रविवार, 10 मई 2026

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो 

बाड़ को खेत की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है परन्तु यदि यही बाढ़ किसी कारण से खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की सुरक्षा कोई नहीं कर सकता। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी कितना भी यत्न कर ले पर उस खेत को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सकता।
           बाड़ खेत को खा रही है, यह एक मुहावरा है। इसका प्रयोग अक्सर ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जहॉं कोई वस्तु किसी के संसाधनों या अवसरों को दूर ले जाई जा रही हो। यह किसी ऐसे व्यक्ति या स्थिति का भी उल्लेख हो सकता है जो रचनात्मकता या प्रगति को बाधित कर रहा है। इस मुहावरे का प्रयोग प्रायः एक बाधा के सामने हताशा या लाचारी की भावना व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
            इसी प्रकार जिस व्यक्ति को सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है यदि वही अमानत में खयानत करने लग जाए तब बहुत ही कठिनाई होने लगती है। हमने ऐसे कई काण्ड होते हुए देखे हैं जहाँ उसी के किसी सुरक्षाकर्मी ने ही हत्या कर दी हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गान्धी की हत्या का हैं।
          इसी प्रकार घर अथवा कार्यालय में नियुक्त किए गए सुरक्षाकर्मी स्वयं या किसी दूसरे की सहायता लेकर जरा-सी नाराजगी होने पर अपने स्वामी को मौत के घाट उतार देते हैं। घर के किसी मासूम बच्चे का अपहरण करके फिरौती में मोटी रकम तक वसूलते हैं। यदि उनका मनचाहा किसी कारण से न हो पाए तो उस बच्चे को मौत की नींद भी सुला देते हैं। ऐसे उदाहरण प्राय: सोशल मीडिया, टी.वी. एवं समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं।
          'हरिवंश पुराण' में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है -
          निर्वाप्यते ज्वलन्नग्निर्जलेन सुमहानपि।
       उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्ति: कुतोन्यत:॥ अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि कितनी ही विराट क्यों न हो, अन्त में जल के द्वारा शान्त कर दी जाती है। पर यदि जल से ही अग्नि उत्पन्न होने लगे तो अन्य किस पदार्थ से उसको शान्त किया जा सकता है? यानी उसे शान्त नहीं किया जा सकता।
            इस श्लोक में दर्शाए गए सत्य से हम सभी भली-भाँति परिचित है। कहीं भी आग लग जाए तो हम उस पर पानी डालकर बुझाते हैं। परन्तु यदि उसी पानी से बनी बिजली से आग भड़क जाए तो वहाँ पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। तब उस आग पर मिट्टी डाली जाती है। इसका कारण यह है कि आग पर पानी डालने से करेण्ट आ जाता है, इससे कई जानें जाने का डर होता है।
            इतिहास का अध्ययन करने पर भी हमें ऐसे अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ इस प्रकार के खूनी खेल खेलने में किसी-न-किसी विभीषण का ही हाथ होता था। अन्यथा विरोधी राजाओं को कहाँ पता होता था उस राजा विशेष में विद्यमान उनकी कमजोरियों का।
            खजाने का रक्षक ही यदि हेराफेरी मास्टर हों तो उस खजाने को लुटने में अधिक समय नहीं लगता। लोगों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बिना समय व्यर्थ हुए नष्ट हो जाती है। इस तरह लक्ष्मी के अपार भण्डार कुत्सित मानसिकता के कारण बर्बाद कर दिए जाते हैं।
            सबसे बढ़कर देश के शासक ही यदि देश को बर्बादी के कगार पर ले जाएँ तो ऐसी सम्भावना होती है कि वह देश किसी अन्य देश के कब्जे में शीघ्र आने वाला है । देश में उसके रक्षक नेता ही यदि भक्षक बन जाएँ अर्थात् नेता चोरबाजारी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त, रिश्वतखोरी को प्रश्रय देने वाले, हेराफेरी करने वाले, दूसरों का गला काटने, अपराधियों की शरणस्थली बनने जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त हो जाएँगे तो उस देश का ईश्वर ही मालिक है। 
          ऐसी स्थिति में उस देश में शासन नाम की कोई चीज नहीं रहती। वहाँ केवल स्वार्थ हावी होने लगते हैं। वहॉं अराजकता का वातावरण बन जाता है। सभी नेता जब देश से अधिक अपने स्वार्थों को महत्त्व देने लगते हैं तब वह देश रसातल की ओर जाने लगता है।
          यदि हम चाहते हैं कि बाड़ खेत को न खाए, हमारा खजाना सुरक्षित रहे अथवा हमारे देश का अहित करने वाला कोई भी मनुष्य न हो तो हम सबको मिलकर इसके लिए साझा प्रयास करना होगा। भीतरघात करने वाले जयचन्दों को शीघ्र पहचानकर उनका सामाजिक तौर से बहिष्कार करना होगा। तभी हर प्रकार से हमारे जान और माल की सुरक्षा हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 9 मई 2026

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

समाज में सदा से ही यह विषय चर्चा का रहा है कि हमारा भोजन शाकाहारी होना चाहिए अथवा मांसाहारी। कुछ लोग ऐसे हैं जो मांसाहार को पौष्टिक भोजन मानते हुए उसे मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य ऐसे लोग हैं जो शाकाहार को सात्विक भोजन कहते हुए मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता पर बल देते हैं। दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने मत को पुष्ट करने के लिए हमारे समक्ष तरह-तरह की दलीलें प्रस्तुत करते हैं। कुछ दलीलें हमारी बुद्धि को मान्य होती हैं और कुछ हमारे हमें नहीं भातीं। 
            शाकाहार निर्विरोध रूप से सभी को स्वीकार्य है। अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि शाकाहार ही मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन है। इसलिए बहुत से लोग स्वेच्छा से शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मांस भक्षण यानी मांसाहार के विषय में हमारे मनीषी अथवा हमारे ग्रन्थ हमें क्या समझाते हैं? इसकी हम आज विवेचना करते हैं। 'मनुस्मृति' में भगवान मनु कहते हों-
        मांसभक्षयिताSमत्र यस्य मांसमिहाद्भ्यहम्।
       एतन्मासस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिण:॥
अर्थात् मैं जिसके मांस को यहाँ (इस संसार में) खाता हूँ, वह भी परलोक में मुझे खाएगा। विद्वान मांस शब्द का यही मांसत्व बताते हैं।
          'मनुस्मृति' ही अन्यत्र मनु महाराज ने और भी कहा है-
       यावन्ति पशुरोमाणि तावन्कृतवोह मारणम्।
       वृथा पशुघ्न: प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि।।
अर्थात् जो मनुष्य निरपराध पशु का वध करता है, पशु की देह पर जितने रोम हैं, वह उतनी ही बार जन्म-जन्म में प्रतिघात प्राप्त करता है अर्थात् दूसरों के हाथों से मारा जाता है।
          'मनुस्मृति' के इन दोनों श्लोकों में भगवान मनु कहना चाहते हैं कि किसी भी पशु का वध करने वालों को बार-बार जन्म लेकर उसी प्रकार हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जब तक उनका प्रायश्चित न हो जाए उन्हें छुटकारा नहीं मिल पाता।
          श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
         भूतेषु बद्धवैरस्य न मन: शान्तिमृच्छति।
अर्थात् जीवों पर वैर का भाव मनुष्य के मन को कभी शान्ति नहीं देता।
        भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में  अन्यत्र कहा है-
        निर्वैर: सर्वभूतेषु य:स सामेति पाण्डव!
अर्थात् हे अर्जुन! जो सभी जीवों पर वैर रहित है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है।
          दोनों ही श्लोकाँशों में भगवान कृष्ण का कथन है कि किसी भी जीव से वैर भाव नहीं रखना चाहिए। किसी जीव का अहित करने पर मन में एक कसक सी रहती है। मनुष्य में बेचैनी रहती है। वे कहते हैं कि मुझे वही प्राप्त कर सकता है जो  मन, वचन व कर्म से भी किसी का अहित न करे।
            श्रीमद्भागवत् में बहुत ही सुन्दर शब्दों में आदेश दिया है किया है-
        मृगोष्ट्र खरमर्काखु सरीसृप्खगमक्षिका:।
       आत्मन: पुत्रवत् पश्येत् तैरेषामनन्तरं कियत्॥ 
अर्थात् हिरण, ऊँट, गधा, बन्दर, चूहा, सरीसृप, सर्प, पक्षी और मक्खी आदि को अपने पुत्र के समान ही समझना चाहिए वास्तव में उनमें और पुत्रों में अन्तर ही कितना है?
            श्रीमद्भागवद् ने व्याख्यायित किया है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी अपने पुत्र के समान मानकर उनकी रक्षा करे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जैसे मनुष्य अपने पुत्र का वध नहीं कर सकता उसी तरह अन्य जीवों को भी नष्ट नहीं करना चाहिए।
          शतपथ ब्राह्मण का कथन है-
        यदु वा आत्मसंमितं तदवति तन्न हिंसति।
       यद् भूयो हिनस्ति तत् यत्कनीयो न तदवति॥
अर्थात् जो आत्मानुकूल है वह रक्षा करता है हिंसा नहीं। और जो हिंसा करता है वह तुच्छ होता है।
              अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांत पर हमारी भारतीय संस्कृति आधारित है। इसका मूल मन्त्र है जो सभी जीवों के प्रति दया और सम्मान सिखाता है। मांसभक्षण को न केवल स्वास्थ्य बल्कि नैतिकता के विरुद्ध भी माना गया है। यह मान्यता इस विचार को पुष्ट करती है कि किसी निर्दोष प्राणी की हत्या करना या उसका मांस खाना नैतिक रूप से उचित नहीं है। यह कथन भी विचारणीय है -
          सर्वैषामपि मांसभश्रणमयुक्तम्
अर्थात् सभी के लिए मांस खाना अनुचित है।  
            साधु पुरुष दूसरे के शरीर को अपने समान ही मानते हैं और संसार के सभी प्राणियों में आत्मा का अंश देखते हैं। अतः अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। किसी भी प्राणी की हिंसा करके उसका मांस खाना अनुचित माना गया है। हिंसा चाहे जीभ के स्वाद के लिए हो अथवा शौक के लिए हो, कभी भी प्रशंसनीय नहीं होती। शेष सुधीजन स्वयं विचार करने में समर्थ हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 8 मई 2026

मकड़जालों से मनुष्य का वास्ता

मकड़जालों से मनुष्य का वास्ता 

मकड़ी के जाले प्रायः घरों में लगते रहते हैं। हम इनका घर में लगना शुभ नहीं माना जाता। इसके अतिरिक्त दीवार पर लगे जाले घर की खूबसूरती को नष्ट करते हैं। कहते है कि जाले यदि घर में लगे हों तो मनहूसियत फैलाते हैं। इसीलिए जाले दिखते ही हम उनकी सफाई करने के लिए बेचैन हो जाते हैं और उन्हें उस स्थान से हटाकर ही दम लेते हैं। खाली पड़े घरों में तो ये बहुत ही अधिक फैल जाते हैं। मकड़जाल का शाब्दिक अर्थ है उलझन भरी संरचना। मकड़ी का जाला उलझन, फरेब अथवा किसी को फंसाने वाली कोई भी पेचीदा वस्तु या योजना हो सकती है। यानी साजिशों के मकड़जाल में किसी को फँसाना कह सकते हैं।
           मकड़ी के पेट में स्थित विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं जो एक तरल रूप में सिल्क या रेशे का निर्माण करती हैं। यह सिल्क बाद में ठोस रूप में बदल जाता है और मकड़ी के पैरों से बाहर निकलता है जिसे वह जाल बनाने में इस्तेमाल करती है। मकड़ी अपने शिकार यानी छोटे-छोटे कीट-पतंगों को अपने जाल में फंसाने के लिए जाल बनाती है। जाल की विशेष संरचना शिकार को फंसाने में मदद करती है। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने रहने के स्थान के रूप में भी करती हैं। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने अण्डे रखने के लिए भी करती हैं।
            मकड़ी का जाला बहुत मजबूत होता है और इसके रेशे काफी हल्के होते हैं। ये रेशे स्टील से भी मजबूत हो सकते हैं। यह जाल बहुत लचीला और खिंचाव को सहन करने में सक्षम होता है जो शिकार को पकड़ने के दौरान टूटता नहीं है। मकड़ी का जाल उसकी जीवित रहने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह उसकी शिकार करने की विशेष विधि को दर्शाता है।
          जंगलों में भी मकड़ियाँ अपने जाले बनाती रहती हैं। इन जालों से बचकर ही सब लोगों को निकलना पड़ता हैं। यदि शरीर या चेहरे को ये छूते हैं तो हम एक अजीब तरह की उलझन का अनुभव करते हैं। उनसे पीछा छुड़ाने का भरसक प्रयास भी करते हैं।
            मकड़ी की कारीगरी की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी। इतनी खूबसूरती से वह अपने जाले बुनती हैं। यदि उस बुनावट को निहारने लगो तो नजर  उस पर से हटती नहीं है। मन हैरान रह जाता है मकड़ी के कौशल को देखकर। यह जाल जो मकड़ी बुनती है उसमें अपने शिकार यानी कीट-पतंगो को फंसाकर अपना पेट भरती है।
            जाल कितना भी आकर्षक हो अथवा खूबसूरत क्यों न हो इसमें फंसने वाले को कभी भी राहत नहीं मिल सकती। मनुष्य को मकड़ी के जाल से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि किसी प्रकार के जाल में भी वह नहीं फंसेगा फिर वह चाहे कितना ही मनमोहक हो।  
            संसार में रहते हुए मनुष्य को इस तरह के मकड़जालों से प्रतिदिन ही वास्ता पड़ता रहता है। कभी मोहमाया के जाल उसे लुभाते है तो कभी सुविधाभोगी होने के कारण शार्टकट का मार्ग। कभी-कभी वह जान-बूझकर अन्न की तलाश में भटकते हुए कबूतरों की तरह स्वयं ही इन जालों में फंसकर असहाय अनुभव करता है। कभी-कभी अनजाने में फंसकर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता है। 
            यदि मनुष्य की इच्छा शक्ति दृढ़ हो तो वह संसार के किसी प्रलोभन देने वाले जाल का तिरस्कार कर सकता है और उसमें फंसता नहीं है। परन्तु कमजोर मानसिकता वाले मनुष्य क्षणिक लाभ के लिए इस जाल में फंसकर अपना जीवन नरक के समान कष्टदायी बना लेते हैं। उस समय ऐसी भयंकर भूल के लिए उनके पास पश्चाताप करने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं बचता।
            शिकार करने वाले शिकारियों का तो काम ही होता है दाना डालने का और जाल बिछाने का। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उन शिकारियों के जाल में न फंसने के उपाय ढूँढ निकालें और उन्हें दूर से ही बॉय-बॉय करते हुए हँसते हुए सुरक्षित रहें।
          इस संसार में जितने भी लुभावने जाल हैं वे मनुष्य को पागल बना देने के लिए पर्याप्त हैं। सच्चाई का रास्ता लम्बा और पथरीला होता है पर यह आकर्षण वाला मार्ग दूर से सुहावना प्रतीत होता है और उस पर चलने वाले को लहुलूहान कर देता है। यहाँ दया अथवा करुणा की कोई भी गुँजाइश नहीं होती।
            मकड़ी जिस प्रकार जाला बनाकर उसके तन्तुओं से स्वयं को समेट लेती है अर्थात् अपने आप को छिपा लेती है, उसी प्रकार तन्तु रूप मायाजाल अथवा सृष्टि की रचना करके ईश्वर भी स्वयं को अपनी इच्छा से आच्छादित कर लेता है यानी स्वयं को समेट लेता है। परमेश्वर और उसकी रचना को समझने के लिए ही 'मुण्डकोपनिषद्' के प्रथम मुण्डक में मकड़ी का उदाहरण दिया गया है। फिर उस प्रभु को पाने के लिए अनेकानेक यत्न करने पड़ते हैं। वही जीव को चौरासी लाख योनियों में भटकने से बचाकर, जन्म-मरण के इन बन्धनों से स्वतन्त्र करके मोक्ष प्रदान कर सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 7 मई 2026

मित्रता को कसौटी पर परखें

 मित्रता को कसौटी पर परखें

मित्रता सदा जाँचकर और परखकर ही करनी चाहिए। मित्र अपने मानसिक स्तर के अनुरूप तो कम-से-कम होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ऐसे लोगों से दोस्ती कर ली जाए जिससे कि उन दोस्तों के कारण जीवन में कभी पछताना पड़े अथवा शर्मिन्दा होना पड़े। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके दोस्ती ऐसे व्यक्ति से ही करनी चाहिए जो हर प्रकार से योग्य हो, विश्वसनीय हो और हितचिन्तक हो अथवा सज्जन हो।
             मित्रता मानव जीवन का एक अनिवार्य और अमूल्य भाग है जो भावनात्मक समर्थन, खुशी और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देती है। सच्चे मित्र कठिन समय में सहारा बनते हैं, तनाव कम करते हैं और व्यक्तिगत विकास में सहायता करते हैं। यह रिश्ता विश्वास, आपसी सम्मान और निस्वार्थ प्रेम की नींव पर टिका होता है। 
              वास्तव में मित्र वही होता है जो माता के समान मनुष्य की रक्षा करता है, पिता की तरह उसे हितकारक कार्यों में लगाता है। कुमार्ग पर जाने पर डाँटकर लौटाकर ला सकता है। सच्चा मित्र किसी भी परिस्थिति में साथ नहीं छोड़ता। वह हर दुख-सुख में सबसे पहले कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़ा मिलता है। 
            वह इससे अनजान रहना चाहता है कि उसका मित्र अमीर है या गरीब। मित्रता के रास्ते में स्टेटस आड़े नहीं आता। वह मित्र को उसके धर्म अथवा जाति से नहीं बल्कि अपनेपन के कारण पहचानता है। इसीलिए भगवान कृष्ण और गरीब ब्राह्मण सुदामा की मित्रता से बड़ा और कोई उदाहरण हो ही नहीं सकता।
            सज्जन व्यक्ति के साथ मित्रता को हम गन्ने के समान मान सकते हैं। गन्ना जिसे हम पूजा में रखते हैं और उससे बनी चीनी से तैयार स्वादिष्ट पदार्थ खाकर जीवन का आनन्द लेते हैं। उसे कितना ही तोड़ लो, छील लो, चूस लो, यहाँ तक कि उसे मशीन में डालकर पीस ही डालो, वह हर बार केवल अपनी मिठास से ही हम सबको निहाल करता है। यानी हर रूप में गन्ना मिठास ही देता है। वह मिठास हमारे अनेक भोज्य पदार्थों को रसीला और स्वादिष्ट बनाती है। उन मनभावन व्यंजनों को खाकर हम सभी तृप्त हो जाते हैं।
            मित्र की मित्रता भी इसी तरह होती है जो मनुष्य को अपनी मिठास से सराबोर करती है। फूल की तरह यह नाजुक और सुगन्ध देने वाली होती है। इस मित्रता को विश्वास और सच्चाई की खाद से पुष्ट करना चाहिए और स्नेह के जल से सींचना चाहिए। तभी यह दोस्ती पुष्पित और पल्लवित होती है जिसकी खुशबू चारों ओर फैलती है। इस मित्रता को देखकर किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है।
          मित्रता में यदि विश्वास को तोड़ा जाए अथवा झूठ, छल-फरेब घर कर जाएँ तो इसमें दरार आ जाती है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी अनमोल दौलत को कोई भी नहीं खोना चाहेगा। इसे खोने का अहसास ही बहुत कष्टदायी होता है। इसलिए सच्चे मित्रों से किसी भी परिस्थिति में किनारा नहीं करना चाहिए और न ही दोस्तों के रास्ते में काँटे बिछाने के विषय में सोचना चाहिए।
           बचपन में जब बच्चा मित्रता के मायने नहीं समझता, उस समय वह अपने पास आने वाले हर किसी को अपना दोस्त मान लेता है यानी जो उससे बात करता है या उसके साथ खेलता है अथवा अपने खिलौने आदि शेयर करता है।
            वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब वह समझदार बन जाता है। उस समय उसे अपने विवेक से मित्रों का चुनाव करना चाहिए। यथासम्भव चापलूस लोगों को अपने से सदा दूर रखना चाहिए। क्योंकि वे स्वार्थवश साथ जुड़ते हैं और अपनी स्वार्थ की पूर्ति होते ही वे पराए हो जाते हैं। ऐसा करके उस समय लगने वाले मानसिक आघात से बचा जा सकता है।
         मित्रता स्वार्थरहित प्रेम और भरोसे का एक अनमोल रिश्ता है जो सुख में प्रसन्नता को दोगुना कर देता है और दुःख में उसे आधा कर देता है। सच्चा मित्र जीवन के हर मुश्किल दौर में छायादार वृक्ष की तरह सहारा बनता है और सही मार्ग दिखाता है। सच्ची दोस्ती सबसे बड़ी दौलत है जो मुसीबत में भी साथ निभाती है। दोस्ती यदि दिल से की जाए तो इसमें कभी भी संदेह की सम्भावना नहीं रहती। सही  मायने में यदि स्वार्थ रहित कन्धा मिल जाए तो फिर मनुष्य के जीवन में कभी कोई गम शेष नहीं रह जाता।
          मित्र वास्तव में श्मशान तक का साथ निभाने वाला होना चाहिए तभी जीवन का आनन्द बना रहता है। आज के भौतिक युग में सच्चा, निस्वार्थ मित्र मिलना किसी खजाने को पाने से कमतर नहीं है। मनुष्य का सौभाग्य होता है तभी उसे ऐसा साथी मिलता है। ऐसे रत्न को सम्हालकर रखना चाहिए जो दुनिया की भीड़ में बिना किसी हील-हुज्जत के हाथ थामकर आगे जाने में समर्थ हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 5 मई 2026

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाऍं

ईश्वर की शरण में जाने का अर्थ होता है अपने अहंकार को त्याग करके पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ प्रभु पर भरोसा करना। परमात्मा ने सभी जीवों को इस संसार में भेजा है। सदा उसका धन्यवाद करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारी परेशानियाँ धीरे-धीरे खुशियों में बदल जाती हैं। खामोशी से यदि उनका सामना किया जाए तो वे सामान्यत: कम हो जाती हैं। इससे सांसारिक तनाव कम हो जाता है। धैर्य धारण करने पर समय बीतते-बीतते वे समाप्त होने लगती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की शरण में किस प्रकार जा सकते हैं? 
              इसका कारण है कि भक्त को भरोसा होता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है। जीवन में परेशानियाँ चाहे कितनी भी क्यों न आ जाएँ यदि उनके बारे में सदा चिन्ता ही करते रहो अथवा सोचते रहो तो वे कम होने के स्थान पर बढ़ने लगती हैं। ऐसा करके मनुष्य अपने ही चारों ओर उदासियों का एक घेरा बना लेता है। फिर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता हुआ हार-पैर मारता रहता है। मनुष्य सदा सफल हो जाएगा, ऐसा आवश्यक नहीं होता।
          मनुष्य के जीवन में अनेकानेक परेशानियाँ एक के बाद एक करके आती रहती हैं। वह अपने गिरते स्वस्थ्य या किसी बीमारी से आक्रान्त होने पर जिसका इलाज सम्भव नहीं से व्यथित होता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के आपसी वैमनस्य या दुर्व्यवहार को देखकर दुखी होता है। कभी वह अवज्ञा करने वाले बच्चों के कुमार्गगामी हो जाने के कारण टूटने लगता है। अपने आर्थिक हालातों के कारण मनुष्य अनमना-सा रहता है। 
             अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली कठिनाइयों को सहने में अक्षम हो जाता है। ऐसे हालात जब बन जाते हैं तब उस गम के कारण उसके होंठ सिल जाते हैं और वह अपनी परेशानी को किसी से कह नहीं पाता। उसके मन में यह डर घर कर जाता है कि लोग उसके विषय में जानकर क्या सोचेंगे? यदि वह अपनी  परेशानी किसी को बताएगा तो लोग पीठ पीछे उसका उपहास करेंगे। यदि मनुष्य अपनी सभी परेशानियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे उनके बारे में हमेशा सोचने के स्थान पर, उनका डटकर सामना करते हुए, उन्हें दूर करने का उपाय करना चाहिए।
            मनुष्य को किसी इन्सान के दुख का कारण नहीं बनना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को दुख के सागर में धकेलने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए। इन्सान कितना भी अच्छा क्यों न हो उससे कभी-कभी भूल तो हो ही जाती है। उसे उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए और दूसरे के दुख को कुछ हद तक कम करने के लिए क्षमायाचना अवश्य कर लेनी चाहिए।
          दूसरे के मन में इससे कितना गहरा घाव हो जाएगा इसका अनुमान भी लगाया नहीं जा सकता। जैसे समुद्र में पत्थर फैंकने पर यह कोई भी नहीं जान सकता कि वह फैंका गया पत्थर वहाँ कितनी गहराई में उतर गया होगा। उसी प्रकार मनुष्य के मन की टीस का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। पीड़ित व्यक्ति के मन से निकलने वाली आह किसी को भी नष्ट कर सकती है।
          परेशानियों से बचने के लिए हमेशा अच्छे कार्य करने का यत्न करना चाहिए। भलाई के कार्य करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। मनुष्य की चाहे प्रशंसा हो या न हो उसे अपने सच्चाई के रास्ते से दूर नहीं जाना चाहिए। इस तरह करने से मन को शान्ति मिलती है और वह अपने दुखों को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। ऐसा करने से मनुष्य को अपने जीवन को समझ आती है।
             हमें नित्य ईश्वर के साथ संवाद करना चाहिए और प्रतिदिन उसे स्मरण करते हुए उसके साथ समय बिताना चाहिए। अपने अहंकार का त्याग करके नि:स्वार्थ भाव से प्रभु को सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। अपने जीवन, सुख-दुख और चिन्ताओं को भगवान को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है। जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं तो हमारा हृदय प्रेम और शान्ति से भर जाता है। ईश्वर को अपना मानने वाले कभी निराश नहीं होते। दुख और विपत्ति के समय में भी हम मनुष्य सुरक्षित अनुभव करते हैं। भगवान की शरण में जाने पर जीवन से मृत्यु और असफलता का भय दूर हो जाता है।
              दुखों और परेशानियों को दूर करने के लिए ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए मनुष्य को सदा अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहकर अपने कष्टों को भोगने के लिए उचित मार्ग की तलाश करनी चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को सहारा मिलता है। उचित मार्गदर्शन और आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त करने का यह एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 4 मई 2026

बार-बार चेतावनी देता शरीर

बार-बार चेतावनी देता शरीर 

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना इस प्रकार की है कि इसमें कोई कमी ढूँढने से भी नहीं मिल सकती। इसे इस प्रकार से मालिक ने बनाया है कि अपनी आवश्यकता के सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों का निर्माण यह स्वयं कर लेता है। जिन-जिन तत्त्वों की इसे जरूरत नहीं होती उन्हें इस शरीर से बाहर निकाल फैंकता है। यह स्वयं ही अपना सुधार कार्य करने में समर्थ है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब नीरोग रहने के लिए यह सारा निर्माण कार्य कर सकता है तो फिर यह बार-बार रोगी क्यों होने लगता है?
            इस प्रश्न के उत्तर में मात्र यही कह सकते हैं कि यह स्वयं रोगी नहीं होता। इसे हम अपनी मूर्खता से रुग्ण बना देते हैं। अब आप कह सकते हैं कि मैंने कितनी हास्यास्पद बात कही है। कौन व्यक्ति होगा जो रोगी बनकर कष्ट उठाना चाहता है? कौन अपने धन और समय दोनों ही की बर्बादी करना चाहता है? कौन डाक्टरों के चक्कर लगाना चाहता है?
            इन सभी प्रश्नों के उत्तर में मैं फिर वही कहूँगी कि हम स्वयं ही इस सबके उत्तरदायी हैं। हम अपनी नादानी के कारण रोगी बनकर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हैं और अपना समय व धन दोनों ही को व्यर्थ गंवाते हैं।
             हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सदा लापरवाह रहते हैं। अथवा यूँ कहना भी अनुचित नहीं होगा कि हम उसकी ओर बिल्कुल ही ध्यान ही नहीं देते हैं। हम स्वयं ही अपने सबसे बड़े दुश्मन बनते हैं। हमारा आहार-विहार, हमारे तौर-तरीके अथवा हमारी जीवन शैली सभी पूर्णरूपेण दोषपूर्ण है। इसके लिए कोई अन्य नहीं, हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
            स्वस्थ रहने के बेसिक नियम हैं कि समय पर सोओ और जागो, समय पर भोजन करो, प्रतिदिन सैर करने जाओ और व्यायाम करो। हम इन मूलभूत नियमों को अपनी व्यस्तता का बहाना बनाते हुए अनदेखा कर देते हैं।
              जिस रोटी को कमाने के लिए सारे प्रपंच रचते हैं, झूठ-सच करते हैं, पाप-पुण्य के कार्य करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। समय-असमय खाने से भोजन ठीक से नहीं पचता और हम परेशानी में आ जाते हैं। हमारी सारी पार्टियाँ रात देर तक चलती हैं, शादियों में बारातें भी आधी रात में पहुँचती है। स्वाभाविक है कि हम देर रात घर लौटेंगे और देर से ही सोएँगे। इसलिए प्रात: भी देर से ही जागेंगे। नाइट शिफ्ट वाली नौकरी भी इसका एक कारण कही जा सकती है। सारा दिन शरीर अलसाया-सा टूटता हुआ रहेगा। उसमें स्फूर्ति नहीं रह सकती।
            अपनी व्यस्त जीवनचर्या में हम अपने खान-पान को सुधार नहीं पाते। न चाहते हुए भी मोटापे के शिकार होते जाते हैं जो सब बिमारियों का मूल कारण है। इन सबके अतिरिक्त हमारे शौक अथवा अपनी शान बघारने के लिए पार्टियों में पी जाने वाली शराब अथवा अन्य किसी प्र्कार के नशीले पदार्थों का सेवन भी शरीर को खोखला बनाता जा रहा है। सारा समय की जाने वाली टेंशन भी शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है।
            हमें अपनी ऋतुचर्या के विषय में तो शायद ज्ञान ही नहीं है। हम नहीं जानते कि किस मौसम में क्या खाना चाहिए और क्या पहनना चाहिए? यह अज्ञानता भी हमारे अस्वस्थ होने का एक प्रमुख कारण हैं। जंक फूड भी हमारी अस्वस्थता का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। सभी समझदार और डाक्टर लोग हमें समय-समय पर चेताते रहते हैं पर हम हैं कि उस शिक्षा पर अमल न करने की कसम खाए बैठे हैं। तब इसका खामियाजा हम बीमार पड़कर चुकाना पड़ता है।
          हमारा शरीर हमें बार-बार चेतावनी देता रहता है और हम अपनी शान बघारते हुए उसे अनदेखा करते रहते हैं। तब फिर उसका परिणाम हमें रोगों से आक्रान्त हो करके भुगतना पड़ता है। यदि वास्तव में हम अपना मित्र बनना चाहते हैं तब हमें स्वयं से शत्रुता निभाना छोड़कर स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना पड़ेगा अन्यथा रोगो की चपेट में आकर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपने बहुमूल्य समय और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को व्यर्थ ही गंवाना पड़ेगा।
            कभी-कभी पर्याप्त आराम के बाद भी महसूस होने वाली थकान एनीमिया, थायराइड या हृदय रोग का संकेत हो सकता है। इसी प्रकार बिना कोशिश किए वजन का तेजी से घटना या बढ़ना थायराइड या कैंसर की चेतावनी हो सकता है। सीने में जकड़न या सॉंस का फूलना हृदय सम्बन्धी समस्याओं के गम्भीर संकेत हो सकते हैं। मखमली काले धब्बे, नए या बदलते तिल और त्वचा का पीला पड़ना त्वचा में बदलाव के संकेत होते हैं।
          बार-बार पेट फूलना, कब्ज, या दस्त होना पाचनतन्त्र की गड़बड़ी से होते हैं। अत्यधिक चिन्ता, तनाव या अनिद्र मानसिक और भावनात्मक संकेत होते हैं। धुंधली दृष्टि, आँखों में लगातार खुजली होना या लाली हो जाना आंखों की समस्या के कारण होते हैं। शरीर से मिलने वाले इन संकेतों को 'फायर अलार्म' की तरह समझना चाहिए। यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाकर जॉंच करवानी चाहिए।
           संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शरीर हमें बार-बार थकान, अनिद्रा, अचानक वजन में गिरावट, सिरदर्द, त्वचा की समस्याओं या सीने में दर्द जैसे संकेतों के माध्यम से गम्भीर बिमारियों की चेतावनी देता है। इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि ये तनाव, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, या हृदय रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। समय पर जॉंच और डॉक्टर से परामर्श करके बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 3 मई 2026

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

गृहस्थी का दायित्व पति-पत्नी दोनों का

भारतीय संस्कृति में गृहस्थ जीवन का बहुत महत्त्व है। दो युवा मिलकर जब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं तब उसे चलाने का दायित्व उन दोनों पर होता है यानी पति और पत्नी दोनों का होता है। परन्तु पति प्राय: यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने का प्रयत्न करता है कि यह तुम्हारा अपना घर है, बच्चे भी तो तुम्हारे हैं और मैं भी तुम्हारा हूँ, तुम जैसे चाहो अपने इस घर को चला सकती हो।
            पति-पत्नी का मुख्य धर्म एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सम्मान, विश्वास और सहयोग के साथ गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाना होता है। दोनों का कर्तव्य है कि वे विपरीत परिस्थितियों में एक-दूसरे का सहारा बनें, सही मार्ग पर चलने में सहायता करें, और नैतिक मूल्यों को बनाए रखते हुए परिवार व समाज के कल्याण के लिए साथ मिलकर कार्य करें। पति को गलत रास्ते पर जाने से रोकना और पतित या गलत रास्ते पर जाने से बचाना पत्नी का दायित्व होता है। 
            पति के साथ सम्मानपूर्वक रहना और घर-परिवार को सुखी रखना भी पत्नी का कर्तव्य होता है। दोनों के निस्वार्थ प्रेम और समर्पण की भावना से घर-परिवार में स्वर्गिक सुख-शान्ति का वातावरण बनता है। वैवाहिक जीवन में प्रेम और सम्मान के साथ एक-दूसरे की जरूरतों को समझना आवश्यक होता है। पति-पत्नी का काम सुख-दुःख में साथ रहकर अपनी जिम्मेदारियों का साझा करना होता है। यह एक-दूसरे को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने का आपसी सम्बन्ध कहलाता है। 
            घर के मुखिया के रूप में परिवार के प्रति अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना चाहिए। पत्नी और बच्चों की शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक सुरक्षा करना पति की जिम्मेदारी होती है। पत्नी के विचारों को आदर देना और उससे पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए। पति नामक प्राणी का पत्नी को तथाकथित रूप से महिमा मण्डित करके अपनी जिम्मेदारियों से भागने का यह बहुत अच्छा उपाय है। उस समय का उपयोग वे घर से बाहर जाकर दोस्तों से गपशप करके, मौजमस्ती करके बिताते हैं। घर में क्या हो रहा है? इससे वे अनजान रहना चाहते हैं अथवा बेखबर रहने का ढोंग करते हैं।
            जहाँ तक घर चलाने की बात है, उसके लिए यही कहा जा सकता है कि पति और पत्नी दोनों की समान सहभागिता की आवश्यकता होती है। आज यह ज्वलन्त प्रश्न है कि घर और बाहर दोनों मोर्चों को स्त्री सम्हाल सकती है तो पुरुष क्यों नहीं?आज मंहगाई के दौर में यदि दोनों कार्य न करें तो जरूरतों को पूरा करना कठिन हो जाता है। दोनो घर से एक ही समय पर जाते हैं और संध्या समय भी एक ही समय पर वापिस लौटते हैं। 
            उस समय भी कुछ अपवाद छोड़ दीजिए, प्राय: पुरुष चहते हैं कि वे महाराजा की तरह बैठे रहें और पत्नी उसकी तिमारदारी में जुट जाए। एक गिलास पानी वह खुद होकर न लें और एक कप चाय भी उन्हें टेबल पर बैठे हाजिर हो जाए। यदि ऐसा न हो पाए तब तकरार होने से कोई नहीं रोक सकता। उस समय पुरुष भूल जाता है कि पत्नी भी उसकी ही तरह थकी-हारी आई है। वह भी एक इन्सान है, उसे भी एक गिलास पानी या एक कप चाय की इच्छा हो रही होगी। 
            पत्नी की कमाई पर ऐश करना या हक जताना तो पुरुष का अधिकार है परन्तु उसे उसी के अनुरूप सुख-सुविधा देने के दायित्व से वह भागता फिरता है। यह दोहरा मापदण्ड किसलिए? हमारी समझ से बाहर की बात है। घर की औरत यदि दफ्तर से आकर किचन का कार्य देख रही है तो उसे भी उसका हाथ बटाना चाहिए, इससे उसके सम्मान को कोई आँच नहीं आती। बच्चों को उनकी पढ़ाई में सहायता करना भी उसका उतना ही दायित्व है। पढ़ी-लिखी पत्नी का क्या लाभ यदि वह यह सब काम न कर सके? ऐसा कहकर पुरुष फिर अपने कर्त्तव्यों से पलायन करना चाहता है।
            पति बीमार हो तो चाहता है पत्नी उसकी तिमारदारी करे, उसके आगे-पीछे चक्करघिनी बनी घूमती रहे। परन्तु यदि पत्नी बिमार हो जाए तो वह सोचता है कि वह नाटक कर रही है। उस समय भी पत्नी की ओर से प्राय: पुरुष लापरवाह हो जाते हैं। ऐसे कष्ट के समय वे उसकी सहायता नहीं करते। यदि वह कुछ कह दे तो फिर घर में महाभारत का युद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता। 
             हम सब जानते हैं कि विदेशों में जहाँ काम करने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए वहाँ जाकर दोनों मिल-जुलकर कार्य कर लेते हैं। परन्तु अपने देश में पुरुष घर के कार्य करने में अपनी हेठी समझते हैं। वे बड़े गर्व से कहते हैं कि हमें तो घर का कोई काम करना नहीं आता। देखा जाए तो यह कोई घमण्ड करने वाली बात नहीं। वास्तव में इस विषय पर सीरियस होकर सोचने की बहुत ही आवश्यकता है।
            विशेष रूप से विचार्य है कि जब घर आप दोनों का है तो सभी दायित्व भी आप दोनों के साझे हैं। किसी एक पक्ष को दूसरे का शोषण करते हुए उसे मानसिक आघात नहीं देना चाहिए। पुरुष को अपने श्रेष्ठ होने के पूर्वाग्रह को त्यागकर अपने घर-परिवार के लिए पूर्णरूप से समर्पित रहना चाहिए। तभी गृहस्थी की गाड़ी के दोनों पहिए ठीक से चल पाते हैं अन्यथा मनमुटाव बढ़ते-बढ़ते अबोलापन होने लगता है। धीरे-धीरे अलगाव होने की स्थिति बनने लगती है जो किसी भी तरह समाज में स्वीकार्य नहीं हो पाती।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 2 मई 2026

झूठे अहं से किसी का भला नहीं

झूठे अहं से किसी का भला नहीं 

मनुष्य के मानस पर यह निर्भर करता है कि वह अपने रास्ते में फूल बिछाना चाहता है अथवा काँटे। फूलों की कोमलता, सुन्दरता, आकर्षण और सुगन्ध के कारण हर व्यक्ति उनकी कामना करता है। परन्तु कठोर और दम्भी काँटों से लहुलूहान हो जाने के डर से सभी लोग उनसे बचते हुए किनारा करना चाहते हैं। इसलिए लोग फूलों और कॉंटों में से फूलों का चुनाव करते हैं। वे उन्हें सुगन्ध देते हैं और उनका मन मोह लेते हैं।
             मंगल की कामना करने वाला हर मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य कर जाता है जिनका नुकसान उसे अपने जीवनकाल में उठाना ही पड़ जाता है। कार्य करते समय तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु उसका फल भोगते समय उसे कष्ट होता है।
           बचपन में एक कहानी पड़ी थी जो आज भी उतनी ही सटीक है। एक हाथी प्रतिदिन नदी में स्नान करने के लिए जाता था। उसके रास्ते में एक दर्जी की दुकान पड़ती थी। हाथी को अपनी दुकान के सामने से हर रोज गुजरते हुए देखकर दर्जी के मन में शरारत सूझी। अब इन्सानी दिमाग है तो कभी-न-कभी कोई खुराफात कर ही बैठता है। इस तरह वह अनजाने में अपने लिए परेशानी मोल ले लेता है। उसका परिणाम भोगते समय उसे नानी याद आने लगती है।
           उसने एक दिन अपनी सुई ली और दुकान के सामने से जाते हुए उस हाथी को चुभो दी। अब तो यह नित्य का क्रम बन गया कि हाथी वहाँ से गुजरता और दर्जी उसे सुई चुभो देता। अकारण पीड़ित होते हुए हाथी को उस दर्जी पर क्रोध आने लगा। एक दिन हाथी ने उस शरारत करने वाले दर्जी को सबक सिखाने की सोची।
           फिर क्या था, वह हाथी नदी पर स्नान करने के लिए गया और अपनी सूँड में पानी भरकर ले आया। वापसी पर जब दर्जी की दुकान आई तो उसने सूँड में भरा हुआ सारा पानी वहाँ उड़ेल दिया। हाथी के ऐसा करने पर उस दर्जी की दुकान पर रखे हुए बहुत सारे ग्राहकों के कपड़े खराब हो गए और उसे बहुत नुकसान हो गया। तब उसे पश्चाताप हुआ कि उसने व्यर्थ ही हाथी जैसे शक्तिशाली जीव से पंगा ले लिया।
            तीर जब कमान से निकल जाता है तो उसे लौटाकर नहीं लाया जा सकता। उस समय मात्र पश्चाताप ही शेष बचता है। यही स्थिति उस दर्जी की भी हो गई। अब उसके पछताने से कुछ भी बदलने वाला नहीं था। अपने नुकसान की भरपाई करने के अतिरिक्त उसके पास अब और कोई चारा नहीं बचा था।
          यह कहानी हमें यही समझा रही है कि दर्जी की तरह ही कभी ईर्ष्या से, कभी मौज-मस्ती के कारण और कभी अपनी मजबूरी में हम दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाते रहते हैं। फिर दर्जी की भाँति हानि उठाकर दुखी हो जाते हैं और तत्पश्चात पश्चाताप करते हैं।
            यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि वह जो व्यवहार वह दूसरों के साथ कर रहा है क्या वही व्यवहार वह अपने लिए चाहता है? यदि उसे वह व्यवहार अपने लिए पसन्द है तो फिर सब ठीक है। परन्तु यदि उसे अपने लिए वह व्यवहार नहीं चाहिए तो कहीं-न-कहीं गड़बड़ है। तब उसे दूसरों के साथ ऐसा कोई बरताव नहीं करना चाहिए जो दूसरे के हृदय को तार-तार कर दे।
            इस प्रकार मनुष्य जानते-बूझते गलत रास्ते पर चल रहा है और दूसरों के रास्ते में काँटे बिछा रहा है। यही काँटे समय बीतते उसके मार्ग पर बिछकर उसे घायल कर देते हैं। इसलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि बबूल का पेड़ बोकर आम का फल नहीं पाया जा सकता।
            इसके विपरीत दूसरों के लिए फूल बरसाने वालों को सर्वत्र सुगन्ध ही मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि फूलों की तरह उनका यश चारों ओर फैलता है।
            अपने झूठे अहं और अनावश्यक पूर्वाग्रह पालने से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। ये सदा ही विनाश का कारण होते हैं। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
    जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
    तोको फूल के फूल हैं वाको हैं तिरसूल।।
अर्थात् जो हमारे लिए काँटे बोता है, उसके लिए भी फूल बोने चाहिए। हमें तो जीवन में फूल रूपी सुख मिल जाएँगे पर उसे दुख ही मिलेंगे।
           इस दोहे का आशय यह है कि बदले की भावना न रखकर, शत्रु के प्रति भी क्षमा और प्रेम का भाव रखना चाहिए। इसका कारण है कि भलाई का फल सुख और बुराई का फल दुख यानी त्रिशूल होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें क्षमा, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार की शिक्षा देता है। 
         ‌‌   बुराई को प्रेम से जीता जा सकता है और ईर्ष्या-द्वेष का उत्तर प्रेम से देना चाहिए। साथ रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने अहं का परित्याग करना चाहिए। इससे हमारा मन शान्त रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 1 मई 2026

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह

माता-पिता बेशक बूढ़े हो जाएँ पर वे घर के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होते हैं। वे घर में रहते हुए चाहे शारीरिक कार्य पूर्ववत दक्षता से न कर सकें परन्तु फिर भी वे बहुत सारे कार्य संवारते रहते हैं। हालाँकि वृद्धावस्था में किसी भी कार्य के सम्पादन में उन्हें कठिनाई होती है पर फिर भी घर में बैठे हुए ही वे उस घर की रौनक होते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र ही अपने बच्चों के मन को यह विश्वास दिला देती है कि वे एकल परिवार के बच्चों की तरह अकेले नहीं हैं। 
             छतनार वृक्ष का अर्थ ऐसे घने और फैले हुए पेड़ से है जिनकी शाखाऍं और टहनियॉं छाते यानी छतरी की भॉंति दूर तक फैली होती हैं। ये वृक्ष घनी छाया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए महुआ, नीम और पीपल जैसे वृक्षों को उनके फैलाव के कारण छतनार कहा जाता है। ये वृक्ष एक विशाल छत्र की तरह दिखाई देते हैं। ये पेड़ भीषण गर्मी में भी अपने नीचे बैठने वालों को ठण्डी और सघन छाया प्रदान करते हैं। साहित्य में 'छतनार वृक्ष' का उपयोग सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैसे एक मॉं का अपने बच्चे को प्यार और सुरक्षा देना।
           बच्चे अपनी हर छोटी-मोटी समस्या को अपने बुजुर्ग होते हुए माता-पिता से शेयर करके चिन्ता मुक्त हो सकते हैं। बड़ों के रहते हुए मनुष्य बिना टेंशन के कहीं भी आ जा सकता है। उन्हें अपने बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। वे चिन्ता मुक्त होकर अपने आफिस में ध्यानपूर्वक कार्य कर सकते हैं। बड़ों के रहते उन्हें अपने घर में ताला तक लगाने की आवश्यकता नहीं होती। बहुत से घरों में तो उनकी मृत्यु के पश्चात जब ताले ढूँढे जाते हैं तो वे नहीं मिलते।
          जिस प्रकार पेड़ बेशक बूढ़ा हो जाए तो भी उसे अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए। वह फल तो शायद नहीं दे पाएगा पर छाया अवश्य ही देगा। उस वृक्ष पर आकर जब विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं तब उस घर का प्रकृति के साथ जुड़े रहने का एक सुखद अहसास होता है। उसी प्रकार घर के वयोवृद्ध माता-पिता को यथोचित सम्मान देना बच्चों का नैतिक दायित्व है।
            यद्यपि अपनी ढलती हुई आयु के कारण वे धन-दौलत नहीं कमा सकते परन्तु बच्चों को अवश्य संस्कार दे सकते हैं। उनके संस्कार और जीवन के अनुभव से संस्कारित हुए बच्चे ही घर, परिवार, देश और समाज के लिए बहुमूल्य रत्न बनते हैं। इन्हें हर स्थान पर सम्मान मिलता है और चारों दिशाओं में इनका यश फैलता है।
            माता-पिता मनुष्य के लिए जीते-जागते भगवान होते हैं जो उन्हें इस दुनिया में लाने का महान् कार्य करते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में सिर उठाकर शान से चल सके। अपने जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटा सकें। अपने निस्वार्थ प्यार और सेवा के साथ-साथ वे अपना सर्वस्व बच्चों को सौंप देते हैं।जो भी धन-सम्पत्ति परिश्रम से उन्होंने अपने जीवन में कमाई होती है, उसे सहर्ष अपने बच्चों को सौंप‌ देते हैं।
              बच्चों का भी यह दायित्व बनता है कि वृद्धावस्था में उन्हें असहाय न छोड़ें। बच्चे भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का सम्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं। उन बच्चों को यह शोभा नहीं देता कि वे तो अपने जीवन में ऐश्वर्य भोगें और उनके माता-पिता दर-बदर की ठोकरें खाएँ, दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ अथवा बिना उचित इलाज के इस दुनिया से विदा ले लें। अपने को असहाय मानकर दूसरों के रहमो कर्म पर जीवित रहें अथवा बच्चों के होते हुए किसी ओल्ड होम की शरण लें।
             बच्चे को अंगुली थामकर चलाते समय हर माता-पिता का सपना होता है कि बड़ा होकर उनका बच्चा कभी उनसे अंगुली छुड़ाकर उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ेगा। वे सदा अपने नाती-पोतों की मोहिनी मुस्कुराहटों और बाल सुलभ चंचल अदाओं के बीच जीना चाहते हैं। हर मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि माता-पिता का अनादर करने वाला सब कुछ होते हुए भी कंगाल होता है। उसे जीवन भर सुख-चैन नहीं मिलता। उसके मन का कोई कोना सदा ही रीता या खाली रह जाता है। उसे भरने के सारे भौतिक प्रयास असफल रह जाते हैं।
          भगवान गणेश ने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माँ भगवती की परिक्रमा करके संसार के समक्ष उदाहरण रखा था कि माता-पिता ही उनका सम्पूर्ण संसार हैं। उन्हीं के चरणों में ही मनुष्य का वास्तविक स्वर्ग होता है। चारों धामों की यात्रा मनुष्य करे अथवा न करे परन्तु अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा करने वाले को सारे तीर्थों का फल घर में  बैठे हुए ही मिल जाता है। इसीलिए भगवान राम और श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों की कामना सभी माता-पिता ईश्वर से करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

बातचीत का रास्ता बन्द न करें

बातचीत का रास्ता बन्द न करें 

लड़-झगड़कर मुँह फुलाकर अलग-थलग होकर बैठ जाना अथवा अपने-अपने रास्ते चल देना किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान आपस में मिल-बैठकर किया जाता है। यानी कोशिश यही रहनी चाहिए कि बातचीत का रास्ता बन्द न हो। बातचीत अक्सर किसी रिश्ते में तनाव, नाराजगी या मतभेदों के कारण बन्द होती है। इसे खत्म करने के लिए सामने वाले की पसन्द की बातों में रुचि लेना, बोरिंग बातें शुरू कर उन्हें ऊबा देना, या शान्त माहौल में सीधे संवाद शुरू करना जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं। 
            यदि सम्भव हो तो सामने वाले व्यक्ति से सीधे पूछना चाहिए कि क्या हुआ है? और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाए। कभी-कभी 'ओह ठीक है' जैसी संक्षिप्त प्रतिक्रियाऍं बातचीत को बन्द करने का संकेत दे सकती हैं जो वास्तव में कभी-कभी अशिष्ट लग सकता है। बातचीत बन्द होने पर उसे फिर से शुरू करना या उसे खत्म करना मनुष्य की स्थिति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके सम्बन्धों पर निर्भर करता है। जब परिवार में कोई सदस्य बातचीत बन्द कर देता है तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। धैर्य से उसे सुलझाया जा सकता है।
          सम्बन्धों में कितनी भी कटुता क्यों न आ जाए उनसे किनारा नहीं किया जा सकता। देर-सवेर उन्हें सुधारना ही पड़ता है। जब सब कुछ बिगड़ जाता है तब उन्हें जोड़ने पर एक गाँठ-सी पड़ जाती है। बाद में यही कहकर उन्हें भूलना होता है कि 'पुरानी बातों पर मिट्टी डालो और उन्हें भूल जाओ।' बड़े-बुजुर्ग गलत नहीं कहते। मिल-जुलकर, एक होकर रहने की शक्ति से हम सभी परिचित हैं।
          समाज में, अपने आस-पड़ोस में, अपने कार्यक्षेत्र में अर्थात् हर स्थान पर यदाकदा मनमुटाव हो जाते हैं। हर व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका सब अलग-अलग होते हैं। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक होता है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि तब उस व्यक्ति विशेष से हम शत्रुता मोल ले बैठें। समय बीतते हमारी यही कटुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी की दुश्मनी बन जाए, जिसका अन्त सुखद कम और दुखद अधिक होता है। इससे किसी का हित नहीं साधा जा सकता है। प्राय: प्राय: व्यवहार में हम देखते हैं।
             दो लोगों या समूहों में भी यदि कभी झगड़े की स्थिति बनती है और थाना-पुलिस अथवा कोर्ट-कचहरी में जाने की नौबत आ जाती है तब भी अन्तत: समझौता ही करना पड़ता है। दोनों पक्षों को शेक हेंड करके ही मुक्ति मिलती है।
              अपने घर में बच्चों के झगड़े होते ही रहते हैं। तब हम उन्हें गले मिलवाकर एक-दूसरे सॉरी कहलवा देते हैं। यानि कि उनमें समझौता हो जाता है और बच्चों के साथ-साथ हम भी खुश हो जाते हैं। उन्हें हम यही शिक्षा देते हैं कि झगड़ा मत करो, प्यार से रहो, गलती हो जाने पर माफी माँग लो और मिलकर रहो। बच्चों को हम सीख दे देते हैं और उनका कोमल मन हमारे प्रति सम्मान के कारण उसे मान लेता है। 
            जब हम बड़ों की बारी आती है तो हमारा अहं आड़े आ जाता है। हम दूसरों को दी हुई अपनी ही सीख को भूलकर अक्खड़ या हठी बन जाते हैं। बच्चे यदि हमारी बात को अनसुनी करना चाहते हैं तो उन्हें डपटकर, हम अपनी बात मनमवाते हैं। उनके समक्ष स्वयं क्या उदाहरण रखते हैं?
             घर-परिवार में होने वाले झगड़े प्राय: गलतफहमियों अथवा गलत फैसलों के कारण होते हैं। जिस प्रकार नाखूनों से माँस को कभी अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भाई-बन्धुवों से पूर्वाग्रह के कारण किनारा नहीं करना चाहिए। सयाने कहते हैं 'अपना मारेगा भी तो छाया में फैंकेगा।' रिश्तों के धागों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए, उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए। फिर जब जोड़ने का समय आता है तो मन में एक कसक रह जाती है। कभी-कभी यह अहसास हो जाता है कि बिना किसी की खास गलती के इतने समय तक हम एक-दूसरे को दोषी मानकर कोसते रहे। 
            हम राजनैतिक कूटनीति पर नजर डालें तो देखते हैं कि युद्ध के बाद भी दो देशों को आखिर समझौता ही करना पड़ता है। वहाँ पर दुश्मनी के बाद भी बातचीत बन्द नहीं की जाती।
             अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि उससे किसी का अहित न हो। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। अपनी हठधर्मिता को त्यागकर और मिल-बैठकर सदा ही सकारात्मक समझौते होते हैं। उनका मान रखने से सबको प्रसन्नता होती है जो अमूल्य होती है। अपनों का साथ बड़े ही भाग्यशालियों को मिलता है। इस सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने से सबको बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

प्राणों का महत्त्व

प्राणों का महत्त्व

हमारे शरीर में रहने वाले प्राण जीव के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्राणों के बिना हमारा शरीर राख की ढेरी के समान बन जाता है। शरीर से प्राणों के निकल जाने के बाद अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति को भी मनुष्य घर में नहीं रहने देता। शीघ्र ही वे उसे अग्नि को समर्पित कर देता है। यदि ऐसा न किया जाए तो कुछ दिनों पश्चात उस शव में से दुर्गन्ध आने लगती है। 
           'छान्दोग्योपनिषद्' में  एक कथा के माध्यम से प्राणों का महत्त्व समझाया गया है। कथा इस प्रकार है कि प्राचीन काल में एक बार सभी इन्द्रियॉं अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगीं। यानी आँख, नासिका, कान (श्रवण शक्ति), जिह्वा(बोलने की शक्ति), मन और प्राण सभी अपने आप को दूसरी इन्द्रियों से श्रेष्ठ बता रहे थे। इसलिए उनमें विवाद होने लगा और फिर उनका झगड़ा बहुत बढ़ने लगा। सभी इन्द्रियॉं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुॅंच पा रही थीं। सभी इन्द्रियॉं अपनी इस समस्या का समाधान चाहती थीं।
            अन्त में वे सभी अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास गईं और उन्हें अपने विवाद का कारण बताया। उन्होंने उन सबको कहा, "जिसके शरीर से बाहर चले जाने के बाद सब समाप्त हो जाए वही श्रेष्ठ है।" 
         सभी इन्द्रियों ने इस सुझाव को मान लिया और उस पर अमल करने का फैसला किया।
          सबसे पहले आँखें शरीर से एक वर्ष के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसने उन सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
          उन सबने उत्तर दिया, "जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कानों से सुनता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ और मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           फिर नासिका (सूँघने की शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने  वापिस लौटकर सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे न सूँघते हुए व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, वाणी से बोलता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           उसके पश्चात कान (श्रवण शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"  
            उन सब ने उत्तर दिया, "जैसे एक बहरा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
            फिर वाक्(बोलने की शक्ति) बाहर चली गई। उसने भी लौटकर वही पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
          उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे एक गूॅंगा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
           फिर उसी तरह से मन ने भी एक साल के पश्चात लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे? 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे बिना मन के बच्चा आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
         अन्त में जब प्राण शरीर को छोड़कर बाहर निकलने लगे तो पल भर में ऐसा लगने लगा मानो सब कुछ समाप्त हो रहा है। उस समय सभी इन्द्रियाँ एकसाथ चिल्लाने लगीं, "मत जाओ, मत जाओ। तुम्हारे बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। तुम चले जाओगे तो सब समाप्त हो जाएगा। हमें समझ आ गया है कि तुम्हीं हम सब में श्रेष्ठ हो।"
            यह उपनिषद् कथा हमें प्राणों का महत्त्व समझा रही है कि उनके बिना इस शरीर का कोई मूल्य नहीं। नश्वर शरीर में रहने वाली अनश्वर आत्मा को हम संसार की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हम सारा समय इस शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। इसी को सदा सजाते-संवारते रहते हैं और इतराते रहते हैं। हम इस बात को भी नजरअंदाज कर देते हैं कि जब यह रूप-यौवन जल्दी ही ढल जाएगा तो फिर क्या होगा? 
            हमारी यह आत्मा अविनाशी ईश्वर का एक अंश मात्र है। परमात्मा की भॉंति यह भी नित्य और नूतन है। हमारे इस भौतिक शरीर के मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी यह सदैव विद्यमान रहती है। यह युगों-युगों तक रूप बदल-बदलकर इस संसार में जन्म लेती रहती है। हमारी आत्मा अपने पुराने, रोगी अथवा कटे-फटे शरीरों का त्याग करके नए शरीर को धारण करती रहती है। अत: आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह


किसी के दिल में जगह बना लेना बहुत ही आसान होता है। दूसरे के मन को मोह लेने की सबसे पहली शर्त होती है विनम्रता। मन में यदि स्वार्थ, दिखावा या छल-फरेब न हो तो किसी को भी अपना बनाया जा सकता है। विनम्र व्यक्ति अपने सरल व सहज व्यवहार से सबको अपना बना लेता है और सबका प्रिय बन जाता है। विनम्र हृदय वाले लोग अधिक आकर्षक और विश्वसनीय होते हैं जो सदा मजबूत सम्बन्ध बनाते हैं।

            विनम्रता दूसरों के दिलों में जगह बनाने का सबसे अनमोल गुण है जो अहंकार को त्यागकर रिश्तों में सौहार्द्र और सम्मान लाता है। यह व्यवहार में नरमी, वाणी में मिठास और दूसरों के विचारों का सम्मान करने से आती है। इस तरह करने से मनुष्य न केवल दूसरों का विश्वास जीतता है बल्कि अपनी महानता भी स्थापित करते हैं। विनम्रता का अर्थ झुकना नहीं होता अपितु अपने अहंकार को त्यागकर दूसरों के प्रति सम्मान दिखाना होता है। विनम्र वाणी और व्यवहार से लोग जुड़ते हैं और रिश्तों में दरार नहीं आती।

