आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत
आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत हर मनुष्य को होती है। इसीलिए वह अपने व्यक्तित्व को निखारने में जुटा रहता है। हर प्रकार के उपाय करता है। विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करता है। यह रंग-रूप मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिलता है। उसमें उसकी मर्जी शामिल नहीं होती। वह चाहकर भी अपनी इच्छानुसार अपने शरीर को नहीं बना सकता।
एक आकर्षक व्यक्तित्व का अर्थ मात्र सुन्दर दिखना नहीं होता। यह शारीरिक हाव-भाव, संवाद कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सकारात्मक सम्बन्ध बनाने की क्षमता का समग्र मिश्रण होता है। मनुष्य की ऊर्जा और व्यवहार उसके बोलने से पहले ही उसका परिचय करा सकते हैं जिससे हर बातचीत का माहौल तय हो जाता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, सक्रिय रूप से सुनने की क्षमता, मुस्कान और अपनी गलतियों को स्वीकार करने के साहस से यह निर्मित होता है। इसकी व्यक्तिगत और पेशेवर सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यकता होती है।
यद्यपि कुछ लोग शरीरिक दोषों को सुधारने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं परन्तु वह तो कोई स्थायी हल नहीं है। केवल शारीरिक सौन्दर्य के कारण मनुष्य इठलाता फिरता है। उसे इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ये रूप-सौन्दर्य क्षणिक होता है। कहने का तात्पर्य है यह कि सुन्दरता नश्वर है, अनश्वर नहीं।
रोग से आक्रान्त होने पर शरीर बदसूरत हो सकता है। आयु के एक पड़ाव पर शरीर पर झुरियाँ आ जाने से उसका वह रूप खो जाता है जिस पर वह गर्व करता है। इससे भी बढ़कर किसी रोग के कारण भी शरीर बेडौल हो सकता है। इसमें अपना कोई दोष न होते हुए भी तब वह दूसरों से नजरें चुराने लगता है।
इसलिए मात्र शरीर के सौन्दर्य को देखने के स्थान पर मनुष्य की आन्तरिक सुन्दरता परखी जानी चाहिए। अपने ज्ञान, अपनी योग्यता के बल पर अग्रणी रहने वाले व्यक्तित्व देश अथवा विदेश सर्वत्र पूजनीय होते है। वास्तव में सुदर्शन व्यक्तित्व उन्हीं लोगों का ही माना जाता है और वही समाज के प्रेरणास्त्रोत और आदर्श होते हैं।
इस महत्त्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचने के लिए वे समय रहते अथक परिश्रम करके ज्ञानार्जन करते रहते हैं। फिर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन होते हैं। बहुत से लोग उनके सज्जन और दुश्मन बन जाते हैं। उनकी योग्यता की परख करने वाले उनके मित्र बनते हैं।
इसके विपरीत उनकी उन्नति से ईर्ष्या करने वाले उनके साथ अपनी शत्रुता निभाते हैं। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने जीवन में वे स्वयं तो कुछ नहीं कर पाते यानी असफल रहते हैं। इसलिए उच्च पदासीन मेधावी लोगों की ओर देखकर, उनकी बुराई करके चर्चा में बने रहने के लिए अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। अन्यथा इन बुरे लोगों की ओर किसका ध्यान जाएगा?
ये लोग फलदायी वृक्ष की भाँति होते हैं जिनका संसर्ग पाकर हर व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ समझता है। फलों से लदे हुए वृक्षों पर लोग पत्थर फैंककर मारते हैं और स्वादिष्ट फल खाकर आनन्द लेते हैं। इन पर कटाक्ष करने वाले उन लोगों को छोड़कर अन्य बुद्धमान इनसे मार्गदर्शन रूपी मधुर फल को पाकर लोग लाभान्वित होते हैं।
दुष्ट लोग सूखे पेड़ की तरह होते हैं। ठूँठ बने वृक्ष जरा-सी चिन्गारी गिर जाने जल जाते हैं। इसी तरह वे दुर्जन सफल लोगों से केवल ईर्ष्या ही करके अपने आप को जलाने का कार्य करते हैं। जैसे उन सूखे वृक्षों पर पत्थर मारने का कोई लाभ नहीं होता, उनसे न फल मिलते हैं और न ही छाया। उसी प्रकार इनकी संगति में लाभ न के बराबर मिलता है पर हानि अधिक होती है।
मनुष्य को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति दयालु व सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए। सक्रिय रूप से दूसरों की बातें सुनने की क्षमता होनी चाहिए और समझना चाहिए कि केवल अपने बोलने पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य को विनम्रता से बात करनी चाहिए, शालीन रहना चाहिए और मुस्कुराते रहना चाहिए। मनुष्य को अपनी स्वच्छता, पहनावे और शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। अपने काम के प्रति उत्साहित रहना चाहिए। मनुष्य के मन में निरन्तर सीखते रहने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।
हर मनुष्य को उसके जीवन काल में अपने आप को साबित करने का एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस अवसर का लाभ उठा लेते हैं वे अपने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा लेते हैं। उस अवसर को किसी भी कारण से चूकने वाले रेस में पिछड़कर आयु पर्यन्त नाकामयाबी का कलंक ढोते हैं। हर व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह अपने व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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