गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

हरि भजन आवश्यक कार्य

हरि भजन आवश्यक कार्य

निम्नलिखित लोकोक्ति को पढ़कर हम अन्तस की पीड़ा का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं-
     आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास
अर्थात् मानव का यह चोला मनुष्य को ईश्वर की भक्ति करने के लिए मिला था पर इस संसार की हवा लगते ही मनुष्य यहॉं की चकाचौंध में खो जाता है। ईश्वर से किए हुए अपने सब वायदे भूलकर यहाँ के कारोबार में व्यस्त हो जाता है। फिर धीरे-धीरे उस मालिक की ओर से अपनी नजरें फेर लेता है।
           इस लोकोक्ति का हम यह अर्थ भी कर सकते हैं कि किसी महान अथवा उच्च उद्देश्य को छोड़कर किसी तुच्छ या साधारण काम में लग जाना है। यह लोकोक्ति मूल काम से भटककर अनावश्यक कार्यों में समय बर्बाद करने के सन्दर्भ में प्रयोग की जाती है। 
            मनीषियों का कथन है कि जब जीव माता के गर्भ में होता है तो उस समय वह कष्ट उससे सहन नहीं होता। ईश्वर को उस अन्धकार से बाहर निकालने के लिए वह गुहार लगता है। तब वह कसमें खाता है कि वह जन्म लेने के पश्चात उस मालिक की आराधना करेगा, उसे हर पल याद स्मरण करेगा और क्षण भर के लिए भी उसे नहीं भूलेगा।
             इस संसार में जब वह जन्म लेने के कुछ समय तक उसे अपनी सारी कसमें याद रहती हैं और उस प्रभु का स्मरण करता है। फिर धीरे-धीरे दुनिया के झमेलों में घिरता हुआ वह ईश्वर की ओर से विमुख होने लगता है। तब वह सोचता है कि सारी उम्र पड़ी है हरि का भजन करने के लिए, उसका नाम जपने की। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वह नित नए बहाने गढ़ने लगता है। 
            इस तरह करते हुए सारी आयु बीत जाती है और अन्तकाल आ जाता है परन्तु हरि भजन की आयु नहीं आ पाती। काल को सामने देखकर वह हाथ जोड़कर क्षमा याचना करता है परन्तु उस उस समय तक तीर निशाने से निकल चुका होता है और बचते हैं वही ढाक के तीन पात। कहने का तात्पर्य है कि तब प्रायश्चित करना ही शेष बचता है जिसका कोई लाभ नहीं होता। इसका कारण यही है कि तब उस समय मालिक मनुष्य को पश्चाताप करने के लिए पलभर का समय भी मोहलत के रूप में उधार नहीं देता।
            हम भी यदि किसी को समय सीमा निश्चित करके कोई काम देते हैं और वह तय समय में उस कार्य को नहीं कर पाता तो हम भी दूसरे व्यक्ति पर दया नहीं दिखाते बल्कि उसे लताड़ते हैं। एकाध बार तो हम उसे क्षमा कर सकते हैं परन्तु जब यह उसकी आदत बन जाती है तो हम उसे कदापि नहीं छोड़ते। और वह कार्य उससे छीन लेते हैं। यदि हम ऐसा व्यवहार दूसरे लोगों से करते हैं तो उस सर्वशक्तिमान परमेश्वर से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह बारबर हमें अपने काम में कोताही करने पर हमारी पुकार पर द्रवित हो जाए। हमें माफ करके थोड़ा और समय उपहार में दे।
            इस पृथ्वी पर हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उस मालिक निश्चित समय देकर हमें इस संसार में भेजता है। उसी समय के अनुसार हमें सौंपा गया कार्य निपटाना होता है। हम न जाने कितने जन्मों से अपने लिए निर्धारित कार्यों को पूरा नहीं कर रहे होते तो हम उस मालिक से आँख मिलाने का साहस ही नहीं जुटा पाते। हमारी बारबार याचना करने पर भी वह अनसुना करता है क्योंकि वह हमारी आदतों को भली-भाँति जानता है।
             इसीलिए मनीषियों के मन में यह क्षोभ रहता है कि मनुष्य दुनिया के बेकार के कामों में उलझे रहते हैं जिनके बिना उनका जीवन बड़ी आसानी से सुविधापूर्वक चल सकता था। जिस कार्य को करने का लक्ष्य लेकर वे इस धरा पर अवतरित हुए थे, उसे पूरा करने में सफल नहीं हो पाए। इसलिए वे नाकामयाबी का कलंक अपने माथे पर लेकर इस दुनिया से विदा हो रहे हैं।
            जब हम अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में होते हैं तब हम यह विचार करते हैं कि हम अच्छे कर्मों के साथ विदा लेंगे। यदि इस दुनिया में वापिस आना पड़े तो हम एक ऐसा इन्सान बनकर आऍं जो अपने अच्छे कर्मों के साथ आया है। बड़े दुख की बात है कि फिर से वही चक्र चलता है और हम वही गलतियॉं दोहराते हैं। हम एक दूसरे की बुराइयॉं करते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि  विशेष कार्य को छोड़कर हम अनावश्यक कार्य में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं। अपने को बुरे कर्मों के कारण फिर से उनका हिसाब अपने सिर पर खड़ा कर लेते हैं।
          उचित समय तो हमेशा ही रहता है। इसलिए उसकी प्रतीक्षा न करते हुए अपने लक्ष्य यानी ईश्वर की उपासना करते हुए मोक्ष प्राप्त करने की ओर मात्र ध्यान लगाना चाहिए। ऐसा करते हुए हम उस मालिक के प्रिय पात्र बनेंगे और उससे मुँह छिपाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। तब उसके पास जाने के लिए प्रसन्नता से समय की प्रतीक्षा करेंगे। उस समय मन में यह दुख नहीं होगा कि अपने लक्ष्य को भूलकर संसार के चक्रव्यूह में फंसे रहे।
चन्द्र प्रभा सूद 

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