बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

बच्चों को स्वावलम्बी बनाऍं

अपने बच्चों को जहाँ तक हो सके बचपन से ही स्वावलम्बी (independent) बनाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से छोटे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। उस समय उन्हें ऐसा लगता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। इसलिए माता-पिता उन पर विश्वास करने लग गए हैं।
               बच्चे हर काम को स्वयं करना चाहते हैं। हम देखते हैं कि बहुत छोटे बच्चे दूध पीते समय बोतल को स्वय पकड़ना चाहते हैं। उन्हें खाना होता है तो चम्मच अपने हाथ से पकड़ने की जिद करते हैं, चाहे वे खा पाएँ या बिखेरते रहें। सबके बीच में बैठा हुआ बच्चा यही कोशिश करता है कि अपनी प्लेट से खाना खुद ही खाए। जो भी दाल-सब्जी वगैरह बड़ों की प्लेट में हैं, वे सब पदार्थ उनकी प्लेट में भी होने चहिए।
             बच्चे जब थोड़े और बड़े होते हैं तब बड़ों की देखा-देखी वे भी स्वयं ही अपना खाना परोसना चाहते हैं। हर बात पर उनका यही उत्तर होता है कि वे अब बड़े हो गए हैं। उनके इस कथन का मान रखते हुए थोड़े-थोड़े काम उन्हें सौंपने चाहिए। सच मानिए बच्चे बहुत खुश होते हैं जब उन्हें यह अहसास होता है कि वे बड़े हो गए हैं। इसलिए उन्हें काम करने के लिए कहा गया है।
              पापा घर से दफ्तर जाते है या दफ्तर से वापिस घर आते हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चा भाग-भागकर पापा की सेवा में हाजिर हो जाता है। वह उनके कहे कामों को करके और उनसे शाबाशी पाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। इसी तरह अपनी माँ को घर का काम करते देख बच्चा भागकर हाथ बटाने चला आता है। कभी वह डस्टिंग करने लगता है तो कभी झाड़ू उठा लेता है। कभी-कभी तो वह रोटी बनाने तक की जिद कर बैठता है। वह बात अलग है कि ऐसा करते समय काम कुछ अधिक फैल जाता है।
              इसी तरह घर में रहने वाले पालतू जीव को खिलाना, उसके साथ खेलना और उसे घूमाना भी वह पसन्द करता है। पौधो को पानी देने में भी उसे मजा आता है। उसका खेल भी हो जाता है और काम भी हो जाता है। बच्चे को प्रोत्साहित करते हुए उसे काम करने की आदत डालिए। हो सकता है कि निकट भविष्य में विदेशों की तरह यहाँ हमारे देश में भी काम करने वाले नहीं मिलें। उस समय बच्चों के साथ मिल-जुलकर बिना परेशान हुए आप सभी कार्य कर सकेंगे।
             बच्चा जब चलना शुरू करता है और बात को समझने लगता है तभी से उसे स्वावलम्बी बनाने की ट्रेनिंग देनी पड़ती है। छोटा-छोटा सामान रसोई में रखकर आना, खिलौने सम्हालने में मदद करना, अपने जूते व कपड़े पहनना, कचरा इधर-उधर न फैंकर कूड़ेदान में डालकर आना आदि कार्य करने के लिए बच्चे को सिखाया जाना चाहिए।
             जब और बड़ा हो तब उसे उसकी आयु के अनुसार घर में कार्य दिए जाने चाहिए। बाजार से दूध, ब्रेड, आइसक्रीम या और जरूरत का छोटा-मोटा सामान लाने के लिए सिखाया जाए। एकाध बार यदि कोई गलती हो जाए तो उसे डाँटने के बजाय प्यार से समझाएँ ताकि उसका उत्साह बना रहे। उसे यह कभी नहीं लगना चाहिए कि उसके हर काम में मीनमेख निकालकर उसे लताड़ा जाता है। दो-चार बार ऐसा हो जाने पर उसका आत्मविश्वास डगमगा जाएगा।
               ज्यो-ज्यों बच्चे बड़े होते हैं त्यों-त्यों वे स्वावलम्बी बनते जाते हैं। उन्हें इतनी ट्रेनिंग अवश्य दी जानी चाहिए कि वे अपना पेट भरने लायक कुछ भी बना सकें। ऐसा करने पर उनके भूखे रहने की चिन्ता नहीं रहती और माता-पिता भी निश्चिन्त होकर अपने कार्य कर पाते हैं।
              बच्चों को स्वावलम्बी बनाने के लिए उन्हें छोटी आयु से ही उनके निजी काम करने देने  चाहिए। जैसे कपड़े पहनना, अपना बैग पैक करना आदि। उम्र के अनुसार घरेलू जिम्मेदारियॉं यानी पौधों को पानी देना, मेज साफ करना आदि कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को  विकसित करना चाहिए। अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही खोजने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि वे गलती करें तो उन्हें निराश नहीं करना चाहिए। उन्हें गलतियों से सीखने में माता-पिता को सहायता करनी चाहिए। वे अपनी ओर से जो भी प्रयास करें, उनकी सराहना करनी चाहिए।
             माता-पिता का यह दायित्व बनता है कि बच्चों को अनावश्यक ही प्रोटेक्ट न करके उन्हें बचपन से ही स्वावलम्बी बनाएँ। उन्हें सही और गलत की शिक्षा भी देनी चाहिए जिससे बच्चे अपने भले-बुरे की पहचान कर सकें। अपने लिए फैसले लेने की समझ उनमें आ सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

जीवन की डोर

जीवन की डोर 

हम सबके मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से बार-बार उठती है कि क्या मनुष्य के जीवन की डोर उसके हाथ में है? यदि उसके हाथ में डोर नहीं तो किसके हाथ में  है? क्या सारा जीवन वह ऊपर वाले के इशारों पर ही नाचता रहेगा?
             इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि मनुष्य इस रंगमंच रूपी संसार में अपने चरित्र अथवा निर्धारित पात्र का अभिनय करने आया है। जो भी रोल उसे डायरेक्टर ईश्वर ने दिया है, उसे दक्षता से निभाना ही उसका दायित्व है। यदि वह अपना किरदार बखूबी निभाता है तो उसे लोगो की सराहना रूपी तालियाँ मिलती रहती हैं। चारों ओर उसका यश फैलता है। लोग उस मंझे हुए अभिनेता को अपनी सिर-आँखों पर बिठाते हैं। उसका मूल्य इस संसार रूपी रंगमंच पर बढ़ जाता है। सभी लोग उसे अपने पक्ष में करने के लिए मिन्नतें करने लगते हैं अथवा जुगाड़ करते रहते हैं।
             इसके विपरीत यदि मनुष्य अपना किरदार निभाने में चूक हो जाता है तब उस पर सड़े-गले टमाटर व अंडे फैंके जाते हैं। यानी जीवन में उसे अपमान के घूँट कदम-कदम पर पीने पड़ते हैं। जीवन की बाजी हारे हुए ऐसे अभिनेता का मूल्य लोगों की नजर में कम हो जाता है। उसे इस रंगमंच पर अभिनय करने के लिए अच्छा रोल नहीं मिलता। यूँ कहें तो वह नाकारा घोषित कर दिया जाता है। ऐसे अभिनेता को फिर कोई अच्छा रोल नहीं मिल पाता।
              जीवन सिनेमा की तरह नहीं होता। यहॉं उसे रंगमंच पर द्रष्टाओं के समक्ष अभिनय करना पड़ता है। वास्तविकता यही है कि यह संसार एक रंगमंच है। हम सभी जीव यहाँ अपना एक विशेष किरदार निभाने के लिए भेजे जाते हैं। कोई राजा तो कोई रंक, कोई अमीर तो कोई गरीब, कोई पुलिस तो कोई चोर, कोई जज तो कोई अपराधी, कोई साधु और कोई फरेबी, कोई नेता तो कोई अभिनेता। इस तरह अच्छे और बुरे सभी तरह के चरित्र वाले पात्र इस रंगमंच पर वह मालिक भेजता है। पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों के अनुसार ही वह हमारा रोल इस जन्म मे निर्धारित करता है।
             हमें साथी कलाकार यानी नाते-रिश्तेदार व भाई-बन्धु वही मिलते हैं जिनके साथ कभी हमारा पूर्वजन्मों के सुकर्मों अथवा कुकर्मों का बकाया शेष होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिनके साथ हमारा लेन-देन का सम्बन्ध होता है, उनके साथ ही हमें रिश्ता निभाना होता है। यह हमारी विवशता होती है कि हम उनसे अपनी नजरें चुराकर दूर नहीं भाग सकते। उनके साथ रहते हुए हमें जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों को  इच्छा अथवा अनिच्छा से सॉंझा‌‌ करना पड़ता है।
              यदि हम उस ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो अगले जन्म के लिए मालिक हम सबको और अधिक अच्छा रोल देकर पुनः इस संसार में भेजता है। जिसमें हमें सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और बन्धु-बान्धव मिलते हैं। जीवन में यश मिलता है, चारों ओर से हमें वाहवाही मिलती रहती है।
              इसके विपरीत यदि हम उस प्रभु की अपेक्षाओं पर किसी भी कारणवश खरे सिद्ध नहीं होते अथवा नाकारा सिद्ध हो जाते हैं तो वह आने वाले जन्म में अच्छा पात्र बनाकर नहीं भेजता। तब वह ऐसे-ऐसे रोल देता है जो सारा समय दुखों और परेशानियों में जीने वाले होते हैं। चारों ओर अपेक्षा, और तानों-उलाहनों को सहन करना पड़ता है। सारा जीवन अच्छा समय आने की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है।
              मनुष्य का जन्म या मरण कब होगा, उसे सुख अथवा समृद्धि मिलेगी या नहीं, उसके जीवन में कब सुख अथवा दुख आएँगे ये सब वही ईश्वर निर्धारित करता है। वह चाहे तो मनुष्य घर से बाहर कदम निकाल सकता है अथवा हाथ में पकड़ा हुआ रोटी का निवाला मुँह तक ले जाकर खा सकता है। मनुष्य चाहे भी तो कहीं छुपकर नहीं बैठ सकता क्योंकि वह हर क्षण, हर पल उस मालिक की नजर में रहता है।
             मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है। यदि वह इस स्वतन्त्रता का सदुपयोग करता है तो आगामी जन्म पुण्य कर्मों से भरा होता है। यदि मनुष्य उसका दुरुपयोग करते है तो सजा के रूप में निम्न योनियों में भेजता है। जैसे हम अपने बच्चों को अच्छा काम करने पर शाबाशी और पुरस्कार देते हैं और गलत काम करने पर सजा देते हैं। हम अपने बच्चों को कोई भी काम करने से पहले सदा चेतावनी देते रहते हैं, इसी प्रकार वह भी हमें अन्तरात्मा के द्वारा चेतावनी देता रहता है। यदि हम मान जाते हैं तब गलत काम नहीं करते और अगर सुनकर अनसुना करते हैं तो कष्ट पाते हैं।
             निष्कर्ष से स्वरूप में हम कह सकते हैं कि निश्चित ही मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है परन्तु उसका फल भोगने में नहीं। जहाँ तक हो सके जीवन में नियमानुसार जीने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

धन और बिमारी की चाल

धन और बिमारी की चाल

कुछ समय पूर्व विशाल वर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया था कि बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
             यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैं। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और उसे दिन-रात ही परेशान करते हैं। उस समय हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं, उसी तरह पलक झपकते ही वे चले भी जाएँ। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और पहले हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं । हमें मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ते हैं। फिर हमने समय और धन को खर्च करवाकर वापिस लौटते हैं।
          बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में प्रत्येक मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा या अनिच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को हम स्वेच्छा से प्रसन्नतापूर्वक करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है। परिवार हमारे साथ होता है। सभी परिवारी जन हमारे कष्ट में हमारे साथ खड़े होते हैं, वे चिन्ता करते हैं। वे अच्छे से अच्छा इलाज करवाते हैं। वे धन और समय भी व्यय करते हैं। पर हमारा दुख, हमारी तकलीफ नहीं बॉंटे सकते।
             सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्वजन्मों में बोयी होती है, वैसी ही तो काटनी पड़ती है। यानी उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होते हैं। इन सबसे बचना किसी भी तरह से सम्भव ही नहीं होता। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
        बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है, वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है। उस कष्ट के समय हम कितना भी रोना-धोना कर लें अथवा चिल्ला लें, उससे कुछ भी नहीं होता। उस समय बस अपने सभी जनों को हम परेशान करने का कारण मात्रा बन जाते हैं।
            अब हम धन की बात करते हैं। धन कमाने के लिए सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। वह रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह अथक परिश्रम करता है तब कहीं जाकर वह अपना और अपने घर-परिवार का पालन-पोषण कर पाता है। 
             कहते हैं पानी की एक-एक बूँद को डालते रहने से मटका भर जाता है, उसी प्रकार एक-एक पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात् कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है तब जाकर मनुष्य अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित कर पाता है। उस धन से वह अपने परिवार के लिए सुख-सुविधा के बारे साधन जुटाने में समर्थ होता है।
           खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान को किसी भी तरह के नशे अथवा रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बर्बादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं। वैसे भी सयाने कहते हैं कि यदि धन गलत तरीकों से कमाया जाए तो वह लम्बे समय तक मनुष्य के पास टिकता नहीं है। अनुचित साधनों से कमाया हुआ धन अपने साथ बहुत-सी बुराइयों को लेकर आता है।
          अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली तो हम इस जीवन में नहीं बना सकते परन्तु अपने वर्तमान जीवन में हमें ऐसा प्रयास अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें दबोचने न पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस जन्म में हमें अपने साधनों की शुचिता की ओर ध्यान अवश्य देना चाहिए।
           इस प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए। इसके अतिरिक्त खरगोश की चाल से आई हुई बिमारी हमें नैतिक और शारीरिक तौर पर तोड़ने में समर्थ नहीं हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सन्तुलित व्यवहार

सन्तुलित व्यवहार

'इतना मीठा न बनो कि कोई निगल जाए और इतना कड़वा भी न बनो कि कोई उगल दे'- यह उक्ति सचमुच विचार करने के लिए विवश करती है। मनुष्य को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। इसलिए उसे हमेशा यही यत्न करना चाहिए कि उसका व्यवहार सन्तुलित हो। उसके अपने ही व्यवहार के कारण किसी को गलतफहमी पैदा न होने पाए।
           सन्तुलित व्यवहार से तात्पर्य भावनाओं, विचारों और कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने से है। इससे कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में मानसिक शान्ति और स्पष्टता बनी रहती है। यह सकारात्मक अभ्यास है। इससे भावनाओं पर नियन्त्रण, सहानुभूति और सोच-समझकर निर्णय लेने की समझ आती है। यह व्यक्तिगत, पेशेवर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक प्रभावी प्रबंधन है। 
              यह परम सत्य है कि जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ आएँगी ही। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोगों में परस्पर जुड़ाव अथवा टकराव की सम्भावना भी बनी रहती है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य किसी दूसरे के कदमों में इतना अधिक गिर जाए और अपने स्वाभिमान को ही गिरवी रख दे।
             मनुष्य को दूसरों की जी-हजूरी अथवा चापलूसी करने के लिए किसी के सामने इतना भी नहीं बिछना चाहिए कि सामने वाला उसे कुचलता हुआ आगे बढ़ जाए और उसकी परवाह भी न करे। ऐसी अपमानजनक स्थिति किसी भी सहृदय व्यक्ति के लिए घातक हो सकती है। मनुष्य को इसके दूरगामी परिणामों के विषय में अवश्य ही विचार कर लेना चाहिए। उन्हें कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
            कुछ लोग ऐसे बोलते हैं मानो अपनी जुबान में उन्होंने शहद घोला हुआ है। ऐसी जरूरत से ज्यादा मीठी जुबान पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वह पीठ पीछे वार करने वाली हो सकती है। कुछ लोग बनावटी आवाज में बोलते हैं। ऐसे लोग भी हितैषी नहीं हो सकते। वाणी की प्राकृतिक स्वाभाविकता से पहचान की जा सकती है कि कौन हमारा हितैषी है और कौन हमारी जड़ें काटने वाला होगा।
          मीठा बोलना चाहिए परन्तु इतना मीठा भी नहीं कि हर कोई अपमानित कर चलता बने। लोग सोचते हैं कि जो मीठा बोल रहा है वह निश्चित ही हमसे अपना कोई स्वार्थ पूरा करना चाहता है। दुनिया असल और नकल की पहचान करना नहीं जानते।
           'मृदुभाषी बनो' यह तो सभी कहते हैं परन्तु संसार में ऐसे लोगों को बेवकूफ समझने में कोई परहेज भी नहीं करता। वे सोचते है इन लोगों का क्या है? इन्हें तो मनचाहे ढंग से नचा लेंगे।
             मनुष्य को कटुभाषी, हठी, अहंकारी और क्रोधी भी नहीं होना चाहिए कि सभी उसे अपने से दूर कर दें और उससे मित्रता भी न करने के बारे में दस बार सोचें। दूसरे शब्दों में कहें तो हर स्थान पर उनका उपहास उड़ाया जाए या उनसे किनारा कर लिया जाए। ऐसे लोग अपनी हठधर्मिता के कारण और अपने दुर्व्यवहार के चलते उन सभी लोगों को जो उनके सम्पर्क में आते हैं, उन्हें अनायास ही अपना शत्रु बना लेते हैं। तब फिर अकेलेपन को स्वेच्छा से अपना साथी बना लेते हैं।
             कोई भी मनुष्य अपने जीवन में कभी अपमानित नहीं होना चाहता इसलिए वह ऐसे लोगों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है। उनके विषय में कोई भी भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि कब उनका मूड खराब हो जाए और वे अपने प्रिय-से-प्रिय का भी अपमान कर दें। इस अपमानित होने के भय से सब यही सोचते हैं कि इन्हें छोड़ दो। न तो इन लोगों की दोस्ती अच्छी है और न ही इनकी दुश्मनी। इसलिए जितना भी हो सके इनसे कन्नी काटते हुए बचकर निकल जाओ, इसी में ही सभी लोगों की भलाई है।
           कैसी भी परिस्थिति हो अत्यधिक गुस्सा, डर अथवा प्रसन्नता के स्थान पर शान्त बने रहना चाहिए। अच्छी तरह सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना उचित होता है। दूसरों के साथ व्यवहार में सदैव सौजन्यता, सम्मान का भाव और धैर्य रखने से मित्रों और शुभचिन्तकों की संख्या बढ़ती है। अपनी शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसी भी अनपेक्षित स्थिति के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उसे स्वीकार करके समझदारी से निपटना चाहिए। सन्तुलित व्यवहार का पालन करने से मानसिक तनाव कम होता है, उत्पादकता बढ़ती है और रिश्तों में मजबूती आती है। 
           अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बहुत अधिक मीठा बनकर ससार में जीना चाहते हैं या कड़वा बनकर। वैसे तो सुधीजनों का यही मानना है कि मनुष्य को इस संसार में सहजता से जीने के लिए आवश्यकता अधिक मधुरता और कटुता दोनों का ही त्याग करना चाहिए। मनुष्य को अपने स्वाभाविक आचार-व्यवहार का ही पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 31 जनवरी 2026

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह

हमारा जीवन सीढ़ियों की तरह है। इसमें हमें बिना रुके लगातार ऊपर की ओर बढ़ते रहना चाहिए। यह यात्रा धैर्य, कड़ी मेहनत, सकारात्मकता और समर्पण के साथ हर कदम पर नए मुकाम हासिल करने का नाम है जो हमें सफलता और ऊॅंचाइयों तक ले जाती है। ऊपर जाओ तो सफलता की बुलन्दियों को छू लो और यदि नीचे उतरने पर आएँ तो गिरावट का कोई अन्त नहीं। इनके अतिरिक्त यदि घुमावदार सीढ़ियों में उलझ गए तो फिर मनुष्य को चक्करघिन्नी की तरह गोल-गोल घूमते रह जाना पड़ता है। 
             जितना हम जीवन में पढ़-लिखकर योग्य बनते हैं उतनी ही उन्नति करते जाते हैं और फिर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं। तब धीरे-धीरे हम हर प्रकार की सुख-समृद्धि प्राप्त करते हैं। जब वह अपने लक्ष्य तक पहुँचता है और ऊपर की सीढ़ी पर खड़ा होकर नीचे की ओर देखता है तब उसे सब बौने दिखाई देते हैं। उस समय उसे अपने साथ कोई भी खड़ा नहीं दिखता। वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। इसका अर्थ यही है कि जितना मनुष्य ऊँचाइयों को छूता है उतना ही उसके पास समयाभाव हो जाता है। अपने कार्यालयीन दायित्वों को निपटाने में दिन-रात व्यस्त रहता है। चाहकर भी अपने पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को वाँच्छित समय नहीं दे पाने के कारण वह बिल्कुल अकेला रह जाता है। 
          इस समय अपने उच्च पद के कारण मनुष्य को अहंकार से बचना चाहिए बल्कि उससे दूर रहना चाहिए तभी तो उसकी महानता तभी बनी रह सकती है। यदि वह चाटुकारों के मध्य घिरकर घमण्डी हो जाए तो उसका पतन निश्चित होता है।
          सीढ़ियों से नीचे उतरने पर मनुष्य नीचे आ जाता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने जीवन में नीचे की ओर जाने लगे तो वह कहाँ तक पतन के रास्ते पर चलता जाएगा, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यह अधोपतन अन्तत: मनुष्य के विनाश का कारण बन जाता है जो उसे सबसे दूर कर देता है। उसके अपने ही घर-परिवार के लोग उसे एक कलंक की तरह देखते हैं जो उनके सपनों और आशाओं को चूर-चूर कर रहा है। तब वह सभ्य समाज पर बोझ की तरह हो जाता है।
            सभी लोग उसको हिकारत की नजर से देखते हैं। उससे मित्रता करना आम इन्सान पसन्द नहीं करता। सभी उससे दूर जाने की सोचते हैं और मौका मिलने पर अपमानित करने से नहीं चूकते। ऐसा व्यक्ति समाज विरोधी कार्य करता हुआ न्याय व्यवस्था का अपराधी बनकर इधर-उधर छुपता फिरता है। उसका दिन-रात का चैन नष्ट हो जाता है। अपने बन्धु-बान्धव ही उससे किनारा कर लेते हैं और वह अकेलेपन का दंश भोगने के लिए विवश हो जाता है।
          घुमावदार सीढ़ियों पर गोल-गोल घुमते हुए भी हम लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इसी प्रकार जीवन में भी यदि मनुष्य स्थिर बुद्धि न हो तो वह यहाँ-वहाँ भटकता रहता है। कभी सज्जनों के सगति में उन्नति करता है। यदि दुर्भाग्यवश दुर्जनों की संगति में फंस जाए तो पिछड़ जाता है।
           जीवन में अनावश्यक घूमते हुए वह अपना अमूल्य समय बरबाद कर देता है पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता। ऐसा व्यक्ति जीवन की बाजी हारने लगते है। उसे कदम-कदम पर निराशा का सामना करना पड़ता है। अपने ढुलमुल रवैये के कारण वह चाहकर भी आगे नहीं बढ़ पाता बल्कि फिसलकर पीछे चला जाता है जो निश्चय ही उसकी निराशा का कारण बन जाता है। आगे चलकर ही ऐसा व्यक्ति सोचने की अधिकता के कारण मानसिक रोगों  का शिकार बन जाता है। 
            पुरुषार्थ यानी सीढ़ियॉं हमेशा साथ देती है जबकि भाग्य यानी लिफ्ट कभी भी बन्द हो सकती है। इसलिए सदा कर्म पर भरोसा करना श्रेयस्कर होता है। सीढ़ियों की तरह यदि हम एक कदम छोड़कर आगे बढ़ेंगे तो गिरने का डर रहेगा। इसलिए जीवन में क्रमिक उन्नति यानी एजुकेशन, करियर और लक्ष्य निर्धारण आवश्यक है। सफलता एक जटिल पहेली है जिसमें पुरुषार्थ और भाग्य दोनों का योगदान होता है।
            जहाँ तक हो सके अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। फिर उसके अनुसार परिश्रम करके उसे पाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सफलता शत-प्रतिशत मिलेगी। कभी-कभी मनुष्य को असफलता का मुँह भी देखना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि निराश होकर बैठा जाए। पुन: पुन: प्रयास करने पर ईश्वर अवश्य फल देता है।
         सफलता के लिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। परिश्रम हमें तैयार करता है और हमारे लिए अवसर उत्पन्न करता है। दूसरी ओर भाग्य हमें अप्रत्याशित लाभ प्रदान कर सकता है। यद्यपि केवल भाग्य पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ ही हम अपनी सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा सकते हैं। सीढ़ियों की तरह जीवन को ऊँचाई की ओर ले जाने का प्रयास करना हितकर होता है। इसके साथ ही यह भी याद रखना आवश्यक है कि यही सीढ़ियाँ ऊपर ले जाती हैं, नीचे भी लाती हैं और गोल-गोल भटकाती भी हैं। इसलिए अपनी उन्नति चाहने वाले मनुष्य के लिए सचेत रहना बहुत जरूरी है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

विशाल संसार सागर

विशाल संसार सागर

संसार रूपी सागर या भवसागर एक रूपक मात्र है। जीवन की तुलना एक अथाह, अशान्त समुद्र से की जाती है। संसार को सागर के समान कहा गया है क्योंकि यह अनन्त और वह पार करने में कठिन होता है, जैसे समुद्र होता है। इस संसार रूपी समुद्र में अच्छाई अमृत है तो बुराई जहर है। जो अच्छाई और बुराई को समाज के हित के लिए जो पीता है, उसे भगवान शिव कहते हैं। भगवान भोलेनाथ ने हमेशा इस सृष्टि का कल्याण चाहा है। इस सागर में मोह-माया, कर्मों और दुखों का गहरा पानी भरा हुआ है। 
            इस विशाल भवसागर को पार करने के लिए सत्संग, भक्ति और ज्ञान को एक नौका के समान माना जाता है जो जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति दिलाती है। धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से इस सागर को पार करने के लिए ईश्वर की भक्ति, ज्ञान या सत्संग को एक दृढ़ नौका अथवा पुल के रूप में वर्णित किया गया है। भवसागर से पार होने का अर्थ है सांसारिक मोह और दुखों से मुक्त होना। इस विशाल संसार सागर में हमारी छोटी-सी जीवन नैया हिचकोले खाती चलती है। यह हमारी अपनी जीवन रूपी नौका है तब इसके नाविक भी हमीं हैं। इसे सम्हालकर पार लगना हमारा कर्त्तव्य है।
           इतने विशाल समुद्र में एक छोटी-सी नाव के सहारे उसे पर करना बहुत ही कठिन हो जाता है । उसमें उठने वाली लहरों से नाव हिचकोले खाने लगती है। कभी-कभी बड़े-बड़े जहाजों से टकराकर इसके चूर-चूर होने का खतरा बन जाता है। यदा कदा यह डूबने-उतरने भी लगती है। इसी प्रकार इसे विशालकाय समुद्री जीवों का भी डर रहता है कि कहीं वे आक्रमण करके उसकी नाव को डूबो कर नाविक को खा न जाएँ। यह भी सम्भव है कि वह वहीं-कहीं उलझकर गायब हो जाए।
            इसी प्रकार यह संसार भी जीवों का सागर है। यहाँ पर फूँक-फूँककर हर कदम रखना पड़ता है। जरा-सी चूक हुई कि सब समाप्त हो जाता है। यहाँ मनुष्य सुखों और दुखों की लहरों पर सदा डूबता-तरता रहता है। कभी वह नीचे डूबता हुआ पटखनी खाता है तो फिर कभी ऊपर तरता हुआ सफलता के सोपानों को छू लेता है।
          ‌ जीवन के ये उतार-चढ़ाव उसे चाहे-अनचाहे भोगने पड़ते हैं। इन सब थपेड़ों को सहना उसकी नियति है। या यूँ कह सकते हैं कि उसकी मजबूरी है। अपने पूर्वजन्म कृत सुकर्मो अथवा कुकर्मों को भोगकर ही वह इस ससार के बन्धनों से मुक्त हो सकता है। उन्हीं के अनुसार ही उसे जीव योनि प्राप्त होती है।
          संसार में रहते हुए उसे सज्जनों का संसर्ग मिलता रहता है जो उसकी सर्वविध उन्नति करने में सहायक बनते हैं। फिर कभी दुर्जनों का साथ मिल जाता है जिनकी संगति उसके विनाश का कारण बनती है। मनुष्य स्वतन्त्र है जहाँ चाहे वह जा सकता  है। अब यह मनुष्य के स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस ओर जाना पसन्द करता है। वह अपना उत्थान चाहता है या पतन की राह पर चलना चाहता है।
           इस जगत में कदम-कदम पर विशालकाय मगरमच्छ रूपी मनुष्य भी हमें राह चलते मिल जाते हैं। जिनसे बचना बहुत कठिन होता है। समझदार मनुष्य कोई-न-कोई उपाय करके उनसे पार पा ही लेते हैं और दूसरे लोग उनके जाल में फंसकर छटपटाते रहते हैं। ऐसे हिंसक प्रकृति के लोगों से जितनी भी दूरी बनाकर रखी जाए उतना ही लाभदायक होता है। यत्न यही होना चाहिए कि हमारा फायदा कोई करे या न करे पर वह हमारा नुकसान न कर पाए।
            यह भौतिक जगत मनुष्य को पाप कर्मों के दलदल में बरबस खींचता है। उससे निकल पाना बहुतही कठिन होता है। इसलिए मनीषी इस दलदल में न फंसने की चेतावनी देते हैं। इस दुनिया में मोह माया भी हमें बराबर पीछे की ओर धकेलते हैं। इनको पीछे ठेलते हुए अपनी जीवन नैया को बचाकर दूसरे किनारे पर लेकर जाना है। यह कोई कठिन ऐसा कार्य नहीं है बस हमारी इच्छाशक्ति दृढ़ होनी चाहिए। तभी हम अपना बचाव करने में समर्थ हो सकते हैं अन्यथा यही सच है कि तब हमारी रक्षा कोई भी नहीं कर सकेगा।
              हमारी यह छोटी-सी जीवन नैया इस महासमुद्र में हिचकोले न खाए इसलिए उसे बाधारहित इस भवसागर से पार ले जाने के लिए हमें सत्कर्मों को करने की महती आवश्यकता है। ईश्वर का दामन थामकर, उस मालिक पर पूर्ण विश्वास करके और स्वयं को समर्पण भाव से उसे सौंपकर ही हम इस वैतरणी को पार कर सकते हैं। अन्यथा हम यहाँ हिचकोले खाते रहेंगे और अन्य लोग हमारा तमाशा देखते रहेंगे। इस संसार सागर में हमें डूबाने में लोग जरा-सी भी कसर नहीं छोड़ना चाहते।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा

वैराग्य की पराकाष्ठा मनुष्य का अपने शरीर तक से मोहभंग करवा देती है। वह इस असार संसार के साथ-साथ स्वयं अपने को भी विस्मृत कर देना चाहता है। इसीलिए वह कह बैठता है-
  क्या तन मांजता रे आखिर माटी में मिल जाना।
अर्थात् इस शरीर को माँजने का क्या लाभ? यानी इस शरीर को सजाना-संवारना व्यर्थ है। इसका कारण है कि अन्त में तो इसने मिट्टी में ही मिल जाना होता है। फिर इसकी देखभाल करके  समय क्यों व्यर्थ गॅंवाना?
             ऐसे विचार रखने वालों की इस धरा के किसी भी कार्य-कलाप में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे सभी कार्यों को करते समय निर्लिप्त रहते हैं। परन्तु कभी-कभी कुछ लोग इन सांसारिक दायित्वों से किनारा भी कर लेते हैं। इस विचारधारा को हम पलायनवादी प्रवृत्ति कह सकते हैं। भौतिक संसार के सभी रिश्ते-नातों से स्वयं को दूर करते हुए मनुष्य ईश्वर के समीप होने लगता है। दिन-रात वह प्रभु का नाम जपने में स्वयं को व्यस्त रखने की कामना करता हैं। 
            यह शरीर हमें ईश्वर ने एक साधन के रूप में दिया है। जिसके माध्यम से हम इस संसार में अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण कर सकें। यदि हम इसकी सार-सम्हाल नहीं करेंगे तो यह रोगी बन जाएगा। तब न हम ईश्वर की भक्ति कर सकेंगे और न ही हम सांसारिक दायित्व पूरे कर पाएँगे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं- '
          दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम
हमारी यही स्थिति हो जाएगी। हम न तो इहलोक संवार सकेंगे और न ही परलोक को‌ सुधार सकेंगे। यह तो स्थिति बहुत विकट हो जाएगी।
            यदि घर में हम वाहन रखते है तो हमें समय-समय पर उसका परीक्षण करवाना पड़ता है, उसमें ईंधन डलवाना होता है, नित्य प्रतिदिन उसकी साफ-सफाई रखनी आवश्यक होती है अन्यथा वह कबाड़ होकर हम पर बोझ बन जाता है। इसी प्रकार शरीर को यदि साफ-सुथरा न रखा जाए, इसे समय पर भोजन न दिया जाए तो यह भी अपने और अपनों पर रोगी होकर बोझ बन जाता है। उस समय सब परेशान हो जाते हैं। इस शरीर को स्वस्थ करने के धन और‌ समय की हानि होती है।
            इसलिए इसका स्वस्थ रहना बहुत ही आवश्यक है। इस शरीर को बेशक आप साध्य न माने पर यह ईश्वर तक जाने का साधन तो है ही। महाकवि कालिदास कने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा है -
          शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
हमारे सभी ऋषि-मुनि इस शरीर को साधन मानकर इसका पूरा ध्यान रखने का परामर्श देते हैं। हम यह कह सकते हैं कि व्यक्ति अपने सभी कर्तव्य चाहे वे धार्मिक हों या सांसारिक, तभी पूरे कर सकता है जब उसका शरीर स्वस्थ और नीरोग हो। एक बीमार या कमजोर शरीर से कोई भी कार्य ठीक से नहीं किया जा सकता। इसलिए शरीर का स्वास्थ्य सबसे बड़ी प्राथमिकता है। 
         यह सच है कि हमें केवल इस शरीर के लिए ही नहीं जीना चाहिए। मात्र इसी को सजाते-संवारते रहें और इसकी देखरेख के लिए ही पानी की तरह पैसा बहाते रहें। सारा-सारा दिन ब्यूटी पार्लर में जाकर सजते रहें अथवा नित नए बालों के स्टाइल बनवाते रहें। उस पर विभिन्न प्रकार के इत्र या परफ्यूम या डियो डालकर इसे नकली सुगन्ध से महकाते रहें। इस तरह इसको खूबसूरत दिखाने के चक्कर में हम दीन-दुनिया भूल जाएँ। घर-परिवार के दायित्वों से मुँह मोड़कर नित्य ही कलह-क्लेश करते रहें।
          इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि शारीरिक सौन्दर्य कुछ सीमित समय के लिए ही रहता है। जहाँ मनुष्य आयु को प्राप्त करने लगता है अर्थात् वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है, वहीं उसके चेहरे पर झुरियाँ आने लगती हैं। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होने पर अथवा किसी रोग के आ जाने पर भी शरीर की सुन्दरता मुँह मोड़ने लगती है। 
          उस समय जिस शरीर की सुन्दरता पर हमें बड़ा मान था वह साथ निभाने से इन्कार कर देती है। तब हमारा यह सुन्दर शरीर सामान्य-सा रह जाता है। इसीलिए गुणीजन कहते है कि इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। हमारा यह सौन्दर्य स्थायी नहीं है। जब यह नहीं रहता तब हमें बहुत दुख होता है।
            अति वैराग्य की चर्चा को यदि हम छोड़ भी दें तो भी इस बात का विशेष ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह शरीर ही सब कुछ नहीं है। इसके पीछे भागते रहने का कोई लाभ नहीं होता। इसके अन्दर रहने वाली उस आत्मा के विषय में भी हमें सोचना चाहिए। तभी हम सब अपने मानव होने के धर्म को सार्थक करके अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद