वायु का प्रकोप
वायु के प्रकोप पर हम चर्चा करते हैं। वैसे तो वायु हमारी जीवनी शक्ति है। इसके बिना हम एक पल भी नहीं रह सकते। यदि वायु के कुछ पल के लिए न होने की स्थिति में सब समाप्त हो जाता है, ब्रह्माण्ड में कुछ भी शेष नहीं बचता। वायु जहाँ हमें सुख देती है वहीं बहुत सारे कष्ट भी देती है चाहे वह हमारे शरीर के अन्दर की वायु हो अथवा ब्रह्माण्डीय वायु हो। इसके साथ की गई छेड़छाड़ हमें हमेशा बहुत मंहगी पड़ती है। फिर भी हम नहीं सुधरते, इसे दूषित करने का दुस्साहस करते हैं।
वायु शरीर रूपी यन्त्र और शरीर के अव्ययों को धारण करती है। इस वायु का गुण सुखाना होता है। यह शरीर में रुक्षता पैदा करती है। यही वायु मन को भी चंचल बनाती है। शरीर से जब प्राणवायु निकल जाती है तब वह मिट्टी के समान हो जाता है अर्थात मृत हो जाता है। इसे अग्नि को समर्पित करने में हम शीघ्रता करते हैं। कुछ समय के लिए इस शरीर को घर में नहीं रख सकते। यदि कुछ दिनों तक शरीर को सम्हालकर रखने का प्रयास किया जाए तो चारों ओर वातावरण में दुर्गन्ध आने लगती है। इससे बिमारियॉं फैलने का डर बढ़ जाता है।
जब हमारे शरीर के भीतर की वायु बिगड़ने लगती है तब पेट में अफारा हो जाता है, पेट फूल जाता है। डकारें और पाद आने लगते हैं। अर्थात् ऊपर और नीचे से हवा निकलने लगती है। इस कारण कभी-कभी मनुष्य को हिचकियाँ आने लगती हैं। इसी प्रकार शरीर के अंग यानी हाथ, पैर और गर्दन आदि हिलने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो पार्किन्सन नामक रोग मनुष्य को हो जाता है। कुछ लोगों की आँख, कुछ के गाल और कुछ के होंठ भी चलने लगते हैं।
इन सबसे भी अधिक कष्टकारी वह स्थिति होती है जब मनुष्य के शरीर में लकवा मार जाता है जिससे वह अपाहिज की तरह बिस्तर पर पड़ जाता है। स्वय कुछ भी नहीं कर पाता बल्कि वह दूसरों की कृपा का मोहताज हो जाता है। उस समय वह ईश्वर से अपने लिए मौत की गुहार लगता है। परन्तु समय से पहले उसे मौत भी नहीं आती। इस वायु के ही कारण मनुष्य को हृदय रोग तथा मस्तिष्क रोग भी होते हैं।
प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर वायु बिगड़ जाती है जिसके कारण से झंझावात आते हैं। तब सब तहस-नहस होने लगता है। आँधी-तूफान बर्बादी मचाने लगते हैं। हर ओर प्रलंयकारी स्थिति बनने लगती है। ब्रह्माण्ड में वायु तब बिगड़ती है जब हम उसे प्रदूषित करते हैं। तब उसी प्रदूषित वायु का सेवन करने से हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। साँस की बिमारियाँ इसी प्रदूषित वायु का उपहार हैं। श्वास नली के कैंसर जैसे भयंकर रोगों तक की चपेट में आ जाते हैं।
हमारे शरीर की वायु हो या हमारे ब्रह्माण्ड की वायु उन दोनों को दूषित करने के दोषी हम स्वयं हैं। गलत खान-पान का परिणाम होता है शरीर की वायु का दूषण जो समय-समय पर रोग के रूप में आकर हम लोगों को चेतावनी देती रहती है। पहले हम जीभ के चटोरेपन के कारण आवश्यकता से अधिक खा लेते हैं या फिर वे खाद्य पदार्थ खाते हैं जिनका हमें परहेज करना चाहिए। उन्हें खाकर बीमार पड़ते हैं। हमें स्वास्थ्यवर्धक भोजन रुचिकर नहीं लगता। हम लोग जंक फूड अथवा अधिक तला-भुना भोजन खाकर प्रसन्न होते हैं, उसमें हमें अधिक स्वाद आता है। यही स्वाद हमारे शरीर को रोगी बना देता है।
हमारे गलत रहन-सहन का कारण होता है वायु प्रदूषण। हम अपने सुविधापूर्वक आवागमन के लिए विभिन्न प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण नित्य प्रति वायुप्रदूषण बढ़ता रहता है। अपनी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए फैक्टरियाँ लगाते हैं जिनका धुँआ भी वायु को दूषित करता है। अपने घरों और दफ्तरों आदि को सुरक्षित करने और उन्हें सजाने तथा दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु कागज के लिए हम पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करते जाते हैं जो वायु को दूषित करने का प्रमुख कारण बन जाता है। इस प्रदूषित वायु से हम अनेक रोगों को आमन्त्रण दे बैठते हैं।
इस प्रकार शरीर और वायुमण्डल दोनों ही प्रकार की वायु को दूषित करके हम अनेक रोगों की चपेट में आ जाते हैं। तब हम डाक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों बर्बाद करते हैं।इनके कुपित हो जाने के फलस्वरूप हम जीवन में कष्ट पाते हैं। ऋतुओं के क्रम को वायु ही बिगाड़ती है। इसी कारण अतिवृष्टि, अनावृष्टि का दंश हमें झेलना पड़ता है। तेज चलने वाले ऑंधी और तूफानों का हमें सामना करना पड़ता है। किसी स्थान विशेष पर लगने वाली आग अथवा जंगल की आग को भी यही वायु भड़काती है। इससे कितने ही जान और माल की हमें हानि उठानी पड़ती है।
वायु का स्थान ईश्वर के समान है। यह अव्यय भी है और अविनाशी है। यही वायु प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का कारण बनती है। इस प्रकार वायु सुख और दुख का कारण होती है।
चन्द्र प्रभा सूद