रविवार, 5 अप्रैल 2026

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा भारतीय संविधान हर भारतवासी को देता है। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने विचार और भावनाओं को स्वतन्त्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। यह अधिकार लोकतन्त्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। इस स्वतन्त्रता को संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है। हालॉंकि, इस स्वतन्त्रता पर कुछ समुचित प्रतिबन्ध भी लगाए जा सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसका दुरुपयोग न हो। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की मानहानि करना, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालना, या समाज में हिंसा भड़काना ऐसे कार्य हैं जिन पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।
            अपने विचारों का अदान-प्रदान करना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में आवश्यक होता है। यदि अपने विचारों को दूसरों के समक्ष न रख सकें तो कोई हमारे विषय में जान नहीं सकेगा। सूचनाओं को स्वतन्त्र रूप से बोलने, लिखने, साझा करने या प्रसारित करने की अनुमति देता है। यह अधिकार मीडिया की स्वतन्त्रता, कलात्मक अभिव्यक्ति और शन्तिपूर्ण विरोध को भी शामिल करता है। 
            स्वतन्त्रता का अर्थ उच्छ्रंखलता कदापि नहीं होता। मर्यादित विचारों की अभिव्यक्ति जहाँ मन को प्रफुल्लित करती है वहीं श्रोता को भी अभिभूत करती है। यहाँ आत्मानुशासन की लगाम का होना बहुत अनिवार्य होता है। जब तक सद् बुद्धि का चाबुक न पकड़ा जाए तब तक विचारों के प्रदूषित होने का खतरा मण्डराता रहता है। यह दूषण सहृदय जनों के कष्ट का कारण बनता है। इससे हर बुद्धिमान व्यक्ति को बचना चाहिए।
              बोलने से पहले मनुष्य को दस बार सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा कुछ न कह दिया जाए जो सामने वाले को आहत कर दे अथवा उसके आत्मसम्मान को ठेस लग जाए। शब्द रूपी बाणों से यदि किसी को घायल कर दिया जाए तो मर्मान्तक पीड़ा होती है। इसीलिए हमारे मनीषी कहते हैं 
              पहले तोलो फिर बोलो।'
            जिस मनुष्य को अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं है वह इन्सान कहलाने के योग्य ही नहीं है। यही वाणी मनुष्य को सबके सिरों पर बिठाकर यश और मान देती है। दूसरी ओर सबकी नजरों से गिराकर अपमान का दंश झेलने के लिए विवश करती है।
            जिस देश में हम रहते हैं, जिसका अन्न खाते है, जिसका जल पीते हैं, उसके प्रति हमारा दायित्व बढ़ जाता है। जिस मातृभूमि की गोद में खेलकर बड़े हुए हैं, उसका सम्मान करना बहुत ही आवश्यक है। विश्व के किसी भी व्यक्ति को अथवा किसी भी देशवासी को यह अधिकार नहीं है कि वह उसका अपमान करे। चाहे जननी हो अथवा जन्मभूमि हो, इन दोनों का निरादर करने वालों को किसी भी सूरत में क्षमा नहीं किया जा सकता।
          अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए देश का सौदा करने वालों और  उसके साथ द्रोह करने वालों को नरक में भी स्थान नहीं मिलता। ईश्वर भी ऐसे अहसानफरामोशों से नाराज हो जाता है।
          सोशल मीडिया, समाचार पत्रों, टी.वी. चैनलों और रेडियो सबका नैतिक दायित्व है कि वे सभी एकजुट होकर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के विरूद्ध जनजागरण की मुहिम चलाकर उन देशद्रोहियों को उनके अंजाम तक पहुँचाने में सरकार की सहायता करें।
          राजनेताओं का दायित्व बनता है कि वे अपने देश के प्रति वफादारी निभाएँ और जन साधारण को भी जागरूक बनाएँ। देशद्रोहियों को अनावश्यक प्रश्रय न दें। तुच्छ राजनैतिक लाभ के लिए देश को हानि पहुँचाने के बारे में स्वप्न में भी न सोचें। 
            जो भी व्यक्ति देश में अलगाव की स्थितियाँ पैदा कर रहे हैं अथवा देश की अखण्डता पर प्रहार कर रहे हैं, उन सब देशद्रोहियों को किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान न करके उन्हें अविलम्ब कानून के हवाले करके राजद्रोह का अभियोग चलाना चाहिए। किसी भी तरह की रियायत न देकर उन लोगों को कठोर-से-कठोर दण्ड देकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति हमारे देश भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का दुस्साहस न कर सकें।
          जो लोग केवल अपने अधिकारों की दुहाई देते हैं और उन्हें कर्त्तव्यों का भान नहीं है, उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से वंचित कर देना चाहिए। जो सब लोग स्वतन्त्रता पाने के इच्छुक हैं, उनके समक्ष उसका सदुपयोग करने की शर्त रखी जानी चाहिए ताकि कोई भी उसका दुरूपयोग न कर सके। 
             भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भारत में यह एक मौलिक अधिकार है लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत तार्किक प्रतिबन्धों के अधीन है। केवल सरकार या कानून को इसके लिए कभी भी चाबुक न चलाना पड़े बल्कि आत्मानुशासन का पालन करके बोलने की स्वतन्त्रता का आनन्द उठाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

रिश्तों की अपनी गरिमा

रिश्तों की अपनी ही गरिमा

रिश्तों की अपनी ही एक गरिमा होती है। उनकी अनुपालना करना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होता। जहाँ कभी थोड़ी-सी चूक हुई वहीं रिश्ते लहुलूहान हो जाते हैं। उन्हें बड़ी ही नजाकत से सम्हालना होता है। जितना सम्हल-सम्हलकर अपना कदम बढ़ाया जाएगा,‌ उतनी ही उनमें गर्माहट बनी‌ रहती है। यदि रिश्तों को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाए तो वे अपने नहीं रहते। वे बेगाने हो जाते हैं। हमारी पहुॅंच से दूर चले जाते हैं। इसका पश्चाताप हमें उस समय होता है जब हमें उनकी आवश्यकता होती है।
        रिश्ते हमें जीवन में ईश्वर की ओर से दिया गया उपहार होते हैं। वे जन्म से ही हमारे पूर्वकृत कर्मों के अनुसार हमारे साथ जुड़े हुए होते हैं। उनके साथ जितना लेनदेन का सम्बन्ध होता है, उसी के अनुरूप उन रिश्तों का हमसे जुडाव होता है। ये सभी हमारे सुखों और दुखों में हमारे साथी बनते हैं। जितना जिसके साथ सम्बन्ध निश्चित होता है, उसे भोगकर वह रिश्ता हमसे विदा लेकर सदा के लिए बिछुड़ जाता है। उस समय उनका जाना हमारे लिए बहुत कष्टकारी होता है।
          मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। हमें उन्हें अपने विवेक से परखना होता है। बातचीत सबसे होनी चाहिए परन्तु अपनापन या मन से जुड़ाव कुछ ही लोगों के साथ हो पाता है। वास्तव में वही मित्रता की श्रेणी में आते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि रिश्ते वो बड़े नहीं होते जिनका सम्बन्ध जन्म से होता है। बल्कि रिश्ते वो बड़े कहलाते हैं जो दिल से जुड़ते हैं। ऐसे सम्बन्ध कुछ दूर तक साथ देते हैं। जहाँ दिलों में दरार आती है वहीं वे रिश्ते भी मन से उतर जाते हैं और वहाँ नफरत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। उन दीवारों के पार कुछ नहीं दिखाई देता।
          आज के भौतिकतावादी युग से  पहले लोग भावुक होते थे और रिश्तों का महत्त्व समझते थे। वे यही मानते थे कि मनुष्य अपने रिश्तेदारों से सुशोभित होता है। इसलिए वे उन्हें सहृदयता से निभाते थे। उसके बाद धीरे-धीरे लोग प्रैक्टिकल होने लगे, तब वे अपने रिश्तों से लाभ उठाने में दक्ष होने लगे। वहाँ उनके बीच स्वार्थ हावी होने लगे। आज इस भौतिक युग के लोग प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे केवल उन लोगों के साथ अपना रिश्ता बनाना चाहते हैं जिनसे भविष्य में फायदा उठाया जा सकता है। 
              दूसरे शब्दों में आज स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते बनाए जाने लगे हैं। यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि ऐसे रिश्ते बहुत सीमित समय तक जीवित रहते हैं। हमें उनका अन्त समीप ही मानकर चलना चाहिए। रिश्तों को निभाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, जरा-सी चोट लगने पर चटककर टूट जाते हैं और चकनाचूर हो जाते हैं। रिश्ते और शीशे दोनों ही में अन्तर होता है। शीशा हमारी मूर्खता अथवा लापरवाही से टूटता है परन्तु रिश्तों के टूटने में हम लोगों की गलतफहमी कारण होती हैं।
          रिश्ते अन्त तक हमारा साथ न छोड़ें उसके लिए हमें सबके साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहिए। जब हम इनसे असमानता बरतते हैं तब मनमुटाव होने लगते हैं और दूरिया बढ़ने लगती हैं। इसलिए रिश्तों में यथायोग्य व्यवहार करना हमारे लिए आवश्यक होता है। अपनों को साथ लेकर चलने में ही मनुष्य की शोभा होती है। चाहे सुख का समय हो अथवा सुख का समय, मनुष्य अपने बन्धु-बान्धवों के साथ ही सुशोभित होता है। अन्यथा अकेले तो न सुख अच्छा लगता है और न ही दुख की घड़ी कटती है।
          रिश्तों में एक-दूसरे की कभी परीक्षा भी नहीं लेनी चाहिए। इससे सम्बन्धों की गरमाहट घटने लगती है। तब वे रिश्ते मात्र औपचारिक बनकर रह जाते हैं। हर रिश्ते में विश्वास होना आवश्यक होता है। माता-पिता का बच्चों पर विश्वास होना चाहिए और बच्चों का माता-पिता पर। पति-पत्नी के रिश्ते में परस्पर विश्वास ही उन्हें जोड़कर रखता है। इसी प्रकार भाई-बहन में आपसी विश्वास की डोर उन्हें आजन्म बाँधे रखती है। बन्धु-बान्धवों के प्रति विश्वास उन्हें अपने से दूर नहीं जाने देते।
        ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से अलग तरह का होता है। वहाँ हम उस मालिक से गिला-शिकवा करते हैं और उससे नाराज हो जाने पर लानत-मलानत भी करते हैं। उस पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। फिर भी ईश्वर का और हमारा रिश्ता बना रहता है। हम उसके बिना नहीं रह सकते। कुछ दिन की नाराजगी के बाद हम फिर उसकी शरण में चले जाते हैं। यह रूठने और मानने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है। यह सब करतब हमारी ओर से होते हैं। वह सदा हमारे ऊपर अपना वरद हाथ रखता है।
        सांसारिक अथवा भौतिक रिश्तों में ऐसा नहीं होता। मनमुटाव या शिकवा-शिकायत की स्थिति में रिश्तों के टूटने में समय नहीं लगता। फिर सबका अहं आड़े लगता है और रिश्ते मृतप्राय: हो जाते हैं। अर्थात् केवल नाम के या दिखावे के रिश्ते रह जाते हैं। इसलिए प्रेम, विश्वास, आपसी भाईचारे और अपने सद् व्यवहार से और मन से सभी रिश्तों को निभाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

आत्मीय सम्बन्धों को लॉन्च पर न लगाऍं

आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर न लगाऍं

बहुत विचार करने पर भी मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आज एक भाई अपने दूसरे भाई के खून का प्यासा क्यों होता जा रहा है? क्या वे सब प्यार से मिल-जुलकर नहीं रह सकते? क्या आज सबके खून सफेद हो रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि रिश्तों के मायने ही बदलते जा रहे हैं?
          मुझे ऐसा लगता है कि हमारे स्वार्थ शायद इतने अधिक टकराने लगे है कि हम असहिष्णु होते जा रहे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए अनावश्यक ही हम लोग दिन-रात अपना सुख-चैन गँवाकर निरन्तर रेस में शामिल हो रहे हैं। आज विदेशियों की तर्ज पर मैं, मेरा परिवार और मेरे बच्चे बस यहीं तक हम सभी सीमित होते जा रहे हैं। इनके अतिरिक्त न हमें कोई दिखाई देता है और न ही हम किसी अन्य भाई-बन्धु के विषय में सोचना चाहते हैं। इसीलिए रिश्ते सिकुड़ने लगे हैं। समाज के लिए यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
           हमारा अहंकार इतना अधिक प्रबल होता जा रहा है जो किसी शर्त पर, किसी के साथ भी समझौता नहीं करना चाहता। सारी दुनिया को देख लेने अथवा उसमें आग लगा देने की बढ़ती युवाओं की मानसिकता समाज का बहुत अहित कर रही है। हमारा यही अहं हमें अपने रिश्तों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं करने दे रहा। इसलिए हमें सबसे कटकर अलग-थलग करने में सफल हो रहे हैं। हम लोग अनजाने में इस षड्यन्त्र का सरलतापूर्वक शिकार हो रहे हैं।
        ये स्वार्थ और अहंकार दोनों ही घर-परिवार के बिखराव में अहं रोल निभा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि का उनके जीवन काल में ही बटवारा करके सुख की साँस लेना चाहते हैं। उन्हें सदा यही लगता है कि दूसरे भाई या बहन को माता-पिता कहीं उनसे अधिक न दे दें। यदि ऐसा हो गया तो वे घाटे में रह जाएँगे। सबसे बड़ी बात कि घाटे का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता। जबकि माता-पिता के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं। वे अपनी धन-सम्पत्ति को सबमें बराबर बॉंटना चाहते हैं।
               अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए युवा पीढ़ी के ये बच्चे अनावश्यक ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। जायज-नाजायज हथकण्डे अपनाकर वे अपने माता-पिता की मेहनत की धन-दौलत को धोखे से हथिया लेने में अपनी शान समझते हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि आज के बच्चे बहुत ही प्रेक्टिल हो गए हैं। अपने माता-पिता को धोखा देने में भी उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास नहीं होता। अपने दूसरे भाई-बहनों का हक छीनते हुए वे जरा-सा भी संकोच नहीं करते। उन्हें न समाज का डर है और न ही ईश्वर का।
        आज के बच्चे अपने अधिकारों के विषय में तो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं परन्तु वे अपने दायित्वों से अनजान बने रहना चाहते हैं। माता-पिता की सेवा करना तो वे प्राय: भूल जाते हैं। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो अपने माता-पिता का सब कुछ हथिया कर उन्हें बोझ समझने लगते हैं। अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धावस्था में ओल्डहोम भेज देते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ उन्हें अच्छा व्यवहार करना भी उन्हें याद नहीं रहता। यदि उनके साथ कोई गलत व्यवहार कर दे तो वे तिलमिला जाते हैं।
          अपने पैतृक घर में ऊपर-नीचे के तल अथवा मंजिल में बच्चे नहीं रह सकते परन्तु उन घरों को बेचकर, फ्लैटों में जाकर दूसरे अनजान लोगों के साथ रहना पसन्द करते हैं। वहाँ रहकर समझौता कर सकते हैं पर अपने भाई-बहनों की शक्ल तक वे देखना पसन्द नहीं करते। उन्हें लगता है कि परायों के साथ रहकर वे सुखी रहेंगे पर जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। वहॉं पर जाकर भी अनेक कठिनाइयों से उन्हें दो-चार होना पड़ता है।
           इन्सानी कमजोरी है कि जिस किसी वस्तु की वह कामना करता है और जब वह उसे उपलब्ध हो जाती है तब वह उससे ऊब जाता है और कुछ नया पाना चाहता है। यही उसके भटकाव का कारण है जो उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता। ऐसे बच्चे जो रिश्तों की अहमियत जानना-समझना ही नहीं चाहते वे कहीं भी रह लें, परेशान ही रहते हैं। यह जीवन का कटु सत्य है कि समझौता तो हरपल और हर स्थान यानी कदम-कदम पर करना ही पड़ता है। इससे कोई बच नहीं सकता।
        सम्बन्धों में आपसी मनमुटाव के कारण ही शायद खून सफेद होने की बात कह दी जाती है। भाई-बहन धन-सम्पत्ति के लालच में इतने अन्धे हो जाते हैं कि एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की हत्या करने या करवाने के लिए षडयन्त्र तक रच डालते हैं। फिर जीवन पर्यन्त घर-परिवार, समाज और न्याय के दुश्मन बन जाते हैं। जिनके लिए ऐसा जघन्य अपराध करते हैं, वे उन्हें दुनिया की भीड़ में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
        हमारे सयाने कहते हैं- 'अपना यदि मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा।' कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर प्रदत्त अपने सम्बन्धों की कद्र करनी चाहिए। वह मालिक नहीं चाहता कि अपने भाई-बन्धुओं से अनुचित व्यवहार किया जाए। यह धन-वैभव तो आना-जाना है, इसके लिए आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर लगाने से बचना चाहिए। हम सभी को चाहिए कि अपने भाई-बहनों के साथ शत्रुता का भाव न रखकर यथासम्भव भाईचारा बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

ईश्वर की रचना में त्रुटि नहीं

ईश्वर की रचना में त्रुटि नहीं 

ईश्वर पूर्ण है और उसकी रचना यह संसार भी पूर्ण है। 'ईशावास्योपनिषद्' और 'बृहदारण्यकोपनिषद्' का प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र है -
     ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। 
          पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
अर्थात् परमात्मा पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण परमात्मा से ही पूर्ण जगत प्रकट होता है। पूर्ण जगत से पूर्ण तत्व निकाल लेने पर भी पूर्ण परमात्मा ही शेष रहता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परमात्मा अनन्त और अद्वैत है। 
             यह मन्त्र बताता है कि ईश्वर या परब्रह्म अनन्त और परिपूर्ण हैं। ईश्वर से उत्पन्न होने के कारण यह संसार भी अपने आप में पूर्ण है, न कि अपूर्ण या अधूरा। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है, इसका अर्थ है कि भगवान में से कुछ भी कम नहीं होता। यह अद्वैत वेदान्त के इस सिद्धान्त की पुष्टि करता है कि जो कुछ भी है, वह केवल परमात्मा ही है।
             ईश्वर की इस सृष्टि में हम कितना भी ढूॅंढ ले, हम कोई कमी नहीं निकाल सकते। यदि हम  कुदरत को निहारने लगो तो हमें उसका ओर-छोर ही समझ नहीं आता। कहाँ से आरम्भ करें? यह सबसे बड़ा प्रश्न सामने आ जाता है। हम जितना अधिक उसकी सृष्टि के बारे में सोचते हैं, उतना ही उसमें डूबते जाते हैं।
             उसकी सृष्टि में डूबे रहने वालों को हम दार्शनिक कहते हैं। वे उसके चमत्कारों की विवेचना करते रहते हैं। उसकी बनाई हुई हर वस्तु की पूर्णता हमें विचार करने के लिए विवश कर देती है कि हम उसकी तरह क्यों नहीं हो सकते? उसकी बनाई किसी भी वस्तु को निहारने लगो, उस पर गहराई से विचार करने लगो तो बहुत खोजने पर भी हम उसमें कमी नहीं निकाल सकते।
             प्रकृति को ही ले लो। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, नदी, समुद्र, ग्रह और नक्षत्र आदि सभी अपने कामों को नियमपूर्वक बिना रुके, बिना थके चौबीसों घण्टे करते रहते हैं। उनके लिए न किसी अलार्म क्लाक की आवश्यकता है और न ही उन्हे अपने कार्य में कोताही बरतने के लिए डाँट-डपट की आवश्यकता होती है। ईश्वर को कभी भी समय-असमय उनकी क्लास लेने अथवा उन्हें समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। 
            न ही वे सब अवकाश के लिए प्रार्थना पत्र मालिक को भेजते हैं कि वे थक गए हैं या वे अब सैर-सपाटे के लिए जाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें अपने नित्य प्रतिदिन के कार्य कुछ समय के लिए मुक्त किया जाए। वे तो अनुशासन बद्ध होकर निरन्तर गतिमान रहते हैं। वे सब कभी शिकायत का मौका नहीं देते।
          जहाँ भी दृष्टि डालो सृष्टि में प्रकृति का नैसर्गिक सौन्दर्य बिखरा हुआ है। उसे कुरूप बनाने में हम अपनी ओर से कोई भी कसर नहीं छोड़ते। फिर भी वह सौन्दर्य हम सबको बरबस आकृष्ट कर लेता है। शहरों और जंगलों में रंग-बिरंगे फलों और फूलो से लदे हुए वृक्ष हमें चमत्कृत कर देते हैं। फूलों का महकना उनकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है। वह बहुत बड़ा चित्रकार है। उसका रंग-विन्यास हमारी समझ से परे की बात है।
            इतने सुन्दर जलचर, नभचर और भूचर जीव बनाए हैं कि उन्हें निहारते ही बनता है। हम उन जीवों को अपनी जीभ के स्वाद के लिए निर्ममता से मारकार खा जाते हैं। इसी प्रकार अन्य पदार्थों का भी जितना अधिक विश्लेषण हम करते जाते हैं, उतना ही उनमें डूबते चले जाते हैं। उस समय मन करता है कि काश वह जगत्कर्त्ता हमें मिल जाए तो हम अपनी जिज्ञासा शान्त कर लें।
            हम मनुष्य यदि कोई भी नई वस्तु बनाते हैं तो कितनी बार उसका परीक्षण करते हैं कि कहीं कोई कमी न रह जाए। इतना सब होने के बाद भी हमसे कहीं-न-कहीं चूक हो ही जाती है। हम पुतले तो बना सकते हैं, उसे बैटरी से रटा-रटाया बुलवा सकते हैं परन्तु उसमें प्राण डालकर उसे सजीव नहीं कर सकते।
          हम सांसारिक प्राणी एक परिवार अथवा कुटुम्ब में कुछ सीमित लोगों के साथ मिलकर नहीं रह सकते। हमारे आपसी मतभेद हमें दूरियाँ बनाने के लिए विवश कर देते हैं। उनके लिए सब साधन नहीं जुटा पाते अथवा अपने अहं के कारण हम चाहकर भी सबका साथ नहीं निभा पाते। एक वह परमपिता है जिसने न जाने कितने अरबों-खरबों जीवों को इस धरती पर उत्पन्न किया है और बड़ी ही सरलता से उन सबका ध्यान रखता है उन्हें सारी सुख-सुविधाएँ देता है।
            हमारी बनाई हुई किसी भी रचना में कमी निकलना बहुत सरल है परन्तु उस परमात्मा की बनाई हुई एक भी रचना में कहीं त्रुटि की गुँजाइश नहीं है। इसीलिए वस महान् है और उसके समक्ष हम सब नतमस्तक हो जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 31 मार्च 2026

जीवन एक पाठशाला

जीवन एक पाठशाला

जीवन एक पाठशाला है। जिसमें हम सभी विद्यार्थी हैं। इसके प्रधानाचार्य जगत पिता ईश्वर हैं और संसार के सभी जीव इसमें अध्यापक हैं। ये सभी निरन्तर हमें कुछ-न-कुछ सिखाते रहते हैं। जब तक सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है तब तक हम आगे बढ़ते रहते हैं। इसके विपरीत सीखना रुकने पर जीवन थम जाता है। हमारे अनुभव ही हमारे सबसे बड़े शिक्षक हैं जो ठोकर लगने पर ही चलना सिखाते हैं।
          जीवन एक निरन्तर चलने वाली पाठशाला है। यहाँ हर अनुभव, सुख-दुःख और व्यक्ति एक शिक्षक की तरह हमें कुछ नया सिखाते हैं। यह पाठशाला हमें अनवरत संघर्ष करना, गलतियों से सीखना और सदैव आगे बढ़ना सिखाती है। जीवन में सीखना कभी समाप्त नहीं होता और समय के साथ परिस्थितियाँ ही हमें परिपक्व बनाने का कार्य करती हैं। 
            बच्चे सवेरे उठकर तैयार होते हैं और अपने विद्यालय जाते हैं। वहाँ निश्चित समय तक पढ़ाई करके घर वापिस लौट आते हैं। वहाँ से मिले गृहकार्य को करना पड़ता है। यदि उसमें कोताही बरतें तो स्कूल में डाँट पड़ती है, सजा मिलती है और कभी-कभी पिटाई भी हो जाती है। उसके पश्चात अपने पढ़े हुए पाठ को बारबार याद करके उसकी परीक्षा देनी पड़ती है। उसमें उत्तीर्ण होने पर ही छात्र अगली कक्षा में जा सकता है। अन्यथा उसी पुरानी कक्षा में वापिस बैठना होता है।
            उसी प्रकार प्रतिदिन प्रात: उठकर अपने दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त होकर हमें भी अपने विद्यालय यानी अपने-अपने दायित्वों को निभाने के लिए तैयार होना होता है। उन्हें यदि सही ढंग से नहीं निभा पाएँगे तो सजा के रूप में घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों से ताने और उलाहने सुनने के लिए मिलते हैं। उस समय मनुष्य को असफलता, कायरता अथवा भगोड़ेपन का सुन्दर-सा, चमकता हुआ मेडल मिलता है।
          संसार के छोटे-से-छोटे जीव से भी हम चाहें तो कुछ सीख सकते हैं। जैसे चींटी से धैर्य व कर्त्तव्य निष्ठा, चातक से वर्षा की पहली बूँद पाने जैसी दृढ़ता, पतंगे की लौ से लगन, अपने समूह की रक्षा अथवा मिल-जुलकर रहना, बन्दरिया का सन्तान प्रेम, शेर से स्वावलम्बन, सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण प्रकृति से नियम का पालन, वृक्षों से परोपकार, पर्वतों से दृढ़ता इत्यादि बहुत कुछ हम लोग सीख सकते हैं।
            व्यक्ति सीखने वाला होना चाहिए, यह सारी कायनात उसे नया-नया पाठ पढ़ाने के लिए तैयार बैठी है। सबसे बड़ा शिक्षक समय है जो हमारे कर्मो के अनुसार हमें कभी सुखों के हिण्डोले में झूलाता है और कभी दुखों के थपेड़ो से मर्माहत करता है। इसका दोष हम किसी ओर को नहीं दे सकते।
            दुनिया में आने के बाद से ही मनुष्य की ज्ञाननार्जन की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जितना ज्ञान वह ग्रहण करता है, उसमें से उसकी परीक्षा ली जाती है। यदि वह उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तो बहुत अच्छा अन्यथा जिन्दगी का वही पाठ उसे पढ़ना पड़ता है। यह ऐसी परीक्षा नहीं होती कि जिसमें पाठ का रट्टा लगाया और उत्तर पुस्तिका में लिख दिया तो पास हो गए। 
           जीवन की इस परीक्षा में वही परखा जाता है कि जो पढ़ा है अथवा अपने जीवन में अनुभव से सीखा है। उसे आत्मसात् किया या नहीं अर्थात् उसका प्रेक्टिकल किया है या उस ज्ञान का मात्र प्रदर्शन ही किया जा रहा है।
             इस परीक्षा के प्रश्नपत्र में अन्य प्रश्नों के अतिरिक्त दुखों और परेशानियों का प्रेक्टिकल करवाया जाता है। उसमें पास होना आवश्यक होता है। इसमें मनुष्य के गुण-अवगुण, उसका पुस्तकीय ज्ञान सब परखा जाता है। इसी विपत्ति रूपी अग्नि की कसौटी पर जो खरा उतरा वही वास्तव में तपकर कुन्दन बनता है। तात्पर्य यह है कि इस समय जो व्यक्ति अधीर होकर सही रास्ते का चुनाव करते हैं, ईश्वर शाबाशी के रूप में उनके मनोरथ पूर्ण करता है। उस समय उन्हें वह सब कई गुणा अधिक लौटा देता है जो उन्होंने खोया होता है।
          जो लोग जीवन की इस परीक्षा में घबराकर अनुत्तीर्ण होने के डर से कुमार्ग की ओर चल पड़ते हैं, आयुपर्यन्त उनके लिए कदम-कदम पर काँटे बिछ जाते हैं। उनका सुख-चैन सब तिरोहित होने लगता है। वे हर समय एक अज्ञात भय के साए में रहते हैं।
              इस परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण होने के लिए जीवन की पाठशाला में मन लगाकर ध्यान से पढ़ना चाहिए। अपने दायित्वों का पूर्णरूपेण निर्वहण करते हुए देश, धर्म व समाज के नियमों का मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिए। यदि मनुष्य सन्मार्ग पर अडिग रहे तो किसी प्रकार की परीक्षा में वह बिना अपना धैर्य खोए पास होता चला जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 30 मार्च 2026

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान हर मनुष्य बनाना चाहता है। उसके लिए वह निरन्तर प्रयास करता रहता है। दिन-रात का अपना सुख-चैन बिसराकर वह अथक परिश्रम करता है, संघर्षरत रहता है। इसका कारण है कि दुनिया की भीड़ में कोई भी व्यक्ति खो जाना नहीं चाहता। स्वतन्त्रता को लेकर सभी की अपनी एक निजी धारणा है। जो परिस्थिति के अनुसार हो जाती है। अपने मामलों और क्षेत्रों पर स्वयं निर्णय लेने की क्षमता आवश्यक होती है। दूसरों पर निर्भर नहीं होना, चाहे वह आर्थिक हो या वैचारिक रूप से हो। बिना किसी अनुचित रोक-टोक के अपने विचार व्यक्त करना या अपने जीवन के बारे में निर्णय लेना। 
            स्वतन्त्रता का अर्थ होता है किसी भी बाहरी नियन्त्रण, दबाव या अनुचित प्रतिबन्धों से मुक्ति पाना। वहाँ व्यक्ति अपनी इच्छा और विवेक से कार्य करने, निर्णय लेने और अपने जीवन को संचालित करने में सक्षम होता है। यह समाज में समानता और व्यवस्था के साथ सन्तुलित करने वाली होती है। यह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों अर्थों में देखी जाती है। इसमें तर्कसंगत और न्यायसंगत नियमों के अधीन रहकर सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना शामिल होता है। 
            विचार करने का विषय यह है कि मनुष्य अपनी पहचान कैसे बना सकता है?  वह क्या उपाय करे कि उसकी वह पहचान बनी रहे? 
          बच्चा जब छोटा होता है तब वह अपने माता-पिता के नाम से जाना जाता है। यानी मनुष्य की पहचान उसके कुल से, उसकी जाति से और उसके धर्म से होती है। जब वह थोड़ा बड़ा होता है तभी से वह अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगता है। वह चाहता है कि सब लोग उसको उसके नाम और कार्य से उसे पहचानें।
            इसके लिए वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके योग्य बनना चाहता है। अच्छी-सी नौकरी अथवा बड़ा-सा कारोबार करना चाहता है। वह चाहता है कि जिस भी किसी क्षेत्र में वह रहे, उसे वहाँ नम्बर वन की ही पोजिशन मिले। 
            ऐसी इच्छा करने में कुछ गलत नहीं है। उसे पाने के लिए प्रयास भी तो करना पड़ता है। यदि यह सब मात्र चाहत ही रहेगी और उसके अनुरूप परिश्रम व लगनशीलता नहीं होगी तो उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण नहीं हो सकेगी। वह अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल नहीं हो सकेगा। 
            यदि कामना करने मात्र से और पलक झपकते ही सभी इच्छाएँ पूर्ण होने लगें तो उनका आनन्द ही नहीं रहेगा। वर्षों कठोर परिश्रम रूपी साधना करने के पश्चात ही मनुष्य को स्वयं उसकी पहचान रूपी श्रेष्ठ फल मिलता है। तब तक इन्सान आयु के बढ़ने के साथ-साथ परिपक्व हो जाता है। उसे तय की गई इस लम्बी यात्रा के सुखद व दुखद अनुभवों के पहलुओं पर विचार करने की समझ आ जाती है। तब अपनी बनाई हुई इस पहचान को वह आयुपर्यन्त सम्हालकर रखने पाने में समर्थ हो जाता है।
          इसके विपरीत इस पहचान की सफलता का नशा जिनके सिर पर चढ़कर बोलने लगता है, इस संसार में पटखनी खाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। यदि किसी भी क्षेत्र में नाम कमाया है तो अपने लिए और स्वयं अपनी प्रसन्नता के लिए। किसी दूसरे को तो उससे कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला। यह निश्चित है कि कोई व्यक्ति आपके रौब में नहीं आएगा। हाँ, किसी को अपना स्वार्थ सिद्ध करना हो तो वह अलग विषय है। वह आगे-पीछे घूम सकता है, मिन्नत-चिरौरी कर सकता है और दिमाग खराब कर सकता है।
          यह स्मरण रखना चाहिए कि इस विश्व में बहुत से नामचीन लोग हैं। उन बहुतों से यदि स्वयं की तुलना कर सकें तो फिर यह नशा सिर चढ़कर नहीं बोलता बल्कि पाँव जमीन पर रखने के लिए विवश कर देता है। इससे मनुष्य इस धरातल पर रहता है, गर्व में चूर होकर अनावश्यक ही उड़ान नहीं भरता। तब वह इस समाज में आलोचना का पात्र नहीं बनता अपितु एक सम्माननीय व्यक्ति बन जाता है।
          हम इस बात को झुठला नहीं सकते कि कामयाबी में बहुत नशा होता है। मनुष्य को दम्भी बनने में जरा भी देर नहीं लगती। उस समय उसे सच्चे पथप्रदर्शक मित्रों की आवश्यकता होती है। हालांकि स्वार्थी लोगों का भ्रमजाल बहुत मजबूत होता है। वे अनावश्यक प्रशस्तियाँ गाते रहते हैं जो किसी को मोहित करने के लिए पर्याप्त होती हैं। उनके मायाजाल से बच निकलने वाला वास्तव में महान होता है। उस समय सच्चे और अच्छे मित्र चापलूसों की भीड़ में कहीं खो से जाते हैं या पीछे रह जाते हैं।
            जब अपनी एक पहचान बन जाए तब उस मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक अपने हितचिन्तकों को हमेशा अगली पंक्ति में रखने की आवश्यकता होती है। उनका साथ पाकर वह मनुष्य दिग्भ्रमित नहीं होगा तथा और अधिक उन्नति करता जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 29 मार्च 2026

महानता पर किसी का एकाधिकार नहीं

महानता पर किसी का एकाधिकार नहीं

जन साधारण की भलाई के लिए जो व्यक्ति कुछ कार्य करता है, वही वास्तव में महान कहलाने योग्य है। समाज के लिए योगदान दिए बिना केवल प्रसिद्ध होना, अमीर होना या शक्तिशाली होना महानता नहीं कहलाती। महानता की असली कसौटी सेवा भावना है। केवल किसी नाम या पद से ही कोई महान नहीं बन जाता। महान वे लोग होते हैं जहॉं भी उनकी बात हो तो लोग उनकी प्रशंसा करें, उनका गुणगान करें। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जो भी व्यक्ति राष्ट्र, धर्म, समाज या उच्च आदर्शों के लिए निस्वार्थ भाव से काम करता है, वही महानता का भागीदार होता है।
             महानता ऐसा विशिष्ट गुण है जिस पर किसी व्यक्ति विशेष का एकाधिकार नहीं होता। हर व्यक्ति को महान बनने का पूरा अधिकार है। यह सत्य है कि महानता, ज्ञान या देश प्रेम पर किसी एक व्यक्ति, समूह या विचारधारा का एकाधिकार नहीं है। यह एक साझा मानवीय गुण है जो योग्यता, कर्म और साधना से प्राप्त होता है। महानता सामूहिक उत्तरदायित्व है और समाज के किसी भी सदस्य द्वारा, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हो, अर्जित की जा सकती है। अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जो व्यक्ति कार्य करता है उसके लिए महानता का मार्ग खुला रहता है।
             ज्ञान और उच्चता के क्षेत्र में वही योग्य माना जाता है जिसमें जिज्ञासा, साधना और तपस्या करने की ललक हो, न कि वह जो किसी खास समूह से जुड़ा हो। जो मनुष्य महानता के मार्ग पर चलना चाहता है, उसे अपनी नित्य प्रति की जीवनशैली में थोड़ा-सा परिवर्तन करना पड़ता है। यानी स्व से पर अथवा व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ना होता है। 
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसे हृदय को संकुचित करने के स्थान पर विशाल बनाना होता है। केवल अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों के साथ-साथ उसे प्राणिमात्र का हितसाधक बनना होता है। इस संसार के सभी जीवों को उसे अपने कुटुम्ब के सदस्य की तरह ही मानना होता है।
            जीवन में आगे बढ़ने और सफल होने के लिए मनुष्य को फूँक-फूँककर कदम रखना होता है। दूसरों को नीचा दिखाने के स्थान पर वह सबकी उन्नति की कामना करनी होती है। दूसरों की सफलता से ऐसा मनुष्य जलता नहीं है बल्कि प्रसन्न होता है। दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है। इसलिए वह उसे हड़प करने के बारे में मन से भी नहीं सोचता। वह जो भी ग्रहण करता है, उसे बादल की तरह संसार को लौटा देने के लिए कटिबद्ध रहता है। 
            दूसरों की निन्दा-चुगली करने के स्थान पर वह अपने समय का सकारात्मक उपयोग करता है। सदा सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करता है। परोपकार के कार्यों में समय व्यतीत करता है। सबको जीवन में प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। महान लोग अपने जीवन में लक्ष्य निर्धारित करके उसे पूर्ण करने के लिए जुट जाते हैं। अपने जीवन को यज्ञमय बनाते हैं। उनका सारा जीवन समाज, देश और धर्म के सुधार कार्यों में ही व्यतीत होता है। हमेशा समाज में फैली हुई कुरीतियों के प्रति लोगों को सावधान करते रहते हैं।
              अपने जीवन को सदा ही सामाजिक, नैतिक और धार्मिक नियमों के अनुसार चलाने वाले ये लोग दूसरों से भी उन नियमों का पालन करने की अपेक्षा करते हैं। तभी ये समाज में अग्रणी बनकर दिशादर्शन का कार्य बखूबी निभाते हैं। किसी भी मनुष्य की व्यथा कथा से ये सहृदय लोग आहत हो जाते हैं। उसके कष्ट को दूर करने का यथासम्भव प्रयास करते हैं। ये महापुरुष पूर्णरूपेण विश्वसनीय होते हैं। दूसरों के रहस्यों को खजाने की तरह गुप्त रखते हैं।
            महान लोगों का सबसे बड़ा गुण होता है निर्विकार और निरहंकार रहना। ये महानुभाव हर किसी की परवाह अपने-पराए के भेदभाव से परे रहकर करते हैं। उनके मन में कर्त्तापन का अभिमान कदापि नहीं आता। इसलिए ये सरल व कोमल होते हैं। इन लोगों के साथ कोई कितना भी  दुर्व्यवहार कर ले, उन्हें भला-बुरा कह ले, उसे दण्ड देने के स्थान पर क्षमा कर देने में विश्वास रखते हैं। इसीलिए इन्हें क्षमाशील कहा जाता है।
             ये महानात्मा संसार के कार्य-व्यवहार करते हुए भी जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहते हैं। अपनी धुन में मस्त ये लोग राग-द्वेष से दूर रहते हैं। किसी को भी इनके संयमित व्यवहार से छल-कपट अथवा किसी प्रकार के षडयन्त्र की बू तक नहीं आती। अपने अन्तस् में महानता का गुण समेटे ये महानुभाव सदा निम्न नियम पर आचरण करते हैं - 
           सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय
अर्थात् सब लोगों के हित के कार्य करना और सबके सुख की चिन्ता करने को ही अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लेते हैं। जो भी इन गुणों को आत्मसात कर लेता है, वह भी महान हो जाता है। जिस पथ पर ये चलते हैं, उसी मार्ग के उन पदचिह्नों पर आने वाली पीढ़ियाँ चलकर अपने जीवन को धन्य बनाती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद