रविवार, 18 अक्टूबर 2026

हॅंसते चेहरे के पीछे भी गम

हँसते चेहरे के पीछे भी गम

किसी व्यक्ति के हँसते-मुस्कुराते हुए चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कदापि उचित नहीं है कि उसे अपने जीवन में कोई गम नहीं है अथवा कष्ट या परेशानी नहीं है। इसके विपरीत यह सोचना अधिक समीचीन होता है कि उसमें सहन करने की शक्ति दूसरों से कुछ अधिक है। वह मानसिक रूप से इतना सक्षम है, तभी वह अपनी असहाय अवस्था को सहजता‌ से छिपा पा रहा है। 
        पता नहीं अपनी कितनी मजबूरियों और परेशानियों को अपने सीने में छिपाकर कोई व्यक्ति दूसरों के चेहरे पर हँसी ला पाता है। ऐसे साहसी लोग इस दुनिया में बहुत कम मिलते हैं। 
        प्रायः लोग यही सोचते हैं कि जिसके पास भी वे बैठें, वह उनके दुखों की दास्तान को दत्तचित्त होकर सुने और अपनी सहानुभूति उसके लिए प्रकट करे। उसे यह पता चलना चाहिए कि उसका वह साथी मनुष्य कितनी पीड़ा भोग रहा है।
        वह अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों से सताया हुआ है। उसे नौकरी या व्यापार में बहुत बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वह धन की कमी या अस्वस्थता के कारण हताश है, जीवन से निराश है। इन सबसे बढ़कर उसे किसी अपने से सदा के लिए बिछुड़ जाने का दर्द है।
          यह सब सोचते समय मनुष्य भूल जाता है कि हर मनुष्य किसी-न-किसी पीड़ा से गुजर रहा होता है। किसी के पास उसके दुखों-परेशानियों पर मलहम लगाने का समय नहीं है। इस मँहगाई के चलते सभी लोग अपने जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास समय का अभाव रहता है। आज हर इन्सान को जीवन जीने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है अन्यथा वह जीवन की रेस में पिछड़ जाता है।
      अपने हिस्से के दुखों, तकलीफों और परेशानियों को मनुष्य को स्वयं ही भोगना पड़ता है। कोई भी उन्हें उसके साथ भोगते हुए साझा नहीं कर सकता। जिन लोगों को वह अपना हमदर्द समझता है, वह उनसे ही अपने दुख और तकलीफ साझा करने का यत्न करता है।
        पहली बात तो यह है कि कोई उसकी बात को ध्यान से सुनना ही नहीं चाहता। दूसरी बात यह है कि कोई सुनता है और प्रत्यक्ष में सहानुभूति का प्रदर्शन करता है तो पीठ पीछे उसकी छिछालेदार करने का अवसर तलाशता है। नमक-मिर्च लगाकर, बढ़ा-चढ़ाकर और चटखारे लेकर सबके सामने उसका उपहास करता है। जहाँ तक हो सके अपने दुख और अपनी परेशानियों को अपने हृदय में ही समेट लेना चाहिए। 
        यहाँ हम सर्कस के जोकर की चर्चा कर सकते हैं। वह बहुत ही सफाई से अपने जीवन की परेशानियों को अपने अन्तस् में दफन कर देता है। जब वह स्टेज पर आता है तो अपनी अदाओं से सबको हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देता है। किसी को भी उसके जीवन के दुखों और कष्टों का भान ही नहीं हो पाता। जोकर के इस व्यवहार को हम उसकी कलाकारी कह सकते हैं।
    एक गुमनाम-सी जिन्दगी जीता हुआ जोकर सबको खुश करने का भरसक प्रयास करता है। वहाँ सर्कस में बैठे हुए वे लोग उसके मसखरेपन का आनन्द लेते हैं। वहाँ से बाहर निकलकर दो-चार मिनट उसके बारे में बात करते हैं। उसके बाद अपने-अपने कामों में व्यस्त होकर उसे भूल जाते हैं। फिर उन्हें उसका परिश्रम भूल जाता हैं।
        जोकर की तरह यदि मनुष्य अपने अन्तस् में अपनी सारी व्यथाओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मान ले तो उसे किसी के सामने उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती। मनुष्य स्वयं ही उन पर विचार करता हुआ उनसे बाहर निकलने का मार्ग खोज लेता है।
        मनुष्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि चन्द्रमा को भी अमावस्या का दंश झेलना पड़ता है। सूर्य को ताप से जलना पड़ता है। दिन को अन्धेरे से मुक्त होने के लिए संघर्ष करना होता है। सोने को खरा बनने के लिए आग में तपना पड़ता है। इससे भी बढ़कर सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहण का दोष भी झेलना पड़ता है।
        संसार में हितचिन्तक बहुत कम हैं। अधिकतर लोग दूसरों का मजाक बनाने में लगे रहते हैं। यही उनका मनोरंजन होता है। इसलिए वे ऐसे अवसर की तलाश करते रहते हैं और अपना शिकार ढूँढते ही लेते हैं। ऐसे लोगों को पहचानाने की कोशिश करनी चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो उनसे किनारा करना ही श्रेयस्कर होता है।
          सज्जनों की सगति, स्वाध्याय और ईश्वर की उपासना से मनुष्य कठिन-से-कठिन परिस्थिति में भी नहीं हारता। उसे अपने कष्ट भी फूल की तरह लगने लगते हैं। हँसने वाले के सभी मीत बनते हैं और बिसूरते रहने वाले से किनारा कर लेते हैं। उसे स्वयं ही भान हो जाता है कि सदा फूलों की तरह मुस्कुराने और खुशियों की सुगन्ध चारों ओर बिखेरनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

अपने बाहूबल पर भरोसा रखिए

अपने बाहूबल पर भरोसा रखिए 

मनुष्य को अपने बाहूबल पर पूरा भरोसा होना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास होगा तो वह किसी भी तूफान का सामना बिना डरे या बिना घबराए कर सकता है। वैसे तो ईश्वर मनुष्य को वही देता है जो उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उसके भाग्य में लिखा होता है। परन्तु फिर भी जो व्यक्ति स्वयं ही अपनी शक्ति पर भरोसा करता है, ईश्वर देर-सवेर उसकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके मालामाल कर देता है।
        अपने बाहूबल यानी शारीरिक और मानसिक शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। इसका अर्थ होता है अपनी क्षमताओं, अपने परिश्रम और अपने आत्मविश्वास पर अटूट भरोसा करना। स्वयं पर यकीन रखने से मनुष्य का मन मजबूत होता है और कठिन फैसले लेना आसान हो जाता है। दूसरों से आशा रखने के स्थान पर‌ स्वयं प्रयास करने से असफलता का डर कम होता है। यह यत्न व्यक्ति को जीवन की हर चुनौती का डटकर सामना करने की शक्ति देता है।
          मनुष्य यदि थक-हारकर बैठ जाए अथवा रोता रहे तो न उसका भाग्य बदल सकता है और न ही उसका जीवन सफल हो सकता है। उद्यम तो उसे करना ही होता है। जिस प्रकार ताश के पत्तों से कभी घर नहीं बनाया जा सकता। उसी प्रकार अनावश्यक प्रलाप करने या शेखचिल्ली की तरह मात्र दिवास्वप्न देखने से जीवन में कभी उन्नति नहीं की जा सकती।
          दुनिया को जीतने का हौंसला रखने वाले अपने जीवन में कभी हार नहीं मानते। वे साहसी अपने विवेक का सहारा लेते हुए शेर की तरह अकेले ही दुनिया में आगे कदम बढ़ाते रहते हैं। यद्यपि एक बार असफल हो जाने पर यह दुनिया समाप्त नहीं हो जाती और न ही कोई मनुष्य हमेशा के लिए हार जाता है। इसी प्रकार एक बार अपने जीवन में सफल हो जाने वाले को सदा के लिए ही विजयी नहीं माना जाता। 
          मानव जीवन में हार-जीत अथवा सफलता-असफलता का चक्र हमेशा चलता रहता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि असफल हो जाने पर मनुष्य सदा के लिए जीवन की बाजी हार गया है। अथवा एक बार उसे सफलता मिल गई तो उसने जीवन में सभी ऊँचाइयों को सदा के लिए छू लिया है।
          युद्ध यदि मात्र दिखावे के लिए भी हो अथवा सफलता निश्चित हो तो कायर-से-कायर व्यक्ति भी उसे लड़कर जीत जाता है। फिर वह विजयी होने का झूठा दम्भ भर सकता है और असत्य ही सही, सिर ऊँचा उठाकर चलने का साहस कर सकता है।
         साहसी व्यक्ति वही होता है जो असफलता निश्चित होने पर भी युद्ध के मैदान में डटा रहता है, अपनी पीठ दिखाकर नहीं भागता और किसी भी परिस्थिति में वह अपने धैर्य का दामन नहीं छोड़ता। 
          कहने का तात्पर्य यही है कि हारने के डर से आगे बढ़ा हुआ कदम पीछे खींच लेने वाला मनुष्य तो मानो बिना लड़े ही युद्ध हार जाता है। ऐसा कापुरुष समाज में हमेशा तिरस्कार का पात्र बनता है। कितनी भी विशेषताएँ उसमेँ विद्यमान हों फिर भी कायरता के कारण उसे सम्माननीय स्थान नहीं मिलता। हर कोई उसे हिकारत की नजर से देखता है।
        शारीरिक शक्ति के न होने पर भी जो मानसिक बल से सशक्त होते हैं वे किसी से भी भिड़ जाते हैं और सफल हो जाते हैं। शरीरिक बल हो पर व्यक्ति मन से सामना करने के लिए तैयार न हो तो सफलता सन्दिग्ध होती है। इसलिए ऋषि-मुनि ईश्वर से सदा मानसिक बल प्रदान करने के लिए प्रार्थना करते हैं। 
          आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए मनुष्य को अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए अपनी छोटी-छोटी सफलताओं को मान्यता देनी चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। यह बात अपने मन में अच्छी तरह बिठा लेनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता। अतः अपनी गलतियों और कमजोरियों को खुले मन से स्वीकार करेना चाहिए। अपने अन्तस् की नकारात्मकता को दूर करके सकारात्मकता को अपनाना चाहिए।
          मन के मजबूत होने पर इन्सान हर प्रकार की चुनौतियों को ललकार सकता है। ऐसा मनुष्य किसी भी व्यक्ति के समक्ष अथवा कैसी भी परिस्थिति हो अडिग रहता है। ऐसे उच्च मनस्थिति वाले साहसी ही चमत्कार करते हैं। यही लोग दुनिया में अग्रणी रहते हैं। समाज को दिशा-निर्देश देते हैं। लोग इनका अनुकरण करके गौरव का अनुभव करते हैं।
            मनुष्य को सदा साहसिक कदम उठाना चाहिए। उसे अपना आत्मविश्वास किसी भी मूल्य पर नहीं खोना चाहिए। जहाँ तक हो सके माँ को बचपन से ही बच्चे को स्वावलम्बी बनाना चाहिए। उसके मन में किसी प्रकार का डर हावी नहीं होने देना चाहिए। यदि बचपन से ही मन में डर घर कर जाए तो इन्सान आयु पर्यन्त साहसिक कार्य नहीं कर सकता।
        मनुष्य को जीवन की चुनौतियों के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए बल्कि उससे टक्कर लेकर उसे मात देनी चाहिए। अपने मनोबल को बढ़ाने के लिए वीरों की गाथाएँ पढ़नी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

इन्सानियत से उठता विश्वास

इन्सानियत से उठता विश्वास

इन्सानियत से दिन-प्रतिदिन मनुष्य का विश्वास उठता जा रहा है। संसार में प्रायः लोग अपना हित साधने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए वे आज संवेदना शून्य होते जा रहे हैं। उनकी यह प्रवृत्ति निस्सन्देह समाज में चिन्ता का विषय बनती जा रही है। माना जाता है कि जिस व्यक्ति में संवेदना नहीं है, वह तो मृतप्राय होता है। 
         समाज में लगातार घटने वाली अमानवीय और हिंसक घटनाओं को देखते हुए इन्सानियत से जनमानस का विश्वास उठता जा रहा है। अपनों और करीबी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले धोखे और व्यक्ति का बढ़ता हुआ अकेलापन भी इसके लिए जिम्मेदार है। टीवी चैनल सारा दिन इन नकारात्मक समाचारों को बार-बार दिखाते रहते हैं। समाचारपत्रों में भी इन समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। सोशल मीडिया भी इस रेस में पीछे नहीं है। इस कारण समाज की एकतरफा और डरावनी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है।
          ऐसे मनुष्य को लोग पत्थर दिल इन्सान कहते हैं यानी वे समाज में क्रूर कहे जाते हैं क्योंकि उनके सीने में दिल नाम की चीज नहीं होती। वे पत्थर की तरह कठोर माने जाते हैं। उनके हृदय में दया, ममता, करुणा और सहृदयता आदि गुण बिल्कुल नहीं होते। 
          कुछ समय से संसार के कितने ही देश युद्ध की विभीषिका से झुलस रहे हैं। न जाने कितने ही निर्दोष लोग काल कवलित हो रहे हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि हो रही है। पता नहीं कब इस सबका अन्त होगा, कहा नहीं जा सकता।
          आज के समय में चारों तरफ फैली हिंसा, स्वार्थ और अपराध की घटनाओं को देखकर कई बार इन्सानियत पर से विश्वास उठने लगता है। इस श्रेणी में आतंकवादी, चोर, डाकू, समाज विरोधी गतिविधियाँ करने वाले नृशंस लोग आते हैं। इसलिए कोई भी इनके सामने नहीं आना चाहता। लोग उनसे भयभीत रहते हैं और उनके साथ सम्बन्ध बनाने में रुचि नहीं रखते।
          सत्य यही है कि कुछ बुरे लोगों या घटनाओं से पूरी इन्सानियत खत्म नहीं होती। आज भी संकट के समय लोग बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद के लिए आगे आते हैं। दुनिया में नेकी, प्यार और करुणा आज भी जीवित है, जो इस समाज को थामे हुए है। इन्हीं लोगों के कारण संसार बचा हुआ है। बुरे लोग संख्या में कम होते हैं परन्तु उनका शोर अधिक होता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि इन्सानियत समाप्त हो गई है।
          आज लोग ईश्वर की भक्ति भी अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। जो दाता सदा सबके लिए अपने भण्डार खोले बैठा रहता है, उससे अपना काम करवाने के लिए, उसे रिश्वत देने का असफल प्रयास करते हैं। मनुष्य को जब कुछ चाहिए होता है अथवा कष्ट-परेशानी में होता है तो वह मालिक से प्रार्थना करता है परन्तु फिर बाद में उसे भूल जाता है। 
        कहा जाता है कि पत्थर की मूर्तियों को लोग इसीलिए पूजने लगे हैं क्योंकि आज विश्वास करने लायक इन्सान बहुत कम मिलते है। यह सत्य है कि पत्थर से यदि प्रहार किया जाए तो वह सामने आने वाले सबको समान रूप से चोट पहुँचाता है अर्थात् घायल कर देता है। 
        पत्थर की यही तारीफ है कि कुछ भी उपाय कर लो वह पिघलता नहीं है। उसकी अन्य विशेषता यह भी है कि वह स्वयं कभी नहीं बदलता। उसे आकार विशेष देने के लिए मूर्तिकार को अथक प्रयास करना पड़ता है।
          पत्थर को जिस प्रकार सधे हुए हाथ तराशते हैं तो वे उसमें मानो प्राण डाल देते हैं। उसे मनचाहा आकार देने में कलाकार समर्थ होते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की संगति और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करने से मनुष्य को भी मनचाहा आकार दिया जा सकता है। 
          सुप्रसिद्ध रामचरित के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि (रत्नाकर डाकू ) और बौद्धधर्म के सन्यासी (अंगुलिमाल डाकू) इसके प्रत्यक्ष उदाहरण कहे जा सकते हैं। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास की खोज करने पर मिल जाएँगे।
          मनुष्य में जब तक मानवोचित गुणों का समावेश नहीं होता तब तक उसका कद ऊँचा नहीं होता। इन्सानियत से ही इन्सान का कद बढ़ता है केवल चौखटों की ऊँचाई बढ़ा लेने से कुछ नहीं होता। मनुष्य की महानता का बखान तभी होता है जब वह मानवता की भलाई के लिए कार्य करता है। अन्यथा उसे भूल जाने में इस जमाने को बिल्कुल भी समय नहीं लगता।
          इस संसार में इन्सान सब कुछ बन सकता है, दुनिया के सारे कार्य-व्यवहार कर सकता है किन्तु एक सच्चा इन्सान बनना वास्तव में उसके लिए सबसे कठिन कार्य होता है। इस ओर उसे प्रयास करना चाहिए।
          मनुष्य अपने इस जीवन में यदि सफलता की बुलन्दियों को छू लेता है तो उसे सबके साथ विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। तभी वह लम्बे समय तक उस स्थान पर बना रह सकता है। उसे सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि समाज में इस पद को पाने के लिए उसे कितना संघर्ष करना पड़ता है। 
        परन्तु इसके विपरीत यदि वह उस मुकाम पर पहुँचने के बाद इन्सानियत को भूलकर अहंकारी अथवा स्वार्थी हो जाता है तो शीघ्र ही सबकी आँखों की किरकिरी बन जाता है। तब उसे पटकनी देने के लिए बहुत लोग तैयार हो जाते हैं। यथा सम्भव प्रयास यही करना चाहिए कि इन्सान कभी अपनी इन्सानियत को न छोड़े।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

जिन्दगी का गणित बहुत ही‌ विचित्र

जिन्दगी का गणित बहुत ही विचित्र

मनुष्य की जिन्दगी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वह किसके लिए जी रहा है? यद्यपि वह स्वयं और अपने परिवार की खुशहाली के लिए अपनी सारी ताकत झौंक देता है तथापि सारी आयु इस सत्य से अनजान रहता है कि उसके लिए कौन जी रहा है? उसकी असली ताकत कौन लोग हैं?
        जिन्दगी कदम-कदम पर मनुष्य की कड़ी परीक्षा लेती है। इस परीक्षा में उसे नम्बर तो नहीं मिलते पर उसमें उसका उत्तीर्ण होना आवश्यक होता है। उस समय उसे अनेक प्रकार के कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लोग यदि सच्चे मन से उस परमात्मा को याद करते रहें तो यह निश्चित है कि वे जीवन की कठोर परीक्षा में अवश्य पास हो जाता है।
          इस धरती पर कोई भी ऐसा इन्सान नहीं है जिसे किसी समस्या से दो-चार न होना पड़े। इसी तरह इस पृथ्वी पर कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न किया जा सके। मनुष्य को समस्या के बारे में सोचते रहने पर बहुत से अनावश्यक बहाने मिल जाते हैं। इसके विपरीत इसके समाधान पर विमर्श करने से कोई-न-कोई हल अवश्य निकल आता है। 
          जीवन का मार्ग बहुत ही कठिन है, काँटों से भरा हुआ है। इसे सरल नहीं बनाया जा सकता। परन्तु स्वयं को मजबूत बना लेने से मनुष्य को उसका सामना करने की शक्ति मिलती है। जिन्दगी में ऐसा समय कम ही आता है जिसे हम बहुत अच्छा (golden period) कह सकते हैं। समय को अपने अनथक प्रयास व परिश्रम से अपने अनुकूल बनाना पड़ता है।
          जब मनुष्य जीवन में संघर्ष के पथ पर चल रहा होता है, उस समय वह निपट अकेला होता है। जब उसे सफलता मिलती है तब बहुत से लोग उसके साथ चलने लगते हैं। वह उनका आदर्श बन जाता है। परन्तु जब उसे मूर्ख समझकर संसार उस पर हँसने लगता है तब वह हिम्मत करके चमत्कार करता है और नए इतिहास की रचना करता है। ऐसे बहुत से लोगों के उदाहरण इतिहास के पन्नों में छिपे हुए हैं। उन्हें खोजना आवश्यक है।
        इस जिन्दगी का गणित बहुत ही विचित्र है। जितना हो सके अपने व्यवहार से मित्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए और शत्रुओं को कम करना चाहिए। अपने दुखों को दूर करने के लिए दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने पर मनुष्य को मानसिक सुख और शान्ति मिलती है। इस प्रकार परोपकार के कार्य करके वह अपने अच्छे समय का भी सदुपयोग कर सकता है। समाज में अपना सम्माननीय स्थान बना सकता है।
        यथासम्भव अपने अहंकार को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से मनुष्य को अपनों का प्यार और सहारा मिलता है। यही उसकी पूॅंजी होते हैं। इससे उसका शेष जीवन बड़ी सुविधा से व्यतीत होता है।
          मनुष्य की यह जिन्दगी दो पल की है अर्थात् कुछ ही समय के लिए उसे यह जीवन मिला है। इसलिए उसे कोशिश यही करनी चाहिए कि वह कुछ ऐसे कार्य अपने जीवन में कर जाए जिससे फूलों की तरह उसकी सुगन्ध चारों ओर बिखरती रहे। लोग उसके इस संसार से चले जाने के बाद भी उसे याद करते रहें। समस्या यह है कि मनुष्य जब जीना आरम्भ करता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उस समय वह अपने करणीय कार्यों को चाहकर भी पूर्ण नहीं कर पाता।
        मनुष्य को अपने रिश्तों को मोतियों की तरह सदा सहेजकर रखना चाहिए। यदि कोई सम्बन्धी रूठकर अलग हो जाए तो उसे मनाकर अपने करीब लेकर आना चाहिए। उनके किसी भी व्यवहार से मनुष्य को अपनी शान्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। इन्सान दुनिया से लड़ सकता है पर अपनों से नहीं। इसका कारण है कि अपनों से उसे होड़ नहीं लगानी होती बल्कि उनके साथ अपना जीवन बिताना होता है। रिश्तों की डोर गलतफहमी होने के कारण कमजोर पड़ती है।
        जिन्दगी में भी तूफान की सी हलचल मचाने दुख, कष्ट, परेशानियाँ आदि आते रहते हैं। इनका आना भी जरूरी है, नहीं तो एक ही ढर्रे पर जीवन को सीधा-सीधा चलता हुआ इन्सान उकता जआता है। इसी समय यह पहचान हो पाती है कि कौन हाथ छुड़ाकर भागता है और कौन हाथ पकड़कर चलता है। यानी कौन अपना है, कौन अपनेपन का दिखावा कर रहा है और कौन पराया है। जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो मनुष्य को लाभ तो नहीं पहुँचाते पर अपने साथ से उसे अमीर अवश्य बना देते हैं।
          जीवन जीने के लिए अपनों का साथ और सच्चे सहयोगियों की आवश्यकता होती है। प्रयास यही करना चाहिए कि हितचिन्तकों को अपने से दूर न किया जाए और अपने मित्रों की सूची बड़ी करते हुए अपने शत्रुओं को भी अपना प्रिय बना लिया जाए। 
       शब्द शब्द से ज़िन्दगी को जोड़ते चले जाने से एक दिन किनारा मिल ही जाता है। रास्ता कठिन अवश्य है और चुभन भी असहनीय होती है । अपनी कदमो का इस्तेमाल करते हुए मनुष्य इस भाव सागर को पार कर ही जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

लेन-देन का सम्बन्ध

लेन-देन का सम्बन्ध

जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त ऐसी अनेक घटनाएँ मनुष्य के जीवन में घटती रहती हैं जिनका कारण उसका प्रारब्ध होता है। प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। प्रारब्ध कर्म तीन प्रकार के होते हैं -  मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम ।
        कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं। तब वे अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इस प्रारब्ध कर्म को सामान्य जीवन के क्रम में बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है। 
           मनुष्य के कर्म से ही उसका प्रारब्ध बनता है। प्रारब्ध कर्म को अपने वर्तमान जन्म में भोगना होता है। दूसरे शब्दों में हम इसे उत्पति कर्म भी कह सकते हैं जिसे व्यक्ति के जींस तय करते हैं कि उसका प्रारब्ध क्या होगा। मनुष्य जब माता के गर्भ में आता है, उसी समय से ही उसका प्रारब्ध निर्धारित हो जाता है। प्रारब्ध कर्म इस जन्म के भोगों का निर्धारण करते हैं। प्रारब्ध कर्म के अनुसार ही मनुष्य की जाति, आयु, गुण और उसके भोग का निर्धारण होता है। ज्योतिषी कुण्डली में प्रारब्ध को नवम भाव या नवमेश से देखते है। प्रारब्ध कर्म के विषय में सन्त तुलसीदास जी 'रामचरितमानस' में हमें समझाते हुए कहते हैं-
        प्रारब्ध  पहले रचा, पीछे  रचा  यह  शरीर।
        तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्रीरघुबीर।। 
अर्थात् इस प्रसिद्ध दोहे में सन्त तुलसीराम जी ने बताया है कि भगवान ने मनुष्य के जन्म लेने से पहले ही उसके भाग्य (प्रारब्ध) और जीवन के भरण-पोषण की व्यवस्था कर दी है और इस शरीर का निर्माण बाद में होता है। इसलिए हमें अपने भविष्य या अपने जीवन निर्वाह की चिन्ता को छोड़कर ईश्वर का भजन करना चाहिए।
        कर्मसिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक सकारात्मक कर्म मनुष्य के पुण्य का कारक होता है और उसका सकारात्मक फल अर्थात सुख उसे प्राप्त होता है। इसी तरह प्रत्येक नकारात्मक कर्म से मनुष्य पाप को उत्पन्न करता है। उसे नकारात्मक फल यानी दु:ख के रूप में उसे ही भुगतना पडता है। यह कर्मसिद्धान्त अपरिवर्तनशील है, अटल है। 
        व्यक्ति का वर्तमान जन्म उस परिवार में होता है जिसकी परिस्थिति उसका प्रारब्ध भोगने के लिए अनुकूल हो। उस परिवार के सदस्यों के साथ उसका पूर्वजन्म का लेन-देन का सम्बन्ध होता है। अपने जीवन की सम्पूर्ण यात्रा में मनुष्य किसी पुराने लेन-देन को चुका रहा होता है या फिर कोई नया लेन-देन कर रहा होता है। यदि यह लेन-देन इस वर्तमान जन्म में न निपट सके तो उसे आगामी जन्मों में बराबर करना पड़ता है। 
         मनीषियों के अनुसार यह सम्भव है कि आने वाले जन्म में वर्तमान जन्म के परिवार वालों के साथ होने वाला उसका सम्बन्ध और लिंग बदल जाए। हो सकता है कि इस जन्म का पिता है अगले जन्म में उसके बेटे, बेटी या अन्य सम्बन्धी के रूप में जन्म ले।
         मनुष्य का शरीर किसी दिन किस प्रकार व्यवहार करेगा, वह इस बात पर निर्भर करता है कि उस दिन उसका प्रारब्ध किस तरह का है। ज्ञानी जन ही यह रहस्य जान सकते हैं। 
        कई बार साधारण प्रतिभा वाले लोगों को उस दिन घटने वाली किसी घटना का ज्ञान हो जाता है। कभी-कभी मनुष्य जब प्रात:काल जागता है तो कुछ विचित्र-सा अनुभव करता हैं। पर वह उसमें छिपे हुए अर्थ को समझ नहीं पाता। स्वप्न में उसे कुछ ऐसे लोग दिखाई देते हैं जिन्हें वह पहचानता है और कुछ लोग ऐसे दिखाई देते हैं जिन्हें वह जानता तक नहीं।
        कुछ स्वप्न भी प्रारब्ध से जुड़े होते हैं। इसका अर्थ यह है कि उस तन्त्र में बहुत बड़ी मात्रा में यादें जमा रहती हैं। ये सभी यादें यदि एक साथ मनुष्य के स्वप्न में आ जाएँ तो दिमाग की नसें मानो फटने लगती हैं। ये यादें इतनी अधिक होती हैं कि इन्हें सम्हाल पाना मनुष्य के लिए बहुत कठिन हो जाता है। स्वप्नों में हर प्रकार की अजीबोगरीब घटनाएँ शामिल होती हैं।
        इसलिए प्रकृति ने एक ऐसा रास्ता निकाला है कि याददाश्त के एक हिस्से से मनुष्य को एक ही एक बार में निपटना होता है। यह प्रारब्ध का ही एक रूप है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रारब्ध में जो यादें अपना काम कर रही होती हैं, वे मनुष्य के अन्तस् में ही विद्यमान होती हैं। जब वे सामने उभर कर आती हैं तो यदा कदा भविष्य की घटनाओं का संकेत भी दे जाती हैं।
        यदि कोई समझ सके तो प्रारब्ध के स्वप्न कई बातों की ओर संकेत करते हुए बहुत-सी गुत्थियों को सुलझा देते हैं। जो लोग अपने जीवन को बहुत बारीकी से देखते हैं, वे नशीले और उत्तेजक पदार्थों से दूर रहते हैं। अगर ऐसे पदार्थों का सेवन किया जाए तो मनुष्य कोई भी चेतावनी समझ नहीं सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

प्राणशक्ति से जीव का जीवन

प्राणशक्ति से जीव का जीवन 

प्राणशक्ति जीव के शरीर में विद्यमान रहती है। यद्यपि यह हमें दिखाई नहीं देती। इसके कारण ही जीव का यह जीवन होता है। जब यह प्राण शरीर से बाहर निकल जाता है तो जीव की मृत्यु हो जाती है। तब उस निर्जीव शरीर का संस्कार कर दिया जाता है। कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसे विदा करना ही पड़ता है। यही ईश्वरीय विधान है। हम सभी मोटे तौर पर शरीर में विद्यमान प्राणवायु के विषय में मात्र इतना ही जानते हैं।
         आयुर्वेद और योग विज्ञान के अनुसार प्राण वायु शरीर की मुख्य पॉंच वायुओं  में से एक है जो हमारे जीवन और अस्तित्व का आधार होती है। प्राण वायु बाहर की ताजी हवा (ऑक्सीजन) को अन्दर लेने (निःश्वास) और क्रिया को संचालित करने का कार्य करती है। भोजन, पानी और ऊर्जा को शरीर के भीतर ग्रहण करने में मदद करती है। यह मस्तिष्क, हृदय, बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियों को सक्रिय और सन्तुलित रखती है। यह शरीर को जीवित रखती है और सम्पूर्ण तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) को ऊर्जा प्रदान करती है।
प्राण वायु का मुख्य स्थान मूर्धा या सिर, मस्तिष्क, छाती या उर और कण्ठ (गला) है। 
          आज हम शरीर में रहने वाले दस प्रकार के प्राणों की चर्चा करते हैं। शास्त्रों में प्राण को दस भागों में विभक्त किया है। जिनमें पाँच मुख्य प्राण हैं और पाँच उपप्राण हैं। पाँच महाप्राणों को ‘ओजस’ और पाँच लघुप्राणों को रेतस’ कहते हैं। 
पाँच मुख्य प्राण हैं - प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। 
पाँचों उपप्राण हैं -  नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।  
          जिस प्रकार शरीर में विद्यमान दोनों कान, दोनों आँखें, दोनों नथुने, दोनों हाथ और दोनों पैर एक-दूसरे की सहायता करते हैं, उसी प्रकार ये महाप्राण और लघुप्राण परस्पर एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक होते हैं। ये दसों प्राण मिलकर हमारे शरीर का संचालन करते हैं-
1 प्राण- हृदय में रहकर श्वास को बाहर-भीतर करने की प्रक्रिया करती है। है। अन्न पानादि को पचाती है। प्राण वायु मुख, नासिका, हृदय, नाभि, कुण्डलिनी के चारों ओर तथा पादाँगुष्ठ में रहती है। 
2 अपान-  मूलाधार में स्थित स्थूल मलों का विसर्जन करता है। देह के भीतर पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, कफ, कीचड़, विष आदि विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकालता है। यह क्रिया न हो सके तो अपच, जुकाम आदि अनेक रोग पैदा हो जायेंगे। अपान पर नियन्त्रण न जानते हुए भी जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्राय: रोगों में ग्रसित हो जाते हैं।
3 समान- नाभि में शरीर को यथा स्थान रखने का काम करता है। उदाराग्नि के कला को लेकर सर्वांग में समान रहता है।
4 उदान-  कण्ठ में रह कर शरीर की वृद्धि करता है। सभी संधियों(जोड़ों) तथा हाथों और पैरों में उदान रहता है। उदान विविध वस्तुएँ बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है।
5 व्यान- व्यान का काम रक्त-संचार है। सम्पूर्ण शरीर में लेने और छोड़ने आदि का धर्म करता है। कर्ण, नेत्र, कण्ठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबँध में व्यान रहता है । 
6 नाग- मनुष्य के मुँह से डकार के रूप में निकालता है। 
7 कूर्म-  नेत्रों की पलकों को बन्द करने और खोलने का कार्य कूर्म करता है। कूर्म यदि सुषुप्त अवस्था में होता है तो शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भधारण नहीं हो सकता।
8 कृकल- छींक मारने का कार्य कृकल करता है।
9 देवदत्त- जम्हाई लेने का कार्य करता है।
10 धनञ्जय- सारे शरीर में व्याप्त रहता है। शरीर के मृत हो जाने पर यह चार घण्टे तक वहाँ विद्यमान रहता है।
          प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है। प्राण के द्वारा ही हृदय की धड़कन होती है, रक्त संचार होता है और साँस आती-जाती है। इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती हैं। प्राण में जब शिथिलता आने लगती है , उस समय जीवनी शक्ति का ह्रास होने लगता है। उसके बिल्कुल कम हो जाने पर हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है। जिसे जीव की मृत्यु कहा जाता है।
          समाधि की अवस्था में योगी प्राण को नियन्त्रित करते हैं। इन्हें जीते बिना हृदय में स्थित कमल पर ध्यान नहीं लगाया जा सकता। योगी प्राणों का निरोध करके जब चाहें तब शरीर में प्राण का स्पन्दन बढ़ा सकते हैं। जब तक उनका प्राण ब्रह्माण्ड में संचित रहता है तब तक उनके हृदय की धड़कन बन्द रहती है और शरीर मृततुल्य प्रतीत होता है। इसीलिए उन्हें दीर्घकालीन समाधि सुख मिलता है।
        इन प्राणों का संयम करके ही दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखकर भीष्म पितामह की तरह इच्छा मृत्यु पाना सम्भव होता है। 
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

अन्न का निरादर ब्रह्म का निरादर

अन्न का‌ निरादर ब्रह्म का अनादर

अपनी थाली में मनुष्य को उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना वह आराम से खा सकता है। यदि आवश्यकता से अधिक अन्न थाली में डाल लिया जाए तो मनुष्य उसे खाने में असमर्थ हो जाता है। अतः वह बच जाता है और फिर उस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान में फैंक दिया जाता है। इस तरह यह अनमोल अन्न बरबाद होता रहता है।
          अन्न का एक-एक दाना बहुत ही मूल्यवान होता है। उस एक दाने को जब बीज के रूप में किसान बोता है तब वह उस बीज को बहुत-से अनाज में बदल लेता है। इस अन्न के हर दाने को उपजाने के लिए किसान हर मौसम में दिन-रात अथक परिश्रम करता है। 
        किसान सर्दी, गर्मी, बरसात की परवाह नहीं करता। जीवन भर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, भूकम्प, जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भी सहन करता है। अपना सारा आराम छोड़कर, अपना खून-पसीना एक करके हम सबके लिए अनाज उपजाता है। बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारा अन्नदाता किसान स्वयं भूखा रह लेता है परन्तु हम सबको पोषित करने का दायित्व बखूबी निभाता है। हम उसके इस परिश्रम का कभी मूल्य नहीं लगा सकते।
        अन्न को बर्बाद करके हम अन्न की बर्बादी तो करते ही हैं और किसान के खून-पसीने के साथ ही उसके सपनों को भी चकनाचूर करते हैं। फिर भी वह धर्म नहीं त्यागता।
        इस अन्न का मूल्य उन लोगों से अधिक कौन जान सकता है जिनके घरों में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता। बड़े दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अपने आसपास हम बच्चों को कचरे से बीनकर खाते हुए देखते हैं। जिन स्थानों में दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है या बाढ़, भूकम्प, तूफान आदि दैवी आपदाओं के कारण लोगों को घर से बेघर होकर विस्थापितों सा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। दो जून रोटी कमाने के लिए मनुष्य कितने पापड़ बेलता है, स्याह-सफेद करता है। सभी पाप-दुराचार करता है। संस्कृत भाषा के 'पंचतन्त्र' नामक ग्रन्थ में कवि विष्णु दत्त ने कहा है -
             बुभुक्षित:किं न करोति पापम्।
अर्थात् भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप है जो नहीं करता यानी वह क्या कुछ नहीं कर गुजरता?
      ‌  भूख से व्याकुल इन्सान भगवान से यहाँ तक कह देता है-
        भूखे भजन न होई गोपाला, 
        ले ले अपनी कण्ठी माला।
        यदि मनुष्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के विषय मे सोच ले, कचरे से खाते और भूख से बिलबिलाते बच्चों के बारे में सोच ले तो कभी अन्न की बर्बादी नहीं कर सकेगा। उसे बर्बाद करने से पहले दस बार सोचेगा।
        यदि मनुष्य भोजन को ईश्वरीय प्रसाद के रूप में मान ले तो वह अनाज को इस तरह कभी बर्बाद नहीं कर सकता। जब उसके मन में यह भाव आ जाएगा कि अन्न भगवान का प्रसाद है तब वह अपनी थाली में उतना ही भोजन लेगा जितना वह खा सकेगा। इस तरह करने से अनाज व्यर्थ नहीं जाएगा। जिसकी बर्बादी का कारण भोजन थाली में भर-भरकर लेना हैं और न खा सकने की स्थिति में झूठा छोड़ देना है। 
        इसके विपरीत प्रसाद को लोग हाथ में लेकर खाते हैं और यदि गलती से वह कभी जमीन पर गिर जाए तो उसे उठाकर अपने माथे से लगाते हैं और फिर उसे खा लेते हैं। प्रसाद का एक भी दाना बरवबाद नहीं कर सकते। इसे हम धर्मभीरूता भी कह सकते हैं। 
        यदि अन्न को प्रसाद मान लेने से उसे बर्बाद होने से बचाया जा सकता है तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है। हर हाल में अन्न का संरक्षण किया जाना चाहिए।
          यह अहं कदापि नहीं करना चाहिए कि हमारे पास पैसा है तो हम मँहगा-सस्ता कैसा भी हो अनाज खरीद कर अपना पेट भर सकते हैं। अब यह अन्न हमारा है हम चाहे इसे खाएँ या बर्बाद करें किसी को हमसे क्या लेनादेना?
        यह प्रवृत्ति बहुत कष्टप्रद है। हम शादी-ब्याह या पार्टियों में अन्न को बर्बाद होते हुए देखते हैं। मन को पीड़ा होती है। यही भोजन यदि किसी भूखे व्यक्ति को खाने के लिए दिया जाए तो उसका पेट भर जाए और उसके मन से कितनी ही दुआएँ निकलेंगी। बड़े ही जब इस ओर ध्यान नहीं देते तो बच्चों को वे अन्न को सुरक्षित रखने के लिए क्या समझाएँगे?
          भारतीय सस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहते हैं। अन्न का अनादर करना ईश्वर का अपमान करना माना जाता है। इसीलिए भोजन खाने के समय जब थाली में अन्न परोसा जाता है तो पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना की जाती है।
          उपनिषद का यह कथन है -  
       जो अन्न को नष्ट करता है, अन्न उसे ही 
       नष्ट कर देता है।
         इसलिए अन्न को न सही स्वयं को बचाने के लिए ही उसका सम्मान कर लेना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद