भाग्य व्यक्तिगत बैक बैलेंस
प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य उसका अपना व्यक्तिगत बैक बेलैंस होता है जो जन्म-जन्मान्तरों तक सभी लोगों के खाते में मल्टीप्लाई होता रहता है। हम सबका वास्ता बैंक से पड़ता रहता है। इसलिए हम बैंक की कार्यप्रणाली के विषय में भली-भॉंति जानते-समझते हैं। हम अपने-अपने बैंक अकाऊँट में पैसा जमा करवाते हैं अथवा निकालते हैं। जो धन हम जमा करवाते हैं, उस पर ब्याज मिलता है। इससे हमारा धन बढ़ता जाता है। इसके विपरीत धन निकालने से कोई ब्याज नहीं मिलता बल्कि हमारा उतना धन कम हो जाता है।
उसी प्रकार हम अपने सुकर्मों की कमाई को अपने भाग्य के खाते में जमा करते हैं तो हमारे शुभकर्म बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब हम अपने कुकर्मों की कमाई करते हैं तो हम उस पूँजी को अपने खाते में जमा करवाते हैं। सद्कर्मों के फलस्वरूप उन शुभ फल मिलता है। हम हर प्रकार से सुविधा सम्पन्न बनकर सुख भोगते हैं। जब हम अशुभ कर्मों का कुफल हम भोगते हैं तो हमें जीवन में कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।इसका अर्थ यही होता है कि हमने अपने खाते में से उन उतने कर्मो की पूँजी निकालकर खर्च कर ली है। इस प्रकार लेन और देन का यह क्रम अनवरत चलता रहता है।
हम कुछ जान भी नहीं पाते परन्तु हमारा यह खाता नित्य ही आटोमेटिकली कम अथवा अधिक होता रहता है। शुभकर्मों की इस खाते में यदि अधिकता होती है तभी जीव को मानव के रूप में जन्म मिलता है। उसमें भी हमारे कर्मानुसार हमें सुख-शान्ति, भौतिक सम्पत्ति, अच्छा घर-परिवार, रिश्ते-नाते, बन्धुजन, रूप-सौन्दर्य और सामाजिक रुतबा आदि मिलते हैं। शुभकर्मौं के कम होने मानव जन्म तो मिलता है पर जीवन अभावों में गुजरता रहता है।
इसके विपरीत यदि हमारे अशुभ कर्मों की अधिकता होती है तो जीव को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मानुसार चौरासी योनियों के भयावह चक्र से गुजरना पड़ता है। मनुष्य योनि को छोड़कर ये सभी योनियाँ भोगयोनि कहलाती हैं। अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगकर जीव को फिर से मानव जन्म की प्राप्ति होती है।
यह एक बहुत बड़ा सत्य है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है पर उनका फल भोगने में नहीं। अपने किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का फल उसे भुगतना ही पड़ता है, उसे किसी भी तरह इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। चाहे वह कितने ही उपाय क्यों न कर ले। वह अपनी इच्छा से तीर्थों की यात्रा करे, तन्त्र या मन्त्र का सहारा या तथाकथित धर्मगुरुओं के पास चला जाए, उनसे किसी भी तरह से मुक्ति सम्भव नहीं होती।
इन्सान कहता है कि जब वह गलत काम करता है अथवा कुमार्ग पर चलता है तब ईश्वर उसे उस समय सन्मार्ग क्यों नहीं दिखाता, चुप क्यों रहता है? सोचिए, यह तो हुई चोरी और सीनाजोरी वाली बात। जब भी मनुष्य शुभकर्म करता है तब वह मालिक उसे उत्साहित करता है। जब वह अशुभकर्म करता है तब वह उसे चेतावनी भी देता है। सुकर्म करते समय मन से प्ररेणादायक आवाज आती है और दुष्कर्म करते समय अन्तस से समझाने जैसी आवाज आती है। उसके अपने मन में विचारों का अन्तर्द्वन्द्व होने लगता है।
यह मनुष्य है कि अपने स्वार्थों को पूर्ण करने में इतना अन्धा हो जाता है कि वह बार-बार उस अन्तरात्मा की आवाज को अनसुना करता रहता है। सन्मार्ग पर चलने के स्थान पर कुमार्ग पर चलने लगता है। फिर बाद में वह दोषारोपण करने से भी बाज नहीं आता।
सुख-ऐश्वर्य का समय जीवन में आने पर वह गर्व से इतराता फिरता है कि मेरे परिश्रम के फलस्वरूप मुझे यह सब मिला है। तब उसे ईश्वर को याद करने का ध्यान ही नहीं आता। इसके विपरीत जब उसके जीवन में दुख और परेशानियाँ आती हैं तब वह ईश्वर को दोष देता है। उसे अपनी की गई गलतियों की जरा भी याद नहीं आती। वह सारा समय मालिक को और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
उसे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं होता कि उसका तो भाग्य ही खराब है अथवा मेरा भाग्य ही मुझसे रूठ गया है। उसे स्मरण करना चाहिए कि। यह भाग्य अथवा यह किस्मत हमारी सखी नहीं है जो बार-बार हमसे रूठ जाती है और फिर जब मनाएँगे तब मान जाएगी। हर जन्म यदि मानव जीवन का चाहिए तो अभी से अपने कर्मों पर लगाम लगानी आरम्भ कर देनी चाहिए। सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। जहाँ तक हो सके ईश्वर को साक्षी मानकर अपने जीवन की डोर उसके हाथ में सौंप देनी चाहिएओ भोगना उतना ही कठिन होता है। मित्रता करना और उसे निभाना दोनों ही कठिन कार्य कहे जाते हैं। अपने अतिप्रिय मित्र को भी पलभर में अपना दुश्मन बनाया जा सकता है पर दुश्मन को अपना बनाना टेढ़ी खीर होता है। उन दोनों में परस्पर विश्वास हो जाना असम्भव नहीं पर कठिन अवश्य होता है क्योंकि अविश्वास की एक रेखा उनके मनों में छुपी रहती है। इसलिए उन दोनों में पूर्ण समर्पण का भाव नहीं आ सकता है।
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