सोमवार, 10 अगस्त 2026

विद्वत्ता की कसौटी

विद्वत्ता की कसौटी

मनुष्य पढ़-लिखकर जब योग्य बनता है तो उसके घर-परिवार और बंधु-बान्धवों में उसे  सम्मान मिलता है। वैसे प्रत्येक मनुष्य की हार्दिक इच्छा होती है कि वह बुद्धिमान व्यक्ति कहलाए। विद्वान उसकी बुद्धिमत्ता का लौहा मानें। किसी सभा में यदि वह जाए तो उस विद्वत सभा में उसकी ही चर्चा हो। सभी उससे अपना सम्बन्ध बनाने के लिए इच्छुक रहें। सर्वत्र उसे एक विशेष स्थान मिले। 
          अब हम विचार करते हैं कि विद्वत्ता की कसौटी क्या है? मनुष्य को बुद्धिमान बनने के लिए कुछ तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक हैं- 
          सबसे पहली अथवा प्रमुख बात यह है कि मनुष्य का विचरवान होना आवश्यक होता है। उसे मननशील होना चाहिए। जब वह एकान्त में बैठकर विचार करता है तो उसे करणीय और अकरणीय का बोध हो जाता है। उसी के अनुरूप अकरणीय कार्यों का परित्याग करता हुआ और करणीय कार्यों के आलम्बन से दिन-प्रतिदिन उन्नति करता हुआ वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है।
          सज्जनों का अनुकरण करना और विद्वानों की संगति में रहना बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य में एक प्रकार का ठहराव आता है। उसका व्यवहार सब लोगों के साथ प्रायः सन्तुलित होने लगता है। उसके मन में व्यष्टि (एक) के स्थान पर समष्टि (सबका) का भाव आने लगता है। तभी वह सबको अपने साथ लेकर चल पाता है।
        जब वह ज्ञानार्जन करता है तब वह अपने नकारात्मक विचारों के जंजाल से मुक्त होकर सकारात्मक मनोवृत्ति वाला हो जाता है। इस तरह ईर्ष्या-द्वेष आदि दुर्भावनाओं के परित्याग करने से वह महापुरुषों की श्रेणी में आ जाता है। हर स्थान पर उसे यथोचित मान-सम्मान मिलने लगता है। इस तरह वह अग्रणी बनकर समाज में दिशा देने का कार्य करने लग जाता है।
          मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपनी योग्यता और अनुभव को देश, समाज, घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में बाँटे। इससे उसे अपना जीवन संवारने के साथ-साथ दूसरों को भी मार्गदर्शन करना चाहिए। समाज को ऐसे मनीषियों की बहुत आवश्यकता है जो निस्वार्थ होकर उसकी भलाई के कार्य कर सकें। इन समाज सुधारकों को युगों-युगों तक स्मरण किया जाता है।
        आजकल राजाओं का युग नहीं है फिर भी हम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति को इस श्रेणी में मान सकते हैं। मनीषियों का विद्वानों के सम्मान के विषय में यह मानना है - 
        स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
अर्थात् राजा का सम्मान उसके अपने देश में होता है। इसके विपरीत विद्वान को हर स्थान पर मान दिया जाता है।
          हम देखते हैं कि हमारे देश के उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर आदि विश्व के किसी भी देश में चले जाएँ, उन्हें सर्वत्र सिर-आँखों पर बिठाया जाता है और उन्हें समान रूप से सम्मान दिया जाता है। उनकी नियुक्तियाँ अच्छे वेतनमान पर होती हैं। इन लोगों को अपने देश में भी उतना‌ ही पुरस्कृत किया जाता है।
          कहने का तात्पर्य यही है कि विद्वान किसी भी आयु अथवा जाति का हो वह सदा पूजनीय होता है। विद्वत्ता के समक्ष आयु की सीमा कोई मायने नहीं रखती, वह गौण हो जाती है। जाति का बन्धन भी गौण हो जाता है। सीखने की जहॉं तक बात है, एक बच्चे से भी ज्ञान लिया जा सकता है। इसमें हेठी जैसी कोई बात नहीं होती।
          यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि विद्वत्ता न होने पर, उसका ढोंग कर लेने से वह विद्वानों की श्रेणी में आ जाएगा तो यह उस मनुष्य की सरासर भूल है। मूर्ख व्यक्ति जब भी मुँह खोलेगा तो उसकी पोल खुल जाएगी। इस तरह तब दूसरों से तिरस्कृत होने पर उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है। इसके लिए हम कह सकते हैं कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, बार-बार नहीं चढ़ती।
          यहॉं संस्कृत भाषा के विश्व सुप्रसिद्ध विद्वान् महाकवि कालिदास की चर्चा करना चाहती हूॅं। अपने पूर्व काल में वे निपट मूर्ख थे। विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए उनका विवाह परम विदुषी विद्योतमा से करवा दिया था। अशुद्ध 'उष्ट्र' शब्द सुनकर उनकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया था। विद्वानों की संगति और ईश्वर की उपासना से वे विद्वान बने।
          विद्वानों को यह सिद्ध करने की या प्रचार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वे बहुत जानकार हैं। लोग उनके प्रचारतन्त्र से प्रभावित होकर उनसे कुछ सीखें। होता इसके विपरीत है, लोग ढूँढते हुए उनके पास आकर अपनी ज्ञान पिपसा को शान्त करते हैं।
          विद्वानों की विद्वत्ता कस्तूरी की गन्ध की भाँति होती है जिसे चाहे सात पर्दों में भी छुपाकर क्यों न रखा जाए, वह चारों ओर के वातावरण को सुगन्धित कर ही देती है।
          विद्वत्ता मनुष्य को ईश्वर का दिया हुआ उपहार है। वह उसे अपने पुण्य कर्मों की बदौलत प्राप्त करता है। मनुष्य भाग्य के भरोसे नहीं बैठ सकता। उसे फिर भी कठोर परिश्रम करना पड़ता है। दिन-रात एक करना पड़ता है। स्वाध्याय, मनन, सज्जनों की संगति और ईश्वर की उपासना करके ज्ञान को निस्सन्देह प्राप्त किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 9 अगस्त 2026

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता 

 मनुष्य के भाग्य में जो भी लिखा होता है वही उसे मिलता है। न उससे अधिक और न ही उससे कम। यह भाग्य हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार बनता है। यदि पूर्व जन्मों में हमारे शुभकर्मों की अधिकता होती है तो इस जन्म में सुख-सुविधा के सभी साधन उपलब्ध होते हैं। इसके विपरीत दुष्कर्मों की यदि अधिकता होती है तब इस जन्म में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक बेहद लोकप्रिय और गहरी सोच है -
        समय से पहले और भाग्य से ज्यादा 
        किसी को कुछ नहीं मिलता
यद्यपि इसका सही अर्थ यह है कि हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए। भाग्य और कर्म दोनों ही जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
          भाग्य मनुष्य को जीवन की परिस्थितियाँ और अवसर प्रदान करता है, लेकिन उन परिस्थितियों में वह कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या निर्णय लेता है, यह पूरी तरह से उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। मनुष्य की कामना या इच्छा ही उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। बिना इच्छा के कोई भी सार्थक प्रयास सम्भव नहीं हो सकता।
          भाग्य के भरोसे बैठने से सब कुछ मिल जाएगा, ऐसा नहीं होता। बिना पुरुषार्थ या मेहनत‌ के भाग्य का फल भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि सब कुछ भाग्य में ही लिखा है तो भी कर्म करना आवश्यक है क्योंकि भाग्य केवल पिछले कर्मों का परिणाम (बैंक बैलेंस) होता है।‌ मनुष्य की वर्तमान इच्छाऍं और पुरुषार्थ या परिश्रम ही मनुष्य 
के नए भाग्य का निर्माण करते हैं।‌ यदि वह आज कर्म नहीं करेगा तो भविष्य में उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा। 
          हमें समझाते हुए सयाने यह कहते हैं - 
         पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर
अर्थात् इस कथन का सीधा-सा अर्थ यही है कि मनुष्य का भाग्य उसके जन्म लेने से पूर्व ही निर्धारित हो जाता है। इसीलिए वर्तमान जीवन में मनुष्य को उसी के अनुसार समय-समय पर शुभाशुभ फल प्राप्त होता है।
        इसी विषय को उदाहरण सहित भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाया है -
  पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्?
 नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्    धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? 
  यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क क्षमः।अर्थात् करीर के वृक्ष में यदि पत्ते नहीं लगते तो इसमें वसन्त ऋतु का क्या दोष है? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? चातक पक्षी के मुँह में यदि वर्षा की धारा नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात उसे ब्रह्मण्ड की कोई ताकत भी नहीं मिटा सकती।
           करीर के वृक्ष पर पत्ते न लगने का कारण वसन्त ऋतु नहीं है। पतझड़ में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और वसन्त में तो सभी वृक्ष हरे-भरे दिखाई देते हैं। उन पर खिले रंग-बिरंगे फूल प्रकृति के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं।  चारों ओर हरियाली का साम्राज्य होता है जो बहुत ही मनमोहक होती है।
          कर्म के माध्यम से भाग्य को बदलने की शक्ति और उदाहरणों के बारे में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले 'श्रीमद्भगवद्गीता' के कर्म सिद्धान्त पर प्रकाश डाला गया है। वहॉं स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है। जैसा वह आज बोएगा, उसी का फल कल भाग्य बनकर उसके सामने आएगा।
        विश्व के सभी जीव-जन्तु सूर्य की रौशनी में दिन में देखते हैं। रात में उन्हें देखने में कठिनाई होती है। परन्तु उल्लू एक ऐसा पक्षी है जो दिन के उजाले में नहीं देख पाता बल्कि रात के अँधेरे में उसे दिखाई देता है। वह दिन में नहीं देख पाता तो हम इसके लिए सूर्य को दोष नहीं दे सकते।
          वर्षा की पहली बूँद चातक पक्षी के मुँह में यदि पड़ती है तो वह अपनी प्यास बुझाता है। यदि वर्षा की पहली बूँद उसके मुँह में न पड़े तो वह प्यास रह जाता है और फिर वर्षा की पहली बूँद के लिए वह पूरा वर्ष प्रतीक्षा करता है। सभी जीवों की प्यास बुझाने वाली वर्षा का इसमें कोई दोष नहीं होता।
          करीर वृक्ष, उल्लू और चातक पक्षी के इन सभी उदाहरणों से यही सिद्ध होता है कि विधाता ने जिसके ललाट पर या मस्तक पर उसके जन्म दे पहले ही जो लिख दिया, उसे इस संसार की कोई भी शक्ति नहीं मिटा सकती। न ही उसे बदलने की सामर्थ्य किसी में है।
          मनीषियों का यह भी कथन है कि अपने जीवन में मनुष्य जिस भी अंग का अधिक दुरुपयोग करता है, आगामी जीवन में ईश्वर उसे उस अंग से वंचित कर देता है। वर्तमान जीवन में वह एक अपाहिज का जीवन व्यतीत करता है और कष्ट पता है। वह सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाता है। हम अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों से मिलते रहते हैं।
          आगामी जन्म में अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए बिना समय व्यर्थ गॅंवाए सत्कर्मो की पूँजी को बढ़ाने के लिए हम सब प्रवृत्त हो जाएँ। इस प्रकार करने से सिर धुनकर रोने और पश्चाताप करने से हम बच सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना करने का अर्थ है, उसको नित्य प्रति स्मरण करना। मनुष्य किसी भी रूप में चाहे प्रभु की भक्ति कर सकता है। यानी चाहे उसकी साधना साकार रूप में की जाए अथवा निराकार रूप में की जाए। उसे किसी भी नाम से याद किया जा सकता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। किसी को उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इस संसार में भेजने वाले उस मालिक का नाम उसे प्रतिदिन भजना चाहिए।
           समस्या यह है कि इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उस ईश्वर की उपासना करने में मनुष्य का मन रमता ही नहीं है। यह एक मनुष्य की बात नहीं है परन्तु प्रायः सभी लोगों की यही समस्या है। इन्सान केवल ऐशो-आराम में मस्त रहना चाहता है। उसे लगता है कि वह यहॉं पर मौज-मस्ती करने आया है। इसलिए उसका ध्यान उस मालिक की ओर जाता ही नहीं है जिसने उसे इस संसार में मनुष्य के रूप में भेजा है।
        ईश्वर की उपासना करना सबसे कठिन कार्य है। यह मैंने इसलिए कहा कि उसकी भक्ति का प्रदर्शन अधिक होता है जिसका कोई लाभ मनुष्य को नहीं होता। जो लोग सच्चे मन से उसकी उपासना करना चाहते हैं जब उनका मन उस समय दुनिया के कारोबार में भटकने लगता है तो वे परेशान रहते हैं।
          ईश्वर का यदि सच्चे मन से भजन किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है यानी मनुष्य ईश्वर के करीब हो जाता है। उसका प्रिय बन जाता है। ये मात्र अड़चनें है जो इन्सान को डिगाने के लिए आती हैं। वह प्रभु भी परीक्षा लेता रहता है कि मनुष्य की लगन कितनी सच्ची है, उसमें कितनी ईमानदारी है। निश्चित समय पर और मन से सोचा गया जप मनुष्य को अवश्य करते रहना चाहिए।
          कहते हैं जब राम कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का मन साधुओं के उपदेश के कारण बदल गया तो वे साधना में लीन हो गए। तपस्या करते हुए उनके ऊपर चींटियों ने बाम्बी बना ली थी। इसलिए उन्हें वाल्मीकि कहते हैं।। वे राम नाम के स्थान पर मरा शब्द का जप करते हुए तर गए। उन्हें तब भी इसका फल मिला और वे विश्व विख्यात हुए वे रामकथा लिखकर इस संसार में सदा के लिए अमर हो गए।
            एक बार तुलसीदास से किसी व्यक्ति ने पूछा था, "कभी-कभी भक्ति करने में मन नहीं लगता। फिर भी जप करने बैठ जाते हैं, क्या उसका फल मिलता है?"
      इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास ने उसे मुस्कुराते हुए कहा था - 
    तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
    भौम पड़ा जा में सभी, उल्टा सीधा बीज।।
अर्थात् जब भूमि में बीज बोए जाते हैं तो यह नहीं पता चलता कि वे उल्टे पड़े हैं या सीधे। पर फिर भी कालान्तर में फसल  तैयार हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु के नाम का सुमिरन कैसे भी किया जाए, उसके सुमिरन का फल अवश्य मिलता है।
        यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि जप कैसे किया बल्कि इसकी उपयोगिता है कि जप करने का जो नियम बनाया था उसे भार तो नहीं समझ रहे। कहीं मन में यही विचार हावी हो रहा हो कि बेकार ही मुसीबत मोल ले ली। यदि ऐसी भवना मन में कभी आ जाए तो अपने ऊपर किए गए उस प्रभु के उपकारों का स्मरण कर लीजिए। फिर मन स्वयं ही उसकी आराधना करने के लिए नतमस्तक हो जाएगा।
        कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर किसी ने भेजा था कि ईश्वर को स्मरण करने के लिए उसे एस. एम.एस. करो। ईश्वर को एस.एम.एस. करने के विषय में लिखे गए ये विचार बहुत ही सुन्दर लगे, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         एक बार कोई भक्त ने किसी सन्त के पास गया और उनसे पूछा, 'मुझे आज तक भगवान नहीं मिले, कैसे मिलेंगे बताइए?"
        सन्त बोले, "भगवन तो हर स्थान पर विद्यमान हैं, वह कण-कण में वास करते हैं। इसीलिए उन्हें सर्वव्यापी कहते हैं। तुमने भगवान को एस.एम. एस. नहीं किया होगा। एक बार उन्हें एस.एम. एस. करना शुरू कर दो फिर निस्सन्देह वे स्वयं ही तुम्हें मिल जाएँगे।" 
        भक्त ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए फिर उनसे पूछा, "मैं एस.एम.एस. कहाँ पर करूँ? भगवन का नम्बर तो मेरे पास नहीं है।" 
          सन्त ने कहा, "अच्छा एक बार इसका अर्थ समझ लो। इसके हर शब्द का अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं- एस- सच्चे,  एम- मन से,  एस - स्मरण।
अर्थात् सच्चे मन से उसका स्मरण कर तो वह तुरन्त मिल जाता है।"
          इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर को मनुष्य से कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो बस मनुष्य के भाव को परखता है। उसकी उपासना करने के लिए मनुष्य को सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए, उसका मन चाहे लगे अथवा न लगे। अपने नियम का पालन सच्चे मन से करने का ईमानदार प्रयास करते रहना चाहिए। कभी तो उसकी उपासना में मन लगने लगेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

धनवान बनने की बलवती कामना

धनवान बनने की बलवती कामना

जीवन को सुविधापूर्वक जीने के लिए मनुष्य के लिए धन एक बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए उसकी सबसे पहली और बलवती कामना होती है धनवान बनने की। यह ऐसा धन है कि बहुत कठिनाइयों और प्रयत्नों से पकड़ में आता है। हाथ में आते ही फिर यह फिसलने के लिए मचलने लगता है। इसका कारण है कि जब इन्सान जी तोड़ श्रम करके धन एकत्र का लेता है तो फिर वह संसार की समस्त सुख-सुविधाएँ भोगना चाहता है। अतः वह अपने और अपनों के लिए उन्हें जुटाने का प्रयास करता है।
        यानी रहने के लिए एक बड़ा घर, घूमने के लिए मँहगी गाड़ी, अच्छे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, ऐशो-आराम के सभी साधन अपने जीवन काल में जुटा लेना चाहता है। उसकी यही इच्छा होती है कि वह और उसका घर-परिवार किसी भी तरह के कष्ट का सामना न करे। यदि घर में कभी कोई अस्वस्थ हो जाए तो अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाना चाहता है। उसकी यही हार्दिक इच्छा होती है कि उसके घर का कोई भी सदस्य अपना मन मारकर न रहे। 
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका कमाया हुआ पैसा बोलने लगता है। यदि वह स्वयं पर नियन्त्रण रख लेता है तो सब सुविधाओं को भोगता है। परन्तु यदि उस पैसे को न सम्हाल सके तो उसका सारा कमाया हुआ धन बर्बाद हो जाता है। इसके पीछे केवल यही कारण है कि पैसा अपने साथ बहुत से दुर्व्यसन लेकर आता है। इन कुटेवों में यदि वह पड़ जाता है तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। सब कुछ हारकर फिर वह सिर धुनकर पश्चाताप करता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसलिए सयाने कहते हैं -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
          जब वह दौलत एकत्रित कर लेता है तब समाज में अपना एक विशेष स्थान भी चाहता है। उसके मन में यश पाने की आशा जागने लगती है। वह चाहता है कि उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले, लोग उसे पहचानें। उसका सर्वत्र समाना हो। इस चक्कर में वह उस समय सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगता है। खूब दान देता है, अपने नाम के पत्थर भी लगवाता है।
         जब वह प्रभूत धन अर्जित कर लेता है और चारों ओर उसका यश फैलने लगता है तब फिर उसके मन में एक शक्तिशाली इन्सान बनने की उत्कट लालसा बलवती होने लगती है। उस समय कुछ लोग स्वयं को सिद्ध करने के लिए अनायास ही असामाजिक तत्वों से साँठ-गाँठ कर बैठते हैं। दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए अपने साथ हथियारबन्द गार्ड रखता है ताकि लोग उसका लौहा मानें और उससे डरकर रहें। 
        समय बीतते वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाता है। तब वहाँ से निकलने के लिए वह छटपटाने लगता है परन्तु उसके सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। वह चाहकर भी अपने जाल को काटकर मुक्त नहीं हो पाता।
        धन कमाने, यश पाने और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए मनुष्य भटकता रहता है। फिर अन्त में वह मन की शान्ति पाने के लिए तलाश में दर-बदर भटकने लगता है। वह तीर्थों, जंगलों की खाक छानता है। यदा कदा तथाकथित धर्मगुरुओं के चंगुल में फंस जाता है। 
         इन सभी स्थानों पर भी जब उसे शान्ति नहीं मिल पाती तब उसकी खोज अधूरी रह जाती है। इस तरह भटकते हुए उसका अन्तकाल आ जाता है और वह मिट्टी में मिल जाता है। उसके सारे-के-सारे ठाठ-बाठ इसी धरा पर धरे रह जाते हैं। वह खाली हाथ इस संसार से विदा हो जाता है।
        मनुष्य अपने जीवन की इस यात्रा में बहुत-सी उम्मीदें पल लेता है। आशा ऐसी होनी चाहिए जो उसे उसके लक्ष्य तक ले जाए। अपने लक्ष्यों को पाने की होड़ में वह अपने रिश्तों से दूर होता जाता है। जब सबसे ऊबकर उसे उनकी आवश्यकता होती है तब तक वे पीछे छूट गए होते हैं। ये वही लोग होते हैं जो उसके अपने होते हैं किन्तु समय की ठोकर लगने से पराए हो गए होते हैं।
          इन्सान का यह दुर्भाग्य है कि जरा-सा ऐश्वर्य, कीर्ति, शक्ति पाकर वह घमण्ड से फूल नहीं समाता और अपनी औकात भूल जाता है। दूसरी और इतनी विशाल जलराशि का स्वामी होकर भी सागर सदा अपनी सीमा में रहता है। 
          बड़े दुःख की बात है कि मनुष्य अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। धन के मद में चूर वह हर किसी को देख लेने की धमकी देता हुआ स्वयं को ईश्वर से भी महान समझने की भूल करने लगता है। उसकी सत्ता को चुनौती देने लगता है जिसका अन्त अच्छा नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहिए की सब सुखों को देने वाले उस प्रभु को सदा स्मरण करते हुए उसका धन्यवाद करे। अपने अन्तस् में अहं को स्थान न देकर सबसे सहृदयता का व्यवहार करके वास्तविक पूँजी का संग्रह करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

आयु‌ में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

आयु में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। वह बच्चे के रूप में जन्म लेता है। फिर वर्षों वर्ष व्यतीत होते रहते हैं और मनुष्य रिटायर हो जाता है। यानी एक आयु के पश्चात उसे वृद्ध मान लिया जाता है। वयोवृद्ध व्यक्ति समाज में सम्माननीय होता है। परन्तु वास्तव में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मात्र आयु में वृद्ध होने से ही कोई भी मनुष्य बड़ा कहला सकता है?
         इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि आयु में वृद्ध होने पर मनुष्य को बड़ा अथवा समझदार नहीं कहा जा सकता। हम यह भी कहा सकते हैं कि मनुष्य का अपना व्यवहार जो वह दूसरों के प्रति करता है, उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं। बड़ा वही व्यक्ति कहलाता है जो अपनी विद्वत्ता और अपने अनुभवजन्य ज्ञान का उपयोग देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए करे। 
          बड़प्पन उसी मनुष्य का माना जाता है जो अपने छोटों के प्रति सहृदय हो। उन्हें पूरा प्यार व सम्मान दे। उनकी समस्याओं को सुलझाने की सामर्थ्य रखता हो। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति उसकी शीतल छाया का आनन्द ले सके। उसके ज्ञान और उसके सद्वयवहार की छाप लेकर ही विदा हो। बार-बार उनसे सम्पर्क साधने के लिए उसका मन लालायित रहे।
          आयु में बड़े होने के उपरान्त यदि मनुष्य में ओछापन हो, चरित्रहीन हो या अहंकारी हो तब भी कोई उसका आदर नहीं करता। लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यदि वह क्रोधी हो तो कोई उसके पास नहीं जाना चाहता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं। यदि वृद्ध व्यक्ति मूर्ख हो तब भी उसका कोई सम्मान नहीं करता।
          जिस बड़े व्यक्ति को अपने पद, ज्ञान, धन-दौलत आदि का घमण्ड हो, वह दूर की कौड़ी जैसा व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं बन पाता बल्कि सबके द्वारा नकार दिया जाता है। उस मनुष्य की स्थिति खजूर के पेड़ की तरह होती है। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में हमें समझाते हुए कहा है-
     बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
     पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर।।
अर्थात् यह दोहा हमें यही समझ रहा है कि खजूर के पेड़ के बड़े होने का लाभ न किसी इन्सान को होता है और न किसी पक्षी को होता है। खजूर के पेड़ की लम्बाई क्योंकि बहुत अधिक होती है। इसलिए वह धूप में तपे हुए किसी भी यात्री को छाया नहीं दे सकता। उस पर लगने वाला फल इतनी ऊँचाई पर होता है जिसे कोई भी तोड़कर नहीं खा सकता और न ही अपनी भूख मिटा सकते हैं। 
        इस दोहे का भावार्थ और इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। केवल आकार या धन-दौलत में बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता। यदि आपका बड़प्पन किसी जरूरतमन्द के काम न आए तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती।
         जो लोग ज्ञान या धर्मचर्चा में योग्य होते हैं, उनके विषय में मनीषी कहते हैं-
        धर्मवृद्धेषु वयः न समीक्षते।
अर्थात् धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती।
          इस सूक्ति के अनुसार यदि धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती तो फिर क्या देखा जाता है? उन लोगों की आयु न देखकर केवल ज्ञान ही परखा जाता है। इस विषय में हम कह सकते हैं कि साधु-सन्त या विद्वान चाहे छोटी आयु के हों या बड़ी आयु के सभी उनके चरण छूते हैं। यहाँ उनका ज्ञान ही महत्वपूर्ण होता है, उनकी आयु नहीं।
          जो मनुष्य बड़े होने पर भी अपने छोटों को अपनी छाया में सुरक्षित नहीं रख सकता, उनका समुचित ध्यान भी नहीं रख सकता, उसे कोई पसन्द नहीं करता। हर इन्सान उससे दूरी बनाए रखने का प्रयत्न करता है, कोई भी व्यक्ति उससे अपना रिश्ता नहीं रखना चाहता। उस समय वह मनुष्य बरगद के विशाल वृक्ष की तरह इस संसार में निपट अकेला ही रह जाता है।
          बरगद के पेड़ की तरह मनुष्य को महान नहीं बनना चाहिए। वह बहुत विशाल होता है। उसकी छाया में कोई और पौधा नहीं पनप सकता। ऐसे उस बरगद की बहुत अधिक आयु होने का किसी को कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण है कि अपनी छाया में अन्य पौधों के न होने से वह बड़ा होने पर भी निपट अकेला ही रह जाता है।
          यदि कोई वयोवृद्ध दुर्वासा ऋषि की तरह क्रोधी हो तो भी वह पूज्य नहीं होता। क्रोधी व्यक्ति यदि गुणवान हो तब भी वह लोकमान्य नहीं बन पाता। जब तक उसके स्वभाव में मधुरता नहीं होगी तब तक कोई उसे नहीं पूछता। इसीलिए कहते हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है।
          इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य का सम्मान उसकी योग्यता, उसके ज्ञान, उसके जीवनभर के अर्जित अनुभवों के आधार पर होता है, उसके वयोवृद्ध होने से नहीं होता।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

माना यही जाता है कि बुरे व्यक्ति अथवा दुष्ट के साथ सहृदयता बरतनी चाहिए। उसे यथासम्भव सुधारने का प्रयास करना चाहिए। उसे सन्मार्ग दिखाया जाए तो वह शायद अपने बुराई के रास्ते को छोड़ सकता है और निस्सन्देह एक अच्छा इन्सान बनने का प्रयत्न सकता है। समस्या यह है कि आज के इस आपा-धापी वाले युग में किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि वह उन्हें सुधारने का कार्य करे।
          आज प्रायः लोग इस तर्क को न मानकर यही कहते हैं कि एक बार जो व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़ता है उसकी वहाँ से वापिसी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होती है। इसका कारण है कि उसका मन वहाँ रमता है और वह समझता है कि उसका लौहा सभी मानते हैं। उसकी तूती बोलती है तथा लोग उससे डरते हैं। इसलिए वह वापिस नहीं लौट सकता। यदि वह लौटना चाहे भी तो उसके साथी उसे वैसा नहीं करने देते। उन पर अपना कीमती समय नष्ट न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए।
          तथाकथित धर्मगुरु अपने धन-वैभव को बढ़ाने में लगे रहते हैं। उन्हें किसी दुष्ट को सुधारने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। कुछ सरकारी और गैर सरकारी संस्थाऍं इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। सोचने की बात यह है कि उनकी सफलता का ऑंकड़ा सन्तोषजनक है क्या? जब घर-परिवार और बन्धुजनों की कही हुई बात वे नहीं मानना चाहते तो फिर किसी अन्य से क्या उम्मीद रखी जा सकती है?
          अपराधिक प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को कितना भी सुधारगृह में भेज दो, उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का कितना भी यत्न क्यों न किया जाए पर परिणाम वही होगा यानी 'ढाक के तीन पात।' तब उन पर की गई मेहनत की जाए व्यर्थ हो जाती है।
          किसी विद्वान का कहना है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए-
            शठे शाठ्यं समाचरेत्।
या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि-
        'शईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए। 
अर्थात यदि कोई ईंट मारे तो उस पर पत्थर से वार तो कर ही देना चाहिए।
        उनका कथन यह है कि उन्हें  कोई और भाषा समझ ही नहीं आती। वे इसके लिए तर्क देते हैं कि दुष्ट व्यक्ति साँप की तरह होता है। उसे कितना भी दूध पिलाओ वह डंक जरूर मारता है। इसी तरह दुष्ट के साथ कितना भी अच्छा करो, मौका आने पर वह अपनी हरकतों से बाज हीं आता। वह हानि करा ही देता है। इसलिए वह कभी विश्वास के योग्य नहीं बन सकता। इसलिए उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होता है।
        यदि दुष्ट व्यक्ति के साथ नरमी का बर्ताव किया जाए तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। वह दूसरों को मूर्ख समझने लगता है। इसलिए उसके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए। उनका कथन है कि- 
          आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति:।
अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के साथ सरलता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। 
          उसे ऐसा व्यवहार रास नहीं आता। मनुष्य को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे उसे यह न लगे कि सामने वाला कमजोर हैं या उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। अतः उसको दबाया न सकता है अथवा डरा-धमकाकर उससे अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है।
      ‌  वैसे तो हम सब चाहते हैं कि उन दुष्ट लोगों को सुधारने का एक मौका दिया जाना चाहिए। पर वास्तव में एक अवसर मिलने पर उनमें सुधार हो सकता है क्या? यदि हाँ तो यह समाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी अन्यथा समय की बर्बादी ही मानी जाएगी।
         दुष्ट को यदि हम क्षमा करेंगे तो वह हमारा मजाक उड़ायेगा और कहेगा कि हम में हिम्मत ही नहीं है उसका सामना करने की। हमारी क्षमाशीलता को वह हमारी कमजोरी समझकर और अधिक अत्याचार करेगा। इसिलए उसका प्रतिकार करना आवश्यक हो जाता है।
          अपवाद हर स्थान पर मिल जाते हैं। सन्यासियों की संगति में आकर पूर्व का रत्नाकर डाकू लोकप्रसिद्ध रामायण का रचियता महर्षि वाल्मीकि बन गया। इसी प्रकार महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आने पर अंगुलिमाल डाकू उनका प्रिय शिष्य बन गया। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है जहाँ सज्जनों की संगति में दुष्ट अपनी बुराइयों को दूर करके महापुरुष बन गए। बस केवल खोजने भर की देर है। महर्षि वाल्मीकि और अंगुलीमाल डाकू दोनों ही महात्माओं की संगति में महान बने तथा उन्होंने समाज को दिशा देने का कार्य किया। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
         यहाँ मैंने विद्वानों की उक्तियों को आपके समक्ष रखा है। अब आप अपनी तर्क बुद्धि और विवेक से विचार करें कि हम इन दुष्ट लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें?
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। इसके लिए उसे किसी के परामर्श कर्त्ता अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए वह किसी मैनेजर आदि के सहारे नहीं रहता। उसने इस ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की। उसकी इस सुन्दर रचना में यानी सृष्टि में कहीं भी कोई कमी नहीं है। हम मनुष्य चाहे जितना भी परिश्रम कर लें, यह हमारे बूते की बात नहीं है।
          परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्त्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा, अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानी वह नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जब से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इस क्रम में कहीं भी, किसी प्रकार की त्रुटि की कोई भी गुॅंजाइश नहीं है।
         सूर्य, चन्द्र आदि सभी ग्रह-नक्षत्रों का क्रम निश्चित है। कोई प्रातः आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद् गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलय हो जाती हैं। नदियॉं अबाध गति से अपने इस नियम का पालन करती हैं।
        सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की जिससे सबको अपने भोज्य पदार्थ मिलते रहें। पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की।
          पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चट्टानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है जिसे वे अपनी जरूरत के समय खा सकें।
         पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि नारायण पण्डित ने 'हितोपदेश' में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
      न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः।
अर्थात् सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता, उसे परिश्रम करना पड़ता है।
       कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए हर जीव को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने ऐसा सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी। 
        कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अतः शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे कहीं बदबू न फैल सके। पेड-पौधों का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए शाकाहारी जीवों को बना दिया।
        इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानी सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके आलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।
      ‌    अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मारने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है जब वह बुझ जाती है तो हर कोई उसे रौंद देता है। चींटियॉं भी उस पर चलने लगती हैं।
         मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने सभी प्रबन्ध स्वयं अपने हाथों में लिए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।
        अतः उसके विधान में मनुष्य को अपनी टाँग अड़ानी छोड़ देनी चाहिए। वह बहुत ही समर्थ है उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। बस यह याद रखिए कि वह स्वयं सब सम्हाल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद