आँखे हमारा आईना
ऑंखें मनुष्य जीवन के लिए बहुत उपयोगी हैं। यह पॉंच ज्ञानेन्द्रियों में से एक है। इनके बिना व्यक्ति लाचार हो जाता है। वह इस सतरंगी दुनिया के नहीं देख सकता। उसे अपने लिए किसी सहारे की आवश्यकता पड़ती है। हमारी ऑंखे आखिर क्या काम करती हैं? जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उससे परावर्तित प्रकाश हमारी ऑंखों में प्रवेश करता है। इसी कारण हम देखने का कार्य करते हैं। प्रकाश कॉर्निया से होकर प्रवेश करता है जो आँख के सामने एक खिड़की की तरह काम करता है।
आँखे हमारा आईना होती हैं। जो भाव हमारे मन में होते हैं, उन्हें ये प्रकट कर देती हैं। ये जो आँखे हैं, बहुत ही दुष्ट और नालायक हैं जो कभी हमारा कहना नहीं मानतीं। ये आँखें बहुत चुगलखोर होती हैं जो न चाहते हुए भी हमारे मन के भावों की सबके समक्ष चुगली कर देती हैं। ऊपर से मनुष्य चाहे कितना ही न न करते रहें परन्तु इनकी बदौलत उसकी चोरी पकड़ी ही जाती हैं। ये ऑंखें हैं ही ऐसी कि किसी का लिहाज नहीं करती। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सामने कौन बैठा है? किसके सामने संयम रखना होता है?
सुख, खुशी, दुख, सन्तोष, ईर्ष्या, क्रोध, वात्सल्य आदि मानव मन के सभी भाव और सारी संवेदनाएँ, उसकी इन आँखों से ही प्रकट होती हैं। जब भी मनुष्य के जीवन में खुशी का समय आता है या गम अनचाहे आ जाते है तब मौका मिलते ही ये तालाब की तरह भर आती हैं। गंगा-यमुना की धारा की भाँति ये बहने लगती हैं अथवा फिर बादलों की तरह बरसने लगती हैं। जहाँ मन के विपरीत कोई घटना अथवा बात हो जाती है, वहीं पर ये छलकने लगती हैं और मनुष्य की वेदना को प्रकट करने लगती हैं।
काली, नीली, कजरारी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें कवियों की रचनाओं के लिए सदा ही प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। इन ऑंखों की गहराई में डूबते-उतरते हुए कवियों ने इनके सौन्दर्य को लेकर बहुत से काव्य लिखे हैं। यत्र तत्र उन सभी काव्यों की सराहना भी की गई है। उनको पढ़कर ऐसे कवियों को दाद दिए बिना कोई सहृदय पाठक नहीं रह सकता।
इनकी चितोरी चितवन से कोई बच नहीं सकता। इनके कटाक्ष बाण किसी को भी घायल कर सकते हैं। न जाने कितने ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की गहन तपस्या इन्होंने भंग की है। आज भी इनके सौन्दर्य से किसी संसारी व्यक्ति का बच पाना सम्भव नहीं है।
गम्भीरता का भाव लिए आँखे व्यक्ति के मन की पवित्रता और गहराई को प्रकट करती हैं। सरलता और सहजता के भाव वाली आँखे मनुष्य के हृदय की विशालता को दर्शाती हैं। बच्चों की तरह चंचल आँखें मानव मन की चंचलता का परिचायक होती हैं। क्रूरता या निर्दयता के भाव वाली आँखों से सभी बचना चाहते हैं। क्रोध से भरी हुई आँखों से डरकर लोग सहम जाते हैं और किनारा करने में अपनी भलाई समझकर कहीं भी छुप जाते हैं।
किसी अपने के मिलने के समय अथवा वियोग के समय ये अनायास ही बिन बुलाए हुए मेहमान की तरह ये ऑंखें ऑंसू टपकाने लगती हैं। प्रसन्नता का समय होने पर हमारा साथ देती हैं। अत्यधिक कष्ट के समय ये मनुष्य के मनोबल को कमजोर बनाती हैं।
ऑंखों से निकलने वाले ये आँसू किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं। स्त्री या पुरुष दोनों पर ये समान रूप से अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कठोर कहे जाने पुरुष भी असहनीय कष्ट या किसी अनहोनी के समय अपने ऑंखों से बहते इन आँसुओं को रोक नहीं पाते, उस स्थिति में उनकी तथाकथित कठोरता न जाने कहॉं गायब हो जाती है?
स्त्रियों को तो वैसे भी कमजोर दिल और करुणामयी कहा जाता है। इसलिए हर स्थिति का प्रभाव उन पर अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसीलिए उनकी ऑंखों से आँसू किसी-न-किसी बात पर छलक आते हैं। पुरुष प्राय: यह दोषारोपण करते हैं कि स्त्रियाँ इन आँसुओं का अपनी बात मनवाने के लिए सदा हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। हालॉंकि यह कह देना उनकी सच्चाई पर प्रहार करना होता है। निस्सन्देह इसके अपवाद भी हो सकते हैं।
मक्कारों की ऑंखों से बहने वाले घड़ियाली आँसुओं से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता होती है। पता नहीं इन पर पिघल जाने वालों की पीठ में कब ये छुरा घोंप दें, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्वार्थी लोग प्राय: दूसरों को चकमा देकर भ्रमित करते हैं।
ये आँसुओ से भरी हुई आँखे वास्तव में दो हृदयों को जोड़ने के लिए एक पुल का कार्य करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। जो व्यक्ति इनके जाल में उलझ गया वह तो समझो काम से गया। जो इनसे बचकर निकल गया वह संयमी कुछ भी कर सकने में समर्थ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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