गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

बातचीत का रास्ता बन्द न करें

बातचीत का रास्ता बन्द न करें 

लड़-झगड़कर मुँह फुलाकर अलग-थलग होकर बैठ जाना अथवा अपने-अपने रास्ते चल देना किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान आपस में मिल-बैठकर किया जाता है। यानी कोशिश यही रहनी चाहिए कि बातचीत का रास्ता बन्द न हो। बातचीत अक्सर किसी रिश्ते में तनाव, नाराजगी या मतभेदों के कारण बन्द होती है। इसे खत्म करने के लिए सामने वाले की पसन्द की बातों में रुचि लेना, बोरिंग बातें शुरू कर उन्हें ऊबा देना, या शान्त माहौल में सीधे संवाद शुरू करना जैसे तरीके अपनाए जा सकते हैं। 
            यदि सम्भव हो तो सामने वाले व्यक्ति से सीधे पूछना चाहिए कि क्या हुआ है? और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाए। कभी-कभी 'ओह ठीक है' जैसी संक्षिप्त प्रतिक्रियाऍं बातचीत को बन्द करने का संकेत दे सकती हैं जो वास्तव में कभी-कभी अशिष्ट लग सकता है। बातचीत बन्द होने पर उसे फिर से शुरू करना या उसे खत्म करना मनुष्य की स्थिति और सामने वाले व्यक्ति के साथ उसके सम्बन्धों पर निर्भर करता है। जब परिवार में कोई सदस्य बातचीत बन्द कर देता है तो यह तनावपूर्ण हो सकता है। धैर्य से उसे सुलझाया जा सकता है।
          सम्बन्धों में कितनी भी कटुता क्यों न आ जाए उनसे किनारा नहीं किया जा सकता। देर-सवेर उन्हें सुधारना ही पड़ता है। जब सब कुछ बिगड़ जाता है तब उन्हें जोड़ने पर एक गाँठ-सी पड़ जाती है। बाद में यही कहकर उन्हें भूलना होता है कि 'पुरानी बातों पर मिट्टी डालो और उन्हें भूल जाओ।' बड़े-बुजुर्ग गलत नहीं कहते। मिल-जुलकर, एक होकर रहने की शक्ति से हम सभी परिचित हैं।
          समाज में, अपने आस-पड़ोस में, अपने कार्यक्षेत्र में अर्थात् हर स्थान पर यदाकदा मनमुटाव हो जाते हैं। हर व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, उसके कार्य करने का तरीका सब अलग-अलग होते हैं। इसलिए ऐसा होना स्वाभाविक होता है, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि तब उस व्यक्ति विशेष से हम शत्रुता मोल ले बैठें। समय बीतते हमारी यही कटुता पीढ़ी-दर-पीढ़ी की दुश्मनी बन जाए, जिसका अन्त सुखद कम और दुखद अधिक होता है। इससे किसी का हित नहीं साधा जा सकता है। प्राय: प्राय: व्यवहार में हम देखते हैं।
             दो लोगों या समूहों में भी यदि कभी झगड़े की स्थिति बनती है और थाना-पुलिस अथवा कोर्ट-कचहरी में जाने की नौबत आ जाती है तब भी अन्तत: समझौता ही करना पड़ता है। दोनों पक्षों को शेक हेंड करके ही मुक्ति मिलती है।
              अपने घर में बच्चों के झगड़े होते ही रहते हैं। तब हम उन्हें गले मिलवाकर एक-दूसरे सॉरी कहलवा देते हैं। यानि कि उनमें समझौता हो जाता है और बच्चों के साथ-साथ हम भी खुश हो जाते हैं। उन्हें हम यही शिक्षा देते हैं कि झगड़ा मत करो, प्यार से रहो, गलती हो जाने पर माफी माँग लो और मिलकर रहो। बच्चों को हम सीख दे देते हैं और उनका कोमल मन हमारे प्रति सम्मान के कारण उसे मान लेता है। 
            जब हम बड़ों की बारी आती है तो हमारा अहं आड़े आ जाता है। हम दूसरों को दी हुई अपनी ही सीख को भूलकर अक्खड़ या हठी बन जाते हैं। बच्चे यदि हमारी बात को अनसुनी करना चाहते हैं तो उन्हें डपटकर, हम अपनी बात मनमवाते हैं। उनके समक्ष स्वयं क्या उदाहरण रखते हैं?
             घर-परिवार में होने वाले झगड़े प्राय: गलतफहमियों अथवा गलत फैसलों के कारण होते हैं। जिस प्रकार नाखूनों से माँस को कभी अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भाई-बन्धुवों से पूर्वाग्रह के कारण किनारा नहीं करना चाहिए। सयाने कहते हैं 'अपना मारेगा भी तो छाया में फैंकेगा।' रिश्तों के धागों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए, उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए। फिर जब जोड़ने का समय आता है तो मन में एक कसक रह जाती है। कभी-कभी यह अहसास हो जाता है कि बिना किसी की खास गलती के इतने समय तक हम एक-दूसरे को दोषी मानकर कोसते रहे। 
            हम राजनैतिक कूटनीति पर नजर डालें तो देखते हैं कि युद्ध के बाद भी दो देशों को आखिर समझौता ही करना पड़ता है। वहाँ पर दुश्मनी के बाद भी बातचीत बन्द नहीं की जाती।
             अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि उससे किसी का अहित न हो। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। अपनी हठधर्मिता को त्यागकर और मिल-बैठकर सदा ही सकारात्मक समझौते होते हैं। उनका मान रखने से सबको प्रसन्नता होती है जो अमूल्य होती है। अपनों का साथ बड़े ही भाग्यशालियों को मिलता है। इस सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने से सबको बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

प्राणों का महत्त्व

प्राणों का महत्त्व

हमारे शरीर में रहने वाले प्राण जीव के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। प्राणों के बिना हमारा शरीर राख की ढेरी के समान बन जाता है। शरीर से प्राणों के निकल जाने के बाद अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति को भी मनुष्य घर में नहीं रहने देता। शीघ्र ही वे उसे अग्नि को समर्पित कर देता है। यदि ऐसा न किया जाए तो कुछ दिनों पश्चात उस शव में से दुर्गन्ध आने लगती है। 
           'छान्दोग्योपनिषद्' में  एक कथा के माध्यम से प्राणों का महत्त्व समझाया गया है। कथा इस प्रकार है कि प्राचीन काल में एक बार सभी इन्द्रियॉं अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगीं। यानी आँख, नासिका, कान (श्रवण शक्ति), जिह्वा(बोलने की शक्ति), मन और प्राण सभी अपने आप को दूसरी इन्द्रियों से श्रेष्ठ बता रहे थे। इसलिए उनमें विवाद होने लगा और फिर उनका झगड़ा बहुत बढ़ने लगा। सभी इन्द्रियॉं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुॅंच पा रही थीं। सभी इन्द्रियॉं अपनी इस समस्या का समाधान चाहती थीं।
            अन्त में वे सभी अपने विवाद को सुलझाने के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी के पास गईं और उन्हें अपने विवाद का कारण बताया। उन्होंने उन सबको कहा, "जिसके शरीर से बाहर चले जाने के बाद सब समाप्त हो जाए वही श्रेष्ठ है।" 
         सभी इन्द्रियों ने इस सुझाव को मान लिया और उस पर अमल करने का फैसला किया।
          सबसे पहले आँखें शरीर से एक वर्ष के लिए बाहर चली गई। लौटकर उसने उन सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
          उन सबने उत्तर दिया, "जिस प्रकार एक अन्धा व्यक्ति अपने कानों से सुनता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ और मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           फिर नासिका (सूँघने की शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने  वापिस लौटकर सबसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?" 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे न सूँघते हुए व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, वाणी से बोलता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब भी जीवित रहे।"
           उसके पश्चात कान (श्रवण शक्ति) एक साल बाहर गई। उसने वापिस लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"  
            उन सब ने उत्तर दिया, "जैसे एक बहरा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
            फिर वाक्(बोलने की शक्ति) बाहर चली गई। उसने भी लौटकर वही पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे?"
          उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे एक गूॅंगा व्यक्ति आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, मन से विचार करता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
           फिर उसी तरह से मन ने भी एक साल के पश्चात लौटकर उनसे पूछा, "तुम सब मेरे बिना कैसे जीवित रहे? 
           उन्होंने ने उत्तर दिया, "जैसे बिना मन के बच्चा आँखों से देखता हुआ, नासिका से सूँघता हुआ, कानों से सुनता हुआ, जिह्वा से बोलता हुआ जीवित रहता है वैसे ही हम सब जीवित रहे।"
         अन्त में जब प्राण शरीर को छोड़कर बाहर निकलने लगे तो पल भर में ऐसा लगने लगा मानो सब कुछ समाप्त हो रहा है। उस समय सभी इन्द्रियाँ एकसाथ चिल्लाने लगीं, "मत जाओ, मत जाओ। तुम्हारे बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। तुम चले जाओगे तो सब समाप्त हो जाएगा। हमें समझ आ गया है कि तुम्हीं हम सब में श्रेष्ठ हो।"
            यह उपनिषद् कथा हमें प्राणों का महत्त्व समझा रही है कि उनके बिना इस शरीर का कोई मूल्य नहीं। नश्वर शरीर में रहने वाली अनश्वर आत्मा को हम संसार की चकाचौंध में भूल जाते हैं। हम सारा समय इस शरीर के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। इसी को सदा सजाते-संवारते रहते हैं और इतराते रहते हैं। हम इस बात को भी नजरअंदाज कर देते हैं कि जब यह रूप-यौवन जल्दी ही ढल जाएगा तो फिर क्या होगा? 
            हमारी यह आत्मा अविनाशी ईश्वर का एक अंश मात्र है। परमात्मा की भॉंति यह भी नित्य और नूतन है। हमारे इस भौतिक शरीर के मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी यह सदैव विद्यमान रहती है। यह युगों-युगों तक रूप बदल-बदलकर इस संसार में जन्म लेती रहती है। हमारी आत्मा अपने पुराने, रोगी अथवा कटे-फटे शरीरों का त्याग करके नए शरीर को धारण करती रहती है। अत: आत्मज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह

विनम्रता से दूसरे के दिल में जगह


किसी के दिल में जगह बना लेना बहुत ही आसान होता है। दूसरे के मन को मोह लेने की सबसे पहली शर्त होती है विनम्रता। मन में यदि स्वार्थ, दिखावा या छल-फरेब न हो तो किसी को भी अपना बनाया जा सकता है। विनम्र व्यक्ति अपने सरल व सहज व्यवहार से सबको अपना बना लेता है और सबका प्रिय बन जाता है। विनम्र हृदय वाले लोग अधिक आकर्षक और विश्वसनीय होते हैं जो सदा मजबूत सम्बन्ध बनाते हैं।

            विनम्रता दूसरों के दिलों में जगह बनाने का सबसे अनमोल गुण है जो अहंकार को त्यागकर रिश्तों में सौहार्द्र और सम्मान लाता है। यह व्यवहार में नरमी, वाणी में मिठास और दूसरों के विचारों का सम्मान करने से आती है। इस तरह करने से मनुष्य न केवल दूसरों का विश्वास जीतता है बल्कि अपनी महानता भी स्थापित करते हैं। विनम्रता का अर्थ झुकना नहीं होता अपितु अपने अहंकार को त्यागकर दूसरों के प्रति सम्मान दिखाना होता है। विनम्र वाणी और व्यवहार से लोग जुड़ते हैं और रिश्तों में दरार नहीं आती।

             किसी दूसरे के दिल में उतरने के लिए अपने रिश्तों में विश्वास और सच्चाई का होना आवश्यक होता है। अपने प्रिय जन के रंग में रंग जाना ही अपनेपन की सीढ़ी है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरे को उसी रूप में अपना लेना होता है जैसा वह है। उसकी अच्छाइयों को बढ़ाते हुए कमियों को अनदेखा कर देना चाहिए। तभी सम्बन्ध दूर तक साथ निभाते हैं। यह दूसरों की भावनाओं को समझने में सहायता करती है और जीवन में शान्ति लाती है। 

            यदि किसी व्यक्ति की कमियों को लेकर सदा उसे कोसते रहेंगे, उस पर टीका-टिप्पणी करते रहेंगे तो सम्बन्ध कितने भी प्रगाढ़ रहे हों, टूटकर बिखर जाते हैं। व्यक्ति विशेष की कमियों को अपनी अच्छाई से दूर करने का यत्न करना चाहिए। दूसरे व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करना चाहिए।‌ हमेशा यही सोचना चाहिए कि कोई भी इन्सान सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। यदि वह पूर्ण हो जाएगा तब वह मनुष्य नहीं रह जाएगा अपितु ईश्वर तुल्य होकर हमारी पहुँच से दूर हो जाएगा।

            मनुष्य जब विनत होता है तब उसमें सबको मन्त्र मुग्ध करने की सामर्थ्य होती है। लोहे जैसी कठोर धातु जब नरम हो जाती है तो उससे मनचाहे पदार्थ बनाए जा सकते हैं। इसी तरह सोने जैसी ठोस धातु को अग्नि में पिघलाकर जब नरम कर देते हैं तब उससे मनभावन आभूषण बनाए जाते हैं। उन आभूषणों को पहनकर सभी इतराते फिरते हैं। उसी प्रकार अगर इन्सान भी नरम हो जाए तो उसके हृदय से कठोरता अथवा निर्दयता के भाव तिरोहित हो जाते हैं और वह मोम की तरह कोमल बन जाता है। वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेता है। वह हर व्यक्ति का प्रिय बन जाता है और फिर किसी के लिए भी पराया नहीं रह जाता।

          इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने स्वार्थ को महत्त्व देते हैं, थोड़े समय पश्चात उनका असली  चेहरा सबके सामने आ जाता है। लोग उनसे शीघ्र किनारा कर लेते हैं। उन्हें पराया बनाने में वे समय नष्ट नहीं करते। अपनी इन्हीं गलतियों से मनुष्य दूसरों से कटकर अकेला हो जाता है। जहाँ तक हित साधने की बात है, वह तो स्वयं ही हो जाता है। इसके लिए छल-फरेब का सहारा लेने की कदापि आवश्यकता नहीं होती।

          कठोर मिट्टी पर हल चलाकर किसान उसे नरम बना देता है। तब वह खेत बन जाती है और उसमें विभिन्न प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। ये अनाज सभी जीवों का पेट भरते हैं। यही धरती की विशेषता है कि उसे हम सबकी चिन्ता रहती है। यदि वह स्वार्थी हो जाए तब उसके लिए अपनी जान गंवा देने हेतु कोई भी रणबाँकुरा आगे नहीं आएगा। उस समय इस जीव जगत में चहुॅं ओर त्राहि-त्राहि मच जाएगी।

          गेहूँ को पीसकर जब नरम आटा बना लिया जाता है तब उसमें पानी मिलाकर ही रोटी बनाई जाती है। जो सभी जीवों को पुष्ट करती है। यानी सारी प्रकृति 'स्व' से परे रहकर 'पर' को महत्त्व देती है। तभी हम जीवों का अस्तित्व इस धरा पर सुरक्षित रहता है। 

            दूध में शक्कर की तरह घुलमिल जाने और आटे में नमक की तरह एकरूप होकर दूसरों को सुख देने वाले विनयशील व्यक्ति ही वास्तव में अपनी पहचान बनाए रखते हुए भी सबके अपने बनते हैं। यही उनका सबसे बड़ा गुण होता है, इन गुणों को अपनाने में कभी भी परहेज नहीं करना चाहिए।

           विनम्रता सफलता की गारण्टी है क्योंकि यह संघर्षों को सुलझाती है और लोगों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध बनाती है। यह हमारे चरित्र को निखारती है और अहंकार को गलाकर व्यक्तित्व को महान बनाती है। अपने अहं को किनारे करके ही दूसरों के हृदय में अपना स्थान बनाया जा सकता है। स्वार्थ के वायरस को भी नगण्य करते हुए एक-दूसरे के दिल में घर बनाया जा सकता है। इन छोटी-छोटी बातों को यदि अपने ध्यान में खा जाए तभी किसी के दिल में सरलता से अपना स्थान बनाया जा सकता है।

चन्द्र प्रभा सूद 


सोमवार, 27 अप्रैल 2026

जब शब्द साथ नहीं दें

जब शब्द साथ नहीं दें

बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य बहुत कुछ कहना चाहता है परन्तु उसके अपने शब्द ही उसका साथ नहीं देते। वह अपने भावों को शब्दों में ढालना चाहता है पर असफल हो जाता है। इसलिए वह बस मूक बनकर एकटक ताकता रह जाता है अथवा फिर पैर के नाखूनों से धरती को खोदने लग जाता है। यदा कदा वह दूसरों से नजरें भी चुराने लगता है। उस समय उसका मौन अथवा उसके अश्रु उसकी मुखर भाषा बन जाते हैं।
          मनुष्य जब बहुत अधिक भावुक होता है तब वह बोल नहीं पाता। सहज होने पर ही वह अपनी बात बता सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक कष्ट के समय भी मनुष्य के बोल उसका साथ छोड़ देते हैं। अधिक प्रसन्नता के आवेग में, भय या विस्मय की स्थिति में, पश्चाताप होनेआदि के समय भी उसकी आवाज नहीं निकल पाती। उसके चेहरे के भावों से उसके हृदय को पढ़ा जा सकता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य का चेहरा ही उसका आईना कहलाता है जो उसके सभी प्रकार के मनोगत भावों को बिना कहे प्रकट कर देता है।
          इन सबके अतिरिक्त कई बार दूसरों के प्रति सम्मान भाव के कारण भी मनुष्य चाहते हुए भी प्रतिकार स्वरूप नहीं बोल पाता कि उसे अमुक बात पसन्द नहीं आई। कभी-कभी अपने प्रियजन को परेशानी न हो सोचकर भी मनुष्य चुप्पी लगा जाता है। चुप की भी अपनी एक आवाज होती है जो बिना कुछ बोले दूसरे के हृदय को चीर कर रख देती है। मनुष्य के हावभाव से उसका हर्षोल्लास झलकता है जो हर किसी को दिखाई देता है। 
          ऐसा भी कहा जाता है कि घमण्डी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उसके बिना कुछ कहे ही उसके व्यवहार से ही सब ज्ञात हो जाता है। मौन रहते हुए मनुष्य की सफलता-असफलता उसके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं। अहंकार में चूर रहने वाले व्यक्ति के सामने कोई मनुष्य नहीं पड़ना चाहता। तब वह धीरे-धीरे अकेला हो जाता है। जब उसे किसी की आवश्यकता होती है तो वह अपने विचारों को स्पष्ट करने में असमर्थ हो जाता है। इसका कारण निश्चित ही पूर्व में किया गया उसका व्यवहार होता है।
            पैसे के लिए यह उचित प्रसिद्ध है कि वह बोलता है। पर पैसा तो निर्जीव है, वह बोल नहीं सकता। परन्तु इसका यही अर्थ है कि जब किसी भी स्त्रोत से पैसा मनुष्य के पास अधिकता से आता है तब उसकी सद्य: खरीदी जाने वाली सुविधाएँ उसके पास पैसा होने के रहस्य की पोल खोल देती हैं। यहाँ पर भी वाणी के व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। उसके हाव-भाव ही उसकी चुगली कर देते हैं।
            बिना शब्दों का उच्चारण किए भी मनुष्य अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ हो सकता है। यहाँ मैं याद दिलाना चाहती हूँ कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म पाकर भी जब दुर्भाग्यवश मनुष्य को ईश्वर की ओर से वाणी का उपहार नहीं मिलता तब वह गूँगा कहलाता है। वह अपने विचारों को बोलकर प्रकट नहीं कर सकता परन्तु उसके व्यवहार से अथवा चेहरे के भावों से या हाथ के इशारों से ही उसके घर-परिवार के लोग अथवा बन्धु-बान्धव उसके सारे भावों को सहजता से समझ लेते हैं।
             हम अपने घर में मूक पालतू पशुओं को रखते हैं। वे तो हमारी तरह बोल नहीं सकते पर अपने स्पर्श से, अपने हावभाव से मौन रहते हुए अपने प्यार, क्रोध या जिद आदि भावों को बखूबी समझा देते हैं। इसी प्रकार अपनी भूख-प्यास आदि दैनिक आवश्यकताओं के बारे में भी वे अच्छी तरह अवगत करवा देते हैं।
             एक छोटा बच्चा जो बोल नहीं सकता, वह भी अपनी माता को अपनी सब समस्याओं के विषय में समझा‌ देता है। उसके रोने के तरीके से मॉं समझ लेती है कि अब बच्चे को भूख लगी है, अब उसने सू सू कर लिया है या पोटी कर ली है। वह बिमार‌ है अथवा उसे कोई शारीरिक कष्ट है। इस प्रकार माता अपने बच्चे की सारी बातों को उसके बोले बिना जान-समझ लेती है। यहॉं‌ पर शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
           इन्सान जितने भी घण्टे-घड़ियाल बजा ले पर ईश्वर उसे नहीं मिलता। वह तो उसके शुद्ध और पवित्र मन-मन्दिर में ही मिलता है। मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भाव में रहता है। कहते हैं जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही हम उस प्रभु का वर्णन नहीं कर सकते। उसका चित्रण करते समय हमारी वाणी मौन रह जाती है। हमारे शास्त्र 'नैति नैति' कहते है। अर्थात् ईश्वर यह भी नहीं है, वह भी नहीं है।
          चारों ओर पसरा सन्नाटा मनुष्य की कहानी बिनकहे सुना देता है। किसी सज्जन के प्रति किए गए अभद्र व्यवहार की क्षमा न माँगने पर भी उसके अविरल बहते आँसू उसकी क्षमायाचना का कारण बन जाते हैं। मौन रहते हुए भी माता-पिता बच्चों को बहुत-सा व्यावहारिक ज्ञान दे देते हैं। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि सारा समय हो-हल्ला करके ही अपनी बात रखी जाए या सान्त्वना दी जाए। मौन रहकर समझाई गई बात भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उसकी मारक शक्ति अधिक होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 अप्रैल 2026

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

अपनापन कम होने से क्रोध बढ़ता

आजकल लोगों में अपनापन कम होने लगा है। हर रिश्ते से लोग दूरी बनाने लगे हैं। अपनेपन में आने वाली यह दूरी मनुष्य के क्रोध को बढ़ाने का कार्य करने लगी है। भौतिक युग में जहाँ मनुष्य जीवन के बाकी सारे मायने बदलते जा‌ रहे हैं, वहाँ इसके साम्राज्य का भी विस्तार होने लगा है। कोई मनुष्य अपने जीवन की रेस में पिछड़ना नहीं चाहता, वह सदा अग्रणी बने रहना चाहता है। शायद यही कारण है कि उसे अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और फिर उसे अनावश्यक ही बात-बेबात पर क्रोध आने लगता है।
            वैस यह क्रोध मनुष्य का ऐसा शत्रु है जो उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। राहू ग्रह की तरह उसके विवेक को ग्रसकर ग्रहण लगा देता है। उसे अपने बन्धु-बान्धवों से दूर कर देने में यह अहं भूमिका निभाता है। इस क्रोध का कोई सानी नहीं है क्योंकि यह हमारी सोच से भी अधिक चालबाज या चतुर होता है। इसे अच्छी तरह पता है कि कहाँ अपना जोर आजमाना है और किस के सामने खून के घूँट पीकर चुप लगा जाना है। किसी भी क्षेत्र में अपने से अधिक बलशाली व्यक्ति के सामने यह मिमियाने लगता है।
            यह क्रोध अक्सर कमजोर पर ही निकलता है क्योंकि केवल उन असहाय दुर्बलों पर ही हमारा वश चलता है। हम अपनी कामवाली बाई, सब्जी वाला, धोबी, माली आदि पर ही अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं अथवा बहस कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए एक गाड़ी वाला अपने से बड़ी गाड़ी वाले से हाथ जोड़कर माफी माँग लेता है, परन्तु आटो वाले, रिक्शा चालक, साईकिल सवार अथवा पैदल चलने वालों पर ही वह अपना गुस्सा निकालने का यत्न करता हैं। 
            किसी पहलवान या गैंगस्टर के सामने तो सबकी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाती है। कार्यालय में अपने बॉस के सामने पैर पटकने की हिम्मत कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। पता होता है कि यदि वहाँ क्रोध दिखाया तो नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाएगा। तब घर-परिवार का खर्च चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए वहॉं अपमान सहन कर भी वह चुप्पी साध लेता है।‌ सभी लोग अपने अधीनस्थों पर ही क्रोध कर सकते हैं बस। उन पर क्रोध करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
            इस तरह हम देखते हैं कि यह क्रोध कैसे-कैसे गुल खिलाता है। यह मनुष्य के अन्तस् में छुपी हुई कमजोरियों को सबके सामने उजागर कर देता है। इन्सान को पता भी नहीं चलता और यह क्रोध अपनी चाल चल देता है। उसे अहंकारी होने का मेडल दिला‌ देता है। लोग ऐसे व्यक्ति के सामने नहीं पड़ना चाहते। उसे दूर से देखकर वे किनारा कर लेते हैं। अपने इस क्रोध रूपी शत्रु के कारण धीरे-धीरे वह अकेला रह जाता है।
            प्रकृति को हम इन्सान अपने स्वार्थ के लिए बहुत अधिक हानि पहुँचाते हैं। नदियों के जल में कचरा और फेक्ट्रियों की गन्दगी डालकर उन्हें दूषित करते हैं। पेड़ों को काटते हैं, वायु प्रदूषित करते हैं। इस कारण वर्षा पर प्रभाव पड़ता है। मौसम चक्र में परिवर्तन होने लगता है। वातावरण को हम गाड़ियों के धुऍं से दूषित करते हैं। जब यह प्रकृति हम लोगों पर क्रोध करती है तो इस धरती पर विनाश हो जाता है। हम सब परेशान हो जाते हैं, उससे उभरने के लिए उपाय सोचते हैं।
           नदियों में बाढ़ आने से लोगों और पशुओं की मृत्यु हो जाती है, बड़े-बड़े भवन तक टूट जाते हैं और फसल नष्ट हो जाती है। जब सुनामी जैसी आपदाएँ आती है तो दूर-दूर तक विनाश हो जाता है। भूकम्प आ जाने पर भी जान-माल की बहुत हानि होती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और ओलावृष्टि सभी धरती पर कहर बरसाती हैं। हमारे दोष के कारण पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचने लगता है। ये सभी प्रकृतिक आपदाएँ हमारी मूर्खता का परिणाम हैं। जब-जब हम सब लापरवाह हो जाते हैं तब-तब ये सब तो झेलना ही पड़ता है। इससे बचना असम्भव हो जाता है।
            अग्नि हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। जब वह तैश में आती है तो सारे भेदभाव भूलकर महलों और झोंपड़ियों सबको समान रूप से खाक में मिला देती है। शहरों और जंगलों को राख के ढेर में बदल देती है। लोहे जैसी कठोर धातु को भी पिघला देती है। उस समय वह किसी के प्रति सहानुभूति नहीं रखती। सब लोगों को उसका प्रकोप झेलना पड़ता है।
            इसी प्रकार पशुओं को जब क्रोध आता है तो वे भी किसी का लिहाज नहीं करते। पलटकर वार कर देते हैं। चाहे वह साँप हो, कुत्ता हो, हाथी हो अथवा कोई अन्य पशु। हम समझ सकते हैं कि क्रोध चाहे मनुष्य का हो, पशु-पक्षी का हो अथवा प्रकृति का हो सदैव विनाशकारी होता है। इसका दुष्परिणाम किसी एक मनुष्य को नहीं अपितु बहुतों को भुगतना पड़ता है।
      ‌      इस नामुराद क्रोध को शान्त करने की महती आवश्यकता होती है। इसके लिए गहरी सांस लेनी चाहिए। हो सके तो 10 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हट जाना चाहिए।मौन रहना चाहिए, ध्यान लगाना चाहिए और अपनी पसन्द का संगीत सुनना गुस्से को नियन्त्रित करने में सहायक होता है। इनके अतिरिक्त सकारात्मक सोच और नियमित दिनचर्या से भी क्रोध पर काबू पाया जा सकता है। ईश्वर की उपासना करनी चाहिए और सद् ग्रन्थों का वाचन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

सामर्थ्य अनुसार बोझ उठाना

मनुष्य को अपने सिर पर बहुत अधिक बोझ नहीं उठाना चाहिए। उसे अपनी पीठ पर मात्र उतना ही बोझ लादकर चलना चाहिए जितना वह आराम से उठा सकता हो। फिर वह बोझ चाहे उसके रिश्तों का हो अथवा किसी सामान का। इसके अतिरिक्त चाहे वह बोझ उसके अभिमान का ही क्यों न हो। देखा जाता है कि अपनी सामर्थ्य से अधिक बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य इस ससार में अक्सर डूब जाता है। 
               बोझ ढोने का अर्थ भारी सामान या वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लादकर ले जाना या उठाना होता है। इसके अतिरिक्त  जिम्मेदारियों, कठिनाइयों या मानसिक तनाव को सहन करने को भी कहते हैं। जीवन में समस्याओं का बोझ उठाना पड़ता है। परिवार या काम का दायित्व सम्भालने को भी हम उसका बोझ कह सकते हैं। मनुष्य को अपनी की गई गलतियों का बोझ दुःख अथवा‌ परिणाम सहने के रूप में  ढोना पड़ता है।
             रिश्तों की अहमियत हम सब लोग जानते हैं परन्तु जब ये रिश्ते मनुष्य के लिए बोझ बन जाएँ तो उनसे दूरी बनाना ही उचित होता है। वैसे तो सभी रिश्ते बहुत ही नाजुक और महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको सदा सहृदयता और सद् भावना से ही निभाना चाहिए। उनमें टकराव की स्थिति कभी उत्पन्न न होने पाए, इससे बचने का यथासम्भव प्रयास मनुष्य को करना चाहिए। 
             यदि उन रिश्तों मे आपसी भाईचारा तथा विश्वास समाप्त हो जाए तो वे भार की तरह हो जाते हैं। एकतरफा रिश्ता लम्बे समय तक हाथ थामकर साथ नहीं चल पाता। ऐसे रिश्ते जो जीवन में नासूर बनकर कष्टदायी बन जाते हैं, उनके लिए अपने मन की शान्ति भंग नहीं करनी चाहिए। उन्हें छोड़ देना ही श्रेयस्कर होता है। 
             यात्रा के लिए जब कभी जाना हो तो यत्न यही करना चाहिए कि सीमित सामान ही लेकर जाया जाए। कम सामान होने पर उसे सम्हालना अधिक सुविधाजनक होता है। यदि बहुत सारा आवश्यक अथवा अनावश्यक  सामान लेकर चला जाएगा तो फिर बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सामान की रखवाली करने के कारण मनुष्य के घूमने-फिरने का आनन्द कम हो जाता है।
             मनुष्य पर उसके घमण्ड का बोझ बहुत अधिक होता है। वह अपने अहं में अन्धा होकर अच्छे और बुरे का विवेक खो बैठता है। अहंकार का नशा जब सिर पर चढ़कर नाचने लगता है तब मनुष्य स्वयं को भगवान से कम नहीं समझता। वह इतराता फिरता है। मद में चूर वह आकाश में उड़ता फिरता है। उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उस समय वह दुनिया को आग लगा देने की बातें करने लगता है।
             एक दृष्टान्त पढ़ा था।‌ उसमें बताया गया था कि एक धोबी के पास एक गधा और एक घोड़ा था। धोबी घोड़े से बहुत प्यार करता था और खूब देखभाल करता था। गधे पर वह सारा सामान लादता रहता था। घोड़ा गधे की दुर्दशा पर उसका मजाक बनाता था। उसने गधे को समझाया कि जब उसका काम करने का मन नहीं करता तो वह बहाना बना लेता है। तब मालिक परेशान हो जाता है तब फिर उसकी बहुत देखभाल करता है।
             गधा अपने ऊपर लादे जाने वाले बोझ से बहुत व्यथित रहता था। मालिक भी ऐसा था जो दिन-प्रतिदिन बिना सोचे-समझे उसका भार बढ़ाता रहता था। वह दिन भर बोझ उठाते-उठाते उदास रहने लगा था। वह भी घोड़े की तरह कभी आराम करना चाहता था। एक दिन उसने सोचा कि वह अपने मालिक को सबक सिखाएगा। शाम को जब धुले हुए सूखे कपड़े लेकर आ रहा था तो रास्ते में नदी पार करते समय उसने नदी में गिरने का नाटक किया। 
            उसके ऊपर लदे हुए वे सारे कपड़े भीग गए और उनका भार बहुत अधिक हो गया। वे भारी कपड़े घर तक ले जाने में उसकी कमर टूटने लगी। उसके मालिक को उस पर जरा-सा भी तरस नहीं आया। उसे ऊपर से अपने मालिक की मार भी खानी पड़ गई।
              अब विचार यह करना है कि यह गधा केवल कोई धोबी का गधा है। नहीं, यह केवल धोबी का गधा नहीं है। हम मनुष्य भी जीवन भर रिश्तों और अपने अहं का बोझ अपने सीने पर ही ढोते रहते हैं और दूर से देखती हुई नियति हम पर हँसती रहती है। 
          मोहमाया के बन्धनों में जकड़े हुए हम मनुष्य चाहकर भी इस बोझ को उतारकर नहीं फैंक पाते। सड़े और नासूर बन रहे इन बन्धनों से मुक्त होने का सार्थक प्रयास करना चाहिए। इसलिए बोझ कैसा भी हो, उसे सिर से उतारकर फैंकने से ही हम सुख की साँस लेकर चैन की बाँसुरी बजा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

डर केवल एक भाव

डर केवल एक भाव

डर क्या होता है यानी कि कुछ भी नहीं होता। यह केवल मन का एक भाव होता है। परन्तु यह व्यक्ति विशेष के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है। उसे सुख और आराम से नहीं रहने देता। उसके दिन-रात के चैन को लील जाता है। मनुष्य हर समय बदहवास-सा रहने लगता है। वास्तव में अक्सर मन में डर का कारण गलत धारणाऍं होती हैं। यह डर मनुष्य को कहीं बाहर से नहीं मिलता अपितु उसके अपने अन्तस् में होता है। मनुष्य को अनावश्यक रूप से नहीं डरना चाहिए।
            डर लगने का मुख्य कारण मस्तिष्क में खतरे की पहचान और शारीरिक प्रतिक्रिया है जो मनुष्य को सम्भावित नुकसान से बचाने के लिए विकसित होती है। यह आघात सीखी हुई प्रतिक्रियाओं, अनिश्चितता अथवा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन और सांस तेज हो जाती है। डर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो सुरक्षा के लिए होती है परन्तु इसकी अति हो जाने पर यह मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकती है।
             इन्सान को अपने डर पर नियन्त्रण रखना चाहिए। यह डर उसके मन में कुण्डली मारकर पसरा रहता है। इस नाग से छुटकारा पाना इन्सान के लिए अति आवश्यक होता है। मनुष्य अपना सारा जीवन किसी-न-किसी कारण से डर-डरकर व्यतीत करता है। कभी धर्म के नाम पर डरता है तो कभी समाज से डरता रहता है। कभी वह अन्धेरे की घुटन से त्रस्त रहता है तो कभी उजाले से। बचपन में माँ से दूर होने का डर होता है। फिर गृहकार्य न करके स्कूल में जाकर मिलने वाली डाँट का भय रहता है। कभी परीक्षा में अपेक्षानुसार अंक न आने का भय उसे व्याकुल कर देता है।
            बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक होने वाली असफलताओं का भय उसे जीने नहीं देता। जीवन में आने वाली परीक्षाओं में सफलता पाना उसका ध्येय होता है। इसलिए उसके मन में डर का घर कर जाना स्वाभाविक है कि अगर किसी कारण से चूक गए तो क्या होगा?
             कभी मनुष्य को अपनी सफेदपोशी को बचाए रखने के लिए परेशानी रहती है। कभी-कभी न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ और कभी इनकम टैक्स, सेल टैक्स आदि उसे भयभीत करते हैं। कभी कार्यालय में की गई किसी गलती के कारण बास या साथियों का डर उसे बेचैन कर देता है। कभी-कभी घर-परिवार के दायित्वों को ठीक से न निभा पाने पर होने वाला विस्फोट उसे भयभीत कर देता है।
            किसी को पानी से, किसी को ऊँचाई से और किसी को आग से डर लगता है। किसी-किसी को तथाकथित भूत-प्रेतों का भय सताता है। और भी न जाने क्या क्या अनजाने डर उसे घेरकर उसके व्यक्तित्व को ग्रसने का कार्य करते हैं। उस समय वह थरथर काँपने लगता है। इस भय की अधिकता होने पर मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन तक खो देता है। किसी को कुछ कीड़ों से डर लगता है।
             विचारणीय है कि घर-परिवार, देश, धर्म और समाज सबके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व होता है। उनके पालन में जहाँ भी चूक होती है, वहीं एक अनजाना-सा डर उसे सताने लगता है। 'लोग क्या कहेंगे' की यह चिन्ता उसके मन को निरन्तर व्यथित करने लगती है। यदि कभी मनुष्य से गलती हो जाए तो निस्सन्देह उसे डरना चाहिए। किन्तु उसके अलावा उसे कभी भी किसी से भी डरना नहीं चाहिए। 
            मनुष्य को अपनी की गई गलती का मन से प्रायश्चित करना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि वह गलती दुबारा न दोहराई जाए। मनुष्य अपनी जिन्दगी का मालिक स्वयं होता है। यदि मनुष्य अपनी गलती से सबक सीखकर आगे बढ़ता है तो उस जैसा कोई और इन्सान नहीं हो सकता।यदि मनुष्य सही तरीके से नियमानुसार कार्य करते हुए आगे बढ़ रहा हो तो कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वह अपने सही रास्ते पर चलता रहे तो उसे किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती, दूसरे उसका सामना करने से घबराते हैं।
            जिस बात से डर लगता है, उससे भागने के बजाय उसका सामना करना चाहिए। जब मनुष्य डर का सामना करता है तो वह धीरे-धीरे कम हो जाता है।इस बात पर विचार करना‌ चाहिए कि क्या उसका डर वास्तव में तर्कसंगत है? डर लगने पर गहरी सांस लेनी शारीरिक व्यायाम (योगा) भी डर व घबराहट को कम करने में मददगार हैं। चाहिए, इससे शरीर को शान्त करने में सहायता मिलती है। मेडिटेशन (ध्यान) के जरिए मन को शान्त रखना चाहिए। नियमित मेडिटेशन मन को शान्त करती है और डर को नियन्त्रित करने में बहुत सहायता करता है। स्वयं को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए ताकि नकारात्मक विचार मन में न आ सकें। ईश्वर अथवा किसी मार्गदर्शक में विश्वास रखने‌ से मन मजबूत होता है। शारीरिक व्यायाम यानी योग भी डर और घबराहट को कम करने में सहायक सिद्ध होता है।
          इनके अतिरिक्त अपने डर पर काबू पाने के लिए मनुष्य को ईश्वर से सहायता की गुहार लगानी चाहिए। शौर्य सम्पन्न महपुरुषों की जीवन गथाएँ पढ़कर प्रेरणा लेनी चाहिए। ऐसे लोगो का साथ करना चाहिए जो सकारात्मक हों और उसे अनजाने डर से बाहर निकलने में सहायता कर सकें। सबसे बढ़कर उसे यह मानकर चलना चाहिए कि डर के आगे जीत है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती

मनुष्य यदि सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है तो वह कभी व्यर्थ नहीं होती। वह उस ईश्वर तक पहुँच ही जाती है और वह भी ऐसे व्यक्ति को अपनी शरण में ले लेता है। उसके दुखों को दूर करके उसे कुन्दन बना देता है। ईश्वर को मनुष्य की भौतिक पद प्रतिष्ठा से कोई अन्तर नहीं पड़ता। उसे तो बस मनुष्य के हृदयगत भावों की आवश्यकता होती है। वह प्रभु मनुष्य के भाव में ही अपना बसेरा बनाना पसन्द करता है। निम्न श्लोक इसी बात पर प्रकाश डाल रहा है -
       न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
    भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥  
अर्थात् न ही लकड़ी या पत्थर की मूर्ति में , न ही मिट्टी में देवता का निवास होता है। देवता का निवास तो भाव यानी हृदय में होता है। अतः भाव ही सर्वोपरि कारण है। यानी हृदय में ही देवता का निवास होता है।
               इस भौतिक संसार में एक बच्चा जब अपनी माता को करुणा से रोते हुए पुकारता है तो उसकी माँ उसे अपने आँचल में छुपा लेती है। उसे हर तरह से सान्त्वना देती है, उसके कष्ट का निवारण करती है। उसी प्रकार वह जगत जननी भी अपने बच्चों करुण पुकार सुनकर द्रवित हो जाती है और फिर झट से उन्हें सहारा देकर कृतार्थ करती है। उस जगज्जननी मॉं पर पूर्ण विश्वास करना चाहिए। स्वयं को उसे सच्चे मन से सौंपने पर वह कभी मनुष्य को निराश नहीं करती। बस हम लोग ही उस पर भरोसा नहीं कर पाते।
            यदि मनुष्य की प्रार्थना मात्र आडम्बर हो तो उसका कोई औचित्य नहीं होता। तब वह बस व्यर्थ होकर रह जाती है। उस व्यक्ति को उसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाता। सच्चे मन से ईश्वर की अराधना करने वाले को कभी‌ हताशा का मुॅंह नहीं देखना पड़ता। सुख का समय हो अथवा दुःख का, ईश्वर हर परिस्थिति में अपने भक्त की सुरक्षा करता है। कभी उसे अकेला नहीं रहने देता। हर कदम पर उसके साथ होता है। हम मनुष्य प्रभु की इस कृपा को समझ नहीं पाते।
             बहुत से लोग इस संसार में ऐसे भी होते हैं जो केवल मात्र दूसरों को दिखाने के लिए ही पूजा-अर्चना करते हैं, उनके मन में कोई भाव नहीं होते। ऐसे लोग जो बरसों बरस प्रदर्शन करते रहते हैं, उनका बस यही उद्देश्य होता है कि  लोग उन्हें सबसे बड़ा भक्त मानें। बताइए जब स्वयं पर ही उस प्रार्थना का प्रभाव नहीं हो रहा तो उस ईश्वर के पास भी तो वह नहीं पहुँच सकेगी।
           अब यहाँ मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है। ईश्वर को कभी आडम्बर वाली भक्ति नहीं चाहिए। उसे तो श्रद्धा से ओतप्रोत स्तुति चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की उपासना आत्मोन्नति के लिए करता है तो उसके पास अणिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियाँ स्वयं ही आ जाती हैं। उसके उपरान्त मनुष्य को वहीं रुकना नहीं चाहिए अपितु और अधिक प्रयास में जुट जाना चाहिए। यदि वह उन पर ध्यान केन्द्रित करेगा तो उसकी उन्नति वहीं रुकना जाती है।
             उसका हृदय शुद्ध, पवित्र और निर्मल हो जाता है। उसके मनोविकार स्वत: ही दूर होने लगते हैं। तब मनुष्य एक साधारण मानव न रहकर एक महामानव बन जाता है। उसके मुख से निकला हुआ हर शब्द पत्थर पर पड़ी लकीर की तरह सच होने लगता है। उसका बोला हुआ हर वाक्य सारगर्भित होता है। उसके चेहरे का दिव्य तेज देखते ही बनता है। उसके आभामण्डल या औरा से निकलने वाली सात्विक किरणें किसी भी व्यक्ति को प्रभावित करने में सक्षम होती हैं।
             इनके पास आने वालों को इनकी सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित करती है। इनकी वाणी में एक ओज होता है जिससे कुमार्गगामी लोग भी भयभीत होते हैं। इन लोगों का तेज ही इतना अधिक होता है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक इनसे घबराते हैं। शरीरिक बल न होने पर भी मानसिक और आत्मिक बल के कारण ये किसी का भी सामना कर सकते हैं। कैसा भी कार्य क्यों न हो, कर गुजरते हैं। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर इन महापुरुषों के विषय में बहुत कुछ पढ़ने और जानने के लिए मिल जाएगा।
             हम देखते हैं कि बादल इस पृथ्वी से जल लेते हैं और उसे वापिस इस धरा को लौटा देते हैं। आकाश से बादलों के द्वारा गिरा हुआ जल किसी-न-किसी रास्ते से होकर अपने लक्ष्य समुद्र तक पहुँच ही जाता है। उसी प्रकार नि:स्वार्थ भाव से ईश्वर की गई प्रार्थना भी किसी-न-किसी प्रकार से उस प्रभु तक पहुँच ही जाती है। कहते हैं ईश्वर को चाहे छप्पन व्यंजनों का भी भोग लगा लो तो वे सब व्यर्थ हो जाते हैं, यदि ईश्वर को पाने की मन में ललक न हो। 
           ईश्वर ने दुनिया की सब नेमते हमें दी हैं। हमारी क्या सामर्थ्य कि हम उसे कुछ भेंट में दे सकें? हम लोग तो बस उसे रिश्वत देकर रिझाने का यत्न करते हैं। यह तो मनुष्य की भावना नहीं कहलाती। इसे हम सौदा करना ही कह सकते हैं। संक्षेप में ईश्वर मनुष्य के मन के भाव में रहता है, ये भाव ही उस तक पहुँचने का कारण हैं, माध्यम हैं। इसलिए अपने मन में उसे पाने की उत्कट भावना रखते हुए उसका स्मरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

कुविचारों का कचरा निकाल फैंकें

अपने अन्त:करण में विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, लालच, अहंकार आदि के कूड़े को मनुष्य सम्हालकर रखता रहता है। कुछ समय पश्चात कचरा बने हुए ये सभी दूषित भाव धीरे-धीरे सड़कर बदबू देने लगते हैं। पिष्टपेषण किए गए वे विचार मनुष्य के मन-मस्तिष्क को और अधिक प्रभावित करने लगते हैं। उस समय अपने अहं के कारण जब मनुष्य विश्लेषण करने लगता है तो उसका अपने परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर से विश्वास उठने लगता है।
           उन कुविचारों पर बार-बार मन्थन करने पर उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में सभी उससे जलते हैं, कोई भी उसे तरक्की करते हुए नहीं देखना चाहता। सभी लोग उसका फायदा उठाना चाहते हैं पर उससे उन्हें कोई लगाव नहीं है। सब लोग उसके साथ स्वार्थवश जुड़े हुए हैं। वह इससे परे कुछ सोचना ही नहीं चाहता। उसकी प्रवृत्ति जब नकारात्मक होने‌ लगती है तब उसकी सोच का दायरा संकुचित होने लगता है। उस समय वह कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता।
              सदा ही इस प्रकार सोच-विचार करते रहने वाले व्यक्ति धीरे-धीरे समय बीतते नकारात्मक दृष्टिकोण वाले बन जाते हैं। उन्हें हर मनुष्य में खोट ही नजर आने लगता है चाहे वह उनका प्रिय ही क्यों न हो। वे हर व्यक्ति को वे सन्देहभरी नजरों से देखते हैं। वे इस बात का दावा करते हैं कि लोग उन्हें समझते ही नहीं है। उन लोगों की बुद्धि ही ऐसी है जो उन्हें उनकी अच्छाई दिखाई नहीं देती। अपने अन्तस में झॉंककर देखने के स्थान पर वे सबमें खोट निकालने का कार्य करते हैं।
             उन्हें हर समय यही लगता है कि एक वे ही हैं जो दुनिया बदल देने की सामर्थ्य रखते हैं और उनके आसपास रहने वाले बाकी सभी लोग मूर्ख हैं। उनकी सोच संकुचित है। वे हर अच्छी चर्चा को अपने नकारात्मक विचारों से बर्बाद करके सबकी आलोचना का शिकार बन जाते हैं। निराश होकर बाद में वे यही शिकायत करते हैं कि उनकी बात को कोई सुनकर लाभ ही नहीं उठाना चाहता और एक दिन वे सब अपनी इस गलती के लिए पश्चाताप करेंगे। तब उन्हें समझ आएगा।
              मोह-माया के बन्धन में जकड़ा हुआ मनुष्य इनसे अपना पल्लू नहीं झाड़ पाता। न चाहते हुए भी अज्ञानतावश बार-बार इनके जाल में फँस जाता है। इसलिए वह केवल अपनों के लिए सब सुख-सुविधाएँ जुटाता है और दूसरे सभी लोगों को अनदेखा करने लगता है। जैसे अन्धा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे, उसी प्रकार अपनों के मोह में फंसे मनुष्य भी बारबार जाने-अनजाने सब गलत-सही काम करने से परहेज नहीं करते। बाद में परेशान होते हैं और पश्चाताप करते हैं।
              इसी प्रकार क्रोध करते हुए ऐसे लोग अपना विवेक दाँव पर लगा देते हैं। वे किसी ऐसे मनुष्य से दोस्ती नहीं करना चाहते जो अनावश्यक ही क्रोध करके अपने सामने वाले का अपमान करे अथवा दूसरों से अलग होता जाए।
             जिस प्रकार अपने घर के अन्दर जमा हुए कूड़े-कचरे को फैंकने के लिए उसका विज्ञापन अखबार आदि में नहीं किया जाता बल्कि चुपचाप प्रसन्नतापूर्वक बाहर जाकर कूड़दान में फैंक दिया जाता है। उसी प्रकार अपने अन्तस् में विद्यमान कुत्सित भावरूपी कचरे को निकालकर फैंकने के लिए भी ढिंढोरा नहीं पीटा जाता या विज्ञापित नहीं किया जाता। इन विचारों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। न ही इन्हें अपने जीवन को नरक के तुल्य कष्टदायी बनाने देना चाहिए। इन्हें नियन्त्रित करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। 
            ईश्वर की शरण में जाने से और अपने सद् ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करने से मन में बसे हुए इन कुत्सित नकारात्मक विचारों को वश में किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपनी संगति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। यथासम्भव सज्जनों की संगति में रहने का प्रयास करना चाहिए। नकारात्मक विचारों से छुटकारा पाने के लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। यदि विचार बहुत अधिक परेशान कर रहे हों तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है। स्वयं को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास तो करना ही पड़ेगा। 
          नकारात्मक विचारों को मन से निकालना मानसिक शान्ति और स्वस्थ जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए नकारात्मक विचारों को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना चाहिए। उन्हें साक्षी भाव से देखना चाहिए और फिर धीरे-धीरे नकारात्मक विचारों को ध्यान तथा स्व-देखभाल‌ से बदलना चाहिए। खुद की आलोचना करने से बचना चाहिए। यदि विचार बार-बार आऍं तो धैर्य रखना चाहिए। धीरे-धीरे सकारात्मकता की ओर कदम बढ़ना चाहिए। मन को खाली न छोड़ें। अच्छी किताबें पढ़ें, सकारात्मक संगीत सुनें या आभारी रहने की आदत डालनी चाहिए।
           अपने मन को साधने के लिए प्रतिदिन आत्मचिन्तन करना चाहिए। रात को सोते समय कुछ वक्त निकालकर एक बार सारे दिन के कार्य व्यवहार पर नजर डालनी चाहिए। इससे अपनी अच्छाई-बुराई का भान हो जाता है। उससे सबक लेकर अच्छे कृत्यों को बढ़ाते जाना चाहिए और अपनी कमियों को यथासम्भव दूर करते रहना चाहिए। वास्तव में थोड़ा-सा प्रयत्न करने से व्यक्ति स्वयं ही समझदार मनुष्य बनकर सबका प्रिय हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

संविधान में महिलाऍं बराबर

संविधान में महिलाऍं बराबर

महिलाओं को मन्दिर में जाना चाहिए अथवा नहीं यह एक ज्वलन्त मुद्दा है। इस विषय पर कुछ वर्षों पूर्व ऐसी बहस प्राय: हर न्यूज चैनल पर आयोजित की जा गई थी। शेष अन्य विवादों की तरह इस समस्या का भी कोई समाधान नहीं निकला था। सभी विद्वान अपने-अपने विचार रख रहे थे, तीखी टीका-टिप्पणियाँ कर रहे थे परन्तु परिणाम वही रहा था यानी ढाक के तीन पात।
           7 मार्च 2016 को न्यूज24 पर शाम 7 बजे तीखी बहस में हो रही थी, उसी को देखते-सुनते हुए यह आलेख लिखने का मन बनाया था।
          आज यह ज्वलन्त प्रश्न एक मुद्दा बनता जा रहा है कि यदि पूजा करने के लिए महिलाओं को मन्दिर में जाने की अनुमति नहीं है तो पुरुषों को भी नहीं होनी चाहिए। इसका कारण है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यह कहना बिल्कुल गलत है कि पुरुष स्त्री से अधिक श्रेष्ठ है। हाँ, शारीरिक रूप से वह अधिक शक्तिशाली हो सकता है पर आज ज्ञान, विज्ञान, उद्योग, राजनीति आदि कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ महिलाएँ पुरुषों से कमतर सिद्ध हो रही हैं। 
            पुरुष को अपने जीवन में हर कदम पर स्त्री के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। जन्म लेने के लिए एक माता की जरूरत होती है और फिर एक बहन चाहिए होती है। बाद में पत्नि की आवश्यकता होती है जिसके काल कवलित हो जाने पर वह अपना घर अकेले नहीं चला सकता और अपने बच्चों को भी अकेले नहीं पाल-पोसकर बड़ा नहीं कर सकता। जबकि पति की मृत्यु के उपरान्त स्त्री को इन सब समस्याओं से दो-चार नहीं होना पड़ता। वह पुरुष के सहारे के बिना भी सभी दायित्वों को सरलता से निभा लेती है। 
             यदि हम बात करें वेदों की तो उनमें ऐसा कोई विधान किसी के लिए भी नहीं है कि वे मन्दिरों में नहीं जा सकते। वहाँ पर तो पूजा करने के लिए मन्दिरों की कल्पना ही नहीं की गई थी। वैसे वैदिक काल में स्त्रियों को पुरुषों से कम अधिकार नहीं दिए गए थे। वे हर क्षेत्र में अपनी पैठ रखती थीं। यह तो कुछ तथाकथित विद्वानों के पूर्वाग्रह युक्त दिमाग‌ की उपज है जिन्होंने नारी को पुरुषों से कमतर समझा। इस प्रकार धर्म और समाज को दोषमुक्त बनाने का अपराध किया।
              हमारे मनीषी समझाते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए किसी मन्दिर यानी धर्म स्थानों या तीर्थों में जाने, जंगलों में खोजने, तथाकथित गुरुओं अथवा तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के पास जाकर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसे पाना बहुत ही सरल होता है। वह तो मनुष्य के मन में ही रहता है और वहीं पर ही मिलता है। वह केवल मनुष्य के मन के भाव में रहता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि स्त्री घर में बैठकर ईश्वर की उपासना करे तो फिर यही नियम पुरुषों पर क्यों लागू नहीं होता? वह घर बैठकर साधना क्यों नहीं कर सकता?
              किसी-किसी क्षेत्र में आज महिलाएँ पुरुषों से भी आगे निकल गई हैं। उनके अधीनस्थ पुरुष कर्मचारी इस बात को पचा नहीं पाते कि उन्हें किसी महिला अधिकारी के अधीन कार्य करना पड़ रहा है। इक्कसवीं सदी में आज के युग में भी पुरुषों की मानसिकता यही है कि स्त्री उनके अँगूठे के नीचे दबकर रहे। उसे सिर उठाकर चलने का अधिकार वे नहीं देना चाहते। स्वयं  वे चाहे विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाएँ परन्तु यदि बहन या पत्नि किसी साथी पुरुष से बात भी कर ले तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, उसे खरी-खोटी सुनाई जाती है। 
             यदि वह पुरुष प्रधान समाज में अपना एक स्थान विशेष बनाने के लिए संघर्ष करना चाहती है तो उसके पैरों में बेड़ियाँ डालने का प्रयास किया जाता है। उसे कभी तो घर-परिवार का वास्ता दिया जाता है और फिर कभी परम्पराओं के नाम की दुहाई देकर उसके बढ़ते हुए कदमों को पलटने के लिए विवश किया जाता है। पुरुष अपने झूठे अहं के कारण अपना वर्चस्व त्यागकर स्त्री को कभी भी महत्त्वपूर्ण बनने नहीं देना चाहते।
             मन्दिर प्रवेश तो मात्र एक बहाना है।  इस बहाने पुरुष कुत्सित राजनैतिक चालें चल रहे हैं। टी वी पर होने वाली चर्चाओं में उन पर कटाक्ष भी किए जाते हैं। पुरुष आज अपनी पत्नी को धन कमाने का माध्यम तो बनाना चाहता है पर उसकी वैचारिक स्वतन्त्रता में बाधक बनता है। स्त्री यदि आगे बढ़ती है तो उस पर लाँछन लगाने से भी बाज नहीं आता। वह नहीं चाहता कि स्त्री उससे आगे बढ़ जाए। बहुत से पुरुष आज भी अपनी पत्नी की उन्नति में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आते।
             हमारा भारतीय संविधान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है। अपने इन अधिकारों को महिलाओं को निस्सन्देह आगे बढ़कर को प्राप्त करना चाहिए पर वहीं उन्हें अपने दायित्वों से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। नारी मुक्ति के नाम पर की जाने वाली उच्छ्रँखता असहनीय है। इससे बचने का हर सम्भव प्रयास हर महिला को करना चाहिए। इसके नाम पर परिवार को छोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कही जा सकती।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक निस्वार्थ सेवक

हितचिन्तक वह व्यक्ति होता है तो किसी दूसरे का कल्याण, सुख अथवा सफलता की कामना करता है। यह वह व्यक्ति है जो सबके हित या भलाई के विषय में सोचता है। हितचिन्तक को अंग्रेजी भाषा में Well W isher कहते हैं। वे सदा ही निस्वार्थ रहकर देश, धर्म और समाज की भलाई के विषय में सोचते हैं। इस नेक काम के लिए अपने घर-परिवार तक की परवाह न करते हुए वे अपने तन, मन और धन सबका उपयोग करते हैं। सबसे बढ़कर अपना अमूल्य समय भी जनहित में खर्च करते हैं। 
              जहाँ लोग अपने शारीरिक आराम को अधिक महत्त्व देते हैं और वे अपने शरीर को सजाने-संवारने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते। वे इसके सुखों में खोए रहते हैं। वहीं पर ये महानुभाव अपने सुख और आराम को तिलांजलि देकर दिन-रात जनहित के कार्य करते रहते हैं। इन लोगों का मानना है कि यह मानव शरीर ईश्वर ने अपने बनाए जीवों का ध्यान रखने के लिए दिया है। वे अपने नैतिक दायित्व को पूर्ण कर रहे हैं, किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहे।
            ये परोपकारी जीव अपने मन से भी सबका हित चाहते हैं। किसी का अहित करने के विषय में कभी सोच नहीं सकते। हर समय नित-नए ऐसे उपाय  सोचते रहते हैं जिनसे जन मानस की भलाई के कार्य किए जा सकें। दीन-दुखियों के जख्मों पर मलहम लगाने का कार्य करने के लिए वे सदा तत्पर रहते हैं। इसीलिए इनका मन बहुत ही खूबसूरत होता है, जिसमें किसी के प्रति घृणा, ईर्ष्या आदि का कोई स्थान नहीं होता। प्राणिमात्र की भलाई में जुटे रहना उनका एकमात्र लक्ष्य होता है।
            अपने अथक परिश्रम से अर्जित धन को परमार्थ के लिए खर्च करने से भी ये लोग नहीं हिचकिचाते। हम सभी जानते हैं कि धन के बिना मनुष्य इस संसार में एक कदम भी नहीं चल सकता। कहीं आने-जाने में भी धन का व्यय होता है और किसी की सहायता के लिए भी उसे दिया जाता है। ये निस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहते हैं। वे अपने धन का मोह पालते हुए कभी स्वार्थी नहीं बनते। बादलों की तरह जो भी इस समाज से लेते हैं उसे इसी धरती पर लोगों में बाँट देने में विश्वास रखते हैं। 
              हो सकता है कुछ स्वार्थी व मूर्ख लोग इसे धन का अपव्यय समझें पर वास्तव में ये महान लोग अपने धन का सदुपयोग करते हैं जिसे वे अज्ञ समझ नहीं सकते। तन, मन और धन से भी बढ़कर मूल्यवान समय होता है। जो इसका सदुपयोग करते हैं, सफल कहलाते हैं और इस समय को अपनी लापरवाही से व्यर्थ गंवाने वाले अपने जीवन में असफल रहते हैं। उचित समय पर ही मनुष्य को उसके कृत कर्मों का फल अथवा कुफल भी मिलता है, ऐसा मनीषी कहते हैं। ऐसे मूल्यवान समय को भी ये सज्जन दूसरों पर खुशी-खुशी खर्च कर देते हैं। 
          हितचिन्तक नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई, सेवा या कल्याण के लिए अपना समय, धन अथवा प्रतिभा समर्पित करते हैं। वे दूसरों के दुखों को दूर करने और बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या प्रतिफल के समाज को बेहतर बनाने की भावना से कार्य करते हैं। इसे 'देव वृत्ति' भी कहा जा सकता है, जो करुणा और उदारता से प्रेरित होती है। नदियॉं अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, वे अपना सब कुछ दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं। उसी प्रकार ये महान लोग भी बिना शिकन लाए अपना सर्वस्व देश, समाज और धर्म के लिए अर्पित कर देते हैं।
          वे समय का मूल्य समझते हैं और जानते हैं कि समय पर यदि किसी की सहायता न की जाए तो उसकी उपयोगिता नहीं रह जाती। यदि हल जुते तैयार खेत में वर्षा अपने ठीक समय पर न हो तो उस खेत की मिट्टी सूख जाती है। फिर उसके बाद कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न हो जाए पर उस सूखे खेत में फसल नहीं हो पाती बल्कि उस खेत के लिए वह व्यर्थ हो जाती है।
            ऐसे व्यक्तियों को हमेशा अधिक महत्त्व और मान-सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे दूसरों के लिए अपने जीवन के वो पल खर्च कर रहे होते हैं जो उन्हें कभी वापिस नहीं मिल सकते। कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता चाहे कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए। परोपकार करने वाले जन इस समय का वास्तव में निस्वार्थ रूप से सदुपयोग करते हैं।  इसीलिए इनका यश बिना किसी प्रयास के स्वयं ही चारों दिशाओं में फैल जाता है। इनकी कीर्ति इनके कहीं भी जाने से पहले पहुँच जाती है।
              सार रूप हम कह सकते हैं कि अपना स्वार्थ त्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए जीना ही वास्तव में हितचिन्तक होना कहलाता है। अपनी इच्छा से, अपने मानसिक सन्तोष के लिए अपने तन, मन, धन और समय का सत्कार्यों में उपयोग करने से मनुष्य के पुण्य कर्मों में स्वत: ही बढ़ोत्तरी होती जाती है। उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं। ऐसे यही महापुरुष विश्व वन्दनीय होते हैं और ईश्वर के प्रिय बन जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 अप्रैल 2026

दान धर्म का पालन करना

दान धर्म का पालन करना

दान करना मनुष्य का धर्म है जो उसे आत्मसन्तोष देता है। किसी जरूरतमन्द की समय पर सहायता करना भी दान कहलाता है। वह मनुष्य कदापि नहीं हो सकता जिसके मन में दया, ममता, करुणा आदि मानवोचित गुण विद्यमान न हों। हमारे महान ग्रन्थ और मनीषी दान देने को महत्त्व देते हैं। मनुष्य में जितनी भी सामर्थ्य हो उसके अनुसार ही उसे अन्न, वस्त्रादि का दान देना चाहिए। दान मनुष्य को इस प्रकार करना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिए। 
            दान धर्म का अर्थ होता है अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी स्वार्थ या प्रतिफल की अपेक्षा के किसी जरूरतमन्द को स्वेच्छा से धन, भोजन, वस्त्र, ज्ञान या अन्य वस्तुऍं निस्वार्थ भाव से समर्पित की जाऍं। यह हिन्दू धर्म में एक कर्तव्य, आत्म-शुद्धि का साधन और करुणा का सर्वोच्च गुण माना गया है जो इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण लाता है। हमारे शास्त्र कहते हैं -
         दाऍं हाथ से दान दो पर बाऍं हाथ को
          पता नहीं चलना चाहिए। 
अर्थात् ऐसा भी कह सकते हैं कि दान और पुण्य जैसे कार्य एकान्त में होने चाहिए। दान ढिंढोरा पीटकर नहीं करना चाहिए अपितु गुप्त रूप से करने चाहिए। तभी वह दान फलीभूत होता है।
         पद्म पुराण का इस विषय में यह कथन है - 
       सच्चे मन से किया गया दान 
       मनुष्य को सुख और शान्ति प्रदान करता है। 
          सामाजिक प्रणी मनुष्य समाज से बहुत कुछ लेता है। इसलिए उसका कर्त्तव्य बनता है कि उस समाज की भलाई के लिए अपनी नेक कमाई का कुछ अंश दान में देना चाहिए। कबीरदास जी  दान देने के लिए कहते हैं-
        चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
        दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर॥
अर्थात् कबीरदास का कहना है कि नदी की विशाल जलराशि से चिड़िया अपनी चोंच में जरा-सा जल ले लेती है तो नदी का पानी कम नहीं होता। उसी प्रकार दान देने से धन में कोई कमी नहीं आती बल्कि उसमें बढ़ोत्तरी होती है।
            दान के विभिन्न रूप हैं। जरूरतमन्दों की सहायता करने से दुखों का निवारण और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। किसी को भयमुक्त या सुरक्षित महसूस कराना अभयदान कहलाता है। अस्पताल में मरीज के लिए खून या दवाओं का प्रबन्ध करना यानी दवाई या चिकित्सा सहायता प्रदान करना औषधि दान कहा जाता है। भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे बड़ा दान माना जाता है। भोजन या अनाज का दान करने को अन्नदान कहते हैं। शिक्षा का दान सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना या उसे शिक्षित करके उसके जीवन को सुधारना होता है। सर्दियों में बेघर लोगों को कम्बल या कपड़े बॉंटने को वस्त्रदान कहते हैं।
             दान का अप्रत्यक्ष यह लाभ होता है कि मनुष्य का यश चारों दिशाओं में फैलता है। दानवीर कर्ण, राजा हरिश्चन्द्र आदि को आज तक उनके दान के कार्यों के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त पुण्य कार्यों में यह दानकार्य भी जुड़ जाता है जिससे हमारे इहलोक के साथ-साथ परलोक भी सुधरता है। मनुष्य को ऐसी मानसिक शान्ति भी मिलती है जो अमूल्य है। इसी शान्ति की खोज में वह तीर्थों, जंगलों तथा तथाकथित गुरुओं के पास जाकर भटकता है।
            इस विषय में एक उदाहरण दिया जाता है कि स्नान बन्द बाथरूम में किया जाता है, सड़क या चौराहे पर नहीं। दान और पुण्य छिपाने से बढ़ते है और बताने से नष्ट हो जाते है अर्थात् उसका महत्त्व नहीं रह जाता। 
            यह इन्सानी कमजोरी है कि वह राई जितना छोटा-सा उपकार का काम करके उसे पहाड़ जितना बड़ा करके बताता है। यद्यपि शुभकार्य करके उसका ढिंढोरा पीटा जाए तो लोग ऐसे व्यक्ति को घमण्डी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति से सहायता लेने में भी उन्हें संकोच होने लगता है। दान देकर हर स्थान पर अपने नाम के पत्थर लगवाने का अर्थ यही है कि वर्षों तक लोग याद रखें कि फलाँ व्यक्ति ने दान दिया था। बताइए दान आत्मतोष के लिए दिया जाता है। फिर इस प्रकार से उसका आत्मप्रचार किसलिए करना?
            ईश्वर में हम चौबीसों घण्टे अपने लिए कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं और वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार भरपूर देता है। हमें देकर न जतलाता है और न पछताता है। उसका गुणगान अथवा धन्यवाद करने में हम सदा कंजूसी बरतते हैं, पर आशा यही करते हैं कि हमने जिसकी सहायता की है वह हमारे समक्ष हमेशा नतमस्तक रहे।         
          विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञान का दीपक जलाने से आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञानवान होकर, मार्गदर्शक बनकर अपने देश, धर्म व समाज का हित करने में सक्षम बनती हैं। 
          दूसरो की होड़ में दान देने के नाम पर सब कुछ नहीं लुटा देना चाहिए। अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करने और उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करने तथा अतिथियों के आदर-सत्कार से जो धन शेष बचे उसका कुछ अंश दान करके सामाजिक यज्ञ में सबको आहुति देनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

मृत्यु का विधान

मृत्यु का विधान 

मृत्यु एक अटल सत्य है। यह विधि का एक कठोर विधान है। इसमें किसी भी जीव को छूट नहीं मिल सकती। इस चराचर जगत में जिस भी जीव का जन्म होता है, चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो अथवा पेड़-पौधे हों, उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है। हर जीव अपने कृत कर्मों के अनुसार निश्चित समय के लिए इस संसार में आता है। मनुष्य स्वयं चाहे अथवा न चाहे परन्तु समयावधि पूर्ण होने के पश्चात उसे इस दुनिया से विदा लेनी ही पड़ती है। इसमें उसकी राय नहीं पूछी जाती और न ही उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती।
             उसके इहलोक के प्रस्थान के समय उसके निकटस्थ सम्बन्धी, परिवारी जन, बन्धु-बान्धव रोते-बिलखते रह जाते हैं और वह दूसरे लोक की यात्रा के लिए निपट अकेले ही प्रस्थान कर जाता है। अपने किसी भी प्रिय व्यक्ति को साथ लेकर जाने की अनुमति उसे ईश्वर की ओर से नहीं मिलती। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में अकेला आता है और अकेले ही यहॉं से विदा लेकर चला जाता है। वह अपनी सारी धन-दौलत और अपने महल-चौबारे इसी धरती पर छोड़कर खाली हाथ मुट्ठी बॉंधे चला जाता है।
          प्राण जब इस शरीर का त्याग कर देते हैं तब जीव की आँखें सदा के लिए मुँद जाती हैं। उस समय सभी भौतिक रिश्ते-नाते इसी संसार में छूट जाते हैं। कोई भी सम्बन्धी उसका अपना नहीं रह जाता और न ही वह भी किसी का नहीं रहता है। जिन परिवारी जनों के लिए वह अपना सारा जीवन स्याह-सफेद कार्य करता रहता है, वे सभी भाई-बन्धु केवल जीते जी की माया होते हैं और सिर्फ श्मशान तक ही वे उसका साथ निभाते हैं। उसके पश्चात की यात्रा जीव को स्वयं अकेले ही तय करनी होती है। वहॉं उसका कोई साथी नहीं होता।
           मनुष्य का जब जन्म होता है तब उसका कोई नाम नहीं होता। जब वह इस संसार को छोड़कर जाता है तब उसके पास नाम तो होता है पर शरीर दंगा दे जाता है। अब हमें यहाँ यह भी विचार करना है कि क्या सिर्फ साँसे बन्द होने से ही कोई मुर्दा हो जाता है? जिसे अपने प्रियजन भी कुछ समय के लिए अपने घर रखने के लिए तैयार नहीं होते। बस शीघ्र ही उसे घर से निकाल देने के लिए उत्सुक रहते हैं। यही रह जाती है बस मनुष्य के जीवन की कहानी। 
            यह चिरन्तन सत्य है कि श्वासों की डोर थमने या टूट जाने से जीव मृत हो जाता है। उसे हम आम बोलचाल में शव या मुर्दा कहते हैं। फिर उस शव को उसी के ही परिवारी जन और बन्धु-बान्धव जुलूस बनाकर, श्मशान में ले जाकर अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं। उसके जल जाने की थोड़ी-सी प्रतीक्षा किए बिना ही अपने-अपने घरों को लौट आते हैं। यदि अधिक समय तक उसे रखा जाए तो उस मृत शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है जो बिमारी का कारण बन जाती है।
            यह भी सत्य है कि जब मनुष्य से उसकी इन्सानियत निकल जाती है या फिर उसकी आँखों का पानी मर जाता है, उस समय भी वह मृतप्राय होता है। मनुष्य के लिए यही आवश्यक है कि सबसे पहले वह एक अच्छा इन्सान बने। एक मनुष्य में सबसे पहले मानवोचित गुणों का होना जरूरी है। उन गुणों के बिना इस मनुष्य को राक्षस या हैवान कहते हैं। ये दुष्ट प्रकृति के लोग मनुष्यता के नाम पर कलंक होते हैं, जो इन्सानियत की कब्र खोदते हैं। इन्हें न तो घर-परिवार में स्थान मिलता है और न ही देश-समाज में। नैतिक, धार्मिक और सामाजिक नियमों के विरुद्ध चलने वाले ये लोग देश, धर्म और समाज के शत्रु कहलाते हैं। 
              इसलिए ये लोग न्याय व्यवस्था के साथ आँखमिचौली खेलते हुए, अन्तत: कानून की बेड़ियों में जकड़कर सलाखों के पीछे जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो जाते है। किसी भी व्यक्ति के जीवित रहते हुए उसे मिलने वाली यह एक ऐसी मृत्यु होती है जो स्वयं उसके लिए और उसके अपनों के लिए बहुत कष्टकारी होती है। वह व्यक्ति तो दुष्कर्म कर लेता है परन्तु उसके बन्धु-बान्धवों को भी दारुण कष्ट भोगना पड़ता है और समाज में अपमानित होना पड़ता है।
            वैसे तो जरा-सा कष्ट आने पर हम सब लोग मृत्यु को पुकारने लगते हैं पर वह क्षणिक रोष होता है। कभी-कभी लम्बी या असाध्य बीमारी की अवस्था में भी मनुष्य जीवन से हारकर मृत्यु का दामन थामना चाहता है परन्तु यह उसके वश में नहीं होता। ईश्वरीय इच्छा के समक्ष मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है। जब वह पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी आयु भोग लेता है तभी उसे अपने जीवन से छुटकारा मिलता है, उसकी कामना करने के कारण पहले नहीं।
            ईश्वर के प्राकृतिक न्याय के अनुसार मृत्यु होना एक स्वाभाविक-सी प्रक्रिया है परन्तु अपने पैरों पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मारने वाली यह मृत्यु मनुष्य की स्वयं की बुलाई हुई होती है। मनुष्य को अपनी मृत्यु को इस प्रकार अनावश्यक रूप से कष्टदायक नहीं बनाना चाहिए। उसे सही रास्ते का चुनाव करके उस मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सुखद बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

संसार में जन्म लेने के पश्चात मनुष्य दिन-दिन करके बड़ा होता है। धीरे-धीरे समय बीतते वह आयुप्राप्त हो जाता है। उसके पास ग्रहण की गई शिक्षा की योग्यता के साथ-साथ अनुभवों का भी एक विशाल खजाना(भण्डार) एकत्रित हो जाता है। अपने इस संग्रहालय से मोती चुन-चुनकर वह उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में सौंपना चाहता है। वह चाहता है कि उसके ज्ञान और अनुभव से सीखकर कठिनाइयों से लोग बच जाएँ और वे गलतियॉं न दोहराऍं। बच्चे अपने जीवन में उत्तोरत्तर उन्नति करते चलें।
          सागर में छिपे खजाने किनारों पर स्वयं नहीं आ जाते। उन्हें पाने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ता है। समुद्र में गहरे पैठना पड़ता है। उसी प्रकार वयोवृद्ध जनों के हृदयों से ऐसे अनुभवजन्य खजानों को उनके पास बैठकर पाकर उनका लाभ उठाया जा सकता है। खड़े-खड़े, भागते-भागते उनसे वह खजाना प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए धैर्य पूर्वक पास बैठकर ही जाना-समझा जा सकता है। यह सत्य है कि उनके अनुभव से लाभ ही होगा, हानि नहीं।
            इसी तरह आयु बीतने पर उनका जीवन यादों का एक ग्रन्थ बन जाता है। उसमें कटु और मधुर दोनों ही तरह की स्मृतियाँ कैद हो जाती हैं। जीवन के ये खट्टे-मीठे अनुभव उन्हें समय-समय पर याद आते रहते हैं। मधुर यादों को याद करके वे प्रसन्न होते हैं और जीवन में आई कटुताओं को याद करके उनका मानस कुछ समय के लिए व्यथित हो जाता है। उस समय यदि कोई उन्हें सहारा दे सके तो वे उन कड़वी यादों से सरलता से बाहर आ सकते हैं।
            किसी व्यक्ति विशेष की याद उन्हें बहुत तड़पाती है। कभी-कभी मनुष्य यादों के सहारे जिन्दगी काट लेता है। यह भी सम्भव है कि उसके प्रियजन अथवा बन्धु-बान्धव उससे जीवन काल में ही दुनिया से बिछुड़ गए हों। उनके वापिस लौटा लाने की हर कोशिश व्यर्थ हो गई होती है पर उनके साथ बिताए गए जीवन के पल हमेशा ही स्मृति में कैद होकर रह जाते हैं। वे चलचित्र की भॉंति मनुष्य के मानस पर चलते हुए यदा कदा उसे मायूस कर जाते हैं। 
            इसी तरह यद्यपि दोस्ती के जमाने भी लौटकर नहीं आते पर निश्चित ही हृदय में कसक छोड़ जाते हैं। जहाँ तक हो सके उन सुखद पलों को याद करके उदास होने के स्थान पर उन मधुर यादों को प्रसन्नतापूर्वक जी लेना चाहिए। युवाओं को अपनी योग्यता पर मान होना चाहिए, अभिमान कदापि नहीं। उन्हें इस सत्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि उन वयोवृद्ध माता-पिता के कारण ही वे योग्य बनकर सफलता के सोपानों को छू पाए हैं।अब उन्हें उनका तिरस्कार न करके उनका सम्मान करना चाहिए।
            युवावर्ग को बुजुर्गों के ज्ञान का उपहास करते हुए यह नहीं कहना चाहिए कि आप चुप रहो आपको क्या पता? आपको समझ नहीं आएगा?इस तरह के अपमान से से वे बहुत आहत होते हैं। उनका हृदय व्यथित होता है। उन्हें लगने लगता है कि अब वे अपने बच्चों के लिए अनुपयोगी हो गए हैं। उनके जीवन में उनकी कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि वे उन पर एक बोझ बनते जा रहे हैं। इस व्यवहार से वे टूटने लगते हैं। इस तरह से जब वे अनावश्यक सोचते रहते हैं तो उनके स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।
            यहाँ यह कहने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही कि जिन माता-पिता की मेहनत की कमाई और धन-समृद्धि को वे युवा बच्चे किसी भी तरह प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं तो वे मूर्ख कैसे हो सकते हैं? उस सबको उन्होंने अपनी समझ-बूझ से ही बनाया होता है। माता-पिता का सब कुछ चाहने वाले बच्चे उनके प्रति असहिष्णु नहीं हो सकते। उनसे किनारा करके उन्हें ओल्डहोम जैसे स्थानों पर नहीं भेज सकते। बाल्यावस्था और युवावस्था में जिस प्रकार उन्होंने अपने बच्चों को सहारा दिया था, अब उनकी बारी है। बच्चे अपने दायित्वों से मुॅंह नहीं मोड़ सकते।
            इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आयु बढ़ने पर मनुष्य धीरे-धीरे शारीरिक रूप से अशक्त होने लगते हैं। इस कारण वे उस समय अधिक बोलने लगते हैं, रूठने-मानने लगते हैं, अनावश्यक क्रोध और जिद करने लगते हैं। उनका व्यवहार बच्चों की तरह हो जाता है। एक ही बात को वे कई बार दोहराने लगते हैं। तब उन्हें बच्चों के प्यार और विश्वास की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। उन्हें यह अहसास करवाना चाहिए कि वे हर स्थिति में बच्चों के लिए उपयोगी हैं और वे उनके परामर्श के बिना एक भी कदम नहीं चल सकते। यदाकदा किसी विषय पर उनसे सलाह लेकर उनको सन्तुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।
          सार रूप में यही कहा जा सकता है कि बच्चों को बिना किसी पूर्वाग्रह के वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। यदि वे ऐसा कर सकें तो बड़ों को भी उन बच्चों पर गर्व होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों को कष्ट की भट्टी में न धकेलें

दूसरों की राह में काँटे बिछाने वालों को जीवन में फूल नहीं मिला करते, यह एक शाश्वत सत्य है। यदि मनुष्य दूसरों के लिए फूल बोता है तो बदले में उसे सुख यानी फूल ही मिलेंगे।इसके विपरीत बुराई करने वाले मनुष्य को उसके कर्मों का दण्ड त्रिशूल की तरह पीड़ादायक फल के रूप में वापस मिलता है। इसलिए यथासम्भव यही प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य जाने-अनजाने किसी के भी दुख का कारण न बने। 
          यह संसार एक सुन्दर बगीचे की तरह है। इसमें जैसी खेती की जाती है, फसल भी वैसी ही काटी जाती है। प्यार, मुहोब्बत, भाईचारे, विश्वास आदि के बीज बोने वाले लोगों को सत्यता: प्यार आदि मिलते हैं। सब लोग ऐसे सज्जनों पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं और उनका साथ देने के लिए सदा तैयार रहते हैं। यही उन लोगों की एक ऐसी विशेषता होती है जिसके कारण वे संसार में पूजनीय बन जाते हैं।
           इसके विपरीत ईर्ष्या, द्वेष आदि की फसल बोने वाले मनुष्यों को दुनिया से नफरत ही मिलती है। दूसरों का अहित करने वाले उन लोगों का साथ कोई भी पसन्द नहीं करता। लोग ऐसे नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों को छोड़ देने में जरा भी देर नहीं करते। ऐसे लोग धीरे-धीरे समाज से काट दिए जाते हैं। फिर वे अकेले होने लगते हैं।
           दूसरों को दुख देकर खुश होने वाले अपने जीवन में कभी भी सुख नहीं प्राप्त कर सकते। कभी-न-कभी तो उन लोगों का अन्तस् उन्हें झकझोरता ही है कि सारा जीवन उन्होंने षडयन्त्र करते हुए बिता दिया है। अपने जीवन के अन्तिम समय में जब उनका कोई भी सहायक नहीं बनता तब उन्हें इस बात का अहसास होता है। उस समय प्रायश्चित करने से भी कुछ हल नहीं निकल पाता। जो हानि हो जाती है, उसे फिर बदल पाना सम्भव नहीं हो सकता।
           जिस प्रकार कमान से निकला हुआ तीर वापिस नहीं आता, उसी प्रकार उन कुविचार रखने वालों की भी स्थिति होती है। सुख और दुख तो मनुष्य के पास उसके जीवन में कर्मभोग फल होते हैं जिन्हें भोगे बिना उनसे छुटकारा सम्भव नहीं होता। बड़े दुख की बात है कि कुछ लोग उस स्थिति में भी अपना हित साधने में लगे रहते हैं। शायद उन्हें कोई डर नहीं बताता। 
            मनीषी जन मानते हैं कि दुख और कष्ट भगवान की बनाई हुई ऐसी प्रयोगशाला हैं जहाँ मनुष्य की योग्यता और आत्मविश्वास को परखा जाता है। दुख-तकलीफ के समय मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को डिगने नहीं देना चाहिए बल्कि दृढ़तापूर्वक कुमार्ग का सहारा लिए बिना कष्टदायक समय को विनयपूर्वक ईश्वर की उपासना करते हुए और स्वाध्याय करते हुए गुजर जाने देना चाहिए जैसे तूफान आने पर पेड़ झुककर अपने ऊपर से उसे गुजर जाने देते हैं। मनुष्य दुखों की अग्नि में तपकर ही कुन्दन बनकर उभरता है।
            यह बात हर व्यक्ति को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुख भोगने वाला समय बीतने के बाद आगे जाकर मनुष्य फिर से सुखी हो जाता है परन्तु दूसरों को दुख देने वाला मनुष्य अपने जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकता। दुखी व्यक्ति के मन से निकलने वाली हाय उसे कभी चैन से नहीं बैठने देती। कबीरदास जी के निम्न दोहे को भी झुठलाया नहीं जा सकता -
       जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
     तोको फूल के फूल हैं, वाको हैं तिरसूल॥
अर्थात् कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति आपके जीवन में कष्ट उत्पन्न करता है तो आप प्रतिशोध लेने के बजाय उसके साथ प्यार और विनम्रता का व्यवहार करें। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रास्ते में काँटे बोने वालों के लिए अपनी ओर से फूल बोने चाहिए। कबीरदास जी का कहना है कि तुम्हें इस नेक कार्य के बदले फूल मिलेंगे और उसे काँटे मिलेंगे। मनीषी इसीलिए समझाते हैं -
          जैसा करोगे वैसा भरोगे
                  अथवा 
         जैसी करनी वैसी भरनी
 इसके अतिरिक्त भी कहते हैं-
      बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाए।
अर्थात् इन उक्तियों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, उसके बदले में वैसा ही पाता है। बबूल का पेड़ बोकर आम के फल की आशा करना व्यर्थ है। 
           दूसरों को कष्ट की सौगात देने वालों को रिटर्न गिफ्ट में कष्ट और परेशानियाँ ही मिलेंगी। इसके विपरीत अपने जीवन में दूसरों को खुशियाँ बाँटने वालों को बदले में खुशियाँ ही मिलती हैं। इस सत्य को अपने जीवन में ढाल लेना चाहिए।
            एक सज्जन व्यक्ति और एक दुर्जन व्यक्ति की वैचारिकता में यही अन्तर होता है। दुर्जनों के चेहरे पर कठोरता का तथा मन में क्रूरता का भाव होता है और सज्जनों के चेहरे व हृदय में सरलता का भाव होता है।
          सार रूप में हम कह सकते हैं कि दूसरों को कष्ट की भट्टी में धकेलकर उनके शत्रु बनने के स्थान पर वास्तव में हमें उनके आँसू पौंछने वाला एक सच्चा मददगार बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत

आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत हर मनुष्य को होती है। इसीलिए वह अपने व्यक्तित्व को निखारने में जुटा रहता है। हर प्रकार के उपाय करता है। विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करता है। यह रंग-रूप मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिलता है। उसमें उसकी मर्जी शामिल नहीं होती। वह चाहकर भी अपनी इच्छानुसार अपने शरीर को नहीं बना सकता।
         एक आकर्षक व्यक्तित्व का अर्थ मात्र सुन्दर दिखना नहीं होता। यह शारीरिक हाव-भाव, संवाद कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सकारात्मक सम्बन्ध बनाने की क्षमता का समग्र मिश्रण होता है। मनुष्य की ऊर्जा और व्यवहार उसके बोलने से पहले ही उसका परिचय करा सकते हैं जिससे हर बातचीत का माहौल तय हो जाता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, सक्रिय रूप से सुनने की क्षमता, मुस्कान और अपनी गलतियों को स्वीकार करने के साहस से यह निर्मित होता है। इसकी व्यक्तिगत और पेशेवर सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यकता होती है। 
           यद्यपि कुछ लोग शरीरिक दोषों को सुधारने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं परन्तु वह तो कोई स्थायी हल नहीं है। केवल शारीरिक सौन्दर्य के कारण मनुष्य इठलाता फिरता है। उसे इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ये रूप-सौन्दर्य क्षणिक होता है। कहने का तात्पर्य है यह कि सुन्दरता नश्वर है, अनश्वर नहीं। 
           रोग से आक्रान्त होने पर शरीर बदसूरत हो सकता है। आयु के एक पड़ाव पर शरीर पर झुरियाँ आ जाने से उसका वह रूप खो जाता है जिस पर वह गर्व करता है। इससे भी बढ़कर किसी रोग के कारण भी शरीर बेडौल हो सकता है। इसमें अपना कोई दोष न होते हुए भी तब वह दूसरों से नजरें चुराने लगता है।
            इसलिए मात्र शरीर के सौन्दर्य को देखने के स्थान पर मनुष्य की आन्तरिक सुन्दरता परखी जानी चाहिए। अपने ज्ञान, अपनी योग्यता के बल पर अग्रणी रहने वाले व्यक्तित्व देश अथवा विदेश सर्वत्र पूजनीय होते है। वास्तव में सुदर्शन व्यक्तित्व उन्हीं लोगों का ही माना जाता है और वही समाज के प्रेरणास्त्रोत और आदर्श होते हैं।
            इस महत्त्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचने के लिए वे समय रहते अथक परिश्रम करके ज्ञानार्जन करते रहते हैं। फिर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन होते हैं। बहुत से लोग उनके सज्जन और दुश्मन बन जाते हैं। उनकी योग्यता की परख करने वाले उनके मित्र बनते हैं।
            इसके विपरीत उनकी उन्नति से ईर्ष्या करने वाले उनके साथ अपनी शत्रुता निभाते हैं। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने जीवन में वे स्वयं तो कुछ नहीं कर पाते यानी असफल रहते हैं। इसलिए उच्च पदासीन मेधावी लोगों की ओर देखकर, उनकी बुराई करके चर्चा में बने रहने के लिए अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। अन्यथा इन बुरे लोगों की ओर किसका ध्यान जाएगा? 
             ये लोग फलदायी वृक्ष की भाँति होते हैं जिनका संसर्ग पाकर हर व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ समझता है। फलों से लदे हुए वृक्षों पर लोग पत्थर फैंककर मारते हैं और स्वादिष्ट फल खाकर आनन्द लेते हैं। इन पर कटाक्ष करने वाले उन लोगों को छोड़कर अन्य बुद्धमान इनसे मार्गदर्शन रूपी मधुर फल को पाकर लोग लाभान्वित होते हैं।
           दुष्ट लोग सूखे पेड़ की तरह होते हैं। ठूँठ बने वृक्ष जरा-सी चिन्गारी गिर जाने जल जाते हैं। इसी तरह वे दुर्जन सफल लोगों से केवल ईर्ष्या ही करके अपने आप को जलाने का कार्य करते हैं। जैसे उन सूखे वृक्षों पर पत्थर मारने का कोई लाभ नहीं होता, उनसे न फल मिलते हैं और न ही छाया। उसी प्रकार इनकी संगति में लाभ न के बराबर मिलता है पर हानि अधिक होती है।
           मनुष्य को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति दयालु व सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। सक्रिय रूप से दूसरों की बातें सुनने की क्षमता होनी चाहिए और समझना चाहिए कि केवल अपने बोलने पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य को विनम्रता से बात करनी चाहिए, शालीन रहना चाहिए और मुस्कुराते रहना चाहिए। मनुष्य को अपनी स्वच्छता, पहनावे और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अपने काम के प्रति उत्साहित रहना चाहिए। मनुष्य के मन में निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।
            हर मनुष्य को उसके जीवन काल में अपने आप को साबित करने का एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस अवसर का लाभ उठा लेते हैं वे अपने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा लेते हैं। उस अवसर को किसी भी कारण से चूकने वाले रेस में पिछड़कर आयु पर्यन्त नाकामयाबी का कलंक ढोते हैं। हर व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह अपने व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

परिवार की एकसूत्रता

परिवार की एकसूत्रता

परिवार जब तक एकसूत्र में बॅंधा रहता है तब तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी टिक नहीं सकता। कोई भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी लोग उस परिवार की एकता से घबराते हैं। उस समय उसमें सेंध लगा पाना बहुत कठिन होता है। दूसरे लोगों को पता होता है कि यदि वे इस परिवार का किसी भी प्रकार अहित करना चाहेंगे तो सभी परिवारी जन उन पर टूट पड़ेंगे। तब उनका वहॉं से बचकर निकलना बहुत कठिन हो जाएगा।
            इसके विपरीत परिवार के टूटकर बिखरते ही स्वार्थी लोगों की बन आती है। वे उन सभी को अलग-अलग बहला-फुसलाकर अपना हित साधने में जुट जाते हैं। इसके लिए वे उन सबको हानि पहुँचाने से बाज नहीं आते। इसलिए वे नए-नए तरीके खोजने‌ लगते हैं। इस प्रकार कभी-न-कभी वे उनके चंगुल में फंसे जातै हैं और अनावश्यक ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर बैठते हैं। जिसका बाद में उन्हें पश्चाताप भी होता है।‌ परन्तु जब हानि हो जाती है तो उसके बाद उसका कोई लाभ नहीं होता।
           इसी विषय में एक दृष्टान्त देखते हैं। किसी समय में एक व्यक्ति के चार बेटे थे। उसे सभी भाग्यशाली मानते थे। वह अपने बच्चों के नित्य के लड़ाई-झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। समय बीतते जब वह मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी तब वह उदास हो गया। तब उस मरणासन्न अवस्था में भी बच्चों के आपसी व्यवहार के कारण उसे चैन नहीं मिल रहा था। उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा, "जाओ, जाकर कुछ लकड़ियाँ लेकर आओ।" 
            चारों बेटे पिता के आदेश के अनुसार ही लकड़ियाँ लेकर उपस्थित हो गए। उन्होंने पूछा, "पिताजी, इन लकड़ियों का क्या करना है?"
           पिता ने उनसे कहा, "इन लकड़ियों को तोड़ दो।"
             वे लोगबहुत ही सरलता से वे उन्हें तोड़ने लगे। तब पिता ने उन चारों बेटों से कहा, "इन सारी लकड़ियों का एक गट्ठर बना दो।"
            बच्चों ने पिता के आदेश का पालन किया और उन लकड़ियों का एक गट्ठर बना दिया। पिता ने उनसे कहा, "अब इस गट्ठर को तोड़ दो।"
           चारों बेटों ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उस गट्ठर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए।
           उस समय पिता ने चारों को समझाया और मिल-जुलकर रहने के लाभ बताते हुए कहा, "यदि तुम चारों  भाई मिल-जुलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हारा अहित करने के लिए तुम लोगों में फूट नहीं डाल सकता। जब तक वे चारों एक बॅंधी हुई मुट्ठी की तरह रहेंगे तो दूसरे उनका बुरा करने के लिए दस बार सोचेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि चारों मिलकर उसे परास्त कर देंगे।यदि वे चारों जीवन में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो दूसरे इस बात का लाभ उठाएँगे।"
           बच्चों को यह बात समझ आ गई और तब उन्होंने अपने पिता को वचन दिया कि वे भविष्य में मिलकर रहेंगे।
          इसी प्रकार जब तक झाडू एक सूत्र में बॅंधी रहती है तब तक वह कचरा साफ करती है। परन्तु जब वही झाडू सूत्र के टूट जाने से बिखर जाती है तब खुद ही कचरा बन जाती है। उस समय उस अनावश्यक कचरे को उठाकर लोग कूड़ेदान में फैंक देते हैं। यानी वही बिखरे तिनके सबके लिए असह्य हो जाते हैं।
          इसलिए हमें हमेशा परिवार में एक मुट्ठी की तरह बॅंधकर, मिल-जुलकर रहना चाहिए। आपसी द्वन्द्वों के कारण बिखरकर दूसरों की नजर में आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला शिकार बनने से बचना चाहिए। इसी में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा होती है।
         अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। यह मानना चाहिए कि परिवार का हित साधने में ही सबका भला होता है। मन की शुद्धता के लिए लोग सप्ताह के किसी भी दिन उपवास रखते हैं और अन्न का त्याग करते हैं। होना यही चाहिए कि अपने मन की शुद्धि के लिए अपने परिवार को तोड़ने वाले कुविचारों का त्याग करके उसे तोड़ने के स्थान पर जोड़कर रखने का यत्न करना चाहिए। 
          परिवारी जनों के प्रति मन से ईर्ष्या और द्वेष के भावों को दूर करके अपने हृदय को सरल और सहज बनाना चाहिए। सभी सदस्यों को अपने अहं का बलिदान करके परिवार की एकजुटता को बनाए रखना चाहिए। इससे बुजुर्गों और बच्चों में होने वाली अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है। अत: अपने परिवार हितों को सर्वोपरि मानते हुए थोड़ा-सा धैर्य रखना चाहिए। इसके लिए विवेकी बनकर यदि अपने स्वार्थों की बलि भी देनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

भौतिक पूॅंजी के साथ सुविचारों की पूॅंजी बढ़ाऍं

भौतिक पूँजी के साथ सुविचारों की पूँजी बढ़ाऍं

मनुष्य जीवन भर अपनी पूँजी बढ़ाने की फिराक में रहता है। ऐसा कोई अवसर नहीं चूकता जिससे उसकी पूँजी में बढ़ोत्तरी हो सके और उसका धन दिन-प्रतिदन द्विगुणित होता रहे। इसके लिए अपने धन को बैक में फिक्सड कराता है, स्वर्ण आदि के बाँड खरीदता है, उसे शेयर मार्किट में लगाता है, नए व्यापार में उसे इन्वेस्ट करता है। और भी न जाने क्या-क्या उपाय अपने जीवन काल में करता रहता है?
    मनुष्य हर हाल में दूसरों से आगे निकलकर विजयी कहलाना चाहता है। इसके लिए घर-परिवार की परवाह किए बिना दिन-रात का सुख-चैन होम कर देता है। माता-पिता, पत्नी-बच्चों, बन्धु-बान्धवों तक सबको भुलाकर पूँजी को बढ़ाने के लिए अपने एकसूत्री मिशन पर आगे-आगे बढ़ता ही जाता है। तब उसके पास पीछे मुड़कर देखने के लिए भी कोई समय नहीं होता।
      उस संघर्ष काल में उसका अपना समय भी उसके हाथ से फिसल जाता है। उसके जीवन में फिर एक समय भी ऐसा आ जाता है जब अथक परिश्रम से कमाई हुई मनचाही दौलत उसके पास एकत्र हो जाती है पर अपनों का साथ छूट जाता है। तब वह हैरान रह जाता है और पश्चाताप करता है कि यह उसने क्या कर डाला? उसके हाथ में उस समय कुछ भी नहीं बच पाता। वह मानो खाली हाथ रहकर दूसरों का मुँह ताकता रह जाता है।
      उस भागमभाग में वह इस सत्य को भी भूल जाता है कि उसकी वास्तविक पूँजी उसके अपने बन्धु-बान्धव हैं। उनसे भी बढ़कर उसके अपने सद् विचार हैं, उसकी नेक करनी है। धन-दौलत और ऐश्वर्य तो सब इस लोक की कमाई है जो परलोक में उसके साथ नहीं जाते। जहाँ आँखे बन्द हुईं सब कुछ मानो समाप्त हो जाता है। उसके सत्कर्म और उसके विचार रूपी पूँजी जन्म-जन्मान्तरों तक उसके साथ रहती है। उन्हीं के अनुसार ही मृत्यु के पश्चात उसे पुनर्जन्म मिलता है।
      जैसे-जैसे कर्म मनुष्य करता रहता है वैसा-ही-वैसा फल उसे मिलता है। न उससे कम और न उससे ज्यादा। ईश्वर के न्याय में किसी प्रकार की हेराफेरी अथवा भाई-भतीजा वाद नहीं होता। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। इसलिए वहाँ पर बस केवल फेयर गेम होती है।
      इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह धन-वैभव मोहिनी माया है। वह आज एक के पास है तो कल दूसरे के पास चली जाती है। उसके लिए राजा और रंक सब एक समान हैं। आज पैसा जेब से निकालो तो वह दूसरे की जेब में चला जाता है और उसकी पूँजी को बढ़ाता है।
      इसलिए मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन न होकर उसके अपने विचार होते हैं। धन तो खरीददारी करते समय दूसरों के पास चला जाता है। उसके सद् विचार तब तक उसका साथ नहीं छोड़ते जब तक वह स्वयं कुमार्ग पर चलने के लिए उन्हें न छोड़ दे। ये उसके अपने पास उसकी जमा पूँजी बनकर ही रहते हैं। यह पूँजी केवल इसी जन्म में शेष नहीं रह जाती बल्कि जन्म-जन्मान्तरों में कमाई हुई पूँजी के जुड़कर उसमें वृद्धि करती है। इस तरह हमारे सद् विचार हमारी आध्यात्मिक उन्नति करते हुए हमें महान बनाते हैं।
      ज्यों ज्यों वह अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करके, सज्जनो की संगति करके और ईश्वर की आराधना करके उनका संचय करता जाता है, त्यों त्यों वे उसे आम साधारण जन से ऊपर उठाकर महामानव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं। फिर वह समाज में शिरोमणि पद प्राप्त कर लेता है। दुनिया उसके पीछे चलती है। 
      अत: अपनी भौतिक पूँजी अवश्य बढ़ाइए पर साथ ही अपने सुविचारों की पूँजी बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 12 अप्रैल 2026

ईश्वर वहीं देता है जो हमारे लिए अच्छा है

ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा है 

ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। उसे हम लोगों की यह साधारण बुद्धि नहीं समझ सकती। पता नहीं उसके कितने हाथ हैं जो पूरे संसार के असंख्य जीवों को झोली भर-भरकर देता है। यानी छप्पर फाड़कर देता है। जब लेने पर आता है तो घर के दाने भी बिक जाते हैं।
          वह परम न्यायकारी है। किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। उसकी अदालत में जो फैसले किए जाते हैं, उनकी अन्यत्र कहीं सुनवाई नहीं होती। सत्कर्म करने वालों को वह हर तरह से मालामाल कर देता है। दुष्कर्म करने वालों को माफ नहीं करता।उन्हें दुखों और तकलीफों में तपाकर कुन्दन बनाता है। इसीलिए उसकी लाठी की आवाज नहीं होती।
           वह बारबार हमें हर काम को करने से पहले चेतावनी अथवा प्रोत्साहन देता रहता है पर हम कानों में रुई डालकर बैठे रहते हैं। उसके समझाने अथवा इन्कार करने का हम लोगों पर कोई असर नहीं होता। तभी हम हर समय बौखलाए हुए से रहते हैं।
           एक बच्चा हर उस वस्तु के लिए अपने माता-पिता से जिद करता है जिसे वह अपने मित्र, पडौसी अथवा किसी दुकान पर देखता है। यह तो आवश्यक नहीं कि माता-पिता उसकी माँगी हुई सारी वस्तुएँ खरीद दें। कुछ ही वस्तुएँ वे उसे लेकर देते हैं शेष के लिए मन कर देते हैं या बहला देते हैं। वे वही वस्तुएँ उसे खरीदकर देते हैं जिनकी उसके जीवन के लिए वाकई उपयोगिता होती है।
           बच्चों की तरह हम लोगों को भी हर वह वस्तु चाहिए होती है जो दुनिया में किसी के भी पास होती है, चाहे उसकी हम आवश्यकता हो अथवा न हो। वह परम पिता परमेश्वर भी हमारी सारी जायज-नाजायज माँगों में से वही हमें देता है जो हमारे पूर्वजन्म कृत हमारे कर्मों के अनुसार हमें मिलनी चाहिए। उससे न कम और न ज्यादा। हम है कि अनावश्यक हठ करते हुए परेशान रहते हैं।
         ईश्वर वह कभी नहीं देता जो हम सबको अच्छा लगता है। हमारा क्या है? हमें हर चीज अच्छी लगती है। मनुष्य का वश चले तो वह चाँद को लाकर अपनी दीवार पर सजा ले। सूर्य के प्रकाश को अपने घर में कैद करके उसे आगे न जाने दे। बाकी सारी दुनिया चाहे अंधेरे में ठोकरें खाती रहे। इसी तरह नदियों का सारा पानी भी किसी को न लेने दे। यानि सारी प्रकृति पर अपनी सत्ता कायम कर ले। वह स्वार्थी बनकर दूसरे के मुँह में जाता हुआ निवाला भी छीनकर खा ले और उसे भूखा मरने के लिए छोड़ दे।
            ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। हमारी योग्यता और भाग्य के अनुसार ही वह हमें देता है। यदि हमारे भाग्य में नहीं हो तो वह किसी-न-किसी रूप से हमारे हाथ से निकल जाएगा। जैसे बन्दर के गले में मोतियों का मूल्यवान् हार डाल दिया जाए तो वह उसे तोड़कर फैंक देगा। उसी प्रकार हम सभी अज्ञ मनुष्य अपनी मूर्खताओं के कारण उस मालिक द्वारा प्रदत्त नेमतों का लाभ नहीं उठा पाते। अपने दुर्भाग्य के कारण उन्हें व्यर्थ गंवा देते हैं।
          यहाँ मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक लकड़हारे की ईमानदारी और उपकार पर प्रसन्न होकर राजा ने उपहार स्वरूप उसे चन्दन का वन दे दिया। उस मूर्ख को उस चन्दन का मूल्य ही ज्ञात नहीं था। इसलिए अमूल्य चन्दन भी उसके भाग्य को नहीं पलट सका। यानि उसकी गरीबी को दूर करने में सफल नहीं हो सका। वह वहीं-का-वहीं रह गया। जब राजा को उसकी मूर्खता का पता चला तो उसने माथा पीट लिया।
            यह उसकी दयानतदारी है जो हमें जीवन में मायूस नहीं करता। वह बिना माँगे नित्य ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। यह हमारी सूझबूझ पर निर्भर करता है कि हम अपनी झोली में मालिक के द्वारा दिया गया कितना खजाना समेट सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

गलती करना मानवीय स्वभाव

गलती करना मानवीय स्वभाव 

मनुष्य का अपने जीवन काल में अनेक लोगों से वास्ता पड़ता है। सभी लोग अलग-अलग स्वभाव व कार्यक्षेत्र के होते हैं। कुछ लोगों की मधुर स्मृतियाँ उसके जीवन की पूँजी बन जाती हैं। उन्हे जीवन में प्राय: याद करके वह आनन्द से सराबोर हो जाता है। कुछ लोगों के साथ होने वाले अपने कटु अनुभवों के कारण उन्हें याद करके उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है। उन्हें वह दुस्वप्न समझकर भूलने की नाकामयाब कोशिश करता है।
             अलेक्जेंडर पोप का यह प्रसिद्ध कथन जीवन का मूलमंत्र है -
          गलती करना मानवीय स्वभाव है,
        क्षमा करना ईश्वरीय।   
गलतियाँ सीखने और आगे बढ़ने का हिस्सा हैं। खुद को और दूसरों को माफ करना मानसिक शान्ति और प्रगति के लिए आवश्यक है।
            यह सत्य है कि मनुष्य मशीन नहीं है। अतः उससे गलतियाँ स्वाभाविक रूप से होती हैं। गलती करना अपराध नहीं है बल्कि उससे सीखकर सुधार करना महत्वपूर्ण होता है। अपनी गलतियों के लिए स्वयं को कोसने के स्थान पर उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना  बुद्धिमानी कहलाती है। अपनी गलती को स्वीकार करना मनुष्य की महानता का प्रतीक होता है। उसे न मानना अथवा बार-बार दोहराना मूर्खता कहीं जा सकती है। अपनी गलतियों का विश्लेषण करके ही हम अपनी कार्यक्षमता में सुधार कर सकते हैं। 
            हर मनुष्य का स्वभाव ऐसा नहीं होता कि वह उनका प्रतिकार करे अथवा उनके मुँह पर जूता मारने जैसा व्यवहार करे। उस स्थिति में वह अपने भीतर-ही-भीतर कुढ़ता रहता है। यह पिष्टपेषण उसे चैन नहीं लेने देता और वह असहज होने लगता है। इस तरह उसके दिन-रात की मानसिक शान्ति भंग होने लगती है। यह स्थिति किसी भी तरह सराही नहीं जा सकती।
            हमारे मनीषी इसीलिए समझाते है कि दिल में बुराई रखने से बेहतर है उस नाराजगी को प्रकट कर दो। ऐसी विकट परिस्थिति में जहाँ दूसरों को समझाना कठिन हो जाए वहाँ स्वयं को समझा लेना ही बेहतर होता है। मनुष्य को आत्मविश्लेषण करते रहना चाहिए। इससे यह पता चल जाता है कि गलती सामने वाले की थी या हमीं से कहीं कोई चूक हो गई।
          प्रसन्न रहने का सीधा-सा मन्त्र यही है कि आशा या उम्मीद केवल अपने आप से रखी जाए, किसी अन्य से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर प्राय: निराशा ही हाथ लगती है। जितनी अपनी सामर्थ्य है उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिल पाती है। बहुत बार हम स्वयं ही अपनी उम्मीद के अनुसार सफलता पाने से चूक जाते हैं।
           जब हम स्वयं अपनी आशा और विश्वास पर खरे नहीं उतर पाते तब हमें यह सोचना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति भी इन्सान है, उससे भी चूक हो सकती है। इसलिए हमें दूसरों से नाराज नहीं होना चाहिए। सहृदयतापूर्वक चिन्तन करने पर मन में दूसरों के प्रति आने वाली दुर्भावनाएँ स्वयं ही किनारा कर लेती हैं। इससे दूसरों के लिए मन में जमी ईर्ष्या व क्रोध रूपी धूल की परतें साफ होने लग जाती हैं और हमारा मन दर्पण की तरह चमकने लगता है।
           मेरा विचार है कि जब दो लोगों में किसी भी विषय पर टकराव हो तो उसे आमने-सामने बैठकर सुलझा लेना चाहिए। अपने मन में दुराग्रह पाल करके बैठने से अच्छा है कि अपनी नाराजगी के कारण को प्रकट करके उसे दूर कर देना चाहिए। ऐसा करने से सम्बन्धों में आने वाला मनमुटाव दूर हो जाता है और वे लम्बे समय तक बने रहते हैं।
            सम्बन्ध कोई भी हो, चाहे माता-पिता का हो, पति-पत्नी का हो, फिर दोस्तों-रिश्तेदारों के मध्य हो अथवा कार्यालयीन साथियों का हो, उन सबमें पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है। अपने मनों में कभी भी, किसी भी कारण से दरार नहीं आनी चाहिए। उसके कारण आने वाली दूरी को पाटना असम्भव तो नहीं परन्तु कठिन अवश्य हो जाता है।
          यदि सम्बन्धों में तनाव बना रहेगा और उसे दूर करने का प्रयास नहीं किया जाएगा तब सभी प्रभावित लोगों के मनों को अतीव कष्ट होगा। यह स्थिति किसी भी सहृदय के लिए भी सुखद नहीं कही जा सकती। सबसे बड़ी बात कि सहजता और सरलता का वातावरण बनाने में आई बाधा को सभी दूर करना चाहते हैं। इसके मूल में सभी पक्षों का अहं आड़े आ जाता है जो समझौता करने से इन्कार कर देता है।
         गलती करना मानवीय प्रकृति है, इसे सदा याद रखना चाहिए। यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे स्वीकार करते हुए यदि क्षमाशील बना जाए तो दूसरों को मानसिक सन्ताप देने के स्थान पर उन्हें उन्हीं की गलती का अहसास कराते हुए अपनी विशालहृदयता का परिचय देना चाहिए। हर व्यक्ति दूसरों की उम्मीद पर खरा नहीं हो सकता। अतः दूसरों से नाउम्मीद होने के स्थान पर स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

स्वार्थ को हावी न होने दें

स्वार्थ को हावी न होने दें 

अपने झूठे अहं के कारण जो मनुष्य दूसरों की सहायता नहीं करता, वह अन्ततः खाली हाथ रह जाता है। वह चाहे कितनी ही सुख-समृद्धि जुटा ले पर उसे मानसिक सन्तोष नहीं मिलता। वह सदा ही किसी-न-किसी कारण से भटकता रहता है। यह भटकाव उसे आजीवन परेशान करता रहता है। वह उसके सुख-चैन पर सदा घात लगाए बैठा रहता है। मनुष्य यदि दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से तत्पर हो जाए तो उसके बिना माँगे ही उसकी झोली में सब कुछ आ जाता है।
               एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक बार देवताओं और असुरों दोनों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया गया। जब वे दोनों आ गए तो उन दिनों गुटों को अलग-अलग मेज पर भोजन करने के लिए बिठा दिया गया। उनके सामने एक शर्त रखी गई, "उनकी बाहों में खप्पचियाँ बाँधी जाएँगी और उन सबको बॅंधे हुए हाथों से ही उन्हें भोजन समाप्त करना है।" 
           फिर उनको खप्पचियाँ बाँध दी गईं और फिर उनके समक्ष भोजन को परोस दिया गया। उन्हें खाना खाने के लिए आदेश देते हुए कहा गया, "अब आप सब भोजन कीजिए।"
            देवताओं और असुरों दोनों ने बहुत प्रयास किया परन्तु बाहें न मोड़ पाने के कारण वे खाना खाने में सफल नहीं हो पाए। वे चम्मच में खाना भरकर मुँह की ओर ले जाते तो बॅंधे हाथों के कारण खाना उनके मुँह में न जाकर जमीन पर गिर जाता। अब वे दोनों ही परेशान होने लगे, उनके समक्ष एक ही समस्या थी, "अब खाना कैसे खाया जाए?"
             असुरों की प्रकृति होती है कि वे कभी मिल-जुलकर रह नहीं पाते, अपने अहं के कारण सदा झगड़ते ही रहते हैं। यहाँ भी मिलकर खाने के विषय में वे असुर सोच ही नहीं पाए। उनका भोजन नीचे धरती पर गिरकर बिखरता हुआ समाप्त हो गया और वे बिनखाए भूखे ही उठ गए।
              दूसरी ओर देवता थे जो सहिष्णु और सबके हितचिन्तक होते हैं। उन्होंने बहुत विचार किया। फिर उन लोगों ने मिलकर एक उपाय सोचा और उस पर अमल करने लगे। सभी देवता गण आमने-सामने होकर बैठ गए। चम्मच में भोज्य लेते और सामने वाले के मुँह में डालते। इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते हुए ही उन्होंने भरपेट भोजन का आनन्द लिया। इस प्रकार देवताओं की बुद्धिमानी और परोपकार की भावना के कारण उनका भोजन बिल्कुल व्यर्थ में नष्ट नहीं हुआ और अपनी मेज से वे तृप्त होकर उठे। 
              यह कथा हमें यही समझाती है कि दूसरों के हित की चिन्ता करने पर अपना हित स्वयं ही सिद्ध हो जाता है। ईश्वर का न्याय है - 
           इस हाथ दो और उस हाथ लो।
बार-बार हम इस सत्य को भूल जाते है और स्वार्थ के हाथों विवश हो जाते हैं। यह स्वार्थ हमारी कामनाओं की पूर्ति का मात्र साधन नहीं है अपितु हमें मूर्ख बनाकर दिन-रात हमें ठगता रहता है। इस तरह हम भी अनजान बनकर अपना तमाशा स्वयं ही बन जाते हैं।
             मनुष्य जितना अधिक 'स्व' तक ही सीमित रहता है, उसे परेशानियो का सामना करना पड़ता है। परन्तु जब वह 'स्व' से ऊपर उठकर 'पर' यानी दूसरों के बारे में सोचना आरम्भ करने लगता है तो उसे सहज ही वह सब प्राप्त हो जाता है जिसे वह अपनी कल्पना में ही पाता रहता है। 
            इसीलिए हमारे मनीषी व्यष्टि(एक) से समष्टि(समूह या अनेक) की ओर चलने की बात करते हैं। यही कारण रहा होगा कि हमारे शास्त्रों में विश्व बन्धुत्व की परिकल्पना ककी गई। इसीलिए कहा जाता है- 
               वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् सारी पृथ्वी अपना घर है। 
             इस विचारधारा में सबको साथ लेकर चलने और मिल-जुलकर रहने की भावना बलवती होती है। हर मनुष्य को अपने घर-परिवार के आगे कुछ भी नहीं दिखाई देता। उन्हीं के लिए ही वह जीता है और सारा जीवन खटता रहता है। 
              स्वार्थ को हावी न होने देने के लिए परोपकार को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। सन्तुलित जीवन के लिए जरूरी है कि निजी स्वार्थ को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए।  जिससे 'मैं' और 'हम' के बीच सन्तुलन बना रहेजब मन में स्वार्थपरक विचार आने लगें तो वहीं रुक जाना चाहिए और रिश्तों की अहमियत को समझने का प्रयास करना चाहिए। मनुष्य को सदा यह समझना चाहिए कि  समाज के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है जिससे स्वार्थ स्वतः ही परोपकार में बदल जाएगा। 
           अतः सम्पूर्ण संसार को यदि मनुष्य अपना परिवार ही मान ले तो सारे फसाद की जड़ ही समाप्त हो जाएगी। तब हर ओर से हम शुभ की ही कामना करेंगे। तब कोई स्वार्थ किसी पर हावी नहीं होगा। सब एक दूसरे का हित साधेंगे और सहायता करेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

दुख और सुख अभिन्न मित्र

दुख और सुख अभिन्न मित्र

दुख और सुख मनुष्य के अभिन्न मित्र हैं। कभी सुख साथ निभाने आता है तो कभी दुख दनदनाते हुए आ जाता है। इन दोनों पर मनुष्य का कोई वश नहीं चलता। उसके चाहने अथवा न चाहने से कोई अन्तर नहीं पड़ता। ये तो यथासमय आकर अपना मधुर और रौद्र रूप दिखा जाते हैं। इन दोनों के चक्र व्यूह में फंसा हुआ बेचारा मनुष्य मात्र मूक दर्शक बना हुआ सब कुछ सहन करने के लिए विवश हो जाता है। 
            सुख और दुःख जीवन के अनिवार्य पहलू हैं जो मन की स्थिति और कर्मों के अनुसार आते-जाते रहते हैं, जैसे धूप-छाँव। सुख जहाँ सन्तोष देता है, वहीं दुःख जीवन के गहरे सबक सिखाता है। इन दोनों में सन्तुलन बनाए रखना और हर स्थिति को समान रूप से स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता और सच्ची शान्ति का मार्ग है। सुख का अर्थ है अनुकूल स्थिति, और दुःख का अर्थ है प्रतिकूल स्थिति है। ये दोनों हमारे मन के भाव हैं।सुख-दुःख सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। न तो सुख हमेशा रहता है, न ही दुःख सदा रहता है। महाभारत के अनुसार सुख और दुःख हमारे अपने कर्मों का ही परिणाम हैं।
            सुख का समय आने पर मनुष्य के साथी अपने-पराए सभी लोग बनना चाहते हैं। उसकी समृद्धि को देखकर उसके इर्द-गिर्द गुड़ पर मक्खियों की तरह मंडराने वाले बहुत से लोग भी आ जाते हैं। उसका प्रशस्ति गान करके उसके दिमाग को वे सातवें आसमान पर चढ़ा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बाद में उसकी निन्दा करने से बाज नहीं आते कि सुख-समृद्धि के आ जाने पर इसका दिमाग खराब हो गया है अथवा घमण्डी हो गया है। यह तो अपने बराबर किसी को नहीं समझता।
            उनकी परीक्षा केवल दुख के समय की जा सकती है। तभी कहा है-
        विपद कसौटी जो कसें ते ही साँचे मीत।
अर्थात् मुसीबत में जो साथ निभाते हैं, वही वास्तव में अपने होते हैं। इसलिए इनकी परख दुख की कसौटी पर की जाती है।
            उस समय वे स्वार्थी लोग अपना  समय व्यर्थ गॅंवाए बिना शीघ्र किनारा कर लेते हैं। फिर वे लोग ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उनसे कभी जान-पहचान भी नहीं थी। वे हमारे सामने से नजरें चुराकर, कन्नी काटकर निकल जाते हैं। ऐसे स्वार्थी बन्धु-बान्धवों से सावधान रहना मनुष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक होता है। आँखों से मोह-माया आदि की पट्टी हटा करके इन सबको पहचानने की आवश्यकता होती है ताकि कभी भी कोई उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ न कर सकें, उसका शीशे की तरह नाजुक हृदय टूटकर चकनाचूर न हो सके।
        जीवन में दुख को रोकने का एकमात्र उपाय यही है कि समय रहते यदि इस सच को स्वीकार कर लिया जाए कि इस असार संसार में सदा के लिए हमारा कुछ भी नहीं है, पहले भी हमारा कुछ भी नहीं था और भविष्य में भी हमारा कुछ नहीं रहेगा। यदि इस भाव को अपने अन्तस् में आत्मसात् कर लिया जाए तो फिर मन को कम कष्ट होता है। अन्यथा मनुष्य ऐसी विपरीत परिस्थितियों के आने पर अपनों द्वारा किए गए ऐसे अकल्पनीय व्यवहार से मानो टूटने लगता है।
            इस प्रकार अपने विवेक का सहारा लेकर मनुष्य यह समझ जाता है कि संसार के ये सभी पदार्थ उसे केवल भोगने के लिए मिले हैं, दिल से लगाने के लिए नहीं मिले। जिसके ये सकल पदार्थ है वह कभी भी उन्हें वापिस ले सकता है। जैसे यात्रा करते समय हम उस स्थान विशेष का ध्यान रखते हैं और यात्रा समाप्त होते ही उससे निस्पृह होकर अपने रास्ते चल पड़ते हैं। तब उस स्थान अथवा वहाँ की वस्तुओं के प्रति हमें मोह नहीं रहता। उन्हें बिना किसी परेशानी के छोड़ देते हैं।
            ओशो का कहना है कि दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दरअसल तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी पूँजी है।
      ओशो के इस कथन का तात्पर्य है कि हम जिसको बारबार याद करते हैं, वह हमें मिल जाता है। यदि दुखों को पुन: पुन: स्मरण करेंगे तो वे रूलाने के लिए हमारे पास आएँगे। इसके विपरीत यदि सुखों का स्मरण करेंगे तो सुख हमें खुशियाँ देने आ जाएँगे। अत: ध्यान हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। यदि हम उठते-बैठते, सोते-जागते चौबीसों घण्टे ही ईश्वर का ध्यान करेंगे तो उसे पा लेंगे। फिर चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होकर मुक्त हो जाएँगे।
             सार रूप में हम कह सकते हैं कि सुख में इतराना नहीं चाहिए और दुःख में घबराना नहीं चाहिए। जो इन्सान अपने मन की स्थिति को नियन्त्रित कर लेता है, वह सुख-दुःख से विचलित नहीं होता। सुख और दुख के क्रम को दिन और रात की तरह मानते हुए सहन करना चाहिए। मन में सदा यह विश्वास बनाए रखना चाहिए कि दुख के बाद सुख भी आएँगे। इसलिए सुख की आशा में दुख की काली घनी अन्धेरी रात के बीत जाने की परीक्षा धैर्यपूर्वक करनी चाहिए और ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद