माता-पिता छतनार वृक्ष की तरह
माता-पिता बेशक बूढ़े हो जाएँ पर वे घर के लिए एक छतनार वृक्ष की तरह होते हैं। वे घर में रहते हुए चाहे शारीरिक कार्य पूर्ववत दक्षता से न कर सकें परन्तु फिर भी वे बहुत सारे कार्य संवारते रहते हैं। हालाँकि वृद्धावस्था में किसी भी कार्य के सम्पादन में उन्हें कठिनाई होती है पर फिर भी घर में बैठे हुए ही वे उस घर की रौनक होते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र ही अपने बच्चों के मन को यह विश्वास दिला देती है कि वे एकल परिवार के बच्चों की तरह अकेले नहीं हैं।
छतनार वृक्ष का अर्थ ऐसे घने और फैले हुए पेड़ से है जिनकी शाखाऍं और टहनियॉं छाते यानी छतरी की भॉंति दूर तक फैली होती हैं। ये वृक्ष घनी छाया प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए महुआ, नीम और पीपल जैसे वृक्षों को उनके फैलाव के कारण छतनार कहा जाता है। ये वृक्ष एक विशाल छत्र की तरह दिखाई देते हैं। ये पेड़ भीषण गर्मी में भी अपने नीचे बैठने वालों को ठण्डी और सघन छाया प्रदान करते हैं। साहित्य में 'छतनार वृक्ष' का उपयोग सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैसे एक मॉं का अपने बच्चे को प्यार और सुरक्षा देना।
बच्चे अपनी हर छोटी-मोटी समस्या को अपने बुजुर्ग होते हुए माता-पिता से शेयर करके चिन्ता मुक्त हो सकते हैं। बड़ों के रहते हुए मनुष्य बिना टेंशन के कहीं भी आ जा सकता है। उन्हें अपने बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। वे चिन्ता मुक्त होकर अपने आफिस में ध्यानपूर्वक कार्य कर सकते हैं। बड़ों के रहते उन्हें अपने घर में ताला तक लगाने की आवश्यकता नहीं होती। बहुत से घरों में तो उनकी मृत्यु के पश्चात जब ताले ढूँढे जाते हैं तो वे नहीं मिलते।
जिस प्रकार पेड़ बेशक बूढ़ा हो जाए तो भी उसे अपने घर के आँगन में ही रहने देना चाहिए। वह फल तो शायद नहीं दे पाएगा पर छाया अवश्य ही देगा। उस वृक्ष पर आकर जब विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं तब उस घर का प्रकृति के साथ जुड़े रहने का एक सुखद अहसास होता है। उसी प्रकार घर के वयोवृद्ध माता-पिता को यथोचित सम्मान देना बच्चों का नैतिक दायित्व है।
यद्यपि अपनी ढलती हुई आयु के कारण वे धन-दौलत नहीं कमा सकते परन्तु बच्चों को अवश्य संस्कार दे सकते हैं। उनके संस्कार और जीवन के अनुभव से संस्कारित हुए बच्चे ही घर, परिवार, देश और समाज के लिए बहुमूल्य रत्न बनते हैं। इन्हें हर स्थान पर सम्मान मिलता है और चारों दिशाओं में इनका यश फैलता है।
माता-पिता मनुष्य के लिए जीते-जागते भगवान होते हैं जो उन्हें इस दुनिया में लाने का महान् कार्य करते हैं। इससे भी बढ़कर वे बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में सिर उठाकर शान से चल सके। अपने जीवन में सुख-सुविधाएँ जुटा सकें। अपने निस्वार्थ प्यार और सेवा के साथ-साथ वे अपना सर्वस्व बच्चों को सौंप देते हैं।जो भी धन-सम्पत्ति परिश्रम से उन्होंने अपने जीवन में कमाई होती है, उसे सहर्ष अपने बच्चों को सौंप देते हैं।
बच्चों का भी यह दायित्व बनता है कि वृद्धावस्था में उन्हें असहाय न छोड़ें। बच्चे भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का सम्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं। उन बच्चों को यह शोभा नहीं देता कि वे तो अपने जीवन में ऐश्वर्य भोगें और उनके माता-पिता दर-बदर की ठोकरें खाएँ, दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ अथवा बिना उचित इलाज के इस दुनिया से विदा ले लें। अपने को असहाय मानकर दूसरों के रहमो कर्म पर जीवित रहें अथवा बच्चों के होते हुए किसी ओल्ड होम की शरण लें।
बच्चे को अंगुली थामकर चलाते समय हर माता-पिता का सपना होता है कि बड़ा होकर उनका बच्चा कभी उनसे अंगुली छुड़ाकर उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ेगा। वे सदा अपने नाती-पोतों की मोहिनी मुस्कुराहटों और बाल सुलभ चंचल अदाओं के बीच जीना चाहते हैं। हर मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि माता-पिता का अनादर करने वाला सब कुछ होते हुए भी कंगाल होता है। उसे जीवन भर सुख-चैन नहीं मिलता। उसके मन का कोई कोना सदा ही रीता या खाली रह जाता है। उसे भरने के सारे भौतिक प्रयास असफल रह जाते हैं।
भगवान गणेश ने अपने माता-पिता यानी भगवान शिव और माँ भगवती की परिक्रमा करके संसार के समक्ष उदाहरण रखा था कि माता-पिता ही उनका सम्पूर्ण संसार हैं। उन्हीं के चरणों में ही मनुष्य का वास्तविक स्वर्ग होता है। चारों धामों की यात्रा मनुष्य करे अथवा न करे परन्तु अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा करने वाले को सारे तीर्थों का फल घर में बैठे हुए ही मिल जाता है। इसीलिए भगवान राम और श्रवण कुमार जैसे आज्ञाकारी पुत्रों की कामना सभी माता-पिता ईश्वर से करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद