मंगलवार, 9 जून 2026

शरीर अनमोल खजाना

शरीर अनमोल खजाना

हमारा यह शरीर बहुत ही अनमोल खजाना है। इसकी हम कद्र नहीं करते और न ही उस ईश्वर का धन्यवाद करते हैं जिसने हमें यह अमूल्य रत्न दिया है। यह वह शरीर है जिस पर मनुष्य इतराता फिरता है। इसे सजाने-संवारने के लिए अनेक यत्न करता रहता है। मेडिकल की भाषा में यदि इस शरीर के एक-एक अंग का मूल्य लगाने लगें तो हम स्वयं ही आश्चर्यचकित हो जाएँगे। इसका कारण है कि यह वह मूल्य होगा जिसकी हम कल्पना हम स्वप्न में भी नहीं कर सकते।
             इस शरीर में विद्यमान मस्तिष्क, आँखें, हाथ, पैर, हृदय, किडनी, गाल ब्लेडर, लीवर, घुटने आदि जितने भी अंग हैं, यदि अकेले-अकेले उन सबका मूल्य चिकित्सक की दृष्टि से लगाया जाए तो करोड़ों-अरबों रुपए होगा। इसी प्रकार इनके अस्वस्थ हो जाने की स्थिति में एक-एक अंग पर लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। इस शरीर में सीमित मात्रा में धातुऍं भी विद्यमान हैं।
          इतना सब जानते-समझते हुए और अपने आसपास देखते हुए भी हम ईश्वर प्रदत्त अपने इस खजाने से सदा अनजान बने रहते हैं। जब भी मौका मिलता है, बिना सोचे-समझे उस मालिक पर दोष लगाते हैं कि उसने हमें दिया क्या है? हम उस परम न्यायकारी मालिक पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकते।
          हमारी अवस्था वास्तव में एक भिखारी जैसी है जो किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। उसे यदि सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात या राजपाट सब दे दिया जाए परन्तु फिर भी उसे सन्तोष नहीं मिलता। उसे तो बस गन्दी नाली में गिरा हुआ, भिक्षा में पहले मिला हुआ ताँबे का सिक्का ही चाहिए होता है।
          इसी आशय को यह कथा स्पष्ट करती है। एक राजा का जन्मदिन था। उसने सोचा, "सवेरे उठते ही जो व्यक्ति सबसे पहले उसे मिलेगा, उसे वह खुश कर देगा।"
          प्रातः उठने के पश्चात सबसे पहले उसे एक भिखारी दिखाई दिया। राजा ने उस भिखारी को बुलाया और कहा, "यह लो ताँबे का एक सिक्का।"   
          यह क्या? तॉंबे का वह सिक्का भिखारी के हाथ सें छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी परेशान हो गया और नाली में हाथ डालकर ताँबे का वह सिक्का ढूँढने लगा। 
         राजा ने उसे बुलाकर कहा, "यह लो ताँबे का दूसरा सिक्का और नाली में हाथ मत डालो।"
           भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा हुआ वह सिक्का ढूँढने लगा। 
          राजा को ऐसा लगा, "यह भिखारी बहुत ही गरीब है। इसलिए नाली से तॉंबे का गिरा हुआ सिक्का निकाल रहा है।" 
        उसने भिखारी को फिर बुलाया, "उसे एक चाँदी का सिक्का दे दिया।"
          उस समय भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुए चाँदी का अपनी जेब में सिक्का रख लिया और फिर नाली में ताँबे वाला सिक्का ढूँढने लगा। राजा ने उसे फिर बुलाकर, उसकी हालत देखकर एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढाने लगा। 
        राजा को बहुत ही बुरा लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को उसे आज खुश एवं सन्तुष्ट करना है। उसने भिखारी को फिर बुलाया और कहा, "मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ। अब तो खुश और सन्तुष्ट हो जाओ तुम।"
           भिखारी ने कहा, "वह खुश और सन्तुष्ट तभी हो सकेगा, जब नाली में गिरा हुआ ताँबे का वह सिक्का भी उसे मिल जाएगा।"
           हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। आधा राजपाट, सोने-चाँदी के सिक्कों के मिल जाने के बाद भी वह गन्दी नाली में हाथ डालने से बाज नहीं आ रहा। हमें परमात्मा ने मानव शरीर रूपी यह अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में से ताँबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं।
            इस अनमोल मानव जीवन रूपी उपहार के लिए उस प्रभु का कोटि-कोटि धन्यवाद हमें करते रहना चाहिए। यदि इस शरीर का एक भी अंग किसी कारण से भंग हो जाए अथवा ठीक से अपना कार्य न कर सके तो हमारा यह जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। उसके द्वारा दिए गए इस बेशकीमती खजाने का यदि हम उचित प्रकार से इस्तेमाल कर सकें, तभी हमारा यह जीवन धन्य हो सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 8 जून 2026

सोच के अनुसार संसार

सोच के अनुसार संसार 

मनुष्य जैसी सोच रखता है, उसे यह सृष्टि वैसी ही दिखाई देती है। सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को सारी सृष्टि बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक प्रतीत होती है। हर ओर अच्छाई देखने के कारण वह हर परिस्थिति में शान्त और प्रसन्न रहता है। वह अपने चारों के वातावरण को अपनी सकारात्मक सोच से महकाता रहता है। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति अपने कष्टों को भूलकर प्रसन्नता से भर जाता है।
            इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाला मनुष्य अच्छाई में भी बुराई ढूँढ लेता है और सदा कलपता रहता है। उसे अपनी इस सोच के कारण दो पल का भी सुकून जीवन में नहीं मिल पाता। वह स्वयं तो परेशान रहता ही है, अपने बन्धु- बान्धवों को भी चैन नहीं लेने देता। अपने चिड़चिड़े स्वभाव के कारण वह उन्हें बिना किसी मतलब के परेशानियों मे डाल देता है।
          सकारात्मक और नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों के विषय में हम इस कथा से समझते हैं। किसी ऋषि के दो शिष्य थे। उनमें से एक शिष्य की सकारात्मक सोच थी। वह हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचता था और दूसरा नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी था। 
            एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें जंगल में ले गये। जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से  कहा, "उस पेड़ को बहुत ध्यान से देखो"
           तब उन्होंने पहले शिष्य से पूछा, "तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?" 
          शिष्य ने कहा, "यह पेड़ बहुत विनम्र है, लोग इसे पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे उन्हें फल देता है। इंसान को भी इसी तरह होना चाहिए, जीवन में कितनी भी परेशानी क्यों न हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए।"
           फिर उन्होंने दूसरे शिष्य से पूछा, "तुम पेड़ पर क्या देखते हो?" 
          उसने क्रोधित होते हुए कहा, "यह पेड़ बहुत धूर्त है। बिना पत्थर मारे यह कभी फल नहीं देता। यदि इससे फल लेने हैं तो इसे मारना ही पड़ेगा। इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीनकर ले लेनी चाहिए।"
           गुरु जी ने हंसते हुए पहले शिष्य की प्रशंसा की और दूसरे शिष्य से कहा, "तुम्हें दूसरे शिष्य से सीख लेनी चाहिए। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है। इसके विपरीत नकारात्मक सोच के व्यक्ति सदा अच्छी चीजों मे भी बुराई ही ढूँढते हैं।"
            इसी बात को पुष्ट करने के लिए हम गुलाब के फूल को देखते हैं। गुलाब के फूल को काँटों से घिरा हुआ देखते ही वह नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा, "इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फायदा? इतना सुन्दर होकर पर भी यह काँटों से घिरा हुआ है। जो भी व्यक्ति इस फूल को तोड़ने का प्रयत्न करेगा, उसे ये दुष्ट काँटे उसे लहुलूहान कर देंगे।"
            इसके विपरीत उसी ही फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा, "वाह! यह फूल प्रकृति की कितनी सुन्दर रचना है जो इतने काँटों के बीच भी सुरक्षित खिला हुआ है। सबका मन मोह रहा है और चारों ओर अपनी सुगन्ध फैला रहा है।" 
            कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों ही व्यक्तियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार एक ही बात कही ही है लेकिन केवल उनकी दृष्टि और कथनी का अन्त स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। 
           संसार एक दर्पण की तरह है, यदि आप मुस्कुराऍंगे तो संसार भी मुस्कुराता हुआ दिखाई देगा। यदि मनुष्य अच्छे विचारों को अपनाते हैं तो संसार अच्छा लगता है। व्यक्ति अपनी भावनाओं, विश्वासों और विचारों के अनुसार संसार का निर्माण करता है। संसार के विषय में भारतीय दर्शन का मानना हैं -
              संसरति इति संसारः'
 अर्थात् संसार निरन्तर गतिशील या परिवर्तनशील है जहाँ हम जैसा सोचते और कर्म करते हैं, वैसा ही परिणाम भोगते हैं। सकारात्मक सोच से निराशा दूर होती है और संसार अच्छा प्रतीत होता है जबकि नकारात्मक दृष्टिकोण से वही संसार दुखों और समस्याओं का घर लगता है।
            एक व्यक्ति को हरेक मनुष्य में गुण दिखाई देते हैं और दूसरे को उसमें दोष ही दिखाई देते हैं। मनुष्य जितना सरल, निष्कपट और सहृदय होगा उतना ही वह दूसरों की हर कठिनाई को समझ सकेगा और उसे दूर करने का यथासम्भव प्रयास करेगा। परन्तु कठोर हृदम, निर्मम और छिद्रान्वेषी व्यक्ति दूसरों की कमियों को ढूँढकर उनका उपहास करेगा। वह भूल जाता है कि उसके अपने भीतर कमियों का भण्डार है।
           दूसरों की कमियों अथवा गलतियों को सदा अनदेखा करके सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। ऐसे सकारात्मक व्यक्तियों के चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक होती है। नकारात्मक सोच वाले हमेशा मुरझाए से रहते हैँ। अब यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम किस प्रकार के व्यक्ति कहलाना पसन्द करना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 7 जून 2026

परमात्मा को भूल जाना

परमात्मा को भूल जाना 

अपने घर-परिवार और नौकरी-व्यापार आदि के दैनन्दिन दायित्वों को पूरा करने की फिराक में मनुष्य उस परमात्मा को बिल्कुल ही भूल जाता है जिसने उसे इस संसार में भेजा है। एक वही है जो प्रसन्न होकर हम लोगों को झोली भर-भरकर देता है और कभी अहसान नहीं जताता। मनुष्य अपने ऐसे शुभ चिन्तक को स्मरण ही नहीं करता। रोजी-रोटी जुटाने के चक्कर में वह दिन-रात एक कर देता है पर मालिक की याद उसे नहीं आती।
              इस संसार में आने से पूर्व माता के गर्भ में अन्धेरे से घबराकर वह बार-बार मालिक से प्रार्थना करता है कि उसे अन्धकार से मुक्ति देकर उजाले की ओर ले चलो। दुनिया में जाकर वह प्रभु का स्मरण करेगा, उसे पलभर के लिए भी नहीं भूलेगा। इस संसार में आते ही वह यहॉं की चकाचौंध और आकर्षण में इतना खो जाता है कि उसे प्रभु को दिया हुआ अपना वचन भी याद नहीं रहता। वह यही सोचता रहता है कि अभी बहुत आयु पड़ी है, उसका स्मरण कर लूॅंगा। बचपन से जवानी आ जाती है, फिर बुढ़ापा पैर पसारने लगता है और फिर अन्तकाल आ जाता है परन्तु मालिक की उपासना का समय नहीं आ पाता।
             इस जगत से विदा लेते समय मनुष्य दाता से रो-रोकर प्रार्थना करता है कि आगले जन्म में मानव तन देना ताकि इस जन्म में पूरी तरह से जो तेरी भक्ति नहीं कर पाया, तब करूँगा। मैं अपना अगला जीवन पूर्णरूप से तुझे समर्पित करूँगा।पुराना तन पीछे छूट गया और नया चोला भी मनुष्य को मिल गया, अब क्या?  बचपन से बुढ़ापे की ओर तेजी से कदम बढ़ाता जा रहा है पर उस मालिक को याद करना तो फिर से पीछे छूटता जा रहा है। दुनिया के सारे व्यापार अपनी गति से चलते जा रहे हैं पर केवल उसकी भक्ति की गाड़ी अभी तक स्टार्ट ही नहीं हो पाई। वाह रे इन्सान! क्या यही है तेरी वचनबद्धता? 
          इस एक जुबान के भरोसे पर अरबों-खरबों के व्यापार तो मनुष्य कर लेता है किन्तु ईश्वर को दी गई यह जबान क्योंकर हार जाता है, यह आज तक समझ नहीं आ सका। सारी आयु इन्सान सोचता रहता है बड़ा हो जाऊँगा तब प्रभु का भजन करूँगा। सारी आयु बीत जाती है, दुनिया से विदा लेने का समय भी पास आ जाता है परन्तु तब भी हरि भजन की वेला नहीं आती।
          भक्ति के पथ पर चलने के लिए वृद्ध होने का इन्तजार नहीं करना चाहिए। किसी भी आयु में उसका नाम ले सकते हैं। जो सारी उम्र उसका स्मरण नहीं कर पाया, वह निश्चित ही बुढ़ापे में भी ईश्वर को नहीं भज सकेगा। कुछ लोग कहते हैं कि बासी फूल तो प्रतिमा पर भी नहीं चढ़ाए जाते फिर बूढ़ा अशक्त शरीर ईश्वर को कैसे अर्पित किया जा सकता है? इस विषय पर विचार आवश्य करना चाहिए।
          मालिक ने यह मानव तन दिया है। हमें अब मौका मिल गया है कि जिस तन को प्राप्त के लिए अगणित जन्म गँवा दिए हैं, उसे पाने का प्रयास करें। अब भी यदि अनजान बने रहे तब उस प्रभु को किसी भी सूरत में नहीं पा सकेंगे। अगला जन्म मनुष्य का मिलेगा अथवा नहीं मिलेगा, इसका कोई भी भरोसा नहीं है। मनीषी कहते हैं चौरासी लाख योनियों में मनुष्य अपने कृत कर्मों के अनुसार जन्म लेता है। अगले जन्म कहॉं मिलेगा? यह तो ईश्वर ही जानता है, हम मनुष्य नहीं जानते। केवल मनुष्य योनि ही कर्मयोनि है, शेष अन्य योनियॉं भोगयोनियॉं कहलाती हैं।
            ईश्वर की पूजा-अर्चना सच्चे मन से करनी चाहिए। उसमें लेशमात्र भी प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। ईश्वर जो बारम्बार हमें बिनमाँगे झोलियाँ भर-भरकर खजाने देता है, उसे हम क्या दे सकते हैं? उसे केवल श्रद्धा अथवा भावना से की गई भक्ति ही चाहिए और कुछ नहीं। प्रार्थना का ढोंग करना स्वयं को छलना है। ऐसा करके दुनिया से वाहवाही तो लूटी जा सकती है पर उसकी नजर में ऐसी भक्ति का मूल्य शून्य से अधिक कुछ नहीं होता।
             पक्षी एक-एक दाना करके चुगता है और सौ-सौ बार अपना शीश झुकाता है। हम इन्सान क्या उन बेजुबान पक्षियों से भी गए गुजरे हैं कि सौ-सौ नेमते पाकर भी उस मालिक का अहसान नहीं मानते। उसका धन्यवाद करने में भी कंजूसी करते हैं। मनुष्य को इन पक्षियों से कुछ सीख लेनी चाहिए।
           जब तक यह शरीर स्वस्थ है और मृत्यु दूर है, तब तक हरि भजन की ओर ध्यान दे देना चाहिए। हम नहीं नहीं जानते कि भविष्य के गर्भ में  क्या लिखा है? कब हमारी आँखें मुँद जाएँ और एक बार फिर हम रो-रोकर हरि भजन करने के लिए कुछ समय की प्रार्थना करने लगें। उस समय एक अतिरिक्त पल की भी मोहलत नहीं मिलेगी। इसलिए जो कुछ हैं, जीवन के यही अनमोल पल हैं। इनका सदुपयोग उस मालिक को सच्चे मन से सिमरण करने में बिता सकें तो हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही संवर जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 6 जून 2026

बड़े बोल बोलना

बड़े बोल बोलना

बड़े बोल बोलना अर्थात् अपने अहंकार का प्रदर्शन करना कहलाता है। इस मुहावरे का अर्थ करते हुए हम कह सकते हैं घमण्ड में आकर अपनी प्रशंसा करना, डींगें हॉंकना या अपनी क्षमता से बहुत अधिक बढ़-चढ़कर बातें करना। यानी यह अहंकार और शेखी बघारने का संकेत देता है। बड़े बोल बोलने वाले व्यक्ति को इस संसार में कोई भी पसन्द नहीं करता। सभी लोग उससे बचकर निकल जाना चाहते हैं। 
            बड़े बोल को अहंकार की श्रेणी में रखा जाता है। यह अहंकार विष की बेल के समान है। इसके सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति का विनाश निश्चित है। 
          रहीम जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है-
        बड़े बड़ाई न करें और बड़े न बोलें बोल।
       रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल।।
अर्थात् मनुष्य को न अपनी प्रशंसा करनी चाहिए और न ही बड़े बोल बोलने चाहिए। यदि ऐसा होता तो बेशकीमती हीरे को भी तो घमण्ड में इतराना चाहिए कि वह बहुत मूल्यवान है। पर वह बेचारा तो किसी से कुछ नहीं कहता। पारखी जौहरी उसका मूल्यांकन करता है, तब उसकी कीमत का अहसास सबको होता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्चे मनीषी लोग अपनी प्रशंसा खुद नहीं करते। लोग उनका गुणगान करते हैं और उनके पीछे-पीछे चलते हैं।
            मनुष्य को अपने रग-रूप, अपने उच्च पद, अपने ज्ञान, अपनी आज्ञाकारी सन्तान अथवा अपने धन-वैभव किसी का भी गर्व नहीं करना चाहिए। ये सब वस्तुऍं आनी-जानी हैं। इस दुनिया में ये स्थायी नहीं हैं। शरीर के नष्ट होने से पहले ही‌ ये मनुष्य का साथ छोड़ देती हैं।
              इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि सफलता की ऊँचाइयों को छूकर भी कभी अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि ढलान हमेशा शिखर से ही शुरु होती है। यदि ऊँचाई को छूने के बाद मनुष्य को जरा-सा धक्का लग जाए तो वह सीधा धरालत पर धड़ाम से गिर पड़ता है। तब उसे सम्हलने में बरसों लग जाते हैं। तब तक दुनिया से विदा लेने का समय करीब आ जाता है।
              इस बात को हम नींबू के उदाहरण द्वारा समझते हैं। नीबू के रस की कुछ बूँदें यदि हजारों लीटर दूध में डाल दी जाए तो वे उस सारे दूध को बर्बाद कर देती है। यानी दूध फट जाता है या खराब हो जाता है। तब किसी भी उपाय से उसको पुरानी स्थिति में वापिस नहीं लाया जा सकता। उस समय उसका दूध के रूप में उपयोग में लाना असम्भव हो जाता है।
            उसी प्रकार अहंकार भी अच्छे-से-अच्छे लोगों को भ्रष्ट कर देता है। वह बन्धु-बान्धवों से उसके प्यार प्रगाढ़ सम्बन्धों को भी बिगाड़ देता है। अपने इस अहंकार की आदत के कारण समय बीतने पर जब वह पीछे मुड़कर देखता है तब स्वयं को निपट अकेला खड़ा पाता है। उस समय उसे अपनों के साथ और सहारे की बहुत ही आवश्यकता होती है।
             हर मनुष्य को  सरल, निष्कपट, सहृदय लोग अच्छे लगते हैं। वे उन लोगों के साथ जुड़ना चाहते हैं जो क्षमाशील हों और हर समय अकड़कर न रहें और दूसरों की भावनाओं को समझें। प्यार का व्यवहार करने से सम्बन्ध लम्बे समय तक साथ चलते हैं। किसी भी गलती के हो जाने की स्थिति में एक-दूसरे से क्षमा याचना करने में उन्हें कोई परहेज नहीं होता। अहंकारी हमेशा दूसरों को उसकी गलती पर जलील करना जानता है। वह केवल सॉरी सुनना पसन्द करता है पर स्वयं सॉरी कहना नहीं चाहता। यदि किसी भी कारण से उसे झुकना पड़ जाए तो उसकी नाक कटने लगती है या उसे अपनी हेठी समझने लगता है।
              अहंकारी व्यक्ति को यह भी पता नहीं चलता कि वह किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके उनके हृदय को घायल कर रहा है। वह अपने झूठे अहं के नशे में चूर, दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए बिना सोचे-समझे अन्धाधुन्ध पैसे बर्बाद करने से भी पीछे नहीं हटता। चाहे बाद में उसे कितना ही पश्चाताप क्यों न करना पड़े। इसीलिए विद्वानों का मानना है कि मनुष्य को किसी का भी मजाक सोच-समझ करके उड़ाना चाहिए और अपना पैसा भी व्यर्थ नही गंवाना चाहिए। दोनों ही स्थितियाँ वास्तव में किसी भी मनुष्य के लिए कष्टकारी होती हैं।
           सामान्यतः समाज में बड़े बोल बोलने वालों को नकारात्मक माना जाता है। उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है और उन्हें ऐसी अहंकारी बातों से बचने के लिए सलाह दी जाती है। मनुष्य को स्वाभिमानी होना चाहिए अहंकारी नहीं। मनुष्य को सदा याद रखना चाहिए कि अहंकार से उसका भला किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 5 जून 2026

इस हाथ दो और उस हाथ लो

इस हाथ दो और उस हाथ लो

'इस हाथ दो और उस हाथ लो' यह एक सार्वभौमिक नियम है जो हर व्यक्ति पर लागू होता है। इस विषय में किसी भी व्यक्ति के साथ पक्षपात नहीं किया जाता। इस बात को दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार भी कह सकते हैं- 
           जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
अर्थात् किसान अपने खेतों में जैसे बीज बोता है, उसे वैसी ही फसल मिलती है। उसी प्रकार मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही मीठा या कड़वा फल प्राप्त होता है।
            किसी भी व्यक्ति को यहाँ छूट दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। बिना किसी पक्षपात के ईश्वर निर्दिष्ट नियमों से ही इस संसार की व्यवस्था चलती है। हर जीव को अपने जीवन में भरपूर अवसर मिलते हैं। यदि उस मौके का वह लाभ उठा लेता है तो सर्वविध सुखों का खजाना उसे प्राप्त हो जाता है। इसके विपरीत आचरण करने वाले मनुष्यों के हिस्से में ‌जीवन पर्यन्त बेशुमार कष्ट और परेशानियाँ आती हैं।
        बहुत वर्षों पहले 1966 की बॉलीवुड फिल्म 'दस लाख' का एक बेहद प्रसिद्ध गीत है।  इसे गीतकार प्रेम धवन ने लिखा था और इसे रवि ने संगीतबद्ध किया था। मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने इस गीत को संजय खान और बबीता के लिए गाया था-
          गरीबों  की सुनो वह  तुम्हारी सुनेगा।
          तुम एक पैसा दोगे वह दस लाख देगा।
इसका यही अर्थ हुआ कि वह मालिक हमारे लिए खजाने लुटाने को तैयार बैठा है। हम अपने को उसके योग्य सिद्ध करेंगे तभी तो वह हमारी झोलियाँ भरेगा। हमें बस अपनी झोली के छेदों को सिलकर उसे मजबूत बनाना है।
          मनुष्य दूसरों से बहुत अपेक्षाएँ रखता है। वह भूल जाता है कि दूसरों से जो वह चाहता है पहले उसे वही दूसरों को देना होता है। तभी तो ईश्वर अनन्त गुणा करके उसे मनुष्य को वापिस लौटा देता है। यदि मनुष्य दूसरों से सेवा करवाना चाहता है तो उसे निस्वार्थ भाव से, बिना पक्षपात के सबकी सेवा करनी होती है। यदि मनुष्य दूसरों से मान की अपेक्षा करता है तो उसे सबको समान रूप से मान देना होगा। यदि मनुष्य दूसरों से यश की कामना करता है तो उसका कर्त्तव्य बनता है कि वह सबको यश दे। यानी सबके साथ यथायोग्य व्यवहार उससे अपेक्षित है।
            इस बात को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि जब शुभकर्म का फल हमारे लिए शुभ होगा तब अशुभकर्म का फल हमारी आशा के सर्वथा विपरीत अशुभ ही होगा। इस अशुभ फल को भोगते समय मनुष्य को नानी याद आ जाती है। कितने भी हाथ-पैर मार लो उससे बचने का कोई भी रास्ता नहीं मिल पिता। इसलिए किसी दूसरे के रास्ते में काँटे बिछाने पर स्वयं के लिए फूलों की अपेक्षा करना अनुचित है। अर्थात् दूसरों को दुख देने पर उसके बदले दुख ही मिलेंगे, सुख कदापि नहीं मिल सकते। किसी का अपमान करने के बदले में मनुष्य को भी अपमान ही सहन करना पड़ता है। उसे प्रशंसा नहीं मिल सकती।
             यदि मनुष्य भ्रष्टाचार, अन्याय, आतंक, रिश्वतखोरी, हेराफेरी, दूसरों का गला काटना आदि समाज विरोधी कार्यों के बीज बोएगा तो अपने जीवन में उसे सुख-शान्ति के पलों की कामना नहीं करनी चाहिए। निश्चित ही ईश्वर का यह सीधा-सा और सरल-सा गणित है। जिससे इस संसार का कोई भी जीव बच नहीं सकता।
             इस संसार में हम अपने आसपास देखते हैं और बन्धु-बान्धवों को परामर्श भी देते हैं। जब किसी व्यक्ति की सन्तान उसकी आशा के विपरीत सामाजिक तौर से नालायक निकल जाती है, अपने दुर्व्यवहार से उसका जीना दूभर कर देती है, समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाती है अथवा धोखे से उसका सब धन, सम्पत्ति या व्यापार हथिया लेती है तब वे माता-पिता उस बच्चे से निराश होकर उससे कानूनी तौर पर सारे रिश्ते समाप्त कर लेते हैं। अर्थात् उसे disown कर देते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब उनका वह बच्चा उनके लिए एक अजनबी के समान है, भविष्य में उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहा।
             पारस्परिक भौतिक सम्बन्धों में जब ऐसा व्यवहार किया जा सकता है तो फिर सामाजिक सम्बन्धों में भी यह न्याय हो सकता है। सरल भाषा में हम कह सकते हैं कि जैसा व्यवहार अपने लिए मनुष्य को दूसरों से चाहिए होता है, उसे वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए। इसे हम न्याय कह सकते हैं।
          दूसरों के साथ किया गया अच्छा या बुरा व्यवहार हमारे सामने कर्मफल बनकर आता है। उसे भोगना हमारी मजबूरी होती है, वहॉं हमारी इच्छा या अनिच्छा का कोई मूल्य नहीं होता। वहाँ शार्टकट अथवा बचाव का कोई भी उपाय कारगर सिद्ध नहीं होता। ये कर्मफल जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे साथ-साथ चलते रहते हैं, इन्हीं से हमारा इहलोक और परलोक प्रभावित होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 4 जून 2026

मनोबल सदा ऊॅंचा रखना

मनोबल सदा ऊँचा रखना

परिस्थितियाँ जीवन में कैसी भी आ जाएँ मनुष्य को अपना मनोबल सदा ऊँचा ही रखना चाहिए। उसे किसी भी स्थिति में गिरने नहीं देना चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव पहिए के अरों की तरह की कभी ऊपर और कभी नीचे होते रहते हैं। यह गति ही जीवन का अभिन्न अंग है। यदि पहिए की भाँति जीवन की गति थम जाए तो सब स्थिर हो जाएगा। तब जीने का आनन्द ही धीरे-धीरे समाप्त होता जाएगा।
           मनोबल ऊँचा रखने के लिए हर स्थिति में सकारात्मक पहलू खोजना चाहिए। नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए क्योंकि एक नकारात्मक विचार सकारात्मक विचारों को नष्ट कर सकता है। ध्यान करने से विचारों में स्पष्टता आती है और मनोबल बढ़ता है। व्यायाम तनाव को कम करता है।  स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए। कठिन समय में भी शान्त रहकर निर्णय लेना चाहिए और साहस बनाए रखना चाहिए।
          उन लोगों की तरफ जरा अपनी नजर दौड़ाइए जिनका जीवन एक निश्चित ढर्रे पर चलता है। उनसे कभी चर्चा करेंगे तो पता चलेगा कि वे कितने परेशान रहते हैं। उनका कहना है कि जिन्दगी से दुखी हैं। सवेरे से शाम तक बस वही घिसी-पिटी बदरंग जिन्दगी है, इसमें कोई आकर्षण नहीं है। वे लोग स्वयं को एक मशीन से अधिक और कुछ भी नहीं मानते। उन्हें लगता है कि उनका जीवन एक बोझ है जिसे वे उठाकर घूम रहे हैं। अपने पास सब सुख-सुविधाएँ होते हुए भी ऐसे लोग  डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। बिना किसी विशेष रोग के प्रतिदिन डाक्टरों के पास चक्कर काटते रहते हैं।
          अब अपने आहार को ही ले लो। एक जैसा यानि रूटीन खाना खाकर हम बोर हो जाते हैं। प्रतिदिन  केवल बिना मसाले का फीका, कम नमक का खाना हम नहीं खा पाते। इसी तरह हररोज केवल मीठे खाद्य नहीं खा सकते। हमें भोजन में वैरायटी चाहिए। हमें मीठा, तीखा, चटपटा, दाल, सब्जी, सलाद, आचार, चटनी, पापड़ आदि सब खाद्य पदार्थ भोजन करते समय थाली में चाहिए। अत्यधिक मिर्च-मसालेदार भोजन मनोबल को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सात्विक आहार अपनाना चाहिए।
          इसी तरह एक ही ढर्रे में हम जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यहाँ भी हमें विविधता चाहिए। इसीलिए ईश्वर ने हमारे जीवन को विविध रंगों से ही सराबोर कर दिया है। जीवन के आरम्भ में यानी कि बाल्यकाल बालसुलभ चेष्टाओं से रंगीन बना दिया। वहाँ सब कुछ समझने-बूझने का उतावलापन होता है। अपनी सम्पूर्ण योग्यताओं को निखारने और सेटल होने की ललक होती है।
          उसके बाद यौवनकाल में घर-गृहस्थी, बच्चों और नौकरी-व्यापार आदि की सभी जिम्मेदारियों से लदकर मनुष्य कोल्हू के बैल की तरह बन जाता है। आयु बढ़ने के साथ बच्चों को सेटल करना, उनके विवाह करना और अपनी रिटायरमेंट की समस्याएँ उसके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।
          इसके बाद वृद्धावस्था में बिमारियाँ, शरीर का अशक्त होना, खर्चो में वृद्धि की परेशानियाँ मुँह बाए खड़ी हो जाती हैं। पति-पत्नी का साथ बना रहे तो जीवन सरल हो जाता है। बच्चों का साथ मिले तो बहुत अच्छा और यदि किसी कारणवश न मिल पाए तो उदासी और दुखों की पराकाष्ठा।
        जीवन के इन इन्द्रधनुषी रंगों को यहाँ उकेरने का मात्र यही उद्देश्य है कि हर मोड़ पर मानव की स्थतियाँ भिन्न होती हैँ। कभी-कभी जीवन नदी की धारा की तरह बाधारहित निरन्तर गतिशील रहता है और कभी उसमें बाढ़ भी आ जाती है जो सारे तटबन्धों को तोड़कर तबाही मचा देती है। 
          दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन में सुख के पलों हम मानो जी उठते हैं। दुख की घड़ियों में भी जीते हैं पर मर-मरकर, डरते हुए, उदास-निराश होकर अथवा जीवन से हार मानने लगते हैं। सब कुछ सहन कर लेना चाहिए पर जिन्दगी से हारना नहीं चाहिए। उससे डटकर मुकाबला करना चाहिए। चुनौतियों का सामना करने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।
        जिस प्रकार काले घने बादलों में छुपा सूर्य उनके बरसने पर मुस्कुराता हुआ आ जाता है, दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, उसी प्रकार परेशानियों की घनी काली रात के बाद फिर खुशियाँ का सवेरा आता है। दुख की बदली भी छट जाती है।
          मनोबल मानसिक शक्ति का प्रतीक है जो जीवन की चुनौतियों का सामना करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। जीवन पर्यन्त आने वाले सभी सुख-दुख कोई नया पाठ पढ़ाकर जाते हैं। इसीलिए यह संसार उस प्रभु की पाठशाला है जिसके हम सभी जीव विद्यार्थी हैं। हर पाठ को पढ़कर परीक्षा देनी पड़ती है और योग्यता से उत्तीर्ण भी होना होता है। इस सबके लिए हमारा अपना मनोबल ही हमारा सच्चा मित्र होता है जो जीवन में कभी लड़खड़ाने नहीं देता।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 3 जून 2026

बच्चों का भोलापन

बच्चों का भोलेपन

बच्चे अपने भोलेपन में ऐसे कार्य कर जाते हैं जिनसे उनके अपने कोमल मन को ही ठेस लग जाती है। बच्चों के मन में छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष नहीं होता। वे ईमानदार, सच्चे, सरल हृदय और भावुक होते हैं। इसीलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है। इन मासूम बच्चों के मन में हम बड़े लोग जहर घोलकर इन्हें समय से पहले बड़ा बनाने का अपराध अनायास ही करते हैं। छोटे बच्चे बिना सोचे-समझे किसी की भी बात पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेते हैं यानी दूसरों की कही गई बात को सच मान लेते हैं।
          अपनी बात मनवाने के लिए वे हठ अवश्य करते हैं। यदि उनकी इच्छा को न पूरा किया जाए तो वे आहत हो जाते हैं। कुछ समय तक वे रूठे भी रहते हैं और थोड़े समय के बाद फिर पहले की तरह मस्त हो जाते हैं। तब उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ पल पहले वे नाराज थे। यही बच्चों की चरित्रगत विशेषता है। इसी कारण वे सबका मन मोह लेने में सफल रहते हैं, उन्हें अपना बना लेते हैं। शीघ्र ही हरेक के साथ ऐसे घुलमिल जाते हैं मानो उनका साथ बरसों पुराना है।
            घर में माता को काम करते देखते हैं तो अपनी माँ का हाथ बटाने के लिए कभी वे झाड़ू लगाने लगते हैं तो कभी डस्टर लेकर डस्टिंग करने लगते हैं। कभी रसोई में जाकर रोटी बनाने की जिद करते हैं। पिता को गाड़ी साफ करते देखकर उनकी सहायता के लिए भागे आते हैं। दादा-दादी के आवाज लगाने पर भागकर उनका काम खुशी-खुशी करते हैं।
             घर में यदि कोई बीमार हो जाए तब उनका काम बढ़ जाता है। वे उसकी तिमारदारी में जुट जाते हैं। बार-बार उन्हें छूकर देखते हैं। उन्हें पानी देते हैं, दवा पकड़ाते हैं और उनके पास सारा समय बैठकर व गप्पे लगाते हैं। जिससे बिमारी की अवस्था में उनका मन बहल सके। ये काम बच्चे 
बखूबी करते हैं। जिससे बिमारी की उस अवस्था में भी उन्हें सुकून मिलता है।
            पापा-मम्मी सवेरे ऑफिस जाते हैं और शाम को लौटकर घर वापिस आते हैं। बच्चे समय बीतते उनके आने की प्रतीक्षा करते हैं। उनकी घर आते ही भागकर उनकी चप्पल लेकर आ जाते हैं। उनके लिए फ्रिज में से पानी निकालकर लाने का प्रयास करते हैं। उनके पास बैठकर अपनी दिनभर की कहानियॉं सुनाते हैं। अपने प्रति उनकी चिन्ता देखकर माता-पिता उन पर बलिहारी जाते हैं। बच्चे से बात करके वे अपनी थकान भूल जाते हैं।
            इस तरह घर में हर किसी सदस्य के लिए फिक्रमन्द रहने वाले बच्चे अपनी नासमझी के कारण प्रायः कुछ-न-कुछ गड़बड़ कर देते हैं। दिन में दसियों बार काम फैला देते हैं। इसके लिए उन्हें डाँट भी लगा दी जाती है। फिर भी वे अपने परोपकारी स्वभाव को नहीं छोड़ते और अपनी ही धुन में खोए रहते हैं। थोड़ी देर के बाद फिर आ जाते हैं कोई दूसरा काम करने के लिए। जरा-सी शाबाशी मिलने पर इतराने लगते हैं।
           अपने अल्पज्ञान के कारण यदा कदा वे अकरणीय कार्य कर जाते हैं। घर के पालतू जीवों को खेल-खेल में तंग करने लगते हैं। कभी-कभी अनजाने में उन जीवों को चोट लग जाती है तब अपनी गलती समझकर वे उदास हो जाते हैं। फिर जब घर के बड़े लोग उन्हें समझाते हैं तब वे दुबारा अपनी गलती न दोहराने के लिए प्रामिस करके प्रसन्नतापूर्वक खेलने लग जाते हैं।
           कभी घर में कोई चिड़िया अण्डे देती है तो उन्हें ज्ञिज्ञासा रहती है कि उसमें से बच्चे कब निकलेंगे? वे कैसे दिखाई देंगे? उन्हें खाना कौन खिलाएगा? आदि प्रश्न उन्हें उद्वेलित करते रहते हैं। इसलिए कभी वे उन अण्डों को सबकी नजर बचाकर छू लेते हैं तो अगले दिन वे उन्हें टूटे हुए मिलते हैं। तब वे व्यथित होकर माता-पिता से इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं। जब उन्हें यह पता चलता है कि उनके छूने से चिड़िया ने अण्डों को तोड़ डाला है तो आहत हुआ बालमन फिर भविष्य में उस गलती को न दोहराने की कसम खाता है।
            अपने मंहगे अथवा सस्ते सभी प्रकार के खिलौनों को तोड़कर प्रायः बच्चे उसका मेकेनिज्म समझने का यत्न करते हैं कि वे किस प्रकार बने हैं अथवा उसमें किन-किन वस्तुओं का प्रयोग किया गया है। अपनी इस आदत के कारण उन्हें अक्सर अपने बड़ों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। फिर भविष्य में खिलौनों को न तोड़ने की कसम खाकर वे दुबारा उसी काम में मशगूल हो जाते हैं। यही उनका बचपन है।
             बच्चों को उनके बचपन में ही जीने देने का यत्न करना चाहिए। आयु से पहले उन्हें बड़ा बनकर उनका बचपन नहीं छीनना चाहिए। हो सके तो कुछ पल के लिए उनके साथ बच्चा बनकर अपने बचपन के हसीन पलों को याद कर लेना चाहिए। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो अपने में मस्त हो जाते हैं। फिर इन पलों का आनन्द नहीं आ सकता। 
चन्द्र प्रभा सूद