मंगलवार, 18 अगस्त 2026

ईश्वर भक्तों का वर्गीकरण

ईश्वर भक्तों का वर्गीकरण

परमपिता परमात्मा की इस सुन्दर सृष्टि में विभिन्न प्रकार के लोग विद्यमान हैं। वे अलग विचार और स्वभाव वाले होते हैं। सबके चारित्रिक गुण एवं दोष भी एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न होते हैं। ईश्वर के प्रति उनके कैसे भाव हैं? इसे आधार बनाकर यदि उनका वर्गीकरण किया जाए तो उन लोगों को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं। यानी इस संसार में प्रभु के भक्त तीन तरह के लोग होते हैं - प्रथम कोटि, मध्यम कोटि और अन्य कोटि।
          प्रथम श्रेणी में वे लोग आते हैं जो परमपिता परमात्मा के प्रति अपने मन में अतिशय अनुराग रखते है। ऐसे मनुष्य ईशचर्चा के अतिरिक्त कभी कोई अन्य बात करना ही नहीं चाहते। सोते-जागते, उठते-बैठते वे प्रभु भक्ति में ही लीन रहना चाहते हैं। यही भक्त लोग ईश्वरमय कहलाते हैं। इस संसार में वे जल में कमल की भॉंति विचरण करते हैं। ऐसे लोगों को हम ईश्वर का सच्चे भक्त कहते हैं। 
          उन्हें लगता है कि यह  जीवन उस मालिक की अमानत है। इसलिए निस्वार्थ भाव से उसका ध्यान और स्मरण करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। ऐसा विचार करते हुए वे लोग सदा अपनी सच्ची साधना बिना किसी दिखावे के करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे ईश्वर की भक्ति में लीन रहने के कारण अपने दायित्वों से मुॅंह मोड़ लेते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वे अपने सभी कार्य ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। उनमें कर्त्तापन का भाव समाप्त हो जाता है।
          दुनिया के लोग उनके विषय में कुछ भी कहते रहें, वे अपनी धुन के पक्के होते हैं और अपने चुने हुए मार्ग पर बिना पीछे मुड़कर देखे आगे बढ़ते चले जाते हैं। ऐसे ही लग्नशील लोग अन्ततः प्रभु की शरण में जाते हैं और इस संसार के चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। निस्सन्देह यही लोग ईश्वर के उत्तम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
          दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो सदा ही सांसारिक क्रियाकलापों में संलग्न रहते हैं। उनका मन संसार में रमता है। वे सदा ही भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते रहते हैं। वे ईश्वर नाम की किसी सत्ता को नहीं मानते। कभी भी उसकी सत्ता को चुनौती देने से परहेज नहीं करते। उन्हें स्वयं को भगवान कहलवाने में कोई संकोच नहीं होता बल्कि वे आनन्दित होते हैं।
        जो लोग उस मालिक के परमभक्त हैं, वे उनका उपहास करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग भी करते हैं। जब उन पर अत्यधिक कष्ट आते हैं तब मजबूरी में ही सही उसकी शरण में जाते हैं। उस समय मालिक को कोसने और गाली-गलौच करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग मध्यम कोटि के भक्त कहलाते हैं।
        तीसरी श्रेणी में वे लोग आते है जो प्रभुचर्चा करते अवश्य हैं परन्तु उनकी वृत्ति उसमें नहीं लगाती। फिर भी वे चाहते हैं कि सभी लोग उनको ईश्वर का परम भक्त मानें, उनकी सराहना करें और भक्त होने का सम्मान दें। इसलिए वे दान-पुण्य का प्रदर्शन करते हैं और प्रभुभक्ति का ढोंग करते हैं। वे अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं। चर्चा में बने रहें, इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
          इसके साथ-साथ कालाबाजारी करना, हेराफेरी करना, भ्रष्टाचार में लिप्त होना, किसी का गला काटना आदि दुष्कार्य करने में भी परहेज नहीं करते। इस प्रकार उनकी भक्ति का दिखावा और दुर्व्यसनों में वृत्ति एकसाथ चलते रहते हैं। उनकी सफेदपोशी बनी रहे इसके लिए वे अनेकानेक तिकड़में भिड़ाते रहते हैं। समाज के लोग इनके सामने किसी भी कारण से कुछ न कहें पर उनकी पीठ पीछे उनका तिरस्कार करते हैं। उनके विषय में कभी अच्छा नहीं बोलते।
        ये अधम कोटि के लोग सदा ही दो नावों पर सवार होना चाहते हैं। परन्तु वे यह बात भूल जाते हैं कि दुनिया का दस्तूर यही है कि दो नावों पर सवार होने वाले व्यक्ति कभी तरते नहीं हैं, वे निश्चित ही डूब जाते हैं। उस समय उन लोगों का बचना कठिन हो जाता है। 
        उत्थान और पतन की एक सहज गति होती है। इन्हें हम एक ही सिक्के के दो पहलू कह सकते हैं। अब हमारा चुनाव है कि हम सिक्के की किस ओर का चयन करते हैं।‌ ईश्वरोन्मुख व्यक्ति सदा आध्यात्मिक उन्नति करते हैं और उससे विमुख रहने वाले पतन या अधोगति की ओर जाते हैं। अवचेतन मन की पाशविक ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य को पुनः पुनः अपने जाल में फंसाती रहती हैं। वे उसे विषय-भोगों की ओर प्रवृत्त करती रहती हैं। मनुष्य चाहकर भी स्वंय को उनसे विलग नहीं कर पाता और पतन के मार्ग पर चल पड़ता है।
        अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह किस और जाना चाहता है। अपनी मानवीय कमजोरियों पर अंकुश लगाकर जन्म-जन्मान्तरों के बन्धनों से मुक्त होकर वह सद् गति प्राप्त करना चाहता है अथवा विषय-भोगों में डूबकर चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ जन्म-मरण के बन्धन में बँधे रहना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 17 अगस्त 2026

ईश्वर के साथ मौन संवाद

ईश्वर के साथ मौन संवाद 

ईश्वर के साथ मनुष्य को प्रतिदिन कुछ समय निकालकर, मौन रहकर संवाद करने का अभ्यास करना चाहिए। मौन साधक की तपस्या का फल उसे अवश्य प्राप्त होता है। मौन एक बहुत बड़ा शस्त्र है यानी हथियार है। इसे हम ब्रह्मास्त्र भी कह सकते हैं। मौन की कोई भाषा नहीं होती किन्तु वह अपने मन की सारी बात समझा देता है। परन्तु जब कभी इसका विस्फोट होता है तब इस ज्वालामुखी की आँच से चारों ओर भयंकर तबाही मच जाती है। उस समय उस आँच से बच पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं होता।
         मौन साधना वह अद्भुत मानसिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें वाणी, मन और शरीर को शान्त रखकर असीम ऊर्जा संचित की जाती है। कम बोलने या पूर्ण चुप रहने से मानसिक भटकाव रुकता है, एकाग्रता बढ़ती है। इसके अभ्यास से व्यक्ति सीधे अपने आन्तरिक स्वरूप से जुड़ पाता है। 
          बोलने में खर्च होने वाली मानसिक और शारीरिक ऊर्जा मनुष्य के भीतर ही सुरक्षित रहती है। इससे विचारों का कोलाहल कम होता है और तनाव या बेचैनी से मुक्ति मिलती है। मन स्थिर होने से स्मरण शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है। मनुष्य सार्थक संवाद कर सकने में समर्थ हो जाता है।
          मौन का महत्त्व समझती हुई एक घटना मुझे स्मरण हो रही है। एक बार कबीरदास जी ने और रैदास जी ने परस्पर मिलने का कार्यक्रम बनाया। उन दोनों के शिष्य बहुत प्रसन्न हुए और परस्पर कहने लगे, "गुरुजनों की इस विशिष्ट ज्ञानचर्चा का लाभ उन्हें भी मिलेगा।"
          तीन दिन तक कबीरदास जी और रैदास जी प्रातःकाल से सायंकाल तक एक कक्ष में बैठे रहते थे और उनके शिष्य दरवाजे पर कान लगाकर खड़े रहते थे, "शायद उनके कानों में इस ज्ञान चर्चा का कुछ अंश पड़ जाए और वे लोग भी लाभान्वित हो सकें।" 
         उनका सारा श्रम व्यर्थ चला गया क्योंकि इन तीन दिनों में उन दोनों ने कुछ बोला ही नहीं। तीन दिनों के पश्चात वे दोनों अपने शिष्यों के साथ वापिस लौटने लगे। तब शिष्यों ने उनसे पूछा, " तीन दिनों तक एक कमरे में आप लोग बैठे रहे परन्तु आप दोनों ने कोई बात नहीं की और अब बिना बात किए ही वापिस जाने लगे हैं।" 
        कबीर जी ने कहा, "हमने न बोलते  हुए भी एक-दूसरे से बहुत-सी बातें कर ली हैं। जो बातें मैंने अपने मन से रैदास जी को कहीं वे उन्होंने समझ लीं। इस प्रकार जो बातें उन्होंने मुझसे अपने मन के माध्यम से मुझे कहीं वे मैंने समझ ली हैं।" 
         तो यह है मौन की वास्तविक परिभाषा जो बिना कुछ कहे सब कुछ कह देती है। ज्ञानी इस मौन की महत्ता को समझ लेता है और अज्ञानी इस मौन की खिल्ली उड़ाकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता है। अपनी बात कहने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि ढेर सारे शब्दों का आदान-प्रदान ही किया जाए। 
        हम सब जानते हैं कि माँ जब बच्चे से नाराज होती है तो कहती मैं तुमसे बात नहीं करूँगी। उस समय बच्चा यह नहीं सहन कर सकता कि उसकी माँ उससे बात न करे। हम सबने अनुभव किया है कि कक्षा में जब शरारती बच्चे को सजा दी जाती है तो कहा जाता है, "मुँह पर अँगुली रखकर कक्षा के कोने में खड़े हो जाओ। "    
          पति-पत्नी में यदि मौन पसरने लगे तो उनके बीच होने वाले अबोलेपन के कारण उनमें अलगाव तक हो जाता है। इससे उनका परिवार बिखर जाता है। उसका भुगतान आयुपर्यन्त बच्चों को अकारण ही करना पड़ता है।
        मौन रहकर भी अपनी बात दूसरे तक पहुँचाई जा सकती है। इसे कहते हैं आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा। जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और मौन स्वयं ही मुखरित होने लगता है।
            मौन एक बहुत कठिन साधना है। इसका कारण है कि मनुष्य अधिक समय तक बिना बोले नहीं रह सकता। कुछ लोग तो एक वाक्य में अपनी बात न कह पाने जे कारण अनेक वाक्य एक साथ बोल जाते हैं। इस व्रत का पालन करना खाला जी का घर नहीं है। 
        ऋषि-मुनि आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए इस मौन की साधना किया करते हैं। मनुष्य जितना अधिक मौन रहता है, उतनी ही उसकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। अधिक बोलने वाला मनुष्य अनर्गल प्रलाप करने लगता है जो उसके तिरस्कार का कारण बनता है। 
          मौन से मनुष्य की वाणी अधिक धारदार हो जाती है। उसमें एक प्रकार का ओज आने लगता है और उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। सम्भव हो तो प्रतिदिन कुछ समय के लिए इसका अभ्यास हर व्यक्ति को करना चाहिए।
        इसी प्रकार यदि मनुष्य ईश्वर से मौन संवाद कर सके तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही संवर जाएँगे। तब उसके जन्म-मरण के बन्धनों को कटने से कोई नहीं रोक सकेगा। फिर यह संसार और उसके कार्य-व्यव्हार सब यहीं धरे रह जाएँगे। उसके साथ बस ईश्वर का साथ रह जाएगा यानी वह उसी परमात्मा में लीन होकर मुक्त हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 16 अगस्त 2026

