अग्नि का गुण
अग्नि का स्वाभाविक गुण जलाना होता है। हम इसे छू नहीं सकते। हम जानते हैं कि यदि इस पर हाथ रखेंगे तो वह जल जाएगा और तब हाथ पर फफोले पड़ जाऍंगे। फिर बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा। अग्नि का मुख्य गुण रूपान्तरण होता है जो उष्णता, तेज और प्रकाश प्रदान करना है। यह पंचतत्वों में से एक है। यह गर्म करने, पचाने और किसी भी पदार्थ को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। इसके अन्य गुणों में तीक्ष्णता, गतिशीलता, शुष्कता, हल्कापन और प्रकाश फैलाना शामिल है जो शारीरिक व मानसिक दोनों स्तरों पर क्रियाशील हैं।
अग्नि से हमारा जीवन चलता है। हम हर प्रकार के अन्न को इसी के माध्यम से पकाकर खाते हैं और स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लेते हैं। यदि यह अग्नि न होती तो हम आज भी आदि मानव की तरह पेड़ों से तोड़कर सब कच्चा ही खाते। इसी अग्नि के कारण हम जीवन में सभी प्रकार की सुख और सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं। हमारे घर और बाहर हर ओर रौशनी होती है।
अग्नि तीन प्रकार की मानी जाती है- दावानल, बड़वानल और जठराग्नि। दावानल जंगल में लगने वाली आग को कहते हैं जो जरा-सी हवा चलने पर बड़े-बड़े जगलों को जलाकर राख कर देती है। उसमें बड़े-बड़े वृक्ष, पशु और पक्षी जलकर खाक हो जाते हैं। बड़वानल समुद्र में लगने वाली आग को कहते हैं। पानी की यही आग है जिससे हम बिजली बनाते हैं और अपने जीवन में सारी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं।
जठराग्नि मनुष्य के शरीर में होती है। यह भोजन को अच्छे से पचाने में सहायता करती है। शरीर की अग्नि जब सुचारू रूप से काम करती है तब मनुष्य के चेहरे पर तेज चमकता है उसकी रौनक ही अलग दिखाई देती है। युवावस्था में प्राय: लोगों के चेहरों पर हम देख सकते हैं। अपने जीवन को संयमित रखने वालों के चेहरों पर तेज हमेशा दिखाई देता है।
शरीर में जठराग्नि सही स्थिति, मन की स्पष्टता, तीक्ष्ण बुद्धि और साहस प्रदान करती है।यदि यह अग्नि शरीर में बढ़ जाए तो बहुत-सी परेशानियों को जन्म देती है। मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है। पसीना भी बहुत अधिक आने लगता है। एसिडिटी और रक्त सम्बन्धी दोष शरीर में हो जाते हैं। शरीर में जलन होने लगती है। जरा-सी ठण्ड लग जाने पर खाँसी-जुकाम जैसी परेशानी हो जाती है। बारबार छींकते रहना पड़ता है। आवाज भारी हो जाती है और गला बैठने लगता है।
यदि शरीर की अग्नि मन्द हो जाती है तो मनुष्य का चेहरा कान्तिहीन हो जाता है। उस समय उसे बहुत से रोग घेर लेते हैं। उसकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे उसका भोजन पच नहीं पाता। पेट की बहुत-सी बिमारियों से मनुष्य घिर जाता है। पेट खराब हो जाने से खाने-पीने में परहेज करना पड़ता है।
कभी घरों, बाजारों या फैक्टरियों आदि में आग लग जाए तो कितना नुकसान कर देगी पता नहीं। न जाने कितने ही लोगों की जान भी चली जाती है। यह अग्नि किसी को भी क्षमा नहीं करती जो इसमें घिर जाता है, वह फिर भस्म हो जाता है। परन्तु जब यह अग्नि तेजहीन होकर बुझ जाती है तो चींटियाँ भी इस पर चलने लगती हैं। इसी प्रकार मनुष्य जब रोगों से घिर जाता है तो वह भी तेजहीन हो जाता है। उसका चेहरा पीला या सफेद पड़ जाता है। उस समय वह सामर्थ्यहीन होकर ईश्वर से अपनी मृत्यु की गुहार लगाता है।
अग्नि के प्रभाव से विभिन्न पदार्थ रूप परिवर्तित करते हैं। अग्नि हमेशा ही शुद्ध होती है। इसमें कैसा भी कचरा डाल दो, वह उसे भस्म कर देती है। इसी अग्नि में ही हम शव का दाह संस्कार भी करते हैं। किसी वस्तु अथवा विचार की शुद्धता की परीक्षा अग्नि में तपने के बाद ही होती है। यह रूक्ष होती है। अग्नि संयोग और वियोग दोनों का ही कारण भी होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री और पुरुष के प्रेम का आधार अग्नि तत्त्व होता है। इसी के कारण सृष्टि की सर्जना होती है। इसके मन्द पड़ जाने पर अलगाव की स्थिति बन जाती है।
अग्नि का सबसे महत्वपूर्ण गुण भोजन, भावनाओं और विचारों को पचाकर उन्हें ऊर्जा में रूपान्तरित करना है। यह शरीर को पोषक तत्व अवशोषित करने में सहायता करती है। शारीरिक क्रियाओं को यह तेज और सुचारू बनाती है।अग्नि तीखी और तेज होती है जो बहुत तेजी से जल सकती है या धीमी गति से भी सुलग सकती है। अग्नि अपने सम्पर्क में आने वाली हर वस्तु को अपने में समाहित करने, भस्म करने या पवित्र करने का गुण रखती है।
अग्नि का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व भी है। वेदों में अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है जो यज्ञ, हवन के द्वारा को विभिन्न देवताओं का भाग उन तक पहुँचाती है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में इसके असन्तुलित हो जाने पर अग्नि विषमाग्नि यानी कभी तेज, कभी धीमी हो जाती है। कभी यह तीक्ष्णाग्नि यानी बहुत तेज हो सकती है। दोनों ही स्थितियों में यह मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
अग्नि हर स्थान पर अपनी शुद्धता को दर्शाती है। इसके होने पर तेज, प्रकाश और ताप से ही इस सृष्टि का जीवन है। इसके न होने पर चारों ओर अन्धकार तथा शीत का प्रकोप हो जाएगा जिसके कारण इस जीव जगत का अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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