रविवार, 9 अगस्त 2026

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता

भाग्य से अधिक या कम नहीं मिलता 

 मनुष्य के भाग्य में जो भी लिखा होता है वही उसे मिलता है। न उससे अधिक और न ही उससे कम। यह भाग्य हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार बनता है। यदि पूर्व जन्मों में हमारे शुभकर्मों की अधिकता होती है तो इस जन्म में सुख-सुविधा के सभी साधन उपलब्ध होते हैं। इसके विपरीत दुष्कर्मों की यदि अधिकता होती है तब इस जन्म में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक बेहद लोकप्रिय और गहरी सोच है -
        समय से पहले और भाग्य से ज्यादा 
        किसी को कुछ नहीं मिलता
यद्यपि इसका सही अर्थ यह है कि हमें अपने कर्म करते रहना चाहिए। भाग्य और कर्म दोनों ही जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। या एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
          भाग्य मनुष्य को जीवन की परिस्थितियाँ और अवसर प्रदान करता है, लेकिन उन परिस्थितियों में वह कैसी प्रतिक्रिया देता है और क्या निर्णय लेता है, यह पूरी तरह से उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। मनुष्य की कामना या इच्छा ही उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। बिना इच्छा के कोई भी सार्थक प्रयास सम्भव नहीं हो सकता।
          भाग्य के भरोसे बैठने से सब कुछ मिल जाएगा, ऐसा नहीं होता। बिना पुरुषार्थ या मेहनत‌ के भाग्य का फल भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि सब कुछ भाग्य में ही लिखा है तो भी कर्म करना आवश्यक है क्योंकि भाग्य केवल पिछले कर्मों का परिणाम (बैंक बैलेंस) होता है।‌ मनुष्य की वर्तमान इच्छाऍं और पुरुषार्थ या परिश्रम ही मनुष्य 
के नए भाग्य का निर्माण करते हैं।‌ यदि वह आज कर्म नहीं करेगा तो भविष्य में उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा। 
          हमें समझाते हुए सयाने यह कहते हैं - 
         पहले बना प्रारब्ध पाछे बना शरीर
अर्थात् इस कथन का सीधा-सा अर्थ यही है कि मनुष्य का भाग्य उसके जन्म लेने से पूर्व ही निर्धारित हो जाता है। इसीलिए वर्तमान जीवन में मनुष्य को उसी के अनुसार समय-समय पर शुभाशुभ फल प्राप्त होता है।
        इसी विषय को उदाहरण सहित भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाया है -
  पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम्?
 नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्    धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? 
  यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क क्षमः।अर्थात् करीर के वृक्ष में यदि पत्ते नहीं लगते तो इसमें वसन्त ऋतु का क्या दोष है? उल्लू यदि दिन में नहीं देख पाता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? चातक पक्षी के मुँह में यदि वर्षा की धारा नहीं पड़ती तो इसमें बादल का क्या दोष? विधाता ने जिसके ललाट पर जो पहले लिख दिया है, उसे मिटाने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात उसे ब्रह्मण्ड की कोई ताकत भी नहीं मिटा सकती।
           करीर के वृक्ष पर पत्ते न लगने का कारण वसन्त ऋतु नहीं है। पतझड़ में पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं और वसन्त में तो सभी वृक्ष हरे-भरे दिखाई देते हैं। उन पर खिले रंग-बिरंगे फूल प्रकृति के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं।  चारों ओर हरियाली का साम्राज्य होता है जो बहुत ही मनमोहक होती है।
          कर्म के माध्यम से भाग्य को बदलने की शक्ति और उदाहरणों के बारे में भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले 'श्रीमद्भगवद्गीता' के कर्म सिद्धान्त पर प्रकाश डाला गया है। वहॉं स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है। जैसा वह आज बोएगा, उसी का फल कल भाग्य बनकर उसके सामने आएगा।
        विश्व के सभी जीव-जन्तु सूर्य की रौशनी में दिन में देखते हैं। रात में उन्हें देखने में कठिनाई होती है। परन्तु उल्लू एक ऐसा पक्षी है जो दिन के उजाले में नहीं देख पाता बल्कि रात के अँधेरे में उसे दिखाई देता है। वह दिन में नहीं देख पाता तो हम इसके लिए सूर्य को दोष नहीं दे सकते।
          वर्षा की पहली बूँद चातक पक्षी के मुँह में यदि पड़ती है तो वह अपनी प्यास बुझाता है। यदि वर्षा की पहली बूँद उसके मुँह में न पड़े तो वह प्यास रह जाता है और फिर वर्षा की पहली बूँद के लिए वह पूरा वर्ष प्रतीक्षा करता है। सभी जीवों की प्यास बुझाने वाली वर्षा का इसमें कोई दोष नहीं होता।
          करीर वृक्ष, उल्लू और चातक पक्षी के इन सभी उदाहरणों से यही सिद्ध होता है कि विधाता ने जिसके ललाट पर या मस्तक पर उसके जन्म दे पहले ही जो लिख दिया, उसे इस संसार की कोई भी शक्ति नहीं मिटा सकती। न ही उसे बदलने की सामर्थ्य किसी में है।
          मनीषियों का यह भी कथन है कि अपने जीवन में मनुष्य जिस भी अंग का अधिक दुरुपयोग करता है, आगामी जीवन में ईश्वर उसे उस अंग से वंचित कर देता है। वर्तमान जीवन में वह एक अपाहिज का जीवन व्यतीत करता है और कष्ट पता है। वह सबकी सहानुभूति का पात्र बन जाता है। हम अपने आसपास ऐसे अनेक लोगों से मिलते रहते हैं।
          आगामी जन्म में अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए बिना समय व्यर्थ गॅंवाए सत्कर्मो की पूँजी को बढ़ाने के लिए हम सब प्रवृत्त हो जाएँ। इस प्रकार करने से सिर धुनकर रोने और पश्चाताप करने से हम बच सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना करने का अर्थ है, उसको नित्य प्रति स्मरण करना। मनुष्य किसी भी रूप में चाहे प्रभु की भक्ति कर सकता है। यानी चाहे उसकी साधना साकार रूप में की जाए अथवा निराकार रूप में की जाए। उसे किसी भी नाम से याद किया जा सकता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। किसी को उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इस संसार में भेजने वाले उस मालिक का नाम उसे प्रतिदिन भजना चाहिए।
           समस्या यह है कि इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उस ईश्वर की उपासना करने में मनुष्य का मन रमता ही नहीं है। यह एक मनुष्य की बात नहीं है परन्तु प्रायः सभी लोगों की यही समस्या है। इन्सान केवल ऐशो-आराम में मस्त रहना चाहता है। उसे लगता है कि वह यहॉं पर मौज-मस्ती करने आया है। इसलिए उसका ध्यान उस मालिक की ओर जाता ही नहीं है जिसने उसे इस संसार में मनुष्य के रूप में भेजा है।
        ईश्वर की उपासना करना सबसे कठिन कार्य है। यह मैंने इसलिए कहा कि उसकी भक्ति का प्रदर्शन अधिक होता है जिसका कोई लाभ मनुष्य को नहीं होता। जो लोग सच्चे मन से उसकी उपासना करना चाहते हैं जब उनका मन उस समय दुनिया के कारोबार में भटकने लगता है तो वे परेशान रहते हैं।
          ईश्वर का यदि सच्चे मन से भजन किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है यानी मनुष्य ईश्वर के करीब हो जाता है। उसका प्रिय बन जाता है। ये मात्र अड़चनें है जो इन्सान को डिगाने के लिए आती हैं। वह प्रभु भी परीक्षा लेता रहता है कि मनुष्य की लगन कितनी सच्ची है, उसमें कितनी ईमानदारी है। निश्चित समय पर और मन से सोचा गया जप मनुष्य को अवश्य करते रहना चाहिए।
          कहते हैं जब राम कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का मन साधुओं के उपदेश के कारण बदल गया तो वे साधना में लीन हो गए। तपस्या करते हुए उनके ऊपर चींटियों ने बाम्बी बना ली थी। इसलिए उन्हें वाल्मीकि कहते हैं।। वे राम नाम के स्थान पर मरा शब्द का जप करते हुए तर गए। उन्हें तब भी इसका फल मिला और वे विश्व विख्यात हुए वे रामकथा लिखकर इस संसार में सदा के लिए अमर हो गए।
            एक बार तुलसीदास से किसी व्यक्ति ने पूछा था, "कभी-कभी भक्ति करने में मन नहीं लगता। फिर भी जप करने बैठ जाते हैं, क्या उसका फल मिलता है?"
      इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास ने उसे मुस्कुराते हुए कहा था - 
    तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
    भौम पड़ा जा में सभी, उल्टा सीधा बीज।।
अर्थात् जब भूमि में बीज बोए जाते हैं तो यह नहीं पता चलता कि वे उल्टे पड़े हैं या सीधे। पर फिर भी कालान्तर में फसल  तैयार हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु के नाम का सुमिरन कैसे भी किया जाए, उसके सुमिरन का फल अवश्य मिलता है।
        यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि जप कैसे किया बल्कि इसकी उपयोगिता है कि जप करने का जो नियम बनाया था उसे भार तो नहीं समझ रहे। कहीं मन में यही विचार हावी हो रहा हो कि बेकार ही मुसीबत मोल ले ली। यदि ऐसी भवना मन में कभी आ जाए तो अपने ऊपर किए गए उस प्रभु के उपकारों का स्मरण कर लीजिए। फिर मन स्वयं ही उसकी आराधना करने के लिए नतमस्तक हो जाएगा।
        कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर किसी ने भेजा था कि ईश्वर को स्मरण करने के लिए उसे एस. एम.एस. करो। ईश्वर को एस.एम.एस. करने के विषय में लिखे गए ये विचार बहुत ही सुन्दर लगे, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         एक बार कोई भक्त ने किसी सन्त के पास गया और उनसे पूछा, 'मुझे आज तक भगवान नहीं मिले, कैसे मिलेंगे बताइए?"
        सन्त बोले, "भगवन तो हर स्थान पर विद्यमान हैं, वह कण-कण में वास करते हैं। इसीलिए उन्हें सर्वव्यापी कहते हैं। तुमने भगवान को एस.एम. एस. नहीं किया होगा। एक बार उन्हें एस.एम. एस. करना शुरू कर दो फिर निस्सन्देह वे स्वयं ही तुम्हें मिल जाएँगे।" 
        भक्त ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए फिर उनसे पूछा, "मैं एस.एम.एस. कहाँ पर करूँ? भगवन का नम्बर तो मेरे पास नहीं है।" 
          सन्त ने कहा, "अच्छा एक बार इसका अर्थ समझ लो। इसके हर शब्द का अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं- एस- सच्चे,  एम- मन से,  एस - स्मरण।
अर्थात् सच्चे मन से उसका स्मरण कर तो वह तुरन्त मिल जाता है।"
          इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर को मनुष्य से कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो बस मनुष्य के भाव को परखता है। उसकी उपासना करने के लिए मनुष्य को सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए, उसका मन चाहे लगे अथवा न लगे। अपने नियम का पालन सच्चे मन से करने का ईमानदार प्रयास करते रहना चाहिए। कभी तो उसकी उपासना में मन लगने लगेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

धनवान बनने की बलवती कामना

धनवान बनने की बलवती कामना

जीवन को सुविधापूर्वक जीने के लिए मनुष्य के लिए धन एक बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए उसकी सबसे पहली और बलवती कामना होती है धनवान बनने की। यह ऐसा धन है कि बहुत कठिनाइयों और प्रयत्नों से पकड़ में आता है। हाथ में आते ही फिर यह फिसलने के लिए मचलने लगता है। इसका कारण है कि जब इन्सान जी तोड़ श्रम करके धन एकत्र का लेता है तो फिर वह संसार की समस्त सुख-सुविधाएँ भोगना चाहता है। अतः वह अपने और अपनों के लिए उन्हें जुटाने का प्रयास करता है।
        यानी रहने के लिए एक बड़ा घर, घूमने के लिए मँहगी गाड़ी, अच्छे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, ऐशो-आराम के सभी साधन अपने जीवन काल में जुटा लेना चाहता है। उसकी यही इच्छा होती है कि वह और उसका घर-परिवार किसी भी तरह के कष्ट का सामना न करे। यदि घर में कभी कोई अस्वस्थ हो जाए तो अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाना चाहता है। उसकी यही हार्दिक इच्छा होती है कि उसके घर का कोई भी सदस्य अपना मन मारकर न रहे। 
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसका कमाया हुआ पैसा बोलने लगता है। यदि वह स्वयं पर नियन्त्रण रख लेता है तो सब सुविधाओं को भोगता है। परन्तु यदि उस पैसे को न सम्हाल सके तो उसका सारा कमाया हुआ धन बर्बाद हो जाता है। इसके पीछे केवल यही कारण है कि पैसा अपने साथ बहुत से दुर्व्यसन लेकर आता है। इन कुटेवों में यदि वह पड़ जाता है तो सब कुछ मिट्टी में मिल जाता है। सब कुछ हारकर फिर वह सिर धुनकर पश्चाताप करता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसलिए सयाने कहते हैं -
 अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
          जब वह दौलत एकत्रित कर लेता है तब समाज में अपना एक विशेष स्थान भी चाहता है। उसके मन में यश पाने की आशा जागने लगती है। वह चाहता है कि उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले, लोग उसे पहचानें। उसका सर्वत्र समाना हो। इस चक्कर में वह उस समय सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगता है। खूब दान देता है, अपने नाम के पत्थर भी लगवाता है।
         जब वह प्रभूत धन अर्जित कर लेता है और चारों ओर उसका यश फैलने लगता है तब फिर उसके मन में एक शक्तिशाली इन्सान बनने की उत्कट लालसा बलवती होने लगती है। उस समय कुछ लोग स्वयं को सिद्ध करने के लिए अनायास ही असामाजिक तत्वों से साँठ-गाँठ कर बैठते हैं। दूसरों पर रौब झाड़ने के लिए अपने साथ हथियारबन्द गार्ड रखता है ताकि लोग उसका लौहा मानें और उससे डरकर रहें। 
        समय बीतते वह अपने ही बनाए हुए जाल में फंस जाता है। तब वहाँ से निकलने के लिए वह छटपटाने लगता है परन्तु उसके सारे प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। वह चाहकर भी अपने जाल को काटकर मुक्त नहीं हो पाता।
        धन कमाने, यश पाने और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए मनुष्य भटकता रहता है। फिर अन्त में वह मन की शान्ति पाने के लिए तलाश में दर-बदर भटकने लगता है। वह तीर्थों, जंगलों की खाक छानता है। यदा कदा तथाकथित धर्मगुरुओं के चंगुल में फंस जाता है। 
         इन सभी स्थानों पर भी जब उसे शान्ति नहीं मिल पाती तब उसकी खोज अधूरी रह जाती है। इस तरह भटकते हुए उसका अन्तकाल आ जाता है और वह मिट्टी में मिल जाता है। उसके सारे-के-सारे ठाठ-बाठ इसी धरा पर धरे रह जाते हैं। वह खाली हाथ इस संसार से विदा हो जाता है।
        मनुष्य अपने जीवन की इस यात्रा में बहुत-सी उम्मीदें पल लेता है। आशा ऐसी होनी चाहिए जो उसे उसके लक्ष्य तक ले जाए। अपने लक्ष्यों को पाने की होड़ में वह अपने रिश्तों से दूर होता जाता है। जब सबसे ऊबकर उसे उनकी आवश्यकता होती है तब तक वे पीछे छूट गए होते हैं। ये वही लोग होते हैं जो उसके अपने होते हैं किन्तु समय की ठोकर लगने से पराए हो गए होते हैं।
          इन्सान का यह दुर्भाग्य है कि जरा-सा ऐश्वर्य, कीर्ति, शक्ति पाकर वह घमण्ड से फूल नहीं समाता और अपनी औकात भूल जाता है। दूसरी और इतनी विशाल जलराशि का स्वामी होकर भी सागर सदा अपनी सीमा में रहता है। 
          बड़े दुःख की बात है कि मनुष्य अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। धन के मद में चूर वह हर किसी को देख लेने की धमकी देता हुआ स्वयं को ईश्वर से भी महान समझने की भूल करने लगता है। उसकी सत्ता को चुनौती देने लगता है जिसका अन्त अच्छा नहीं होता। 
        मनुष्य को चाहिए की सब सुखों को देने वाले उस प्रभु को सदा स्मरण करते हुए उसका धन्यवाद करे। अपने अन्तस् में अहं को स्थान न देकर सबसे सहृदयता का व्यवहार करके वास्तविक पूँजी का संग्रह करे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

आयु‌ में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

आयु में वृद्ध होने से मनुष्य बड़ा नहीं

मनुष्य की आयु दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहती है। वह बच्चे के रूप में जन्म लेता है। फिर वर्षों वर्ष व्यतीत होते रहते हैं और मनुष्य रिटायर हो जाता है। यानी एक आयु के पश्चात उसे वृद्ध मान लिया जाता है। वयोवृद्ध व्यक्ति समाज में सम्माननीय होता है। परन्तु वास्तव में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मात्र आयु में वृद्ध होने से ही कोई भी मनुष्य बड़ा कहला सकता है?
         इस प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि आयु में वृद्ध होने पर मनुष्य को बड़ा अथवा समझदार नहीं कहा जा सकता। हम यह भी कहा सकते हैं कि मनुष्य का अपना व्यवहार जो वह दूसरों के प्रति करता है, उसे छोटा या बड़ा बनाते हैं। बड़ा वही व्यक्ति कहलाता है जो अपनी विद्वत्ता और अपने अनुभवजन्य ज्ञान का उपयोग देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए करे। 
          बड़प्पन उसी मनुष्य का माना जाता है जो अपने छोटों के प्रति सहृदय हो। उन्हें पूरा प्यार व सम्मान दे। उनकी समस्याओं को सुलझाने की सामर्थ्य रखता हो। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति उसकी शीतल छाया का आनन्द ले सके। उसके ज्ञान और उसके सद्वयवहार की छाप लेकर ही विदा हो। बार-बार उनसे सम्पर्क साधने के लिए उसका मन लालायित रहे।
          आयु में बड़े होने के उपरान्त यदि मनुष्य में ओछापन हो, चरित्रहीन हो या अहंकारी हो तब भी कोई उसका आदर नहीं करता। लोग उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यदि वह क्रोधी हो तो कोई उसके पास नहीं जाना चाहता। सभी उससे कन्नी काटकर निकलने का प्रयास करते हैं। यदि वृद्ध व्यक्ति मूर्ख हो तब भी उसका कोई सम्मान नहीं करता।
          जिस बड़े व्यक्ति को अपने पद, ज्ञान, धन-दौलत आदि का घमण्ड हो, वह दूर की कौड़ी जैसा व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं बन पाता बल्कि सबके द्वारा नकार दिया जाता है। उस मनुष्य की स्थिति खजूर के पेड़ की तरह होती है। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में हमें समझाते हुए कहा है-
     बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
     पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर।।
अर्थात् यह दोहा हमें यही समझ रहा है कि खजूर के पेड़ के बड़े होने का लाभ न किसी इन्सान को होता है और न किसी पक्षी को होता है। खजूर के पेड़ की लम्बाई क्योंकि बहुत अधिक होती है। इसलिए वह धूप में तपे हुए किसी भी यात्री को छाया नहीं दे सकता। उस पर लगने वाला फल इतनी ऊँचाई पर होता है जिसे कोई भी तोड़कर नहीं खा सकता और न ही अपनी भूख मिटा सकते हैं। 
        इस दोहे का भावार्थ और इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। केवल आकार या धन-दौलत में बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता। यदि आपका बड़प्पन किसी जरूरतमन्द के काम न आए तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती।
         जो लोग ज्ञान या धर्मचर्चा में योग्य होते हैं, उनके विषय में मनीषी कहते हैं-
        धर्मवृद्धेषु वयः न समीक्षते।
अर्थात् धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती।
          इस सूक्ति के अनुसार यदि धर्म में वृद्ध लोगों की आयु नहीं देखी जाती तो फिर क्या देखा जाता है? उन लोगों की आयु न देखकर केवल ज्ञान ही परखा जाता है। इस विषय में हम कह सकते हैं कि साधु-सन्त या विद्वान चाहे छोटी आयु के हों या बड़ी आयु के सभी उनके चरण छूते हैं। यहाँ उनका ज्ञान ही महत्वपूर्ण होता है, उनकी आयु नहीं।
          जो मनुष्य बड़े होने पर भी अपने छोटों को अपनी छाया में सुरक्षित नहीं रख सकता, उनका समुचित ध्यान भी नहीं रख सकता, उसे कोई पसन्द नहीं करता। हर इन्सान उससे दूरी बनाए रखने का प्रयत्न करता है, कोई भी व्यक्ति उससे अपना रिश्ता नहीं रखना चाहता। उस समय वह मनुष्य बरगद के विशाल वृक्ष की तरह इस संसार में निपट अकेला ही रह जाता है।
          बरगद के पेड़ की तरह मनुष्य को महान नहीं बनना चाहिए। वह बहुत विशाल होता है। उसकी छाया में कोई और पौधा नहीं पनप सकता। ऐसे उस बरगद की बहुत अधिक आयु होने का किसी को कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण है कि अपनी छाया में अन्य पौधों के न होने से वह बड़ा होने पर भी निपट अकेला ही रह जाता है।
          यदि कोई वयोवृद्ध दुर्वासा ऋषि की तरह क्रोधी हो तो भी वह पूज्य नहीं होता। क्रोधी व्यक्ति यदि गुणवान हो तब भी वह लोकमान्य नहीं बन पाता। जब तक उसके स्वभाव में मधुरता नहीं होगी तब तक कोई उसे नहीं पूछता। इसीलिए कहते हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है।
          इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य का सम्मान उसकी योग्यता, उसके ज्ञान, उसके जीवनभर के अर्जित अनुभवों के आधार पर होता है, उसके वयोवृद्ध होने से नहीं होता।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

दुष्ट लोगों के साथ व्यवहार

माना यही जाता है कि बुरे व्यक्ति अथवा दुष्ट के साथ सहृदयता बरतनी चाहिए। उसे यथासम्भव सुधारने का प्रयास करना चाहिए। उसे सन्मार्ग दिखाया जाए तो वह शायद अपने बुराई के रास्ते को छोड़ सकता है और निस्सन्देह एक अच्छा इन्सान बनने का प्रयत्न सकता है। समस्या यह है कि आज के इस आपा-धापी वाले युग में किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि वह उन्हें सुधारने का कार्य करे।
          आज प्रायः लोग इस तर्क को न मानकर यही कहते हैं कि एक बार जो व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़ता है उसकी वहाँ से वापिसी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होती है। इसका कारण है कि उसका मन वहाँ रमता है और वह समझता है कि उसका लौहा सभी मानते हैं। उसकी तूती बोलती है तथा लोग उससे डरते हैं। इसलिए वह वापिस नहीं लौट सकता। यदि वह लौटना चाहे भी तो उसके साथी उसे वैसा नहीं करने देते। उन पर अपना कीमती समय नष्ट न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए।
          तथाकथित धर्मगुरु अपने धन-वैभव को बढ़ाने में लगे रहते हैं। उन्हें किसी दुष्ट को सुधारने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। कुछ सरकारी और गैर सरकारी संस्थाऍं इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। सोचने की बात यह है कि उनकी सफलता का ऑंकड़ा सन्तोषजनक है क्या? जब घर-परिवार और बन्धुजनों की कही हुई बात वे नहीं मानना चाहते तो फिर किसी अन्य से क्या उम्मीद रखी जा सकती है?
          अपराधिक प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को कितना भी सुधारगृह में भेज दो, उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का कितना भी यत्न क्यों न किया जाए पर परिणाम वही होगा यानी 'ढाक के तीन पात।' तब उन पर की गई मेहनत की जाए व्यर्थ हो जाती है।
          किसी विद्वान का कहना है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए-
            शठे शाठ्यं समाचरेत्।
या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि-
        'शईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए। 
अर्थात यदि कोई ईंट मारे तो उस पर पत्थर से वार तो कर ही देना चाहिए।
        उनका कथन यह है कि उन्हें  कोई और भाषा समझ ही नहीं आती। वे इसके लिए तर्क देते हैं कि दुष्ट व्यक्ति साँप की तरह होता है। उसे कितना भी दूध पिलाओ वह डंक जरूर मारता है। इसी तरह दुष्ट के साथ कितना भी अच्छा करो, मौका आने पर वह अपनी हरकतों से बाज हीं आता। वह हानि करा ही देता है। इसलिए वह कभी विश्वास के योग्य नहीं बन सकता। इसलिए उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होता है।
        यदि दुष्ट व्यक्ति के साथ नरमी का बर्ताव किया जाए तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। वह दूसरों को मूर्ख समझने लगता है। इसलिए उसके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए। उनका कथन है कि- 
          आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति:।
अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के साथ सरलता का व्यवहार नहीं करना चाहिए। 
          उसे ऐसा व्यवहार रास नहीं आता। मनुष्य को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे उसे यह न लगे कि सामने वाला कमजोर हैं या उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। अतः उसको दबाया न सकता है अथवा डरा-धमकाकर उससे अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है।
      ‌  वैसे तो हम सब चाहते हैं कि उन दुष्ट लोगों को सुधारने का एक मौका दिया जाना चाहिए। पर वास्तव में एक अवसर मिलने पर उनमें सुधार हो सकता है क्या? यदि हाँ तो यह समाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी अन्यथा समय की बर्बादी ही मानी जाएगी।
         दुष्ट को यदि हम क्षमा करेंगे तो वह हमारा मजाक उड़ायेगा और कहेगा कि हम में हिम्मत ही नहीं है उसका सामना करने की। हमारी क्षमाशीलता को वह हमारी कमजोरी समझकर और अधिक अत्याचार करेगा। इसिलए उसका प्रतिकार करना आवश्यक हो जाता है।
          अपवाद हर स्थान पर मिल जाते हैं। सन्यासियों की संगति में आकर पूर्व का रत्नाकर डाकू लोकप्रसिद्ध रामायण का रचियता महर्षि वाल्मीकि बन गया। इसी प्रकार महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आने पर अंगुलिमाल डाकू उनका प्रिय शिष्य बन गया। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है जहाँ सज्जनों की संगति में दुष्ट अपनी बुराइयों को दूर करके महापुरुष बन गए। बस केवल खोजने भर की देर है। महर्षि वाल्मीकि और अंगुलीमाल डाकू दोनों ही महात्माओं की संगति में महान बने तथा उन्होंने समाज को दिशा देने का कार्य किया। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
         यहाँ मैंने विद्वानों की उक्तियों को आपके समक्ष रखा है। अब आप अपनी तर्क बुद्धि और विवेक से विचार करें कि हम इन दुष्ट लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें?
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 4 अगस्त 2026

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन

प्रकृति में सन्तुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। इसके लिए उसे किसी के परामर्श कर्त्ता अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए वह किसी मैनेजर आदि के सहारे नहीं रहता। उसने इस ब्रह्माण्ड की परिकल्पना की। उसकी इस सुन्दर रचना में यानी सृष्टि में कहीं भी कोई कमी नहीं है। हम मनुष्य चाहे जितना भी परिश्रम कर लें, यह हमारे बूते की बात नहीं है।
          परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्त्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा, अपने दायित्वों को पूर्ण करेगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानी वह नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जब से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इस क्रम में कहीं भी, किसी प्रकार की त्रुटि की कोई भी गुॅंजाइश नहीं है।
         सूर्य, चन्द्र आदि सभी ग्रह-नक्षत्रों का क्रम निश्चित है। कोई प्रातः आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद् गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलय हो जाती हैं। नदियॉं अबाध गति से अपने इस नियम का पालन करती हैं।
        सृष्टि के सभी जीव-जन्तुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की जिससे सबको अपने भोज्य पदार्थ मिलते रहें। पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की।
          पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चट्टानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है जिसे वे अपनी जरूरत के समय खा सकें।
         पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि नारायण पण्डित ने 'हितोपदेश' में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
      न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः।
अर्थात् सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता, उसे परिश्रम करना पड़ता है।
       कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए हर जीव को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने ऐसा सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी। 
        कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अतः शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे कहीं बदबू न फैल सके। पेड-पौधों का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए शाकाहारी जीवों को बना दिया।
        इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानी सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके आलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।
      ‌    अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मारने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है जब वह बुझ जाती है तो हर कोई उसे रौंद देता है। चींटियॉं भी उस पर चलने लगती हैं।
         मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने सभी प्रबन्ध स्वयं अपने हाथों में लिए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।
        अतः उसके विधान में मनुष्य को अपनी टाँग अड़ानी छोड़ देनी चाहिए। वह बहुत ही समर्थ है उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। बस यह याद रखिए कि वह स्वयं सब सम्हाल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 3 अगस्त 2026

दान का महत्त्व

दान का महत्त्व

दान के महत्त्व को हमारे मनीषी भली-भाँति समझते थे। इसीलिए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हर शुभकार्य को करते समय दान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी भी दुःख-तकलीफ से उभरने के पश्चात् भी दान देना चाहिए। अपने मन की शान्ति के लिए भी हर मनुष्य को अपनी शुद्ध कमाई में से कुछ धन अलग निकालकर रखना चाहिए और उसे दान में भी देना चाहिए।
        समाज में रहते हुए मनुष्य दूसरों से बहुत कुछ ग्रहण करता है क्योंकि सदा से ही वह एक समाजिक प्राणी है। उसके बदले में उसे समाज के हितार्थ कुछ-न-कुछ अपना योगदान करते रहना चाहिए। उनमें दान देना भी प्रमुख है। दान देने के विषय में मुझे कबीरदास जी का निम्न दोहा याद आ रहा है-
          चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
          दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर।।
अर्थात् नदी में जल का भण्डार होता है। यदि चिडिया उसमें से कुछ बूँदे जल की ले लेती है तो उस नदी के जल में कोई कमी नहीं आती, वह खाली नहीं होती।
        इस प्रकार अपनी कमाई में से कुछ राशि यदि समाजिक और धार्मिक कार्यो पर व्यय कर दी जाए तो वह धन सार्थक हो जाता है। धन का दान किसी प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर नहीं करना चाहिए अथवा न ही किसी के दबाव में आकर करना चाहिए। साथ ही किसी की होड़ में आकर भी दान नहीं करना चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धाभाव होना चाहिए और अपना कर्तव्य मानकर दान देना ही‌श् श्रेयस्कर होता है।
        दान देते समय यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि दान सुपात्र को ही देना चाहिए ताकि वह उसका सदुपयोग करे। यदि दान कुपात्र को दिया जाए तो वह उसका दुरुपयोग करता है। इस तरह दिया गया धन व्यर्थ हो जाता है। उस समय अपने मन को भी कष्ट होता है।
        दान देते समय कर्त्तापन का अभिमान मन में कदापि नहीं आना चाहिए। हालाँकि यह इन्सानी कमजोरी है कि वह चाहता है कि सभी लोग उसके इस कार्य को महत्त्व दें, उसकी सराहना करे और सम्मान दे। जिसकी सहायता की है वह सारी आयु उससे नजरें न मिला सके अथवा हमेशा उसके सामने सिर झुककर रहे। ऐसी सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए और यथासम्भव अहं से बचने का प्रयास करना चाहिए।
        यदि मनुष्य इस बात को आत्मसात कर लेता है कि देने वाला तो वह ईश्वर है, इन्सान तो बस दान देने का एक माध्यम है। तब कभी उसके मन में कर्त्तापन का यह मिथ्या अभिमान नहीं आ सकेगा कि दान उसने दिया है या उसने किसी व्यक्ति की सहायता की है।
         दान देने का लाभ तभी होता है जब अपना कर्त्तव्य समझकर दान दिया जाए। हमारे मनीषी कहते हैं कि दाएँ हाथ से दान दो तो बाएँ हाथ को पता न चले। दूसरे शब्दों में कहें तो दान को गुप्त रूप से देना चाहिए और स्वयं भी उसके बारे में भूल जाना चाहिए।
           यहॉं मैं एक बात कहना अपना धर्म समझती हूॅं कि तथाकथित गुरुओं के कहने पर अपने खून-पसीने की कमाई को गंवाना नहीं चाहिए। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिसके पास अकूत धन है उसे हमारे कुछ पैसों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वही धन किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाए जिसे उसकी आवश्यकता सचमुच है। तभी हमारा दिया धन सार्थक होता है।
         इसी भाव को रहीम जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखते हैं-
        देन हार कोई और है भेजत जो दिन रैन।
        लोग भरम हम पर करें तासो नीचे नैन।।
अर्थात् देने वाला तो कोई ओर है जो हमें दिन-रात देता रहता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो जाता है कि हम देने वाले हैं। इसीलिए दान देते समय उनकी नजरें झुक जाती थीं।
         देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों का दान करने वाले महर्षि दधिचि को हम सब जानते हैं।दानवीर कर्ण को कौन भूल सकता है? राजा हरिश्चन्द्र से बड़ा दानी कौन हो सकता है? उनके दान के फलस्वरूप उनकी पत्नी को दासी बनना पड़ा। उन्हें स्वयं भी एक चाण्डाल के यहॉं नौकरी करनी पड़ी। इतिहास भरा हुआ है ऐसे महापुरुषों की गाथाओं से। 
    धन के दान को सर्वाधिक महत्त्व इसलिए दिया जाता है कि उसके बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं होता। अन्न, वस्त्र, श्रम आदि के दान का भी महत्त्व कम नहीं है। मनुष्य यदि नए वस्त्र नहीं दान कर सकता तो ऐसे वस्त्र देने चाहिए जिन्हें कोई पहन सके और कुछ समय के लिए वह अपना तन ढक सके।
        विद्या के दान का शास्त्रों में सबसे अधिक महत्त्व माना जाता है। इससे एक भावी पीढ़ी संस्कारित होती है जो देश का भविष्य होती है। इसलिए निस्वार्थ भाव से दान देते रहना चाहिए। इससे मनुष्य के इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 2 अगस्त 2026

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता प्राप्ति के लिए हर मनुष्य अपने हाथ-पैर मारता है। उसके बाद भी यदि ऐसा लगे कि पास आती हुई सफलता रूठकर कहीं दूर चली जा रही है और हाथ नहीं आ रही तब उसे अपने प्रयासों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता होती है। इसके लिए निराश नहीं होना चाहिए। असफलता अन्त नहीं होता। यह सीखने और खुद को बेहतर बनाने का एक अवसर होती है। अपनी गलतियों की समीक्षा करनी चाहिए और फिर आगे बढ़ना चाहिए। 
         जीवन की सफलता का कोई एक जादुई पैमाना नहीं होता बल्कि यह स्पष्ट लक्ष्य, कठोर साधना और अनवरत सीखने का परिणाम होती है। इसके लिए सबसे आवश्यक है कि मनुष्य स्वयं की भूमिका निश्चित करे और पूरी लगन से उस दिशा में अपने कदम बढ़ाए। मनुष्य को स्वयं पर यह विश्वास रखना चाहिए कि वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है। यह उसे विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
       भाग्य पर अन्धविश्वास न करके अपने उद्देश्यों को मजबूत बनाना चाहिए और अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए और स्वयं की सामर्थ्य पर ही विश्वास करना चाहिए। जीवन में कुछ बातें या घटनाएँ अवश्य ही संयोगवश हो जाती हैं पर हमेशा ऐसा नहीं होता। 
       दृढ़ विश्वास और अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने वालों को कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। समय का सही उपयोग ही महान लोगों की सफलता का रहस्य रहा है। असफलता से कभी क्षणिक अवसाद अवश्य हो सकता है परन्तु उसका परिणाम सदा ही सुखदायी और परिवर्तन लाने वाला होता है। सकारात्मक सोच मनुष्य को ऊर्जावान बनाए रखती है। समस्याओं के स्थान पर‌ समाधान की ओर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करती है।
      अपने लक्ष्य को पाने के इच्छुक साहसी लोग असफलताओं से निराश नहीं होते। जब तक मन-मस्तिष्क सुनियोजित रहेगा यानी उनमें तालमेल बना रहेगा तो तब तक मनुष्य की भावनाएँ उसी के अनुरूप ही जन्म लेंगी। 
      मनुष्य की उर्जा, उसकी शक्ति का यदि सही दिशा में उपयोग होगा तो शरीर भी अपनी गति में आ जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता स्वयं होता है। यह सर्वथा उचित है। मनुष्य जब अपने मजबूत इरादों, दृढ़ विश्वास, सुनियोजित मन-मस्तिष्क और एक निश्चित गति से आगे बढ़ेगा तो ब्रह्माण्ड की कोई भी ताकत उसे पछाड़ नहीं सकती।
         मनुष्य के विचारों में, उसकी सोच में स्पष्टता और परिपक्वता का होना बहुत आवश्यक होता है। उसका आत्मविश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मनुष्य को एकान्त में बैठकर धैर्य से विवेकपूर्वक योजना बनानी चाहिए और उसे उचित समय पर क्रियान्वित कर देना चाहिए।
         यदि उसकी योजना में ही कमी रह जाएगी तो उसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। मनुष्य को उत्साही बनना चाहिए पर अति उत्साही नहीं होना चाहिए। ऐसा करके वह अपने ही दुर्भाग्य को स्वयं न्यौता दे बैठता है जिसके लिए आयुपर्यन्त उसे हाथ मलते ही रह जाना पड़ता है।
      मनुष्य को चाहिए की वह उन सबको अपने साथ लेकर चले जिन्हें वह पसन्द हैं। जो उसे नापसन्द हैं उनका त्याग न करके ऐसा कुछ करे कि वे स्वेच्छा से उसके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाएँ। जीवन में पता नहीं कब किस मोड़ पर उसे उनकी भी जरूरत पड़ जाए। उस समय वह स्वयं को सबसे भाग्यशाली इन्सान समझेगा।
      किसी को भी अपने जीवन मैं सदा एक जैसी परिस्थितियाँ नहीं मिलतीं। जीवन पर्यन्त धूप-छाँव का खेल चलता रहता है। उन सभी परिस्थितियों को सम रहकर सहन करना ही बुद्धिमत्ता कहलाती है। भगवन श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसे द्वन्द्व सहन करना कहा है। 
      मनुष्य को व्यपरियों की तरह जमा-घटा का पहाड़ा नहीं पढ़ना चाहिए। उसके ये विचार उसकी सोच को संकुचित बना देते हैं। उसे महान बनने के स्थान पर सबका प्रिय बनने का प्रयत्न करना चाहिए। महान तो वह अपने सत्कार्यो से बन ही जाता है।
    अपनी क्षमताओं के अनुसार यदि वह अपनी उन्नति की ओर ध्यान देगा तो उसका व्यक्तित्व स्वयं ही निखरकर दुनिया के सामने आ जाएगा। उसे संसार सधारण से असाधारण या महान बना देता है। तब वह महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है। उसके दिशा-निर्देशों की अनुपालना करके लोग स्वयं को धन्य मानते हैं।
           बिना रुके लगातार प्रयास करना सफलता की कुंजी होती है। सोचने मात्र से कुछ नहीं होता, उसे पाने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है। मनुष्य यदि कछुए की तरह कर्मठता, आत्मविश्वास, निष्ठा व लग्न से आगे बढ़ने लगे तो तरह खरगोश जैसे तीव्रगामी लोगों को पछाड़कर अपनी सफलता के झण्डे गाड़ सकता है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 1 अगस्त 2026

शिकायत पुराण

शिकायत पुराण

हम इन्सानों को सदा ही हर दूसरे व्यक्ति से  शिकायत रहती है। हर मनुष्य को लगता है कि उसके बराबर इस संसार में कोई और बुद्धिमान हो नहीं सकता। वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं। इसीलिए हर किसी में कमियाँ ढूँढकर, उनका उपहास करके आत्मसन्तोष का अनुभव करता है। यदि उसमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो बहुत अच्छा होता। दूसरों के स्थान पर अपनी कमियाँ ढूँढकर यदि वह उन्हें सुधार पाता तो निश्चित ही इस संसार का भला हो जाता।
         मनुष्य को अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों, संगी-साथियों के साथ-साथ प्रकृति, मौसम और ईश्वर से भी शिकायत रहती है। पति-पत्नी को एक-दूसरे से, बच्चों को माता-पिता से, माता-पिता को बच्चों से, घर-परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों, शत्रुओं, पड़ोसियों, कार्यालयीन साथियों आदि सभी से हमेशा शिकायत रहती है। मनुष्य को यही लगता है कि हर कोई उसका अहित करना चाहता है। सब उससे और उसके ऐश्वर्य से जलते हैं। तरक्की करते हुए उसे देखकर उसकी टाँग खींचकर जमीन पर पटखनी देना चाहते हैं। उसे सदा यही चिन्ता सताती रहती है कि किस तरह सबको नीचा दिखाकर वह पतंग की तरह ऊँचा उड़ता रहे।
        इसी प्रकार दूसरों को कोसते हुए हम सभी अपने जीवन में अशान्ति खरीद लेते हैं। सब कुछ होते हुए भी परेशान रहते हैं। यही एक शंका मन में घुन की तरह लगा लेते हैं कि हमसे कोई भी व्यक्ति आगे न निकल जाए। यदि कोई अपने परिश्रम से आगे निकलने में सफल हो जाता है तब हमें सहन नहीं होता। बस फिर उसकी बुराइयाँ करने की कवायद शुरू होने लगती है।
         प्रकृति जिससे मनुष्य सब कुछ लेता है, उसे उससे विशेष रूप से शिकायत रहती है। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के उपरान्त भी उसका मन नहीं भरता और उसे दूषित करने से वह बाज नहीं आता। जब उसकी मूर्खता के कारण अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती है या भूकम्प आते हैं तब उनके कारण खेती और अन्य जानमाल की बर्बादी होती है। फिर प्रकृति की शिकायत करते हुए वह थकता नहीं है।
       नदियों पर बड़े-बड़े बाँध और पुल बनाकर मनुष्य सुविधाएँ भोगना चाहता है। उन्हें अपने यातायात के लिए प्रयोग करना चाहता है। पर उनकी सफाई और रख-रखाव पर ध्यान नहीं देना चाहता। इसलिए उनके द्वारा जब तबाही होने लगती है, उस समय वह बिसूरने लगता है। बड़े-बड़े भाषण देकर अपनी कमियॉं छुपाने का असफल प्रयास करता है।
       सागर से भी उसे परेशानी होती है। वह सोचता है कि समुद्र का पानी खारा न होकर मीठा होता तो पानी की समस्या स्वत: हल हो जाती। स्वयं तो वह ध्यान नहीं देता और हर समय पानी को बर्बाद करता रहता है। विद्वान कहते भी हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।
        पक्षियों से विशेषकर कोयल से उसे यह शिकायत है कि उसका रंग काला है। उसकी मधुर आवाज के साथ यदि रंग भी गोरा होता तो अच्छा होता। फूलों अर्थात् विशेषकर गुलाब से शिकायत रहती है कि उसमें काँटे होते हैं। यदि वे न होते तो बहुत अच्छा होता। जब वह उसे तोड़ना चाहता है, वे उसे चुभ जाते हैं। 
          पेड़-पौधों से शुद्ध वायु और सभी प्रकार के खाद्यान्न पाकर मुदित होता रहता है, फिर भी उन्हें काटकर अपने घर को सजाने तथा ईंधन के रूप में प्रयोग करने में जरा भी परहेज नहीं करता। उसे हर मौसम से भी शिकायत रहती है चाहे वह सर्दी हो, गर्मी हो, वर्षा हो या पतझड़ हो। सर्दी में उसे बहुत ठण्ड लगती है और उसे हीटर व गीजर जलाने पड़ते हैं। गर्मी में उसे गर्मी लगती है तो उसे ए.सी. चलाने पड़ते हैं। इस कारण इन दोनों मौसम में उसका बिजली का बिल बढ़ जाता है। वर्षा ऋतु में बाढ़ आने से घर से बाहर निकलने में परेशानी होती है। पतझड़ के समय गन्दगी बहुत हो जाती है। इसलिए सफाई अधिक करनी पड़ती है।
        इसी प्रकार पशुओं को अपने आराम और मनोरंजन के लिए पालतू बनाता है और अपने जीभ के स्वाद के लिए मारकर खा जाता है। जब वे इसके विपरीत कार्य करने लगते हैं तब उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है।
        ईश्वर जिसने उसे इस संसार में भेजा है और झोली भर-भरकर नेमते दीं हैं। चौबीसों घण्टे किसी-न-किसी बात पर उसी से शिकायत करता रहता है। उसे यही लगता है कि दुनिया को मालिक सुख देता है किन्तु सारे दुख, कष्ट और परेशानियाँ उसकी झोली में डाल देता है। अतः ईश्वर को लानत-मलामत करता है।
          ये सभी शिकायतें वास्तव में मनुष्य के नकारात्मक रवैए का परिणाम होता है। यदि इस शिकायत पुराण को तिलांजलि देकर मनुष्य सकारात्मक सोच अपना ले तो उसकी बहुत सारी स्थितियाँ स्वयं ही बदल जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

पुण्य कर्मों की पूॅंजी कैश करवाऍं

पुण्य कर्मो की पूँजी कैश करवाऍं

बैंक में हम अपना पैसा जमा करवाते हैं। जब हमें आवश्यकता होती है तब वहाँ से इच्छित राशि निकाल सकते हैं। उस पैसे से हम अपनी अनेक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यदि हम बैंक में अपना अकाउंट खुलवाकर पैसा जमा नहीं करेंगे तो आवश्यकता होने पर बैंक से हमें पैसा नहीं मिल सकेगा। इसका सीधा-सीधा यही अर्थ हुआ कि बैंक से पैसा निकालने के लिए वहॉं अकाउंट होना और धन होना आवश्यक होता है। अपना जमा किया हुआ पैसा भविष्य में हमारे काम आता है।
          इसी प्रकार अपने पुण्य कर्मो की पूँजी को यदि हम अपने भाग्य के खाते में जमा कराएँगे तभी अगले जन्म में उसे कैश करवा सकेंगे। उसी पुण्य कर्मों की पूॅंजी से हम उस जीवन में सुख भोग सकेंगे। यदि इस जीवन में हम इस पूॅंजी से वंचित रह जाऍंगे तो अगले जन्मों में हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। हमारे शास्त्र, हमारे बड़े-बुजुर्ग और मनीषी हमें अपने सत्कर्मों की पूॅंजी बढ़ाने पर बल देते हैं।
          बैंक में जमा करवाए हुआ धन के कारण हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद हम अपने जीवन के आड़े वक्त के लिए धन का संग्रह करने के लिए व्यघ्र रहते हैं।
        इस एक भौतिक जीवन को जीने के लिए हम इतने तामझाम करते हैं परन्तु जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे शरीर में रहने वाले जीव को अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी होती है, उसके विषय में हम कभी नहीं सोचते। जबकि यह विचार मन में अधिक हावी होना चाहिए। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि उसे हम अपने मन-मस्तिष्क में कभी आने ही नहीं देते। अपने आसपास रहने वाले लोगों को देखकर भी हम कुछ नहीं सीखते।
        एक दिन बैंक हमेशा की तरह पैसे निकालने वालों की भीड़ थी। भीड़ को देखकर एक व्यक्ति रुक गया। उसने वहाँ खड़े हुए एक व्यक्ति से सहज ही पूछा, "भाई, यहाँ भीड़ क्यों है?"
            दूसरे आदमी ने जवाब में कहा,"यह भीड़ पैसे लेने वालों की है।"
          वह आगन्तुक बैंक की प्रणाली से अनजान था। उसने फिर पूछा, "क्या सबको पैसे मिलते हैं?"
           दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हाँ।"
          उसकी हॉन् सुनकर वह व्यक्ति भी उसी लाइन में खड़ा हो गया।
        जब उसकी बारी आई तो बैंक के कैशियर ने उससे पूछा, "उसे कितने पैसे चाहिए, पर्ची भरी है क्या, तुम्हारा खाता बैंक में है क्या?" 
        अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित करते हुए उसने न में सिर हिला दिया और कहा, "तुम सबको पैसे दे रहे थे। मुझे भी पैसे चाहिए थे, इसलिए मैं भी लाइन में खड़ा हो गया।"
          उसका भोला-सा उत्तर सुनकर कैशियर ने उसे समझाया, "यह बैंक है। यहाँ पर लोग पैसे जमा करवाते हैं। फिर जब जितने पैसे की उनको जरूरत होती है तब पर्ची भरकर उतने पैसे ले लेते हैं और फिर अपनी पासबुक में एंट्री करवा लेते हैं।"
        कहने का अर्थ यही है कि बैंक में पहले पैसे जमा करवाने होते हैं तभी निकल पाते हैं। पासबुक में केवल तीन एंट्री होती हैं-  डिपाजिट यानी धनराशि जमा कराना, विड्राल अर्थात् पैसा निकालना और बैलेंस यानी खाते में कितना धन शेष बच गया है।
          बैंकिंग प्रणाली से अनजान उस व्यक्ति ने जब बैंक में अपना पैसा जमा ही नहीं करवाया था तो फिर उसे आवश्यकता होने पर भी वहाँ से पैसा नहीं मिल सकता था। वह व्यक्ति खाली हाथ ही रह गया।
        हम सब लोग जो इस बैंकिंग प्रणाली को भली-भाँति जानते हैं, वे भी भूल जाते हैं कि धन की तरह हमारे भाग्य का भी अपना एक अकाऊंट होता है। वहाँ भी जमा, घटा और शेष बची हुई राशि का हिसाब रखा जाता है।
        इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भाग्य एक बैंक है। हमारे पुण्यकर्म और हमारे पापकर्म हमारी जमाराशि है। पुण्य कर्मों के कारण हम अपने इस भौतिक जीवन में सुख-समृद्धि, शान्ति, सफलता, यश और स्वस्थ जीवन आदि का आनन्द ले सकते हैं।
        इसके विपरीत पापकर्मों के कारण हमें जीवन में अभाव, परेशानी, रोग, कलह-क्लेश और निराशा आदि भोगने पड़ते हैं। जब जीव अपने पापकर्मों को भोग लेता है तभी उसे उनसे मुक्ति मिलती है।
          पापकर्मों और पुण्यकर्मो को भोगने के बाद उनमें से जितने कर्म शेष बचते हैं, उन्हीं के अनुसार जीव को अगला जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों में से उसे अपने कर्मों के अनुसार कोई भी शरीर मिल सकता है।
        अतः अपने पुण्यकर्मो को अपने भाग्य के खाते में जोड़ने के लिए अभी से सन्नद्ध हो जाइए। ऐसा न हो कि पापकर्मों की अधिकता से न अगला जन्म अच्छा मिले और न ही इस जीवन में ही सुख-सुविधाएँ मिल सकें। उस समय सिर धुनकर पश्चाताप करने से अच्छा है कि हम अभी से चेत जाएँ। इसका कारण है कि हमारे इन पुण्यकर्मो और पापकर्मों के लेखे-जोखे के अनुसार ही हमें सब कुछ मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

आकर्षित करते मोहजाल

  आकर्षित करते मोहजाल 

इस संसार में रहने वाले मनुष्य को सदैव परेशानियाँ अथवा डर डराते रहते हैं। उनसे घिरा वह सुख की सॉंस नहीं ले पाता। सारा समय उनसे छुटकारा पाने का प्रयास करता रहता है। जब भी, जहाँ भी, उसे कहीं से थोड़ी-सी राहत मिल जाती है, वह वहीं सब कुछ भूल जाता है। उसे यह भी याद नहीं रह जाता कि वह इस संसार में सीमित समय के लिए ही आया है। तत्पश्चात तो उसे यहॉं से विदा हो होकर दूसरे लोक या परलोक जाना‌ है।
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संसार के आकर्षण और मोहमाया के जाल इतने अधिक लुभावने हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी उनके तिलस्म में उलझकर रह जाता है। वह जितना भी उनसे बाहर निकलने का प्रयत्न करता है, उतना ही गहरे उसमें फँसता चला जाता है। मजे की बात यह है कि उसे पता ही नहीं चलता।
          एक बोधकथा की यहाँ चर्चा करते है जिसे हममें से कई लोगों ने पढ़ा होगी। एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था। तभी एक शेर उसका शिकार करने के लिए उसके पीछे भागने लगता है। भागते हुए उसे एक कुँआ दिखाई देता है। उसके सामने विकट स्थिति आ जाती है। यह वही बात हो गई -
            आगे कुआँ और पीछे खाई 
इस स्थिति से बचने के लिए वह छटपटाने लगता है। उसे आगे एक कुऑं दिखाई देता है। वह डरा हुआ बेचारा अपनी जान बचाने के लिए उस कुएँ में के ऊपर लगे हुए चक्र में बंधी हुई रस्सी को पकड़कर लटक जाता है। 
          वह वहाँ लटक तो गया परन्तु जब उसकी नजर नीचे कुँए की गहराई में पड़ी तो उसके होश उड़ गए। वहॉं पर फन फैलाए हुए एक काले साँप बैठा होता है। उसे देखकर वह चौंक जाता है। मौत को साक्षात् अपने समक्ष देखकर वह बहुत घबरा जाता है। उसी समय उसकी नजर काले और सफेद रंग के दो चूहों पर पड़ती है जो उस रस्सी को काट रहे होते हैं, जिसको पकड़कर वह लटक रहा था। ऐसा भयावह दृश्य देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। 
          ईश्वर का चमत्कार देखिए कि कुँए में उसे एक शहद का छत्ता नजर आता है। उसे थोड़ी-सी राहत मिलती है। उस छत्ते से शहद की एक-एक बूँद उसके मुँह पर गिरने लगती है। अपनी जीभ से वह उस शहद को चाटने लगता है। शहद की मिठास में वह इतना खो जाता है कि उसे वहाँ मौजूद शेर, भयानक साँप और चूहों के डर को भूल जाता है। उस समय वह अपने सिर मंडराती मौत तक को नजरंदाज कर देता है। यही है इन्सानी फितरत कहीं जा सकती है कि क्षणिक सुख के सामने वह अपनी मौत को बिसरा बैठा।
           यह दुनिया जंगल की तरह है। कुआँ मौत का घर है और साँप मौत का कारण है जिसे हर हाल में डसना ही है। दोनों चूहे दिन और रात हैं जो हमारी जिन्दगी की डोर को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं। शहद इस संसार का रस-रंग है जिसे थोड़ा-सा भी चख लिया जाए तो मनुष्य भूल जाता है कि उसे इस असार संसार से विदा लेनी है।
          यह कथा हमें समझाती है कि काल रूपी सर्प मनुष्य को भयभीत करता रहता है। वह समझता है कि यही काल एक दिन उसे अपना ग्रास बना लेगा। फिर भी यह मनुष्य समय से न डरते हुए मस्त रहता है, मानो उसने रावण की तरह काल को बाँध लिया है। जो मनुष्य विषय-भोगों में अपना समय व्यतीत करता है, वह इस समय को व्यर्थ गँवा देता है। इसके विपरीत जो इस समय का सदुपयोग कर लेता है सफलता उसके कदम चूमती है और उस व्यक्ति को आम से खास बनाकर सबके सिरों पर बिठा देती है।
        हमारा यह जीवन पल-पल करके बीत रहा है। जन्म लेने के पश्चात से बीतता हुआ यह समय हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, यह क्रम अनवरत चलता रहता है। ये दोनों मिलकर हमारी जीवन की डोर को धीरे-धीरे काट रहे हैं यानी कम से और कम करते जा रहे हैं। इससे जीवन और मृत्यु के बीच का जो अन्तर है वह दिन-प्रतिदिन कम से कमतर होता जा रहा है। हम सब इस तथ्य को अनदेखा करते हुए इस अमूल्य जीवन को दुनिया के झंझटों में व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं।
          मनमोहक दुनिया के माध्यम से इस संसार सागर में वह प्रभु इन्सान को चारा डालकर ललचाता रहता है। मनुष्य को पता ही नहीं चलता कि कब वह उसके काँटे में मछली की तरह फँस जाता है और मालिक वह काँटा खींच लेता है। तब मनुष्य तड़पता रह जाता है। हाथ-पैर पटकता रहता है पर सब व्यर्थ हो जाता है।
          मौत को हमेशा प्रत्यक्ष खड़ा हुआ मानना चाहिए। व्यवहार ऐसा करना चाहिए जैसे आज का दिन ही अन्तिम दिन है और अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना है। इसी भावना के साथ मौत से बिना डरे निश्शंक होकर विचरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता 

मनुष्य निस्वार्थ भाव से जो भी परोपकार के कार्य करता है, वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे कार्य उसके शुभकर्मों में जुड़ जाते हैं और उसके पुण्यों की वृद्धि करते हैं। समयानुसार जैसे फलदार वृक्ष राहगीरों को मीठा फल देते हैं, उसी प्रकार परोपकारी जन अपने कर्मों से दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का यत्न करके उन्हें सुख पहुॅंचाते हैं। ऐसे मनुष्य की प्रसिद्धि कहाँ तक फैलेगी, यह सब ईश्वर ही जानता है। न तो वह स्वयं जानता है और न ही कोई अन्य लोग।
          उसके समीपस्थ अन्य दूसरे लोग चाहे उसकी कितनी ही आलोचना क्यों न करते रहें, उन्हें अनदेखा करते हुए वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। अपने द्वारा चुने हुए मार्ग पर सूर्य की तरह निरन्तर गतिमान रहता है।
        यहाँ हम एक कथा को लेते हैं जो इन्हीं विचारों की पोषक है। एक बहुत ही सज्जन मनुष्य थे जो हर आने-जाने वाले व्यक्ति को अपने पास बिठाकर पानी पूछते थे। आया हुआ कोई परदेसी यदि भूखा होता तो उसे पूछकर खाना भी खिलाते थे। वे बस यही कहते थे, "जो यहाँ दिया है तो वहीं वहाँ मिलेगा।"
         एक बार उन्हें किसी कार्यवश अपने घर से दूसरे शहर जाना पड़ गया। उन्होंने अपनी बहू से कहा, "बेटा, चार पराँठे बनाकर मेरे बैग में रख दो। जब भूख लगेगी तो किसी पेड़ की छाया में बैठकर खाना खा लूँगा।"
          उनकी बहू ने मन में विचार किया कि नित्य प्रति लोगों को खाना खिलाते रहते हैं और कहते हैं, "यहाँ दिया है तो वहाँ मिलेगा। इन्हें भोजन की क्या आवश्यकता आ पड़ी।"
          उसने खाना नहीं बनाया। जब वे सज्जन घर से जाने लगे तो उन्होंने बहू से पूछा, "बेटा, क्या तुमने भोजन रख दिया है।"
          उसने हाँ में उत्तर देते हुए कहा, "बाबू जी, रख दिया है, आगे जाकर मिल जाएगा।"
          वे अपने गन्तव्य पर थके-माँदे पहुँचे और एक चबूतरे पर बैठ गए। थोड़ी दूरी पर काम रहे युवक ने उन्हें देखा तो पहचान गया कि वे वही सज्जन हैं जिन्होंने थके और भूखे-प्यासे उसे खाना खिलाया था। वह उनके पास आया और उनसे हालचाल पूछा तथा फिर पूछा, "आपने भूखा का लिया है।"
           उन्होंने ने कहा, "नहीं, अभी नहीं खाया।"
          उन्हें भूखा जानकर उसने उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाया।
        तब उन सज्जन ने कहा,"मेरे बैग में मेरी बहू ने खाना रखा है, उसे भी खा लेते हैं।"
         परन्तु जब उन्होंने बैग खोला तो देखा कि उसमें बहू ने खाना रखा ही नहीं था। तभी उन्हें बहू के शब्द याद आ गए, "यहाँ जो खाना दिया है, वह आगे जाकर मिल जाएगा।"
          यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अपना खुद का पेट भर लेना और अन्य किसी के बारे में कभी न सोचना पशुवृत्ति कहलाती है। मनुष्य को मिल-बाँटकर खाना चाहिए। सम्पूर्ण प्रकृति यानी जल, पृथ्वी, वायु, पेड़-पौधे, सूर्य, बादल आदि अपने पास कुछ भी नहीं रखते। उनके पास जो भी है, वे उसे हम जीवों में बॉंट देते हैं। वे अपने स्वार्थ का त्याग करके परमार्थ का कार्य दिन-रात करते रहते हैं।
          स्वयं के हिस्से का भोजन खाना तो प्रकृति कहलाती है किन्तु दूसरों के हिस्से पर नजर रखना अथवा खा लेना विकृति कहलाती है। इन सबसे भी बढ़कर होता है किसी भूखे को अपना हिस्सा दे देना, यह उसके संस्कारों को बताता है। हमारी भारतीय संस्कृति सदा अतिथि की सेवा करने का निर्देश देती है और कहती है -
              अतिथि देवो भव।
अर्थात् अतिथि को ईश्वर की तरह मानो।
        जिन लोगों ने कभी भूख की ज्वाला का अनुभव नहीं किया उन्हें तो पता ही नहीं कि भूखा व्यक्ति क्या-क्या अनर्थ नहीं कर गुजरता? बहुत से लोग अपनी असह्य भूख के कारण गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। जिनके पेट भरे होते हैं उनके दिमाग खराब हो जाते हैं और नखरे अलग होते हैं। इसलिए उनके घर की रोटियाँ किसी जरूरतमन्द को देने के स्थान पर कूड़े में फैंक दी जाती हैं अथवा खाने लायक नहीं रहतीं। इससे बढ़कर और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।
          जरूरतमन्द इन्सान की सहायता यदि बिना उससे कुछ प्राप्ति की भावना से सहृदयतापूर्वक की जाए तो वह अवश्य ही फलदायी होती है। ऐसे ही महानात्मा लोगों के पुण्यों के कारण इस धरती पर आज तक मानवता का अस्तित्व आज बचा हुआ है। अन्यथा स्वार्थि लोगों ने इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे लोग अपने तुच्छ स्वार्थों को महत्त्व देते हुए दूसरे लोगों को गलत सन्देश देते हैं। इससे लोगों का मानवता पर विश्वास डगमगाने लगता है जिसे हम किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहरा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

स्वस्थ्य शरीर मात्र साधन

स्वस्थ शरीर मात्र साधन

स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का परम कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता। यह स्वास्थ्य मनुष्य की अमूल्य निधि है। जैसे धन-वैभव को सम्हालकर रखा जाता है, उसी प्रकार अपने इस स्वास्थ्य को भी सम्हालकर रखना चाहिए। परन्तु बहुत दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हम इसी ईश्वरीय नेमत के साथ दिन-रात खिलवाड़ करते हैं।
           हमारे शास्त्रों के द्वारा जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। उन सबको धत्ता दिखाते हुए हम किसी दूसरे ही युग में जाते जा रहे हैं। हमारा आहार-विहार बिल्कुल उलट-पुलट हो चुका है। आज हमारे किसी भी कार्य को करने का कोई समय नहीं होता। हम न समय पर सोते हैं और न ही समय पर जागते है। हमारी सभी पार्टियाँ, शादी-ब्याह आदि देर रात तक चलते रहते हैं। देर रात तक क्लबों में मौज-मस्ती चलती है। इसलिए प्रातः देर से उठते हैं। परिणामस्वरूप सभी कार्य देर से होते‌ हैं।
           जिस रोजी-रोटी को कमाने के लिए हम अथक परिश्रम करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं और कोल्हू का बैल तक बन जाते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। हम पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक भोजन न खाकर अधिक मसालेदार और तले हुए खाद्यान्न खाना पसन्द करते हैं। डिब्बाबन्द पदार्थ और जंकफूड खाकर हम बहुत इतराते हैं। घर का खाना हमें नहीं भाता, यह कहकर हम अपनी शान बघारते हैं।
           फिर एक समय ऐसा आता है जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है यानी हमारा यह स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। उस समय जब हम असहाय हो जाते हैं तब रो-रोकर ईश्वर से स्वस्थ करने की या इस दुनिया से उठा लेने की प्रार्थना करते हैं। हमें अपनी गलती तब भी समझ नहीं आती कि हमने स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। 
         अस्वस्थ हो जाने पर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हुए अपना बहुमूल्य समय व मेहनत की गाढ़ी कमाई बर्बाद करते हैं। वह एक समय जीवन में ऐसा होता है जब डाक्टरों की सलाह पर सादा खाना खाना हमारी लाचारी बन जाती है। तब डायटिशियन के बनाए हुए चार्ट के अनुसार अपना खानपान सन्तुलित करने के लिए हम विवश हो जाते हैं और तब हमारी सारी हेकड़ी निकल जाती है। उस समय कमाया हुआ सारा धन धरा रह जाता है। 
           अपने प्रिय से प्रिय और जान छिड़कने वाला भी कोई सहायता नहीं कर सकता। रुग्ण शरीर के कष्ट को कोई भी न बॉंट सकता है और न ही दूर कर सकता है। अपने प्रियजन मात्र दर्शक बनकर रह जाते हैं। उस समय कितना भी पैसा खर्च लो किन्तु यह स्वास्थ्य पलटकर वापिस नहीं आ सकता और न ही मुँह में कोई एक निवाला डाल सकता है।
          हमारे मनीषी इसलिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने पर बल देते हैं। हम ऐसे नालायक हैं जो उनकी महत्त्वपूर्ण बातों को अनदेखा करके कष्ट पाते हैं। महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा था-
        शरीरमाध्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् हमारा यह शरीर धार्मिक कार्यों अथवा हमारे दायित्वों को पूरा करने का साधन है।
        शरीर जब स्वस्थ होता है तो मनुष्य अपने सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो वह दूसरों का मुॅंह देखने लगता है। मनुष्य घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। इन कारणों से उसके मन को बहुत कष्ट होता है। 
        समस्या हमारे सामने तब आती है जब हम इस साधन शरीर को साध्य मान लेते हैं। दिन-रात इसे सजाने-सँवारने में लगे रहते हैं। इस पर सदा घमण्ड करते रहते हैं। अपने सामने दूसरों को हीन समझते हैं। बड़े दुख की बात है कि इसे स्वस्थ रखने का प्रयास मनुष्य नहीं करता। अस्वस्थ होने पर दूसरों को दोष देते हैं। ईश्वर को उलाहना देते हैं और लानत-मलामत करते हैं।
          मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य है कि वह चौरासी लाख योनियों के साथ-साथ जन्म-जन्मान्तरों के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना। ईश्वर की उपासना अपना प्रमुख कर्त्तव्य मानकर करे। लेकिन इस दुनिया के आकर्षणों में फँसकर वह सब भूल जाता है और आजन्म कष्ट भोगता रहता है।
          इस स्वस्थ शरीर में ही अपने विचारों को शुद्ध व पवित्र रख सकते हैं और अपने मन को साध सकते हैं। कठोपनिषद् ने इस शरीर को रथ माना है। यदि यह रथ अपनी गति से चलेगा तभी तो हमें अपनी मंजिल मुक्ति तक पहुँचाएगा। इसलिए इस शरीर की देखभाल करनी अत्यन्त आवश्यक है। शेष अन्य दायित्वों की भाँति इसका निर्वहण भी करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर लो दुनिया मुट्ठी में

कर लो दुनिया मुट्ठी में

प्रत्यक्ष रूप से समक्ष न होने पर हमारी आपसी बातचीत का माध्यम टेलीफोन होता है। पहले लोग पत्रों के सहारे अपने बन्धु-बान्धवों से सम्पर्क साधा करते थे। वह प्रक्रिया पूर्ण होने में बहुत समय लग जाता था। आज हम सभी अपने विचारों का आदान-प्रदान एक-दूसरे के साथ फोन के द्वारा करते हैं। इस वैज्ञानिक आविष्कार को हम एक चमत्कार कह सकते हैं।आधुनिक तकनीक की यह बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। इससे आपसी दूरी का अहसास भी नहीं होता।
        देश-विदेश में हम बहुत कम पैसों में अपने बन्धु-बान्धवों से अपने सुख-दुख साझा कर सकते हैं, उनका हालचाल जान लेते हैं। कुछ दशक पहले लैण्डलाइन टेलीफोन बहुत वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिला करते थे क्योंकि उस समय फोन घर में लगवा लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था। जिसके घर पर टेलीफोन होता था, उसे लोग बड़ा आदमी कहते थे। शायद टेलीफोन के कठिनता से उपलब्ध होने के कारण ही एक फिल्म में यह गाना फिल्माया गया था जिसकी बहुत अधिक धूम मची थी और बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह गाना था-
    मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से  
      टेलीफून तुम्हारी याद सताती है।
ये बहुत ही प्रसिद्ध पुराने गाने के बोल हैं। यह सदाबहार गीत 1949 में आई फिल्म 'पतंगा' का है। इसे दिग्गज गायिका शमशाद बेगम और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने गाया था। इसके बोल राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखे थे। 
        कुछ समय पूर्व अपने प्रदेश से बाहर या विदेश में रहने वाले किसी से बात करनी होती थी तो एस. टी. डी. अथवा आई. एस. डी. बुक करवानी पड़ती थी। उन दिनों ऐसे फोन यदि दिन में किए जाते थे तो बिल बहुत अधिक आया करता था। इसलिए लोग रात दस के बजे के बाद फोन करते थे। उस समय फोन का रेट बहुत कम हो जाया करता था। उस समय काल बुक कराई जाती थी किन्तु यह कोई गारण्टी नहीं होती थी कि बात हो ही जाएगी।
         आज वाकई दुनिया हमारी मुट्ठी में हो गई है। वैज्ञानिक चमत्कारों के कारण दूरियों के कम हो जाने से दुनिया सिमटकर रह गई हैं। किसी भी समय बाजार से मोबाइल फोन खरीदो और अपने बन्धु-बान्धवों से पलक झपकते ही देश-विदेश में कहीं भी, किसी भी समय बहुत ही कम पैसों में बात कर लो। रात में काल रेट कम होने का इन्तजार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। इससे भी बढ़कर स्काईप, वाट्सअप, फेसबुक आदि से भी मुफ्त में काल करके बात कर सकते हैं।
          जिस प्रकार दूर बैठा व्यक्ति जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, उससे टेलीफोन के माध्यम से बातचीत करते हैं। उसी प्रकार ईश्वर जो हमसे बहुत दूर है, उससे बात करने के लिये मौन रहने की आवश्यकता होती है। वह इन भौतिक चर्म चक्षुओं से हमें प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता परन्तु हम मौन रहकर, ध्यान लगाकर और प्रार्थना के माध्यम से जब चाहें उससे बातचीत कर सकते हैं।
        जैसे हम मालिक से अपनी प्रार्थना के माध्यम से बात करते हैं उसी प्रकार वह दाता भी हमसे बात करता है। अन्तरात्मा की आवाज के माध्यम से वह हमारे साथ संवाद करता है। जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं तो हमारे मन में उत्साह होगा यानी वह शाबाशी देता है। इसके विपरीत गलत कार्य करने पर मन से आवाज आती है कि यह काम गलत है अथवा कोई देख न ले या किसी को पता चलेगा तो क्या होगा ? यानी हमें गलत कार्य न करने की चेतावनी देता है। उस परमपिता का हमारे साथ संवाद करने का यही तरीका है।
          भौतिक फोन से बात करने के लिए हमें निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। यानी उसके लिए हमें बिल देना होता है। यदि बिल का भुगतान न किया जाए तो कम्पनी के द्वारा फोन काट दिया जाता है। दूसरी ओर अपने प्रभु से बात करने के लिए अपने मन की भावना का समर्पण करना पड़ता है। वहाँ किसी प्रकार के धन का व्यय नहीं करना पड़ता और न ही फोन कटने या काल ड्राप होने का डर रहता है।
           आज तकनीक इतनी एडवांस हो गई है कि विडीयो कॉल करने पर हम सामने वाले का चेहरा भी देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हम आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हैं। इसी प्रकार उस मालिक से संवाद करने के हेतु सामने प्रत्यक्ष बैठकर बात करने के लिए हमें अपने अन्तस् में ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है। 
        हमें अपने जीवन में प्रतिदिन अपना थोड़ा-सा समय निकालकर अपने मालिक के साथ वार्तालाप करना चाहिए। सांसारिक रिश्ते जिनके साथ हम हमेशा बातचीत में व्यस्त रहते हैं, वे हमारे परलोक सिधारते ही समाप्त हो जाते हैं। केवल प्रभु का और हमारा साथ चिरन्तन है। अतः उससे चर्चा भी करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 जुलाई 2026

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य को ईश्वर ने इस सृष्टि का सबसे अधिक समझदार जीव बनाया है। बुद्धि का उपहार देकर इतनी उसे सामर्थ्य दे दी है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। यदि वह सकारात्मक रुख रखता है तो चमत्कार कर देता है। इसके विपरीत वह अपने नकारात्मक विचारों के कारण स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
        ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थीं। इन्हें आप सबके साथ कुछ वर्तनी संशोधन के पश्चात साझा कर रही हूँ। आशा है आप भी इन्हें आत्मसात करना चाहेंगे।
        'नजर रखो अपने विचार पर क्योंकि वे शब्द बनते हैं। नजर रखो अपने शब्द पर क्योंकि वे कार्य बनते हैं। नजर रखो अपने कार्य पर क्योंकि वे स्वभाव बनता है। नजर रखो अपने स्वभाव पर क्योंकि वह आदत बनता है। नजर रखो अपनी आदत पर क्योंकि वह चरित्र बनती है। नजर रखो अपने चरित्र पर क्योंकि वह जीवन का आदर्श बनता है।'
          इन पंक्तियों को पढ़ने के पश्चात यही समझ आता है कि मनुष्य जो भी विचार अपने मन में रखता है, उसी के अनुरूप बोलता है और फिर उसे अपने आचरण में ढाल लेता‌ है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह सबको प्रभावित करेगा। निश्चित ही उसे उन सबका समर्थन मिलेगा। उनका मार्गदर्शक बनकर वह समाज में अपना अहं किरदार निभाएगा।
          इसके विपरीत नकारात्मक सोच होने पर मनुष्य न सही ढंग से कोई कार्य कर पाता है और न ही किसी को उचित परामर्श दे सकता है। जीवन की बाजी हारने वाला वह इन्सान जीत का जश्न नहीं मना पाता। ऐसे व्यक्ति घर-परिवार और समाज के लिए बोझ के समान बन जाते हैं। उन्हें कहीं पर भी सम्मान नहीं मिल पाता।
          मनुष्य के क्रियाकलापों पर उसके विचारों की छाप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। उत्साही मनुष्य सदा सबको प्रेरित करेगा और निरुत्साही व्यक्ति सबको निराश ही करेगा। विवेकी व्यक्ति और अज्ञ व्यक्ति के कार्यो में जमीन और आकाश जैसा अन्तर होता है। जिसका अनुमान हम उनके कार्य-व्यवहार से भलीभॉंति लगा सकते हैं।
          चोर व्यक्ति चोरी करना सिखाएगा, भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टाचरण की शिक्षा देगा, धोखेबाज इन्सान धोखाधड़ी सिखाएगा, सदाचरी महापुरुष सदाचरण पर बल देगा। विद्वान व्यक्ति सदा दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य को अपने मन, वचन और कर्म पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसे हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य यही है कि जिसके पास जो गुण-अवगुण होंगे, उसीके अनुरूप ही उसका आचरण अथवा स्वभाव बन जाता है। भविष्य में मनुष्य का यह स्वभाव परिपक्व होकर अनजाने ही उसकी आदत बन जाता है। यदि उसमें अच्छी आदतें ढल गयी तो चारों ओर उसकी जय-जयकार होती है। ऐसा मनुष्य सफलता की सीढ़ियों पर सुगमता से चढ़ता जाता है।
          यदि गलत आदतें अपना ली गई हों तो लाख कोशिशों के बाद भी वह अपनी आदतों को बदल नहीं पाता। तब उसके कारण उसके भाई-बन्धुओं तथा परिवारी जनों को शर्मसार होना पड़ता है। उनके समझाने पर भी यदि वह अपनी गलत आदतें नहीं छोड़ता तो वे सब उससे किनारा करने लगते हैं। तब वह अकेला हो जाता है। उसके लिए यह बहुत दुखदाई स्थिति होती है।
        अपने जीवन का आदर्श ही मनुष्य का चरित्र बनाता है। उसके चरित्र की महानता उसे महान बनाकर ऊपर उठाती है और उसकी चारित्रिक विकृति उसे रसातल की ओर धकेल देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सदैव चरित्र निर्माण पर बल देती है।
          जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है तब व्यष्टि का यानी समाज का चरित्र बनता है। समाज के साथ-साथ देश के चरित्र का भी  निर्माण होता है। जिस देश का और उसके निवासियों का चरित्र उदात्त होता है, उस देश का गौरवशाली ध्वज सदा ही ऊँचा फहराता है। उस देश की ओर कितना ही शक्तिशाली शत्रु हो, आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। यदि किसी खुशफहमी के कारण ऐसा करने का दुस्साहस करता है तो उस शत्रु को मुँह की खानी पड़ती है।
        इस प्रकार विचार, शब्द, कार्य, स्वभाव, आदत, चरित्र और जीवन आदर्श ये सब एक चेन या कड़ी हैं। ये सभी एक ही सूत्र में पिरोए गए हैं। इनका परस्पर अन्तर्सम्बन्ध होता है। इसीलिए विचारों की शुद्धता, सरलता, सहजता पर सयाने बल देते हैं जो सर्वथा समीचीन है और आज भी उतने ही सटीक हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक 

नंगे पैर यानी जूता या चप्पल बिन पहने चलना हाईजीन और स्वास्थ्य दोनों ही के लिए लाभदायक होता है। विद्वानों  का मानना है कि हरी घास पर प्रातःकाल नंगे पैर चलने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसीलिए सुबह-सवेरे पार्क में बहुत से लोग यह क्रिया करते हुए दिखाई देते हैं।
            बहुत से घरों में आज आधुनिक सुविधाओं वाले माडर्न रसोईघर बन गए हैं, वहाँ सारा कार्य खड़े होकर किया जाता है। इसलिए वहाँ जूता या चप्पल ले जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। अभी भी बहुत से परिवार ऐसे मिल जाएँगे जिनके घर के रसोईघर में जूते-चप्पल ले जाने की मनाही है। वे मानते हैं कि जहाँ खाना बनता है वहाँ इन्हें ले जाने से शुद्धता नहीं रहती और इनके साथ कई कीटाणु घर में प्रवेश कर जाते हैं।
          इसी तरह आज भी अनेक घर ऐसे मिल जाएँगे जहाँ घर के भीतर जूते आदि नहीं लाए जाते बल्कि घर का हर सदस्य उन्हें मुख्य द्वार के बाहर ही उतारकर घर में प्रवेश करता है। इसका कारण है कि वे अपने घर को बाहर की गन्दगी से बचाकर शुद्ध रखना चाहते हैं।
        प्रायः सभी धर्मस्थलों में भी जूते-चप्पलों को बाहर उतारा जाता है। अधिकांश स्थानों पर उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। यहाँ भी उन स्थलों की पवित्रता और शुद्धता मुख्य कारण होती है। इसी प्रकार के अन्य सभी धार्मिक आयोजनों में चाहे वे घर पर हों अथवा कहीं अन्यत्र क्यों न हो रहे हों इन्हें बाहर ही उतारने का विधान है। घरों, दुकानों, फैक्टरी या किसी भी आयोजन में पूजा करते समय इन्हें उतार दिया जाता है। इस धार्मिक आस्था पर कोई भी प्रश्नचिह्न नहीं लगाता। 
        अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष यानी आई सी यू में रोगियों को बाहरी कीटाणुओं के आक्रमण से बचाने के लिए जूते-चप्पलों को उस कक्ष के बाहर ही उतारने का आदेश लिखा होता है।
           पुराने समय में लोग बगैर जूतों के ही पैदल चलते थे परन्तु समय के साथ-साथ जूते-चप्पल पहनना आम हो गया। वास्तव में गन्दगी या चोट से बचने के लिए ही जूते-चप्पलों का इस्तेमाल किया जाता है। यदि व्यक्ति किसी घास के मैदान या साफ जमीन पर पैदल चल रहा हो तो उसकी आवश्यकता नहीं होती। नंगे पैर चलने से बहुत से फायदे हो सकते हैं।
          धरती के सम्पर्क में आने से शरीर में मौजूद नकारात्मक तनाव कम होता है। इससे जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है। नंगे पैर घास पर चलने से मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बेहतर होता है। इससे मनुष्य गहरी और सुकून भरी नींद सो सकता है। जूते-चप्पल पहनने के कारण पैरों की कुछ मांसपेशियॉं निष्क्रिय हो जाती हैं। नंगे पैर चलने से पैर, टखने और पिण्डलियों की मांसपेशियॉं सक्रिय और मजबूत होती हैं। 
            नंगे पैर रहने से एनर्जी लेवल बढ़ता है और घुटनों एवं कूल्हों की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। खाली पैर चलना एक प्रकार की एक्सरसाइज है। रोजाना आधा घण्टा पैदल चलने से हार्ट की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति मिल सकती है। 
          कुछ लोग घर में भी खाली पैर घूमना पसन्द करने लगे हैं क्योंकि इससे कई तरह के पॉजिटिव एफेक्ट्स भी शरीर पर पड़ते हैं। सेहत के लिए गर्मी के दिनों में नंगे पैर चलना अधिक फायदेमन्द होता है। यह शरीर को ठण्डा रखता है। ऐसा भी देखा गया है कि बचपन में अधिक खाली पैर रहने से बड़े होने पर पैर की तकलीफें कम होती हैं। 
        नंगे पैर चलने से किसी प्रकार की हानि नहीं हो सकती। बस नंगे पाँव चलने से पैर अवश्य गन्दे हो सकते हैं। विचार यह है कि उससे कोई हानि नहीं होती अपितु उसके लाभ अधिक हैं।
          जैन साधु आज भी बिना जूता पहने रहते हैं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा नंगे पैर ही करते हैं। उनका विचार है कि जूतों के नीचे आकर मरने वाले कई जीवों की हत्या के पाप से बचा जा सकता है।
        कुछ लोग अपनी गरीबी या विपन्न अवस्था की लाचारी के कारण बिना जूते या चप्पल के सड़कों पर घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं। वे लोग भी प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं।
        हमारी पृथ्वी मे हर तरह की धातुएँ पाई जाती हैं जो हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं। नंगे पैर चलकर हमें वे धातुएँ स्वतः मिल जाती हैं जिनकी कमी हो जाने पर हम डाक्टरों के पास जाकर अपना अमूल्य समय व कमाया हुआ धन खर्च करते हैं और फिर उनके निर्देशानुसार उन्हें दवा के रूप में खाते हैं।
        नंगे पैर चलना चाहे धार्मिक कारण से हो अथवा स्वास्थ्य के लिए हो, उसके पीछे भावना मनुष्य के कल्याण की ही होती है। इससे कोई हानि नहीं होती। इसलिए इसे अपनी आदत में शामिल कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

जीवन साथी की कल्पना

जीवन साथी की कल्पना 

हर युवा अपने भावी जीवन की रूपरेखा बनाता है।इसी कड़ी में वह अपने जीवन साथी के विषय में भी सोचता है। जीवन साथी कैसा हो? इस विषय में हर मनुष्य की कल्पना अलग-अलग होती है। वह अपने मनोनुकूल साथी को पा लेने का हरसम्भव प्रयास भी करता है। यह निश्चित है कि कुछ गुण ऐसे हैं जो हर व्यक्ति अपने जीवन साथी में चाहता है। उनमें परस्पर विश्वास, आपसी प्रेम, सद्भाव, एक-दूसरे की परवाह आदि गुण प्रमुख हैं।
          जीवन साथी का चुनाव करते समय यह विचार अपने मन में रखना आवश्यक है कि यह साथ उम्रभर का है, केवल पलभर का नहीं है। यह जीवनसाथी है कोई खिलौना भी नहीं है जिसे मन भर जाने पर कहीं फैंक दिया जाए और फिर बाजार जाकर नया खरीदकर लाया जा सके। हमारे मनीषियों ने इस साथ को जन्म-जन्मान्तरों का साथ यानी सात जन्मों का माना है।
          मात्र गोरा रंग होना अथवा फिल्मी हीरो-हीरोइन जैसे हावभाव देखकर या उसके उन्मुक्त स्वभाव से प्रभावित होकर ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जो भविष्य में जी का जंजाल बन जाए। जिस कारण आयुपर्यन्त स्वयं को कोसने की स्थिति बनी रहे। उस एक पल के लिए जीवन भर पश्चाताप करना पड़ जाए कि उसने गलत साथी का चुनाव किया था।
          अपनी शिक्षा, आर्थिक स्थिति और अपनी कदकाठी के अनुरूप ही जीवन साथी का चुनाव करना चाहिए। दोनों में से एक के पास भी इनकी अधिकता अथवा कमी जीवन भर के लिए परेशानी‌ का कारण बना सकती है। ऐसी स्थिति में सारी आयु एक-दूसरे को ताने देने में ही गुजर जाती है। इस प्रकार के आचरण से मानसिक शान्ति खो जाती है, घर का माहौल बोझिल हो जाता है और फिर जो जग हँसाई होती है सो अलग।
          शारीरिक सौन्दर्य तो चार दिन की चाँदनी होता है परन्तु मनुष्य के गुण हमेशा परखे जाते हैं। रूप सौन्दर्य तो किसी एक्सीडेंट, बिमारी अथवा आयु ढलने पर फीका पड़ जाता है। इसके विपरीत आत्मिक सुन्दरता दिन-प्रतिदिन निखरती जाती है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि सुन्दर व्यक्ति को अपना हमसफर न बनाया जाए। यदि सुन्दरता के साथ गुणों का समावेश भी साथी में हो तो यह सम्मिलिन सौभाग्यदायी हो जाता है।
         इसका अर्थ है कि भौतिक सौन्दर्य के साथ ही अपने अन्तस् में सद् गुणों का विकास भी करना चाहिए। तभी सोने पर सुहागे वाली उक्ति चरितार्थ होती है।
          घर-गृहस्थी चलाने के लिए परस्पर सामंजस्य होना आवश्यक है। यदि दोनों अपने रंग-रूप, ऊँचे पद, अधिक वेतन आदि के नशे में चूर रहकर अपने साथी की अवहेलना करें तो इसे कोई भी उचित नहीं ठहराएगा। इस अहंकार से जीवन नहीं चल पाता। घर में सदा कलह-क्लेश बढ़ता‌ है और जीवन नरक के समान दुखदाई बन जाता है। उसका एकमात्र हल घर का विघटन होता है।
          घर में एक मटका भी यदि खरीदा जाता है तो ठोक बजाकर परखा जाता है। फिर यहाँ तो सारी आयु के साहचर्य की बात होती है। अपने जीवन साथी का चुनाव भी अच्छी तरह देख-परखकर और सोच-समझकर करना चाहिए। जब तक मन को पूरी तसल्ली न हो जाए तब तक सम्बन्ध के लिए हाँ नहीं करनी चाहिए।
          सबसे प्रमुख बात है साथी का चाल-चलन। उस पर पैनी नजर रखनी चाहिए। जिस भी साथी को घर के सदस्यों की अपेक्षा अपने दोस्तों का साथ अधिक पसन्द हो, वह अपने साथी के प्रति वफादार नहीं हो सकता। किसी भी साथी‌ के विवाहेत्तर सम्बन्ध समाज और घर-परिवार में मान्य नहीं होते।‌ऐसे सम्बन्धों के कारण पहले अबोलापन बढ़ता है और फिर तलाक हो जाता है।
             इसीलिए हमारे अनुभवी बुजुर्ग शादी-ब्याह लड़के और लड़की की आर्थिक स्थिति न देखकर उनके कुल या परिवार की ओर अधिक ध्यान देते थे। इसलिए कहते हैं कि यह सम्बन्ध दो परिवारों का होता है।‌ इसका कारण था युवाओं में घर-परिवार और समाज का डर व शर्म होना होता था। इसलिए उस समय प्रायः सही चुनाव होते थे और यदि कभी गलत हो भी जाते थे तो वे‌न के बराबर होते थे। 
          जीवन साथी वही होना चाहिए जो अपने दूसरे साथी के मनोभावों को समझने वाला हो। उसके सामने आप खुलकर हँस सकें और आवश्यकता पड़ने पर उसके कन्धे पर सिर रखकर रो भी सकें। उसका साथ आप आपको अच्छा लगता हो। पूरा दिन उसके साथ हँसते, खेलते और गप्पे लगाते बिताने पर भी ऊब न हो, ऐसा साथी जिसे सौभाग्य से मिल जाए तो उसका सम्मान करते हुए अपना पूरा जीवन बिताकर स्वयं को धन्य मानना चाहिए। साथ ही ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए कि उसने इतना अच्छा जीवन साथी दिया है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं है। कोई भी मनुष्य सफलता की उँचाइयों को छू सकता है। सफलता अमीर-गरीब, ऊॅंच-नीच और जात-पात को नहीं देखती। मानव को अपने जीवन में सफल होने तथा सबका प्रिय बनने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें यदि अपने जीवन में ढाल लिया जाए तो दुनिया की ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो उसे उसका मनचाहा पाने से रोक सके। 
         यह सर्वथा सत्य है कि सफलता न किसी की मोहताज है‌और न ही किसी की बपौती है। यह केवल अटूट संकल्प, निरन्तर परिश्रम और धैर्य का परिणाम होती है। यह किसी व्यक्ति की आयु नहीं देखती।‌ यह उचित समय पर आरम्भ की गई योजना और मनुष्य की लगन का परिणाम होती है। मनुष्य की प्रतिभा और उसके कार्य स्वयं उसका परिचय देते हैं। इतिहास गवाह है कि इस संसार में अनेक महान हस्तियों ने अपने सीमित संसाधनों तथा विपरीत परिस्थितियों से बिना घबराए अपनी पहचान बनाई है।
         सफलता का मुख्य मूल मन्त्र है अनवरत परिश्रम करना। अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण रखना, असफलता से सीखकर आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति और समय का सही प्रबन्धन करना। ये गुण किसी भी क्षेत्र में सफलता की नींव रखते हैं।यह मानकर चलना चाहिए कि असफलताऍं अस्थायी होती हैं। महान नेताओं और विचारकों के सफलता के मूल मन्त्र को देखकर धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम फलदाई होता है। यह भी सत्य है कि मनुष्य को सदा आशावादी बनना चाहिए। सकारात्मक ऊर्जा ही मनुष्य को चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देती है। 
        समाज में रहते हुए मनुष्य हर प्रकार के लोगों से सम्पर्क में रहता है। कभी वह दूसरों की सहायता करता है और कभी अन्य लोग उसकी। उसे किसी के उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए। जो कष्ट के समय अपना साथ दे उसका कृतज्ञ होना चाहिए। उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
          इसके विपरीत दूसरों के प्रति किये गए परोपकार के कार्यो को भूल जाना चाहिए। सयाने कहते हैं- 'नेकी कर दरिया में डाल।' हमें कभी यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि जिसका भला हमने किया है, वह व्यक्ति आजन्म हमारे समक्ष नजरें झुकाकर रहे अथवा जिन्दगी भर के लिए गुलाम बनकर हमारी चाकरी करता रहे। 
          किए गए उपकार का यदि हर समय बखान करते रहने से उसका महत्त्व समाप्त हो जाता हैं। उसके बदले में हमें किसी से कुछ मिलने की आशा नहीं रखनी चाहिए। हालाँकि यह बहुत कठिन कार्य है क्योंकि इन्सानी कमजोरी है कि वह सदा अपनी प्रशंसा चाहता है। मनुष्य को स्वयं पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। अपने बाहुबल, अपनी मेहनत, अपनी लग्नशीलता पर उसे सदा विश्वास रखना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास नहीं होगा तो वह एक कामयाब इन्सान नहीं बन सकता। वह दुनिया की रेस में पिछड़ जाता है।
          इसी प्रकार अपने भाई-बन्धुओं एवं अपने सहयोगियों पर भी विश्वास करना चाहिए। परस्पर विश्वास से ही दुनिया के सभी कार्य व्यवहार चलते हैं। दूसरों पर सन्देह करने से जीना दुष्वार हो जाता है। यह अविश्वास घुन या दीमक की तरह जीवन को खोखला कर देता है। स्वयं पर और अपने स्वजनों पर विश्वास के साथ-साथ परमपिता परमात्मा पर भी मनुष्य को अटूट विश्वास होना चाहिए। सदा यही मानना चाहिए कि वह जो भी करेगा हमारे हित के लिए ही होगा।
        'क्षमा बड़न को चाहिए' ऐसा कहकर मनीषियों ने क्षमा के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। मनुष्य को सदा क्षमाशील होना चाहिए। यह गुण मनुष्य को सृष्टि के अन्य जीवों से अलग तथा विशेष बनाता है। यह ईश्वरीय गुण है। किसी को उसकी गलती के लिए क्षमा कर देना वास्तव में विशालहृदयता का परिचायक होता है। 
          वे लोग बहुत ही संकीर्ण मानसिकता के होते हैं जो किसी की गलती होने पर उसे सबके समक्ष तिरस्कृत करते हैं, उसका उपहास करते हैं। उनकी ऐसी हरकत के कारण कोई भी उन्हें पसन्द नहीं करता। इसलिए क्षमा रूपी दिव्य गुण को अपनाने से मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सकता है। लोग ऐसे व्यक्ति का साथ पाने के‌ लिए सदैव लालायित रहते हैं।
          मनुष्य के मन में सदा ही यह भाव रहना चाहिए कि इस संसार में वह अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के लिए आया है। जिस भी जीव का जन्म यहाँ होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। यह वैराग्य भाव जब मनुष्य के मन में आता है तब वह जल में कमल की तरह सांसारिक कार्य कलापों में लिप्त हुए बिना जीवन व्यतीत करता है। 
          यदि मनुष्य इस अटल सत्य को आत्मसात कर ले तो किसी कार्य को करने से पहले दस बार सोचेगा। तब वह कोई भी अनुचित कार्य नहीं कर सकता। उचित मार्ग पर चलता हुआ मानसिक सुखानुभूति कर सकता है। एवंविध इन सूत्रों को जीवन में अपना करके मनुष्य सही मायने में अपना इहलोक और परलोक दोनों ही सुधार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 जुलाई 2026

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते हम इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है।
          हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन्दगी जी रहे हैं। हम सहज और सरल नहीं बन पआ रहे हैं। हमारी कथनी, करनी और सोच में बहुत अन्तर है। हम जो सोचते हैं उसे व्यवहार में नहीं लाते और न ही मन में सोचे भावों को अपनी वाणी से यथावत प्रकट करते हैं।
         दिखावे और मुनाफे की इस दुनिया में न केवल खाने-पीने की चीजों में बल्कि इन्सान के व्यवहार और रिश्तों में भी मिलावट आ गई है। आज व्यक्ति बाहर से जितना आकर्षक और सच्चा दिखता है, भीतर से उतना ही स्वार्थी और बनावटी हो गया है। लोग अपनी वास्तविकता छिपाकर झूठी छवि दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते है। 
        सोशल मीडिया की इस दुनिया में यह और भी स्पष्ट हो जाता है जहाँ हर व्यक्ति एक परफेक्ट और खुशहाल जिन्दगी का मुखौटा पहनकर घूमता रहता है। यद्यपि असलियत इससे कोसों दूर होती है। जिस प्रकार मिलावटी खाना स्वास्थ्य को हानि पहुॅंचाता है, उसी प्रकार स्वार्थी रिश्ते और झूठे वादे मनुष्य के मानसिक सुकून को समाप्त कर देते हैं।
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में किसी के पास दो पल का समय नहीं है कि दो मिनट रुककर थकने वाले को सान्त्वना दे सके। जो रेस में पीछे छूट जाता है अथवा गिर जाता है, हम उसकी ओर हाथ बढ़ाकर उसे नहीं उठाते। बस उसे हालात से लड़ने के लिए यूँही छोड़ देते हैं।
        अपने स्वार्थो को सर्वोपरि समझने वाले लोग गधे को भी बाप बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अद्ययुगीन मनुष्य की यही विडम्बना है कि वह पैसे को महत्त्व देता है। सभी सम्बन्ध उसके स्वार्थ के सामने बौने हो जाते हैं क्योंकि वह उन्हें पैसे की कसौटी पर ही तौलता है। वह इस सत्य को भूल जाना चाहता है कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं होती। आज वह उसके पास है तो कल उसे छोड़कर किसी दूसरे का वरण कर लेगी। उस पर मान करके दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मानना सर्वथा अनुचित है। ईश्वर न करे ऐसी विपन्नावस्था आ जाने पर अपनी स्थिति के विषय में विचार करते हुए अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखें।
        हमारी सोच और हमारा व्यवहार दोनों परस्पर मेल नहीं खाते। जिन लोगों को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं, पानी पी-पीकर कोसते हैं, जब वे प्रत्यक्ष सामने उपस्थित हो जाते हैं तो उनकी मनुहार करते हैं। तब उन्हें यह अहसास कराते हैं कि उनके सबसे प्रिय वही हैं।
        इस मानसिकता के चलते अपने सगे रिश्तों के साथ भी ऐसा कृत्रिम व्यवहार करने को भी हम बुरा नहीं मानते। इसलिए 'मुँह में राम बगल में छुरी' वाली उक्ति कही गई है। 
          मन में प्रेम नहीं परन्तु उसका जी जान से प्रदर्शन करते हैं। धन का अभाव होने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो सारी दुनिया को खरीद सकते हैं। अल्प ज्ञान होने पर भी सबके हृदयों में विद्वत्ता की ऐसी धाक जमाना चाहते हैं कि सब हमारा लौहा मानने लगें। 
          असामाजिक कार्य यानि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरबाजारी आदि करते हुए भी स्वय को शुद्ध व पवित्र आत्मा होने कआ दावा करते हैं। अधार्मिक कृत्य करते हुए सबसे बड़े धार्मिक होने का प्रपंच करते हैं। बात-बात पर झूठ बोलने वाले कसमें खाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देने का यत्न करते हैं।
          माता-पिता बच्चों के समक्ष और बच्चे माता-पिता के सामने मुखौटों में रहते हैं। भाई-बन्धुओं के साथ भी बस पाक-साफ बनने का ढोंग किया जाता है।
        राजनेता तो जनता के बीच जाकर अपनी नाकाम उपलब्धियों का बखान करते नहीं अघाते। वे ऐसा जाल फैंकने का प्रयास करते हैं कि हर कोई उनके वश में हो जाएँ। 
        कोई भी यह समझने-बूझने के लिए तैयार नहीं होता कि 'काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।' इसी तरह जब मुखौटा चेहरे से उतर जाता है तब वह विकृत चेहरा बहुत ही भयावह दिखाई देता है। 
          मनुष्य का चेहरा एक आईना होता है जिसमें उसके मन के सभी भाव दूसरों को सरलता से दिख जाते हैं। ईश्वर को भी किसी तरह का दिखावा पसन्द नहीं है। अतः अपने मुखौटानुमा मिलावटी आचरण को छोड़कर हम सभी लोगों को अपने स्वभाविक रूप में रहना चाहिए। इसी में मनुष्य का बड़प्पन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जीवन जीने के बदलते मायने

जीवन जीने के बदलते मायने 

जीवन को जीने के हमारे मायने बदलते जा रहे हैं। हमारी जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन हो चुका है। हमारा आहार-विहार जीवनोपयोगी नहीं रह गया। मनीषियों का कथन है कि हमें जीने के लिए खाना चाहिए परन्तु हम खाने के लिए जीने लगे हैं।विचार का यह अन्तर हमारे लिए एक चुनौती बन सकता ‌है।‌ 
          ‌हमारे आहार-विहार में बहुत बदलाव हो गया है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में युवाओं के पास अपने लिए समय नहीं निकल पाता। इसलिए सामाजिक कार्यों में चाहकर भी भाग नहीं ले पाते। सही लोगों के पास आज गाड़ियॉं हैं। इस कारण आवागमन में कठिनाई नहीं होती। शायद यही कारण है कि आज शादी-ब्याह और पार्टियॉं देर रात तक चलती हैं। इसलिए नींद पूरी नहीं हो पाती। पूरा दिन शरीर पर आलस्य छाया रहता है।
          कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तुलित और सुपाच्य भोजन के स्थान पर हम मिर्च-मसालों वाला और जंक फूड खाना पसन्द करते हैं। परिणाम स्वरूप हम अनेक बिमारियों को न्यौता दे बैठते हैं। कुछ लोग लाचार हैं, मजबूर हैं इसलिए बीमार होते है किन्तु कुछ दूसरे लोग अपनी बिमारियों की वजह से लाचारी का जीवन ढो रहे है।
          सारा दिन टेबल वर्क करने से भी शरीरिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। फिर जिम संस्कृति के चक्कर में पड़कर और परेशान होते हैं। डाक्टर परामर्श देते हैं सैर करिए। उस समय अमीर लोग खाना पचाने के लिए मीलों चलते हैं। इसके विपरीत गरीब व्यक्ति खाना खाने के लिए पता नहीं कितने मील पैदल चल लेता है। 
          आज महँगाई के समय घर के सभी लोग कमाने में लगे हुए हैं। दिन-रात काम की धुन में खाने-पीने की सुध नहीं रहती। जिस भोजन को पाने के लिए इतने जतन करते हैं उसी खाने के लिए समय नहीं निकल पाता। दूसरी ओर संसार में ऐसे भी असहाय लोग हैं जिनको खाने के लाले पड़े हुए हैं। उन बेचारों को कितने वक्त का खाना नसीब हो पाएगा, यह भी कुछ निश्चित नहीं होता।
          अपनी गरीबी की लाचार अवस्था में माता-पिता अपने बच्चों को रोटी खिला देते हैं और स्वयं भूखे रह जाते हैं। उधर साधन सम्पन्न होते हुए भी बच्चे माता-पिता को असहाय छोड़ देते हैं। वे बेचारे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं और दरबदर की ठोकरें खाते हैं। इस समय स्थिति बड़ी विकट बनती जा रही है। दो वक्त की रोटी न खिलानी पड़ जाए इसलिए लोग अपने ही प्रियजनों से मुँह मोड़ने में लगे हुए हैं।
          दिन-प्रतिदिन हम अपने संकुचित विचारों के कारण इस दुनिया को भी संकीर्ण बनाते जा रहे हैं। ईश्वर ने तो हमें ऐसा कभी नहीं बनाया था फिर ऐसा नकारात्मक परिवर्तन क्योंकर हो गया। यह हमारी समझ से परे है।
          कुछ समय पहले जब हम बच्चे थे तब प्रतिदिन छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते थे, तकरार करते थे और फिर थोड़े समय बाद एक-दूसरे को मना भी लिया करते थे। एक-दूसरे के गले मे गलबहियाँ डालकर मुस्कुराते थे। अब जब हम बड़े हो गए हैं तो हमारे अहं परस्पर टकराने लगे हैं। हम अपने बचपन जैसी सहजता औऱ सरलता कहीं पीछे छोड़ आए हैं। इसलिए स्थितियाँ बहुत खराब हो गई हैं। अब यदि हम एक बार लड़ते है तो रिश्तों को ही खत्म करने के बहाने ढूँढने लगते हैं। आपसी प्यार और विश्वास तो मानो पता नहीं कहॉं खोते जा रहे हैं।
     ‌   जिन्दगी ने हमें बहुत अनुभवी बना दिया है। हम आवश्यकता से अधिक सीखकर बुद्धिमान हो गए हैं। अब हम इतने बड़े होते जा रहे हैं कि बाकी सब लोग हमें बौने दिखाई देने लगे हैं। किसी दूसरे के कष्ट को देखकर हमारा मन बिल्कुल नहीं पसीजता। हम हाथ बढ़ाकर किसी भी ‌व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहते। हम लोग दूसरों को परेशान देखकर अपनी ऑंखें मूॅंद लेते हैं। हमें सिर्फ और सिर्फ अपनी समस्याएँ दिखाई देती हैं। 
          हम लोगों पर आज केवल स्वार्थ हावी होता जा रहा है जो बहुत ही गलत है। न तो हमें अपने दोस्तों में कोई दिलचस्पी है और न ही अपने भाई-बन्धुओं में। जिससे हमारे स्वार्थ पूरे होते हैं वही हमें अपना-सा प्रतीत होता है। स्वार्थ पूरे होने के बाद सबके रास्ते अलग हो जाते हैं। लोग मिलने पर नजरें चुराकर या कन्नी काटकर निकली जाते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो वे एक-दूसरे को पहचानते ही नहीं हैं।
        अपने हृदयों को थोड़ा विशाल बनाकर और सकारात्मक रूख अपनाकर हम इस संसार को अपना बना सकते हैं। इस जीवन यात्रा में हमें बहुत से हमसफर मिलते हैं। उनके साथ यदि कदम मिलाकर चलने की मानसिकता हम बना लें तो तभी बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। हम सब लोग मिलकर ही सम्बन्धों में परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

इक्कीसवीं सदी का यह युग टेक्नोलॉजी का है। बच्चे और युवा इस तकनीक का सफलतापूर्वक भरपूर प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। आज हर छोटे-बड़े ऑफिस में हम कर्मचारियों को कम्प्यूटर और लेपटाप पर काम करते हुए देख सकते हैं। बैंक भी आनलाइन हो गए हैं। उनकी एप्लिकेशन डाउनलोड करके बिना समय गॅंवाए शीघ्रता से हम ट्रांजेक्शन कर सकते हैं। आजकल यूपीआई आदि से पैसों का लेन-देन प्रायः सभी लोग करते हुए दिखाई देते हैं।
         छोटे-छोटे बच्चे भी आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और आईपेड का प्रयोग सुविधा से करते हैं। बच्चों को इन उपकरणों पर सहजता से कार्य करते हुए देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। बच्चों की अंगुलियॉं इन उपकरणों पर बहुत तेजी से भागती हुई सी दिखाई देती हैं। बच्चे अपने मन पसन्द प्रोग्राम बिना किसी की सहायता के स्वयं ही देख लेते हैं। उनके ज्ञानवर्धक बहुत से प्रोग्राम मोबाइल आदि में मिल जाते हैं। उनके विद्यालय के प्रोजेक्ट्स भी इनकी सहायता से बनाए जाते हैं। बच्चों की आधी पढ़ाई तो इन्हीं उपकरणों के माध्यम से हो जाती है।
        प्रायः आयुप्राप्त होते लोगों से भी मिलना होता रहता है। वे स्वयं को जब इस तकनीक के प्रयोग के लिए मिसफिट समझ लेते हैं तो मन को कष्ट होता है। सारी आयु नित नूतन प्रयोग करने वालों से ऐसी सोच की आशा वास्तव में बहुत निराश करने वाली होती है। 
          मोबाइल फोन अपनी जेब में रखकर जब लोग कहते हैं कि हमें तो बस फोन मिलाना और किसी से बात करने के अलावा कुछ नहीं आता तब झटका-सा लगता है। न वे फोन में कोई नम्बर फीड कर सकते हैं और न ही मैसेज तक कर सकते हैं। फेसबुक और वाट्सअप या अन्य एप्लीकेशन की जानकारी होना उनके लिए मानो बहुत दूर की कौड़ी होती है। यद्यपि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। घर में रहने वाले युवाओं और बच्चों का यह दायित्व बनता है कि अपने बुजुर्गों को इस नई टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दें।
          रिटायर होने के बाद सभी बुजुर्गों को समय व्यतीत करने की समस्या होने लगती है। उसका कारण है कि वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते हुए उनका शरीर अशक्त होने लगता है। इसलिए वे भागदौड़ करने वाले काम नहीं कर पाते। सभी लोगों के पास कुछ करने के लिए काम नहीं होता। तभी वे प्रायः खाली बैठे रहते हैं। बच्चे अपने कामों में व्यस्त रहते हैं, उनके पास बुजुर्गों के पास बैठने के लिए सीमित समय निकल पाता है। स्वयं को अपेक्षित समझने के कारण वे हर समय अनमने और चिड़चिड़े से रहने लगते हैं।
        इस तरह की परेशानियों से अपने घर के बुजुर्गों को मोबाइल का उपहार देकर उन्हें व्यस्त रहने का अवसर दें। उन्हें फेसबुक और वाट्सअप आदि चलाना भी सिखाएँ। वे जब इस नई तकनीक का सही ढंग से प्रयोग करना सीख जाएँगे तो उनका मन भी लगा रहेगा। उन्हें घर बैठे काम करने की जानकारी समझानी चाहिए।
        उन्हें सिखा देना चाहिए कि वे पोस्ट पढ़ें, उन पर कमेण्ट करे, मन करे तो कुछ लिखकर पोस्ट कर दें, कभी चाहें तो फोटो भी लोड कर सकते हैं। उन्हें अपने मित्रों के साथ चैट करना भी सीखा सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका काफी समय व्यतीत हो जाएगा। जब वे इस प्रकार व्यस्त हो जाएँगे तो उनकी समय बिताने की समस्या का समाधान हो जाएगा। वे खुश रहेंगे तो घर की शान्ति भी बनी रहेगी। 
        अपने बुजुर्गों या माता-पिता को यह अवश्य बता दें कि फेसबुक मित्रता का अखाड़ा नहीं है अपितु उसका उपयोग रचनात्मक होना चाहिए। यदि कोई अवांछित पोस्ट करे अथवा कोई पसन्द न आए तो उसे ब्लॉक करना अथवा अनफ्रैण्ड करना भी सिखाएँ। 
        जिस भी विषय में उनकी जानकारी है अथवा अपने जीवनभर प्राप्त अनुभवों को सबके साथ साझा कर सकते हैं। लाइक वाले बटन पर वे क्लिक करके अपनी सहमति दर्ज कर सकते हैं। यह बात उन्हें समझानी भी आवश्यक है कि यदि वहाँ उनकी पोस्ट पर लाइक न भी आ सकें तो निराश न होकर अपने अनुभवों को साझा करते रहें। यह ऐसा माध्यम है जहाँ सभी लोग निस्सकोच अपने मन की बात या सुख-दुख भी शेयर करके अपने दिल का बोझ कम कर सकते हैं। इस माध्यम से लाभ-हानि की अपेक्षा करना उचित नहीं हो सकता।
        युवाओं को चाहिए कि जहाँ भी उन्हें कोई कठिनाई आए तो उनके पास बैठकर तसल्ली से उसके निवारण का उपाय बताएँ। उनकी व्यस्तता के इस बहाने की सराहना करते रहें, इससे उनका उत्साह बना रहेगा। प्रयास करिए कि वे इस नई तकनीक से बोर न हों बल्कि उसमें अपना मन लगाए रहें। यदि बुजुर्ग अपने फालतू समय का सदुपयोग इस तरह करेंगे तो प्रसन्न रहेंगे और आप स्वयं भी उनकी ओर से निश्चिन्त हो जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 जुलाई 2026

मनुष्य का ‌क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना अति आवश्यक है। कोई कुछ भी कहे या अहित कर दे तो भी उसके कृत्यों को अपने दिल से लगाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। अनावश्यक रूप से पिष्टपेषण करते रहने से अपने मन में उस व्यक्ति के लिए नफरत की भावना बढ़ने लगती है। उसका बिगाड़ तो समय पर होगा किन्तु अपना ही मन अनावश्यक ही ‌कलुषित हो जाएगा और उसमें ईर्ष्या-क्रोध आदि की अधिकता हो जाती है। इस कारण मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है।
          प्रतिकार करने से किसी का भला नहीं होता। किसी को माफ कर देने से बड़ा और कोई गुण नहीं होता। जितने भी महापुरुष इस भारतभूमि पर हुए हैं उन सबने इसे अस्त्र के रूप में अपनाया। तभी उन सबको हम याद करते हैं।
        यह भी सच है कि दूसरों को क्षमा करने वालों को लोग बहुधा कायर समझ लेते हैं। यह क्षमा दूसरों के हृदयों में अपना स्थान बनाने का ब्रह्मास्त्र है जिसका सन्धान करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। यह क्षमा रूपी गुण सज्जनों का अमूल्य आभूषण होता है।
              राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक प्रसिद्ध कविता है 'शक्ति और क्षमा' उसकी निम्न पंक्ति का अर्थ है कि क्षमा उसी व्यक्ति को शोभा देती है, जो शक्तिशाली हो -
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।।
अर्थात् कवि का कथन है कि शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी कमजोर व्यक्ति को क्षमा कर दे तो उसकी उदारता और महानता दिखाई देती है। सर्प का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक विषैले और शक्तिशाली सॉंप में यदि डसने की क्षमता या उसके पास विष हो और फिर भी वह किसी को न काटे तो उसका यह संयम महान माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कवि का मुख्य सन्देश यही है कि दया, त्याग और क्षमा जैसे गुण तभी सार्थक और प्रभावशाली बन सकते हैं जब एक व्यक्ति भीतर से शक्तिशाली और समर्थ हो।
          राजा रंजीत सिंह के जीवन की एक घटना की चर्चा करते हैं। उनकी एक आँख नहीं थी। एक बार वे अपने सिपाहियों के साथ शहर की व्यवस्था देखने के लिए भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में एक बाग में थोड़ी देर विश्राम करने के लिए रुके।
        तभी कहीं से एक पत्थर आकर उन्हें लगा। सिपाहियों को बहुत क्रोध आ गया और पत्थर मारने वाले बालक को पकड़कर वे राजा के सामने ले आए। राजा ने कड़ककर उससे पत्थर मारने का कारण पूछा, "बच्चे तुमने पत्थर क्यों मारा?"
          उस बालक ने बड़ी निडरता से उत्तर दिया, "महाराज, वह फल तोड़ने के लिए वृक्ष पर पत्थर मारा था। मेरी कोई गलती नहीं है कि वह पत्थर आपको लग गया।"
          बालक के इस निर्भीक उत्तर को सुनकर राजा ने सिपाहियों को आदेश देते हुए कहा, "इस बालक को मेरी ओर से एक पुरस्कार दिया जाए।"
          वे सभी सिपाही राजा के इस निर्णय को सुनकर हैरान हो गए।
          तब राजा रंजीत सिंह ने उनसे कहा, "वृक्ष को पत्थर मारो तो वह फल देता हैं और मैं राजा होकर यानी इन्सान होकर भी इस बालक को पुरस्कार नहीं दे सकता। समर्थ होकर भी क्या मैं इतना गया गुजरा हूँ कि फल पाने की आस से पेड़ पर पत्थर मारने वाले को वह फल देता है और मैं इस बालक को निराश करूँ।"
          ऐसी होती हैं महान् लोगों की बातें जिन्हें युगों तक याद किया जाता है। इसीलिए कहा है कि क्षमा से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं होता। सामने वाला व्यक्ति बिना मोल अपना बन जाता है। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन दूसरों को क्षमा कर देने से अपना मन कलुषित नहीं होता। दिल पर से बोझ उतर जाता है और हृदय सदा प्रसन्न रहता है।
          कुछ लोगों का मानना है कि दुर्बल व्यक्ति की क्षमा कोई मायने नहीं रखती। वह क्षमा नहीं करेगा तो क्या करेगा? इसके लिए वे कहते हैं कि क्षमा उसे सुशोभित करती है जिसके पास दूसरे को दण्ड देने की सामर्थ्य हो। मेरे विचार से यह कहना अनुचित है क्योंकि क्षमा करने का गुण उसी में होगा जिसमें आत्मिक व मानसिक बल होगा। 
          शारीरिक दुर्बलता की बात करना बेमायने हो जाती है। यदि शरीर से व्यक्ति दुबला-पतला हो किन्तु उसमें आत्मिक बल हो तो वह संसार की किसी शक्ति से नहीं डरता। सबका डटकर मुकाबला करता है व हर चुनौती से भिड़ने की सामर्थ्य रखता है। शरीर से कमजोर होने पर महात्मा गान्धी की तरह व्यक्ति अपने व्यवहार से सिद्ध कर सकता है कि वह अच्छे अच्छों की हवा टाइट करके उन्हें उखाड़कर फैंक सकता है।
          क्षमा को अपनाने वाला व्यक्ति हमेशा प्रथम पंक्ति में रहता है। ऐसे सज्जन की चाहे कोई बुराई कर ले परन्तु उसका यह एक गुण सब पर भारी पड़ता है। ईश्वर को भी विनयी और क्षमाशील लोग पसन्द आते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

बगुला भगत

बगुला भगत 

'बगुला भगत' एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है - कपटी व्यक्ति, झूठा इन्सान, ढोंगी मनुष्य, पाखण्डी आदमी, धूर्त या चालाक व्यक्ति। इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो बाहर से बहुत सीधे-सादे, धार्मिक और सज्जन दिखाई देते हैं परन्तु असल में वे बहुत चालाक, दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के होते हैं। बगुला भक्तों के लिए हमें प्रायः यह उक्ति सुनने को मिलती है-
              मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
        बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इन्सान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? 
         वास्तव में 'बगुला भगत' यह शब्द बगुला (पक्षी) के स्वभाव से लिया गया है। कहते हैं कि जब बगुला मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। 
          दूसरे शब्दों में बगुला पानी में एक टाँग पर खड़ा होकर ऐसा ध्यान लगाता है जैसे कोई बहुत बड़ा तपस्वी हो लेकिन मौका मिलते ही वह झट से मछली पर झपट्टा मार देता है। उन्हें अपना शिकार बना लेता है। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकतीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगती हैं। अब बगुले की तो मौज हो जाती है। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
         मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। केवल जौहरी ही स्वयं उसका मूल्य लगा सकता है।
          जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय वे ही भयभीत रहते हैं।
         कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
अर्थात् जिस प्रकार का अन्न मनुष्य खाता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। इसलिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का सभी दुरूपयोग ही करते हैं।
        मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम पर लाखों रुपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
         पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
          कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। उनका यह जप-तप सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं-     
    अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है, उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
         अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से सदा बचकर रहना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर मनुष्य सारे आडम्बर कर रहा है, वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर यदि डरकर अपनी ऑंखें बन्द कर लेता है तो बिल्ली वहॉं से भाग नहीं जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत  दुष्कर्मों का फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर वह कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है। अतः बगुला भक्त न बनकर मनुष्य को प्रभु का सच्चा भक्त बनना चाहिए।