निन्यानवे का फेर

निन्यानवे का फेर

'निन्यानवे का फेर' एक प्रसिद्ध हिन्दी भाषा का मुहावरा है। इसका अर्थ होता है धन को कमाने, जोड़ने या बढ़ाने का ऐसा लालच अथवा चक्कर है जिसके कारण मनुष्य हर समय बस पैसे जोड़ने की फिक्र में डूबा रहता है। यह ऐसी तृष्णा है जो कभी खत्म नहीं होती। यह फेर मनुष्य को बहुत परेशान करता है। इस फेर से न तो कोई आज तक बच पाया है और भविष्य में भी शायद ही कोई इससे बच सकेगा। इसके कारण मनुष्य सारा समय बस लाभ-हानि की फिक्र में फंसा रहता है।
        आखिर यह निन्यानवे का फेर है क्या? क्यों यह सबके दुःख का कारण बनता है? इससे बच पाना मनुष्य के लिए असम्भव क्यों है?
        ये कुछ प्रश्न हैं जिनकी हम विवेचना करेंगे। निन्यानवे (99) यानी गणितीय रूप से नब्बे (90) और नौ (9) का योग होता है जो सौ (100) से एक कम होता है। इसे अंकों में '99' लिखा जाता है।
           बचपन में एक दृष्टान्त सुना था। बहुत समय पहले एक गरीब दम्पत्ति बहुत कष्ट में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। पर वे दोनों बड़े सुकून से रहते थे। उनकी यह दुरावस्था किसी सहृदय सज्जन से देखी नहीं गई। उसने उनकी सहायता करने का विचार किया। यदि वे सामने से जाकर सहायता करते तो स्वाभिमानी दम्पत्ति आहत हो जाते। वे उन्हें दुखी नहीं करना चाहते थे।
         इसलिए उन्होंने ने एक निर्णय लिया। उन्होंने एक थैली में कुछ रुपए डाले और उसे उस दम्पत्ति के घर में चुपके से रख दिया। अब वे देखना चाहते थे कि वे दोनों उस धन को पाकर क्या प्रसन्न हो जाएँगे? उन्होंने उन दोनों पर अपनी नजर रखनी शुरू कर दी।
          उन दोनों ने जब अपने घर में अचानक रुपयों से भरी थैली देखी तो उनकी खुशी का पारावार न रहा। वे अपने सौभाग्य को सराहने लगे। जब उन्होंने ने थैली में से पैसे निकालकर गिने तो वे निन्यानवे सिक्के निकले। अब उनके मन में यह इच्छा बलवती हुई कि किसी तरह इस राशि को सौ तक पहुँचा दें। अब उनका सारा सुख-चैन खो गया। दिन-रात उन्हें बस एक ही धुन रहती कि किसी तरह उनकी धनराशि सौ रुपए हो जाए।
        वे खूब मेहनत करके कमाते रहते और जब उन्हें लगता कि अब उनके पास सौ रुपए हो जाएँगे तो ऐसे खर्च आ जाते कि उन्हें वे टाल न पाते। इस कारण वह राशि सौ के आंकडे तक पहुँच ही नहीं सक रही थी। कहते हैं कि इसीलिए यह 'निन्यानवे के फेर' वाली उक्ति बनी।
          यह केवल उस गरीब दम्पत्ति की व्यथा-कथा नहीं है बल्कि हम सब लोग भी इसी कमाने धुन में दिन-रात कठोर परिश्रम करते हुए कोल्हू का बैल बन जाते हैं। अपना सुख-चैन गंवा देते हैं पर मनचाहा धन नहीं कमा पाते।
         इन्सान इस धन को कमाने की होड़ में अपना-आपा तक भूल जाता है। उसका मस्तिष्क बस पैसे को कमाने की जुगाड़ में लगा रहता है। उसका हृदय सच-झूठ, भ्रष्टाचार, कालाबजारी, किसी का गला काटने से भी परहेज न करता हुआ सम्वेदना शून्य तक हो जाता है। जिनके लिए वह सारे पाप-पुण्य करता है, उन्हीं से दूर होकर एक समय के पश्चात अकेला रह जाता है।
          यह पैसा है कि इसकी हवस दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है। जितना मनुष्य इसके पीछे भागता है उतना ही वह उसे और नाच नाचता है। इन्सान सोचता है कि उसने इतना कमा लिया की उसकी सात पुश्तें आराम से बैठकर खा सकती हैं। पर वह भूल जाता है कि जो भी वस्तु मनुष्य को बिना मेहनत किए मिल जाती है, वह उसकी कद्र नहीं करता। 
        यही बात धन-सम्पत्ति के साथ भी होती है। अनायास मिले अकूत धन-वैभव को उसके उत्तराधिकारी सम्हाल नहीं पाते और उसे दुर्व्यसनों में बर्बाद कर देते हैं। फिर जायज-नाजायज तरीके से कमाया हुआ सारा धन तो व्यर्थ होता ही है और जिनको सताया था, उनकी बद्दुआएँ भी मनुष्य का पीछा नहीं छोड़तीं।
          इसीलिए सयाने कहते हैं-
            पूत सपूत तो का धन संचै
            पूत कपूत तो का धन संचै।
अर्थात् यदि पुत्र सुपुत्र है तो वह स्वयं ही काम लेगा, उसके लिए धन का संचय न करो। यदि पुत्र कुपुत्र है तो वह सारा धन उजाड़ देगा, उसके लिए धन संचय करना व्यर्थ है।
          इसके अतिरिक्त सुनामी, भूकम्प, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय यह अनैतिक कमाई नहीं दूसरों द्वारा दिए गए आशीर्वाद ही काम आते हैं। इस सत्य को कभी भी अपने मन से नहीं निकालना चाहिए।
          तात्पर्य यही है कि बच्चों को संस्कारी बनाएँ। धन तो वे काम ही लेंगे। स्वयं भी ईमानदारी और सच्चाई से धन कमाइए उसमें बहुत बरकत होती है। ईश्वर भी ऐसे सज्जनों से प्रसन्न रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 15 अगस्त 2026

मन को भटकने से बचाऍं

मन को भटकने से बचाऍं

अपने मन को सदा शान्त और प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उसे अनावश्यक ही इधर-उधर भटकने से बचाना अचाहिए। यदि मन ही भटकने लगेगा तब मनुष्य कभी सहज नहीं हो सकता। वह बैचेन होने लगता है। उसके लिए एक-एक पल व्यतीत करना बहुत कठिन हो जाता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता। न ही उसकी किसी से बात करने की इच्छा होती है। उस समय उसे किसी वस्तु में मन नहीं लगता। वह बस अकेला रहना चाहता है। 
          यहॉं हम चर्चा करते हैं कि बड़े शहरों में प्रायः सारा दिन बिजली रहती है। यदि थोड़ी देर के लिए न भी रहे तो महसूस नहीं होता। इसका कारण है कि वहॉं पर प्रायः सबने अपने घरों में इन्वर्टर लगाए हुए होते हैं। इसके विपरीत छोटे शहरों और दूर-दराज के इलाकों में बिजली की समस्या बहुत विकट होती है। बिजली कब जाती है और कब आती है, इसका कुछ भी ठिकाना नहीं होता। इसलिए वहॉं पर रहने वाले लोग परेशान होने लगते हैं। वे बिजली विभाग को कोसने लगते हैं।
      किसी दूर के इलाके में बिजली न होने के कारण एक व्यक्ति बहुत परेशान हो गया। रात का समय हो गया था पर लाइट नहीं आई थी। उसे अपना कोई बहुत जरूरी कार्य निपटाना था। इसलिए उसने अपने कमरे में रात के समय रौशनी करने के लिए एक छोटा-सा दीया जला दिया। अपने हाथ में लिए गए उस आवश्यक कार्य को उसने निपटा दिया। आधी रात का समय हो गया था और  वह बहुत थक भी गया था। उसने सोचा कि अब सो जाना चाहिए। 
        उसने फूँक मारकर वह दीया बुझा दिया तो उस कमरे में अंधेरा हो गया है। उसे यह देख कर हैरानी हुई कि जब तक दीया कमरे में जल रहा था तब तक चाँद कमरे के बाहर खड़ा होकर दीये के बुझने की प्रतीक्षा कर रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि कमरे में अंधेरा होते ही उसे बाहर चन्द्रमा की रौशनी दिखाई देने लगी। इसी प्रकार प्रातः कालीन सूर्य हमारे घर के दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा में बाहर खड़ा रहता है। ज्यों ही दरवाजा खुलता है वह मुस्कुराता हुआ अपनी रौशनी घर के अन्दर और बाहर चारों ओर बिखेर देता है। उसी प्रकार दीये के बुझते ही चन्द्रमा की किरणें उस अंधेरे कमरे में फैल गईं। उसने अपनी शीतल चाँदनी हर तरफ बिखेर दी। 
      प्रकृति का यह अलौकिक रूप देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव आ गया। उसके मन में यह विचार आया कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार का मुकाबला डटकर सकता है, अपना प्रकाश फैला सकता है। जब तक चाहे उसकी राह का रोड़ा बन सकता है। मनुष्य उस छोटे से दीये की तरह दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी क्यों नही बन सकता? वह अपने मन को उत्साहित क्यों नहीं कर सकता?
          सूर्य और चन्द्रमा के समान परम तेजस्वी परमात्मा को स्वयं से दूर करने के लिए हमने भी अपने जीवन में इसी तरह के बहुत से छल-प्रपंच किए हुए हैं। उसकी सुन्दर छवि यानी उसके दिव्य प्रकाश को निहारने की हम बिल्कुल भी कोशिश नहीं करते। उससे सब कुछ पा जाना चाहते हैं पर उसको पाने के लिए कोई परिश्रम नहीं करना चाहते।
      हम अपने मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण व्यर्थ ही के दुराग्रह पाले रहते हैं। अपने स्वार्थ में हम अन्धे हो जाते हैं, इस कारण हमें कुछ भी नहीं दिखाई देता। हम अपने मन के अंधेरों में घिरे रहते हैं।‌ उस समय अपने ऊपर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं रहता। बिना सोचे-समझे हम अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं। हर जीव को तुच्छ समझने की हमारी प्रवृत्ति ही हमारे विनाश का कारण बन जाती है।
        इसलिए हम हर समय अशान्त रहते हैं। हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। उसका दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। हमारी कार्यक्षमता दिनों-दिन प्रभावित होती है। इस सबसे बढ़कर हमारे ही स्वजन सारा दिन घर के बोझिल माहौल के कारण परेशान होते रहते हैं। घर में नकारात्मक ऊर्जा अपने पैर पसारने लगती है। देखते ही देखते घर में अशान्ति का साम्राज्य हो जाता है। यह वातावरण घर के किसी भी सदस्य के लिए भी सुखदायी नहीं होता।
        सबसे अधिक खलबली हमारी वाणी मचाती है। उसका बेलगाम हो जाना खतरे की घण्टी बन जाती है। यही वाणी राज कराती है और यही दर-दर की ठोकरें खिलाती है। इसकी कटुता को कोई भी सहन नहीं कर सकता। इसको नियन्त्रण में रखना बहुत आवश्यक होता है अन्यथा जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपनी वाणी को विश्राम नहीं देता तब तक उसका मन शान्त नहीं रह सकता। अशान्त मन में तो ईश्वर का वास नहीं हो सकता। 
          अपने मन को पवित्र बनाना बहुत आवश्यक होता है। तभी उस शुद्ध मन में ईश्वर का निवास बन सकता है। जहाँ तक हो सके अपने मन को भटकने से बचाना चाहिए। जब तक मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आ पाएगी तब तक वह अपने अन्तस में विद्यमान परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर सकता।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर

स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर 

मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए विभिन्न प्रकार के आडम्बर रचता रहता है। स्वार्थ सिद्धि हेतु आडम्बर का तात्पर्य है अपने मतलब या लाभ को पूरा करने के लिए झूठा दिखावा करना या पाखण्ड करना। लोग समाज में खुद को बड़ा, ईमानदार या ज्ञानी दिखाने के लिए नकली रूप अपनाते हैं। वे अपनी वास्तविकता को छुपाकर बड़ा होने का नाटक करते हैं या झूठा दिखावा करते हैं। ऐसे लोग दूसरे लोगों से विश्वासघात करके, धोखा देकर अपना काम निकालते में सिद्ध होते हैं। इससे समाज में झूठ और दिखावे की आदत बढ़ती चली जाती है। 
          वैसे मनुष्य में आन्तरिक विनम्रता सहज होती है और उसके संस्कारजन्य होती है। विनम्रता का यह गुण अहंकार से रहित होता है। दूसरों का आदर करना, शिष्टाचार का पालन करना, मधुर भाषण करना,  लज्जा, संकोच, आज्ञाकारिता आदि गुण विनम्रता के सहचर हैं। ऐसे व्यक्ति को घर-परिवार, बन्धु-बान्धव और समाज शील-सदाचरण वाला मानता है।
        विनम्रता मनुष्य का चारित्रिक गुण है। मनुष्य के हाव-भाव और शारीरिक चेष्टाओं से उसकी विनम्रता सबके समक्ष प्रकट होती है। बड़ों के प्रति सम्मानभाव, छोटों की गलतियों पर उन्हें क्षमा कर देना विनम्र व्यक्ति की पहचान होती है। कभी अपने से कोई भूल हो जाए तो निसंकोच रूप से क्षमा याचना करना मनुष्य का एक बहुत बड़ा गन होता है। यह स्वाभाविक गुण विनम्र व्यक्तियों को एक अलग पहचान देता है।
          परन्तु जहाँ दूसरों की चापलूसी करना, उनके आगे बिछ जाना, किसी के पैर अपने मतलब के लिए पकड़ लेना, जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेना आदि स्वार्थ की पराकाष्ठा है। यह किसी मनुष्य की चरित्रगत गिरावट को दर्शाती है। ऐसे व्यक्ति का समाज में कोई भी आदर नहीं करता। ऐसे स्वार्थी व्यक्ति से लोग एक समय के पश्चात किनारा करने लगते हैं ।
          शिष्य की अपने गुरु के प्रति सादर विनम्रता, सन्तान का अपने माता-पिता के प्रति विनयशील होना, पति-पत्नी का परस्पर विनययुक्त व्यवहार, कार्यालय में नम्रता आदि भौतिक सम्बन्धों का मूल होता है। विनयी की विनम्रता बिना किसी भेदभाव के अपने-पराए सभी के लिए ही होती है।
          भाग्य पर विश्वास करने वाले इस गुण को जन्मजात मानते हैं। उनका कथन है कि यह विलक्षण संस्कार अन्य गुणों की भाँति ही मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार पूँजी के रूप में मिलता है। कई बार अपने आसपास की या बाहरी परिस्थितियाँ भी उस पर अपना प्रभाव डालती हैं पर वह क्षणिक होता है। उनके घर-परिवार और भाग्य से मिले संस्कार उन्हें वापिस सन्मार्ग पर लेकर आ जाते हैं।
        वैसे दूसरों की दया पर निर्भर रहने वाले मनुष्यों में जबरदस्ती वाली विनम्रता  आती है। किसी की चाकरी करने वाले सेवक से, बॉस अपने अधीनस्थ कर्मचारी से हमेशा विनम्रता की अपेक्षा करते हैं। जहाँ उन्होंने पलटकर जवाब दिया वहीँ उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। कितना भी प्रिय व्यक्ति का भी उत्तर देना कोई सहन नहीं कर सकता।
          सज्जनों की संगति, स्वाध्याय और ईश्वर भजन  के कारण आने वाली विनम्रता  वास्तविक होती है। वैसे विद्यार्जन या विद्वत्ता की पहली शर्त होती है विनम्रता-
              विद्या ददाति विनयम्।
अर्थात् विद्या विनय को देती है।
          इसी कड़ी में निम्न श्लोक देखते हैं जिसमें कवि ने कहा है कि -
      नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः
     शुष्कवृक्षाः च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन।।
अर्थात् फल वाले वृक्ष झुकते हैं और गुणीजन झुकते हैं परन्तु दूसरी ओर मूर्ख व्यक्ति 
और ठूँठ हुए पेड़ कभी नहीं झुकते।
          कवि का स्पष्ट कथन है कि मूर्ख अपनी बेवकूफियों के कारण अकड़कर रहते हैं। दूसरी ओर ठूँठ हुए पेड़ भी तनकर खड़े रहते हैं और न झुक पाने के कारण टूट जाते हैं। पेड़ वही झुकते हैं जिन पर फल लगे होते हैं। उसी प्रकार मनुष्य वही विनम्र होते हैं जिनके पास गुण होते हैं।
          विनम्रता मनुष्य का आभूषण है। कुछ लोग इस गुण को मनुष्य की कमजोरी मान लेते हैं जो उचित नहीं है। संसार के प्रति सहिष्णुता या विनम्रता को अपनाने वालों को ईश्वर के प्रति भी विनम्र होना चाहिए। वही मनुष्य को सर्वविध सुख-सुविधाएँ देता है। उसका तिरस्कार करने का स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए।
          इस विनम्रता रूपी गुण को सदा यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए। स्वार्थपरता रूपी अवगुण का यथासम्भव त्याग कर देना चाहिए। इसे अपनाकर मनुष्य को हठी अथवा उद्दण्ड नहीं बनना चहिए। अपने सद् गुणों के प्रति मनुष्य को सदैव सजग रहना चाहिए। तभी वह सर्वत्र सम्मान का अधिकारी बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

बच्चों जैसी निश्छल हंसी

बच्चों जैसी निश्छल हंसी

बच्चों की निश्छल हंसी हर किसी का मन मोह लेती है। जहाँ उसमें कुटिलता का भाव आया वहीं मात्र औपचारिकता रह जाती है। कुटिल हंसी वाले लोग न विश्वसनीय होते हैं और न ही हितचिन्तक। बड़े लोग भी यदि बच्चों की भॉंति निश्छल हंसी हंसने लगें तो उनका तनाव समाप्त हो सकता है।
         बच्चों की निश्छल हंसी स्वार्थ, दिखावे और तनाव से पूरी तरह मुक्त होती है। यह मासूमियत, पवित्रता और सच्ची खुशी का प्रतीक है जो बिना किसी कारण या बिना किसी मतलब के केवल दिल के आनन्द से फूट पड़ती है। ऐसी खिलखिलाहट से भरी हंसी बड़े से बड़े गम और तनाव को पल भर में दूर कर देती है। 
        इस हंसी में कोई छिपा हुआ उद्देश्य या लालच नहीं होता। यह मन को हल्का और तरोताजा कर देती है। इसे सुनकर आसपास के लोगों के चेहरे पर भी अपने आप मुस्कान आ जाती है। बच्चे बीती बातों या भविष्य की चिन्ता किए बिना सिर्फ उस पल का आनन्द लेते हैं।
          सयानों का कहना है कि दिन में एकबार जोर से खिलखिलाकर अवश्य ही हंसना चाहिए। इसके बहुत लाभ होते हैं। मनुष्य के अन्तस् में विद्यमान अवसाद दूर हो जाता है और शरीर के अंग-प्रत्यंगों को प्रभावित करता है।
          आज के भागमभाग वाले इस युग में सभी टेंशन में यानी परेशानी में रहते हैं। उनसे ऐसी हंसी हंसने की बात करना ही व्यर्थ हो जाता है। हंसने की मानसिकता यदि नहीं बन पाती तो मुस्कुराया भी जा सकता है। हंसने का यह वरदान ईश्वर ने केवल मनुष्यों को ही दिया है पशुओं को नहीं।
          हंसने के पैसे नहीं लगते। यह तो मनुष्य की प्रसन्नता और संपन्नता की पहचान है। उसकी उन्मुक्त हंसी कई चेहरों को मुरझाने से बचा सकती है और उन्हें खुशियाँ दे सकती है। एक बच्चा जब खिलखिलता हुआ सबके सामने आता हैं तो सब लोग अपनी परेशानी भूलकर उसके साथ खुश होने लगते हैं। उसकी भोली-भाली शरारतें हर किसी को गुदगुदा देती हैं। बड़े भी उस समय उसके साथ बच्चा बन जाते हैं और भूल जाते हैं कि वे बच्चा नहीं एक समझदार इन्सान हैं।
       भारत में यहाँ-वहाँ पार्को में लाफ्टर क्लब बने हुए हैं। वहॉं सदस्य अपनी हंसी का जलवा दिखाते हैं। उन्हें देखकर अनजान आदमी यही सोचेगा की ये सभी लोग पागल हो गए हैं जो अजीब-सी हरकते कर रहे हैं। 
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी और काम के बोझ के कारण हमें यह याद ही नहीं रहता कि खिलखिलाकर हम कब हंसे थे? हंसना बहुत महत्त्वपूर्ण है परन्तु हम उसे अनदेखा करके अपनी मजबूरियों का रोना रोते रहते हैं। जिन्दगी हंसने की बदौलत स्वस्थ एवं खुशनुमा बन सकती है।
         खुलकर हंसना व्यायाम की श्रेणी में आता है। यह व्यायाम मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, इमोशनल, आध्यात्मिक और सामाजिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है। इसी प्रकार उसके वैयक्तिक, कार्यक्षेत्र और समाज की सेहत में भी बहुत सुधार लाता है।
        हंसने से हृदय में रक्त का संचार होता है। शरीर से निकलने वाला एंडोर्फिन रसायन हृदय को मजबूत बनाता है। सबसे प्रमुख बात यह  होती है कि हंसने से हार्ट-अटैक की सम्भावना कम हो जाती है। मनुष्य स्वस्थ रहता है।
          हंसने से ऑक्सीजन अधिक मात्रा में मिलती है और शरीर का प्रतिरक्षातन्त्र मजबूत हो जाता है। इससे कैंसर कोशिका और कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया एवं वायरस नष्ट हो जाते हैं। 
        यदि प्रातः काल हास्य ध्यान योग किया जाए तो दिन भर प्रसन्नता रहती है। रात इस योग को करने से नींद अच्छी आती है। शरीर में कई प्रकार के हारमोंस का स्राव होता है, जिससे मधुमेह, पीठ-दर्द एवं तनाव से पीङित व्यक्तियों को लाभ होता है।
          हँसने से मनुष्य में सकारत्मक ऊर्जा बढती है। खुशहाल सुबह से कार्यक्षेत्र का माहौल भी खुशनुमा होता है। चुटकुले पढ़कर या सुनकर दिन की शुरूआत एक जोरदार हंसी के साथ की जा सकती है। 
        कहते हैं कि प्रतिदिन एक घण्टा हँसने से 400 कैलोरी ऊर्जा की खपत होती है और मनुष्य का मोटापा नियन्त्रित रहता है। 
        प्रकृति भी यही समझाती है कि जिस प्रकार वर्षा के बाद खिली धूप, खिले हुआ फूल और लहलहाते हरे भरे पेड़ अपनी प्रसन्नता को प्रकट करते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी समय-समय पर अपनी खुशी प्रकट करते रहना चाहिए।
           मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हुआ है कि अधिक हंसने वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान होते हैं। जापान के लोग अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही हंसते रहने की शिक्षा देते हैं।
          इस हंसने के लाभ बहुत हैं पर हानि कोई नही होती। इसलिए जब भी अवसर मिले खिलखिलाकर हंसना मत भूलिए। जब हम स्वयं खुश एवं स्वस्थ रहेंगे तभी अपने आसपास का वातावरण भी खुशनुमा बना सकेंगे। इससे स्वयं को तो आनन्द आता ही हैं दूसरे भी आनन्दित होते हैं। हास-परिहास दुःख और कष्ट का दुश्मन है, निराशा और चिन्ता का अचूक इलाज यानी रामबाण औषधि है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 12 अगस्त 2026

परमात्मा शक्तियॉं किसे देता

परमात्मा शक्तियाँ किसे देता

परमात्मा सारी शक्तियाँ उसी व्यक्ति को देता हैं जो सच्चे मन से उसकी पूजा-अर्चना करता है। यदि हम मन की गहराई से उसे याद करें तो मनुष्य को कुछ भी माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वह मालिक तो स्वयं ही सब कुछ दे देता है। परमात्मा से कुछ माँगो नहीं और उससे दूरी भी मत बनाओ। बल्कि उसे सदा अपने हृदय में बसाकर याद करो। 
         परमात्मा शक्तियाँ किसी विशेष व्यक्ति को छॉंटकर नहीं देता। वह सच्चे मन से  उपासना करने वाले भक्त, पवित्र मन वाले और परोपकारी स्वभाव वाले मनुष्यों को देता है। जो लोग ध्यान, प्रार्थना और अच्छे कर्मों से खुद को योग्य बनाते हैं, परमात्मा उन्हें आन्तरिक शक्ति, शान्ति और ज्ञान का वरदान देता है। 
        जो लोग बिना किसी स्वार्थ के ईश्वर का स्मरण करते हैं। उनका मन बुरे विचारों और विकारों से साफ होता है। वे अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की सहायता करने के लिए करते हैं। उन्हें ईश्वर कठिन समय में अडिग रहने के लिए सहनशक्ति देता है। मन को बिखरने से बचाने की उन्हें क्षमता प्रदान करता है। साथ ही उन्हें सही और गलत की पहचान करने की बुद्धि देता है।
          दुःख आने पर तो उस मालिक को सभी याद करते हैं परन्तु सुख के समय तो उसे भूल जाते हैं। उसका हर स्थिति में स्मरण करते रहना चाहिए। कबीरदास बहुत सुन्दर शब्दों में इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कहते हैं- 
    दुःख में सिमरन सब करें सुख में करे न कोय।
   जो सुख में सिमरन करें तो दुःख कहे को होय।।
अर्थात् कबीरदास जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि दुःख में तो ईश्वर को सब याद करते हैं पर सुख के समय कोई स्मरण नहीं करता। यदि सुख के समय परमपिता परमात्मा का पूजन-अर्चन किया जाए तो दुःख अपनी दाल गलती न देखकर मनुष्य के पास फटकते ही नहीं हैं, दूर भाग जाते हैं। ईश्वर उन्हें इतनी आत्मिक शक्ति देता है कि वे दुख मनुष्य को पीड़ित नहीं करते।
        दुःख मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अवश्य मिलते अवश्य हैं। ईश्वर का स्मरण करते रहने से मनुष्य में बहुत अधिक आत्मशक्ति आ जाती है। तब  उसे दुःख शूलों या काँटों की तरह नहीं प्रतीत होते बल्कि वे फूलों की तरह लगने लगते हैं। इन्सान के मन से सुख और दुःख दोनों का ही भेद मिट जाता है। वह सुख-दुःख के द्वन्द्व को एक समान रूप से मानने लगता है।
          एक छोटा बच्चा जब किसी कारण से परेशान होता है तब अपनी माँ के पास जाता है। माँ अपने बच्चे के बिना कुछ कहे ही, केवल उसका चेहरा देखकर समझ जाती है कि उसका बच्चा किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट से गुजर रहा है। वह उसे बड़े प्यार से अपने पास बैठाकर उसके सिर पर अपना हाथ रखती है। उसका निस्वार्थ प्रेम बच्चे के दुःख-दर्द को दूर करने में सहायक बनता है।
           ईश्वर जो जगज्जननी है, उसकी भी अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएँ होती है। वह भी तो अपनी सन्तान मनुष्य को हर परिस्थिति में अपनी शरण में लेने के बाहें फैलाए प्रतीक्षा करता रहता है। जिस प्रकार सागर नदी को उसके उदगम से वहाँ पहुँचने तक की यात्रा के सारे कष्टों से मुक्त करने के लिए, उसकी प्रतीक्षा अपनी बाहें फैलाकर करता है।
          इस भौतिक संसार के माता-पिता के पास हम अपनी सभी समस्याओं को लेकर जाते हैं। इसी तरह उस मालिक की भी इच्छा होती है कि उसके बच्चे सदा अपनी हर समस्या को उससे साझा करें। उसके पास आकर वे अपनी व्यथा-कथा का बखान करें। उससे उस कष्ट से मुक्त करने के लिए गुहार लगाएँ।
          गर्मी के ताप से तपा हुआ मनुष्य पंखे से हवा माँगता नहीं है अपितु बटन दबाता है और उसके सामने बैठ जाता है। उस समय स्वयं ही हवा उसे मिलने लगती है और उस ताप से मुक्ति देती है।
          उसी तरह दुनिया के सन्तापों से तपे हुए मनुष्य यदि बिना आडम्बर के उसका ध्यान करते हुए बैठ जाएँ तो वह निश्चित ही उनके त्रिविध तापों -  आधिभौतिक (सांसारिक वस्तुओं या जीवों से प्राप्त कष्ट), आधिदैविक (दैवीं आपदाएँ या पूर्व में स्वयं के किए गए कर्मों से प्राप्त कष्ट) और आध्यात्मिक (अज्ञानजनित) को दूर करता है।
        संसार के सभी कार्यव्यवहार करते हुए, उनमें जल में कमल की तरह लिप्त न होते हुए, प्रभु को पाने की स्वाभाविक तड़प ही मनुष्य को उस मालिक के करीब ले जाती है। तब वह उसी का चिन्तन करता है और उसी का भजन करता है। तभी मनुष्य की ऐसी स्थिति बनती है कि वह आगे-आगे चलता है और सिद्धियाँ उसके पीछे-पीछे भागती हैं।
          परमात्मा की निष्काम उपासना का यही सार है कि मनुष्य को बिना माँगे ही वह सब कुछ मिल जाता है जो उसके हर प्रकार के अज्ञान को दूर करके उसे भवसागर से पार तर जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद