्यमान होता है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि जब उसमें ईश्वर का अंश है तो वह ईश्वर स्वरूप ही होगा। बस उसे अपने अन्तस् में विद्यमान इस ईश्वरीय शक्ति को पहचानना होता है। भारतीय वेदान्त दर्शन के अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश या प्रतिबिम्ब है। अद्वैत सिद्धान्त का मानना है कि आत्मा और परमात्मा वास्तव में एक ही हैं। माया यानी अज्ञान के कारण वे अलग प्रतीत होते हैं।
          यहॉं समुद्र और उसकी लहरों की बात करते हैं। जिस प्रकार समुद्र की हर लहर पानी ही होती है, उसी प्रकार हर जीव में निवास करने वाली यह आत्मा निरावरण होकर परमात्मा का ही रूप होती है। आत्मा परमात्मा का आंशिक ज्ञान है जो ज्ञान प्राप्त होने पर ईश्वरमय हो जाती है।
        आत्मा सर्वोच्च सत्ता का ही एक सूक्ष्म रूप है। मनुष्य अज्ञानतावश स्वयं को शरीर मान लेता है। परमात्मा और आत्मा को हम‌ सूर्य और उसकी किरण के समान मान सकते हैं। किरण सूर्य का ही अंश होती है परन्तु पूर्ण सूर्य नहीं होती। जीवात्मा शरीर और कर्मों से बॅंधी होती है जबकि परमात्मा मुक्त और सर्वव्यापी होता है। ज्ञान और योग के द्वारा आत्मा कका परमात्मा में लीन होना ही मोक्ष कहलाता है। मोक्ष प्राप्त करने के उपरान्त निश्चित समय तक जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।
          जब मनुष्य का जन्म इस धरा पर होता है तो उसे पृथ्वी पर अवतरित होना कहा जाता है। उसका यह अवतार रूप उसे ब्रह्माण्ड के अन्य सभी जीवों से अलग करता है। अवतार लेने के बाद उसे अपने चरित्र से दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। वह महापुरुषों के समान देवता भी बन सकता है और आतंकवादियों की भाँति दानव भी। वह मर्यादा पुरुषोततम राम भी बन सकता है और अहंकारी रावण भी। इसी प्रकार अपने जीवन के लिए मानक उसे स्वयं तय करने होंगे।
          जब मनुष्य एक इन्सान के स्थान पर ईश्वर के रूप में अपना जीवन जीना प्रारम्भ करेगा तब इस संसार में और उसके इस जीवन में कोई उथल-पुथल नहीं होगी। वह शान्त व संयमी जीवन जी पाएगा। तब किसी जीव अथवा किसी पदार्थ की अवस्था और गतिविधि में भी कोई बदलाव नहीं आएगा। इन्सानी गुणों, क्षमताओं और कार्यों में कोई कतर-ब्यौंत नहीं होगी। जब मनुष्य अपने भीतर स्वयं ही ईश्वरीय गुणों को समझने लगेगा तब केवल एक चीज बदलेगी, वह है उसका दृष्टिकोण या नजरिया। उसके बदलते ही मनुष्य का जीवन सहज, सरल, निष्कपट हो जाएगा, वहाँ ईर्ष्या-द्वेष, मारकाट, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति आदि आसुरी भावनाएँ दूर हो जाएँगी। ईश्वर तथा इन्सान के रूप में अपनी दोहरी भूमिका को मनुष्य बिना किसी कष्ट के आसानी से निभा सकेगा।
           मनुष्य के मन में ईश्वर का वास होता है। इसीलिए मनीषी जन मन को मन्दिर बनाने पर बल देते हैं। जब हमारा मन मन्दिर बन जाएगा तब हमारा घर स्वयं ही तीर्थस्थल कहलाएगा। उस घर में रहने वाले स्वर्ग के समान शान्ति का अनुभव करेंगे। उस घर के पास से गुजरने वालों को भी सुगन्धित बयार का झौंका प्रफुल्लित करेगा।
            ईश्वर तीर्थों, जंगलों, पर्वतों की गुफाओं में भटकने से नहीं मिलता बल्कि अपने घर में रहकर सांसारिक दायित्वों को निभाते हुए मिलता है। दुनिया के दुख-कष्टों से भागकर भगवा चोला पहनने वाले भगोड़ों अथवा तथाकथित गुरुओं को तो वह कदापि नहीं मिलता।
          गुरुडम फैलाने वाले तथाकथित गुरु सवालों-जबावों के चक्कर में अपने अनुयायियों को उलझाए रखते हैं। ये गुरु अलग-अलग सवालों के अलग-अलग उत्तर बताते हैं लेकिन सारे सवालों को हल करने का एक सूत्र कभी नहीं बता सकते। यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी? वे तो बस भ्रमजाल फैलाए रखना चाहते हैं। दूसरों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले धन-सम्पत्तियों का संग्रह करते रहते हैं। अपने चरित्रों से अनुयायियों को प्रभावित नहीं कर पाते। इसलिए अपने वजूद को बचाने के लिए वे संघर्ष करते रहते हैं। 
          मनुष्य को स्वयं ही अपनी खोज करनी होगी कि वह ईश्वर तुल्य आचरण किस प्रकार कर सकता है? अपने अतस् में ईश्वरीय गुणों को प्रकाशित करने लिए उसे सबसे पहले स्वयं संयमित आचरण करना होगा। फिर अपने अन्तस् में ध्यान लगाकर  ईश्वर रूपी प्रकाश को पाने का यत्न करना होगा। इस सम्पूर्ण साधना के लिए ईश्वर की आराधना और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करना उसके लिए बहुत आवश्यक होता है।
          यदि मनुष्य केवल सच्चाई और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहण करता हुआ ईश्वरीय शक्ति को अपने अन्तस् में अनुभव करने लगेगा तब वह उस प्रभु के गुणों अपने भीतर महसूस कर सकता है। विचारों की शुद्धता और सच्चरित्रता से ईश्वरत्व के गुण मनुष्य में स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद