रविवार, 31 मई 2026

सुन्दरता आन्तरिक हो बाह्य नहीं

सुन्दरता आन्तरिक हो बाह्य नहीं

सुन्दरता आन्तरिक होनी चाहिए बाह्य नहीं। यह सुन्दरता केवल देखने में अच्छी लगने वाली वस्तु नहीं होती। जब कोई व्यक्ति अन्दर से सुन्दर होता है तो उसका व्यवहार और आचरण भी सुन्दर हो जाते हैं। सच्चा सौन्दर्य हमारे गुणों में होता है रंग-रूप में नहीं होता। भौतिक अथवा शारीरिक सौन्दर्य क्षणिक होता है। मनुष्य का रंग-रूप, उसका शारीरिक सौष्ठव, उसकी कद-काठी, उसके नैन-नक्श आदि बाह्य सौन्दर्य को दर्शाने वाले होते हैं।
           हम अपने भारत देश को एक छोटे विश्व के रूप में देख सकते हैं। यहाँ गोरे-से-गोरे और काले-से-काले, मोटे-पतले, लम्बे-नाटे आदि सभी प्रकार के लोग मिल जाएँगे। अब प्रश्न यह उठता है कि जब इतनी विविधता है तो सुन्दरता का पैमाना क्या होगा? 
           सभी लोगों का सुन्दरता को जाँचने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। जिन देशों में लोग काले होते हैं, वे उसी के अनुरूप सुन्दरता को देखते हैं। जिन देशों में लोग गोरे होते हैं, उनका पैमाना तथावत् बन जाता है। इसी प्रकार लम्बे या नाटे होने की भी कसौटी हो सकती है।
           ये सब लिखने का तात्पर्य मात्र यही है कि शारीरिक सौन्दर्य को मापने का निकष सबका अपना-अपना होता है। फिर भी यदि हम यह कह सकते हैं कि आकर्षक व्यक्तित्व सभी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। ईश्वर ने हर प्रजाति में मादा को सुन्दर बनाया है। इसका अपवाद केवल मोर पक्षी है जो अपनी मादा मोरनी से कहीं अधिक सुन्दर होता है।
          सच्ची सुन्दरता बाहरी दिखावे, रूप-रंग या पहनावे में नहीं अपितु मन की शुद्धता, अच्छे विचारों, दयालुता और चरित्र में निहित होती है। बाहरी सौन्दर्य अस्थायी होता है जबकि लेकिन आन्तरिक गुण हमेशा बने रहते हैं और समाज में सम्मान दिलाते हैं। आन्तरिक सुन्दरता ही किसी व्यक्ति को वास्तव में आकर्षक और भरोसेमन्द बनाती है।
           इस संसार में बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने रूप-सौन्दर्य पर गर्व करते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह भौतिक सौन्दर्य सदा साथ नहीं निभाता। शरीर के रोगी हो जाने पर अथवा चेचक आदि बिमारी के आ जाने पर चेहरा पूर्ववत् सुन्दर नहीं रह सकता। एक आयु के बाद जब इन्सान वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है तब झुरियाँ आ जाने के कारण भी सुन्दरता कहीं खो सी जाती है।
          इसलिए अस्थायी सुन्दरता पर घमण्ड करना मनुष्य को कदापि शोभा नहीं देता। अपने बाहरी रूप-सौन्दर्य का गर्व न करके मनुष्य को अपने आन्तरिक गुणों को बढ़ाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। अपने गुणों को अथवा योग्यता का मनुष्य जितना अधिक विस्तार करता है उतना ही वह सबका प्रिय बनता है। मनुष्य के पास भरपूर सौन्दर्य हो परन्तु वह मूर्ख हो तो कोई उससे मित्रता करना पसन्द नहीं करेगा। इसी प्रकार मनुष्य के मुँह खोलते ही उसका फूहड़पन सामने आ जाए तब भी वह किसी का प्रिय कभी नहीं बन सकता।
            बाहरी सौन्दर्य का आकर्षण तभी तक रहता है जब तक मनुष्य के अवगुण प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते। यदि उसमें योग्यता है और शारीरिक सुन्दरता नहीं है तब भी लोग उसके दीवाने बन जाएँगे। बालक अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था पर बालपन से ही वह प्रकाण्ड पण्डित था, उसकी कुरूपता को अनदेखा करके लोग उसकी विद्वत्ता का लोहा मानते थे।
           मेरे कथन का यही अर्थ है कि भौतिक सुन्दरता भले ही सबको आकर्षित करती है परन्तु उसी सौन्दर्य को मान्यता तभी मिल पाती है जब उसमें गुणों का सम्मिश्रण होता है अन्यथा उस सुन्दरता का कोई मोल नहीं रह जाता। उस व्यक्ति को कोई घास नहीं डालता। उसके व्यवहार और बोलने के लहजे के कारण उससे दूरी बनाना लोग अधिक पसन्द करते हैं।
            मनुष्य के आन्तरिक गुण यानी दया, सहानुभूति, परोपकार, सहृदयता और ज्ञान आदि गुण उसे सबका सिरमौर बनाते हैं। ये गुण ही मनुष्य का वास्तविक सौन्दर्य कहलाते हैं जो भौतिक सौन्दर्य को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। बाह्य भौतिक सौन्दर्य के साथ यदि आन्तरिक सौन्दर्य भी हो तो वह सोने पर सुहागे का कार्य करता है। ऐसे व्यक्ति को लोकप्रिय होने से कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती।
          अन्त में इतना ही कहना है कि अपने अन्तस् में मानवोचित गुणों और सदाचरण का इतना विस्तार कर लेना चाहिए कि हर व्यक्ति मित्रता करने के लिए अथवा साथ जुड़ने के लिए लालायित हो जाए। तभी आन्तरिक सौन्दर्य बाहरी सौन्दर्य पर भारी पड़ सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 30 मई 2026

दिन बदलने की आशा

दिन बदलने की आशा

मनुष्य इस आशा में सारा जीवन व्यतीत देता है कि कभी तो उसके दिन बदलेंगे और वह भी सुख की साँस ले सकेगा। वह उस दिन की प्रतीक्षा व्यग्रता से करता है जब उसका भी अपना आसमान होगा और वहाँ वह लम्बी उड़ान भर सकेगा। उसकी अपनी जमीन होगी जहाँ वह पैर जमाकर खड़ा हो पाएगा। तब कोई उसकी ओर चुभती नजरों से देखने की हिमाकत नहीं करेगा।
           दिन बदलने की आशा इन्सान को विपरीत परिस्थितियों में शक्ति, धैर्य और नई ऊर्जा देती है। यह टूटी हुई भावनाओं को जोड़ती है, मन में सकारात्मकता लाती है और कठिन समय में भी आगे बढ़ने का हौसला बनाए रखती है। यह एक तपस्या की तरह है जिसमें सुबह एक नई किरण के साथ जीने का साहस मिलता है। 
           आशा ही जीवन की फिसलन भरी राहों पर चलने के लिए एकमात्र सहारा होती है। यह जीवन में सुधार की उम्मीद के साथ एक नई शुरूआत करने की प्रेरणा देती है। यह दिन भर की तपस्या की तरह है जो विश्वास दिलाती है कि हमारा कल बेहतर होगा। यह मन की टूटी हुई भावनाओं को धीरे-धीरे ठीक करती है। इससे निराशा को उत्साह और अन्धेरे को रोशनी में बदलने का विश्वास जागता है। यह जीवन के कठिन समय में भी संघर्ष करने की मानसिक ताकत देती है।
           हिन्दी की एक प्रसिद्ध लोकोक्ति या
 कहावत है -
      बारह वर्ष बाद तो घूरे के भी दिन बदलते हैं  अर्थात् समय सदा एक जैसा नहीं रहता। बहुत बुरा समय, कष्ट या परेशानी अथवा गरीबी की स्थिति भी हमेशा नहीं रहती। कभी-न-कभी मनुष्य के अच्छे दिन अवश्य आते हैं। 'घूरा'  यानी कूड़े के ढेर जैसी उपेक्षित जगह का भाग्य अगर बदल सकता है तो इन्सान की स्थिति भी एक-न-एक दिन अवश्य सुधर जाती है। 
          इन्सान के अपने भाग्य में भी परिवर्तन होगा, ऐसे सपने तो वह देख ही सकता है। संसार में कुछ लोग सौभाग्यशाली होते हैं जिनके जीवन में समय बीतते बदलाव आ जाता है। परन्तु कुछ दुर्भाग्यपूर्ण लोग ऐसे भी संसार में होते हैं जो जन्म से मृत्यु तक एड़ियाँ घिसते रहते हैं। उनके लिए 'सावन हरे न भादों सूखे' वाली स्थिति रहती है।
          उम्मीद वर्षो से घर की दहलीज पर खड़ी वो मुस्कान है जो हमारे कानों में धीरे से कहती है- 
             जीवन में सब अच्छा होगा 
और इसी सब अच्छा होने की आशा में हम अपना सारा जीवन दाँव पर लगा देते हैं। अपने जीवन को अधिक और अधिक खुशहाल बनाने के लिए अनथक श्रम करते हुए भी मुस्कुराते रहते हैं। अपने उद्देश्य को पाने में जुटा मनुष्य हसी-खुशी कोल्हू का बैल बन जाता है।
           घर-परिवार के दायित्वों को यदि मनुष्य सफलतापूर्वक निभा सकता है तो उससे अधिक सौभाग्यशाली कोई और हो नहीं सकता। किन्तु जब उनको पूरा करने की कवायद करता हुआ वह, बस जोड़तोड़ तक सीमित रह जाता है तब यह मानसिक सन्ताप उसे पलभर भी जीने नहीं देता। धीरे-धीरे उसकी हिम्मत जवाब देने लगती है। तब उसके कुमार्गगामी बन जाने की सम्भावना बढ़ जाती है। 
          उस समय मनुष्य भूल जाता है कि समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी भी किसी को कुछ नहीं मिलता। यदि इस सूत्र का स्मरण उस समय कर लिया जाए तो वह सदा सन्मार्ग का पथिक ही रहेगा। तब मनुष्य अपने जीवन को इस तरह नरक की भट्टी में झोंककर और अधिक कष्टों को न्यौता नहीं देगा। यदि वह अपने विवेक का सहारा ले सके तो सब बन्धु-बान्धवों का जीवन बर्बाद होने से बचा सकता है।
           मनुष्य को सदा आशा का दामन थामकर रखना चाहिए। इस बात को उसे स्मरण रखना चाहिए कि जब काले घने बादल आकाश पर छा जाते हैं तब वे शक्तिशाली सूर्य को भी आक्रान्त कर लेते हैं। दिन में ही रात होने का अहसास होने लगता है। यानी घटाटोप अन्धकार छा जाता है। उस समय बादलों के बरस जाने के बाद सूर्य मुस्कुराता हुआ फिर से आकाश में चमकने लगता है। तब सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है।
            मनुष्य के जीवन में भी कठिनाइयों के पल यदा कदा आते रहते हैं। उसे निराश और हताश करते हैं। सब बन्धु-बान्धवों से उसे अलग-थलग कर देते हैं। उसका अपना साया ही मानो पराया हो जाता है। अपने चारों ओर उसे निराशा के बादल घिरते हुए दिखाई देते हैं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी सुख की चाह में मनुष्य को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। अपने समय पर स्थितियाँ फिर से अनुकूल हो जाती हैं और मनुष्य की झोली में पड़े हुए काँटे फूलों में बदल जाते हैं।
          उस समय मुरझाया हुआ मनुष्य पुनः फूलों की तरह महकने लगता है। तब मनुष्य को कर्तापन के वृथा अहंकार को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहिए। जीवन की हर परीक्षा में तपकर कुन्दन की तरह और निखरकर सामने आना चाहिए। हर परिस्थिति में उसे उस मालिक का अनुगृहीत होना चाहिए। तभी मनुष्य को मानसिक और आत्मिक बल तथा शान्ति मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 29 मई 2026

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़ होते हैं। सभी को उनके जीवनकाल के अनुभवजन्य ज्ञान का प्रत्यक्ष लाभ उठाना चाहिए। घर के बुजुर्ग छायादार वृक्ष की तरह अपने अनुभवों के मधुर फल से उपकृत करते हैं। अपनी उपस्थिति की घनी छाया से परिवार की हर पीढ़ी को कृतार्थ करते हैं। अपने पूर्वजों से मिले संस्कारों की धाती आने पीढ़ियों को सौंपते समय वे गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
         बुजुर्ग परिवार के अनुभव और ज्ञान के अनुपात होते हैं। वे अपने जीवन के गुणों से बच्चों को शिक्षित करते हैं। ये परिवार में संस्कार और परम्परा को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। पूर्वजों का आदर और सम्मान करने से परिवार में द्विपक्षीय प्रेम और लाभ प्राप्त होता है।
          बुजुर्गों की आवश्यकता मनुष्य को हर कदम पर पड़ती है। इस विषय में एक दृष्टान्त याद आ रहा है। किसी समय शादी के अवसर पर दुल्हन वालों ने दूल्हे वालों के समक्ष शर्त रखी, "बारात में किसी भी बुजुर्ग को नहीं लेकर आएँगे, केवल युवा ही आएँगे।"
            अब लड़के वाले परेशान हो गए, "बुजुर्गों के बिना बारात कैसे सजेगी?"
           तब एक अनुभवी बुजुर्ग ने उन लोगों को परामर्श दिया, "बारात में दिखाने के लिए सभी युवा ही जाएँ। एक बक्से में एक बुजुर्ग को बिठाकर साथ ले जाया जाए। इससे लड़की वालों की बात भी रह जाएगी और एक बुजुर्ग भी साथ मिल जाएगा।"
          इस बात पर राजी होकर बारात दुल्हन के द्वार पर पहुँची। अब वहाँ शादी की रस्में होने लगीं। कुछेक रस्मों के विषय में युवा कुछ नहीं जानते थे। उस समय एक युवक ने अपने ठहरने के स्थान पर जाकर उस बुजुर्ग से सब समझ लिया। वापिस आकर जब उसने उन रस्मों को उचित रीति से निभा लिया।
          तब दुल्हन पक्ष वालों ने दूल्हे पक्ष वालों से पूछा, "उन रस्मों को उन्होंने किस प्रकार निभाया।" 
         उस समय उन्होंने ने बताया' "वे एक बुजुर्ग को सबकी नजरों से बचाकर बक्से में छुपाकर लाए हैं।"
           उस समय सब स्पष्ट हो गया। इसका अर्थ यही है कि युवा कितने भी योग्य क्यों न हो जाएँ परन्तु बुजुर्गों से अधिक निपुण नहीं हो सकते। अत: बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लौहा युवावर्ग को मानना चाहिए।
          बजुर्ग परिवार में नमक की तरह होते हैं। यदि मीठे की तरह उन्हें कहेंगे तो उचित नहीं होगा क्योंकि मीठे से मनुष्य शीघ्र ऊब जाता है। मीठे खाद्यान्न कितने ही स्वादिष्ट क्यों न हों उनसे मन जल्दी भर जाता है। नमक से मनुष्य कभी नहीं ऊबता। जिस प्रकार नमक से भोजन का स्वाद बढ़ जाता है, उसी प्रकार बजुर्गों के होने से परिवार के संस्कार बढ़ते हैं। भोजन में नमक का होना जितना आवश्यक होता है, उतना ही घर में बजुर्गों का होना अनिवार्य होता है।
          परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, नियमित स्वास्थ्य जॉंच करवानी चाहिए। डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयॉं सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन देना सबसे जरूरी है। उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और स्वतन्त्रता देनी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर महसूस कराना चाहिए। घर में उन्हें चलने-फिरने की जगह को सुलभ बनाना चाहिए।साथ ही घर में जरूरी सुरक्षा बदलाव करके और उनके साथ समय व्यतीत करके उनके एकाकीपन को दूर किया जा सकता है।
          माता-पिता मनुष्य के लिए भगवान का रूप होते हैं। जीवन पर्यन्त उनकी सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता। ईश्वर को हम इन भौतिक चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकते पर माता-पिता उसके प्रतिनिधि के रूप में हमारे पास रहते हैं। जिस घर में माँ-बाप हंसते हैं अर्थात् सन्तुष्ट और खुशहाल रहते हैं, प्रभु स्वयं ही उस घर में बसते हैं। वहाँ सुख-शान्ति की कभी कमी नहीं रहती। 
          इसके विपरीत जिस घर में उनका अपमान होता है या वे कष्ट पाते हैं, वहाँ पर कष्ट-क्लेश अपना स्थायी निवास बना लेते हैं। मन्दिरों में जाकर पत्थर के भगवान के आगे माथा रगड़ने के स्थान पर घर में बैठे जीवित भगवान का पूजन-अर्चन करना सदा ही कल्याणकारी होता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है।
          बुजुर्ग अपने घर-परिवार के हों अथवा कोई अन्य हों, अपने पूर्वाग्रह और अहं का त्याग करके उनके अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। जो बुजुर्गों की अवहेलना करते हैं उन्हें ऐसा न करने का परामर्श देना चाहिए। ईश्वर से उनकी सद् बुद्धि की कामना करनी चाहिए। जब किसी के भी द्वारा दिए गए श्राप फलदायी हो सकते हैं तो बुजुर्गों के द्वारा दिए गए आशीर्वाद भी मनुष्य के लिए निस्सन्देह फलीभूत होते है। 
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 28 मई 2026

दोषारोपण करना सबसे सरल

दोषारोपण करना सबसे सरल 

दूसरों पर दोषारोपण करना सबसे सरल कार्य है। मनुष्य सोचता है कि दूसरे को फंसाकर वह बच जाएगा परन्तु ऐसा होता नहीं है। स्वयं का बचाव करने के लिए कभी भी दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए। सच्चाई कभी-न-कभी तो प्रकट हो ही जाती है। उस समय मनुष्य की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। तब बगलें झाँकने के अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य उपाय नहीं शेष बचता।
           दोषारोपण करना वास्तव में सबसे सरल और तात्कालिक प्रतिक्रिया है जो अक्सर अपनी गलतियों या जिम्मेदारियों से बचने के लिए अपनाई जाती है। यह व्यवहार क्षणिक राहत देता है। अन्ततः व्यक्तिगत विकास को बाधित करता है। इससे रिश्तों में खटास आती है और नकारात्मकता बढ़ती है। 
           हम सब मानते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। उसके पास सत्य को प्रकट करने के लिए अपने ही तरीके हैं। कभी-कभी मनुष्य का अपना जमीर ही उसे बार-बार कचोटने लगता है। तब वह अपराधबोध से बहुत अधिक ग्रसित हो जाता है और फिर वह मानसिक दबाव झेल नहीं पाता। इस कारण वह स्वयं ही उस सत्य को सबके समक्ष प्रकट कर देता है जिसे वह एक अर्से से छिपाता चला आ रहा होता है।
          हमारे सयाने हमें चेतावनी देते हुए कहते हैं -
         झूठ को सात पर्दों में भी छिपाकर रख लो
         वह सामने आ ही जाता है। 
जैसे सुगन्ध चारों ओर बिना प्रयास के फैलती है। इसी प्रकार दुर्गन्ध भी हर तरफ फैल जाती है। और भी कहा जाता है - 
             झूठ के पाँव नहीं होते।
कहने का तात्पर्य है कि झूठे दूसरों के कन्धों पर चढ़कर वह बहुत समय तक सवारी नहीं कर सकता। उसे वास्तविकता के धरातल पर आना ही होता है।
            बचपन से ही दोषारोपण की यह बीमारी आरम्भ हो जाती है। शैतानी करने पर अपने दूसरे भाई-बहन अथवा मित्र-पडौसी के बच्चे पर अपना दोष मढ़ने का कार्य बच्चे बखूबी करते हैं। पढ़ाई ठीक से न करने पर जब परीक्षा में कम अंक आते हैं तब अपनी खाल बचाने के लिए अध्यापक पर पक्षपात का दोष लगाना सबसे सरल कार्य होता है। अध्यापक ने जबरदस्ती अंक काटे हैं, उसे मेरे साथ पता नहीं क्या दुश्मनी है?
            ज्यों ज्यों इन्सान बड़ा होता जाता है त्यों त्यों दोषारोपण के इस अनुचित कार्य में वह अधिक दक्षता प्राप्त करता जाता है। समय और स्थितियों के अनुसार वह अपने बचाव के लिए बकरे ढूँढता ही रहता है। कार्यालय में गड़बड़ी करने पर कभी अपने बास को दोष देता है तो कभी अपने ही  साथियों को कटघरे में खड़ा कर देता है। जब और कोई न मिले तो उस समय बस सरकार को ही कोसकर अपनी भड़ास निकाल लो।
              अपने घर में ही देखिए, पति अपनी पत्नी पर किसी भी प्रकार की गलती का दोष मढ़कर, उसे भलाबुरा कहकर अपने अहं को तुष्ट कर लेता है। इसी तरह पत्नी भी अपने पति को गाहेबगाहे दोषी ठहराकर सबकी सहानुभूति बटोरने का प्रयास करती रहती है।
            जन साधारण हर समस्या को बढ़ावा देने और उसका निदान न करने के लिए अपने चुने हुए नेताओं को दोष देते हैं, सारा समय उनकी आलोचना करते रहते हैं। सभी राजनैतिक दल अपने विरोधियों पर प्रतिदिन परेशानियाँ बढ़ाने का दोषारोपण करते हैं।
           सड़क पर चलते हुए कोई भी व्यक्ति अपनी गलती न मानकर सामने वाले को ही दोष देता है, गाली-गलौच करता है और मारपीट करने के लिए उतावला हो जाता है।
          यदि सभी मनुष्य अपने अनतस् में या अपने गिरेबान में झाँक ले तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। तब उन्हें अपने ऊपर शर्म आने लगेगी कि वे किस हद तक गिर सकते हैं। 
          सन्त  कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा आत्म-निरीक्षण और विनम्रता का सन्देश देता है। यह दोहा भी यही सच्चाई प्रकट कर रहा है -
       बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोई।
       जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोई।।
अर्थात् जब हम दूसरों में कमियॉं ढूंढते हैं तो हमें कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिलता। लेकिन जब हम अपने मन के भीतर झॉंकते हैं तो हमें एहसास होता है कि हमसे बुरा कोई नहीं है। 
           कबीरदास जी के अनुसार हमें दूसरों की गलतियॉं खोजने के स्थान पर अपनी कमियों को सुधारना चाहिए। सच्चा ज्ञान खुद को जानने और आत्म-सुधार करने से ही आता है। दूसरों के दोष ढूँढते हुए हम छिद्रान्वेषी बन जाने का अपराध करते हैं। यदि हम स्वयं को खोजने लगें तब पता चलेगा कि हमारे भीतर दोषों की कोई कमी नहीं है।
        अतः दोषारोपण करना छ़ोड़कर यदि अपने दोषों का सुधार कर लें तो यह मानव जीवन धन्य हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 27 मई 2026

जिन्दगी जीना एक कला

जिन्दगी जीना एक कला

जिन्दगी जीना एक कला है। मनुष्य आयुपर्यन्त नई-नई बातें सीखता है। मनुष्य द्वारा प्राप्त हर नई सीख उसे दिशा दिखाती है और कमियों को दूर करने में सहायता करती है। यही जीवन है और सफलतापूर्वक जीवन जीने को हम जीवन जीने की कला कह सकते हैं।
           वास्तव में अपने जीवन को समझदारी, रचनात्मकता और सकारात्मकता के साथ जीना एक कला है। केवल अस्तित्व बनाए रखना जीने की कला नहीं कहलाती। जीवन जीना एक साधना है जिसमें आत्म-सुधार, तनाव-मुक्त रहना और विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहकर कर्म करना शामिल होता है। 
             वैसे तो अपना-अपना जीवन सभी चराचर जीव जीते हैं। कुछ लोग जिन्दगी में ऐसे कार्य कर जाते हैं कि वे युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। उनके विपरीत ऐसे भी लोग हैं जो एड़िया घिसते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं। कीड़े-मकौड़ों की जीना कोई जीना नहीं कहलाता। 
           जीवन की चुनौतियों और संघर्षों के बीच भी मानसिक शान्ति कैसे बनाए रखी जाए, यह महत्त्वपूर्ण है। जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं अपितु दूसरों के काम आने और निस्वार्थ कर्म करने का नाम है। अपनी कमजोरियों को दूर करना और अच्छी आदतों को अपनाकर अपनी प्रगति सुनिश्चित करना होता है। दुखों से विचलित न होकर धैर्य के साथ जीवन का आननद लिया जाना चाहिए। यानी कि जीवन को एक कलाकार की तरह रचनात्मक और सार्थक बनाना ही सच्ची कला है।
          जीवन उसी का सफल है जिसके जाने के बाद लोग उसे श्रद्धा और प्रेम से याद करें। जिन्दगी उसकी सफल है जिसकी मौत पर जमाना अफसोस करे। वरना इस असार संसार में हर किसी का जन्म मरने के लिए ही होता है।
            जिन्दगी को जीना कभी भी किसी के लिए आसान नहीं होती। इसे आसान बनाने के लिए अथक प्रयास करना पड़ता है। सौ पापड़ बेलने पड़ते हैं। दूसरों की गलतियों को नजरअंदाज करना होता है और कुछ लोगों को न चाहते हुए बर्दाशत करना पड़ता है। जीवन में जीतोड़ मेहनत करनी आवश्यक होती है। इसके साथ ही सही वक्त पर सही फैसले लेने होते हैं।
           जीवन में हर किसी को खुश कर पाना टेढ़ी खीर होती है। जिन्दगी बीत जाती है सबको खुश रखने के प्रयास करने में। जो लोग खुश हुए वे अपने नहीं थे। जो लोग अपने थे वे लाख कोशिशों के बाद भी खुश नहीं हो सके। आजकल रिश्ते रोटी की तरह गोल हो गए हैं, उनका ओरछोर ही समझ में नहीं आता। जरा-सी भी आँच बढ़ाने पर जैसे रोटी जल जाती है उसी प्रकार यदि रिश्ते न सम्हाले जाएँ तो तुरन्त बिखर जाते हैं।
          जीवन फूलों की सेज नहीं हैं, कदम-कदम पर यहॉं काँटे बिछे रहते हैं। जीवन के हर मोड़ पर बहुत-सी कठिनाइयॉं रास्ता रोककर खड़ी रहती हैं। मनुष्य को इसके लिए कभी शिकायत नहीं करनी चाह। भगवान ऐसा कुशल डायरेक्टर है जो सबसे कठिन रोल बेस्ट एक्टर को ही देता है। यानी कि हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार रोल देकर इस दुनिया में भेजता है।
           यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा जीवन एक नाटक है। यदि हम दिए गए कथानक को ठीक से समझ लेंगे तो सदैव खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं। कोई भी व्यक्ति यहाँ किसी का अहसान नहीं लेना चाहता। उसे यही लगता है कि सारी जिन्दगी नजरें झुकाकर चलने से अच्छा है कि किसी का अहसान ही न लिया जाए। अपनी या दूसरों की नजरों से गिरकर कोई भी नहीं जीना चाहता। 
          जिन्दगी हर मोड़ पर परीक्षा लेती है। यहाँ मुझे 1972 की प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म 'सीता और गीता' के लोकप्रिय गीत पंक्ति याद आ रही है। इसे आशा भोसले और मन्ना डे ने गाया है, संगीत आर.डी. बर्मन ने दिया है और बोल आनन्द बख्शी ने लिखे हैं -
      जिन्दगी है खेल, कोई पास कोई फेल
      खिलाड़ी है कोई अनाड़ी है कोई।
जीवन में हार-जीत की चिन्ता किए बिना खेल भावना से लेते हुए निरन्तर गतिशील रहना चाहिए।यही फलसफा है कि कोई चाहे या न चाहे मनुष्य को सबका साथ निभाना ही पड़ता है। इसका कारण है मनुष्य का सामाजिक प्राणी होना। वह पलभर के लिए भी अकेला रह नहीं सकता। उसे हर समय किसी-न-किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती रहती है।
           जिन्दगी में क्या खोया क्या पाया, इसका हिसाब कभी रखा नहीं जा सकता। जो कुछ भी हम जीवन में खोते हैं, उसमें अपनी नादानी होती है और जो पाते हैं वह प्रभु की कृपा ही होती है। इन्सान और ईश्वर के बीच बहुत ही खूबसूरत रिश्ता है। मनुष्य हर समय कुछ-न-कुछ माँगता रहता है और वह हम पर बिना अहसान किए बिनमाँगे ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। वह हमें मालामाल करता रहता है।
          जिन्दगी वही अच्छी होती है जिसके हर पृष्ठ पर प्रेम की प्रेरणा होती है। कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य हर जीव से प्रेम करे। अपने सद्ज्ञान तथा विवेक से मार्गदर्शन लेते हुए इस जीवन को सफल बनाए।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 26 मई 2026

मरणधर्मा है यह संसार

मरणधर्मा है यह संसार

मानव के इस शरीर का स्वभाव मरणशील है। यह संसार इसलिए मरणधर्मा कहलाता है क्योंकि जो भी जड़-चेतन जीव यहाँ जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित होती है। यानी यहाँ जन्म लेने वाली हर वस्तु और प्राणी का अन्त निश्चित है। यह नश्वरता शरीर और सांसारिक विषयों तक सीमित है जबकि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। यह विचार ज्ञान और अनासक्ति की ओर ले जाता है। इसीलिए इस संसार को असार भी कहा जाता है।
         इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, सब कुछ समय के साथ बदलता रहता है और मिटता रहता है। देह मरणधर्मा है, इसलिए देह से जुड़े सुख-दुःख और प्रारब्ध भी क्षणभंगुर हैं। शरीर का जन्म होना और फिर मरण होना धर्म है। शरीर में रहने वाली आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नए रूप में बदलती रहती है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। प्रायः यह कहा जाता है कि इस जगत में मुख्य रूप से अहंकार ही नष्ट होने वाला है। यह दार्शनिक दृष्टिकोण हमें जीवन की अनित्यता को स्वीकार करके फल की इच्छा के बिना कर्म पर ध्यान केन्द्रित करने की प्रेरणा देता है। 
          'हितोपदेश' ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने इस विषय में कहा है -
      काय: सन्निहितापाय: सम्पद: पदमापदाम्।
      समागमा: सापगमा: सर्वमुत्पदि भङ्गुरम्॥
अर्थात् शरीर का स्वभाव विनाश है। सम्पत्तियों और आपत्तियों का स्थान हैं। संयोग-वियोग वाले हैं और सम्पूर्ण उत्पन्न पदार्थ क्षणभंगुर हैं।
        इस श्लोक में कवि का कथन है कि शरीर का स्वभाव विनाश है। मनुष्य परिश्रम करके सम्पत्तियाँ जुटाता है। फिर उन एकत्रित किए गए ऐश्वर्यो का भोग करता है। उसके जीवन में क्रमानुसार विपत्तियाँ आती हैं जो उसे दुखों के भंवर में छोड़ देती हैं। उनसे त्रस्त मनुष्य को कहीं ठौर नही मिलता। उस कष्टकारी समय को बिताने में उसे नानी याद आ जाती है। उस समय उसके अपने भी उससे किनारा कर लेते हैं। तब वह इस संसार सागर में निपट अकेला रह जाता है
          अपने बन्धु-बान्धवों से उसका संयोग होता है और कुछ समय पश्चात उनसे वियोग भी हो जाता है। उसका कोई-न-कोई प्रियजन इस असार संसार में पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोगकर सदा के लिए यहाँ से विदा ले लेता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न सभी जीव क्षणभंगुर कहलाते हैं।
            इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आचार्य चाणक्य के इस कथन पर विचार करते हैं -
      नासातो निर्गमस्यापि श्वासस्य च महामुने।
      प्रवेशे प्रत्ययो नास्ति प्रातरागमनं कुत:॥
अर्थात् हे महामुने! नाक से निकला श्वास पुन: प्रवेश कर पाएगा या नहीं, इसका भी भरोसा नहीं है। तब प्रात:काल के आने की बात ही क्या?
          आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हम जो श्वास दिन के चौबीसों घण्टे लेते हैं, उसका कुछ भी भरोसा नहीं है। अभी जो श्वास ले लिया है, उसके बाद का श्वास हमें लेने के लिए मिलेगा अथवा नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं। यह सब भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। इस विषय में उस ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं जानता।
          यह संसार जीव की कर्मभूमि है। यहाँ मनुष्य के रूप में जन्म लेकर वह अपने कर्मों को बीजरूप में बोता है और जन्म-जन्मान्तर तक उसके कड़वे-मीठे फल खाता रहता है। चौरासी लाख कही जाने वाली योनियों में केवल मनुष्य योनि ही कर्मयोनि कहलाती है, शेष अन्य योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। वहाँ जीव मात्र अपने कर्मों का फल भोगता है परन्तु कर्म कर नहीं सकता। इसलिए मनुष्य का अपने कर्मों के प्रति सदा सजग रहना आवश्यक है।
          मनीषियों का मानना है कि जीव संसार में रहते हुए यदि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के बनाए नियमों के अनुसार कर्म करता है तो वे श्रेष्ठ कर्म करता है। इसके विपरीत किए गए कर्म निम्न कहलाते हैं। शुभकर्मों का फल उसे इस जन्म में और आगामी जन्म में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य देते हैं। इसके विपरीत उसके दुष्कर्म उसे इहलोक और परलोक में महान् कष्ट और परेशानियाँ देते हैँ। उन्हें भोगने में मनुष्य को बहुत कष्ट होता है।
           मनुष्य चाहे तो अपना लोक और परलोक दोनों सुधारकर उस मालिक का प्रिय बन सकता है अन्यथा वह जन्म-जन्मान्तरों तक अपने कर्मो का भुगतान दुखों और कष्टों के रूप में करता रहेगा। यह संसार उसकी बपौती नहीं है, यहाँ से उसकी विदाई निश्चित है। चाहे वह कितना ही विरोध कर ले, वह सब व्यर्थ रहता है। उसे नियति के समक्ष सिर झुकाना ही पड़ता है।
          इस क्षणभंगुर नश्वर शरीर से जिन सत्कर्मों की वृद्धि करनी है कर लीजिए। यदि यह समय निकल गया तो फिर हाथ नहीं आएगा। अन्तकाल में यदि पश्चाताप कर भी लिया तो कुछ भी सुधार नहीं हो सकेगा। अत: अपने साथ मित्रता निभाना बहुत आवश्यक हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 25 मई 2026

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश

निर्माण और विनाश परस्पर विरोधी होते हुए भी एक सिक्के के दो पासों की तरह जुड़े रहते हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ निर्माण है वहाँ विनाश भी अवश्यम्भावी होता है। विनाश और निर्माण दोनों साथ-साथ चलते हैं। यहॉं हम वसन्त ऋतु और पतझड़ का उदाहरण लें सकते हैं। एक ओर पतझड़ के कारण वृक्षों के पत्ते और फूल गिरकर पेड़ों को ठूॅंठ बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर वसन्त ऋतु चारों ओर हरियाली और सुगन्ध लेकर आती है।
            यानी निर्माण एक रचनात्मक, योजनाबद्ध और समय लेने वाली प्रक्रिया है जो नई वस्तुओं को बनाती है। दूसरी ओर विनाश एक शीघ्र घटने वाली, बेतरतीब और नकारात्मक प्रक्रिया है जो मौजूद संरचनाओं को नष्ट कर देती है। निर्माण का उद्देश्य विकास है जबकि विनाश का परिणाम ह्रास या समाप्ति होता है।          
           इसीलिए इस संसार को मरणधर्मा कहा जाता है। इसका अर्थ यही है कि जो भी चराचर जीव इस दुनिया में आया है उसकी मृत्यु निश्चित है। उसके चाहने या न चाहने का कोई औचित्य नहीं होता। उसे इस धरा से जाना ही होता है, उसके पास इसका कोई विकल्प नहीं होता। सदा के लिए कोई भी यहाँ नहीं रह सकता।
          निर्माण का उद्देश्य सृजन, उपयोगिता और वृद्धि करना होता है। निर्माण सकारात्मक होता है जो संरचना का निर्माण करता है। जबकि विनाश का उद्देश्य प्रायः वस्तुओं को मिटाना अथवा ऊर्जा को नष्ट करना होता है। वह विनाशकारी और नकारात्मक होता है जो संरचना का ह्रास या क्षरण करता है।
            बीज का वृक्ष बनना रूप परिवर्तन होता है, निर्माण नहीं कहलाता। परन्तु वृक्ष को काटकर उससे अपनी आवश्यकता की अथवा आकर्षक वस्तुएँ बनाना निर्माण कहलाता है। उस काष्ठ को नष्ट कर देना या ईंधन के रूप में उसका प्रयोग करना ही विनाश कहलाता है। 
           यह समस्त चराचर जगत् उस प्रभु की रचना है अथवा निर्माण है। जब भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं तब वे स्थान-स्थान पर विनाश का ताण्डव करती हैं। चारों ओर त्राहि-त्राहि मचने लगती है। वे किसी भी चराचर जीव का पक्षपात नहीं करतीं। सभी पर उस विनाश का प्रभाव पड़ता है।
          किसी भी निर्माण में वर्षों लगते हैं किन्तु उसका विनाश करने में अधिक समय नहीं लगता। जैसे एक बहुमंजिला भवन बनाने में वर्ष भर या इससे भी अधिक समय लग सकता है परन्तु उसे तोड़ने के लिए कुछ दिन ही बहुत हो जाते हैं। मैं यही कहना चाहती हूँ कि निर्माण करना बहुत कठिन कार्य होता है और विध्वंस करना अपेक्षाकृत बहुत सरल होता है। 
          'सूक्तिमुक्तावली' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव का वर्णन किया है-
        दीर्घप्रयासेन कृतं हि वस्तुनिमेष-
                     मात्रेण भजेद् विनाशम्।
        कृतं कुलालस्य तु वर्षमैक नेतुं हि 
                       दण्डस्य मुहुर्तमात्रम्॥
अर्थात् लम्बी अवधि में परिश्रम से प्रस्तुत की गई वस्तु का विनाश क्षणभर में ही किया जा सकता है। कुम्भकार को जिस वस्तु को तैयार करने में एक वर्ष का समय लगता है, उसी को डण्डे ने क्षणभर में ही विध्वस्त कर दिया।
             इस श्लोक के माध्यम से कवि हमें यही समझाना चाहता है कि निर्माण की अपेक्षा विध्वंस सरलता से, बिना समय गॅंवाए पलभर में किया जा सकता है। कुम्हार का उदाहरण देकर अपनी बात को कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में प्रस्तुत किया है। इसके माध्यम से सरलता से कवि का आशय समझा जा सकता है।
            इतिहास के पन्ने खंगालने पर हम जान सकते हैं कि कितने शहर, कितनी सभ्यताएँ समय बीतते पृथ्वी के गर्त में  समा गईं। आज जब कभी उन स्थानों की खुदाई की जाती है तो वहाँ से उन प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष मिलते रहते हैं। वे किसी चमत्कार से कम प्रतीत नहीं होते। यह उन सबकी विनाश लीला को दर्शाती है। आखिर कभी तो वहाँ इतना निर्माण हुआ होगा।
          विद्वानों का मानना है कि रेगिस्तान के स्थान पर नदियाँ अथवा समुद्र आ जाते हैं और समुद्रों अथवा नदियों के स्थान पर शहर बस जाते हैं। इसी प्रकार पर्वत धरती में बदल जाते हैं और पृथ्वी पहाड़ों अथवा टीलों में बदल जाती है। यह भी निर्माण और विनाश की ही कहानी कही जा सकती है। इसी तरह समुद्र से भी यदा कदा खोई वस्तुओं के अवशेष मिलते रहते हैं जिसके विषय में जानकर हम आश्चर्यचकित रह जाते हैं।
            मनुष्य को सदा निर्माण कार्य करते रहना चाहिए जो देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के लिए उपयोगी हों। उसे आतंकवादी तथा तोड़फोड़ की अन्य सभी गतिविधियों से यथासम्भव दूर हो रहना चाहिए। निर्माण सदा-सर्वदा श्रेयस्कर होता है और विनाश की ओर कदम बढ़ाना पतन का कारण बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 24 मई 2026

तन्हाइयॉं

'तन्हाइयाँ' मेरी पहली कविता है। इसे मैंने‌अक्टूबर 2014 में बंगलौर में लिखा था। मैं और सूद साहब प्रतिवर्ष बच्चों के पास अक्टूबर माह में बंगलौर जाया करते थे। एक दोपहर को वहॉं बैठे हुए उन लोगों के विषय में विचार आया जो इस दुनिया में बिल्कुल अकेले हैं या भरापूरा परिवार होते हुए भी अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं अथवा सामाजिक परिस्थतिवश निपट अकेले हैं।
        मैं कविता नहीं लिखती थी परन्तु मन में आए इन विचारों को सूत्र में पिरोने से स्वयं को रोक नहीं पाई। इसलिए इस विषय पर लिखे मेरे कुछ उदगार यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ। आशा है मेरी इस पहली कविता को पढ़कर सुधीजन अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे।
                  तन्हाइयाँ

मेरे पीछे-पीछे दबे पाँव अचानक कोई
घर में घुसने की कोशिश में शायद अब
जोर से दरवाजे की साँकल खटका रहा है
समझ नहीं पाई वह कौन हो सकता है?

उफ, अब तो उठकर जाना ही होगा मुझे
दरवाजा भी खोलना पड़ेगा न चाहते हुए
चलो, चलकर देखते हैं कौन है वहाँ पर?
क्यों मुझे वह अधीरता से पुकार रहा है?

उसकी बैचेनी का आखिर कारण क्या है?
उठती हूँ, बाहर जाती हूँ उसे देखने हेतु
सोचती हूँ कौन-सा मेहमान आया है यहाँ
यह क्या? द्वार खोलते ही एक अजनबी।

मुझे एकटक निहारती हुई यह कौन है?
अपनी दोनों बाहें फैलाए सामने से आती
मेरी ओर खुले मन से बढ़ती यह कौन है?
मैंने घर के द्वार पर खड़े ही उससॆ पूछा।

कौन हो तुम? मैं नहीं पहचानती तुम्हें
बड़ी जोर से हँसकर बोली थी मुझसे
मैं तेरी सखी हूँ, भूल गई हो क्या मुझे?
मैं तो हर पल ही तेरे साथ थी पगली।

कुछ दिन तेरे घर में चहल-पहल देख
दूर चली गई थी घूमने-फिरने के लिए
परन्तु अब तो मैं तेरे पास लौट आई हूँ
तुझे थामने औ प्यार से बचाने के लिए।

मैंने फिर उससे तमतमा कर पूछ लिया
यह बता दो मुझे तुम आखिर हो कौन?
मुझसे लिपटकर बड़े प्यार से बोली वो
मैं तेरी सखी हूँ, तेरी तन्हाई हूँ बावली।

तुझ से दूर रहकर जी नहीं सकती थी
इसीलिए तेरे पास आई हूँ अरी सखी
किसी साथी के न होने का यह गम 
नहीं सतायेगा तुझे अकेलापन उम्रभर।

मेरे साथ साँझे कर लो री सखी तुम
अपने सभी हसीन कमसिन से पल
सारी खुशी अपने सारे गम जानेमन
समेटकर अपने दिल में बसा ले मुझे।

तेरे आँगन में हरपल मैं इठलाऊँगी
घर में अन्दर-बाहर सदा-सर्वदा ही
चारों तरफ तुझे नजर आऊँगी सखी
प्रिये! अपना बना ले मुझे सोच मत।

अपनी यादों के झरोखों से तुम अब
मत निकालो मुझे घर से और दिल से
बहुत पछताओगी रोवोगी गिड़गिड़ोगी
अपने इस मन में बसा ले सदा के लिए।

उसका इतना कहना बहुत था मेरे लिए
उसे अपने मन में, अपने घर में बसाया
तो बसा ही लिया हमेशा-हमेशा के लिए
अब बस मैं हूँ और है मेरी मेरी तन्हाई।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 23 मई 2026

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता असफलता का मूल

दीर्घसूत्रता यानी आज का कार्य कल पर टालने की हमारी प्रवृत्ति के कारण ही हम कदम-कदम पर असफलता का मुँह देखते हैं। जिस कल की हम प्रतीक्षा करते रहते हैं, वह कल तो कभी आता ही नहीं है। किसी कार्य को करने की योजना जब एक बार बना ली तो फिर इस आलस्य का कारण समझ में नहीं आता। दीर्घसूत्रता यानी काम को कल पर टालना केवल समय की बर्बादी नहीं है अपितु अपने सपनों और सफलता को जानबूझकर पीछे धकेलने की प्रक्रिया है।
             दीर्घसूत्रता या काम को टालने की आदत, सफलता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसका अर्थ है महत्वपूर्ण कार्यों को बिना किसी ठोस कारण के भविष्य के लिए छोड़ देना। यह असफलता का मूल कारण है क्योंकि यह समय बर्बाद करती है, अवसरों को नष्ट करती है और व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करके दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधक बनती है। 
             सही समय पर निर्णय न लेने या कार्य न करने से अच्छे-अच्छे अवसर मनुष्य के हाथ से निकल जाते हैं। महत्वपूर्ण कार्यों को अन्तिम समय के लिए छोड़ने के कारण चिन्ता बढ़ती है। इससे कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जब कार्यों को बार-बार टालने की आदत बन जाती है तो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। 
          सन्त कबीरदास द्वारा रचित एक प्रसिद्ध दोहा है जो समय के महत्व और कार्यों को तुरंत पूरा करने की प्रेरणा देता है -
      कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
     पल में परलय  होएगी  बहुरि  करेगा कब॥
अर्थात् जिस कार्य को कल करना चाहते हो उसे आज ही कर लेना चाहिए। जिस कार्य को आज करना चाहते हो उसे अभी कर लेना चाहिए। पलभर में प्रलय आ जाती है यानि प्राकृतिक आपदा के आ जाने पर जब  विनाश हो जाएगा तब फिर वह सोचा हुआ कार्य कब कर सकोगे?
           दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भविष्य के लिए काम नहीं टालना चाहिए क्योंकि जीवन अनिश्चित है। 'पल में प्रलय' का अर्थ है कि कल कभी नहीं आता। इसलिए आज का काम शीघ्र ही अभी पूरा कर लेना चाहिए। हमें चेतावनी देते हुए कवि ने इस दोहे में समझाने का प्रयास किया है।
          'लोकानन्दम्' ग्रन्थ में कवि ने इसी भाव के विषय में कहा है-
      श्व:  कार्यमेतदिदमद्य  परं   मुहुर्ताद्।
      एतत् क्षणादिति जनेन विचिन्त्यमाने॥
      तिर्यग्निरीक्षणपिशङ्गितकालदण्ड:।
      शङ्के हसत्यसहन: कुपित: कृतान्त:॥
अर्थात् यह कल करूँगा, इसे आज ही थोड़ी देर बार करूँगा और इसे तो क्षणभर में कर लूँगा। लोगों को इस तरह विचार करते हुए देखकर मैं सोचता हूँ कि असहनशील क्रुद्ध यमराज हाथ में काल का दण्ड लिए हुए और कटाक्ष निरीक्षण करते हुए उन पर हंसते हैं।
           कवि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के जीवन का समय उसके पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार ईश्वर की ओर से मिलता है। हमारी नादानी या टालमटोल करने के स्वभाव के कारण हम लोग आजकल, आजकल करता रहते हैं और पल-पल करके उसका जीवन कम होता जा रहा है। मृत्यु का देवता मनुष्य की इस मूर्खता पर हंसता है।
            हम सभी मनुष्य अपने आलस्य के कारण कार्य अभी करते हैं क्या जल्दी है? प्रात:काल कर लेंगे, सायंकाल करेंगे अथवा कल कर लेंगे, बस यही करते हुए अपना अमूल्य समय नष्ट करते नहीं थकते। समय बीत जाने के बाद सिर धुनने का लाभ नहीं होता। कहते हैं- 
            का वर्षा या कृषि सुखाने।
अर्थात् जब फसल खराब हो गई तब वर्षा हो भी जाए तब उसका कोई लाभ नहीं अथवा बेकार हो जाती है। समय रहते यदि वर्षा हो जाती तो किसान का नुकसान न होता।
          बच्चा स्कूल में पढ़ता है तब वह वहाँ पढ़ाए गए पाठ को यदि प्रतिदिन दोहरा ले तो परीक्षा के समय उसे अतिरिक्त पढ़ाई करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। पर वह तो मस्ती करता रहता है। सोचता है अभी खेल लूँ या अभी टी. वी. देख लूँ या दोस्तों के साथ चैटिंग कर लूँ या थोड़ा घूम लूँ, फिर पढूँगा। ऐसा करते रहने पर पढ़ाई पिछड़ जाती है और परीक्षा के समय जब पुस्तक खोलता है तो उसे कुछ समझ नहीं आता।
          इसी प्रकार हम उत्साह से योजनाएँ बनाते रहते हैँ और आज क्रियान्वित करेंगे या कल कर लेंगे ऐसा सोचते रहते है और फिर रेस में पिछड़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। फिर जब हानि उठाते हैं तब फिर दूसरों को कोसते हैं।
          दीर्घसूत्री सदा ही अपनी इस आदत के कारण परेशान रहता है। बस पकड़नी हो या रेल या जहाज हर स्थान पर भागते हुए पहुँचता है और कभी-कभी उसकी बस, रेल या जहाज छूट भी जाते हैं। अपने कार्यस्थल पर देर से पहुँचकर वह बास की डाँट खाता है। शादी-ब्याह व पार्टियों में देर से पहुँचकर लोगों के कटाक्ष सहन करता है।
          अपनी दीर्घसूत्रता का त्याग करके यदि हम लोग समय पर बीज बो सकें तो कोई कारण नहीं कि हमें असफलता का मुँह देखना पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 22 मई 2026

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हानिकारक

प्रदूषित खान-पान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, इस बात को हम सब जानते हैं। फिर भी जानते-बूझते हम अपने शत्रु स्वयं ही बन जाते हैं। दूषित खान-पान पाचन तन्त्र को कमजोर करता है जिससे भूख कम लगती है और पेट में भारीपन या असहजता महसूस होती है। दूषित भोजन में पोषक तत्व कम होते हैं जिससे शरीर कमजोर हो सकता है।
           प्रदूषित या दूषित खाना खाने से फूड पॉइजनिंग हो सकती है  जिसके मुख्य लक्षणों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन शामिल हैं। यह जीवाणुओं, वायरस, रसायनों या भारी धातुओं के कारण होता है जो गम्भीर मामलों में डायरिया, पाचन तन्त्र में खराबी, कैंसर और हार्मोनल असन्तुलन का कारण बन सकते हैं। सोचने वाली बात है कि कोई मनुष्य अपना दुश्मन खुद कैसे बन सकता है?
           कितनी विचित्र है यह बात किन्तु सत्य है। यदि गहनता से विचार कर लिया जाए तो शीशे की तरह सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगेगा। हम सभी अपनी मन और जिह्वा के गुलाम हैं। जहाँ मन को बैठे-बिठाए याद आ गया कि फलाँ पदार्थ खाना है, वहाँ हमारी जीभ उसके स्वाद को याद करके लपलपाने लगती है। हम बस शीघ्र ही उसे खाने के लिए उतावले हो जाते हैं। फिर हमारा मस्तिष्क आदेश देता है खाने चलो। तब हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि उसे खाकर हमारे शरीर को हानि तो नहीं होगी।
           एक छोटा-से उदाहरण से इसे स्पष्ट करते हैं। प्रतिदिन हम सभी के खान-पान में चीनी और नमक का एक अहं रोल होता है। इन दोनों का निश्चित मात्रा में प्रयोग होना चाहिए। जहाँ इनकी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई वहीं दोनों शरीर को नुकसान पहुँचाने लगते हैं। नमक की अधिकता हमारी किडनियों को प्रभावित करती है और हाई बी. पी. की सम्भावना बढ़ जाती है। इसी प्रकार चीनी की अधिकता शूगर जैसी बिमारी को जन्म देती है। इसके अतिरिक्त इनसे शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। इसलिए इनके साथ-साथ और अनेक रोगों की चपेट में भी मनुष्य धीरे-धीरे आने लगता है। 
          जब भी कभी बन्धु-बान्धवों से चर्चा होती है तो हम यही कहते हैं कि हम तो कुछ भी फालतू या ऊल-जलूल खाते ही नहीं। वास्तविकता यह है कि हम पौष्टिक खाने से दिन-प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। जंक फूड, डिब्बाबन्द खाद्य और बासी खाना खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। यदि किसी बिमारी के कारण कभी डाक्टर कुछ परहेज बताते हैं तो भी उस पर अमल करना नहीं चाहते।
           खेतों में डाले जाने वाले कीटनाशक और ऊर्वरक अन्न को प्रदूषित कर रहे हैं। गोदामों में स्टोर किए गए अन्न के रख-रखाव के लिए भी कई प्रकार के कीटनाशकों का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है। कोल्ड स्टोर में रखे गए खाद्य पदार्थ भी हमारे शरीर के लिए निश्चित ही नुकसानदेह होते हैं। इन स्थितियों को अनदेखा किया जा रहा है।
        किसान के अधिक फसल पाने और कमाई करने की लालसा भी हानिप्रद है जो मानव शरीर के साथ खिलवाड़ कर रही है। पहले समय में जैविक खाद का प्रयोग किया जाता था जिससे बिमारियों का खतरा नहीं ही होता था। हानिकारक बैक्टीरिया और रसायन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करते जा रहे हैं। 
            इसके अतिरिक्त हमारे रहन-सहन ने और भी बेड़ा गर्क किया हुआ है। हमारे आहार-विहार, सोने-जागने आदि के सारे गलत नियम 'एक करेला और दूसरा नीम चढ़ा' वाली उक्ति को चरितार्थ करने में देर नहीं कर रहे हैं। यदि दूषित खाना खाने के बाद लक्षण गम्भीर हों जैसे कि उच्च बुखार, गम्भीर निर्जलीकरण या मल में खून आए तो तुरन्त डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।
          अपनी मूर्खता के कारण बड़े धड़ल्ले से वायुमण्डल को गाड़ियों, फैक्टरियों आदि के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। नदियों के अमृत रूपी जल को विष में बदल रहे हैं। पृथ्वी की मिट्टी आदि को हम जहरीला बना रहे हैं। शहर में पेड़ों और जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। प्रकृति को प्रदूषित करने का खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना पड़ेगा। इस प्रदूषण का मूल्य हम अनजाने में अपने स्वास्थ्य से चुका रहे हैं। फिर भी हम खुश हैं, यह मजे की बात है।
            सरकार को लानत भेजकर हम अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री नहीं कर सकते। जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तब तक कुछ भी सुधार नहीं हो सकेगा। जब तक सरकार, सोशल मीडिया, समाचार पत्र, स्वयं सेवी संस्थाएँ और सबसे बढ़कर हम स्वयं जन-जागृति का कार्य नहीं करेंगे तब तक प्रदूषित खान-पान से हम लोगों की जिन्दगियों से खिलवाड़ होता रहेगा। फाइव स्टार और मल्टी स्पेशिलिटी अस्पताल आम जनता को मूर्ख बनाकर उनकी जेब काटते रहेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 21 मई 2026

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा

दुख की पराकाष्ठा जब हो जाती है तब उस समय मनुष्य स्वयं को असहाय अनुभव करने लगता है। उसकी उस स्थिति में अपने साथ नहीं निभा पाते अथवा निभाना नहीं चाहते। तब अपनों से बेज़ार होकर, वह सबसे कटकर अलग-थलग हो जाता है। रिश्तों को निभाने के उसके सभी प्रयास खोखले दिखाई देने लगते हैं।
         ‌   वास्तव में दुख एक मानसिक, शारीरिक अथवा भावनात्मक कष्ट की अवस्था है। दुख तब उत्पन्न होता है जब इच्छाऍं, अपेक्षाऍं या परिस्थितियॉं मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं। यह किसी महत्वपूर्ण हानि जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु का होना, किसी रिश्ते के टूटने या असफलता के कारण होने वाली एक प्राकृतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुःख मन की वह व्याकुलता है जो किसी हानि या प्रतिकूल परिस्थिति के कारण पैदा होती है। यह स्थिति व्यक्ति को व्यथित करती रहती है। 
           मनीषी कहते हैं कि ऐसे कठिन समय में जब अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है, तब मनुष्य अनहोनी के भय से कदम-कदम पर चौंकने लगता है। अपनों के प्यार-दुलार से ठुकराए जाते हुए मनुष्य को कहीं ठौर नहीं मिलता। ऐसे कष्ट के समय पति को अपनी पत्नी का और पत्नी को अपने पति का सहारा मिल जाए तो ईश्वर की बड़ी कृपा समझो। यदि उनके बच्चे माता अथवा पिता के दुख को समझने वाले हों और उन्हें सहारा देने वाले हों तो सोने पर सुहागे जैसी स्थिति बन जाती है। मनुष्य अपने दुखों से जूझने में एक हद तक सफल हो जाता है।
            दुख एक अस्थायी स्थिति है परन्तु इसे स्थायी मान लेने पर व्यक्ति बहुत अधिक दुखी हो जाता है। दुख केवल दुखद भावनाओं तक सीमित नहीं होता बल्कि इसमें शारीरिक पीड़ा, अवसाद, और मानसिक अशान्ति भी शामिल किया जा सकता है।
            अपने दुख के विषय में हर समय सोचते रहने पर मनुष्य को लगने लगता है कि उसके मनोमस्तिष्क पर उसके दुख की सोच हावी होती जा रही है। अधिक तनाव में आ जाने के कारण उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके मस्तिष्क की नसें फट जाएँगी। उस समय मनुष्य किसी को भी अपनी व्यथा कथा सुनाकर अपने मन को हल्का कर‌ लेना चाहता है।
            इसी भाव को पुष्ट करती हुई एक कहानी का स्मरण हो रहा है जो कभी स्कूल में पढ़ी थी। यह कथा अंग्रेजी भाषा की पुस्तक में थी। कहानी का या उसके लेखक का नाम भी याद नहीं। कहानी के नायक के दुख का कारण भी याद नहीं है। पर वह घटना मन को इतना छू गई थी कि यदा कदा याद आ जाती है कि एक इन्सान दूसरे इन्सान के प्रति इतना सम्वेदनाहीन कैसे हो सकता है?
            यह कहानी एक टाँगा चलाने वाले गरीब व्यक्ति की है। लोगों की नजर में जिसकी कोई कीमत नहीं होती। दिनभर उसके टाँगे पर सवारियाँ चढ़ती और उतरती रहती हैं। टॉंगे में बैठे सभी लोग अपनी किसी-न-किसी समस्या को डिस्कस करते रहते हैं। वह भी अपनी समझ के अनुसार उन्हें उत्तर देता रहता है। 
            उनकी बातें या समस्याएँ सुनकर वह भी अपनी परेशानी को उनसे बाँटना चाहता है किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई भी सवारी तैयार नहीं होती। कोई उसे गाली देता है तो कोई उसे झिड़ककर चुप करा देता है। हद तो तब होती है जब अपनी व्यथा सुनाने के कसूर में एक सवारी उसे लात मारकर चुप कराती है। मानो वह इन्सान नहीं या उसके मन को कष्ट नहीं होता। दिनभर वह अपने मन में अतीव कष्ट का अनुभव करता है।
            रात के समय घर जाकर घोड़े को बाँधता है और उसे खाने के लिए दाना देता है। उस समय वह अपने घोड़े के पास बैठ जाता है और अपने मन की भड़ास, अपनी व्यथ की कथा और दिन में अपने साथ होने वाले अत्याचार की कहानी अपने उस घोड़े को सुनाकर अपना मन हल्का करता है।
            इस कहानी के याद रह जाने का कारण है कि आज लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। अपना कष्ट सबको बड़ा लगता है। दूसरे का कष्ट उनकी दृष्टि में कुछ महत्त्व ही नहीं रखता। उनकी सम्वेदनाएँ मानो मरती जा रही हैं। कोई भी दूसरे की परेशानी को अथवा दुख को समझना ही नहीं चाहता। हाँ, दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए, नमक-मिर्च लगाकर चटखारे लेने के लिए लोग जानकारी जुटाने में महारत हासिल कर रहे हैं। इससे उनके झूठे अहं को शान्ति मिलती है। वे भूल जाते हैं कि यदि वे कष्ट में हों और दूसरे लोग उनके वैसा व्यवहार करेँगे तब उनकी स्थिति कैसी होगी?
           किसी के दुख में बेशक साझेदार न बनो पर उनसे सहानुभूति के दो बोल तो बोले जा सकते हैं। दूसरे के दुख पर मलहम लगाने वाला छोटा नहीं हो जाता बल्कि महान होता है। सुख और दुख शरीर के भोग हैं। वे पूर्वकृत कर्मानुसार हर मनुष्य के जीवन में आते हैं। अतः सुधी जनों से दूसरों के प्रति सहृदयतापूर्वक व्यवहार अपेक्षित है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 20 मई 2026

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि शरीर के लिए आवश्यक

अग्नि इस मानव शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक है। पाचक अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है और शेष सभी अग्नियों की तुलना में यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रुप से पेट और आंतों के बीच नाभि के आस पास रहती है। यह अग्नि अपनी गर्मी से बहुत जल्दी ही भोजन को पचा देती है। हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे यह अग्नि छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर उन्हें शरीर के अनुरूप बना देती है। फिर ये शरीर को पुष्ट करते हैं।
             इस अग्नि को विद्वान मनीषी जठराग्नि कहते हैं। यह अग्नि मनुष्य  को ओजस्वी बनाती है। उसके तेज से ही हम सबका चेहरा दमकता है। उसकी गरमी से ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है। सभी कामों को करने के लिए अग्नि का सन्तुलित अवस्था में होना बहुत आवश्यक होता है।
          यदि शरीर की यह अग्नि मन्द हो जाए यानी मन्दाग्नि हो जाए तब मनुष्य का शरीर रोगी होने लगता है। उस पर सर्दी का प्रकोप बार-बार होता है। मनुष्य का पाचनतन्त्र प्रभावित हो जाता है। तब उसे भोजन पचाने में भी असुविधा होती है। उसका लीवर प्रभावित हो जाता है। यह लीवर मानव शरीर में महत्त्वपूर्ण रोल निभाता है।
          यदि शरीर में अग्नि न हो तो मनुष्य के द्वारा किया गया भोजन पचेगा नहीं और शरीर में धातुऍं भी नहीं बनेंगी। आयुर्वेद में बताया गया है कि शरीर की जठराग्नि जब शान्त हो जाती है अर्थात् समाप्त हो जाती है तो मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। शरीर का तापमान भी इसी अग्नि द्वारा ही निर्धारित किया जाता है। यही कारण है कि मृत्यु के कुछ ही समय पश्चात ही मनुष्य शरीर एकदम ठण्डा हो जाता है।
            'सन्यासोपनिषद्' का कथन है कि-
     मय्यग्रेsग्नि गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन।
     मयि प्रज्ञां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्।।
अर्थात् मैं अपने सम्मुख अग्नि को क्षमा, तेज, बल और ओज के साथ ग्रहण करता हूँ।
            हम कह सकते हैं कि क्षमा, तेज, बल और ओज आदि सभी गुणों के साथ अग्नि को ग्रहण करना चाहिए। अग्नि के साथ अनावश्यक रूप से छेड़छाड़ की जाए तो वह बच्चों तक को भी नहीं छोड़ती। सबको जलाकर राख कर देती है। मनुष्य भी क्रोध की अधिकता में सारी दुनिया को जलाकर राख कर देने का दावा करता है। दूसरों की हानि तो समय बीतते हो पाती है परन्तु अपने पैर पर वह कुल्हाड़ी अवश्य मार लेता है। 
          इसलिए मनुष्य से क्षमाशील होने की आशा की जाती है। दूसरों को क्षमा कर देने वाले तेजस्वी व्यक्ति संसार के अमूल्य रत्न होते हैं। उनका बल असहायों की रक्षा और सहायता करने के लिए होना चाहिए, उनका दमन करने वाला कदापि नहीं होना चाहिए।
            इस अग्नि के बल पर हम साहसी बने रहते हैं। इसके अभाव में मनुष्य का चेहरा तेजहीन दिखाई देता है। वह स्वयं को बलहीन अनुभव करता है। निर्बल व्यक्ति जरा-सी समस्या आने पर घबरा जाता है और उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं। उसे कम्पकपी छूटने लगती है। वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। उस समय अपने लिए सहारा खोजने लगता है और बहाने बनाने लगता है।
          जब तक मनुष्य स्वास्थ्य के नियमों का पालन करता रहता है तब तक उसके शरीर में ऊर्जा तत्त्व बना रहता है। शरीर में अग्नि ठीक तरह से अपना काम करती रहती है।
          जंगलों में जब आग यानी दावानल भड़कती है तब वह किसी से पक्षपात नहीं करती अपितु सभी प्रकार के हरे-भरे या ठूँठ हुए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों आदि सभी को जलाकर राख कर देती है। उसकी चपेट में आने से कोई मनुष्य अथवा कोई जीव नहीं बच सकता। सबको समान रूप से भस्मसात् कर देती है। घने जंगलों को पलभर में पलक झपकते ही राख के ढेर में बदल देती है।    
        इसी तरह समुद्र में लगने वाली आग यानी बड़वानल समुद्री जीवों को अपनी चपेट में लेती है। 'रघुवंशम्' महाकाव्य में महाकवि कालिदास ने अग्नि के विषय में कहा है-
        पावकस्य महिमा स गणयते   
        कक्षवज्ज्वलति सागरेSपि य:॥   
अर्थात् अग्नि का यही महत्त्व गिना जाता है कि वह समुद्र में घास की तरह जलती है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि समुद्र के पानी में लगने वाली अग्नि को बड़वानल कहते हैं जो वहाँ कभी भी, किसी भी स्थान पर जलने लगती है।
            यह अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसके बिना हम अपना भोजन सुपाच्य नहीं बना सकते। यह भी एक प्रकार से हमारी जीवनी शक्ति है। इससे छेड़छाड़ की जाए तो फिर यह बच्चे तक को क्षमा नहीं करती, सबको अपनी चपेट में ले लेती है। अत: सावधान रहना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 19 मई 2026

आत्मचिन्तन करना आवश्यक

आत्मचिन्तन करना आवश्यक 

मनुष्य को प्रतिदिन समय निकालकर आत्मचिन्तन करना चाहिए। आत्मचिन्तन का अर्थ है अपने विषय में विचार करना। यह मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। इसका यह अर्थ नहीं कर सकते कि मनुष्य केवल अपने लाभ के विषय में सोचता हुआ स्वार्थी बन जाए। अपनी अच्छाइयों और बुराइयों दोनों पर मथन करना ही इस कथन का उपयुक्त अर्थ होगा। 
          आत्मचिन्तन का हम यह अर्थ कर सकते हैं कि है अपने स्वयं के विचारों, भावनाओं, कार्यों और अनुभवों का गहराई से विश्लेषण और मूल्यॉंकन करना। बाहरी दुनिया से हटकर अन्तर्मुखी होकर, अपनी कमियों और खूबियों को समझकर, व्यक्तित्व में सुधार और आत्म-विकास करने की यह एक सचेत प्रक्रिया है।अपने कार्यों की समीक्षा करना कि वे सही थे या गलत। गलतियों से सीखकर उन्हें भविष्य में न दोहराने का संकल्प लेना। 
          आत्ममन्थन करते समय अपने अन्तस् में विद्यमान बुराई को दूर करने का प्रयास ईमानदारी से करना चाहिए। उस बुराई को त्यागने का ढोंग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना तो स्वयं को धोखा देना कहलाएगा। इससे अपना हितसाधन नहीं होगा बल्कि हम स्वयं के शत्रु बन जाएँगे।
          'पद्मपुराण' में मर्हषि वेदव्यास हमें समझा रहे हैं कि-
       सर्वथा   प्रातरुत्थाय   पुरुषेण   सुचेतसा।
       कुशलाकुशलं स्वस्य चिन्तनीयं विवेकत:॥
अर्थात् बुद्धिमान को प्रात:काल उठकर विवेकपूर्वक अपने हित-अहित का विचार करना चाहिए।
दूसरे शब्दों में प्रतिदिन मनुष्य को गहन चिन्तन करना चाहिए। उसे अपने भले-बुरे का विचार करते हुए अपने हित के कार्य करने चाहिए।
           अपनी कमियों को दूर करते हुए अपनी अच्छाइयों को बढ़ाते रहना चाहिए। ऐसा करते हुए धीरे-धीरे बुराइयों का त्याग करके मनुष्य अपनी आत्मोन्नति की यात्रा सुगमतापूर्वक तय करने लगता है। इस प्रकार जब उसे सही और गलत की पहचान हो जाती है तब वह गलत रास्ते पर चलकर अपने जीवन को कष्टमय होने से बचाकर स्वयं का मित्र बन जाता है।
          हमें किन-किन विषयों पर विवेचना करनी चाहिए? 'तन्त्रोपाख्यानम्' ग्रन्थ इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहता है कि अतीत का चिन्तन छोड़कर वर्तमान के बारे सोचना चाहिए-
नातिकान्तानि शोचेत प्रस्तुतान्यानगतानि चिन्त्यानि।
अर्थात् अतीत का चिन्तन नहीं करना चाहिए। जो प्रस्तुत है या समक्ष है वही चिन्तनीय है। 
          अपने अतीत की समृद्धि का बखान करते हुए मनुष्य को उसका गर्व नहीं करना चाहिए। साथ ही मद में निठल्ला होकर भी नहीं बैठ जाना चाहिए। इसी तरह अपनी पुरानी असफलताओं और मिले हुए कष्टों से व्यथित होकर मनुष्य को निराशावादी नहीं बन जाना चाहिए। ऐसे चिन्तन का कोई लाभ नहीं होता। इसलिए इसका त्याग करना चाहिए। अपना वर्तमान ही मनुष्य के समक्ष प्रस्तुत होता है वही चिन्तनीय है।  
           'चाणक्यनीति:' में अन्यत्र आचार्य चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य को किस-किस के विषय में चिन्तन करना चाहिए-
        क: काल: कानि मित्राणि 
             को देश: कौ व्ययाव्ययौ।
को वाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहु:॥         
अर्थात् कैसा समय है, कौन मित्र हैं, कैसा देश है, आय-व्यय कैसा है, वाहन कैसा है और मेरी शक्ति कैसी है, इस विषय पर पुन:पुन: चिन्तन करना चाहिए।
           मनुष्य यदि समय को पहचानकर उसके अनुरूप कार्य करता रहे तो उसे कभी निराश नहीं होना पड़ता। वह सदा सफलता के सोपानों को छू सकता है। उसे स्वयं ही ज्ञात हो जाएगा कि उसका सच्चा मित्र कौन है? और बरसाती मेंडकों की तरह टर्राने वाले मित्र कौन से है? तब वह अपने सच्चे मित्रों के साथ अपनी जीवन यात्रा का भरपूर आनन्द उठा सकता है और स्वार्थी मित्रों से अपनी रक्षा कर सकता है।
           मनुष्य अपने देश के विष्य में जानकारियाँ एकत्र करते हुए अपने आय और व्यय का सामंजस्य बिठा सकता है। इसी प्रकार वह अपने वाहन के रख-रखाव आदि पर नजर रखकर सुविधा का यथोचित लाभ ले सकता है। एवंविध अपनी शरीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों की परीक्षा करते हुए वह अपना इहलोक और परलोक सुधार सकता है।
           मनुष्य को चिन्तन आवश्य करना चाहिए पर केवल वर्तमान का। जो बीत चुका है उससे सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भविष्य में क्या होगा अथवा क्या नहीं? इस विषय में हम नहीं जानते। इसलिए उसके विषय में चिन्ता करना व्यर्थ है। अत: अपना वर्तमान सुधारने के लिए मनन करते हुए अथक परिश्रम करना चाहिए। तभी वह एक सफल मनुष्य बनकर समाज में मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वहन कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 18 मई 2026

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

भूलना इन्सानी प्रवृत्ति

इन्सानी प्रवृत्ति है कि वह बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाता हैं अथवा अनदेखा करता रहता हैं। समय बीतते-बीतते उसके घावों पर मलहम लग जाती है। वह भली-भाँति जानता है कि जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी है जीवन जिसे हम सब यत्नपूर्वक जीते हैं। परिश्रम करते हैं और अपनी सुख-सुविधा के साधन जुटाते हैं। भूलना इसलिए भी जरूरी है ताकि हम मानसिक स्वास्थ्य को सन्तुलित रख सकें, सामान्य दिनचर्या को सुविधाजनक बना सकें और स्वतन्त्रता और विकास का आनन्द ले सकें।
          कदम-कदम पर अपनी जीत का जश्न मनाते हुए हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। उस समय हम चाहते हैं कि सारी कायनात हमारी ही खुशी में शामिल हो जाए और जब हम दुखी हों तब सारा ब्रह्माण्ड हमारे दुख में दुखी होता हुआ दिखाई दे। यद्यपि ऐसा होता नहीं है, ये तो मात्र इन्सानी भावनाऍं हैं। मनुष्य अपने सुख-दुख को ब्रह्माण्ड के साथ जोड़कर देखता रहता है।
           ईश्वर ने मनुष्य को इस प्रकृति का बनाया है कि वह शीघ्र ही हर दुख, हर परेशानी को भूलकर आगे बढ़ जाता है। यह उसके लिए बहुत आवश्यक भी है। यदि वह पुरानी सफलता-असफलता और सुख-दुख को पकड़कर बैठा रहेगा तो वह कदापि दुनिया की रेस में भाग नहीं ले सकता। अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति के परलोक गमन पर भी दुनिया का कोई काम नहीं रुकता। मनुष्य पूर्ववत खाता-पीता है, हंसता-बोलता है, अपनी खुशियॉं मनाता है, शुभ कार्यों को सम्पादित करता है।
            कुछ लोग हमारे जीवन में उस समय आते हैं जब हम टूट चुके होते हैं या जब हमें किसी की आवश्यकता होती है अथवा जब हम बिना किसी बनावट के होते हैं। उस समय जो रिश्ता बनता है, वह दिमाग से नहीं आत्मा से जुड़ता है। आत्मा से जुड़े रिश्ते समय की मार नहीं सहते, वे बस चुप हो जाते हैं पर समाप्त नहीं होते। समय हमें सिखाता है कि जो हो गया उसे भूलकर आगे बढ़ो, इसी में समझदारी है।
           दिन-दिन करके मनुष्य जन्म के बाद बचपन से जवानी की ओर बढ़ता है और फिर वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है। तदुपरान्त मृत्यु उसका वरण कर लेती है। वह हर वर्ष अपने बन्धु-बान्धवों के साथ अपना जन्मदिवस मनाकर आनन्दित होता है। पर वह भूल जाता है कि उसके जीवन का एक वर्ष और कम हो गया और मृत्यु तक पहुँचने की एक साल की दूरी उसने तय कर ली है। यह इस जीवन की सच्चाई है। हम सब लोग इस अटल सत्य से नजरें चुराते रहते हैं। हम बस यही सोचते हैं कि हम आयुप्राप्त हो रहे हैं तथा अधिक अनुभवी बनते जा रहे हैं।
          भर्तृहरि जी ने 'वैराग्यशतकम्' ग्रन्थ में जीवन के इस सत्य को बहुत ही सुन्दर शब्दों में उदाहरण सहित उद्घाटित किया है-
          व्याघ्रीव  तिष्ठति  जरापरितर्जयन्ति।
          रोगाश्च  शत्रव  इव  प्रहरन्ति  देहम्॥
          आयु: परिस्त्रवतिभिन्नघटादिवाम्भो।
          लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्॥
अर्थात् बुढ़ापा बाघ की तरह गुर्राता हुआ सामने खड़ा है, शत्रु की तरह रोग शरीर पर नित्य प्रहार करते हैं, छेदयुक्त घट की तरह आयु का नित्य क्षय हो रहा है लेकिन आश्चर्य है कि फिर भी लोग अहित आचरण कर रहे हैं।
           इस श्लोक का कथन है कि वृद्धावस्था बाघ की तरह गुर्राते हुए, मुँह बाए हमारी ओर बढ़ रही है। हमें इस बाघ से इसलिए डर नहीं लगता क्योंकि वह सिर्फ गुर्रा रहा है, हमें खाने नहीं आ रहा। इसलिए उस बाघ को हम अनदेखा करके चैन की बाँसुरी बजाते हैं। उस समय अपने झूठे अहं के कारण हम यही सोचते हैं कि जब वह हमें खाने के लिए आएगा तब हम उसे भी देख लेंगे।
          ज्यों-ज्यों हमारी आयु बीत रही है और हम वृद्धावस्था की ओर जा रहे हैं, हमारा शरीर रोगों का घर बनता जाता है। वह दिन-दिन करके अशक्त हो रहा है। जिस प्रकार घड़े में छेद हो जाने पर पानी बूँद-बूँद करके समाप्त होता रहता है, उसी प्रकार एक-एक दिन करके मनुष्य मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता रहता है। फिर भी मृत्यु की गोद में समा जाने के भय को छोड़कर मनुष्य हर प्रकार के अच्छे-बुरे कर्मों को करने में व्यस्त रहते हैं। न उन्हें वृद्ध होने का भय होता है और न ही मृत्यु का डर। इसीलिए करणीय-अकरणीय कार्यों को करके वे प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
            किसी की मृत्यु होने पर किसी मृत शरीर को देखकर क्षणिक वैराग्य मनुष्य के मन में आता है। कभी श्मशान जाने पर संसार की असारता का ज्ञान मन में कुछ पल के लिए अवश्य आता है। पर वह क्षणिक वैराग्य दूसरे ही पल संसार के आकर्षणों से आवेष्टित (ढक) जाता है। फिर आरम्भ हो जाते है वही दुनिया के सभी आडम्बर और ढकोसले।
           इस सबको लिखने का यह तात्पर्य कदापि नहीं कि मनुष्य दीन-दुनिया को भूलकर जंगलों में जाकर तपस्या करने के नाम पर उसे छोड़ जाए। यानी मनुष्य पलायनवादी बन जाए। दुनिया में रहते हुए सभी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हुए मनुष्य को जल में कमल की तरह रहना चाहिए। तभी वह अपने मानव होने के अर्थ को सार्थक करने में सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 17 मई 2026

अन्नदाता की शोचनीय दशा

अन्नदाता की शोचनीय दशा 

किसान शब्द सुनते ही हमारे सामने सादा-सा कुर्ता और धोती पहने, बैलों की सहायता से अपने खेत में हल जोतते हुए उसकी छवि प्रकट हो जाती है। यह किसान हमारा अन्नदाता है। हमारे भोजन के लिए वह हमें अन्न देता है परन्तु उसने अपने परिवार के साथ दिन में दो समय का भोजन खाया भी है अथवा नहीं, यह कोई नहीं समझना चाहता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा अन्नदाता कितने ही दिन भूखे पेट सोने के लिए विवश होता है। उनकी दशा हमारे देश में हमेशा से ही शोचनीय रही है।
             किसानों की दुर्दशा होने का सबसे बड़ा कारण रहा है उनकी अशिक्षा और आर्थिक रूप से पिछड़ापन। हालॉंकि आज उनके बच्चे पढ़ने लगे हैं। फिर भी अभी बहुत कुछ शेष है जो उनके लिए करना आवश्यक है। बहुत से गाँव इतने वर्षों की आजादी के बाद भी अभी तक शहरों से नहीं जुड़ पाए हैं, वहाँ पक्की सड़कें नहीं हैं। दिल्ली जो भारत की राजधानी है वहाँ भी लोग बिजली और पानी के संकट से यदाकदा जूझते रहते हैं तो उन दूर-दराज के गाँवों में तो यह समस्याएँ सदा ही‌ मुँह बाए खड़ी रहती हैं।
            पहले समय में कृषि पूर्णरूपेण वर्षा पर आश्रित रहती थी। आज भी उन स्थितियों में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कृषि के लिए बहुत से आधुनिक यन्त्र बन गए हैं जिनका उपयोग किसान करते रहते हैं। परन्तु फिर भी वर्षा उनके इरादों पर पानी फेर देती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और असमय ओलावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ उनकी फसलों को बर्बाद कर देती हैं। 
            महंगाई के चलते उर्वरक, खाद और बीज इत्यादि दिन-प्रतिदिन बहुत महंगे होते जा रहे हैं। उनको खरीदने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जिसे वह साहूकार से या बैंक से कर्ज के रूप में लेता है। यदि फसल अच्छी हो गई तो कर्ज का भुगतान कर दिया जाता है। परन्तु यदि दुर्भाग्यवश फसल बर्बाद हो जाए तो फिर कर्ज चुका पाना असम्भव हो जाता है। 
           किसान अच्छी फसल की आशा में बच्चों की शादी, अथवा अन्य शुभ कार्य सम्पन्न करने की, टपकती हुई छत वाले घर की मुरम्मत आदि की योजनाएँ बनाता है। लेकिन जब आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के कारण यदा कदा उसकी फसल ही चौपट हो जाती है तब उसकी सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं।
          पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे किसानों की जमीन के टुकड़े छोटे होते जा रहे हैं। उस पर मौसम की मार और कर्ज लिया धन उनकी कमर ही तोड़ देता है। वे असहाय हो जाते हैं। बैंकों से लिए कर्ज को न चुका पाने के कारण गुँडानुमा एजेण्ट उनके मन में इतना आतंक भर देते हैं कि आत्महत्या के अतिरिक्त उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझता।
          पहले समय में साहूकार उन अनपढ़ किसानों को थोड़े से कर्ज को न चुका पाने के कारण उनकी पीढ़ियों को ही बन्धक बना लिया करते थे।  इसी विषय से सम्बन्धित स्कूल में पढ़ी हुई  इंगलिश भाषा में लिखी कहानी 'A handful of wheat' यानी 'मुट्ठी भर अनाज' जो ऋण स्वरूप लिया गया था, उसकी याद आ रही है। इसके लेखक शायद मुलख राज आनन्द हैं। इस कहानी को याद करके आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कहानी बहुत ही हृदयस्पर्शी है।
        लेखक ने इस कहानी में किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया है। अपनी किसी आवश्यकता के कारण साहूकार से थोड़ा-सा ऋण लेता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज के अनुसार उसका बढ़ता रहता है। उसका ऋण कभी चुकाया हुआ माना ही नहीं जाता। तब पिता के द्वारा लिए गए उस ऋण को चुकाने के लिए उसके बच्चों को सारी आयु उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। साहूकारों का यह बहुत ही शर्मनाक व्यवहार कहा जा सकता है।
             पहले साहूकारों का आतंक होता था जो ब्याज के रूप में उनकी फसलें कटवाकर ले जाया करते थे और अब बैंकों का खौफ रहता है। इन‌ सबके अतिरिक्त इन छोटे किसानों के पास अनाज को सुरक्षित रखने के लिए भण्डार गृह भी नहीं होते। इन्हें औने-पौने भाव अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल को दलालों को बेचना पड़ता है। मण्डियों में जाकर अनाज बेचने पर भी उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
            सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएँ किसानों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते रहते हैं। उन सबके किए गए उपाय अभी किसानों की दशा को सुधारने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। हम सभी को भी उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उनके उत्थान के लिए मनन करना चाहिए।
            ऐसे किसान जो परिश्रम करके हमें जीवन देते हैं, हम उनके प्रति थोड़ा भी संवेदनशील नहीं हैं। वे किसान और उनके परिवारी जन दाने-दाने को तरसते हैं। हम सबका पेट भरने के लिए दिनोंदिन फाके करते हैं। हम उनके परिश्रम का मूल्य तो नहीं चुका सकते पर अन्न को सुरक्षित रखकर उनकी मेहनत का सम्मान तो कर सकते हैं। अपने झूठे अहं का प्रदर्शन करते हुए अपने घर में और अपनी की जाने वाली पार्टियों में अन्न को बर्बाद होने से हम बचा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 16 मई 2026

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति-पत्नी के मध्य समर्पण भाव

पति और पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मान्तर यानी सात जन्मों का होता है, ऐसा हमारी भारतीय संस्कृति मानती है। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। हमारी ऐसी मान्यता है कि शरीर पीछे बनता है पर भाग्य पहले लिख दिया जाता है। उसी प्रकार जोड़ियॉं भी ईश्वर पहले ही बनाकर मनुष्य को इस संसार में भेजता है। इस रिश्ते को सही तरीके से निभाना पति और पत्नी दोनों का ही दायित्व होता है। इसमें चूक होने की गुँजाइश घर-परिवार और समाज में कदापि मान्य नहीं होती।
            स्कूल में पढ़ते समय अंग्रेजी भाषा की एक कहानी पढ़ी थी। अब भी जब मैं उस कथा को याद करती हूं तो मन भर जाता है। इस कहानी में जिम और डैला नामक दो पति-पत्नी थे। वे दोनों सुविधा सम्पन्न नहीं थे। वे अभावग्रस्त जीवन व्यतीत कर रहे थे। जिम के पास सुन्दर-सी सोने की एक घड़ी थी पर उसकी चेन सोने की नहीं थी। डैला चाहती थी कि जिम की घड़ी में सोने की चेन हो। पर उनके पास सोने की चेन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।   
           दूसरी ओर डैला के बाल बहुत सुन्दर थे जिनके लिए जिम एक सोने का क्लिप खरीदना चाहता था। पर धन न होने के कारण लाचार था। दोनों ही अपनी आर्थिक स्थिति के कारण बहुत मजबूर थे। चाहकर भी वे दोनों एक-दूसरे के लिए सोने की चेन अथवा सोने का क्लिप नहीं खरीद सकते थे। इन्हें खरीदना उन दोनों के बूते से बाहर था। इसलिए वे दोनों अपना मन मसोस कर रह जाते थे।
          इस प्रकार समय बीतता गया। एक दिन जिम का जन्मदिन आया। उस दिन डैला ने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन उपहार स्वरूप खरीदने की सोची। परन्तु पैसे तो उसके पास नहीं थे। वह पार्लर गई और उसने अपने सुन्दर बाल बेच दिए। उन पैसों से उसने जिम की घड़ी के लिए सोने की चेन खरीदी। उधर जिम ने अपनी पत्नी को रिटर्न गिफ्ट देने के लिए अपनी घड़ी बेच दी और उसके लिए सोने का क्लिप खरीद लिया।
           शाम के समय डैला ने जिम को जन्मदिन के उपहार स्वरूप सोने की चेन भेंट की। फिर जिम ने रिटर्न गिफ्ट के तौर पर डैला को सोने का क्लिप भेंट किया। यद्यपि अब सोने की चेन और क्लिप की आवश्यकता नहीं रह गई थी। अपनी-अपनी पूँजी को गँवाकर भी वे एकदम-दूसरे के प्रति समर्पण भाव से विभोर हो उठे।
          ऐसा समर्पण भाव पति-पत्नी के मध्य होना आवश्यक होता है। उन दोनों में आपसी प्रेम और विश्वास होना आवश्यक है। इसके बिना आपस में सामंजस्य नहीं स्थापित किया जा सकता। उन दोनों को दो जिस्म और एक जान की तरह जीवन व्यतीत करना चाहिए। तभी उनके जीवन में खुशियाँ सदा बरकरार रह सकती हैं।
           दोनों के सुख-दुख भी साझे होने चाहिए। उन दोनों के मध्य किसी भी स्थिति में तीसरे की गुँजाइश नहीं होनी चाहिए। आपसी विश्वास गृहस्थ जीवन की पहली सीढ़ी है। दोनों को सहनशीलता अपनानी चाहिए। यदि दोनों में से कोई एक अपने साथी से विश्वासघात करता है तब रिश्ते दरकने लगते हैं। उसका अन्त अलगाव के रूप में होता है। उनका अलग होना घर-परिवार को तोड़ देता है। मासूम बच्चे बिना किसी दोष के सबसे अधिक कष्ट भोगते हैं।
           अपने-अपने पूर्वाग्रह त्याग करके उन्हें भावी जीवन के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए। उन दोनों का व्यवहार परस्पर सहृदयतापूर्वक होना चाहिए। मन, वचन और कर्म से इस पावन रिश्ते को निभाना चाहिए। इससे आपसी मनमुटाव की गुॅंजाइश बिल्कुल नहीं रहती। पति-पत्नी दोनों में प्रेम और विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता है। यही गृहस्थ जीवन की पूॅंजी कहलाती है। यहॉं स्वर्ग के समान शान्ति का वातावरण रहता है। ऐसे परिवार की सुगन्ध चहुॅं ओर फैलती है।
             इस प्रकार का व्यवहार जब उन दोनों के मध्य होता है तब उनके बीच पनपने वाली सभी दूरियाँ समाप्त हो जाती हैं और उनके हृदयों के तार फिर से जुड़ जाते हैं। जिसे हम दूसरे शब्दों में टेलीपेथी कह सकते हैं। यही टेलीपेथी उनके जीवनों के जुड़ाव का प्रमाण होती है। उन्हें इसे सिद्ध करने के लिए किसी शपथ को खाने की आवश्यकता नहीं होती।
            पति-पत्नी में ऐसी प्रगाढ़ता सफल दाम्पत्य जीवन का मूल मन्त्र होती है। ऐसा घर सबके लिए एक उदाहरण बन जाता है। वहॉं धन-वैभव की यदि कभी कमी भी हो तो उनके व्यहार में कोई परिवर्तन नहीं आता। वे एकजुट होकर हर संकट से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार रहते हैं।
            हर माता-पिता को अपने बच्चों में संस्कार बचपन से ही देने चाहिए। कैसी भी परिस्थिति हो वे अपने जीवन साथी के साथ, सारा जीवन एक-दूसरे की कमियों को अनदेखा करते हुए, राजी-खुशी व्यतीत करके सबके समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करें। इसी में सबका सुख-चैन निहित है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 15 मई 2026

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल

सबके साथ चलने वाले का जीवन सफल 

हमारे मनीषी कहते हैं कि जीवन उसी व्यक्ति का सफल होता है जो इस ससार में अकेला नहीं है। उसके भाई-बन्धुओं के आवागमन से घर में रौनक रहती है, चहल-पहल रहती है। वह घर तो मानो भूतों के डेरे के समान होता है जहाँ पर कभी कोई नहीं आता। इसका सीधा-सा अर्थ यही निकलता है कि जिसके घर बहुत से लोग आते रहते हैं चाहे वे मिलने-जुलने हों अथवा चाहे किसी कार्य से आने वाले हों, उसका जीवन ही वास्तव में इस भूतल पर सफल माना जाता है।   
            सबके साथ सामंजस्य बनाकर चलना जीवन को सफल, शान्तिपूर्ण और सन्तोषजनक बनाता है। यह दृष्टिकोण न केवल रिश्तों को मजबूत करता है बल्कि व्यक्तिगत और पेशेवर विकास के लिए भी आवश्यक है। सहयोग से सफलता मिलने पर आप मानसिक शान्ति और खुशी अनुभव होती है। जीवन की दौड़ में केवल अकेले दौड़ने वाले को प्रतिस्पर्धा में प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती।
            'पञ्चतन्त्रम्' नामक ग्रन्थ में पण्डित विष्णु शर्मा ने इसी आशय को अपने शब्दों में बहुत सुन्दर तरीके से व्यक्त किया है-
        य धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले।
       आगच्छन्ति गृहे येषां कार्यार्थं सुहृदो जना:।।
अर्थात् इस जगत में वे लोग धन्य, विवेकी और सभ्य हैं जिनके आवास स्थान पर मित्रगण काम के लिए आते हैं।
            इस श्लोक से कवि यही स्पष्ट करना चाहते हैं कि दूसरे की उम्मीदों पर जो लोग खरे उतरते हैं, संसार में उन्हीं को पूछा जाता है। उन्हें सभी अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं। सबके अपने वही कहलाते हैं जिनके पास कोई भी व्यक्ति बेझिझक होकर अपनी समस्याओं के साथ आ सकता है। ऐसे महानुभावों का जीना ही इस धरा पर वास्तव में जीना कहलाता है। ऐसे लोगो को धन्य और विवेकी कहा जाता है।
               अपने अहं के कारण दूसरों को हेय समझकर दुत्कारने वालों से सभी किनारा कर लेते हैं। सबको अपना बनाकर चलने वालों के साथियों की कतार बहुत लम्बी हो जाती है। इसी से ज्ञात होता है कि मनुष्य कितना सभ्य है? वह कितने लोगों को अपने साथ लेकर चल सकता है? उसे दूसरों की कितनी चिन्ता और परवाह है?
            आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में इस विषय पर लिखते हैं-
       जीवने यस्य जीवन्ति मित्राणीष्टा सबान्धवा।
       सफलं जीवितं तस्य आत्मर्थे को न जीवति।।
अर्थात् जिसके जीवन से इष्ट , मित्र, बन्धु-बान्धव जीवित रहते हैं, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए कौन नहीं जीता? यानी अपने लिए तो सभी लोग जीते हैं।
           जो मनुष्य अपने इष्टजनों और बन्धु-बान्धवों के जीने का कारण बनता है, उसी का जीवन सफल है। अपने लिए, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए यानी अपने घर-संसार के लिए तो सभी जीते हैं। यह जीना स्वार्थपरक होता है जहाँ मेरे और मेरे परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान ही नहीं होता। अपने और अपनों के लिए सब सुख-साधनों को जुटाना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। उनकी सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करना मनुष्य का कर्त्तव्य होता है।
              इसका यह तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मनुष्य समाज के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाए या अनदेखा करने लगे जिसके कारण ही उसका अपना यह अस्तित्व है। वह समाज में अकेला रहकर नहीं जी सकता। ‌‌भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य 'चाणक्यनीति:'  में अन्यत्र इस विषय पर लिखते हैं- 
        स जीवति गुणो यस्यधर्मो यस्य सजीवति।
        गुणधर्म-विहीनो य: जीवितं तस्य निष्फलम्।।
अर्थात् वही जीवित रहता है जिसमें गुण हों अथवा धर्म हो। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निष्फल है।
           आचार्य चाणक्य ने मानव जीवन के लिए बहुत ही गूढ़ रहस्य बताया है। उनके अनुसार गुण और धर्म का मनुष्य में होना आवश्यक है। गुणों से रहित मूर्ख व्यक्ति का होना या न होना एक समान होता है। वह इस पृथ्वी पर बोझ के समान होता है। उसके होने से किसी को खुशी मिलती है और न ही उसके जाने का किसी को गम होता है।
            अपने धर्म यानी अपनी जिम्मेवारियों को सुचारू रूप से निर्वहण करने वाला ही मनुष्य ही सर्वत्र सम्मान प्राप्त करता है। इसके विपरीत आचरण करने वाला हर कदम पर तिरस्कृत होता है। उसे कोई घास नहीं डालता। धीरे-धीरे वह अन्धेरों में खो जाता है। इसलिए गुण और धर्म के बिना जीने वाले मनुष्य का जीवन संसार में व्यर्थ हो जाता है।
            मानव जीवन की ऊँचाइयों को छूने वाला सफल व्यक्ति सबका प्रिय बनता है। वह समाज को उचित मार्गदर्शन देता है। उसके दिखाए गए मार्ग पर चलकर आने वाली पीढ़िया भी स्वयं को धन्य मानती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 14 मई 2026

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति की बर्बादी से विनाश

अपनी ही जाति के लोग जब किसी को बर्बाद करने लग जाऍं तब विनाश होना निश्चित है। इस कथन का अर्थ है कि इन्सान इन्सान का शत्रु बन जाए या शेर ही शेर का दुश्मन जाए (यानी एक ही प्रकार या जाति का पशु) अथवा एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएँ तब उनका बच पाना वाकई कठिन हो जाता है। इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता। यह कथन सर्वथा सत्य है। किसी जाति का विनाश दूसरे लोग कम करते हैं। अपने ही किसी से जाति का विनाश कर दिया जाता है।
             दूसरा कोई यदि अहित करने की सोचेगा तो अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार उसका प्रतिकार किया जा सकता है। परन्तु जब अपने ही लोग पीठ में खंजर घोंप दें यानी धोखा देने लग जाएँ तब बचना नामुमकिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि वे हमारी अच्छाइयों, बुराइयों और कमजोरियों को भली-भाँति जानते हैं।   
          'कामन्दकीयनीतिसार' ग्रन्थ में इसी तथ्य को कवि ने उदाहरण सहित हमें समझाया है-
        विषं  विषेण  व्यथते  वज्रं  वज्रेण  भिद्यते।
        गजेन्द्रो      दृष्टसारेण     गजेन्द्रेणैव     च॥
        मत्स्यो मत्स्यमुपादत्ते ज्ञातिर्ज्ञातिमसशयम्।
        रावणोच्छिद्यत्तये  रामो  विभूषणमपूजयत्॥
अर्थात् विष से विष का नाश होता है, वज्र से वज्र का भेदन होता है, गजेन्द्र गजेन्द्र के द्वारा बन्धन में आता है, मछली को मछली ही निगलती है। निस्सन्देह जाति का विनाश जाति के द्वारा ही होता है। राम ने रावण के विनाश के लिए विभीषण का ही सत्कार किया।
              दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह श्लोक हमें चेताने का यत्न कर रहा है कि जहर को जहर काटता है। वज्र को वज्र काटता है, इसे ऐसे भी कह सकते है कि लोहे को लोहा काटता है। हाथी को पकड़ने के लिए महावत हाथी का इस्तेमाल करता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। ये सभी जातियाँ अपनी दुश्मनी खुद ही निभाती हैं। इसी प्रकार एक कुत्ते के क्षेत्र में यदि कोई अन्य कुत्ता आ जाता है तो अपने एरिया से वे उसे बाहर निकाल कर ही चैन लेते हैं।
          आगे और भी सटीक उदाहरण देते हुए कवि ने कहा है कि अपने शत्रु रावण का वध करने के लिए भगवान राम को भी विभीषण की सहायता लेनी पड़ी। तभी तो बड़े-बजुर्ग कहते हैं घर का भेदी लंका ढाए। इतिहास के पृष्ठ भरे हुए हैं इस प्रकार के उदाहरणों से जहाँ इन जैसे विभीषणों और जयचन्दों ने बड़े-बड़े साम्राज्यों का विनाश करवा दिया। तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने ही देश को शत्रुओं के हाथों सुपुर्द करने में उनकी सहायता की। उनके समक्ष सारे रहस्यों का उद्घाटन किया। अनेक मासूम लोगों को मौत की नींद सुलाते हुए न तो उन्हें किसी से डर लगा और न ही उनके मन ने उन्हें कचोटा। 
             सृष्टि की रचना करते समय उसमें सभी जीवों में तालमेल बना रहे, इसका ध्यान ईश्वर ने रखा था। जीव-जन्तुओं की अधिकता न हो जाए, इसलिए शायद यह विधान बनाया कि अपनी जाति ही उसके विनाश का कारण बन जाए। पशुओं की आबादी बहुत अधिक न हो जाए इसलिए शेर, लोमड़ी, सियार आदि मांसाहारी हिंसक पशु बनाए। इसी प्रकार समुद्र में जन्तुओं का सामंजस्य बना रहे इसलिए बड़ी हिंसक मछलियाँ बना दीं। इसी प्रकार सभी जीवो की बुद्धियों को बना दिया कि वे अपनी जाति के विनाश का कारण बन जाएँ।
          मनुष्य जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है उसकी बुद्धि को भी ऐसा बना दिया कि वह अवसर आते ही दूध की तरह फट जाती है और सभी अनर्थों का मूल (जड़) बन जाती है। अपनी मूर्खताओं के कारण शत्रु राज्यों को अपने गुप्त रहस्यों को देकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारता है। देशद्रोही बनकर सबकी नफरत और नाराजगी मोल लेता है। अन्ततः मनुष्य न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सलाखों के पीछे चला जाता है।
          प्रकृति का अत्यधिक दोहन करके और उसे दूषित करके मनुष्य अपने रास्ते में खड्डे खोदता है। समय बीतते भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को न्यौता देकर वह अनेक मनुष्यों के विनाश और उनके दरबदर होने का कारण बन‌ जाता है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं में मनुष्यों के साथ हम अन्य जीवों के विनाश का कारण भी बन जाते हैं। ऐसी आपदाओं के समय जान और माल की बहुत हानि होती है। उससे उबरने में वर्षों लग जाते हैं।
          अपनी जाति को विनाश से बचाने के लिए मनुष्यों को सदा सकारात्मक कार्य करने चाहिए। उसे अपने विवेक का आश्रय लेकर मानव जाति की भलाई के कार्य करने चाहिए। पशु-पक्षियों की तो बुद्धि ऐसा नहीं सोच सकती। परन्तु मनुष्य को तो ईश्वर ने बुद्धि का वरदान दिया है, उसे तो सावधान होना चाहिए। अपनों से शत्रुता न करके उनके लिए सम्वेदनशील होना चाहिए। यथासम्भव उनकी भलाई के कार्य करने चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 13 मई 2026

सोने का ढोंग करने वाले

सोने का ढोंग करने वाले 

व्यक्ति यदि गहरी नींद में सो रहा हो तो उसे जगाया जा सकता है परन्तु जो सोने का ढोंग कर रहा हो (मचला बन जाए) तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी जगा नहीं सकती। उसके कानों के पास यदि ढोल भी बजाया तब भी उसकी नींद नहीं खुलेगी, वह नहीं जागेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि सोने वाले व्यक्ति को जगाया जा सकता है पर जो जाग रहा हो और जानते-बूझते सोने का दिखावा कर रहा हो तो उसे जगाना वाकई टेढ़ी खीर होती है। ईश्वर ही उसका मालिक होता है।
            दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं किसी विषय की जानकारी न होना कोई अपराध नहीं होता। इस कारण अपने मन में हीन भावना नहीं आने देनी चहिए। अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए। जानकर या समझकर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और स्वयं को ज्ञानवान बनाया जा सकता है। उसके पश्चात सही रास्ते पर चलकर ही वास्तव में मनुष्य सफलता की ऊँचाइयों को छूने में समर्थ हो सकता है। इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
          इसके विपरीत जो मनुष्य किसी विषय को जानता है और समझता है पर फिर भी अज्ञानी बनने का प्रदर्शन करता है, गलत रास्ते का चुनाव करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में कोई और नहीं हो सकता। ऐसे लोगों से सदा ही सावधान रहना आवश्यक होता है। ये लोग स्वयं अपना नुकसान तो करते हैं पर दूसरों को बर्बाद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। इन‌ लोगों से दूरी बनाना मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होता है। 
            हम सब जानते हैं कि घर, परिवार, धर्म, देश अथवा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण न करने वालों को सभी हेय समझते हैं। कदम-कदम पर उन्हें अपमान का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को अपने जीवन में नाकामयाब होने का मेडल मिलता है जिसे उन्हें सारा जीवन ढोना पड़ता है। उनके भाई-बन्धु भी ऐसे लोगों से नाराज होकर शीघ्र ही उनसे किनारा कर लेते हैं। वे स्वयं को उनके साथ रहकर तिरस्कृत होना पसन्द नहीं करते।
          समाज में रहते हुए जब सामाजिक व्यवस्था पर कुठाराघात किया जाता है तब वह चरमराने लगती है। उसका प्रभाव पूरे समाज पर ही पड़ता है। समाज में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का माहौल बनने लगता है। हर व्यक्ति दूसरे को सन्देह की नजर से देखने लगता है। इस प्रकार वातावरण दूषित हो जाता है, उसमें हर सहृदय व्यक्ति को बहुत घुटन महसूस होने लगती है। वह ऐसी स्थिति में अन्यत्र कहीं जाने के लिए बेचैन होने लगता है।
          जानते-बूझते हम दुनिया की अन्धी दौड़ में शामिल हो जाते हैं। जब अपनी आर्थिक, शारीरिक, बौद्धिक अथवा अन्य क्षमताओं में कमजोर होने को हम अनदेखा कर बैठते हैं तब हमें मुँह की खानी पड़ती है। उस समय चारों खाने चित्त होकर हम निराशा का लबादा ओढ़ लेते हैं। हम लोगों से सहानुभूति की आशा करते हैं पर वे हमारा उपहास करते हैं कि हमने अपनी क्षमताओं को जानते हुए भी कुँए में छलाँग लगा दी। तब हम दोषी करार किए हुए कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
            हम जानते हैं कि रात को जल्दी सोना और प्रात: जल्दी उठना स्वास्थ्यवर्धक होता है फिर भी हम लेट नाइट पार्टियाँ करते हैं। हर प्रकार के स्वास्थ्य के नियमों को धत्ता बताकर ऊल-जलूल खाते हैं। जब रोग हल्ला बोलते हैं तो डाक्टरों के पास जाकर मेहनत की कमाई और समय दोनों बरबाद करते हैं।
          हम सब इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि आलस्य करने से हम उन्नति नहीं कर सकते बल्कि पिछड़ जाते हैं पर फिर भी उसे गले लगाकर आनन्दित होते हैं। पढ़ने की आयु में जब कैरियर बनाने का समय होता है तब स्कूल-कालेज बंक करके हीरो बनते हैं। बताइए हो गया न सब गुड़ गोबर।
          अपने अन्तस् में विराजमान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी शत्रुओं और बाहरी शत्रुओं से हमारी गहरी छनती है। तब असफलताओं को हम अनजाने में ही दावत दे देते हैं और फिर अपनी हार पर रोते हैं। सारी दुनिया को पानी पी-पीकर कोसते हैं कि किसी से हमारी खुशी सहन नहीं होती। जब तक हम इन शत्रुओं के जाल से नहीं बचेंगे तब तक हमारा उद्धार नहीं हो सकता। इस बात को जितना जल्दी समझ लेंगे उतना ही हम सुखी रहेंगे।
            हम अपने मित्र और शत्रु स्वयं ही होते हैं। यदि हम जागते रहते है यानी कि सचेत रहते हैं तो हम निश्चित ही महान कार्य करते हुए विश्व में अपना एक स्थान बना सकते हैं। इसके विपरीत समझते हुए भी सोने का उपक्रम करते है यानी अनजान बनने का ढोंग करते हैं तो पतन निश्चित होता है। असफलता हमारा स्वागत करने के लिए तैयार बैठी रहती है। इसलिए सदा ही सावधानी बरतनी चाहिए। किसी के जगाने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 12 मई 2026

नीति वचन

नीति वचन 

नीति-कथाओं का संग्रह 'हितोपदेश' नामक ग्रन्थ में नारायण पण्डित ने मनुष्यों के लिए नीतिपूर्ण बातें लिखी हैं। निम्नलिखित श्लोक में उन्होंने प्रिय व्यक्ति, सत्कर्म, अच्छी पत्नी, बुद्धिमान व्यक्ति, लक्ष्मी, मित्र और पुरुष इन सबके विषय में बहुत सुन्दर विवेचना की है-
      स स्निग्धोSकुशलान्निवारयति 
                    यस्तत्कर्म यन्निर्मलम्।
       सा स्त्री यानुविधायिनी स 
                ‌मतिमान्य: सद्भिरम्यर्च्यते॥
       सा धीर्या न मदं करोति स 
                 सुखी यस्तृष्णया मुच्यते।
        तन्मित्रं  यदकृत्रिमं  स  पुरुषो 
                   य:  खिद्यते  नैन्द्रियै:॥      
अर्थात् प्रिय व्यक्ति वही होता है जो अमंगल का निवारण करता है, सत्कर्म वही है जो निर्मल है, पत्नी वही है जो अनुगामिनी है, बुद्धिमान वही है जो सज्जनों के द्वारा पूजित होता है, लक्ष्मी वह है जो मद उत्पन्न न करे, सुख वही है जो तृष्णा से विमोचित करे, मित्र वही है जो अकृत्रिम (बिना दिखावे का) है और पुरुष वही है जो इन्द्रियों के वश में नहीं है।
            प्रिय व्यक्ति दूसरों का हित करने वाला होता है। वह अपने प्रियजनों की हर अमंगल से रक्षा करता है। वह नहीं चाहता कि उसके प्रियजन किसी भी कारण से दुख पाएँ या उनको जीवन में कभी गर्म हवा की तपिश सताए। वह सदैव उनके जीवन में खुशियाँ लाने का यथासम्भव प्रयास करता है। व्यक्ति प्रिय तभी बनता है जब वह निस्वार्थ भाव से अपने बन्धु-बान्धवों के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिन-रात कार्य करता है। उनके मंगल की कामना करता हुआ उनके सुख-दुख में हर समय साथ निभाता है।
             सत्कर्म वही कहलाते‌ हैं जो निर्मल हैं यानी अन्त:करण को शुद्ध और पवित्र करने वाले हों। रैदास जी ने कहा था -
          मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मनुष्य का मन शुद्ध, पवित्र और निष्कपट है तो घर पर या अपने कार्यस्थल पर ही ईश्वर की प्राप्ति और पुण्य मिल सकता है, तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं। इसका भाव है कि आन्तरिक पवित्रता ही सबसे बड़ी भक्ति है, बाहरी आडम्बर नहीं। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सत्कर्म करने वाला अपने इहलोक और परलोक दोनों को सुधारता है। उसके मन में कभी कुमार्ग की ओर प्रवृत्त होने के विषय में सोच ही नहीं सकता।
           पत्नी वही है जो अनुगामिनी है अर्थात् अपने जीवन साथी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चले। उसके सुख-दुख के समय उसकी परछाई बनकर रहे। अपने व्यवहार से कभी ऐसा प्रदर्शन न करे कि वह अपने पति के घर में सामंजस्य नहीं बिठा सकती। वही पत्नी भाती है जो गृहस्थी को कुशलता से चलाए। घर चलाने की उसकी कुशलता उसे ‌विशेष बनाती है। अपने परिवारी‌ जनों के साथ उसे सदा‌ यथायोग्य व्यवहार करना‌ चाहिए।
            बुद्धिमान वह मनुष्य कहा जाता है जो सदा सज्जनों के द्वारा पूजित होता है। अपने विवेक के कारण सदा सत्संगति में रहता है। हर प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करने की क्षमता रखता है। ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ, उसे विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना भी बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं। उसे सभी लोगों के साथ सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए। किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखना चाहिए।
             लक्ष्मी के विषय में हम सभी जानते हैं कि वह एक स्थान पर टिककर नहीं रह सकती। आज यहाँ है तो पलक झपकते ही वहाँ यानी अन्यत्र पहुँच जाती है। राजा को रंक बनाने और रंक को राजा बनाने की भरपूर क्षमता रखती है। गलत तरीके से धन कमाने पर अपने साथ व्यसनों को भी लेकर आती है। मनुष्य को आसमन से जमीन पर पटकना इसे बखूबी आता है। इसलिए मनुष्य को अपने धन और वैभव पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी वही है जो मद उत्पन्न न करे।
          सुख वही कहलाता है जिससे तृष्णा दूर रहे। यदि एक के बाद एक तृष्णा मनुष्य को घेरे रखेंगी तो वह कोल्हू के बैल की तरह अपना सुख-चैन गॅंवाकर दिन-रात परिश्रम करता रहेगा। फिर भी कोई-न-कोई तृष्णा उसे भटकाती ही रहेगी। सुख की चाह रखनी हो तो तृष्णाओं का त्याग करना पड़ता है। यदि जीवन में सुख की कामना हो तो मनुष्य को सन्तोष रखना चाहिए। जो उसके पास है, उसी में सुख की तलाश करनी चाहिए।
             मित्र उसे कहते है जो आडम्बर रहित, सरल व निश्छल होता है। वह सदा अपने मित्र का हितचिन्तक होता है। उसके लिए हमेशा शुभ करने वाला और सोचने वाला होता है। सुख-दुख के समय अपने मित्र के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर वह खड़ा रहता है। वह पीठ पीछे भी अपने मित्र की बुराई नहीं करता। मित्र के विषय में मनीषी‌ कहते हैं कि वह श्मशान तक‌ साथ निभाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मित्रों की मित्रता जीवन भर चलती है। मृत्यु के अतिरिक्त उन्हें कोई अलग‌‌ नहीं कर सकता।
            मनीषियों का कथन है कि वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जिसे अपने ऊपर संयम है। वह कदापि इन्द्रियों के वश में नहीं होता। वह जानता है कि इन्द्रियों के वश में हो जाने का अर्थ है अपने लक्ष्य से भटक जाना। इनके अधीन होने वाले व्यक्ति को कभी शान्ति नहीं मिल सकती। मनुष्य एक अद्वितीय सामाजिक, बुद्धिमान और तर्कशील प्राणी है जो अपनी उच्च संज्ञानात्मक क्षमताओं के कारण अन्य जीवों से भिन्न है। वे आत्म-जागरूकता, नैतिक मूल्यों, जटिल उपकरणों के निर्माण और संस्कृति के विकास में सक्षम हैं। 
          ‌‌    हितोपदेश के इस श्लोक में बताए गए नीतिपूर्वक वचनों के अनुसार व्यवहार करने वाले ही वास्तव में जीवन को सफलतापूर्वक जीते हैं। इन बातों का ध्यान रखने से मनुष्य सदा ऊँचाइयों को छूता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 11 मई 2026

पति-पत्नी के बीच अबोलापन

पति-पत्नी के बीच अबोलापन

पति और पत्नी का रक्त सम्बन्ध नहीं होता। उन दोनों में प्यार और विश्वास का रिश्ता होता है। अतः रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए दोनों को प्रयत्न करना होता है। एक के प्रयास से रिश्ते मजबूत नहीं होते बल्कि टूटने‌ लगते हैं। इस बात का दोनों हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जब उन दोनों में किसी भी कारण से झगड़े की स्थिति बन जाती है तब उनके मध्य घर कर जाने वाला अबोलापन बहुत ही घातक होता है। इसकी अति हो जाने पर अलगाव की स्थिति तक बन जाती है जो घर-परिवार को टूटने के कगार पर पहुँचा देती है।
            वास्तव में पति और पत्नी के मध्य किन्हीं भी कारणों से जब चुप्पी पसरने लगती है तब फिर यही चुप्पी धीरे-धीरे अबोलेपन को जन्म देती है। इसके चलते दोनों परस्पर एक-दूसरे से बात नहीं करना चाहते। यदि थोड़ी-बहुत बात उनके बीच होती भी है तो बहुत ही आवश्यक यानी जिसके बिना घर की गुजर-बसर नहीं हो सकती। जैसे बच्चों की कोई अहं समस्या अथवा किसी सम्बन्धी से सम्बन्धित चर्चा।
           ऐसी स्थिति में घर में फैली सन्नाटे की चादर बहुत त्रासदायक होती है। ऐसे माहौल में घर में रहने वालों का तो मानो दम ही घुटने लगता है। गम्भीर सोच को जन्म देता यह अबोलापन दिन-प्रतिदिन और और अधिक कड़वाहट घोलता रहता है। जो पक्ष अधिक सोचता है वह अधिक घुटन महसूस करता है। उसे घर का खालीपन मानो काटने को दौता है।
          अब हम इस दुखद परिस्थिति का विश्लेषण करते हैं। पति अथवा पत्नी में विचारों में, खान-पान में, विवाह से पूर्व के रहन-सहन में अन्तर होता है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इस वैभिन्नय के कारण अपनी गृहस्थी को ही नरक बना दिया जाए। ये बातें प्रमुख नहीं हैं, इन बातों को नजरंदाज किया जा सकता है।
              यह कहने से मेरा अभिप्राय है कि कुछ पत्नियों को शिकायत होती है कि उनके पति उन्हें बाहर घुमाने नहीं ले जाते, उन्हें खाना खिलाने के लिए किसी रेस्टोरेंट में नहीं ले जाते, शापिंग के लिए नहीं लेकर जाते, घर तथा बच्चों की ओर ध्यान नहीं देते। इसी तरह पतियों को भी ऐसी ही बहुत-सी शिकायतें अपनी पत्नियों से भी होती है। कभी वे इसे प्रकट कर देते हैं और कभी नहीं। फिर झल्लाहट भरा व्यवहार वे एक-दूसरे के साथ करने लगते हैं। जो किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया या जा सकता। इस तरह मन की दूरियाँ अधिक होने लगती हैं। जाने-अनजाने किए जाने वाले ऐसे व्यवहार से दोनों को यथासम्भव बचने का प्रयास करना चाहिए।
             इसका अर्थ यह कभी नहीं लगाया जा सकता कि उनमें आपस में प्यार नहीं है या वे एक-दूसरे को अनदेखा कर रहे हैं। हर व्यक्ति की अपनी-अपनी प्रकृति होती है। कुछ लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त कर देते हैं और कुछ लोग अपनी भावनाओं को अपने मन में ही रखते हैं। इसे बदलना बहुत कठिन कार्य होता है। इस कारण अपने जीवन साथी को सदा अपने मित्रों और कार्यालय के साथियों सामने कोसते रहना अथवा लानत-मलानत करते रहना उचित नहीं होता।
            ऐसा व्यवहार करके दूसरे के समक्ष अपने साथी की छवि धूमिल कर रहे हैं। लोग इन स्थितियों का लाभ उठाने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।उन्हें तो बस मौके की तलाश रहती है। जहाँ मौका मिला वहीं वे क्रिकेट की बाल की तरह उसे लपक लेते हैं। ऐसे स्वार्थी मित्र या सम्बन्धी आग में घी डालने का कार्य करते हैं। इन घात लगाए बैठे लोगों से सावधान रहने के लिए अपने मन की बात इनसे नहीं करनी चाहिए।
          इस अबोलेपन का दुष्प्रभाव बच्चों पर भी पड़ता है। वे अपना उल्लू सीधा करने के लिए तत्पर रहने लगते हैं और उनके मन में बड़ों के प्रति आदर भाव कम होने लगता है। धीरे-धीरे वे माता-पिता के प्रति उदासीन होने लगते हैं और उन्हें बस अपने मनीबैंक से अधिक कुछ नहीं समझते। वे उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने का एक माध्यम मात्र समझने लगते हैं।
            पति-पत्नी दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। भावनात्मक रूप से उनमें टूटन न होने पाए, इसलिए उचित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। सत्य यह है कि शरीर के जख्म भर जाते है लेकिन मन के जख्म नहीं भरते, वे सदा हरे रहते है। अपनी जिम्मेदारियों को हर हालत मे निभाने की कोशिश करनी चाहिए। लापरवाही करने का परिणाम घातक हो सकता है। 
            अपने साथी या अपने घर की समस्याओं के विषय में आप स्वयं जानते हैं। बातचीत का रास्ता कभी भी, किसी भी स्थिति में बन्द नहीं करना चाहिए। जहाँ तक हो अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर आपसी मनमुटाव को यदि आपस में मिल-बैठकर सुलझाया जा सके तो बहुत अच्छा होता है। परन्तु यदि किसी कारण से अहं टकराने लगें और आपसी बातचीत से मामला न सुलझ पाए तब घर की सुख-शान्ति के लिए घर के बड़ों को विश्वास में लेकर चर्चा की जा सकती है। इससे उनको अपनी समस्या को सुलझाने में सहायता मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 10 मई 2026

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो

बाड़ खेत को खाने लग जाए तो 

बाड़ को खेत की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है परन्तु यदि यही बाढ़ किसी कारण से खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की सुरक्षा कोई नहीं कर सकता। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी कितना भी यत्न कर ले पर उस खेत को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सकता।
           बाड़ खेत को खा रही है, यह एक मुहावरा है। इसका प्रयोग अक्सर ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जहॉं कोई वस्तु किसी के संसाधनों या अवसरों को दूर ले जाई जा रही हो। यह किसी ऐसे व्यक्ति या स्थिति का भी उल्लेख हो सकता है जो रचनात्मकता या प्रगति को बाधित कर रहा है। इस मुहावरे का प्रयोग प्रायः एक बाधा के सामने हताशा या लाचारी की भावना व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
            इसी प्रकार जिस व्यक्ति को सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है यदि वही अमानत में खयानत करने लग जाए तब बहुत ही कठिनाई होने लगती है। हमने ऐसे कई काण्ड होते हुए देखे हैं जहाँ उसी के किसी सुरक्षाकर्मी ने ही हत्या कर दी हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गान्धी की हत्या का हैं।
          इसी प्रकार घर अथवा कार्यालय में नियुक्त किए गए सुरक्षाकर्मी स्वयं या किसी दूसरे की सहायता लेकर जरा-सी नाराजगी होने पर अपने स्वामी को मौत के घाट उतार देते हैं। घर के किसी मासूम बच्चे का अपहरण करके फिरौती में मोटी रकम तक वसूलते हैं। यदि उनका मनचाहा किसी कारण से न हो पाए तो उस बच्चे को मौत की नींद भी सुला देते हैं। ऐसे उदाहरण प्राय: सोशल मीडिया, टी.वी. एवं समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं।
          'हरिवंश पुराण' में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है -
          निर्वाप्यते ज्वलन्नग्निर्जलेन सुमहानपि।
       उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्ति: कुतोन्यत:॥ अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि कितनी ही विराट क्यों न हो, अन्त में जल के द्वारा शान्त कर दी जाती है। पर यदि जल से ही अग्नि उत्पन्न होने लगे तो अन्य किस पदार्थ से उसको शान्त किया जा सकता है? यानी उसे शान्त नहीं किया जा सकता।
            इस श्लोक में दर्शाए गए सत्य से हम सभी भली-भाँति परिचित है। कहीं भी आग लग जाए तो हम उस पर पानी डालकर बुझाते हैं। परन्तु यदि उसी पानी से बनी बिजली से आग भड़क जाए तो वहाँ पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। तब उस आग पर मिट्टी डाली जाती है। इसका कारण यह है कि आग पर पानी डालने से करेण्ट आ जाता है, इससे कई जानें जाने का डर होता है।
            इतिहास का अध्ययन करने पर भी हमें ऐसे अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ इस प्रकार के खूनी खेल खेलने में किसी-न-किसी विभीषण का ही हाथ होता था। अन्यथा विरोधी राजाओं को कहाँ पता होता था उस राजा विशेष में विद्यमान उनकी कमजोरियों का।
            खजाने का रक्षक ही यदि हेराफेरी मास्टर हों तो उस खजाने को लुटने में अधिक समय नहीं लगता। लोगों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बिना समय व्यर्थ हुए नष्ट हो जाती है। इस तरह लक्ष्मी के अपार भण्डार कुत्सित मानसिकता के कारण बर्बाद कर दिए जाते हैं।
            सबसे बढ़कर देश के शासक ही यदि देश को बर्बादी के कगार पर ले जाएँ तो ऐसी सम्भावना होती है कि वह देश किसी अन्य देश के कब्जे में शीघ्र आने वाला है । देश में उसके रक्षक नेता ही यदि भक्षक बन जाएँ अर्थात् नेता चोरबाजारी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त, रिश्वतखोरी को प्रश्रय देने वाले, हेराफेरी करने वाले, दूसरों का गला काटने, अपराधियों की शरणस्थली बनने जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त हो जाएँगे तो उस देश का ईश्वर ही मालिक है। 
          ऐसी स्थिति में उस देश में शासन नाम की कोई चीज नहीं रहती। वहाँ केवल स्वार्थ हावी होने लगते हैं। वहॉं अराजकता का वातावरण बन जाता है। सभी नेता जब देश से अधिक अपने स्वार्थों को महत्त्व देने लगते हैं तब वह देश रसातल की ओर जाने लगता है।
          यदि हम चाहते हैं कि बाड़ खेत को न खाए, हमारा खजाना सुरक्षित रहे अथवा हमारे देश का अहित करने वाला कोई भी मनुष्य न हो तो हम सबको मिलकर इसके लिए साझा प्रयास करना होगा। भीतरघात करने वाले जयचन्दों को शीघ्र पहचानकर उनका सामाजिक तौर से बहिष्कार करना होगा। तभी हर प्रकार से हमारे जान और माल की सुरक्षा हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 9 मई 2026

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

भोजन शाकाहारी अथवा मांसाहारी

समाज में सदा से ही यह विषय चर्चा का रहा है कि हमारा भोजन शाकाहारी होना चाहिए अथवा मांसाहारी। कुछ लोग ऐसे हैं जो मांसाहार को पौष्टिक भोजन मानते हुए उसे मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य ऐसे लोग हैं जो शाकाहार को सात्विक भोजन कहते हुए मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता पर बल देते हैं। दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने मत को पुष्ट करने के लिए हमारे समक्ष तरह-तरह की दलीलें प्रस्तुत करते हैं। कुछ दलीलें हमारी बुद्धि को मान्य होती हैं और कुछ हमारे हमें नहीं भातीं। 
            शाकाहार निर्विरोध रूप से सभी को स्वीकार्य है। अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि शाकाहार ही मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन है। इसलिए बहुत से लोग स्वेच्छा से शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। मांस भक्षण यानी मांसाहार के विषय में हमारे मनीषी अथवा हमारे ग्रन्थ हमें क्या समझाते हैं? इसकी हम आज विवेचना करते हैं। 'मनुस्मृति' में भगवान मनु कहते हों-
        मांसभक्षयिताSमत्र यस्य मांसमिहाद्भ्यहम्।
       एतन्मासस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिण:॥
अर्थात् मैं जिसके मांस को यहाँ (इस संसार में) खाता हूँ, वह भी परलोक में मुझे खाएगा। विद्वान मांस शब्द का यही मांसत्व बताते हैं।
          'मनुस्मृति' ही अन्यत्र मनु महाराज ने और भी कहा है-
       यावन्ति पशुरोमाणि तावन्कृतवोह मारणम्।
       वृथा पशुघ्न: प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि।।
अर्थात् जो मनुष्य निरपराध पशु का वध करता है, पशु की देह पर जितने रोम हैं, वह उतनी ही बार जन्म-जन्म में प्रतिघात प्राप्त करता है अर्थात् दूसरों के हाथों से मारा जाता है।
          'मनुस्मृति' के इन दोनों श्लोकों में भगवान मनु कहना चाहते हैं कि किसी भी पशु का वध करने वालों को बार-बार जन्म लेकर उसी प्रकार हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जब तक उनका प्रायश्चित न हो जाए उन्हें छुटकारा नहीं मिल पाता।
          श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
         भूतेषु बद्धवैरस्य न मन: शान्तिमृच्छति।
अर्थात् जीवों पर वैर का भाव मनुष्य के मन को कभी शान्ति नहीं देता।
        भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में  अन्यत्र कहा है-
        निर्वैर: सर्वभूतेषु य:स सामेति पाण्डव!
अर्थात् हे अर्जुन! जो सभी जीवों पर वैर रहित है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है।
          दोनों ही श्लोकाँशों में भगवान कृष्ण का कथन है कि किसी भी जीव से वैर भाव नहीं रखना चाहिए। किसी जीव का अहित करने पर मन में एक कसक सी रहती है। मनुष्य में बेचैनी रहती है। वे कहते हैं कि मुझे वही प्राप्त कर सकता है जो  मन, वचन व कर्म से भी किसी का अहित न करे।
            श्रीमद्भागवत् में बहुत ही सुन्दर शब्दों में आदेश दिया है किया है-
        मृगोष्ट्र खरमर्काखु सरीसृप्खगमक्षिका:।
       आत्मन: पुत्रवत् पश्येत् तैरेषामनन्तरं कियत्॥ 
अर्थात् हिरण, ऊँट, गधा, बन्दर, चूहा, सरीसृप, सर्प, पक्षी और मक्खी आदि को अपने पुत्र के समान ही समझना चाहिए वास्तव में उनमें और पुत्रों में अन्तर ही कितना है?
            श्रीमद्भागवद् ने व्याख्यायित किया है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी अपने पुत्र के समान मानकर उनकी रक्षा करे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जैसे मनुष्य अपने पुत्र का वध नहीं कर सकता उसी तरह अन्य जीवों को भी नष्ट नहीं करना चाहिए।
          शतपथ ब्राह्मण का कथन है-
        यदु वा आत्मसंमितं तदवति तन्न हिंसति।
       यद् भूयो हिनस्ति तत् यत्कनीयो न तदवति॥
अर्थात् जो आत्मानुकूल है वह रक्षा करता है हिंसा नहीं। और जो हिंसा करता है वह तुच्छ होता है।
              अहिंसा और नैतिकता के सिद्धांत पर हमारी भारतीय संस्कृति आधारित है। इसका मूल मन्त्र है जो सभी जीवों के प्रति दया और सम्मान सिखाता है। मांसभक्षण को न केवल स्वास्थ्य बल्कि नैतिकता के विरुद्ध भी माना गया है। यह मान्यता इस विचार को पुष्ट करती है कि किसी निर्दोष प्राणी की हत्या करना या उसका मांस खाना नैतिक रूप से उचित नहीं है। यह कथन भी विचारणीय है -
          सर्वैषामपि मांसभश्रणमयुक्तम्
अर्थात् सभी के लिए मांस खाना अनुचित है।  
            साधु पुरुष दूसरे के शरीर को अपने समान ही मानते हैं और संसार के सभी प्राणियों में आत्मा का अंश देखते हैं। अतः अहिंसा को परम धर्म कहा गया है। किसी भी प्राणी की हिंसा करके उसका मांस खाना अनुचित माना गया है। हिंसा चाहे जीभ के स्वाद के लिए हो अथवा शौक के लिए हो, कभी भी प्रशंसनीय नहीं होती। शेष सुधीजन स्वयं विचार करने में समर्थ हैं।
चन्द्र प्रभा सूद