जिजीविषा
जिजीविषा एक संस्कृत शब्द है। इस शब्द का अर्थ होता है जीने की प्रबल इच्छा अथवा जीवन के प्रति गहरा लगाव होता है। जीवन जीने की चाह, जीवन जीने की कला अथवा दीर्घायु की महत्वाकांक्षा। यह शब्द उस मानवीय जजबे को व्यक्त करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को न छोड़ने की प्रेरणा देता है। किसी व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों के बावजूद जीवन जीने की तीव्र लालसा, उत्साह और जीवटता को दर्शाता है।
जिजीविषा शब्द का प्रयोग प्रायः उन लोगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। यह शब्द दर्शाता है कि मनुष्य अपने जीवन से कितना प्यार करता है और उसे बनाए रखने के लिए उसमें कितनी अदम्य इच्छाशक्ति है। जिजीविषा का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती तो वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े, दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर प्रतिदिन ईश्वर से मृत्यु की कामना करता है। उसकी स्थिति को देखते हुए उसकी मनःस्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं।
यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात लगती है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे मनुष्य के रूप में अवतरित हुए तब उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बस बैठा-बैठा कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ होना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह व्यक्ति मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई दे जाती हैं।
हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी मनुष्य का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य या विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है। इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उबर जाता है। उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
हम देखते हैं कि प्रकृति में भी जिजीविषा होती है। तभी सूखे और ठूॅंठ हो चुके पेड़ों में भी हरियाली देखी जा सकती है। इसी प्रकार मनुष्य की जिजीविषा असम्भव को भी सम्भव बना देती है। जिजीविषा मानव मन की अद्भुत शक्ति का प्रतीक होती है जो हमें हर परिस्थिति में जीवन को अपनाने और उसका जश्न मनाने की प्रेरणा देती है।
कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे बिना डगमगाए खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही मनुष्य आकाश की बुलन्दियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलतापूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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