शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

पुण्य कर्मों की पूॅंजी कैश करवाऍं

पुण्य कर्मो की पूँजी कैश करवाऍं

बैंक में हम अपना पैसा जमा करवाते हैं। जब हमें आवश्यकता होती है तब वहाँ से इच्छित राशि निकाल सकते हैं। उस पैसे से हम अपनी अनेक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। यदि हम बैंक में अपना अकाउंट खुलवाकर पैसा जमा नहीं करेंगे तो आवश्यकता होने पर बैंक से हमें पैसा नहीं मिल सकेगा। इसका सीधा-सीधा यही अर्थ हुआ कि बैंक से पैसा निकालने के लिए वहॉं अकाउंट होना और धन होना आवश्यक होता है। अपना जमा किया हुआ पैसा भविष्य में हमारे काम आता है।
          इसी प्रकार अपने पुण्य कर्मो की पूँजी को यदि हम अपने भाग्य के खाते में जमा कराएँगे तभी अगले जन्म में उसे कैश करवा सकेंगे। उसी पुण्य कर्मों की पूॅंजी से हम उस जीवन में सुख भोग सकेंगे। यदि इस जीवन में हम इस पूॅंजी से वंचित रह जाऍंगे तो अगले जन्मों में हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। हमारे शास्त्र, हमारे बड़े-बुजुर्ग और मनीषी हमें अपने सत्कर्मों की पूॅंजी बढ़ाने पर बल देते हैं।
          बैंक में जमा करवाए हुआ धन के कारण हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद हम अपने जीवन के आड़े वक्त के लिए धन का संग्रह करने के लिए व्यघ्र रहते हैं।
        इस एक भौतिक जीवन को जीने के लिए हम इतने तामझाम करते हैं परन्तु जन्म-जन्मान्तरों तक हमारे शरीर में रहने वाले जीव को अपनी जीवन यात्रा पूरी करनी होती है, उसके विषय में हम कभी नहीं सोचते। जबकि यह विचार मन में अधिक हावी होना चाहिए। परन्तु बड़े अफसोस की बात है कि उसे हम अपने मन-मस्तिष्क में कभी आने ही नहीं देते। अपने आसपास रहने वाले लोगों को देखकर भी हम कुछ नहीं सीखते।
        एक दिन बैंक हमेशा की तरह पैसे निकालने वालों की भीड़ थी। भीड़ को देखकर एक व्यक्ति रुक गया। उसने वहाँ खड़े हुए एक व्यक्ति से सहज ही पूछा, "भाई, यहाँ भीड़ क्यों है?"
            दूसरे आदमी ने जवाब में कहा,"यह भीड़ पैसे लेने वालों की है।"
          वह आगन्तुक बैंक की प्रणाली से अनजान था। उसने फिर पूछा, "क्या सबको पैसे मिलते हैं?"
           दूसरे व्यक्ति ने कहा, "हाँ।"
          उसकी हॉन् सुनकर वह व्यक्ति भी उसी लाइन में खड़ा हो गया।
        जब उसकी बारी आई तो बैंक के कैशियर ने उससे पूछा, "उसे कितने पैसे चाहिए, पर्ची भरी है क्या, तुम्हारा खाता बैंक में है क्या?" 
        अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित करते हुए उसने न में सिर हिला दिया और कहा, "तुम सबको पैसे दे रहे थे। मुझे भी पैसे चाहिए थे, इसलिए मैं भी लाइन में खड़ा हो गया।"
          उसका भोला-सा उत्तर सुनकर कैशियर ने उसे समझाया, "यह बैंक है। यहाँ पर लोग पैसे जमा करवाते हैं। फिर जब जितने पैसे की उनको जरूरत होती है तब पर्ची भरकर उतने पैसे ले लेते हैं और फिर अपनी पासबुक में एंट्री करवा लेते हैं।"
        कहने का अर्थ यही है कि बैंक में पहले पैसे जमा करवाने होते हैं तभी निकल पाते हैं। पासबुक में केवल तीन एंट्री होती हैं-  डिपाजिट यानी धनराशि जमा कराना, विड्राल अर्थात् पैसा निकालना और बैलेंस यानी खाते में कितना धन शेष बच गया है।
          बैंकिंग प्रणाली से अनजान उस व्यक्ति ने जब बैंक में अपना पैसा जमा ही नहीं करवाया था तो फिर उसे आवश्यकता होने पर भी वहाँ से पैसा नहीं मिल सकता था। वह व्यक्ति खाली हाथ ही रह गया।
        हम सब लोग जो इस बैंकिंग प्रणाली को भली-भाँति जानते हैं, वे भी भूल जाते हैं कि धन की तरह हमारे भाग्य का भी अपना एक अकाऊंट होता है। वहाँ भी जमा, घटा और शेष बची हुई राशि का हिसाब रखा जाता है।
        इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भाग्य एक बैंक है। हमारे पुण्यकर्म और हमारे पापकर्म हमारी जमाराशि है। पुण्य कर्मों के कारण हम अपने इस भौतिक जीवन में सुख-समृद्धि, शान्ति, सफलता, यश और स्वस्थ जीवन आदि का आनन्द ले सकते हैं।
        इसके विपरीत पापकर्मों के कारण हमें जीवन में अभाव, परेशानी, रोग, कलह-क्लेश और निराशा आदि भोगने पड़ते हैं। जब जीव अपने पापकर्मों को भोग लेता है तभी उसे उनसे मुक्ति मिलती है।
          पापकर्मों और पुण्यकर्मो को भोगने के बाद उनमें से जितने कर्म शेष बचते हैं, उन्हीं के अनुसार जीव को अगला जन्म मिलता है। चौरासी लाख योनियों में से उसे अपने कर्मों के अनुसार कोई भी शरीर मिल सकता है।
        अतः अपने पुण्यकर्मो को अपने भाग्य के खाते में जोड़ने के लिए अभी से सन्नद्ध हो जाइए। ऐसा न हो कि पापकर्मों की अधिकता से न अगला जन्म अच्छा मिले और न ही इस जीवन में ही सुख-सुविधाएँ मिल सकें। उस समय सिर धुनकर पश्चाताप करने से अच्छा है कि हम अभी से चेत जाएँ। इसका कारण है कि हमारे इन पुण्यकर्मो और पापकर्मों के लेखे-जोखे के अनुसार ही हमें सब कुछ मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

आकर्षित करते मोहजाल

  आकर्षित करते मोहजाल 

इस संसार में रहने वाले मनुष्य को सदैव परेशानियाँ अथवा डर डराते रहते हैं। उनसे घिरा वह सुख की सॉंस नहीं ले पाता। सारा समय उनसे छुटकारा पाने का प्रयास करता रहता है। जब भी, जहाँ भी, उसे कहीं से थोड़ी-सी राहत मिल जाती है, वह वहीं सब कुछ भूल जाता है। उसे यह भी याद नहीं रह जाता कि वह इस संसार में सीमित समय के लिए ही आया है। तत्पश्चात तो उसे यहॉं से विदा हो होकर दूसरे लोक या परलोक जाना‌ है।
          दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस संसार के आकर्षण और मोहमाया के जाल इतने अधिक लुभावने हैं कि मनुष्य न चाहते हुए भी उनके तिलस्म में उलझकर रह जाता है। वह जितना भी उनसे बाहर निकलने का प्रयत्न करता है, उतना ही गहरे उसमें फँसता चला जाता है। मजे की बात यह है कि उसे पता ही नहीं चलता।
          एक बोधकथा की यहाँ चर्चा करते है जिसे हममें से कई लोगों ने पढ़ा होगी। एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था। तभी एक शेर उसका शिकार करने के लिए उसके पीछे भागने लगता है। भागते हुए उसे एक कुँआ दिखाई देता है। उसके सामने विकट स्थिति आ जाती है। यह वही बात हो गई -
            आगे कुआँ और पीछे खाई 
इस स्थिति से बचने के लिए वह छटपटाने लगता है। उसे आगे एक कुऑं दिखाई देता है। वह डरा हुआ बेचारा अपनी जान बचाने के लिए उस कुएँ में के ऊपर लगे हुए चक्र में बंधी हुई रस्सी को पकड़कर लटक जाता है। 
          वह वहाँ लटक तो गया परन्तु जब उसकी नजर नीचे कुँए की गहराई में पड़ी तो उसके होश उड़ गए। वहॉं पर फन फैलाए हुए एक काले साँप बैठा होता है। उसे देखकर वह चौंक जाता है। मौत को साक्षात् अपने समक्ष देखकर वह बहुत घबरा जाता है। उसी समय उसकी नजर काले और सफेद रंग के दो चूहों पर पड़ती है जो उस रस्सी को काट रहे होते हैं, जिसको पकड़कर वह लटक रहा था। ऐसा भयावह दृश्य देखकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। 
          ईश्वर का चमत्कार देखिए कि कुँए में उसे एक शहद का छत्ता नजर आता है। उसे थोड़ी-सी राहत मिलती है। उस छत्ते से शहद की एक-एक बूँद उसके मुँह पर गिरने लगती है। अपनी जीभ से वह उस शहद को चाटने लगता है। शहद की मिठास में वह इतना खो जाता है कि उसे वहाँ मौजूद शेर, भयानक साँप और चूहों के डर को भूल जाता है। उस समय वह अपने सिर मंडराती मौत तक को नजरंदाज कर देता है। यही है इन्सानी फितरत कहीं जा सकती है कि क्षणिक सुख के सामने वह अपनी मौत को बिसरा बैठा।
           यह दुनिया जंगल की तरह है। कुआँ मौत का घर है और साँप मौत का कारण है जिसे हर हाल में डसना ही है। दोनों चूहे दिन और रात हैं जो हमारी जिन्दगी की डोर को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं। शहद इस संसार का रस-रंग है जिसे थोड़ा-सा भी चख लिया जाए तो मनुष्य भूल जाता है कि उसे इस असार संसार से विदा लेनी है।
          यह कथा हमें समझाती है कि काल रूपी सर्प मनुष्य को भयभीत करता रहता है। वह समझता है कि यही काल एक दिन उसे अपना ग्रास बना लेगा। फिर भी यह मनुष्य समय से न डरते हुए मस्त रहता है, मानो उसने रावण की तरह काल को बाँध लिया है। जो मनुष्य विषय-भोगों में अपना समय व्यतीत करता है, वह इस समय को व्यर्थ गँवा देता है। इसके विपरीत जो इस समय का सदुपयोग कर लेता है सफलता उसके कदम चूमती है और उस व्यक्ति को आम से खास बनाकर सबके सिरों पर बिठा देती है।
        हमारा यह जीवन पल-पल करके बीत रहा है। जन्म लेने के पश्चात से बीतता हुआ यह समय हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, यह क्रम अनवरत चलता रहता है। ये दोनों मिलकर हमारी जीवन की डोर को धीरे-धीरे काट रहे हैं यानी कम से और कम करते जा रहे हैं। इससे जीवन और मृत्यु के बीच का जो अन्तर है वह दिन-प्रतिदिन कम से कमतर होता जा रहा है। हम सब इस तथ्य को अनदेखा करते हुए इस अमूल्य जीवन को दुनिया के झंझटों में व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं।
          मनमोहक दुनिया के माध्यम से इस संसार सागर में वह प्रभु इन्सान को चारा डालकर ललचाता रहता है। मनुष्य को पता ही नहीं चलता कि कब वह उसके काँटे में मछली की तरह फँस जाता है और मालिक वह काँटा खींच लेता है। तब मनुष्य तड़पता रह जाता है। हाथ-पैर पटकता रहता है पर सब व्यर्थ हो जाता है।
          मौत को हमेशा प्रत्यक्ष खड़ा हुआ मानना चाहिए। व्यवहार ऐसा करना चाहिए जैसे आज का दिन ही अन्तिम दिन है और अपने सभी दायित्वों को पूर्ण करना है। इसी भावना के साथ मौत से बिना डरे निश्शंक होकर विचरण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता

निस्वार्थ परोपकार व्यर्थ नहीं जाता 

मनुष्य निस्वार्थ भाव से जो भी परोपकार के कार्य करता है, वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे कार्य उसके शुभकर्मों में जुड़ जाते हैं और उसके पुण्यों की वृद्धि करते हैं। समयानुसार जैसे फलदार वृक्ष राहगीरों को मीठा फल देते हैं, उसी प्रकार परोपकारी जन अपने कर्मों से दूसरों की कठिनाइयों को दूर करने का यत्न करके उन्हें सुख पहुॅंचाते हैं। ऐसे मनुष्य की प्रसिद्धि कहाँ तक फैलेगी, यह सब ईश्वर ही जानता है। न तो वह स्वयं जानता है और न ही कोई अन्य लोग।
          उसके समीपस्थ अन्य दूसरे लोग चाहे उसकी कितनी ही आलोचना क्यों न करते रहें, उन्हें अनदेखा करते हुए वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है। अपने द्वारा चुने हुए मार्ग पर सूर्य की तरह निरन्तर गतिमान रहता है।
        यहाँ हम एक कथा को लेते हैं जो इन्हीं विचारों की पोषक है। एक बहुत ही सज्जन मनुष्य थे जो हर आने-जाने वाले व्यक्ति को अपने पास बिठाकर पानी पूछते थे। आया हुआ कोई परदेसी यदि भूखा होता तो उसे पूछकर खाना भी खिलाते थे। वे बस यही कहते थे, "जो यहाँ दिया है तो वहीं वहाँ मिलेगा।"
         एक बार उन्हें किसी कार्यवश अपने घर से दूसरे शहर जाना पड़ गया। उन्होंने अपनी बहू से कहा, "बेटा, चार पराँठे बनाकर मेरे बैग में रख दो। जब भूख लगेगी तो किसी पेड़ की छाया में बैठकर खाना खा लूँगा।"
          उनकी बहू ने मन में विचार किया कि नित्य प्रति लोगों को खाना खिलाते रहते हैं और कहते हैं, "यहाँ दिया है तो वहाँ मिलेगा। इन्हें भोजन की क्या आवश्यकता आ पड़ी।"
          उसने खाना नहीं बनाया। जब वे सज्जन घर से जाने लगे तो उन्होंने बहू से पूछा, "बेटा, क्या तुमने भोजन रख दिया है।"
          उसने हाँ में उत्तर देते हुए कहा, "बाबू जी, रख दिया है, आगे जाकर मिल जाएगा।"
          वे अपने गन्तव्य पर थके-माँदे पहुँचे और एक चबूतरे पर बैठ गए। थोड़ी दूरी पर काम रहे युवक ने उन्हें देखा तो पहचान गया कि वे वही सज्जन हैं जिन्होंने थके और भूखे-प्यासे उसे खाना खिलाया था। वह उनके पास आया और उनसे हालचाल पूछा तथा फिर पूछा, "आपने भूखा का लिया है।"
           उन्होंने ने कहा, "नहीं, अभी नहीं खाया।"
          उन्हें भूखा जानकर उसने उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाया।
        तब उन सज्जन ने कहा,"मेरे बैग में मेरी बहू ने खाना रखा है, उसे भी खा लेते हैं।"
         परन्तु जब उन्होंने बैग खोला तो देखा कि उसमें बहू ने खाना रखा ही नहीं था। तभी उन्हें बहू के शब्द याद आ गए, "यहाँ जो खाना दिया है, वह आगे जाकर मिल जाएगा।"
          यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अपना खुद का पेट भर लेना और अन्य किसी के बारे में कभी न सोचना पशुवृत्ति कहलाती है। मनुष्य को मिल-बाँटकर खाना चाहिए। सम्पूर्ण प्रकृति यानी जल, पृथ्वी, वायु, पेड़-पौधे, सूर्य, बादल आदि अपने पास कुछ भी नहीं रखते। उनके पास जो भी है, वे उसे हम जीवों में बॉंट देते हैं। वे अपने स्वार्थ का त्याग करके परमार्थ का कार्य दिन-रात करते रहते हैं।
          स्वयं के हिस्से का भोजन खाना तो प्रकृति कहलाती है किन्तु दूसरों के हिस्से पर नजर रखना अथवा खा लेना विकृति कहलाती है। इन सबसे भी बढ़कर होता है किसी भूखे को अपना हिस्सा दे देना, यह उसके संस्कारों को बताता है। हमारी भारतीय संस्कृति सदा अतिथि की सेवा करने का निर्देश देती है और कहती है -
              अतिथि देवो भव।
अर्थात् अतिथि को ईश्वर की तरह मानो।
        जिन लोगों ने कभी भूख की ज्वाला का अनुभव नहीं किया उन्हें तो पता ही नहीं कि भूखा व्यक्ति क्या-क्या अनर्थ नहीं कर गुजरता? बहुत से लोग अपनी असह्य भूख के कारण गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। जिनके पेट भरे होते हैं उनके दिमाग खराब हो जाते हैं और नखरे अलग होते हैं। इसलिए उनके घर की रोटियाँ किसी जरूरतमन्द को देने के स्थान पर कूड़े में फैंक दी जाती हैं अथवा खाने लायक नहीं रहतीं। इससे बढ़कर और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता।
          जरूरतमन्द इन्सान की सहायता यदि बिना उससे कुछ प्राप्ति की भावना से सहृदयतापूर्वक की जाए तो वह अवश्य ही फलदायी होती है। ऐसे ही महानात्मा लोगों के पुण्यों के कारण इस धरती पर आज तक मानवता का अस्तित्व आज बचा हुआ है। अन्यथा स्वार्थि लोगों ने इसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे लोग अपने तुच्छ स्वार्थों को महत्त्व देते हुए दूसरे लोगों को गलत सन्देश देते हैं। इससे लोगों का मानवता पर विश्वास डगमगाने लगता है जिसे हम किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहरा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

स्वस्थ्य शरीर मात्र साधन

स्वस्थ शरीर मात्र साधन

स्वास्थ्य मनुष्य के लिए ईश्वर का दिया हुआ सबसे अमूल्य और दिव्य उपहार है। अपने शरीर को स्वस्थ रखना मनुष्य का परम कर्तव्य है अन्यथा मनुष्य अपने मन और अपनी सोच को शुद्ध व पवित्र नहीं रख सकता। यह स्वास्थ्य मनुष्य की अमूल्य निधि है। जैसे धन-वैभव को सम्हालकर रखा जाता है, उसी प्रकार अपने इस स्वास्थ्य को भी सम्हालकर रखना चाहिए। परन्तु बहुत दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हम इसी ईश्वरीय नेमत के साथ दिन-रात खिलवाड़ करते हैं।
           हमारे शास्त्रों के द्वारा जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। उन सबको धत्ता दिखाते हुए हम किसी दूसरे ही युग में जाते जा रहे हैं। हमारा आहार-विहार बिल्कुल उलट-पुलट हो चुका है। आज हमारे किसी भी कार्य को करने का कोई समय नहीं होता। हम न समय पर सोते हैं और न ही समय पर जागते है। हमारी सभी पार्टियाँ, शादी-ब्याह आदि देर रात तक चलते रहते हैं। देर रात तक क्लबों में मौज-मस्ती चलती है। इसलिए प्रातः देर से उठते हैं। परिणामस्वरूप सभी कार्य देर से होते‌ हैं।
           जिस रोजी-रोटी को कमाने के लिए हम अथक परिश्रम करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं और कोल्हू का बैल तक बन जाते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। हम बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। हम पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक भोजन न खाकर अधिक मसालेदार और तले हुए खाद्यान्न खाना पसन्द करते हैं। डिब्बाबन्द पदार्थ और जंकफूड खाकर हम बहुत इतराते हैं। घर का खाना हमें नहीं भाता, यह कहकर हम अपनी शान बघारते हैं।
           फिर एक समय ऐसा आता है जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है यानी हमारा यह स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। उस समय जब हम असहाय हो जाते हैं तब रो-रोकर ईश्वर से स्वस्थ करने की या इस दुनिया से उठा लेने की प्रार्थना करते हैं। हमें अपनी गलती तब भी समझ नहीं आती कि हमने स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया है। 
         अस्वस्थ हो जाने पर डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हुए अपना बहुमूल्य समय व मेहनत की गाढ़ी कमाई बर्बाद करते हैं। वह एक समय जीवन में ऐसा होता है जब डाक्टरों की सलाह पर सादा खाना खाना हमारी लाचारी बन जाती है। तब डायटिशियन के बनाए हुए चार्ट के अनुसार अपना खानपान सन्तुलित करने के लिए हम विवश हो जाते हैं और तब हमारी सारी हेकड़ी निकल जाती है। उस समय कमाया हुआ सारा धन धरा रह जाता है। 
           अपने प्रिय से प्रिय और जान छिड़कने वाला भी कोई सहायता नहीं कर सकता। रुग्ण शरीर के कष्ट को कोई भी न बॉंट सकता है और न ही दूर कर सकता है। अपने प्रियजन मात्र दर्शक बनकर रह जाते हैं। उस समय कितना भी पैसा खर्च लो किन्तु यह स्वास्थ्य पलटकर वापिस नहीं आ सकता और न ही मुँह में कोई एक निवाला डाल सकता है।
          हमारे मनीषी इसलिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने पर बल देते हैं। हम ऐसे नालायक हैं जो उनकी महत्त्वपूर्ण बातों को अनदेखा करके कष्ट पाते हैं। महाकवि कालिदास ने 'कुमारसम्भवम्' महाकाव्य में कहा था-
        शरीरमाध्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थात् हमारा यह शरीर धार्मिक कार्यों अथवा हमारे दायित्वों को पूरा करने का साधन है।
        शरीर जब स्वस्थ होता है तो मनुष्य अपने सभी कार्य उत्साह से करता है। यदि यही शरीर रोगी हो जाए या अपंग हो तो मनुष्य अपने स्वयं के कार्य करने में असमर्थ हो जाता है तो वह दूसरों का मुॅंह देखने लगता है। मनुष्य घर-परिवार व भाई-बन्धुओं के प्रति अपने कर्त्तव्यों को चाहकर भी पूरा नहीं कर सकता। इन कारणों से उसके मन को बहुत कष्ट होता है। 
        समस्या हमारे सामने तब आती है जब हम इस साधन शरीर को साध्य मान लेते हैं। दिन-रात इसे सजाने-सँवारने में लगे रहते हैं। इस पर सदा घमण्ड करते रहते हैं। अपने सामने दूसरों को हीन समझते हैं। बड़े दुख की बात है कि इसे स्वस्थ रखने का प्रयास मनुष्य नहीं करता। अस्वस्थ होने पर दूसरों को दोष देते हैं। ईश्वर को उलाहना देते हैं और लानत-मलामत करते हैं।
          मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य है कि वह चौरासी लाख योनियों के साथ-साथ जन्म-जन्मान्तरों के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास करना। ईश्वर की उपासना अपना प्रमुख कर्त्तव्य मानकर करे। लेकिन इस दुनिया के आकर्षणों में फँसकर वह सब भूल जाता है और आजन्म कष्ट भोगता रहता है।
          इस स्वस्थ शरीर में ही अपने विचारों को शुद्ध व पवित्र रख सकते हैं और अपने मन को साध सकते हैं। कठोपनिषद् ने इस शरीर को रथ माना है। यदि यह रथ अपनी गति से चलेगा तभी तो हमें अपनी मंजिल मुक्ति तक पहुँचाएगा। इसलिए इस शरीर की देखभाल करनी अत्यन्त आवश्यक है। शेष अन्य दायित्वों की भाँति इसका निर्वहण भी करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 27 जुलाई 2026

कर लो दुनिया मुट्ठी में

कर लो दुनिया मुट्ठी में

प्रत्यक्ष रूप से समक्ष न होने पर हमारी आपसी बातचीत का माध्यम टेलीफोन होता है। पहले लोग पत्रों के सहारे अपने बन्धु-बान्धवों से सम्पर्क साधा करते थे। वह प्रक्रिया पूर्ण होने में बहुत समय लग जाता था। आज हम सभी अपने विचारों का आदान-प्रदान एक-दूसरे के साथ फोन के द्वारा करते हैं। इस वैज्ञानिक आविष्कार को हम एक चमत्कार कह सकते हैं।आधुनिक तकनीक की यह बहुत महत्त्वपूर्ण देन है। इससे आपसी दूरी का अहसास भी नहीं होता।
        देश-विदेश में हम बहुत कम पैसों में अपने बन्धु-बान्धवों से अपने सुख-दुख साझा कर सकते हैं, उनका हालचाल जान लेते हैं। कुछ दशक पहले लैण्डलाइन टेलीफोन बहुत वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिला करते थे क्योंकि उस समय फोन घर में लगवा लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था। जिसके घर पर टेलीफोन होता था, उसे लोग बड़ा आदमी कहते थे। शायद टेलीफोन के कठिनता से उपलब्ध होने के कारण ही एक फिल्म में यह गाना फिल्माया गया था जिसकी बहुत अधिक धूम मची थी और बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह गाना था-
    मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से  
      टेलीफून तुम्हारी याद सताती है।
ये बहुत ही प्रसिद्ध पुराने गाने के बोल हैं। यह सदाबहार गीत 1949 में आई फिल्म 'पतंगा' का है। इसे दिग्गज गायिका शमशाद बेगम और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने गाया था। इसके बोल राजेन्द्र कृष्ण जी ने लिखे थे। 
        कुछ समय पूर्व अपने प्रदेश से बाहर या विदेश में रहने वाले किसी से बात करनी होती थी तो एस. टी. डी. अथवा आई. एस. डी. बुक करवानी पड़ती थी। उन दिनों ऐसे फोन यदि दिन में किए जाते थे तो बिल बहुत अधिक आया करता था। इसलिए लोग रात दस के बजे के बाद फोन करते थे। उस समय फोन का रेट बहुत कम हो जाया करता था। उस समय काल बुक कराई जाती थी किन्तु यह कोई गारण्टी नहीं होती थी कि बात हो ही जाएगी।
         आज वाकई दुनिया हमारी मुट्ठी में हो गई है। वैज्ञानिक चमत्कारों के कारण दूरियों के कम हो जाने से दुनिया सिमटकर रह गई हैं। किसी भी समय बाजार से मोबाइल फोन खरीदो और अपने बन्धु-बान्धवों से पलक झपकते ही देश-विदेश में कहीं भी, किसी भी समय बहुत ही कम पैसों में बात कर लो। रात में काल रेट कम होने का इन्तजार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। इससे भी बढ़कर स्काईप, वाट्सअप, फेसबुक आदि से भी मुफ्त में काल करके बात कर सकते हैं।
          जिस प्रकार दूर बैठा व्यक्ति जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, उससे टेलीफोन के माध्यम से बातचीत करते हैं। उसी प्रकार ईश्वर जो हमसे बहुत दूर है, उससे बात करने के लिये मौन रहने की आवश्यकता होती है। वह इन भौतिक चर्म चक्षुओं से हमें प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता परन्तु हम मौन रहकर, ध्यान लगाकर और प्रार्थना के माध्यम से जब चाहें उससे बातचीत कर सकते हैं।
        जैसे हम मालिक से अपनी प्रार्थना के माध्यम से बात करते हैं उसी प्रकार वह दाता भी हमसे बात करता है। अन्तरात्मा की आवाज के माध्यम से वह हमारे साथ संवाद करता है। जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं तो हमारे मन में उत्साह होगा यानी वह शाबाशी देता है। इसके विपरीत गलत कार्य करने पर मन से आवाज आती है कि यह काम गलत है अथवा कोई देख न ले या किसी को पता चलेगा तो क्या होगा ? यानी हमें गलत कार्य न करने की चेतावनी देता है। उस परमपिता का हमारे साथ संवाद करने का यही तरीका है।
          भौतिक फोन से बात करने के लिए हमें निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। यानी उसके लिए हमें बिल देना होता है। यदि बिल का भुगतान न किया जाए तो कम्पनी के द्वारा फोन काट दिया जाता है। दूसरी ओर अपने प्रभु से बात करने के लिए अपने मन की भावना का समर्पण करना पड़ता है। वहाँ किसी प्रकार के धन का व्यय नहीं करना पड़ता और न ही फोन कटने या काल ड्राप होने का डर रहता है।
           आज तकनीक इतनी एडवांस हो गई है कि विडीयो कॉल करने पर हम सामने वाले का चेहरा भी देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हम आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हैं। इसी प्रकार उस मालिक से संवाद करने के हेतु सामने प्रत्यक्ष बैठकर बात करने के लिए हमें अपने अन्तस् में ध्यान लगाने की आवश्यकता होती है। 
        हमें अपने जीवन में प्रतिदिन अपना थोड़ा-सा समय निकालकर अपने मालिक के साथ वार्तालाप करना चाहिए। सांसारिक रिश्ते जिनके साथ हम हमेशा बातचीत में व्यस्त रहते हैं, वे हमारे परलोक सिधारते ही समाप्त हो जाते हैं। केवल प्रभु का और हमारा साथ चिरन्तन है। अतः उससे चर्चा भी करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 26 जुलाई 2026

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य सृष्टि का सबसे समझदार जीव

मनुष्य को ईश्वर ने इस सृष्टि का सबसे अधिक समझदार जीव बनाया है। बुद्धि का उपहार देकर इतनी उसे सामर्थ्य दे दी है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। यदि वह सकारात्मक रुख रखता है तो चमत्कार कर देता है। इसके विपरीत वह अपने नकारात्मक विचारों के कारण स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है।
        ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ी थीं। इन्हें आप सबके साथ कुछ वर्तनी संशोधन के पश्चात साझा कर रही हूँ। आशा है आप भी इन्हें आत्मसात करना चाहेंगे।
        'नजर रखो अपने विचार पर क्योंकि वे शब्द बनते हैं। नजर रखो अपने शब्द पर क्योंकि वे कार्य बनते हैं। नजर रखो अपने कार्य पर क्योंकि वे स्वभाव बनता है। नजर रखो अपने स्वभाव पर क्योंकि वह आदत बनता है। नजर रखो अपनी आदत पर क्योंकि वह चरित्र बनती है। नजर रखो अपने चरित्र पर क्योंकि वह जीवन का आदर्श बनता है।'
          इन पंक्तियों को पढ़ने के पश्चात यही समझ आता है कि मनुष्य जो भी विचार अपने मन में रखता है, उसी के अनुरूप बोलता है और फिर उसे अपने आचरण में ढाल लेता‌ है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह सबको प्रभावित करेगा। निश्चित ही उसे उन सबका समर्थन मिलेगा। उनका मार्गदर्शक बनकर वह समाज में अपना अहं किरदार निभाएगा।
          इसके विपरीत नकारात्मक सोच होने पर मनुष्य न सही ढंग से कोई कार्य कर पाता है और न ही किसी को उचित परामर्श दे सकता है। जीवन की बाजी हारने वाला वह इन्सान जीत का जश्न नहीं मना पाता। ऐसे व्यक्ति घर-परिवार और समाज के लिए बोझ के समान बन जाते हैं। उन्हें कहीं पर भी सम्मान नहीं मिल पाता।
          मनुष्य के क्रियाकलापों पर उसके विचारों की छाप प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। उत्साही मनुष्य सदा सबको प्रेरित करेगा और निरुत्साही व्यक्ति सबको निराश ही करेगा। विवेकी व्यक्ति और अज्ञ व्यक्ति के कार्यो में जमीन और आकाश जैसा अन्तर होता है। जिसका अनुमान हम उनके कार्य-व्यवहार से भलीभॉंति लगा सकते हैं।
          चोर व्यक्ति चोरी करना सिखाएगा, भ्रष्ट मनुष्य भ्रष्टाचरण की शिक्षा देगा, धोखेबाज इन्सान धोखाधड़ी सिखाएगा, सदाचरी महापुरुष सदाचरण पर बल देगा। विद्वान व्यक्ति सदा दूसरों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करेगा। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य को अपने मन, वचन और कर्म पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उसे हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, लापरवाही बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
          कहने का तात्पर्य यही है कि जिसके पास जो गुण-अवगुण होंगे, उसीके अनुरूप ही उसका आचरण अथवा स्वभाव बन जाता है। भविष्य में मनुष्य का यह स्वभाव परिपक्व होकर अनजाने ही उसकी आदत बन जाता है। यदि उसमें अच्छी आदतें ढल गयी तो चारों ओर उसकी जय-जयकार होती है। ऐसा मनुष्य सफलता की सीढ़ियों पर सुगमता से चढ़ता जाता है।
          यदि गलत आदतें अपना ली गई हों तो लाख कोशिशों के बाद भी वह अपनी आदतों को बदल नहीं पाता। तब उसके कारण उसके भाई-बन्धुओं तथा परिवारी जनों को शर्मसार होना पड़ता है। उनके समझाने पर भी यदि वह अपनी गलत आदतें नहीं छोड़ता तो वे सब उससे किनारा करने लगते हैं। तब वह अकेला हो जाता है। उसके लिए यह बहुत दुखदाई स्थिति होती है।
        अपने जीवन का आदर्श ही मनुष्य का चरित्र बनाता है। उसके चरित्र की महानता उसे महान बनाकर ऊपर उठाती है और उसकी चारित्रिक विकृति उसे रसातल की ओर धकेल देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति सदैव चरित्र निर्माण पर बल देती है।
          जब व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है तब व्यष्टि का यानी समाज का चरित्र बनता है। समाज के साथ-साथ देश के चरित्र का भी  निर्माण होता है। जिस देश का और उसके निवासियों का चरित्र उदात्त होता है, उस देश का गौरवशाली ध्वज सदा ही ऊँचा फहराता है। उस देश की ओर कितना ही शक्तिशाली शत्रु हो, आँख उठाकर भी नहीं देख सकता। यदि किसी खुशफहमी के कारण ऐसा करने का दुस्साहस करता है तो उस शत्रु को मुँह की खानी पड़ती है।
        इस प्रकार विचार, शब्द, कार्य, स्वभाव, आदत, चरित्र और जीवन आदर्श ये सब एक चेन या कड़ी हैं। ये सभी एक ही सूत्र में पिरोए गए हैं। इनका परस्पर अन्तर्सम्बन्ध होता है। इसीलिए विचारों की शुद्धता, सरलता, सहजता पर सयाने बल देते हैं जो सर्वथा समीचीन है और आज भी उतने ही सटीक हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 25 जुलाई 2026

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक

नंगे पैर चलना स्वास्थ्यवर्धक 

नंगे पैर यानी जूता या चप्पल बिन पहने चलना हाईजीन और स्वास्थ्य दोनों ही के लिए लाभदायक होता है। विद्वानों  का मानना है कि हरी घास पर प्रातःकाल नंगे पैर चलने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसीलिए सुबह-सवेरे पार्क में बहुत से लोग यह क्रिया करते हुए दिखाई देते हैं।
            बहुत से घरों में आज आधुनिक सुविधाओं वाले माडर्न रसोईघर बन गए हैं, वहाँ सारा कार्य खड़े होकर किया जाता है। इसलिए वहाँ जूता या चप्पल ले जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। अभी भी बहुत से परिवार ऐसे मिल जाएँगे जिनके घर के रसोईघर में जूते-चप्पल ले जाने की मनाही है। वे मानते हैं कि जहाँ खाना बनता है वहाँ इन्हें ले जाने से शुद्धता नहीं रहती और इनके साथ कई कीटाणु घर में प्रवेश कर जाते हैं।
          इसी तरह आज भी अनेक घर ऐसे मिल जाएँगे जहाँ घर के भीतर जूते आदि नहीं लाए जाते बल्कि घर का हर सदस्य उन्हें मुख्य द्वार के बाहर ही उतारकर घर में प्रवेश करता है। इसका कारण है कि वे अपने घर को बाहर की गन्दगी से बचाकर शुद्ध रखना चाहते हैं।
        प्रायः सभी धर्मस्थलों में भी जूते-चप्पलों को बाहर उतारा जाता है। अधिकांश स्थानों पर उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। यहाँ भी उन स्थलों की पवित्रता और शुद्धता मुख्य कारण होती है। इसी प्रकार के अन्य सभी धार्मिक आयोजनों में चाहे वे घर पर हों अथवा कहीं अन्यत्र क्यों न हो रहे हों इन्हें बाहर ही उतारने का विधान है। घरों, दुकानों, फैक्टरी या किसी भी आयोजन में पूजा करते समय इन्हें उतार दिया जाता है। इस धार्मिक आस्था पर कोई भी प्रश्नचिह्न नहीं लगाता। 
        अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष यानी आई सी यू में रोगियों को बाहरी कीटाणुओं के आक्रमण से बचाने के लिए जूते-चप्पलों को उस कक्ष के बाहर ही उतारने का आदेश लिखा होता है।
           पुराने समय में लोग बगैर जूतों के ही पैदल चलते थे परन्तु समय के साथ-साथ जूते-चप्पल पहनना आम हो गया। वास्तव में गन्दगी या चोट से बचने के लिए ही जूते-चप्पलों का इस्तेमाल किया जाता है। यदि व्यक्ति किसी घास के मैदान या साफ जमीन पर पैदल चल रहा हो तो उसकी आवश्यकता नहीं होती। नंगे पैर चलने से बहुत से फायदे हो सकते हैं।
          धरती के सम्पर्क में आने से शरीर में मौजूद नकारात्मक तनाव कम होता है। इससे जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है। नंगे पैर घास पर चलने से मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बेहतर होता है। इससे मनुष्य गहरी और सुकून भरी नींद सो सकता है। जूते-चप्पल पहनने के कारण पैरों की कुछ मांसपेशियॉं निष्क्रिय हो जाती हैं। नंगे पैर चलने से पैर, टखने और पिण्डलियों की मांसपेशियॉं सक्रिय और मजबूत होती हैं। 
            नंगे पैर रहने से एनर्जी लेवल बढ़ता है और घुटनों एवं कूल्हों की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। खाली पैर चलना एक प्रकार की एक्सरसाइज है। रोजाना आधा घण्टा पैदल चलने से हार्ट की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति मिल सकती है। 
          कुछ लोग घर में भी खाली पैर घूमना पसन्द करने लगे हैं क्योंकि इससे कई तरह के पॉजिटिव एफेक्ट्स भी शरीर पर पड़ते हैं। सेहत के लिए गर्मी के दिनों में नंगे पैर चलना अधिक फायदेमन्द होता है। यह शरीर को ठण्डा रखता है। ऐसा भी देखा गया है कि बचपन में अधिक खाली पैर रहने से बड़े होने पर पैर की तकलीफें कम होती हैं। 
        नंगे पैर चलने से किसी प्रकार की हानि नहीं हो सकती। बस नंगे पाँव चलने से पैर अवश्य गन्दे हो सकते हैं। विचार यह है कि उससे कोई हानि नहीं होती अपितु उसके लाभ अधिक हैं।
          जैन साधु आज भी बिना जूता पहने रहते हैं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा नंगे पैर ही करते हैं। उनका विचार है कि जूतों के नीचे आकर मरने वाले कई जीवों की हत्या के पाप से बचा जा सकता है।
        कुछ लोग अपनी गरीबी या विपन्न अवस्था की लाचारी के कारण बिना जूते या चप्पल के सड़कों पर घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं। वे लोग भी प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं।
        हमारी पृथ्वी मे हर तरह की धातुएँ पाई जाती हैं जो हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं। नंगे पैर चलकर हमें वे धातुएँ स्वतः मिल जाती हैं जिनकी कमी हो जाने पर हम डाक्टरों के पास जाकर अपना अमूल्य समय व कमाया हुआ धन खर्च करते हैं और फिर उनके निर्देशानुसार उन्हें दवा के रूप में खाते हैं।
        नंगे पैर चलना चाहे धार्मिक कारण से हो अथवा स्वास्थ्य के लिए हो, उसके पीछे भावना मनुष्य के कल्याण की ही होती है। इससे कोई हानि नहीं होती। इसलिए इसे अपनी आदत में शामिल कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

जीवन साथी की कल्पना

जीवन साथी की कल्पना 

हर युवा अपने भावी जीवन की रूपरेखा बनाता है।इसी कड़ी में वह अपने जीवन साथी के विषय में भी सोचता है। जीवन साथी कैसा हो? इस विषय में हर मनुष्य की कल्पना अलग-अलग होती है। वह अपने मनोनुकूल साथी को पा लेने का हरसम्भव प्रयास भी करता है। यह निश्चित है कि कुछ गुण ऐसे हैं जो हर व्यक्ति अपने जीवन साथी में चाहता है। उनमें परस्पर विश्वास, आपसी प्रेम, सद्भाव, एक-दूसरे की परवाह आदि गुण प्रमुख हैं।
          जीवन साथी का चुनाव करते समय यह विचार अपने मन में रखना आवश्यक है कि यह साथ उम्रभर का है, केवल पलभर का नहीं है। यह जीवनसाथी है कोई खिलौना भी नहीं है जिसे मन भर जाने पर कहीं फैंक दिया जाए और फिर बाजार जाकर नया खरीदकर लाया जा सके। हमारे मनीषियों ने इस साथ को जन्म-जन्मान्तरों का साथ यानी सात जन्मों का माना है।
          मात्र गोरा रंग होना अथवा फिल्मी हीरो-हीरोइन जैसे हावभाव देखकर या उसके उन्मुक्त स्वभाव से प्रभावित होकर ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जो भविष्य में जी का जंजाल बन जाए। जिस कारण आयुपर्यन्त स्वयं को कोसने की स्थिति बनी रहे। उस एक पल के लिए जीवन भर पश्चाताप करना पड़ जाए कि उसने गलत साथी का चुनाव किया था।
          अपनी शिक्षा, आर्थिक स्थिति और अपनी कदकाठी के अनुरूप ही जीवन साथी का चुनाव करना चाहिए। दोनों में से एक के पास भी इनकी अधिकता अथवा कमी जीवन भर के लिए परेशानी‌ का कारण बना सकती है। ऐसी स्थिति में सारी आयु एक-दूसरे को ताने देने में ही गुजर जाती है। इस प्रकार के आचरण से मानसिक शान्ति खो जाती है, घर का माहौल बोझिल हो जाता है और फिर जो जग हँसाई होती है सो अलग।
          शारीरिक सौन्दर्य तो चार दिन की चाँदनी होता है परन्तु मनुष्य के गुण हमेशा परखे जाते हैं। रूप सौन्दर्य तो किसी एक्सीडेंट, बिमारी अथवा आयु ढलने पर फीका पड़ जाता है। इसके विपरीत आत्मिक सुन्दरता दिन-प्रतिदिन निखरती जाती है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि सुन्दर व्यक्ति को अपना हमसफर न बनाया जाए। यदि सुन्दरता के साथ गुणों का समावेश भी साथी में हो तो यह सम्मिलिन सौभाग्यदायी हो जाता है।
         इसका अर्थ है कि भौतिक सौन्दर्य के साथ ही अपने अन्तस् में सद् गुणों का विकास भी करना चाहिए। तभी सोने पर सुहागे वाली उक्ति चरितार्थ होती है।
          घर-गृहस्थी चलाने के लिए परस्पर सामंजस्य होना आवश्यक है। यदि दोनों अपने रंग-रूप, ऊँचे पद, अधिक वेतन आदि के नशे में चूर रहकर अपने साथी की अवहेलना करें तो इसे कोई भी उचित नहीं ठहराएगा। इस अहंकार से जीवन नहीं चल पाता। घर में सदा कलह-क्लेश बढ़ता‌ है और जीवन नरक के समान दुखदाई बन जाता है। उसका एकमात्र हल घर का विघटन होता है।
          घर में एक मटका भी यदि खरीदा जाता है तो ठोक बजाकर परखा जाता है। फिर यहाँ तो सारी आयु के साहचर्य की बात होती है। अपने जीवन साथी का चुनाव भी अच्छी तरह देख-परखकर और सोच-समझकर करना चाहिए। जब तक मन को पूरी तसल्ली न हो जाए तब तक सम्बन्ध के लिए हाँ नहीं करनी चाहिए।
          सबसे प्रमुख बात है साथी का चाल-चलन। उस पर पैनी नजर रखनी चाहिए। जिस भी साथी को घर के सदस्यों की अपेक्षा अपने दोस्तों का साथ अधिक पसन्द हो, वह अपने साथी के प्रति वफादार नहीं हो सकता। किसी भी साथी‌ के विवाहेत्तर सम्बन्ध समाज और घर-परिवार में मान्य नहीं होते।‌ऐसे सम्बन्धों के कारण पहले अबोलापन बढ़ता है और फिर तलाक हो जाता है।
             इसीलिए हमारे अनुभवी बुजुर्ग शादी-ब्याह लड़के और लड़की की आर्थिक स्थिति न देखकर उनके कुल या परिवार की ओर अधिक ध्यान देते थे। इसलिए कहते हैं कि यह सम्बन्ध दो परिवारों का होता है।‌ इसका कारण था युवाओं में घर-परिवार और समाज का डर व शर्म होना होता था। इसलिए उस समय प्रायः सही चुनाव होते थे और यदि कभी गलत हो भी जाते थे तो वे‌न के बराबर होते थे। 
          जीवन साथी वही होना चाहिए जो अपने दूसरे साथी के मनोभावों को समझने वाला हो। उसके सामने आप खुलकर हँस सकें और आवश्यकता पड़ने पर उसके कन्धे पर सिर रखकर रो भी सकें। उसका साथ आप आपको अच्छा लगता हो। पूरा दिन उसके साथ हँसते, खेलते और गप्पे लगाते बिताने पर भी ऊब न हो, ऐसा साथी जिसे सौभाग्य से मिल जाए तो उसका सम्मान करते हुए अपना पूरा जीवन बिताकर स्वयं को धन्य मानना चाहिए। साथ ही ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए कि उसने इतना अच्छा जीवन साथी दिया है।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं

सफलता किसी की बपौती नहीं है। कोई भी मनुष्य सफलता की उँचाइयों को छू सकता है। सफलता अमीर-गरीब, ऊॅंच-नीच और जात-पात को नहीं देखती। मानव को अपने जीवन में सफल होने तथा सबका प्रिय बनने के लिए कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। उन्हें यदि अपने जीवन में ढाल लिया जाए तो दुनिया की ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो उसे उसका मनचाहा पाने से रोक सके। 
         यह सर्वथा सत्य है कि सफलता न किसी की मोहताज है‌और न ही किसी की बपौती है। यह केवल अटूट संकल्प, निरन्तर परिश्रम और धैर्य का परिणाम होती है। यह किसी व्यक्ति की आयु नहीं देखती।‌ यह उचित समय पर आरम्भ की गई योजना और मनुष्य की लगन का परिणाम होती है। मनुष्य की प्रतिभा और उसके कार्य स्वयं उसका परिचय देते हैं। इतिहास गवाह है कि इस संसार में अनेक महान हस्तियों ने अपने सीमित संसाधनों तथा विपरीत परिस्थितियों से बिना घबराए अपनी पहचान बनाई है।
         सफलता का मुख्य मूल मन्त्र है अनवरत परिश्रम करना। अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण रखना, असफलता से सीखकर आगे बढ़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति और समय का सही प्रबन्धन करना। ये गुण किसी भी क्षेत्र में सफलता की नींव रखते हैं।यह मानकर चलना चाहिए कि असफलताऍं अस्थायी होती हैं। महान नेताओं और विचारकों के सफलता के मूल मन्त्र को देखकर धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम फलदाई होता है। यह भी सत्य है कि मनुष्य को सदा आशावादी बनना चाहिए। सकारात्मक ऊर्जा ही मनुष्य को चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देती है। 
        समाज में रहते हुए मनुष्य हर प्रकार के लोगों से सम्पर्क में रहता है। कभी वह दूसरों की सहायता करता है और कभी अन्य लोग उसकी। उसे किसी के उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए। जो कष्ट के समय अपना साथ दे उसका कृतज्ञ होना चाहिए। उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
          इसके विपरीत दूसरों के प्रति किये गए परोपकार के कार्यो को भूल जाना चाहिए। सयाने कहते हैं- 'नेकी कर दरिया में डाल।' हमें कभी यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि जिसका भला हमने किया है, वह व्यक्ति आजन्म हमारे समक्ष नजरें झुकाकर रहे अथवा जिन्दगी भर के लिए गुलाम बनकर हमारी चाकरी करता रहे। 
          किए गए उपकार का यदि हर समय बखान करते रहने से उसका महत्त्व समाप्त हो जाता हैं। उसके बदले में हमें किसी से कुछ मिलने की आशा नहीं रखनी चाहिए। हालाँकि यह बहुत कठिन कार्य है क्योंकि इन्सानी कमजोरी है कि वह सदा अपनी प्रशंसा चाहता है। मनुष्य को स्वयं पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। अपने बाहुबल, अपनी मेहनत, अपनी लग्नशीलता पर उसे सदा विश्वास रखना चाहिए। यदि उसे स्वयं पर विश्वास नहीं होगा तो वह एक कामयाब इन्सान नहीं बन सकता। वह दुनिया की रेस में पिछड़ जाता है।
          इसी प्रकार अपने भाई-बन्धुओं एवं अपने सहयोगियों पर भी विश्वास करना चाहिए। परस्पर विश्वास से ही दुनिया के सभी कार्य व्यवहार चलते हैं। दूसरों पर सन्देह करने से जीना दुष्वार हो जाता है। यह अविश्वास घुन या दीमक की तरह जीवन को खोखला कर देता है। स्वयं पर और अपने स्वजनों पर विश्वास के साथ-साथ परमपिता परमात्मा पर भी मनुष्य को अटूट विश्वास होना चाहिए। सदा यही मानना चाहिए कि वह जो भी करेगा हमारे हित के लिए ही होगा।
        'क्षमा बड़न को चाहिए' ऐसा कहकर मनीषियों ने क्षमा के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। मनुष्य को सदा क्षमाशील होना चाहिए। यह गुण मनुष्य को सृष्टि के अन्य जीवों से अलग तथा विशेष बनाता है। यह ईश्वरीय गुण है। किसी को उसकी गलती के लिए क्षमा कर देना वास्तव में विशालहृदयता का परिचायक होता है। 
          वे लोग बहुत ही संकीर्ण मानसिकता के होते हैं जो किसी की गलती होने पर उसे सबके समक्ष तिरस्कृत करते हैं, उसका उपहास करते हैं। उनकी ऐसी हरकत के कारण कोई भी उन्हें पसन्द नहीं करता। इसलिए क्षमा रूपी दिव्य गुण को अपनाने से मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सकता है। लोग ऐसे व्यक्ति का साथ पाने के‌ लिए सदैव लालायित रहते हैं।
          मनुष्य के मन में सदा ही यह भाव रहना चाहिए कि इस संसार में वह अपने कर्मानुसार निश्चित अवधि के लिए आया है। जिस भी जीव का जन्म यहाँ होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। यह वैराग्य भाव जब मनुष्य के मन में आता है तब वह जल में कमल की तरह सांसारिक कार्य कलापों में लिप्त हुए बिना जीवन व्यतीत करता है। 
          यदि मनुष्य इस अटल सत्य को आत्मसात कर ले तो किसी कार्य को करने से पहले दस बार सोचेगा। तब वह कोई भी अनुचित कार्य नहीं कर सकता। उचित मार्ग पर चलता हुआ मानसिक सुखानुभूति कर सकता है। एवंविध इन सूत्रों को जीवन में अपना करके मनुष्य सही मायने में अपना इहलोक और परलोक दोनों ही सुधार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 22 जुलाई 2026

