रविवार, 1 मार्च 2026

सफलता के लिए

सफलता के लिए

अपने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति सदैव सफलता का व्रत करना चाहता है। कोई भी व्यक्ति असफल होने के विषय में विचार नहीं करना चाहता। किसी भी कार्य को सावधानी पूर्वक करना चाहिए। किसी भी कार्य की सफलता के लिए मनुष्य के पास दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता होता है शार्टकट वाला, यानी गलत मार्ग। जबकि दूसरा रास्ता लम्बा और सीधा होता है। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह कितना धैर्यशाली है? वह किस मार्ग का चुनाव करता है? 
             मनुष्य यदि धैर्यवान् एवं निष्ठावान् होगा तो वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए अथक प्रयास करेगा। दिन-रात मेहनत करता हुआ वह अपने उद्देश्य में अवश्य सफल होगा। उसे अपने रास्ते पर चलते हुए अनेक प्रलोभनों का सामना करना पड़ता है। अनेक कठिनाइयाँ उसका रास्ता रोक लेती हैं। वह लगनशील व्यक्ति उन प्रलोभनो से किनारा करता हुआ, सभी कठिनाइयों को सुलझाता हुआ अपने सीधे रास्ते पर चलकर मंजिल तक पहुँच जाता है। ऐसे ही कर्त्तव्यनिष्ठ पुरुषार्थियों का लक्ष्य उनका रास्ता बड़ी ही बेसब्री से देखता है।
               इनके विपरीत सुविधाभोगी लोग हमेशा सरल मार्ग ढूँढते रहते हैं। वे लम्बे मार्ग की अपेक्षा शार्टकट अपनाना पसन्द करते हैं। इस सरलता की खोज करते हुए वे यदा कदा अपने रास्ते से भटक जाते हैं और गलत हाथों में पड़ जाते हैं। समाज और न्याय व्यवस्था के अपराधी बनने में उनको देर नहीं लगती। ऐसे कार्य करके वे स्वयं को और अपनों को संकट में डाल देते हैं। उस समय वे अपने बन्धु-बान्धवों की शर्मिंदगी का कारण जाने-अनजाने बन जाते हैं।
              अधीरता सदा ही हानिकारक होती है। उसके दूरगामी भी परिणाम उतने ही निराशाजनक होते हैं। जल्दबाजी में भी जो कार्य किए जाते हैं वे सुलझने के स्थान पर उलझ जाते हैं। तब मनुष्य उनको सुलझाने में और अधिक दुखी हो जाता है। उसे समझ नहीं आता कि वह इस स्थिति में क्या करे और क्या न करे? यह दुविधा की स्थिति उसके लिए परेशानी का कारण बन जाती है।
              'महाभारत' के शान्तिपर्व में वेद व्यास जी कहते हैं -
      नासम्यक् कृतकारी स्यात् अप्रमत्त: सदा भवेत्।
      कण्टकोSपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम्॥
अर्थात् अनुचित तरीके से काम नहीं करना चाहिए, सदा सावधान रहना चाहिए। काँटा भी यदि सही ढंग से न निकाला जाए तो वह भी बहुत समय तक कष्टकारक होता है।
             इस श्लोक का यही कथन है कि हमेशा चौकस रहना चाहिए। गलत तरीके से किए गए कार्य का परिणाम दुखदायी होता है। यहाँ काँटे का उदाहरण देते हुए वे कह रहे है कि यदि काँटा चुभ जाए तो उसे ध्यान से निकालकर फैंक देना चाहिए। यदि उसका कुछ भी अंश शरीर में बचा रह जाए तो वह नासूर बन जाता है। तब आपरेशन करवा करके उसे निकलवाना पड़ता है। फिर कोई गारण्टी नहीं कि मनुष्य पूर्णरूपेण ठीक हो पाएगा। इसलिए ध्यान से अपना काम करना चाहिए।
          उसी प्रकार अपनी सुविधा के लिए पथभ्रष्ट होकर कुमार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति की भी कोई गारण्टी नहीं है कि वह समाज के लिए नासूर नहीं बन जाएगा। अथवा पूरे मन से सन्मार्ग का पुन: पथिक बन सकेगा। यदि वह मुख्य धारा का मन से अनुगामी बन जाए तो उसका सौभाग्य होगा। अन्यथा उसे सारा जीवन समाज में अभिशप्त जीवन जीना पड़ता है। यह परिस्थिति उसके लिए बहुत कठिन होती है।
             यदि मनुष्य अपने कुमार्ग का परित्याग नहीं करता तो समाज ही उसका बॉयकाट कर देता है। उसे सम्मान के स्थान पर तिरस्कार मिलता है। वह नासूर बनकर समाज को दूषित न करे इसलिए उसे अलग-थलग करके सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। उसके अपने प्रियजन भी समाज के डर से उस समय उससे किनारा कर लेते हैं। यह उसके दुख का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। वह जीवित रहते हुए, सबके साथ की कामना करता हुआ अकेलेपन का शिकार हो जाता है।
             गलत तरीके से कमाया हुआ धन-वैभव, अर्जित की गई विद्या अथवा अन्य कोई सम्मान समय बीतते सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। तब मनुष्य को अपनी पोल खुल जाने पर सबके सामने सिर नीचा करना पड़ता है। उसे जग हंसाई का सामना करना पड़ता है। तब वह अपना मुॅंह छिपाने के लिए विवश हो जाता है। उसके अपने परिवार के लोग उसे लानत-मलामत करने लगते हैं। उसका सम्मान नहीं करते।
              मनीषी जन इसीलिए उचित मार्ग से अपने कार्यों की सिद्धि और अनुचित मार्ग का त्याग करने का परामर्श देते हैं। जीवन में कल्याण की कामना करने वाले मनुष्य को इस आत्म अनुशासन का मन से पालन करना चाहिए। तभी उसे सर्वत्र मान-सम्मान मिलता है। इस प्रकार करने से उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद 

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