शनिवार, 4 अप्रैल 2026

रिश्तों की अपनी गरिमा

रिश्तों की अपनी ही गरिमा

रिश्तों की अपनी ही एक गरिमा होती है। उनकी अनुपालना करना तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होता। जहाँ कभी थोड़ी-सी चूक हुई वहीं रिश्ते लहुलूहान हो जाते हैं। उन्हें बड़ी ही नजाकत से सम्हालना होता है। जितना सम्हल-सम्हलकर अपना कदम बढ़ाया जाएगा,‌ उतनी ही उनमें गर्माहट बनी‌ रहती है। यदि रिश्तों को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाए तो वे अपने नहीं रहते। वे बेगाने हो जाते हैं। हमारी पहुॅंच से दूर चले जाते हैं। इसका पश्चाताप हमें उस समय होता है जब हमें उनकी आवश्यकता होती है।
        रिश्ते हमें जीवन में ईश्वर की ओर से दिया गया उपहार होते हैं। वे जन्म से ही हमारे पूर्वकृत कर्मों के अनुसार हमारे साथ जुड़े हुए होते हैं। उनके साथ जितना लेनदेन का सम्बन्ध होता है, उसी के अनुरूप उन रिश्तों का हमसे जुडाव होता है। ये सभी हमारे सुखों और दुखों में हमारे साथी बनते हैं। जितना जिसके साथ सम्बन्ध निश्चित होता है, उसे भोगकर वह रिश्ता हमसे विदा लेकर सदा के लिए बिछुड़ जाता है। उस समय उनका जाना हमारे लिए बहुत कष्टकारी होता है।
          मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। हमें उन्हें अपने विवेक से परखना होता है। बातचीत सबसे होनी चाहिए परन्तु अपनापन या मन से जुड़ाव कुछ ही लोगों के साथ हो पाता है। वास्तव में वही मित्रता की श्रेणी में आते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि रिश्ते वो बड़े नहीं होते जिनका सम्बन्ध जन्म से होता है। बल्कि रिश्ते वो बड़े कहलाते हैं जो दिल से जुड़ते हैं। ऐसे सम्बन्ध कुछ दूर तक साथ देते हैं। जहाँ दिलों में दरार आती है वहीं वे रिश्ते भी मन से उतर जाते हैं और वहाँ नफरत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। उन दीवारों के पार कुछ नहीं दिखाई देता।
          आज के भौतिकतावादी युग से  पहले लोग भावुक होते थे और रिश्तों का महत्त्व समझते थे। वे यही मानते थे कि मनुष्य अपने रिश्तेदारों से सुशोभित होता है। इसलिए वे उन्हें सहृदयता से निभाते थे। उसके बाद धीरे-धीरे लोग प्रैक्टिकल होने लगे, तब वे अपने रिश्तों से लाभ उठाने में दक्ष होने लगे। वहाँ उनके बीच स्वार्थ हावी होने लगे। आज इस भौतिक युग के लोग प्रोफेशनल हो गए हैं। इसलिए वे केवल उन लोगों के साथ अपना रिश्ता बनाना चाहते हैं जिनसे भविष्य में फायदा उठाया जा सकता है। 
              दूसरे शब्दों में आज स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते बनाए जाने लगे हैं। यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि ऐसे रिश्ते बहुत सीमित समय तक जीवित रहते हैं। हमें उनका अन्त समीप ही मानकर चलना चाहिए। रिश्तों को निभाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। रिश्ते शीशे की तरह नाजुक होते हैं, जरा-सी चोट लगने पर चटककर टूट जाते हैं और चकनाचूर हो जाते हैं। रिश्ते और शीशे दोनों ही में अन्तर होता है। शीशा हमारी मूर्खता अथवा लापरवाही से टूटता है परन्तु रिश्तों के टूटने में हम लोगों की गलतफहमी कारण होती हैं।
          रिश्ते अन्त तक हमारा साथ न छोड़ें उसके लिए हमें सबके साथ बराबरी का व्यवहार करना चाहिए। जब हम इनसे असमानता बरतते हैं तब मनमुटाव होने लगते हैं और दूरिया बढ़ने लगती हैं। इसलिए रिश्तों में यथायोग्य व्यवहार करना हमारे लिए आवश्यक होता है। अपनों को साथ लेकर चलने में ही मनुष्य की शोभा होती है। चाहे सुख का समय हो अथवा सुख का समय, मनुष्य अपने बन्धु-बान्धवों के साथ ही सुशोभित होता है। अन्यथा अकेले तो न सुख अच्छा लगता है और न ही दुख की घड़ी कटती है।
          रिश्तों में एक-दूसरे की कभी परीक्षा भी नहीं लेनी चाहिए। इससे सम्बन्धों की गरमाहट घटने लगती है। तब वे रिश्ते मात्र औपचारिक बनकर रह जाते हैं। हर रिश्ते में विश्वास होना आवश्यक होता है। माता-पिता का बच्चों पर विश्वास होना चाहिए और बच्चों का माता-पिता पर। पति-पत्नी के रिश्ते में परस्पर विश्वास ही उन्हें जोड़कर रखता है। इसी प्रकार भाई-बहन में आपसी विश्वास की डोर उन्हें आजन्म बाँधे रखती है। बन्धु-बान्धवों के प्रति विश्वास उन्हें अपने से दूर नहीं जाने देते।
        ईश्वर के साथ हमारा रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से अलग तरह का होता है। वहाँ हम उस मालिक से गिला-शिकवा करते हैं और उससे नाराज हो जाने पर लानत-मलानत भी करते हैं। उस पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। फिर भी ईश्वर का और हमारा रिश्ता बना रहता है। हम उसके बिना नहीं रह सकते। कुछ दिन की नाराजगी के बाद हम फिर उसकी शरण में चले जाते हैं। यह रूठने और मानने का सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है। यह सब करतब हमारी ओर से होते हैं। वह सदा हमारे ऊपर अपना वरद हाथ रखता है।
        सांसारिक अथवा भौतिक रिश्तों में ऐसा नहीं होता। मनमुटाव या शिकवा-शिकायत की स्थिति में रिश्तों के टूटने में समय नहीं लगता। फिर सबका अहं आड़े लगता है और रिश्ते मृतप्राय: हो जाते हैं। अर्थात् केवल नाम के या दिखावे के रिश्ते रह जाते हैं। इसलिए प्रेम, विश्वास, आपसी भाईचारे और अपने सद् व्यवहार से और मन से सभी रिश्तों को निभाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

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