सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल
हमारे मनीषी कहते हैं कि जीवन उसी व्यक्ति का सफल होता है जो इस ससार में अकेला नहीं है। उसके भाई-बन्धुओं के आवागमन से घर में रौनक रहती है, चहल-पहल रहती है। वह घर तो मानो भूतों के डेरे के समान होता है जहाँ पर कभी कोई नहीं आता। इसका सीधा-सा अर्थ यही निकलता है कि जिसके घर बहुत से लोग आते रहते हैं चाहे वे मिलने-जुलने हों अथवा चाहे किसी कार्य से आने वाले हों, उसका जीवन ही वास्तव में इस भूतल पर सफल माना जाता है।
सबके साथ सामंजस्य बनाकर चलना जीवन को सफल, शान्तिपूर्ण और सन्तोषजनक बनाता है। यह दृष्टिकोण न केवल रिश्तों को मजबूत करता है बल्कि व्यक्तिगत और पेशेवर विकास के लिए भी आवश्यक है। सहयोग से सफलता मिलने पर आप मानसिक शान्ति और खुशी अनुभव होती है। जीवन की दौड़ में केवल अकेले दौड़ने वाले को प्रतिस्पर्धा में प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
'पञ्चतन्त्रम्' नामक ग्रन्थ में पण्डित विष्णु शर्मा ने इसी आशय को अपने शब्दों में बहुत सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है-
य धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले।
आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थं सुहृदो जना:।।
अर्थात् इस जगत में वे लोग धन्य, विवेकी और सभ्य हैं जिनके आवास स्थान पर मित्रगण काम के लिए आते हैं।
इस श्लोक से कवि यही स्पष्ट करना चाहते हैं कि दूसरे की उम्मीदों पर जो लोग खरे उतरते हैं, संसार में उन्हीं को पूछा जाता है। उन्हें सभी अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं। सबके अपने वही कहलाते हैं जिनके पास कोई भी व्यक्ति बेझिझक होकर अपनी समस्याओं के साथ आ सकता है। ऐसे महानुभावों का जीना ही इस धरा पर वास्तव में जीना कहलाता है। ऐसे लोगो को धन्य और विवेकी कहा जाता है।
अपने अहं के कारण दूसरों को हेय समझकर दुत्कारने वालों से सभी किनारा कर लेते हैं। सबको अपना बनाकर चलने वालों के साथियों की कतार बहुत लम्बी हो जाती है। इसी से ज्ञात होता है कि मनुष्य कितना सभ्य है? वह कितने लोगों को अपने साथ लेकर चल सकता है? उसे दूसरों की कितनी चिन्ता और परवाह है?
आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:' में इस विषय पर लिखते हैं-
जीवने यस्य जीवन्ति मित्राणीष्टा सबान्धवा।
सफलं जीवितं तस्य आत्मर्थे को न जीवति।।
अर्थात् जिसके जीवन से इष्ट , मित्र, बन्धु-बान्धव जीवित रहते हैं, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए कौन नहीं जीता? यानी अपने लिए तो सभी लोग जीते हैं।
जो मनुष्य अपने इष्टजनों और बन्धु-बान्धवों के जीने का कारण बनता है, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए यानी अपने घर-संसार के लिए तो सभी जीते हैं। यह जीना स्वार्थपरक होता है जहाँ मेरे और मेरे परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान ही नहीं होता। अपने और अपनों के लिए सब सुख-साधनों को जुटाना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। उनकी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करना मनुष्य का कर्त्तव्य होता है।
इसका यह तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मनुष्य समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाए या अनदेखा करने लगे जिसके कारण ही उसका अपना यह अस्तित्व है। वह समाज में अकेला रहकर नहीं जी सकता। भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:' में अन्यत्र इस विषय पर लिखते हैं-
स जीवति गुणो यस्यधर्मो यस्य सजीवति।
गुणधर्म-विहीनो य: जीवितं तस्य निष्फलम्।।
अर्थात् वही जीवित रहता है जिसमें गुण हों अथवा धर्म हो। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निष्फल है।
आचार्य चाणक्य ने मानव जीवन के लिए बहुत ही गूढ़ रहस्य बताया है। उनके अनुसार गुण और धर्म का मनुष्य में होना आवश्यक है। गुणों से रहित मूर्ख व्यक्ति का होना या न होना एक समान होता है। वह इस पृथ्वी पर बोझ के समान होता है। उसके होने से किसी को खुशी मिलती है और न ही उसके जाने का किसी को गम होता है।
अपने धर्म यानी अपनी जिम्मेवारियों को सुचारू रूप से निर्वहण करने वाला ही मनुष्य ही सर्वत्र सम्मान प्राप्त करता है। इसके विपरीत आचरण करने वाला हर कदम पर तिरस्कृत होता है। उसे कोई घास नहीं डालता। धीरे-धीरे वह अन्धेरों में खो जाता है। इसलिए गुण और धर्म के बिना जीने वाले मनुष्य का जीवन संसार में व्यर्थ हो जाता है।
मानव जीवन की ऊँचाइयों को छूने वाला सफल व्यक्ति सबका प्रिय बनता है। वह समाज को उचित मार्गदर्शन देता है। उसके दिखाए गए मार्ग पर चलकर आने वाली पीढ़िया भी स्वयं को धन्य मानती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद