शनिवार, 8 अगस्त 2026

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना में मन रमता नहीं

ईश्वर की उपासना करने का अर्थ है, उसको नित्य प्रति स्मरण करना। मनुष्य किसी भी रूप में चाहे प्रभु की भक्ति कर सकता है। यानी चाहे उसकी साधना साकार रूप में की जाए अथवा निराकार रूप में की जाए। उसे किसी भी नाम से याद किया जा सकता है। यह मनुष्य का कर्त्तव्य है। किसी को उसे यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि इस संसार में भेजने वाले उस मालिक का नाम उसे प्रतिदिन भजना चाहिए।
           समस्या यह है कि इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उस ईश्वर की उपासना करने में मनुष्य का मन रमता ही नहीं है। यह एक मनुष्य की बात नहीं है परन्तु प्रायः सभी लोगों की यही समस्या है। इन्सान केवल ऐशो-आराम में मस्त रहना चाहता है। उसे लगता है कि वह यहॉं पर मौज-मस्ती करने आया है। इसलिए उसका ध्यान उस मालिक की ओर जाता ही नहीं है जिसने उसे इस संसार में मनुष्य के रूप में भेजा है।
        ईश्वर की उपासना करना सबसे कठिन कार्य है। यह मैंने इसलिए कहा कि उसकी भक्ति का प्रदर्शन अधिक होता है जिसका कोई लाभ मनुष्य को नहीं होता। जो लोग सच्चे मन से उसकी उपासना करना चाहते हैं जब उनका मन उस समय दुनिया के कारोबार में भटकने लगता है तो वे परेशान रहते हैं।
          ईश्वर का यदि सच्चे मन से भजन किया जाए तो उसका फल अवश्य मिलता है यानी मनुष्य ईश्वर के करीब हो जाता है। उसका प्रिय बन जाता है। ये मात्र अड़चनें है जो इन्सान को डिगाने के लिए आती हैं। वह प्रभु भी परीक्षा लेता रहता है कि मनुष्य की लगन कितनी सच्ची है, उसमें कितनी ईमानदारी है। निश्चित समय पर और मन से सोचा गया जप मनुष्य को अवश्य करते रहना चाहिए।
          कहते हैं जब राम कथा के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का मन साधुओं के उपदेश के कारण बदल गया तो वे साधना में लीन हो गए। तपस्या करते हुए उनके ऊपर चींटियों ने बाम्बी बना ली थी। इसलिए उन्हें वाल्मीकि कहते हैं।। वे राम नाम के स्थान पर मरा शब्द का जप करते हुए तर गए। उन्हें तब भी इसका फल मिला और वे विश्व विख्यात हुए वे रामकथा लिखकर इस संसार में सदा के लिए अमर हो गए।
            एक बार तुलसीदास से किसी व्यक्ति ने पूछा था, "कभी-कभी भक्ति करने में मन नहीं लगता। फिर भी जप करने बैठ जाते हैं, क्या उसका फल मिलता है?"
      इस प्रश्न के उत्तर में तुलसीदास ने उसे मुस्कुराते हुए कहा था - 
    तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
    भौम पड़ा जा में सभी, उल्टा सीधा बीज।।
अर्थात् जब भूमि में बीज बोए जाते हैं तो यह नहीं पता चलता कि वे उल्टे पड़े हैं या सीधे। पर फिर भी कालान्तर में फसल  तैयार हो जाती है। उसी प्रकार प्रभु के नाम का सुमिरन कैसे भी किया जाए, उसके सुमिरन का फल अवश्य मिलता है।
        यहाँ यह महत्वपूर्ण नहीं कि जप कैसे किया बल्कि इसकी उपयोगिता है कि जप करने का जो नियम बनाया था उसे भार तो नहीं समझ रहे। कहीं मन में यही विचार हावी हो रहा हो कि बेकार ही मुसीबत मोल ले ली। यदि ऐसी भवना मन में कभी आ जाए तो अपने ऊपर किए गए उस प्रभु के उपकारों का स्मरण कर लीजिए। फिर मन स्वयं ही उसकी आराधना करने के लिए नतमस्तक हो जाएगा।
        कुछ समय पूर्व वाट्सअप पर किसी ने भेजा था कि ईश्वर को स्मरण करने के लिए उसे एस. एम.एस. करो। ईश्वर को एस.एम.एस. करने के विषय में लिखे गए ये विचार बहुत ही सुन्दर लगे, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहती हूँ।
         एक बार कोई भक्त ने किसी सन्त के पास गया और उनसे पूछा, 'मुझे आज तक भगवान नहीं मिले, कैसे मिलेंगे बताइए?"
        सन्त बोले, "भगवन तो हर स्थान पर विद्यमान हैं, वह कण-कण में वास करते हैं। इसीलिए उन्हें सर्वव्यापी कहते हैं। तुमने भगवान को एस.एम. एस. नहीं किया होगा। एक बार उन्हें एस.एम. एस. करना शुरू कर दो फिर निस्सन्देह वे स्वयं ही तुम्हें मिल जाएँगे।" 
        भक्त ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते हुए फिर उनसे पूछा, "मैं एस.एम.एस. कहाँ पर करूँ? भगवन का नम्बर तो मेरे पास नहीं है।" 
          सन्त ने कहा, "अच्छा एक बार इसका अर्थ समझ लो। इसके हर शब्द का अर्थ इस प्रकार कर सकते हैं- एस- सच्चे,  एम- मन से,  एस - स्मरण।
अर्थात् सच्चे मन से उसका स्मरण कर तो वह तुरन्त मिल जाता है।"
          इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर को मनुष्य से कुछ भी नहीं चाहिए होता। वह तो बस मनुष्य के भाव को परखता है। उसकी उपासना करने के लिए मनुष्य को सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए, उसका मन चाहे लगे अथवा न लगे। अपने नियम का पालन सच्चे मन से करने का ईमानदार प्रयास करते रहना चाहिए। कभी तो उसकी उपासना में मन लगने लगेगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें