शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान

हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान

हर व्यक्ति की इस संसार में अपनी एक पहचान होती है। जीव का जन्म इस धरा पर उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार होता है। इसलिए हर व्यक्ति दूसरे से अलग होता है। उसी के अनुरूप उसका व्यवहार तथा चरित्र होता है। मनुष्य का जैसा चरित्र होता है, उसके मित्र भी वैसे ही होते हैं। यानी मनुष्य अपने चरित्र और आचार-व्यवहार के अनुसार ही अपने मित्रों का चयन कर लेता है।
         दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सज्जन व्यक्ति को सज्जन लोग मिल जाते हैं और दुर्जन को दुर्जन का साथ मिल जाता है। नेता को अपने साथी नेता और अभिनेता को अभिनेता मिल जाते हैं। चोर को चोरी करने वाले बन्धुओं का साथ मिल जाता है। भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचार करने वाले मिल जाते हैं। रिश्वतखोर व्यक्ति रिश्वत लेने वाले लोगों का ग्रुप बना लेता है। इसी प्रकार धोखेबाज को धोखा देने वाले मित्र मिल जाते हैं। व्यवसायी को व्यवसाय करने वाले, नौकरी करने वाले को नौकरी करने लोग वाले मिल जाते हैं।
          कहने का मात्र इतना ही अर्थ है कि इस संसार में अरबों-खरबों लोग विद्यमान हैं। वे सभी भिन्न-भिन्न प्रकृति के या आचार-विचार के होते हैं। मनुष्य अपने आचार-व्यवहार के अनुरूप ही अपने मित्रों का चुनाव कर लेता है। जैसा वह स्वयं होता है वैसे ही उसके संगी-साथी बन जाते हैं। अपने उन साथियों की संगति से ही वह समाज में पहचाना जाता है। 
         हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष पहचान उसके अच्छे या बुरे कर्मों, विचारों और व्यवहार से बनती है। मनुष्य के महंगे कपड़ों या बाहरी रूप-रंग से उसकी पहचान नहीं बनती बल्कि उसके अच्छे संस्कारों और कार्यों से होती है। व्यक्ति की सोच और उसकी नीयत समाज में उसका वास्तविक स्थान तय करती है। सच्चा मनुष्य वही होता है जो अपने पैरों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भरता के साथ अपना जीवन जीता है।
          शुद्धता या पवित्रता सदा मनुष्य के विचारों में परखी जा सकती है। यदि वह सहृदय व परोपकारी है तो उसके व्यवहार से स्वयं ही ये सद् गुण प्रकट हो जाते हैं। वह जहाँ भी रहेगा जनहित के कार्य ही करेगा। दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करता रहेगा। वह दिन-रात की परवाह किए बिना ही समाप्त में परहित के कार्यों को करने में व्यस्त रहता है।
         इसके विपरीत यदि वह स्वार्थी, कठोर अथवा असहिष्णु होगा तो अपने व्यवहार से उन अवगुणों को समय-समय पर प्रकट करता रहेगा। यही अवगुण उसकी पहचान बन जाते हैं। यानी लोग कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति बड़ा क्रोधी है या लालची है अथवा स्वार्थी है इत्यादि। गाहेबगाहे उसके ये दुर्गुण सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं और उसके तिरस्कार का कारण बनते हैं। 
          मनुष्य को अपने आचरण से किसी को ऐसा सोचने पर विवश नहीं करने देना चाहिए कि वह है तो फूलों की तरह सुगन्ध फैलाने वाला पर अवगुण रूपी कीट उसे घुन की तरह खोखला कर रहा है। उसे ज्ञात ही नहीं हो पाता कि वह विनाश की ओर कब झुक गया? 
          ऐसा होना असम्भव-सा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति विशेष है तो बहुत गुणवान पर उसके साथी दुष्प्रवृत्ति वाले लोग हैं। हाँ, अपवाद स्वरूप कोई ऐसा हीरा मिल जाए पर यह स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। प्रायः होता यही है कि दुर्जन अपने सम्पर्क में आने वाले सभी को अपने जैसा ही बना लेते हैँ। वे अपने व्यवहार से इतने लालच और आकर्षक उन्हें दिखाते हैं कि न चाहते हुए भी लोग उनके चंगुल में फँस जाते हैं।
          यह सर्वथा सत्य है कि महापुरुष कुमार्गगामी व्यक्तियों को अपने सुचरित्र से ऐसे लोगों को दुष्कर्म करने से विमुख करके सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं और उनका कायाकल्प कर देते हैं। महर्षि वाल्मीकि और अगुलीमाल डाकू सहित अनेक महापुरुषों के उदाहरणों से इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं। बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
          वैसे देखा जाए तो हीरा कोयले की खदान में पाया जाता हैं। हीरे को लोग अपने सिर के ताज मे जड़ते हैं, उससे बने आभूषण पहनकर इतराते हैं।उपयोग करने के उपरान्त उसे सम्हालकर रखते हैं जबकि कोयले को जलाने के काम में लाते हैं। यही अन्तर सज्जनों और दुर्जनों के साथ किए जाने वाले व्यवहार में  स्पष्ट देखा जा सकता है।
        मनीषी कहते हैं जिस प्रकार हर नर में नारायण विद्यमान रहता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में सद् गुणों का भण्डार भी रहता है। उसे उन गुणों को यूँ ही बुराइयों में परिवर्तित नहीं करना चाहिए। यह मनुष्य का परम सौभाग्य होता है कि उसके सिर पर मालिक का वरद हस्त सदा बना रहता है, बस उसे स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। ईश्वर कहता है कि मैं हमेशा आप सबके साथ हूँ। इसलिए मनुष्य को सदा ही सावधान रहना चाहिए। उसे बुराई के रास्ते को छोड़कर अच्छाई के मार्ग को यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

बिनमॉंगे परामर्श न दें

बिनमाँगे परामर्श न दें 

मनुष्य को बिनमाँगे किसी को परामर्श नहीं देना चाहिए अथवा कभी भी अनावश्यक रूप से किसी के कार्य में दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए। जन साधारण की आम भाषा में इसे कहते हैं -
            किसी के फटे में टाँग अड़ाना 
यदि मनुष्य ऐसा करता है तो उसे अपनी अवमानना के लिए तैयार हो जाना चाहिए। मनीषी सदैव हमें समझाते हुए कहते हैं - 
        अपनी इज्जत अपने आप हाथ में होती है। 
       मनुष्य को जहाँ ऐसा प्रतीत हो कि उसकी वहाँ जरूरत नहीं है तो बिना कुछ कहे अथवा बिना कोई विशेष टीका-टिप्पणी किए हुए उसे स्वयं को चुपचाप वहाँ से अलग कर लेना चाहिए। बुद्धिमानी यही कहलाती है कि मनुष्य समय और परिस्थिति को पहचानकर उसके अनुसार ही सबके साथ यथोचित व्यवहार करे।
         बिनमॉंगे सलाह या परामर्श न देना एक बहुत ही समझदारी की और सम्मानजनक आदत है।
मनुष्य जब बिना पूछे किसी को सलाह नहीं देता तो लोग उसकी बातों और विचारों की कीमत समझते हैं। लोग प्रायः बिनमॉंगे दी गई सलाह को सुनना ही नहीं चाहते। वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं या फिर गम्भीरता से नहीं लेते। जब सामने वाला खुद अपनी इच्छा से सलाह मॉंगता है तब वह व्यक्ति की बात का पूरा सम्मान करता है। 
          जरूरत पड़ने पर लोग गधे को भी बाप बना लेते हैं परन्तु स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर दुल्लती मारकर किनारे भी हो जाते हैं। उसके बाद वे उस सहायता करने वाले को पहचानने तक से भी इन्कार कर देते हैं। सामने पड़ जाने पर वे कन्नी काटकर निकली जाते हैं। निस्सन्देह यह मनुष्य की चरित्रगत विशेषता को प्रकट करता है।
        इन्हीं भावों को रहीमदास जी ने निम्न दोहे में एक उदाहरण के साथ बड़े ही सुन्दर शब्दों में स्पष्ट किया है-
        काज पड़े कछु और हैं काज सरे कछु और।
        रहिमन भँवरी के भये नदी सिरावत मौर।।
अर्थात् जब मनुष्य को किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है तब उसका व्यवहार अलग होता है और स्वार्थ पूर्ण हो जाने पर उसके तेवर ही बदल जाते हैं। जैसे विवाह के समय आवश्यकता होने पर मुकुट को दूल्हे के सिर पर सजाया जाता है और फिर जब फेरे हो जाते हैं तो उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।
          इसी प्रकार जिन सोने, चाँदी और हीरे के आभूषणों से लोग श्रृंगार करके पार्टियों में वाहवाही लूटते हैं, उन्हीं को वापिस लौटकर उतार देते हैँ। फिर उन्हें तिजोरी में अथवा बैंक के लाकर में बन्द करके रख देते है। यानी आवश्यकता पूरी हो जाने के बाद उनको किनारे करके तिजोरी या लाकर में बन्द कर दिया जाता है। इसे ही इन्सानी फितरत कहते हैं, जिसकी हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं।
          यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि समय और समझ दोनों ही एक साथ भाग्यशाली लोगों के हिस्से में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब समझदारी दिखाने का समय आता है तो उस समय मनुष्य चूक जाता है। घबराहट के मारे उसके हाथ-पैर फूलने लग जाते हैं। वह अपने बचाव में न कुछ कह पाता है और न ही अपने विवेक पर भरोसा कर पाता है। वह मानो असहाय-सा अनुभव करने लगता है।
          जब समय निकल जाता है तब वह समझदार बन जाता है। अपने मन ही में सोचने लगता है कि काश उसने उस समय यह, यह सब कह दिया होता तो वह बच जाता। उसकी हेठी होने से बच जाती। यह तो वही बात हुई- 
  अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।      
                          अथवा 
               का वर्षा जब कृषि सुखाने।
        जब कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ जाता है तो मनुष्य को तुरन्त ही उत्तर देना चाहिए। स्वीकारोक्ति सूचक हाँ या नकारात्मक न जैसे शब्दों का उपयुक्त समय पर उपयोग करने में दुविधा नहीं होनी चाहिए। ये दोनों शब्द छोटे होते हैं पर बड़े ही खोटे होते हैं। जरा-सी लापरवाही हो जाने पर ये उसे मुसीबत में डालने से जरा भी परहेज नहीं करते।
        यदि इन शब्दों का प्रयोग उपयुक्त समय पर न किया जाए तो मनुष्य को बहुत ही हानि उठानी पड़ सकती है। बहुत सोच-समझकर इनका प्रयोग करना चाहिए। जल्दबाजी में न कहकर और समय से चूक जाने पर हाँ बोलने पर मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ हार जाता है। इनका दूरगामी परिणाम कभी-कभी उसकी काया कल्प भी कर देता है।
          इसलिए समय का सही उपयोग करते हुए मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिए। दूसरों को अनावश्यक परामर्श देने के स्थान पर उसे अपने पर इस जीवन की पहेलियों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जब तक अच्छी तरह से तसल्ली न हो जाए उसे न तो अपनी स्वीकृति देनी चाहिए और न ही इन्कार करना चाहिए। अपने विवेक पर विश्वास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 23 सितंबर 2026

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

सज्जनों की कड़ी परीक्षा लेता परमात्मा

परमात्मा सज्जनों की, अपने भक्तों की बहुत कड़ी परीक्षा लेता है किन्तु उनका साथ कभी नहीं छोड़ता। भगवान परीक्षा अवश्य लेते हैं पर सीमा से बाहर नहीं। हमारी सीमा वहीं तक होती है, जहाँ तक हमारा विश्वास टूटता है। ईश्वर उस विश्वास को मजबूत करने के लिए हमें कसौटी पर कसते हैं।
          भारतीय संस्कृति के अनुसार भगवान किसी भी जीव की क्षमता से अधिक परीक्षा नहीं लेते। गीता में स्पष्ट संकेत मिलता है कि ईश्वर मनुष्य को उसके कर्म, संस्कार और सामर्थ्य के अनुसार ही परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। यदि परीक्षा कठिन लगती है तो वह हमारी दृष्टि का दोष होता है, ईश्वर की योजना का कदापि नहीं होता।
           विद्यालय या कालेज में जब भी विद्यार्थियों की परीक्षा ली जाती है तो उसका अर्थ यही होता है कि विद्यार्थी उस परीक्षा में सफल होकर अगली परीक्षा के लिए तैयार हो रहा है। स्कूल की परीक्षाओं में सफल होने के पश्चात कालेज की परीक्षाओं से उसे गुजरना पड़ता है। उसके बाद नौकरी पाने की परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती है। फिर जीवन की भागदौड़ में आयुपर्यन्त उसे एक के बाद एक समस्याओं से जूझना पड़ता है, उसे उनसे छुटकारा नहीं मिलता।
        इसी तरह जीवन की इन परीक्षाओं का क्रम निरन्तर चलता रहता है। मनुष्य एक परीक्षा में सफल होता है तो फिर एक नई परीक्षा उसकी प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाए तैयार बैठी होती है। उसे जीवन भर इनसे दो-चार होते रहना होता है और फिर निश्चित ही सफल भी होना होता है।    
        इसीलिए इस जीवन को युद्धभूमि कहा जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य बस कभी स्वयं से तो कभी अपनी परिस्थितियों से अनवरत संग्राम करता ही रहता है। शायद मानव जीवन की यही त्रासदी कहलाती है।
          बार-बार इन परीक्षाओं में उलझने का कारण है कि वह मालिक मनुष्य को सोने की तरह खरा बनाना चाहता है। जैसे सोने को शुद्ध करने के लिए उसे अग्नि में तपाया जाता है, उसी प्रकार ईश्वर अपने भक्त को दोषमुक्त तथा शुद्ध-पवित्र बनाने के लिए कठिन परीक्षाओं में डालता है यानी कष्टों और परेशानियों की अग्नि में तपाता है। ताकि वह कुन्दन की तरह निखरकर सबके समक्ष आ सके।
        यह शुद्धता केवल मात्र शरीर या मन की नहीं होती बल्कि मन, वचन और कर्म तीनों प्रकार की होती है। ईश्वर चाहता है कि उसका प्रियजन जो भी विचार अपने मन में करे, वैसा ही अपनी वाणी से बोले और फिर उसी के अनुसार आचरण भी करे। इन तीनों से वह अलग-अलग न रहे।
          मनुष्य मन में कुछ और सोचे तथा वाणी से कुछ अलग बोले और आचरण सर्वथा विपरीत करे तो यह उसके व्यवहार की कुटिलता होती है, सरलता या सहजता नहीं कहलाती। जब तक मन, वचन और कर्म से वह एक नहीं होगा तब तक उसके कथन का स्थायी प्रभाव दूसरे लोगों पर नहीं पड़ सकता। यह बात उस मालिक को बिल्कुल पसन्द नहीं है।
        दुखों और परेशानियों की भट्टी में तपकर मनुष्य जब खरे सोने की तरह विशुद्ध और चमकदार बन जाता है। तब इस खरे सोने को वह मालिक फिर वैसे ही अपने पास सम्हालकर रख लेता है जैसे अपने स्वर्णाभूषणों को हम तिजोरी में, बैंक के लाकर आदि में सुरक्षित रख देते हैं।
          इसके विपरीत दुर्जनों को भगवान देता तो बहुत कुछ है परन्तु उन्हें अपना साथ नहीं देता। अर्थात् वह उन्हें अपने से विमुख कर देता है। उनके मन में रहता हुआ, उन्हें चेतावनी देता हुआ भी उनकी पहुँच से दूर हो जाता है। उस समय उन दुर्जनों की पूजा-अर्चना, दान आदि सब मात्र प्रदर्शन के लिए ही रह जाते हैं क्योंकि उस प्रभु को दूसरों को कष्ट देने वाले, मारकाट, चोरी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी आदि अनैतिक कार्य करने वालों की तथाकथित भक्ति नहीं चाहिए होती।
          वे जब तक अपने सभी कुकृत्यों को त्यागकर सहृदय, परोपकारी, दयालु नहीं बन जाते तब तक वह दर्शक की तरह बना रहता है। वह मालिक तब तक उनका हाथ नहीं थामता जब तक वे अपने सच्चे मन से प्रायश्चित नहीं करते। 
        सज्जनों की महानता कर्मठता, सहृदयता, दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव ही उन्हें दुर्जनों से अलग बनाते हैं। यही कारण है कि वे जन साधारण में लोकप्रिय बन जाते हैं। समाज उन्हें हृदय से सच्चा हितैषी व मार्गदर्शक स्वीकार करता है। दुष्ट सबकी आँखों की किरकिरी बनते हैं। मजबूरी में उनके साथ कोई सम्बन्ध रख सकता है पर मन से उनके साथ जुड़ाव नहीं कर पाते। उनके मुँह के सामने वे डर के मारे कुछ न कह पाएँ पर पीठ पीछे सदा उनकी अवमानना ही करते हैं।
         मनुष्य को स्वयं ही यह निश्चित करना होता है कि वह ईश्वर का कृपा पात्र बनना चाहता है अथवा मालिक से दूरी बनकर अपयश की भागीदार बनना चाहता है। निश्चित ही उसे उसी के अनुरूप परमेश्वर की परीक्षाओं में सफल होकर उसका प्रिय भक्त बनना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

शक्ति अथवा कमजोरी गले की हड्डी नहीं

संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे हम पूर्ण कह सकें क्योंकि उसमें अच्छाई और बुराई दोनों का ही समावेश होता है। इसीलिए कभी वह गलतियाँ या अपराध कर बैठता है तो कभी महान कार्य करके अमर हो जाता है। यानी कि उसमें हमेशा स्थायित्व की कमी रहती है। यदि वह पूर्ण हो जाए तो भगवान ही बन जाएगा तथा ईश्वर कहलाने लगेगा। 
          केवल और केवल वह परमपिता परमात्मा ही इस जगत में पूर्ण है। इसीलिए उसकी यह सृष्टि भी पूर्ण है। उसमें से कोई कमी नहीं निकाली जा सकती। वह मालिक सभी भौतिक गुण-दोषों से परे है। उसमें किसी प्रकार की कोई कलुषता नहीं हो ही सकती। इसीलिए हम सब उसे पूर्णब्रह्म कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करके सदा ही उससे कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं। परमात्मा के विषय में निम्न प्रसिद्ध शान्ति मन्त्र 'ईशोपनिषद्' और 'बृहदारण्यकोपनिषद्' से लिया गया है। मन्त्र कहता है-
       ऊॅं पूर्णमिद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदुच्यते।   
       पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
अर्थात् वह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
         हम कह सकते हैं कि वह जो दिखाई नहीं देता है पर वह पूर्ण है। वह दृश्यमान जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण है। क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण से उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए तब भी पूर्ण ही शेष बचता है।
        यह पूर्णता कहलाती है जहाँ अपूर्ण होने का कोई भाव ही नहीं है। सब तरह से हमें उसकी पूर्णता का साक्षात्कार होता है। उसमें से कुछ ले भी लिया जाए तब भी सागर के जल की तरह वह सदा पूर्ण ही रहता है।
        यह सर्वथा सत्य है कि इन्सान पूर्ण नहीं हो सकता पर पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास अवश्य कर सकता है। इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हर मनुष्य की अपनी एक शक्ति होती है और उसी प्रकार उसकी कोई-न-कोई कमजोरी भी होती है। उसी के आधार पर समाज में उसकी एक निश्चित पहचान बन जाती है।
          इस असार संसार के किसी मनुष्य के पास धन का बल होता है, किसी अन्य व्यक्ति के पास विद्या का बल होता है, दूसरे किसी के पास सत्ता का बल होता है और कुछेक के पास शारीरिक बल होता है। कुछ ऐसे सन्त प्रकृति के लोग भी होते हैं जिनके पास आत्मिक शक्ति होती है। इन सबके अतिरिक्त वे लोग होते हैं जो अपने घमण्ड में सदा ही चूर रहते हैं। वे उसे ही अपनी शक्ति मानकर इतराते रहते हैं।
         बल या शक्ति की ही भाँति हर मनुष्य की अपनी-अपनी कमजोरी भी होती है। शारीरिक बल या आत्मिक बल अथवा मानसिक बल किसी की भी कमी मनुष्य में हो सकती है। इनके अतिरिक्त धन, विद्या, अनुभव जन्य ज्ञान, अनुशासन में से किसी एक की भी कमी उसकी कमजोरी बन जाती है। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-सी मनुष्य की कमजोरियाँ हो सकती हैं यथा पानी को देखकर डरना, ऊँचाई से घबराहट, अग्नि से भय, किसी पशु विशेष से डर जाना, कहीं भी भीड़ को देखकर परेशान हो जाना आदि।    
          समझदार मनुष्य वही है जो अपनी ताकत या शक्तियों का अनावश्यक प्रदर्शन न करे। जिससे लोग उसकी ताकत का दुरूपयोग करने के लिए उसे उकसाने न लग जाएँ। यदि मनुष्य उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों के झाँसे में आ गया तो उसका विनाश निश्चित समझ लीजिए। इसका कारण है कि अपनी चाटुकारिता होती देखकर वह जीवन की वास्तविकता से विमुख होने लगता है। वह उसे ही सच्चाई मान लेता है।
        अपनी कमजोरियों को भी दूसरों के सामने प्रकट न होने दे जिससे किसी को उसका उपहास उड़ाने का अवसर न मिल सके। इससे उसका मनोबल कमजोर नहीं पड़ेगा।
        जिस प्रकार मछली पेड़ पर नहीं चढ़ सकती और पशु, पक्षी या इन्सान पानी में अपना घरौंदा नहीं बना सकते। सबके लिए उपयुक्त स्थान निश्चित हैं। उसी प्रकार मनुष्य की शक्ति अथवा कमजोरी उसके गले की हड्डी नहीं बनने चाहिए। उसे अपनी शक्ति का उपयोग देश, धर्म, परिवार, समाज की भलाई के लिए करना चाहिए। इसी तरह अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके चमत्कार करने उसे निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्र प्रभा 

सोमवार, 21 सितंबर 2026

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन

दबाव अथवा प्रैशर आधुनिक भौतिक युग की देन है। आज सभी लोग भागमभाग की जिन्दगी जी रहे हैं। दूसरों की देखादेखी हर व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा के अधिक-से-अधिक साधन जुटाना चाहता है। उसके लिए बहुत सारे पैसों की आवश्यकता होती है। इस धन को कमाने के लिए दिन-रात एक करता हुआ वह कोल्हू के बैल की तरह जुता रहता है। 
        बच्चे, युवा, बड़े-बुजुर्ग प्रायः सभी लोग किसी-न-किसी दबाव में रहते हैं। बच्चों के सिर पर पढ़ाई का और फिर कैरियर बनाने का दबाव रहता है। समय की माँग के कारण माता-पिता उनके परीक्षा परिणाम में अच्छे अंक लाने के लिए उन पर दबाव बनाए रहते हैं। यदि कहीं कमी रह जाए तो उनका भविष्य प्रभावित हो जाता है। यही कारण है कि बच्चों का बचपन मानो आज कहीं खो सा गया है।
        युवाओं के समक्ष अपने भावी जीवन और अच्छी नौकरी मिलने का दबाव होता है। दिनभर इतना दबाव रहता है कि उनके कार्यक्षेत्र में आने-जाने का कोई समय निश्चित नहीं रहता। इसी कारण वे अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों को पूर्ण करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनके पास समय का प्रायः अभाव-सा रहता है। जिसके कारण उनकी सोशल लाइफ सिमटती जा रही है और वे अलग-थलग होते जा रहे हैं।
          अपने दायित्वों को निपटाने और रिटायरमेंट के पश्चात भी बड़े-बुजुर्ग आज के बदलते माहौल के चलते दबाव में रहते हैं। नौकरी के लिए बच्चों के बाहर चले जाने के कारण उनके खानपान, शरीरिक स्वास्थ्य, देखभाल, सुरक्षा, अकेलेपन आदि की समस्या के कारण उन पर मानसिक दबाव बना रहता है।
        कच्ची दाल को पकाने के लिए जब हम प्रैशर कुक्कर में डालकर गैस पर रखते हैं तो प्रैशर से वह पक जाती है। तब वह खाने लायक हो जाती है और हमें पुष्ट करती है।
          यह दबाव परिवर्तन लाता है। वह परिवर्तन कोई अनुभव कर पाता है और किसी को वह महसूस नहीं होता। सबमें इसे अनुभव करने की क्षमता अलग-अलग होती है। इस दबाव से एनर्जी या शक्ति के कारण शारीरिक अथवा मानसिक बदलाव होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी गुणवत्ता यानी क्वालिटी और क्वांटिटी पर निर्भर करता है।
        इस दबाव को सहन करने की क्षमता भी सबकी अलग-अलग होती है। कुछ लोग इसे किसी भी तरह सहन कर लेते हैं। वे अपने दुखों और परेशानियों से स्वयं को बचाकर निकाल लेते हैं। डटकर उनका सामना करते हुए विजयी हो जाते हैं।
          इसके विपरीत कुछ लोग इस दबाव को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे लोग अपने दुखों और परेशानियों से घबरा जाते हैं और कायरतापूर्ण मार्ग अपना लेते हैं। यानी आत्महत्या कर लेते हैं। 
          इन लोगों के विषय में हम प्रतिदिन समाचार पत्रों, टी वी व सोशल मीडिया पर हम पढ़ते व सुनते हैं। इनमें बाढ़, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि के कारण फसल के नष्ट हो जाने पर किसान हो सकते हैं। खराब परीक्षा परिणाम डर से घबराए छात्र हो सकते हैं। व्यापार में हानि अथवा अन्य कारणों से आर्थिक स्थिति के बिगड़ने का बोझ न सहने वाला कोई भी हो सकता है। कुछ लोग अपनी शारीरिक दुरावस्था से घबराकर भी इस मार्ग को अपना लेते हैं।
          कहने का तात्पर्य है कि पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक अथवा राजनैतिक  किसी भी तरह के दबाव को न झेल पाने के कारण नेता, अभिनेता, न्याय व्यवस्था का रक्षक या सामान्य जन कोई भी इस गलत मार्ग को अपनाने वाला हो सकता है।
          आजकल मनुष्य हमेशा ही तनाव में रहता है। उसकी भलाई के लिए कही गई किसी भी बात पर वह अनावश्यक ही भड़क उठता है। वह जाने-अनजाने असहनशील बनता जा रहा है। इस कारण उसका शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। यह दबाव या तनाव बहुत से रोगों को निमन्त्रण देता है। इसीलिए छोटी आयु से ही बच्चे दवाइयों पर निर्भर रहने लगे हैं।
       अनेक बुराइयों की जड़ इस तनाव को अपने सिर पर हावी नहीं होने देना चाहिए। अपने को यथासम्भव शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। दिन में थोड़ा समय निकालकर परिवार के साथ चर्चा करनी चाहिए। अवकाश का दिन बच्चों से मस्ती करनी चाहिए। योग का आश्रय लिया जा सकता है। मेडिटेशन या ध्यान लगाया जा सकता है। इससे दबाव या प्रैशर दूर होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 20 सितंबर 2026

अपनी तुलना किसी से न करें

अपनी तुलना किसी से न करें 

मनुष्य को अपनी तुलना कभी किसी दूसरे से नहीं करनी चाहिए। उसे इस बात को अपने मन में गहरे बिठा लेनी चाहिए कि वह ईश्वर की एक श्रेष्ठ रचना है। इसलिए वह जैसा भी है सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर के हर कार्य में अच्छाई होती है। उसे भी मालिक ने कुछ सोचकर ही इस संसार मे भेजा है। इसलिए उसे कोई विशेष कार्य करना चाहिए।
          उस प्रभु की हर रचना अपने आप में सर्वोत्तम और अद् भुत होती हैं। किसी भी इन्सान में इतनी सामर्थ्य नही है कि उसे समझ सके अथवा उसमें से कोई कमी नहीं निकालकर स्वयं को सर्व शक्तिमान सिद्ध सके। इसलिए अपने में विद्यमान कमियों अथवा आने वाली परेशानियों को देखते हुए सदा ही अपने आप को कोसते रहना उचित नहीं है। उस मालिक पर मनुष्य को पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए।
        यहाँ एक उदाहरण लेते हैं। हम एक बीज बोते हैं और उस छोटे से बीज से एक बहुत बड़ा वृक्ष बन जाता है। यदि जब हम उस बीज को खोलकर देखते हैं तो हमें कुछ भी ऐसा भी नहीं दिखाई देता। उस समय हम समझ ही नहीं पाते कि यह नन्हा-सा बीज महान वृक्ष का कारक बन जाएगा।
        एक छोटे से बीज में इतना बड़ा वट वृक्ष समाया होता है। उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में भी अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। आवश्यकता होती है तो बस उन्हें तलाशने की। अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को पहचानकर उसके अनुसार कार्य करने वाले को जीवन में कभी हार का स्वाद नहीं चखना पड़ता।
       हम अपना स्वयं का ही उदाहरण लेते हैं। हमारे अपने हाथ की पॉंचों अंगुलियॉं बराबर नहीं होती। जब हमारी अपनी अंगुलियों में समानता नहीं होती तो संसार के सभी जीवों की क्षमता एक जैसी कैसे हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती। इसलिए दूसरों को देखकर स्वयं को दोष नहीं देना चाहिए। जितनी अपनी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार कार्य करने चाहिए। दूसरों से तुलना करके अनावश्यक तनाव लेना उचित नहीं होता।
       मनुष्य जब अपनी दूसरों से तुलना करता है तो उस समय वह अपनी मेहनत की खुशी को भी खो देता है। हर व्यक्ति इस दुनिया में विशेष योग्ताऍं लेकर पैदा होता है। उसकी अपनी अलग पहचान होती है। इसी प्रकार हर किसी का जीवन और संघर्ष अलग-अलग होता है। इसलिए किसी और से बराबरी करना व्यर्थ है। 
          मनुष्य को वास्तव में अपनी तुलना केवल अपने बीते हुए कल से करनी चाहिए। दूसरों की नकल करने के स्थान पर उसे अपनी क्षमताओं को पहचानना और निखारना चाहिए। जो कुछ भी उसके पास है, उसकी सराहना करनी चाहिए।
        मनुष्य को यह सोचकर कभी दुखी नहीं होना चाहिए कि उसके पास कुछ नहीं है। उसके पास यह नहीं है या वह नहीं है, सोचने के स्थान पर उसे पुनः पुनः यह मनन करना चाहिए कि सीमित समय के लिए मिले हुए इस मानव जीवन में उसके पास क्या-क्या है? उसे अपने जीवन में क्या-क्या करना चाहिए? क्या वह अपने जीवन में कुछ नए मानकों की स्थापना कर सकता है?
         मनुष्य को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुनिया की कोई भी शक्ति उसे तब तक नहीं हरा सकती जब तक वह स्वयं ही हार न माने। अपना मनोबल उच्च रखते हुए मनुष्य को संसार सागर में छलाँग लगा लेनी चाहिए। यह निश्चित मानिए कि वह इसे पार करने की सामर्थ्य रखता है। चाहे तो सफलता अवश्य ही उसके कदम चूमेगी।
        इसमें कोई दोराय नहीं है कि यदि मनुष्य सही है, उसने कोई गलती नहीं की तो उसे क्रोध नहीं करना चाहिए। अपने बेगुनाह होने की बात को दृढ़तापूर्वक सबके समक्ष रखना चाहिए। 
          इसके विपरीत यदि मनुष्य ने गलती की हैं तो उसे गुस्सा करने का हक बिल्कुल नहीं है। तब तो यह चोरी और सीनाजोरी वाली बात हो जाएगी जिसकी सराहना किसी तरह नहीं की जा सकती। उस समय क्षमा याचना करने से उसे परहेज नहीं करना चाहिए। अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने वाला कभी छोटा नहीं हो जाता बल्कि उसे महत्त्व दिया जाता है।
          घर-परिवार के लोग तथा बन्धु-बान्धव सभी यही चाहते हैं कि उनका प्रियजन अपने जीवनकाल में कुछ अच्छा करे। लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वे कभी नहीं चाहते कि उनका वह प्रियजन उनसे बेहतर करें। जहाँ पर वह उनसे आगे बढ़ने लगता है, सभी उसकी टाँग खींचने में लग जाते हैं। उसे नीचा दिखाकर आत्मतुष्टि करते हैं।
            यदि मनुष्य अपने पूर्व निर्धारित दृष्टिकोण में किञ्चित मात्र परिवर्तन कर ले तो उसका काया कल्प सम्भव हो सकता है। इसलिए हर समय को उपयुक्त समय मानते हुए ही मनुष्य को सदा उत्साह और लग्न से अपने दायित्वों का निर्वहण करते रहना चाहिए।  
चन्द्र प्रभा सूद        

शनिवार, 19 सितंबर 2026

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मक सोच वालों से किनारा करें

नकारात्मकता एक सोच है जो मनुष्य को सबसे अलग-थलग करने में अपनी विशेष भूमिका निभाती है। नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति की पहचान यह है कि उसे हर परिस्थिति में बुराई ही दिखाई देती है। ऐसे लोग लगातार शिकायत करते हैं और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं। 
         नकारात्मक सोच वाले लोग मनुष्य की सकारात्मक ऊर्जा को चूस लेते हैं और आपको हमेशा हताश करते हैं। उनकी लगातार की गई शिकायतें और निराशाजनक बातें सामने वाले के मन में भी बेचैनी पैदा करती हैं। नकारात्मक माहौल में रहने से बड़े लक्ष्यों को हासिल करने का हौसला कमजोर पड़ता है। नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूरी बनाना मानसिक शान्ति और सकारात्मकता के लिए बहुत जरूरी है।
          अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्य पर पहुँचने के लिए यदि मनुष्य कटिबद्ध हो गया हो तो उसे नकारात्मक लोगों की निराशाजनक बातों की ओर कदापि ध्यान नहीं देना चाहिए। उनके सामने उसे बहरा अथवा मूर्ख बन जाने का ढोंग करना चाहिए। उन्हें तब अनदेखा करके उसे अपने लक्ष्य का सन्धान कर लेना चाहिए।
          ये निराशावादी लोग कभी किसी को प्रोत्साहित कर ही नहीं सकते। इनके हर कार्य के साथ किन्तु, परन्तु जुड़ा रहता है। हर कार्य में सफलता या लाभ के विषय में न सोचकर ये हर समय असफलताओं की लम्बी लिस्ट लेकर बैठ जाते हैं। ये लोग हर समय रोते-झींकते रहते हैं। परेशानियों के साथ इनका चोली-दामन का साथ रहता है जिसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि जबरदस्ती गले गलाते हैं।
        इसीलिए न ये स्वयं कोई साहसिक कार्य कर सकते हैं और न किसी दूसरे को करने देना चाहते हैं। सबको  हतोत्साहित करके बस अपने दायित्व को पूरा कर लेते हैं। यही कारण है कि जीवन में सफलता इनके आगे-आगे भागती रहती है और ये उसे पाने के लिए उसके पीछे भरसक दौड़ लगाते रहते हैं। 
        साहसी मनुष्य को चाहिए कि जब भी वह किसी कार्य करने के बारे में ठोस योजना बनाए तब सकारात्मक विचार वाले सज्जनों से परामर्श ले। उनकी मूल्यवान सोच कभी उसे डूबने नहीं देती। वे सदा ऐसी सलाह देते हैं जिससे  दूसरों की उन्नति होती रहती है।
          एक बोध कथा की यहाँ चर्चा करना चाहती हूँ। एक मेंढक ने पेड़ की चोटी पर चढ़ने के विषय में विचार किया और फिर वह आगे बढ़ने लगता है। उसे उस पेड़ पर चढ़ता देखकर बाकी के सारे मेंढक शोर मचाने लगते हैं, "ये असम्भव कार्य है आज तक कोई भी मेंढक पेड़ पर नहीं चढ़ सका। यह नहीं हो सकता है, तुम पेड़ पर नहीं चढ़ पाओगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम लौटकर वापिस आ जाओ।" 
          मेंढक का संकल्प और दृढ़ निश्चय रंग लाया और आखिरकार वह पेड़ की चोटी पर पहुँच ही जाता है। इसका कारण यही है कि वह मेंढक बहरा होता है और अपने साथियों की बात नहीं सुन सका। सारे मेंढकों को चिल्लाते हुए देखकर उसने अपने मन में यही सोचा कि आज वह एक आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक कार्य करने जा रहा है। उसके सभी साथी उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं। इसलिए वह और अधिक जोश से भर जाता है। अन्ततः अथक संघर्ष करते हुए असम्भव कार्य को कर गुजरता है।
          यह बोधकथा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता? उसकी संकल्पशक्ति दृढ होनी चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में डाँवाडोल नहीं होनी चाहिए। इस दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वह अनेकानेक साहसिक कार्य कर लेता है। विश्व में हुए सभी चमत्कार इन्हीं सकारात्मक विचारों के कारण सम्भव हो सके।
          ये कार्य कोई भी हो सकते हैं- चाहे आकाश को नापना हो, ग्रह-नक्षत्रों आदि की जानकारी जुटाना हो, ऊँचे पर्वतों का सीना चीरकर सुविधाजनक यातायात के लिए रेल या सड़क मार्ग बनाना हो, समुद्र पर पुल बनाना या जहाज चलाना हो, हिमालय की चढ़ाई करनी हो अथवा फिर खूँखार जंगली जानवरों अपने को वश में करना हो। 
          कैसा भी कठिन या असम्भव कार्य हो वे मानो चुटकी बजाते ही कर लेते हैं। वे मुसीबतों से कभी घबराते नहीं हैं। तभी तो सच्चे पराक्रमी कहलाते हैं। सकारात्मक सोच वाले यही लोग इतिहास रचते हैं और उन हैरतअँगेज कारनामों को आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ती हैं। उनमें से भी कुछ लोग उन्हीं के पदचिह्नों का अनुगमन करते हुए धारा के विपरीत चलते हुए इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
          इसीलिए मनीषियों का सद्परामर्श सभी सकारात्मक सोच वालों के लिए है कि यत्नपूर्वक नकारात्मक सोच वालों से किनारा कर लेना चाहिए। उनके विचारों को सुनने की यदि मजबूरी सामने आ जाए तो उसे अनसुना करते हुए आगे बढ़ते चलो। नकारात्मक विचारों का परित्याग करते हुए, अपनी सोच का दायरा विस्तृत करके उसे सकारात्मक बनाते हुए, दुनिया के साथ कदम ताल करते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य

सच्चाई और ईमानदारी से हिलते साम्राज्य 

किसी की आँख में आँख डालकर बात करना बड़े जीवट का काम है। ऐसा वही मनुष्य कर सकता है जो किसी से भी न डरता हो। यह तभी सम्भव हो सकता है जब मनुष्य का मनोबल उच्च हो और उसके पास आत्मिक बल हो। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आत्मिक बल उसी व्यक्ति के पास हो सकता है, जिसके साथ सच्चाई और ईमानदारी होती है।
       सच्चाई और ईमानदारी वे शक्तिशाली नैतिक बल होते हैं जो बड़े-बड़े और अहंकारी साम्राज्यों की नींव को भीतर से खोखला करके हिला देते हैं। साम्राज्य अपनी ताकत, सेना और धन के बल पर चलते हैं। उनके पास नैतिक बल नहीं होता। सच्चाई के आगे सत्ता का अहंकार टिक नहीं सकता। जब कोई व्यक्ति या समाज ईमानदारी और सत्य का मार्ग चुनता है, तो आम जनता में भी साहस आता है। यह सामूहिक एकता किसी भी बड़े शासन को झुकने के लिए मजबूर कर देती है।
        इस सच्चाई की शक्ति से तो बड़े-बड़े साम्राज्य तक हिल जाते हैं। शारीरिक बल न होते हुए भी मनुष्य आत्मिक बल के रहते किसी से भी लोहा ले सकता है। यहाँ हम महात्मा गांधी के जीवन का उदाहरण ले सकते हैं जिन्होंने कृशकाय होते हुए भी अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ली। उनकी एक आवाज पर हजारों लोग अपने सारे काम-काज छोड़कर भागे चले आते थे। विदेशी शासक के अत्याचारों को भी हँसकर सहन करते थे।
          इसी प्रकार के अनेक उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा हुआ है जहाँ केवल आत्मिक बल अथवा सच्चाई की ताकत के कारण लोग शक्तिशालियों से भिड़ गए और उनकी नाक में दम कर दिया।
         झूठ और अन्याय की एक सीमा होती है। जब सच्चाई सामने आ जाती है तो साम्राज्य का पर्दाफाश हो जाता है। ईमानदार आचरण बाहरी डर को समाप्त कर देता है। बिना डर के जीने वाला यह समाज किसी भी दमनकारी व्यवस्था को बदलने में सक्षम हो जाता है। 
        टीवी पर, सोशल मीडिया पर एवं समाचार पत्रों में भी आए दिन ऐसे समाचार देखने, सुनने और पढ़ने को मिलते रहते हैं। दृढ़तापूर्वक प्रतिकार करने वालों की कमी नहीं है।
        आम व्यवहार में हम सभी प्रायः इन वाक्यों का प्रयोग करते रहते हैं- 'मेरी आँखों में देखकर बोल', 'नजरें क्यों चुरा रहे हो?', 'हिम्मत है तो नजर मिलाकर बात कर', 'आँखों में आँखें डालकर बात कर' आदि।
        इन सभी वाक्यों से पता चलता है कि कोई व्यक्ति स्वयं कितना ही धोखेबाज, मक्कार, हेराफेरी मास्टर क्यों न हो, उसे हर बात सच्ची ही सुननी होती है बस। असत्य भाषण अथवा अनर्गल प्रलाप कोई नहीं सुनना चाहता। झूठ और फरेब के कारण असामाजिक तत्त्व और आतंकवादी आदि अपने पुराने वफादारों तक को जान से मार देने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। इस विषय पर अनेक फिल्में तथा टीवी सीरियल बने हैं। जिन्हें देखकर इन लोगों का व्यवहार समझा जा सकता है
          कार्यक्षेत्र आदि में भी बॉस चाहता है कि उसके अधीनस्थ सत्य का व्यवहार करें। यदि कोई उसके समक्ष असत्य बोलता है तो वह अपना आपा खो देता है और उल्टा-सीधा बहुत कुछ सुना देता है। इस कृत्य के लिए सरकारी दफ्तरों में मेमो इश्यू कर दिए जाते हैं पर प्राइवेट में तो कर्मचारी को नौकरी से हाथ तक धोना पड़ जाता है। इससे उस व्यक्ति का कैरियर बर्बाद हो जाता है।
          अपने घर में यदि बच्चे बड़ों से किसी भी कारण से सच्चाई छिपाएँ तो उनके साथ डाँट-डपट की जाती है अथवा सजा भी दी जाती है। किन्तु यदि घर के सदस्य एक-दूसरे से पर्देदारी करने लगें तो वह परिवार टूटकर बिखर जाता है। कोई भी व्यक्ति दूसरे का असत्य आचरण सहन नहीं कर पाता।
          मनुष्य की जुबान की बड़ी कीमत होती है। इसकी सच्चाई और ईमानदारी के कारण लाखों करोडों के व्यापार उचन्ती में हो जाते हैं। जहाँ किसी के मन में धोखाधड़ी करने की भावना आ गई, वहाँ पर व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और तब व्यवसाय की साख गिर जाने से व्यापार में हानि होने लगती है।
          मनुष्य की आँखों की चमक से ही ज्ञात हो जाता है कि उसकी बात में कितनी सच्चाई है और कितनी धूर्तता है। उसकी बात विश्वसनीय है अथवा नहीं। ऐसा व्यक्ति किसी से नजर नहीं मिला सकता। बात करते समय वह या तो इधर-उधर देखेगा या नाखून दाँतों से कुतरेगा या पैर के अँगूठे से जमीन खोदेगा या फिर नजरें चुराने का प्रयास करता है अथवा हकलाने लगता है।
        सत्य की शक्ति इतनी अधिक होती है कि सत्यवादी के मुँह से निकलने वाला हर वचन ब्रह्मवाक्य बन जाता है। ऐसे व्यक्ति की बोलते समय न कभी जुबान लड़खड़ाती है और न ही वह किसी से डरता है। सबके सामने सिर उठाकर और दूसरों से आँखें मिलाकर वह बात कर सकता है।  
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन व विश्वास का जीवन में महत्त्व

ज्ञान, धन और विश्वास इन तीनों का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व होता है। इनके बिना मनुष्य का कोई मूल्य नहीं होता। ये तीनों वास्तव में उसके प्रिय और सच्चे मित्र होते हैं जो चौबीसों घण्टे उसके साथ ही रहते हैं। ज्ञान उसका मार्गदर्शन करता रहता है, धन उसकी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूर्ण करता है और उसकी विश्वास की पूँजी हर कदम पर उसकी सहायक बनती है।
          यदि इन तीनों के विषय में विचार करें और इन्हें ढूँढने लगे जाऍं तो सोचिए ये सब हमें कहाँ पर मिल सकेंगे?
        आज की परिस्थितियों में ज्ञान धार्मिक स्थलों और विद्या का मन्दिर कहे जाने वाले स्कूलों में मिलता है। वहाँ उन स्थानों पर इसका व्यापार किया जाता है। धर्म स्थलों में धर्म के ठेकेदार अपने ज्ञान का दुरूपयोग करते हुए जन साधारण को गुमराह करते हैं। उन्हें धर्म के नाम पर जन साधारण को बाँटने का कार्य करते हैं और मारकाट करवाते हैं। अपने विरोध में सिर उठाने वालों पर अत्याचार करते हैं और समाज में अनाचार फैलाते हैं। लोगों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले ये तथाकथित ज्ञानी विद्वान समाज को उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं।
          बच्चों को विद्यालय में स्कूली शिक्षा यानी किताबी ज्ञान ही मिल सकता है। मोटी डोनेशन लेकर जहाँ दाखिला दिया जाता है और मोटी फीस लेकर पढ़ाई कराई जाती है। उन विद्यालयों और कालेजों में पढ़ने वाले छात्र सदा ही नियम-कानून को धत्ता दिखाते रहते हैं। अपने अध्यापकों का भी सम्मान नहीं करते। एक ओर व्यापारी मैनेजमेंट लूट-खसौट करने पर लगी रहती है। और दूसरी ओर शिक्षक अपने व्यवसाय के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ नहीं हैं। वे भी सदा अपना हितसाधक बने रहते हैं। 
         इन स्थानों पर ऐसे ज्ञान का दुरूपयोग खुल्लमखुल्ला किया जा रहा है जो मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों को संवारता है। ये सब देखकर हर संवेदनशील व्यक्ति के मन को बहुत पीड़ा होती है। आम आदमी इस दुरूपयोग का प्रतिकार नहीं सकता।
        धन केवल अमीरों के पास मिलता है जो हर तरह की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इसके लिए वे ईमानदारी, सच्चाई और नियम-कानून को ताक पर रख देते हैं। वे चोरबाजारी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी आदि को प्रश्रय देते हैं। इस क्रम में यदि किसी की पीठ मे छुरा घोंपना पड़े या गला काटना पड़े तो गुरेज नहीं करते। जिस सीढ़ी से ये लोग ऊपर चढ़े होते हैं उसे ठोकर मारकर गिराना पड़े तो वे कदापि परहेज नहीं करते। इन लोगों का उद्देश्य मात्र धन कमाना होता है और कुछ नहीं। 
        जबकि यह धन मनुष्य के लिए केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ खरीद सकता है। उसके लिए यह स्वास्थ्य, शान्ति, संस्कारी या आज्ञाकारी सन्तान, सहृदय बन्धु-बान्धव और रिश्तों में परस्पर विश्वास आदि को जीवन में नहीं खरीद सकता। फिर भी वे इसके पीछे दीवानों की तरह पड़े रहते हैं। उन्हें न खाने की सुध रहती है और न ही अपने आराम की।अपने दिन-रात का सुख-चैन गॅंवाकर ये कोल्हू का बैल बन जाते हैं। 
          विश्वास मनुष्य के जीवन के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। एक बार यदि यह जीवन से निकल गया तो फिर कभी वापिस नहीं लौटकर नहीं आता। आज के भौतिक युग में मानो विश्वास बेचारा तोड़ने के लिए ही होता है। हर रिश्ते को निभाने के लिए विश्वास बहुत आवश्यक होता है। लोग उसका मान नहीं रख पाते। एक बार विश्वास खो जाए तो समाज में मनुष्य की साख प्रभावित होती है। उसे पुनः बनाने में बहुत समय लग जाता है। फिर भी कोई गारण्टी नहीं होती।
          आज बहुत से भाई, बहन, माता, पिता, पति, पत्नी, मित्र, पड़ौसी, नेता, अभिनेता आदि एक-दूसरे के साथ विश्वासघात करने में परहेज नहीं कर रहे। वे तो दूसरे की आँखों में धूल झौंककर बड़े खुश होते हैं। वचनबद्धता तो उनके लिए एक प्रकार से खिलवाड़ बनती जा रही है। माना यही जाता है कि दुनिया विश्वास पर चलती है। इस क्षेत्र में भी लोग पिछड़ने लगे हैं।
        यदि मनुष्य किसी का विश्वास तोड़ता है अथवा कोई अन्य व्यक्ति उसका विश्वास खण्डित करता है तो दोनों ही स्थितियों में उसे पुनः जमा पाना बहुत कठिन हो जाता है। यह विश्वास काँच की तरह बहुत नाजुक होता है। यदि यह एक बार टूटकर बिखर जाता है तो फिर उसे समेटना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य हो जाता है।मनुष्य की आयु बीत जाती है लोगों के हृदयों में पुनः इसे जमाने में।
          ज्ञान, धन और विश्वास मनुष्य के परम मित्र हैं किन्तु जहाँ सावधानी हटी वहीं पर दुर्घटना घट जाती है। यानी मनुष्य को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इन तीनों के भरोसे मनुष्य चमत्कार करता है। समाज में अपना स्थान बनाता है। इनमें से किसी एक की भी कमी उसे सबकी नजरों से गिरा देती है। तब वह हीरे सा मूल्यवान होते हुए भी सबकी नजरों मे काँच की तरह बेकार बन जाता है। उसे दूर फैंक देने में बिल्कुल परहेज नहीं किया जाता।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 16 सितंबर 2026

सुनो अधिक और बोलो कम

सुनो अधिक और बोलो कम

ईश्वर ने मनुष्य को कान दो दिए हैं पर मुँह एक दिया है। इससे यही अर्थ लगाया जा सकता है कि प्रभु का यह स्पष्ट सन्देश है कि सुनो अधिक और बोलो कम। सभी जानते हैं कि कानों का काम है सुनना और मुँह का काम है बोलना। 
         अधिक सुनना और कम बोलना एक महान गुण है जो आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली और समझदार बनाता है। इसके बहुत लाभ होते हैं। ध्यान से दूसरों की बात सुनने से नई चीजें सीखने और समझने का अवसर मिलता है। कम बोलने से आपकी मानसिक ऊर्जा सुरक्षित रहती है और अनावश्यक तनाव से बचाव होता है। कम बोलने और सोच-समझकर बात करने वाले लोग समाज में अधिक विश्वसनीय और सम्मानित माने जाते हैं।
          अब विचार इस विषय पर करना है कि मनुष्य को क्या सुनना चाहिए और क्या नहीं? इसी प्रकार क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं?
          मनुष्य को सदा ही अच्छा सुनना चाहिए और अच्छा बोलना चाहिए। अच्छा सुनने का तात्पर्य है अपने देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के हितकर शब्द सुनने चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों एवं महापुरुषों के उपदेशों तथा आदर्शों के विषय में सुनना चाहिए। उन पर आचरण करना चाहिए।
          महाजनों की सुसंगति में रहते हुए, उनके सुवचनों का लाभ उठाते हुए अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए। समष्टि का भला करने वाले या लाभ पहुँचाने वाले सद् वाक्यों को सुनना सदा ही सबको आनन्दित करता रहता है। 
          दुर्जनों से और उनके कठोर वचनों को सुनने से बचना चाहिए। उनके अपशब्द व गाली-गलौज सुनने से दूर रहना मनुष्य के लिए आवश्यक है। इनके अतिरिक्त ऐसे वचन भी नहीं सुनने चाहिए जिनमें किसी की निन्दा-चुगली की गई हो या तोड़फोड़ करने की बात हो।
          देश, धर्म, समाज तथा घर-परिवार को तोड़ने वाले दुर्वचनों को सुनने से बचना चाहिए। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले जिन वचनों में षडयन्त्र की बू आ रही हो, मनुष्य को उन्हें सुनने से सदा परहेज करना चाहिए।
          एवंविध बोलते समय वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 
             पहले तोलो फिर बोलो।
ऐसा बोलने से हमेशा बचने का प्रयास करना चाहिए जिससे किसी के मन को कष्ट हो या किसी का हृदय छलनी हो जाए। अपनी तरफ से सदा यही प्रयत्न करना चाहिए कि दूसरे के मन को हरने वाले बोल ही बोले जाएँ।
            वाणी की सरलता और सहजता का पुट उसमें होना चाहिए, छल-फरेब वाली भाषा का प्रयोग मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरों के जख्मों पर मलहम लगाने वाले वचन सबको पसन्द आते हैं।
          किसी मनुष्य के साथ यदि कोई भी व्यक्ति अपने रहस्यों को साझा करता है तो उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि जिसके पास जाकर वह अपना मन हल्का कर रहा है, वह उन्हें अपने अन्तस् में ही समाकर रख लेगा। उन्हें किसी दूसरे के सामने कभी भी, किसी भी परिस्थिति में प्रकट नहीं करेगा। वह उन्हें अपने तक ही सीमित रखेगा।
          उसे यह भी विश्वास होता है कि वह स्वयं लोगों के सामने न तो उसका उपहास करेगा और किसी दूसरे को भी उसकी छिछालेदार नहीं करने देगा। जिस व्यक्ति पर लोग इतना विश्वास करते हैं, उससे महान कोई और हो ही नहीं सकता। 
          इस प्रकार बोलने और सुनने में यदि अनुशासन का पालन किया जाए तो होने वाले बहुत से झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है। वाणी से किया गया प्रहार बहुत गहरा घाव करता है। इस प्रकार के तीक्ष्ण वारों को करने से मनुष्य को यथासम्भव बचना चाहिए।
         वास्तव में जब मनुष्य बात कर रहा होता है तो वह प्रायः अधिक सुनता नहीं हैं। इसलिए अक्सर बहुत कुछ सीखता भी नहीं है। इसलिए कम बोलने और अधिक सुनने से मनुष्य एक बेहतर वार्ताकार बन सकता है। अच्छे श्रोता बनने से बातचीत की गुणवत्ता बेहतर हो जाती है। दूसरे लोगों को व्यक्ति से बातचीत करने में आनन्द आता है। वे खुलकर अपनी बातें साझा करने लगते हैं।
          मन में दूसरों के गूढ़ रहस्यों को सदा छुपाकर रखने वाला और वाणी का संयम रखने वाला मनुष्य वास्तव में महान होता है। ऐसे महापुरुषों को समाज अपना नेता मानकर उसके बताए मार्ग पर चलने लगते हैं।
          इन सबसे भी बढ़कर प्रत्येक मनुष्य को उस परमपिता का यशोगान भी अपनी वाणी से सदैव करते रहना चाहिए और उसी की प्रार्थनाओं को अपने इन कानों से सुनना भी चाहिए। तभी इन दो कानों और इस मुँह की सार्थकता है। अपने अन्तस् में ईश्वरोचित गुणों का समावेश करने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 15 सितंबर 2026

पाप-पुण्य के विषय में जिज्ञासा

 पाप-पुण्य के विषय में जिज्ञासा

पाप क्या है और पुण्य क्या है? मानव के मन में इनक विषय में सदा से ही जिज्ञासा रही है। इस दुविधा का समाधान करते हुए विद्वान ऋषियों ने अपने-अपने ग्रन्थों के माध्यम से हमें अपने-अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया है। 
       सभी धर्म-ग्रन्थों की यही शिक्षा है कि हमें हमेशा सबकी सहायता करनी चाहिए। कभी भी किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कष्ट नहीं पहुॅंचाना चाहिए। महर्षि व्यास द्वारा हमें समझाया गया है -
       अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
       परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्।।
अर्थात् महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों में केवल दो ही मुख्य बातें कही हैं - दूसरों की भलाई करना या उपकार करना पुण्य का कार्य है। दूसरों को दुख या पीड़ा पहुॅंचाना पापकर्म है।
        महर्षि वेदव्यास के अनुसार मानव जीवन का मूल उद्देश्य दूसरों की सेवा करना होना चाहिए।  किसी भी जीव को मानसिक या शारीरिक रूप से पीड़ा पहुँचाना नहीं होना चाहिए।
        सार रूप में हम इतना कह सकते हैं कि देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए बनाए नियमों का पालन करते हुए जो कार्य किए जाते हैं वे पुण्य कहलाते हैं। इनके विपरीत किए जाने वाले सभी कार्य पाप की श्रेणी में आते हैं।
        यह स्पष्ट है कि जनहित में किए जाने वाले कार्य मनुष्य को सफलता और ख्याति देते हैं। इसके विपरीत मानवता विरोधी किए गए सभी कार्य उसे अपयश दिलाते हैं और अन्ततः उसे परेशानी में डाल देते हैं।
        वैसे तो क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो उसके विवेक का हरण कर लेता है। मनीषियों का कथन है कि किया गया क्रोध उस समय पुण्य बन जाता है जब धर्म व मर्यादा के लिए उसका उपयोग किया जाता है।
          यदि मनुष्य ऋषि के उपदेश के कारण साँप की तरह आवश्यकता पड़ने पर क्रोध का प्रदर्शन नहीं करेगा तो वह समाज में कायर कहलाएगा। उसका समाज में कोई सम्मान नहीं करेगा। सभी उसे अनदेखा करते रहेंगे। यह ठीक है कि क्रोध के वशीभूत वह किसी का अहित न करे किन्तु समय पड़ने पर उसे अन्याय का प्रतिकार तो अवश्य करना चाहिए।
          रामायण काल का एक उदाहरण देखते हैं। पक्षीराज जटायु के जीवन का पुण्य यही था कि भगवती सीता का हरण करके जाते हुए रावण पर उसने क्रोध किया। उसका मुकाबला यथाशक्ति किया। इस पुण्य के फलस्वरूप उसे प्रभु श्रीराम की गोद मिली।
          इसके विपरीत सहनशीलता जो मनुष्य का एक बहुत बड़ा गुण है परन्तु उस समय यह पाप बन जाता है जब वह धर्म और मर्यादा को बचाने में असफल होने लगता है। जब वह अपने स्वार्थ को सर्वोपरि मानने लगता है तब चाहकर भी वह अन्याय का विरोध नहीं कर सकता। इसीलिए अपने इस दोष के कारण वह समाज में सदा अपयश का भागीदार बन जाता है।
          महाभारत के इस उदाहरण के द्वारा इस तथ्य को समझने का प्रयास करते हैं। भीष्म पितामह ने अपने राज्य और परिवार की उन्नति व प्रसन्नता के लिए अनेक कार्य किए। इसी कारण आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर उसका पालन भी किया। परन्तु फिर भी उस पाप अथवा अत्याचार को न रोकने के दण्ड स्वरूप उन्हें अन्तिम समय में बाणों की शैय्या मिली। उसका कारण यही है कि जब द्रौपदी के साथ कौरव दुर्व्यवहार कर रहे थे तब उन्हें क्रोध करना चाहिए था। मोहवश वे ऐसा नहीं कर सके, बस मूकदर्शक बने रहे।
          ये दोनों उदाहरण इसलिए लिए हैं कि रामायण और महाभारत इन दोनों महाग्रन्थों के इन पात्रों से सभी भारतीय जनमानस भली-भाँति परिचित हैं। यहाँ यह चर्चा करना आवश्यक है कि यदि जटायु रावण का रास्ता रोककर उसे न ललकारता तो शायद भगवती सीता कहाँ गईं है, इस विषय में जानकारी न मिल पाती। इसी तरह यदि भीष्य पितामह ने अन्याय का विरोध दृढ़तापूर्वक किया होता और कौरवों को वहीं दण्ड दे दिया होता तो शायद महाभारत का युद्ध न होता।
          छुटपन में पढ़ा था और बड़ों के मुख से भी सुना था कि यदि किसी जीव की जान बचाने के कभी झूठ का सहारा लेना पड़ जाए तो वह पाप नहीं कहा जाता।
          यदि माता-पिता क्रोध न करें तो बच्चों का लालन-पालन नहीं कर सकते और न ही उन्हें अनुशासित कर सकते हैं। सहनशीलता आदि सभी गुण मनुष्य को महान बनाने के लिए बहुत आवश्यक होते हैं।
          इस तरह कुछ अपवाद स्वरूप कार्य को मनुष्य को यदा कदा न चाहते हुए भी दूसरों की भलाई के लिए करने पड़ जाते हैं। इन्हें फारग्रान्टेड नहीं लेना चाहिए। सदा यही प्रयास नकरना चाहिए कि जाने-अनजाने कोई गलत कार्य अपने हाथों से न होने पाए। इसके लिए सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 14 सितंबर 2026

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

हम भारतीयों के संस्कार में है कि अपनी जन्मभूमि को जन्मदात्री माता से कम नहीं मानते। जन्मभूमि हमारी अपनी ही जन्मदात्री माता की तरह सभी कष्ट सहन करके हमें जीवन की सारी खुशियाँ देती है। हमें स्वर्ग के समान सभी प्रकार के सुख-सुविधा के सारे साधन देती है। 
          स्वर्ग को केवल सुख और ऐश्वर्य का स्थान माना गया है। वहाँ मानवीय सम्वेदनाएँ और अपनापन नहीं होता। इसके विपरीत माता और मातृभूमि हमें जीवन में स्नेह और आत्मीयता देती हैं। इसलिए इनका स्थान समस्त लोकों और स्वर्ग से भी सर्वोच्च माना गया है।
         माँ मनुष्य को नौ महीने तक अपनी कोख में रखती है और अपने रक्त से उसे सींचती है। इस सुन्दर दुनिया में लेकर आती है। वह मनुष्य की पहली गुरु होती है। वही उसे चलना, बोलना सीखाती है और अच्छे-बुरे का ज्ञान देती है। हम माँ के निस्वार्थ प्रेम को किसी स्वार्थ या शर्त से नहीं बॉंध सकते। वह स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी सन्तान को दुनिया के सभी सुख देने का प्रयास करती है। 
          दूसरी ओर जन्मभूमि की वायु, उसके जल और अन्न से हमारा शरीर पुष्ट होता है और बढ़ता है। यह धरती हमें आश्रय, पहचान, भाईचारा और जीने का अधिकार देती है। जिस माटी पर हम लोग खेल-कूदकर बड़े होते हैं, उसके प्रति वफादारी करना और उसकी रक्षा करना हम लोगों का परम कर्त्तव्य होता है। 
          हम इस धरा पर अत्याचार करते रहते हैं अर्थात् अपने पैरों से इसे रौंदते हैं, जीभर कर कूड़ा-कचरा फैंकते हैं, अपना बोझ उस पर डालते हैं, अपनी सुविधा के लिए बड़े-बड़े भवन बनाकर बार-बार इस धरा की हरियाली को नष्ट करते रहते हैं, पर्यावरण और प्रदूषण की समस्याएँ पैदा करते हैं। फिर भी यह हमसे कभी नाराज नहीं होती बल्कि हमारा बोझ सहन करती रहती है। हमारे मार्ग को सदा सुगमतर ही करती रहती है।
        ऐसी मातृभूमि को छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाना उचित नहीं। अपनी धरती, अपने देश की मिट्टी, अपना देश हमें सदा प्रिय होने चाहिए। विश्व में कहीं भी रहने वालों को इसकी सौंधी सुगन्ध हमेशा याद रहती है। वे चाहकर भी अपनी इस देव तुल्य भारतभू का मोह नहीं छोड़ पाते। जब भी मौका मिले अपने देश चले आते हैं जहाँ पर जन्म लेने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं।
           'वाल्मीकि रामायणम्' में महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से यही आशय व्यक्त कर रहे हैं-
       न मे सुवर्णमयी लंकापि रोचते लक्ष्मण।
       जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। 
अर्थात् भगवान श्रीराम कहते हैं- हे लक्ष्मण मुझे सोने की लंका भी रुचिकर नहीं प्रतीत होती। जननी और जन्मभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान होती हैं।
          भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करके भी वहाँ राज्य करना अथवा वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया। उनके लिए सोने की लंका का कोई मोल नहीं था। वे अपनी मातृभूमि अयोध्या में वापिस जाना चाहते थे। उनके अनुसार जन्मदात्री माता के चरणों में मनुष्य का स्वर्ग है। उसी प्रकार अपनी जन्मभूमि में जो सुख-साधन हैं, वही स्वर्ग तुल्य हैं।
         यह प्रसिद्ध श्लोक हमें समझाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और कल्पना के स्वर्ग से बढ़कर माँ का आंचल और अपनी माटी का प्यार होता है। इसका कारण है कि यही हमारे जीवन, संस्कार और पहचान का आधार हैं।
        बहुत से ऐसे देश हैं जहाँ सारा साल गरमी रहती है या सरदी। वहाँ हमारे देश की तरह छह ऋतुएँ नहीं आतीं। वहाँ के निवासी अनेक कष्ट सहन करते हैं परन्तु फिर भी उस देश के वासी उसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते। 
        यही कारण है कि हमारे भारत के नवयुवकों ने निहत्थे भोले-भाले भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेजों को अपने देश से बाहर निकालने और उसे स्वतन्त्र करवाने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के अपने प्राणों की आहुति दी। हम सभी उनके बलिदान के फलस्वरूप इस धरा की स्वतन्त्र हवा में साँस ले रहे हैं। धन्य हैं वे स्वतन्त्रता सेनानी और उनकी वे माताएँ जिनकी तपस्या को उन युवाओं ने सार्थक कर दिया।
        यहाँ न जाने कितनी ही सभ्यताएँ धूल-धूसरित हो गई हैं। वहीं हमारी प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति फूलों की तरह मुस्कुराती हुई गर्व से सिर उठाए ब्रह्माण्ड के नीलाकाश में ध्रुवतारे की भाँति जगमगा रही है। वह विश्व के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही है।
        अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से हर व्यक्ति को प्यार होना चाहिए। जिस इन्सान को अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से प्यार नहीं वह सही अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नही। उनकी अवहेलना करने वाला हमेशा निन्दनीय होता है। हमें अपने इस अतुल्य भारत देश पर बहुत गर्व है। इकबाल जी पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं- 
            सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 13 सितंबर 2026

अपने ही देश में पराई

 अपने ही देश में पराई

हिन्दी के नाम पर आज छींटाकशी भी चल रही है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि तथाकथित हिन्दी प्रेमी केवल भाषणों का आदान-प्रदान करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। उससे ही उनका हिन्दी प्रेम छलककर सबको सम्मोहित करने का प्रयास करता है।
          यह सत्य है कि आज हिन्दी अपने ही देश में पराई हो रही है। उसकी इस स्थिति का श्रेय हम सभी भारतवासियों को है जो बड़ी शान से कहते हैं कि हिन्दी बहुत कठिन भाषा है।
          चाहे हिन्दी प्रेमी हों अथवा टीवी- सिनेमा के कलाकार हों सभी हिन्दी से रोटी कमाते हैं पर जब उनसे कुछ पूछा जाए तो उत्तर अंग्रेजी में देते हैं। ऐसा करके उनका सीना गर्व से फूल जाता है। उन्हें शायद हिन्दी में बोलने में शर्म महसूस होती है।
        मैं देश की राजधानी दिल्ली की बात करना चाहती हूँ जहाँ हिन्दी के नाम पर छोटे-छोटे गुट बने हुए हैं। हिन्दी भाषियों में हो रही यह गुटबन्दी भाषा का भला नहीं कर रही बल्कि उसे नित्य हानि ही पहुँचा रही है।
        तथाकथित साहित्यकार एक-दूसरे की पीठ सहलाकर ही महान रचनाकार कहलवाने का जुगाड़ कर रहे हैं। बिना ऐसी किसी महत्त्वपूर्ण रचना के लिखे ही सम्मान बाँटने अथवा बटोरने की होड़-सी मची हुई है। इनमें से बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिन्हें भाषा को शुद्ध लिखना व बोलना तक नहीं आता। 
          आपको फेसबुक पर ऐसे उदाहरण आसानी से मिल जाएँगे जिनकी लिखी हुई दो-चार पंक्तियों में भी भाषागत अशुद्धियाँ मिल जाएँगी। ऐसे लोगों को वर्तनी अथवा व्याकरण से कोई लेना देना नहीं है परन्तु हाँ  उन्हें सम्मान भी मिल रहे हैं और वाहवाही भी।
        मन को उस समय बहुत कष्ट होता है जब रचनाकारों की बिना स्वाध्याय के उथली रचनाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। 
         तब समझ में नहीं आता कि हम साहित्य में क्या योगदान कर रहे हैं? अपने आने वाली पीढ़ी को क्या ऐसा साहित्य थाती के रूप में सौंपेगे?
            फेसबुक पर प्रायः हिन्दी प्रेमियों की ऐसी व्यथा कथा पढ़ने के लिए मिल जाती है। कुछ समय पूर्व फेसबुक पर एक मित्र ने बड़े ही दुखी मन से पूछा है- 'क्या इस देश अथवा समाज में लेखक या कलाकार की कोई इज्जत नहीं होती?'
      इस प्रश्न के उत्तर में मैंने उन्हें लिखा है-  'इज्जत कमाई जाती है। यदि लेखक और कलाकार इज्जत कमाना चाहते हैं तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना छोड़कर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वहण करें। ऐसी रचनाएँ समाज को दें कि वह उनके समक्ष नतमस्तक हो जाए।' 
          कुछ लोगों को रातोंरात महाकवि बनने की शीघ्रता है। सबसे बड़ा मजाक यह हो रहा है कि कुछ महानुभाव अपने नाम से पूर्व कवि, कविराज अथवा महाकवि भी लिख रहे हैं। अरे मेरे भाई साहित्य प्रेमियों को निर्धारित करने दीजिए कि आप कितने पानी में हैं।
         हिन्दी की हो रही दुर्दशा को हम सब मिलकर सुधार सकते हैं। यह एक अकेले के बूते की बात नहीं है। अपनी भाषा को यथोचित स्थान दिलाने के लिए हम सबको साझा प्रयास करना होगा। अपने आपको स्वाध्यायशील बनाना होगा। जिससे जब कलम चले तो दूसरों  को झकझोर कर रख दे और सबके हृदयों पर राज करे। हिन्दी भाषा पर हमें अपनी पकड़ इतनी मजबूत करनी होगी जिससे यह समृद्ध भाषा हमें गौरवान्वित कर सके। उस समय हम अपना मस्तक शान से उठाकर कह सकें-
    हम हिन्दुस्तानी हैं और हमारी मातृभाषा हिन्दी     
     है। हमें अपने देश और अपनी भाषा पर गर्व है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 12 सितंबर 2026

सुसंस्कृत वाणी वास्तविक आभूषण

सुसंस्कृत वाणी वास्तविक आभूषण

सुसंस्कृत वाणी यानी संस्कार युक्त वाणी ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण होती है। यदि बोलते समय भाषा का ध्यान न रखा जाए अथवा अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाए या बोलते समय गाली-गलौच किया जाए तो उसे वाणी का संस्कार कदापि नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि वाणी की सरलता और शुद्धता मनुष्य के संस्कारों पर निर्भर करती है। उसकी झलक उसके मुॅंह खोलते ही सामने वालों को दिखाई देने‌ लगती है।
          भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में बहुत ही सुन्दर शब्दों में सुसंस्कृत वाणी का महत्त्व बताते हुए व्याख्या की है -
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला।
न स्नानं न विलेपनं  न कुसुमं  नालंकृता  मूर्धजा।।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते।
क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषमम्।।
अर्थात् न बाजूबन्द आदि आभूषण मनुष्य को सजाते हैं और न ही चन्द्रमा के समान चमकते हुए हार। सुगन्धित जल से स्नान करने, लेप लगाने, फूलों से बाल सजाने से भी कोई सुन्दर नहीं बन जाता। मनुष्य केवल संस्कारित वाणी से सुशोभित होता है जिसे वह धारण करता है। सभी भौतिक आभूषण नष्ट हो जाते हैं परन्तु वाणी रूपी आभूषण कभी नष्ट नहीं होता।
        यह श्लोक हमें चेतावनी दे रहा है कि सम्पूर्ण भौतिक ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति नश्वर हैं। इन सबका कुछ भी पता नहीं रहता कि ये कब तक साथ निभा सकेंगे। मनुष्य की वाणी चाहे कौए की तरह कर्कश हो अथवा कोयल की भाँति माधुर, हमेशा दूसरों को याद रहती है। उसी के अनुसार लोग उस व्यक्ति विशेष के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और फिर उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं।
          इसी भाव को दर्शाती हुई एक कथा को यहाँ साझा करना चाहती हूँ जो मूलरूप से संस्कृत भाषा में लिखी गई है।
          एक समय में एक राजा अपने मन्त्री और सेवकों के साथ जंगल में विहार के लिए गया। जब वे थक गए तब आराम करने लगे। राजा को बहुत जोर की प्यास लगी। सामने एक झोंपड़ी थी जिसमें एक अन्धा फकीर रहता था।
         राजा ने अपने सेवक को पानी लाने के लिए भेजा। उसने वहाँ जाकर उस फकीर से कहा, ‘‘अरे अन्धे, एक लोटा जल  देना।” 
        उसने कहा, ‘‘भाग जा, मैं तुझ जैसे मूर्ख सेवक को जल नहीं देता।” 
          सेवक यह सुनकर बहुत निराश होकर राजा के पास वापिस लौट गया। 
          फिर राजा का मन्त्री वहाँ जल लेने पहुँचा और कहा, ‘‘अन्धे, भाई एक लोटा जल शीघ्रता से दे दो राजा को प्यास लगी है।” 
         अन्धे ने उसे भी पानी देने से इन्कार करते हुए कहा, "मैं तुझ मन्त्री को भी जल नहीं दूँगा।"
          यह सुनकर राजा उन दोनों के साथ स्वयं उस झोपड़ी में पहुँचा और अभिवादन करते हुए बोला, ‘‘बाबा जी! बहुत प्यास लगी है, गला सूख रहा है, थोड़ा-सा जल दे सकते हैं।” 
         अन्धे फकीर ने कहा, "महाराज! बैठिये अभी जल पिलाता हूँ।"
          राजा ने पूछा, ‘‘महात्मन्, आपने चक्षुहीन होकर भी कैसे जान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री है और मैं तीसरा राजा हूँ।” 
          अन्धे फकीर ने हँसते हुए कहा, ‘‘महाराज, व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी से होती है। उसके लिये आँखों से देखने की आवश्यकता नहीं होती। आप तीनों के बोलने के तरीके से ही मैंने पहचान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री और तीसरे आप स्वय हैं।”
        इस कथा को सुनकर हमें समझ आ रही है कि मनुष्य बातचीत के माध्यम से अपनी पहचान और स्थान बनाता है। जितना वह उन्नति के शिखर पर चढ़ता जाता है, उतनी ही उसकी वाणी संयमित होनी चाहिए। अन्यथा वह दूसरों का स्वार्थ साधने के माध्यम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाता। अपने आसपास लोगों से बातचीत करके, उनके बोलने के लहजे से हम बहुत कुछ उनके विषय में जान सकते हैं।
          बच्चों को अनुशासन की शिक्षा देने के लिए वाणी की कठोरता आवश्यक होती है परन्तु आम व्यवहार में नहीं। मनुष्य की वाणी की मधुरता ही उसे सबके सिरों पर विराजमान कर देती है और उसकी कठोरता दूसरों की नजरों से उसे गिरा देती है। इसीलिए वाणी को मनुष्य का वास्तविक आभूषण माना गया है। 
         यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसे समाज में सम्माननीय स्थान चाहिए अथवा वह तिरस्कार का पात्र बनना चाहता है? जैसा भी व्यवहार वह दूसरे लोगों से अपने लिए चाहता है, उसे उसी के अनुरूप अपनी वाणी का प्रयोग करना चाहिए। इस वाणी के कारण वह संसार में अपना एक‌ विशेष स्थान बना सकता है। दुनिया से विदा लेने के पश्चात भी लोग उसके सद् व्यवहार के उदाहरण देते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

जन्म-मृत्यु नदी के दो किनारों की तरह

जन्म-मृत्यु नदी के दो किनारों की तरह

मनुष्य का जन्म जब इस संसार में होता है तब वह खाली हाथ मुठ्ठी बाँधे हुए आता है। और जब यहाँ से विदा लेने लगता है तब भी वह मुठ्ठी खोले खाली हाथ ही चला जाता है। इसका अर्थ यही कहा जा‌ सकता है कि मनुष्य इस दुनिया में न कुछ लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जाता है। तब यह मारकाट, हेराफेरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, उठापटक आदि मनुष्य किसके लिए करता है?
        मनुष्य का जन्म और उसकी मृत्यु नदी के दो छोरों की तरह हैं जो कभी आपस में नहीं मिल पाते। जन्म और मृत्यु के बीच की सुन्दर यात्रा ही हमारा वास्तविक जीवन है। जन्म इस दुनिया में मनुष्य की नई शुरूआत और आगमन का प्रतीक होता है। दूसरी ओर मृत्यु इस भौतिक यात्रा का अन्तिम छोर और विराम होता है। दोनों किनारों के बीच बहता हुआ पानी वह समय होता है जिसमें हम लोग बहुत कुछ सीखते हैं, अनुभव लेते हैं और अपने होने का अर्थ तलाशते हैं।
        धरती और आसमान की तरह ये दोनों बस एक दूसरे को निहारते रहते हैं। रस्सी के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी तक बड़ी सावधानी से चलते हुए पार करनी पड़ती है। जहाँ चूक हुई वहीं सब बर्बाद हो जाता है। 
          प्रातःकाल जब सूर्योदय होता है तो उस समय मानो नवसृष्टि का आह्वान होता है। प्रकृति में चारों ओर प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है, हर कोना सूर्य के प्रकाश में जगमगाने लगता है। पक्षियों का कलरव नवगीत बन जाता है। उसी प्रकार नव शिशु के जन्म पर घर-परिवार में आनन्द-मंगल छा जाता है। नन्हा शिशु नई उमंग और उत्साह का प्रतीक बनकर अपने परिवार में खुशियाँ बिखेरने का माध्यम बन जाता है।
        अपने उदय के पश्चात पल-पल करके सूर्य दिन का अपना चक्र पूर्ण करता हुआ फिर अपने अवसान यानी सूर्यास्त की ओर बढ़ता जाता है। यह क्रम एक दिन का अन्त होता है और आने वाले अगले दिन का प्रारम्भ होता है। उसी प्रकार मनुष्य क्षण-क्षण करके अपने इस जीवनक्रम को पूर्ण करता हुआ अपने अन्त अर्थात् मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता चलता है। उसका यह अन्त नहीं होता अपितु उसके नव जीवन का आरम्भ कहलाता है।
          सूर्य की उदय से अस्त तक की यात्रा यूँ ही सरलता से निर्विघ्न समाप्त नहीं हो जाती। उसके लिए उसे भी संघर्ष करना पड़ता है। कभी किसी ग्रह के उसके मार्ग में आ जाने से उसे ग्रहण लग जाता है और कभी-कभार काले घने बादल आकर उसे ढक लेते हैं। उस समय दिन में ही हमें रात्रि का आभास होने लगता है। तब भी सूर्य हार नहीं मानता बल्कि बादलों के बीच से निकालकर पुनः मुस्कुराता हुआ चमकने लगता है।
        मनुष्य की जन्म से मृत्यु तक की यात्रा भी कष्टों और संघर्षों से भरी रहती है। कदम-कदम पर उसके लिए काँटे बिछाने वालों की कमी नहीं होती। उसके दुःख और उसकी परेशानियाँ उसे चैन नहीं लेने देते। दुखों की बदली छँटने तक उसकी दयनीय दशा में उसे कोई सहारा नहीं देता बल्कि उसके भाई-बन्धुओं की तरह उसकी अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है।
          अपने और अपने परिवार के लिए तो सभी जी लेते हैं। वास्तव में जीना उन्हीं का सफल होता है जो दूसरों के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा देते हैं, समर्पित कर देते हैं। उन्हें ही संसार सदा स्मरण करता है। यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि मृत्यु अवश्यम्भावी है।  इससे कोई भी जीव इस कठोर नियम से नहीं बच सकता। इसे ही विधि का विधान कहा जाता है।
          सूर्य कष्टों का सामना करते हुए भी अपने अहं का त्याग नहीं करता। दोपहर यानी उसके यौवन काल के समय का उसका प्रचण्ड तेज असहनीय होता है। उसी प्रकार मनुष्य का अहं उसे ले डूबता है। काल की ओर बढ़ते हुए उसके लिए अहंकार उचित नहीं है।
          जिस प्रकार रात्रि सम्पूर्ण संसार के विश्राम के लिए होती है उसी प्रकार मृत्यु भी मनुष्य के लिए जन्म से अब तक की सारी थकान मिटाने के लिए माँ की गोद की तरह सुखदायिनी होती है। इस मृत्यु से घबराना नहीं चाहिए बल्कि प्रसन्नता से इसकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिए।
          इस दुनिया का चलन भी बहुत विचित्र है, वह जीवित रहते मनुष्य की सुध नहीं लेती। उसके कष्टों में उससे सहानुभूति भी नहीं रखती। एक इन्सान दूसरे इन्सान को सहारा देने से कतराता है। परन्तु जब उसकी मृत्यु हो जाती है तो फिर वही सब लोग कन्धा देने के लिए पहुँच जाते हैं। इसका कारण यही है कि मृतक को अन्तिम यात्रा के लिए कन्धा देना भारतीय परम्परा के अनुसार पुण्य का कार्य माना जाता है।
          जहाँ तक हो सके समाज में रहते हुए दूसरों की सहायता अवश्य करनी चाहिए। हो सकता है कि उनके दिए गए आशीषों के फलस्वरूप अपने बन्द ताले की चाबी मिल जाए और इससे मनुष्य का इहलोक-परलोक दोनों ही सुधर जाएँ। उसे चौरासी लाख योनियों वाले जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिल जाए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

परस्पर अहंकार का टकराव

परस्पर अहंकार का टकराव

परस्पर अहं यानी Ego का टकराव दो मनुष्यों में तब होता है जब वे दोनों व्यक्ति अपनी-अपनी श्रेष्ठता अथवा स्वयं के सही होने को साबित करने की जिद पर अड़ जाते हैं। हर व्यक्ति यही मानता है कि उसका विचार या निर्णय ही सबसे अच्छा है। उसे हर किसी को मान लेना चाहिए। अपनी गलती को मानने से डरना और खुद को सर्वगुण सम्पन्न दिखाना उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। ऐसे लोग दूसरे के नजरिए और परिस्थिति को समझने का प्रयास नहीं करना चाहते।
            इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो आज तक कोई भी युग ऐसा नहीं हुआ जिसमें न्याय-अन्याय न हुआ हो और आगे आने वाले समय में भी शायद इस अभिशाप से बचा जा सके। इसका कारण है परस्पर अहंकार का टकराव। 
          रामायण काल में भगवान श्रीराम का अगले दिन होने वाला राज्यतिलक सहसा वनवास में बदल जाना, कैकेयी के अहंकार और स्वार्थ का परिणाम था। यहाँ श्रीराम के प्रति अन्याय किया गया जिसे उन्होंने से सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
          शूर्पणखा की नाक काटना, अहिल्या का अपमान होना व उसका मूर्तिवत हो जाना, बाली व रावण जैसे योद्धाओं का वध होना, भगवती सीता का हरण और उनकी अग्नि परीक्षा तथा गर्भावस्था में पुनः निष्कासन सभी इसी न्याय-अन्याय की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।
         इसी प्रकार महाभारत काल में भी न्याय और अन्याय का चला यह चक्र बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है। कौरवों द्वारा पाण्डवों का राज्य हथियाना, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर का जुए के खेल में राज्य के साथ अपने भाइयों और द्रौपदी को हार जाना, कौरवों का अन्यायपूर्ण राज्य करना और अन्ततः होने वाला महाभारत का युद्ध जिसमें सारे नियमों को अनदेखा करके छल-छद्म का सहारा लिया गया। इस युद्ध ने इतना भयंकर विनाश कर दिया था जिसका भुगतान देश ने बहुत समय तक किया।
        ये सब उन सबके अहं का परिणाम ही कहे जा सकते हैं। महाभारत काल में नैतिक-अनैतिक, न्याय-अन्याय आदि के सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया था जिसके परिणाम का हम लोग आज तक भुगतान रहे हैं और न जाने कब तक भोगेंगे?
          उसके पश्चात मुगलों के शासनकाल का भयावह रूप हमें आज तक सताता है। उस समय जबरदस्ती तलवार के बल से लोगों का धर्म परिवर्तन कराना और न मानने पर नृशंसता करना, बहु-बेटियों का अपहरण करना, जन साधारण पर अत्याचार करना, मन्दिरों को ध्वस्त करना आदि बहुत से अन्यायपूर्ण कार्य उनके द्वारा किए गए। इसके फलस्वरूप देश में अशिक्षा, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का जन्म हुआ। महापुरुषों के अथक प्रयत्नों के बाद भी आज तक हम उनसे मुक्त नहीं हो सके।
          अंग्रेजों के शासन काल में भी कुछ कम अन्याय नहीं हुआ। निहत्थों पर गोली चलना, लोगों को बन्धुआ मजदूर बना लेना, चलती ट्रेन से किसी भी नागरिक को नीचे फैंक देना, स्वतन्त्रता सेनानियों को फाँसी देना व काले पानी भेजना, जन साधारण पर अनेक प्रकार के अत्याचार करना आदि इन अंग्रेजों का शगल था।
          ये तो थे न्याय-अन्याय के इतिहास से सम्बन्धित कुछ ऐसे उदाहरण जिन्हें प्रायः सभी लोग जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी न जाने कितने शासकों और उनके चमचों के द्वारा जनता अन्याय का शिकार होती रही है। जिस भी कालखण्ड के विषय में पढ़ने लगो तो उस समय में हुए अन्याय और अत्याचार के विषय में पढ़कर मन उदास और परेशान हो जाता है।
          आज हमारे भारत देश में राजतन्त्र नहीं प्रजातन्त्र है पर जन साधरण को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है। सत्ता में कोई भी आए, उसे तो बस पिसना ही है। अन्याय का सामना करना ही उसकी विवशता है। पुरातन युग की तरह आज भी राजपुरुषों का विरोध करना अपनी मौत को बुलावा देना ही होता है। 
          प्रतिदिन टी वी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में ऐसी दुखद खबरें हम सुनते और देखते रहते हैं। आज ह्यूमन राइट वाले बहुत एक्टिव हो रहे हैं किन्तु वे भी किसी को न्याय दिलाने में समर्थ नहीं हो रहे। ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वत्र होने वाला अन्याय शायद अधिक मुखर होता जा रहा है और इसीलिए उसका ही बोलबाला है। बहुत हो-हल्ला होता है परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात ही दिखाई देता है।
          केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में कमोबेश यही स्थिति है। कहीं भी किसी भी व्यक्ति ने जरा-सा सिर उठाने का दुस्साहस किया नहीं कि बस उसकी आफत आई समझो। बेशक हम लोग आज इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं परन्तु सामन्तवादी सोच से हम अभी भी बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए आज न्याय-अन्याय की जिम्मेदारी किस व्यक्ति को दी जाए, यह समझ नहीं आ रहा।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 9 सितंबर 2026

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार

प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार पर चलने जैसा होता है। जहाँ चूक हुई वहीं सब समाप्त हो जाता है। प्रेम का मार्ग दुधारी तलवार की धार के समान इसलिए होता है क्योंकि इसमें अपार आनन्द के साथ-साथ गहरी पीड़ा और जोखिम भी जुड़ा होता है।  इस मार्ग पर चलने के लिए इन्सान को अपने अहंकार और स्वार्थ को छोड़ना पड़ता है जो किसी तलवार की धार पर चलने जितना कठिन होता है। जिस प्रकार दुधारी तलवार जरा सी चूक पर घायल कर देती है, उसी तरह प्रेम में भी अत्यधिक अपेक्षाऍं अथवा असावधानी रिश्तों को तोड़ सकती है।
            प्रेम व्यक्ति को जीवन का अपनापन और परम आनन्द का अहसास कराता है परन्तु साथ ही यह विरह, डर और असहनीय मानसिक कष्ट भी दे सकता है। यह प्रेम एक ऐसी उच्च अवस्था होती है जिसमें स्वयं को ही मिटा देना होता है। जब तक स्वयं को मिटा देने की भावना मनुष्य में न आ जाए तब तक वह प्रेम की पराकाष्ठा को छू भी नहीं सकता। इसीलिए कहा गया है-
     प्रेम गली अति संकरी जा में दो न समाए।
अर्थात् प्रेम का रास्ता इतना संकरा या तंग होता है कि इसमें दो लोग एकसाथ नहीं गुजर सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो जब तक दो लोगों का अहं परस्पर टकराता रहेगा तब तक प्रेम हो ही नहीं सकता। जब वे अपने अहं को त्यागकर दो से एक बन जाते हैं, उनका मन से उनका जुड़ाव हो जाता है तभी प्रेम परवान चढ़ता है।
        स्वार्थ में अन्धे होकर कभी प्रेम नहीं किया जा सकता। उसके लिए तो अपना सर्वस्व समर्पित करना पड़ता है। प्रेम कुछ पाने का नाम नहीं अपितु उसमें पूर्ण समर्पण करना होता है। अपनी हस्ती को मिटाकर ही वास्तव में सच्चा प्रेम किया जा सकता है और पाया जा सकता है।
        एक माँ का निश्छल प्रेम अपने बच्चे की एक मुस्कान पर बलिहारी हो जाता है। प्रेम वही सात्त्विक होता है जहाँ वह अपने जीवन की परवाह न करते हुए अपना सब कुछ अपनी सन्तान के लिए दाँव पर लगाने के लिए तैयार हो जाती है। उसे अपने बच्चे के अतिरिक्त और कोई दिखाई नहीं देता।
        सेवक और स्वामी में कभी प्रेम नहीं हो सकता। क्योंकि वहाँ स्वार्थ प्रधान होता है। दोनों को एक-दूसरे से कुछ-न-कुछ पाने की आशा होती है। सेवक को स्वामी से धन की कामना होती हे और मालिक को अपने अधीनस्थ से अच्छा कार्य करने की चाह होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में वहाँ पर प्रेम की सम्भावना हो ही नहीं सकती। इस अन्तर को समझना आवश्यक होता है।
        आज विश्व में प्रेम की सम्भावना प्रायः समाप्त होती जा रही है। आज प्रेम दूसरे व्यक्ति की हैसियत को देखकर किया जाता है। उसमें यही भाव प्रधान होता है कि मुझे उस दूसरे व्यक्ति से क्या मिलेगा? जबकि विशुद्ध प्रेम वही होता है जो दूसरे की सामाजिक और आर्थिक स्थिति नहीं देखता। वह तो अपने साथी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर स्वयं को मिटा देता है। वहॉं कुछ पाने या चाहने की बात नहीं होती।
          हमारे भारत देश में यद्यपि पति-पत्नी साथ रह रहे हैं और इस साथ रहने को वे प्रेम समझ बैठते हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि मात्र एक-दूसरे के साथ रहने को ही प्रेम नहीं कहा जा सकता। इस प्रेम को सरासर धोखा कह सकते है। साथ रहने भर से प्रेम कभी नहीं हो सकता है। एक-दूसरे के प्रति उनके निस्वार्थ समर्पण को ही प्रेम का दूसरा रूप कहा जाता है।
          परस्पर कलह-क्लेश करके किसी तरह जीवन साथी का जीवन चौबीसों घण्टे नरक बनाकर जिन्दगी गुजार देना प्रेम नहीं कहला सकता। प्रेम और समर्पण की कमी के कारण ही आज भारत में तलाक लेने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 
        प्रेम एक पुलक है और एक प्रकार का उत्साह है। वह सच्चे मन से की गई एक प्रार्थना मात्र है। इस प्रेम की अपनी ही एक महक होती है जो दूर-दूर तक फैलती है। युगों तक उसे जनसाधारण याद रखता है। प्रेम अपने आप में एक ऐसा संगीत है जो मन को ही नहीं मनुष्य की आत्मा को भी तृप्त कर देता है।
          इस समर्पित प्रेम का उदाहरण मीरा बाई हैं। उन्होंने सम्पूर्ण राज्य भोगों का परित्याग करके भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ली थी। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई भाता ही नहीं था। सूरदास जी की कृष्ण भक्ति का भी कोई सानी नहीं है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप की उपासना की थी।
          यहाँ किसी विवाद में न पड़ते हुए श्री राधा जी और गोपिकाओं की कृष्ण भक्ति की चर्चा भी कर सकते हैं। उनकी भक्ति की प्रशस्ति में आज तक अनेक ग्रन्थ लिखे गए हैं। लोग श्रद्धापूर्वक उनका महिमा मण्डन करते नहीं अघाते। उनकी इस उपासना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
          ईश्वर से किया जाने वाला वह प्रेम वस्तुतः चरम प्रेम होता है जब साधक अपने पूर्ण समर्पण के साथ उसकी शरण में जाता है। भक्त के मन में इहलौकिक और पारलौकिक कोई कामना नहीं रह जाती। वह बस उसी परमात्मा में लीन हो जाना चाहता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान

बच्चे कच्ची मिट्टी के समान होते हैं। जिस प्रकार कच्ची मिट्टी से कुम्हार मनचाहा आकर देता हुआ विभिन्न पात्र बना लेता है, उसी प्रकार एक छोटे बच्चे को माता-पिता जिस भी साँचे में चाहें, उसे ढाल सकते हैं। जैसा भी आकार देना चाहते हैं, वैसा दे सकते हैं। जिस तरह एक चावल से ही सारे चावल पक जाने का ज्ञान हो जाता है। उसी प्रकार से घर के बच्चे के व्यवहार को देखकर पता चल जाता है कि इस परिवार में रहने वाले लोगों के संस्कार कैसे होंगे?
          बचपन में निम्न कथा सुनी थी। उस समय शायद इसकी गहराई समझ नहीं आई होगी पर अब ज्ञात होता है कि इस कथा का क्या रहस्य है?
          एक गाँव में तीन सहेलियाँ रहती थीं। एक दिन वे तीनों कुएँ पर पानी भरने गयीं। उसी समय एक महिला का बेटा वहाँ से गुजरा। वह बड़े गर्व से बोली, "यह मेरा बेटा कान्वेंट स्कूल में पढ़ता है। पढ़ाई में यह बहुत योग्य है।"
          माँ को कुँए से पानी भरते हुए देखकर वह होशियार बेटा वहाँ से निकल गया। थोड़ी देर के बाद दूसरी महिला का पुत्र भी वहाँ से गुजरा।
         उसकी माँ बोली,"देखो यह मेरा बेटा है जो एक पब्लिक स्कूल में पढ़ता है।" 
          वह भी अपनी माता को वहाँ पर पानी भरता हुआ छोड़कर चला गया। अन्त में तीसरी महिला का पुत्र भी वहाँ से गुजरा। उसने अपनी माँ को पानी भरते देखा और उसके पास आ गया। पानी से भरा हुआ मटका उसने उठाकर अपने कन्धे पर रख लिया और वहीं पास रखी पानी की भरी हुई बाल्टी भी दूसरे हाथ से पकड़ ली। 
        पानी से भरे दोनों बर्तन उठाने के बाद उसने आपनी माता कहा, "मॉं, चलो अब हम दोनों घर चलते हैं।"
        उसकी माँ ने गर्व से प्रसन्न होते हुए कहा," मेरा बेटा एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है।" 
         उस माँ के चेहरे की प्रसन्नता देखकर अन्य दोनों माताओं की नजरें शर्म से झुक गईं।
        पहली और दूसरी दोनों महिलाओं के पुत्रों के मन में यह भावना ही नहीं आई कि उनकी माँ दो-दो बर्तन उठाकर घर तक कैसे लेकर जाएगी? उन्हें अपनी माता के कष्ट का जरा भी ध्यान नहीं आया, केवल उन्होंने ने अपने बारे में ही सोचा। जबकि तीसरी महिला का बेटा संस्कारी था। उसके मन में अपनी माता के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना भरी हुई थी।
        इस कथा का सार मात्र इतना ही है कि माता-पिता अपने बच्चों को लाड़ लड़ाते हुए उद्दण्ड, नकचढ़ा और सिरफिरा तो बना सकते हैं किन्तु लाखों रुपए खर्च करके भी उन्हें संस्कारवान नहीं बना सकते। बचपन में जैसे संस्कार बच्चों में डाले जाते हैं, वे उसी के अनुसार ही बन जाते हैं। 
         कई घरों में देखा है कि छोटे बच्चे से बड़े सदस्य कहते हैं, "मॉं के बल पकड़ लो या पिता को चाँटा मार दो। अपनी तुतलाती बोली में गाली बोलकर बताना।"
         जब बच्चा बालपन में यह हरकतें अपने घर वालों की मर्जी से करता है तब घर के लोग उसकी उस बालसुलभ चंचलता पर प्रसन्न होते हैं, उस पर बलिहारी जाते हैं। उस समय बच्चे के मन में यह बात घर कर जाती है कि वह निश्चित ही कोई अच्छा और बड़ा काम कर रहा है जिससे घर के सब लोग खुश हो रहे हैं। 
          बड़ा होकर बच्चा जब यही सब करता है तो उसे मारा-पीटा जाता है या उस पर क्रोध किया जाता है। तब बच्चे को यह समझ में नहीं आता कि बचपन से जो कार्य वह करता हुआ आ रहा है वे अचानक गलत कैसे हो गए? उसे किसलिए सजा दी जा रही है? 
        इसके अतिरिक्त घर के सदस्यों का परस्पर व्यवहार देखकर छोटा बच्चा बहुत कुछ सीख जाता है। उस सबको बारीकी से परखते हुए वह भी वैसा ही व्यवहार करने लगता है। हद तो तब पर हो जाती है जब घर के बड़े सदस्य उससे एक-दूसरे की जासूसी का काम लालच देकर उससे करवाते हैं। इससे उसे दूसरों की भावनाओं से खेलने की समझ स्वत: ही आ जाती है। रिश्वतखोरी और दूसरे व्यक्ति को ब्लैकमेल करना, वह मासूम बच्चा बखूबी जान जाता है। 
          कभी-कभी घर में कोई व्यक्ति आ जाता है और मनुष्य उसे पसन्द नहीं करता अथवा वह उससे उस समय किसी कारण से बात नहीं करना चाहता तो बच्चे से कह दिया जाता है, "बेटा, बाहर जाकर अंकल से कह दो कि पापा घर पर नहीं हैं।"
          इस तरह बच्चा झूठ बोलना सीख जाता है।बड़े होकर वह अपनी गलतियॉं छुपाने लगता है। इस सबका का यही कारण है कि बच्चे ने अपनी ट्रेनिंग अच्छे से कर ली है।
         वैसे तो बाहरी परिवेश यानी आस-पड़ोस अथवा विद्यालय के साथियों का प्रभाव बच्चे पर अवश्य पड़ता है। परन्तु यदि घर के संस्कार मजबूत हों तो बाहरी संस्कार उस बच्चे पर हावी नहीं हो सकते। इसलिए बच्चे में छुटपन से ही सुसंस्कारों को रोपित कीजिए जिससे बड़े होने पर यह पौधा सड़ने या मुरझाने न पाए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 7 सितंबर 2026

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें

अपने व्यवहार के प्रति सावधान रहें 

मनुष्य इस संसार में शत्रु अथवा मित्र लेकर पैदा नहीं होता बल्कि यहाँ रहते हुए उनका चयन करता है। अपनी सहृदयता से, अपने सद् व्यवहार से वह किसी भी पराए को जीवन भर के लिए अपना बना सकता है। कठोर-से-कठोर व्यक्ति को वह मोम की तरह पिघला सकता है। उसे शीघ्र ही अपना प्रिय बना सकता है।
          इसके विपरीत नाक के बाल के सामान अपने किसी प्रियजन अथवा किसी भी मित्र को क्षण भर में शत्रु बना सकता है। यह सब उसकी मानसिकता और सूझबूझ पर निर्भर करता है। मनुष्य को समझते हुए कबीरदास जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
          जो तोको काँटे बोए ताको दीजो फूल।
          तोको फूल के फूल हैं वा को हैं तिरसूल।।
इस दोहे का सार यही है कि दूसरों का शुभ करते चलो। जो रास्ते में काँटे बिछाने का काम करता है, उसे फूल दो। इसका कारण है कि परोपकारी मनुष्य को अन्ततः फूल मिलते हैं। इसके विपरीत दूसरे व्यक्ति को कुदरत के न्याय के अनुसार त्रिशूल जैसे कष्ट मिलते हैं।
          ऐसा ही भाव हमने एक फिल्म में भी देखा था जहाँ अपने साथ शत्रुता करने वाले लोगों को संजय दत्त अपने साथियों के साथ जाकर फूल भेंट करते हैं। 
        कहने का तात्पर्य यही है कि यदि मनुष्य थोड़ा-सा सहनशील होकर दूसरे की बुराई का उत्तर उसकी भाषा में न देकर, उसे क्षमा करता हुआ उसके साथ अच्छा व्यवहार करता है तो उसे उसका सुफल अवश्य मिलता है। इसीलिए ऐसे महापुरुषों को इस समाज में युगों-युगों तक याद किया जाता है। वे समाज के दिग्दर्शक बनते हैं।
        दूसरों का हित चाहने वाले को वक्ती तौर पर दुःख या परेशानी का सामना करना पड़ सकता है अथवा दूसरों के कोप का भजन बनना पड़ सकता है परन्तु अन्ततः जीत अच्छाई और सच्चाई की ही होती है। लोगों को समय बीतते स्वयं ही यह अहसास हो जाता है कि उन्होंने उस व्यक्ति विशेष को पहचानने में भूल कर दी है। अपनी इस गलती के लिए तब वे क्षमा याचना करने के लिए उसके पास आते हैं।
          इसी भाव को प्रकट करती हुए एक घटना जो वाट्सअप पर पढ़ी थी, उसे अपने अनुसार लिख रही हूँ।
        किसी व्यक्ति ने अपने लिए एक नया घर खरीदा जिसमें फलों के पेड़ लगे हुए थे। उसके पड़ौस में एक पुराना-सा मकान था जिसमें बहुत लोग रहते थे। एक दिन उसने देखा कि पड़ोस के मकान से किसी ने ढेर सारा कूड़ा उसके घर के बाहर दरवाजे पर डाल दिया है। उसने उनसे जाकर झगड़ा नहीं किया। बल्कि शाम को वह व्यक्ति एक टोकरी में ताजे फल रखकर उस पड़ोसी के घर पर चला गया।
          पड़ोसी उसे देखकर परेशान हो गए कि वह शायद उनसे सुबह की उस घटना के लिये झगड़ा करने आया होगा। दरवाजा खोलते ही वे हैरान हो गये कि जिसे वे भला-बुरा कह रहे थे, वही व्यक्ति चेहरे पर मुस्कान लिए रसीले ताजे फलों की भरी टोकरी के साथ सामने खडा था। 
         उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "अपने पेड़ों के ताजे फल मैं आपके लिये लाया हूँ। कृपया इन्हें स्वीकार करें।"
          इसमें कोई दोराय नहीं है कि मनुष्य अपने व्यवहार से किसी के हृदय में अपना स्थान बना सकता है। यदि मनुष्य के पास किसी को देने के लिए कुछ भी नहीं है पर अपनी गलतियों की माफी उसे स्वयं से ही माँग लेनी चाहिए। इस जीवन का कोई भी भरोसा नहीं है कि अगले पल उसकी ये आँख खुले-न-खुले।
        मनुष्य इस संसार में रहते हुए जो भी दूसरों को देता है, वही उसे ब्याज सहित वापिस मिल जाता है। फिर चाहे वह प्यार हो या घृणा, खुशी हो या गम, नेकी हो या बदी। अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह समाज से क्या पाना चाहता है और क्या नहीं?
        अपने हृदय को यदि विशाल बना लिया जाए तो सामने वाले की ओछी हरकत पर गुस्सा नहीँ आता अपितु उससे सहानुभूति होती है। मन ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि अमुक व्यक्ति को वह सद् बुद्धि दे। 
        हमारी भारतीय परम्परा में तो काटने से मौत देने वाले विषधर यानी साँप को भी दूध पिलाने का विधान है। नागपंचमी के दिन लोग उसकी पूजा करके उसे दूध पिलाते हैं।
        यदि बुरे लोग अपनी बुराई नहीं छोड़ते तो अच्छे लोगों को अपनी अच्छाई किसी भी शर्त पर नहीं छोड़नी चाहिए। अपने व्यवहार के प्रति सदैव यत्नपूर्वक सावधान रहना चाहिए। मनुष्य के अच्छे व्यवहार के कारण वह समाज में लोकप्रिय और सम्मानित बन जाता है। उसके इस संसार से प्रस्थान करने के पश्चात भी लोग उसके सद् व्यवहार के कारण उसे स्मरण करते रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 6 सितंबर 2026

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते

धन-सम्पत्ति की तरह मूल्यवान रिश्ते 

रिश्ते मनुष्य की धन-सम्पत्ति की तरह ही बहुत मूल्यवान होते हैं। उन्हें यत्नपूर्वक सहेजकर रखना पड़ता है। धन को यदि बैंक में जमा करवा दो तो उस पर ब्याज मिलता है और वह बढ़ता रहता है। उसी प्रकार रिश्तों की जमा पूँजी भी तभी बढ़ती है जब मनुष्य उनका कद्र करता है, उन सबके साथ वह समानता का व्यवहार करता है और उन्हें यथोचित मान-सम्मान देता है। बढ़ती हुई रिश्तों की यह पूॅंजी उसका सम्बल बनती है। उनके रहते उसे कभी अकेलापन नहीं सताता।
          यदि हम बैंक में जमा अपने धन को बार-बार निकालते रहते हैं, उसमें कुछ जमा नहीं करते तो धीरे-धीरे वह धन समाप्त होने लगता है। उसी प्रकार अपने रिश्तों की पूॅंजी को हम अपने झूठे अहं के कारण गॅंवाते जाऍंगे तो वे भी हमसे दूर होते जाऍंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा जब हम अकेले पड़ जाऍंगे। हमारे पास अपना कहने के लिए कोई नहीं होगा। उस समय हमें उनकी कमी अखरने लगेगी। उस पछताना व्यर्थ होगा।
        वह सम्पत्ति जो अपने या किसी परिवारी जन के नाम पर हो तो वास्तव में वही अपनी होती है। यदि बेनामी सम्पत्ति हो और उसके विषय में किसी को पता न हो तो कोई गारण्टी नहीं होती कि वह अपनी रहेगी भी या नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि जिसके नाम पर वह सम्पत्ति है, वही कल को धोखा दे जाए और वह अपने हाथ से निकल जाए। उस समय मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। तब उसे समझ आता है कि सम्पत्ति अपने नाम ली होती तो अच्छा होता।
       उसी तरह रिश्ते भी होते हैं, वे तभी तक अपने बने रहते हैं जब तक उनकी पहचान होती है। यानी कि माता, पिता भाई, बहन, चाचा, बेटा, बेटी, मित्र आदि कोई भी नाम उनका हो सकता है। यदि उनकी पहचान खोने लगो तो उनके खो जाने का डर हमेशा बना रहता हैं। जब इन रिश्तों से दूरी बनने लगती है तो ये मनुष्य से विलग हो जाते हैं। तब मनुष्य की पूॅंजी में कटौती होने‌ल लगती है।
        यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि जिन्दगी के बैंक में जब प्रेम और सौहार्द का बैलेंस कम होने लगता है तभी सुख और रिश्तों के चैक बाउंस होने लगते हैं। मनुष्य सदा अपने रिश्तेदारों से ही सुशोभित होता है। किसी भी खुशी या गम में यदि अपनों का साथ न हो तो जीवन नीरस हो जाता है। उनके बिना मनुष्य को अपना अस्तित्व शून्य जैसा प्रतीत होने लगता है।
         मनुष्य का रिश्ता ऐसा होना चाहिए जिस पर उसे नाज हो। उन पर उसे सदा मान और भरोसा होना चाहिए। रिश्ता वही होता अपना होता है जो सदा अपनेपन की अहसास देता हो। सुख या दुःख में साथ निभाने वाले रिश्ते शीघ्र ही सिमटकर रह जाते हैं, उनमें दूरी अधिक होती है और सम्बन्ध केवल दिखावे भर के होते हैं। उनमें उतनी गर्माहट नहीं होती जितनी किसी एक रिश्ते में वास्तव में होनी चाहिए।
         मनुष्य का यह जीवन और रिश्ते दोनों मौसम की तरह होते हैं कभी सर्द और कभी गर्म। पेड़-पौधों को यदि समय पर खाद और पानी देते रहो तो वे अपने समय पर हमें छाया तथा फल देते हैं। यदि उनको नजरअंदाज कर दो तो वे पनपते ही नहीं हैं, मुरझा जाते हैं। ऐसे ही पतझड़ के मौसम में जब पेड़ों के पत्ते सूख जाते हैं और वे ठूँठ होकर बदसूरत दिखाई देने लगते हैं, उस समय प्रकृति भी नीरस लगने लगती है।
         उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में जब अहं रूपी पतझड़ आ जाता है तब रिश्ते मुरझा जाते हैं यानी उनमें दूरियाँ बढ़ जाती हैं। वे मनुष्य को बोझ की तरह लगने लगते हैं। मनुष्य की पहुँच से दूर होकर वे उसे संसार सागर में हिचकोले खाने के लिए अकेला छोड़ देते हैं। जब उसे इस सबका होश आता है तो वह स्वयं को बिल्कुल अकेला पाता है। यह उसके लिए कष्टकारी स्थिति बन जाती है।
        अच्छे और  सच्चे रिश्ते उन्हें ही कहा जा सकता है जो हमेशा हवा की तरह खामोशी से मनुष्य की जीवनीशक्ति की तरह उसके आसपास बने रहें। उसे कभी अकेलेपन का अहसास न होने दें। उनके साथ से वह खिल जाए। उनके बिना तो मानो उसका जीना ही दुश्वार हो जाए।
         एक सार की बात यहॉं बताना चाहती हूँ कि धनवान व्यक्ति वह नहीं होता जिसकी तिजोरी सदा नोटों या सोने-चाँदी के आभूषणों से भरी रहे अथवा ईश्वर की कृपा से वह बहुत ही सुख-सुविधाओं का भोग करता हो।
         मेरे विचार में उसी व्यक्ति को हम धनी कह सकते हैं जिसकी तिजोरी धन के बजाय सच्चे रिश्तों की पूँजी से भरी हुई होती है। दूसरे शब्दों में मनुष्य के रिश्ते जितने अधिक मजबूत होते हैं, उतना ही उसकी भुजाऍं होती हैं। ऐसा व्यक्ति भौतिक रूप से शक्तिशाली बन जाता है।
        अपने रिश्तों की पूँजी को व्यर्थ ही अपने अहं के कारण गॅंवाना नहीं चाहिए अपितु उन्हें अपने साथ लेकर चलते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 5 सितंबर 2026

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज का बड़ा कलंक

सभ्य समाज के माथे पर लगने वाला यह बहुत बड़ा कलंक है कि यदि उसके आयुप्राप्त बुजुर्गों के लिए घर में स्थान न हो। वह घर-परिवार एक श्मशान की तरह है जहाँ उनके वृद्ध हुए माता-पिता की सुरक्षा अथवा देखभाल नहीं की जा सकती। उन्हें घर पर सम्मान देने के स्थान पर ओल्ड होम में भेजने की योजना बनाई जाए। वास्तव में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही कही जा सकती है।
       माता-पिता अपना सारा जीवन बच्चों के लालन-पालन में व्यतीत कर देते हैं। उनकी खुशी में खुश होते हैं और उनके कष्ट में दुखी हो जाते हैं। साधन सम्पन्न लोगों की तो खैर बात ही अलग है। वे अपने बच्चों की सारी आवश्यकताएँ सुविधा से पूरी करते हैं। परन्तु जिनके पास उतनी सुविधाएँ नहीं हैं, वे माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए कोई कमी नहीं छोड़ते।
        आजकल लोग घर में कुत्ते-बिल्लियाँ पालते हैं और उनकी देखभाल के लिए नौकरों की फौज भी रखते हैं। उन पर वर्षभर में लाखों रुपए हँसी-खुशी खर्च देते हैं किन्तु माता-पिता को देने के लिए कुछ थोड़ी-सी राशि उनके पास नहीं बचती। यानी सारी कटौती उन्हीं के लिए की जाती हैं। इसे हम उन बच्चों का दुर्भाग्य ही कहा सकते हैं।
       धन्य हैं ऐसी नालायक सन्तान जिसे इतनी भी तमीज नहीं कि वे रत्तीभर भी अपने माता-पिता की परवाह कर लें। यह देख लें कि उन्होंने भोजन खाया है या नहीं, कहीं उनका स्वास्थ्य तो खराब नहीं है, उन्हें दवा की आवश्यकता तो नहीं, उनके पास पहनने के लिए वस्त्र तो हैं। ऐसे घरों में किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान, दिए जाने वाले दान आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। वहाँ से सुख-शान्ति कब उड़न छू हो जाती है, पता ही नहीं चलता।
       इन्हीं कपूतों को पाने के लिए माता-पिता ईश्वर से हाथ जोड़कर पुत्र की कामना करते हैं। जो उनके जीते जी सेवा नहीं कर सकता, उनका ध्यान नहीं रख सकता वह उन्हें कौन से तथाकथित नरक से उभारेगा, जैसी कि मान्यता है।
        इन्हीं कपूतों के लिए बेटियों को जन्म लेने से पहले ही माता के गर्भ में मार दिया जाता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकॉंश बेटियों को अपने माता-पिता की परवाह बेटों से अधिक होती है। वे आजन्म उनकी चिन्ता करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर उनका सहारा भी बनती हैं।
        बहुत दुर्भाग्य की बात है कि अपने माता-पिता के लिए चिन्तित रहने वाली यही बेटियाँ जब बहु बनकर ससुराल जाती हैं तो वहाँ जाकर सास-ससुर को ही भार मानने लगती हैं। उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने में कोताही बरतती हैं। वहाँ जाकर उन्हें सारी नैतिकता भूल जाती है। उन्हीं माता-पिता समान सास-ससुर से उन्हें उनकी सारी धन-सम्पत्ति चाहिए होती है। उनके सारे कर्त्तव्य तो उन्हें बड़ी अच्छी तरह से याद रहते हैं परन्तु अपने दायित्वों से वे मुॅंह मोड़ लेती हैं। यानी उन्हें अपने कर्त्तव्य बिल्कुल भूल जाते हैं।
          यही कारण है कि आवश्यकता से अधिक पढ़ी-लिखी आज की यह युवा पीढ़ी अपने सारे कर्त्तव्यों को ताक पर रखकर मात्र अपने ही स्वार्थ को साधने में लगी रहती है। जिसका परिणाम बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। जिनकी पूजा करनी चाहिए थी, वे ईश्वर तुल्य माता-पिता उन्हें बहुत बड़ा बोझ लगने लगे हैं।
        घर के बुजुर्गों को या तो कोने में किया जा रहा है या फिर परेशान होकर उन्हें किसी वृद्धाश्रम की शरण में जाना पड़ रहा है। यहाँ भी धन प्रधान है। यदि वह है तो मनचाही सुविधाएँ मिल जाएँगी अन्यथा पूछ नहीं होती। कितने दुर्भाग्य की बात है कि अकेले माता-पिता दस बच्चों को पाल सकते हैं परन्तु दस बच्चों के होते हुए वे दरबदर की ठोकरें खाने को विवश हैं।
         कभी वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिले तो वहाँ विद्यमान वृद्धों से यह अवश्य पूछना कि आपका बेटा क्या करता है? उनमें से अधिकॉंश बजुर्गों का यही उत्तर होगा कि उनका बेटा बड़ा अफसर है या नामी डॉक्टर है या सुप्रसिद्ध वकील है या योग्य इंजीनियर है या मजिस्ट्रेट है अथवा किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। इन सभी पढ़े-लिखों को क्यों और किसलिए कोई उनके कर्त्तव्य का बोध कराए।
         इसके विपरीत शायद ही कोई वृद्ध वहाँ पर ऐसा मिलेगा जिसका बेटा अनपढ़ है या गरीब है। इसका कारण है कि अनपढ़ या गरीब व्यक्ति को समाज और ईश्वर का डर होता है। उसके मन में कभी यह बात कभी नहीं आएगी कि माता-पिता को कभी वृद्धाश्रम भेजा जा सकता है।
       यदि पाश्चात्य जगत के अन्धानुकरण के कारण यही आधुनिक युग का सत्य बनता जा रहा है तो इस सच्चाई पर सौ बार धिक्कार है। ऐसी सन्तान के लिए तो अन्ततः माता-पिता यही कह बैठते हैं ऐसी सन्तान के न होने पर वे निस्सन्तान रह जाते तो अच्छा था। ईश्वर तथाकथित शिक्षित और सभ्य कहलाने वाली ऐसी नालायक पीढ़ी को सद् बुद्धि प्रदान करे।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 2 सितंबर 2026

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय के फेर में उलझता इन्सान

समय किसी मनुष्य के बाँधने से थम नहीं जाता। वह तो निरन्तर अपनी गति से प्रवाहित होता रहता है। कहते हैं कि महाबली रावण ने अपने समय में काल को अपने सिरहाने बाँधकर रखा था। फिर भी काल ने उसका पक्ष नहीं लिया। न ही उसे उसकी गलतियों के लिए बख्शा। समय किसी को क्षमा नहीं करता चाहे वह व्यक्ति स्वयं को कितना शक्तिशाली समझने की भूल क्यों न करता रहे।
          समय के इसी फेर बदल में इन्सान सदा उलझा रहता है पर इसका रहस्य वह आयुपर्यन्त नहीं जान पाता। मनुष्य का समय कभी अच्छा होता है और कभी वह पटकनी खाने लगता है। यानी कभी वह उन्नति करता है और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसके विपरीत वह कभी अनथक दुखों और परेशानियों में घिरकर लाचार हो जाता है। उस समय उसका किया गया परिश्रम इच्छानुसार फलदायी नहीं हो पाता।
          समय के इस फेर से बचने के लिए मनुष्य विभिन्न उपाय करता रहता है। धर्मस्थानों में जाता है, तीर्थ यात्राएँ करता है, तन्त्र-मन्त्र वालों के जाल में फंस जाता है, जंगलों की खाक छानता है और कभी-कभी तथाकथित धर्मगुरुओं की शरण में भी चला जाता है। फिर भी समय के इस दुस्सह फेर से बाहर निकालने में वह स्वयं को असमर्थ पाकर सिर धुनने लगता है।
          ग्रन्थों में एक प्रसंग ऐसा भी आता है कि एक बार धनुर्धारी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध किया, "प्रभु! इस दीवार पर कुछ ऐसा लिख दीजिए कि जब खुशी में पढूँ तो दुख हो और जब दुख में पढूँ तो मुझे प्रसन्नता हो।"
         प्रभु ने अर्जुन के आग्रह पर बस यह वाक्य लिखा, "यह समय व्यतीत हो जाएगा।"
          इस प्रसंग का तात्पर्य यही है कि यह समय हर परिस्थिति में बदल जाता है। जब मनुष्य सुखों का भोग कर रहा होता है तो वह समय भी बीत जाता है। इसी प्रकार दुखों-कष्टों का समय भी सदा नहीं रहता, वह भी बदल जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य का अच्छा या बुरा कैसा भी समय हो, अन्ततः वह समय बदल ही जाता है। 
        समय कभी अच्छा या बुरा नहीं होता बल्कि अच्छी या बुरी इन्सान की वे सभी परिस्थितियाँ होती हैं जो उस समय विशेष पर मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। उनके कारण ही वह कभी-कभी विचलित भी होने लगता है और उससे बचने के लिए कुमार्ग को अपना लेता है। समय बीतते जब उसे होश आता है तो पश्चाताप करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचता। उस समय वह सोचता है कि काश उसने वह कुमार्ग कभी चुना ही न होता।
        मनुष्य जब प्रसन्न होता है तो कह दिया जाता है कि फलाँ व्यक्ति का समय अच्छा चल रहा है तभी तो वह जीवन की ऊँचाइयों को छू रहा है। इसके विपरीत जब वह कष्ट में होता है तब आम भाषा में कह दिया जाता है कि उस व्यक्ति विशेष का समय खराब चल रहा है, तभी उसकी ऐसी दुर्दशा हो रही है। ईश्वर न जाने उस बेचारे पर कब अपनी मेहरबानी करेंगे? 
        इसी बात को हम इन शब्दों में कह सकते हैं कि आदिकाल से ही समय अपनी गति से समान रूप से चलता जा रहा है। न वह किसी की भलाई करता है और न ही वह किसी का अनिष्ट करता है। उसके लिए सभी जीव एक सामान हैं। इसीलिए सबके ही साथ वह समान रूप से व्यवहार करता है। ईश्वर का यह कठोर नियम है कि दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन आता है। सही ऋतुऍं अपने समयानुसार परिवर्तित होती रहती हैं। किसी के भी कहने से समय का यह क्रम कभी बदलता नहीं है।
          मनुष्य के जीवन में पहिए के अरों की तरह समय ऊपर-नीचे होता रहता है। अर्थात् सुख और दुःख उसके जीवन में क्रम से आते रहते हैं। जीवन की धूप-छॉंव का यह सम्पूर्ण क्रम उसे उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलता है। जैसे भी सुकर्म या दुष्कर्म उसने किए होते हैं, उनसे उसे किसी भी तरह छुटकारा नहीं मिल पाता। 
          जब तक मनुष्य अपने किए गए शुभाशुभ कर्मों का फल भोग नहीं लेता तब तक वह जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन में जकड़ा हुआ चौरासी लाख योनियों के फेर में ही भटकता रहता है। इससे उसकी मुक्ति सम्भव नहीं हो सकती। 
          समय को सदा दोष देते रहने का कभी कोई औचित्य नहीं होता। समय का वरद हस्त हम सब पर हमेशा बना रहता है। बस हम अज्ञ लोग समझ नहीं पाते। उसका सदुपयोग करता हुआ मनुष्य इस संसार सफल हो जाता है और दुरुपयोग करता हुआ व्यक्ति अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य कर बैठता है। इसलिए समय के साथ यदि मनुष्य कदम मिलाकर चल सके तो यह उसका सौभाग्य बन जाता है। फिर उसे अपने जीवन में कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 31 अगस्त 2026

संजीवनी बूटी है मुस्कुराहट

संजीवनी बूटी है मुस्कराहट

मुस्कराहट एक ऐसी संजीवनी बूटी है जो सामने वाले को जीवन दान देने का कार्य करती है। उसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। यह तो मनुष्य की प्रसन्नता और सम्पन्नता की पहचान है। उसकी मुस्कराहट कई चेहरों को मुरझाने से बचा सकती है और उन्हें खुशियाँ दे सकती है। मुस्कुराहट चेहरे पर आने वाला एक बहुत सुन्दर भाव है। यह सच्ची खुशी, प्यार और शान्ति का एक प्रतीक है। एक छोटी-सी मुस्कान मनुष्य के तनाव को कम करने में सहायक होती है। सामने वाले का दिल जीतने में यह सफल हो जाती है।
        प्रातःकाल पूर्व दिशा से मुस्कुराते हुए जब सूर्य देवता का उदय होता है, उस समय ब्रह्माण्ड में चारों ओर ही खुशियाँ छा जाती हैं। उस समय पक्षियों का कलरव वातावरण को जीवन्त कर देता है। प्रकृति जब रंग-बिरंगे फूलों के रूप में मुस्कुराती है तब उनके पास से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इसी प्रकार नदियों की कलकल ध्वनि मानो एक संगीत में सबसे बॉंध देती है। ये सभी प्रकृति की प्रसन्नता के द्योतक कहे जाते हैं।
        एक मधुर मुस्कान युक्त किसी व्यक्ति किसी के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। अपने समक्ष आने वाले हर इन्सान के लिए वह जादू का काम करती है, उसके दुःख-दर्द पालक झपकते ही मानो छूमन्तर हो जाते हैं। यह मुस्कान मनुष्य के लिए जादू की झप्पी का काम करती है।
          हम सबने अनुभव किया है कि कष्ट और परेशानी से तड़पता हुआ मरीज यदि डॉक्टर के पास जाता है और वह मुस्कराते हुए उस मरीज की परेशानी को सुनकर कर उसका इलाज करता है। उसके दर्द पर अपना स्नेहासिक्त हाथ रखता है तो मरीज को ऐसा लगता मानो उसकी आधी बिमारी वहीं दूर हो गयी। रोगी का डॉक्टर के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह शीघ्र ही स्वस्थलाभ करेगा।
          अपना सामान खरीदने के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी मॉल या दुकान में जाता है और वहाँ पर मौजूद सेल्समेन अथवा दुकानदार उसका मुस्कुराकर स्वागत करता है, ध्यान देते हुए उसकी इच्छित वस्तुएँ दिखाता है तो मनुष्य प्रसन्न हो जाता है। उस स्थान को वह अपने लिए निर्धारित कर लेता है। फिर बार-बार वहाँ आकर ही अपना मनचाहा सामान खरीदता है।
          एवंविध कोई व्यापारी हैं अथवा बॉस प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए अपने दफ्तर में प्रवेश करता है तो कर्मचारियों के मन में रहने वाला प्रेशर कम हो जाता है। आफिस का माहौल खुशनुमा होने से सभी कार्य सुचारू रूप से और व्यवस्थित होने लगते हैं। इस प्रकार वह कम्पनी या कार्यालय सबके लिए एक आदर्श बन जाता है। वहॉं कार्य करने का एक अच्छा माहौल बन जाता है। इससे कर्मचारियों के काम करने की क्षमता में अपेक्षाकृत सुधार होने लगता है।
            एक अध्यापक यदि मुस्कुराते हुए अपनी कक्षा में प्रवेश करता है तो वहाँ विद्यमान सभी विद्यार्थियों के चेहरों पर स्वयं ही मुस्कान खिलने लगती है। उस कक्षा का वातावरण खुशनुमा बन जाता है, छात्रों का मन भी पढ़ने में लगने लगता है। पढ़ने-पढ़ाने का आनन्द कई गुणा बढ़ जाता है। वह अध्यापक छात्रों का प्रिय बन‌जाता है।
        जब हम अपनी फोटो खिंचवाते है तो फोटो खींचने वाला यही कहता है- smile please. यदि जरा-सा मुस्कुरा देने से हमारी फोटो अच्छी आ सकती है तो फिर खुलकर हँसने से जिन्दगी की सारी तस्वीर बहुत ही सुन्दर हो सकती है।
        सदा ही मुस्कुराहटें बिखेरने वाला व्यक्ति यदि उदास हो जाए तो किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा। उससे लोग पूछने लग जाते हैं कि भाई क्या बात है आज उदास क्यों हो गए? इसका कारण यही है कि सदा मुस्कान बिखेरने वाले लोग अपने आसपास बहुत कम मिलते हैं। इसका दूसरों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
          यदि इन्सान दिन भर के काम की थकान के बावजूद शाम को मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश करता है तो पूरा परिवार आनन्दित हो जाता है। ऐसे खुशगवार माहौल में आकर व्यक्ति की अपनी थकावट भी दूर हो जाती है और परिवारी जनों के साथ की जाने वाली गपशप से मन बहलने के साथ-साथ घर-परिवार की कई समस्याएँ भी सुलझ जाती हैं।
          कुटिल मुस्कान वालों से बचकर रहना बहुत आवश्यक होता है। बात वही है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। यानी जहाँ हमने इन्सान को समझने की भूल की वहीं उसके जाल में उलझकर दलदल में फंसने जैसी बात हो जाती है। सावधानी रखने से ऐसे लोगों को देख-परखकर किनारे किया जा सकता है।
          हँसने और मुस्कुराने का वरदान ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही दिया है। छोटे बच्चे की एक मुस्कान पर सारा घर बलिहारी होने लगता है। उसी प्रकार किसी भी भी मनुष्य की सरल और सहज मुस्कान सबको हरने वाली होती है। 
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 30 अगस्त 2026

मनुष्य का गुणग्राही होना

मनुष्य का गुणग्राही होना

गुणग्राही होना मनुष्य का स्वभाव होता है। आपने अन्तस् में सद् गुणों का समावेश करते हुए वह गुणों का पारखी बन जाता है। उसे लोग हंस की तरह नीरक्षीर विवेकी मानने लगते हैं। विश्व के अन्य जीव-जन्तुओं से अलग यही गुण उसकी एक विशेष पहचान बनाते हैं।
       मनुष्य का गुणग्राही होना उसका श्रेष्ठ स्वभाव होता है। इसमें व्यक्ति दूसरों के दोषों को नजरअंदाज करके उनके अच्छे गुणों को देखता और अपनाता है। यह उदार सोच इन्सान को जीवन में तेजी से आगे बढ़ाती है और समाज में आदर दिलाती है। दूसरों में कमियॉं खोजने के स्थान पर वे उनकी खूबियों को पहचानते हैं। 
         हर व्यक्ति और परिस्थिति से कुछ-न-कुछ अच्छी बात ग्रहण करते हैं। ये लोग ईर्ष्या-द्वेष और अहंकार से दूर रहते हैं। लोग ऐसे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति का सम्मान करते हैं और उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर स्वयं को गौरवान्वित समझते हैं।
       रामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था कि मक्खियाँ दो प्रकार की होती हैं। एक शहद की मक्खियाँ होती हैं जो शहद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं खाती। दूसरी साधारण मक्खियाँ होती हैं जो शहद पर भी बैठती हैं और यदि सड़ता हुआ घाव दिखाई दे जाए तो तुरन्त शहद को छोड़कर उस पर भी जाकर बैठ जाती हैं।
        मक्खी का यह उदाहरण मनुष्यों पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है। शहद वाली मक्खी की तरह गुणग्राही लोग सदा शहद यानी अच्छाई के ही पक्षधर होते हैं। ये लोग हर स्थान पर कुछ-न-कुछ शुभ तलाश ही लेते हैं। 
          ऐसे महानुभाव गन्दगी में से अपने मतलब की अच्छाई को खोज निकालते हैं। कितनी भी गन्दगी क्यों न हो उसमें से जैसे हीरे को निकाल लेना समझदारी कही जाती है, उसी प्रकार ये पारखी लोग अपना हित कहीं भी रहते हुए साध लेते हैं। इसके लिए उन लोगों को किसी तरह का कोई भी अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता बल्कि यह उनके स्वभाव की विशेषता और दृढ़ता का परिचायक ही कहलाता है। 
          ऐसे महानुभाव दुर्जनों के संग नहीं करते, इन्हें केवल सज्जनों की संगति ही रास आती है। सद् ग्रन्थों का परायण और स्वाध्याय करते हैं। बस उसी में उनका मन रमता है। इसीलिए अपने जीवन में भौतिक साधनों के स्थान पर सदा आत्मोन्नति को प्रश्रय देते हैं। 
        दिन-रात उसी के बारे में सोचते रहते हैं और उसी मस्ती में डूब जाते हैं। ये सन्त प्रकृति के लोग दूसरों के लिए उदाहरण बन जाते हैं और समाज का दिशादर्शन करते हैं। समाज इन्हें सदा आदरणीय व्यक्ति का मान देता है। 
          इसके विपरीत दूसरे प्रकार के अन्य लोग मक्खियों की तरह इधर-उधर हर स्थान पर भिनभिनाते रहते हैं। जहाँ उन्हें अपना लाभ दिखाई देता है, वे वहीं के हो जाते हैं। इन्ही लोगों के लिए शायद कहा गया है- 
   जहाँ देखि तवा-परात वहीँ बिताई सारी रात।
        यानी जहाँ उनके स्वार्थ पूर्ण होते हैं वे वहीं के होकर रह जाते हैं। उन्हें किसी से कोई लेना देना नहीं होता। ये लोग अच्छाई की ओर जाते अवश्य हैं, अच्छा बनना भी चाहते हैं परन्तु जहाँ अधिक लाभ होता हुआ प्रतीत होता है, उस ओर आकृष्ट होकर अच्छाई की ओर से मुँह मोड़ लेते हैं।
        ये लोग अच्छाई का लबादा ओढ़कर गलत कार्य करने से परहेज नहीं करते। अपनी सफेदपोशी बनाए रखने के लिए तरह-तरह के षडयन्त्र रचते रहते हैं। 
          ऐसे लोग जो केवल अपने भौतिक स्वार्थो को अधिक महत्त्व देते है, वे कभी भी किसी धोखेबाज या चालबाज के धोखे या चाल का आसानी से शिकार बन जाते हैं। इसका कारण है कि वे इन्हें अपने जल में फँसाने के लिए आकर्षक जाल या चारा डालते रहते हैं। अपने मस्तिष्क से विचार न कर पाने और किसी सयाने से परामर्श न करने के कारण ये उन शातिर लोगों के झाँसे में आकर अपना बहुत कुछ गँवा बैठते हैं।
        कुछ समय पश्चात जब परेशानी में फँस जाते हैं तो हैरान रह जाते हैं कि उन्होंने क्या कर डाला? तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है तो वे इतनी दूर निकल गए होते हैं कि वहाँ से उनकी वापिसी सम्भव नहीं हो पाती।
        अपने तुच्छ भौतिक स्वार्थों का मोह छोड़कर इन्सान को विचारशील बनना चाहिए ताकि कोई उसे आसानी से न छल सके। अपने आस्तीन के साँपों से सावधान रहना चाहिए और शहद की मक्खी की भाँति अपने निर्धारित लक्ष्य पर डटे रहना चाहिए। न अपने जीवन मूल्यों का कभी त्याग करना चाहिए और न ही स्वयं को सन्तापों की भट्टी में झोंक देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद