मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

परिवार की एकसूत्रता

परिवार की एकसूत्रता

परिवार जब तक एकसूत्र में बॅंधा रहता है तब तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी टिक नहीं सकता। कोई भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी लोग उस परिवार की एकता से घबराते हैं। उस समय उसमें सेंध लगा पाना बहुत कठिन होता है। दूसरे लोगों को पता होता है कि यदि वे इस परिवार का किसी भी प्रकार अहित करना चाहेंगे तो सभी परिवारी जन उन पर टूट पड़ेंगे। तब उनका वहॉं से बचकर निकलना बहुत कठिन हो जाएगा।
            इसके विपरीत परिवार के टूटकर बिखरते ही स्वार्थी लोगों की बन आती है। वे उन सभी को अलग-अलग बहला-फुसलाकर अपना हित साधने में जुट जाते हैं। इसके लिए वे उन सबको हानि पहुँचाने से बाज नहीं आते। इसलिए वे नए-नए तरीके खोजने‌ लगते हैं। इस प्रकार कभी-न-कभी वे उनके चंगुल में फंसे जातै हैं और अनावश्यक ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर बैठते हैं। जिसका बाद में उन्हें पश्चाताप भी होता है।‌ परन्तु जब हानि हो जाती है तो उसके बाद उसका कोई लाभ नहीं होता।
           इसी विषय में एक दृष्टान्त देखते हैं। किसी समय में एक व्यक्ति के चार बेटे थे। उसे सभी भाग्यशाली मानते थे। वह अपने बच्चों के नित्य के लड़ाई-झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। समय बीतते जब वह मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी तब वह उदास हो गया। तब उस मरणासन्न अवस्था में भी बच्चों के आपसी व्यवहार के कारण उसे चैन नहीं मिल रहा था। उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा, "जाओ, जाकर कुछ लकड़ियाँ लेकर आओ।" 
            चारों बेटे पिता के आदेश के अनुसार ही लकड़ियाँ लेकर उपस्थित हो गए। उन्होंने पूछा, "पिताजी, इन लकड़ियों का क्या करना है?"
           पिता ने उनसे कहा, "इन लकड़ियों को तोड़ दो।"
             वे लोगबहुत ही सरलता से वे उन्हें तोड़ने लगे। तब पिता ने उन चारों बेटों से कहा, "इन सारी लकड़ियों का एक गट्ठर बना दो।"
            बच्चों ने पिता के आदेश का पालन किया और उन लकड़ियों का एक गट्ठर बना दिया। पिता ने उनसे कहा, "अब इस गट्ठर को तोड़ दो।"
           चारों बेटों ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उस गट्ठर को तोड़ने में सफल नहीं हो पाए।
           उस समय पिता ने चारों को समझाया और मिल-जुलकर रहने के लाभ बताते हुए कहा, "यदि तुम चारों  भाई मिल-जुलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हारा अहित करने के लिए तुम लोगों में फूट नहीं डाल सकता। जब तक वे चारों एक बॅंधी हुई मुट्ठी की तरह रहेंगे तो दूसरे उनका बुरा करने के लिए दस बार सोचेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि चारों मिलकर उसे परास्त कर देंगे।यदि वे चारों जीवन में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो दूसरे इस बात का लाभ उठाएँगे।"
           बच्चों को यह बात समझ आ गई और तब उन्होंने अपने पिता को वचन दिया कि वे भविष्य में मिलकर रहेंगे।
          इसी प्रकार जब तक झाडू एक सूत्र में बॅंधी रहती है तब तक वह कचरा साफ करती है। परन्तु जब वही झाडू सूत्र के टूट जाने से बिखर जाती है तब खुद ही कचरा बन जाती है। उस समय उस अनावश्यक कचरे को उठाकर लोग कूड़ेदान में फैंक देते हैं। यानी वही बिखरे तिनके सबके लिए असह्य हो जाते हैं।
          इसलिए हमें हमेशा परिवार में एक मुट्ठी की तरह बॅंधकर, मिल-जुलकर रहना चाहिए। आपसी द्वन्द्वों के कारण बिखरकर दूसरों की नजर में आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला शिकार बनने से बचना चाहिए। इसी में अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा होती है।
         अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। यह मानना चाहिए कि परिवार का हित साधने में ही सबका भला होता है। मन की शुद्धता के लिए लोग सप्ताह के किसी भी दिन उपवास रखते हैं और अन्न का त्याग करते हैं। होना यही चाहिए कि अपने मन की शुद्धि के लिए अपने परिवार को तोड़ने वाले कुविचारों का त्याग करके उसे तोड़ने के स्थान पर जोड़कर रखने का यत्न करना चाहिए। 
          परिवारी जनों के प्रति मन से ईर्ष्या और द्वेष के भावों को दूर करके अपने हृदय को सरल और सहज बनाना चाहिए। सभी सदस्यों को अपने अहं का बलिदान करके परिवार की एकजुटता को बनाए रखना चाहिए। इससे बुजुर्गों और बच्चों में होने वाली अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है। अत: अपने परिवार हितों को सर्वोपरि मानते हुए थोड़ा-सा धैर्य रखना चाहिए। इसके लिए विवेकी बनकर यदि अपने स्वार्थों की बलि भी देनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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