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी होते इन्सान

मिलावटी खाद्यान्न खाते-खाते हम इन्सान भी दिन-प्रतिदिन मिलावटी होते जा रहे हैं। यह पढ़-सुनकर तो एकबार हम सबको शाक लगना स्वाभाविक है। यदि इस विषय पर गहराई से मनन किया जाए तो हम हैरान रह जाएँगे कि धरातलीय वास्तविकता यही है।
          हम मिलावटी हो रहे हैं यह कहने के पीछे तात्पर्य है कि हम सभी मुखौटानुमा जिन्दगी जी रहे हैं। हम सहज और सरल नहीं बन पआ रहे हैं। हमारी कथनी, करनी और सोच में बहुत अन्तर है। हम जो सोचते हैं उसे व्यवहार में नहीं लाते और न ही मन में सोचे भावों को अपनी वाणी से यथावत प्रकट करते हैं।
         दिखावे और मुनाफे की इस दुनिया में न केवल खाने-पीने की चीजों में बल्कि इन्सान के व्यवहार और रिश्तों में भी मिलावट आ गई है। आज व्यक्ति बाहर से जितना आकर्षक और सच्चा दिखता है, भीतर से उतना ही स्वार्थी और बनावटी हो गया है। लोग अपनी वास्तविकता छिपाकर झूठी छवि दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते है। 
        सोशल मीडिया की इस दुनिया में यह और भी स्पष्ट हो जाता है जहाँ हर व्यक्ति एक परफेक्ट और खुशहाल जिन्दगी का मुखौटा पहनकर घूमता रहता है। यद्यपि असलियत इससे कोसों दूर होती है। जिस प्रकार मिलावटी खाना स्वास्थ्य को हानि पहुॅंचाता है, उसी प्रकार स्वार्थी रिश्ते और झूठे वादे मनुष्य के मानसिक सुकून को समाप्त कर देते हैं।
        आज की भागमभाग वाली जिन्दगी में किसी के पास दो पल का समय नहीं है कि दो मिनट रुककर थकने वाले को सान्त्वना दे सके। जो रेस में पीछे छूट जाता है अथवा गिर जाता है, हम उसकी ओर हाथ बढ़ाकर उसे नहीं उठाते। बस उसे हालात से लड़ने के लिए यूँही छोड़ देते हैं।
        अपने स्वार्थो को सर्वोपरि समझने वाले लोग गधे को भी बाप बनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अद्ययुगीन मनुष्य की यही विडम्बना है कि वह पैसे को महत्त्व देता है। सभी सम्बन्ध उसके स्वार्थ के सामने बौने हो जाते हैं क्योंकि वह उन्हें पैसे की कसौटी पर ही तौलता है। वह इस सत्य को भूल जाना चाहता है कि लक्ष्मी किसी की सगी नहीं होती। आज वह उसके पास है तो कल उसे छोड़कर किसी दूसरे का वरण कर लेगी। उस पर मान करके दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मानना सर्वथा अनुचित है। ईश्वर न करे ऐसी विपन्नावस्था आ जाने पर अपनी स्थिति के विषय में विचार करते हुए अपने जीवन में सन्तुलन बनाए रखें।
        हमारी सोच और हमारा व्यवहार दोनों परस्पर मेल नहीं खाते। जिन लोगों को पीठ पीछे गालियाँ देते हैं, पानी पी-पीकर कोसते हैं, जब वे प्रत्यक्ष सामने उपस्थित हो जाते हैं तो उनकी मनुहार करते हैं। तब उन्हें यह अहसास कराते हैं कि उनके सबसे प्रिय वही हैं।
        इस मानसिकता के चलते अपने सगे रिश्तों के साथ भी ऐसा कृत्रिम व्यवहार करने को भी हम बुरा नहीं मानते। इसलिए 'मुँह में राम बगल में छुरी' वाली उक्ति कही गई है। 
          मन में प्रेम नहीं परन्तु उसका जी जान से प्रदर्शन करते हैं। धन का अभाव होने पर ऐसा दिखावा करते हैं मानो सारी दुनिया को खरीद सकते हैं। अल्प ज्ञान होने पर भी सबके हृदयों में विद्वत्ता की ऐसी धाक जमाना चाहते हैं कि सब हमारा लौहा मानने लगें। 
          असामाजिक कार्य यानि भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरबाजारी आदि करते हुए भी स्वय को शुद्ध व पवित्र आत्मा होने कआ दावा करते हैं। अधार्मिक कृत्य करते हुए सबसे बड़े धार्मिक होने का प्रपंच करते हैं। बात-बात पर झूठ बोलने वाले कसमें खाकर अपनी सच्चाई का प्रमाण देने का यत्न करते हैं।
          माता-पिता बच्चों के समक्ष और बच्चे माता-पिता के सामने मुखौटों में रहते हैं। भाई-बन्धुओं के साथ भी बस पाक-साफ बनने का ढोंग किया जाता है।
        राजनेता तो जनता के बीच जाकर अपनी नाकाम उपलब्धियों का बखान करते नहीं अघाते। वे ऐसा जाल फैंकने का प्रयास करते हैं कि हर कोई उनके वश में हो जाएँ। 
        कोई भी यह समझने-बूझने के लिए तैयार नहीं होता कि 'काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।' इसी तरह जब मुखौटा चेहरे से उतर जाता है तब वह विकृत चेहरा बहुत ही भयावह दिखाई देता है। 
          मनुष्य का चेहरा एक आईना होता है जिसमें उसके मन के सभी भाव दूसरों को सरलता से दिख जाते हैं। ईश्वर को भी किसी तरह का दिखावा पसन्द नहीं है। अतः अपने मुखौटानुमा मिलावटी आचरण को छोड़कर हम सभी लोगों को अपने स्वभाविक रूप में रहना चाहिए। इसी में मनुष्य का बड़प्पन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जीवन जीने के बदलते मायने

जीवन जीने के बदलते मायने 

जीवन को जीने के हमारे मायने बदलते जा रहे हैं। हमारी जीवन शैली में आमूल चूल परिवर्तन हो चुका है। हमारा आहार-विहार जीवनोपयोगी नहीं रह गया। मनीषियों का कथन है कि हमें जीने के लिए खाना चाहिए परन्तु हम खाने के लिए जीने लगे हैं।विचार का यह अन्तर हमारे लिए एक चुनौती बन सकता ‌है।‌ 
          ‌हमारे आहार-विहार में बहुत बदलाव हो गया है। अपनी व्यस्त दिनचर्या में युवाओं के पास अपने लिए समय नहीं निकल पाता। इसलिए सामाजिक कार्यों में चाहकर भी भाग नहीं ले पाते। सही लोगों के पास आज गाड़ियॉं हैं। इस कारण आवागमन में कठिनाई नहीं होती। शायद यही कारण है कि आज शादी-ब्याह और पार्टियॉं देर रात तक चलती हैं। इसलिए नींद पूरी नहीं हो पाती। पूरा दिन शरीर पर आलस्य छाया रहता है।
          कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तुलित और सुपाच्य भोजन के स्थान पर हम मिर्च-मसालों वाला और जंक फूड खाना पसन्द करते हैं। परिणाम स्वरूप हम अनेक बिमारियों को न्यौता दे बैठते हैं। कुछ लोग लाचार हैं, मजबूर हैं इसलिए बीमार होते है किन्तु कुछ दूसरे लोग अपनी बिमारियों की वजह से लाचारी का जीवन ढो रहे है।
          सारा दिन टेबल वर्क करने से भी शरीरिक समस्याएँ बढ़ रही हैं। फिर जिम संस्कृति के चक्कर में पड़कर और परेशान होते हैं। डाक्टर परामर्श देते हैं सैर करिए। उस समय अमीर लोग खाना पचाने के लिए मीलों चलते हैं। इसके विपरीत गरीब व्यक्ति खाना खाने के लिए पता नहीं कितने मील पैदल चल लेता है। 
          आज महँगाई के समय घर के सभी लोग कमाने में लगे हुए हैं। दिन-रात काम की धुन में खाने-पीने की सुध नहीं रहती। जिस भोजन को पाने के लिए इतने जतन करते हैं उसी खाने के लिए समय नहीं निकल पाता। दूसरी ओर संसार में ऐसे भी असहाय लोग हैं जिनको खाने के लाले पड़े हुए हैं। उन बेचारों को कितने वक्त का खाना नसीब हो पाएगा, यह भी कुछ निश्चित नहीं होता।
          अपनी गरीबी की लाचार अवस्था में माता-पिता अपने बच्चों को रोटी खिला देते हैं और स्वयं भूखे रह जाते हैं। उधर साधन सम्पन्न होते हुए भी बच्चे माता-पिता को असहाय छोड़ देते हैं। वे बेचारे दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं और दरबदर की ठोकरें खाते हैं। इस समय स्थिति बड़ी विकट बनती जा रही है। दो वक्त की रोटी न खिलानी पड़ जाए इसलिए लोग अपने ही प्रियजनों से मुँह मोड़ने में लगे हुए हैं।
          दिन-प्रतिदिन हम अपने संकुचित विचारों के कारण इस दुनिया को भी संकीर्ण बनाते जा रहे हैं। ईश्वर ने तो हमें ऐसा कभी नहीं बनाया था फिर ऐसा नकारात्मक परिवर्तन क्योंकर हो गया। यह हमारी समझ से परे है।
          कुछ समय पहले जब हम बच्चे थे तब प्रतिदिन छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते थे, तकरार करते थे और फिर थोड़े समय बाद एक-दूसरे को मना भी लिया करते थे। एक-दूसरे के गले मे गलबहियाँ डालकर मुस्कुराते थे। अब जब हम बड़े हो गए हैं तो हमारे अहं परस्पर टकराने लगे हैं। हम अपने बचपन जैसी सहजता औऱ सरलता कहीं पीछे छोड़ आए हैं। इसलिए स्थितियाँ बहुत खराब हो गई हैं। अब यदि हम एक बार लड़ते है तो रिश्तों को ही खत्म करने के बहाने ढूँढने लगते हैं। आपसी प्यार और विश्वास तो मानो पता नहीं कहॉं खोते जा रहे हैं।
     ‌   जिन्दगी ने हमें बहुत अनुभवी बना दिया है। हम आवश्यकता से अधिक सीखकर बुद्धिमान हो गए हैं। अब हम इतने बड़े होते जा रहे हैं कि बाकी सब लोग हमें बौने दिखाई देने लगे हैं। किसी दूसरे के कष्ट को देखकर हमारा मन बिल्कुल नहीं पसीजता। हम हाथ बढ़ाकर किसी भी ‌व्यक्ति की सहायता नहीं करना चाहते। हम लोग दूसरों को परेशान देखकर अपनी ऑंखें मूॅंद लेते हैं। हमें सिर्फ और सिर्फ अपनी समस्याएँ दिखाई देती हैं। 
          हम लोगों पर आज केवल स्वार्थ हावी होता जा रहा है जो बहुत ही गलत है। न तो हमें अपने दोस्तों में कोई दिलचस्पी है और न ही अपने भाई-बन्धुओं में। जिससे हमारे स्वार्थ पूरे होते हैं वही हमें अपना-सा प्रतीत होता है। स्वार्थ पूरे होने के बाद सबके रास्ते अलग हो जाते हैं। लोग मिलने पर नजरें चुराकर या कन्नी काटकर निकली जाते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो वे एक-दूसरे को पहचानते ही नहीं हैं।
        अपने हृदयों को थोड़ा विशाल बनाकर और सकारात्मक रूख अपनाकर हम इस संसार को अपना बना सकते हैं। इस जीवन यात्रा में हमें बहुत से हमसफर मिलते हैं। उनके साथ यदि कदम मिलाकर चलने की मानसिकता हम बना लें तो तभी बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। हम सब लोग मिलकर ही सम्बन्धों में परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

नई टेक्नोलॉजी को मित्र बनाऍं

इक्कीसवीं सदी का यह युग टेक्नोलॉजी का है। बच्चे और युवा इस तकनीक का सफलतापूर्वक भरपूर प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं। आज हर छोटे-बड़े ऑफिस में हम कर्मचारियों को कम्प्यूटर और लेपटाप पर काम करते हुए देख सकते हैं। बैंक भी आनलाइन हो गए हैं। उनकी एप्लिकेशन डाउनलोड करके बिना समय गॅंवाए शीघ्रता से हम ट्रांजेक्शन कर सकते हैं। आजकल यूपीआई आदि से पैसों का लेन-देन प्रायः सभी लोग करते हुए दिखाई देते हैं।
         छोटे-छोटे बच्चे भी आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और आईपेड का प्रयोग सुविधा से करते हैं। बच्चों को इन उपकरणों पर सहजता से कार्य करते हुए देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। बच्चों की अंगुलियॉं इन उपकरणों पर बहुत तेजी से भागती हुई सी दिखाई देती हैं। बच्चे अपने मन पसन्द प्रोग्राम बिना किसी की सहायता के स्वयं ही देख लेते हैं। उनके ज्ञानवर्धक बहुत से प्रोग्राम मोबाइल आदि में मिल जाते हैं। उनके विद्यालय के प्रोजेक्ट्स भी इनकी सहायता से बनाए जाते हैं। बच्चों की आधी पढ़ाई तो इन्हीं उपकरणों के माध्यम से हो जाती है।
        प्रायः आयुप्राप्त होते लोगों से भी मिलना होता रहता है। वे स्वयं को जब इस तकनीक के प्रयोग के लिए मिसफिट समझ लेते हैं तो मन को कष्ट होता है। सारी आयु नित नूतन प्रयोग करने वालों से ऐसी सोच की आशा वास्तव में बहुत निराश करने वाली होती है। 
          मोबाइल फोन अपनी जेब में रखकर जब लोग कहते हैं कि हमें तो बस फोन मिलाना और किसी से बात करने के अलावा कुछ नहीं आता तब झटका-सा लगता है। न वे फोन में कोई नम्बर फीड कर सकते हैं और न ही मैसेज तक कर सकते हैं। फेसबुक और वाट्सअप या अन्य एप्लीकेशन की जानकारी होना उनके लिए मानो बहुत दूर की कौड़ी होती है। यद्यपि यह स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। घर में रहने वाले युवाओं और बच्चों का यह दायित्व बनता है कि अपने बुजुर्गों को इस नई टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी दें।
          रिटायर होने के बाद सभी बुजुर्गों को समय व्यतीत करने की समस्या होने लगती है। उसका कारण है कि वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाते हुए उनका शरीर अशक्त होने लगता है। इसलिए वे भागदौड़ करने वाले काम नहीं कर पाते। सभी लोगों के पास कुछ करने के लिए काम नहीं होता। तभी वे प्रायः खाली बैठे रहते हैं। बच्चे अपने कामों में व्यस्त रहते हैं, उनके पास बुजुर्गों के पास बैठने के लिए सीमित समय निकल पाता है। स्वयं को अपेक्षित समझने के कारण वे हर समय अनमने और चिड़चिड़े से रहने लगते हैं।
        इस तरह की परेशानियों से अपने घर के बुजुर्गों को मोबाइल का उपहार देकर उन्हें व्यस्त रहने का अवसर दें। उन्हें फेसबुक और वाट्सअप आदि चलाना भी सिखाएँ। वे जब इस नई तकनीक का सही ढंग से प्रयोग करना सीख जाएँगे तो उनका मन भी लगा रहेगा। उन्हें घर बैठे काम करने की जानकारी समझानी चाहिए।
        उन्हें सिखा देना चाहिए कि वे पोस्ट पढ़ें, उन पर कमेण्ट करे, मन करे तो कुछ लिखकर पोस्ट कर दें, कभी चाहें तो फोटो भी लोड कर सकते हैं। उन्हें अपने मित्रों के साथ चैट करना भी सीखा सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका काफी समय व्यतीत हो जाएगा। जब वे इस प्रकार व्यस्त हो जाएँगे तो उनकी समय बिताने की समस्या का समाधान हो जाएगा। वे खुश रहेंगे तो घर की शान्ति भी बनी रहेगी। 
        अपने बुजुर्गों या माता-पिता को यह अवश्य बता दें कि फेसबुक मित्रता का अखाड़ा नहीं है अपितु उसका उपयोग रचनात्मक होना चाहिए। यदि कोई अवांछित पोस्ट करे अथवा कोई पसन्द न आए तो उसे ब्लॉक करना अथवा अनफ्रैण्ड करना भी सिखाएँ। 
        जिस भी विषय में उनकी जानकारी है अथवा अपने जीवनभर प्राप्त अनुभवों को सबके साथ साझा कर सकते हैं। लाइक वाले बटन पर वे क्लिक करके अपनी सहमति दर्ज कर सकते हैं। यह बात उन्हें समझानी भी आवश्यक है कि यदि वहाँ उनकी पोस्ट पर लाइक न भी आ सकें तो निराश न होकर अपने अनुभवों को साझा करते रहें। यह ऐसा माध्यम है जहाँ सभी लोग निस्सकोच अपने मन की बात या सुख-दुख भी शेयर करके अपने दिल का बोझ कम कर सकते हैं। इस माध्यम से लाभ-हानि की अपेक्षा करना उचित नहीं हो सकता।
        युवाओं को चाहिए कि जहाँ भी उन्हें कोई कठिनाई आए तो उनके पास बैठकर तसल्ली से उसके निवारण का उपाय बताएँ। उनकी व्यस्तता के इस बहाने की सराहना करते रहें, इससे उनका उत्साह बना रहेगा। प्रयास करिए कि वे इस नई तकनीक से बोर न हों बल्कि उसमें अपना मन लगाए रहें। यदि बुजुर्ग अपने फालतू समय का सदुपयोग इस तरह करेंगे तो प्रसन्न रहेंगे और आप स्वयं भी उनकी ओर से निश्चिन्त हो जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 19 जुलाई 2026

