शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश

प्रियजनों की शत्रुता से विनाश 

मनुष्य जब इस संसार में आता है तो एक कोरी स्लेट की तरह होता है। जैसे जैसे उसे समझ आने लगती है तो वह स्वयं को सबसे बुद्धिमान समझने की भूल करने लगता है। उस समय वह अपने झूठे दम्भ के कारण अथवा अज्ञानतावश अपने ही प्रियजनों को अपना शत्रु बना बैठता है। जिन लोगों को उसकी ढाल बनना चाहिए था, वे उससे अपना मुॅंह मोड़ लेते हैं।
         अपने घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों को यत्नपूर्वक विश्वास में लेना चाहिए। यदि अपनों का साथ किसी मनुष्य को मिल जाए तो समझिए उस इन्सान ने जिन्दगी की जंग जीत ली है। इस विश्वास को जीतने के लिए मनुष्य को अपने स्वार्थ को त्याग देना चाहिए। अपने साथ-साथ अपनों को भी आगे बढ़ने का मौका देना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता भी करनी चाहिए।
       परस्पर शत्रुता के कारण संवाद की कमी हो जाती है जो रिश्तों में दरार पैदा करती है। अहंकार यानी मैं और मेरे की भावना मनुष्य को अपनों को दूर कर देती है। अपनों का विरोध इन्सान को अन्दर से तोड़ देता है। इससे उसे मानसिक तनाव होने लगता है। इस प्रकार प्रियजनों अथवा अपनों के बीच की शत्रुता मनुष्य के रिश्तों, मानसिक शान्ति और पारिवारिक सौहार्द का विनाश कर सकती है। यह उसके परिवेश के लिए घातक होता है।
        यदि मनुष्य अपनों से द्रोह करता है तो आज नहीं तो कल बाहर वाले मूर्ख उस पर राज करने लग जाते हैं। अपने जब धोखा देते हैं तो बहुत कष्ट होता है। शायद यह मुहावरा इसीलिए बना हैं कि- 
            घर का भेदी लंका ढाए।
यानी विभीषण रावण का भाई था। उसने अपने भाई का त्याग करके देकर भगवान श्रीराम का साथ दिया था। यदि विभीषण भाई की मृत्यु का रहस्य भगवान श्रीराम को न बताता तो शायद युद्ध का रुख बदला हुआ होता। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब अपने ही अपनों की बर्बादी का कारण बन जाते हैं तो फिर उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। 
          यह तो सर्वविदित है कि लोहा केवल लोहे से ही काटा जाता है। यदि लोहा लोहे को न काटे तो उसे दुनिया की कोई वस्तु नहीं काट सकती। इसी तरह पेड़ों की लकड़ी से माचिस की तीलियॉं बनाई जाती हैं। पेड़ों से बनने वाली माचिस की तीलियों से ही लकड़ी को आग लगाई जाती है। इसी प्रसंग में कहना चाहूँगी कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि यदि अपने प्रियजन जब शत्रुता निभाने पर आ जाएँ तो अपने ही विनाश का कारण बन जाते हैं।
        एक बोधकथा की यहॉं पर चर्चा करते हैं। आशा है इसे आप सबने इसे पढ़ा होगा। कहते हैं कि एक बार एक कुत्ते और एक गधे के बीच शर्त लगी कि जो जल्दी दौड़ते हुए दो गाँव आगे रखे हुए एक सिंहासन पर पहले बैठेगा, वही उस सिंहासन का अधिकारी माना जाएगा और राज्य करेगा। 
          जैसा कि निश्चित हुआ था दौड़ शुरू हुई। कुत्ते को पूरा विश्वास था कि वही जीतेगा और सिंहासन पर बैठेगा। इसका कारण था कि गधा कभी भी उससे तेज नहीं भाग सकता। उसका भाग्य किस करवट बैठने वाला है यानी उसके भाग्य में क्या लिखा है यह उस कुत्ते को अभी बिल्कुल भी ज्ञात नहीं था।
          शर्त के अनुसार कुत्ता तेजी से दौड़ने लगा। ज्योंहि वह थोडा-सा ही आगे गया था कि स्वभावत: गली के कुत्ते मिलकर उसे अपनी गली से खदेड़ने के लिए लपकने लगे तथा नोचने लगे। उन्होंने उस पर भौंकना शुरू किया। ऐसा ही व्यवहार उसके साथ हर गली और हर चौराहे पर होता रहा। जैसे तैसे कुत्ता हाँफते हुए जब सिंहासन के पास पहुँचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि गधा पहले से ही सिंहासन पर विराजमान है। वह उससे पहले ही वहाँ पहुँच चुका था। शर्त के अनुसार बाजी जीतकर वह राजा बन चुका था।
          यह सब देखकर निराश हो चुका कुत्ता बोल पड़ा, "यदि मेरे ही लोगों ने मुझे पीछे न खींचा होता तो आज ये गधा इस सिंहासन पर न बैठा होता।"।  
         इस घटना को देखते हुए हम कह सकते हैं कि वह बेचारा कुत्ता अपनी खुशफहमी में ही बर्बाद हो गया।
        लोहे की चर्चा एक बार पुनः करते हैं। लोहे से उत्पन्न जंग ही बस उसे नष्ट करता है। उसी तरह मनुष्य को भी कोई और नहीं बल्कि उसके विचार ही नष्ट करने में अहं भूमिका निभाते हैं। 
        मनुष्य यदि सहृदय होगा और सबको साथ लेकर चलने वाला बनेगा तो वे सभी उसके सहायक बनते हैं। इस तरह उसका बल बढ़ जाता है। तब कोई बाहरी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकती। इसके विपरीत सबके साथ विपरीत व्यवहार करने वाले से उसके अपने विमुख हो जाते हैं। निश्चित मानिए कि उस समय मनुष्य उस समय मूर्खों के वश में होता है। यदि विद्वानों के संसर्ग में हो तो वे उसे ऐसी मूर्खता नहीं करने देंगे।
        मनुष्य को सदा अपनी सोच का दायरा विस्तृत रखना चाहिए। तभी उसका शुभ सम्भव हो सकता है। उसे सदा आत्म मन्थन करते रहना चाहिए जिससे वह अपने लिए उचित मार्ग का चयन कर सकता है और पथभ्रष्ट होने से बच सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद

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