मंगलवार, 7 जुलाई 2026

शरीर शुभ कर्म करने के लिए

शरीर शुभ कर्म करने के लिए

ईश्वर ने हम जीवों को यह शरीर शुभ कर्म करने के लिए उपहार स्वरूप दिया है। उसने हमें इस मूल्यवान शरीर के साथ-साथ आँख, कान, नाक, जीभ और मन पाँच इन्द्रियाँ भी दी हैं। इन्हें अपने वश में करके निश्चित ही हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियों को मनुष्य अपने वश में नहीं कर सकता तो वह जीवन की बाजी हार जाता है। 
             यदि मनुष्य इनके वश में हो जाता तब ये इन्द्रियाँ मनुष्य को भटका देती हैं जिससे वह अपने लक्ष्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता। जब उसका अन्त समय आता है तब वह अपने अधूरे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए के लिए ईश्वर से रो-रोकर थोड़े से और समय की मोहलत माँगता है। किन्तु उस समय उसे पलभर की भी मोहलत भी नहीं मिल पाती।
            विशाल वर्मा द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई निम्न बोधकथा के माध्यम से इस सत्य को समझते हैं। कुछ संशोधन के साथ इस कथा को प्रस्तुत कर रही हूॅं।
            एक बार एक गरीब किसान एक साहूकार के पास आया और कहा, "सेठ जी, मुझे अपना एक खेत एक साल के लिए उधार दे दीजिए।"
           उसने साहूकार को वचन दिया,"मैं दिन-रात मेहनत से काम करके अपने खाने के लिए अन्न उपजाने का कार्य करूॅंगा।"
          ‌साहूकार बहुत ही दयालु व्यक्ति था। उसने किसान को अपना एक खेत दे दिया और उसकी मदद के लिए पाँच मजदूर भी दिए। ताकि उनकी सहायता से उसे खेती करने में आसानी हो जाए।
           साहूकार को प्रणाम करके और धन्यवाद देकर किसान उन पाँच मजदूरों को अपने साथ लेकर चला गया। उन्हें खेत ले जाकर काम पर लगा दिया। किसान ने सोचा, "जब ये पाँच लोग खेत में काम कर तो रहे हैं, फिर मैं क्यों करू?"
           किसान दिन रात बस सपने ही देखता रहता कि खेत में जो अन्न उगेगा उससे क्या क्या करेगा? मालिक के सामने न होने पर वे पाँचो मजदूर अपनी मनमर्जी से खेत में काम करते। जब मन करता वे फसल को पानी देते और अगर उनका मन नहीं करता तो मस्ती करते। इस तरह कई दिनों तक फसल सूखी पड़ी रहती।
           समयानुसार जब फसल काटने का समय आया तो किसान ने देखा कि खेत में खड़ी फसल बहुत ही खराब है। जितनी लागत उसने खेत में पानी और खाद डालने में लगाई, खेत में उतनी लागत की फसल भी नहीं पैदा नहीं हुई।   
            किसान यह देखकर बहुत दुखी हो गया। एक साल बाद साहूकार अपना खेत किसान से वापिस माँगने आया। तब किसान उसके सामने रोने लगा और बोला, "आपने मुझे जो पाँच मजदूर दिए थे, मैं उनसे सही तरीके से काम नहीं करवा पाया। इसलिए मेरी सारी फसल बर्बाद हो गयी।"
            किसान ने साहूकार से हाथ जोड़कर आगे कहा, "मुझे एक और साल का समय दे दीजिए ताकि मैं अच्छे से काम कर सकूॅं और उसका खेत उसे लौटा सकूॅं।"
          किसान की बात सुनकर साहूकार ने उससे कहा, "बेटा, ऐसा मौका मनुष्य को बार-बार नहीं मिल पाता। मैं अब तुम्हें यह अपना खेत नहीं दे सकता।"
          यह कहकर साहूकार वहाँ से चला गया। उसे रोते हुए किसान पर जरा भी दया नहीं आई। 
            विचारणीय है कि दयालु साहूकार वह परमपिता परमात्मा है। गरीब किसान हम सभी लोग हैं जो इस शरीर रूपी खेत को उससे कुछ समय के लिए उधार लेते हैं। यानी ईश्वर हमें यह शरीर सीमित समय के लिए उपहार स्वरूप देता है। वह मालिक हमारी मदद के लिए आँख, कान, नाक, जीभ और मन आदि पाँच इन्द्रियाँ रूपी मजदूर साथ में देता है। ताकि हम इस संसार में कमल की भाँति रहते हुए, किसी प्रकार की कोताही न करते हुए अपने सभी दायित्वों को ठीक से निभा सकें। ताकि जब भगवान हमसे अपना दिया हुआ यह शरीर वापिस माँगे तो हमें रोना न आये बल्कि हम प्रसन्नतापूर्वक इस दुनिया से विदा ले सकें।
          वास्तव में हम मनुष्य इतने नाशुकरे हैं कि दुनिया की रंगीनियों में खोकर सब कुछ भूल जाते हैं। संसार के आकर्षण ही इतने हैं कि हम कुछ भी याद नहीं रखना चाहते। हम तो बस यहॉं के सारे एशो-आराम भोगना चाहते हैं। इस संसार में आते समय हम ईश्वर से किया गया अपना वादा याद नहीं रहता। उस समय हम इतना मस्त हो जाते हैं कि यह भी याद नहीं करना चाहते कि अपने कृत कर्मो का निपटारा करके शुभ कर्मों को अपने खाते में जोड़ने आए हैं। अपने कार्य को पूरा न कर पाने का मलाल हमें मृत्यु के समय नहीं हो, यह प्रयास समय रहते यथासम्भव कर लेना चाहिए। 
चन्द्र प्रभा सूद 

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