मंगलवार, 23 जून 2026

कर्म का फल

कर्म का फल

कर्म का विधान बहुत कठोर है। उससे कोई बच नहीं सकता। वह किसी को भी नहीं छोड़ता। मनुष्य यदि किसी का बुरा करता है तो वह उसके साथ रहता है और उसका दुष्परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। यदि वह अच्छा कार्य करता है तो वह पलटकर उसके ही सामने आता है। तब उसे जीवन में सुख-समृद्धि रूपी फल मिलता है। यानी कि सच्चाई यही है कि बुराई का फल कष्टदायी होता है और उसकी अच्छाई का फल उसे खुशियाँ देता है। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
            जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
       ‌‌        ‌‌     अथवा
             जैसा करोगे वैसा भरोगे।
 अर्थात् मनुष्य द्वारा की गई अच्छाई या बुराई का परिणाम उसके सामने आ ही जाता है।
          इसी विषय को स्पष्ट करती एक बोधकथा है। एक औरत अपने परिवार के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी। एक रोटी वह किसी भूखे व्यक्ति के लिए पकाकर उसे खिड़की के सहारे रख देती थी। जिसे कोई भी भूखा व्यक्ति वहॉं से ले जाकर अपना पेट भर सकता था।
        एक कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन उस रोटी को ले जाता था। धन्यवाद देने के स्थान पर अपने रस्ते पर चलता हुआ बड़बड़ाता रहता था, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौटकर आएगा।" 
           इस तरह दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा। वह कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन रोटी लेकर  बड़बड़ाता हुआ चला जाता। वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी थी। वह मन-ही-मन सोचने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो कहता नहीं और न जाने क्या-क्या उल्टा-सीधा बड़बड़ाता रहता है? मतलब क्या है इसका।"
           एक दिन क्रोधित होकर उसने निर्णय लिया और बोली, "मैं इस कुबड़े से अब निजात पाकर ही रहूँगी।"
           उस दिन उसने रोटी में जहर मिला दिया। जैसे ही उसने रोटी को खिड़की पर रखा, अचानक उसके हाथ काँपने लगे और वह बोली, "हे भगवन, मैं यह क्या करने जा रही थी?" 
            उसने तुरन्त उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया। फिर उसने एक ताजी रोटी बनाई और खिड़की के सहारे रख दी। हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह इससे बिलकुल बेखबर था कि आज उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
           वह महिला खिड़की पर रोटी रखते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगी, "हे प्रभु, मेरे पुत्र को सही-सलामत रखना और घर वापिस भेज देना जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए शहर से बाहर गया हुआ था।"
         महीनों से उसकी कोई खबर नहीं मिली थी। ठीक उसी शाम उसका बेटा घर आया। वह कमजोर हो गया था। उसके कपड़े फट गए थे और वह भूख के कारण बेहाल हो गया था। 
             माँ को देखते ही उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार ही है कि मैं आज यहाँ हूँ। जब घर से एक मील दूर था तो मैं भूख के कारण गिर गया था। मैं मर गया होता यदि वहाँ से गुजर रहे एक कुबड़े की नजर मुझ पर न पड़ी होती। उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। भूख के मारे मानो मेरे प्राण निकले जा रहे थे।"
             मैंने उससे कहा, "बाबा खाने के लिए कुछ हो तो दे दो।" 
           उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कहते हुए दे दी, "मैं हर रोज यही खाता हूँ। आज मुझसे ज्यादा तुम्हें इसकी जरूरत है। बेटा, यह खा लो और अपनी भूख शान्त करो।"
           अपने बेटे की यह बात सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा ले लिया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूमने लगी कि यदि उसने सुबह जहर मिली हुई रोटी को आग में जलाकर नष्ट नहीं किया होता तो शायद आज उसका बेटा उसी रोटी को खाकर मर जाता?
             उस महिला को उन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ आ गया, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे तो वह तुम तक लौटकर आएगा।
            इस कहानी को पढ़कर यही बात समझ में आती है कि हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अच्छा करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस समय उस कृत कार्य के लिए आपकी सराहना या प्रशंसा हो अथवा न हो। अपने प्रयासों को यत्नपूर्वक बढ़ाते रहना चाहिए। पता नहीं किस मोड़ पर हमारी बुराई हमसे सर्वस्व छीन ले। इसके विपरीत हमारी अच्छाई हमें बहुत कुछ दे जाए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 22 जून 2026

समय को खरीदना असम्भव

समय को खरीदना असम्भव 

 इस संसार में कोई भी ऐसा राजा-महाराजा अथवा अमीर व्यक्ति आज तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सकता हो। यदि ऐसा हो जाता तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा, चक्रवर्ती सम्राट जिनके पास अकूत धन-सम्पदा थी, वे समय को खरीद लेते और आज हमारे बीच जीवित होते। तब इस धरा पर रत्ती भर जगह पैर रखने के लिए नहीं बचती। परन्तु यह होना असम्भव है। ईश्वर ने रचना ही इस प्रकार की है कि जिसमें कहीं किसी गलती की गुंजाइश ही नहीं है।
           सत्य यह है कि विधि के विधान को बदलने की सामर्थ्य किसी भी मनुष्य में नहीं है। जिन्हें हम भगवान मानकर पूजते हैं, वे फिर हमारे पास ही होते। वे अपने नश्वर शरीर को छोड़कर इस दुनिया से विदा नहीं लेते और न ही हमें छोड़कर कोई और जन्म लेते। समय प्रवहमान है, उसे पकड़कर कैद करने की शक्ति किसी व्यक्ति में नहीं है। वह अपनी गति से निरन्तर बढ़ता रहता है। शक्तिशाली रावण को बड़ा अहंकार था कि उसने काल को अपने वश में किया हुआ है। वह भी बच नहीं सका ईश्वरीय न्याय से और इस संसार से विदा हो गया।
            इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि भूतकाल में जो हो गया उससे शिक्षा लेकर आगे बढ़ो। बन्दरिया जिस तरह अपने मृत बच्चे को चिपकाए हुए घूमती है, उस तरह भूतकाल को अपने साथ चिपककर मनुष्य को नहीं चलना चाहिए। भविष्य के गर्भ में क्या है? हम नहीं जानते, उसे केवल ईश्वर जानता है। इसलिए सब उस पर छोड़कर चिन्ता मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। केवल वर्तमान ही हमारे समक्ष है उसके विषय में ही सोचना चाहिए और उसे संवारना चाहिए। मनीषी हमें समझाते हैं कि -
     ‌ Time is money. Enjoy the today.
          इसी भाव को एक बोधकथा के माध्यम से समझते हैं। एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूर्ण मेहनत तथा ईमानदारी से करती थी। गिलहरी जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर नें उसे कहा था, "वह इसी तरह मन लगाकर काम करती रहेगी तो वह उसे दस बोरी अखरोट देगा।"
        गिलहरी जब काम करते-करते थक जाती थी तो सोचती, "बहुत तक गई हूॅं। अब थोड़ा आराम कर लेती हूॅं।"
             तभी उसे याद आ जाती थी, "मैं तुम्हें दस बोरी अखरोट दूॅंगा।"
             गिलहरी फिर दुगने उत्साह से अपने काम पर जुट जाती थी। वह जब दूसरी गिलहरियों को खेलते-कूदते देखती तो उसकी भी खेलने और मस्ती करने इच्छा होती पर अखरोट याद आते ही पुनः काम पर लग जाती।
            शेर कभी-कभी उसे दूसरे शेर के पास भी काम करने के लिये भेज देता था। ऐसा नहीं था कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, वह बहुत ईमानदार था।
          ऐसे ही समय बीतता रहा एक दिन ऐसा भी आया जब शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट देकर आजाद कर दिया। गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये सारे अखरोट हमारे किस काम के? पूरी जिन्दगी काम करते-करते दाँत घिस गये, अब इसे खाऊँगी कैसे?
           यह कहानी हम सभी के जीवन की भी वास्तविकता बन चुकी है। कभी घर-परिवार और कभी बच्चों के प्रति दायित्वों को पूरा करने में इन्सान मन मारकर सारा जीवन अपनी इच्छाओं का त्याग करता रहता है। सारी जिन्दगी नौकरी करते हुए बिता देता है। मनुष्य जब 60 वर्ष की उम्र में रिटायर होता है तब उसे उसे जीवन भर की कभाई हुई उसकी पूँजी यानी प्रोविडेंट फण्ड आदि मिल जाता है। उस समय उसके पास पैसा और समय दोनों होते हैं पर उसका शरीर अस्वस्थ होने लगता है। इसलिए चाहकर भी वह अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता।
             परिवर्तनशील समय में पीढ़ी बदल जाता है। उह समय परिवार चलाने वाला मुखिया भी बदल जाता है। वह नया जोश से भरा युवा मुखिया कभी इस बात का अनुमान नहीं लगा पाता कि पुराने मुखिया ने इस जमा पूँजी (फण्ड) को पाने के लिए सारा जीवन अपनी कितनी इच्छाओं का दमन किया होगा? कितने कष्टों-परेशानियों का सामना किया होगा? कितने ही अपने सपनों को होम कर दिया  होगा? 
          इस वृद्धावस्था में फण्ड की यह राशि उसे मिल जाती है जिसे पाने के लिए उसने अपनी पूरी जिन्दगी दिन-रात अथक श्रम किया था। डाक्टरों द्वारा बताए गए परहेज के कारण वह उस धन का वैसा आनन्द नहीं उठा पाता जैसा वह जीवन पर्यन्त सोचता रहता था। अपनी इस लाचारी के कारण वह अपना मन मसोसकर कर रह जाता है।
          अतः समय कैसा भी हो उसको कोसना नहीं चाहिए। धूप-छाँव तो जीवन का हिस्सा हैं, उस समय के लिए सुरक्षा का उपाय करते हुए अपने साधनों के अनुसार जीवन का भरपूर आनन्द उठाना चाहिए। जिससे अपने जीवन में हार जाने का मलाल न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 21 जून 2026

ईश्वर की पूजा-अर्चना

ईश्वर की पूजा-अर्चना

ईश्वर की पूजा-अर्चना यानी प्रार्थना करना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य का लोक-परलोक दोनों ही सुधरते हैं। उसका आत्मिक बल बढ़ता है और उसे मानसिक शान्ति मिलती है।
          प्रभु की प्रार्थना करना और उसका ध्यान करना इंसान के लिए बहुत जरूरी होता हैं। जब मनुष्य सच्चे मन से प्रार्थना करता है तब भगवान उसकी प्रार्थना को सुनकर देर-सवेर उसे पूरा करते हैं। वह मालिक मनुष्य के भाव को चाहता है। उसे किसी भी प्रकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं लगता।
        जब मनुष्य भगवान का ध्यान करता है तब वह उसकी बात सुनते हैं। ध्यान की अवस्था में मनुष्य ईश्वर के करीब होता है। संसार के सारे कार्य-व्यवहार से दूर रहकर वह मालिक के पास बैठता है। इस प्रकार वह उसके साथ एकात्म होने का प्रयास करता है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का ही लाभ होता है।
      इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बनाने वाला परमात्मा है और हर जीव के लिए वही सब प्रकार की व्यवस्थाएँ भी करता है। जब तक मनुष्य इस सत्य को स्मरण रखता है तब तक वह सावधान रहता है। वह कुमार्ग पर नहीं चल सकता। अपने जीवन में वह हर कदम फूँक-फूँककर रखता है ताकि उससे कोई अपराध न हो जाए।
        जब वह अपने अहं में चूर हो जाता है तब स्वयं को उस परमात्मा से भी महान् समझने लगता है। उस समय वह अहंकारी बनकर वह अपनी औकात भूल जाता है।  अपने दुष्कर्मो के कारण उसे भी उस परम न्यायकारी परमेश्वर से सजा तो मिलती है जैसे हम गलती करने पर बच्चों या अपने अधीनस्थों को देते हैं। कहते हैं कि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है और उसका प्रहार बहुत ही कठोर होता है। जब अपने दुष्कृत्यों का फल मानव को भोगना पड़ता है तब वह उसकी सहनशक्ति से परे हो जाता है।
         संसार में विद्यमान नानाविध पदार्थ वह मालिक हमें बिनमाँगे झोलियाँ भरकर देता है। अब सबके समक्ष यह समस्या उठती है कि हम उसे क्या अर्पित कर सकते हैं? कहते हैं कि एक बार एक व्यक्ति ने ईश्वर से प्रश्न किया था कि वह उसे किस प्रकार रिझा सकता है और उसे क्या अर्पित कर सकता है? 
        वास्तव में यह प्रश्न केवल उस व्यक्ति का नहीं हम सभी का भी है। इस संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जो उस प्रभु को समर्पित की जा सके। ईश्वर ने इस प्रश्न को सुनकर उत्तर दिया कि संसार की हर वस्तु उसी ने ही मनुष्य को दी है। मनुष्य के पास अपनी एक ही चीज है, वह है सिर्फ उसका अहंकार। वह उसे मालिक ने नहीं दिया। प्रभु का कहना है कि मनुष्य वही अहंकार यदि उसे अर्पित कर दे तो उसका जीवन सफल हो जाएगा।
          इसका तात्पर्य यही है कि मनुष्य को सरल, सहज और सहृदय बनना चाहिए, अहंकारी कदापि नहीं। ईश्वर को घमण्डी लोग बिल्कुल पसन्द नहीं है। वह स्वयं दयालु, प्यार करने वाला और सभी जीवों का हितचिन्तक है। उसे सदाचारी और परोपकारी लोग ही भाते हैं। अहंकारी का सिर कभी-न-कभी नीचा हो ही जाता है।
        ओशो का कथन है कि आस्तिक के बजाय नास्तिक के लिए परमात्मा को पाने की ज्यादा सभावना है क्योंकि आस्तिक तो झूठ से ही ईश्वर को पाने की शुरूआत करता है। ईश्वर का उसे पता नहीं है और उसने ईश्वर को मान लिया। यहीं पर तो बेईमानी हो गई। जब मान ही लिया तो अब खोज क्या खाक होगी? जब उसे झूठा ही मान लिया, तो फिर खोज का तो अन्त हो गया। 
          इसलिए परमात्मा को पाने के लिए, उसे जानने और समझने का सदा प्रयास करना चाहिए। उसकी निष्काम उपासना करनी चाहिए। उसके गुणों का अंशमात्र भी यदि मनुष्य अपना ले, अपने जीवन में डाल ले तो उसके इहलोक और परलोक दोनों संवर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

पिता के साए में सौभाग्यशाली बच्चे

पिता के साए में सौभाग्यशाली बच्चे 

संसार में वे बच्चे बहुत ही सौभाग्यशाली होते हैं जिनके सिर पर उनके पिता का साया बना रहता है। पिता के होने से ही मनुष्य का अस्तित्व होता है। पिता और माता ही वे दो भगवान हैं जो मनुष्य को इस धरती पर लेकर आते हैं। बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए इन दोनों की आवश्यकता होती है। पिता के होने से बच्चों में अनुशासन बना रहता है। माता और पिता मिलकर ही बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में अपना सिर ऊँचा करके चल सके और सुविधापूर्वक अपना जीवन यापन कर सके। 
        हमारे महान ऋषि ने 'तैत्तरीयोपनिषद्' में हमें समझाते हुए कहा है-
                पितृदेवो भव
अर्थात् पिता को देवता मानो। कहने का तात्पर्य यह है कि मन्दिर में जाकर निर्जीव मूर्तियों की पूजा अवश्य करो, पर घर में जीवित देवता यानी पिता और माता की पूजा पहले करो। यहाँ पूजा करने का अर्थ है यह नहीं है कि धूप अगरबत्ती जलाकर उनकी आरती उतारी जाए। बल्कि इसका अर्थ यही है कि उनकी अच्छी तरह से देखभाल करनी चाहिए। जैसे उन्होंने कभी अपनी सन्तान की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण किया था। मनुष्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब वे अशक्त होने लगें, तब उन्हें समय पर भोजन मिले, आवश्यकता होने पर दवा मिले। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को अपना धर्म समझकर, बिना माथे पर शिकन लाए पूरा किया जाए। 
        बच्चे को यह अहसास होता है कि पिता के होने से वह सदा सुरक्षित है। जब तक पिता जीवित हैं, वह स्वयं को बच्चा ही समझता है। उसे लगता है कि यदि उससे कुछ गलत हो जाएगा तो पिता है न उसे बचाने के लिए, उसकी सुरक्षा करने के लिए। पिता के रहने से वह घर-गृहस्थी की चिन्ताओं से मुक्त रहता है। उसकी दृष्टि में उसके पिता का कद बहुत ऊँचा होता है जिसे कोई छू नहीं सकता। पिता के घर पर रहने से बच्चे अपने कार्य पर अच्छी तरह ध्यान दे सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि घर में उनके पिता बैठे हैं जो घर की और अगली पीढ़ी का ध्यान रख लेंगे।
        महाभारत के काल में जब पाण्डव वन में विचरण रहे थे, उस समय चलते हुए उन्हें प्यास लगी। उन्हें समीप ही एक तालाब मिल गया। चारों भाई बारी-बारी से उस तालाब के पास पानी लेने के लिए पहुँचे। उस तालाब का स्वामी एक यक्ष था उसने उनसे पानी लेने से पहले, उसके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। वे सभी इतने प्यासे थे कि बिना उत्तर दिए ही जल लेना चाहते थे। उसके प्रश्नों का उत्तर न देने के कारण अर्जुन सहित चारों भाई बेहोश हो गए।
         तब धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ गए। उन्हें भी यक्ष ने पहले प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। यक्ष के अनेक प्रश्नों में से एक प्रश्न यह था, "आकाश से ऊँचा कौन है?"
          इस प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था, "पिता आकाश से ऊँचा है।"
          पिता का महत्त्व इसी बात से चलता है कि शास्त्रों में उसे शीर्ष स्थान पर रखा गया है। सन्तान चाहे भी तो उस आकाश को हाथ बढ़ाकर नहीं छू सकती। वह केवल उस आकाश को दूर से निहार सकती है और उसके जैसा बनने का प्रयास कर सकती है।
        पिता के विषय में 'नीतिशास्त्र' का यह कथन द्रष्टव्य है-
            स पिता यस्तु पोषक:। 
अर्थात् पिता वही है जो पोषक यानी पालन-पोषण करता है।
          इस नीति वचन का तात्पर्य यह है कि पिता वही है जो अपने सारे सुखों का त्याग करके अपनी सन्तान का पालन-पोषण करता है। वह उसे कभी किसी वस्तु की कमी का अनुभव नहीं होने देता। अपनी सामर्थ्य से बढ़कर भी वह अपने बच्चों की सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है, उन्हें हर प्रकार से योग्य बनाता है।
        'ब्रह्मवैवर्तपुराणम्' का यह कथन भी बहुत समीचीन है-
      सर्वेषामपि वन्द्यानां जनक: परमो गुरु:।
अर्थात् सभी वन्दनीय जनों में पिता सर्वश्रेष्ठ है।
        इस संसार में बहुत से लोग पूजनीय होते हैं, जिनकी हम किसी भी कारण से वन्दना करते हैं। उनके आगे-पीछे घूमते रहते हैं, उनकी कही हुई बात को महत्त्व देते हैं। उन सबसे अधिक पिता की अर्चना करनी चाहिए, ऐसा ब्रह्मवैवर्त पुराण का आदेश है। मनुष्य के जीवन में जो स्थान पिता का है, उसे कोई नहीं ले सकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में पिता स्थान बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह सत्य है कि उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।
         अन्त में यही कह सकते हैं कि प्रत्येक बच्चे का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने पिता के मान-सम्मान को बनाए रखे। ऐसा कोई भी कार्य उसे नहीं करना चाहिए जिससे उनके पिता को दूसरों के समक्ष कभी अपनी नजर नीची करनी पड़ें। उसे स्वयं उनकी सेवा-सुश्रुषा के कार्य प्रसन्नतापूर्वक करने चाहिए। ऐसा करके वह अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 20 जून 2026

योग अमूल्य धरोहर

योग अमूल्य धरोहर 

योग हमारे ऋषि-मुनियों के द्वारा दी गई एक अमूल्य देन है। योग अपने आप में एक समूचा दर्शन है। आजकल कुछ लोग इसे मात्र उछल कूद करने का माध्यम समझ रहे हैं जो उचित नहीं है। आज की पीढ़ी के अनुसार टीवी के सामने खड़े होकर या सीडी देखकर हाथ-पैरों को हिला लेना मात्र योग बन गया है। जिसको आज ये आधुनिक लोग 'योगा' की संज्ञा देते हैं। वास्तव में वह योग नहीं कहलाता। वे केवल योगासन कहलाते हैं। इन दोनो के अन्तर को समझना आवश्यक है।
              योग एक बहुत गम्भीर विषय है। इसकी अनुपालना करना इतना सरल कार्य नहीं है, जितना लोग समझते हैं। महर्षि पातंजलि ने योगशास्त्र में योग के आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों अंगों का पालन करते हुए मनुष्य समाधि के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करता है। इनमें पहले पाँच अंगों को बहिरंग कहते हैं और अन्तिम तीन अंगों  को अन्तरंग कहा जाता है। इन आठ अंगो के कारण ही इसे अष्टांगयोग कहते हैं।
             मनुष्य का सारा जीवन व्यतीत हो जाता है यम और नियम का पालन करते हुए पर उनकी पूर्ण रूप से अनुपालना नहीं कर पाता। जिस प्रकार नींव के बिना यदि घर बनाया जाए तो वह बहुत दिन तक टिका नहीं रह सकता, उसी प्रकार यम और नियम के बिना समाधि तक पहुँच पाना असम्भव होता है। योग की पहली सीढ़ी यम है इसके पालन के बिना नियम की अनुपालना नहीं हो सकती। इन दोनों के पालन से अन्त:करण पवित्र होता है। इनके पालन के बिना प्राणायाम का भली-भाँति होना बहुत कठिन होता है। अब इन अंगों की संक्षिप्त जानकारी नीचे दे रही हूॅं - 
1. यम- महर्षि पातंलि योगदर्शन में कहते हैं-
    अहिंसासत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:
अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय(चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह न करना) ये पाँच यम हैं। मन, वचन व कर्म से इन सबका पालन करना चाहिए। सारा जीवन ईमानदार कोशिश करने पर भी इनका पालन असम्भव-सा है।
2. नियम- योगशास्त्र के अनुसार दूसरा नियम हैं-
शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्चप्रणिधानानि नियमा:।अर्थात् शौच(तन और मन की स्वच्छता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान (सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना)। पाँचों नियमों का पालन इन पाँचों यमों के साथ-साथ ही करना होता है।
3. आसन- योगाभ्यास करते समय उपयुक्त आसन का चुनाव करके बैठना चाहिए। साधक प्रायः पद्मासन में ही बैठते हैं। आसन में बैठते समय तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. मेरुदंड, ग्रीवा और मस्तक को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए। 2. नासिकाग्र पर या भृकुटि में दृष्टि रखनी चाहिए। 3. यदि आलस्य न सताए तो आँखें मूँदकर बैठ सकते हैं। इस प्रकार उचित आसन पर बैठकर योगाभ्यास किया जाता है।
4. प्राणायाम- श्वास के आरोह व अवरोह का निरोध यानी रोकना प्राणायाम कहलाता है। इसी बात को योगशास्त्र कहता है-
    तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद:      प्राणायाम:। 
अर्थात् देश, काल और संख्या के सम्बन्ध से बाह्य (कुम्भक), आभ्यन्तर(रेचक) और स्तम्भन वृत्ति(रोकना) वाले तीनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। प्राणायाम सिद्ध होने पर विवेक को कुण्ठित करने वाले अज्ञान का नाश होता है और मन स्थिर होता है।
5. प्रत्याहार- अपने-अपने विषय के संयोग से हट जाने और इन्द्रियों का चित्त के रूप में अवस्थित होना प्रत्याहार कहलाता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं। तब साधक बाह्य ज्ञान से दूर होता जाता है।
6. धारणा- योगशास्त्र धारणा के विषय में यह कहता है-  
          देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
अर्थात् चित्त को किसी भी एक ध्येय स्थान पर स्थित करने को धारणा कहते हैं।
7.  ध्यान- ध्यान के विषय में योगशास्त्र का यह कथन है-  
             तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्
अर्थात् ध्येय वस्तु में चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।
8. समाधि- एकाग्र ध्यान धीरे-धीरे समाधि की ओर प्रवृत्त करता है। तब ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं। 
            स्थूल पदार्थ में समाधि 'निर्वितर्क' कहलाती है और सूक्ष्म में समाधि 'निर्विचार' कहलाती है। यही समाधि ईश्वर विषयक होने से मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है।
             इस संक्षिप्त विवेचन से यह समझ आता है कि योग एक बहुत ही गहन विषय है। इसके प्रारम्भिक अंगों यम और नियम का पालन आजीवन करना होता है। यह योग मनुष्य के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इसकी अनुपालना करके ही जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 19 जून 2026

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

मनुष्य अपनी खुशी धन-वैभव में ढूँढता है। वह भूल जाता है कि दुनिया के सारे ऐश्वर्य मनुष्य के लिए केवल साधन मात्र हैं, वे साध्य कदापि नहीं बन सकते। हम अपने लिए दिन-रात एक करके परिश्रमपूर्वक साधन जुटाते जाते हैं, वे हमें क्षणिक सुख का अहसास देते हैं। उन्हें भोगने के पश्चात वे हमारे लिए सामान्य जैसे हो जाते हैं, विशेष नहीं रहते। कभी जिन्हें पाने के लिए हम मरे जा रहे होते हैं, अब उनकी परवाह भी नहीं करते।
            यह इन्सानी स्वभाव है कि वह हर वस्तु से शीघ्र ही उकता जाता है अर्थात् बोर हो जाता है। प्रसन्नता पाने के लिए या सुखी रहने के लिए केवल धन, दौलत, प्रापर्टी आदि की आवश्यकता नहीं होती, मनुष्य इनके अभाव में भी मस्त रह सकता है। सच्ची खुशी का कारण मन है जो सदा मनुष्य को इधर-उधर भटकाता रहता है।
           ‌ इसी बात को एक बोध कथा के माध्यम से समझते हैं। एक शहर में बहुत अमीर व्यक्ति रहता था। अत्यधिक धनी होने पर भी वह सदा दुखी रहता था। एक दिन वह महात्मा के पास गया और उन्हें कहा, "अपनी समस्या बताई कि उसके पास सब ऐश्वर्या हैं पर वह सुखी नहीं है।"
             उन्होने सेठ की बात ध्यान से सुनी और कहा, "आप कल मेरे पास इसी समय आना। मैं तुम्हारी सारी समस्या का हल बता दूँगा।"
             सेठ खुशी-खुशी घर गया। जब अगले दिन वह महात्मा के पास आया तो उसने देखा कि वे सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त हैं।
          सेठ ने उस खोई वस्तु के बारे में पूछा जिसे वे ढूँढ रहे हैं। उन्होंने बताया, "उनकी एक अंगूठी गिर गयी है और वे उसी ढूँढ रहे हैं पर वह अंगूठी मिल ही नहीं रही।"
             यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया। सेठ ने  महात्मा से कुछ समय बाद पूछा, "महात्मा जी, आपकी अंगूठी गिरी कहाँ थी?"
            उन्होंने जवाब दिया, "अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ बहुत अन्धेरा है। अतः वे उसे यहाँ सड़क पर ढूँढ रहे हैं।"
           सेठ ने चौंककर पूछा, "जब अंगूठी आश्रम में खोई है तो वहाँ कैसे मिल सकती है।"
            महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो अपने मन में छुपी रहती है लेकिन उसे धन में खोजने की कोशिश करते हैं। इसीलिए दुखी रहते हैं।"
           महात्मा जी की बात सुनकर सेठ उनके पैरों में गिर गया। सन्तुष्ट होकर महात्मा जी से विदा लेकर वह अपने घर चला गया।
           ‌यही बात हम सभी पर लागू होती है। जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इन्सान खुश नहीं रहता क्योंकि हम पैसा कमाने में इतना मस्त हो जाते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। बच्चा जैसे किसी खिलौने के लिए हठ करता है और जब उसे वह दिला दिया जाता है तब वह दीन- दुनिया भूल जाता है। कुछ ही समय उससे खेलने के बाद उस खिलौने से उसका मन भर जाता है तो उसे फैंक देता है। उसे इस बात का कोई मतलब नहीं होता कि वह कितना कीमती खिलौना था। वही हाल हम सभी का भी है।
          प्रयास यही करना चाहिए कि अपने बच्चों को धनवान होना सिखाने के स्थान पर खुश रहना सिखाना चाहिए ताकि बड़े होने पर वे रिश्तों की अहमियत समझ सकें और वस्तुओं की उपयोगिता को समझ सकें, न कि उनके मूल्य को।
          खुशियों के पल खोजने होते हैं। हम बड़ी-बड़ी खुशियों को पाने की फिराक में रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि बड़ी खुशियाँ तो जीवन मे गिनी-चुनी आती हैं। इसलिए छोटे-छोटे खुशियों के पल यत्नपूर्वक खोजने चाहिए। वे हमें प्रतिदिन के कार्य व्यवहार में मिल सकते हैं। शर्त यह है कि हम उन अमूल्य पलों को सहेजने का मन बना सकने में सफल हो‌ जाऍं।
            स्वामी विवेकानन्द जी का इस विषय में कथन है कि 'समस्त ब्रह्माण्ड हमारे इस शरीर के अन्दर ही विद्यमान है जबकि हम जीवनभर इधर-उधर भटकते रहते हैं। सत्य बोलना, परोपकार करना, अच्छी सोच रखना आदि जीवन के बहुत बड़े सुख हैं।'
          स्वामी विवेकानन्द जी का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वास्तविक सुख और शान्ति मनुष्य को शुभकार्य करके ही मिलती है। किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाने पर जो खुशी मिलती है वह करोड़ों रूपए खर्च करके भी नहीं मिल सकती। इसलिए सच्चा सुख खोजना हो तो शुभकर्म करते हुए मन को शुद्ध और पवित्र बनाना चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने पर परम मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 18 जून 2026

रिश्तों को फटने मत दो

रिश्तों को फटने मत दो

मनुष्य को अपने जीवनकाल में इस बात की चिन्ता छोड़ देनी चाहिए कि कौन उसे दुख पहुँचाता है या उससे नफरत करता है बल्कि उसकी चिन्ता करनी चाहिए कौन उसे प्यार करता है। क्योंकि मनुष्य की सारी खुशियाँ उसी प्यार से जुड़ी होती हैं यानी मौजूद होती हैं। जिन्दगी में जितना अधिक हसीन पलों को याद किया तो जीना उतना ही सुखद व सुगम हो जाता है। 
          परस्पर प्यार व आपसी विश्वास दुनिया का वह सबसे खूबसूरत पौधा है जो जमीन पर नहीं दिलों में उगता है। जिस प्रकार कड़वी गोलियाँ चबाई नहीं निगल ली जाती हैं। उसी प्रकार ही अपमान, धोखे, असफलता जैसी कड़वी बातों को भी सीधे गटक लिया जाए तो आपसी कड़वाहट समय रहते समाप्त हो जाती है। यदि उन्हें चबाते रहेंगे यानि पिष्टपेषण करते रहेंगे तो जीवन दुष्वार हो जाता है और जीने का आनन्द नहीं रहता। अपना मन ही कलुषित होता रहता है।
        मनुष्य यदि यही सोचता रहे कि फलाँ व्यक्ति ने उसको उस समय यथोचित मान-सम्मान नहीं दिया अथवा यही विचार करके हलकान होता रहे कि उसने मुझे नहीं पूछा तो मैं सम्बन्ध क्यों रखूँ, तो जीना मुहाल हो जाता है। 
          सम्बन्धों अथवा रिश्तों की सिलाई यदि भावनाओं के पक्के धागे से की जाए तो उनका टूटना मुश्किल होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई कितना भी यत्न कर ले उन रिश्तों को नहीं तोड़ सकता। यदि रिश्तों की बुनियाद स्वार्थ पर रखी गई है तो उनका लम्बे समय तक टिकना मुश्किल है। स्वार्थों की पूर्ति होते ही वे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। तब फिर वहाँ एक-दूसरे को पहचानना भी नागवार हो जाता है।
        इस  क्षणभंगुर जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कौन इस संसार से पहले विदा लेगा और कौन बाद में, इसके विषय में कोई नहीं जानता। सब भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। बाद में अपनों को खोकर बहुत आघात लगता है और मानसिक सन्ताप होता है। उस समय केवल हाथ मलते हुए रह जाना पड़ता है। इसलिए पश्चाताप करने से अच्छा है रिश्तों में अनावश्यक आने वाली दूरियों को पाट दिया जाए। सम्बन्धों की गरिमा को बनाए रखने के लिए सबसे सामञ्जस्य बनाए रखना चाहिए।
            मन को लघु अथवा उदार बनाना होता है। यदि मन को लघु बना दिया तो मनुष्य की चिन्तन शक्ति संकीर्ण हो जाती है। वह मैं, मेरा घर, मेरे परिवार आदि तक ही सिमटकर रह जाता है। उसकी स्वार्थी प्रवृत्ति उस पर हावी होने लगती है। उसमें किसी अन्य के लिए कोई जगह नहीं बच पाती। ऐसे लोग आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं और पूर्वाग्रहों को पाल लेते हैं। इनके लिए सभी रिश्ते-नाते बस नाममात्र के ही रह जाते हैं।
        इसके विपरीत मन को थोड़ा उदार या विशाल बना लेने से बहुत-समस्याएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं। सबको साथ लेकर चलने की इनकी प्रवृत्ति इन्हें सबका प्रिय बना देती है। रिश्तों को तोड़ने के बजाय उन्हें बनाए रखने में ये लोग अधिक विश्वास रखते हैं। दूसरों से होड़ करने के स्थान पर उन्हें साथ लेकर चलना ही समझदारी होती है। ऐसा व्यवहार करने से मनुष्य की आत्मा प्रफुल्लित रहती है और उसमें उत्साह बना रहता है।
          सकारात्मक सोच रखने वाले लोग हर हाल में अपेक्षाकृत अधिक सुखी रहते हैँ। नकारात्मक सोच रखने वालों को सदा ही मानसिक पीड़ा का अनुभव होता है। वे जीवन से हमेशा निराश रहते हैं।
        जहाँ तक हो सके रिश्तों को फटने मत दो और यदि दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो जाए तो उनको इतनी खूबसूरती से रफू कर दो कि किसी को कभी पता ही न चल सके कि कभी उनमें कभी पैबन्द लगाने की आवश्यकता हुई थी।
चन्द्र प्रभा सूद