मनुष्य का ‌क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना

मनुष्य का क्षमाशील होना अति आवश्यक है। कोई कुछ भी कहे या अहित कर दे तो भी उसके कृत्यों को अपने दिल से लगाकर नहीं बैठ जाना चाहिए। अनावश्यक रूप से पिष्टपेषण करते रहने से अपने मन में उस व्यक्ति के लिए नफरत की भावना बढ़ने लगती है। उसका बिगाड़ तो समय पर होगा किन्तु अपना ही मन अनावश्यक ही ‌कलुषित हो जाएगा और उसमें ईर्ष्या-क्रोध आदि की अधिकता हो जाती है। इस कारण मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है।
          प्रतिकार करने से किसी का भला नहीं होता। किसी को माफ कर देने से बड़ा और कोई गुण नहीं होता। जितने भी महापुरुष इस भारतभूमि पर हुए हैं उन सबने इसे अस्त्र के रूप में अपनाया। तभी उन सबको हम याद करते हैं।
        यह भी सच है कि दूसरों को क्षमा करने वालों को लोग बहुधा कायर समझ लेते हैं। यह क्षमा दूसरों के हृदयों में अपना स्थान बनाने का ब्रह्मास्त्र है जिसका सन्धान करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। यह क्षमा रूपी गुण सज्जनों का अमूल्य आभूषण होता है।
              राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक प्रसिद्ध कविता है 'शक्ति और क्षमा' उसकी निम्न पंक्ति का अर्थ है कि क्षमा उसी व्यक्ति को शोभा देती है, जो शक्तिशाली हो -
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।।
अर्थात् कवि का कथन है कि शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी कमजोर व्यक्ति को क्षमा कर दे तो उसकी उदारता और महानता दिखाई देती है। सर्प का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक विषैले और शक्तिशाली सॉंप में यदि डसने की क्षमता या उसके पास विष हो और फिर भी वह किसी को न काटे तो उसका यह संयम महान माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कवि का मुख्य सन्देश यही है कि दया, त्याग और क्षमा जैसे गुण तभी सार्थक और प्रभावशाली बन सकते हैं जब एक व्यक्ति भीतर से शक्तिशाली और समर्थ हो।
          राजा रंजीत सिंह के जीवन की एक घटना की चर्चा करते हैं। उनकी एक आँख नहीं थी। एक बार वे अपने सिपाहियों के साथ शहर की व्यवस्था देखने के लिए भ्रमण कर रहे थे। रास्ते में एक बाग में थोड़ी देर विश्राम करने के लिए रुके।
        तभी कहीं से एक पत्थर आकर उन्हें लगा। सिपाहियों को बहुत क्रोध आ गया और पत्थर मारने वाले बालक को पकड़कर वे राजा के सामने ले आए। राजा ने कड़ककर उससे पत्थर मारने का कारण पूछा, "बच्चे तुमने पत्थर क्यों मारा?"
          उस बालक ने बड़ी निडरता से उत्तर दिया, "महाराज, वह फल तोड़ने के लिए वृक्ष पर पत्थर मारा था। मेरी कोई गलती नहीं है कि वह पत्थर आपको लग गया।"
          बालक के इस निर्भीक उत्तर को सुनकर राजा ने सिपाहियों को आदेश देते हुए कहा, "इस बालक को मेरी ओर से एक पुरस्कार दिया जाए।"
          वे सभी सिपाही राजा के इस निर्णय को सुनकर हैरान हो गए।
          तब राजा रंजीत सिंह ने उनसे कहा, "वृक्ष को पत्थर मारो तो वह फल देता हैं और मैं राजा होकर यानी इन्सान होकर भी इस बालक को पुरस्कार नहीं दे सकता। समर्थ होकर भी क्या मैं इतना गया गुजरा हूँ कि फल पाने की आस से पेड़ पर पत्थर मारने वाले को वह फल देता है और मैं इस बालक को निराश करूँ।"
          ऐसी होती हैं महान् लोगों की बातें जिन्हें युगों तक याद किया जाता है। इसीलिए कहा है कि क्षमा से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं होता। सामने वाला व्यक्ति बिना मोल अपना बन जाता है। कोई कुछ भी कहता रहे लेकिन दूसरों को क्षमा कर देने से अपना मन कलुषित नहीं होता। दिल पर से बोझ उतर जाता है और हृदय सदा प्रसन्न रहता है।
          कुछ लोगों का मानना है कि दुर्बल व्यक्ति की क्षमा कोई मायने नहीं रखती। वह क्षमा नहीं करेगा तो क्या करेगा? इसके लिए वे कहते हैं कि क्षमा उसे सुशोभित करती है जिसके पास दूसरे को दण्ड देने की सामर्थ्य हो। मेरे विचार से यह कहना अनुचित है क्योंकि क्षमा करने का गुण उसी में होगा जिसमें आत्मिक व मानसिक बल होगा। 
          शारीरिक दुर्बलता की बात करना बेमायने हो जाती है। यदि शरीर से व्यक्ति दुबला-पतला हो किन्तु उसमें आत्मिक बल हो तो वह संसार की किसी शक्ति से नहीं डरता। सबका डटकर मुकाबला करता है व हर चुनौती से भिड़ने की सामर्थ्य रखता है। शरीर से कमजोर होने पर महात्मा गान्धी की तरह व्यक्ति अपने व्यवहार से सिद्ध कर सकता है कि वह अच्छे अच्छों की हवा टाइट करके उन्हें उखाड़कर फैंक सकता है।
          क्षमा को अपनाने वाला व्यक्ति हमेशा प्रथम पंक्ति में रहता है। ऐसे सज्जन की चाहे कोई बुराई कर ले परन्तु उसका यह एक गुण सब पर भारी पड़ता है। ईश्वर को भी विनयी और क्षमाशील लोग पसन्द आते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 18 जुलाई 2026

बगुला भगत

बगुला भगत 

'बगुला भगत' एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है - कपटी व्यक्ति, झूठा इन्सान, ढोंगी मनुष्य, पाखण्डी आदमी, धूर्त या चालाक व्यक्ति। इसका उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो बाहर से बहुत सीधे-सादे, धार्मिक और सज्जन दिखाई देते हैं परन्तु असल में वे बहुत चालाक, दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के होते हैं। बगुला भक्तों के लिए हमें प्रायः यह उक्ति सुनने को मिलती है-
              मुँह में राम बगल में छुरी।
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
        बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इन्सान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? 
         वास्तव में 'बगुला भगत' यह शब्द बगुला (पक्षी) के स्वभाव से लिया गया है। कहते हैं कि जब बगुला मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टॉंग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए अब इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। 
          दूसरे शब्दों में बगुला पानी में एक टाँग पर खड़ा होकर ऐसा ध्यान लगाता है जैसे कोई बहुत बड़ा तपस्वी हो लेकिन मौका मिलते ही वह झट से मछली पर झपट्टा मार देता है। उन्हें अपना शिकार बना लेता है। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयन्त्र को समझ नहीं सकतीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगती हैं। अब बगुले की तो मौज हो जाती है। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
         मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है, उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। केवल जौहरी ही स्वयं उसका मूल्य लगा सकता है।
          जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं, वे मन्दिर में जाकर कितनी भी घण्टियाँ बजा लें ईश्वर उनसे कभी प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय वे ही भयभीत रहते हैं।
         कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।
अर्थात् जिस प्रकार का अन्न मनुष्य खाता है, उसका मन वैसा ही बन जाता है। इसलिए नाजायज तरीके से कमाए गए धन का सभी दुरूपयोग ही करते हैं।
        मन्दिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम पर लाखों रुपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
         पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
          कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घण्टों-घण्टों पूजापाठ करते हैं। उनका यह जप-तप सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं-     
    अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
अर्थात् जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है, उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
         अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से सदा बचकर रहना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर मनुष्य सारे आडम्बर कर रहा है, वह तो सर्वज्ञ है। कबूतर यदि डरकर अपनी ऑंखें बन्द कर लेता है तो बिल्ली वहॉं से भाग नहीं जाती, उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत  दुष्कर्मों का फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर वह कहीं नहीं जा सकता। उसका मन उसे कचोटता रहता है। अतः बगुला भक्त न बनकर मनुष्य को प्रभु का सच्चा भक्त बनना चाहिए।

हम मिलावटी युग में जी रहे

हम मिलावटी युग में जी रहे

समय परिवर्तनशील है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। कुछ दशकों पूर्व तक सभी प्राकृतिक संसाधन यानी जल, वायु सभी शुद्ध मिलते थे। उसी प्रकार सभी  खाद्यान्न भी शुद्ध मिलते थे। परन्तु आज की वास्तविकता यही है कि हम लोग मिलावट वाले युग में जी रहे हैं। जिस भी चीज में देखा जाए कुछ-न-कुछ मिला हुआ ही होता है। न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। हम लोगों को कोई भी खाद्य पदार्थ अपने शुद्ध रूप में नहीं मिल पाता जिनको पाना हम सबका अधिकार है। 
           हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे जीवन के साथ यह मिलावट का खेल चल रहा है। प्रायः टीवी और समाचार पत्रों ये खाद्यान्नों में मिलावट के समाचार सुर्खियाँ बनती रहती हैं। यूरिया आदि मिलाकर सिन्थेटिक दूध बनाना, मिलावटी खोया व पनीर बिकना, फलों और सब्जियों पर आर्टिफिशयल रंग करना व उनको आकार में बड़ा करने के लिए अथवा मिठास के लिए इन्जेकशन लगाना, काली मिर्च में पपीते के बीज डालना, चीनी में हड्डियों का चूरा, बहुत से खाद्य तेलों में जानवरों की चर्बी मिलना आदि।
       हम लोग फल और सब्जियों को इस उम्मीद में बाजार से खरीदकर लाते हैं कि वे स्वास्थ्यवर्धक हैं।पर बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि घर में सब्जियों को जब धोने लगो तो उन पर लगा अप्राकृतिक रंग निकलने लगता है। हैरानी की बात यह है कि फल खाने लगो तो एक ही फल का कुछ हिस्सा अजीब तरह से मीठा होता है और कुछ फीका। इन पर पता नहीं किसका लेप लगाते हैं जिसके कारण ये सब एकदम चमकते हुए और आकर्षक दिखाई देते हैं। उन्हें देखते ही खरीदने का मन कर जाता है।
          सुन्दरता में चार चाँद लगाने की सलाह देने वाले विज्ञापनों के अनुसार यदि उनका इस्तेमाल किया जाए तो उन सौन्दर्य प्रसाधनों में की गई मिलावट त्वचा को हानि पहुँचा रही है। इसी प्रकार कुछ समय पहले मैगी, कोक और टूथपेस्ट आदि में हानिकारक तत्त्वों की चर्चा टीवी और समाचार पत्रों में प्रमुखता से कवरेज दी गई।
         खेती में पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक आदि भी मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं। और तो और जल को फैक्टरियों का केमिकल युक्त वेस्ट और सीवर की गन्दगी दूषित कर रही है। वायु को हम पेड़ काटकर और गाड़ियों, एसी, फैक्टरियों के धुँए से प्रदूषित कर रहे हैं। यानी कि प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रही है।इनके कारण कई रोग बढ़ते जा रहे हैं।
         ईश्वर ने हमें हर पदार्थ शुद्धरूप में दिया है परन्तु मुट्ठी भर स्वार्थी लोग अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण पूरे भारत देश के करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसा कुकृत्य करते समय न उनका जमीर उन्हें कचोटता है और न ही उनके हाथ काँपते हैं। पता नहीं पर शायद ऐसे लोग मोटी चमड़ी के बन जाते हैं। इसीलिए उन लोगों पर कोई असर नहीं होता।
        आज स्थिति यह हो गई है कि न हमें शुद्ध वायु मिलती है और न ही जल। फल-सब्जियाँ तथा खाद्यान्न भी हमें पुष्ट नहीं करते। इस प्रकार अपनी मूर्खताओं के कारण हम अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं। समझ नहीं आता कि हम आने वाली पीढ़ी को क्या खिला रहे हैं? हमारे बच्चे ऐसे मिलावटी पदार्थों को खाकर कैसे स्वस्थ रहेंगे?
          इन प्रदूषित खाद्यों का सेवन करके हम स्वयं ही अनेकानेक बिमारियों को न्योता देते जा रहे हैं। इसी कारण ही कुकुरमुत्ते की तरह मल्टीस्पेशैलिटी वाले हस्पलात नित्य प्रति खुलते जा रहे हैं जो हमारे स्वास्थ्य और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। ये दुनिया भर के टेस्ट करवाते हैं फिर भी कोई गारण्टी नहीं कि इलाज सही हो सकेगा। कितने ही ऐसे उदाहरणों की चर्चा सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर होती रहती है।
        देश में कई प्रदेशों में टेस्टिंगलेब हैं जहाँ इन खाद्यान्नों के सैम्पल चैक किए जाते हैं। अब समस्या यही है कि यदि इन समाजविरोधियों को सजा मिल सके तो शायद इस समस्या से किसी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। केवल सरकार के आधे-अधूरे प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला। बस ऐसे ही ये खबरें सुर्खियाँ बटोरती रहेंगी और फिर सब टाँय-टाँय फिस्स होता रहेगा।
           सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों को भी आगे कदम बढ़ाना पड़ेगा। जन साधारण के भी जागरूक रहने की बहुत आवश्यकता है। यदि आमजन इन अशुद्ध वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे तो शायद भविष्य में कुछ राहत मिलने की सम्भावना बन सकती है।
          यदि समय रहते हम न जागे तो पता नहीं हम सबके स्वास्थ्य का कितना और विनाश होगा और इस विनाशलीला के लिए किसी ओर को दोष नहीं दे सकेंगे, इसके जिम्मेदार हम खुद ही होंगे। यह हमारे लिए खतरे की घण्टी है। यदि शीघ्र ही कोई ठोस कदम न उठाया गया तो जनसाधारण के स्वास्थ्य की रक्षा किसी तरह नहीं की जा सकेगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

धर्म केवल ईश्वर तक पहुॅंचने का मार्ग

धर्म केवल ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग

इस संसार में जितने भी धर्म हैं वे केवल ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। मनुष्य के इस संसार में आने का उद्देश्य यही है कि वह अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करे। मनीषियों का कथन है कि चौरासी लाख योनियों में अपने कृत पापकर्मों की सजा भुगतने के बाद जीव को यह मानुष तन मिलता है। इस मानव चोले के मिलने के पश्चात उसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। संसार के आकर्षणों में भ्रमित होकर उसे परमात्मा को भूलना नहीं चाहिए।
           कोई भी धर्म दंगा-फसाद करने की अनुमति नहीं देता। हर जीवन उपयोगी है। उसे धर्म के नाम पर अनावश्यक ही नष्ट नहीं करना चाहिए। ईश्वर इस बात की इजाजत कभी नहीं देता कि उसके बनाए हुए जीवों को कोई भी आततायी, किसी भी कारण से हानि पहुॅंचाए। 
            सभी धर्म परस्पर मिल-जुलकर रहने का आदेश देते हैं। वे परस्पर भाईचारे को प्रोत्साहित करते हैं। किसी व्यक्ति का धर्म क्या है? वह किस पद्धति से पूजा-अर्चना करता है? यह उस व्यक्ति विशेष का मानना व्यक्तिगत मामला है। साथ ही वह किस देवी-देवता की पूजा-अर्चना करे यह व्यक्ति विशेष की इच्छा पर निर्भर करता है। 
        कोई यदि जोर-जबरदस्ती करता है अथवा तलवार के बल पर या कोई लालच दिखाकर किसी का धर्म परिवर्तित कराना चाहता है तो यह सरासर गलत है। इसे हम अपराध की श्रेणी में रख सकते हैं। यदि कोई भी व्यक्ति ऐसा दुष्कार्य करता हुआ पकड़ा जाए तो उसके लिए कानून में सजा का प्रावधान है।
         इसी आशय को साईं बाबा के अनुसार समझते हैं। उनका कथन है- 
        'मन्दिर में ज्योत, दरगाह में दीया, गुरुद्वारे में ज्योति और गिरिजाघर में मोमबत्ती जलाते हैं। मगर लौ सबकी एक जैसी होती है। इससे पता चलता है कि सबका मालिक एक है।' 
            इस कथन का अभिप्राय यही है कि हर धार्मिक स्थान पर पूजा करते समय प्रकाश किया जाता है। यानी प्रकाश का महत्त्व है। उन सबका ईश्वर की उपासना का तरीका चाहे अलग-अलग है किन्तु अर्थ एक ही है। 
          सभी धर्म यद्यपि एक ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। जैसे विश्व के किसी भी कोने से हम अपने घर पर पहुँच सकते हैं। किसी भी स्थान से घर आने के लिए हम अलग-अलग रास्ता पकड़ सकते हैं। हमारा लक्ष्य मात्र अपने घर पहुँचना होता है। चाहे कितनी भी कठिनाई मार्ग में आए अथवा कितने ही कटु अनुभवों से हमें दो-चार होना पड़े, अन्तत: हम अपने घर पहुँच ही जाते हैं। हम घर पर पहुँचकर ही सन्तुष्टि का अनुभव करते हैं। इसीलिए छज्जू महाराज जी ने कहा था -
       जो सुख छज्जू दे चौबारे न बलख न बुखारे।
अर्थात् अपना घर चाहे महल न हो, टूटा-फूटा हो या झोंपड़ी हो, सुख वहीं पर आकर मिलता है। कितने ही फाइव स्टार होटलों में रह लिया जाए अथवा किसी धनी मित्र के घर आवभगत करवा ली जाए पर भगवान श्रीकृष्ण से महल में अपनी सेवा करवाने वाले सुदामा की तरह अपनी झोंपड़ी का मोह नहीं छूटता। सदा अपना वही बसेरा ही मनुष्य को सुखदायी लगता है।
          यह संसार एक रैन बसेरा है। हम चाहें अथवा न चाहें इसे निश्चित अवधि के पश्चात छोड़कर जाना पड़ता है। हमारा वास्तविक घर प्रभु की शरणस्थली है। वहीं जाकर हमें सच्चा सुख मिलता है। इस दुनिया के बाजार में तो बस हम मौज-मस्ती करने आते हैं। काम निपटाकर फिर अपने घर चले जाते हैं।
          उस प्रभु तक पहुँचने का मार्ग संसार के सारे धर्म बताते हैं। जिस प्रकार एक मनुष्य को बेटा, भाई, भतीजा, पिता, पति, मामा, चाचा, ताया, फूफा, मित्र आदि अनेक नामों से बुलाते हैं, उसी प्रकार परमपिता परमात्मा को भी हम विभिन्न नामों से पुकारते हैं। इसके लिए झगड़ा करना अथवा  एक-दूसरे को नीचा दिखाना उचित नहीं है। न ही इसे विवाद का विषय बनाना चाहिए।
          अब बात आती है कि ईश्वर की पूजा किस रूप में की जाए। उसकी पूजा चाहे निराकार रूप में की जाए या साकार रूप में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मूर्ति पूजा प्रारम्भिक स्टेज होती है जिस पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। बाद में धीरे-धीरे मूर्ति भी छूट जाती है और निराकार ईश्वर केवल प्रकाश के रूप में ही दिखाई देने लगता है। उस प्रभु का यह प्रकाश हमारे इन भौतिक चक्षुओं से नहीं दिखाई देता। वह केवल हमारे आभ्यन्तरिक चक्षुओं से दिखाई देता है।
           ईश्वर की आराधना किसी भी धर्म के अनुसार मनुष्य कर सकता है। जब वह अपनी भक्ति में आगे बढ़ जाता है तो फिर उसे किसी भी चिह्न की आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय उसे अपने अन्तस् में केवल प्रकाश ही दिखाई देता है। यानी सभी धर्मावलम्बियों को ईश्वर का दिव्य स्वरूप प्रकाश के रूप में दृष्टिगोचर होता है। शेष सब पीछे छूट जाता है।
          सभी धर्म इसी अलौकिक प्रकाश की ओर ले जाते हैं। यानी सभी धर्मो की अन्तिम परिणति एक ही है। हमारे आदीग्रन्थ वेद भी यही कहते हैं।                तमसो मा ज्योतिर्गमय
अर्थात् हे ईश्वर! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

आत्मामुग्ध व्यक्ति

आत्ममुग्ध व्यक्ति 

हम सभी आत्ममुग्ध रहते हैं। हम केवल अपने बारे में बात करना चाहते हैं, अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं। जरा-सी आलोचना को हम सहन नहीं कर पाते। उस समय हमारा मन करता है कि इस आलोचक को काले पानी भेज दें अथवा उसका वो हाल करें कि जिन्दगी भर याद रखे, वह उसे भूल न पाए। सोचना अलग बात होती है किन्तु उस पर आचरण करना अलग बात।
           आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी ही परछाई, रूप, प्रतिभा या व्यक्तित्व पर अत्यधिक मुग्ध रहता है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। वे सदैव अपनी आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखते हैं। दूसरों से हमेशा अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं। दूसरों की भावनाओं या तकलीफों की उन्हें बिल्कुल भी परवाह न होती। वे अपनी छोटी-सी आलोचना या असहमति होने पर भड़क उठते हैं। उनका यह मानना होता है कि विशेष व्यवहार पाना उनका अधिकार है।
           महात्मा बुद्ध ने इसीलिए किसी समय यह कहा था, 'आप पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी ऐसा व्यक्ति खोज लें जो आपको आपसे ज्यादा प्यार करता हो, आप पाएँगे कि जितना प्यार आप खुद से कर सकते हैं उतना कोई आपसे नहीं कर सकता।'
          जब हम खुश होते हैं तब यदि गहराई से विचार करते हुए अपने अन्तस् को टटोलें तो पता चलेगा कि जिस वस्तु ने हमें परेशान किया हुआ था, वह हमें खुशियाँ दे रही है। इसके विपरीत जब हम दुखी होते हैं तब मनन करने पर पता चलता है कि वस्तुत: जिसके लिए हम व्यथित हो रहे थे, वही हमारी प्रसन्नता का कारण है। 
          अपनी खुशियों को ग्रहण लगाना उचित नहीं है। यदि हम सभी अपने भीतर विद्यमान क्रोध को हवा दते रहेंगे तो हम स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इस क्रोध से बड़ा मनुष्य का कोई और शत्रु नहीं है। वह मनुष्य के विवेक पर प्रहार करके उसे कुण्ठित करता है। क्रोध करना ऐसा है मानो एक गर्म कोयले को उठाकर किसी दूसरे पर फैंक दिया गया हो। दूसरे को तो वह बाद में जलाएगा लेकिन पहले तो वह आपना ही हाथ जलाएगा।
          क्रोधी व्यक्ति को कोई दण्ड दे या न दे परन्तु उसका क्रोध स्वयं ही उसे सबसे अलग करके दण्ड दे देता है। अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। इसीलिए अनावश्यक क्रोध करने वाले से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं होता कि वे कब अनर्गल प्रलाप करते हुए सामने वाले का अपमान करने लगें। 
         जब तक मनुष्य जीवित है और वह साँस ले रहा है तब तक कदम-कदम पर उसे टकराव मिलता रहेगा, विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि मनुष्य अपना आपा खोने लगे। ऐसा करके वह अनजाने में अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करता है। पीठ पीछे जो बोलते है उन्हें बोलने देना चाहिए। यदि कोई सामने बुराई करे तो उस पर विचार अवश्य करना चाहिए।
           जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा छिपाए नहीं छिप सकते, उसी तरह सत्य भी बहुत समय तक छिपाकर नहीं रखा जा सकता। जब सच्चाई सामने आती है तो वे झूठे लोग बगलें झाँकने लगते हैं। यदि मनुष्य सही रास्ते पर चल रहा है तो लोगों से देर-सवेर सम्मान और लगाव मिलता रहता है। यही उसकी पूँजी होती है।
          इस क्रोध से मुक्ति पाना बहुत सरल है। इन्सान अपने हृदय में यदि शान्त रहने का अभ्यास कर ले तो इसे वश में किया जा सकता है अन्यथा दुर्वासा ऋषि की तरह कभी सम्मान नहीं पाता। शान्ति का वास हमारे अपने हृदय में होता है, उसे तीर्थों, जंगलों या तथाकथित गुरुओं के पास जाकर तलाशने का कोई लाभ नहीं होता। इसे बाहर ढूँढने से केवल धन और समय की बर्बादी होती है। फिर मन अशान्त हो जाता है।
           हमारे अतिरिक्त हमें कोई और इस क्रोध रूपी शत्रु से नहीं बचा सकता। हमें अपने सही रास्ते का चुनाव करके स्वयं ही उस पर चलना पड़ता है। जबरदस्ती हाथ पकड़कर व्यक्ति को कोई दूसरा नहीं चला सकता।
          जो बीत गया उसके बारे में अधिक नहीं सोचना चाहिए और न ही पिष्टपेषण करते हुए अनावश्यक क्रोध करना चाहिए। भविष्य के गर्भ मे क्या है? उसके विषय में सोचते हुए सुनहरे सपने नहीं देखने चाहिए। यदि किसी भी कारणवश वे सपने पूरे न हो सकें तो फिर मनुष्य को अपनी क्षमताओं पर क्रोध आने लगता है। केवल वर्तमान हमारा अपना है, उसी पर ध्यान केन्द्रित करके आगे बढ़ते रहना चाहिए।
           आत्मकेन्द्रित बनकर सदा अपनी कमियों का सुधार करना चाहिए। अपने दोषों को इंगित करने वालों पर क्रोध न करके उनसे मिलने वाले प्रहारों से स्वयं को बचाते हुए जीवन की कठिन डगर पर बढ़ते रहना बुद्धिमानी होती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

बुधवार, 15 जुलाई 2026

अपने हित के लिए रास्ता निकालना

अपने हित के लिए रास्ता निकालना 

बुद्धिमान व्यक्ति हर स्थिति में अपने हित के लिए रास्ता निकाल लेता है। मनीषियों का कथन है कि किसी से बदला लेने के स्थान पर सदा बदलाव लाने पर विचार करना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से देना कोई महानता का कार्य नहीं होता। दूसरे को शय देना अथवा उससे डरकर जीवन जीना एक नकारात्मक तरीका कहलाता है। इससे बचना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।
           जीवन को व्यहारिकता से चलने वाला मनुष्य कभी जीवन की रेस में पिछड़ता नहीं है। समझदारी इसी में है कि यदि कोई ईंट फैंके तो उसका जवाब पत्थर से न दिया जाए। उस व्यर्थ जाती हुई ईंट को नष्ट न करके उससे अपना घर बना लेना चाहिए। इस प्रकार शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को मुँहतोड़ उत्तर देना ही बुद्धिमत्ता की निशानी होती है। यह सकारात्मक तरीका है जिससे अपनी मानसिक शान्ति भंग नहीं होती और दूसरे को भी मुँह की खानी पड़ जाती है।
          मनुष्य का भाग्य बड़ा ही प्रबल होता है। जब  किस्मत के सिक्के को हवा में उछला जाता है तभी तक हार-जीत का अनुमान लगाए जाता है। जब वह नीचे जमीन पर आकर गिर जाता है तब उसके भाग्य का फैसला सुना दिया जाता है कि वह हार गया है या जीत उसकी झोली में आई है।
          हम लोग अपने कर्मों के द्वारा अपना भाग्य लिखते हैं। यहाँ हम कागज और पत्थर के नसीब की चर्चा करते हैं। वही कागज होता है जिस पर हम लिखते हैं और कुछ समय पश्चात उसकी पुड़िया बनाकर उसमें सामान बेचा जाता है। लोग उस सामान का उपयोग करके उसे कूड़ेदान में फैंक देते हैं। दूसरी ओर उसी कागज पर हमारे धर्म ग्रन्थ लिखे जाते हैं जिन्हें लोग अपने सिर माथे पर रखते हैं, उनका नित्य पाठ करके उनकी पूजा करते हैं। उसके पश्चात उसे सुन्दर से वस्त्र में लपेटकर सम्हाल देते हैं।
          इसी तरह सड़क पर पड़े हुए पत्थर सबके पाँव से ठोकर खाते रहते हैं। लोग उसे अपने पैर से ठोकर मारकर एक किनारे कर देते हैं। इसके विपरीत कुछ भाग्यशाली पत्थर ऐसे होते हैं जिन्हें सुघड़ हाथों से तराशकर भगवान की मूर्ति बनाई जाती है। उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है। लोग प्रात:काल और सायंकाल वहॉं आकर उस मूर्ति की पूजा करते हैं।
           मनुष्य को हर परिस्थिति में अपना आत्मसम्मान बचाकर रखना चाहिए। उसे कुचलकर वह निर्जीव जैसा हो जाता है। सहनशीलता रूपी बहुमूल्य गुण का उसे पालन करना चाहिए। निसन्देह महात्मा बुद्ध आदि महापुरुषों की तरह सहनशीलता के अस्त्र से किसी को भी परास्त किया जा सकता है। सबका यथायोग्य सम्मान करना चाहिए परन्तु आत्मसम्मान की शर्त पर कभी नहीं। इसलिए सम्मानपूर्वक जीवन जीकर अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाना हर व्यक्ति के लिए बहुत आवश्यक होता है। अतः अपने आत्माभिमान को कभी दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
          जितनी खुशियाँ मनुष्य जीवन पथ पर चलते हुए बाँटता जाता है उतना ही उसका कद बढ़ता रहता है। एक मोमबत्ती से हजारों मोमबत्तियों को जलाया जा सकता है, फिर भी उसके प्रकाश में कहीं कोई कमी नहीं आती। उसी तरह दूसरों को खुशियाँ बाँटने वाले मनुष्य की खुशियाँ भी कभी कम नहीं होतीं बल्कि मोमबत्ती के प्रकाश की तरह बढ़ती रहती हैं। अपने पास आने वाले सभी लोगों को वह आनन्दित करता रहता हैं।
          महत्त्व इस बात का नहीं होता कि मोमबत्ती अमीर व्यक्ति के महल में जल रही है अथवा किसी गरीब व्यक्ति की झोंपड़ी में जल रही है। उसकी सार्थकता मात्र उसके प्रकाशित होने में होती है, अन्धेरे से मुक्ति दिलाने में होती है। इसी प्रकार मनुष्य के खुशनुमा व्यवहार की चर्चा हमेशा करनी चाहिए। उसकी जाति, रंग रूप आदि अन्य बातों को नजरंदाज कर देना चाहिए।
          किसी भी कीमत पर इस जीवन के मूल उद्देश्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए। संसार में स्वाभिमान के साथ सहनशील रहकर अपने चारों ओर खुशियाँ बिखेरने वाला ही वातावरण को सुगन्धित कर सकता है। अपने लिए, अपने घर-परिवार और अपने बन्धु-बान्धवों के लिए तो सभी जी लेते हैं। इसीलिए वास्तव में जो दूसरों के लिए जीता है, उसी को इन्सान कहते हैं और वही महान होता है। उसका यश चारों दिशाओं में फैलता है। लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

संसार का सौभाग्यशाली व्यक्ति

उस मनुष्य से बढ़कर इस संसार में बड़भागी अथवा सौभाग्यशाली व्यक्ति कोई और नहीं हो सकता जिसके घर पर बन्धु-बान्धवों अथवा आगन्तुकों की चहल-पहल रहती है। मनुष्य वही बड़ा होता है जिसके द्वार पर कोई सहायता माँगने के लिए आता है। उसे अपने ऊपर मान होना चाहिए पर घमण्ड नहीं कि उसे किसी ने इस योग्य समझा कि उसके पास आकर वह अपनी समस्या का वह निदान कर सकता है।
          कोई भी व्यक्ति किसी के पास बहुत आशा लेकर आता है। कोई मनुष्य किसी के पास तीन कारणों से आता है- भाववश, अभाववश अथवा प्रभाववश।
           व्यक्ति यदि सच्चे मन से किसी भावना से आया है तो उसे उस समय प्रेम की आवश्यकता होती। इसलिए उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हो सकता है वह अपनी मूर्खता से या अपनी किसी मजबूरी के कारण समाज से कटकर अलग-थलग पड़ गया हो। उसे अनचाहे अवसाद के समय शायद किसी अपने के भावनात्मक सहारे की जरूरत हो। यदि मनुष्य ऐसा कर सके तो वह व्यक्ति उस सहारा देने वाले का सदा के लिए अपना बन जाता है।
          समय और परिस्थितियों के कारण कोई अभावग्रस्त व्यक्ति किसी पास जाता है तो यथासम्भव उसकी मदद अवश्य ही करनी चाहिए। उसे इन्कार करके निराश नहीं करना चाहिए। पता नहीं वह व्यक्ति कितना मजबूर होगा जो अपने जमीर को मारकर सामने वाले से सहायता माँगने आया है। कबीरदास जी कहते हैं-  
       मॉंगन गये सो मर रहे, मरै जु मॉंगन जाहि।
        तिनते पहिले वे मरे, होत करत है नाहि।।
अर्थात् यदि कोई किसी से कुछ मॉंगने जाता है तो समझ लो कि वह मर गया। परन्तु उसके पहले वह व्यक्ति मर चुका होता है जो दान देने की स्थिति में होकर भी देने से इन्कार कर देता है।
            रहीमदास का यह दोहा द्रष्टव्य है, इसमें उन्होंने ने भी इसी भाव को व्यक्त किया है -
     रहिमन वे नर मर चुके, जो कहुॅं मॉंगने जाहिं।
     उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।
अर्थात् रहीम जी कहते हैं कि जो मॉंगने जाते हैं, वे मरे हुए के समान होते हैं। परन्तु उनसे पहले वे मर जाते हैं जो होते हुए भी न कह देते हैं।
         इसलिए अपने पास आए उस मजबूर व्यक्ति की आशा को निराशा में न बदलते हुए एक अच्छे सामाजिक इन्सान होने का परिचय देना चाहिए। इसी प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते रहने से संसार के सभी व्यवहार चलते हैं। समृद्ध व्यक्ति की सहायता कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। वहाँ तो इस प्रकार के लेनदेन का व्यापार होता ही रहता है।
            यदि किसी प्रभावशाली के पास कोई मनुष्य उसके प्रभाव के कारण से आया है तो इस बात के लिए प्रसन्न होना चाहिए कि परमात्मा ने उसे इतनी सामर्थ्य दी है कि वह किसी के काम आ सकता है। ऐसी स्थिति में किसी की सहायता करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसे अपना सौभाग्य ही समझना चाहिए कि सारा शहर छोड़कर वह व्यक्ति आपके पास आया है किसी और के पास नहीं गया। उसे आपसे कुछ अच्छाई की उम्मीद होगी, तभी तो आपकी शरण में सहायता लेने आया है।
          इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किस्मत की एक आदत है कि वो पलटती जरुर है और जब पलटती है तब सब कुछ उलट-पलट करके रख देती है। जीवन में ऐसी विपरीत स्थिति किसी भी व्यक्ति की हो सकती है। इसलिए अच्छा समय आने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और कष्टदायी समय में धैर्य रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके अपनी उन्नति के समय अपने हाथों से कुछ ऐसे काम कर लेने चाहिए जिससे मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सके।
          दूसरा व्यक्ति किसी के पास चाहे भाव के कारण, अभाव से त्रस्त होकर अथवा रुतबे से प्रभावित होकर आया है, यानी किसी भी परिस्थिति के वशीभूत होकर आया है, उसे निराश नहीं करना चाहिए। समय पर उसके सिर हाथ रख देने से वह कृतज्ञ होकर उसका मुरीद बन जाता है। इस प्रकार मनुष्य के हितचिन्तकों की संख्या बढ़ती रहती है। मनुष्य की पहचान उसके बन्धु-बान्धवों और मित्रों से होती है। वे उसके अपने बन गए तो मानो वह जिन्दगी की जंग जीत गया अन्यथा कुचलने के लिए तो जमाना तैयार ही बैठा हुआ है।
          बस शर्त एक ही है कि मनुष्य को किसी की सहायता करने का घमण्ड नहीं करना चाहिए, उसे केवल अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। उसे अपने किए गए परोपकार के कार्यों को यहाँ वहाँ गाते नहीं फिरना चाहिए। ऐसा करने से सम्मान के स्थान पर उसे लोगों की अपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
          मनुष्य को सदा इस बात के लिए परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने इस संसार में भेजकर उसे इस योग्य बनाया है कि वह किसी दूसरे के काम आ रहा है।      
चन्द्र प्रभा सूद 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

धन्य है आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता

धन्य हैं आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता  

धन्य हैं वे माता-पिता जिनकी आज्ञाकारी सन्तान आजन्म उनका मान-सत्कार करती है। ईश्वर के तुल्य समझते हुए जिन्दगी के हर मोड़ पर मन से उनकी देखभाल करती है, बिना कहे उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। कभी उनके मन में यह विचार तक नहीं आने देती कि उनके माता-पिता यह सोचने पर विवश हो जाएँ कि काश यह हमारी सन्तान न होती। ऐसी सुयोग्य सन्तान पर हर माता-पिता को बहुत गर्व का अनुभव होता है।
           अपने बच्चों से बढ़कर माता-पिता के लिए और कोई नहीं होता। वे उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बना हुआ देखना चाहते हैं। वे यह भी कामना करते हैं कि उनके बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में एक सफल व्यक्ति बनें। दुनिया की सारी नेमते उनके कदमों में हो, किसी प्रकार का कोई अभाव अथवा परेशानी उनके पास फटकने भी न पाए। बच्चे का भविष्य बनाने के लिए वे सभी तरह के कष्ट हंसते हुए झेल लेते हैं।
           वाट्सअप पर यह बोधकथा पढ़ी थी। मुझे अच्छी लगी। सबके साथ इसे साझा करने की इच्छा हुई। कुछ संशोधनों के साथ आपके समक्ष यह कथा प्रस्तुत है। 
           सभी माता-पिता की तरह एक पिता ने भी अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की, उसे खूब पढ़ाया, लिखाया व उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा किया। पुत्र सफल इन्सान बनकर एक मल्टी नेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्य करने लगा। कम्पनी की ओर से उसे उच्च पद के साथ-साथ अच्छा वेतन व सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की गईं। 
          समय बीतते उसका विवाह एक सुन्दर व सुघड़ कन्या से हुआ। उसके घर एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। समय बीतते पिता भी बूढ़ा हो गया। बूढ़े पिता को एक दिन पुत्र से मिलने की उत्कट इच्छा हुई। वह उससे मिलने शहर उसके ऑफिस में गया। वहाँ पुत्र का शानदार ऑफिस देख पिता का सीना गर्व से फूल गया। उसके मातहत सैंकड़ों कर्मचारी कार्य कर रहे थे। 
            उसके चैम्बर में जाकर पीछे से उसके कन्धे पर हाथ रखकर प्यार से पुत्र से पूछा, "इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
            पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए यह कहा, "मेरे आलावा कौन हो सकता है?" 
           पिता पुत्र के उत्तर से निराश हो गया। उसे यह विश्वास था कि बेटा गर्व से कहेगा, "सबसे भाग्यशाली इन्सान आप है जिन्होंने मुझे योग्य बनाया।"
           उसकी आँखे छलछला गईं। दफ्तर से बाहर निकलने से पहले पुनः उन्होंने पीछे मुड़कर बेटे से पूछा, "बताओ  इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
          पुत्र ने इस बार अपने पिता से बार कहा, "पिताजी, वह तो आप हैं।"
          पिता आश्चर्यचकित हो गया और उसने पुत्र से‌ कहा, "अभी तो तुम स्वयं को इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान बता रहे थे।"
         पुत्र ने हंसते हुए कहा, "पिताजी उस समय आपका हाथ मेरे कन्धे पर था। जिस पुत्र के कन्धे पर या सिर पर पिता का वरद हस्त होता है, वह पुत्र दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है।" 
       ‌  पिता की आँखे नम हो आईं, उसने अपने पुत्र को गले लग लिया।
          सच बात है यह कि जिसके कन्धे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है वह इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है। पिता का वरद हस्त उसी इन्सान के सिर पर हो सकता है जो माता-पिता का आज्ञाकारी बच्चा होता है। जिसे उनकी परवाह होती है और उनके सुख-दुख का ध्यान रखता है। उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा का मान रखता है। तभी वह उनका आशीर्वाद भी पाने का अधिकारी बन पाता है।
         इसके विपरीत अपने माता-पिता का जो सन्तान वृद्धावस्था में बिल्कुल ध्यान नहीं रखती, उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना देती है, उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देती है, ऐसी सन्तान को न तो ईश्वर कभी क्षमा करता है और न ही घर-परिवार, बन्धु-बान्धवअथवा समाज। ऐसे नालायक बच्चों के लिए दुखी होकर माता-पिता के मुँह से यही बात निकलती है कि 'काश ये पैदा होते ही मर जाते।'
          भगवान श्रीराम और श्रवण कुमार जैसी पितृभक्त सन्तानों को ही संसार युगों-युगों तक स्मरण करता है और उनके उदाहरण दिए जाते हैं। ऐसे बच्चे सबकी ईर्ष्या का भाजन बनते हैं। यही समाज व देश की धरोहर होते हैं। माता-पिता के साथ सभी लोग उन पर मान करते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद 

रविवार, 12 जुलाई 2026

विश्व की प्राचीनतम भाषा

विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ 

संस्कृत भाषा निर्विवाद रूप से सम्पूर्ण विश्व की एक सम्मानित भाषा है। अन्य किसी भी भाषा पर विवाद हो सकता है परन्तु इस भाषा को सभी भाषाविद् एकमत से विश्व की प्राचीनतम भाषा मानते हैं। 
          सभी विद्वान् एकमत से 'ऋग्वेद' को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ मानते हैं। यह सनातन धर्म का सबसे पुराना वेद है। यह न केवल भारत का बल्कि विश्व का भी सबसे पुराना जीवित यानी पढ़ा जाने वाला साहित्यिक ग्रन्थ है। 'ऋग्वेद' की पुरानी पाण्डुलिपियों को यूनेस्को के 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर' में शामिल किया गया है। 'ऋग्वेद' को मौखिक परम्परा के माध्यम से सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किया गया था।
              संस्कृत भाषा को भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु संसार की सभी भाषाओं की जननी माना जाता है। उत्तराखंड प्रदेश की आधिकारिक भाषा इसे बनाया गया है।
            कुछ शताब्दियों पूर्व संस्कृत भाषा आधिकारिक तौर पर भारत की राष्ट्रीय भाषा थी। इसीलिए हमारे सभी ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गए हैं। बेशक लोगों को आज संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं है, फिर भी पूजा करते समय कुछ संस्कृत में श्लोक या मन्त्र गा लेते हैं। वैसे कर्नाटक प के मुत्तुर गांव के लोग केवल संस्कृत में ही बात करते है।
         नासा के अनुसार संस्कृत भाषा धरती पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है। संस्कृत भाषा का शब्दकोष बहुत समृद्ध है। इसमें 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है। संस्कृत भाषा में अनेक शब्द हैं जिनके लिए अनेक पर्यायवाची उपलब्ध हैं। आज नासा के वैज्ञानिक संस्कृत भाषा में ताड़पत्रों पर लिखी गई 60,000 पांडुलिपियों पर रिसर्च का कार्य कर रहे हैं।
          संस्कृत भाषा एक वैज्ञानिक भाषा है जो आधुनिक कमप्यूटर के लिए भी उपयुक्त भाषा है। फोर्बस मैगजीनन ने जुलाई1987 में संस्कृत को Computer Software के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था। किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे कम शब्दों में वाक्य पूरा हो जाता है। यानी कभी कर्त्ता और कभी क्रिया के बिना भी वक्ता अपनी बात को स्पष्ट कर सकता है।
          मजे की बात है कि इस भाषा में कर्ता, कर्म और क्रिया का क्रम यदि बदल भी दिया जाए तो भी उस वाक्य के अर्थ में परिवर्तन नहीं होता।
          संस्कृत भाषा दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसका उच्चारण करते समय में  जीभ मुँह के अन्दर के सभी अवयवों का स्पर्श करती है। इस तरह मुँह की सभी मांसपेशियों की एक्सरसाइज हो जाती है। संस्कृत भाषा में वार्तालाप करने से मनुष्य का शरीरिक तन्त्रिका तन्त्र सक्रिय रहता है जिससे व्यक्ति का शरीर सकारात्म ऊर्जा के साथ सक्रिय हो जाता है। इसीलिए यह भाषा स्पीच थेरेपी में भी बहुत सहायक है। इस भाषा का प्रयोग करने से एकाग्रता बढ़ती है।
          आज भी संस्कृत  भाषा में कई पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। सुधर्मा नामक संस्कृत का पहला अखबार 1970 में आरम्भ हुआ था। आजकल इसे ऑनलाइन भी प्रकाशित किया जाता है।
           संस्कृत भाषा सीखने से दिमाग तेज हो जाता है और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसलिए लंदन और आयरलैण्ड के कई स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य विषय बना दिया गया है। इस समय विश्व के सत्तरह से अधिक देशों के कम-से-कम एक विश्वविद्यालय में तकनीकी शिक्षा के कोर्स में संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है। जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियों की माँग है। वहाँ चौदह विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा पढ़ाई जाती है। भारत के प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत विषय पढ़ाया जाता है। 
            अमेरिकन हिन्दू युनिवर्सिटी के विद्वानों का कथन है कि संस्कृत भाषा में यदि बातचीत की जाए तो मनुष्य बी.पी., मधुमेह, कोलेस्ट्रोल आदि रोगों से मुक्त हो जाता है। 
          हम भारतीय केवल अपनी भाषा के गौरव का गुणगान करते नहीं अघाते। परन्तु जहाँ बच्चों को इसे पढ़ाने की बारी आती है तो उन्हें विदेशी भाषा का मोह सताने लगता है।
           मैं यह नहीं कहती कि बच्चे दूसरी भाषाएँ न पढ़ें। ज्ञान तो जितना आत्मसात किया जाए उतना ही कम है। आयुपर्यन्त मनुष्य ज्ञानार्जन कर सकता है यदि उसमें ज्ञान पिपासा हो। इसे पढ़ने का अर्थ पण्डित बनना नहीं होता है। अपनी मिट्टी और जड़ों से जुड़े रहने के लिए इस देववाणी संस्कृत को भाषा बच्चों को अवश्य पढ़ाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 11 जुलाई 2026

धन-सम्पत्ति का संग्रह किसके लिए?

धन-सम्पत्ति का संग्रह किसके लिए ?

जीवनभर मनुष्य एक-एक पाई करके धन-सम्पत्ति का संग्रह करता है। जैसे बूँद-बूँद जल से घट भरता है, उसी प्रकार पैसा-पैसा जोड़कर वह अपने खजाने की वृद्धि करता है। अपने ऐशो-आराम के लिए दुनिया के सभी साधन जुटाता है। वह मन से चाहता है कि उसके परिवारी जन सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत करें। किसी भी दुख की काली परछाई तक उन्हें छू न सके।
          इसीलिए वह बच्चों को अच्छे-से-अच्छे स्कूल में पढ़ाता है। उच्च शिक्षा भी दिलाता है। देश में अन्यत्र अथवा विदेश में बच्चों को पढ़ने के लिए भेजता है। खुशी-खुशी उनके सारे खर्चों को वहन करता है। उन्हें योग्य बनता देखकर मन-ही-मन वह प्रसन्न होता है। अपने आपको वह दुनिया का सबसे सौभाग्यशाली इन्सान समझकर इतराता फिरता है। हर किसी से अपने बच्चों का परिचय बड़े गर्व से करवाता है। उसे अपने ऊपर मान होता है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा पिता या अच्छा पति है। चारों दिशाओं में सदा उसकी कर्मठता के डंके बजते रहते हैं।
          मनुष्य सोचता है कि उसने यह धन-दौलत अपनी आंखें आने वाली कई पीढ़ियों के लिए जमा कर ली है। बच्चे कोई काम न करें और बैठकर भी खाएँ तो समाप्त नहीं होगी। इतना सब होने के बाद भी उसके मन के किसी कोने में यह कसक रह जाती है कि मैंने जो इतना सब इकट्ठा कर लिया है क्या वह अपने साथ अपनी धन-दौलत अगले जन्म में लेकर नहीं जा सकता?
          उसकी इस पीड़ा को इस कहानी के माध्यम से समझते हैं। एक दौलतमन्द इन्सान ने अपने बेटे के लिए वसीयत करते हुए लिखा कि मरने के बाद उसके पैरों मे उसके फटे हुऐ मोजे (जुराबें) पहना देना। उसने अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए आग्रह किया। पिता के मरने के बाद उसे नहलाया गया। बेटे ने पण्डित से अपने पिता की अन्तिम इच्छा बताई। 
            पण्डित ने कहा, "हमारे शास्त्रों के विधान के अनुसार केवल कफन पहनाने की अनुमति है।"
          बेटा आज्ञाकारी था और जिद पर अड़ा हुआ था, "उसे पिता की अन्तिम इच्छा हर हाल में पूरी करनी है।" 
       ‌ बहस इतनी अधिक बढ़ गई की शहर के अन्य विद्वानों को जमा किया गया लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला।
          इसी समय एक व्यक्ति आया और आकर उसने बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ पत्र रख दिया। उस पत्र में पिता ने अपने पुत्र के लिए यह नसीहत लिखी हुई थी-
            'मेरे प्यारे बेटे, तुम देख रहे हो? धन-दौलत, बंगला, गाड़ी, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियॉं और फॉर्म हाउस होने के बाद भी मैं एक फटा हुआ मोजा तक अपने साथ नहीं ले जा सकता। एक दिन मौत तुम्हारे लिए भी आएगी। इसलिए तुम्हें सावधान कर रहा हूँ कि तुम्हें भी एक कफन में ही इस संसार से विदा होना पड़ेगा। प्रयास यही करना कि इस धन-दौलत का सही इस्तेमाल हो।'
          इस कहानी से उस पिता के मन की व्यथा छलकती है जो धन के अम्बार एकत्र करके रख गया। वह अपनी धन-दौलत तो छोड़ो अपने फटे हुए मोजे तक साथ नहीं ले जा सका। कहने का तात्पर्य यही है कि इस भौतिक संसार के सारे खजाने यहीं रह जाते हैं। हमारे अगले जन्म की यात्रा फिर खाली हाथ से ही आरम्भ होती है क्योंकि मनुष्य खाली हाथ इस दुनिया में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाता है।
          ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण ही इस प्रकार किया है कि जो भी जीव इस संसार में जन्म लेता है उसे अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार प्राप्त आयु को भोगकर यहाँ से विदा होना पड़ता है। यहाँ मनुष्य की इच्छा नहीं चलती। उसे तो बस अपने कर्मों पर ध्यान देना है, यही शुभाशुभ कर्म ही उसके साथ अगले जन्मों में जाते हैं। उन्हीं के अनुसार उसे अगला जन्म मिलता है। 
          हमारे मनीषियों का कथन है कि शुभकर्मों की अधिकता होने पर मनुष्य को पुनः मानव योनि मिलती है। इसी तरह पापकर्मों की अधिकता होने पर मनुष्य को चौरासी लाख योनियों में क्रमशः भटकना पड़ता है। अपने दुष्कृत्यों के फल को भोगना बहुत कठिन होता है। उन्हें भोगने के बाद ही जीव पुन: यह मानव शरीर मिल पाता है।
          इस संसार में रहकर मनुष्य ने जो भी कमाया है, उसे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में लगाना चाहिए। कुछ धन परोपकार के कार्यों  में भी खर्च करना चाहिए। उसे बेसहारा लोगों का सहारा बनना चाहिए। मरने के पश्चात मनुष्य के साथ धन-वैभव नहीं जाता। सिर्फ उसके सत्कर्म अथवा दुष्कर्म ही उसके साथ जाते हैं। इसलिए अपने सुकर्मों की पूँजी अगला मानव जन्म लेकर सुखों को भोगने के लिए एकत्र करते रहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

पत्नी सारा दिन क्या करती है?

पत्नी सारा दिन करती क्या है? 

पुरुष प्रायः अपनी पत्नी के कार्यों को लेकर एक गलत धारणा बना लेते हैं। उनकी दृष्टि में नौकरी न करने वाली पत्नी बस बैठे-बिठाए मौज करती है और उनका पैसा उड़ाती है।‌ घर में रहने वाली गृहकार्यों को दक्षता से निपटाने वाली पत्नी के विषय पुरुष प्रायः सोचते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन घर में निठल्ली बैठी रहती है। घर का काम भी कोई काम होता है। वे हर समय बस यही राग अलापते रहते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन करती ही क्या है? 
           पुरुषों को इस मानसिकता को बदलना बहुत कठिन है। उन्हें बस यही लगता है कि नौकरी या व्यवसाय करने वाली महिलाएँ ही सिर्फ काम करती हैं। घरेलू स्त्रियाँ तो बस केवल अपने पति के कमाए हुए पैसों पर मौज-मस्ती करती हैं। वे नहीं जानते कि घर का काम करना कितना उबाऊ और थका देने वाला होता है। 
            एक गृहिणी सवेरे मुॅंह अन्धेरे उठती है और रात को सबसे बाद में अपने बिस्तर पर जाती है। उसी की बदौलत पति अपने आफिस में चिन्तामुक्त होकर कार्य करता है। बच्चों की जरूरतों को वही पूरा करती है। घर के बुजुर्गों की देखभाल भी उसी के जिम्मे होती है। घर आने वाले मेहमानों का वह प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करती है। उसके ये सभी कार्य पुरुषों की नजर में नहीं आते। वे तो बस पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। उन्हें शायद यही लगता है कि ये सभी कार्य अपने आप चुटकी बजाते ही हो जाते हैं।
            आज हम एक ऐसे मनुष्य की चर्चा करते हैं जो ईश्वर से नाराज था कि उसने सारे सुख स्त्री की झोली में डाल दिए हैं। वह तो बस पैसा कमाने की मशीन भर है।
            एक आदमी ने भगवान से नाराज होते हुए प्रश्न किया, "हे प्रभु! मैं सारा दिन खटता रहता हूँ, जीतोड़ मेहनत करता हूँ, अपने परिवार के लिए परिश्रम करके कमाता हूँ। मेरी पत्नी पूरा दिन घर में रहकर आराम करती है, मजे करती है और फरमाइशें करती रहती है? उसकी जिन्दगी तो बहुत मजे से बिना किसी कष्ट से कट रही है, ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यों हो रहा है?"
          भगवान ने उसकी शिकायत सुनकर सुझाव दिया, "ऐसा करते हैं केवल दो दिन के लिए तुम अपनी पत्नी के साथ उसकी जिन्दगी बदलकर देखो और सब कुछ स्वयं जान लो।"
            वह आदमी खुशी से प्रभु की सलाह मान गया। अगले दिन प्रातः पाँच बजे जब अलार्म बजा तब उसने उठकर बच्चों का लंच बनाया और फिर उन्हें तैयार करके स्कूल भेजा। फिर पति बनी पत्नी को उठाकर उसका नाश्ता बनाया। फिर उसके जाने के बाद घर साफ किया।अभी नाश्ता करने बैठा ही था कि कामवाली आ गयी। वो गई तो बच्चों के स्कूल से आने का टाइम हो गया। उन्हें खाना खिलाकर होमवर्क करने बिठाया। 
        शाम के खाने की तैयारी करके बच्चों को ट्यूशन क्लास में ले गया। शाम को पत्नी के आने पर खाना परोसा तो उसने उसमें से चार कमियाँ निकाल दीं। उसकी नुकताचीनी से उसे गुस्सा तो बहुत आया पर वह चुप रहा। अन्त में थके होने के बावजूद रात को पति बनी पत्नी को सन्तुष्ट भी किया।
            इस सारी दिनचर्या के बाद ही उस आदमी को पता चला कि पत्नी के बारे में वह कितना गलत सोचता था। उसके किए गए कार्यों की बराबरी नहीं की जा सकती। पत्नी बिना कोई वेतन लिए सारे कार्य बिना शिकन लाए खुशी-खुशी करती है।
           उसे  अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई। उसे समझ आ गया था कि सारा दिन उसकी पत्नी चक्करघिन्नी बनी कभी पति की आवश्यकताओं को पूरा करती और कभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करती इधर से उधर घूमती रहती है। अपने लिए उसके पास समय ही नहीं होता। वह यदि बीमार भी हो जाए तो दवाई खाकर फिर से घर-गृहस्थी के कामों में जुट जाती है।
            वह बिना किसी से शिकायत किए अपने सारे दायित्व बखूबी निभाती है। उसके बाद भी सभी आने-जाने वालों का स्वागत अपनी प्यारी-सी मुस्कान से करती है। पुरुष किसी भी मायने में उसकी बराबरी नहीं कर सकता।
          तब दो दिन बाद प्रातः उठकर सबसे पहले उसने भगवान से प्रार्थना की कि वे उसे वापिस आदमी बना दें क्योंकि अब उसे समझ आ गया कि घर में रहने वाली एक औरत को कितना अधिक काम करना पड़ता है। उसके बराबर मैं भी काम नहीं कर सकता।   
          जिस पुरुष ने ईश्वर से शिकायत की थी उसे जिस प्रकार सब कुछ समझ में आ गया उसी तरह शेष अन्य पुरुषों को भी यह समझ में आ आना चाहिए। स्त्री के प्रति उनका व्यवहार सहृदयता पूर्ण होना चाहिए। हर समय पत्नी की शिकायत न करके उसकी समस्याओं की ओर ध्यान देना चाहिए। उस पर व्यंग्य करना या उस पर चुटकले बनाकर उसके स्वाभिमान को आहत नहीं करना चाहिए। अपने पुरुष होने के मिथ्या अहं का त्याग करके उसकी ओर सहायता करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

दिल के धड़कने से मनुष्य का अस्तित्व

दिल के धड़कने से मनुष्य का अस्तित्व 

मनुष्य के शरीर में एक धड़कने वाला एक अनमोल दिल है जो ईश्वर ने उसे उपहार स्वरूप दिया है। जब तक यह दिल ठीक से कार्य करता रहता है यानी धड़कता रहता है तब तक मनुष्य का इस धरती पर अस्तित्व बना रहता है। यदि यह हृदय काम करना बन्द कर दे तो शरीर बेजान हो जाता है अर्थात् तब मनुष्य के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। उस समय वह इस लोक को छोड़कर कही अन्यत्र दूसरे लोक में चला जाता है। अपने प्रिय बन्धु-बान्धव कुछ समय के लिए भी उस मृत शरीर को सहन नहीं कर पाते। उसका संस्कार करने के लिए शीघ्रता करने लग जाते हैं।
           इस हृदय का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। जरा-सी लापरवाही परेशानी का कारण बन जाती है। यदि किसी के हृदय का एक वाल्व ब्लाक हो जाए तो डाक्टर एंजियोग्राफी करके स्टन डाल देते हैं जो कुछ समय के बाद बदलना पड़ता है। उसके लिए लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। यदि दिल का दौरा पड़ जाए तो डाक्टर बिना समय गँवाए आपरेशन कर देते हैं। उस आपरेशन पर भी लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। 
            एक घटना का यहॉं वर्णन करते हैं। ऐसा हुआ कि एक बार अस्सी वर्षीय एक बुजुर्ग को दिल का दौरा पड़ा। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया। वहाँ डाक्टर ने उस बुजुर्ग के हृदय का शीघ्र ही का ऑपरेशन कर दिया।
          उस आपरेशन का आठ लाख रूपए बिल का आया। बिल देखते ही उस बुजुर्ग की आँखों में आँसू आ गए। यह देखकर डॉक्टर ने सोचा कि शायद इनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि ये आठ लाख रूपयों का भुगतान कर सकें।
            डाक्टर ने साँत्वना देते हुए उन बुजुर्ग से कहा, "रोइए मत, मैं इस राशि को कहकर कम करवा देता हूँ।"
          डाक्टर की बात सुनकर उस बुजुर्ग ने उत्तर दिया, "बिल की राशि की कोई समस्या नहीं है। यदि बिल दस लाख का भी होता तो मैं उसे देने में समर्थ हूॅं।"
             डॉक्टर ने उनसे पूछा, "फिर आपकी ऑंखों में ऑंसू किसलिए आए?"
             उन्होंने कहा, "आँसू तो इसलिए आए कि जिस प्रभु ने अस्सी वर्षों तक इस दिल को सम्भाला, उसने कोई बिल नहीं भेजा। आपने केवल तीन घण्टे ही इसे सम्भाला और आठ लाख रूपये का बिल आ गया।"
           फिर ईश्वर को धन्यवाद करते उस वृद्ध ने कहा, "धन्य है वह मालिक जो सब लोगों का कितना ध्यान रखता है।" 
           इस हृदय को स्वस्थ रखने के लिए हमें स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना चाहिए। उचित आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। यानी निश्चित समय पर सोना-जागना चाहिए, सन्तुलित  और पौष्टिक भोजन खाना चाहिए। योगासन करने चाहिए और नियमित सैर करनी चाहिए।
          हममें से प्रायः सभी लोग इन नियमों का बड़े धड़ल्ले से उल्लंघन करते हैं और फिर सफाई भी देते हैं कि क्या करें? बहुत व्यस्त रहते हैं, इन सबके लिए समय ही नहीं निकाल पाते। आजकल हम सबको होटलों का तैल-मसाले वाला खाना अधिक रुचिकर लगता है।
          दोष शत-प्रतिशत हमारी जीवन शैली का है। हमें डिब्बा बन्द व जंक फूड खाना पसन्द आता है। दूध और फल हम खाना नहीं चाहते। अधिक चिकनाई वाला और तला हुआ भोजन खाकर सन्तुष्ट होते हैं। जिस भोजन को कमाने के लिए सारे प्रपंच करते हैं, दिन-रात एक कर देते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय नहीं होता। न हम सैर करते हैं और न ही व्यायाम। लेट नाइट पार्टियाँ करना हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन गई हैं। इसी प्रकार शादियों से भी रात देर से लौटते हैं। इससे हमारी बाडी क्लाक डिस्टर्ब होती है। तब हम लोगों का शिकार बन जाते हैं।
          हर छोटी या बड़ी बात हम अपने दिल पर ले लेते हैं। अनावश्यक तनाव में रहते हैं। चौबीसों घण्टे योजनाएँ बनाते रहते हैं। इसके साथ ही ईर्ष्या-द्वेष, क्रोध आदि को भी अपने दिल में स्थान दे देते हैं। इसीलिए परिणाम स्वरूप यह हमारा दिल धीरे-धीरे निराश हो जाता है। इसमें रूकावट आने लगती है। जिससे साँस फूलने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
           समय रहते इसका चैकअप कराते रहना चाहिए। जहॉं जरा-सी भी कमी दिखाई दे, तुरन्त उपचार करवा लेना चाहिए। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए प्रसन्न रहना चाहिए। मद्यपान, धूम्रपान जैसे दुर्व्यसनों से बचना चाहिए। साथ ही अनावश्यक तनाव को दूर करते हुए उस मालिक का धन्यवाद करना चाहिए जिसने हमें यह अनमोल दौलत बिना कोई मूल्य लिए उपहार में दी है।
चन्द्र प्रभा सूद