मंगलवार, 30 जून 2026

कुछ रह तो नहीं गया?

कुछ रह तो नहीं गया?

हम मनुष्य हैं और यदा कदा गलती कर ही बैठते हैं। फिर बाद में पछताना पड़ता है। इसलिए बार-बार सोचते रहते हैं, चेक करते रहते हैं कि कुछ रह तो नहीं गया? कुछ पीछे छूट तो नहीं गया? अथवा कोई गलती तो नहीं हो गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हम सभी को जीवन के हर मोड़ पर चलते हुए हमेशा परेशान करते रहते हैं। यदि विचार किया जाए तो हम दिन में न जाने कितनी बार इन प्रश्नों से दो-चार होते रहते हैं। 
           छोटे बच्चे को आया के पास अथवा क्रच में छोड़कर नौकरी पर जाने वाली माँ दस बार अपना और बच्चे का सामान चैक करती है और बार-बार यही सोचती है कि कुछ रह तो नहीं गया? यदि यहाँ कुछ छूट गया तो फिर दिनभर बच्चे के लिए परेशानी हो जाएगी। मॉं अपने बच्चे को कभी भी परेशान होते हुए नहीं देख सकती। इसलिए वह पूरी तैयारी करती है।
            रसोई में खाना बनाकर निकलने से पहले सब कुछ सम्हालने और गैस बन्द कर देने के बाद गृहिणी जब कमरे में आकर बैठ जाती है। उस समय उसके मन में आशंका उठती है कि मैंने गैस बन्द कर दिया था क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि सब्जी जल जाए और परेशानी हो जाए?
           किसी भी कारण से घर से बाहर निकलने वाले हम सभी अपने पर्स, गाड़ी की चाबी, घर की चाबी आदि रख लेने के बाद फिर इन चीजों को जाँचते रहते हैं कि उन्हें रख लिया या नहीं? समस्या तब आती है कि जब भागमभाग कुछ छूट जाता है तो बाहर जाने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसी तरह घर के सारे स्विच तथा ताले बार-बार चैक कर लेते हैं। फिर भी मन के किसी कोने में एक अनजाना-सा डर बना रहता है कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? यदि कुछ छूट जाएगा तो फिर बहुत झंझट हो जाएगा।
          शादी में दुल्हन को बिदा करने के बाद दुल्हन के माता-पिता घर के सभी सदस्यों से कहते हैं कि अपना सामान अच्छे से देख लो, कुछ रह तो नहीं गया न? कहीं घर जाने पर कोई परेशानी न हो जाए? वहाँ कुछ छूटे-न-छूटे पर बचपन से आज तक जिस नाम वे अपनी बेटी को पुकारते थे, वह नाम पीछे रह जाता है। जब भी लाडली बिटिया को याद करेंगे उनकी आँखों में आँसू आए बिना नहीं रहेंगे। बेटी की बचपन से अब तक की यादें, उसका रूठना-मानना यानी कि उसकी हर बात माता-पिता के हृदयों में याद बनकर पीछे रह जाती है।
          माता-पिता, बहन-भाई अपनी जुबान से चाहे कुछ न बोलें परन्तु उनके दिल में एक कसक तो रह ही जाती है। विदा होते समय दुल्हन का मन भी यही कहता है कि सब कुछ तो यहीं छूट गया। अपने नाम के आगे गर्व से जो सरनेम लगाती थी वह भी पीछे छूट गया। उस घर से उसका नाता छूट रहा है। माता-पिता का प्यार, उनसे की जाने वाली जिद, सखी-सहेलियाँ और बाबुल का  आँगन  सब पीछे छूट रहे हैं।
          इन्सान बड़ी हसरत से अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजता है और वे पढ़कर वहीं सैटल हो जाते हैं। उनसे मिलने के लिए बड़ी ही मुश्किल से उन्हें अधिकतम छह महीने का वीजा मिला पाता है। वापिस लौटते समय जब बच्चे पूछते हैं कि सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया? उस समय बच्चों से बिछुड़ते समय सब तो वहीं छूट जाता है। ऐसा लगता है मानो हृदय की गहराइयों से कुछ-कुछ छीजता जा रहा है। इससे अधिक और छूटने के लिए क्या बचा रह जाता है? 
              साठ वर्ष पूर्ण करने के उपरान्त जब सेवानिवृत्ति की शाम जब दोस्त याद दिलाते हैं कि सब चेक कर लो, कुछ रह तो नही गया। तब मन में एक टीस उठती है कि सारी जिन्दगी तो यहीं आने-जाने में बीत गई, अब क्या रह गया होगा? उस समय मन उदास हो जाता है।
            किसी अपने बन्धु-बान्धव की अन्तिम यात्रा के समय शमशान में उसका संस्कार करके लौटते समय लगता है कि कुछ छोड़कर जा रहे हैं। एक बार पीछे देखने पर चिता की सुलगती आग को देखकर मन भर आता है। अपने से वियोग के समय उससे पुनः न मिल पाने की पीड़ा में सब पीछे रह जाता है। भरी आँखों से इन्सान कुछ बोल तो नहीं  पाता पर कुछ तो पीछे छूट जाता है। उस प्रिय की वे यादें उसके अन्तस् में सदा उसके साथ रहती हैं। ये यादें यदा कदा उसके दिल में टीस दे देती हैं।
              आत्मचिन्तन करना हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है। हमें अपने पूरे जीवन में झाँकना चाहिए। यह जानकारी लेने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसा तो नहीं है कि कुछ पीछे छूट रहा हो? जिसे हम अपने साथ लेकर चल सकते थे। इस मलाल को जीवन भर ढोने के बजाय समय रहते यदि ध्यान दे दिया जाए तो उचित होता है, बाद में तो बस हमारे मन में पश्चाताप ही शेष बचता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 29 जून 2026

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक

मनुष्य का विवेक, उसकी समझदारी, उसका अच्छा स्वभाव, उसकी संगति और उसके प्रगाढ़ सम्बन्ध हमेशा साथ निभाते हैं। यद्यपि उसका समय कभी सदा एक-सा नहीं रह पाता, उसकी सत्ता का दबदबा भी हमेशा कायम नहीं रह सकता। उसकी धन-सपत्ति आदि भी सदा‌ उसका साथ नहीं निभा पाते। और तो और उसका अपना यह शरीर भी एक निश्चित समय के बाद अशक्त हो जाने के कारण साथ नहीं दे पाता। समय बीतने के पश्चात वह भी उसका साथ छोड़ देता है।
            मनुष्य एक विवेकशील और विचारशील प्राणी है जो उचित-अनुचित और भविष्य के परिणामों को समझने की क्षमता रखता है। यह क्षमता उसे अन्य जीवधारियों से श्रेष्ठ बनाती है और स्वयं के उत्थान या पतन के लिए जिम्मेदार बनाती है। विवेकशीलता का अर्थ है अपनी बुद्धि का सही उपयोग करना, आत्म-नियन्त्रण करना और सोच-समझकर कोई भी निर्णय लेना। 
          अपने विवेक से, अपनी समझदारी से मनुष्य यदि अपने जीवन का निर्वहण करता है तो यह उसके लिए बड़े सौभाग्य की बात कही जा सकती है। इस प्रकार वह सफल व्यक्ति बनता है। अपने सम्पर्क में आने वालों का मार्गदर्शन करता है। 
          तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी मनुष्य को सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और निरन्तर आत्म-चिन्तन करना चाहिए। तात्कालिक सुख के स्थान पर मनुष्य को स्थायी भलाई और भविष्य को प्राथमिकता देनी चाहिए।
          अपने अच्छे स्वभाव के कारण वह सबको अपना बना लेता है। उससे कोई भी नाराज नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा करता भी है तो उसके अच्छे स्वभाव के कारण अधिक दिन उससे रूठा नहीं रह सकता। इसी तरह सहृदयता का परिचय देते हुए वह सबको उनकी गलतियों के लिए उन्हें क्षमा कर देता है। इसलिए उसके सम्बन्ध सबके साथ लम्बे समय तक बने रहते हैं।
            मनुष्य को सदा यही प्रयास करना चाहिए कि वह यथासम्भव दूसरों की दुआओं अथवा आशीर्वाद को अपने जमा खाते में जोड़ता जाए। कहा जाता है कि दूसरों द्वारा दी गई बददुआओं का असर मनुष्य के जीवन पर अवश्य पड़ता है। यदि अभिशाप का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है तो दूसरों के मन से निकलने वाले आशीर्वाद भी अपनी छाप छोड़ते हैं। जितने अधिक आशीर्वाद उसे मिलेंगे उतनी ही उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में प्रसरित होगी।
          सदा याद रखना चाहिए कि धन, दौलत और प्रसिद्धि का कोई भरोसा नहीं कि वे सदा‌ साथ निभाएँगे अथवा नहीं। इसका कारण है कि ये दोनों अपने साथ अनेक बुराइयों को साथ लेकर आते हैं। इनके चंगुल में फंसकर मनुष्य धोखा खाकर अपनी हानि कर बैठता है।
            जो मनुष्य इन्हें सम्हाल पाता है या इनके मिलने पर अहंकारी न होकर विनम्र बना रहता है, वही सबका प्रिय भाजन बनता है। उसकी सर्वत्र जय जयकार होती है।
          अपनों पर भरोसा करना मनुष्य की बहुत बड़ी पूँजी है। यह यूँ ही नहीं बाँट दी जाती। पहले मनुष्य को स्वयं पर विश्वास करना चाहिए तभी उसे आत्मविश्वास की शक्ति मिलती है। इसके विपरीत दूसरों पर अन्धविश्वास करना उसकी कमजोरी बन जाता है।
         मनुष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब वह सफलता की ऊँचाइयों को छू रहा होता है तो उसकी सफलता के गुब्बारे में सबसे पहले पिन चुभाने वाला व्यक्ति कोई अपना ही होता है जिस पर वह आँख मूँदकर विश्वास कर रहा होता है। पीठ पर छुरा भौंकने वालों से सावधानी रखना बहुत ही आवश्यक होता है।
          हम अपने जीवन में बहुत सारे सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने का भरसक प्रयत्न करते हैं। हमारी जिन्दगी बहुत ही चालाक है, हमें ठगती रहती है। यह हर रोज एक नया कल देने का वादा करके हमारी उम्र छीनती रहती है। इसलिए समय रहते इरादे मजबूत करके अपने देखे हुए सपनों को सच कर लेना चाहिए।
          मनुष्य को आत्मोन्नति के लिए सदा सत्संगति में रहना चाहिए और ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ईश्वर की राह पर जब कोई एक कदम बढ़ाता है तो ईश्वर उसे थामने के लिए सौ कदम आगे बढ़ाता है। हम इन्सानों की ही तरह वह मालिक भी अपनी सन्तानों से बहुत प्यार करता है। उनकी परेशानियों के समय उन्हें सहारा देता है। 
           वह हमेशा चाहता कि उसकी सन्तानें हम मानव शुभ कर्म करें जिससे हमें कष्टों का सामना न करना पड़े। हम मालिक की ऐसी नालायक सन्तानें बन जाते हैं जो इस संसार में आने के बाद अपने सही रास्ते से भटककर गलत मार्ग पर चल पड़ते हैं। तभी कष्टों और परेशानियाँ झेलते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 28 जून 2026

लक्ष्य निर्धारित करना

लक्ष्य निर्धारित करना

मनुष्य को अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए तभी वह अपने जीवनकाल में सफलता की ऊँचाइयों को छू सकता है। लक्ष्य को पाने की कामना करने वाले के लिए आत्मानुशासन (self discipline) की आवश्यकता होती है। जब वह अपने लक्ष्य को पाने के प्रयास में परिश्रम करता है, दिन-रात एक कर देता है तभी अपने अनथक श्रम से वह लक्ष्य पाकर ही चैन लेता है। छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने से आत्मविश्वास बढ़ाता है और अन्ततः बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर मनुष्य कदम बढ़ाता है। 
          दूसरे शब्दों में कहें तो वह मनुष्य भाग्यशाली है जो एक निश्चित लक्ष्य की ओर अपने कदम बढ़ाता है। उसका जीवन किसी विशेष उद्देश्य के लिए होता है। ऐसे ही अनुशासित लोग घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के लिए कुछ गुजरने का माद्दा रखते हैं।
           लक्ष्य निर्धारण जीवन में सफलता पाने और दिशा निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। इसमें  प्रासंगिक और समयबद्ध लक्ष्यों को परिभाषित किया जा सकता है। यह टालमटोल को कम करके मनुष्य के फोकस बढ़ाता है और उपलब्धियों की निगरानी करने में मदद करता है। लक्ष्य हमेशा एक मार्गदर्शक के रूप में काम करता है। इससे अपने विकास को प्रबन्धित करना और आवश्यक बदलावों की शुरूआत करना आसान हो जाता है। लक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो प्रेरित करें। मनुष्य को अपनी प्रगति की नियमित समीक्षा करनी चाहिए।
            लक्ष्य मनुष्य के जुनून से जुड़े होने चाहिए और उन्हें हासिल करने के लिए एक चरणबद्ध योजना बनाने की आवश्यकता होती है। लक्ष्यहीन व्यक्ति कटी हुई पतंग की तरह केवल इधर-उधर भटकता रहता है। जब तक मनुष्य यह निर्धारित नहीं करेगा कि वह जीवन में क्या बनना चाहता है अथवा क्या करना चाहता है? तब तक वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकता। 
          यदि हमें कही जाना हो तो पहले हम स्थान निर्धारित करते हैं। फिर वहाँ तक पहुँघने का मार्ग सुनिश्चित करते हैं। जब हम पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाते हैं तभी यात्रा के लिए निकलते हैं और निश्चित ठिकाने पर पहुँच जाते हैं। उसी प्रकार जीवन की यात्रा भी करनी होती है। वहाँ किन्तु अथवा परन्तु से काम नहीं चलता। जीवन में एक स्पष्ट रूपरेखा की आवश्यकता होती है। तब जाकर मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। अन्यथा मानव जन्म पाकर भी वह उस जीवन को वृथा गँवा देता है। 
          मनीषी कहते हैं कि लक्ष्यहीन जीवन बिना पता लिखे लिफाफे की तरह होता है जो कहीं भी नहीं पहुँच सकता, उसे बस रद्दी की टोकरी में फैंक दिया जाता है। उसे भेजने वाला और पाने वाला दोनों ही उसके लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। यदि मनुष्य अपने जीवन में लक्ष्य पाने के लिए यदि दूसरों का मुँह ताकता रहेगा तो वह जीवन की इस रेस में पिछड़ जाएगा।
              हर किसी के कहने पर यदि मनुष्य चलेगा तो वह थाली के बैगन की तरह इधर-उधर लुड़कता रहेगा। सभी लोग अपने-अपने जीवन में भागमभाग में लगे हुए हैं। इसलिए किसी की ओर देखने का समय उनके पास नहीं है। जब तक मनुष्य स्वयं भागकर उन भागने वालों के साथ कदम नहीं मिलाएगा तब तक वह बस निराशा का सामना ही करता रहेगा। फिर ऐसे पिछड़े हुए का साथ देना कौन चाहेगा?
             हमारे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम ने कहा था, "इन्तजार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते है।"
          स्वामी विवेकानन्द का कथन है, "आप जैसे विचार रखोगे वैसे ही बन जाओगे। अगर अपने आपको को निर्बल मानोगे तो निर्बल बन जाओगे।यदि अपने आपको समर्थ मानोगे तभी तो समर्थ बन पाओगे।"
           अब यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह विचार करे कि आखिर वह अपने जीवन में क्या चाहता है? क्या वाले वह दूसरों को हसरत भरी निगाहों से निहारता रहना चाहता है? अथवा वह कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य रखने वाला बनना चाहता‌ है?
          इसलिए विवेकपूर्वक मनन करते हुए जीवन को सही दिशा की ओर ले जाना ही समझदारी है। नदी में प्रायः वही किश्तियाँ डूबती हैं जो बिना योग्य मल्लाह के केवल आनन्द के लिए बस यूँ ही दिशाहीन दौड़ाई जाती हैं।
          उसी प्रकार जिनके जीवन लक्ष्यहीन होकर डगमगाते हैं वे इस संसार सागर में डूब जाते हैं। जिनके दिल में कुछ कर गुजरने की सामर्थ्य होती है वे ही हरदम झूमते-गाते हैं, मस्त रहते हैं। सफलता इन्हीं महानुभावों के चरण चूमती है। दुनिया भी इन लोगों को अपनी सिर आँखों पर बिठाती है। ऐसे उद्यमी समाज को दिशा  देते हैं। 
        अतः जीवन को लक्ष्यहीन होकर नहीं भटकने देना चाहिए, अपने लक्ष्य का निर्धारण करके वहीं बाण का अनुसन्धान करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद

शनिवार, 27 जून 2026

मनुष्य का वास्तविक धन

मनुष्य का वास्तविक धन

आजन्म मनुष्य धन की कामना करता है।यह धन उसकी आवश्यकता होता है और वह इसे पाने के लिए अनथक प्रयास भी करता है। दिन-रात अपना सुख-चैन गॅंवाकर वह‌ इस धन को कमाने का प्रयास करता है। सोचने वाली बात यह है कि क्या मनुष्य परिश्रम से अर्जित धन को प्राप्त करके सन्तुष्ट हो जाता है? यदि नहीं तो फिर मनुष्य का वास्तविक धन क्या है? यह एक गहन विषय है। आज हम इसी विषय पर चर्चा करते हैं।
            मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक धन उसका उत्तम स्वास्थ्य, सकारात्मक सोच, सन्तोष, बन्धु-बान्धवों के साथ मधुर सम्बन्ध और शुभकर्म होते‌ हैं। भौतिक धन-वैभव नश्वर है जबकि अच्छा स्वास्थ्य और सत्चरित्र जीवन भर साथ निभाते हैं। यही जीवन को भी सार्थक बनाते हैं। 
          हम सांसारिक लोग हैं, हमारे घरों में यदा कदा अतिथि आते रहते हैं। कुछ अतिथि थोड़े समय के लिए आते हैं और कुछ अतिथि हमारे साथ कुछ दिन व्यतीत करते हैं। हम सबकी आवभगत अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हैं। जब कोई अतिथि हमारे घर कुछ दिन रहता है और जाते समय प्रसन्न मन यह से कहता है कि आपके घर में आकर मेरा मन रम गया है, यहाँ से जाने का दिल नहीं कर रहा। यह घर नहीं एक मन्दिर है तो यह मनुष्य का सबसे बड़ा धन होता है।
          जब माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार से, उनकी सेवा सुश्रुषा से प्रसन्न होते हैं तब उनके मन से अपने आप ही आशीर्वाद निकलते हैं। वे अनायास ही यह कहते हैं कि ये बच्चे हमारे कलेजे का टुकड़ा हैं। मेरे विचार में किसी भी मनुष्य के लिए इससे बढ़कर और कोई धन हो ही नहीं सकता।
          घर-परिवार में सामञ्जस्य का वातावरण हो। बच्चे माता-पिता की आज्ञाकारी सन्तान हों, उनका आदेश बच्चों के लिए ब्रह्मवाक्य हो। ऐसे माहौल में यदि कोई बेटा या बेटी यह कहे कि मेरे माँ-बाप ही मेरे भगवान हैं तो यह मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी कहलाएगी।
            पति-पत्नी में परस्पर प्यार और विश्वास हो और वे दोनों एक बन्द मुट्ठी की तरह मिलकर रहते हों, उनके बच्चे भी संस्कारी हों तो ऐसा घर स्वर्ग से भी बढ़कर सुखी होता है। शादी के बीस साल के बाद भी पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति लगाव कम न होकर बढ़ता रहे तो उनके इस प्रेमधन के समक्ष अन्य सभी धन फीके पड़ जाते हैं। 
           घर-परिवार में प्रायः सास और बहू की नोकझोंक चलती रहती है। यदि वहाँ सभी को यथोचित सम्मान देने की परम्परा हो तो इस समस्या से बचा जा सकता है। बहू अपनी सास को सास नहीं माँ माने और इसी प्रकार सास भी अपनी बहू को बहू नहीं बेटी मान लें तो अधिकतर झगड़े समाप्त हो जाएँ। दोनों ही एक-दूसरे की गलतियों को अनदेखा करके यदि परस्पर सौहार्द बनाए रखें तो वहाँ टकराव होगा ही नहीं। उस घर की खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। यही गृहस्थी का सबसे बड़ा धन है।
           जिस घर में घर में बड़ों को मान और छोटों को प्यार भरी नजरों से देखा जाता है वहाँ सुख-शान्ति का वास होता है। बड़ों को चाहिए कि वे अपना हृदय विशाल बनाकर बच्चों को उनके किसी भी दोष के लिए क्षमा कर दें। इसी प्रकार बच्चों का दायित्व भी बनता है कि वे बड़ों की कोई बात रुचिकर न लगने की स्थिति में घर में बवाल न मचाकर प्यार से समाधान करें। छोटे-बड़े सभी को हठधर्मिता छोड़कर रिश्तों में तालमेल बनाए रखना चाहिए। ऐसा करने पर घर के सभी सदस्यों का आपसी व्यवहार सन्तुलित रहता है। बाहर जाने पर घर में भागकर आने का मन करता है। अब आप ही बताइए कि इससे बड़ा कोई और धन मनुष्य के लिए हो सकता है?
           भाई-बन्धुओं अथवा घर-परिवार के किसी सदस्य की यदि जरूरत के समय आप अपना फर्ज समझकर प्रसन्नतापूर्वक, बिना अहसान जताए सहायता कर सकें और वह आपको अपने दिल की गहराई से दुआ दे तो यह सबसे धन होगा। यह धन आत्मसन्तुष्टि का भाव देता है।
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि जो वस्तुऍं मनुष्य को मानसिक शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करें, वही सच्चा कहलाता धन है। अच्छा स्वास्थ्य मनुष्य का मनोबल बढ़ाता है, उसे ऊर्जावान बनाता है और जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके खुशियॉं तलाशना और मन की शान्ति को वास्तविक सम्पत्ति माना जाता है। अपने भाई-बन्धुओं के साथ समय व्यतीत करना सुकून देता है। 
            यदि अपने विवेक से ऐसा धन मनुष्य पा सके तो उससे बढ़कर भाग्यशाली व्यक्ति कोई और हो ही नहीं सकता। मनुष्य को अपने घर को यत्नपूर्वक ऐसा बनाना चाहिए कि उसके मन में कोई और कामना न रह जाए। ईश्वर की कृपा से हर किसी व्यक्ति को ऐसे परम धन की प्राप्ति हो और वह अपना खुशहाल जीवन जी सके।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 26 जून 2026

धन दैनन्दिन आवश्यकता

धन दैनन्दिन आवश्यकता

धन हमारी सभी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत आवश्यक है। इसके बिना हम जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। कदम-कदम पर हमें धन की आवश्यकता का अनुभव होता है। इसे कमाना बहुत ही कठिन कार्य है। अपने सुख-चैन को तिलांजलि देकर दिन-रात अथक प्रयास करना पड़ता है। कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुते रहना पड़ता है। उस पर भी यह कोई गारण्टी नहीं होती कि मनुष्य को मनोवांच्छित सफलता मिल सकेगी।
            एक मजदूर सर्दी-गर्मी की परवाह किए बिना दिन-रात मेहनत करता है फिर भी उसके घर का चूल्हा कितने दिन जल पाएगा? यह नहीं कहा जा सकता। यह धन, यह लक्ष्मी किसी की सगी नहीं है। यह बहुत ही चंचल कही जाती है। यह आज यहाँ है तो कल कहाँ होगी? इसका पता किसी को नहीं चल पाता। पलभर में यह राजा को रंक बना देती है और रंक को राजगद्दी पर बैठा देती है। इसकी महिमा अपरम्पार है, जिसका पार इस संसार में कोई नहीं पा सकता।
          यह धन मनुष्य को कहता है कि मुझे इस हद तक पसन्द करो कि लोग आपको नापसन्द करने लग जाऍं। यदि इस धन के पीछे भागते रहे तो सभी संगी-साथी पीछे छूट जाते हैं। इसकी अधिकता होने पर मनुष्य में सबसे पहले अहंकार आता है जो सारे विनाश की जड़ है। फिर उसके साथ-साथ दुर्व्यसन भी मनुष्य को घेरने लगते हैं। तब सब लोग उस व्यक्ति से किनारा करने लगते हैं। वह मनुष्य सभी बन्धु-बान्धवों के रहते भी हुए निपट अकेला हो जाता है।
           यही धन सारे फसाद की जड़ है। फिर भी न जाने क्यों सब लोग इसके पीछे पागल हुए रहते हैं। यह सारे रिश्तों को खोखला कर देता है। भाई को भाई के खून का प्यासा बना देता है। माना कि जीवन के लिए इसकी बहुत उपयोगिता है परन्तु यह सब कुछ नहीं कहा जा सकता। यह इन्सान के लिए न तो खुशियाँ खरीद सकता है और न ही उसके लिए स्वास्थ्य खरीद सकता है। न ही उसकी इस लोक में मृत्यु से रक्षा कर सकता है। इन स्थितियों में इसके होने का कोई लाभ नहीं मिल पाता।
             मरने के बाद इसे ऊपर नहीं ले जा सकते। यह इसी लोक में रह जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही विदा लेता है। उसका सब साम्राज्य यहीं धरा रह जाता है। मनुष्य के अपने सच्चे साथी उसके अच्छे या बुरे कर्म होते हैं जो जन्म-जन्मान्तरों तक साथ निभाते हैं। यह धन जीते जी मनुष्य को ऊपर ले जा सकता है। यह मनुष्य को अपमानित कराने का कोई अवसर नहीं चूकता। धन के नशे में चूर व्यक्ति को कुकर्मों में फँसाने में तनिक भी देर नहीं करता।
             इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनके पास बेशुमार धन-दौलत थी पर फिर भी जब वे मरे तब उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था। जब तक यह धन अपने पास है तभी तक ही अपना है। जब यह अपने पास नहीं है तब यह किसी का सगा नहीं रह जाता। इस धन की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि जब यह मनुष्य के पास होता है तब अपने-पराए सभी उसके अपने बन जाते हैं। स्वार्थ के कारण उस धनी को भगवान कहने लगते हैं और उसके सौ खून भी माफ कर देते हैं। वैसे तो धन भगवान नहीं है परन्तु लोग उसे भगवान से कम भी नहीं मानते।
            धन नमक की तरह होता है जो भोजन का स्वाद बढ़ाता है परन्तु सब्जी में इसे यदि गलती से अधिक डाल दिया जाए तो मुँह का स्वाद बिगाड़ देता है। उसी प्रकार अपने पास धन आवश्यकता के अनुसार हो तो वह जीवन में आनन्द देता है। सही प्रकार की खुशियॉं देता है।‌ लेकिन जब यह‌ जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो जिन्दगी का स्वाद बिगाड़ देता है। 
             धन की मादकता के कारण बच्चे अपने माता-पिता के अहंकार को देखते हुए बिगड़ जाते हैं। वे भी अपने माता-पिता की तरह सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे। दुनिया को अपने पैरों तले कुचलने की बातें करने लगते हैं। ऐसे घमण्डी लोग दूसरों को हीन समझने की भूल करने लगते हैं। इसी नशे में वे गलत रास्ते पर चलकर न्याय व्यवस्था के दोषी बनने लगते हैं। इस विषय में समाचार पत्र, टीवी और सोशल मीडिया गाहे-बगाहे हमें बताते रहते हैं।
           धन को जीवन में यदि साधन मानकर चला जाए तो श्रेयस्कर होता है। जहाँ मानव इसे साध्य मानने की भूल करता है, वहीं उसके पथभ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जाती है। खूब धन कमाइए और उसका सदुपयोग सत्कार्यों में लगाकर कीजिए। घर-परिवार की सभी आवश्यकताओं को और दायित्वों को पूरा करते हुए दान धर्म का निर्वहण भी करना चाहिए। वैसे यह कर पाना बहुत कठिन होता है। फिर भी प्रयास करना चाहिए कि उसे अपने सिर पर सवार न होने दिया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 25 जून 2026

माता मनुष्य की प्रथम गुरु

माता मनुष्य की प्रथम गुरु

माता मनुष्य की प्रथम गुरु कहलाती है। विद्यालय में बच्चा बाद में जाता है पर माता उससे पहले घर में ही बच्चे को सर्वप्रथम अक्षर ज्ञान करवा देती है। उसका अपनी सन्तान से रिश्ता अन्य सभी रिश्तों से नौ माह अधिक होता है। इस धरती पर लाने के कारण उसे भगवान का रूप कहा जाता है। वह बच्चे को संस्कारित करती है। इस कारण ऐसे बच्चे को सर्वत्र प्रशंसा मिलती है।
          बच्चे का लालन-पालन वह बहुत ही ममता और प्यार से करती है। स्वयं गीले में सो जाती है परन्तु बच्चे को सदा सूखे में सुलाती है। अपना सारा सुख और आराम बच्चे के लिए कुर्बान कर देती है। उसकी ममता के समक्ष दुनिया के सभी सुख फीके पड़ जाते हैं। जब बच्चा पहली बार मॉं शब्द का उच्चारण करता है तो वह अपने बच्चे पर बलिहारी जाती है।
            उसके चरणों में ही मनीषियों ने स्वर्ग की अवधारणा की है। भगवान गणेश ने माता पार्वती और पिता महादेव की परिक्रमा करके सारी पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर ली थी। देवताओं ने उनके इस कदम की सराहना की थी। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य आयुपर्यन्त उसकी सेवा करने के उपरान्त भी उसके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। जब वह अशक्त हो जाए तब बच्चे की तरह उसकी देखभाल करनी चाहिए। उसके खान-पान और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
        स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन की एक घटना है कि एक नवयुवक उनका शिष्य बनने की इच्छा से उनके पास आया और उनके चरणों में गिर गया। वहउनसे प्रार्थना करने लगा, "अपना शिष्य बनाकर मुझे दीक्षा दीजिए।"
          युवक की बात सुनकर परमहंस जी ने मुस्कुराकर उससे पूछा, "परिवार में तुम्हारे अतिरिक्त और कौन-कौन लोग हैं? अथवा क्या वह अपने घर पर अकेला ही है?"
           उनका यह प्रश्न सुनकर युवक ने  उत्तर दिया, "उसके घर में सिर्फ उसकी बूढी माँ है और कोई नहीं है।"
            युवक के उत्तर को सुनकर परमहंस जी को क्रोध आया। परन्तु अपने क्रोध को पीकर उन्होंने उससे पूछा, "तुम साधु क्यों बनना चाहते हो?"
             युवक ने कहा, "वह मोह-माया और ऊँच-नीच से युक्त संसार को छोड़कर मुक्ति पाना चाहता है।"
             इस उत्तर को सुनकर परमहंस जी ने उसे समझाते हुए कहा, "अपनी बूढ़ी माँ को असहाय छोड़कर तुम्हें कभी मुक्ति नहीं मिल सकती। सच्ची मुक्ति तुम्हें माँ की सेवा करने से मिलेगी। मानव जीवन का यही सार है।" 
            विद्याध्ययन करने के पश्चात नव जीवन में प्रवेश करने वाले युवा शिष्य को आचार्य शिक्षा यही देते हैं- 
                मातृ देवो भव। 
 अर्थात माँ ईश्वर का रूप होते हैं। वही सबसे बड़ा देवता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने माता को अपना प्रतिनिधि बनाकर इस संसार में भेजता है। माता के प्रति अपने सारे दायित्वों का निर्वहण प्रसन्नता पूर्वक करने चाहिए।
            माता को जीवन में कोई कष्ट न हो, उसके सुख-साधन का ध्यान रखना ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना है। मन्दिर मे जाकर पत्थर की मूर्तियों के सामने माथा रगड़ने के स्थान पर यदि घर में बैठे जीवित माता-पिता रूपी भगवान की पूजा की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। यही माता का सच्चा श्राद्ध तभी कहलाता है जब सन्तान जीवित रहती माता की तन, मन और धन से सेवा करता है।
          सारे रिश्ते-नाते और बन्धु-बान्धव मनुष्य को मझधार में छोड़ सकते हैं परन्तु ममता की छाया से वह कभी वंचित नहीं हो सकता। वहाँ आकर जो स्वर्गिक आनन्द उसे मिलता है वह अन्यत्र नहीं मिल सकता। इसीलिए सयाने कहते हैं-
       माँवा ठण्डियाँ छावाँ कि छाँवा कौन करे?
अर्थात् माँ शीतल छाया की भाँति होती है। उसके अलावा और कहीं से इन्सान को ठण्डी छाया नहीं मिल सकती।
          इसका सबसे बड़ा कारण है कि पुत्र कुपुत्र बन सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती। आवश्यकता होने पर वह अपने बच्चों की बुराइयों पर भी पर्दा डाल देती है। दुनिया की नजरों में उसे हमेशा ऊँचा उठा हुआ देखना चाहती है। सबसे बढ़कर वह सन्तान को गरम हवा भी नहीं लगने देना चाहती। 
          उसका वश चले तो अपने बच्चों के सारे दुख स्वयं झेल ले। इन्सान को दुनिया से चाहे दुत्कार मिले लेकिन माता के लिए वह सबसे श्रेष्ठ होता है। वह कभी अपनी सन्तान को अपमानित होते हुए नहीं देख सकती। सन्तान को यदि कष्ट होता है तो उसका कलेजा छलनी हो जाता है। माता के अतिरिक्त ऐसा निस्वार्थ प्रेम किसी और रिश्ते में नहीं मिल सकता। उसकी सेवा करने से चारों धामों की यात्रा के पुण्य का फल मिलता है तथा मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 24 जून 2026

पति-पत्नी

पति-पत्नी

पति-पत्नी की जोड़ी ईश्वर बनाकर भेजता है, ऐसा सभी मानते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं। इसमें हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही ये संयोग बनता है। इसके लिए किसी की च्वाइस का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः उस रिश्ते की पवित्रता व गरिमा बनाए रखना और उसे बिना किसी शिकवा-शिकायत के निभाना हम सभी मनुष्यों का नैतिक दायित्व है। अन्य सभी रिश्ते इस एक रिश्ते पर कुर्बान किए जा सकते हैं। 
        भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की परिकल्पना इसी सत्य को ही उजागर करती है। महाकवि कालिदास ने पति-पत्नी को शब्द और अर्थ की तरह परस्पर मिला हुआ कहा है, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शब्द को अर्थ से और अर्थ को शब्द से अलग करना असम्भव है, उसी प्रकार पति और पत्नी को अलग-अलग ईकाई मानना भी सर्वथा गलत है। इसीलिए उनके दोनों के लिए एक शब्द 'दम्पत्ति' का प्रयोग किया जाता है। उन्हें दो जिस्म और एक जान कहा जाता है।
        वाटसअप पर किसी ने यह कहानी पोस्ट की थी, जो हम सभी को इस रिश्ते की वास्तविकता को समझाती है। किसी कॉलेज में Happy married life पर एक  workshop हो रही थी, उसमें शादीशुदा जोड़े भाग ले रहे थे। जब प्रोफेसर मंच पर आए तो उन्होंने नोट किया कि सभी पति-पत्नी शादी पर जोक सुनाकर हँस रहे थे। यह देख कर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले एक खेल खेलते है। उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे। 
        सभी लोग खुश हो गए और उन्होंने खेल के विषय में पूछा? तब प्रोफ़ेसर ने एक शादीशुदा लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लेक बोर्ड पर ऐसे 25-30 लोगों के  नाम लिखो जो तुम्हें सबसे अधिक प्रिय हों। लड़की ने पहले अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे फिर अपने सगे सम्बन्धियों, दोस्तों, पड़ोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए।
           अब प्रोफ़ेसर ने उसे उनमें से कोई भी कम पसंद वाले 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए। प्रोफेसर ने उसे और 5 नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की ने थोडा सोचकर अपने पड़ोसियों के नाम मिटा दिए। अब प्रोफ़ेसर ने और 10 नाम मिटाने को कहा। लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी और दोस्तों के नाम मिटा दिए। 
        अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे जो उसके मम्मी-पापा, पति और बच्चे का नाम था। अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से और 2 नाम मिटा दो। लड़की असमंजस में पड़ गयी। बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने माता-पिता का नाम मिटा दिया।
        सभी लोग स्तब्ध और शान्त बैठे थे क्योकि वे जानते थे कि ये गेम सिर्फ वह लड़की ही नहीं खेल रही थी, उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था। अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे उसके पति और बेटे का। प्रोफ़ेसर ने एक और एक नाम मिटाने के लिए कहा। लड़की अब बहुत सहमी गयी। बहुत सोचने के बाद रोते हुए उसने अपने बेटे का नाम मिटा दिया।
          प्रोफ़ेसर ने  उस लड़की से कहा तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ और सभी की तरफ गौर से देखा और पूछा- 'क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया।'
          कोई भी इस प्रश्न उत्तर नहीं दे सका। सभी मुँह लटकाकर बैठे हुए थे। प्रोफ़ेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और ऐसा करने का कारण पूछा। जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर इतना बड़ा किया उनका नाम तुमने मिटा दिया और तो और तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया, उसका भी नाम तुमने मिटा दिया? लड़की ने जवाब दिया कि अब मम्मी-पापा बूढ़े हो चुके हैं, कुछ साल बाद वे मुझे और इस दुनिया को छोड़कर चले जाएँगे। मेरा बेटा जब बड़ा हो जाएगा तो 
जरूरी नहीं कि वह शादी के बाद मेरे साथ ही रहे। 
        लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है, तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभाएँगे। इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज मेरे पति हैं। प्रोफेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूँज से लड़की को सलामी दी।
          प्रोफेसर ने कहा तुमने बिल्कुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो पर अपने आधे अंग अर्थात् अपने पति के बिना नहीं रह सकती। मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर हर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसको सब से ज्यादा अजीज होता है। सभी पति और पत्नियों के लिए ये वास्तव में सत्य है, इसे कभी मत भूलना।
        वास्तव में गृहस्थ जीवन की सच्चाई यही है कि सभी रिश्ते-नातों से हम दूर हो सकते हैं पर पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ हाथ थामे हुए जीवन के अन्तिम समय तक साथ निभाते हैं। जीवन साथी में लाख कमियाँ हों परन्तु उन कमियों को अनदेखा करते हुए अपनी जीवन यात्रा पूरी करें। एक बात और कहना चाहती हूँ कि जो पति-पत्नी परस्पर एक-दूसरे को सम्मान नहीं दे सकते उन्हें घर अथवा बाहर कोई नहीं पूछता। स्वार्थी बनकर भी यदि रिश्ता निभाना पड़े तो सौदा महँगा नहीं है। अतः सभी से विनम्र अनुरोध है कि इस सत्य को स्वीकार करते हुए दोनों परस्पर विश्वास और प्रेम को खण्डित न होने दें। फूँक-फूँककर कदम बढ़ाते हुए अपने-अपने जीवन में पारदर्शिता बनाकर रखें। एक-दूसरे के लिए ही जीना और मरना श्रेयस्कर है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 23 जून 2026

कर्म का फल

कर्म का फल

कर्म का विधान बहुत कठोर है। उससे कोई बच नहीं सकता। वह किसी को भी नहीं छोड़ता। मनुष्य यदि किसी का बुरा करता है तो वह उसके साथ रहता है और उसका दुष्परिणाम उसे भुगतना पड़ता है। यदि वह अच्छा कार्य करता है तो वह पलटकर उसके ही सामने आता है। तब उसे जीवन में सुख-समृद्धि रूपी फल मिलता है। यानी कि सच्चाई यही है कि बुराई का फल कष्टदायी होता है और उसकी अच्छाई का फल उसे खुशियाँ देता है। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
            जैसा बोओगे वैसा काटोगे।
       ‌‌        ‌‌     अथवा
             जैसा करोगे वैसा भरोगे।
 अर्थात् मनुष्य द्वारा की गई अच्छाई या बुराई का परिणाम उसके सामने आ ही जाता है।
          इसी विषय को स्पष्ट करती एक बोधकथा है। एक औरत अपने परिवार के लिए प्रतिदिन भोजन पकाती थी। एक रोटी वह किसी भूखे व्यक्ति के लिए पकाकर उसे खिड़की के सहारे रख देती थी। जिसे कोई भी भूखा व्यक्ति वहॉं से ले जाकर अपना पेट भर सकता था।
        एक कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन उस रोटी को ले जाता था। धन्यवाद देने के स्थान पर अपने रस्ते पर चलता हुआ बड़बड़ाता रहता था, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौटकर आएगा।" 
           इस तरह दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा। वह कुबड़ा व्यक्ति प्रतिदिन रोटी लेकर  बड़बड़ाता हुआ चला जाता। वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी थी। वह मन-ही-मन सोचने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो कहता नहीं और न जाने क्या-क्या उल्टा-सीधा बड़बड़ाता रहता है? मतलब क्या है इसका।"
           एक दिन क्रोधित होकर उसने निर्णय लिया और बोली, "मैं इस कुबड़े से अब निजात पाकर ही रहूँगी।"
           उस दिन उसने रोटी में जहर मिला दिया। जैसे ही उसने रोटी को खिड़की पर रखा, अचानक उसके हाथ काँपने लगे और वह बोली, "हे भगवन, मैं यह क्या करने जा रही थी?" 
            उसने तुरन्त उस रोटी को चूल्हे की आँच में जला दिया। फिर उसने एक ताजी रोटी बनाई और खिड़की के सहारे रख दी। हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह इससे बिलकुल बेखबर था कि आज उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
           वह महिला खिड़की पर रोटी रखते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगी, "हे प्रभु, मेरे पुत्र को सही-सलामत रखना और घर वापिस भेज देना जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए शहर से बाहर गया हुआ था।"
         महीनों से उसकी कोई खबर नहीं मिली थी। ठीक उसी शाम उसका बेटा घर आया। वह कमजोर हो गया था। उसके कपड़े फट गए थे और वह भूख के कारण बेहाल हो गया था। 
             माँ को देखते ही उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार ही है कि मैं आज यहाँ हूँ। जब घर से एक मील दूर था तो मैं भूख के कारण गिर गया था। मैं मर गया होता यदि वहाँ से गुजर रहे एक कुबड़े की नजर मुझ पर न पड़ी होती। उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। भूख के मारे मानो मेरे प्राण निकले जा रहे थे।"
             मैंने उससे कहा, "बाबा खाने के लिए कुछ हो तो दे दो।" 
           उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कहते हुए दे दी, "मैं हर रोज यही खाता हूँ। आज मुझसे ज्यादा तुम्हें इसकी जरूरत है। बेटा, यह खा लो और अपनी भूख शान्त करो।"
           अपने बेटे की यह बात सुनते ही माँ का चेहरा पीला पड़ गया। अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा ले लिया। उसके मस्तिष्क में वही बात घूमने लगी कि यदि उसने सुबह जहर मिली हुई रोटी को आग में जलाकर नष्ट नहीं किया होता तो शायद आज उसका बेटा उसी रोटी को खाकर मर जाता?
             उस महिला को उन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ आ गया, "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे तो वह तुम तक लौटकर आएगा।
            इस कहानी को पढ़कर यही बात समझ में आती है कि हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अच्छा करने से अपने आप को कभी रोकना नहीं चाहिए। चाहे उस समय उस कृत कार्य के लिए आपकी सराहना या प्रशंसा हो अथवा न हो। अपने प्रयासों को यत्नपूर्वक बढ़ाते रहना चाहिए। पता नहीं किस मोड़ पर हमारी बुराई हमसे सर्वस्व छीन ले। इसके विपरीत हमारी अच्छाई हमें बहुत कुछ दे जाए।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 22 जून 2026

समय को खरीदना असम्भव

समय को खरीदना असम्भव 

 इस संसार में कोई भी ऐसा राजा-महाराजा अथवा अमीर व्यक्ति आज तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सकता हो। यदि ऐसा हो जाता तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा, चक्रवर्ती सम्राट जिनके पास अकूत धन-सम्पदा थी, वे समय को खरीद लेते और आज हमारे बीच जीवित होते। तब इस धरा पर रत्ती भर जगह पैर रखने के लिए नहीं बचती। परन्तु यह होना असम्भव है। ईश्वर ने रचना ही इस प्रकार की है कि जिसमें कहीं किसी गलती की गुंजाइश ही नहीं है।
           सत्य यह है कि विधि के विधान को बदलने की सामर्थ्य किसी भी मनुष्य में नहीं है। जिन्हें हम भगवान मानकर पूजते हैं, वे फिर हमारे पास ही होते। वे अपने नश्वर शरीर को छोड़कर इस दुनिया से विदा नहीं लेते और न ही हमें छोड़कर कोई और जन्म लेते। समय प्रवहमान है, उसे पकड़कर कैद करने की शक्ति किसी व्यक्ति में नहीं है। वह अपनी गति से निरन्तर बढ़ता रहता है। शक्तिशाली रावण को बड़ा अहंकार था कि उसने काल को अपने वश में किया हुआ है। वह भी बच नहीं सका ईश्वरीय न्याय से और इस संसार से विदा हो गया।
            इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि भूतकाल में जो हो गया उससे शिक्षा लेकर आगे बढ़ो। बन्दरिया जिस तरह अपने मृत बच्चे को चिपकाए हुए घूमती है, उस तरह भूतकाल को अपने साथ चिपककर मनुष्य को नहीं चलना चाहिए। भविष्य के गर्भ में क्या है? हम नहीं जानते, उसे केवल ईश्वर जानता है। इसलिए सब उस पर छोड़कर चिन्ता मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। केवल वर्तमान ही हमारे समक्ष है उसके विषय में ही सोचना चाहिए और उसे संवारना चाहिए। मनीषी हमें समझाते हैं कि -
     ‌ Time is money. Enjoy the today.
          इसी भाव को एक बोधकथा के माध्यम से समझते हैं। एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूर्ण मेहनत तथा ईमानदारी से करती थी। गिलहरी जरूरत से ज्यादा काम करके भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर नें उसे कहा था, "वह इसी तरह मन लगाकर काम करती रहेगी तो वह उसे दस बोरी अखरोट देगा।"
        गिलहरी जब काम करते-करते थक जाती थी तो सोचती, "बहुत तक गई हूॅं। अब थोड़ा आराम कर लेती हूॅं।"
             तभी उसे याद आ जाती थी, "मैं तुम्हें दस बोरी अखरोट दूॅंगा।"
             गिलहरी फिर दुगने उत्साह से अपने काम पर जुट जाती थी। वह जब दूसरी गिलहरियों को खेलते-कूदते देखती तो उसकी भी खेलने और मस्ती करने इच्छा होती पर अखरोट याद आते ही पुनः काम पर लग जाती।
            शेर कभी-कभी उसे दूसरे शेर के पास भी काम करने के लिये भेज देता था। ऐसा नहीं था कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, वह बहुत ईमानदार था।
          ऐसे ही समय बीतता रहा एक दिन ऐसा भी आया जब शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट देकर आजाद कर दिया। गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये सारे अखरोट हमारे किस काम के? पूरी जिन्दगी काम करते-करते दाँत घिस गये, अब इसे खाऊँगी कैसे?
           यह कहानी हम सभी के जीवन की भी वास्तविकता बन चुकी है। कभी घर-परिवार और कभी बच्चों के प्रति दायित्वों को पूरा करने में इन्सान मन मारकर सारा जीवन अपनी इच्छाओं का त्याग करता रहता है। सारी जिन्दगी नौकरी करते हुए बिता देता है। मनुष्य जब 60 वर्ष की उम्र में रिटायर होता है तब उसे उसे जीवन भर की कभाई हुई उसकी पूँजी यानी प्रोविडेंट फण्ड आदि मिल जाता है। उस समय उसके पास पैसा और समय दोनों होते हैं पर उसका शरीर अस्वस्थ होने लगता है। इसलिए चाहकर भी वह अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता।
             परिवर्तनशील समय में पीढ़ी बदल जाता है। उह समय परिवार चलाने वाला मुखिया भी बदल जाता है। वह नया जोश से भरा युवा मुखिया कभी इस बात का अनुमान नहीं लगा पाता कि पुराने मुखिया ने इस जमा पूँजी (फण्ड) को पाने के लिए सारा जीवन अपनी कितनी इच्छाओं का दमन किया होगा? कितने कष्टों-परेशानियों का सामना किया होगा? कितने ही अपने सपनों को होम कर दिया  होगा? 
          इस वृद्धावस्था में फण्ड की यह राशि उसे मिल जाती है जिसे पाने के लिए उसने अपनी पूरी जिन्दगी दिन-रात अथक श्रम किया था। डाक्टरों द्वारा बताए गए परहेज के कारण वह उस धन का वैसा आनन्द नहीं उठा पाता जैसा वह जीवन पर्यन्त सोचता रहता था। अपनी इस लाचारी के कारण वह अपना मन मसोसकर कर रह जाता है।
          अतः समय कैसा भी हो उसको कोसना नहीं चाहिए। धूप-छाँव तो जीवन का हिस्सा हैं, उस समय के लिए सुरक्षा का उपाय करते हुए अपने साधनों के अनुसार जीवन का भरपूर आनन्द उठाना चाहिए। जिससे अपने जीवन में हार जाने का मलाल न रहे।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 21 जून 2026

ईश्वर की पूजा-अर्चना

ईश्वर की पूजा-अर्चना

ईश्वर की पूजा-अर्चना यानी प्रार्थना करना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य का लोक-परलोक दोनों ही सुधरते हैं। उसका आत्मिक बल बढ़ता है और उसे मानसिक शान्ति मिलती है।
          प्रभु की प्रार्थना करना और उसका ध्यान करना इंसान के लिए बहुत जरूरी होता हैं। जब मनुष्य सच्चे मन से प्रार्थना करता है तब भगवान उसकी प्रार्थना को सुनकर देर-सवेर उसे पूरा करते हैं। वह मालिक मनुष्य के भाव को चाहता है। उसे किसी भी प्रकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं लगता।
        जब मनुष्य भगवान का ध्यान करता है तब वह उसकी बात सुनते हैं। ध्यान की अवस्था में मनुष्य ईश्वर के करीब होता है। संसार के सारे कार्य-व्यवहार से दूर रहकर वह मालिक के पास बैठता है। इस प्रकार वह उसके साथ एकात्म होने का प्रयास करता है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का ही लाभ होता है।
      इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बनाने वाला परमात्मा है और हर जीव के लिए वही सब प्रकार की व्यवस्थाएँ भी करता है। जब तक मनुष्य इस सत्य को स्मरण रखता है तब तक वह सावधान रहता है। वह कुमार्ग पर नहीं चल सकता। अपने जीवन में वह हर कदम फूँक-फूँककर रखता है ताकि उससे कोई अपराध न हो जाए।
        जब वह अपने अहं में चूर हो जाता है तब स्वयं को उस परमात्मा से भी महान् समझने लगता है। उस समय वह अहंकारी बनकर वह अपनी औकात भूल जाता है।  अपने दुष्कर्मो के कारण उसे भी उस परम न्यायकारी परमेश्वर से सजा तो मिलती है जैसे हम गलती करने पर बच्चों या अपने अधीनस्थों को देते हैं। कहते हैं कि ईश्वर की लाठी बेआवाज होती है और उसका प्रहार बहुत ही कठोर होता है। जब अपने दुष्कृत्यों का फल मानव को भोगना पड़ता है तब वह उसकी सहनशक्ति से परे हो जाता है।
         संसार में विद्यमान नानाविध पदार्थ वह मालिक हमें बिनमाँगे झोलियाँ भरकर देता है। अब सबके समक्ष यह समस्या उठती है कि हम उसे क्या अर्पित कर सकते हैं? कहते हैं कि एक बार एक व्यक्ति ने ईश्वर से प्रश्न किया था कि वह उसे किस प्रकार रिझा सकता है और उसे क्या अर्पित कर सकता है? 
        वास्तव में यह प्रश्न केवल उस व्यक्ति का नहीं हम सभी का भी है। इस संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जो उस प्रभु को समर्पित की जा सके। ईश्वर ने इस प्रश्न को सुनकर उत्तर दिया कि संसार की हर वस्तु उसी ने ही मनुष्य को दी है। मनुष्य के पास अपनी एक ही चीज है, वह है सिर्फ उसका अहंकार। वह उसे मालिक ने नहीं दिया। प्रभु का कहना है कि मनुष्य वही अहंकार यदि उसे अर्पित कर दे तो उसका जीवन सफल हो जाएगा।
          इसका तात्पर्य यही है कि मनुष्य को सरल, सहज और सहृदय बनना चाहिए, अहंकारी कदापि नहीं। ईश्वर को घमण्डी लोग बिल्कुल पसन्द नहीं है। वह स्वयं दयालु, प्यार करने वाला और सभी जीवों का हितचिन्तक है। उसे सदाचारी और परोपकारी लोग ही भाते हैं। अहंकारी का सिर कभी-न-कभी नीचा हो ही जाता है।
        ओशो का कथन है कि आस्तिक के बजाय नास्तिक के लिए परमात्मा को पाने की ज्यादा सभावना है क्योंकि आस्तिक तो झूठ से ही ईश्वर को पाने की शुरूआत करता है। ईश्वर का उसे पता नहीं है और उसने ईश्वर को मान लिया। यहीं पर तो बेईमानी हो गई। जब मान ही लिया तो अब खोज क्या खाक होगी? जब उसे झूठा ही मान लिया, तो फिर खोज का तो अन्त हो गया। 
          इसलिए परमात्मा को पाने के लिए, उसे जानने और समझने का सदा प्रयास करना चाहिए। उसकी निष्काम उपासना करनी चाहिए। उसके गुणों का अंशमात्र भी यदि मनुष्य अपना ले, अपने जीवन में डाल ले तो उसके इहलोक और परलोक दोनों संवर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

पिता के साए में सौभाग्यशाली बच्चे

पिता के साए में सौभाग्यशाली बच्चे 

संसार में वे बच्चे बहुत ही सौभाग्यशाली होते हैं जिनके सिर पर उनके पिता का साया बना रहता है। पिता के होने से ही मनुष्य का अस्तित्व होता है। पिता और माता ही वे दो भगवान हैं जो मनुष्य को इस धरती पर लेकर आते हैं। बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए इन दोनों की आवश्यकता होती है। पिता के होने से बच्चों में अनुशासन बना रहता है। माता और पिता मिलकर ही बच्चे को इस योग्य बनाते हैं कि वह समाज में अपना सिर ऊँचा करके चल सके और सुविधापूर्वक अपना जीवन यापन कर सके। 
        हमारे महान ऋषि ने 'तैत्तरीयोपनिषद्' में हमें समझाते हुए कहा है-
                पितृदेवो भव
अर्थात् पिता को देवता मानो। कहने का तात्पर्य यह है कि मन्दिर में जाकर निर्जीव मूर्तियों की पूजा अवश्य करो, पर घर में जीवित देवता यानी पिता और माता की पूजा पहले करो। यहाँ पूजा करने का अर्थ है यह नहीं है कि धूप अगरबत्ती जलाकर उनकी आरती उतारी जाए। बल्कि इसका अर्थ यही है कि उनकी अच्छी तरह से देखभाल करनी चाहिए। जैसे उन्होंने कभी अपनी सन्तान की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण किया था। मनुष्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब वे अशक्त होने लगें, तब उन्हें समय पर भोजन मिले, आवश्यकता होने पर दवा मिले। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को अपना धर्म समझकर, बिना माथे पर शिकन लाए पूरा किया जाए। 
        बच्चे को यह अहसास होता है कि पिता के होने से वह सदा सुरक्षित है। जब तक पिता जीवित हैं, वह स्वयं को बच्चा ही समझता है। उसे लगता है कि यदि उससे कुछ गलत हो जाएगा तो पिता है न उसे बचाने के लिए, उसकी सुरक्षा करने के लिए। पिता के रहने से वह घर-गृहस्थी की चिन्ताओं से मुक्त रहता है। उसकी दृष्टि में उसके पिता का कद बहुत ऊँचा होता है जिसे कोई छू नहीं सकता। पिता के घर पर रहने से बच्चे अपने कार्य पर अच्छी तरह ध्यान दे सकते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि घर में उनके पिता बैठे हैं जो घर की और अगली पीढ़ी का ध्यान रख लेंगे।
        महाभारत के काल में जब पाण्डव वन में विचरण रहे थे, उस समय चलते हुए उन्हें प्यास लगी। उन्हें समीप ही एक तालाब मिल गया। चारों भाई बारी-बारी से उस तालाब के पास पानी लेने के लिए पहुँचे। उस तालाब का स्वामी एक यक्ष था उसने उनसे पानी लेने से पहले, उसके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। वे सभी इतने प्यासे थे कि बिना उत्तर दिए ही जल लेना चाहते थे। उसके प्रश्नों का उत्तर न देने के कारण अर्जुन सहित चारों भाई बेहोश हो गए।
         तब धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ गए। उन्हें भी यक्ष ने पहले प्रश्नों का उत्तर देने के लिए कहा। यक्ष के अनेक प्रश्नों में से एक प्रश्न यह था, "आकाश से ऊँचा कौन है?"
          इस प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था, "पिता आकाश से ऊँचा है।"
          पिता का महत्त्व इसी बात से चलता है कि शास्त्रों में उसे शीर्ष स्थान पर रखा गया है। सन्तान चाहे भी तो उस आकाश को हाथ बढ़ाकर नहीं छू सकती। वह केवल उस आकाश को दूर से निहार सकती है और उसके जैसा बनने का प्रयास कर सकती है।
        पिता के विषय में 'नीतिशास्त्र' का यह कथन द्रष्टव्य है-
            स पिता यस्तु पोषक:। 
अर्थात् पिता वही है जो पोषक यानी पालन-पोषण करता है।
          इस नीति वचन का तात्पर्य यह है कि पिता वही है जो अपने सारे सुखों का त्याग करके अपनी सन्तान का पालन-पोषण करता है। वह उसे कभी किसी वस्तु की कमी का अनुभव नहीं होने देता। अपनी सामर्थ्य से बढ़कर भी वह अपने बच्चों की सारी आवश्यकताओं को पूर्ण करता है, उन्हें हर प्रकार से योग्य बनाता है।
        'ब्रह्मवैवर्तपुराणम्' का यह कथन भी बहुत समीचीन है-
      सर्वेषामपि वन्द्यानां जनक: परमो गुरु:।
अर्थात् सभी वन्दनीय जनों में पिता सर्वश्रेष्ठ है।
        इस संसार में बहुत से लोग पूजनीय होते हैं, जिनकी हम किसी भी कारण से वन्दना करते हैं। उनके आगे-पीछे घूमते रहते हैं, उनकी कही हुई बात को महत्त्व देते हैं। उन सबसे अधिक पिता की अर्चना करनी चाहिए, ऐसा ब्रह्मवैवर्त पुराण का आदेश है। मनुष्य के जीवन में जो स्थान पिता का है, उसे कोई नहीं ले सकता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में पिता स्थान बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह सत्य है कि उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता।
         अन्त में यही कह सकते हैं कि प्रत्येक बच्चे का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने पिता के मान-सम्मान को बनाए रखे। ऐसा कोई भी कार्य उसे नहीं करना चाहिए जिससे उनके पिता को दूसरों के समक्ष कभी अपनी नजर नीची करनी पड़ें। उसे स्वयं उनकी सेवा-सुश्रुषा के कार्य प्रसन्नतापूर्वक करने चाहिए। ऐसा करके वह अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार लेता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शनिवार, 20 जून 2026

योग अमूल्य धरोहर

योग अमूल्य धरोहर 

योग हमारे ऋषि-मुनियों के द्वारा दी गई एक अमूल्य देन है। योग अपने आप में एक समूचा दर्शन है। आजकल कुछ लोग इसे मात्र उछल कूद करने का माध्यम समझ रहे हैं जो उचित नहीं है। आज की पीढ़ी के अनुसार टीवी के सामने खड़े होकर या सीडी देखकर हाथ-पैरों को हिला लेना मात्र योग बन गया है। जिसको आज ये आधुनिक लोग 'योगा' की संज्ञा देते हैं। वास्तव में वह योग नहीं कहलाता। वे केवल योगासन कहलाते हैं। इन दोनो के अन्तर को समझना आवश्यक है।
              योग एक बहुत गम्भीर विषय है। इसकी अनुपालना करना इतना सरल कार्य नहीं है, जितना लोग समझते हैं। महर्षि पातंजलि ने योगशास्त्र में योग के आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों अंगों का पालन करते हुए मनुष्य समाधि के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करता है। इनमें पहले पाँच अंगों को बहिरंग कहते हैं और अन्तिम तीन अंगों  को अन्तरंग कहा जाता है। इन आठ अंगो के कारण ही इसे अष्टांगयोग कहते हैं।
             मनुष्य का सारा जीवन व्यतीत हो जाता है यम और नियम का पालन करते हुए पर उनकी पूर्ण रूप से अनुपालना नहीं कर पाता। जिस प्रकार नींव के बिना यदि घर बनाया जाए तो वह बहुत दिन तक टिका नहीं रह सकता, उसी प्रकार यम और नियम के बिना समाधि तक पहुँच पाना असम्भव होता है। योग की पहली सीढ़ी यम है इसके पालन के बिना नियम की अनुपालना नहीं हो सकती। इन दोनों के पालन से अन्त:करण पवित्र होता है। इनके पालन के बिना प्राणायाम का भली-भाँति होना बहुत कठिन होता है। अब इन अंगों की संक्षिप्त जानकारी नीचे दे रही हूॅं - 
1. यम- महर्षि पातंलि योगदर्शन में कहते हैं-
    अहिंसासत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:
अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय(चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह न करना) ये पाँच यम हैं। मन, वचन व कर्म से इन सबका पालन करना चाहिए। सारा जीवन ईमानदार कोशिश करने पर भी इनका पालन असम्भव-सा है।
2. नियम- योगशास्त्र के अनुसार दूसरा नियम हैं-
शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्चप्रणिधानानि नियमा:।अर्थात् शौच(तन और मन की स्वच्छता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान (सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना)। पाँचों नियमों का पालन इन पाँचों यमों के साथ-साथ ही करना होता है।
3. आसन- योगाभ्यास करते समय उपयुक्त आसन का चुनाव करके बैठना चाहिए। साधक प्रायः पद्मासन में ही बैठते हैं। आसन में बैठते समय तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. मेरुदंड, ग्रीवा और मस्तक को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए। 2. नासिकाग्र पर या भृकुटि में दृष्टि रखनी चाहिए। 3. यदि आलस्य न सताए तो आँखें मूँदकर बैठ सकते हैं। इस प्रकार उचित आसन पर बैठकर योगाभ्यास किया जाता है।
4. प्राणायाम- श्वास के आरोह व अवरोह का निरोध यानी रोकना प्राणायाम कहलाता है। इसी बात को योगशास्त्र कहता है-
    तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद:      प्राणायाम:। 
अर्थात् देश, काल और संख्या के सम्बन्ध से बाह्य (कुम्भक), आभ्यन्तर(रेचक) और स्तम्भन वृत्ति(रोकना) वाले तीनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। प्राणायाम सिद्ध होने पर विवेक को कुण्ठित करने वाले अज्ञान का नाश होता है और मन स्थिर होता है।
5. प्रत्याहार- अपने-अपने विषय के संयोग से हट जाने और इन्द्रियों का चित्त के रूप में अवस्थित होना प्रत्याहार कहलाता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं। तब साधक बाह्य ज्ञान से दूर होता जाता है।
6. धारणा- योगशास्त्र धारणा के विषय में यह कहता है-  
          देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
अर्थात् चित्त को किसी भी एक ध्येय स्थान पर स्थित करने को धारणा कहते हैं।
7.  ध्यान- ध्यान के विषय में योगशास्त्र का यह कथन है-  
             तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्
अर्थात् ध्येय वस्तु में चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।
8. समाधि- एकाग्र ध्यान धीरे-धीरे समाधि की ओर प्रवृत्त करता है। तब ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं। 
            स्थूल पदार्थ में समाधि 'निर्वितर्क' कहलाती है और सूक्ष्म में समाधि 'निर्विचार' कहलाती है। यही समाधि ईश्वर विषयक होने से मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है।
             इस संक्षिप्त विवेचन से यह समझ आता है कि योग एक बहुत ही गहन विषय है। इसके प्रारम्भिक अंगों यम और नियम का पालन आजीवन करना होता है। यह योग मनुष्य के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इसकी अनुपालना करके ही जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति मिलती है।
चन्द्र प्रभा सूद 

शुक्रवार, 19 जून 2026

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

खुशी धन-वैभव में ढूॅंढना

मनुष्य अपनी खुशी धन-वैभव में ढूँढता है। वह भूल जाता है कि दुनिया के सारे ऐश्वर्य मनुष्य के लिए केवल साधन मात्र हैं, वे साध्य कदापि नहीं बन सकते। हम अपने लिए दिन-रात एक करके परिश्रमपूर्वक साधन जुटाते जाते हैं, वे हमें क्षणिक सुख का अहसास देते हैं। उन्हें भोगने के पश्चात वे हमारे लिए सामान्य जैसे हो जाते हैं, विशेष नहीं रहते। कभी जिन्हें पाने के लिए हम मरे जा रहे होते हैं, अब उनकी परवाह भी नहीं करते।
            यह इन्सानी स्वभाव है कि वह हर वस्तु से शीघ्र ही उकता जाता है अर्थात् बोर हो जाता है। प्रसन्नता पाने के लिए या सुखी रहने के लिए केवल धन, दौलत, प्रापर्टी आदि की आवश्यकता नहीं होती, मनुष्य इनके अभाव में भी मस्त रह सकता है। सच्ची खुशी का कारण मन है जो सदा मनुष्य को इधर-उधर भटकाता रहता है।
           ‌ इसी बात को एक बोध कथा के माध्यम से समझते हैं। एक शहर में बहुत अमीर व्यक्ति रहता था। अत्यधिक धनी होने पर भी वह सदा दुखी रहता था। एक दिन वह महात्मा के पास गया और उन्हें कहा, "अपनी समस्या बताई कि उसके पास सब ऐश्वर्या हैं पर वह सुखी नहीं है।"
             उन्होने सेठ की बात ध्यान से सुनी और कहा, "आप कल मेरे पास इसी समय आना। मैं तुम्हारी सारी समस्या का हल बता दूँगा।"
             सेठ खुशी-खुशी घर गया। जब अगले दिन वह महात्मा के पास आया तो उसने देखा कि वे सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त हैं।
          सेठ ने उस खोई वस्तु के बारे में पूछा जिसे वे ढूँढ रहे हैं। उन्होंने बताया, "उनकी एक अंगूठी गिर गयी है और वे उसी ढूँढ रहे हैं पर वह अंगूठी मिल ही नहीं रही।"
             यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया। सेठ ने  महात्मा से कुछ समय बाद पूछा, "महात्मा जी, आपकी अंगूठी गिरी कहाँ थी?"
            उन्होंने जवाब दिया, "अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ बहुत अन्धेरा है। अतः वे उसे यहाँ सड़क पर ढूँढ रहे हैं।"
           सेठ ने चौंककर पूछा, "जब अंगूठी आश्रम में खोई है तो वहाँ कैसे मिल सकती है।"
            महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा, "यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो अपने मन में छुपी रहती है लेकिन उसे धन में खोजने की कोशिश करते हैं। इसीलिए दुखी रहते हैं।"
           महात्मा जी की बात सुनकर सेठ उनके पैरों में गिर गया। सन्तुष्ट होकर महात्मा जी से विदा लेकर वह अपने घर चला गया।
           ‌यही बात हम सभी पर लागू होती है। जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इन्सान खुश नहीं रहता क्योंकि हम पैसा कमाने में इतना मस्त हो जाते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। बच्चा जैसे किसी खिलौने के लिए हठ करता है और जब उसे वह दिला दिया जाता है तब वह दीन- दुनिया भूल जाता है। कुछ ही समय उससे खेलने के बाद उस खिलौने से उसका मन भर जाता है तो उसे फैंक देता है। उसे इस बात का कोई मतलब नहीं होता कि वह कितना कीमती खिलौना था। वही हाल हम सभी का भी है।
          प्रयास यही करना चाहिए कि अपने बच्चों को धनवान होना सिखाने के स्थान पर खुश रहना सिखाना चाहिए ताकि बड़े होने पर वे रिश्तों की अहमियत समझ सकें और वस्तुओं की उपयोगिता को समझ सकें, न कि उनके मूल्य को।
          खुशियों के पल खोजने होते हैं। हम बड़ी-बड़ी खुशियों को पाने की फिराक में रहते हैं। यह भूल जाते हैं कि बड़ी खुशियाँ तो जीवन मे गिनी-चुनी आती हैं। इसलिए छोटे-छोटे खुशियों के पल यत्नपूर्वक खोजने चाहिए। वे हमें प्रतिदिन के कार्य व्यवहार में मिल सकते हैं। शर्त यह है कि हम उन अमूल्य पलों को सहेजने का मन बना सकने में सफल हो‌ जाऍं।
            स्वामी विवेकानन्द जी का इस विषय में कथन है कि 'समस्त ब्रह्माण्ड हमारे इस शरीर के अन्दर ही विद्यमान है जबकि हम जीवनभर इधर-उधर भटकते रहते हैं। सत्य बोलना, परोपकार करना, अच्छी सोच रखना आदि जीवन के बहुत बड़े सुख हैं।'
          स्वामी विवेकानन्द जी का कथन सर्वथा उपयुक्त है। वास्तविक सुख और शान्ति मनुष्य को शुभकार्य करके ही मिलती है। किसी भूखे को भरपेट खाना खिलाने पर जो खुशी मिलती है वह करोड़ों रूपए खर्च करके भी नहीं मिल सकती। इसलिए सच्चा सुख खोजना हो तो शुभकर्म करते हुए मन को शुद्ध और पवित्र बनाना चाहिए। ईश्वर की शरण में जाने पर परम मनुष्य को परम सुख की प्राप्ति होती है।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 18 जून 2026

रिश्तों को फटने मत दो

रिश्तों को फटने मत दो

मनुष्य को अपने जीवनकाल में इस बात की चिन्ता छोड़ देनी चाहिए कि कौन उसे दुख पहुँचाता है या उससे नफरत करता है बल्कि उसकी चिन्ता करनी चाहिए कौन उसे प्यार करता है। क्योंकि मनुष्य की सारी खुशियाँ उसी प्यार से जुड़ी होती हैं यानी मौजूद होती हैं। जिन्दगी में जितना अधिक हसीन पलों को याद किया तो जीना उतना ही सुखद व सुगम हो जाता है। 
          परस्पर प्यार व आपसी विश्वास दुनिया का वह सबसे खूबसूरत पौधा है जो जमीन पर नहीं दिलों में उगता है। जिस प्रकार कड़वी गोलियाँ चबाई नहीं निगल ली जाती हैं। उसी प्रकार ही अपमान, धोखे, असफलता जैसी कड़वी बातों को भी सीधे गटक लिया जाए तो आपसी कड़वाहट समय रहते समाप्त हो जाती है। यदि उन्हें चबाते रहेंगे यानि पिष्टपेषण करते रहेंगे तो जीवन दुष्वार हो जाता है और जीने का आनन्द नहीं रहता। अपना मन ही कलुषित होता रहता है।
        मनुष्य यदि यही सोचता रहे कि फलाँ व्यक्ति ने उसको उस समय यथोचित मान-सम्मान नहीं दिया अथवा यही विचार करके हलकान होता रहे कि उसने मुझे नहीं पूछा तो मैं सम्बन्ध क्यों रखूँ, तो जीना मुहाल हो जाता है। 
          सम्बन्धों अथवा रिश्तों की सिलाई यदि भावनाओं के पक्के धागे से की जाए तो उनका टूटना मुश्किल होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई कितना भी यत्न कर ले उन रिश्तों को नहीं तोड़ सकता। यदि रिश्तों की बुनियाद स्वार्थ पर रखी गई है तो उनका लम्बे समय तक टिकना मुश्किल है। स्वार्थों की पूर्ति होते ही वे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। तब फिर वहाँ एक-दूसरे को पहचानना भी नागवार हो जाता है।
        इस  क्षणभंगुर जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कौन इस संसार से पहले विदा लेगा और कौन बाद में, इसके विषय में कोई नहीं जानता। सब भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। बाद में अपनों को खोकर बहुत आघात लगता है और मानसिक सन्ताप होता है। उस समय केवल हाथ मलते हुए रह जाना पड़ता है। इसलिए पश्चाताप करने से अच्छा है रिश्तों में अनावश्यक आने वाली दूरियों को पाट दिया जाए। सम्बन्धों की गरिमा को बनाए रखने के लिए सबसे सामञ्जस्य बनाए रखना चाहिए।
            मन को लघु अथवा उदार बनाना होता है। यदि मन को लघु बना दिया तो मनुष्य की चिन्तन शक्ति संकीर्ण हो जाती है। वह मैं, मेरा घर, मेरे परिवार आदि तक ही सिमटकर रह जाता है। उसकी स्वार्थी प्रवृत्ति उस पर हावी होने लगती है। उसमें किसी अन्य के लिए कोई जगह नहीं बच पाती। ऐसे लोग आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं और पूर्वाग्रहों को पाल लेते हैं। इनके लिए सभी रिश्ते-नाते बस नाममात्र के ही रह जाते हैं।
        इसके विपरीत मन को थोड़ा उदार या विशाल बना लेने से बहुत-समस्याएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं। सबको साथ लेकर चलने की इनकी प्रवृत्ति इन्हें सबका प्रिय बना देती है। रिश्तों को तोड़ने के बजाय उन्हें बनाए रखने में ये लोग अधिक विश्वास रखते हैं। दूसरों से होड़ करने के स्थान पर उन्हें साथ लेकर चलना ही समझदारी होती है। ऐसा व्यवहार करने से मनुष्य की आत्मा प्रफुल्लित रहती है और उसमें उत्साह बना रहता है।
          सकारात्मक सोच रखने वाले लोग हर हाल में अपेक्षाकृत अधिक सुखी रहते हैँ। नकारात्मक सोच रखने वालों को सदा ही मानसिक पीड़ा का अनुभव होता है। वे जीवन से हमेशा निराश रहते हैं।
        जहाँ तक हो सके रिश्तों को फटने मत दो और यदि दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो जाए तो उनको इतनी खूबसूरती से रफू कर दो कि किसी को कभी पता ही न चल सके कि कभी उनमें कभी पैबन्द लगाने की आवश्यकता हुई थी।
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 17 जून 2026

अपनों से मिलता कष्ट

अपनों से मिलता कष्ट 

अपने बन्धु-बान्धवों से जब मनुष्य को जीवन में कष्ट मिलता है तब मानव मन तार-तार हो जाता है। वह अपनों से प्रेम, विश्वास, सहानुभूति, सहृदयता और अपनेपन की अपेक्षा करता है। इस कसौटी पर जब अपने बन्धु-बान्धव खरे नहीं उतरते और उसकी अवहेलना करते हैं, तब उसे लगता है कि उसके जीवन की कोई उपयोगिता नहीं रह गई।
          उसे संसार में रहते हुए ऐशो-आराम के सारे साधन व्यर्थ लगने लगते हैं। इसी प्रकार थाली में सजे छप्पन भोग भी उसे बेस्वाद प्रतीत होते हैं। किसी अंजान व्यक्ति से यदि ठोकर लग जाए तो उतना कष्ट नहीं होता जितना स्वजनों की बेरुखी मनुष्य को तोड़ देती है।
            अवमानना की इस अवस्था में होने की विवेचना को इस दृष्टान्त के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। 
            एक राजा के महल में एक स्त्री और उसका बेटा काम करते थे। एक दिन उस राजमहल में कामवाली के बेटे को हीरा मिला। 
           उसने माँ से कहा, "मॉं, देखो मुझे यह हीरा मिला है।" 
            काम वाली होशियारी से वह हीरा बाहर फैंककर कहती है, " बेटा, यह काँच का टुकड़ा है, हीरा नहीं है।"
           कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वह हीरा उठाकर ले जाती है। वह एक सुनार के पास जाती है और उसे कहती हैं, "भैया, इस हीरे को देखकर इसका मूल्य बता दो।"
          सुनार समझ जाता है कि इसे कहीं से मिला होगा। यह असली या नकली इसे पता नहीं है। इसलिए पूछने आई है। सुनार होशियारी से वह हीरा बाहर फैंककर कहता है, "बहन, यह एक काँच का टुकड़ा है हीरा नहीं है।"
          कामवाली लौट जाती है। सुनार वह हीरा चुपके सेे उठाकर जौहरी के पास जाता है और कहता है, "जौहरी भाई, इस हीरे का मूल्य बता दो।"
           जौहरी उस हीरे को पहचान लेता है। अनमोल हीरा देखकर उसकी नियत बदल जाती है। वह भी हीरा बाहर फैंककर कहता है, "ये एक काँच का टुकड़ा है हीरा नहीं है।"
           जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फैंकता है उसके टुकडे-टुकडे हो जाते है। एक राहगीर यह सब निहार रहा था उसने हीरे से जाकर पूछा, "कामवाली और सुनार ने दो बार तुम्हे फैंका तब तो तुम नहीं टूटे। फिर अब ऐसा क्या हुआ कि तुम टूट गए?"
            हीरा बोला, "कामवाली और सुनार ने मुझे फैंका क्योंकि वे वास्तव में मेरी वास्तविकता से अनजान थे। वे मेरे मूल्य को नहीं पहचानते थे। इसलिए मुझे उनके कृत्य पर अन्तर नहीं पड़ा। परन्तु जौहरी को तो मेरे बहुमूल्य होने का पूरा ज्ञान था, फिर भी उसने लालच के कारण मेरे साथ दुर्व्यवहार किया। यह दुःख मैं सहन नहीं कर सका और टूट गया।"
              ऐसा ही हम मनुष्यों के साथ भी होता है। जो लोग हमें जानते हैं, समझते हैं उसके बावजूद भी यदि हमारा दिल दुःखाते है, उस समय मनुष्य को भी यह बात सहन नही होती कि वह अपनों के द्वारा ठुकराया जाए। अपने इस तिरस्कार को जब मनुष्य सहन नहीं कर सकता तो वह धीरे-धीरे अकेला होता चला जाता है। मनुष्य की यह स्थिति बहुत भयावह होती है। उस समय वह डिप्रेशन में जाने लगता है। उसे डॉक्टरों के पास जाकर अपना समय और धन दोनों को व्यय करना पड़ता है।
           प्रयास यही करनी चाहिए कि कभी अपने स्वार्थ के कारण स्वजनों को आहत न किया जाए और न ही उनका दिल ही तोड़ा जाना चाहिए। इसे उचित नहीं कहा जा सकता। यदि मनुष्य सच्चे मन से इस सच्चाई को स्वीकार कर ले कि सबके साथ उसे सहृदयतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए तो बहुत सारी समस्याओं से बचा जा सकता है।
             हमारे आसपास बहुत से लोग हीरे जैसे अमूल्य होते है। उनके दिल को कभी नहीं दुखाना चाहिए। किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करना अच्छा नहीं होता और न ही उनके सद् गुणों के टुकड़े करके उन्हें बिखरने के लिए विवश करना चाहिए।
           अपने आसपास हीरे जैसे लोगों को लताश करना कोई कठिन कार्य नहीं है। वे तो लाखों की भीड़ में भी सरलता से पहचाने जाते हैं। अपने सहृदय व्यवहार और परोपकारी वृत्ति के कारण वे अनजाने में ही सबके हृदयों पर राज करने लग जाते हैं। सबके साथ समानता का व्यवहार करने वाले ये महानुभाव हर जीव के दुख-दर्द का सहभागी बन जाते हैं। विश्वसनीयता इनका विशेष गुण होता है जो इन्हें सबका प्रिय भाजन बना देता है।
          अपना व्यवहार मनुष्य को सदा ही ऐसा रखना चाहिए कि वह यदि किसी का अच्छा नहीं कर सकता तो कम-से-कम किसी का बुरा भी न करे। वह किसी के दुख, परेशानी अथवा अपमान का कारण न बने। यदि हर व्यक्ति ऐसा सोचने लगे तो दूसरे लोगों को मानसिक आघात देने के दोष से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 16 जून 2026

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई

मनुष्य की वास्तविक कमाई क्या है? यदि इस विषय पर विचार करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि जिस धन-दौलत और ऐश्वर्य-समृद्धि को पाने के लिए मनुष्य ने कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात एक करके अथक परिश्रम किया, वह तो कभी उसका था ही नहीं। जीवन के अन्तिम समय आने पर उस सारे भौतिक धन-वैभव को उसे इस पृथ्वी पर ही छोड़कर परलोक जाना पड़ता है। वह तो मात्र एक ही भ्रम था जिसने उसे अपने जाल में सारा जीवन उलझाए रखा।
           हमारे महान् ग्रन्थ और मनीषी एक ही बात कहते हैं और अनुभवजन्य सच्चाई भी यही है कि मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और अपनी आयु भोगकर खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। उसके सभी साजो-समान, उसकी सारी धन-दौलत यहीं रह जाती है। गठरी बाँधकर वह कुछ भी अगले जन्म के लिए नहीं ले जा सकता। अपने जीवन काल में कृत केवल अच्छे अथवा बुरे कर्म ही वह साथ लेकर जा सकता है। फिर उनका मीठा या कड़वा फल वह जन्म-जन्मान्तरों तक भोगता रहता है।
             एक दृष्टान्त से इस सत्य को समझने का प्रयास करते हैं। एक बार एक सन्त ने अपने दो भक्त को बुलाया और कहा आप दोनों को यहाँ से पचास कोस तक पैदल जाना है। एक भक्त को एक बोरी खाने के समान से भर कर दी और कहा जो भी रास्ते में मिले उसे ये बाँटते जाना और दूसरे भक्त को खाली बोरी दी उससे कहा रास्ते में जो उसे अच्छा सामान मिले उसे बोरी में भर लेना। दोनों सन्त द्वारा निर्दिष्ट यात्रा के लिए अपना सिर झुकाकर निकल पड़े।
          जिसके कन्धे पर सामान था वह धीरे-धीरे चल रहा था पर खाली बोरी वाला भक्त आराम से जा रहा था। थोड़ी दूर जाने पर उसे सोने की एक ईंट मिली, उसने उसे बोरी मे डाल लिया। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे फिर एक ईंट मिली। उसे भी उसने उठा लिया। जैसे-जैसे चलता गया, उसे सोना मिलता गया और वह बोरी मे भरता हुआ चलता गया। बोरी का वजन बढता चला गया और अब उसका चलना मुश्किल होने लगा। उसकी साँस भी फूलने लगी। उसका एक-एक कदम बढ़ाना कठिन होने लगा।
          दूसरे भक्त को रास्ते में जो भी मिलता, उसे बोरी में से खाने का कुछ समान दे देता। धीरे-धीरे बोरी का वजन कम होता गया और उसका चलना आसान होता गया। जो बाँटता गया उसका मंजिल तक पहुँचना आसान हो गया और जो इकट्ठा करता रहा, उसने अतिभार के कारण रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
           कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जो मनुष्य आयुपर्यन्त दूसरों को बाँटता रहता है, अन्तकाल तक पहुँचते-पहुॅंचते वह हल्का हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों के दुख-दर्द, परेशानियों को बाँटने, निस्वार्थ परोपकार करने वाले मनुष्य को यात्रा पूरी करने तक सन्तुष्टि मिलती है, वह प्रसन्न रहता है। अपने शुभकर्मों के कारण उसके पापकर्मों की गठरी नहीं बनती। उसे इहलोक और परलोक हर स्थान पर पुण्यों के सुख का अहसास होता है।
          इसके विपरीत अपनी स्वार्थ वृत्ति के कारण जो मनुष्य दूसरों को कष्ट देते हैं, ऐसे अत्याचार करने वालों के दुष्कर्मों की गठरी भारी होती जाती है, उसे उठाकर चलना उनके लिए कठिन हो जाता है। जीव उस बोझ को सम्हाल नहीं पाता। फिर भी जन्म- जन्मान्तरों तक उसे वह गठरी उठाकर चलना पड़ता है जो बहुत कष्टदायी होता है।
          मनन करने पर यह पता चलता है कि हमने सारे जीवन में क्या बाँटा? क्या इकट्ठा किया? हम मंजिल तक कैसे पहुँच सकेंगे?
          हमारे जीवन का कड़वी सच्चाई यही है कि 60 साल की आयु के बाद कोई बैंक बैलेन्स के विषय में नहीं पूछता है और न ही मँहगी गाड़ियों के बारे में जानना चाहता है। मिलने वाले सभी लोग उससे उसके स्वास्थ्य और बच्चों के बारे में ही जानकारी लेना चाहते हैं।
        जीवन के अन्तिम दौर में धन-समृद्धि अथवा गाड़ियाँ सुविधा दे सकती हैं परन्तु वृद्धावस्था के कष्टों को कदापि दूर नहीं कर सकती। उस समय मनुष्य यही प्रार्थना करता है कि बेशक उसकी धन-दौलत ले लो पर उसके बदले सुकून के दो पल दे दो। समय रहते मनुष्य को सावधान हो जाना चाहिए।
        'अथर्ववेद' का कथन है-  
        शतहस्तं समाहार सहस्त्र हस्त संकिर:।
अर्थात्  सैंकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से सद्कार्यों में खर्च करो। यानी यह मन्त्रॉंश कठोर परिश्रम करने, प्रचुर धन कमाने और फिर उसे समाज की भलाई के लिए उदारतापूर्वक व्यय करने का सन्देश देता है। 
           सार रूप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य की वास्तविक कमाई वही है जिसे वह निस्वार्थ रहकर समाज की भलाई के‌ लिए खर्च करता है। यही पुण्य कर्म उसके साथ-साथ अगले जन्मों में भी जाते हैं। इन पुण्यों का भोग वह इहलोक और परलोक दोनों में करता है।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 15 जून 2026

अध्यापक का कार्य

अध्यापक का कार्य

शिक्षक अथवा अध्यापक का कार्य अपने विद्यार्थियों को सुसंस्कारित करना होता है। ताकि वे देश और समाज का गौरव कहला सकें। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समाज के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत करें और अपने उच्च चरित्र का परिचय दें। उसके लिए पहली शर्त है उन शिक्षकों का चरित्रवान होना और उन विद्यार्थियों का आज्ञाकारी होना। शिक्षक को अपने छात्रों को सन्तान तुल्य मानकर एक पिता के समान उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। यदि वह ऐसा करने मे असमर्थ रहता है तो वह इस गौरवशाली पद के कदापि योग्य नहीं है।
          एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को जीवन में सफलता के सोपानों पर चढ़ते देखता है तो उसे वैसी ही प्रसन्नता मिलती है जैसी उस बच्चे के माता-पिता को। वह  स्वयं तो अपने उसी स्थान पर मील के पत्थर की तरह खड़ा रहता है परन्तु अपने छात्रों को ऊँचाइयों पर पहुँचाने का कार्य बखूबी निभाता है। जिस प्रकार सड़क अपने स्थान पर स्थित रहकर यात्रियों को उनके गन्तव्य, उनकी मंजिल तक पहुँचा ही देती है। इसीलिए शिक्षक को भगवान का दर्जा दिया जाता है।
            हमारी भारतीय सभ्यता ने गुरु और शिष्य दोनों को जहाँ संस्कार दिए हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें मर्यादाओं में भी बाँधा है। एक ओर जहाँ छात्रों को सिखाया कि अपने गुरु का सम्मान ईश्वर की तरह करो तो वहीं दूसरी ओर गुरु को भी शिक्षित किया कि अपने सभी शिष्यों के साथ समानता का व्यवहार करते हुए उन पर पुत्रवत् स्नेह रखे। उसके पास जो भी ज्ञान है, उसे अपने छात्रों में बाँट देने में हिचकिचाए नहीं। माता-पिता जैसे आगे बढ़ते हुए अपने बच्चों पर गर्व करते हैं, उसी प्रकार एक अध्यापक को भी अपने छात्रों को उन्नति करते हुए देखकर गौरवान्वित होना चाहिए। उनसे स्पर्धा अथवा ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए।
          यद्यपि आज इस भौतिक युग में कुछ अध्यापक दुराचरण में लिप्त होकर इस पद की गरिमा को ठेस पहुँचा रहे हैं। कुछेक ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी अन्जाम दे दिया है। छात्रों के साथ मारपीट व दुर्व्यवहार की घटनाएँ भी यदा कदा सुनने को मिल जाती हैं। उन मुट्ठी भर लोगों के कारण इस गौरवशाली गुरु-शिष्य परम्परा को कलंकित करके कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। अध्यापक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने सभी छात्रों के साथ समान रूप से व्यवहार करे। किसी बच्चे के माता-पिता के पद या धन-वैभव से प्रभावित होकर उस तथाकथित छात्र के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया नहीं अपनाना चाहिए।
        आजकल प्राइवेट सेक्टर की स्वार्थी प्रकृति और महत्त्वाकाँक्षा के कारण इस शिक्षक वर्ग का बहुत ही शोषण हो रहा है। जिसके कारण कम तनख्वाह पर भी काम करना उनकी मजबूरी बनती जा रही है। इसलिए अपना व परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें प्राइवेट ट्यूशन का सहारा भी लेना पड़ रहा है। कक्षा में वे लोग कैसा भी पढ़ाऍं, उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। उनका ट्यूशन का धन्धा अच्छा चलना चाहिए। शिक्षा के इस पावन क्षेत्र में यद्यपि नई पीढ़ी की कोई रुचि नहीं है। वे शिक्षक बनने के स्थान पर दफ्तरों में अधिक वेतन पर कार्य करना चाहते हैं। अतः यहाँ इस क्षेत्र में गुणवत्ता की कमी बहुत अखरती है।
            कुछ सरकारी नीतियों के चलते अभी तक साक्षरता दर का आँकड़ा अपेक्षाकृत कम है। देश में निरक्षर लोग अभी भी बहुत बड़ी संख्या में हैं। पूरे देश में लाखों विद्यालय आज भी बिना अध्यापक के चल रहे हैं अथवा उनकी संख्या नगण्य है। इस इक्कीसवीं सदी में आज भी हमारे देश में लाखों बच्चे ऐसे मिल जाएँगे जिन्होंने दुर्भाग्यवश कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। उन बच्चों के भविष्य के विषय में भी अध्यापकों को आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
          जमीनी सच्चाई तो यही है कि एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को सदा ही अपना बेस्ट यानी सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करता है। अपने मार्गदर्शन से उसके भावी कैरियर को बनाने में यथासम्भव प्रयास करता है। दूसरी ओर बहुत से अध्यापक ऐसे भी हैं जिन्हें महीने के आखिर में आने वाली बस अपनी तनख्वाह से मतलब होता है। वे अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकों को पढ़कर अथवा समाचारपत्र को पढ़कर अपने ज्ञान की वृद्धि नहीं करना चाहते। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे कूपमण्डूक की तरह बनकर रह जाते हैं।
          सब विपरीत स्थितियों के चलते हुए भी शिक्षक वर्ग को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। उसे अपने ज्ञान का समुचित उपयोग करना ही चाहिए और समय-समय पर उसे स्वयं को अपग्रेड भी करना होगा। जिससे अपने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में उनकी भूमिका पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह महत्त्वपूर्ण रहे। वे अपने छात्रों के जीवन में एक मील के पत्थर की तरह सिद्ध हो सकें।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 14 जून 2026

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार

सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार 

महान भारतीय संस्कृति की सामाजिक व्यवस्था का आधार परिवार है। परिवार समाज की सबसे छोटी, प्राथमिक और मूलभूत इकाई है। यह सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तम्भ है। यह न केवल बच्चों का समाजीकरण और पालन-पोषण करता है बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित करता है। इससे सामाजिक स्थिरता, अनुशासन और भावात्मक सुरक्षा बनी रहती है। 
        भारतीय परम्परा में परिवार को एक सामाजिक संरचना की धुरी माना जाता है। संयुक्त परिवार की व्यवस्था ने पारम्परिक रूप से आर्थिक सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा दिया है। वर्तमान समय में किसी भी कारण से एकल परिवार का चलन बढ़ गया है। फिर भी परिवार के आधारभूत कार्यों में कोई अन्तर नहीं होता। ये व्यक्ति और समाज को जोड़ने का कार्य बखूबी करता है। 
           परिवार बच्चे पहली पाठशाला होती है जहाँ वह सामाजिक व्यवहार, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्य और परम्पराओं के विषय में जानकारी प्राप्त करता है। परिवार अपनी विरासत, भाषा और संस्कृति को जीवित रखता है। यह अपने सदस्यों को सुरक्षा, प्यार और आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है जो व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक होता है।
          परिवार को एकसूत्र में बाँधकर रखना एक कुशल गृहिणी बखूबी जानती और समझती है। घर को स्वर्ग बनाने के लिए एक स्त्री अकेले ही समर्थ है, उसे किसी अन्य सहारे की आवश्यकता नहीं होती। वह सदा अपनी सूझबूझ से घर-गृहस्थी की समस्याओं का निदान करके परिवार में समरसता का माहौल बना सकती है।
          इसीलिए ऐसी व्यवहार कुशल गृहिणी की प्रशस्ति में शास्त्रों में बहुत कुछ कहा गया है। 'गृहिणी गृहमुच्यते' अर्थात् गृहिणी ही घर है कहकर उसके महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। पुरुष से भी अधिक मान उसे इसीलिए दिया गया कि वह परिवार का केन्द्रबिन्दु यानी धुरी होती है। सबको यथोचित सम्मान देना, सबके साथ वर्तना या व्यवहार करने में उसका कोई सानी नहीं होता। वह अतिथियों और देवों का यथोचित सम्मान करके अपने घर-परिवार को सुरभित करती है। ऐसे घरों में ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा सदा ही होती रहती है।
        कहते हैं कि एक माला बनाने के लिए बहुत से मनकों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एक आरती को सजाने के लिए भी अनेक दीपक चाहिए होते हैं। एक खाली समुद्र को भरने के लिए हजारों बूँद जल की आवश्यकता होती है। परन्तु इन सबसे बढ़कर कठिन कार्य यानी घर को संचालित करने का कार्य एक स्त्री बहुत ही खूबसूरती से निभा लेती है। यहाँ अनेक की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
          ओशो रजनीश ने अपनी पुस्तक 'शिक्षा में क्रान्ति' में लिखा है कि ‘स्त्री के जीवन में यदि कोई चीज सक्रिय हो जाती है तो एक परिवार के प्राणों में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। एक स्त्री को बदल लेना पचास पुरुषों को बदलने के बराबर होता है। इतनी बड़ी शक्ति जिनके  हाथ में हो, इतनी बड़ी सामर्थ्य जिनके हाथ मे हो, अगर जीवन के लिए कुछ भी नहीं करती तो निश्चित ही अपराधी है।’ 
          इस कथन का वास्तव में यही अर्थ है कि यदि स्त्री अपनी शक्ति को विस्मृत करती है और अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं करती तो वह बहुत बड़ा अपराध करती है। उसके कन्धों पर घर-परिवार का महान् दायित्व है। 
          संस्कार देकर वह भावी पीढ़ियों का निर्माण करती है जो राष्ट्र की धरोहर हैं। यदि हमारा युवावर्ग उच्छ्रँखल और दिशाहीन होगा तो उसका दोष घर की स्त्री का होता है। यदि नींव ही कमजोर रह जाएगी तो निर्माण कार्य ठीक से नहीं होगा। इसी प्रकार यदि नव पीढ़ी को संस्कार नहीं दिए गए तो देश, धर्म और समाज की रक्षा नहीं हो सकेगी। एवंविध इसके दूरगामी परिणाम हम सबको भुगतने पड़ेंगे।
            संस्कृत भाषा और हिन्दी भाषा में पवित्र विवाह सम्बन्ध का विच्छेद करने के लिए कोई शब्द नहीं है। विवाहोपरान्त अपने जीवन साथी का त्याग करने के लिए पहला Divorce शब्द अंग्रेजी भाषा में है जिसे ईसाई धर्मानुयायियों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। दूसरा 'तलाक' शब्द उर्दू भाषा में इस्लाम मतावलम्बियों द्वारा प्रयोग किया जाता है।
            हमारी महान् भारतीय हिन्दू सभ्यता में ऐसी परिकल्पना ही नहीं की गई कि विवाह के पश्चात दोनों जीवन साथियों में अलगाव हो। यहाँ यह पवित्र बन्धन सात जन्मों के लिए माना जाता है। हमारा धर्म केवल एक होना या जोड़ना सिखाता है अलग करना नहीं। 
          भारतीय वैवाहिक संस्था विवाह के समय सप्तपदी के समय एक-दूसरे को दिए गए वचनों को निभाने पर बल देता है। पति-पत्नी दोनों का यह बराबर का दायित्व बनता है कि वे अपने पूर्वाग्रहों और झूठे अहं का त्याग करके सामंजस्यपूर्वक अपनी गृहस्थी की गाड़ी को बाधारहित चलाएँ और आदर्श स्थापित करें।
चन्द्र प्रभा सूद

शुक्रवार, 12 जून 2026

आत्मा परमात्मा का अंश

आत्मा परमात्मा का अंश

हर मनुष्य में परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में विद्यमान होता है। यहाँ समझने वाली बात यह है कि जब उसमें ईश्वर का अंश है तो वह ईश्वर स्वरूप ही होगा। बस उसे अपने अन्तस् में विद्यमान इस ईश्वरीय शक्ति को पहचानना होता है। भारतीय वेदान्त दर्शन के अनुसार आत्मा परमात्मा का अंश या प्रतिबिम्ब है। अद्वैत सिद्धान्त का मानना है कि आत्मा और परमात्मा वास्तव में एक ही हैं। माया यानी अज्ञान के कारण वे अलग प्रतीत होते हैं।
          यहॉं समुद्र और उसकी लहरों की बात करते हैं। जिस प्रकार समुद्र की हर लहर पानी ही होती है, उसी प्रकार हर जीव में निवास करने वाली यह आत्मा निरावरण होकर परमात्मा का ही रूप होती है। आत्मा परमात्मा का आंशिक ज्ञान है जो ज्ञान प्राप्त होने पर ईश्वरमय हो जाती है।
        आत्मा सर्वोच्च सत्ता का ही एक सूक्ष्म रूप है। मनुष्य अज्ञानतावश स्वयं को शरीर मान लेता है। परमात्मा और आत्मा को हम‌ सूर्य और उसकी किरण के समान मान सकते हैं। किरण सूर्य का ही अंश होती है परन्तु पूर्ण सूर्य नहीं होती। जीवात्मा शरीर और कर्मों से बॅंधी होती है जबकि परमात्मा मुक्त और सर्वव्यापी होता है। ज्ञान और योग के द्वारा आत्मा कका परमात्मा में लीन होना ही मोक्ष कहलाता है। मोक्ष प्राप्त करने के उपरान्त निश्चित समय तक जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।
          जब मनुष्य का जन्म इस धरा पर होता है तो उसे पृथ्वी पर अवतरित होना कहा जाता है। उसका यह अवतार रूप उसे ब्रह्माण्ड के अन्य सभी जीवों से अलग करता है। अवतार लेने के बाद उसे अपने चरित्र से दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। वह महापुरुषों के समान देवता भी बन सकता है और आतंकवादियों की भाँति दानव भी। वह मर्यादा पुरुषोततम राम भी बन सकता है और अहंकारी रावण भी। इसी प्रकार अपने जीवन के लिए मानक उसे स्वयं तय करने होंगे।
          जब मनुष्य एक इन्सान के स्थान पर ईश्वर के रूप में अपना जीवन जीना प्रारम्भ करेगा तब इस संसार में और उसके इस जीवन में कोई उथल-पुथल नहीं होगी। वह शान्त व संयमी जीवन जी पाएगा। तब किसी जीव अथवा किसी पदार्थ की अवस्था और गतिविधि में भी कोई बदलाव नहीं आएगा। इन्सानी गुणों, क्षमताओं और कार्यों में कोई कतर-ब्यौंत नहीं होगी। जब मनुष्य अपने भीतर स्वयं ही ईश्वरीय गुणों को समझने लगेगा तब केवल एक चीज बदलेगी, वह है उसका दृष्टिकोण या नजरिया। उसके बदलते ही मनुष्य का जीवन सहज, सरल, निष्कपट हो जाएगा, वहाँ ईर्ष्या-द्वेष, मारकाट, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति आदि आसुरी भावनाएँ दूर हो जाएँगी। ईश्वर तथा इन्सान के रूप में अपनी दोहरी भूमिका को मनुष्य बिना किसी कष्ट के आसानी से निभा सकेगा।
           मनुष्य के मन में ईश्वर का वास होता है। इसीलिए मनीषी जन मन को मन्दिर बनाने पर बल देते हैं। जब हमारा मन मन्दिर बन जाएगा तब हमारा घर स्वयं ही तीर्थस्थल कहलाएगा। उस घर में रहने वाले स्वर्ग के समान शान्ति का अनुभव करेंगे। उस घर के पास से गुजरने वालों को भी सुगन्धित बयार का झौंका प्रफुल्लित करेगा।
            ईश्वर तीर्थों, जंगलों, पर्वतों की गुफाओं में भटकने से नहीं मिलता बल्कि अपने घर में रहकर सांसारिक दायित्वों को निभाते हुए मिलता है। दुनिया के दुख-कष्टों से भागकर भगवा चोला पहनने वाले भगोड़ों अथवा तथाकथित गुरुओं को तो वह कदापि नहीं मिलता।
          गुरुडम फैलाने वाले तथाकथित गुरु सवालों-जबावों के चक्कर में अपने अनुयायियों को उलझाए रखते हैं। ये गुरु अलग-अलग सवालों के अलग-अलग उत्तर बताते हैं लेकिन सारे सवालों को हल करने का एक सूत्र कभी नहीं बता सकते। यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी रोजी-रोटी कैसे चलेगी? वे तो बस भ्रमजाल फैलाए रखना चाहते हैं। दूसरों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले धन-सम्पत्तियों का संग्रह करते रहते हैं। अपने चरित्रों से अनुयायियों को प्रभावित नहीं कर पाते। इसलिए अपने वजूद को बचाने के लिए वे संघर्ष करते रहते हैं। 
          मनुष्य को स्वयं ही अपनी खोज करनी होगी कि वह ईश्वर तुल्य आचरण किस प्रकार कर सकता है? अपने अतस् में ईश्वरीय गुणों को प्रकाशित करने लिए उसे सबसे पहले स्वयं संयमित आचरण करना होगा। फिर अपने अन्तस् में ध्यान लगाकर  ईश्वर रूपी प्रकाश को पाने का यत्न करना होगा। इस सम्पूर्ण साधना के लिए ईश्वर की आराधना और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करना उसके लिए बहुत आवश्यक होता है।
          यदि मनुष्य केवल सच्चाई और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहण करता हुआ ईश्वरीय शक्ति को अपने अन्तस् में अनुभव करने लगेगा तब वह उस प्रभु के गुणों अपने भीतर महसूस कर सकता है। विचारों की शुद्धता और सच्चरित्रता से ईश्वरत्व के गुण मनुष्य में स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

गुरुवार, 11 जून 2026

जीवन नदी की तरह

जीवन नदी की तरह

मनुष्य का जीवन नदी की तरह निरन्तर प्रवाहमान है। गत्यात्मकता ही उसकी जीवनदायिनी शक्ति है। जब कभी उसकी यह गति बाधित होने लगती है तभी सारी समस्याओं का जन्म होता है। जैसे नदी की गति चट्टानों के आ जाने से सहज नहीं रह पाती उसी प्रकार मानव जीवन में दुखों और परेशानियों के आ जाने से रुकावट होने लगती है।
         जीवन नदी की तरह है जो लगातार बहती रहती है, कभी शान्त तो कभी उतार-चढ़ाव यानी दुख-सुख के साथ। जैसे नदी अपनी मंजिल समुद्र की ओर बिना रुके चलती है, वैसे ही जीवन भी समय के साथ आगे बढ़ता है। यह निरन्तर प्रवाह, परिवर्तन और संघर्ष के बीच आगे बढ़ने का सन्देश देता है जहाँ बाधाओं रूपी पत्थर नदी के वेग को बढ़ाती हैं। 
          जीवन यात्रा की तुलना नदी से की जाती है। इसका कारण है कि नदी की तरह जीवन कभी नहीं रुकता, यह लगातार बदलता रहता है। जीवन में सुख-दुख, आशा-निराशा नदी की लहरों की तरह आते-जाते रहते हैं। नदी की तरह इन्सान को भी हर परिस्थिति में ढलना और आगे बढ़ना सीखना चाहिए। जैसे नदी का अन्तिम लक्ष्य समुद्र है, वैसे ही जीवन का लक्ष्य मोक्ष तक की उद्देश्यपूर्ण यात्रा है। जीवन के अनुभव नदी में पत्थरों के साथ संघर्ष की तरह इन्सान को समय-समय पर अधिक निखारते हैं और गहरा बनाते हैं। 
          रुके हुए शान्त जल में कंकड़ मारने से उसमें हलचल होने लगती है और कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई देता। उसी प्रकार जब जीवन में ठहराव आता है और उस समय उसमें दुख या परेशानी का कंकर फैंका जाता है तो जीवन में भी उथल-पुथल होने लगती है। जीवन की आशाएँ निराशा में बदल जाती हैं। निराशाजनक स्थिति में भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगता है। कोई रास्ता नहीं सूझता। इन्सान केवल बेबस होकर रह जाता है और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
        समय बीतने पर सारी परेशानियाँ स्वयं ही दूर होने लगती हैं। तब जीवन में आनन्द और उल्लास फिर से लौट आता है। इन्हीं विचारों को महात्मा बुद्ध के जीवन में घटी इस घटना के माध्यम से समझते हैं। यह कथा फेसबुक पर किसी मित्र ने पोस्ट की थी। मुझे बहुत प्रेरणादायक प्रतीत हुई। इसलिए मैंने इसे अपने आलेख लिखने क प्रयास किया है।
           महात्मा बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ बौद्ध धर्म का प्रचार करते हुए भ्रमण कर रहे थे। एक गाँव में घूमते हुए उन्हें काफी देर हो गयी और उन्हें बहुत प्यास लगी। उन्होनें अपने एक शिष्य को पानी लाने का आदेश दिया। शिष्य पानी लेने गया तो उसने देखा कि नदी में कुछ लोग कपड़े धो रहे थे, कुछ लोग नहा रहे थे और नदी का पानी काफी गन्दा दिखाई दे रहा था।
            शिष्य ने ऐसा गन्दा पानी ले जाना उचित नहीं समझा और वापिस आ गया। महात्मा बुद्ध ने फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा। कुछ देर बाद वह शिष्य पानी लेकर लौटा। महात्मा जी  ने शिष्य से पूछा कि नदी का पानी तो गन्दा था फिर तुम साफ पानी कैसे लेकर आए। शिष्य बोला कि नदी का पानी तो वास्तव में गन्दा था। लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इन्तजार किया और जब मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी ऊपर आ गया तब मैं शुद्ध पानी लेकर आया।
           यह सुनकर महात्मा बुद्ध बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने शिष्यों को यह शिक्षा दी कि हमारा यह जीवन भी पानी की तरह है। जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है। जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आती हैं जिससे जीवन रूपी पानी गन्दा लगने लगता है। 
            कुछ लोग पहले शिष्य की तरह मुसीबत को देखकर घबरा जाते हैं और वापिस लौट जाते हैं। ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते और उन्नति नहीं कर सकते। वहीं दूसरी ओर कुछ धैर्यशील लोग किसी भी परिस्थिति में व्याकुल नहीं होते। समय बीतने पर गन्दगी रूपी सभी समस्याएँ और दुख स्वयं ही समाप्त हो जाते है।
            यह कहानी हमें समझाती है कि समस्याएँ और दुख कुछ समय के पश्चात स्वयं ही समाप्त हो जाते है। समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गन्दा कर सकती है। यदि धैर्य से काम लिया जाए तो दुख और कष्ट खुद ही कुछ समय बाद साथ छोड़ देते है। फिर निर्मल जल में आईने की तरह सब कुछ साफ-साफ दिखाई देने लगता है।
          सार रूप में हम कह सकते हैं कि जीवन को एक नदी की तरह मानकर, इसकी गति को स्वीकार करना और हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है। मनुष्य को घबराकर हाथ-पैर नहीं छोड़ देने चाहिए। समय सदा एक-सा नहीं रहता। अपनी विपरीत परिस्थितियों के समय मनुष्य को कुमार्गगामी न बनकर ईश्वर की उपासना, सज्जनों की संगति और सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हुए सही समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। 
चन्द्र प्रभा सूद

बुधवार, 10 जून 2026

समय बहुत मूल्यवान

समय बहुत मूल्यवान

समय बहुत ही मूल्यवान होता है। एक बार जो समय बीत जाता है, वह लौटकर नहीं आता। समय का मूल्य पहचानते हुए मनुष्य को इसकी कद्र करनी चाहिए। जो लोग समय की कीमत नहीं पहचानते उन्हें बाद में सिर धुनकर पछताना पड़ता है। इसे व्यर्थ गॅंवाने वाले व्यक्ति समय की रेस में पिछड़े जाते हैं। उन्हें उसका मूल्य चुकाते समय बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
          संस्कृत भाषा के महाकवि कालिदास विरचित 'रघुवंशम्' महाकाव्य से निम्न श्लोकांश उद्धृत है जो समय के महत्व और सही प्रबन्धन की सफलता पर जोर देती है। कवि ने हमें समझाने का प्रयास किया है कि- 
          काले खलु समारब्धा नीतय: फलन्ति।
अर्थात् यथासमय आरम्भ की गई नीतियाँ ही सदा फलदायी होती हैं। 
          कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी नीति या योजना की सफलता केवल योजना बनाने पर निर्भर नहीं करती बल्कि उसे सही समय पर लागू करने पर निर्भर करती है। यदि कार्य सही समय किया जाए तो सफलता सुनिश्चित होती है। समय बीत जाने के बाद लकीर पीटते रहने का कोई लाभ नहीं होता। वे नीतियाँ हमारे लिए अनुपयोगी होकर मात्र कागजों में कैद होकर रह जाती हैं। चाहकर भी वे हमारे लिए कुछ नहीं कर सकती।
         न जाने विश्व की कितनी ही महान संस्कृतियाँ इस काल के गाल में समा गई हैं जिनके बारे में आज शायद ही कोई जान पाता होगा। इसी प्रकार बड़े-बड़े साम्राज्यों को भी समय ने सम्हलने के लिए मोहलत नहीं दी। फिर हम लोग किस खेत की मूली हैं? जो समय हमारे साथ ही सहानुभूति रखेगा। इसीलिए मनुष्य को समय का मूल्य पहचानकर उसके अनुसार कार्य करना चाहिए।
          समय पलक झपकते ही एक राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा। यह वक्त नूर को भी बेनूर बना देता है और बेनूर को नूर दे देता है। समय कोयले को भी कोहिनूर बना देता है। मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं- 
        वक्त बलवान तो गधा पहलवान।
यानी मनुष्य का समय यदि अनुकूल हो तो मूर्खों की भी पौ बारह हो जाती है। अन्यथा यह समय बड़े-बड़े पहलवानों को भी पटखनी दे देता है। अर्थात् इन्सान देखता रह जाता है और यह समय चुटकियों में उन्हें मसलकर रख देता है।
           हर मनुष्य को जिन्दगी बदलने के लिए एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस मौके का लाभ उठा लेते हैं, वे समाज के सफल व्यक्तियों में गिने जाते हैं। जो लोग मिले हुए अवसर को गँवा देते हैं वे सारी उम्र अच्छे समय के आने की प्रतीक्षा करते रहते हैं पर उनका मनचाहा पुनः उन्हें कभी नहीं मिल पाता। यदि मिलता है तो लम्बा इन्तजार। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें समय बदलने के लिए जिन्दगी दोबारा नहीं मिल सकती। यदि समझदारी से वक्त को पहचान करके मनुष्य अपनी योजनाओं को क्रियान्वित कर सके तो उसे ऊँचाइयाँ छूने से कोई नहीं रोक सकता।
           इसके विपरीत समय को किसी भी कारण से अथवा आलस्यवश गँवाने वाले रेस में पिछड़कर नाकामयाबी का तमगा अपने माथे पर लगाकर घूमते हैं। सयाने प्रायः निम्न उक्ति कहते हैं - 
            का वर्षा या कृषि सुखाने
अर्थात् उस वर्षा का क्या लाभ? जब खेती सूख गई तब हो जाए।
           इसका यही अर्थ है कि जुते हुए खेत वर्षा के अभाव में सूख गए, वहाँ अब खेती नहीं हो सकती और आकाल पड़ना निश्चित हो गया है। यदि उस समय  छमाछम करती मूसलाधार बारिश हो भी जाए तो सब व्यर्थ है। जो जान-माल का नुकसान होना था, सो तो हो गया।
         समय पर वृक्ष फल देते हैं, माली चाहे सैंकड़ों घड़े पानी क्यों न डाल दे। एक छोटा बच्चा जिसने अभी विद्यालय में प्रवेश लिया है, वह अपनी चौदह वर्ष की अवधि के बाद ही स्कूल की पढ़ाई करके वहाँ से बाहर निकलेगा। उसके बाद उच्च शिक्षा, फिर नौकरी या व्यापार और तब शादी करके अपने जीवन को व्यवस्थित करता है।
          सारे जीवन का आधार निश्चित ही समयावधि की गणना है। इतने वर्ष पश्चात एल. आई. सी. या एफ. डी. परिपक्व हो जाएगी, हम अपना घर बना लेंगे, बच्चों की शादियाँ करके हम फ्री हो जाएँगे, मकान या गाड़ी का लोन चुक जाएगा, रिटायर हो जाएँगे आदि। इसी तरह मनुष्य का सारा जीवन समय की गणना करते हुए बीत जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
          इसीलिए हमारे मनीषी समय के महत्त्व को पहचानने पर बल देते हैं। इस वक्त को अपनी मुट्ठी में कोई भी कैद नहीं कर सकता। यह रेत पर पड़ी मछली की तरह मनुष्य के हाथ से फिसल जाता है। यदि इसकी कद्र की जाए तो यह मनुष्य को आसमान छूने में सहायक बनता है और इसे बर्बाद करने वालो को मसलकर रख देता है।
चन्द्र प्रभा सूद

मंगलवार, 9 जून 2026

शरीर अनमोल खजाना

शरीर अनमोल खजाना

हमारा यह शरीर बहुत ही अनमोल खजाना है। इसकी हम कद्र नहीं करते और न ही उस ईश्वर का धन्यवाद करते हैं जिसने हमें यह अमूल्य रत्न दिया है। यह वह शरीर है जिस पर मनुष्य इतराता फिरता है। इसे सजाने-संवारने के लिए अनेक यत्न करता रहता है। मेडिकल की भाषा में यदि इस शरीर के एक-एक अंग का मूल्य लगाने लगें तो हम स्वयं ही आश्चर्यचकित हो जाएँगे। इसका कारण है कि यह वह मूल्य होगा जिसकी हम कल्पना हम स्वप्न में भी नहीं कर सकते।
             इस शरीर में विद्यमान मस्तिष्क, आँखें, हाथ, पैर, हृदय, किडनी, गाल ब्लेडर, लीवर, घुटने आदि जितने भी अंग हैं, यदि अकेले-अकेले उन सबका मूल्य चिकित्सक की दृष्टि से लगाया जाए तो करोड़ों-अरबों रुपए होगा। इसी प्रकार इनके अस्वस्थ हो जाने की स्थिति में एक-एक अंग पर लाखों रूपए खर्च हो जाते हैं। इस शरीर में सीमित मात्रा में धातुऍं भी विद्यमान हैं।
          इतना सब जानते-समझते हुए और अपने आसपास देखते हुए भी हम ईश्वर प्रदत्त अपने इस खजाने से सदा अनजान बने रहते हैं। जब भी मौका मिलता है, बिना सोचे-समझे उस मालिक पर दोष लगाते हैं कि उसने हमें दिया क्या है? हम उस परम न्यायकारी मालिक पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकते।
          हमारी अवस्था वास्तव में एक भिखारी जैसी है जो किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट नहीं रह सकता। उसे यदि सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात या राजपाट सब दे दिया जाए परन्तु फिर भी उसे सन्तोष नहीं मिलता। उसे तो बस गन्दी नाली में गिरा हुआ, भिक्षा में पहले मिला हुआ ताँबे का सिक्का ही चाहिए होता है।
          इसी आशय को यह कथा स्पष्ट करती है। एक राजा का जन्मदिन था। उसने सोचा, "सवेरे उठते ही जो व्यक्ति सबसे पहले उसे मिलेगा, उसे वह खुश कर देगा।"
          प्रातः उठने के पश्चात सबसे पहले उसे एक भिखारी दिखाई दिया। राजा ने उस भिखारी को बुलाया और कहा, "यह लो ताँबे का एक सिक्का।"   
          यह क्या? तॉंबे का वह सिक्का भिखारी के हाथ सें छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी परेशान हो गया और नाली में हाथ डालकर ताँबे का वह सिक्का ढूँढने लगा। 
         राजा ने उसे बुलाकर कहा, "यह लो ताँबे का दूसरा सिक्का और नाली में हाथ मत डालो।"
           भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा हुआ वह सिक्का ढूँढने लगा। 
          राजा को ऐसा लगा, "यह भिखारी बहुत ही गरीब है। इसलिए नाली से तॉंबे का गिरा हुआ सिक्का निकाल रहा है।" 
        उसने भिखारी को फिर बुलाया, "उसे एक चाँदी का सिक्का दे दिया।"
          उस समय भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुए चाँदी का अपनी जेब में सिक्का रख लिया और फिर नाली में ताँबे वाला सिक्का ढूँढने लगा। राजा ने उसे फिर बुलाकर, उसकी हालत देखकर एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढाने लगा। 
        राजा को बहुत ही बुरा लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को उसे आज खुश एवं सन्तुष्ट करना है। उसने भिखारी को फिर बुलाया और कहा, "मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ। अब तो खुश और सन्तुष्ट हो जाओ तुम।"
           भिखारी ने कहा, "वह खुश और सन्तुष्ट तभी हो सकेगा, जब नाली में गिरा हुआ ताँबे का वह सिक्का भी उसे मिल जाएगा।"
           हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। आधा राजपाट, सोने-चाँदी के सिक्कों के मिल जाने के बाद भी वह गन्दी नाली में हाथ डालने से बाज नहीं आ रहा। हमें परमात्मा ने मानव शरीर रूपी यह अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में से ताँबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं।
            इस अनमोल मानव जीवन रूपी उपहार के लिए उस प्रभु का कोटि-कोटि धन्यवाद हमें करते रहना चाहिए। यदि इस शरीर का एक भी अंग किसी कारण से भंग हो जाए अथवा ठीक से अपना कार्य न कर सके तो हमारा यह जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। उसके द्वारा दिए गए इस बेशकीमती खजाने का यदि हम उचित प्रकार से इस्तेमाल कर सकें, तभी हमारा यह जीवन धन्य हो सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद

सोमवार, 8 जून 2026

सोच के अनुसार संसार

सोच के अनुसार संसार 

मनुष्य जैसी सोच रखता है, उसे यह सृष्टि वैसी ही दिखाई देती है। सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति को सारी सृष्टि बहुत ही खूबसूरत और मनमोहक प्रतीत होती है। हर ओर अच्छाई देखने के कारण वह हर परिस्थिति में शान्त और प्रसन्न रहता है। वह अपने चारों के वातावरण को अपनी सकारात्मक सोच से महकाता रहता है। उसके पास आने वाला हर व्यक्ति अपने कष्टों को भूलकर प्रसन्नता से भर जाता है।
            इसके विपरीत नकारात्मक सोच वाला मनुष्य अच्छाई में भी बुराई ढूँढ लेता है और सदा कलपता रहता है। उसे अपनी इस सोच के कारण दो पल का भी सुकून जीवन में नहीं मिल पाता। वह स्वयं तो परेशान रहता ही है, अपने बन्धु- बान्धवों को भी चैन नहीं लेने देता। अपने चिड़चिड़े स्वभाव के कारण वह उन्हें बिना किसी मतलब के परेशानियों मे डाल देता है।
          सकारात्मक और नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों के विषय में हम इस कथा से समझते हैं। किसी ऋषि के दो शिष्य थे। उनमें से एक शिष्य की सकारात्मक सोच थी। वह हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचता था और दूसरा नकारात्मक सोच रखता था और स्वभाव से बहुत क्रोधी था। 
            एक दिन महात्मा जी अपने दोनों शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें जंगल में ले गये। जंगल में एक आम का पेड़ था जिस पर बहुत सारे खट्टे और मीठे आम लटके हुए थे। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से  कहा, "उस पेड़ को बहुत ध्यान से देखो"
           तब उन्होंने पहले शिष्य से पूछा, "तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?" 
          शिष्य ने कहा, "यह पेड़ बहुत विनम्र है, लोग इसे पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे उन्हें फल देता है। इंसान को भी इसी तरह होना चाहिए, जीवन में कितनी भी परेशानी क्यों न हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए।"
           फिर उन्होंने दूसरे शिष्य से पूछा, "तुम पेड़ पर क्या देखते हो?" 
          उसने क्रोधित होते हुए कहा, "यह पेड़ बहुत धूर्त है। बिना पत्थर मारे यह कभी फल नहीं देता। यदि इससे फल लेने हैं तो इसे मारना ही पड़ेगा। इसी तरह मनुष्य को भी अपने मतलब की चीज़ें दूसरों से छीनकर ले लेनी चाहिए।"
           गुरु जी ने हंसते हुए पहले शिष्य की प्रशंसा की और दूसरे शिष्य से कहा, "तुम्हें दूसरे शिष्य से सीख लेनी चाहिए। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है। इसके विपरीत नकारात्मक सोच के व्यक्ति सदा अच्छी चीजों मे भी बुराई ही ढूँढते हैं।"
            इसी बात को पुष्ट करने के लिए हम गुलाब के फूल को देखते हैं। गुलाब के फूल को काँटों से घिरा हुआ देखते ही वह नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा, "इस फूल की इतनी खूबसूरती का क्या फायदा? इतना सुन्दर होकर पर भी यह काँटों से घिरा हुआ है। जो भी व्यक्ति इस फूल को तोड़ने का प्रयत्न करेगा, उसे ये दुष्ट काँटे उसे लहुलूहान कर देंगे।"
            इसके विपरीत उसी ही फूल को देखकर सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति कहेगा, "वाह! यह फूल प्रकृति की कितनी सुन्दर रचना है जो इतने काँटों के बीच भी सुरक्षित खिला हुआ है। सबका मन मोह रहा है और चारों ओर अपनी सुगन्ध फैला रहा है।" 
            कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों ही व्यक्तियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार एक ही बात कही ही है लेकिन केवल उनकी दृष्टि और कथनी का अन्त स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। 
           संसार एक दर्पण की तरह है, यदि आप मुस्कुराऍंगे तो संसार भी मुस्कुराता हुआ दिखाई देगा। यदि मनुष्य अच्छे विचारों को अपनाते हैं तो संसार अच्छा लगता है। व्यक्ति अपनी भावनाओं, विश्वासों और विचारों के अनुसार संसार का निर्माण करता है। संसार के विषय में भारतीय दर्शन का मानना हैं -
              संसरति इति संसारः'
 अर्थात् संसार निरन्तर गतिशील या परिवर्तनशील है जहाँ हम जैसा सोचते और कर्म करते हैं, वैसा ही परिणाम भोगते हैं। सकारात्मक सोच से निराशा दूर होती है और संसार अच्छा प्रतीत होता है जबकि नकारात्मक दृष्टिकोण से वही संसार दुखों और समस्याओं का घर लगता है।
            एक व्यक्ति को हरेक मनुष्य में गुण दिखाई देते हैं और दूसरे को उसमें दोष ही दिखाई देते हैं। मनुष्य जितना सरल, निष्कपट और सहृदय होगा उतना ही वह दूसरों की हर कठिनाई को समझ सकेगा और उसे दूर करने का यथासम्भव प्रयास करेगा। परन्तु कठोर हृदम, निर्मम और छिद्रान्वेषी व्यक्ति दूसरों की कमियों को ढूँढकर उनका उपहास करेगा। वह भूल जाता है कि उसके अपने भीतर कमियों का भण्डार है।
           दूसरों की कमियों अथवा गलतियों को सदा अनदेखा करके सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। ऐसे सकारात्मक व्यक्तियों के चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक होती है। नकारात्मक सोच वाले हमेशा मुरझाए से रहते हैँ। अब यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम किस प्रकार के व्यक्ति कहलाना पसन्द करना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 7 जून 2026

परमात्मा को भूल जाना

परमात्मा को भूल जाना 

अपने घर-परिवार और नौकरी-व्यापार आदि के दैनन्दिन दायित्वों को पूरा करने की फिराक में मनुष्य उस परमात्मा को बिल्कुल ही भूल जाता है जिसने उसे इस संसार में भेजा है। एक वही है जो प्रसन्न होकर हम लोगों को झोली भर-भरकर देता है और कभी अहसान नहीं जताता। मनुष्य अपने ऐसे शुभ चिन्तक को स्मरण ही नहीं करता। रोजी-रोटी जुटाने के चक्कर में वह दिन-रात एक कर देता है पर मालिक की याद उसे नहीं आती।
              इस संसार में आने से पूर्व माता के गर्भ में अन्धेरे से घबराकर वह बार-बार मालिक से प्रार्थना करता है कि उसे अन्धकार से मुक्ति देकर उजाले की ओर ले चलो। दुनिया में जाकर वह प्रभु का स्मरण करेगा, उसे पलभर के लिए भी नहीं भूलेगा। इस संसार में आते ही वह यहॉं की चकाचौंध और आकर्षण में इतना खो जाता है कि उसे प्रभु को दिया हुआ अपना वचन भी याद नहीं रहता। वह यही सोचता रहता है कि अभी बहुत आयु पड़ी है, उसका स्मरण कर लूॅंगा। बचपन से जवानी आ जाती है, फिर बुढ़ापा पैर पसारने लगता है और फिर अन्तकाल आ जाता है परन्तु मालिक की उपासना का समय नहीं आ पाता।
             इस जगत से विदा लेते समय मनुष्य दाता से रो-रोकर प्रार्थना करता है कि आगले जन्म में मानव तन देना ताकि इस जन्म में पूरी तरह से जो तेरी भक्ति नहीं कर पाया, तब करूँगा। मैं अपना अगला जीवन पूर्णरूप से तुझे समर्पित करूँगा।पुराना तन पीछे छूट गया और नया चोला भी मनुष्य को मिल गया, अब क्या?  बचपन से बुढ़ापे की ओर तेजी से कदम बढ़ाता जा रहा है पर उस मालिक को याद करना तो फिर से पीछे छूटता जा रहा है। दुनिया के सारे व्यापार अपनी गति से चलते जा रहे हैं पर केवल उसकी भक्ति की गाड़ी अभी तक स्टार्ट ही नहीं हो पाई। वाह रे इन्सान! क्या यही है तेरी वचनबद्धता? 
          इस एक जुबान के भरोसे पर अरबों-खरबों के व्यापार तो मनुष्य कर लेता है किन्तु ईश्वर को दी गई यह जबान क्योंकर हार जाता है, यह आज तक समझ नहीं आ सका। सारी आयु इन्सान सोचता रहता है बड़ा हो जाऊँगा तब प्रभु का भजन करूँगा। सारी आयु बीत जाती है, दुनिया से विदा लेने का समय भी पास आ जाता है परन्तु तब भी हरि भजन की वेला नहीं आती।
          भक्ति के पथ पर चलने के लिए वृद्ध होने का इन्तजार नहीं करना चाहिए। किसी भी आयु में उसका नाम ले सकते हैं। जो सारी उम्र उसका स्मरण नहीं कर पाया, वह निश्चित ही बुढ़ापे में भी ईश्वर को नहीं भज सकेगा। कुछ लोग कहते हैं कि बासी फूल तो प्रतिमा पर भी नहीं चढ़ाए जाते फिर बूढ़ा अशक्त शरीर ईश्वर को कैसे अर्पित किया जा सकता है? इस विषय पर विचार आवश्य करना चाहिए।
          मालिक ने यह मानव तन दिया है। हमें अब मौका मिल गया है कि जिस तन को प्राप्त के लिए अगणित जन्म गँवा दिए हैं, उसे पाने का प्रयास करें। अब भी यदि अनजान बने रहे तब उस प्रभु को किसी भी सूरत में नहीं पा सकेंगे। अगला जन्म मनुष्य का मिलेगा अथवा नहीं मिलेगा, इसका कोई भी भरोसा नहीं है। मनीषी कहते हैं चौरासी लाख योनियों में मनुष्य अपने कृत कर्मों के अनुसार जन्म लेता है। अगले जन्म कहॉं मिलेगा? यह तो ईश्वर ही जानता है, हम मनुष्य नहीं जानते। केवल मनुष्य योनि ही कर्मयोनि है, शेष अन्य योनियॉं भोगयोनियॉं कहलाती हैं।
            ईश्वर की पूजा-अर्चना सच्चे मन से करनी चाहिए। उसमें लेशमात्र भी प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। ईश्वर जो बारम्बार हमें बिनमाँगे झोलियाँ भर-भरकर खजाने देता है, उसे हम क्या दे सकते हैं? उसे केवल श्रद्धा अथवा भावना से की गई भक्ति ही चाहिए और कुछ नहीं। प्रार्थना का ढोंग करना स्वयं को छलना है। ऐसा करके दुनिया से वाहवाही तो लूटी जा सकती है पर उसकी नजर में ऐसी भक्ति का मूल्य शून्य से अधिक कुछ नहीं होता।
             पक्षी एक-एक दाना करके चुगता है और सौ-सौ बार अपना शीश झुकाता है। हम इन्सान क्या उन बेजुबान पक्षियों से भी गए गुजरे हैं कि सौ-सौ नेमते पाकर भी उस मालिक का अहसान नहीं मानते। उसका धन्यवाद करने में भी कंजूसी करते हैं। मनुष्य को इन पक्षियों से कुछ सीख लेनी चाहिए।
           जब तक यह शरीर स्वस्थ है और मृत्यु दूर है, तब तक हरि भजन की ओर ध्यान दे देना चाहिए। हम नहीं नहीं जानते कि भविष्य के गर्भ में  क्या लिखा है? कब हमारी आँखें मुँद जाएँ और एक बार फिर हम रो-रोकर हरि भजन करने के लिए कुछ समय की प्रार्थना करने लगें। उस समय एक अतिरिक्त पल की भी मोहलत नहीं मिलेगी। इसलिए जो कुछ हैं, जीवन के यही अनमोल पल हैं। इनका सदुपयोग उस मालिक को सच्चे मन से सिमरण करने में बिता सकें तो हमारा इहलोक और परलोक दोनों ही संवर जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद