बुधवार, 4 मार्च 2026

ईश्वर का निवास हमारा हृदय

ईश्वर का निवास हमारा हृदय 

परमपिता परमात्मा जिसे हम सब लोग ऊपरवाला
कहते हैं, वह वास्तव में हमारे हृदयों में निवास करता है। बस हम उसे अपने इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख पाते। इसलिए उससे हम दूरी बना लेते हैं। उसे पाने की यदि ललक सच्ची हो तो वह हमें मिल जाता है। पंजाबी सूफी कवि बुल्लेशाह जी ने प्रभु को पाने के विषय में कहा है -
        बुल्लिआ रब दा की पौणा। 
       एत्थों पुटणा ओत्थे लाउणा।
अर्थात् बुल्लेशाह जी का कहना है कि रब यानी ईश्वर को पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस इस क्यारी से उखाड़ कर उस क्यारी में लगा देना है। दूसरे शब्दों में कहें तो मन को सांसारिक वस्तुओं से हटाकर ईश्वर में लगा दो और रब मिल जाएगा।
            वह मालिक बैठा-बैठा बस हम लोगों को देखता रहता है और मजे लेता रहता है। कभी-कभी हम उससे बिना कारण रूठ जाते हैं तो कभी मान जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में जब हमें अपरिहार्य स्थितियों का सामना करना पड़ता है तो हम उससे रूठ जाते हैं और उससे शिकायत करते हुए कहते हैं कि उसने सारे दुख और कष्ट सिर्फ हमारी झोली में ही डाल दिए हैं। हमें ऐसा लगता है कि उसे कोई और नहीं मिलता। बस हमीं उसे दिखाई देते हैं।
            इसलिए उसे हम यह धमकी भी दे देते हैं कि अब तुझे याद नहीं करेंगे और न ही तेरी पूजा करेंगे। समय बीतते-बीतते जब सब स्थितियाँ अनुकूल हो जाती हैं तो फिर हम बच्चों की तरह उससे अब्बा कर लेते हैं अर्थात् उसकी शरण में चले जाते हैं। सच तो यह है कि हम बहुत समय तक उससे दूर नहीं रह सकते। हम सभी उसी का अंश हैं तो फिर उससे अधिक दिनों तक रूठना सम्भव नहीं हो पाता।
              जब हम अपनी मनोनुकूल वस्तुओं को प्राप्त कर लेते हैं, तब यह आवश्यक नहीं रह जाता कि हम उसका स्मरण कर लें या उसका धन्यवाद कर दें। उस समय भी हमारी कृतघ्नता पर वह न हमसे नाराज होता है और न ही रूठता है। यदि वह कभी हमसे रूठ जाए या नाराज हो जाए तब हम पलभर भी चैन से जी नहीं सकेंगे, यह बिल्कुल निश्चत है।
             ईश्वर की सन्तान मनुष्य छोटे बच्चों की तरह अलग-अलग रोल करते दिखाई देते हैं। कभी बन्दूक उठा लेते हैं और अपने मुँह से ठॉय-ठॉय बोलते हुए उसे चलाने लगते हैं। कभी हम गाड़ियाँ चलाते हैं, कभी गुड्डे-गुड्डियों के खेल की तरह हम इन्सानों के जीवन से खिलवाड़ करने लग जाते हैं। हम भाँति-भाँति के खेल खेलते रहते हैं।
               हम कभी नेता-अभिनेता के पात्रों में ढलकर अभिनय करते हैं। कभी हम राजा, चोर और सिपाही के खेल खेलते दिखाई देते हैं। कभी हम जज-वकील बनकर न्याय करते हैं। अध्यापक बनकर कभी हम खेल-खेल में दूसरों को पढ़ाने का उपक्रम करते हैं। हम कभी सेवाकार्य करके उसे और दूसरे लोगों को रिझाते हैं। कभी पण्डे-पुजारी के रूप आ जाते हैं। तब पूजा-पाठ कराने का खेल खेलने लगते हैं। कभी कार्टून पात्रों की तरह हम व्यवहार करते हैं। कभी अच्छे व सज्जन लोगों के रोल निभाते हैं और कभी दुर्जन बनकर मस्ती करते हैं। कभी हम‌ ज्ञानी-ध्यानी बनते हुए सबको संस्कार देते हैं तो कभी अत्याचारी बन जाते हैं। 
              कहने का तात्पर्य यही है कि हम अपने जीवन में सदा अदाकारी दिखाते रहते हैं। वह बस हमारी कलाकारियों को निरखता रहता है और मुग्ध होता रहता है। जब हम अपनी सीमाएँ पार करने लगते हैं तब वह हमें चेतावनी देता है कि यह कार्य मत करो। पर जब हम डीठ बन जाते हैं या चिकने घड़े बन जाते हैं, उस चेतावनी को अनसुना कर देते हैं तब वह हमें सजा के रूप में कष्ट और परेशानियाँ देता है।
            जब हम उसकी चेतावनी के अनुसार कार्य करते हैं तब वह हमारी मनोकामनाएँ पूरी करके हमें खुशियों और समृद्धि का उपहार देता है। शाबाशी के तौर पर वह हमें यश देता है, सहृदय परिवारी जन व मित्र देता है। वह हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर  चलाता हुआ हमें सफलता देता है।
             परमपिता परमात्मा हमारे भौतिक संसार के माता-पिता की ही तरह हमारे साथ व्यवहार करता है। उन्हीं की तरह हमारे सुख-दुख आदि में हमारा साथ देता है। परेशानी से उभरने के लिए हमें रास्ता दिखाता है। जैसे हम उनके इशारों पर चलते हैं वैसे ही हमें उस मालिक के इशारों को अथवा चेतावनी को समझना चाहिए। वास्तव में इसी में हमारा लाभ निहित है।
               वह परमपिता हमारा माता, पिता, भाई, बन्धु, मित्र सब कुछ है। उससे बड़ा और कोई हमारा हितैषी नहीं हो सकता। वह हमारी बालकोचित क्रीडाओं पर हँसता और मुस्कुराता है। उसे इसी रूप में रखना हमारा दायित्व बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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