रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सन्तुलित व्यवहार

सन्तुलित व्यवहार

'इतना मीठा न बनो कि कोई निगल जाए और इतना कड़वा भी न बनो कि कोई उगल दे'- यह उक्ति सचमुच विचार करने के लिए विवश करती है। मनुष्य को इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। इसलिए उसे हमेशा यही यत्न करना चाहिए कि उसका व्यवहार सन्तुलित हो। उसके अपने ही व्यवहार के कारण किसी को गलतफहमी पैदा न होने पाए।
           सन्तुलित व्यवहार से तात्पर्य भावनाओं, विचारों और कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने से है। इससे कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में मानसिक शान्ति और स्पष्टता बनी रहती है। यह सकारात्मक अभ्यास है। इससे भावनाओं पर नियन्त्रण, सहानुभूति और सोच-समझकर निर्णय लेने की समझ आती है। यह व्यक्तिगत, पेशेवर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक प्रभावी प्रबंधन है। 
              यह परम सत्य है कि जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ आएँगी ही। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोगों में परस्पर जुड़ाव अथवा टकराव की सम्भावना भी बनी रहती है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य किसी दूसरे के कदमों में इतना अधिक गिर जाए और अपने स्वाभिमान को ही गिरवी रख दे।
             मनुष्य को दूसरों की जी-हजूरी अथवा चापलूसी करने के लिए किसी के सामने इतना भी नहीं बिछना चाहिए कि सामने वाला उसे कुचलता हुआ आगे बढ़ जाए और उसकी परवाह भी न करे। ऐसी अपमानजनक स्थिति किसी भी सहृदय व्यक्ति के लिए घातक हो सकती है। मनुष्य को इसके दूरगामी परिणामों के विषय में अवश्य ही विचार कर लेना चाहिए। उन्हें कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए।
            कुछ लोग ऐसे बोलते हैं मानो अपनी जुबान में उन्होंने शहद घोला हुआ है। ऐसी जरूरत से ज्यादा मीठी जुबान पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि वह पीठ पीछे वार करने वाली हो सकती है। कुछ लोग बनावटी आवाज में बोलते हैं। ऐसे लोग भी हितैषी नहीं हो सकते। वाणी की प्राकृतिक स्वाभाविकता से पहचान की जा सकती है कि कौन हमारा हितैषी है और कौन हमारी जड़ें काटने वाला होगा।
          मीठा बोलना चाहिए परन्तु इतना मीठा भी नहीं कि हर कोई अपमानित कर चलता बने। लोग सोचते हैं कि जो मीठा बोल रहा है वह निश्चित ही हमसे अपना कोई स्वार्थ पूरा करना चाहता है। दुनिया असल और नकल की पहचान करना नहीं जानते।
           'मृदुभाषी बनो' यह तो सभी कहते हैं परन्तु संसार में ऐसे लोगों को बेवकूफ समझने में कोई परहेज भी नहीं करता। वे सोचते है इन लोगों का क्या है? इन्हें तो मनचाहे ढंग से नचा लेंगे।
             मनुष्य को कटुभाषी, हठी, अहंकारी और क्रोधी भी नहीं होना चाहिए कि सभी उसे अपने से दूर कर दें और उससे मित्रता भी न करने के बारे में दस बार सोचें। दूसरे शब्दों में कहें तो हर स्थान पर उनका उपहास उड़ाया जाए या उनसे किनारा कर लिया जाए। ऐसे लोग अपनी हठधर्मिता के कारण और अपने दुर्व्यवहार के चलते उन सभी लोगों को जो उनके सम्पर्क में आते हैं, उन्हें अनायास ही अपना शत्रु बना लेते हैं। तब फिर अकेलेपन को स्वेच्छा से अपना साथी बना लेते हैं।
             कोई भी मनुष्य अपने जीवन में कभी अपमानित नहीं होना चाहता इसलिए वह ऐसे लोगों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझता है। उनके विषय में कोई भी भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि कब उनका मूड खराब हो जाए और वे अपने प्रिय-से-प्रिय का भी अपमान कर दें। इस अपमानित होने के भय से सब यही सोचते हैं कि इन्हें छोड़ दो। न तो इन लोगों की दोस्ती अच्छी है और न ही इनकी दुश्मनी। इसलिए जितना भी हो सके इनसे कन्नी काटते हुए बचकर निकल जाओ, इसी में ही सभी लोगों की भलाई है।
           कैसी भी परिस्थिति हो अत्यधिक गुस्सा, डर अथवा प्रसन्नता के स्थान पर शान्त बने रहना चाहिए। अच्छी तरह सोच-समझकर प्रतिक्रिया देना उचित होता है। दूसरों के साथ व्यवहार में सदैव सौजन्यता, सम्मान का भाव और धैर्य रखने से मित्रों और शुभचिन्तकों की संख्या बढ़ती है। अपनी शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए। किसी भी अनपेक्षित स्थिति के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया देने के स्थान पर उसे स्वीकार करके समझदारी से निपटना चाहिए। सन्तुलित व्यवहार का पालन करने से मानसिक तनाव कम होता है, उत्पादकता बढ़ती है और रिश्तों में मजबूती आती है। 
           अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम बहुत अधिक मीठा बनकर ससार में जीना चाहते हैं या कड़वा बनकर। वैसे तो सुधीजनों का यही मानना है कि मनुष्य को इस संसार में सहजता से जीने के लिए आवश्यकता अधिक मधुरता और कटुता दोनों का ही त्याग करना चाहिए। मनुष्य को अपने स्वाभाविक आचार-व्यवहार का ही पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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