बुजुर्ग परिवार की रीढ़
बुजुर्ग परिवार की रीढ़ होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
बुजुर्ग परिवार के अनुभव और ज्ञान के अनुपात होते हैं। वे अपने जीवन के गुणों से बच्चों को शिक्षित करते हैं। ये परिवार में संस्कार और परम्परा को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। पूर्वजों का आदर और सम्मान करने से परिवार में द्विपक्षीय प्रेम और लाभ प्राप्त होता है।
बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी, "बारात में किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे।"
अब लड़के वाले परेशान हो गए, "बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी?"
तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन लोगों को परामर्श दिया, "बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।"
इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया।
तब दुल्हन पक्ष वालों ने दूल्हे पक्ष वालों से पूछा, "उन रस्मों को उन्होंने किस प्रकार निभाया।"
उस समय उन्होंने ने बताया' "वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं।"
उस समय सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से मनुष्य कभी नहीं ऊबता। जिस प्रकार नमक से भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, उसी प्रकार बजुर्गों के होने से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं। भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है, उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, नियमित स्वास्थ्य जॉंच करवानी चाहिए। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयॉं सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन देना सबसे जरूरी है। उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और स्वतन्त्रता देनी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर महसूस कराना चाहिए। घर में उन्हें चलने-फिरने की जगह को सुलभ बनाना चाहिए।साथ ही घर में जरूरी सुरक्षा बदलाव करके और उनके साथ समय व्यतीत करके उनके एकाकीपन को दूर किया जा सकता है।
माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते पर माता-पिता उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात् सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैं, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती।
इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैं, वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन करना सदा ही कल्याणकारी होता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है।
बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है।
चन्द्र प्रभा सूद