हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान
हर व्यक्ति की इस संसार में अपनी एक पहचान होती है। जीव का जन्म इस धरा पर उसके पूर्वकृत कर्मों के अनुसार होता है। इसलिए हर व्यक्ति दूसरे से अलग होता है। उसी के अनुरूप उसका व्यवहार तथा चरित्र होता है। मनुष्य का जैसा चरित्र होता है, उसके मित्र भी वैसे ही होते हैं। यानी मनुष्य अपने चरित्र और आचार-व्यवहार के अनुसार ही अपने मित्रों का चयन कर लेता है।
दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सज्जन व्यक्ति को सज्जन लोग मिल जाते हैं और दुर्जन को दुर्जन का साथ मिल जाता है। नेता को अपने साथी नेता और अभिनेता को अभिनेता मिल जाते हैं। चोर को चोरी करने वाले बन्धुओं का साथ मिल जाता है। भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचार करने वाले मिल जाते हैं। रिश्वतखोर व्यक्ति रिश्वत लेने वाले लोगों का ग्रुप बना लेता है। इसी प्रकार धोखेबाज को धोखा देने वाले मित्र मिल जाते हैं। व्यवसायी को व्यवसाय करने वाले, नौकरी करने वाले को नौकरी करने लोग वाले मिल जाते हैं।
कहने का मात्र इतना ही अर्थ है कि इस संसार में अरबों-खरबों लोग विद्यमान हैं। वे सभी भिन्न-भिन्न प्रकृति के या आचार-विचार के होते हैं। मनुष्य अपने आचार-व्यवहार के अनुरूप ही अपने मित्रों का चुनाव कर लेता है। जैसा वह स्वयं होता है वैसे ही उसके संगी-साथी बन जाते हैं। अपने उन साथियों की संगति से ही वह समाज में पहचाना जाता है।
हर व्यक्ति की अपनी एक विशेष पहचान उसके अच्छे या बुरे कर्मों, विचारों और व्यवहार से बनती है। मनुष्य के महंगे कपड़ों या बाहरी रूप-रंग से उसकी पहचान नहीं बनती बल्कि उसके अच्छे संस्कारों और कार्यों से होती है। व्यक्ति की सोच और उसकी नीयत समाज में उसका वास्तविक स्थान तय करती है। सच्चा मनुष्य वही होता है जो अपने पैरों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भरता के साथ अपना जीवन जीता है।
शुद्धता या पवित्रता सदा मनुष्य के विचारों में परखी जा सकती है। यदि वह सहृदय व परोपकारी है तो उसके व्यवहार से स्वयं ही ये सद् गुण प्रकट हो जाते हैं। वह जहाँ भी रहेगा जनहित के कार्य ही करेगा। दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करता रहेगा। वह दिन-रात की परवाह किए बिना ही समाप्त में परहित के कार्यों को करने में व्यस्त रहता है।
इसके विपरीत यदि वह स्वार्थी, कठोर अथवा असहिष्णु होगा तो अपने व्यवहार से उन अवगुणों को समय-समय पर प्रकट करता रहेगा। यही अवगुण उसकी पहचान बन जाते हैं। यानी लोग कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति बड़ा क्रोधी है या लालची है अथवा स्वार्थी है इत्यादि। गाहेबगाहे उसके ये दुर्गुण सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं और उसके तिरस्कार का कारण बनते हैं।
मनुष्य को अपने आचरण से किसी को ऐसा सोचने पर विवश नहीं करने देना चाहिए कि वह है तो फूलों की तरह सुगन्ध फैलाने वाला पर अवगुण रूपी कीट उसे घुन की तरह खोखला कर रहा है। उसे ज्ञात ही नहीं हो पाता कि वह विनाश की ओर कब झुक गया?
ऐसा होना असम्भव-सा प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति विशेष है तो बहुत गुणवान पर उसके साथी दुष्प्रवृत्ति वाले लोग हैं। हाँ, अपवाद स्वरूप कोई ऐसा हीरा मिल जाए पर यह स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। प्रायः होता यही है कि दुर्जन अपने सम्पर्क में आने वाले सभी को अपने जैसा ही बना लेते हैँ। वे अपने व्यवहार से इतने लालच और आकर्षक उन्हें दिखाते हैं कि न चाहते हुए भी लोग उनके चंगुल में फँस जाते हैं।
यह सर्वथा सत्य है कि महापुरुष कुमार्गगामी व्यक्तियों को अपने सुचरित्र से ऐसे लोगों को दुष्कर्म करने से विमुख करके सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं और उनका कायाकल्प कर देते हैं। महर्षि वाल्मीकि और अगुलीमाल डाकू सहित अनेक महापुरुषों के उदाहरणों से इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं। बस उन्हें खोजने की आवश्यकता है।
वैसे देखा जाए तो हीरा कोयले की खदान में पाया जाता हैं। हीरे को लोग अपने सिर के ताज मे जड़ते हैं, उससे बने आभूषण पहनकर इतराते हैं।उपयोग करने के उपरान्त उसे सम्हालकर रखते हैं जबकि कोयले को जलाने के काम में लाते हैं। यही अन्तर सज्जनों और दुर्जनों के साथ किए जाने वाले व्यवहार में स्पष्ट देखा जा सकता है।
मनीषी कहते हैं जिस प्रकार हर नर में नारायण विद्यमान रहता है, उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में सद् गुणों का भण्डार भी रहता है। उसे उन गुणों को यूँ ही बुराइयों में परिवर्तित नहीं करना चाहिए। यह मनुष्य का परम सौभाग्य होता है कि उसके सिर पर मालिक का वरद हस्त सदा बना रहता है, बस उसे स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। ईश्वर कहता है कि मैं हमेशा आप सबके साथ हूँ। इसलिए मनुष्य को सदा ही सावधान रहना चाहिए। उसे बुराई के रास्ते को छोड़कर अच्छाई के मार्ग को यत्नपूर्वक अपनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद