मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

पल की खबर नहीं

पल की खबर नहीं 

पल की खबर नहीं कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व जन्म कृत कर्मों के अनुसार हम इस संसार में सीमित समय के लिए आए हैं। यहॉं से विदा होने के विषय में हम नहीं जानते। इसकी जानकारी तो केवल सृष्टि कर्ता ईश्वर को है, हम मनुष्यों को नहीं है। हम तो बस उस प्रभु के हाथ की कठपुतलियॉं हैं। जैसा वह चाहता है वैसा कार्य हम लोगों से करवा लेता‌ है। निम्न उक्ति हम सबने बहुत बार सुनी है और कहीं भी है -
          सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
यह उक्ति प्राय: हम सभी यदा-कदा दोहराते रहते हैं। परन्तु बड़े दुख की बात है कि जब इस पर आचरण करने का समय आता है तब हम सभी इसे भूल जाते हैं। हम अपने घर में एक के बाद एक सामानों के बिना सोचे-समझे अनावश्यक ढेर लगाते चले जाते हैं चाहे हमें उनकी आवश्यकता हो अथवा न हो। बस झूठे आत्मतोष के लिए अनावश्यक रूप से हम भटकते रहते हैं।
             कभी पड़ौसी की होड़ में लगकर तो कभी किसी नाते-रिश्तेदार की नकल में हम रेस लगा रहे हैं। यह तो वही बात हुई कि उसकी 'कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफेद कैसे?' पता नहीं यह अन्धी दौड़ कब तक और कहाँ तक जाकर रूकेगी? कोई भी किसी से छोटा नहीं कहलवाना चाहता। हमारे घर में दुनिया की हर चीज होनी चाहिए चाहे उसे खरीदने की हमारी हैसियत न हो या न हो। हमारे पास साधन हैं तो बहुत बढ़िया, नहीं तो हम कर्ज लेकर ही अपनी जिद पूरी कर लेना चाहते हैं। इसका परिणाम तो हम प्रतिदिन सड़क पर जाम के रूप में और बेतहाशा बढ़ती मंहगाई के रूप में भोगते जा रहे हैं। फिर भी हम जाग नहीं रहे, बस मस्त हैं अपनी ही धुन में।
          अपने घर की ओर नजर दौड़ाइए जहाँ जगह ही नहीं हैं। घर की अल्मारियाँ कपड़ों से ठूँसी पड़ी हैं परन्तु हमारे पास किसी भी अवसर पर पहनने के लिए वस्त्र नहीं होते। क्राकरी सम्हाले नहीं सम्हल रही पर किसी के सामने हम उसमें सर्व नहीं कर सकते। घर के हमारे कमरे सामान रखते-रखते गोदाम की शक्ल के बनते जा रहे हैं। चलते समय शायद सामान से ठोकर ही लग जाती हो, उसकी हमें कोई चिन्ता नहीं होती। हम तो अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं।
               हम सब जानते हैं कि इस ससार में हम सीमित समय के लिए जन्म लेते हैं और फिर यहाँ से निश्चित जीवन व्यतीत करके, विदा लेकर अपने अगले पड़ाव के लिए चल पड़ते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच की इस दूरी को पार करते समय हम अपने लोभ और मोह के वशीभूत सब कर्म और कुकर्म करते चले जाते हैं। इस सत्य को हम भूल जाते हैं कि मृत्यु आने के बाद सब यहीं रह जाएगा। बस सदा अन्धाधुन्ध अनुकरण करते चले जाते हैं।
          कुछ महानुभाव ऐसे हैं जो जायज-नाजायज हर तरीके से धन कमाने में जुटे हुए हैं। वे कहते हैं हमारे पास इतना धन है कि हमारी सात पुश्तें बैठकर खा सकती हैं। फिर भी दूसरो का हक छीनने और गला दबाने में उन्हें कोई परहेज नहीं। वे लोग इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि यदि आज भूकम्प, बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आ जाएँ तो उनकी सारी लूट-खसौट धरी-की-धरी रह जाएगी। वह किसी काम नहीं आने वाली। हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी के मन से निकलने वाली हाय कभी चैन नहीं लेने देती।
             जमाखोरी और हेराफेरी करने वाले लोग इतने हृदयहीन हो गए है कि जन साधारण के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते हुए उन्हें ईश्वर से जरा भी डर नहीं लगता। बस पैसा और हाय पैसा यही उनके जीवन का मानो उद्देश्य रह गया है। समय आने पर यह पैसा भी काम नहीं आता। न यह स्वास्थ्य खरीद सकता है और न ही रिश्ते। ऐसे ही लोग एक समय आने पर निपट अकेले रह जाते हैं। उस समय पश्चाताप करते हैं पर तब तक सब साथ से निकल चुका होता है।
            आज वातावरण कुछ ऐसा दूषित होता जा रहा है कि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लूट-खसौट का बाजार बहुत गरम हो रहा है। हर शक्तिशाली कमजोर को दबाकर उसका सब हड़पना चाहता है। शायद सभी सोचते हैं कि वे पृथ्वी पर आ गए है तो यहाँ से कभी नहीं जाएँगे। उनका यह घमण्ड किस दिन टूट जाए कोई भी नहीं जानता। इस सबका परिणाम यह है कि इन्सान एक-दूसरे पर से अपना विश्वास खोता जा रहा है। हर एक को सन्देह की नजर से देखने लगा है। दया, ममता, सहनशीलता, करुणा, परोपकार आदि मानवोचित गुणों का ह्रास होता जा रहा है। 
            मनुष्य यदि यह याद रख सके कि वह सदा के लिए इस धरा पर रहने नहीं आया है तो शायद सौ बरस की जमाखोरी, हेराफेरी, चार सौ बीसी, रिश्वतखोरी की हवस कुछ कम हो जाए। इन्सान को हमेशा परमपिता से डरते रहना चाहिए। अपनी जरूरतों व इच्छाओं की पूर्ति मनुष्य को करनी चाहिए पर उन्हें अपने सिर पर सवार नहीं होने देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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