ईश्वर की शरण में जाऍं
ईश्वर की शरण में जाने का अर्थ होता है अपने अहंकार को त्याग करके पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ प्रभु पर भरोसा करना। परमात्मा ने सभी जीवों को इस संसार में भेजा है। सदा उसका धन्यवाद करते रहना चाहिए। ऐसा करने से हमारी परेशानियाँ धीरे-धीरे खुशियों में बदल जाती हैं। खामोशी से यदि उनका सामना किया जाए तो वे सामान्यत: कम हो जाती हैं। इससे सांसारिक तनाव कम हो जाता है। धैर्य धारण करने पर समय बीतते-बीतते वे समाप्त होने लगती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की शरण में किस प्रकार जा सकते हैं?
इसका कारण है कि भक्त को भरोसा होता है कि ईश्वर सदा उसके साथ है। जीवन में परेशानियाँ चाहे कितनी भी क्यों न आ जाएँ यदि उनके बारे में सदा चिन्ता ही करते रहो अथवा सोचते रहो तो वे कम होने के स्थान पर बढ़ने लगती हैं। ऐसा करके मनुष्य अपने ही चारों ओर उदासियों का एक घेरा बना लेता है। फिर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता हुआ हार-पैर मारता रहता है। मनुष्य सदा सफल हो जाएगा, ऐसा आवश्यक नहीं होता।
मनुष्य के जीवन में अनेकानेक परेशानियाँ एक के बाद एक करके आती रहती हैं। वह अपने गिरते स्वस्थ्य या किसी बीमारी से आक्रान्त होने पर जिसका इलाज सम्भव नहीं से व्यथित होता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के आपसी वैमनस्य या दुर्व्यवहार को देखकर दुखी होता है। कभी वह अवज्ञा करने वाले बच्चों के कुमार्गगामी हो जाने के कारण टूटने लगता है। अपने आर्थिक हालातों के कारण मनुष्य अनमना-सा रहता है।
अपने कार्यक्षेत्र में आने वाली कठिनाइयों को सहने में अक्षम हो जाता है। ऐसे हालात जब बन जाते हैं तब उस गम के कारण उसके होंठ सिल जाते हैं और वह अपनी परेशानी को किसी से कह नहीं पाता। उसके मन में यह डर घर कर जाता है कि लोग उसके विषय में जानकर क्या सोचेंगे? यदि वह अपनी परेशानी किसी को बताएगा तो लोग पीठ पीछे उसका उपहास करेंगे। यदि मनुष्य अपनी सभी परेशानियों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे उनके बारे में हमेशा सोचने के स्थान पर, उनका डटकर सामना करते हुए, उन्हें दूर करने का उपाय करना चाहिए।
मनुष्य को किसी इन्सान के दुख का कारण नहीं बनना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को दुख के सागर में धकेलने का विचार भी मन में नहीं लाना चाहिए। इन्सान कितना भी अच्छा क्यों न हो उससे कभी-कभी भूल तो हो ही जाती है। उसे उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए और दूसरे के दुख को कुछ हद तक कम करने के लिए क्षमायाचना अवश्य कर लेनी चाहिए।
दूसरे के मन में इससे कितना गहरा घाव हो जाएगा इसका अनुमान भी लगाया नहीं जा सकता। जैसे समुद्र में पत्थर फैंकने पर यह कोई भी नहीं जान सकता कि वह फैंका गया पत्थर वहाँ कितनी गहराई में उतर गया होगा। उसी प्रकार मनुष्य के मन की टीस का अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता। पीड़ित व्यक्ति के मन से निकलने वाली आह किसी को भी नष्ट कर सकती है।
परेशानियों से बचने के लिए हमेशा अच्छे कार्य करने का यत्न करना चाहिए। भलाई के कार्य करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। मनुष्य की चाहे प्रशंसा हो या न हो उसे अपने सच्चाई के रास्ते से दूर नहीं जाना चाहिए। इस तरह करने से मन को शान्ति मिलती है और वह अपने दुखों को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। ऐसा करने से मनुष्य को अपने जीवन को समझ आती है।
हमें नित्य ईश्वर के साथ संवाद करना चाहिए और प्रतिदिन उसे स्मरण करते हुए उसके साथ समय बिताना चाहिए। अपने अहंकार का त्याग करके नि:स्वार्थ भाव से प्रभु को सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। अपने जीवन, सुख-दुख और चिन्ताओं को भगवान को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है। जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं तो हमारा हृदय प्रेम और शान्ति से भर जाता है। ईश्वर को अपना मानने वाले कभी निराश नहीं होते। दुख और विपत्ति के समय में भी हम मनुष्य सुरक्षित अनुभव करते हैं। भगवान की शरण में जाने पर जीवन से मृत्यु और असफलता का भय दूर हो जाता है।
दुखों और परेशानियों को दूर करने के लिए ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए मनुष्य को सदा अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। सज्जनों की संगति में रहकर अपने कष्टों को भोगने के लिए उचित मार्ग की तलाश करनी चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य को सहारा मिलता है। उचित मार्गदर्शन और आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त करने का यह एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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