सोमवार, 2 नवंबर 2026

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग परिवार की रीढ़

बुजुर्ग घर-परिवार परिवार और समाज की रीढ़ होते हैं। उनके होने से ही परिवार का अस्तित्व होता है। वे घर को एक सूत्र में बॉंधकर रखते हैं। यदि वे न होते तो परिवार भी नहीं होता। वे नमक की तरह बहुत उपयोगी होते हैं। नमक के बिना कितनी ही मेहनत करके बनाए सभी भोग स्वादिष्ट होने के स्थान पर स्वादहीन हो जाते हैं। उन्हें कोई भी खाना पसन्द नहीं करता।
          इसीलिए जिस प्रकार भोजन का नमक से स्वाद बढ़ता है वैसे ही बुजुर्गों के रहने से घर-परिवार के सदस्यों के संस्कार बढ़ते हैं। अन्यथा बच्चे संस्कारहीन होकर देश और समाज पर भार ही बन जाते हैं। किसी परिवार में बुजुर्गों का होना बहुत ही आवश्यक होता है।
         बुजुर्गों ने एक लम्बा जीवन जिया होता है। अतः उनका अनुभव अपने बच्चों से अपेक्षाकृत अधिक होता है। यह अनुभव कठिन समय में सही रास्ता दिखाता है। बच्चों को संस्कारित करने और नैतिक मूल्य सिखाने में दादा-दादी की भूमिका अहं होती है। घर में विद्यमान बुजुर्गों का हर मुश्किल घड़ी में एक मजबूत सहारा होता है। 
        मनुष्य अपने जीवन में सफलता पाने के लिए मन्दिरों में माथा रगड़ता है, तीर्थ स्थानों में भटकता है अथवा तथाकथित गुरुओं, तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के चंगुल में फंस जाता है।
        जो व्यक्ति अपने बुजुर्ग माता-पिता को असहाय छोड़कर तीर्थ स्थलों पर अथवा मन्दिरों में भटकते रहते हैं, उनसे परमपिता परमात्मा बहुत नाराज होता है। ईश्वर उनकी सहायता करने के स्थान पर उन्हें अकेला छोड़ देता है। 
          मनुष्य के वास्तविक देवता और तीर्थ घर में बैठे हुए उसके जीवित माता-पिता होते हैं। इसीलिए उनके चरणों में सारा संसार होता है, स्वर्ग माना जाता है। 
          इस विषय में एक कथा का स्मरण हो रहा है। एक पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं के बीच ब्रह्माण्ड की परिक्रमा की प्रतियोगिता हुई थी।  कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर निकल पड़े।गणेश जी ने भगवान भोलेनाथ और भगवती पार्वती यानी अपने माता-पिता की परिक्रमा करके मानो पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा अपने भाई कुमार कार्तिकेय से पहले पूर्ण कर ली थी।
           माता-पिता की भक्ति और बुद्धि से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गणेश जी को यह वरदान दिया कि सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाएगी। इसलिए भगवान गणेश की पूजा सभी देवताओं से पहले की जाती है।
         आज संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवार के चलते कई बुजुर्ग अकेलापन का दंश झेल रहे हैं। बच्चे अपने व्यस्त जीवनशैली के कारण कई बार उनकी भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह बहुत दुखद स्थिति है।
          प्रत्येक मनुष्य को अपना सम्पूर्ण जीवन उनकी सेवा में लगाना चाहिए। वह अपना सारा जीवन भी यदि उनकी सेवा करता रहे तो भी कम है। मनुष्य को इस पृथ्वी पर लाने का उनका उपकार उनकी सेवा से कहीं बढ़कर है। उनके इस ऋण से उऋण होना बिल्कुल असम्भव है।
          दूसरे शब्दों में यही कहा जा सकता हैं कि उनकी आवश्यकताओं को अपना दायित्व समझकर अपने मन से पूर्ण करना चाहिए। कभी उनकी सेवा-सुश्रुषा भार मानकर नहीं करनी चाहिए। सदा उनके खान-पान का ध्यान रखना चाहिए जैसे वे उनके लिए करते थे। अस्वस्थ होने पर उनके इलाज की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। यही उनकी सच्ची पूजा-अर्चना कहलाती है।
        इसके विपरीत कुछ लोग अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति लड़-झगड़कर या धोखा देकर हड़प लेते हैं। उन बुजुर्गों को मानसिक सन्ताप देते हैं। वे उनके स्वास्थ्य और खान-पान का ध्यान नहीं रखते। उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे लोगों को अपने जीवनकाल में कभी सुख और शान्ति नहीं मिल पाती। 
          कभी-न-कभी जब उनका अन्तर्मन उन्हें कचोटने लगता है, वे पश्चाताप करते हैं। तब तक अपने ही हाथों से वे सब कुछ गँवा चुके होते हैं। तब समय उनका साथ नहीं देता। सब कुछ भूत के गर्भ में समा चुका होता है। तब चाहकर भी अपनी गलतियों को सुधारने का एक अवसर उन्हें नहीं मिल सकता।
          जो लोग अपने माता-पिता को हर तरह से प्रसन्न और सन्तुष्ट रखते हैं, उन्हें सदा ही उनका आशीर्वाद मिलता रहता है। उनका यश चारों ओर फैलता है। उन्हें लोग 'श्रवण पुत्र' कहकर सम्मानित करते हैं।
        इसके विपरीत माता-पिता तिरस्कार करने वालों के लिए उनके मन को कष्ट होता है। वह मानसिक सन्ताप किसी बद् दुआ से कम नहीं होता। यह समाज भी उन्हें यदा कदा तिरस्कृत करता रहता है। सब सुविधाओं के होते हुए भी उनके मन का कोई कोना रीता या खाली रह जाता है।
          जिन लोगों को इस संसार में माता-पिता का आशीर्वाद मिल जाता है, उनसे परमपिता भी प्रसन्न रहते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में खुशियाँ हमेशा अपनी दस्तक देती रहती हैं। समाज भी उन्हें यथोचित सम्मान देकर गौरवान्वित अनुभव करता है। उनका यश श्रवण कुमार की भॉंति चारों ओर प्रसरित होता है।
चन्द्र प्रभा सूद

रविवार, 1 नवंबर 2026

अवसादग्रस्त जीवन एक बोझ

अवसादग्रस्त जीवन एक बोझ

डिप्रेशन या अवसाद आधुनिक भौतिक युग की देन है। हर इन्सान वे सब सुविधाएँ पाना चाहता है जो उसकी जेब खरीद सकती है और वे भी जो उसकी सामर्थ्य से परे हैं। इसलिए जीवन की रेस में भागते हुए हर व्यक्ति अपने आप में इतना अधिक व्यस्त रहने लगा है कि सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक गतिविधियों के लिए उसके पास समय ही नहीं बचता। इसीलिए आज डिप्रेशन की समस्या बढ़ती जा रही है। वृद्ध और युवा तो इसकी चपेट में आ ही गए हैं, इसने बच्चों तक को नहीं छोड़ा, उनको अपने जाल में फंसा लिया है।
         अवसाद या डिप्रेशन में खुद को एक बोझ समझ लेना एक बहुत नकारात्मक विचार है। यह वास्तविकता नहीं है अपितु बीमारी का एक मानसिक लक्षण है। डिप्रेशन मनुष्य के दिमाग में ऐसे विचार पैदा करता है कि वह दूसरों के लिए परेशानी बन रहा है। इसके कारण शारीरिक और मानसिक थकान होने लगती है। इन्सान अपने दैनन्दिन कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाता। तब व्यक्ति के मन में  अपराधबोध‌ होने लगता है। वह अपनी भावनाओं को दूसरों के साथ साझा से कतराने लगता है।
      वह किसी के साथ सम्पर्क बनाना नहीं चाहता। जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो स्वयं को नितान्त अकेला पाता है। इसका कारण है कि अपनों को तो वह पता नहीं कब का पीछे छोड़ आया होता है। यही नामुराद अकेलापन उसके जीवन के लिए सबसे बड़ा अवसाद का कारण बन जाता है। 
      इस अकेलेपन के कई और भी कारण हो सकते हैं। पति या पत्नी की मृत्यु के बाद, तलाक के बाद पुनर्विवाह न करना, माता-पिता की अत्यधिक व्यस्तता के कारण बच्चों में, आफिस में किसी के द्वारा किया गया दुर्व्यवहार, वृद्धावस्था आदि में भी इस अकेलेपन की समस्या आड़े आती है।
        अनावश्यक ही अधिक सोचते रहने के कारण मनुष्य की अपने जीवन के प्रति नकारात्मक अवधारणा बनाने लगती है। वह ऐसी अपेक्षाएँ करता है जो वास्तव में पूर्ण होनी असम्भव होती हैं। जब उसकी अपेक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं तो वे उसे अन्तर्मन की गहराइयों तक तोड़ देती हैं। ऐसी स्थिति में खाना-पहनना, घूमने जाना, हास-परिहास आदि उसे कुछ भी नहीं सुहाता। वह बस उल्टा-सीधा सोचता रहता है। ऐसे में उसके मन का उपचार करने की भी आवश्यक होती है। मन को नकारात्मक बनाने के स्थान पर उसे वास्तविकता के धरातल पर लाना आवश्यक होता है।
          यह अवसाद यदि लम्बे समय तक बना रहे तो मन-मस्तिष्क को हानि पहुँचाता है। भावनात्मक परिवर्तन शरीर पर स्थाई एवं अस्थाई प्रभाव छोड़ते हैं। परेशानी इस कारण होती है कि मस्तिष्क का आकार घटने लगता है। शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं।
         अवसादग्रस्त जीवन के प्रति अरुचि जैसे लक्षण उभरने लगते हैं। यह अवस्था अधिक समय तक नहीं बनी रहती अपितु कुछ समय पश्चात स्वत: सामान्य हो जाती है। कई मानसिक रोगी तनावग्रस्त होने पर अधिक खाने लगते हैं। उनकी मानसिक एकाग्रता नष्ट हो जाती है। वे हर बात को भूलने लगते हैं और अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाते हैं। उनके विचारों की स्पष्टता खत्म हो जाती है व गडमड होने लगते हैं।
          प्राचीनकाल से ही हमारे भारतीय मनीषी सकारात्मक सोच रखने की शिक्षा देते रहे। इसकी मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ के लिए बहुत जरूरत होती है। 
          इन सकारात्मक विचारों से शरीर की ग्रन्थियाँ अधिक सक्रिय होकर काम करने लगती हैं। हारमोन्स का प्रवाह शरीर को स्फूर्ति प्रदान करता है जिससे भरपूर नींद आने लगती है और मन व मस्तिष्क को सुकून मिलता है। फिर से जीवन के प्रति उत्साह होने लगता है। तब यही दुनिया जो पहले बदसूरत दिखाई देती थी, अब सुन्दर लगने लगती है। चिन्ता, तनाव अथवा अवसाद बढ़ जाने की स्थिति में किसी योग्य चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक होता है। अन्यथा व्यक्ति के मानसिक सन्तुलन खो जाने में बहुत अधिक समय नहीं लगता।
        इस अवसाद से मुक्त होने के लिए सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिए, सज्जनों की संगति में रहना चाहिए और ईश्वर का ध्यान लगाना चाहिए। यौगिक क्रियाएँ भी लाभदायक होती हैं। इन सबसे बढ़कर मनुष्य को स्वयं को सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखना चाहिए। सबके साथ मिलना-जुलना चाहिए और हो सके तो किसी हाबी में समय बिताना चाहिए।
        ईश्वर पर विश्वास सदैव आत्मिक बल देता है। अवसादग्रस्त व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि ईश्वर उसका अपना सच्चा मीत है। वह उसकी रक्षा करेगा, उसके दुख दूर करेगा, सहायता करेगा और कल्याण भी करेगा। ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखने वाले को कभी अवसाद हो नहीं सकता। यदि दुर्भाग्यवश कभी ऐसी स्थिति बन जाती है तो वह शीघ्र ही उस अवसाद से बाहर निकल आता है।
चन्द्र प्रभा सूद