जीवन की डोर
हम सबके मन में यह जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से बार-बार उठती है कि क्या मनुष्य के जीवन की डोर उसके हाथ में है? यदि उसके हाथ में डोर नहीं तो किसके हाथ में है? क्या सारा जीवन वह ऊपर वाले के इशारों पर ही नाचता रहेगा?
इन प्रश्नों के उत्तर में यही कहा जा सकता है कि मनुष्य इस रंगमंच रूपी संसार में अपने चरित्र अथवा निर्धारित पात्र का अभिनय करने आया है। जो भी रोल उसे डायरेक्टर ईश्वर ने दिया है, उसे दक्षता से निभाना ही उसका दायित्व है। यदि वह अपना किरदार बखूबी निभाता है तो उसे लोगो की सराहना रूपी तालियाँ मिलती रहती हैं। चारों ओर उसका यश फैलता है। लोग उस मंझे हुए अभिनेता को अपनी सिर-आँखों पर बिठाते हैं। उसका मूल्य इस संसार रूपी रंगमंच पर बढ़ जाता है। सभी लोग उसे अपने पक्ष में करने के लिए मिन्नतें करने लगते हैं अथवा जुगाड़ करते रहते हैं।
इसके विपरीत यदि मनुष्य अपना किरदार निभाने में चूक हो जाता है तब उस पर सड़े-गले टमाटर व अंडे फैंके जाते हैं। यानी जीवन में उसे अपमान के घूँट कदम-कदम पर पीने पड़ते हैं। जीवन की बाजी हारे हुए ऐसे अभिनेता का मूल्य लोगों की नजर में कम हो जाता है। उसे इस रंगमंच पर अभिनय करने के लिए अच्छा रोल नहीं मिलता। यूँ कहें तो वह नाकारा घोषित कर दिया जाता है। ऐसे अभिनेता को फिर कोई अच्छा रोल नहीं मिल पाता।
जीवन सिनेमा की तरह नहीं होता। यहॉं उसे रंगमंच पर द्रष्टाओं के समक्ष अभिनय करना पड़ता है। वास्तविकता यही है कि यह संसार एक रंगमंच है। हम सभी जीव यहाँ अपना एक विशेष किरदार निभाने के लिए भेजे जाते हैं। कोई राजा तो कोई रंक, कोई अमीर तो कोई गरीब, कोई पुलिस तो कोई चोर, कोई जज तो कोई अपराधी, कोई साधु और कोई फरेबी, कोई नेता तो कोई अभिनेता। इस तरह अच्छे और बुरे सभी तरह के चरित्र वाले पात्र इस रंगमंच पर वह मालिक भेजता है। पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों के अनुसार ही वह हमारा रोल इस जन्म मे निर्धारित करता है।
हमें साथी कलाकार यानी नाते-रिश्तेदार व भाई-बन्धु वही मिलते हैं जिनके साथ कभी हमारा पूर्वजन्मों के सुकर्मों अथवा कुकर्मों का बकाया शेष होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जिनके साथ हमारा लेन-देन का सम्बन्ध होता है, उनके साथ ही हमें रिश्ता निभाना होता है। यह हमारी विवशता होती है कि हम उनसे अपनी नजरें चुराकर दूर नहीं भाग सकते। उनके साथ रहते हुए हमें जीवन में खट्टे-मीठे अनुभवों को इच्छा अथवा अनिच्छा से सॉंझा करना पड़ता है।
यदि हम उस ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो अगले जन्म के लिए मालिक हम सबको और अधिक अच्छा रोल देकर पुनः इस संसार में भेजता है। जिसमें हमें सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और बन्धु-बान्धव मिलते हैं। जीवन में यश मिलता है, चारों ओर से हमें वाहवाही मिलती रहती है।
इसके विपरीत यदि हम उस प्रभु की अपेक्षाओं पर किसी भी कारणवश खरे सिद्ध नहीं होते अथवा नाकारा सिद्ध हो जाते हैं तो वह आने वाले जन्म में अच्छा पात्र बनाकर नहीं भेजता। तब वह ऐसे-ऐसे रोल देता है जो सारा समय दुखों और परेशानियों में जीने वाले होते हैं। चारों ओर अपेक्षा, और तानों-उलाहनों को सहन करना पड़ता है। सारा जीवन अच्छा समय आने की प्रतीक्षा में ही व्यतीत हो जाता है।
मनुष्य का जन्म या मरण कब होगा, उसे सुख अथवा समृद्धि मिलेगी या नहीं, उसके जीवन में कब सुख अथवा दुख आएँगे ये सब वही ईश्वर निर्धारित करता है। वह चाहे तो मनुष्य घर से बाहर कदम निकाल सकता है अथवा हाथ में पकड़ा हुआ रोटी का निवाला मुँह तक ले जाकर खा सकता है। मनुष्य चाहे भी तो कहीं छुपकर नहीं बैठ सकता क्योंकि वह हर क्षण, हर पल उस मालिक की नजर में रहता है।
मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है। यदि वह इस स्वतन्त्रता का सदुपयोग करता है तो आगामी जन्म पुण्य कर्मों से भरा होता है। यदि मनुष्य उसका दुरुपयोग करते है तो सजा के रूप में निम्न योनियों में भेजता है। जैसे हम अपने बच्चों को अच्छा काम करने पर शाबाशी और पुरस्कार देते हैं और गलत काम करने पर सजा देते हैं। हम अपने बच्चों को कोई भी काम करने से पहले सदा चेतावनी देते रहते हैं, इसी प्रकार वह भी हमें अन्तरात्मा के द्वारा चेतावनी देता रहता है। यदि हम मान जाते हैं तब गलत काम नहीं करते और अगर सुनकर अनसुना करते हैं तो कष्ट पाते हैं।
निष्कर्ष से स्वरूप में हम कह सकते हैं कि निश्चित ही मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र होता है परन्तु उसका फल भोगने में नहीं। जहाँ तक हो सके जीवन में नियमानुसार जीने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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