शनिवार, 18 जुलाई 2026

बगुला भगत

बगुला भगत 

'बगुला भगत' एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है - कपटी व्यक्ति, झूठा इन्सान, ढोंगी मनुष्य, पाखण्डी आदमी, धूर्त या चालाक व्यक्ति। इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो बाहर से बहुत सीधे-सादे, धार्मिक और सज्जन दिखाई देते हैं परन्तु असल में वे बहुत चालाक, दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के होते हैं। बगुला भक्तों के लिए हमें प्रायः यह उक्ति सुनने को मिलती है-
              मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
        बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इन्सान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? 
         वास्तव में 'बगुला भगत' यह शब्द बगुला (पक्षी) के स्वभाव से लिया गया है। कहते हैं कि जब बगुला मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। 
          दूसरे शब्दों में बगुला पानी में एक टाँग पर खड़ा होकर ऐसा ध्यान लगाता है जैसे कोई बहुत बड़ा तपस्वी हो लेकिन मौका मिलते ही वह झट से मछली पर झपट्टा मार देता है। उन्हें अपना शिकार बना लेता है। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकतीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगती हैं। अब बगुले की तो मौज हो जाती है। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
         मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। केवल जौहरी ही स्वयं उसका मूल्य लगा सकता है।
          जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय वे ही भयभीत रहते हैं।
         कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
अर्थात् जिस प्रकार का अन्न मनुष्य खाता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। इसलिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का सभी दुरूपयोग ही करते हैं।
        मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम पर लाखों रुपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
         पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
          कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। उनका यह जप-तप सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं-     
    अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है, उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
         अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से सदा बचकर रहना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर मनुष्य सारे आडम्बर कर रहा है, वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर यदि डरकर अपनी ऑंखें बन्द कर लेता है तो बिल्ली वहॉं से भाग नहीं जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत  दुष्कर्मों का फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर वह कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है। अतः बगुला भक्त न बनकर मनुष्य को प्रभु का सच्चा भक्त बनना चाहिए।

हम मिलावटी युग में जी रहे

हम मिलावटी युग में जी रहे

समय परिवर्तनशील है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। कुछ दशकों पूर्व तक सभी प्राकृतिक संसाधन यानी जल, वायु सभी शुद्ध मिलते थे। उसी प्रकार सभी  खाद्यान्न भी शुद्ध मिलते थे। परन्तु आज की वास्तविकता यही है कि हम लोग मिलावट वाले युग में जी रहे हैं। जिस भी चीज में देखा जाए कुछ-न-कुछ मिला हुआ ही होता है। न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। हम लोगों को कोई भी खाद्य पदार्थ अपने शुद्ध रूप में नहीं मिल पाता जिनको पाना हम सबका अधिकार है। 
           हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे जीवन के साथ यह मिलावट का खेल चल रहा है। प्रायः टीवी और समाचार पत्रों ये खाद्यान्नों में मिलावट के समाचार सुर्खियाँ बनती रहती हैं। यूरिया आदि मिलाकर सिन्थेटिक दूध बनाना, मिलावटी खोया व पनीर बिकना, फलों और सब्जियों पर आर्टिफिशयल रंग करना व उनको आकार में बड़ा करने के लिए अथवा मिठास के लिए इन्जेकशन लगाना, काली मिर्च में पपीते के बीज डालना, चीनी में हड्डियों का चूरा, बहुत से खाद्य तेलों में जानवरों की चर्बी मिलना आदि।
       हम लोग फल और सब्जियों को इस उम्मीद में बाजार से खरीदकर लाते हैं कि वे स्वास्थ्यवर्धक हैं।पर बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि घर में सब्जियों को जब धोने लगो तो उन पर लगा अप्राकृतिक रंग निकलने लगता है। हैरानी की बात यह है कि फल खाने लगो तो एक ही फल का कुछ हिस्सा अजीब तरह से मीठा होता है और कुछ फीका। इन पर पता नहीं किसका लेप लगाते हैं जिसके कारण ये सब एकदम चमकते हुए और आकर्षक दिखाई देते हैं। उन्हें देखते ही खरीदने का मन कर जाता है।
          सुन्दरता में चार चाँद लगाने की सलाह देने वाले विज्ञापनों के अनुसार यदि उनका इस्तेमाल किया जाए तो उन सौन्दर्य प्रसाधनों में की गई मिलावट त्वचा को हानि पहुँचा रही है। इसी प्रकार कुछ समय पहले मैगी, कोक और टूथपेस्ट आदि में हानिकारक तत्त्वों की चर्चा टीवी और समाचार पत्रों में प्रमुखता से कवरेज दी गई।
         खेती में पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक आदि भी मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं। और तो और जल को फैक्टरियों का केमिकल युक्त वेस्ट और सीवर की गन्दगी दूषित कर रही है। वायु को हम पेड़ काटकर और गाड़ियों, एसी, फैक्टरियों के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। यानी कि प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है।इनके कारण कई रोग बढ़ते जा रहे हैं।
         ईश्वर ने हमें हर पदार्थ शुद्धरूप में दिया है परन्तु मुट्ठी भर स्वार्थी लोग अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण पूरे भारत देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसा कुकृत्य करते समय न उनका जमीर उन्हें कचोटता है और न ही उनके हाथ काँपते हैं। पता नहीं पर शायद ऐसे लोग मोटी चमड़ी के बन जाते हैं। इसीलिए उन लोगों पर कोई असर नहीं होता।
        आज स्थिति यह हो गई है कि न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। फल-सब्जियाँ तथा खाद्यान्न भी हमें पुष्ट नहीं करते। इस प्रकार अपनी मूर्खताओं के कारण हम अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं। समझ नहीं आता कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या खिला रहे हैं? हमारे बच्चे ऐसे मिलावटी पदार्थों को खाकर कैसे स्वस्थ रहेंगे?
          इन प्रदूषित खाद्यों का सेवन करके हम स्वयं ही अनेकानेक बिमारियों को न्योता देते जा रहे हैं। इसी कारण ही कुकुरमुत्ते की तरह मल्टीस्पेशैलिटी वाले हस्पलात नित्य प्रति खुलते जा रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। ये दुनिया भर के टेस्ट करवाते हैं फिर भी कोई गारण्टी नहीं कि इलाज सही हो सकेगा। कितने ही ऐसे उदाहरणों की चर्चा सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर होती रहती है।
        देश में कई प्रदेशों में टेस्टिंगलेब हैं जहाँ इन खाद्यान्नों के सैम्पल चैक किए जाते हैं। अब समस्या यही है कि यदि इन समाजविरोधियों को सजा मिल सके तो शायद इस समस्या से किसी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। केवल सरकार के आधे-अधूरे प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला। बस ऐसे ही ये खबरें सुर्खियाँ बटोरती रहेंगी और फिर सब टाँय-टाँय फिस्स होता रहेगा।
           सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों को भी आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा। जन साधारण के भी जागरूक रहने की बहुत आवश्यकता है। यदि आमजन इन अशुद्ध वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे तो शायद भविष्य में कुछ राहत मिलने की सम्भावना बन सकती है।
          यदि समय रहते हम न जागे तो पता नहीं हम सबके स्वास्थ्य का कितना और विनाश होगा और इस विनाशलीला के लिए किसी ओर को दोष नहीं दे सकेंगे, इसके जिम्मेदार हम खुद ही होंगे। यह हमारे लिए खतरे की घण्टी है। यदि शीघ्र ही कोई ठोस कदम न उठाया गया तो जनसाधारण के स्वास्थ्य की रक्षा किसी तरह नहीं की जा सकेगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

धर्म केवल ईश्वर तक पहुॅंचने का मार्ग

धर्म केवल ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग

इस संसार में जितने भी धर्म हैं वे केवल ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य यही है कि वह अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करे। मनीषियों का कथन है कि चौरासी लाख योनियों में अपने कृत पापकर्मों की सजा भुगतने के बाद जीव को यह मानुष तन मिलता है। इस मानव चोले के मिलने के पश्चात उसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। संसार के आकर्षणों में भ्रमित होकर उसे परमात्मा को भूलना नहीं चाहिए।
           कोई भी धर्म दंगा-फसाद करने की अनुमति नहीं देता। हर जीवन उपयोगी है। उसे धर्म के नाम पर अनावश्यक ही नष्ट नहीं करना चाहिए। ईश्वर इस बात की इजाजत कभी नहीं देता कि उसके बनाए हुए जीवों को कोई भी आततायी, किसी भी कारण से हानि पहुॅंचाए। 
            सभी धर्म परस्पर मिल-जुलकर रहने का आदेश देते हैं। वे परस्पर भाईचारे को प्रोत्साहित करते हैं। किसी व्यक्ति का धर्म क्या है? वह किस पद्धति से पूजा-अर्चना करता है? यह उस व्यक्ति विशेष का मानना व्यक्तिगत मामला है। साथ ही वह किस देवी-देवता की पूजा-अर्चना करे यह व्यक्ति विशेष की इच्छा पर निर्भर करता है। 
        कोई यदि जोर-जबरदस्ती करता है अथवा तलवार के बल पर या कोई लालच दिखाकर किसी का धर्म परिवर्तित कराना चाहता है तो यह सरासर गलत है। इसे हम अपराध की श्रेणी में रख सकते हैं। यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा दुष्कार्य करता हुआ पकड़ा जाए तो उसके लिए कानून में सजा का प्रावधान है।
         इसी आशय को साईं बाबा के अनुसार समझते हैं। उनका कथन है- 
        'मन्दिर में ज्योत, दरगाह में दीया, गुरुद्वारे में ज्योति और गिरिजाघर में मोमबत्ती जलाते हैं। मगर लौ सबकी एक जैसी होती है। इससे पता चलता है कि सबका मालिक एक है।' 
            इस कथन का अभिप्राय यही है कि हर धार्मिक स्थान पर पूजा करते समय प्रकाश किया जाता है। यानी प्रकाश का महत्त्व है। उन सबका ईश्वर की उपासना का तरीका चाहे अलग-अलग है किन्तु अर्थ एक ही है। 
          सभी धर्म यद्यपि एक ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। जैसे विश्व के किसी भी कोने से हम अपने घर पर पहुँच सकते हैं। किसी भी स्थान से घर आने के लिए हम अलग-अलग रास्ता पकड़ सकते हैं। हमारा लक्ष्य मात्र अपने घर पहुँचना होता है। चाहे कितनी भी कठिनाई मार्ग में आए अथवा कितने ही कटु अनुभवों से हमें दो-चार होना पड़े, अन्तत: हम अपने घर पहुँच ही जाते हैं। हम घर पर पहुँचकर ही सन्तुष्टि का अनुभव करते हैं। इसीलिए छज्जू महाराज जी ने कहा था -
       जो सुख छज्जू दे चौबारे न बलख न बुखारे।
अर्थात् अपना घर चाहे महल न हो, टूटा-फूटा हो या झोंपड़ी हो, सुख वहीं पर आकर मिलता है। कितने ही फाइव स्टार होटलों में रह लिया जाए अथवा किसी धनी मित्र के घर आवभगत करवा ली जाए पर भगवान श्रीकृष्ण से महल में अपनी सेवा करवाने वाले सुदामा की तरह अपनी झोंपड़ी का मोह नहीं छूटता। सदा अपना वही बसेरा ही मनुष्य को सुखदायी लगता है।
          यह संसार एक रैन बसेरा है। हम चाहें अथवा न चाहें इसे निश्चित अवधि के पश्चात छोड़कर जाना पड़ता है। हमारा वास्तविक घर प्रभु की शरणस्थली है। वहीं जाकर हमें सच्चा सुख मिलता है। इस दुनिया के बाजार में तो बस हम मौज-मस्ती करने आते हैं। काम निपटाकर फिर अपने घर चले जाते हैं।
          उस प्रभु तक पहुँचने का मार्ग संसार के सारे धर्म बताते हैं। जिस प्रकार एक मनुष्य को बेटा, भाई, भतीजा, पिता, पति, मामा, चाचा, ताया, फूफा, मित्र आदि अनेक नामों से बुलाते हैं, उसी प्रकार परमपिता परमात्मा को भी हम विभिन्न नामों से पुकारते हैं। इसके लिए झगड़ा करना अथवा  एक-दूसरे को नीचा दिखाना उचित नहीं है। न ही इसे विवाद का विषय बनाना चाहिए।
          अब बात आती है कि ईश्वर की पूजा किस रूप में की जाए। उसकी पूजा चाहे निराकार रूप में की जाए या साकार रूप में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मूर्ति पूजा प्रारम्भिक स्टेज होती है जिस पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। बाद में धीरे-धीरे मूर्ति भी छूट जाती है और निराकार ईश्वर केवल प्रकाश के रूप में ही दिखाई देने लगता है। उस प्रभु का यह प्रकाश हमारे इन भौतिक चक्षुओं से नहीं दिखाई देता। वह केवल हमारे आभ्यन्तरिक चक्षुओं से दिखाई देता है।
           ईश्वर की आराधना किसी भी धर्म के अनुसार मनुष्य कर सकता है। जब वह अपनी भक्ति में आगे बढ़ जाता है तो फिर उसे किसी भी चिह्न की आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय उसे अपने अन्तस् में केवल प्रकाश ही दिखाई देता है। यानी सभी धर्मावलम्बियों को ईश्वर का दिव्य स्वरूप प्रकाश के रूप में दृष्टिगोचर होता है। शेष सब पीछे छूट जाता है।
          सभी धर्म इसी अलौकिक प्रकाश की ओर ले जाते हैं। यानी सभी धर्मो की अन्तिम परिणति एक ही है। हमारे आदीग्रन्थ वेद भी यही कहते हैं।                तमसो मा ज्योतिर्गमय
अर्थात् हे ईश्वर! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

आत्मामुग्ध व्यक्ति

आत्ममुग्ध व्यक्ति 

हम सभी आत्ममुग्ध रहते हैं। हम केवल अपने बारे में बात करना चाहते हैं, अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं। जरा-सी आलोचना को हम सहन नहीं कर पाते। उस समय हमारा मन करता है कि इस आलोचक को काले पानी भेज दें अथवा उसका वो हाल करें कि जिन्दगी भर याद रखे, वह उसे भूल न पाए। सोचना अलग बात होती है किन्तु उस पर आचरण करना अलग बात।
           आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी ही परछाई, रूप, प्रतिभा या व्यक्तित्व पर अत्यधिक मुग्ध रहता है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। वे सदैव अपनी आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखते हैं। दूसरों से हमेशा अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं। दूसरों की भावनाओं या तकलीफों की उन्हें बिल्कुल भी परवाह न होती। वे अपनी छोटी-सी आलोचना या असहमति होने पर भड़क उठते हैं। उनका यह मानना होता है कि विशेष व्यवहार पाना उनका अधिकार है।
           महात्मा बुद्ध ने इसीलिए किसी समय यह कहा था, 'आप पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी ऐसा व्यक्ति खोज लें जो आपको आपसे ज्यादा प्यार करता हो, आप पाएँगे कि जितना प्यार आप खुद से कर सकते हैं उतना कोई आपसे नहीं कर सकता।'
          जब हम खुश होते हैं तब यदि गहराई से विचार करते हुए अपने अन्तस् को टटोलें तो पता चलेगा कि जिस वस्तु ने हमें परेशान किया हुआ था, वह हमें खुशियाँ दे रही है। इसके विपरीत जब हम दुखी होते हैं तब मनन करने पर पता चलता है कि वस्तुत: जिसके लिए हम व्यथित हो रहे थे, वही हमारी प्रसन्नता का कारण है। 
          अपनी खुशियों को ग्रहण लगाना उचित नहीं है। यदि हम सभी अपने भीतर विद्यमान क्रोध को हवा दते रहेंगे तो हम स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इस क्रोध से बड़ा मनुष्य का कोई और शत्रु नहीं है। वह मनुष्य के विवेक पर प्रहार करके उसे कुण्ठित करता है। क्रोध करना ऐसा है मानो एक गर्म कोयले को उठाकर किसी दूसरे पर फैंक दिया गया हो। दूसरे को तो वह बाद में जलाएगा लेकिन पहले तो वह आपना ही हाथ जलाएगा।
          क्रोधी व्यक्ति को कोई दण्ड दे या न दे परन्तु उसका क्रोध स्वयं ही उसे सबसे अलग करके दण्ड दे देता है। अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। इसीलिए अनावश्यक क्रोध करने वाले से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं होता कि वे कब अनर्गल प्रलाप करते हुए सामने वाले का अपमान करने लगें। 
         जब तक मनुष्य जीवित है और वह साँस ले रहा है तब तक कदम-कदम पर उसे टकराव मिलता रहेगा, विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि मनुष्य अपना आपा खोने लगे। ऐसा करके वह अनजाने में अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करता है। पीठ पीछे जो बोलते है उन्हें बोलने देना चाहिए। यदि कोई सामने बुराई करे तो उस पर विचार अवश्य करना चाहिए।
           जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा छिपाए नहीं छिप सकते, उसी तरह सत्य भी बहुत समय तक छिपाकर नहीं रखा जा सकता। जब सच्चाई सामने आती है तो वे झूठे लोग बगलें झाँकने लगते हैं। यदि मनुष्य सही रास्ते पर चल रहा है तो लोगों से देर-सवेर सम्मान और लगाव मिलता रहता है। यही उसकी पूँजी होती है।
          इस क्रोध से मुक्ति पाना बहुत सरल है। इन्सान अपने हृदय में यदि शान्त रहने का अभ्यास कर ले तो इसे वश में किया जा सकता है अन्यथा दुर्वासा ऋषि की तरह कभी सम्मान नहीं पाता। शान्ति का वास हमारे अपने हृदय में होता है, उसे तीर्थों, जंगलों या तथाकथित गुरुओं के पास जाकर तलाशने का कोई लाभ नहीं होता। इसे बाहर ढूँढने से केवल धन और समय की बर्बादी होती है। फिर मन अशान्त हो जाता है।
           हमारे अतिरिक्त हमें कोई और इस क्रोध रूपी शत्रु से नहीं बचा सकता। हमें अपने सही रास्ते का चुनाव करके स्वयं ही उस पर चलना पड़ता है। जबरदस्ती हाथ पकड़कर व्यक्ति को कोई दूसरा नहीं चला सकता।
          जो बीत गया उसके बारे में अधिक नहीं सोचना चाहिए और न ही पिष्टपेषण करते हुए अनावश्यक क्रोध करना चाहिए। भविष्य के गर्भ मे क्या है? उसके विषय में सोचते हुए सुनहरे सपने नहीं देखने चाहिए। यदि किसी भी कारणवश वे सपने पूरे न हो सकें तो फिर मनुष्य को अपनी क्षमताओं पर क्रोध आने लगता है। केवल वर्तमान हमारा अपना है, उसी पर ध्यान केन्द्रित करके आगे बढ़ते रहना चाहिए।
           आत्मकेन्द्रित बनकर सदा अपनी कमियों का सुधार करना चाहिए। अपने दोषों को इंगित करने वालों पर क्रोध न करके उनसे मिलने वाले प्रहारों से स्वयं को बचाते हुए जीवन की कठिन डगर पर बढ़ते रहना बुद्धिमानी होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 15 जुलाई 2026

अपने हित के लिए रास्ता निकालना

अपने हित के लिए रास्ता निकालना 

बुद्धिमान व्यक्ति हर स्थिति में अपने हित के लिए रास्ता निकाल लेता है। मनीषियों का कथन है कि किसी से बदला लेने के स्थान पर सदा बदलाव लाने पर विचार करना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से देना कोई महानता का कार्य नहीं होता। दूसरे को शय देना अथवा उससे डरकर जीवन जीना एक नकारात्मक तरीका कहलाता है। इससे बचना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।
           जीवन को व्यहारिकता से चलने वाला मनुष्य कभी जीवन की रेस में पिछड़ता नहीं है। समझदारी इसी में है कि यदि कोई ईंट फैंके तो उसका जवाब पत्थर से न दिया जाए। उस व्यर्थ जाती हुई ईंट को नष्ट न करके उससे अपना घर बना लेना चाहिए। इस प्रकार शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को मुँहतोड़ उत्तर देना ही बुद्धिमत्ता की निशानी होती है। यह सकारात्मक तरीका है जिससे अपनी मानसिक शान्ति भंग नहीं होती और दूसरे को भी मुँह की खानी पड़ जाती है।
          मनुष्य का भाग्य बड़ा ही प्रबल होता है। जब  किस्मत के सिक्के को हवा में उछला जाता है तभी तक हार-जीत का अनुमान लगाए जाता है। जब वह नीचे जमीन पर आकर गिर जाता है तब उसके भाग्य का फैसला सुना दिया जाता है कि वह हार गया है या जीत उसकी झोली में आई है।
          हम लोग अपने कर्मों के द्वारा अपना भाग्य लिखते हैं। यहाँ हम कागज और पत्थर के नसीब की चर्चा करते हैं। वही कागज होता है जिस पर हम लिखते हैं और कुछ समय पश्चात उसकी पुड़िया बनाकर उसमें सामान बेचा जाता है। लोग उस सामान का उपयोग करके उसे कूड़ेदान में फैंक देते हैं। दूसरी ओर उसी कागज पर हमारे धर्म ग्रन्थ लिखे जाते हैं जिन्हें लोग अपने सिर माथे पर रखते हैं, उनका नित्य पाठ करके उनकी पूजा करते हैं। उसके पश्चात उसे सुन्दर से वस्त्र में लपेटकर सम्हाल देते हैं।
          इसी तरह सड़क पर पड़े हुए पत्थर सबके पाँव से ठोकर खाते रहते हैं। लोग उसे अपने पैर से ठोकर मारकर एक किनारे कर देते हैं। इसके विपरीत कुछ भाग्यशाली पत्थर ऐसे होते हैं जिन्हें सुघड़ हाथों से तराशकर भगवान की मूर्ति बनाई जाती है। उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है। लोग प्रात:काल और सायंकाल वहॉं आकर उस मूर्ति की पूजा करते हैं।
           मनुष्य को हर परिस्थिति में अपना आत्मसम्मान बचाकर रखना चाहिए। उसे कुचलकर वह निर्जीव जैसा हो जाता है। सहनशीलता रूपी बहुमूल्य गुण का उसे पालन करना चाहिए। निसन्देह महात्मा बुद्ध आदि महापुरुषों की तरह सहनशीलता के अस्त्र से किसी को भी परास्त किया जा सकता है। सबका यथायोग्य सम्मान करना चाहिए परन्तु आत्मसम्मान की शर्त पर कभी नहीं। इसलिए सम्मानपूर्वक जीवन जीकर अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाना हर व्यक्ति के लिए बहुत आवश्यक होता है। अतः अपने आत्माभिमान को कभी दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
          जितनी खुशियाँ मनुष्य जीवन पथ पर चलते हुए बाँटता जाता है उतना ही उसका कद बढ़ता रहता है। एक मोमबत्ती से हजारों मोमबत्तियों को जलाया जा सकता है, फिर भी उसके प्रकाश में कहीं कोई कमी नहीं आती। उसी तरह दूसरों को खुशियाँ बाँटने वाले मनुष्य की खुशियाँ भी कभी कम नहीं होतीं बल्कि मोमबत्ती के प्रकाश की तरह बढ़ती रहती हैं। अपने पास आने वाले सभी लोगों को वह आनन्दित करता रहता हैं।
          महत्त्व इस बात का नहीं होता कि मोमबत्ती अमीर व्यक्ति के महल में जल रही है अथवा किसी गरीब व्यक्ति की झोंपड़ी में जल रही है। उसकी सार्थकता मात्र उसके प्रकाशित होने में होती है, अन्धेरे से मुक्ति दिलाने में होती है। इसी प्रकार मनुष्य के खुशनुमा व्यवहार की चर्चा हमेशा करनी चाहिए। उसकी जाति, रंग रूप आदि अन्य बातों को नजरंदाज कर देना चाहिए।
          किसी भी कीमत पर इस जीवन के मूल उद्देश्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए। संसार में स्वाभिमान के साथ सहनशील रहकर अपने चारों ओर खुशियाँ बिखेरने वाला ही वातावरण को सुगन्धित कर सकता है। अपने लिए, अपने घर-परिवार और अपने बन्धु-बान्धवों के लिए तो सभी जी लेते हैं। इसीलिए वास्तव में जो दूसरों के लिए जीता है, उसी को इन्सान कहते हैं और वही महान होता है। उसका यश चारों दिशाओं में फैलता है। लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

उस मनुष्य से बढ़कर इस संसार में बड़भागी अथवा सौभाग्यशाली व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता जिसके घर पर बन्धु-बान्धवों अथवा आगन्तुकों की चहल-पहल रहती है। मनुष्य वही बड़ा होता है जिसके द्वार पर कोई सहायता माँगने के लिए आता है। उसे अपने ऊपर मान होना चाहिए पर घमण्ड नहीं कि उसे किसी ने इस योग्य समझा कि उसके पास आकर वह अपनी समस्या का वह निदान कर सकता है।
          कोई भी व्यक्ति किसी के पास बहुत आशा लेकर आता है। कोई मनुष्य किसी के पास तीन कारणों से आता है- भाववश, अभाववश अथवा प्रभाववश।
           व्यक्ति यदि सच्चे मन से किसी भावना से आया है तो उसे उस समय प्रेम की आवश्यकता होती। इसलिए उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हो सकता है वह अपनी मूर्खता से या अपनी किसी मजबूरी के कारण समाज से कटकर अलग-थलग पड़ गया हो। उसे अनचाहे अवसाद के समय शायद किसी अपने के भावनात्मक सहारे की जरूरत हो। यदि मनुष्य ऐसा कर सके तो वह व्यक्ति उस सहारा देने वाले का सदा के लिए अपना बन जाता है।
          समय और परिस्थितियों के कारण कोई अभावग्रस्त व्यक्ति किसी पास जाता है तो यथासम्भव उसकी मदद अवश्य ही करनी चाहिए। उसे इन्कार करके निराश नहीं करना चाहिए। पता नहीं वह व्यक्ति कितना मजबूर होगा जो अपने जमीर को मारकर सामने वाले से सहायता माँगने आया है। कबीरदास जी कहते हैं-  
       मॉंगन गये सो मर रहे, मरै जु मॉंगन जाहि।
        तिनते पहिले वे मरे, होत करत है नाहि।।
अर्थात् यदि कोई किसी से कुछ मॉंगने जाता है तो समझ लो कि वह मर गया। परन्तु उसके पहले वह व्यक्ति मर चुका होता है जो दान देने की स्थिति में होकर भी देने से इन्कार कर देता है।
            रहीमदास का यह दोहा द्रष्टव्य है, इसमें उन्होंने ने भी इसी भाव को व्यक्त किया है -
     रहिमन वे नर मर चुके, जो कहुॅं मॉंगने जाहिं।
     उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि जो मॉंगने जाते हैं, वे मरे हुए के समान होते हैं। परन्तु उनसे पहले वे मर जाते हैं जो होते हुए भी न कह देते हैं।
         इसलिए अपने पास आए उस मजबूर व्यक्ति की आशा को निराशा में न बदलते हुए एक अच्छे सामाजिक इन्सान होने का परिचय देना चाहिए। इसी प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते रहने से संसार के सभी व्यवहार चलते हैं। समृद्ध व्यक्ति की सहायता कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। वहाँ तो इस प्रकार के लेनदेन का व्यापार होता ही रहता है।
            यदि किसी प्रभावशाली के पास कोई मनुष्य उसके प्रभाव के कारण से आया है तो इस बात के लिए प्रसन्न होना चाहिए कि परमात्मा ने उसे इतनी सामर्थ्य दी है कि वह किसी के काम आ सकता है। ऐसी स्थिति में किसी की सहायता करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसे अपना सौभाग्य ही समझना चाहिए कि सारा शहर छोड़कर वह व्यक्ति आपके पास आया है किसी और के पास नहीं गया। उसे आपसे कुछ अच्छाई की उम्मीद होगी, तभी तो आपकी शरण में सहायता लेने आया है।
          इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किस्मत की एक आदत है कि वो पलटती जरुर है और जब पलटती है तब सब कुछ उलट-पलट करके रख देती है। जीवन में ऐसी विपरीत स्थिति किसी भी व्यक्ति की हो सकती है। इसलिए अच्छा समय आने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और कष्टदायी समय में धैर्य रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके अपनी उन्नति के समय अपने हाथों से कुछ ऐसे काम कर लेने चाहिए जिससे मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सके।
          दूसरा व्यक्ति किसी के पास चाहे भाव के कारण, अभाव से त्रस्त होकर अथवा रुतबे से प्रभावित होकर आया है, यानी किसी भी परिस्थिति के वशीभूत होकर आया है, उसे निराश नहीं करना चाहिए। समय पर उसके सिर हाथ रख देने से वह कृतज्ञ होकर उसका मुरीद बन जाता है। इस प्रकार मनुष्य के हितचिन्तकों की संख्या बढ़ती रहती है। मनुष्य की पहचान उसके बन्धु-बान्धवों और मित्रों से होती है। वे उसके अपने बन गए तो मानो वह जिन्दगी की जंग जीत गया अन्यथा कुचलने के लिए तो जमाना तैयार ही बैठा हुआ है।
          बस शर्त एक ही है कि मनुष्य को किसी की सहायता करने का घमण्ड नहीं करना चाहिए, उसे केवल अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। उसे अपने किए गए परोपकार के कार्यों को यहाँ वहाँ गाते नहीं फिरना चाहिए। ऐसा करने से सम्मान के स्थान पर उसे लोगों की अपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
          मनुष्य को सदा इस बात के लिए परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने इस संसार में भेजकर उसे इस योग्य बनाया है कि वह किसी दूसरे के काम आ रहा है।      
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

धन्य है आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता

धन्य हैं आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता  

धन्य हैं वे माता-पिता जिनकी आज्ञाकारी सन्तान आजन्म उनका मान-सत्कार करती है। ईश्वर के तुल्य समझते हुए जिन्दगी के हर मोड़ पर मन से उनकी देखभाल करती है, बिना कहे उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। कभी उनके मन में यह विचार तक नहीं आने देती कि उनके माता-पिता यह सोचने पर विवश हो जाएँ कि काश यह हमारी सन्तान न होती। ऐसी सुयोग्य सन्तान पर हर माता-पिता को बहुत गर्व का अनुभव होता है।
           अपने बच्चों से बढ़कर माता-पिता के लिए और कोई नहीं होता। वे उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बना हुआ देखना चाहते हैं। वे यह भी कामना करते हैं कि उनके बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में एक सफल व्यक्ति बनें। दुनिया की सारी नेमते उनके कदमों में हो, किसी प्रकार का कोई अभाव अथवा परेशानी उनके पास फटकने भी न पाए। बच्चे का भविष्य बनाने के लिए वे सभी तरह के कष्ट हंसते हुए झेल लेते हैं।
           वाट्सअप पर यह बोधकथा पढ़ी थी। मुझे अच्छी लगी। सबके साथ इसे साझा करने की इच्छा हुई। कुछ संशोधनों के साथ आपके समक्ष यह कथा प्रस्तुत है। 
           सभी माता-पिता की तरह एक पिता ने भी अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की, उसे खूब पढ़ाया, लिखाया व उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा किया। पुत्र सफल इन्सान बनकर एक मल्टी नेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्य करने लगा। कम्पनी की ओर से उसे उच्च पद के साथ-साथ अच्छा वेतन व सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की गईं। 
          समय बीतते उसका विवाह एक सुन्दर व सुघड़ कन्या से हुआ। उसके घर एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। समय बीतते पिता भी बूढ़ा हो गया। बूढ़े पिता को एक दिन पुत्र से मिलने की उत्कट इच्छा हुई। वह उससे मिलने शहर उसके ऑफिस में गया। वहाँ पुत्र का शानदार ऑफिस देख पिता का सीना गर्व से फूल गया। उसके मातहत सैंकड़ों कर्मचारी कार्य कर रहे थे। 
            उसके चैम्बर में जाकर पीछे से उसके कन्धे पर हाथ रखकर प्यार से पुत्र से पूछा, "इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
            पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए यह कहा, "मेरे आलावा कौन हो सकता है?" 
           पिता पुत्र के उत्तर से निराश हो गया। उसे यह विश्वास था कि बेटा गर्व से कहेगा, "सबसे भाग्यशाली इन्सान आप है जिन्होंने मुझे योग्य बनाया।"
           उसकी आँखे छलछला गईं। दफ्तर से बाहर निकलने से पहले पुनः उन्होंने पीछे मुड़कर बेटे से पूछा, "बताओ  इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
          पुत्र ने इस बार अपने पिता से बार कहा, "पिताजी, वह तो आप हैं।"
          पिता आश्चर्यचकित हो गया और उसने पुत्र से‌ कहा, "अभी तो तुम स्वयं को इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान बता रहे थे।"
         पुत्र ने हंसते हुए कहा, "पिताजी उस समय आपका हाथ मेरे कन्धे पर था। जिस पुत्र के कन्धे पर या सिर पर पिता का वरद हस्त होता है, वह पुत्र दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है।" 
       ‌  पिता की आँखे नम हो आईं, उसने अपने पुत्र को गले लग लिया।
          सच बात है यह कि जिसके कन्धे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है वह इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है। पिता का वरद हस्त उसी इन्सान के सिर पर हो सकता है जो माता-पिता का आज्ञाकारी बच्चा होता है। जिसे उनकी परवाह होती है और उनके सुख-दुख का ध्यान रखता है। उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा का मान रखता है। तभी वह उनका आशीर्वाद भी पाने का अधिकारी बन पाता है।
         इसके विपरीत अपने माता-पिता का जो सन्तान वृद्धावस्था में बिल्कुल ध्यान नहीं रखती, उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना देती है, उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देती है, ऐसी सन्तान को न तो ईश्वर कभी क्षमा करता है और न ही घर-परिवार, बन्धु-बान्धवअथवा समाज। ऐसे नालायक बच्चों के लिए दुखी होकर माता-पिता के मुँह से यही बात निकलती है कि 'काश ये पैदा होते ही मर जाते।'
          भगवान श्रीराम और श्रवण कुमार जैसी पितृभक्त सन्तानों को ही संसार युगों-युगों तक स्मरण करता है और उनके उदाहरण दिए जाते हैं। ऐसे बच्चे सबकी ईर्ष्या का भाजन बनते हैं। यही समाज व देश की धरोहर होते हैं। माता-पिता के साथ सभी लोग उन पर मान करते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद