सोमवार, 14 सितंबर 2026

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान

हम भारतीयों के संस्कार में है कि अपनी जन्मभूमि को जन्मदात्री माता से कम नहीं मानते। जन्मभूमि हमारी अपनी ही जन्मदात्री माता की तरह सभी कष्ट सहन करके हमें जीवन की सारी खुशियाँ देती है। हमें स्वर्ग के समान सभी प्रकार के सुख-सुविधा के सारे साधन देती है। 
          स्वर्ग को केवल सुख और ऐश्वर्य का स्थान माना गया है। वहाँ मानवीय सम्वेदनाएँ और अपनापन नहीं होता। इसके विपरीत माता और मातृभूमि हमें जीवन में स्नेह और आत्मीयता देती हैं। इसलिए इनका स्थान समस्त लोकों और स्वर्ग से भी सर्वोच्च माना गया है।
         माँ मनुष्य को नौ महीने तक अपनी कोख में रखती है और अपने रक्त से उसे सींचती है। इस सुन्दर दुनिया में लेकर आती है। वह मनुष्य की पहली गुरु होती है। वही उसे चलना, बोलना सीखाती है और अच्छे-बुरे का ज्ञान देती है। हम माँ के निस्वार्थ प्रेम को किसी स्वार्थ या शर्त से नहीं बॉंध सकते। वह स्वयं कष्ट सहन करके भी अपनी सन्तान को दुनिया के सभी सुख देने का प्रयास करती है। 
          दूसरी ओर जन्मभूमि की वायु, उसके जल और अन्न से हमारा शरीर पुष्ट होता है और बढ़ता है। यह धरती हमें आश्रय, पहचान, भाईचारा और जीने का अधिकार देती है। जिस माटी पर हम लोग खेल-कूदकर बड़े होते हैं, उसके प्रति वफादारी करना और उसकी रक्षा करना हम लोगों का परम कर्त्तव्य होता है। 
          हम इस धरा पर अत्याचार करते रहते हैं अर्थात् अपने पैरों से इसे रौंदते हैं, जीभर कर कूड़ा-कचरा फैंकते हैं, अपना बोझ उस पर डालते हैं, अपनी सुविधा के लिए बड़े-बड़े भवन बनाकर बार-बार इस धरा की हरियाली को नष्ट करते रहते हैं, पर्यावरण और प्रदूषण की समस्याएँ पैदा करते हैं। फिर भी यह हमसे कभी नाराज नहीं होती बल्कि हमारा बोझ सहन करती रहती है। हमारे मार्ग को सदा सुगमतर ही करती रहती है।
        ऐसी मातृभूमि को छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाना उचित नहीं। अपनी धरती, अपने देश की मिट्टी, अपना देश हमें सदा प्रिय होने चाहिए। विश्व में कहीं भी रहने वालों को इसकी सौंधी सुगन्ध हमेशा याद रहती है। वे चाहकर भी अपनी इस देव तुल्य भारतभू का मोह नहीं छोड़ पाते। जब भी मौका मिले अपने देश चले आते हैं जहाँ पर जन्म लेने के लिए देवगण भी लालायित रहते हैं।
           'वाल्मीकि रामायणम्' में महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से यही आशय व्यक्त कर रहे हैं-
       न मे सुवर्णमयी लंकापि रोचते लक्ष्मण।
       जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। 
अर्थात् भगवान श्रीराम कहते हैं- हे लक्ष्मण मुझे सोने की लंका भी रुचिकर नहीं प्रतीत होती। जननी और जन्मभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान होती हैं।
          भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करके भी वहाँ राज्य करना अथवा वहाँ रहना स्वीकार नहीं किया। उनके लिए सोने की लंका का कोई मोल नहीं था। वे अपनी मातृभूमि अयोध्या में वापिस जाना चाहते थे। उनके अनुसार जन्मदात्री माता के चरणों में मनुष्य का स्वर्ग है। उसी प्रकार अपनी जन्मभूमि में जो सुख-साधन हैं, वही स्वर्ग तुल्य हैं।
         यह प्रसिद्ध श्लोक हमें समझाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और कल्पना के स्वर्ग से बढ़कर माँ का आंचल और अपनी माटी का प्यार होता है। इसका कारण है कि यही हमारे जीवन, संस्कार और पहचान का आधार हैं।
        बहुत से ऐसे देश हैं जहाँ सारा साल गरमी रहती है या सरदी। वहाँ हमारे देश की तरह छह ऋतुएँ नहीं आतीं। वहाँ के निवासी अनेक कष्ट सहन करते हैं परन्तु फिर भी उस देश के वासी उसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते। 
        यही कारण है कि हमारे भारत के नवयुवकों ने निहत्थे भोले-भाले भारतीयों पर अत्याचार करने वाले अंग्रेजों को अपने देश से बाहर निकालने और उसे स्वतन्त्र करवाने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के अपने प्राणों की आहुति दी। हम सभी उनके बलिदान के फलस्वरूप इस धरा की स्वतन्त्र हवा में साँस ले रहे हैं। धन्य हैं वे स्वतन्त्रता सेनानी और उनकी वे माताएँ जिनकी तपस्या को उन युवाओं ने सार्थक कर दिया।
        यहाँ न जाने कितनी ही सभ्यताएँ धूल-धूसरित हो गई हैं। वहीं हमारी प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति फूलों की तरह मुस्कुराती हुई गर्व से सिर उठाए ब्रह्माण्ड के नीलाकाश में ध्रुवतारे की भाँति जगमगा रही है। वह विश्व के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही है।
        अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से हर व्यक्ति को प्यार होना चाहिए। जिस इन्सान को अपने देश, अपने वेश और अपनी भाषा से प्यार नहीं वह सही अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी नही। उनकी अवहेलना करने वाला हमेशा निन्दनीय होता है। हमें अपने इस अतुल्य भारत देश पर बहुत गर्व है। इकबाल जी पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं- 
            सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
चन्द्र प्रभा सूद

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