मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह


किसी के दिल में जगह बना लेना बहुत ही आसान होता है। दूसरे के मन को मोह लेने की सबसे पहली शर्त होती है विनम्रता। मन में यदि स्वार्थ, दिखावा या छल-फरेब न हो तो किसी को भी अपना बनाया जा सकता है। विनम्र व्यक्ति अपने सरल व सहज व्यवहार से सबको अपना बना लेता है और सबका प्रिय बन जाता है। विनम्र हृदय वाले लोग अधिक आकर्षक और विश्वसनीय होते हैं जो सदा मजबूत सम्बन्ध बनाते हैं।

            विनम्रता दूसरों के दिलों में जगह बनाने का सबसे अनमोल गुण है जो अहंकार को त्यागकर रिश्तों में सौहार्द्र और सम्मान लाता है। यह व्यवहार में नरमी, वाणी में मिठास और दूसरों के विचारों का सम्मान करने से आती है। इस तरह करने से मनुष्य न केवल दूसरों का विश्वास जीतता है बल्कि अपनी महानता भी स्थापित करते हैं। विनम्रता का अर्थ झुकना नहीं होता अपितु अपने अहंकार को त्यागकर दूसरों के प्रति सम्मान दिखाना होता है। विनम्र वाणी और व्यवहार से लोग जुड़ते हैं और रिश्तों में दरार नहीं आती।

             किसी दूसरे के दिल में उतरने के लिए अपने रिश्तों में विश्वास और सच्चाई का होना आवश्यक होता है। अपने प्रिय जन के रंग में रंग जाना ही अपनेपन की सीढ़ी है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरे को उसी रूप में अपना लेना होता है जैसा वह है। उसकी अच्छाइयों को बढ़ाते हुए कमियों को अनदेखा कर देना चाहिए। तभी सम्बन्ध दूर तक साथ निभाते हैं। यह दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायता करती है और जीवन में शान्ति लाती है। 

            यदि किसी व्यक्ति की कमियों को लेकर सदा उसे कोसते रहेंगे, उस पर टीका-टिप्पणी करते रहेंगे तो सम्बन्ध कितने भी प्रगाढ़ रहे हों, टूटकर बिखर जाते हैं। व्यक्ति विशेष की कमियों को अपनी अच्छाई से दूर करने का यत्न करना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करना चाहिए।‌ हमेशा यही सोचना चाहिए कि कोई भी इन्सान सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। यदि वह पूर्ण हो जाएगा तब वह मनुष्य नहीं रह जाएगा अपितु ईश्वर तुल्य होकर हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।

            मनुष्य जब विनत होता है तब उसमें सबको मन्त्र मुग्ध करने की सामर्थ्य होती है। लोहे जैसी कठोर धातु जब नरम हो जाती है तो उससे मनचाहे पदार्थ बनाए जा सकते हैं। इसी तरह सोने जैसी ठोस धातु को अग्नि में पिघलाकर जब नरम कर देते हैं तब उससे मनभावन आभूषण बनाए जाते हैं। उन आभूषणों को पहनकर सभी इतराते फिरते हैं। उसी प्रकार अगर इन्सान भी नरम हो जाए तो उसके हृदय से कठोरता अथवा निर्दयता के भाव तिरोहित हो जाते हैं और वह मोम की तरह कोमल बन जाता है। वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है। वह हर व्यक्ति का प्रिय बन जाता है और फिर किसी के लिए भी पराया नहीं रह जाता।

          इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को महत्त्व देते हैं, थोड़े समय पश्चात उनका असली  चेहरा सबके सामने आ जाता है। लोग उनसे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। उन्हें पराया बनाने में वे समय नष्ट नहीं करते। अपनी इन्हीं गलतियों से मनुष्य दूसरों से कटकर अकेला हो जाता है। जहाँ तक हित साधने की बात है, वह तो स्वयं ही हो जाता है। इसके लिए छल-फरेब का सहारा लेने की कदापि आवश्यकता नहीं होती।

          कठोर मिट्टी पर हल चलाकर किसान उसे नरम बना देता है। तब वह खेत बन जाती है और उसमें विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। ये अनाज सभी जीवों का पेट भरते हैं। यही धरती की विशेषता है कि उसे हम सबकी चिन्ता रहती है। यदि वह स्वार्थी हो जाए तब उसके लिए अपनी जान गंवा देने हेतु कोई भी रणबाँकुरा आगे नहीं आएगा। उस समय इस जीव जगत में चहुॅं ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी।

          गेहूँ को पीसकर जब नरम आटा बना लिया जाता है तब उसमें पानी मिलाकर ही रोटी बनाई जाती है। जो सभी जीवों को पुष्ट करती है। यानी सारी प्रकृति 'स्व' से परे रहकर 'पर' को महत्त्व देती है। तभी हम जीवों का अस्तित्व इस धरा पर सुरक्षित रहता है। 

            दूध में शक्कर की तरह घुलमिल जाने और आटे में नमक की तरह एकरूप होकर दूसरों को सुख देने वाले विनयशील व्यक्ति ही वास्तव में अपनी पहचान बनाए रखते हुए भी सबके अपने बनते हैं। यही उनका सबसे बड़ा गुण होता है, इन गुणों को अपनाने में कभी भी परहेज नहीं करना चाहिए।

           विनम्रता सफलता की गारण्टी है क्योंकि यह संघर्षों को सुलझाती है और लोगों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध बनाती है। यह हमारे चरित्र को निखारती है और अहंकार को गलाकर व्यक्तित्व को महान बनाती है। अपने अहं को किनारे करके ही दूसरों के हृदय में अपना स्थान बनाया जा सकता है। स्वार्थ के वायरस को भी नगण्य करते हुए एक-दूसरे के दिल में घर बनाया जा सकता है। इन छोटी-छोटी बातों को यदि अपने ध्यान में खा जाए तभी किसी के दिल में सरलता से अपना स्थान बनाया जा सकता है।

चन्द्र प्रभा सूद 


सोमवार, 27 अप्रैल 2026

जब शब्द साथ नहीं दें

जब शब्द साथ नहीं दें

बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य बहुत कुछ कहना चाहता है परन्तु उसके अपने शब्द ही उसका साथ नहीं देते। वह अपने भावों को शब्दों में ढालना चाहता है पर असफल हो जाता है। इसलिए वह बस मूक बनकर एकटक ताकता रह जाता है अथवा फिर पैर के नाखूनों से धरती को खोदने लग जाता है। यदा कदा वह दूसरों से नजरें भी चुराने लगता है। उस समय उसका मौन अथवा उसके अश्रु उसकी मुखर भाषा बन जाते हैं।
          मनुष्य जब बहुत अधिक भावुक होता है तब वह बोल नहीं पाता। सहज होने पर ही वह अपनी बात बता सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक कष्ट के समय भी मनुष्य के बोल उसका साथ छोड़ देते हैं। अधिक प्रसन्नता के आवेग में, भय या विस्मय की स्थिति में, पश्चाताप होनेआदि के समय भी उसकी आवाज नहीं निकल पाती। उसके चेहरे के भावों से उसके हृदय को पढ़ा जा सकता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य का चेहरा ही उसका आईना कहलाता है जो उसके सभी प्रकार के मनोगत भावों को बिना कहे प्रकट कर देता है।
          इन सबके अतिरिक्त कई बार दूसरों के प्रति सम्मान भाव के कारण भी मनुष्य चाहते हुए भी प्रतिकार स्वरूप नहीं बोल पाता कि उसे अमुक बात पसन्द नहीं आई। कभी-कभी अपने प्रियजन को परेशानी न हो सोचकर भी मनुष्य चुप्पी लगा जाता है। चुप की भी अपनी एक आवाज होती है जो बिना कुछ बोले दूसरे के हृदय को चीर कर रख देती है। मनुष्य के हावभाव से उसका हर्षोल्लास झलकता है जो हर किसी को दिखाई देता है। 
          ऐसा भी कहा जाता है कि घमण्डी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उसके बिना कुछ कहे ही उसके व्यवहार से ही सब ज्ञात हो जाता है। मौन रहते हुए मनुष्य की सफलता-असफलता उसके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं। अहंकार में चूर रहने वाले व्यक्ति के सामने कोई मनुष्य नहीं पड़ना चाहता। तब वह धीरे-धीरे अकेला हो जाता है। जब उसे किसी की आवश्यकता होती है तो वह अपने विचारों को स्पष्ट करने में असमर्थ हो जाता है। इसका कारण निश्चित ही पूर्व में किया गया उसका व्यवहार होता है।
            पैसे के लिए यह उचित प्रसिद्ध है कि वह बोलता है। पर पैसा तो निर्जीव है, वह बोल नहीं सकता। परन्तु इसका यही अर्थ है कि जब किसी भी स्त्रोत से पैसा मनुष्य के पास अधिकता से आता है तब उसकी सद्य: खरीदी जाने वाली सुविधाएँ उसके पास पैसा होने के रहस्य की पोल खोल देती हैं। यहाँ पर भी वाणी के व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। उसके हाव-भाव ही उसकी चुगली कर देते हैं।
            बिना शब्दों का उच्चारण किए भी मनुष्य अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ हो सकता है। यहाँ मैं याद दिलाना चाहती हूँ कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म पाकर भी जब दुर्भाग्यवश मनुष्य को ईश्वर की ओर से वाणी का उपहार नहीं मिलता तब वह गूँगा कहलाता है। वह अपने विचारों को बोलकर प्रकट नहीं कर सकता परन्तु उसके व्यवहार से अथवा चेहरे के भावों से या हाथ के इशारों से ही उसके घर-परिवार के लोग अथवा बन्धु-बान्धव उसके सारे भावों को सहजता से समझ लेते हैं।
             हम अपने घर में मूक पालतू पशुओं को रखते हैं। वे तो हमारी तरह बोल नहीं सकते पर अपने स्पर्श से, अपने हावभाव से मौन रहते हुए अपने प्यार, क्रोध या जिद आदि भावों को बखूबी समझा देते हैं। इसी प्रकार अपनी भूख-प्यास आदि दैनिक आवश्यकताओं के बारे में भी वे अच्छी तरह अवगत करवा देते हैं।
             एक छोटा बच्चा जो बोल नहीं सकता, वह भी अपनी माता को अपनी सब समस्याओं के विषय में समझा‌ देता है। उसके रोने के तरीके से मॉं समझ लेती है कि अब बच्चे को भूख लगी है, अब उसने सू सू कर लिया है या पोटी कर ली है। वह बिमार‌ है अथवा उसे कोई शारीरिक कष्ट है। इस प्रकार माता अपने बच्चे की सारी बातों को उसके बोले बिना जान-समझ लेती है। यहॉं‌ पर शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
           इन्सान जितने भी घण्टे-घड़ियाल बजा ले पर ईश्वर उसे नहीं मिलता। वह तो उसके शुद्ध और पवित्र मन-मन्दिर में ही मिलता है। मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भाव में रहता है। कहते हैं जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही हम उस प्रभु का वर्णन नहीं कर सकते। उसका चित्रण करते समय हमारी वाणी मौन रह जाती है। हमारे शास्त्र 'नैति नैति' कहते है। अर्थात् ईश्वर यह भी नहीं है, वह भी नहीं है।
          चारों ओर पसरा सन्नाटा मनुष्य की कहानी बिनकहे सुना देता है। किसी सज्जन के प्रति किए गए अभद्र व्यवहार की क्षमा न माँगने पर भी उसके अविरल बहते आँसू उसकी क्षमायाचना का कारण बन जाते हैं। मौन रहते हुए भी माता-पिता बच्चों को बहुत-सा व्यावहारिक ज्ञान दे देते हैं। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि सारा समय हो-हल्ला करके ही अपनी बात रखी जाए या सान्त्वना दी जाए। मौन रहकर समझाई गई बात भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उसकी मारक शक्ति अधिक होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

आजकल लोगों में अपनापन कम होने लगा है। हर रिश्ते से लोग दूरी बनाने लगे हैं। अपनेपन में आने वाली यह दूरी मनुष्य के क्रोध को बढ़ाने का कार्य करने लगी है। भौतिक युग में जहाँ मनुष्य जीवन के बाकी सारे मायने बदलते जा‌ रहे हैं, वहाँ इसके साम्राज्य का भी विस्तार होने लगा है। कोई मनुष्य अपने जीवन की रेस में पिछड़ना नहीं चाहता, वह सदा अग्रणी बने रहना चाहता है। शायद यही कारण है कि उसे अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और फिर उसे अनावश्यक ही बात-बेबात पर क्रोध आने लगता है।
            वैस यह क्रोध मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। राहू ग्रह की तरह उसके विवेक को ग्रसकर ग्रहण लगा देता है। उसे अपने बन्धु-बान्धवों से दूर कर देने में यह अहं भूमिका निभाता है। इस क्रोध का कोई सानी नहीं है क्योंकि यह हमारी सोच से भी अधिक चालबाज या चतुर होता है। इसे अच्छी तरह पता है कि कहाँ अपना जोर आजमाना है और किस के सामने खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना है। किसी भी क्षेत्र में अपने से अधिक बलशाली व्यक्ति के सामने यह मिमियाने लगता है।
            यह क्रोध अक्सर कमजोर पर ही निकलता है क्योंकि केवल उन असहाय दुर्बलों पर ही हमारा वश चलता है। हम अपनी कामवाली बाई, सब्जी वाला, धोबी, माली आदि पर ही अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं अथवा बहस कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी वाला अपने से बड़ी गाड़ी वाले से हाथ जोड़कर माफी माँग लेता है, परन्तु आटो वाले, रिक्शा चालक, साईकिल सवार अथवा पैदल चलने वालों पर ही वह अपना गुस्सा निकालने का यत्न करता हैं। 
            किसी पहलवान या गैंगस्टर के सामने तो सबकी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाती है। कार्यालय में अपने बॉस के सामने पैर पटकने की हिम्मत कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। पता होता है कि यदि वहाँ क्रोध दिखाया तो नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाएगा। तब घर-परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए वहॉं अपमान सहन कर भी वह चुप्पी साध लेता है।‌ सभी लोग अपने अधीनस्थों पर ही क्रोध कर सकते हैं बस। उन पर क्रोध करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
            इस तरह हम देखते हैं कि यह क्रोध कैसे-कैसे गुल खिलाता है। यह मनुष्य के अन्तस् में छुपी हुई कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर देता है। इन्सान को पता भी नहीं चलता और यह क्रोध अपनी चाल चल देता है। उसे अहंकारी होने का मेडल दिला‌ देता है। लोग ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं पड़ना चाहते। उसे दूर से देखकर वे किनारा कर लेते हैं। अपने इस क्रोध रूपी शत्रु के कारण धीरे-धीरे वह अकेला रह जाता है।
            प्रकृति को हम इन्सान अपने स्वार्थ के लिए बहुत अधिक हानि पहुँचाते हैं। नदियों के जल में कचरा और फेक्ट्रियों की गन्दगी डालकर उन्हें दूषित करते हैं। पेड़ों को काटते हैं, वायु प्रदूषित करते हैं। इस कारण वर्षा पर प्रभाव पड़ता है। मौसम चक्र में परिवर्तन होने लगता है। वातावरण को हम गाड़ियों के धुऍं से दूषित करते हैं। जब यह प्रकृति हम लोगों पर क्रोध करती है तो इस धरती पर विनाश हो जाता है। हम सब परेशान हो जाते हैं, उससे उभरने के लिए उपाय सोचते हैं।
           नदियों में बाढ़ आने से लोगों और पशुओं की मृत्यु हो जाती है, बड़े-बड़े भवन तक टूट जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। जब सुनामी जैसी आपदाएँ आती है तो दूर-दूर तक विनाश हो जाता है। भूकम्प आ जाने पर भी जान-माल की बहुत हानि होती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और ओलावृष्टि सभी धरती पर कहर बरसाती हैं। हमारे दोष के कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचने लगता है। ये सभी प्रकृतिक आपदाएँ हमारी मूर्खता का परिणाम हैं। जब-जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं तब-तब ये सब तो झेलना ही पड़ता है। इससे बचना असम्भव हो जाता है।
            अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। जब वह तैश में आती है तो सारे भेदभाव भूलकर महलों और झोंपड़ियों सबको समान रूप से खाक में मिला देती है। शहरों और जंगलों को राख के ढेर में बदल देती है। लोहे जैसी कठोर धातु को भी पिघला देती है। उस समय वह किसी के प्रति सहानुभूति नहीं रखती। सब लोगों को उसका प्रकोप झेलना पड़ता है।
            इसी प्रकार पशुओं को जब क्रोध आता है तो वे भी किसी का लिहाज नहीं करते। पलटकर वार कर देते हैं। चाहे वह साँप हो, कुत्ता हो, हाथी हो अथवा कोई अन्य पशु। हम समझ सकते हैं कि क्रोध चाहे मनुष्य का हो, पशु-पक्षी का हो अथवा प्रकृति का हो सदैव विनाशकारी होता है। इसका दुष्परिणाम किसी एक मनुष्य को नहीं अपितु बहुतों को भुगतना पड़ता है।
      ‌      इस नामुराद क्रोध को शान्त करने की महती आवश्यकता होती है। इसके लिए गहरी सांस लेनी चाहिए। हो सके तो 10 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हट जाना चाहिए।मौन रहना चाहिए, ध्यान लगाना चाहिए और अपनी पसन्द का संगीत सुनना गुस्से को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। इनके अतिरिक्त सकारात्मक सोच और नियमित दिनचर्या से भी क्रोध पर काबू पाया जा सकता है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और सद् ग्रन्थों का वाचन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

मनुष्य को अपने सिर पर बहुत अधिक बोझ नहीं उठाना चाहिए। उसे अपनी पीठ पर मात्र उतना ही बोझ लादकर चलना चाहिए जितना वह आराम से उठा सकता हो। फिर वह बोझ चाहे उसके रिश्तों का हो अथवा किसी सामान का। इसके अतिरिक्त चाहे वह बोझ उसके अभिमान का ही क्यों न हो। देखा जाता है कि अपनी सामर्थ्य से अधिक बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य इस ससार में अक्सर डूब जाता है। 
               बोझ ढोने का अर्थ भारी सामान या वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लादकर ले जाना या उठाना होता है। इसके अतिरिक्त  जिम्मेदारियों, कठिनाइयों या मानसिक तनाव को सहन करने को भी कहते हैं। जीवन में समस्याओं का बोझ उठाना पड़ता है। परिवार या काम का दायित्व सम्भालने को भी हम उसका बोझ कह सकते हैं। मनुष्य को अपनी की गई गलतियों का बोझ दुःख अथवा‌ परिणाम सहने के रूप में  ढोना पड़ता है।
             रिश्तों की अहमियत हम सब लोग जानते हैं परन्तु जब ये रिश्ते मनुष्य के लिए बोझ बन जाएँ तो उनसे दूरी बनाना ही उचित होता है। वैसे तो सभी रिश्ते बहुत ही नाजुक और महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको सदा सहृदयता और सद् भावना से ही निभाना चाहिए। उनमें टकराव की स्थिति कभी उत्पन्न न होने पाए, इससे बचने का यथासम्भव प्रयास मनुष्य को करना चाहिए। 
             यदि उन रिश्तों मे आपसी भाईचारा तथा विश्वास समाप्त हो जाए तो वे भार की तरह हो जाते हैं। एकतरफा रिश्ता लम्बे समय तक हाथ थामकर साथ नहीं चल पाता। ऐसे रिश्ते जो जीवन में नासूर बनकर कष्टदायी बन जाते हैं, उनके लिए अपने मन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। उन्हें छोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है। 
             यात्रा के लिए जब कभी जाना हो तो यत्न यही करना चाहिए कि सीमित सामान ही लेकर जाया जाए। कम सामान होने पर उसे सम्हालना अधिक सुविधाजनक होता है। यदि बहुत सारा आवश्यक अथवा अनावश्यक  सामान लेकर चला जाएगा तो फिर बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सामान की रखवाली करने के कारण मनुष्य के घूमने-फिरने का आनन्द कम हो जाता है।
             मनुष्य पर उसके घमण्ड का बोझ बहुत अधिक होता है। वह अपने अहं में अन्धा होकर अच्छे और बुरे का विवेक खो बैठता है। अहंकार का नशा जब सिर पर चढ़कर नाचने लगता है तब मनुष्य स्वयं को भगवान से कम नहीं समझता। वह इतराता फिरता है। मद में चूर वह आकाश में उड़ता फिरता है। उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उस समय वह दुनिया को आग लगा देने की बातें करने लगता है।
             एक दृष्टान्त पढ़ा था।‌ उसमें बताया गया था कि एक धोबी के पास एक गधा और एक घोड़ा था। धोबी घोड़े से बहुत प्यार करता था और खूब देखभाल करता था। गधे पर वह सारा सामान लादता रहता था। घोड़ा गधे की दुर्दशा पर उसका मजाक बनाता था। उसने गधे को समझाया कि जब उसका काम करने का मन नहीं करता तो वह बहाना बना लेता है। तब मालिक परेशान हो जाता है तब फिर उसकी बहुत देखभाल करता है।
             गधा अपने ऊपर लादे जाने वाले बोझ से बहुत व्यथित रहता था। मालिक भी ऐसा था जो दिन-प्रतिदिन बिना सोचे-समझे उसका भार बढ़ाता रहता था। वह दिन भर बोझ उठाते-उठाते उदास रहने लगा था। वह भी घोड़े की तरह कभी आराम करना चाहता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अपने मालिक को सबक सिखाएगा। शाम को जब धुले हुए सूखे कपड़े लेकर आ रहा था तो रास्ते में नदी पार करते समय उसने नदी में गिरने का नाटक किया। 
            उसके ऊपर लदे हुए वे सारे कपड़े भीग गए और उनका भार बहुत अधिक हो गया। वे भारी कपड़े घर तक ले जाने में उसकी कमर टूटने लगी। उसके मालिक को उस पर जरा-सा भी तरस नहीं आया। उसे ऊपर से अपने मालिक की मार भी खानी पड़ गई।
              अब विचार यह करना है कि यह गधा केवल कोई धोबी का गधा है। नहीं, यह केवल धोबी का गधा नहीं है। हम मनुष्य भी जीवन भर रिश्तों और अपने अहं का बोझ अपने सीने पर ही ढोते रहते हैं और दूर से देखती हुई नियति हम पर हँसती रहती है। 
          मोहमाया के बन्धनों में जकड़े हुए हम मनुष्य चाहकर भी इस बोझ को उतारकर नहीं फैंक पाते। सड़े और नासूर बन रहे इन बन्धनों से मुक्त होने का सार्थक प्रयास करना चाहिए। इसलिए बोझ कैसा भी हो, उसे सिर से उतारकर फैंकने से ही हम सुख की साँस लेकर चैन की बाँसुरी बजा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

डर केवल एक भाव

डर केवल एक भाव

डर क्या होता है यानी कि कुछ भी नहीं होता। यह केवल मन का एक भाव होता है। परन्तु यह व्यक्ति विशेष के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। उसे सुख और आराम से नहीं रहने देता। उसके दिन-रात के चैन को लील जाता है। मनुष्य हर समय बदहवास-सा रहने लगता है। वास्तव में अक्सर मन में डर का कारण गलत धारणाऍं होती हैं। यह डर मनुष्य को कहीं बाहर से नहीं मिलता अपितु उसके अपने अन्तस् में होता है। मनुष्य को अनावश्यक रूप से नहीं डरना चाहिए।
            डर लगने का मुख्य कारण मस्तिष्क में खतरे की पहचान और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो मनुष्य को सम्भावित नुकसान से बचाने के लिए विकसित होती है। यह आघात सीखी हुई प्रतिक्रियाओं, अनिश्चितता अथवा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन और सांस तेज हो जाती है। डर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो सुरक्षा के लिए होती है परन्तु इसकी अति हो जाने पर यह मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकती है।
             इन्सान को अपने डर पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यह डर उसके मन में कुण्डली मारकर पसरा रहता है। इस नाग से छुटकारा पाना इन्सान के लिए अति आवश्यक होता है। मनुष्य अपना सारा जीवन किसी-न-किसी कारण से डर-डरकर व्यतीत करता है। कभी धर्म के नाम पर डरता है तो कभी समाज से डरता रहता है। कभी वह अन्धेरे की घुटन से त्रस्त रहता है तो कभी उजाले से। बचपन में माँ से दूर होने का डर होता है। फिर गृहकार्य न करके स्कूल में जाकर मिलने वाली डाँट का भय रहता है। कभी परीक्षा में अपेक्षानुसार अंक न आने का भय उसे व्याकुल कर देता है।
            बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली असफलताओं का भय उसे जीने नहीं देता। जीवन में आने वाली परीक्षाओं में सफलता पाना उसका ध्येय होता है। इसलिए उसके मन में डर का घर कर जाना स्वाभाविक है कि अगर किसी कारण से चूक गए तो क्या होगा?
             कभी मनुष्य को अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने के लिए परेशानी रहती है। कभी-कभी न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ और कभी इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि उसे भयभीत करते हैं। कभी कार्यालय में की गई किसी गलती के कारण बास या साथियों का डर उसे बेचैन कर देता है। कभी-कभी घर-परिवार के दायित्वों को ठीक से न निभा पाने पर होने वाला विस्फोट उसे भयभीत कर देता है।
            किसी को पानी से, किसी को ऊँचाई से और किसी को आग से डर लगता है। किसी-किसी को तथाकथित भूत-प्रेतों का भय सताता है। और भी न जाने क्या क्या अनजाने डर उसे घेरकर उसके व्यक्तित्व को ग्रसने का कार्य करते हैं। उस समय वह थरथर काँपने लगता है। इस भय की अधिकता होने पर मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन तक खो देता है। किसी को कुछ कीड़ों से डर लगता है।
             विचारणीय है कि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज सबके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व होता है। उनके पालन में जहाँ भी चूक होती है, वहीं एक अनजाना-सा डर उसे सताने लगता है। 'लोग क्या कहेंगे' की यह चिन्ता उसके मन को निरन्तर व्यथित करने लगती है। यदि कभी मनुष्य से गलती हो जाए तो निस्सन्देह उसे डरना चाहिए। किन्तु उसके अलावा उसे कभी भी किसी से भी डरना नहीं चाहिए। 
            मनुष्य को अपनी की गई गलती का मन से प्रायश्चित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि वह गलती दुबारा न दोहराई जाए। मनुष्य अपनी जिन्दगी का मालिक स्वयं होता है। यदि मनुष्य अपनी गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ता है तो उस जैसा कोई और इन्सान नहीं हो सकता।यदि मनुष्य सही तरीके से नियमानुसार कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा हो तो कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह अपने सही रास्ते पर चलता रहे तो उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती, दूसरे उसका सामना करने से घबराते हैं।
            जिस बात से डर लगता है, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। जब मनुष्य डर का सामना करता है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।इस बात पर विचार करना‌ चाहिए कि क्या उसका डर वास्तव में तर्कसंगत है? डर लगने पर गहरी सांस लेनी शारीरिक व्यायाम (योगा) भी डर व घबराहट को कम करने में मददगार हैं। चाहिए, इससे शरीर को शान्त करने में सहायता मिलती है। मेडिटेशन (ध्यान) के जरिए मन को शान्त रखना चाहिए। नियमित मेडिटेशन मन को शान्त करती है और डर को नियन्त्रित करने में बहुत सहायता करता है। स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि नकारात्मक विचार मन में न आ सकें। ईश्वर अथवा किसी मार्गदर्शक में विश्वास रखने‌ से मन मजबूत होता है। शारीरिक व्यायाम यानी योग भी डर और घबराहट को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।
          इनके अतिरिक्त अपने डर पर काबू पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर से सहायता की गुहार लगानी चाहिए। शौर्य सम्पन्न महपुरुषों की जीवन गथाएँ पढ़कर प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे लोगो का साथ करना चाहिए जो सकारात्मक हों और उसे अनजाने डर से बाहर निकलने में सहायता कर सकें। सबसे बढ़कर उसे यह मानकर चलना चाहिए कि डर के आगे जीत है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

मनुष्य यदि सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है तो वह कभी व्यर्थ नहीं होती। वह उस ईश्वर तक पहुँच ही जाती है और वह भी ऐसे व्यक्ति को अपनी शरण में ले लेता है। उसके दुखों को दूर करके उसे कुन्दन बना देता है। ईश्वर को मनुष्य की भौतिक पद प्रतिष्ठा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे तो बस मनुष्य के हृदयगत भावों की आवश्यकता होती है। वह प्रभु मनुष्य के भाव में ही अपना बसेरा बनाना पसन्द करता है। निम्न श्लोक इसी बात पर प्रकाश डाल रहा है -
       न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
    भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥  
अर्थात् न ही लकड़ी या पत्थर की मूर्ति में , न ही मिट्टी में देवता का निवास होता है। देवता का निवास तो भाव यानी हृदय में होता है। अतः भाव ही सर्वोपरि कारण है। यानी हृदय में ही देवता का निवास होता है।
               इस भौतिक संसार में एक बच्चा जब अपनी माता को करुणा से रोते हुए पुकारता है तो उसकी माँ उसे अपने आँचल में छुपा लेती है। उसे हर तरह से सान्त्वना देती है, उसके कष्ट का निवारण करती है। उसी प्रकार वह जगत जननी भी अपने बच्चों करुण पुकार सुनकर द्रवित हो जाती है और फिर झट से उन्हें सहारा देकर कृतार्थ करती है। उस जगज्जननी मॉं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। स्वयं को उसे सच्चे मन से सौंपने पर वह कभी मनुष्य को निराश नहीं करती। बस हम लोग ही उस पर भरोसा नहीं कर पाते।
            यदि मनुष्य की प्रार्थना मात्र आडम्बर हो तो उसका कोई औचित्य नहीं होता। तब वह बस व्यर्थ होकर रह जाती है। उस व्यक्ति को उसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाता। सच्चे मन से ईश्वर की अराधना करने वाले को कभी‌ हताशा का मुॅंह नहीं देखना पड़ता। सुख का समय हो अथवा दुःख का, ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुरक्षा करता है। कभी उसे अकेला नहीं रहने देता। हर कदम पर उसके साथ होता है। हम मनुष्य प्रभु की इस कृपा को समझ नहीं पाते।
             बहुत से लोग इस संसार में ऐसे भी होते हैं जो केवल मात्र दूसरों को दिखाने के लिए ही पूजा-अर्चना करते हैं, उनके मन में कोई भाव नहीं होते। ऐसे लोग जो बरसों बरस प्रदर्शन करते रहते हैं, उनका बस यही उद्देश्य होता है कि  लोग उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानें। बताइए जब स्वयं पर ही उस प्रार्थना का प्रभाव नहीं हो रहा तो उस ईश्वर के पास भी तो वह नहीं पहुँच सकेगी।
           अब यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। ईश्वर को कभी आडम्बर वाली भक्ति नहीं चाहिए। उसे तो श्रद्धा से ओतप्रोत स्तुति चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की उपासना आत्मोन्नति के लिए करता है तो उसके पास अणिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियाँ स्वयं ही आ जाती हैं। उसके उपरान्त मनुष्य को वहीं रुकना नहीं चाहिए अपितु और अधिक प्रयास में जुट जाना चाहिए। यदि वह उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा तो उसकी उन्नति वहीं रुकना जाती है।
             उसका हृदय शुद्ध, पवित्र और निर्मल हो जाता है। उसके मनोविकार स्वत: ही दूर होने लगते हैं। तब मनुष्य एक साधारण मानव न रहकर एक महामानव बन जाता है। उसके मुख से निकला हुआ हर शब्द पत्थर पर पड़ी लकीर की तरह सच होने लगता है। उसका बोला हुआ हर वाक्य सारगर्भित होता है। उसके चेहरे का दिव्य तेज देखते ही बनता है। उसके आभामण्डल या औरा से निकलने वाली सात्विक किरणें किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं।
             इनके पास आने वालों को इनकी सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित करती है। इनकी वाणी में एक ओज होता है जिससे कुमार्गगामी लोग भी भयभीत होते हैं। इन लोगों का तेज ही इतना अधिक होता है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक इनसे घबराते हैं। शरीरिक बल न होने पर भी मानसिक और आत्मिक बल के कारण ये किसी का भी सामना कर सकते हैं। कैसा भी कार्य क्यों न हो, कर गुजरते हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इन महापुरुषों के विषय में बहुत कुछ पढ़ने और जानने के लिए मिल जाएगा।
             हम देखते हैं कि बादल इस पृथ्वी से जल लेते हैं और उसे वापिस इस धरा को लौटा देते हैं। आकाश से बादलों के द्वारा गिरा हुआ जल किसी-न-किसी रास्ते से होकर अपने लक्ष्य समुद्र तक पहुँच ही जाता है। उसी प्रकार नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की गई प्रार्थना भी किसी-न-किसी प्रकार से उस प्रभु तक पहुँच ही जाती है। कहते हैं ईश्वर को चाहे छप्पन व्यंजनों का भी भोग लगा लो तो वे सब व्यर्थ हो जाते हैं, यदि ईश्वर को पाने की मन में ललक न हो। 
           ईश्वर ने दुनिया की सब नेमते हमें दी हैं। हमारी क्या सामर्थ्य कि हम उसे कुछ भेंट में दे सकें? हम लोग तो बस उसे रिश्वत देकर रिझाने का यत्न करते हैं। यह तो मनुष्य की भावना नहीं कहलाती। इसे हम सौदा करना ही कह सकते हैं। संक्षेप में ईश्वर मनुष्य के मन के भाव में रहता है, ये भाव ही उस तक पहुँचने का कारण हैं, माध्यम हैं। इसलिए अपने मन में उसे पाने की उत्कट भावना रखते हुए उसका स्मरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

अपने अन्त:करण में विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लालच, अहंकार आदि के कूड़े को मनुष्य सम्हालकर रखता रहता है। कुछ समय पश्चात कचरा बने हुए ये सभी दूषित भाव धीरे-धीरे सड़कर बदबू देने लगते हैं। पिष्टपेषण किए गए वे विचार मनुष्य के मन-मस्तिष्क को और अधिक प्रभावित करने लगते हैं। उस समय अपने अहं के कारण जब मनुष्य विश्लेषण करने लगता है तो उसका अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर से विश्वास उठने लगता है।
           उन कुविचारों पर बार-बार मन्थन करने पर उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में सभी उससे जलते हैं, कोई भी उसे तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता। सभी लोग उसका फायदा उठाना चाहते हैं पर उससे उन्हें कोई लगाव नहीं है। सब लोग उसके साथ स्वार्थवश जुड़े हुए हैं। वह इससे परे कुछ सोचना ही नहीं चाहता। उसकी प्रवृत्ति जब नकारात्मक होने‌ लगती है तब उसकी सोच का दायरा संकुचित होने लगता है। उस समय वह कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता।
              सदा ही इस प्रकार सोच-विचार करते रहने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे समय बीतते नकारात्मक दृष्टिकोण वाले बन जाते हैं। उन्हें हर मनुष्य में खोट ही नजर आने लगता है चाहे वह उनका प्रिय ही क्यों न हो। वे हर व्यक्ति को वे सन्देहभरी नजरों से देखते हैं। वे इस बात का दावा करते हैं कि लोग उन्हें समझते ही नहीं है। उन लोगों की बुद्धि ही ऐसी है जो उन्हें उनकी अच्छाई दिखाई नहीं देती। अपने अन्तस में झॉंककर देखने के स्थान पर वे सबमें खोट निकालने का कार्य करते हैं।
             उन्हें हर समय यही लगता है कि एक वे ही हैं जो दुनिया बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं और उनके आसपास रहने वाले बाकी सभी लोग मूर्ख हैं। उनकी सोच संकुचित है। वे हर अच्छी चर्चा को अपने नकारात्मक विचारों से बर्बाद करके सबकी आलोचना का शिकार बन जाते हैं। निराश होकर बाद में वे यही शिकायत करते हैं कि उनकी बात को कोई सुनकर लाभ ही नहीं उठाना चाहता और एक दिन वे सब अपनी इस गलती के लिए पश्चाताप करेंगे। तब उन्हें समझ आएगा।
              मोह-माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मनुष्य इनसे अपना पल्लू नहीं झाड़ पाता। न चाहते हुए भी अज्ञानतावश बार-बार इनके जाल में फँस जाता है। इसलिए वह केवल अपनों के लिए सब सुख-सुविधाएँ जुटाता है और दूसरे सभी लोगों को अनदेखा करने लगता है। जैसे अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे, उसी प्रकार अपनों के मोह में फंसे मनुष्य भी बारबार जाने-अनजाने सब गलत-सही काम करने से परहेज नहीं करते। बाद में परेशान होते हैं और पश्चाताप करते हैं।
              इसी प्रकार क्रोध करते हुए ऐसे लोग अपना विवेक दाँव पर लगा देते हैं। वे किसी ऐसे मनुष्य से दोस्ती नहीं करना चाहते जो अनावश्यक ही क्रोध करके अपने सामने वाले का अपमान करे अथवा दूसरों से अलग होता जाए।
             जिस प्रकार अपने घर के अन्दर जमा हुए कूड़े-कचरे को फैंकने के लिए उसका विज्ञापन अखबार आदि में नहीं किया जाता बल्कि चुपचाप प्रसन्नतापूर्वक बाहर जाकर कूड़दान में फैंक दिया जाता है। उसी प्रकार अपने अन्तस् में विद्यमान कुत्सित भावरूपी कचरे को निकालकर फैंकने के लिए भी ढिंढोरा नहीं पीटा जाता या विज्ञापित नहीं किया जाता। इन विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। न ही इन्हें अपने जीवन को नरक के तुल्य कष्टदायी बनाने देना चाहिए। इन्हें नियन्त्रित करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
            ईश्वर की शरण में जाने से और अपने सद् ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करने से मन में बसे हुए इन कुत्सित नकारात्मक विचारों को वश में किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपनी संगति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यथासम्भव सज्जनों की संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए। नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने के लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। यदि विचार बहुत अधिक परेशान कर रहे हों तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। स्वयं को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास तो करना ही पड़ेगा। 
          नकारात्मक विचारों को मन से निकालना मानसिक शान्ति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए नकारात्मक विचारों को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। उन्हें साक्षी भाव से देखना चाहिए और फिर धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को ध्यान तथा स्व-देखभाल‌ से बदलना चाहिए। खुद की आलोचना करने से बचना चाहिए। यदि विचार बार-बार आऍं तो धैर्य रखना चाहिए। धीरे-धीरे सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ना चाहिए। मन को खाली न छोड़ें। अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक संगीत सुनें या आभारी रहने की आदत डालनी चाहिए।
           अपने मन को साधने के लिए प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। रात को सोते समय कुछ वक्त निकालकर एक बार सारे दिन के कार्य व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। इससे अपनी अच्छाई-बुराई का भान हो जाता है। उससे सबक लेकर अच्छे कृत्यों को बढ़ाते जाना चाहिए और अपनी कमियों को यथासम्भव दूर करते रहना चाहिए। वास्तव में थोड़ा-सा प्रयत्न करने से व्यक्ति स्वयं ही समझदार मनुष्य बनकर सबका प्रिय हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद