जीव की पहचान अपनी जाति से
हर जीव अपनी जाति से पहचाना जाता है। इसका अर्थ यही है कि हम मनुष्य हैं, वे पशु हैं, पक्षी हैं अथवा जलचर और नभचर हैं इत्यादि। ईश्वर ने यही वर्गीकरण करके जीवों को इस संसार मे भेजा है। उसके विभाजन में बिल्कुल स्पष्टता है। शेष सब मानव मस्तिष्क की खुराफात है। इसी मानव ने अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करके अनावश्यक ही मनुष्यों को विभिन्न जातियों में बॉंटने का अपराध किया है।
न्यायदर्शन का कथन है -
समान प्रसवात्मिका जाति:।
अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में समान बुद्धि पैदा करने वाली जाति है।
न्यायदर्शन हमें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि एक समान बुद्धि वालों की एक ही जाति होती है। इस तथ्य को हम इस तरह भी कह सकते हैं कि विद्वान, मूर्ख आदि के प्रकार से यदि जातियों का विभाजन किया जाए तो शायद अधिक उपयुक्त प्रतीत होगा।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि जातियों का विभाजन उनके गुण और कर्म के आधार पर किया गया। यह विभाजन कोई रूढ़ नहीं था। चारों जातियों के लोग यदि अपना कर्म परिवर्तित कर लेते थे तो उस कर्म के अनुसार ही उनकी जाति भी बदल जाती थी।
संस्कृत भाषा के कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक 'राजतरंगिनी' में लिखा है कि दुनिया में प्राय: देखा गया है कि सब जीवों को अपनी ही अपनी ही जाति वालों से भय होता है। वे कहते हैं कि बाज पक्षियों को मारता है, शेर वन में पशुओं को मारकर खा जाता है, मणियाँ हीरों के द्वारा भेदी जाती हैं, कुदाल से पृथ्वी खोदी जाती है, वायु के द्वारा पुष्प गिराए जाते हैं और सूर्य के द्वारा नक्षत्र निस्तेज कर दिए जाते हैं।
कवि कल्हण का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वे कहते हैं, 'हम मनुष्यों की बात करें तो वे जाति के नाम पर जो भी अत्याचार और अनाचार करते हैं, वे किसी से भी छुपे हुए नहीं हैं। हर दूसरे दिन ऐसे हृदय विदारक समाचार सोशल मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं। एक-दूसरे के सिर पर दोष मढ़कर सभी लोग अपना पल्लू झाड़कर बचकर निकल जाना चाहते हैं। उच्च जाति का यह घमण्ड मानव समाज को रसातल की ओर ले जा रहा है।'
भगदत्त जल्हण ने 'सुक्तिमुक्तावली' नामक अपने ग्रन्थ में कहा है -
शुनक: स्वर्णपरिष्कृतगात्र:
नृपपीठे विनिवेशित: एव।
अभिषिक्तश्च जलै: सुमुहुर्ते
न जहात्येव गुणं खलु पूर्णम्॥
अर्थात् कुत्ते को स्वर्ण अलंकारों से विभूषित करके राजसिंहासन पर बैठाकर यदि अच्छे मुहुर्त में जल से अभिषेक कर दिया जाए तो भी कुत्ता अपना जातिगत गुण नहीं छोड़ता।
हर मनुष्य को बराबर समझने वाले विचार तो न जाने कहीं खोते जा रहे हैं। इसका खमियाजा समस्त मानव जाति को भुगतना पड़ रहा है।
जैन आचार्य और दार्शनिक वाचकवर श्री उमास्वाति (उमास्वामी) महाराज ने अपने ग्रन्थ 'प्रशमरतिप्रकरण' में हमें समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा है, 'ससार में परिभ्रमण करते हुए लाखों-करोड़ों बार जन्म लेकर असंख्य बार प्राप्त हुई नीच, ऊँच और मध्यम अवस्थाओं को जानकर कौन बुद्धिमान जातिमद करेगा? कर्मवश संसारी प्राणी इन्द्रियों की रचना से उत्पन्न होने वाली विभिन्न जातियों में जन्म लेता रहता है। यहाँ पर किसकी, कौन-सी जाति स्थायी रह सकती है? इसलिए जाति का घमण्ड नहीं करना चाहिए।'
पता नहीं कितने जन्मों में हम अपने कृत कर्मों के अनुसार किस-किस जाति में जन्म लेकर आए हैं तो फिर यह ऊँच-नीच का भेद करने का कोई औचित्य समझ नहीं आता। छोटे या बड़े किसी भी मनुष्य के बिना हम अपने जीवन में आगे नहीं चला सकते। हमें अपने दैनिक जीवन में हर प्रकार के व्यवसाय के व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके बिना हम स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। उस समय मानो चक्का जाम हो जाता है और हम परेशान हो जाते हैं।
निम्न मन्त्र विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' के प्रथम मण्डल का 25वाँ सूक्त से है। इसके ऋषि शुनःशेप आजीगर्ति हैं और देवता वरुण हैं। यह मन्त्र पापमुक्ति और जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना का प्रतीक है -
उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पांश माध्यम चृत।
अवाधमानि जीवसे।
अर्थात् हे वरुण! देव हमें ऊपरी बन्धनों (पापों) से मुक्त करो, मध्य के बन्धनों को खोल दो और निचले बन्धनों को भी ढीला कर दो ताकि हम जीवित रह सकें और धर्म के मार्ग पर चल सकें।
चन्द्र प्रभा सूद
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