झूठे अहं से किसी का भला नहीं
मनुष्य के मानस पर यह निर्भर करता है कि वह अपने रास्ते में फूल बिछाना चाहता है अथवा काँटे। फूलों की कोमलता, सुन्दरता, आकर्षण और सुगन्ध के कारण हर व्यक्ति उनकी कामना करता है। परन्तु कठोर और दम्भी काँटों से लहुलूहान हो जाने के डर से सभी लोग उनसे बचते हुए किनारा करना चाहते हैं। इसलिए लोग फूलों और कॉंटों में से फूलों का चुनाव करते हैं। वे उन्हें सुगन्ध देते हैं और उनका मन मोह लेते हैं।
मंगल की कामना करने वाला हर मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य कर जाता है जिनका नुकसान उसे अपने जीवनकाल में उठाना ही पड़ जाता है। कार्य करते समय तो वह बहुत प्रसन्न होता है परन्तु उसका फल भोगते समय उसे कष्ट होता है।
बचपन में एक कहानी पड़ी थी जो आज भी उतनी ही सटीक है। एक हाथी प्रतिदिन नदी में स्नान करने के लिए जाता था। उसके रास्ते में एक दर्जी की दुकान पड़ती थी। हाथी को अपनी दुकान के सामने से हर रोज गुजरते हुए देखकर दर्जी के मन में शरारत सूझी। अब इन्सानी दिमाग है तो कभी-न-कभी कोई खुराफात कर ही बैठता है। इस तरह वह अनजाने में अपने लिए परेशानी मोल ले लेता है। उसका परिणाम भोगते समय उसे नानी याद आने लगती है।
उसने एक दिन अपनी सुई ली और दुकान के सामने से जाते हुए उस हाथी को चुभो दी। अब तो यह नित्य का क्रम बन गया कि हाथी वहाँ से गुजरता और दर्जी उसे सुई चुभो देता। अकारण पीड़ित होते हुए हाथी को उस दर्जी पर क्रोध आने लगा। एक दिन हाथी ने उस शरारत करने वाले दर्जी को सबक सिखाने की सोची।
फिर क्या था, वह हाथी नदी पर स्नान करने के लिए गया और अपनी सूँड में पानी भरकर ले आया। वापसी पर जब दर्जी की दुकान आई तो उसने सूँड में भरा हुआ सारा पानी वहाँ उड़ेल दिया। हाथी के ऐसा करने पर उस दर्जी की दुकान पर रखे हुए बहुत सारे ग्राहकों के कपड़े खराब हो गए और उसे बहुत नुकसान हो गया। तब उसे पश्चाताप हुआ कि उसने व्यर्थ ही हाथी जैसे शक्तिशाली जीव से पंगा ले लिया।
तीर जब कमान से निकल जाता है तो उसे लौटाकर नहीं लाया जा सकता। उस समय मात्र पश्चाताप ही शेष बचता है। यही स्थिति उस दर्जी की भी हो गई। अब उसके पछताने से कुछ भी बदलने वाला नहीं था। अपने नुकसान की भरपाई करने के अतिरिक्त उसके पास अब और कोई चारा नहीं बचा था।
यह कहानी हमें यही समझा रही है कि दर्जी की तरह ही कभी ईर्ष्या से, कभी मौज-मस्ती के कारण और कभी अपनी मजबूरी में हम दूसरों के रास्ते में काँटे बिछाते रहते हैं। फिर दर्जी की भाँति हानि उठाकर दुखी हो जाते हैं और तत्पश्चात पश्चाताप करते हैं।
यदि मनुष्य यह विचार कर ले कि वह जो व्यवहार वह दूसरों के साथ कर रहा है क्या वही व्यवहार वह अपने लिए चाहता है? यदि उसे वह व्यवहार अपने लिए पसन्द है तो फिर सब ठीक है। परन्तु यदि उसे अपने लिए वह व्यवहार नहीं चाहिए तो कहीं-न-कहीं गड़बड़ है। तब उसे दूसरों के साथ ऐसा कोई बरताव नहीं करना चाहिए जो दूसरे के हृदय को तार-तार कर दे।
इस प्रकार मनुष्य जानते-बूझते गलत रास्ते पर चल रहा है और दूसरों के रास्ते में काँटे बिछा रहा है। यही काँटे समय बीतते उसके मार्ग पर बिछकर उसे घायल कर देते हैं। इसलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि बबूल का पेड़ बोकर आम का फल नहीं पाया जा सकता।
इसके विपरीत दूसरों के लिए फूल बरसाने वालों को सर्वत्र सुगन्ध ही मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि फूलों की तरह उनका यश चारों ओर फैलता है।
अपने झूठे अहं और अनावश्यक पूर्वाग्रह पालने से किसी भी मनुष्य का भला नहीं होता। ये सदा ही विनाश का कारण होते हैं। कबीरदास जी ने निम्न दोहे में कहा है-
जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोको फूल के फूल हैं वाको हैं तिरसूल।।
अर्थात् जो हमारे लिए काँटे बोता है, उसके लिए भी फूल बोने चाहिए। हमें तो जीवन में फूल रूपी सुख मिल जाएँगे पर उसे दुख ही मिलेंगे।
इस दोहे का आशय यह है कि बदले की भावना न रखकर, शत्रु के प्रति भी क्षमा और प्रेम का भाव रखना चाहिए। इसका कारण है कि भलाई का फल सुख और बुराई का फल दुख यानी त्रिशूल होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यह दोहा हमें क्षमा, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार की शिक्षा देता है।
बुराई को प्रेम से जीता जा सकता है और ईर्ष्या-द्वेष का उत्तर प्रेम से देना चाहिए। साथ रूप में हम कह सकते हैं कि हमें अपने अहं का परित्याग करना चाहिए। इससे हमारा मन शान्त रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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