             किसी दूसरे के दिल में उतरने के लिए अपने रिश्तों में विश्वास और सच्चाई का होना आवश्यक होता है। अपने प्रिय जन के रंग में रंग जाना ही अपनेपन की सीढ़ी है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरे को उसी रूप में अपना लेना होता है जैसा वह है। उसकी अच्छाइयों को बढ़ाते हुए कमियों को अनदेखा कर देना चाहिए। तभी सम्बन्ध दूर तक साथ निभाते हैं। यह दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायता करती है और जीवन में शान्ति लाती है। 

            यदि किसी व्यक्ति की कमियों को लेकर सदा उसे कोसते रहेंगे, उस पर टीका-टिप्पणी करते रहेंगे तो सम्बन्ध कितने भी प्रगाढ़ रहे हों, टूटकर बिखर जाते हैं। व्यक्ति विशेष की कमियों को अपनी अच्छाई से दूर करने का यत्न करना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करना चाहिए।‌ हमेशा यही सोचना चाहिए कि कोई भी इन्सान सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। यदि वह पूर्ण हो जाएगा तब वह मनुष्य नहीं रह जाएगा अपितु ईश्वर तुल्य होकर हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।

            मनुष्य जब विनत होता है तब उसमें सबको मन्त्र मुग्ध करने की सामर्थ्य होती है। लोहे जैसी कठोर धातु जब नरम हो जाती है तो उससे मनचाहे पदार्थ बनाए जा सकते हैं। इसी तरह सोने जैसी ठोस धातु को अग्नि में पिघलाकर जब नरम कर देते हैं तब उससे मनभावन आभूषण बनाए जाते हैं। उन आभूषणों को पहनकर सभी इतराते फिरते हैं। उसी प्रकार अगर इन्सान भी नरम हो जाए तो उसके हृदय से कठोरता अथवा निर्दयता के भाव तिरोहित हो जाते हैं और वह मोम की तरह कोमल बन जाता है। वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है। वह हर व्यक्ति का प्रिय बन जाता है और फिर किसी के लिए भी पराया नहीं रह जाता।

          इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को महत्त्व देते हैं, थोड़े समय पश्चात उनका असली  चेहरा सबके सामने आ जाता है। लोग उनसे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। उन्हें पराया बनाने में वे समय नष्ट नहीं करते। अपनी इन्हीं गलतियों से मनुष्य दूसरों से कटकर अकेला हो जाता है। जहाँ तक हित साधने की बात है, वह तो स्वयं ही हो जाता है। इसके लिए छल-फरेब का सहारा लेने की कदापि आवश्यकता नहीं होती।

          कठोर मिट्टी पर हल चलाकर किसान उसे नरम बना देता है। तब वह खेत बन जाती है और उसमें विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। ये अनाज सभी जीवों का पेट भरते हैं। यही धरती की विशेषता है कि उसे हम सबकी चिन्ता रहती है। यदि वह स्वार्थी हो जाए तब उसके लिए अपनी जान गंवा देने हेतु कोई भी रणबाँकुरा आगे नहीं आएगा। उस समय इस जीव जगत में चहुॅं ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी।

          गेहूँ को पीसकर जब नरम आटा बना लिया जाता है तब उसमें पानी मिलाकर ही रोटी बनाई जाती है। जो सभी जीवों को पुष्ट करती है। यानी सारी प्रकृति 'स्व' से परे रहकर 'पर' को महत्त्व देती है। तभी हम जीवों का अस्तित्व इस धरा पर सुरक्षित रहता है। 

            दूध में शक्कर की तरह घुलमिल जाने और आटे में नमक की तरह एकरूप होकर दूसरों को सुख देने वाले विनयशील व्यक्ति ही वास्तव में अपनी पहचान बनाए रखते हुए भी सबके अपने बनते हैं। यही उनका सबसे बड़ा गुण होता है, इन गुणों को अपनाने में कभी भी परहेज नहीं करना चाहिए।

           विनम्रता सफलता की गारण्टी है क्योंकि यह संघर्षों को सुलझाती है और लोगों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध बनाती है। यह हमारे चरित्र को निखारती है और अहंकार को गलाकर व्यक्तित्व को महान बनाती है। अपने अहं को किनारे करके ही दूसरों के हृदय में अपना स्थान बनाया जा सकता है। स्वार्थ के वायरस को भी नगण्य करते हुए एक-दूसरे के दिल में घर बनाया जा सकता है। इन छोटी-छोटी बातों को यदि अपने ध्यान में खा जाए तभी किसी के दिल में सरलता से अपना स्थान बनाया जा सकता है।

चन्द्र प्रभा सूद 


सोमवार, 27 अप्रैल 2026

जब शब्द साथ नहीं दें

जब शब्द साथ नहीं दें

बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य बहुत कुछ कहना चाहता है परन्तु उसके अपने शब्द ही उसका साथ नहीं देते। वह अपने भावों को शब्दों में ढालना चाहता है पर असफल हो जाता है। इसलिए वह बस मूक बनकर एकटक ताकता रह जाता है अथवा फिर पैर के नाखूनों से धरती को खोदने लग जाता है। यदा कदा वह दूसरों से नजरें भी चुराने लगता है। उस समय उसका मौन अथवा उसके अश्रु उसकी मुखर भाषा बन जाते हैं।
          मनुष्य जब बहुत अधिक भावुक होता है तब वह बोल नहीं पाता। सहज होने पर ही वह अपनी बात बता सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक कष्ट के समय भी मनुष्य के बोल उसका साथ छोड़ देते हैं। अधिक प्रसन्नता के आवेग में, भय या विस्मय की स्थिति में, पश्चाताप होनेआदि के समय भी उसकी आवाज नहीं निकल पाती। उसके चेहरे के भावों से उसके हृदय को पढ़ा जा सकता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य का चेहरा ही उसका आईना कहलाता है जो उसके सभी प्रकार के मनोगत भावों को बिना कहे प्रकट कर देता है।
          इन सबके अतिरिक्त कई बार दूसरों के प्रति सम्मान भाव के कारण भी मनुष्य चाहते हुए भी प्रतिकार स्वरूप नहीं बोल पाता कि उसे अमुक बात पसन्द नहीं आई। कभी-कभी अपने प्रियजन को परेशानी न हो सोचकर भी मनुष्य चुप्पी लगा जाता है। चुप की भी अपनी एक आवाज होती है जो बिना कुछ बोले दूसरे के हृदय को चीर कर रख देती है। मनुष्य के हावभाव से उसका हर्षोल्लास झलकता है जो हर किसी को दिखाई देता है। 
          ऐसा भी कहा जाता है कि घमण्डी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उसके बिना कुछ कहे ही उसके व्यवहार से ही सब ज्ञात हो जाता है। मौन रहते हुए मनुष्य की सफलता-असफलता उसके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं। अहंकार में चूर रहने वाले व्यक्ति के सामने कोई मनुष्य नहीं पड़ना चाहता। तब वह धीरे-धीरे अकेला हो जाता है। जब उसे किसी की आवश्यकता होती है तो वह अपने विचारों को स्पष्ट करने में असमर्थ हो जाता है। इसका कारण निश्चित ही पूर्व में किया गया उसका व्यवहार होता है।
            पैसे के लिए यह उचित प्रसिद्ध है कि वह बोलता है। पर पैसा तो निर्जीव है, वह बोल नहीं सकता। परन्तु इसका यही अर्थ है कि जब किसी भी स्त्रोत से पैसा मनुष्य के पास अधिकता से आता है तब उसकी सद्य: खरीदी जाने वाली सुविधाएँ उसके पास पैसा होने के रहस्य की पोल खोल देती हैं। यहाँ पर भी वाणी के व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। उसके हाव-भाव ही उसकी चुगली कर देते हैं।
            बिना शब्दों का उच्चारण किए भी मनुष्य अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ हो सकता है। यहाँ मैं याद दिलाना चाहती हूँ कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म पाकर भी जब दुर्भाग्यवश मनुष्य को ईश्वर की ओर से वाणी का उपहार नहीं मिलता तब वह गूँगा कहलाता है। वह अपने विचारों को बोलकर प्रकट नहीं कर सकता परन्तु उसके व्यवहार से अथवा चेहरे के भावों से या हाथ के इशारों से ही उसके घर-परिवार के लोग अथवा बन्धु-बान्धव उसके सारे भावों को सहजता से समझ लेते हैं।
             हम अपने घर में मूक पालतू पशुओं को रखते हैं। वे तो हमारी तरह बोल नहीं सकते पर अपने स्पर्श से, अपने हावभाव से मौन रहते हुए अपने प्यार, क्रोध या जिद आदि भावों को बखूबी समझा देते हैं। इसी प्रकार अपनी भूख-प्यास आदि दैनिक आवश्यकताओं के बारे में भी वे अच्छी तरह अवगत करवा देते हैं।
             एक छोटा बच्चा जो बोल नहीं सकता, वह भी अपनी माता को अपनी सब समस्याओं के विषय में समझा‌ देता है। उसके रोने के तरीके से मॉं समझ लेती है कि अब बच्चे को भूख लगी है, अब उसने सू सू कर लिया है या पोटी कर ली है। वह बिमार‌ है अथवा उसे कोई शारीरिक कष्ट है। इस प्रकार माता अपने बच्चे की सारी बातों को उसके बोले बिना जान-समझ लेती है। यहॉं‌ पर शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
           इन्सान जितने भी घण्टे-घड़ियाल बजा ले पर ईश्वर उसे नहीं मिलता। वह तो उसके शुद्ध और पवित्र मन-मन्दिर में ही मिलता है। मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भाव में रहता है। कहते हैं जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही हम उस प्रभु का वर्णन नहीं कर सकते। उसका चित्रण करते समय हमारी वाणी मौन रह जाती है। हमारे शास्त्र 'नैति नैति' कहते है। अर्थात् ईश्वर यह भी नहीं है, वह भी नहीं है।
          चारों ओर पसरा सन्नाटा मनुष्य की कहानी बिनकहे सुना देता है। किसी सज्जन के प्रति किए गए अभद्र व्यवहार की क्षमा न माँगने पर भी उसके अविरल बहते आँसू उसकी क्षमायाचना का कारण बन जाते हैं। मौन रहते हुए भी माता-पिता बच्चों को बहुत-सा व्यावहारिक ज्ञान दे देते हैं। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि सारा समय हो-हल्ला करके ही अपनी बात रखी जाए या सान्त्वना दी जाए। मौन रहकर समझाई गई बात भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उसकी मारक शक्ति अधिक होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

आजकल लोगों में अपनापन कम होने लगा है। हर रिश्ते से लोग दूरी बनाने लगे हैं। अपनेपन में आने वाली यह दूरी मनुष्य के क्रोध को बढ़ाने का कार्य करने लगी है। भौतिक युग में जहाँ मनुष्य जीवन के बाकी सारे मायने बदलते जा‌ रहे हैं, वहाँ इसके साम्राज्य का भी विस्तार होने लगा है। कोई मनुष्य अपने जीवन की रेस में पिछड़ना नहीं चाहता, वह सदा अग्रणी बने रहना चाहता है। शायद यही कारण है कि उसे अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और फिर उसे अनावश्यक ही बात-बेबात पर क्रोध आने लगता है।
            वैस यह क्रोध मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। राहू ग्रह की तरह उसके विवेक को ग्रसकर ग्रहण लगा देता है। उसे अपने बन्धु-बान्धवों से दूर कर देने में यह अहं भूमिका निभाता है। इस क्रोध का कोई सानी नहीं है क्योंकि यह हमारी सोच से भी अधिक चालबाज या चतुर होता है। इसे अच्छी तरह पता है कि कहाँ अपना जोर आजमाना है और किस के सामने खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना है। किसी भी क्षेत्र में अपने से अधिक बलशाली व्यक्ति के सामने यह मिमियाने लगता है।
            यह क्रोध अक्सर कमजोर पर ही निकलता है क्योंकि केवल उन असहाय दुर्बलों पर ही हमारा वश चलता है। हम अपनी कामवाली बाई, सब्जी वाला, धोबी, माली आदि पर ही अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं अथवा बहस कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी वाला अपने से बड़ी गाड़ी वाले से हाथ जोड़कर माफी माँग लेता है, परन्तु आटो वाले, रिक्शा चालक, साईकिल सवार अथवा पैदल चलने वालों पर ही वह अपना गुस्सा निकालने का यत्न करता हैं। 
            किसी पहलवान या गैंगस्टर के सामने तो सबकी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाती है। कार्यालय में अपने बॉस के सामने पैर पटकने की हिम्मत कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। पता होता है कि यदि वहाँ क्रोध दिखाया तो नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाएगा। तब घर-परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए वहॉं अपमान सहन कर भी वह चुप्पी साध लेता है।‌ सभी लोग अपने अधीनस्थों पर ही क्रोध कर सकते हैं बस। उन पर क्रोध करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
            इस तरह हम देखते हैं कि यह क्रोध कैसे-कैसे गुल खिलाता है। यह मनुष्य के अन्तस् में छुपी हुई कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर देता है। इन्सान को पता भी नहीं चलता और यह क्रोध अपनी चाल चल देता है। उसे अहंकारी होने का मेडल दिला‌ देता है। लोग ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं पड़ना चाहते। उसे दूर से देखकर वे किनारा कर लेते हैं। अपने इस क्रोध रूपी शत्रु के कारण धीरे-धीरे वह अकेला रह जाता है।
            प्रकृति को हम इन्सान अपने स्वार्थ के लिए बहुत अधिक हानि पहुँचाते हैं। नदियों के जल में कचरा और फेक्ट्रियों की गन्दगी डालकर उन्हें दूषित करते हैं। पेड़ों को काटते हैं, वायु प्रदूषित करते हैं। इस कारण वर्षा पर प्रभाव पड़ता है। मौसम चक्र में परिवर्तन होने लगता है। वातावरण को हम गाड़ियों के धुऍं से दूषित करते हैं। जब यह प्रकृति हम लोगों पर क्रोध करती है तो इस धरती पर विनाश हो जाता है। हम सब परेशान हो जाते हैं, उससे उभरने के लिए उपाय सोचते हैं।
           नदियों में बाढ़ आने से लोगों और पशुओं की मृत्यु हो जाती है, बड़े-बड़े भवन तक टूट जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। जब सुनामी जैसी आपदाएँ आती है तो दूर-दूर तक विनाश हो जाता है। भूकम्प आ जाने पर भी जान-माल की बहुत हानि होती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और ओलावृष्टि सभी धरती पर कहर बरसाती हैं। हमारे दोष के कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचने लगता है। ये सभी प्रकृतिक आपदाएँ हमारी मूर्खता का परिणाम हैं। जब-जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं तब-तब ये सब तो झेलना ही पड़ता है। इससे बचना असम्भव हो जाता है।
            अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। जब वह तैश में आती है तो सारे भेदभाव भूलकर महलों और झोंपड़ियों सबको समान रूप से खाक में मिला देती है। शहरों और जंगलों को राख के ढेर में बदल देती है। लोहे जैसी कठोर धातु को भी पिघला देती है। उस समय वह किसी के प्रति सहानुभूति नहीं रखती। सब लोगों को उसका प्रकोप झेलना पड़ता है।
            इसी प्रकार पशुओं को जब क्रोध आता है तो वे भी किसी का लिहाज नहीं करते। पलटकर वार कर देते हैं। चाहे वह साँप हो, कुत्ता हो, हाथी हो अथवा कोई अन्य पशु। हम समझ सकते हैं कि क्रोध चाहे मनुष्य का हो, पशु-पक्षी का हो अथवा प्रकृति का हो सदैव विनाशकारी होता है। इसका दुष्परिणाम किसी एक मनुष्य को नहीं अपितु बहुतों को भुगतना पड़ता है।
      ‌      इस नामुराद क्रोध को शान्त करने की महती आवश्यकता होती है। इसके लिए गहरी सांस लेनी चाहिए। हो सके तो 10 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हट जाना चाहिए।मौन रहना चाहिए, ध्यान लगाना चाहिए और अपनी पसन्द का संगीत सुनना गुस्से को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। इनके अतिरिक्त सकारात्मक सोच और नियमित दिनचर्या से भी क्रोध पर काबू पाया जा सकता है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और सद् ग्रन्थों का वाचन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

मनुष्य को अपने सिर पर बहुत अधिक बोझ नहीं उठाना चाहिए। उसे अपनी पीठ पर मात्र उतना ही बोझ लादकर चलना चाहिए जितना वह आराम से उठा सकता हो। फिर वह बोझ चाहे उसके रिश्तों का हो अथवा किसी सामान का। इसके अतिरिक्त चाहे वह बोझ उसके अभिमान का ही क्यों न हो। देखा जाता है कि अपनी सामर्थ्य से अधिक बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य इस ससार में अक्सर डूब जाता है। 
               बोझ ढोने का अर्थ भारी सामान या वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लादकर ले जाना या उठाना होता है। इसके अतिरिक्त  जिम्मेदारियों, कठिनाइयों या मानसिक तनाव को सहन करने को भी कहते हैं। जीवन में समस्याओं का बोझ उठाना पड़ता है। परिवार या काम का दायित्व सम्भालने को भी हम उसका बोझ कह सकते हैं। मनुष्य को अपनी की गई गलतियों का बोझ दुःख अथवा‌ परिणाम सहने के रूप में  ढोना पड़ता है।
             रिश्तों की अहमियत हम सब लोग जानते हैं परन्तु जब ये रिश्ते मनुष्य के लिए बोझ बन जाएँ तो उनसे दूरी बनाना ही उचित होता है। वैसे तो सभी रिश्ते बहुत ही नाजुक और महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको सदा सहृदयता और सद् भावना से ही निभाना चाहिए। उनमें टकराव की स्थिति कभी उत्पन्न न होने पाए, इससे बचने का यथासम्भव प्रयास मनुष्य को करना चाहिए। 
             यदि उन रिश्तों मे आपसी भाईचारा तथा विश्वास समाप्त हो जाए तो वे भार की तरह हो जाते हैं। एकतरफा रिश्ता लम्बे समय तक हाथ थामकर साथ नहीं चल पाता। ऐसे रिश्ते जो जीवन में नासूर बनकर कष्टदायी बन जाते हैं, उनके लिए अपने मन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। उन्हें छोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है। 
             यात्रा के लिए जब कभी जाना हो तो यत्न यही करना चाहिए कि सीमित सामान ही लेकर जाया जाए। कम सामान होने पर उसे सम्हालना अधिक सुविधाजनक होता है। यदि बहुत सारा आवश्यक अथवा अनावश्यक  सामान लेकर चला जाएगा तो फिर बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सामान की रखवाली करने के कारण मनुष्य के घूमने-फिरने का आनन्द कम हो जाता है।
             मनुष्य पर उसके घमण्ड का बोझ बहुत अधिक होता है। वह अपने अहं में अन्धा होकर अच्छे और बुरे का विवेक खो बैठता है। अहंकार का नशा जब सिर पर चढ़कर नाचने लगता है तब मनुष्य स्वयं को भगवान से कम नहीं समझता। वह इतराता फिरता है। मद में चूर वह आकाश में उड़ता फिरता है। उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उस समय वह दुनिया को आग लगा देने की बातें करने लगता है।
             एक दृष्टान्त पढ़ा था।‌ उसमें बताया गया था कि एक धोबी के पास एक गधा और एक घोड़ा था। धोबी घोड़े से बहुत प्यार करता था और खूब देखभाल करता था। गधे पर वह सारा सामान लादता रहता था। घोड़ा गधे की दुर्दशा पर उसका मजाक बनाता था। उसने गधे को समझाया कि जब उसका काम करने का मन नहीं करता तो वह बहाना बना लेता है। तब मालिक परेशान हो जाता है तब फिर उसकी बहुत देखभाल करता है।
             गधा अपने ऊपर लादे जाने वाले बोझ से बहुत व्यथित रहता था। मालिक भी ऐसा था जो दिन-प्रतिदिन बिना सोचे-समझे उसका भार बढ़ाता रहता था। वह दिन भर बोझ उठाते-उठाते उदास रहने लगा था। वह भी घोड़े की तरह कभी आराम करना चाहता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अपने मालिक को सबक सिखाएगा। शाम को जब धुले हुए सूखे कपड़े लेकर आ रहा था तो रास्ते में नदी पार करते समय उसने नदी में गिरने का नाटक किया। 
            उसके ऊपर लदे हुए वे सारे कपड़े भीग गए और उनका भार बहुत अधिक हो गया। वे भारी कपड़े घर तक ले जाने में उसकी कमर टूटने लगी। उसके मालिक को उस पर जरा-सा भी तरस नहीं आया। उसे ऊपर से अपने मालिक की मार भी खानी पड़ गई।
              अब विचार यह करना है कि यह गधा केवल कोई धोबी का गधा है। नहीं, यह केवल धोबी का गधा नहीं है। हम मनुष्य भी जीवन भर रिश्तों और अपने अहं का बोझ अपने सीने पर ही ढोते रहते हैं और दूर से देखती हुई नियति हम पर हँसती रहती है। 
          मोहमाया के बन्धनों में जकड़े हुए हम मनुष्य चाहकर भी इस बोझ को उतारकर नहीं फैंक पाते। सड़े और नासूर बन रहे इन बन्धनों से मुक्त होने का सार्थक प्रयास करना चाहिए। इसलिए बोझ कैसा भी हो, उसे सिर से उतारकर फैंकने से ही हम सुख की साँस लेकर चैन की बाँसुरी बजा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

डर केवल एक भाव

डर केवल एक भाव

डर क्या होता है यानी कि कुछ भी नहीं होता। यह केवल मन का एक भाव होता है। परन्तु यह व्यक्ति विशेष के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। उसे सुख और आराम से नहीं रहने देता। उसके दिन-रात के चैन को लील जाता है। मनुष्य हर समय बदहवास-सा रहने लगता है। वास्तव में अक्सर मन में डर का कारण गलत धारणाऍं होती हैं। यह डर मनुष्य को कहीं बाहर से नहीं मिलता अपितु उसके अपने अन्तस् में होता है। मनुष्य को अनावश्यक रूप से नहीं डरना चाहिए।
            डर लगने का मुख्य कारण मस्तिष्क में खतरे की पहचान और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो मनुष्य को सम्भावित नुकसान से बचाने के लिए विकसित होती है। यह आघात सीखी हुई प्रतिक्रियाओं, अनिश्चितता अथवा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन और सांस तेज हो जाती है। डर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो सुरक्षा के लिए होती है परन्तु इसकी अति हो जाने पर यह मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकती है।
             इन्सान को अपने डर पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यह डर उसके मन में कुण्डली मारकर पसरा रहता है। इस नाग से छुटकारा पाना इन्सान के लिए अति आवश्यक होता है। मनुष्य अपना सारा जीवन किसी-न-किसी कारण से डर-डरकर व्यतीत करता है। कभी धर्म के नाम पर डरता है तो कभी समाज से डरता रहता है। कभी वह अन्धेरे की घुटन से त्रस्त रहता है तो कभी उजाले से। बचपन में माँ से दूर होने का डर होता है। फिर गृहकार्य न करके स्कूल में जाकर मिलने वाली डाँट का भय रहता है। कभी परीक्षा में अपेक्षानुसार अंक न आने का भय उसे व्याकुल कर देता है।
            बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली असफलताओं का भय उसे जीने नहीं देता। जीवन में आने वाली परीक्षाओं में सफलता पाना उसका ध्येय होता है। इसलिए उसके मन में डर का घर कर जाना स्वाभाविक है कि अगर किसी कारण से चूक गए तो क्या होगा?
             कभी मनुष्य को अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने के लिए परेशानी रहती है। कभी-कभी न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ और कभी इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि उसे भयभीत करते हैं। कभी कार्यालय में की गई किसी गलती के कारण बास या साथियों का डर उसे बेचैन कर देता है। कभी-कभी घर-परिवार के दायित्वों को ठीक से न निभा पाने पर होने वाला विस्फोट उसे भयभीत कर देता है।
            किसी को पानी से, किसी को ऊँचाई से और किसी को आग से डर लगता है। किसी-किसी को तथाकथित भूत-प्रेतों का भय सताता है। और भी न जाने क्या क्या अनजाने डर उसे घेरकर उसके व्यक्तित्व को ग्रसने का कार्य करते हैं। उस समय वह थरथर काँपने लगता है। इस भय की अधिकता होने पर मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन तक खो देता है। किसी को कुछ कीड़ों से डर लगता है।
             विचारणीय है कि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज सबके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व होता है। उनके पालन में जहाँ भी चूक होती है, वहीं एक अनजाना-सा डर उसे सताने लगता है। 'लोग क्या कहेंगे' की यह चिन्ता उसके मन को निरन्तर व्यथित करने लगती है। यदि कभी मनुष्य से गलती हो जाए तो निस्सन्देह उसे डरना चाहिए। किन्तु उसके अलावा उसे कभी भी किसी से भी डरना नहीं चाहिए। 
            मनुष्य को अपनी की गई गलती का मन से प्रायश्चित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि वह गलती दुबारा न दोहराई जाए। मनुष्य अपनी जिन्दगी का मालिक स्वयं होता है। यदि मनुष्य अपनी गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ता है तो उस जैसा कोई और इन्सान नहीं हो सकता।यदि मनुष्य सही तरीके से नियमानुसार कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा हो तो कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह अपने सही रास्ते पर चलता रहे तो उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती, दूसरे उसका सामना करने से घबराते हैं।
            जिस बात से डर लगता है, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। जब मनुष्य डर का सामना करता है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।इस बात पर विचार करना‌ चाहिए कि क्या उसका डर वास्तव में तर्कसंगत है? डर लगने पर गहरी सांस लेनी शारीरिक व्यायाम (योगा) भी डर व घबराहट को कम करने में मददगार हैं। चाहिए, इससे शरीर को शान्त करने में सहायता मिलती है। मेडिटेशन (ध्यान) के जरिए मन को शान्त रखना चाहिए। नियमित मेडिटेशन मन को शान्त करती है और डर को नियन्त्रित करने में बहुत सहायता करता है। स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि नकारात्मक विचार मन में न आ सकें। ईश्वर अथवा किसी मार्गदर्शक में विश्वास रखने‌ से मन मजबूत होता है। शारीरिक व्यायाम यानी योग भी डर और घबराहट को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।
          इनके अतिरिक्त अपने डर पर काबू पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर से सहायता की गुहार लगानी चाहिए। शौर्य सम्पन्न महपुरुषों की जीवन गथाएँ पढ़कर प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे लोगो का साथ करना चाहिए जो सकारात्मक हों और उसे अनजाने डर से बाहर निकलने में सहायता कर सकें। सबसे बढ़कर उसे यह मानकर चलना चाहिए कि डर के आगे जीत है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

मनुष्य यदि सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है तो वह कभी व्यर्थ नहीं होती। वह उस ईश्वर तक पहुँच ही जाती है और वह भी ऐसे व्यक्ति को अपनी शरण में ले लेता है। उसके दुखों को दूर करके उसे कुन्दन बना देता है। ईश्वर को मनुष्य की भौतिक पद प्रतिष्ठा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे तो बस मनुष्य के हृदयगत भावों की आवश्यकता होती है। वह प्रभु मनुष्य के भाव में ही अपना बसेरा बनाना पसन्द करता है। निम्न श्लोक इसी बात पर प्रकाश डाल रहा है -
       न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
    भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥  
अर्थात् न ही लकड़ी या पत्थर की मूर्ति में , न ही मिट्टी में देवता का निवास होता है। देवता का निवास तो भाव यानी हृदय में होता है। अतः भाव ही सर्वोपरि कारण है। यानी हृदय में ही देवता का निवास होता है।
               इस भौतिक संसार में एक बच्चा जब अपनी माता को करुणा से रोते हुए पुकारता है तो उसकी माँ उसे अपने आँचल में छुपा लेती है। उसे हर तरह से सान्त्वना देती है, उसके कष्ट का निवारण करती है। उसी प्रकार वह जगत जननी भी अपने बच्चों करुण पुकार सुनकर द्रवित हो जाती है और फिर झट से उन्हें सहारा देकर कृतार्थ करती है। उस जगज्जननी मॉं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। स्वयं को उसे सच्चे मन से सौंपने पर वह कभी मनुष्य को निराश नहीं करती। बस हम लोग ही उस पर भरोसा नहीं कर पाते।
            यदि मनुष्य की प्रार्थना मात्र आडम्बर हो तो उसका कोई औचित्य नहीं होता। तब वह बस व्यर्थ होकर रह जाती है। उस व्यक्ति को उसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाता। सच्चे मन से ईश्वर की अराधना करने वाले को कभी‌ हताशा का मुॅंह नहीं देखना पड़ता। सुख का समय हो अथवा दुःख का, ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुरक्षा करता है। कभी उसे अकेला नहीं रहने देता। हर कदम पर उसके साथ होता है। हम मनुष्य प्रभु की इस कृपा को समझ नहीं पाते।
             बहुत से लोग इस संसार में ऐसे भी होते हैं जो केवल मात्र दूसरों को दिखाने के लिए ही पूजा-अर्चना करते हैं, उनके मन में कोई भाव नहीं होते। ऐसे लोग जो बरसों बरस प्रदर्शन करते रहते हैं, उनका बस यही उद्देश्य होता है कि  लोग उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानें। बताइए जब स्वयं पर ही उस प्रार्थना का प्रभाव नहीं हो रहा तो उस ईश्वर के पास भी तो वह नहीं पहुँच सकेगी।
           अब यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। ईश्वर को कभी आडम्बर वाली भक्ति नहीं चाहिए। उसे तो श्रद्धा से ओतप्रोत स्तुति चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की उपासना आत्मोन्नति के लिए करता है तो उसके पास अणिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियाँ स्वयं ही आ जाती हैं। उसके उपरान्त मनुष्य को वहीं रुकना नहीं चाहिए अपितु और अधिक प्रयास में जुट जाना चाहिए। यदि वह उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा तो उसकी उन्नति वहीं रुकना जाती है।
             उसका हृदय शुद्ध, पवित्र और निर्मल हो जाता है। उसके मनोविकार स्वत: ही दूर होने लगते हैं। तब मनुष्य एक साधारण मानव न रहकर एक महामानव बन जाता है। उसके मुख से निकला हुआ हर शब्द पत्थर पर पड़ी लकीर की तरह सच होने लगता है। उसका बोला हुआ हर वाक्य सारगर्भित होता है। उसके चेहरे का दिव्य तेज देखते ही बनता है। उसके आभामण्डल या औरा से निकलने वाली सात्विक किरणें किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं।
             इनके पास आने वालों को इनकी सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित करती है। इनकी वाणी में एक ओज होता है जिससे कुमार्गगामी लोग भी भयभीत होते हैं। इन लोगों का तेज ही इतना अधिक होता है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक इनसे घबराते हैं। शरीरिक बल न होने पर भी मानसिक और आत्मिक बल के कारण ये किसी का भी सामना कर सकते हैं। कैसा भी कार्य क्यों न हो, कर गुजरते हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इन महापुरुषों के विषय में बहुत कुछ पढ़ने और जानने के लिए मिल जाएगा।
             हम देखते हैं कि बादल इस पृथ्वी से जल लेते हैं और उसे वापिस इस धरा को लौटा देते हैं। आकाश से बादलों के द्वारा गिरा हुआ जल किसी-न-किसी रास्ते से होकर अपने लक्ष्य समुद्र तक पहुँच ही जाता है। उसी प्रकार नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की गई प्रार्थना भी किसी-न-किसी प्रकार से उस प्रभु तक पहुँच ही जाती है। कहते हैं ईश्वर को चाहे छप्पन व्यंजनों का भी भोग लगा लो तो वे सब व्यर्थ हो जाते हैं, यदि ईश्वर को पाने की मन में ललक न हो। 
           ईश्वर ने दुनिया की सब नेमते हमें दी हैं। हमारी क्या सामर्थ्य कि हम उसे कुछ भेंट में दे सकें? हम लोग तो बस उसे रिश्वत देकर रिझाने का यत्न करते हैं। यह तो मनुष्य की भावना नहीं कहलाती। इसे हम सौदा करना ही कह सकते हैं। संक्षेप में ईश्वर मनुष्य के मन के भाव में रहता है, ये भाव ही उस तक पहुँचने का कारण हैं, माध्यम हैं। इसलिए अपने मन में उसे पाने की उत्कट भावना रखते हुए उसका स्मरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

अपने अन्त:करण में विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लालच, अहंकार आदि के कूड़े को मनुष्य सम्हालकर रखता रहता है। कुछ समय पश्चात कचरा बने हुए ये सभी दूषित भाव धीरे-धीरे सड़कर बदबू देने लगते हैं। पिष्टपेषण किए गए वे विचार मनुष्य के मन-मस्तिष्क को और अधिक प्रभावित करने लगते हैं। उस समय अपने अहं के कारण जब मनुष्य विश्लेषण करने लगता है तो उसका अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर से विश्वास उठने लगता है।
           उन कुविचारों पर बार-बार मन्थन करने पर उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में सभी उससे जलते हैं, कोई भी उसे तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता। सभी लोग उसका फायदा उठाना चाहते हैं पर उससे उन्हें कोई लगाव नहीं है। सब लोग उसके साथ स्वार्थवश जुड़े हुए हैं। वह इससे परे कुछ सोचना ही नहीं चाहता। उसकी प्रवृत्ति जब नकारात्मक होने‌ लगती है तब उसकी सोच का दायरा संकुचित होने लगता है। उस समय वह कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता।
              सदा ही इस प्रकार सोच-विचार करते रहने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे समय बीतते नकारात्मक दृष्टिकोण वाले बन जाते हैं। उन्हें हर मनुष्य में खोट ही नजर आने लगता है चाहे वह उनका प्रिय ही क्यों न हो। वे हर व्यक्ति को वे सन्देहभरी नजरों से देखते हैं। वे इस बात का दावा करते हैं कि लोग उन्हें समझते ही नहीं है। उन लोगों की बुद्धि ही ऐसी है जो उन्हें उनकी अच्छाई दिखाई नहीं देती। अपने अन्तस में झॉंककर देखने के स्थान पर वे सबमें खोट निकालने का कार्य करते हैं।
             उन्हें हर समय यही लगता है कि एक वे ही हैं जो दुनिया बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं और उनके आसपास रहने वाले बाकी सभी लोग मूर्ख हैं। उनकी सोच संकुचित है। वे हर अच्छी चर्चा को अपने नकारात्मक विचारों से बर्बाद करके सबकी आलोचना का शिकार बन जाते हैं। निराश होकर बाद में वे यही शिकायत करते हैं कि उनकी बात को कोई सुनकर लाभ ही नहीं उठाना चाहता और एक दिन वे सब अपनी इस गलती के लिए पश्चाताप करेंगे। तब उन्हें समझ आएगा।
              मोह-माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मनुष्य इनसे अपना पल्लू नहीं झाड़ पाता। न चाहते हुए भी अज्ञानतावश बार-बार इनके जाल में फँस जाता है। इसलिए वह केवल अपनों के लिए सब सुख-सुविधाएँ जुटाता है और दूसरे सभी लोगों को अनदेखा करने लगता है। जैसे अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे, उसी प्रकार अपनों के मोह में फंसे मनुष्य भी बारबार जाने-अनजाने सब गलत-सही काम करने से परहेज नहीं करते। बाद में परेशान होते हैं और पश्चाताप करते हैं।
              इसी प्रकार क्रोध करते हुए ऐसे लोग अपना विवेक दाँव पर लगा देते हैं। वे किसी ऐसे मनुष्य से दोस्ती नहीं करना चाहते जो अनावश्यक ही क्रोध करके अपने सामने वाले का अपमान करे अथवा दूसरों से अलग होता जाए।
             जिस प्रकार अपने घर के अन्दर जमा हुए कूड़े-कचरे को फैंकने के लिए उसका विज्ञापन अखबार आदि में नहीं किया जाता बल्कि चुपचाप प्रसन्नतापूर्वक बाहर जाकर कूड़दान में फैंक दिया जाता है। उसी प्रकार अपने अन्तस् में विद्यमान कुत्सित भावरूपी कचरे को निकालकर फैंकने के लिए भी ढिंढोरा नहीं पीटा जाता या विज्ञापित नहीं किया जाता। इन विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। न ही इन्हें अपने जीवन को नरक के तुल्य कष्टदायी बनाने देना चाहिए। इन्हें नियन्त्रित करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
            ईश्वर की शरण में जाने से और अपने सद् ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करने से मन में बसे हुए इन कुत्सित नकारात्मक विचारों को वश में किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपनी संगति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यथासम्भव सज्जनों की संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए। नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने के लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। यदि विचार बहुत अधिक परेशान कर रहे हों तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। स्वयं को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास तो करना ही पड़ेगा। 
          नकारात्मक विचारों को मन से निकालना मानसिक शान्ति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए नकारात्मक विचारों को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। उन्हें साक्षी भाव से देखना चाहिए और फिर धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को ध्यान तथा स्व-देखभाल‌ से बदलना चाहिए। खुद की आलोचना करने से बचना चाहिए। यदि विचार बार-बार आऍं तो धैर्य रखना चाहिए। धीरे-धीरे सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ना चाहिए। मन को खाली न छोड़ें। अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक संगीत सुनें या आभारी रहने की आदत डालनी चाहिए।
           अपने मन को साधने के लिए प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। रात को सोते समय कुछ वक्त निकालकर एक बार सारे दिन के कार्य व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। इससे अपनी अच्छाई-बुराई का भान हो जाता है। उससे सबक लेकर अच्छे कृत्यों को बढ़ाते जाना चाहिए और अपनी कमियों को यथासम्भव दूर करते रहना चाहिए। वास्तव में थोड़ा-सा प्रयत्न करने से व्यक्ति स्वयं ही समझदार मनुष्य बनकर सबका प्रिय हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

संविधान में महिलाऍं बराबर

संविधान में महिलाऍं बराबर

महिलाओं को मन्दिर में जाना चाहिए अथवा नहीं यह एक ज्वलन्त मुद्दा है। इस विषय पर कुछ वर्षों पूर्व ऐसी बहस प्राय: हर न्यूज चैनल पर आयोजित की जा गई थी। शेष अन्य विवादों की तरह इस समस्या का भी कोई समाधान नहीं निकला था। सभी विद्वान अपने-अपने विचार रख रहे थे, तीखी टीका-टिप्पणियाँ कर रहे थे परन्तु परिणाम वही रहा था यानी ढाक के तीन पात।
           7 मार्च 2016 को न्यूज24 पर शाम 7 बजे तीखी बहस में हो रही थी, उसी को देखते-सुनते हुए यह आलेख लिखने का मन बनाया था।
          आज यह ज्वलन्त प्रश्न एक मुद्दा बनता जा रहा है कि यदि पूजा करने के लिए महिलाओं को मन्दिर में जाने की अनुमति नहीं है तो पुरुषों को भी नहीं होनी चाहिए। इसका कारण है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यह कहना बिल्कुल गलत है कि पुरुष स्त्री से अधिक श्रेष्ठ है। हाँ, शारीरिक रूप से वह अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर आज ज्ञान, विज्ञान, उद्योग, राजनीति आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ महिलाएँ पुरुषों से कमतर सिद्ध हो रही हैं। 
            पुरुष को अपने जीवन में हर कदम पर स्त्री के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। जन्म लेने के लिए एक माता की जरूरत होती है और फिर एक बहन चाहिए होती है। बाद में पत्नि की आवश्यकता होती है जिसके काल कवलित हो जाने पर वह अपना घर अकेले नहीं चला सकता और अपने बच्चों को भी अकेले नहीं पाल-पोसकर बड़ा नहीं कर सकता। जबकि पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को इन सब समस्याओं से दो-चार नहीं होना पड़ता। वह पुरुष के सहारे के बिना भी सभी दायित्वों को सरलता से निभा लेती है। 
             यदि हम बात करें वेदों की तो उनमें ऐसा कोई विधान किसी के लिए भी नहीं है कि वे मन्दिरों में नहीं जा सकते। वहाँ पर तो पूजा करने के लिए मन्दिरों की कल्पना ही नहीं की गई थी। वैसे वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों से कम अधिकार नहीं दिए गए थे। वे हर क्षेत्र में अपनी पैठ रखती थीं। यह तो कुछ तथाकथित विद्वानों के पूर्वाग्रह युक्त दिमाग‌ की उपज है जिन्होंने नारी को पुरुषों से कमतर समझा। इस प्रकार धर्म और समाज को दोषमुक्त बनाने का अपराध किया।
              हमारे मनीषी समझाते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए किसी मन्दिर यानी धर्म स्थानों या तीर्थों में जाने, जंगलों में खोजने, तथाकथित गुरुओं अथवा तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के पास जाकर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे पाना बहुत ही सरल होता है। वह तो मनुष्य के मन में ही रहता है और वहीं पर ही मिलता है। वह केवल मनुष्य के मन के भाव में रहता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि स्त्री घर में बैठकर ईश्वर की उपासना करे तो फिर यही नियम पुरुषों पर क्यों लागू नहीं होता? वह घर बैठकर साधना क्यों नहीं कर सकता?
              किसी-किसी क्षेत्र में आज महिलाएँ पुरुषों से भी आगे निकल गई हैं। उनके अधीनस्थ पुरुष कर्मचारी इस बात को पचा नहीं पाते कि उन्हें किसी महिला अधिकारी के अधीन कार्य करना पड़ रहा है। इक्कसवीं सदी में आज के युग में भी पुरुषों की मानसिकता यही है कि स्त्री उनके अँगूठे के नीचे दबकर रहे। उसे सिर उठाकर चलने का अधिकार वे नहीं देना चाहते। स्वयं  वे चाहे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएँ परन्तु यदि बहन या पत्नि किसी साथी पुरुष से बात भी कर ले तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, उसे खरी-खोटी सुनाई जाती है। 
             यदि वह पुरुष प्रधान समाज में अपना एक स्थान विशेष बनाने के लिए संघर्ष करना चाहती है तो उसके पैरों में बेड़ियाँ डालने का प्रयास किया जाता है। उसे कभी तो घर-परिवार का वास्ता दिया जाता है और फिर कभी परम्पराओं के नाम की दुहाई देकर उसके बढ़ते हुए कदमों को पलटने के लिए विवश किया जाता है। पुरुष अपने झूठे अहं के कारण अपना वर्चस्व त्यागकर स्त्री को कभी भी महत्त्वपूर्ण बनने नहीं देना चाहते।
             मन्दिर प्रवेश तो मात्र एक बहाना है।  इस बहाने पुरुष कुत्सित राजनैतिक चालें चल रहे हैं। टी वी पर होने वाली चर्चाओं में उन पर कटाक्ष भी किए जाते हैं। पुरुष आज अपनी पत्नी को धन कमाने का माध्यम तो बनाना चाहता है पर उसकी वैचारिक स्वतन्त्रता में बाधक बनता है। स्त्री यदि आगे बढ़ती है तो उस पर लाँछन लगाने से भी बाज नहीं आता। वह नहीं चाहता कि स्त्री उससे आगे बढ़ जाए। बहुत से पुरुष आज भी अपनी पत्नी की उन्नति में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आते।
             हमारा भारतीय संविधान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है। अपने इन अधिकारों को महिलाओं को निस्सन्देह आगे बढ़कर को प्राप्त करना चाहिए पर वहीं उन्हें अपने दायित्वों से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। नारी मुक्ति के नाम पर की जाने वाली उच्छ्रँखता असहनीय है। इससे बचने का हर सम्भव प्रयास हर महिला को करना चाहिए। इसके नाम पर परिवार को छोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कही जा सकती।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक वह व्यक्ति होता है तो किसी दूसरे का कल्याण, सुख अथवा सफलता की कामना करता है। यह वह व्यक्ति है जो सबके हित या भलाई के विषय में सोचता है। हितचिन्तक को अंग्रेजी भाषा में Well W isher कहते हैं। वे सदा ही निस्वार्थ रहकर देश, धर्म और समाज की भलाई के विषय में सोचते हैं। इस नेक काम के लिए अपने घर-परिवार तक की परवाह न करते हुए वे अपने तन, मन और धन सबका उपयोग करते हैं। सबसे बढ़कर अपना अमूल्य समय भी जनहित में खर्च करते हैं। 
              जहाँ लोग अपने शारीरिक आराम को अधिक महत्त्व देते हैं और वे अपने शरीर को सजाने-संवारने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते। वे इसके सुखों में खोए रहते हैं। वहीं पर ये महानुभाव अपने सुख और आराम को तिलांजलि देकर दिन-रात जनहित के कार्य करते रहते हैं। इन लोगों का मानना है कि यह मानव शरीर ईश्वर ने अपने बनाए जीवों का ध्यान रखने के लिए दिया है। वे अपने नैतिक दायित्व को पूर्ण कर रहे हैं, किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे।
            ये परोपकारी जीव अपने मन से भी सबका हित चाहते हैं। किसी का अहित करने के विषय में कभी सोच नहीं सकते। हर समय नित-नए ऐसे उपाय  सोचते रहते हैं जिनसे जन मानस की भलाई के कार्य किए जा सकें। दीन-दुखियों के जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य करने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं। इसीलिए इनका मन बहुत ही खूबसूरत होता है, जिसमें किसी के प्रति घृणा, ईर्ष्या आदि का कोई स्थान नहीं होता। प्राणिमात्र की भलाई में जुटे रहना उनका एकमात्र लक्ष्य होता है।
            अपने अथक परिश्रम से अर्जित धन को परमार्थ के लिए खर्च करने से भी ये लोग नहीं हिचकिचाते। हम सभी जानते हैं कि धन के बिना मनुष्य इस संसार में एक कदम भी नहीं चल सकता। कहीं आने-जाने में भी धन का व्यय होता है और किसी की सहायता के लिए भी उसे दिया जाता है। ये निस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहते हैं। वे अपने धन का मोह पालते हुए कभी स्वार्थी नहीं बनते। बादलों की तरह जो भी इस समाज से लेते हैं उसे इसी धरती पर लोगों में बाँट देने में विश्वास रखते हैं। 
              हो सकता है कुछ स्वार्थी व मूर्ख लोग इसे धन का अपव्यय समझें पर वास्तव में ये महान लोग अपने धन का सदुपयोग करते हैं जिसे वे अज्ञ समझ नहीं सकते। तन, मन और धन से भी बढ़कर मूल्यवान समय होता है। जो इसका सदुपयोग करते हैं, सफल कहलाते हैं और इस समय को अपनी लापरवाही से व्यर्थ गंवाने वाले अपने जीवन में असफल रहते हैं। उचित समय पर ही मनुष्य को उसके कृत कर्मों का फल अथवा कुफल भी मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं। ऐसे मूल्यवान समय को भी ये सज्जन दूसरों पर खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं। 
          हितचिन्तक नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई, सेवा या कल्याण के लिए अपना समय, धन अथवा प्रतिभा समर्पित करते हैं। वे दूसरों के दुखों को दूर करने और बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या प्रतिफल के समाज को बेहतर बनाने की भावना से कार्य करते हैं। इसे 'देव वृत्ति' भी कहा जा सकता है, जो करुणा और उदारता से प्रेरित होती है। नदियॉं अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, वे अपना सब कुछ दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं। उसी प्रकार ये महान लोग भी बिना शिकन लाए अपना सर्वस्व देश, समाज और धर्म के लिए अर्पित कर देते हैं।
          वे समय का मूल्य समझते हैं और जानते हैं कि समय पर यदि किसी की सहायता न की जाए तो उसकी उपयोगिता नहीं रह जाती। यदि हल जुते तैयार खेत में वर्षा अपने ठीक समय पर न हो तो उस खेत की मिट्टी सूख जाती है। फिर उसके बाद कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न हो जाए पर उस सूखे खेत में फसल नहीं हो पाती बल्कि उस खेत के लिए वह व्यर्थ हो जाती है।
            ऐसे व्यक्तियों को हमेशा अधिक महत्त्व और मान-सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे दूसरों के लिए अपने जीवन के वो पल खर्च कर रहे होते हैं जो उन्हें कभी वापिस नहीं मिल सकते। कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता चाहे कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए। परोपकार करने वाले जन इस समय का वास्तव में निस्वार्थ रूप से सदुपयोग करते हैं।  इसीलिए इनका यश बिना किसी प्रयास के स्वयं ही चारों दिशाओं में फैल जाता है। इनकी कीर्ति इनके कहीं भी जाने से पहले पहुँच जाती है।
              सार रूप हम कह सकते हैं कि अपना स्वार्थ त्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए जीना ही वास्तव में हितचिन्तक होना कहलाता है। अपनी इच्छा से, अपने मानसिक सन्तोष के लिए अपने तन, मन, धन और समय का सत्कार्यों में उपयोग करने से मनुष्य के पुण्य कर्मों में स्वत: ही बढ़ोत्तरी होती जाती है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं। ऐसे यही महापुरुष विश्व वन्दनीय होते हैं और ईश्वर के प्रिय बन जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 अप्रैल 2026

दान धर्म का पालन करना

दान धर्म का पालन करना

दान करना मनुष्य का धर्म है जो उसे आत्मसन्तोष देता है। किसी जरूरतमन्द की समय पर सहायता करना भी दान कहलाता है। वह मनुष्य कदापि नहीं हो सकता जिसके मन में दया, ममता, करुणा आदि मानवोचित गुण विद्यमान न हों। हमारे महान ग्रन्थ और मनीषी दान देने को महत्त्व देते हैं। मनुष्य में जितनी भी सामर्थ्य हो उसके अनुसार ही उसे अन्न, वस्त्रादि का दान देना चाहिए। दान मनुष्य को इस प्रकार करना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिए। 
            दान धर्म का अर्थ होता है अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी स्वार्थ या प्रतिफल की अपेक्षा के किसी जरूरतमन्द को स्वेच्छा से धन, भोजन, वस्त्र, ज्ञान या अन्य वस्तुऍं निस्वार्थ भाव से समर्पित की जाऍं। यह हिन्दू धर्म में एक कर्तव्य, आत्म-शुद्धि का साधन और करुणा का सर्वोच्च गुण माना गया है जो इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण लाता है। हमारे शास्त्र कहते हैं -
         दाऍं हाथ से दान दो पर बाऍं हाथ को
          पता नहीं चलना चाहिए। 
अर्थात् ऐसा भी कह सकते हैं कि दान और पुण्य जैसे कार्य एकान्त में होने चाहिए। दान ढिंढोरा पीटकर नहीं करना चाहिए अपितु गुप्त रूप से करने चाहिए। तभी वह दान फलीभूत होता है।
         पद्म पुराण का इस विषय में यह कथन है - 
       सच्चे मन से किया गया दान 
       मनुष्य को सुख और शान्ति प्रदान करता है। 
          सामाजिक प्रणी मनुष्य समाज से बहुत कुछ लेता है। इसलिए उसका कर्त्तव्य बनता है कि उस समाज की भलाई के लिए अपनी नेक कमाई का कुछ अंश दान में देना चाहिए। कबीरदास जी  दान देने के लिए कहते हैं-
        चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
        दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर॥
अर्थात् कबीरदास का कहना है कि नदी की विशाल जलराशि से चिड़िया अपनी चोंच में जरा-सा जल ले लेती है तो नदी का पानी कम नहीं होता। उसी प्रकार दान देने से धन में कोई कमी नहीं आती बल्कि उसमें बढ़ोत्तरी होती है।
            दान के विभिन्न रूप हैं। जरूरतमन्दों की सहायता करने से दुखों का निवारण और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। किसी को भयमुक्त या सुरक्षित महसूस कराना अभयदान कहलाता है। अस्पताल में मरीज के लिए खून या दवाओं का प्रबन्ध करना यानी दवाई या चिकित्सा सहायता प्रदान करना औषधि दान कहा जाता है। भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे बड़ा दान माना जाता है। भोजन या अनाज का दान करने को अन्नदान कहते हैं। शिक्षा का दान सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना या उसे शिक्षित करके उसके जीवन को सुधारना होता है। सर्दियों में बेघर लोगों को कम्बल या कपड़े बॉंटने को वस्त्रदान कहते हैं।
             दान का अप्रत्यक्ष यह लाभ होता है कि मनुष्य का यश चारों दिशाओं में फैलता है। दानवीर कर्ण, राजा हरिश्चन्द्र आदि को आज तक उनके दान के कार्यों के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त पुण्य कार्यों में यह दानकार्य भी जुड़ जाता है जिससे हमारे इहलोक के साथ-साथ परलोक भी सुधरता है। मनुष्य को ऐसी मानसिक शान्ति भी मिलती है जो अमूल्य है। इसी शान्ति की खोज में वह तीर्थों, जंगलों तथा तथाकथित गुरुओं के पास जाकर भटकता है।
            इस विषय में एक उदाहरण दिया जाता है कि स्नान बन्द बाथरूम में किया जाता है, सड़क या चौराहे पर नहीं। दान और पुण्य छिपाने से बढ़ते है और बताने से नष्ट हो जाते है अर्थात् उसका महत्त्व नहीं रह जाता। 
            यह इन्सानी कमजोरी है कि वह राई जितना छोटा-सा उपकार का काम करके उसे पहाड़ जितना बड़ा करके बताता है। यद्यपि शुभकार्य करके उसका ढिंढोरा पीटा जाए तो लोग ऐसे व्यक्ति को घमण्डी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति से सहायता लेने में भी उन्हें संकोच होने लगता है। दान देकर हर स्थान पर अपने नाम के पत्थर लगवाने का अर्थ यही है कि वर्षों तक लोग याद रखें कि फलाँ व्यक्ति ने दान दिया था। बताइए दान आत्मतोष के लिए दिया जाता है। फिर इस प्रकार से उसका आत्मप्रचार किसलिए करना?
            ईश्वर में हम चौबीसों घण्टे अपने लिए कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं और वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार भरपूर देता है। हमें देकर न जतलाता है और न पछताता है। उसका गुणगान अथवा धन्यवाद करने में हम सदा कंजूसी बरतते हैं, पर आशा यही करते हैं कि हमने जिसकी सहायता की है वह हमारे समक्ष हमेशा नतमस्तक रहे।         
          विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञान का दीपक जलाने से आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञानवान होकर, मार्गदर्शक बनकर अपने देश, धर्म व समाज का हित करने में सक्षम बनती हैं। 
          दूसरो की होड़ में दान देने के नाम पर सब कुछ नहीं लुटा देना चाहिए। अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करने और उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करने तथा अतिथियों के आदर-सत्कार से जो धन शेष बचे उसका कुछ अंश दान करके सामाजिक यज्ञ में सबको आहुति देनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

मृत्यु का विधान

मृत्यु का विधान 

मृत्यु एक अटल सत्य है। यह विधि का एक कठोर विधान है। इसमें किसी भी जीव को छूट नहीं मिल सकती। इस चराचर जगत में जिस भी जीव का जन्म होता है, चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो अथवा पेड़-पौधे हों, उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। हर जीव अपने कृत कर्मों के अनुसार निश्चित समय के लिए इस संसार में आता है। मनुष्य स्वयं चाहे अथवा न चाहे परन्तु समयावधि पूर्ण होने के पश्चात उसे इस दुनिया से विदा लेनी ही पड़ती है। इसमें उसकी राय नहीं पूछी जाती और न ही उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती।
             उसके इहलोक के प्रस्थान के समय उसके निकटस्थ सम्बन्धी, परिवारी जन, बन्धु-बान्धव रोते-बिलखते रह जाते हैं और वह दूसरे लोक की यात्रा के लिए निपट अकेले ही प्रस्थान कर जाता है। अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति को साथ लेकर जाने की अनुमति उसे ईश्वर की ओर से नहीं मिलती। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही यहॉं से विदा लेकर चला जाता है। वह अपनी सारी धन-दौलत और अपने महल-चौबारे इसी धरती पर छोड़कर खाली हाथ मुट्ठी बॉंधे चला जाता है।
          प्राण जब इस शरीर का त्याग कर देते हैं तब जीव की आँखें सदा के लिए मुँद जाती हैं। उस समय सभी भौतिक रिश्ते-नाते इसी संसार में छूट जाते हैं। कोई भी सम्बन्धी उसका अपना नहीं रह जाता और न ही वह भी किसी का नहीं रहता है। जिन परिवारी जनों के लिए वह अपना सारा जीवन स्याह-सफेद कार्य करता रहता है, वे सभी भाई-बन्धु केवल जीते जी की माया होते हैं और सिर्फ श्मशान तक ही वे उसका साथ निभाते हैं। उसके पश्चात की यात्रा जीव को स्वयं अकेले ही तय करनी होती है। वहॉं उसका कोई साथी नहीं होता।
           मनुष्य का जब जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता। जब वह इस संसार को छोड़कर जाता है तब उसके पास नाम तो होता है पर शरीर दंगा दे जाता है। अब हमें यहाँ यह भी विचार करना है कि क्या सिर्फ साँसे बन्द होने से ही कोई मुर्दा हो जाता है? जिसे अपने प्रियजन भी कुछ समय के लिए अपने घर रखने के लिए तैयार नहीं होते। बस शीघ्र ही उसे घर से निकाल देने के लिए उत्सुक रहते हैं। यही रह जाती है बस मनुष्य के जीवन की कहानी। 
            यह चिरन्तन सत्य है कि श्वासों की डोर थमने या टूट जाने से जीव मृत हो जाता है। उसे हम आम बोलचाल में शव या मुर्दा कहते हैं। फिर उस शव को उसी के ही परिवारी जन और बन्धु-बान्धव जुलूस बनाकर, श्मशान में ले जाकर अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं। उसके जल जाने की थोड़ी-सी प्रतीक्षा किए बिना ही अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। यदि अधिक समय तक उसे रखा जाए तो उस मृत शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है जो बिमारी का कारण बन जाती है।
            यह भी सत्य है कि जब मनुष्य से उसकी इन्सानियत निकल जाती है या फिर उसकी आँखों का पानी मर जाता है, उस समय भी वह मृतप्राय होता है। मनुष्य के लिए यही आवश्यक है कि सबसे पहले वह एक अच्छा इन्सान बने। एक मनुष्य में सबसे पहले मानवोचित गुणों का होना जरूरी है। उन गुणों के बिना इस मनुष्य को राक्षस या हैवान कहते हैं। ये दुष्ट प्रकृति के लोग मनुष्यता के नाम पर कलंक होते हैं, जो इन्सानियत की कब्र खोदते हैं। इन्हें न तो घर-परिवार में स्थान मिलता है और न ही देश-समाज में। नैतिक, धार्मिक और सामाजिक नियमों के विरुद्ध चलने वाले ये लोग देश, धर्म और समाज के शत्रु कहलाते हैं। 
              इसलिए ये लोग न्याय व्यवस्था के साथ आँखमिचौली खेलते हुए, अन्तत: कानून की बेड़ियों में जकड़कर सलाखों के पीछे जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाते है। किसी भी व्यक्ति के जीवित रहते हुए उसे मिलने वाली यह एक ऐसी मृत्यु होती है जो स्वयं उसके लिए और उसके अपनों के लिए बहुत कष्टकारी होती है। वह व्यक्ति तो दुष्कर्म कर लेता है परन्तु उसके बन्धु-बान्धवों को भी दारुण कष्ट भोगना पड़ता है और समाज में अपमानित होना पड़ता है।
            वैसे तो जरा-सा कष्ट आने पर हम सब लोग मृत्यु को पुकारने लगते हैं पर वह क्षणिक रोष होता है। कभी-कभी लम्बी या असाध्य बीमारी की अवस्था में भी मनुष्य जीवन से हारकर मृत्यु का दामन थामना चाहता है परन्तु यह उसके वश में नहीं होता। ईश्वरीय इच्छा के समक्ष मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है। जब वह पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोग लेता है तभी उसे अपने जीवन से छुटकारा मिलता है, उसकी कामना करने के कारण पहले नहीं।
            ईश्वर के प्राकृतिक न्याय के अनुसार मृत्यु होना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है परन्तु अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने वाली यह मृत्यु मनुष्य की स्वयं की बुलाई हुई होती है। मनुष्य को अपनी मृत्यु को इस प्रकार अनावश्यक रूप से कष्टदायक नहीं बनाना चाहिए। उसे सही रास्ते का चुनाव करके उस मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सुखद बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद