सोमवार, 25 मई 2026

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश परस्पर विरोधी होते हुए भी एक सिक्के के दो पासों की तरह जुड़े रहते हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ निर्माण है वहाँ विनाश भी अवश्यम्भावी होता है। विनाश और निर्माण दोनों साथ-साथ चलते हैं। यहॉं हम वसन्त ऋतु और पतझड़ का उदाहरण लें सकते हैं। एक ओर पतझड़ के कारण वृक्षों के पत्ते और फूल गिरकर पेड़ों को ठूॅंठ बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर वसन्त ऋतु चारों ओर हरियाली और सुगन्ध लेकर आती है।
            यानी निर्माण एक रचनात्मक, योजनाबद्ध और समय लेने वाली प्रक्रिया है जो नई वस्तुओं को बनाती है। दूसरी ओर विनाश एक शीघ्र घटने वाली, बेतरतीब और नकारात्मक प्रक्रिया है जो मौजूद संरचनाओं को नष्ट कर देती है। निर्माण का उद्देश्य विकास है जबकि विनाश का परिणाम ह्रास या समाप्ति होता है।          
           इसीलिए इस संसार को मरणधर्मा कहा जाता है। इसका अर्थ यही है कि जो भी चराचर जीव इस दुनिया में आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। उसके चाहने या न चाहने का कोई औचित्य नहीं होता। उसे इस धरा से जाना ही होता है, उसके पास इसका कोई विकल्प नहीं होता। सदा के लिए कोई भी यहाँ नहीं रह सकता।
          निर्माण का उद्देश्य सृजन, उपयोगिता और वृद्धि करना होता है। निर्माण सकारात्मक होता है जो संरचना का निर्माण करता है। जबकि विनाश का उद्देश्य प्रायः वस्तुओं को मिटाना अथवा ऊर्जा को नष्ट करना होता है। वह विनाशकारी और नकारात्मक होता है जो संरचना का ह्रास या क्षरण करता है।
            बीज का वृक्ष बनना रूप परिवर्तन होता है, निर्माण नहीं कहलाता। परन्तु वृक्ष को काटकर उससे अपनी आवश्यकता की अथवा आकर्षक वस्तुएँ बनाना निर्माण कहलाता है। उस काष्ठ को नष्ट कर देना या ईंधन के रूप में उसका प्रयोग करना ही विनाश कहलाता है। 
           यह समस्त चराचर जगत् उस प्रभु की रचना है अथवा निर्माण है। जब भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं तब वे स्थान-स्थान पर विनाश का ताण्डव करती हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि मचने लगती है। वे किसी भी चराचर जीव का पक्षपात नहीं करतीं। सभी पर उस विनाश का प्रभाव पड़ता है।
          किसी भी निर्माण में वर्षों लगते हैं किन्तु उसका विनाश करने में अधिक समय नहीं लगता। जैसे एक बहुमंजिला भवन बनाने में वर्ष भर या इससे भी अधिक समय लग सकता है परन्तु उसे तोड़ने के लिए कुछ दिन ही बहुत हो जाते हैं। मैं यही कहना चाहती हूँ कि निर्माण करना बहुत कठिन कार्य होता है और विध्वंस करना अपेक्षाकृत बहुत सरल होता है। 
          'सूक्तिमुक्तावली' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव का वर्णन किया है-
        दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तुनिमेष-
                     मात्रेण भजेद् विनाशम्।
        कृतं कुलालस्य तु वर्षमैक नेतुं हि 
                       दण्डस्य मुहुर्तमात्रम्॥
अर्थात् लम्बी अवधि में परिश्रम से प्रस्तुत की गई वस्तु का विनाश क्षणभर में ही किया जा सकता है। कुम्भकार को जिस वस्तु को तैयार करने में एक वर्ष का समय लगता है, उसी को डण्डे ने क्षणभर में ही विध्वस्त कर दिया।
             इस श्लोक के माध्यम से कवि हमें यही समझाना चाहता है कि निर्माण की अपेक्षा विध्वंस सरलता से, बिना समय गॅंवाए पलभर में किया जा सकता है। कुम्हार का उदाहरण देकर अपनी बात को कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रस्तुत किया है। इसके माध्यम से सरलता से कवि का आशय समझा जा सकता है।
            इतिहास के पन्ने खंगालने पर हम जान सकते हैं कि कितने शहर, कितनी सभ्यताएँ समय बीतते पृथ्वी के गर्त में  समा गईं। आज जब कभी उन स्थानों की खुदाई की जाती है तो वहाँ से उन प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष मिलते रहते हैं। वे किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होते। यह उन सबकी विनाश लीला को दर्शाती है। आखिर कभी तो वहाँ इतना निर्माण हुआ होगा।
          विद्वानों का मानना है कि रेगिस्तान के स्थान पर नदियाँ अथवा समुद्र आ जाते हैं और समुद्रों अथवा नदियों के स्थान पर शहर बस जाते हैं। इसी प्रकार पर्वत धरती में बदल जाते हैं और पृथ्वी पहाड़ों अथवा टीलों में बदल जाती है। यह भी निर्माण और विनाश की ही कहानी कही जा सकती है। इसी तरह समुद्र से भी यदा कदा खोई वस्तुओं के अवशेष मिलते रहते हैं जिसके विषय में जानकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
            मनुष्य को सदा निर्माण कार्य करते रहना चाहिए जो देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए उपयोगी हों। उसे आतंकवादी तथा तोड़फोड़ की अन्य सभी गतिविधियों से यथासम्भव दूर हो रहना चाहिए। निर्माण सदा-सर्वदा श्रेयस्कर होता है और विनाश की ओर कदम बढ़ाना पतन का कारण बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 24 मई 2026

तन्हाइयॉं

'तन्हाइयाँ' मेरी पहली कविता है। इसे मैंने‌अक्टूबर 2014 में बंगलौर में लिखा था। मैं और सूद साहब प्रतिवर्ष बच्चों के पास अक्टूबर माह में बंगलौर जाया करते थे। एक दोपहर को वहॉं बैठे हुए उन लोगों के विषय में विचार आया जो इस दुनिया में बिल्कुल अकेले हैं या भरापूरा परिवार होते हुए भी अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं अथवा सामाजिक परिस्थतिवश निपट अकेले हैं।
        मैं कविता नहीं लिखती थी परन्तु मन में आए इन विचारों को सूत्र में पिरोने से स्वयं को रोक नहीं पाई। इसलिए इस विषय पर लिखे मेरे कुछ उदगार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। आशा है मेरी इस पहली कविता को पढ़कर सुधीजन अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे।
                  तन्हाइयाँ

मेरे पीछे-पीछे दबे पाँव अचानक कोई
घर में घुसने की कोशिश में शायद अब
जोर से दरवाजे की साँकल खटका रहा है
समझ नहीं पाई वह कौन हो सकता है?

उफ, अब तो उठकर जाना ही होगा मुझे
दरवाजा भी खोलना पड़ेगा न चाहते हुए
चलो, चलकर देखते हैं कौन है वहाँ पर?
क्यों मुझे वह अधीरता से पुकार रहा है?

उसकी बैचेनी का आखिर कारण क्या है?
उठती हूँ, बाहर जाती हूँ उसे देखने हेतु
सोचती हूँ कौन-सा मेहमान आया है यहाँ
यह क्या? द्वार खोलते ही एक अजनबी।

मुझे एकटक निहारती हुई यह कौन है?
अपनी दोनों बाहें फैलाए सामने से आती
मेरी ओर खुले मन से बढ़ती यह कौन है?
मैंने घर के द्वार पर खड़े ही उससॆ पूछा।

कौन हो तुम? मैं नहीं पहचानती तुम्हें
बड़ी जोर से हँसकर बोली थी मुझसे
मैं तेरी सखी हूँ, भूल गई हो क्या मुझे?
मैं तो हर पल ही तेरे साथ थी पगली।

कुछ दिन तेरे घर में चहल-पहल देख
दूर चली गई थी घूमने-फिरने के लिए
परन्तु अब तो मैं तेरे पास लौट आई हूँ
तुझे थामने औ प्यार से बचाने के लिए।

मैंने फिर उससे तमतमा कर पूछ लिया
यह बता दो मुझे तुम आखिर हो कौन?
मुझसे लिपटकर बड़े प्यार से बोली वो
मैं तेरी सखी हूँ, तेरी तन्हाई हूँ बावली।

तुझ से दूर रहकर जी नहीं सकती थी
इसीलिए तेरे पास आई हूँ अरी सखी
किसी साथी के न होने का यह गम 
नहीं सतायेगा तुझे अकेलापन उम्रभर।

मेरे साथ साँझे कर लो री सखी तुम
अपने सभी हसीन कमसिन से पल
सारी खुशी अपने सारे गम जानेमन
समेटकर अपने दिल में बसा ले मुझे।

तेरे आँगन में हरपल मैं इठलाऊँगी
घर में अन्दर-बाहर सदा-सर्वदा ही
चारों तरफ तुझे नजर आऊँगी सखी
प्रिये! अपना बना ले मुझे सोच मत।

अपनी यादों के झरोखों से तुम अब
मत निकालो मुझे घर से और दिल से
बहुत पछताओगी रोवोगी गिड़गिड़ोगी
अपने इस मन में बसा ले सदा के लिए।

उसका इतना कहना बहुत था मेरे लिए
उसे अपने मन में, अपने घर में बसाया
तो बसा ही लिया हमेशा-हमेशा के लिए
अब बस मैं हूँ और है मेरी मेरी तन्हाई।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 23 मई 2026

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता यानी आज का कार्य कल पर टालने की हमारी प्रवृत्ति के कारण ही हम कदम-कदम पर असफलता का मुँह देखते हैं। जिस कल की हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, वह कल तो कभी आता ही नहीं है। किसी कार्य को करने की योजना जब एक बार बना ली तो फिर इस आलस्य का कारण समझ में नहीं आता। दीर्घसूत्रता यानी काम को कल पर टालना केवल समय की बर्बादी नहीं है अपितु अपने सपनों और सफलता को जानबूझकर पीछे धकेलने की प्रक्रिया है।
             दीर्घसूत्रता या काम को टालने की आदत, सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसका अर्थ है महत्वपूर्ण कार्यों को बिना किसी ठोस कारण के भविष्य के लिए छोड़ देना। यह असफलता का मूल कारण है क्योंकि यह समय बर्बाद करती है, अवसरों को नष्ट करती है और व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करके दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधक बनती है। 
             सही समय पर निर्णय न लेने या कार्य न करने से अच्छे-अच्छे अवसर मनुष्य के हाथ से निकल जाते हैं। महत्वपूर्ण कार्यों को अन्तिम समय के लिए छोड़ने के कारण चिन्ता बढ़ती है। इससे कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जब कार्यों को बार-बार टालने की आदत बन जाती है तो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। 
          सन्त कबीरदास द्वारा रचित एक प्रसिद्ध दोहा है जो समय के महत्व और कार्यों को तुरंत पूरा करने की प्रेरणा देता है -
      कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
     पल में परलय  होएगी  बहुरि  करेगा कब॥
अर्थात् जिस कार्य को कल करना चाहते हो उसे आज ही कर लेना चाहिए। जिस कार्य को आज करना चाहते हो उसे अभी कर लेना चाहिए। पलभर में प्रलय आ जाती है यानि प्राकृतिक आपदा के आ जाने पर जब  विनाश हो जाएगा तब फिर वह सोचा हुआ कार्य कब कर सकोगे?
           दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भविष्य के लिए काम नहीं टालना चाहिए क्योंकि जीवन अनिश्चित है। 'पल में प्रलय' का अर्थ है कि कल कभी नहीं आता। इसलिए आज का काम शीघ्र ही अभी पूरा कर लेना चाहिए। हमें चेतावनी देते हुए कवि ने इस दोहे में समझाने का प्रयास किया है।
          'लोकानन्दम्' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव के विषय में कहा है-
      श्व:  कार्यमेतदिदमद्य  परं   मुहुर्ताद्।
      एतत् क्षणादिति जनेन विचिन्त्यमाने॥
      तिर्यग्निरीक्षणपिशङ्गितकालदण्ड:।
      शङ्के हसत्यसहन: कुपित: कृतान्त:॥
अर्थात् यह कल करूँगा, इसे आज ही थोड़ी देर बार करूँगा और इसे तो क्षणभर में कर लूँगा। लोगों को इस तरह विचार करते हुए देखकर मैं सोचता हूँ कि असहनशील क्रुद्ध यमराज हाथ में काल का दण्ड लिए हुए और कटाक्ष निरीक्षण करते हुए उन पर हंसते हैं।
           कवि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के जीवन का समय उसके पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार ईश्वर की ओर से मिलता है। हमारी नादानी या टालमटोल करने के स्वभाव के कारण हम लोग आजकल, आजकल करता रहते हैं और पल-पल करके उसका जीवन कम होता जा रहा है। मृत्यु का देवता मनुष्य की इस मूर्खता पर हंसता है।
            हम सभी मनुष्य अपने आलस्य के कारण कार्य अभी करते हैं क्या जल्दी है? प्रात:काल कर लेंगे, सायंकाल करेंगे अथवा कल कर लेंगे, बस यही करते हुए अपना अमूल्य समय नष्ट करते नहीं थकते। समय बीत जाने के बाद सिर धुनने का लाभ नहीं होता। कहते हैं- 
            का वर्षा या कृषि सुखाने।
अर्थात् जब फसल खराब हो गई तब वर्षा हो भी जाए तब उसका कोई लाभ नहीं अथवा बेकार हो जाती है। समय रहते यदि वर्षा हो जाती तो किसान का नुकसान न होता।
          बच्चा स्कूल में पढ़ता है तब वह वहाँ पढ़ाए गए पाठ को यदि प्रतिदिन दोहरा ले तो परीक्षा के समय उसे अतिरिक्त पढ़ाई करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। पर वह तो मस्ती करता रहता है। सोचता है अभी खेल लूँ या अभी टी. वी. देख लूँ या दोस्तों के साथ चैटिंग कर लूँ या थोड़ा घूम लूँ, फिर पढूँगा। ऐसा करते रहने पर पढ़ाई पिछड़ जाती है और परीक्षा के समय जब पुस्तक खोलता है तो उसे कुछ समझ नहीं आता।
          इसी प्रकार हम उत्साह से योजनाएँ बनाते रहते हैँ और आज क्रियान्वित करेंगे या कल कर लेंगे ऐसा सोचते रहते है और फिर रेस में पिछड़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। फिर जब हानि उठाते हैं तब फिर दूसरों को कोसते हैं।
          दीर्घसूत्री सदा ही अपनी इस आदत के कारण परेशान रहता है। बस पकड़नी हो या रेल या जहाज हर स्थान पर भागते हुए पहुँचता है और कभी-कभी उसकी बस, रेल या जहाज छूट भी जाते हैं। अपने कार्यस्थल पर देर से पहुँचकर वह बास की डाँट खाता है। शादी-ब्याह व पार्टियों में देर से पहुँचकर लोगों के कटाक्ष सहन करता है।
          अपनी दीर्घसूत्रता का त्याग करके यदि हम लोग समय पर बीज बो सकें तो कोई कारण नहीं कि हमें असफलता का मुँह देखना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 22 मई 2026

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, इस बात को हम सब जानते हैं। फिर भी जानते-बूझते हम अपने शत्रु स्वयं ही बन जाते हैं। दूषित खान-पान पाचन तन्त्र को कमजोर करता है जिससे भूख कम लगती है और पेट में भारीपन या असहजता महसूस होती है। दूषित भोजन में पोषक तत्व कम होते हैं जिससे शरीर कमजोर हो सकता है।
           प्रदूषित या दूषित खाना खाने से फूड पॉइजनिंग हो सकती है  जिसके मुख्य लक्षणों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन शामिल हैं। यह जीवाणुओं, वायरस, रसायनों या भारी धातुओं के कारण होता है जो गम्भीर मामलों में डायरिया, पाचन तन्त्र में खराबी, कैंसर और हार्मोनल असन्तुलन का कारण बन सकते हैं। सोचने वाली बात है कि कोई मनुष्य अपना दुश्मन खुद कैसे बन सकता है?
           कितनी विचित्र है यह बात किन्तु सत्य है। यदि गहनता से विचार कर लिया जाए तो शीशे की तरह सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगेगा। हम सभी अपनी मन और जिह्वा के गुलाम हैं। जहाँ मन को बैठे-बिठाए याद आ गया कि फलाँ पदार्थ खाना है, वहाँ हमारी जीभ उसके स्वाद को याद करके लपलपाने लगती है। हम बस शीघ्र ही उसे खाने के लिए उतावले हो जाते हैं। फिर हमारा मस्तिष्क आदेश देता है खाने चलो। तब हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि उसे खाकर हमारे शरीर को हानि तो नहीं होगी।
           एक छोटा-से उदाहरण से इसे स्पष्ट करते हैं। प्रतिदिन हम सभी के खान-पान में चीनी और नमक का एक अहं रोल होता है। इन दोनों का निश्चित मात्रा में प्रयोग होना चाहिए। जहाँ इनकी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई वहीं दोनों शरीर को नुकसान पहुँचाने लगते हैं। नमक की अधिकता हमारी किडनियों को प्रभावित करती है और हाई बी. पी. की सम्भावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार चीनी की अधिकता शूगर जैसी बिमारी को जन्म देती है। इसके अतिरिक्त इनसे शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। इसलिए इनके साथ-साथ और अनेक रोगों की चपेट में भी मनुष्य धीरे-धीरे आने लगता है। 
          जब भी कभी बन्धु-बान्धवों से चर्चा होती है तो हम यही कहते हैं कि हम तो कुछ भी फालतू या ऊल-जलूल खाते ही नहीं। वास्तविकता यह है कि हम पौष्टिक खाने से दिन-प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। जंक फूड, डिब्बाबन्द खाद्य और बासी खाना खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। यदि किसी बिमारी के कारण कभी डाक्टर कुछ परहेज बताते हैं तो भी उस पर अमल करना नहीं चाहते।
           खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक और ऊर्वरक अन्न को प्रदूषित कर रहे हैं। गोदामों में स्टोर किए गए अन्न के रख-रखाव के लिए भी कई प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है। कोल्ड स्टोर में रखे गए खाद्य पदार्थ भी हमारे शरीर के लिए निश्चित ही नुकसानदेह होते हैं। इन स्थितियों को अनदेखा किया जा रहा है।
        किसान के अधिक फसल पाने और कमाई करने की लालसा भी हानिप्रद है जो मानव शरीर के साथ खिलवाड़ कर रही है। पहले समय में जैविक खाद का प्रयोग किया जाता था जिससे बिमारियों का खतरा नहीं ही होता था। हानिकारक बैक्टीरिया और रसायन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते जा रहे हैं। 
            इसके अतिरिक्त हमारे रहन-सहन ने और भी बेड़ा गर्क किया हुआ है। हमारे आहार-विहार, सोने-जागने आदि के सारे गलत नियम 'एक करेला और दूसरा नीम चढ़ा' वाली उक्ति को चरितार्थ करने में देर नहीं कर रहे हैं। यदि दूषित खाना खाने के बाद लक्षण गम्भीर हों जैसे कि उच्च बुखार, गम्भीर निर्जलीकरण या मल में खून आए तो तुरन्त डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
          अपनी मूर्खता के कारण बड़े धड़ल्ले से वायुमण्डल को गाड़ियों, फैक्टरियों आदि के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। नदियों के अमृत रूपी जल को विष में बदल रहे हैं। पृथ्वी की मिट्टी आदि को हम जहरीला बना रहे हैं। शहर में पेड़ों और जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। प्रकृति को प्रदूषित करने का खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना पड़ेगा। इस प्रदूषण का मूल्य हम अनजाने में अपने स्वास्थ्य से चुका रहे हैं। फिर भी हम खुश हैं, यह मजे की बात है।
            सरकार को लानत भेजकर हम अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते। जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तब तक कुछ भी सुधार नहीं हो सकेगा। जब तक सरकार, सोशल मीडिया, समाचार पत्र, स्वयं सेवी संस्थाएँ और सबसे बढ़कर हम स्वयं जन-जागृति का कार्य नहीं करेंगे तब तक प्रदूषित खान-पान से हम लोगों की जिन्दगियों से खिलवाड़ होता रहेगा। फाइव स्टार और मल्टी स्पेशिलिटी अस्पताल आम जनता को मूर्ख बनाकर उनकी जेब काटते रहेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 21 मई 2026

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा जब हो जाती है तब उस समय मनुष्य स्वयं को असहाय अनुभव करने लगता है। उसकी उस स्थिति में अपने साथ नहीं निभा पाते अथवा निभाना नहीं चाहते। तब अपनों से बेज़ार होकर, वह सबसे कटकर अलग-थलग हो जाता है। रिश्तों को निभाने के उसके सभी प्रयास खोखले दिखाई देने लगते हैं।
         ‌   वास्तव में दुख एक मानसिक, शारीरिक अथवा भावनात्मक कष्ट की अवस्था है। दुख तब उत्पन्न होता है जब इच्छाऍं, अपेक्षाऍं या परिस्थितियॉं मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं। यह किसी महत्वपूर्ण हानि जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु का होना, किसी रिश्ते के टूटने या असफलता के कारण होने वाली एक प्राकृतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुःख मन की वह व्याकुलता है जो किसी हानि या प्रतिकूल परिस्थिति के कारण पैदा होती है। यह स्थिति व्यक्ति को व्यथित करती रहती है। 
           मनीषी कहते हैं कि ऐसे कठिन समय में जब अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है, तब मनुष्य अनहोनी के भय से कदम-कदम पर चौंकने लगता है। अपनों के प्यार-दुलार से ठुकराए जाते हुए मनुष्य को कहीं ठौर नहीं मिलता। ऐसे कष्ट के समय पति को अपनी पत्नी का और पत्नी को अपने पति का सहारा मिल जाए तो ईश्वर की बड़ी कृपा समझो। यदि उनके बच्चे माता अथवा पिता के दुख को समझने वाले हों और उन्हें सहारा देने वाले हों तो सोने पर सुहागे जैसी स्थिति बन जाती है। मनुष्य अपने दुखों से जूझने में एक हद तक सफल हो जाता है।
            दुख एक अस्थायी स्थिति है परन्तु इसे स्थायी मान लेने पर व्यक्ति बहुत अधिक दुखी हो जाता है। दुख केवल दुखद भावनाओं तक सीमित नहीं होता बल्कि इसमें शारीरिक पीड़ा, अवसाद, और मानसिक अशान्ति भी शामिल किया जा सकता है।
            अपने दुख के विषय में हर समय सोचते रहने पर मनुष्य को लगने लगता है कि उसके मनोमस्तिष्क पर उसके दुख की सोच हावी होती जा रही है। अधिक तनाव में आ जाने के कारण उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके मस्तिष्क की नसें फट जाएँगी। उस समय मनुष्य किसी को भी अपनी व्यथा कथा सुनाकर अपने मन को हल्का कर‌ लेना चाहता है।
            इसी भाव को पुष्ट करती हुई एक कहानी का स्मरण हो रहा है जो कभी स्कूल में पढ़ी थी। यह कथा अंग्रेजी भाषा की पुस्तक में थी। कहानी का या उसके लेखक का नाम भी याद नहीं। कहानी के नायक के दुख का कारण भी याद नहीं है। पर वह घटना मन को इतना छू गई थी कि यदा कदा याद आ जाती है कि एक इन्सान दूसरे इन्सान के प्रति इतना सम्वेदनाहीन कैसे हो सकता है?
            यह कहानी एक टाँगा चलाने वाले गरीब व्यक्ति की है। लोगों की नजर में जिसकी कोई कीमत नहीं होती। दिनभर उसके टाँगे पर सवारियाँ चढ़ती और उतरती रहती हैं। टॉंगे में बैठे सभी लोग अपनी किसी-न-किसी समस्या को डिस्कस करते रहते हैं। वह भी अपनी समझ के अनुसार उन्हें उत्तर देता रहता है। 
            उनकी बातें या समस्याएँ सुनकर वह भी अपनी परेशानी को उनसे बाँटना चाहता है किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई भी सवारी तैयार नहीं होती। कोई उसे गाली देता है तो कोई उसे झिड़ककर चुप करा देता है। हद तो तब होती है जब अपनी व्यथा सुनाने के कसूर में एक सवारी उसे लात मारकर चुप कराती है। मानो वह इन्सान नहीं या उसके मन को कष्ट नहीं होता। दिनभर वह अपने मन में अतीव कष्ट का अनुभव करता है।
            रात के समय घर जाकर घोड़े को बाँधता है और उसे खाने के लिए दाना देता है। उस समय वह अपने घोड़े के पास बैठ जाता है और अपने मन की भड़ास, अपनी व्यथ की कथा और दिन में अपने साथ होने वाले अत्याचार की कहानी अपने उस घोड़े को सुनाकर अपना मन हल्का करता है।
            इस कहानी के याद रह जाने का कारण है कि आज लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। अपना कष्ट सबको बड़ा लगता है। दूसरे का कष्ट उनकी दृष्टि में कुछ महत्त्व ही नहीं रखता। उनकी सम्वेदनाएँ मानो मरती जा रही हैं। कोई भी दूसरे की परेशानी को अथवा दुख को समझना ही नहीं चाहता। हाँ, दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए, नमक-मिर्च लगाकर चटखारे लेने के लिए लोग जानकारी जुटाने में महारत हासिल कर रहे हैं। इससे उनके झूठे अहं को शान्ति मिलती है। वे भूल जाते हैं कि यदि वे कष्ट में हों और दूसरे लोग उनके वैसा व्यवहार करेँगे तब उनकी स्थिति कैसी होगी?
           किसी के दुख में बेशक साझेदार न बनो पर उनसे सहानुभूति के दो बोल तो बोले जा सकते हैं। दूसरे के दुख पर मलहम लगाने वाला छोटा नहीं हो जाता बल्कि महान होता है। सुख और दुख शरीर के भोग हैं। वे पूर्वकृत कर्मानुसार हर मनुष्य के जीवन में आते हैं। अतः सुधी जनों से दूसरों के प्रति सहृदयतापूर्वक व्यवहार अपेक्षित है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 20 मई 2026

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि इस मानव शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक है। पाचक अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है और शेष सभी अग्नियों की तुलना में यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रुप से पेट और आंतों के बीच नाभि के आस पास रहती है। यह अग्नि अपनी गर्मी से बहुत जल्दी ही भोजन को पचा देती है। हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे यह अग्नि छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर उन्हें शरीर के अनुरूप बना देती है। फिर ये शरीर को पुष्ट करते हैं।
             इस अग्नि को विद्वान मनीषी जठराग्नि कहते हैं। यह अग्नि मनुष्य  को ओजस्वी बनाती है। उसके तेज से ही हम सबका चेहरा दमकता है। उसकी गरमी से ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है। सभी कामों को करने के लिए अग्नि का सन्तुलित अवस्था में होना बहुत आवश्यक होता है।
          यदि शरीर की यह अग्नि मन्द हो जाए यानी मन्दाग्नि हो जाए तब मनुष्य का शरीर रोगी होने लगता है। उस पर सर्दी का प्रकोप बार-बार होता है। मनुष्य का पाचनतन्त्र प्रभावित हो जाता है। तब उसे भोजन पचाने में भी असुविधा होती है। उसका लीवर प्रभावित हो जाता है। यह लीवर मानव शरीर में महत्त्वपूर्ण रोल निभाता है।
          यदि शरीर में अग्नि न हो तो मनुष्य के द्वारा किया गया भोजन पचेगा नहीं और शरीर में धातुऍं भी नहीं बनेंगी। आयुर्वेद में बताया गया है कि शरीर की जठराग्नि जब शान्त हो जाती है अर्थात् समाप्त हो जाती है तो मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। शरीर का तापमान भी इसी अग्नि द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के कुछ ही समय पश्चात ही मनुष्य शरीर एकदम ठण्डा हो जाता है।
            'सन्यासोपनिषद्' का कथन है कि-
     मय्यग्रेsग्नि गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन।
     मयि प्रज्ञां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्।।
अर्थात् मैं अपने सम्मुख अग्नि को क्षमा, तेज, बल और ओज के साथ ग्रहण करता हूँ।
            हम कह सकते हैं कि क्षमा, तेज, बल और ओज आदि सभी गुणों के साथ अग्नि को ग्रहण करना चाहिए। अग्नि के साथ अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ की जाए तो वह बच्चों तक को भी नहीं छोड़ती। सबको जलाकर राख कर देती है। मनुष्य भी क्रोध की अधिकता में सारी दुनिया को जलाकर राख कर देने का दावा करता है। दूसरों की हानि तो समय बीतते हो पाती है परन्तु अपने पैर पर वह कुल्हाड़ी अवश्य मार लेता है। 
          इसलिए मनुष्य से क्षमाशील होने की आशा की जाती है। दूसरों को क्षमा कर देने वाले तेजस्वी व्यक्ति संसार के अमूल्य रत्न होते हैं। उनका बल असहायों की रक्षा और सहायता करने के लिए होना चाहिए, उनका दमन करने वाला कदापि नहीं होना चाहिए।
            इस अग्नि के बल पर हम साहसी बने रहते हैं। इसके अभाव में मनुष्य का चेहरा तेजहीन दिखाई देता है। वह स्वयं को बलहीन अनुभव करता है। निर्बल व्यक्ति जरा-सी समस्या आने पर घबरा जाता है और उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं। उसे कम्पकपी छूटने लगती है। वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। उस समय अपने लिए सहारा खोजने लगता है और बहाने बनाने लगता है।
          जब तक मनुष्य स्वास्थ्य के नियमों का पालन करता रहता है तब तक उसके शरीर में ऊर्जा तत्त्व बना रहता है। शरीर में अग्नि ठीक तरह से अपना काम करती रहती है।
          जंगलों में जब आग यानी दावानल भड़कती है तब वह किसी से पक्षपात नहीं करती अपितु सभी प्रकार के हरे-भरे या ठूँठ हुए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों आदि सभी को जलाकर राख कर देती है। उसकी चपेट में आने से कोई मनुष्य अथवा कोई जीव नहीं बच सकता। सबको समान रूप से भस्मसात् कर देती है। घने जंगलों को पलभर में पलक झपकते ही राख के ढेर में बदल देती है।    
        इसी तरह समुद्र में लगने वाली आग यानी बड़वानल समुद्री जीवों को अपनी चपेट में लेती है। 'रघुवंशम्' महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने अग्नि के विषय में कहा है-
        पावकस्य महिमा स गणयते   
        कक्षवज्ज्वलति सागरेSपि य:॥   
अर्थात् अग्नि का यही महत्त्व गिना जाता है कि वह समुद्र में घास की तरह जलती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि समुद्र के पानी में लगने वाली अग्नि को बड़वानल कहते हैं जो वहाँ कभी भी, किसी भी स्थान पर जलने लगती है।
            यह अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसके बिना हम अपना भोजन सुपाच्य नहीं बना सकते। यह भी एक प्रकार से हमारी जीवनी शक्ति है। इससे छेड़छाड़ की जाए तो फिर यह बच्चे तक को क्षमा नहीं करती, सबको अपनी चपेट में ले लेती है। अत: सावधान रहना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 19 मई 2026

आत्मचिन्तन करना आवश्यक

आत्मचिन्तन करना आवश्यक 

मनुष्य को प्रतिदिन समय निकालकर आत्मचिन्तन करना चाहिए। आत्मचिन्तन का अर्थ है अपने विषय में विचार करना। यह मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। इसका यह अर्थ नहीं कर सकते कि मनुष्य केवल अपने लाभ के विषय में सोचता हुआ स्वार्थी बन जाए। अपनी अच्छाइयों और बुराइयों दोनों पर मथन करना ही इस कथन का उपयुक्त अर्थ होगा। 
          आत्मचिन्तन का हम यह अर्थ कर सकते हैं कि है अपने स्वयं के विचारों, भावनाओं, कार्यों और अनुभवों का गहराई से विश्लेषण और मूल्यॉंकन करना। बाहरी दुनिया से हटकर अन्तर्मुखी होकर, अपनी कमियों और खूबियों को समझकर, व्यक्तित्व में सुधार और आत्म-विकास करने की यह एक सचेत प्रक्रिया है।अपने कार्यों की समीक्षा करना कि वे सही थे या गलत। गलतियों से सीखकर उन्हें भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेना। 
          आत्ममन्थन करते समय अपने अन्तस् में विद्यमान बुराई को दूर करने का प्रयास ईमानदारी से करना चाहिए। उस बुराई को त्यागने का ढोंग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना तो स्वयं को धोखा देना कहलाएगा। इससे अपना हितसाधन नहीं होगा बल्कि हम स्वयं के शत्रु बन जाएँगे।
          'पद्मपुराण' में मर्हषि वेदव्यास हमें समझा रहे हैं कि-
       सर्वथा   प्रातरुत्थाय   पुरुषेण   सुचेतसा।
       कुशलाकुशलं स्वस्य चिन्तनीयं विवेकत:॥
अर्थात् बुद्धिमान को प्रात:काल उठकर विवेकपूर्वक अपने हित-अहित का विचार करना चाहिए।
दूसरे शब्दों में प्रतिदिन मनुष्य को गहन चिन्तन करना चाहिए। उसे अपने भले-बुरे का विचार करते हुए अपने हित के कार्य करने चाहिए।
           अपनी कमियों को दूर करते हुए अपनी अच्छाइयों को बढ़ाते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए धीरे-धीरे बुराइयों का त्याग करके मनुष्य अपनी आत्मोन्नति की यात्रा सुगमतापूर्वक तय करने लगता है। इस प्रकार जब उसे सही और गलत की पहचान हो जाती है तब वह गलत रास्ते पर चलकर अपने जीवन को कष्टमय होने से बचाकर स्वयं का मित्र बन जाता है।
          हमें किन-किन विषयों पर विवेचना करनी चाहिए? 'तन्त्रोपाख्यानम्' ग्रन्थ इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहता है कि अतीत का चिन्तन छोड़कर वर्तमान के बारे सोचना चाहिए-
नातिकान्तानि शोचेत प्रस्तुतान्यानगतानि चिन्त्यानि।
अर्थात् अतीत का चिन्तन नहीं करना चाहिए। जो प्रस्तुत है या समक्ष है वही चिन्तनीय है। 
          अपने अतीत की समृद्धि का बखान करते हुए मनुष्य को उसका गर्व नहीं करना चाहिए। साथ ही मद में निठल्ला होकर भी नहीं बैठ जाना चाहिए। इसी तरह अपनी पुरानी असफलताओं और मिले हुए कष्टों से व्यथित होकर मनुष्य को निराशावादी नहीं बन जाना चाहिए। ऐसे चिन्तन का कोई लाभ नहीं होता। इसलिए इसका त्याग करना चाहिए। अपना वर्तमान ही मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत होता है वही चिन्तनीय है।  
           'चाणक्यनीति:' में अन्यत्र आचार्य चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को किस-किस के विषय में चिन्तन करना चाहिए-
        क: काल: कानि मित्राणि 
             को देश: कौ व्ययाव्ययौ।
को वाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहु:॥         
अर्थात् कैसा समय है, कौन मित्र हैं, कैसा देश है, आय-व्यय कैसा है, वाहन कैसा है और मेरी शक्ति कैसी है, इस विषय पर पुन:पुन: चिन्तन करना चाहिए।
           मनुष्य यदि समय को पहचानकर उसके अनुरूप कार्य करता रहे तो उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। वह सदा सफलता के सोपानों को छू सकता है। उसे स्वयं ही ज्ञात हो जाएगा कि उसका सच्चा मित्र कौन है? और बरसाती मेंडकों की तरह टर्राने वाले मित्र कौन से है? तब वह अपने सच्चे मित्रों के साथ अपनी जीवन यात्रा का भरपूर आनन्द उठा सकता है और स्वार्थी मित्रों से अपनी रक्षा कर सकता है।
           मनुष्य अपने देश के विष्य में जानकारियाँ एकत्र करते हुए अपने आय और व्यय का सामंजस्य बिठा सकता है। इसी प्रकार वह अपने वाहन के रख-रखाव आदि पर नजर रखकर सुविधा का यथोचित लाभ ले सकता है। एवंविध अपनी शरीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों की परीक्षा करते हुए वह अपना इहलोक और परलोक सुधार सकता है।
           मनुष्य को चिन्तन आवश्य करना चाहिए पर केवल वर्तमान का। जो बीत चुका है उससे सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भविष्य में क्या होगा अथवा क्या नहीं? इस विषय में हम नहीं जानते। इसलिए उसके विषय में चिन्ता करना व्यर्थ है। अत: अपना वर्तमान सुधारने के लिए मनन करते हुए अथक परिश्रम करना चाहिए। तभी वह एक सफल मनुष्य बनकर समाज में मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद