मंगलवार, 31 मार्च 2026

जीवन एक पाठशाला

जीवन एक पाठशाला

जीवन एक पाठशाला है। जिसमें हम सभी विद्यार्थी हैं। इसके प्रधानाचार्य जगत पिता ईश्वर हैं और संसार के सभी जीव इसमें अध्यापक हैं। ये सभी निरन्तर हमें कुछ-न-कुछ सिखाते रहते हैं। जब तक सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है तब तक हम आगे बढ़ते रहते हैं। इसके विपरीत सीखना रुकने पर जीवन थम जाता है। हमारे अनुभव ही हमारे सबसे बड़े शिक्षक हैं जो ठोकर लगने पर ही चलना सिखाते हैं।
          जीवन एक निरन्तर चलने वाली पाठशाला है। यहाँ हर अनुभव, सुख-दुःख और व्यक्ति एक शिक्षक की तरह हमें कुछ नया सिखाते हैं। यह पाठशाला हमें अनवरत संघर्ष करना, गलतियों से सीखना और सदैव आगे बढ़ना सिखाती है। जीवन में सीखना कभी समाप्त नहीं होता और समय के साथ परिस्थितियाँ ही हमें परिपक्व बनाने का कार्य करती हैं। 
            बच्चे सवेरे उठकर तैयार होते हैं और अपने विद्यालय जाते हैं। वहाँ निश्चित समय तक पढ़ाई करके घर वापिस लौट आते हैं। वहाँ से मिले गृहकार्य को करना पड़ता है। यदि उसमें कोताही बरतें तो स्कूल में डाँट पड़ती है, सजा मिलती है और कभी-कभी पिटाई भी हो जाती है। उसके पश्चात अपने पढ़े हुए पाठ को बारबार याद करके उसकी परीक्षा देनी पड़ती है। उसमें उत्तीर्ण होने पर ही छात्र अगली कक्षा में जा सकता है। अन्यथा उसी पुरानी कक्षा में वापिस बैठना होता है।
            उसी प्रकार प्रतिदिन प्रात: उठकर अपने दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त होकर हमें भी अपने विद्यालय यानी अपने-अपने दायित्वों को निभाने के लिए तैयार होना होता है। उन्हें यदि सही ढंग से नहीं निभा पाएँगे तो सजा के रूप में घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों से ताने और उलाहने सुनने के लिए मिलते हैं। उस समय मनुष्य को असफलता, कायरता अथवा भगोड़ेपन का सुन्दर-सा, चमकता हुआ मेडल मिलता है।
          संसार के छोटे-से-छोटे जीव से भी हम चाहें तो कुछ सीख सकते हैं। जैसे चींटी से धैर्य व कर्त्तव्य निष्ठा, चातक से वर्षा की पहली बूँद पाने जैसी दृढ़ता, पतंगे की लौ से लगन, अपने समूह की रक्षा अथवा मिल-जुलकर रहना, बन्दरिया का सन्तान प्रेम, शेर से स्वावलम्बन, सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण प्रकृति से नियम का पालन, वृक्षों से परोपकार, पर्वतों से दृढ़ता इत्यादि बहुत कुछ हम लोग सीख सकते हैं।
            व्यक्ति सीखने वाला होना चाहिए, यह सारी कायनात उसे नया-नया पाठ पढ़ाने के लिए तैयार बैठी है। सबसे बड़ा शिक्षक समय है जो हमारे कर्मो के अनुसार हमें कभी सुखों के हिण्डोले में झूलाता है और कभी दुखों के थपेड़ो से मर्माहत करता है। इसका दोष हम किसी ओर को नहीं दे सकते।
            दुनिया में आने के बाद से ही मनुष्य की ज्ञाननार्जन की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जितना ज्ञान वह ग्रहण करता है, उसमें से उसकी परीक्षा ली जाती है। यदि वह उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तो बहुत अच्छा अन्यथा जिन्दगी का वही पाठ उसे पढ़ना पड़ता है। यह ऐसी परीक्षा नहीं होती कि जिसमें पाठ का रट्टा लगाया और उत्तर पुस्तिका में लिख दिया तो पास हो गए। 
           जीवन की इस परीक्षा में वही परखा जाता है कि जो पढ़ा है अथवा अपने जीवन में अनुभव से सीखा है। उसे आत्मसात् किया या नहीं अर्थात् उसका प्रेक्टिकल किया है या उस ज्ञान का मात्र प्रदर्शन ही किया जा रहा है।
             इस परीक्षा के प्रश्नपत्र में अन्य प्रश्नों के अतिरिक्त दुखों और परेशानियों का प्रेक्टिकल करवाया जाता है। उसमें पास होना आवश्यक होता है। इसमें मनुष्य के गुण-अवगुण, उसका पुस्तकीय ज्ञान सब परखा जाता है। इसी विपत्ति रूपी अग्नि की कसौटी पर जो खरा उतरा वही वास्तव में तपकर कुन्दन बनता है। तात्पर्य यह है कि इस समय जो व्यक्ति अधीर होकर सही रास्ते का चुनाव करते हैं, ईश्वर शाबाशी के रूप में उनके मनोरथ पूर्ण करता है। उस समय उन्हें वह सब कई गुणा अधिक लौटा देता है जो उन्होंने खोया होता है।
          जो लोग जीवन की इस परीक्षा में घबराकर अनुत्तीर्ण होने के डर से कुमार्ग की ओर चल पड़ते हैं, आयुपर्यन्त उनके लिए कदम-कदम पर काँटे बिछ जाते हैं। उनका सुख-चैन सब तिरोहित होने लगता है। वे हर समय एक अज्ञात भय के साए में रहते हैं।
              इस परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण होने के लिए जीवन की पाठशाला में मन लगाकर ध्यान से पढ़ना चाहिए। अपने दायित्वों का पूर्णरूपेण निर्वहण करते हुए देश, धर्म व समाज के नियमों का मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिए। यदि मनुष्य सन्मार्ग पर अडिग रहे तो किसी प्रकार की परीक्षा में वह बिना अपना धैर्य खोए पास होता चला जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 30 मार्च 2026

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान

अपनी एक स्वतन्त्र पहचान हर मनुष्य बनाना चाहता है। उसके लिए वह निरन्तर प्रयास करता रहता है। दिन-रात का अपना सुख-चैन बिसराकर वह अथक परिश्रम करता है, संघर्षरत रहता है। इसका कारण है कि दुनिया की भीड़ में कोई भी व्यक्ति खो जाना नहीं चाहता। स्वतन्त्रता को लेकर सभी की अपनी एक निजी धारणा है। जो परिस्थिति के अनुसार हो जाती है। अपने मामलों और क्षेत्रों पर स्वयं निर्णय लेने की क्षमता आवश्यक होती है। दूसरों पर निर्भर नहीं होना, चाहे वह आर्थिक हो या वैचारिक रूप से हो। बिना किसी अनुचित रोक-टोक के अपने विचार व्यक्त करना या अपने जीवन के बारे में निर्णय लेना। 
            स्वतन्त्रता का अर्थ होता है किसी भी बाहरी नियन्त्रण, दबाव या अनुचित प्रतिबन्धों से मुक्ति पाना। वहाँ व्यक्ति अपनी इच्छा और विवेक से कार्य करने, निर्णय लेने और अपने जीवन को संचालित करने में सक्षम होता है। यह समाज में समानता और व्यवस्था के साथ सन्तुलित करने वाली होती है। यह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों अर्थों में देखी जाती है। इसमें तर्कसंगत और न्यायसंगत नियमों के अधीन रहकर सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना शामिल होता है। 
            विचार करने का विषय यह है कि मनुष्य अपनी पहचान कैसे बना सकता है?  वह क्या उपाय करे कि उसकी वह पहचान बनी रहे? 
          बच्चा जब छोटा होता है तब वह अपने माता-पिता के नाम से जाना जाता है। यानी मनुष्य की पहचान उसके कुल से, उसकी जाति से और उसके धर्म से होती है। जब वह थोड़ा बड़ा होता है तभी से वह अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगता है। वह चाहता है कि सब लोग उसको उसके नाम और कार्य से उसे पहचानें।
            इसके लिए वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके योग्य बनना चाहता है। अच्छी-सी नौकरी अथवा बड़ा-सा कारोबार करना चाहता है। वह चाहता है कि जिस भी किसी क्षेत्र में वह रहे, उसे वहाँ नम्बर वन की ही पोजिशन मिले। 
            ऐसी इच्छा करने में कुछ गलत नहीं है। उसे पाने के लिए प्रयास भी तो करना पड़ता है। यदि यह सब मात्र चाहत ही रहेगी और उसके अनुरूप परिश्रम व लगनशीलता नहीं होगी तो उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण नहीं हो सकेगी। वह अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल नहीं हो सकेगा। 
            यदि कामना करने मात्र से और पलक झपकते ही सभी इच्छाएँ पूर्ण होने लगें तो उनका आनन्द ही नहीं रहेगा। वर्षों कठोर परिश्रम रूपी साधना करने के पश्चात ही मनुष्य को स्वयं उसकी पहचान रूपी श्रेष्ठ फल मिलता है। तब तक इन्सान आयु के बढ़ने के साथ-साथ परिपक्व हो जाता है। उसे तय की गई इस लम्बी यात्रा के सुखद व दुखद अनुभवों के पहलुओं पर विचार करने की समझ आ जाती है। तब अपनी बनाई हुई इस पहचान को वह आयुपर्यन्त सम्हालकर रखने पाने में समर्थ हो जाता है।
          इसके विपरीत इस पहचान की सफलता का नशा जिनके सिर पर चढ़कर बोलने लगता है, इस संसार में पटखनी खाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। यदि किसी भी क्षेत्र में नाम कमाया है तो अपने लिए और स्वयं अपनी प्रसन्नता के लिए। किसी दूसरे को तो उससे कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला। यह निश्चित है कि कोई व्यक्ति आपके रौब में नहीं आएगा। हाँ, किसी को अपना स्वार्थ सिद्ध करना हो तो वह अलग विषय है। वह आगे-पीछे घूम सकता है, मिन्नत-चिरौरी कर सकता है और दिमाग खराब कर सकता है।
          यह स्मरण रखना चाहिए कि इस विश्व में बहुत से नामचीन लोग हैं। उन बहुतों से यदि स्वयं की तुलना कर सकें तो फिर यह नशा सिर चढ़कर नहीं बोलता बल्कि पाँव जमीन पर रखने के लिए विवश कर देता है। इससे मनुष्य इस धरातल पर रहता है, गर्व में चूर होकर अनावश्यक ही उड़ान नहीं भरता। तब वह इस समाज में आलोचना का पात्र नहीं बनता अपितु एक सम्माननीय व्यक्ति बन जाता है।
          हम इस बात को झुठला नहीं सकते कि कामयाबी में बहुत नशा होता है। मनुष्य को दम्भी बनने में जरा भी देर नहीं लगती। उस समय उसे सच्चे पथप्रदर्शक मित्रों की आवश्यकता होती है। हालांकि स्वार्थी लोगों का भ्रमजाल बहुत मजबूत होता है। वे अनावश्यक प्रशस्तियाँ गाते रहते हैं जो किसी को मोहित करने के लिए पर्याप्त होती हैं। उनके मायाजाल से बच निकलने वाला वास्तव में महान होता है। उस समय सच्चे और अच्छे मित्र चापलूसों की भीड़ में कहीं खो से जाते हैं या पीछे रह जाते हैं।
            जब अपनी एक पहचान बन जाए तब उस मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक अपने हितचिन्तकों को हमेशा अगली पंक्ति में रखने की आवश्यकता होती है। उनका साथ पाकर वह मनुष्य दिग्भ्रमित नहीं होगा तथा और अधिक उन्नति करता जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 29 मार्च 2026

महानता पर किसी का एकाधिकार नहीं

महानता पर किसी का एकाधिकार नहीं

जन साधारण की भलाई के लिए जो व्यक्ति कुछ कार्य करता है, वही वास्तव में महान कहलाने योग्य है। समाज के लिए योगदान दिए बिना केवल प्रसिद्ध होना, अमीर होना या शक्तिशाली होना महानता नहीं कहलाती। महानता की असली कसौटी सेवा भावना है। केवल किसी नाम या पद से ही कोई महान नहीं बन जाता। महान वे लोग होते हैं जहॉं भी उनकी बात हो तो लोग उनकी प्रशंसा करें, उनका गुणगान करें। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जो भी व्यक्ति राष्ट्र, धर्म, समाज या उच्च आदर्शों के लिए निस्वार्थ भाव से काम करता है, वही महानता का भागीदार होता है।
             महानता ऐसा विशिष्ट गुण है जिस पर किसी व्यक्ति विशेष का एकाधिकार नहीं होता। हर व्यक्ति को महान बनने का पूरा अधिकार है। यह सत्य है कि महानता, ज्ञान या देश प्रेम पर किसी एक व्यक्ति, समूह या विचारधारा का एकाधिकार नहीं है। यह एक साझा मानवीय गुण है जो योग्यता, कर्म और साधना से प्राप्त होता है। महानता सामूहिक उत्तरदायित्व है और समाज के किसी भी सदस्य द्वारा, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हो, अर्जित की जा सकती है। अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जो व्यक्ति कार्य करता है उसके लिए महानता का मार्ग खुला रहता है।
             ज्ञान और उच्चता के क्षेत्र में वही योग्य माना जाता है जिसमें जिज्ञासा, साधना और तपस्या करने की ललक हो, न कि वह जो किसी खास समूह से जुड़ा हो। जो मनुष्य महानता के मार्ग पर चलना चाहता है, उसे अपनी नित्य प्रति की जीवनशैली में थोड़ा-सा परिवर्तन करना पड़ता है। यानी स्व से पर अथवा व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ना होता है। 
             दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उसे हृदय को संकुचित करने के स्थान पर विशाल बनाना होता है। केवल अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों के साथ-साथ उसे प्राणिमात्र का हितसाधक बनना होता है। इस संसार के सभी जीवों को उसे अपने कुटुम्ब के सदस्य की तरह ही मानना होता है।
            जीवन में आगे बढ़ने और सफल होने के लिए मनुष्य को फूँक-फूँककर कदम रखना होता है। दूसरों को नीचा दिखाने के स्थान पर वह सबकी उन्नति की कामना करनी होती है। दूसरों की सफलता से ऐसा मनुष्य जलता नहीं है बल्कि प्रसन्न होता है। दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान समझता है। इसलिए वह उसे हड़प करने के बारे में मन से भी नहीं सोचता। वह जो भी ग्रहण करता है, उसे बादल की तरह संसार को लौटा देने के लिए कटिबद्ध रहता है। 
            दूसरों की निन्दा-चुगली करने के स्थान पर वह अपने समय का सकारात्मक उपयोग करता है। सदा सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करता है। परोपकार के कार्यों में समय व्यतीत करता है। सबको जीवन में प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। महान लोग अपने जीवन में लक्ष्य निर्धारित करके उसे पूर्ण करने के लिए जुट जाते हैं। अपने जीवन को यज्ञमय बनाते हैं। उनका सारा जीवन समाज, देश और धर्म के सुधार कार्यों में ही व्यतीत होता है। हमेशा समाज में फैली हुई कुरीतियों के प्रति लोगों को सावधान करते रहते हैं।
              अपने जीवन को सदा ही सामाजिक, नैतिक और धार्मिक नियमों के अनुसार चलाने वाले ये लोग दूसरों से भी उन नियमों का पालन करने की अपेक्षा करते हैं। तभी ये समाज में अग्रणी बनकर दिशादर्शन का कार्य बखूबी निभाते हैं। किसी भी मनुष्य की व्यथा कथा से ये सहृदय लोग आहत हो जाते हैं। उसके कष्ट को दूर करने का यथासम्भव प्रयास करते हैं। ये महापुरुष पूर्णरूपेण विश्वसनीय होते हैं। दूसरों के रहस्यों को खजाने की तरह गुप्त रखते हैं।
            महान लोगों का सबसे बड़ा गुण होता है निर्विकार और निरहंकार रहना। ये महानुभाव हर किसी की परवाह अपने-पराए के भेदभाव से परे रहकर करते हैं। उनके मन में कर्त्तापन का अभिमान कदापि नहीं आता। इसलिए ये सरल व कोमल होते हैं। इन लोगों के साथ कोई कितना भी  दुर्व्यवहार कर ले, उन्हें भला-बुरा कह ले, उसे दण्ड देने के स्थान पर क्षमा कर देने में विश्वास रखते हैं। इसीलिए इन्हें क्षमाशील कहा जाता है।
             ये महानात्मा संसार के कार्य-व्यवहार करते हुए भी जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहते हैं। अपनी धुन में मस्त ये लोग राग-द्वेष से दूर रहते हैं। किसी को भी इनके संयमित व्यवहार से छल-कपट अथवा किसी प्रकार के षडयन्त्र की बू तक नहीं आती। अपने अन्तस् में महानता का गुण समेटे ये महानुभाव सदा निम्न नियम पर आचरण करते हैं - 
           सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय
अर्थात् सब लोगों के हित के कार्य करना और सबके सुख की चिन्ता करने को ही अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लेते हैं। जो भी इन गुणों को आत्मसात कर लेता है, वह भी महान हो जाता है। जिस पथ पर ये चलते हैं, उसी मार्ग के उन पदचिह्नों पर आने वाली पीढ़ियाँ चलकर अपने जीवन को धन्य बनाती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 28 मार्च 2026

अपेक्षा और उपेक्षा का चक्र

अपेक्षा और उपेक्षा का चक्र

मजबूत-से-मजबूत सम्बन्धों की नींव हिलने में जरा भी देर नहीं लगती। यदि अपना समझकर किसी से अपेक्षा की जाए अथवा कोई हमसे अपेक्षा करे और वह किसी भी कारण से पूरी न हो पाए तो सम्बन्धों में दरार आने लगती है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी किसी अपने द्वारा की गई उपेक्षा से अथवा दूसरों के द्वारा उपेक्षित होने पर भी ये भौतिक सम्बन्ध दरकने लगते हैं। अपेक्षा और उपेक्षा दोनों ही भाव बड़ी ही खूबसूरती से सम्बन्धों को तोड़ने के लिए आग में घी डालने का काम करती हैं। ये दोनों ही भावनाएँ सहृदय मनुष्य के लिए सदा घातक होती हैं।
             अपेक्षा का अर्थ हम कर सकते हैं कि किसी से आशा करना, चाह रखना, इच्छा करना या तुलना करना। उपेक्षा का अर्थ हम कर सकते हैं कि किसी को नजरअंदाज करना, उस पर ध्यान न देना, किसी का तिरस्कार करना या अवहेलना करना। यानी दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि अपेक्षा सकारात्मक उम्मीद को दर्शाता है जबकि उपेक्षा नकारात्मक तिरस्कार को प्रदर्शित करती है।
          और भी यदि सरल शब्दों में हम कहें तो कह सकते हैं कि जब किसी बात को जानबूझकर टाल दिया जाता है और उसपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता तो वह उपेक्षा कहलाती है। इसके विपरीत जब कोई व्यक्ति किसी चीज के लिए किसी व्यक्ति के पास जाकर उम्मीद रखता है या आशा प्रकट करता है अथवा पाने की इच्छा रखता है तो इसे अपेक्षा कहते है।
            मनुष्य ससार में अकेला रह नहीं सकता। उसके लिए सभी परिवारी जनों और बन्धुजनों का सहयोग आवश्यक होता है। इसी आदान-प्रदान के चलते समाज में उसे अपना मन मारकर बहुत कुछ करना पड़ता है अथवा सहना होता है। वह कभी दूसरों से अपेक्षा करता है और कभी दूसरे उससे अपेक्षा करते हैं। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। जब मनुष्य अपने माता-पिता, मित्रों-सम्बन्धियों अथवा सहयोगियों की अपेक्षाओं पर खरा उतरता है तब वह सबका प्रिय बन जाता है। सभी उसकी निष्ठा और उसकी कार्यशैली की तारीफों के पुल बाँधते नहीं थकते।
           इसके अलावा भी उसे जीवन के हर मोर्चे पर कड़ी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना पड़ता है। जहाँ पर उससे कोई चूक हो गई अथवा वह असफल हो गया वहीं उसकी टीका-टिप्पणी आरम्भ हो जाती है। उसकी बुराई करने का विशेषाधिकार लोगों को मिल जाता है। कोई व्यक्ति अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखना चाहता कि उसकी सफलता का प्रतिशत कितना है। लोग तो बस दूसरे की कमियों को लपकने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। इसका कारण है होता है कि ऐसा करने से बिना अपनी जेब ढीली किए उनका मनोरंजन हो जाता है। वे इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते हैं।
            कोई भी व्यक्ति शत-प्रतिशत दूसरों  की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सकता। इसी प्रकार हर अपने की सभी की अपेक्षाओं को पूरा करना भी किसी के बूते की बात नहीं होती। इसके पीछे मनुष्य की तत्कालीन आर्थिक परिस्थिति, शारीरिक समर्थ, धार्मिक स्थिति और मानसिक स्थितियों का हाथ होता है। कभी-कभी मनुष्य की कोई विवशता होती है और कभी आलस्यवश, हीनभावना या कमजोर इच्छा शक्ति के कारण वह पिछड़ जाता है।
          मानव का स्वभाव ऐसा है कि किसी के भी द्वारा की गई उपेक्षा को वह सहन नहीं कर पाता। उसका अहं उसे उन सबसे दूर कर देता है जो उसकी अवहेलना करते हैं। वह अपनों द्वारा उपेक्षित किए जाने को सहन नहीं कर पाता और उस स्थिति में वह मन-ही-मन टूटने लगता है। उन परिस्थितियों में वह उन सबसे अपना सम्बन्ध विच्छेद तक कर लेता है। आजन्म उन सबका चेहरा भी नहीं देखना चाहता। यदि कभी अनजाने में सामना हो जाए तो मुॅंह मोड़कर, कन्नी काटकर निकल जाता है।
             इसके विपरीत जब वह दूसरों की उपेक्षा करता है तो स्वयं को सही ठहराने के लिए उस समय सौ-सौ बहाने गढ़ लेता है। तब वह भूल जाता है कि जैसी पीड़ा उसे अपनी अवहेलना झेलते समय हुई थी वैसी ही व्यथा उन लोगो को भी हो रही होगी जो जाने-अनजाने उसके तिरस्कार के शिकार बने हैं।
            इसलिए चाहे मनुष्य की अपेक्षा पूरी न हो अथवा उसे उपेक्षा का शिकार बनना पड़े, दोनों ही विपरीत स्थितियों के समक्ष आ जाने पर मनुष्य को अपना धैर्य कभी नहीं खोना चाहिए। उसे डटकर, सीना तानकर इन विरोधी परिस्थितियों का सामना करना चाहिए। उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। ऐसा कठिन समय भी आखिरकार गुजर ही जाता है। उसके बाद सब अनुकूल हो जाता है और लोग उन बातों को ही भूल जाते हैं। तब उसके जीवन में एक नया सवेरा मुस्कुराते हुए खुशहाली लेकर आ जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

सफलता जब पंख लगाकर उड़ती

सफलता जब पंख लगाकर उड़ती

सफलता जब पंख लगाकर उन्मुक्त आकाश में पक्षी की भाँति ऊँची उड़ान भरने लगती है तब उन पंखों को कतरने के लिए बहुत से लोग कैंची लेकर तैयार बैठे होते हैं। यह स्थिति वास्तव में बहुत कष्टकारक होती है परन्तु दुर्भाग्यवश यह भी जीवन का एक सत्य है। इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।‌ सीधी-सी बात है कि कोई भी मनुष्य दूसरे को सफल होते हुए नहीं देखना चाहता। उसकी टॉंग खींचकर गिराने से लोग गुरेज नहीं करते। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों को उन्नति करते देखकर प्रसन्न‌ होते हैं। 
             इस संसार में लोग अपने दुखों से दुखी नहीं होते, वे दूसरो के सुखों से परेशान होते हैं। किसी का भी धन-वैभव अथवा सुख-समृद्धि अन्यों के लिए ईर्ष्या का कारण बन जाती है। लोग यह नहीं सोचना चाहते कि अमुक व्यक्ति ने दिन-रात एक करके जी तोड़ अथक परिश्रम किया है। तब जाकर उसने जीवन में यह सब प्राप्त किया है। दूसरे व्यक्ति की सफलता मानो उनके गले की फॉंस बन जाती है जिसे न उनसे निगलते बनता हैं और न ही उनसे उसे उगलते बनता है।
            जब तक किसी भी योजना को साकार करने के लिए उसे उपयुक्त उपाय से क्रियान्वित न किया जाए तब तक उसके सफल होने में सन्देह रहता है। योजना की सफलता के लिए सबसे पहले उसे एक रूप दिया जाता है। उसके बाद उसके लिए धन-बल का प्रबन्ध करना होता है। फिर उसका क्रियान्वयन इस प्रकार करना पड़ता है कि मनुष्य को असफलता का मुँह न देखना पड़े। हर उद्देश्य को सफल बनाने के लिए सच्चे और ईमानदार साथियों का होना पहली आवश्यकता होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण होता है व्यक्ति का अपना श्रम और लगन या उसकी निष्ठा।
             जिस मनुष्य ने इन सभी पक्षों पर समय लगाकर और मन्थन करके किसी भी योजना का प्रारूप तैयार किया हो, उसे प्राय: सफलता मिलती है। यदि उससे कहीं चूक हो जाए तो उसे सुधारकर फिर पूरे साहस से अपने कर्मक्षेत्र में उतर जाता है। तब तक वहाँ डटा रहना होता है जब तक उसे वहाँ मनचाही सफलता न मिल जाए।
        इसके विपरीत जो व्यक्ति अपनी कार्य योजना को आरम्भ करने से पूर्व ही उसको सार्वजनिक कर देता है अथवा चारों ओर प्रचारित करता है, उसके असफल होने के अवसर अधिक होते हैं। इसका कारण है कि अपने रहस्य का उसने ऐसा ढिंढोरा पीटा जिससे उसके पहले ही किसी और ने उसे क्रियान्वित करके शायद उसका लाभ उठा लिया हो। मनीषी इसीलिए चेतावनी देते हैं कि अपने रहस्यों को तब तक गुप्त रखना चाहिए जब तक उनका शुभारम्भ न हो जाए।
             कुछ लोग ऐसे सुविधाभोगी होते हैं जिन्हें बिना हाथ-पैर हिलाए केवल सोचने मात्र से ही सफलता चाहिए होती है। दिवास्वप्न देखने वाले वे शेखचिल्ली अपने जीवन के हर मोर्चे पर असफल रहते हैं। वे अपनों से और समाज से तिरस्कृत होते रहते हैं। ये लोग अपनी असफलता के कारणों पर विचार करने के स्थान पर, अपना पूरा जीवन दूसरे सफल व्यक्तियों को कोसते रहते हैं। उन पर टीका-टिप्पणी करते हैं। इससे भी बढ़कर अपनी असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़कर आत्ममुग्ध होते हैं।
          कुछ मनुष्य दूसरों की देखादेखी अथवा होड़ में उत्साहित होकर किसी भी कार्य को आरभ्भ कर लेते हैं पर रास्ते में आने वाली कठिनाइयों के कारण उसे बीच अधर में अधूरा छोड़कर पलायन कर जाते हैं। ऐसे ढुलमुल रवैये वाले लोग भी अपने जीवन में कदापि सफल नहीं हो पाते।
          सफलता सदा उन्हीं लोगों के कदम चूमती है जो अपनी असफलताओं और मार्ग में आने वाली निराशाओं को अपने नियन्त्रण में करके, उनसे शिक्षा लेकर निरन्तर आगे बढ़ते रहते हैं। पीछे मुड़कर देखना उनके स्वभाव में नहीं होता। दिन-रात एक करके अपने लक्ष्य की ओर देखने वाले, ये निस्सन्देह सफल होते हैं। ऐसे साहसी व्यक्ति समाज में अग्रणी बनते हैं। इन साहसी उद्यमियों को समाज सदा सम्मान भरी नजरों से देखता है। ऐसे ही महानुभाव सबके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनते हैं और समाज का पथप्रदर्शन करते हैं।
               सफलता प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार है। उसे पाने के लिए आलस्य त्यागकर उद्यम करना पड़ता है। बैठे-बिठाए तो सामने रखी थाली का निवाला भी मुँह में नहीं जाता। सफल व्यक्तियों से ईर्ष्या करने के स्थान पर उनकी तरह दृढ़तापूर्वक लक्ष्य का सन्धान करने की आवश्यकता होती है। सफलता का मीठा फल चखना चाहिए, उसे दूर की कौड़ी समझने की भूल करके उससे मुँह नहीं मोड़ लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 26 मार्च 2026

रिश्तों में प्यार और विश्वास

रिश्तों में प्यार और विश्वास

लौकिक रिश्ता हो अथवा ईश्वरीय हो, कोई भी सम्बन्ध ऐसा ही नहीं होता जिसके लिए हमारे मनों पर धूल नहीं जमती। जब तक वहाँ धूल जमी रहती है तब तक सब धुँधला-धुँधला दिखाई देता है। जब उस धूल को हटाकर सफाई कर देते हैं तब सब पारदर्शी हो जाता है। उस समय हमारे समक्ष सब साफ होने लगता है। हर रिश्ते में प्यार और विश्वास का होना बहुत आवश्यक होता है। उनके बिना सब‌ बेमायने रह जाता है।
            यह सब कहने का मात्र यही अभिप्राय है कि हर रिश्ता प्यार और विश्वास पर टिका होता है। जितना अधिक हम एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील रहेंगे, वह सम्बन्ध उतना ही अधिक करीबी बन जाता है। अब सोचने वाली बात यह है कि कौन-सी धूल है जिसकी यहाँ चर्चा की जा रही है? मन पर यह धूल कैसे जम जाती है? इसे साफ करने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जा सकता है?
          ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, माया, लालच, अहंकार आदि की धूल हमारे मनों पर जम जाती है। हम प्राय: आवेश में आ जाते हैं। किसी दूसरे की भौतिक उन्नति, सुख-समृद्धि, वैभव, ज्ञान आदि को हमारा अहं सहन नहीं कर पाता। इसीलिए हम दूसरों की ओर से उदासीन हो जाते हैं और दूरी बना लेते हैं। हम अपने ही बन्धु-बान्धवों के बीच भेदभाव की दीवारें खड़ी करते रहते हैं। अपने सम्बन्धों के बीच जाने-अनजाने नफरत के बीज बोते रहते हैं। जब उसका फल मिलता है तो वह हमसे सहन नहीं होता। हम व्याकुल हो जाते हैं।
          ‌धीरे-धीरे समय बीतने पर सारी यादें धुँधली पड़ जाती हैं। इस कारण हमारे मनों में पड़ी दरारें बढ़ने लगती हैं। हमें सब कुछ बदरंग दिखाई देने लगता है। कुछ भी साफ नहीं दिखाई देता। यदि हम इन यादों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तब हमारा अहं आड़े आ जाता है। तब हम चाहकर भी अपनी दुर्भावनाओं से मुक्त नहीं हो पाते और हमारे मनों में जमी हुई धूल बढ़ती जाती है। हम उसे साफ करने के स्थान पर वैसा ही छोड़कर आगे बढ़ जाना‌ चाहते हैं। यह उचित नहीं होता।
            हमारे अपने घर में जो भी फर्नीचर होता है, उसे हम प्रतिदिन झाड़-पौंछकर साफ करते हैं, उसे चमकाकर सजाते हैं। इसी तरह अपने घर को भी शीशे की तरह चमकाते हैं ताकि वहाँ आने-जाने वाला हर व्यक्ति हमारे सलीके की प्रशंसा करे। घर यदि साफ-सुथरा होता है तो वहाँ सकारात्मक ऊर्जा प्रसरित होती है। वह ऊर्जा हमारे तन और मन को प्रफुल्लित करती है। इसके विपरीत धूल आदि गन्दगी रहने पर नकारत्मक ऊर्जा रहती है जिससे तन और मन दोनों रोगी हो जाते हैं।
             इस प्रकार हम प्रतिदिन धूल को झाड़कर साफ करते हैं। अपने घर के बाहर सड़क पर जमी धूल भी हमें अच्छी नहीं लगती। उसे कितनी भी साफ कर लो फिर दुबारा उस पर धूल हो ही जाती है। हम बार-बार सफाई करते हैं परन्तु धूल भी अपना साम्राज्य फिर से स्थापित कर लेती है। 
            अपने मन पर नित्य जम रही धूल के प्रति हम लापरवाह रहते हैं। हम उसे साफ करने अथवा हटाने का कोई प्रयास ही नहीं करते। अपने घर की धूल हमें परेशान करती है पर मन की धूल को हम बड़े प्यार से पालते हैं। उसे अपना मीत बना लेते हैं। उससे हमें तनिक भी चिड़चिड़ाहट नहीं होती। इस कारण हमारे मनों में नकारात्मक विचार जन्म लेने लगते हैं जो हमें सहज या सरल बने रहने देना नहीं चाहते। हम अपने अन्तस में हो रहे इस परिवर्तन को समझ ही नहीं पाते।
            यदि हम अपने मन पर पड़ी अथवा विचारों की धूल को दूर करने का प्रयास करें तो निश्चित ही सफलता मिलेगी। जब हम इसे झाड़-पौंछकर साफ कर देंगे तो हमारे अन्तस की जड़ता दूर हो जाएगी। वर्षा के बाद जैसे सारी प्रकृति चमकती हुई दिखाई देती है वैसे ही इस धूल के दूर हो जाने से सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। हमें अपने सम्बन्ध मोहक और अपने-से लगने लगते हैं। उस समय वहॉं पर प्यार और विश्वास अपनी जड़ें मजबूत करने लगते हैं।
             बन्धु-बान्धवों के प्रति मन में पनपने वाला सारा रोष धुलकर सब चमकता हुआ प्रतीत होता है। मनों में आई हुई मलिनता नष्ट होने लगती है। तब उनको कसौटी पर परखने की आवश्यकता नहीं रह जाती। मन में आने वाले ग्लानि के भाव तिरोहित हो जाते हैं और सभी को बहुत सुकून देते हैं। सभी लोग फिर से मानो एक डोर में बॅंधे हुए से प्रतीत होने लगते हैं।
          यथासम्भव अपने अन्तस की धूल को साफ करने के लिए ईश्वर की उपासना, सद् ग्रन्थों का अध्ययन और सज्जनों की संगति में रहना चाहिए। इससे मनों में सरलता और सहजता का वास होता है जिससे सहृदयता बढ़ती है। उसे शीशे की तरह चमकाने से सकारात्मक किरणें प्रवाहित होती हैं। वे हमारे पास आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करती हैं। बस अपने सम्बन्धों को प्यार और विश्वास से सींचने की आवश्यकता होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 25 मार्च 2026

धन के पीछे दीवाना होकर भागना

धन के पीछे दीवाना होकर भागना

मनुष्य जीवन भर अपने खाने-पहनने की और अपनी स्वयं की सुध बिसराकर पैसे के पीछे दीवाना होकर भागता रहता है। वह भूल जाता है कि यह मृगतृष्णा उसे बस यहाँ-वहाँ भटकाती रहेगी और फिर कहीं का भी नहीं छोड़ेगी। मनुष्य इस विषय पर कभी विचार ही नहीं करना चाहता कि इस संसार में क्या यह धन-दौलत किसी की अपनी बन पाई है? यह उसे क्या-क्या दे सकती है? उसके बदले में उससे क्या-क्या छीनने में सफल हो सकती है? ये प्रश्न वास्तव में विचारणीय हैं।
             यह पैसा, यह धन-दौलत मनुष्य को सुन्दर मखमली बिस्तर दिलवा सकती है परन्तु उसे  प्रफुल्लतादायक अच्छी और गहरी नींद कभी नहीं दे सकती। इसी तरह यह दौलत भोजन तो दे सकती है पर भूख को मिटा पाना उसके बूते से बाहर की बात है। व्यवहार में देखा जाए तो दौलत हमें पहनने के लिए अच्छे-से-अच्छे कपड़े खरीदकर दे सकती है परन्तु हमारे लिए सुन्दरता नहीं खरीद सकती। यह पैसा ऐशो-आराम के साधन दे सकता है परन्तु सुकून के दो पल हमारे जीवन के लिए नहीं जुटा सकता।
            इसी प्रकार धन-दौलत जिस पर हम इतना गर्व करते हैं, वह हमें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ दे सकती है परन्तु अच्छा स्वास्थ्य अथवा जीवन खरीदकर नहीं दे सकती। बच्चों को यह बिगाड़ सकती है, उन्हें हठी और मानी बना सकती है पर सन्तान को आज्ञाकारी नहीं बना सकती। यह मनुष्य को ऐशो-आराम के साधन दे सकती है परन्तु सुख-सौभाग्य नहीं दे सकती। उसकी पसन्द के नाते-रिश्तेदार देना उसके बस की बात नहीं है। ईश्वर ने जो नाते-रिश्तेदार दे दिए सो दे दिए। 
           किसी से प्यार अथवा किसी का विश्वास आदि कुछ भी तो नहीं दिला सकती यह दौलत। यह मनुष्य के घर कुव्यसनों का डेरा बना सकती है पर उसे सन्मार्ग पर चलाने के लिए उसका हाथ नहीं थामती। उसे गर्त में गिरते देखती रहती है परन्तु उसे सम्भलने के लिए प्रेरित नहीं करती। अत: इस पर इतना इतराना या मान करना उचित नहीं है। हम यह भी जानते हैं कि यह माया बहुत ही चंचल है, ठगिनी है। हमारे विवेक को भ्रमित कर देती है। यह दौलत भले-चंगे इन्सान को अपने जाल में फंसाकर उसे भ्रष्ट बना देती है। 
            कबीरदास जी का एक बहुत प्रसिद्ध सब्द या पद  है - 
           माया महा ठगनी हम जानी
इसमें उन्होंने माया को 'महाठगिनी' यानी बहुत बड़ी धोखेबाज कहा है जो त्रिगुण यानी सत्व, रज और तम की फाँसी लेकर मीठी बोली बोलती है। यह माया संसार के सभी प्राणियों को मोह और इच्छाओं के जाल में फंसाकर परम सत्य सत्य ईश्वर से दूर कर देती है।
            यह धन-दौलत उसे अपनों से दूर अकेला कर देने का षडयन्त्र करती रहती है। जब वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है तब धत्ता बताकर चल देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि जब मनुष्य उसके मायाजाल में पूरी तरह उलझ जाता है तब उसे ठोकर मार देती है तथा इठलाते हुए शान से किसी और के पास चली जाती है। बेचारे मनुष्य को तो पता भी नहीं चलता और उसका सब कुछ लुट जाता है और वह नष्ट हो जाता है। वह कंगाल बनकर अपने दुर्भाग्य को कोसता रहता है। 
            मनुष्य इस धन के हाथ की कठपुतली बना बस सोचता ही रह जाता है कि यह सब कैसे हो गया? क्यों हो गया? वह है कि मुस्कुराते हुए दूर खड़ी होकर उसकी इस बर्बादी का आनन्द लेती रहती है। पलक झपकते ही यह माया राजा को रंक बना देती है और रंक को राजा के सिंहासन पर विराजमान कर देती है।  इसके खेल बहुत निराले हैं जो आम आदमी की समझ से बाहर हैं।
            इसलिए सयाने कहते हैं कि पैसा हाथ का मैल है। इस पर गर्व नहीं करना चाहिए। आज यह यहॉं है तो देखते-ही-देखते कल कहीं और चली जाएगी। यह किसी को कलम पकड़ाकर वारा न्यारा कर देती है। दूसरी ओर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले से जीवन भर आँख मिचौली का खेल खेलती रहती है। इसकी आशा में संसार में आया हुआ मनुष्य अपने जीवन से हार जाता है पर यह उसका साथ नहीं निभाती।
           इस आने-जाने वाली धन-दौलत पर मनुष्य को कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए। इसे देश, धर्म और समाज के हित के लिए खर्च करना चाहिए। घर-परिवार के सदस्यों को भौतिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करते हुए इस धन को परोपकार के कार्यों में लगा देना चाहिए। दानवीर कर्ण की भॉंति इसे दान देने वाले इतिहास में अमर हो जाते हैं। समय-समय पर यथोचित दान देने में ही इस धन-दौलत की सार्थकता होती है। इस तरह इस धन का सदुपयोग करने से मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 24 मार्च 2026

मिल-जुलकर सौहार्दपूर्वक रहना

मिल-जुलकर और सौहार्दपूर्हवक रहना

सभी मनुष्यों को सदा परस्पर मिल-जुलकर और  प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। इससे उनमें एकता की भावना बढ़ती है और चारों ओर सौहार्द फैलता है। यह मानवता के लिए बहुत आवश्यक होता है। यदि किसी के भी साथ घृणा या ईर्ष्या की जाए तब चारों ही ओर परस्पर नफरत की आग भड़कने लगती है जिसकी चपेट में आकर बहुत कुछ जलकर खाक हो जाता हैं। इससे हम सबको हानि होती है। चाहे उसे हम प्रत्यक्ष रूप से अनुभव कर सकें अथवा नहीं।
              ईश्वर ने मनुष्य को सहृदय प्राणी बनाकर इस संसार में भेजा है। वह नहीं चाहता कि उसके बनाए हुए जीवों से कोई भी नफरत करे। वह स्वयं सबसे प्रेम करता है और किसी से कभी नाराज नहीं होता। इसलिए वह चाहता है कि उसके बनाए हुए सभी लोग मिल-जुलकर रहें। उनमें परस्पर भाईचारा बना‌ रहना‌ चाहिए। कहीं विरोध या अलगाव की स्थिति नहीं बननी चाहिए।
            यदि किसी व्यक्ति की कोई बात पसन्द न आए तो यह आवश्यक नहीं कि उसी समय बदला ले लिया जाए। होना तो चाहिए कि उसे शान्ति पूर्वक इस बात का अहसास करवा दिया जाए कि उसकी अमुक बात अच्छी नहीं लगी। उसके बाद फिर अपने-अपने मन को एक-दूसरे की ओर से साफ कर लेना चाहिए। अपने मन में कलुषित भाव लाकर अनावश्यक ही पिष्टपेषण करने से सदा बचना चाहिए और स्वयं को परेशान करने से बचना चाहिए।
            अपनी नाराजगी को केवल शब्दों  तक रखना चाहिए, दिल की गहराई में बसाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। कुछ कह लिया और कुछ सुन लिया, मन की भड़ास निकल गई। फिर ऐसे हिसाब बराबर करके हाथ मिला लेना चाहिए। दुश्मनी पालने से किसी का भला नहीं होता। अपनों को यदि इस तरह हम दिन-प्रतिदिन नाराज करते जाएँगे तो शत्रुओं की संख्या बढ़ाते जाएँगे। उस समय अपना कहने के लिए हमारे पास कोई नहीं रहेगा। हम अकेले होकर सबसे कट जाऍंगे।
            धीरे-धीरे अकेले हो जाने से जीवन यात्रा दुष्वार हो जाती है। कहते हैं-
         अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
अर्थात् अकेला मनुष्य तो कुछ भी नहीं कर सकता। हर कार्य को करने के लिए उसे बहुत से लोगों की आवश्यकता पड़ती है।
          'एकता में बल है' कहकर इसीलिए मिलकर रहने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसी भाव को इस तरह भी कहकर समझाया जाता है कि  'एक अकेला और दो ग्यारह।' यानी सामाजिक प्राणि यह मनुष्य समाज से कटकर अलग-थलग होकर कभी अकेला नहीं रह सकता। अकेले रहना किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए अभिशाप से कम नहीं होता। ऐसा व्यक्ति सब परिजनों से कटकर मात्र दुखी ही रहता है। माना कि ऋषि-मुनि अकेले रह सकते हैं पर केवल तब, जब वे साधना कर रहे हों। हमेशा के लिए तो वे भी अकेले नहीं रह सकते।
           मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भी अकेला नहीं रह सकता। यदि उसे अकेलापन न सताता तो वह इस सृष्टि की रचना करके स्वयं को व्यस्त न रखता। 'छान्दोग्योपनिषद्' में कहा है - 
                एकोहं बहुस्याम' 
अर्थात् मैं एक हूॅं, मैं अनेक‌ हो जाऊॅं कहकर इस बात की पुष्टि की है। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कि एक ही ब्रह्म अपने संकल्प से कई रूपों में विस्तृत हो गया।
           वह बस बैठा हुआ दुनिया के लोगों के खेल देखकर अपना मनोरंजन करता रहता है। दूसरों को आकर्षित करने अथवा अपना बनाने का एकमात्र जादू है प्रेम का व्यवहार करना। इससे शेर जैसे खूँखार, हाथी जैसे शक्तिशाली और साँप जैसे जहरीले जीवों को वश में किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि संसार के सभी जीव इस प्यार की भाषा को बखूबी समझते हैं। इसलिए किसी को भी अपना बनाना हो तो उससे प्यार और अपनत्व का ही व्यवहार करना चाहिए।
             मन को थोड़ा-सा विशाल बनाने से उसमें छिपे घृणा, द्वेष आदि शत्रु स्वयं ही निकलकर भाग जाते हैं। उस समय मनुष्य की मन की वृत्तियाँ सात्विक हो जाती हैं। उसके पास आने वाला हर जीव स्वाभाविक रूप से स्वयं ही उसके प्यार से सराबोर हो जाता है। प्यार से सब कुछ सरल और सहज हो जाता है। मनुष्य के सभी कार्य स्वत: ही सिद्ध हो जाते हैं। इसका कारण यही  है कि प्यार करने वाले व्यक्ति के बहुत से साथी अपने आप बन जाते हैं। 
             इस तरह उसके अपनों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो जाती है। जब बहुत से हाथ एकसाथ आगे बढ़ने लगते हैं  तब दुनिया का कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरा नहीं हो सकता। जहाँ तक हो सके चारों ओर प्यार की वर्षा होती रहनी चाहिए। इस दुनिया से नफरत, आतंक और अन्य बुराइयों को दूर करने के लिए और स्वच्छ समाज के निर्माण के लिए इसकी महती आवश्यकता है। इसलिए प्रेम की गंगा बहाते रहिए और धरती पर ही स्वर्ग जैसी सुख एवं शान्ति का आनन्द लेते रहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 23 मार्च 2026

रिश्तों की अहमियत समझें

रिश्तों की अहमियत समझें

रिश्तों की अहमियत समझने वाले जानते हैं कि वे कितने महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन्सान हमेशा अपने भाई, बन्धुओं, सम्बन्धियों और मित्रों  के साथ ही सुशोभित होता है। सुख-दुख के समय मनुष्य के कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़े होने वाले ये सभी आत्मीय जन उसके जीवन का बहुत बड़ा सम्बल होते हैं। इनका साथ किसी मनुष्य के लिए बहुत गौरव की बात होता है। उन्हीं के भरोसे वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता है। उसे पता होता है उसके पीछे अपनों का साथ है।
          जीवन चलाने के लिए ये रिश्ते-नाते उसे ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलते हैं जिन्हें वह किसी भी शर्त पर बदल नहीं सकता। वह चाहे या न चाहे उनका साथ निभाना उसका नैतिक दायित्व बन जाता है। रिश्तों को 'मजबूरी में ढो रहे हैं' ऐसा कहना उन रिश्तों का अपमान करना ही कहलाता है। परमेश्वर को मनुष्य का यह व्यवहार कभी पसन्द नहीं आता। इसीलिए मनुष्य को अपनी मूर्खता से रिश्तों को खोने पर पीड़ित होना पड़ता है। उसे हर कदम पर सचेत रहने की आवश्यकता होती है।
        केवल मित्रों का चुनाव करने में हम स्वतन्त्र होते हैं। उनका चुनाव स्वयं अपने विवेक से हमें करना होता है। यदि मनुष्य गलत मित्रों का चुनाव करता है तो उसे उसके परिणाम स्वरूप दण्ड भोगना पड़ता है अर्थात् कष्टों का सामना करके व्यथित होना पड़ता है। यदि सौभाग्य से सन्मित्रों के सम्पर्क में वह आ जाता है तो दुनिया का भाग्यशाली व्यक्ति बन जाता है। तब उसे अपनी समझदारी पर गर्व होता है कि उसने बहुत सोच-समझकर मित्रों का चुनाव किया है।
        इस सृष्टि का यह बहुत कठोर नियम है- 
            इस हाथ दो और उस हाथ लो' 
                         या 
             जैसी करनी वैसी भरनी
                       अथवा
            जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
इन सभी मुहावरों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, बदले में उसे वैसा ही मिलता है। यदि वह सबके साथ समानता, प्यार, विश्वास, भाईचारे अथवा सदाशयता का व्यवहार करता है तो उसे भी आजन्म सबसे प्यार और विश्वास मिलता है। सभी उसे अपना समझते हैं और उसके व्यवहार से किसी को कभी कोई शिकायत नहीं होती। इस प्रकार जीवन अपनी गति से और शान्ति से चलता रहता है।
           हर रिश्ते को मन की गहराई से निभाना चाहिए। शब्दों से कह देने मात्र से रिश्ते नहीं निभते। कहने मात्र से रिश्ता दूर तक साथ नहीं दे पाता चाहे वह पति-पत्नि का हो या भाई-बहन का। हमारे माता-पिता की तो मजबूरी होती है कि वे अपने बच्चो को मरते समय तक नहीं छोड़ सकते। बशर्ते बच्चे स्वार्थ में अन्धे होकर अनुचित व्यवहार करते हुए उनके साथ कुछ बुरा न करें। अथवा धोखा देकर अपने माता-पिता की धन-दौलत आदि अपने नाम करवा न लें।
           जो लोग अपने धन, वैभव, ज्ञान आदि के झूठे अहं के शिकार हो जाते हैं, वे अपने जीवन में कभी रिश्तों की अहमियत नहीं समझ पाते। सबको अपने दुर्व्यवहार से ठोकर मारकर वे उन्हें अपने से दूर कर देते हैं। एक आयु के पश्चात जब अकेलापन उन पर हावी होने लगता है तब वे सबको पानी पी-पीकर कोसते हैं और फिर परेशान होते रहते हैं। उस समय वे रिश्तों को न निभाने के लिए लानत भेजते हैं। रिश्तों में खून सफेद होने का सबको दोष देते हैं। अपने गिरेबान में झॉंकने का प्रयास नहीं करना चाहते।
          जो लोग अपने सम्बन्धियों के साथ मधुर सम्बन्ध रखते हैं, वे हमेशा ही प्रसन्न रहते हैं। जब कुटुम्ब या परिवार के सभी जन किसी अवसर विशेष पर एकत्रित होते हैं तो वहीं त्योहार जैसा आनन्ददायक वातावरण बन जाता है। मस्ती में झूमते वे दूसरों की ईर्ष्या का कारण भी बन जाते हैं। उस समय वे भी सोचते हैं कि काश उनके साथ भी इसी तरह सभी अपने होते।
        अपने परिवार में यदि एकता हो तो किसी की क्या मजाल है कि कोई उनकी ओर टेढ़ी आँख से देखने की हिमाकत कर सके। यदि कोई गलती से कोई ऐसा दुस्साहस करता है तो उसे कोई नहीं बचा सकता। तब तो फिर ईश्वर ही उसका मालिक बन सकता है। जहॉं तक हो सके अपने परिवार की एकजुटता को बनाए रखने का प्रयास चाहिए। उसे कभी खण्डित नहीं होने देना चाहिए। यदि रिश्तों को  बचाने के लिए किसी को थोड़ा झुकना भी पड़े तो कोई हानि नहीं है। इसीलिए हमारे सयाने कहते हैं - 
        ‌ ‌        एकता में बल है।
         सभी रिश्ते बहुत ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें उसी तरह से सहृदयता से निभाना चाहिए। रिश्तों की बुनियाद समानता और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार पर टिकी होती है। अपने रिश्तों की न कभी बुराई नहीं करनी चाहिए और न ही सुननी चाहिए।बात को मिर्च-मसाला लगाकर लोग दूसरों को बताते हैं। कभी-न-कभी बात उस व्यक्ति तक पहुॅंच ही जाती है। इससे सम्बन्धों में कड़वाहट आ जाती है। इसलिए रिश्तों का निर्वहण करते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए जिससे उनकी गरिमा और गर्माहट बनी रहती है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 22 मार्च 2026

नी पीढ़ी को संस्कारित करने का दायित्व

नई पीढ़ी को संस्कारित करने का दायित्व

अपनी आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करना हम सभी का दायित्व होता है। यदि सभी माता-पिता यह दायित्व पूरी तरह निभा पाएँ तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपने सस्कारों को, अपनी मर्यादाओं को भली-भाँति समझेगी और उनका पालन अवश्य करेगी। यह सत्य है कि जाने वाली पीढ़ी अपनी थाती संस्कारों के रूप में आने वाली पीढ़ी को सौंपती है। नई पीढ़ी अपनी समझदारी से उन मूल्यों को आत्मसात करती है। आने वाली समझदार पीढ़ी कभी अपनी राह से नहीं भटकेगी।
             छोटे बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जैसा भी आकार हम देना चाहेंगे, वे वैसे ही बन जाएँगे। हम देखते हैं कि कुम्हार बड़ी ही लगन से गीली मिट्टी से मनचाहे आकार देकर अनेक सुन्दर वस्तुएँ गढ़ता है। उन्हें हम देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते नही थकते। हम उनको खरीदकर अपने घर की शोभा बढ़ाते हैं। उसी प्रकार अपने माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव बच्चों के जीवन में प्रत्यक्ष झलकता है।
            किसान उचित समय पर हल जोतकर खेत तैयार करता है और उसमें बीज बोता है। उस खेत को यदि समय पर तैयार न किया जाए तो फसल के लिए बीज नहीं हो सकते। कभी-कभी दुर्भाग्यवश वर्षा नहीं होती तो फसल तबाह हो जाती है। उससे किसान का नुकसान तो होता ही है और साथ ही देश में खाद्यान्न का अभाव भी हो जाता है। उस स्थिति में महंगाई बढ़ जाती है। जनता में त्राहि-त्राहि मच जाती है।
            इसी प्रकार यदि बच्चों को समय रहते संस्कार न दिए जाएँ तो वे बिगड़ जाते हैं। इसलिए समाज उन माता-पिता का तिरस्कार करता है। ऐसे संस्कारहीन बच्चे भी अपने माता-पिता के लिए भी जीवन भर का अभिशाप बन जाते हैं। समाज में कभी उन्हें यथोचित सम्मान भी नहीं मिलता। ऐसे बच्चों को कोई बन्धु-बान्धव अपने घर बुलाना पसन्द नहीं करते। उनके मित्र उनके साथ खेलना नहीं चाहते। वे उनसे किनारा कर लेते हैं। ऐसे संस्कार हीन बच्चे अलग-थलग पड़ जाते हैं।
           अच्छे संस्कारों से वंचित रहने वाले बच्चे हठी, मनमानी करने वाले, उद्दण्ड और छोटे-बड़े किसी का लिहाज न करने वाले होते हैं। ऐसे बच्चों को कोई भी पसन्द नहीं करता। उनसे दोस्ती करना भी बुरा माना जाता है। अपने घर में भी उन्हें कोई बुलाना नहीं चाहता। इसका कारण लोगों के मन में एक डर रहता है कि वे उनके घर पर आकर तोड़फोड़ या उठापटक करेंगे। उसे अस्त-व्यस्त कर देंगे और मना करने पर वे सभी लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करेंगे जिसका कुप्रभाव उनके अपने बच्चों पर पड़ सकता है।
           अपने बच्चों को सद्संस्कार देना हर माता-पिता का नैतिक कर्त्तव्य होता है। यदि अपने अहंकारवश अथवा आपसी वैमनस्य के कारण इस महत्त्वपूर्ण दायित्व को निभाने से वे चूक जाते हैं तो अपने और अपने बच्चों के दुर्भाग्य के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार कहलाते हैं। शायद उस समय वे चेत जाऍं और दूसरों को सही सुझाव देने का कार्य कर सकें। हो सकता है उनके इस प्रयास से कुछ बच्चों का भविष्य संवर‌ जाए।
            ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों को किसी भी कारण से संस्कार देने में चूक जाते हैं, वे अपने बच्चों का जीवन बर्बाद करने के लिए वास्तव में उनके शत्रु कहलाते हैं। बड़े होकर ये बच्चे जब उन्हें दोष देते हैं तब उन्हें अपार कष्ट होता है। उस समय अपने उन ऐसे बच्चों को दोष देते रहना अथवा दुत्कारना समझदारी नहीं कहलाती। समय रहते यदि सावधानी बरती होती तो बाद में पश्चाताप करने की आवश्यकता न पड़ती। समय बीत जाने पर सब व्यर्थ होता है।
          एक ही कार्य हो सकता है चाहे तो बच्चों को संस्कारी बनाकर घर, परिवार, समाज और देश का सबल स्तम्भ बनाएँ अथवा अपने सुख-आराम को सर्वोपरि मानकर बच्चों संस्कार न देकर उनका भविष्य बिगाड़ दें। बच्चे चाहे कहें या न कहें पर घर में होने वाली सभी गतिविधियों को वे बड़ी बारीकी से देखते हैं। उन सबका असर भी बच्चों के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है, इसका प्रभाव उन पर आजीवन रहता है। उसी के अनुरूप वे सबके बारे में अपनी राय बना लेते हैं। घर के सभी सदस्यों को छोटों और बड़ों के साथ मर्यादित व्यवहार करना चाहिए। यह भी संस्कार ही कहलाता है।
          ‌‌  संस्कार कोई ऐसा खिलौना नहीं है जिसे धन के मद में चूर माता-पिता बाजार से खरीदकर बच्चे को सौंप सकें। उसके लिए माता और पिता को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उन्हें तथा परिवार के अन्य सदस्यों को अपने आचार-व्यवहार की शुद्धता पर ध्यान देना पड़ता है तब जाकर उनके बच्चे संस्कारवान बनते हैं। यही बच्चे बड़े होकर समाज में अपने माता-पिता का नाम रौशन करते हैं। ये बच्चे ही देश और समाज की वास्तविक धरोहर होते हैं। इन पर सब लोग गर्व करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 21 मार्च 2026

मन की सोच के अनुसार संसार

मन की सोच के अनुसार संसार 

मानव मन की सोच जैसी होती है, उसे यह संसार वैसा ही दिखाई देता है। यदि उसकी सोच का दायरा विस्तृत होगा यानी वह अच्छी, भली अथवा सुन्दर होगी तो उसे सारा संसार अच्छा, भला और सुन्दर नजर आएगा। उस समय उसे सारी प्रकृति मनोरम दिखाई देती है। नदियॉं, पर्वत, झरने, आकाश, पृथ्वी और सागर आदि सभी उसे लुभावने लगते हैं। वह इन सबमें खोकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहता है। वह मन से प्राणिमात्र से प्यार करता है। किसी के भी प्रति अपने मन में दुर्भावना नहीं रखता।
           दूसरी ओर जब उसके मन के भाव विपरीत होते हैं, उस समय उसे सब बदरंग दिखाई देने लगता है। उसे चारों ओर की खूबसूरती में अच्छाई कम और बुराई अधिक दिखाई देती है। उस समय उसे यह संसार बिल्कुल भी रहने लायक प्रतीत नहीं होता। उसे ऐसा लगता है जैसे सारा संसार उस पर हंस रहा है, व्यंग्य कर रहा है। प्रकृति उसके जीवन को कोई आनन्द नहीं दे पाती। अपने बन्धु-बान्धवों को स्वार्थी कहकर वह उनसे किनारा करने लगता है। यानी उसे कुछ भी नहीं सुहाता।
        मनुष्य के मन में जब खुशी अथवा उल्लास होता है तब वह चाहता है कि हर व्यक्ति उसके साथ उसकी खुशी बाँटे और उसकी खुशी में शामिल हो। उस समय वह अपने परिजनों से घिरा रहना चाहता है। तब उसे सारी कायनात अपनी तरह प्रसन्न होती हुई प्रतीत होती है। उसे लगता है कि सारी प्रकृति उसका साथ दे रही है, उसकी खुशियों में शामिल हो रही है। वह उसके साथ रो रही है, हँस रही है, नाच-गा रही है अथवा चारों ओर अपनी खुशबू बिखेर रही है। 
      इसके विपरीत जब मनुष्य का मन दुखों और परेशानियों से घिरा होता है तो उसे लगता है कि सारा जमाना उसका दुश्मन हो गया है। ईश्वर भी उससे नाराज होकर परेशान कर रहा है। उससे उसकी खुशी देखी नहीं जाती। इसलिए वह उसे दुखी ही दुख दे रहा है। तब सारी प्रकृति उसे उदास और बदरंग दिखाई देने लगती है। उस समय उसे ऐसा लगता है मानो उसके साथ ही वह उत्साह से रहित निर्जीव-सी हो गई है। उसके मन में जीवन के प्रति मोह ही नहीं रह जाता।
      मनुष्य के मन में जब ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि भाव अपना बसेरा कर लेते हैं तो उसे चारों ओर नफरत का व्यापार होता दिखाई देता है। तब उसे लगने लगता है कि आपसी भाईचारा, प्यार, मुहब्बत सब खत्म हो गया है और सभी एक-दूसरे की टाँग खींचने में लगे हुए हैं। इस संसार में परस्पर नफरत के कारण कोई भी किसी को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता, सबका खून सफेद हो गया है। उसके मन में अनजाना-सा भय व्याप्त होने लगता है। यह स्थिति वास्तव में भयावह होती है।
        मन में क्रोध की अधिकता हो जाने पर मनुष्य इस दुनिया को आग लगा देना चाहता है। किसी की शक्ल नहीं देखना चाहता। इस दुनिया को छोड़कर कहीं भाग जाना चाहता है। परन्तु जब उसके मन में प्यार का भाव आता है तब सभी उसे अपने लगने लगते हैं। उसे लगता है यह संसार मानो प्यार का सागर है जिसमें नहाकर सभी सराबोर हो रहे हैं। सब कुछ अच्छा और भला प्रतीत होता है। वह स्वयं भी सबसे प्रेम से मिल-जुलकर रहना चाहता है।
        चोर को सभी लोग चोर दिखते हैं। हेराफेरी व चालबाजी करने वाले को सभी हेराफेरी करने वाले और चालबाज दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचारी, चोरबाजारी करने वाले को सब भ्रष्ट लगते हैं। इसके विपरीत सरल व सहज स्वभाव वालों को सभी सरल और सीधे लगते हैं। सज्जनों  को सब सज्जन लगते हैं और मूर्खों को सब मूर्ख। पागल पूरी दुनिया को ही पागल समझते हैं। वीरों के लिए सभी वीर होते हैं और कायरों के लिए सब कायर होते हैं। सच्चे लोगों को सब सच्चे और झूठों को सब झूठे लगते हैं। इसीलिए असत्यवादी किसी पर विश्वास नहीं करते।
      रैदास जी ने कहा था-
      मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मन शुद्ध पवित्र हो तो उनके पास जो कठौती है, उसमें रखा हुआ पानी गंगाजल हो सकता है।
      तुलसीदास जी ने भी मन के इन्हीं  भावों के विषय में कहा था-
  जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अर्थात् जैसी मनुष्य की भावना होती है, उसे ईश्वर उसी रूप में दिखाई देता है।
        तुलसीदास जी के कथन के अनुसार यदि हम विश्लेषण करें तो मनुष्य के मन के भावों के अनुसार ही उसे संसार और संसार के लोग दिखाई देते हैं।
        इन सबसे अलग हटकर अन्य जीवों के विषय में देखें तो कह सकते हैं कि पशु-पक्षी आदि अन्य जीव भी प्रेम, घृणा और हिंसा की भावना को समझते हैं। प्रेम की बदौलत शेर जैसे खूँखार जानवर, हाथी जैसे शक्तिशाली जीव और साँप जैसे जहरीले प्राणी पालतू बनाए जा सकते हैं।
        साररूप में हम यही कह सकते हैं कि हमारे मन के भावों का बहुत गहरा प्रभाव सामने वाले व्यक्ति के ऊपर पड़ता है। फिर वह उसी के अनुसार ही व्यवहार करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र पर विशेष

नवरात्र के इस पावन पर्व में हम माँ दुर्गा के नौ रूपों - शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्धमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं।
        हाँ, यहाँ तान्त्रिकों की तन्त्र साधना के विषय में चर्चा करना हमारा उद्देश्य नहीं है जो इन दिनों श्मशान में जाकर साधना करते हैं और फिर अपनी मनचाही सिद्धियाँ प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। फिर उनके अनुरूप कार्य करते हैं।
           प्रश्न यह उठता है कि अपने जीवन में इन रूपों को ढालने की हमने कभी कोशिश की है क्या? मात्र नौ दिन माँ की पूजा करके हम अपने सभी कर्त्तव्यों से मुक्त हो पाएँगे क्या? दुष्टों का दलन करने वाली माँ के इस बलिदान को क्या हम यूँ ही व्यर्थ में गॅंवा देंगे?
            इन प्रश्नों का सीधा-सा उत्तर है नहीं। केवल कथन मात्र से समस्याओं का अन्त नहीं होगा। जब तक हम माँ के इन रूपों को अपने में आत्मसात नहीं करेंगे अथवा उन पर आचरण नहीं करेंगे तब तक सब अधूरा ही रहेगा। केवल कहने मात्र से बात नहीं बनती। उसे जीवन में क्रियान्वित करना पड़ता है। तभी वास्तव में हम मॉं के इन रूपों के अनुसार जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
          माँ दुर्गा ने संसार की भलाई करने के लिए कठोर कदम उठाया था। अपना सुख-चैन सब छोड़कर उसने उन असुरों से युद्ध करने की ठानी थी। उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करके माँ ने हम सबके समक्ष एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया था। माँ भगवती ने जनसाधारण की भलाई के लिए दुष्टों का संहार करके हमें चमत्कृत किया हैं।
          उस सबके विषय में बस किस्से-कहानियों की तरह पढ़कर हम चटखारे नहीं ले सकते। उसकी शूरवीरता को हमें अपने अन्तस् में अनुभव करना होगा। उचित समय आने पर उसी तरह आचरण भी करना होगा। समाज में दुष्प्रवृत्ति के लोगों का संहार तो हम नहीं कर सकते परन्तु उनके कुकृत्यों के लिए न्याय व्यवस्था का सहारा लेकर उन्हें दण्ड अवश्य दिलवा सकते हैं। यह हमारा मौलिक दायित्व भी है और उसे निभाना चाहिए।
          आज मैं अपनी सभी बहनों से आग्रह करना चाहती हूँ कि एक माँ के सभी करुणा, कोमलता, दयालुता आदि गुणों के साथ-साथ माँ दुर्गा के वीरता और दुष्टदलन वाले गुणों को आगे बढ़कर अपनाएँ। इस प्रकार करके हर प्रकार के अत्याचार का मुँहतोड़ जवाब देने की सामर्थ्य माँ स्वयं ही हम सबको देगी।
            माँ दुर्गा के सभी अस्त्रों-शस्त्रों यानी त्रिशूल, शंख, तलवार, धनुष-बाण, चक्र, गदा आदि  का प्रयोग करते समय साम, दाम, दण्ड और भेद का सहारा लेने में किंचित भी हिचकिचाना नहीं है। तभी हम मॉं के सच्चे भक्त कहला सकेंगे।
           हमें स्वयं ही अपने मनोबल को ऊपर उठाते हुए स्वेच्छा से यह प्रण लेना होगा कि माँ दुर्गा की तरह बुराई के कारण को जड़ से उखाड़कर हमें फैंकना है। तभी नवरात्र को मनाने की सार्थकता है अन्यथा अन्य रस्मों अथवा उत्सवों की तरह यह पूजन भी मात्र एक दिखावे की रस्म बनकर निरर्थक रह जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 19 मार्च 2026

महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह

महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह

सज्जनों या महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह होता है। वे अपना सब सुख-चैन किनारे करके दिन-रात दूसरों के जीवन में प्रकाश करते रहते हैं। किसी के जीवन को प्रकाशित करने वाला मनुष्य हमेशा महान कहलाता है।
          दीपक सदा अन्धकार को दूर करके प्रकाश देता है। ऐसा करके दीपक को तो कुछ नहीं मिलता। उसका जलना उसकी प्रकृति है जो महत्त्वपूर्ण होती है। कितने भी आँधी-तूफान आ जाएँ, दीपक की लौ थरथरा सकती है परन्तु वह बुझती नहीं है। स्वयं कष्ट सहन करके भी वह दूसरों का हित साधता है और प्रकाश देता है। यही उस छोटे से दीपक की विशेषता होती है जो उसे अन्य सभी से विशेष बना देती है।
            छोटे से दीपक का जीवन इसलिए महान अथवा पूज्य नहीं होता कि वह जलता रहता है अपितु वह इसलिए वन्दनीय होता है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए जलता है। ऐसा कार्य कोई विरला ही कर सकता हैं। अपनी जलने की पीड़ा को अनदेखा करते हुए वह मनुष्यों पर महान परोपकार करता है।
             सोचने की बात यह है कि दीपक जैसी छोटी-सी वस्तु जब ऐसा महान कार्य कर सकती है तो हम मनुष्य क्यों पीछे रह जाते हैं? 
            इसका कारण है हमारा स्वार्थ। वह हमें अपना कदम पीछे लौटा ले जाने के लिए विवश कर देता है। हम अपने घर-परिवार तक सीमित होते जा रहे हैं। हमारी संवेदनाएँ शायद शून्य होती जा रही हैं। बहुधा अपनी समस्याओं के चलते चाहकर भी हम दूसरों के बारे में सोच नहीं पाते। इसीलिए हम जरूरतमन्दों का सान्त्वना नहीं दे पाते और उनकी सहायता नहीं कर पाते।
          परोपकारी जीव अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को अनदेखा करके भी दूसरों के प्रति चिन्तित रहते हैं, उनके कष्टों को दूर करने का उपाय करते रहते हैं। जहाँ तक हो सके उनका सम्बल बनने का प्रयास करते हैं। उनका एकमात्र ध्येय होता है, दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव रखना। उनके कष्टों और परेशानियों का यथासम्भव निदान करना‌ होता है।
            परोपकारी सज्जन जो भी इस ब्रह्माण्ड से लेते है, बादलों की तरह उसे समाज की भलाई के कार्यो में लगा देते हैं। उनके अपने पास कुछ बचे या नहीं, वे अपने इस महान उद्देश्य से पीछे नहीं हटते। तन, मन और धन से वह माता प्रकृति की तरह सभी जीवों पर उपकार करते हैं।
           इनके पास जो भी व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आते हैं, उसका समाधान निकालकर उनकी सहायता करते हैं। ये सभी के विश्वासपात्र होते हैं। कैसी भी समस्या व्यक्ति के जीवन में आ जाए,  इनके साथ बिना हिचकिचाए साझा की जा सकती है। इनका हृदय इतना विशाल और गम्भीर होता है कि वे अपने भीतर सागर की तरह सब कुछ समेट लेते हैं। किसी के भी रहस्य को दूसरों के समक्ष किसी भी स्थिति में चटखारे लेकर न सुनाना उनका स्वभाव होता है।
            उनके साथ कोई कैसा भी व्यवहार क्यों न करे, वे किसी का भी तिरस्कार नहीं करते हैं। वे अपने अथवा पराए सभी लोगों का खुले दिल से स्वागत करते हैं। इसका कारण है कि उनकी नजर में कोई भी पराया नहीं होता। वे प्राणिमात्र को अपना समझते हैं। 
            हर रिश्ते का सम्मान करना उनका स्वभाव होता है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, रंग-रूप, जात-पात आदि किसी भी कारण से भेदभाव करना उनकी प्रकृति में नहीं होता। वे सभी के साथ समानता और अपनेपन का व्यवहार करते हैं। किसी का अहित करने के विषय में वे स्वप्न में भी नहीं सोचते। 
            महापुरुषों का जीवन संघर्ष, त्याग, तपस्या और जन-कल्याण का एक आदर्श स्तम्भ होता है। वे अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों से ऊपर उठकर समाज, देश और मानवता के लिए अपना जीवन जीते हैं। उनके विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बनते हैं। उनका सादा जीवन, उच्च विचार और निष्काम सेवा का प्रतीक होता है। 
            महापुरुषों के चरित्र पढ़ना चाहिए और उसका मनन करना करना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो सके उनसे शिक्षा ग्रहण करके उन पर अमल करना चाहिए। जन साधारण के लिये उन्नति तथा कल्याण का एक सहज साधन होता है। जिस देश में महापुरुषों का मान नहीं किया जाता उसे मृत प्रायः समझना चाहिए। महापुरुषों के चरित्र और कार्य ही हमारे सच्चे पथ प्रदर्शक होते हैं।
            ऐसे महत् जन ही संसार के दीपक होते हैं। सबका हित साधने वाले महापुरुष देश, धर्म और समाज के अमूल्य रत्न होते हैं जो इतिहास में अमर हो जाते हैं। युगों तक उनकी चर्चाएँ होती रहती हैं। इन्हें सहेजकर रखना सबका दायित्व होता है। जिस मार्ग पर ये चलते हैं, वही आने वाली पीढ़ियों का रास्ता बन जाता है। उस पथ का अनुसरण करके अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 18 मार्च 2026

परिस्थिति के अनुसार ढलना

परिस्थिति के अनुसार ढलना

मनुष्य के स्वभाव की यह विशेषता है कि वह स्वयं को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल लेता है। चाहे वह मौसम हो, सुख-दुख कक समय हो अथवा वियोगकाल हो यानी उसके हालात कैसे भी क्यों न हों, वह सदा साहस से डटकर उनका सामना करता है। पीठ दिखाकर भाग जाना उसकी प्रकृति में नहीं होता है। इस विषय में कुछ अपवाद अवश्य मिल सकते हैं।
               मनुष्य मौसम की तरह पल-पल बदलता रहता है। कभी वह क्रोधित होता है तो कभी प्यार करता है। इसी तरह कभी वह अकेला रहना चाहता है तो कभी सबके साथ मिलकर, नाच-गाकर सदा मस्त रहना चाहता है। ईर्ष्या, द्वेष, राग, घृणा, प्रेम, क्रूरता, वात्सल्य, करुणा आदि भाव उसे नया-नया रूप देते रहते हैं। यही कारण है कि कभी हमें ऐसा लगने लगता है कि इस व्यक्ति विशेष से बढ़कर हमारा अपना कोई और है ही नहीं परन्तु कभी वही मनुष्य हमें अजनबी-सा प्रतीत होता है।
           मानव स्वभाव का यह नित्यप्रति परिवर्तन उसकी तत्कालीन परिस्थियों पर निर्भर करता है। जीवन के हालात उसके मानस को झकझोरते रहते हैं। इसीलिए कभी-कभी वह एक सामान्य-सा इन्सान प्रतीत होता है। यही समय होता है जब वह हमारा अपना होता है। उस समय वह धरातल पर रहता हुआ दूसरों के दुख-दर्द को समझने वाला मनुष्य होता है। उस समय घर-परिवारी जनों और भाई-बन्धुओं के साथ उसके मधुर सम्बन्ध होते हैं। सभी मिल-जुलकर अपने जीवन को प्रसन्नतापूर्वक चलाते हैं।
             इसके विपरीत कभी असामान्य स्थितियों के चलते वही व्यक्ति हमें अपनी पहुँच से बहुत दूर दिखाई देता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि वह हमसे रूठा हुआ है या बहुत घमण्डी हो गया है। हो सकता वह अपने घर, परिवार अथवा कार्यक्षेत्र की किसी परेशानी में उलझा हुआ हो। इसके अतिरिक्त उसे कोई शरीरिक या मानसिक पीड़ा भी हो सकती है। इनमें से कोई भी कारण उसके अनमनेपन का हो सकता है। शायद तभी वह व्यक्ति इस प्रकार का विचित्र व्यवहार कर रहा हो, जिसे हम समझ नहीं पाते।
            मनुष्य के जीवन में समयानुसार सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि स्थितियाँ आती रहती हैं। यही सब उसके स्वभाव या मूड परिवर्तन का कारण बन जाती हैं। उसके नित्य प्रति के आचरण में इन सबका प्रभाव हो जाना स्वाभाविक होता है। जब वह प्रसन्न होता है और अपने जीवन से सन्तुष्ट होता है, तब उसका व्यवहार सन्तुलित होता है। उस समय वह सारे अपनों की खुशियों के लिए जीता है। सबको साथ लेकर चलने की बातें करने लगता है। घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों  में सामंजस्य बनाते हुए उनके साथ समय व्यतीत करता है। उस समय सब लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते। 
            इसके विपरीत जब वह स्वयं कष्ट में होता है तब वह अपने जीवन के प्रति उदासीन हो जाता है। ऐसे निरुत्साहित व्यक्ति को सबसे अलग-थलग एकान्त में रहना रुचिकर लगता है। कोई भी आवाज उसे चिड़चिड़ा बना देती है। जब उसके मन में अवसाद हो जाता है तब संसार के हर किसी व्यक्ति से अथवा हर क्रिया कलाप से उसका मोहभंग हो जाता है और उसे सबसे घृणा होने लगती है। उस स्थिति में उसे हंसना, बोलना, खाना, पीना, घूमना सब बेकार लगने लगता है।
              वह स्वयं को दुनिया का सबसे अधिक दुर्भाग्यहीन व्यक्ति मानने लगता है। वह सोचता है कि वह इस पृथ्वी पर भार है। उसकी जरूरत न अपनों को है और न किसी को है। इस तरह वह मायूसी में घिरता चला जाता है। अनावश्यक तनाव लेता हुआ मनुष्य कभी-कभी डिप्रेशन में जाने लगता है। उस समय उसे डॉक्टरी परामर्श की आवश्यकता होती है।
            ‌  इस प्रकार अपने अस्थिर स्वभाव के कारण मनुष्य का स्थान सबके हृदयों में बदलता रहता है। अपने ऊपर नियन्त्रण रखते हुए मनुष्य को अन्तस के भावों को प्रकट नहीं होने देना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि हमारे कारण किसी दूसरे को किसी तरह की परेशानी न हो।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 17 मार्च 2026

बेटी और बेटे में अन्तर

बेटी और बेटे में अन्तर

बेटी और बेटे में लिंगभेद का भाव उनके पैदा होने से ही आरम्भ हो जाता है। यद्यपि एक ही माता-पिता की दोनों ही सन्तान होते हैं और एक ही कोख से उनका जन्म होता है। फिर भी यह भेदभाव युक्त व्यवहार प्रायः घरों में देखने को मिल जाता है। यह उपेक्षित व्यवहार बेटे को उत्कृष्ट और बेटी को‌ निकृष्ट समझने का कारण बन जाता है। यह भेदभाव उन दोनों बच्चों के मनों में घर कर जाता है जिससे स्वस्थ परिवेश में नकारात्मकता का साम्राज्य खड़ा हो जाता है।
          कहने और सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है कि हमारे घर में बेटी व बेटे दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है। यह सच है कि बहुत से माता-पिता आज दोनों की पढ़ाई-लिखाई के विषय में सोचने लगे हैं। उन्हें समान सुख-सुविधाएँ भी दी जाने लगी हैं। दोनों के खान-पान और रहन-सहन में भी आजादी दी जा रही है। 
            उन घरो की लड़किया उच्च शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन हैं। ज्ञान, विज्ञान, राजनीति, साहित्य, व्यापार आदि हर क्षेत्र में वह अग्रणी बन रही हैं। यही कारण है कि वे हर क्षेत्र अपने झण्डे गाढ़ रही हैं। भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री  श्रीमति इन्दिरा गाधी और राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल से हम सभी परिचचित हैं। अपने क्षेत्र कीआधुनिक सफल महिलाओं सुश्री किरण बेदी, सुश्री कल्पना चावला, सुश्री इन्दिरा नूई आदि को भी नहीं भूल सकते।
          प्रश्न यह है कि ऐसे लोग कितने हैं जिनकी सोच का ऐसा विस्तृत दायरा है? मेरे विचार में इनका प्रतिशत आज भी बहुत कम है।
          बहुत से माता-पिता लड़के और लड़की के खाने-पीने, सोने-जागने, हँसने-खेलने आदि में भी अन्तर करते हैं। जो अच्छा, पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हैं वे बेटे को दिए जाते हैं, बेटी को नहीं। इस कारण उनमें पौष्टिकता की कमी हो जाने से एनिमिया आदि कई रोग होते हैं। ऐसे घरों में लड़के को अधिक माना जाता है।
          लड़का देर तक सोए और घर या बाहर का कोई भी काम न करे तब भी उसके लाड़ लड़ाए जाते हैं। दूसरी ओर लड़की से आशा की जाती है कि वह सवेरे उठकर घर के काम-काज में हाथ बटाए। हर खेल लड़का खेल सकता है और कितना भी समय वह घर से बाहर रह सकता है परन्तु लड़की के लिए यहाँ भी बन्धन रहता है। कुछ ही खेल खेलने की उसे आज्ञा मिलती है और घर से बाहर अधिक समय रहने की उसे आज्ञा नहीं मिलती। लड़की को जोर से बोलने अथवा हँसने पर यह कहकर टोक दिया जाता है कि उसे पराए घर जाना है। इसलिए उसका व्यवहार सदा संयमित होना चाहिए। लड़कों को यहाँ पर भी बड़ी सहजता से छूट दे दी जाती है। 
        पैदा होने के बाद जब वह होश सम्भालती है तभी से उसे यह घुट्टी में पिलाया जाता है कि उसे अपने बाबुल का यह घर छोड़कर ससुराल जाना है। उसे घरेलू कार्यों, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि में दक्ष होना चाहिए। उसका ऊँचा बोलना, जिद करना आदि अनुचित कार्य माने जाते हैं। उसे उच्च शिक्षा दिलाने में आज भी बहुत से माता-पिता आनाकानी करते हैं। बहुत से माता-पिता उसे नौकरी भी नहीं करने देते।
            वह अपने भाई के साथ बराबरी के व्यवहार की माँग नहीं कर सकती। दोनों यदि कहीं से आते है तो लड़की से ही अपेक्षा की जाती है कि आराम न करके भाई को चाय-पानी लाकर दे। वह नवाब बना रहे और खुद होकर पानी का गिलास भी न ले। घर में होने वाले ऐसे भेदभाव वाले व्यवहार लड़की के मन को तार-तार कर देते हैं। उसे लगने लगता है कि सारे बन्धन उसी के लिए ही क्यों हैं? उसे क्यों लड़की का यह जन्म ईश्वर ने दिया है?
            धार्मिक स्थलों पर उसके प्रवेश का मुद्दा कुछ समय पूर्व सुर्खियों में था जो बहुत ही गरमाया हुआ था। आज इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे है। फिर भी यह बेटे और बेटी के लिए व्यवहार में यह भेदभाव समझ में नहीं आता जो कन्या भ्रूण को गर्भ में ही नष्ट करा देता है। संवैधानिक रूप से उसे माता-पिता की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त है। फिर भी प्राय: उसे वंचित रखा जाता है। बेटे को ही सब कुछ सौंप दिया जाता है चाहे वह उस योग्य हो या नहीं। यदि कोई बहन विरोध करे तो उसे तिरस्कृत किया जाता है।
            बहुत सुकून की बात है कि आज की युवा पीढ़ी प्रेक्टिकल होने लगी है। उनके मन में बेटे-बेटी का अन्तर समाप्त होने लगा है। समय के अनुसार मंहगाई और एकल परिवार की समस्याओं के कारण वे एक ही बच्चा चाहने लगे हैं। वह चाहे बेटा हो या फिर बेटी। उसकी परवरिश पर वे अपना ध्यान लगाने लगे हैं।
            आज एकल परिवारों के चलते समय और परिस्थितियों की माँग यही है कि दोनों बच्चों को ही घर-बाहर के कार्यों में दक्ष होना चाहिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के बेटे-बेटी दोनों के लिए ही समानता का व्यवहार अपेक्षित है। बेटियों को भी यदि समान अवसर दिए जाएँ तो निस्सन्देह वे किसी भी क्षेत्र में चमत्कार कर सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 16 मार्च 2026

शत्रुता करना सरल निभाना कठिन

शत्रुता करना सरल निभाना कठिन 

शत्रुता अथवा दुश्मनी करना मनुष्य के मन के कटु भावों की परिणति होती है। किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध अपने मन में जितना अधिक ईर्ष्या, घृणा आदि विचारों को एकत्रित करते जाते हैं, उतना ही उसके प्रति क्रोध और नफरत बढ़ती जाती है। यही सारे दुर्भाव आगे चलकर दुश्मनी को जन्म देते हैं। हालांकि दुश्मनी का कोई बीज नहीं होती परन्तु फिर भी किसी-न-किसी कारण से वह बोयी जाती है।
          समाज में हम अपने आसपास देखते हैं और किस्से भी पढ़ते-सुनते हैं कि दुश्मनी की यह आग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। इसके चलते न जाने कितने ही मासूम मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। पता नहीं ऐसे क्या कारण होते हैं जो ऐसी दुश्मनियाँ निभाई जाती हैं। इससे किसी भी पक्ष का हित नहीं होता। दोनों ही ओर के पक्षों को यह आग जलाकर रख देती है। 
      इस विषय को लेकर बहुत-सी फिल्में बन चुकी हैं और टीवी सीरियल भी बने हैं। यदा कदा ऐसी घटनाएँ हमें समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलती हैं और टीवी चैनलों पर भी इनकी चर्चा होती रहती है।
        जर, जोरु और जमीन प्राय: शत्रुता के कारण माने जाते हैं। आज भी इन्हीं को हम दुश्मनी की जड़ मान सकते हैं। जर का अर्थ है धन सम्पत्ति, जोरु का अर्थ है पत्नी और जमीन का अर्थ है जयदाद।
          धन-सम्पत्ति और जमीन-जयदाद के लिए तो सगे भाई-बहन भी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं। न्यायालय की शरण लेकर अपना समय और धन दोनों ही नष्ट करते हैं। बरसों लग जाते हैं इनका फैसला होने में। इसके लिए वे ईश्वर तुल्य अपने माता-पिता से धोखा करने और उन्हें दर-बदर करने में भी बाज नहीं आते। ऐसा घोर पापाचरण करते समय उन लोगों को पता नहीं उनकी आत्मा नहीं कचोटती। 
          अपनी पत्नी की मान-मर्यादा की रक्षा करना हर पति का ही कर्त्तव्य होता है। किसी दुष्ट के कुदृष्टि डालने पर खून तक कर दिए जाते हैं। रामायणकाल और महाभारतकाल इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। जहाँ इस दुस्साहस के लिए भयंकर युद्ध लड़े गए और इतना विनाश हुआ। 
          इतिहास के पन्नों में भी दुश्मनी की ऐसी घटनाओं की भरमार है जहाँ दो देशों में किसी भी कारण से अनावश्यक ही युद्ध हुए और दोनों ओर के असंख्य लोग काल कवलित हो गए। 
          आज भी दो देशों में युद्ध का कारण दूसरे की जमीन पर कब्जा करना ही होता है। यही प्रतिस्पर्धा दोनों देशों में चलती रहती है कि मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूँ। हमारे पास आधुनिक युद्ध सामग्री तुमसे अधिक है। यानि कि दो देशों में शक्तिप्रदर्शन भी इस शत्रुता का एक कारण बन जाता है।
          मेरे विचार में अधिकांश दुश्मनियाँ जाति के मद और अपनी नाक को बचाने के लिए की जाती हैं। और भी देखें तो कुम्भ के मेलों में पहले स्नान करने के नाम पर ही साधुओं के अखाड़ों में भी अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए लट्ठ चल जाते हैं।
          कहने का तात्पर्य यही है कि इस दुश्मनी के अजगर को अपने जीवन से निकाल फैंकने में ही सबका भला है। इसे ढोल की तरह अपने गले से लगा लेने पर अपना ही नुकसान होता है। हमारी अपनी मानसिक शान्ति नष्ट होती है जो अमूल्य है, इसके लिए मनुष्य जगह-जगह भटकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 15 मार्च 2026

ऑंखे हमारा आईना

आँखे हमारा आईना 

ऑंखें मनुष्य जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। यह पॉंच ज्ञानेन्द्रियों में से एक है। इनके बिना व्यक्ति लाचार हो जाता है। वह इस सतरंगी दुनिया के नहीं देख सकता। उसे अपने लिए किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती है।  हमारी ऑंखे आखिर क्या काम करती हैं? जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उससे परावर्तित प्रकाश हमारी ऑंखों में प्रवेश करता है। इसी कारण हम देखने का कार्य करते हैं। प्रकाश कॉर्निया से होकर प्रवेश करता है जो आँख के सामने एक खिड़की की तरह काम करता है।
             आँखे हमारा आईना होती हैं। जो भाव हमारे मन में होते हैं, उन्हें ये प्रकट कर देती हैं। ये जो आँखे हैं, बहुत ही दुष्ट और नालायक हैं जो कभी हमारा कहना नहीं मानतीं। ये आँखें बहुत चुगलखोर होती हैं जो न चाहते हुए भी हमारे मन के भावों की सबके समक्ष चुगली कर देती हैं। ऊपर से मनुष्य चाहे कितना ही न न करते रहें परन्तु इनकी बदौलत उसकी चोरी पकड़ी ही जाती हैं। ये ऑंखें हैं ही ऐसी कि किसी का लिहाज नहीं करती। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने कौन बैठा है? किसके सामने संयम रखना होता‌ है?
              सुख, खुशी, दुख, सन्तोष, ईर्ष्या, क्रोध, वात्सल्य आदि मानव मन के सभी भाव और सारी संवेदनाएँ, उसकी इन आँखों से ही प्रकट होती हैं। जब भी मनुष्य के जीवन में खुशी का समय आता है या गम अनचाहे आ जाते है तब मौका मिलते ही ये तालाब की तरह भर आती हैं। गंगा-यमुना की धारा की भाँति ये बहने लगती हैं अथवा फिर बादलों की तरह बरसने लगती हैं। जहाँ मन के विपरीत कोई घटना अथवा बात हो जाती है, वहीं पर ये छलकने लगती हैं और मनुष्य की वेदना को प्रकट करने लगती हैं।
              काली, नीली, कजरारी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें कवियों की रचनाओं के लिए सदा ही प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। इन ऑंखों की गहराई में डूबते-उतरते हुए कवियों ने इनके सौन्दर्य को लेकर बहुत से काव्य लिखे हैं। यत्र तत्र उन सभी काव्यों की सराहना भी की गई है। उनको पढ़कर ऐसे कवियों को दाद दिए बिना कोई सहृदय पाठक नहीं रह सकता।    
            इनकी चितोरी चितवन से कोई बच नहीं सकता। इनके कटाक्ष बाण किसी को भी घायल कर सकते हैं। न जाने कितने ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की गहन तपस्या इन्होंने भंग की है। आज भी इनके सौन्दर्य से किसी संसारी व्यक्ति का बच पाना सम्भव नहीं है। 
          गम्भीरता का भाव लिए आँखे व्यक्ति के मन की पवित्रता और गहराई को प्रकट करती हैं। सरलता और सहजता के भाव वाली आँखे मनुष्य के हृदय की विशालता को दर्शाती हैं। बच्चों की तरह चंचल आँखें मानव मन की चंचलता का परिचायक होती हैं। क्रूरता या निर्दयता के भाव वाली आँखों से सभी बचना चाहते हैं। क्रोध से भरी हुई आँखों से डरकर लोग सहम जाते हैं और किनारा करने में अपनी भलाई समझकर कहीं भी छुप जाते हैं।
             किसी अपने के मिलने के समय अथवा वियोग के समय ये अनायास ही बिन बुलाए हुए मेहमान की तरह ये ऑंखें ऑंसू टपकाने लगती हैं। प्रसन्नता का समय होने पर हमारा साथ देती हैं। अत्यधिक कष्ट के समय ये मनुष्य के मनोबल को कमजोर बनाती हैं।
             ऑंखों से निकलने वाले ये आँसू किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं। स्त्री या पुरुष दोनों पर ये समान रूप से अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कठोर कहे जाने पुरुष भी असहनीय कष्ट या किसी अनहोनी के समय अपने ऑंखों से बहते इन आँसुओं को रोक नहीं पाते, उस स्थिति में उनकी तथाकथित कठोरता न जाने कहॉं गायब हो जाती है?
               स्त्रियों को तो वैसे भी कमजोर दिल और करुणामयी कहा जाता है। इसलिए हर स्थिति का प्रभाव उन पर अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसीलिए उनकी ऑंखों से आँसू किसी-न-किसी बात पर छलक आते हैं। पुरुष प्राय: यह दोषारोपण करते हैं कि स्त्रियाँ इन आँसुओं का अपनी बात मनवाने के लिए सदा हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। हालॉंकि यह कह देना उनकी सच्चाई पर प्रहार करना होता है। निस्सन्देह इसके अपवाद भी हो सकते हैं।
           मक्कारों की ऑंखों से बहने वाले घड़ियाली आँसुओं से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता होती है। पता नहीं इन पर पिघल जाने वालों की पीठ में कब ये छुरा घोंप दें, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्वार्थी लोग प्राय: दूसरों को चकमा देकर भ्रमित करते हैं।
              ये आँसुओ से भरी हुई आँखे वास्तव में दो हृदयों को जोड़ने के लिए एक पुल का कार्य करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। जो व्यक्ति इनके जाल में उलझ गया वह तो समझो काम से गया। जो इनसे बचकर निकल गया वह संयमी कुछ भी कर सकने में समर्थ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 14 मार्च 2026

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का कुण्ठित होना

बुद्धि का वरदान ईश्वर ने मनुष्य को दिशा है। यह बुद्धि मनुष्य के जीवन को दिशा देने का कार्य करती है। यह हमें अच्छे बुरे का ज्ञान कराती है। हमारी बुद्धि तब कुण्ठित होती है जब हम अपने सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय नहीं करते और सत्संगति में जाकर उसे पैना नहीं करते अथवा उसे सुविचारों से पोषित नहीं करते। हम जितना अधिक अध्ययन करेंगे, हमारी बुद्धि को उतना ही अधिक भोजन मिलेगा। तभी हमारे विचारों में भी परिपक्वता आ सकती है। इसकी बदौलत हम मनुष्य सफलता के सोपानों पर चढ़ते हैं।
           मनीषी कहते हैं कि ज्ञानार्जन की कोई आयु नहीं होती। किसी भी आयु में मनुष्य, किसी भी जीव से कुछ सीख सकता है। मनुष्य का यह सौभाग्य है कि वह आजन्म कुछ-न-कुछ सीखकर अपनी ज्ञान-पिपासा को शान्त कर सकता है। अपने जीवन को ऊॅंचाइयों पर ले जा सकता है।
               हमारी बुद्धि को भी जंग लग सकता है। यद्यपि हमारी यह बुद्धि लोहा नहीं है। परन्तु फिर भी कभी-कभी मूर्खतापूर्ण व्यवहार करने वालों को अथवा दूसरे की कही हुई बात को उस समय न समझ सकने वालों को हम कह देते हैं -
         1 तुम्हारी बुद्धि को जंग लग गया है 
         2 तुम्हारी मति मारी गई है 
         3 तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है
         4 तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। इत्यादि। 
          इन सबको कहने का मात्र यही अर्थ होता है कि उस समय विशेष पर वे अपनी बुद्धि का वैसा प्रयोग नहीं कर रहे होते जैसा किसी समझदार मनुष्य को उस परिस्थिति में करना चाहिए।
            कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि यदि लम्बे समय तक बुद्धि को सुविचारों से पोषित न किया जाए तो इसमें मोह-माया व स्वार्थपरक भावों का जंग लग जाता है। तब ये भाव मनुष्य को चैन से नहीं बैठने देते बल्कि उसे भटकने के लिए विवश कर देते हैं। उस समय वह अनावश्यक ही पिष्टपेशन करता रहता है। अपने मन को दुविधा की स्थिति में पहुॅंचा देता है। मनुष्य के लिए यह स्थिति कभी भी सुखदायक नहीं हो सकती। 
             मनुष्य जब खाली बैठकर सोचता है तो उसके मन के विचारों का ताना-बाना उसे परेशान करता रहता है। इसका प्रभाव उसके मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। उसकी विवेकशील बुद्धि उसे विचलित कर देती है।
         यदि अपनी बुद्धि का उपयोग हम अपने परिवार, देश, समाज और धर्म के लिए करते हुए सकारात्मक कार्य करते हैं तो यह बुद्धि का सदुपयोग करना कहलाता है। अर्थात् उस समय हम बुद्धिमान कहलाते हैं। समाज में अग्रणी बनकर हम पूज्य हो जाते हैं।
        इसके विपरीत यदि हम इस बुद्धि को अपने देश, धर्म, परिवार अथवा समाज के विरुद्ध नकारात्मक कार्यों में लगाने लगते हैं तो इसका दुरूपयोग करते हैं। तब मनुष्य तोड़फोड़, भ्रष्टाचार, अनाचार व कदाचार के कार्य करते हैं। उस समय वह मनुष्य विशेष विघटनकारी बनकर द्रोही कहलाते हैं। समाज के लिए एक अभिशाप बन जाते हैं। उन्हें हर तरफ हिकारत की नजर से देखा जाता है। हो सकता है अपनी कुटिल चालों से कुछ समय तक वे दूसरों को प्रभावित कर सकें, परन्तु अन्तत: उन सब कृत्यों के दुष्परिणामों को उन्हें भोगना ही पड़ता है।
            ये लोग देश, धर्म व न्याय के शत्रु बन जाते हैं। सब कुछ होते हुए भी इधर-उधर भागते हुए और छिपते-छिपाते हुए, ये सारा जीवन गुमनाम रहकर बिता देते हैं। उनसे किनारा कर लेने में ही सबको अपना भला दिखाई देता है। कोई भी उनके साथ सम्पर्क रखकर स्वयं को मुसीबत में डालना नहीं चाहता।
              लोमड़ी जैसी चालाक बुद्धि किसी भी व्यक्ति को पसन्द नहीं आती है। सबका प्रिय वही मनुष्य बनता है जिसकी बुद्धि का सरल और सहज हो। उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से दूसरे लोगों के हृदयों को छू जाए।
          सदैव सकारात्मक कार्यों में अपनी बुद्धि को नियोजित करना बुद्धिमानी होती है। इसे हम सद् बुद्धि कहते हैं। नकारात्मक सोच रखने से बुद्धि कुटिल बन जाती है। इसलिए यथासम्भव बुद्धि को कुटिलता से बचते हुए इसे सरल और सहज बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को लोग अपनी सिर आँखों पर बिठाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

भाग्य व्यक्तिगत बैंक बैलेंस

भाग्य व्यक्तिगत बैक बैलेंस 

प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य उसका अपना व्यक्तिगत बैक बेलैंस होता है जो जन्म-जन्मान्तरों तक सभी लोगों के खाते में मल्टीप्लाई होता रहता है। हम सबका वास्ता बैंक से पड़ता रहता है। इसलिए हम बैंक की कार्यप्रणाली के विषय में भली-भॉंति जानते-समझते हैं। हम‌ अपने-अपने बैंक अकाऊँट में पैसा जमा करवाते हैं अथवा निकालते हैं। जो धन हम जमा करवाते हैं, उस पर ब्याज मिलता है। इससे हमारा धन बढ़ता जाता है। इसके विपरीत धन निकालने से कोई ब्याज नहीं मिलता बल्कि हमारा उतना धन कम हो जाता है।
              उसी प्रकार हम अपने सुकर्मों की कमाई को अपने भाग्य के खाते में जमा करते हैं तो हमारे शुभकर्म बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब हम अपने कुकर्मों की कमाई करते हैं तो हम उस पूँजी को अपने खाते में जमा करवाते हैं। सद्कर्मों के फलस्वरूप उन शुभ  फल मिलता है। हम हर प्रकार से सुविधा सम्पन्न बनकर सुख भोगते हैं। जब हम अशुभ कर्मों का  कुफल हम भोगते हैं तो हमें जीवन में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।‌इसका अर्थ यही होता है कि हमने अपने खाते में से उन उतने कर्मो की पूँजी निकालकर खर्च कर ली है। इस प्रकार लेन और देन का यह क्रम अनवरत चलता रहता है।
             हम कुछ जान भी नहीं पाते परन्तु हमारा यह खाता नित्य ही आटोमेटिकली कम अथवा अधिक होता रहता है। शुभकर्मों की इस खाते में यदि अधिकता होती है तभी जीव को मानव के रूप में जन्म मिलता है। उसमें भी हमारे कर्मानुसार हमें सुख-शान्ति, भौतिक सम्पत्ति, अच्छा घर-परिवार, रिश्ते-नाते, बन्धुजन, रूप-सौन्दर्य और सामाजिक रुतबा आदि मिलते हैं। शुभकर्मौं के कम होने मानव जन्म तो मिलता है पर जीवन अभावों में गुजरता‌ रहता है।
               इसके विपरीत यदि हमारे अशुभ कर्मों की अधिकता होती है तो जीव को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मानुसार चौरासी योनियों के भयावह चक्र से गुजरना पड़ता है। मनुष्य योनि को छोड़कर ये सभी योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगकर जीव को फिर से मानव जन्म की प्राप्ति होती है। 
              यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है पर उनका फल भोगने में नहीं। अपने किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का फल उसे भुगतना ही पड़ता है, उसे किसी भी तरह इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। चाहे वह कितने ही उपाय क्यों न कर ले। वह अपनी इच्छा से तीर्थों की यात्रा करे, तन्त्र या मन्त्र का सहारा या तथाकथित धर्मगुरुओं के पास चला जाए, उनसे किसी भी तरह से मुक्ति सम्भव नहीं होती।
             इन्सान कहता है कि जब वह गलत काम करता है अथवा कुमार्ग पर चलता है तब ईश्वर उसे उस समय सन्मार्ग क्यों नहीं दिखाता, चुप क्यों रहता है? सोचिए, यह तो हुई चोरी और सीनाजोरी वाली बात। जब भी मनुष्य शुभकर्म करता है तब वह मालिक उसे उत्साहित करता है। जब वह अशुभकर्म करता है तब वह उसे चेतावनी भी देता है। सुकर्म करते समय मन से प्ररेणादायक आवाज आती है और दुष्कर्म करते समय अन्तस से समझाने जैसी आवाज आती है। उसके अपने मन में विचारों का अन्तर्द्वन्द्व होने लगता है।
            यह मनुष्य है कि अपने स्वार्थों को पूर्ण करने में इतना अन्धा हो जाता है कि वह बार-बार उस अन्तरात्मा की आवाज को अनसुना करता रहता है। सन्मार्ग पर चलने के स्थान पर कुमार्ग पर चलने लगता है। फिर बाद में वह दोषारोपण करने से भी बाज नहीं आता।
               सुख-ऐश्वर्य का समय जीवन में आने पर वह गर्व से इतराता फिरता है कि मेरे परिश्रम के फलस्वरूप मुझे यह सब मिला है। तब उसे ईश्वर को याद करने का ध्यान ही नहीं आता। इसके विपरीत जब उसके जीवन में दुख और परेशानियाँ आती हैं तब वह ईश्वर को दोष देता है। उसे अपनी की गई गलतियों की जरा भी याद नहीं आती। वह सारा समय मालिक को और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
             उसे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि उसका तो भाग्य ही खराब है अथवा मेरा भाग्य ही मुझसे रूठ गया है। उसे स्मरण करना चाहिए कि। यह भाग्य अथवा यह किस्मत हमारी सखी नहीं है जो बार-बार हमसे रूठ जाती है और फिर जब मनाएँगे तब मान जाएगी। हर जन्म यदि मानव जीवन का चाहिए तो अभी से अपने कर्मों पर लगाम लगानी आरम्भ कर देनी चाहिए। सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जहाँ तक हो सके ईश्वर को साक्षी मानकर अपने जीवन की डोर उसके हाथ में सौंप देनी चाहिएओ भोगना उतना ही कठिन होता है। मित्रता करना और उसे निभाना दोनों ही कठिन कार्य कहे जाते हैं। अपने अतिप्रिय मित्र को भी पलभर में अपना दुश्मन बनाया जा सकता है पर दुश्मन को अपना बनाना टेढ़ी खीर होता है। उन दोनों में परस्पर विश्वास हो जाना असम्भव नहीं पर कठिन अवश्य होता है क्योंकि अविश्वास की एक रेखा उनके मनों में छुपी रहती है। इसलिए उन दोनों में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आ सकता है।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

आत्मसम्मान

आत्मसम्मान

अपना आत्मसम्मान हर मनुष्य को बहुत प्रिय होता है। आत्मसम्मान मनुष्य की वह थाती होती है जिसके कारण वह समाज में सिर उठाकर चलता है। उस पर होने वाले तनिक से प्रहार को भी वह सहन नहीं कर पाता। यह आत्मसम्मान न हुआ मानो कोई शीशा है जो जरा-सी चोट लग जाने पर किरच-किरच होकर बिखर जाता है। यद्यपि यह आत्मसम्मान कोई शरीर नहीं है परन्तु फिर भी हर बात पर घायल हो जाने के लिए बेताब रहता है। कोई भी चोट यह सहन नहीं कर पाता।
             यह सत्य भी है कि आत्मसम्मान मनुष्य के लिए बहुत ही आवश्यक है। उसके बिना उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। वैसे देखा जाए तो जिस व्यक्ति को अपने सम्मान की चिन्ता नहीं रहती वह जीवित होते हुए भी मृत के समान है। वास्तव में सम्मान की कामना हर व्यक्ति करता है। कहते हैं कि जहाँ मान व सम्मान न मिले वहाँ भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। फिर आत्मसम्मान की बात कुछ अलग ही है। जिस व्यक्ति को अपना आत्मसम्मान प्रिय नहीं है, वह तो इन्सान कहलाने के योग्य भी नहीं है। इसीलिए मनीषी कहते हैं- 
          मानो हि महतां धनम्।
अर्थात् मान ही महान लोगो का धन है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनस्वी लोग अपने जीवन को अभावों में जी लेंगे पर अपने स्वाभिमान को ठेस नहीं लगने देते। उनके लिए उनका मान यानी स्वाभिमान या आत्मसम्मान ही सर्वोपरि होता है, अन्य शेष कुछ भी उन्हें चाहिए नहीं होता।
             इसे हम नाक का प्रश्न भी कह सकते है। स्वाभिमानी व्यक्ति किसी को भी अपनी पगड़ी उछालने नहीं देते। वे स्वयं भी सावधान रहते हैं कि उनके द्वारा किसी का सम्मान न रौंदा जाए। यहॉं हम एक उदाहरण लेते हैं। अग्नि जब अपने उत्कर्ष पर होती है यानी उसमें सब कुछ भस्म कर देने की सामर्थ्य होती है। उसमें तेज में होता है तो सभी जीव-जन्तु उससे डरते हैं, उसके पास जाने से कतराते हैं। जब वही आग जब राख बन जाती है तो चींटियाँ भी उस पर चलने लगती हैं।
              स्वाभिमानी व्यक्ति टूट सकते हैं पर किसी के आगे अनावश्यक रूप से झुकते नहीं है। वे चाहते है कि उन्हें कोई खाने के लिए दे चाहे न दे परन्तु उनके आत्मसम्मान को ठेस न लगाए। वे दुनिया के हर सुख व ऐश्वर्य को इसके लिए बलिदान कर सकते हैं। महाराणा प्रताप, गुरु गोबिन्द सिंह आदि स्वाभिमानी व्यक्तियों के बलिदानों से इतिहास के पन्ने भरे हुए हैं जिन्होंने अपने देश, धर्म व समाज के लिए अपनी व अपने बच्चों तक की परवाह नहीं की। इसीलिए वे आदरणीय हमारे हृदयों में बसते हैं। हम उनके लिए प्रात:स्मरणीय विशेषण का प्रयोग करते हैं।
             इसके विपरीत ऐसे लोग भी दुनिया में होते हैं जो अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर अपने तुच्छ स्वार्थो को महत्त्व देते हैं। उन्हें कोई कुछ भी कह ले, चिकने घड़े की तरह उन पर कोई असर नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए कहा जाता है -
      बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैय्या।
अर्थात् वे हर रिश्ते या सम्बन्ध को केवल पैसे के तराजू पर तौलते हैं। इसीलिए उनके मायने अलग ही होते हैं। उन्हें लोग डीठ, चापलूस, चिकना घड़ा अथवा चाटूकार आदि विशेषणों से नवाजते हैं। ये लोग अपनी तथाकथित प्रशंसा को सुनकर बस दाँत निपोरकर रह जाते हैं। 
            ऐसे लोगों का यही मन्त्र होता है कि दुनिया भाड़ में जाए, बस इनके स्वार्थों की पूर्ति किसी भी तरह से होती रहनी चाहिए। ये किसी भी हद तक गिरकर अपना काम्य पाना चाहते हैं। रिश्वतखोरी, हेराफेरी, लूटपाट करने में इन्हें संकोच नहीं होता। ऐसे ही लोग अपने स्वार्थ पूर्ति करने में इतने अन्धे हो जाते हैं कि अपने देश व धर्म का सौदा करने से भी बाज नहीं आते। ये लोग अपने ही देश के गुप्त दस्तावेजों को चन्द टुकड़े लेकर शत्रु देश को बेच देने का दुस्साहस करते हैं। 
            उन्हें इस बात का तनिक भी भय नहीं लगता कि शत्रु देश यदि अपने देश पर आक्रमण करेगा तब न जाने कितने वीरों को उनके कारण अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। देश पर युद्ध का अनावश्यक बोझ बढ़ जाने से उन्नति के कार्य प्रभावित हो जाएँगे। चारों ओर त्राहि-त्राहि होने लगेगी। ऐसे देशद्रोही लोग पकड़े जाने पर अपना सारा जीवन सलाखों के पीछे ही व्यतीत करते हैं। अपने कुत्सित कर्मों के कारण ही वे‌ अपने देश और अपनों के लिए कलंक बन जाते हैं।
             मनुष्य को अपनी इच्छाओं को अपने मेहनत के बलबूते पर पूर्ण करना चाहिए। स्वार्थों को अपने ऊपर इतना अधिक हावी नहीं होने देना चाहिए कि वह कुमार्ग पर चलकर तिरस्कार का पात्र बन जाए। अपना आत्मसम्मान बचाए रखने का सदा प्रयत्न करना चाहिए। उसे किसी भी मूल्य पर गँवाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 10 मार्च 2026

जीव की पहचान अपनी जाति से

जीव की पहचान अपनी जाति से  

हर जीव अपनी जाति से पहचाना जाता है। इसका अर्थ यही है कि हम मनुष्य हैं, वे पशु हैं, पक्षी हैं अथवा जलचर और नभचर हैं इत्यादि। ईश्वर ने यही वर्गीकरण करके जीवों को इस संसार मे भेजा है। उसके विभाजन में बिल्कुल स्पष्टता है। शेष सब मानव मस्तिष्क की खुराफात है। इसी मानव ने अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करके अनावश्यक ही मनुष्यों को विभिन्न जातियों में बॉंटने का अपराध किया है।
        न्यायदर्शन का कथन है -
          समान प्रसवात्मिका जाति:।
अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में समान बुद्धि पैदा करने वाली जाति है।
           न्यायदर्शन हमें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि एक समान बुद्धि वालों की एक ही जाति होती है। इस तथ्य को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि विद्वान, मूर्ख आदि के प्रकार से यदि जातियों का विभाजन किया जाए तो शायद अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा।
            ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि जातियों का विभाजन उनके गुण और कर्म के आधार पर किया गया। यह विभाजन कोई रूढ़ नहीं था। चारों जातियों के लोग यदि अपना कर्म परिवर्तित कर लेते थे तो उस कर्म के अनुसार ही उनकी जाति भी बदल जाती थी। 
            संस्कृत भाषा के कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक 'राजतरंगिनी' में लिखा है कि दुनिया में प्राय: देखा गया है कि सब जीवों को अपनी ही अपनी ही जाति वालों से भय होता है। वे कहते हैं कि बाज पक्षियों को मारता है, शेर वन में पशुओं को मारकर खा जाता है, मणियाँ हीरों के द्वारा भेदी जाती हैं, कुदाल से पृथ्वी खोदी जाती है, वायु के द्वारा पुष्प गिराए जाते हैं और सूर्य के द्वारा नक्षत्र निस्तेज कर दिए जाते हैं।
           कवि कल्हण का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वे कहते हैं, 'हम मनुष्यों की बात करें तो वे जाति के नाम पर जो भी अत्याचार और अनाचार करते हैं, वे किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं। हर दूसरे दिन ऐसे हृदय विदारक समाचार सोशल मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। एक-दूसरे के सिर पर दोष मढ़कर सभी लोग अपना पल्लू झाड़कर बचकर निकल जाना चाहते हैं। उच्च जाति का यह घमण्ड मानव समाज को रसातल की ओर ले जा रहा है।' 
         भगदत्त जल्हण ने 'सुक्तिमुक्तावली' नामक अपने ग्रन्थ में कहा है -
          शुनक: स्वर्णपरिष्कृतगात्र: 
              नृपपीठे विनिवेशित: एव।
          अभिषिक्तश्च जलै: सुमुहुर्ते
                न जहात्येव गुणं खलु पूर्णम्॥
अर्थात् कुत्ते को स्वर्ण अलंकारों से विभूषित करके राजसिंहासन पर बैठाकर यदि अच्छे मुहुर्त में जल से अभिषेक कर दिया जाए तो भी कुत्ता अपना जातिगत गुण नहीं छोड़ता।
          हर मनुष्य को बराबर समझने वाले विचार तो न जाने कहीं खोते जा रहे हैं। इसका खमियाजा समस्त मानव जाति को भुगतना पड़ रहा है। 
          जैन आचार्य और दार्शनिक वाचकवर श्री उमास्वाति (उमास्वामी) महाराज ने अपने ग्रन्थ 'प्रशमरतिप्रकरण' में हमें समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है, 'ससार में परिभ्रमण करते हुए लाखों-करोड़ों बार जन्म लेकर असंख्य बार प्राप्त हुई नीच, ऊँच और मध्यम अवस्थाओं को  जानकर कौन बुद्धिमान जातिमद करेगा? कर्मवश संसारी प्राणी इन्द्रियों की रचना से उत्पन्न होने वाली विभिन्न जातियों में जन्म लेता रहता है। यहाँ पर किसकी, कौन-सी जाति स्थायी रह सकती है? इसलिए जाति का घमण्ड नहीं करना चाहिए।'
             पता नहीं कितने जन्मों में हम अपने कृत कर्मों के अनुसार किस-किस जाति में जन्म लेकर आए हैं तो फिर यह ऊँच-नीच का भेद करने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। छोटे या बड़े किसी भी मनुष्य के बिना हम अपने जीवन में आगे नहीं चला सकते। हमें अपने दैनिक जीवन में हर प्रकार के व्यवसाय के व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके बिना हम स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। उस समय मानो चक्का जाम हो जाता है और हम परेशान हो जाते हैं।
          निम्न मन्त्र विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' के प्रथम मण्डल का 25वाँ सूक्त से है। इसके ऋषि शुनःशेप आजीगर्ति हैं और देवता वरुण हैं। यह मन्त्र पापमुक्ति और जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना का प्रतीक है -
          उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पांश माध्यम चृत।
          अवाधमानि जीवसे।
अर्थात् हे वरुण! देव हमें ऊपरी बन्धनों (पापों) से मुक्त करो, मध्य के बन्धनों को खोल दो और निचले बन्धनों को भी ढीला कर दो ताकि हम जीवित रह सकें और धर्म के मार्ग पर चल सकें। 
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 9 मार्च 2026

बालसुलभ चेष्टाऍं

बालसुलभ चेष्टाऍं

बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं को देखते हुए हम सभी बहुत आनन्दित होते हैं। बालसुलभ चेष्टाऍं बच्चों की स्वाभाविक, मासूम और निश्छल प्रवृत्तियाँ होती हैं जो निस्वार्थ खुशी और चंचलता दर्शाती हैं। खिलखिलाकर हँसना, जिद्द करना, निर्भीकता से जिज्ञासु प्रश्न पूछना, रंगों से प्रेम, शरारत करना और हर छोटी-बड़ी बात पर खुश होना शामिल है। ये व्यवहार बच्चों की मासूमियत का ऐसा प्रतीक होता हैं जो बड़े लोगों में भी आनन्द भर देता है। 
        प्रतिदिन उनकी किसी भी माँग को माता-पिता के न मनाने पर रूठना और मानना, बात-बात पर जिद करना आदि अच्छा लगता है। इन सभी मौकों पर हम मुस्कुराकर रह जाते हैं। उनके ये सभी क्रिया-कलाप हमें मानसिक सन्तोष देते हैं। एक प्रकार से हम उन क्षणों में स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं। कभी-कभी हम बड़े भी बच्चों की प्रसन्नता के लिए जान-बूझकर उनसे वैसा ही रूठने, मानने या जिद करने का अभिनय करते हैं। इस प्रकार जीवन अपनी ही गति से निरन्तर चलता रहता है।
        छोटे बच्चे गिरते-पड़ते जब ठुमकते हुए चलते हैं तो वे हर किसी के आकर्षण का पात्र बन जाते हैं। इनके गिरने पर कष्ट भी होता है। चोट लगने पर जब ये रोते हैं तब बड़े इन्हें बहला देते हैं कि फर्श टूट गया है अथवा चींटी मर गई है। उसी पल वे रोना भूलकर उठ खड़े होते हैं और पहले की ही तरह बर्ताव करने लगते हैं। उनकी ये मासूम हरकतें बड़ी मनमोहक होती हैं। घर के सब लोग इसका आनन्द लेते हैं।
           छुपन-छुपाई का खेल जब वे खेलते हैं तब उनका अलग ही रूप दिखाई देता है। एक ही स्थान पर बैठे हुए बड़े जब यह कहते हैं, "हमें तो वह दिखाई ही नहीं दे रहा, पता नहीं कहाँ चला गया है? चलो उसे ढूँढो।"
           यह सुनते ही वह हँसते हुए आकर कहने लगता है, "मैं तो यहाँ हूँ।"
            बच्चों की ये सभी सरल क्रीड़ाएँ अनायास ही मन्त्रमुग्ध कर लेती हैं। उनकी इन मनोहारी चेष्टाओं पर माता-पिता व अन्य सभी बलिहारी होते रहते हैं।
            हर अवसर पर उनका बात-बात पर उन्मुक्त होकर खिलखिलाना, हर किसी को आनन्दित करता है। इन्सान चाहे कितना भी परेशानियों में क्यों न घिरा हो पर छोटे बच्चे जब गोद में बैठकर प्यार करते हैं तब कुछ समय के लिए मनुष्य अपने सारे कष्ट और परेशानियॉं भूल जाता है। तब वह बच्चे के साथ बच्चा बन जाता है। बच्चे जब बड़ों के साथ खेलते हैं तो हार जाने पर रोने लगते हैं, चीटिंग करने का आरोप लगाते हैं और फिर भाग जाते हैं। उनकी ये हरकतें मन को मोह लेती हैं।
           कितनी ही सख्या में बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों, वहाँ उतनी रौनक और खुशगवार माहौल नहीं बन पाता जितना एक बच्चे के आने पर हो जाता है। सभी लोग उस बच्चे के साथ बच्चा बनकर आनन्दित होने लगते हैं। उस समय सारा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। सभी लोग उन पलों को सहेज लेना चाहते हैं।
             किसी भी बात को न समझ पाने पर इनके भोले-से मुखड़े पर आया आश्चर्य का भाव वाकई देखने लायक होता है। इनके बालसुलभ प्रश्नों की बौछार का उत्तर देते हुए सब थक जाते हैं। ये बच्चे हैं कि नित नए प्रश्नों के साथ बार-बार हाजिर हो जाते हैं। डाँट खाने के बाद थोड़े समय के लिए अवश्य चुप लगाते हैं। फिर बिना बुरा माने, बिना नाराज हुए उनका वही क्रम पुन: आरम्भ हो जाता है। यानी फिर से प्रश्नों की झड़ी।
             बच्चों में छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, तेरे-मेरे आदि की सभी भावनाएँ नहीं होतीं। हम समझदार लोग ही उनके निष्कपट हृदयों में इन बुराइयों को भरते हैं। उन्हें सरल से विषाक्त बनाने का कार्य हम बखूबी निभाते हैं। हम अपने गिरहबान में झाँकने के बजाय फिर बाद में यह कहने से भी नहीं चूकते कि आजकल के बच्चे बहुत चालाक अथवा घाघ हो गए हैं। इन लोगों को छोटे-बड़े का लिहाज करना ही नहीं आता।
               इन्हें हम बड़े अपने स्वार्थ के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। कोई भी लालच देकर घर में एक-दूसरे की जासूसी इन मासूमों से करवाते हैं जो एकदम गलत है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उनमें लालच बनकर पनपने लगती है। बड़े होकर जब वे किसी माँग को पूरा करने के लिए पैसा या अपनी जरूरत की कोई वस्तु माँगते हैं तब उस समय हमें बहुत बुरा लगता है। उस समय हमें याद नहीं आता कि यह गलत संस्कार हमीं ने उसे दिए हैं।
              ये बाल सुलभ चेष्टाऍं बच्चों के बचपन की मासूमियत को जीवित रखती हैं। ये बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य कही जाती हैं। हम बड़ों की सच्ची-झूठी बातों को अक्षरश: सत्य मानने वाले इन बच्चों को यदि हम सरल हृदय ही रहने दें तो समाज का ढाँचा ही कुछ और हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 8 मार्च 2026

माता-पिता की बादशाही

माता-पिता की बादशाही

सुनने और पढ़ने में शायद सबको यह वाक्य कुछ अटपटा-सा लग सकता है परन्तु यह बहुत सारगर्भित है। हमारे बड़े-बुजुर्ग कहा करते थे -     
       माता-पिता की बादशाही होती है
       और भाई-बहनों का व्यापार।
इसके समर्थन में हम यह कह सकते हैं कि जब तक माता-पिता अथवा उनमें से एक भी जीवित होता है तब तक मनुष्य अधिकार पूर्वक उनके समक्ष अपनी इच्छा रख सकता है। वे भी ऐसे होते है जो बच्चों की इच्छाओं को यथासम्भव पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बच्चों की माँग उनकी सामर्थ्य से परे की हो जाती है। फिर भी बच्चों को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, ऐसा सोचकर वे उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
            बच्चे माता-पिता से कभी रूठते हैं और कभी मानते हैं। उनसे जिद करके वे अपनी बातें मनवा लेते हैं। वे यह भी ध्यान नहीं रखते कि जिस वस्तु के लिए वे जिद कर रहे हैं, उसे लाकर देना उनके माता-पिता के बूते की बात है या नहीं। वे माता-पिता भी अपने बच्चों की मुँह से निकली बात को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं। न वे दिन देखते हैं और न ही रात की परवाह करते हैं। बस उन्हें एक ही धुन होती है कि कैसे भी करके बच्चे की मॉंग को पूरा करना है।
            दुर्भाग्यवश यदि अभाव का समय आ जाए तब वे अपने मुँह का निवाला भी बच्चों को दे देते हैं, ताकि उनके बच्चे भूखे न सोएँ। सारा जीवन अपने बच्चों के होठों पर मुस्कान बनाए रखने के लिए स्वयं दिन-रात खटते रहते हैं। उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाने के लिए किए गए अपने श्रम को वे कुछ मानते ही नहीं हैं। वे बस अपने बच्चों को जीवन में सफल देखकर मुस्कुराना चाहते हैं। उनका बस चले तो दुनिया की सारी खुशियाँ अपने बच्चों की झोली में डाल दें। हम अपने आसपास देखते हैं कि शारीरिक अक्षमता वाले बहुत से बच्चे उच्च पदों पर कार्यरत हैं। यह असम्भव कार्य माता-पिता के परिश्रम का फल है।
           अपने बच्चों के शादी-ब्याह आदि शुभकार्यों को सम्पन्न करते समय उनके चेहरों पर आए हुए सन्तुष्टि के भाव देखते ही बनते हैं। ऐसे माता-पिता बच्चों से कोई आशा नहीं रखते। वे बस अपने बच्चों के जीवन की मंगल कामना करते नहीं अघाते।
          यदि कोई बच्चा शारीरिक या आर्थिक रूप से कमजोर होता है तो उस पर उनकी विशेष कृपा दृष्टि रहती है। उनकी यही सोच होती है कि उनका वह कमजोर बच्चा भी ऐसी स्थिति में आ जाए ताकि उसे किसी का मुॅंह न देखना पड़े। वे चुनौतियों का सामना करते हुए थकते नहीं हैं। उसे भी अपने गुजर-बसर लायक बना ही लेते हैं।
            माता-पिता का स्थान इस संसार में कोई नहीं ले सकता। बच्चों के प्रति उनके ऐसे त्याग और समर्पण के कारण ही उनके लिए बादशाही शब्द का प्रयोग हमारे सयानों ने किया है। वे बच्चों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को भी अनदेखा करके उनकी मंगल की कामना करते हैं। वे दुनिया की नजरों से छुपाकर भी बच्चों को यथाशक्ति देते रहते हैं। बेटियों के प्रति उनका विशेष ममत्व होता है। वे कितनी भी बड़ी हो जाऍं माता-पिता उन्हें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से देते ही रहते हैं।
          उनके अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते लेन-देन के व्यवहार पर चलते हैं। चाहे वह सम्बन्ध भाई-बहन का हो, दोस्तों का हो अथवा अन्य रिश्तेदारों का हो। जितना प्यार और सम्मान उनको दोगे, उतना ही पाओगे। उनके साथ न जिद की जा सकती है और न ही अपनी माँग को दृढ़तापूर्वक मनवाया जा सकता है। जितना दूसरों के बरतोगे उतना ही वे बरतेंगे। यदि उन लोगों के साथ कदम मिलाकर चलोगे तभी वे भी साथ निभाएँगे अन्यथा वे किनारा कर लेने में पलभर की देरी नहीं करते। इसका कारण यही है कि कोई भी व्यक्ति अपनी अवहेलना सहन नहीं कर सकता। हर व्यक्ति स्वयं को ईश्वर से कम नहीं समझता।
              इसीलिए माता-पिता के सम्बन्ध के अतिरिक्त सभी रिश्ते-नाते स्वार्थ से जुड़े हुए होते हैं। जहाँ तक स्वार्थ पूरे होते रहते हैं, वहीं तक सम्बन्ध बने रहते हैं। जहाँ पर जरा-सी लापरवाही हुई, वहाँ वे टूटकर बिखर जाते हैं। उस समय परस्पर दूरियाँ बढ़ जाती हैं। यदि इन सम्बन्धों को बचाए रखना चाहते हैं तो रिश्तों की गरिमा का ध्यान रखना आवश्यक होता है। माता-पिता के साथ ऐसी कोई शर्त नहीं होती। वे सदैव अपने बच्चों का हित साधते रहते हैं।
             माता-पिता की महानता और उनकी बच्चों के प्रति सहृदयता के कारण ही उनके काल को बादशाही का समय कहा गया है। उनके निस्वार्थ व्यवहार के आगे दुनिया के सभी सम्बन्ध बौने हैं। इसीलिए माता-पिता को ईश्वर का रूप कहा जाता है। उनकी जितनी भी सेवा की जाए कम होती है। उनके आशीर्वाद भी स्वार्थ रहित होते हैं। उन्हें अपने जीवन काल में लेते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 7 मार्च 2026

हृदय ही ब्रह्म

हृदय ही ब्रह्म

हृदय शब्द की यह व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहती है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन सन्तानें हैं- देव, मनुष्य और असुर। 
          हृदय शब्द तीन अक्षरों से बना है- हृ+द+य। वैदिक व्याकरण में इनका अर्थ बताया है- हृ का अर्थ है 'हरति' अर्थात् लाना। द का अर्थ है 'ददाति' अर्थात् देना और य का अर्थ है 'याति' अर्थात् जाना।
           जो इस रहस्य को समझ लेते हैं कि हृदय ही सब कुछ है यानी कि वही ब्रह्मा है, वही प्रजापति है। अपने और पराए सभी उसे उपहार लाकर देते हैं। जो इसे पूरी तरह जान लेता है वही स्वर्गलोक को जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वह सभी प्रकार से सुखी रहता है।
              हमारे भीतर का आध्यात्मिक केन्द्र यानी आत्मा ही परम सत्य, सर्वोच्च चेतना या ब्रह्म है। इससे स्पष्ट होता है कि हृदय मात्र एक शारीरिक अंग नहीं बल्कि वह असीम, शुद्ध, शान्त और अमर दिव्य शक्ति है। वह ब्रह्माण्ड का मूल है। स्वयं को जानने-समझने और परमात्मा से एक होने की यह अनुभूति है। हृदय में सर्वोच्च चेतना वास करती है और सम्पूर्ण अस्तित्व को बनाए रखती है। यह आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) की ओर ले जाती है जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य सार को अनुभव करता है। 
          मेडिकल की भाषा में कहें हम तो सब जानते है कि हृदय मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है। यह जब तक  ठीक से कार्य करता रहता है तब तक ही मनुष्य स्वस्थ रहता है। जहाँ इसमें विकार आया वहीं से परेशानी आरम्भ हो गई। यह लेता है, देता है और चलता है। इसका कार्य रुधिर का लेना और देना होता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को लेकर फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को वापिस लौटा देता है। इसी उद्देश्य को लेकर यह निरन्तर गतिमान रहता है। यह न दिन देखता है और न रात, बस चलता ही रहता है। इस प्रकार हृदय शब्द के अर्थ से रुधिर की गति अथवा बल्ड सर्कुलेशन का भाव आ जाता है।
             यदि यह हमारी तरह सोचने लगे कि वह वर्षों से चलते-चलते, अपना काम करते हुए थक गया है। अब उसे भी आराम करना चाहिए तो वहीं, उसी पल इस मनुष्य के जीवन का अन्त हो जाता है। जिसे डॉक्टर लोग कहते हैं कि मृतक का हार्ट फेल हो गया है और वह इस दुनिया में विदा लेकर जा चुका है।
          अभी ऊपर इसकी तीन सन्तानों की हमने चर्चा की थी। पहली सन्तान है देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते है, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खानपान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को सन्तुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं उन्हें दुखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खानपान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं।
          दूसरी सन्तान है मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर बन जाते हैं। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है। जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु यदा कदा असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। उस समय शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ निश्चित ही धन व समय की बर्बादी करता है।
              इसकी तीसरी सन्तान हैं असुर। वे हर नियम को, हर बन्धन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं। उनका वश चले तो सारे एक्सपेरिमेंट इसी जीवन में अपने शरीर पर कर डालें। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियन्त्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है।
              खाने-पीने, सोने-जागने यानी कि आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक बन जाती है। यह शरीर दिन-प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे। वह अब इन रोगों से और अधिक लड़ने में समर्थ नहीं है। 
           अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे सदा बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद