शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

आत्मीय सम्बन्धों को लॉन्च पर न लगाऍं

आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर न लगाऍं

बहुत विचार करने पर भी मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आज एक भाई अपने दूसरे भाई के खून का प्यासा क्यों होता जा रहा है? क्या वे सब प्यार से मिल-जुलकर नहीं रह सकते? क्या आज सबके खून सफेद हो रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि रिश्तों के मायने ही बदलते जा रहे हैं?
          मुझे ऐसा लगता है कि हमारे स्वार्थ शायद इतने अधिक टकराने लगे है कि हम असहिष्णु होते जा रहे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए अनावश्यक ही हम लोग दिन-रात अपना सुख-चैन गँवाकर निरन्तर रेस में शामिल हो रहे हैं। आज विदेशियों की तर्ज पर मैं, मेरा परिवार और मेरे बच्चे बस यहीं तक हम सभी सीमित होते जा रहे हैं। इनके अतिरिक्त न हमें कोई दिखाई देता है और न ही हम किसी अन्य भाई-बन्धु के विषय में सोचना चाहते हैं। इसीलिए रिश्ते सिकुड़ने लगे हैं। समाज के लिए यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है।
           हमारा अहंकार इतना अधिक प्रबल होता जा रहा है जो किसी शर्त पर, किसी के साथ भी समझौता नहीं करना चाहता। सारी दुनिया को देख लेने अथवा उसमें आग लगा देने की बढ़ती युवाओं की मानसिकता समाज का बहुत अहित कर रही है। हमारा यही अहं हमें अपने रिश्तों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं करने दे रहा। इसलिए हमें सबसे कटकर अलग-थलग करने में सफल हो रहे हैं। हम लोग अनजाने में इस षड्यन्त्र का सरलतापूर्वक शिकार हो रहे हैं।
        ये स्वार्थ और अहंकार दोनों ही घर-परिवार के बिखराव में अहं रोल निभा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि का उनके जीवन काल में ही बटवारा करके सुख की साँस लेना चाहते हैं। उन्हें सदा यही लगता है कि दूसरे भाई या बहन को माता-पिता कहीं उनसे अधिक न दे दें। यदि ऐसा हो गया तो वे घाटे में रह जाएँगे। सबसे बड़ी बात कि घाटे का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता। जबकि माता-पिता के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं। वे अपनी धन-सम्पत्ति को सबमें बराबर बॉंटना चाहते हैं।
               अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए युवा पीढ़ी के ये बच्चे अनावश्यक ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। जायज-नाजायज हथकण्डे अपनाकर वे अपने माता-पिता की मेहनत की धन-दौलत को धोखे से हथिया लेने में अपनी शान समझते हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि आज के बच्चे बहुत ही प्रेक्टिल हो गए हैं। अपने माता-पिता को धोखा देने में भी उन्हें शर्मिन्दगी का अहसास नहीं होता। अपने दूसरे भाई-बहनों का हक छीनते हुए वे जरा-सा भी संकोच नहीं करते। उन्हें न समाज का डर है और न ही ईश्वर का।
        आज के बच्चे अपने अधिकारों के विषय में तो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं परन्तु वे अपने दायित्वों से अनजान बने रहना चाहते हैं। माता-पिता की सेवा करना तो वे प्राय: भूल जाते हैं। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो अपने माता-पिता का सब कुछ हथिया कर उन्हें बोझ समझने लगते हैं। अपना पिण्ड छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धावस्था में ओल्डहोम भेज देते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ उन्हें अच्छा व्यवहार करना भी उन्हें याद नहीं रहता। यदि उनके साथ कोई गलत व्यवहार कर दे तो वे तिलमिला जाते हैं।
          अपने पैतृक घर में ऊपर-नीचे के तल अथवा मंजिल में बच्चे नहीं रह सकते परन्तु उन घरों को बेचकर, फ्लैटों में जाकर दूसरे अनजान लोगों के साथ रहना पसन्द करते हैं। वहाँ रहकर समझौता कर सकते हैं पर अपने भाई-बहनों की शक्ल तक वे देखना पसन्द नहीं करते। उन्हें लगता है कि परायों के साथ रहकर वे सुखी रहेंगे पर जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। वहॉं पर जाकर भी अनेक कठिनाइयों से उन्हें दो-चार होना पड़ता है।
           इन्सानी कमजोरी है कि जिस किसी वस्तु की वह कामना करता है और जब वह उसे उपलब्ध हो जाती है तब वह उससे ऊब जाता है और कुछ नया पाना चाहता है। यही उसके भटकाव का कारण है जो उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता। ऐसे बच्चे जो रिश्तों की अहमियत जानना-समझना ही नहीं चाहते वे कहीं भी रह लें, परेशान ही रहते हैं। यह जीवन का कटु सत्य है कि समझौता तो हरपल और हर स्थान यानी कदम-कदम पर करना ही पड़ता है। इससे कोई बच नहीं सकता।
        सम्बन्धों में आपसी मनमुटाव के कारण ही शायद खून सफेद होने की बात कह दी जाती है। भाई-बहन धन-सम्पत्ति के लालच में इतने अन्धे हो जाते हैं कि एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की हत्या करने या करवाने के लिए षडयन्त्र तक रच डालते हैं। फिर जीवन पर्यन्त घर-परिवार, समाज और न्याय के दुश्मन बन जाते हैं। जिनके लिए ऐसा जघन्य अपराध करते हैं, वे उन्हें दुनिया की भीड़ में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
        हमारे सयाने कहते हैं- 'अपना यदि मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा।' कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर प्रदत्त अपने सम्बन्धों की कद्र करनी चाहिए। वह मालिक नहीं चाहता कि अपने भाई-बन्धुओं से अनुचित व्यवहार किया जाए। यह धन-वैभव तो आना-जाना है, इसके लिए आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर लगाने से बचना चाहिए। हम सभी को चाहिए कि अपने भाई-बहनों के साथ शत्रुता का भाव न रखकर यथासम्भव भाईचारा बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

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