मंगलवार, 6 जनवरी 2015

धन की बचत

आयुपर्यन्त भागदौड़ करके बहुत ही मेहनत से जीवन में हम धन कमाते हैं। उस धन का सदुपयोग करते हुए अपने पारिवारिक, धार्मिक व सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं। बच्चों को समाज में उनका उचित स्थान दिलाने के लिए भरसक यत्न करते हैं। हम अपने उद्देश्यों में बहुत सीमा तक सफल भी होते हैं।
        अपनी सारी जिम्मेवारियों को निभाते हुए हम भारतीय यह कदापि नहीं भूलते कि धूप-छाँव या अपने अच्छे-बुरे समय के लिए थोड़ा धन बचा कर रखना चाहिए। इससे भी बढ़कर हम यह चाहते हैं कि वृद्धावस्था के लिए भी हमारे पास कुछ धन सुरक्षित रहे जिससे पराश्रित न होना पड़े। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी का मुँह न ताकना पड़े या फिर बच्चों के समक्ष भी हाथ न फैलाना पड़े। अपने सिर पर छत भी ईश्वर की कृपा से बनी रहे।
        हमारी भारतीय विचारधारा बहुत गहराई से जीवन के हर मोड़ पर हमारा मार्ग प्रशस्त करती है। यही कारण है जिस समय पूरा विश्व मंदी के दौर से गुजर रहा था उस समय अमेरिका जैसे वैभवशाली देश के कई बैंक डूब गए थे। हमारे देश में चाहे गरीबी का प्रतिशत अधिक है फिर भी हमारी अर्थ व्यवस्था चरमराई नहीं। थोड़ी परेशानी तो अवश्य हुई पर देश मंदी में भी उभर गया। उसका कारण था देशवासियों की छोटी-बड़ी बचतें जो लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते रहते हैं।
        इस बचत अभियान की बदौतल ही हम अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। कुछ चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए वाली सोच वाले भी होते हैं जो खाने-पहनने हर जगह कंजूसी करते हुए बस जोड़ने में ही लगे रहते हैं।
       कुछ लोग चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, दुराचार, नीति-अनीति का मार्ग अपनाकर दूसरों का गला काटकर भी धन बटोरने की जुगत करते रहते हैं। हर प्रकार के टैक्स की चोरी से भी बाज नहीं आते।
      वे कहते हैं हमने अपनी पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रबंध कर लिया है पर वे भूल जाते हैं-
       पूत कपूत तो कि धन संचै पूत सपूत तो का धन संचै।
अर्थ यह है कि संतान योग्य होगी तो हम से भी अधिक कमा लेगी और यदि नालायक निकली तो सब बरबाद कर देगी। इसलिए जो सच्चाई व ईमानदारी से कमाया जाए अर्थात जो सात्विक कमाई होती है बरकत उसी में होती है।
       धन कमाकर हम धन-संपत्ति बढ़ाते जाते हैं। भौतिक पदार्थों यानी कि गाड़ी, वस्त्र, जूते-चप्पल, पर्स और ऐशोआराम के साधन हम जुटाते रहते हैं जिन सबका उपभोग भी हम नहीं कर पाते।
         हमारी मृत्यु के पश्चात सब कुछ यहीं रह जाता है। हमारा जमा धन जिसकी जानकारी पत्नी-बच्चों को हो तो ठीक नहीं तो बैंक में ही पड़ा रहता है। जब तक जीवित रहते हैं तब तक हमें लगता है कि हमारे पास जो पैसा है वह कम है और उसे बढ़ाने के चक्कर में कोल्हू का बैल बन जाते हैं।
         धन से हम भौतिक पदार्थों- कपडे़, जेवर, जूते, धन-संपत्ति, ठाठबाट, गाड़ी, नौकर-चाकर आदि जुटा सकते हैं परन्तु स्वास्थ्य, प्रसन्नता, रिश्ते-नाते  आदि नहीं खरीद सकते। जीते जी इन सब पर भी ध्यान देना आवश्यक है अन्यथा मन में मलाल रह जाता है।
           धन जीवन जीने के लिए बहुत आवश्यक है उससे से बहुत कुछ कर सकते हैं पर उसे सिर पर न सवार होने दें। रावण की तरह अहंकार को अपने पास भी न फटकने दें। तभी सही मायने में जीवन का आनन्द ले सकते हैं।

सोमवार, 5 जनवरी 2015

अतिथि देवो भव

'अतिथि देवो भव' अर्थात् अतिथि यानि घर आए मेहमान को भगवान मानो। ऐसा हमें समझाकर अतिथि का सम्मान करना सीखाने वाली भारतीय सांकृतिक परंपरा ही हो सकती है कोई अन्य नहीं।
          हमारे ग्रन्थों के अनुसार अतिथि साधु, संतों या विद्वानों को कहते थे। ये वे लोग होते थे जो दुनियादारी से दूर रहकार समाज का दिशा-निर्देश करते थे। ऐसे ज्ञानी जन कभी भी किसी भी गाँव या प्रदेश में चले जाते थे। जहाँ शाम या रात हो गयी वहीं डेरा डाल लेते थे। जन-साधारण को ज्ञानोपदेश देकर एक-दिन रुककर आगे निकल जाते थे।
        ये विद्वत जन मोह-माया से परे किसी स्थान पर अधिक समय नहीं ठहरते थे। इन लोगों के आने का कोई निश्चित समय नहीं होता था इसलिए अ + तिथि यानि बिना तिथि आने वाले कहलाते थे। बिना नखरा किए जो मिल जाता था खा लिया करते थे।
       वास्तव में ये अतिथि समाज की धरोहर होते थे जिनके भरण-पोषण करने का दायित्व समाज पर होता था। ये समाज पर बोझ नहीं होते थे बल्कि समाज का उचित मार्ग दर्शन करके उनकी आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते थे।
        आजकल अन्यों की तरह अतिथि के मायने भी बदल गए हैं। अतिथि तो अब भी हमारे घरों में आते हैं पर बिना बताए नहीं। आज इस भौतिक युग में चारों ओर मारामारी हो रही है, आपाधापी मची हुई है। किसी को किसी से मिलने का समय ही नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि कोई किसी से मिलना ही नहीं चाहता। सभी अपने को तीसमारखाँ समझते हैं। अगर मजबूरी में मिलना भी पड़े तो सभी को भारी पड़ता है। सब समय न होने का रोना रोते रहते हैं।
        वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है केवल हममें इच्छा शक्ति की कमी है। वैसे अपनी मर्जी से व्यर्थ में हम घंटों बरबाद कर देते हैं। खैर, फिर भी मेहमानों का आना जाना तो लगा ही रहता है।
       मेहमान भी अब बहुत समझदार हो गए हैं। वे भी दूसरे की मजबूरी जानते हैं। इसलिए बिना पूर्व सूचना के नहीं आते। जो लोग हमें पसन्द होते हैं उनका स्वागत हम गर्मजोशी से करते हैं। जिन्हें हम नापसन्द करते हैं उनके घर आने पर हम अनमने हो जाते हैं। उनका सत्कार हम करते तो हैं पर भार समझ कर।
       आज के युग में किसी के घर में कुछ दिन रहने की बात बड़ी विचित्र-सी प्रतीत  होती है। परन्तु कुछेक स्थितियों में रहने के लिए भी आना होता है। जब किसी के घर रहने की आवश्यकता हो तो तो अपने अतिथि धर्म का निर्वहण करना चाहिए। कहना यही है कि मेहमान को दूसरे के घर में मेहमान न बनकर घर के सदस्य की भाँति व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने पर वह बोझ नहीं बनता बल्कि सबका प्रिय बन जाता है। जब वह पुनः कभी वहाँ जाता है तो खुले दिल से उसका स्वागत किया जाता है।
         इसके विपरीत जो अपनी अकड़ में रहकर दूसरे के घर की व्यवस्था के अनुरूप ढलना नहीं चाहता वह अतिथि अपने मेजबान की आँखों में खटकता है। उससे कोई प्रसन्न नहीं होता और सभी यही मनाते हैं कि वह शीघ्र ही चलता बने।
        मित्रों अथवा संबधिंयों के घर जाते समय अपनेआप को संतुलित रखना चाहिए। बच्चों को भी अनुशासन में रहने के लिए समझाना चाहिए। तभी किसी के घर जाने में सम्मान मिलता है। बच्चों की उद्दंडता के कारण भी कई बार अतिथि व आतिथेय में मनमुटाव हो जाता है। इस अप्रिय स्थिति से हमेशा बचने का प्रयास करें।
       अतिथि को भगवान की तरह मानने की परंपरा वाले अपने देश में समय व परिस्थितियों के चलते चाहे कुछ स्वाभाविक बदलाव आए हैं परन्तु आज भी अतिथि का स्वागत-सत्कार अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है।

रविवार, 4 जनवरी 2015

संबंधों की गरिमा

अपने रिश्तों का चुनाव हम नहीं करते बल्कि वे हमारे कर्मों के अनुसार ईश्वर की ओर से बनाकर भेजे जाते हैं जबकि अपने मित्रों का चुनाव हम स्वयं करते हैं। ये रिश्ते जितना हमारा संबल बनते हैं उतने ही नाजुक भी होते हैं। बड़ी सूझबूझ से इनको निभाना होता है। जरा सी लापरवाही होने पर इनमें दरार आने लगती है। रिश्तों के विषय में कहा जाता है कि वे कच्चे धागों से बंधे होते हैं। कितने सुन्दर शब्दों में इसी भाव को निम्नलिखित दोहे में समझाया है-
रूठे सजन मनाइए जो रूठें सौ बार।
रहीमन फिर फिर पोहिए टूटे मुक्ताहार॥
        इन रिश्तों में पारदर्शिता होनी बहुत आवश्यक है। सभी रिश्ते अपने-आप में बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। सबके साथ समानता का व्यवहार करने से सभी नाजुक रिश्ते बने रहते हैं। किसी को भी त्यागना उचित नहीं क्योंकि मनुष्य अपने भाई-बन्धुओं से ही सुशोभित होता है। सभी सुख-दुख भी मिलजुल कर ही काटे जाते हैं।
        आज भौतिक युग में धन को बहुत अधिक अधिक महत्त्व दिया जाता है। नजदीकी रिश्तों को भी स्वार्थ के तराजू में तौला जाता है। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है तब तक संबंध बने रहते हैं। ऐसे संबंध लंबे समेय तक नहीं चलते। स्वार्थ के पूर्ण होते ही आपसी सौहार्द समाप्त हो जाता है।
        धन-संपत्ति आजकल बहुधा झगड़े का कारण बनती जा रही है। परिवारों में उसके बटवारे को लेकर कोर्ट-कचहरी तक जाने में भी लोग हिचकिचाते नहीं हैं। इस कारण परिवारी जन एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखना चाहते। वहाँ संबंधों का कोई मूल्य नहीं रह जाता।
      इतना आश्चर्य होता है कि यह देखकर कि लोग दूसरों से दोस्ती गाँठते हैं, उनके साथ संबंध बनाते हैं पर अपने भाई-बहनों से बात करके राजी नहीं होते। उनका चेहरा तक नहीं देखना चाहते।
      बाद चाहे वे तथाकथित मित्र उन्हें धोखा दे जाएँ। उस समय फिर वे उनको कोसते हैं पर कुछ कर नहीं पाते। तब वही कहावत सिद्ध होती है-
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
      अपने घर-परिवार में यदि कोई भाई-बहन पैसे से कमजोर है तो उससे किनारा करना चाहते हैं। उन्हें बातचीत तक रखना नहीं चाहते। उससे यथासंभव दूरी बनाए रखते हैं।
        वे सोचते हैं कि पैसे के बल पर दुनिया खरीद लेंगे पर भूल जाते हैं कि रिश्ते-नाते पैसे से नहीं खरीदे जाते। यह पूँजी ईश्वर ने हमें दी है इसे सहेज कर रखना हमारा दायित्व है। जीवन ऐसा समय अवश्य आता है जब अपनों के साथ की बहुत आवश्यकता होती है। जो लोग रिश्तों का मूल्य समझते हैं वे प्रसन्नता पूर्वक उस समय अपनों के साथ का आनन्द उठाते हैं और दूसरे पछताते हैं कि काश कोई अपना होता। जब अपनों को पराया करते हैं उस समय नहीं सोचते कि कभी उनके बिना जीवन व्यतीत करना कठिन हो जाएगा। रहीम जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए।
जोड़े से फिर न जुड़े जुड़े गांठ पड़ी जाए॥
       अपने प्रिय जनों से बिछुड़ने का दंश झेलना बहुत कठिन होता है। हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते थे-
   अपना मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा
अर्थात् जो दर्द अपनों को होता है वह दूसरों को नहीं होता।
        यथासंभव रिश्तों की मिठास बनाए रखने का यत्न करें। अपने अपने ही होते हैं। पराए मुखौटा लगाकर अपने हो सकते हैं पर वे बन नहीं सकते। इसलिए उन्हें स्वयं से दूर न करिए। थोड़ा झुककर भी साथ निभाना पड़े तो उसे अन्यथा न सोचें। ईश्वर भी उन्हीं से प्रसन्न होता है जो उसके द्वारा बनाए गए संबंधों को सद् भावना से निभाते हैं।

शनिवार, 3 जनवरी 2015

विद्वान की परिभाषा

पराई स्त्री को माता के समान मानने वाला और दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले की तरह जानने वाला और अपनी ही तरह सभी जीवों को जो देखता है या समझता वही वास्तव में विद्वान कहलाता है। ये सुन्दर भाव निम्नलिखित श्लोक में कहे गए हैं-
        मातृवत्   परदारेषु   परद्रव्येषु    लोष्टवत्।
        आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पण्डित:॥
   श्लोक में सबसे पहले समझाया है पराई स्त्री को माता की तरह मानो। यदि हर व्यक्ति इस उक्ति का मनन कर जीवन में ढाल ले तो तथाकथित सभ्य समाज की बहुत-सी बुराइयों का अंत हो जाएगा। बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत कोई नहीं करेगा। घर, बाहर, आफिस आदि किसी स्थान पर यौनशोषण की समस्या नहीं रहेगी। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों से भी मुक्ति मिल जाएगी।
       समाज में चारों ओर स्वच्छ तथा स्वस्थ वातावरण का निर्माण होगा। महिलाएँ खुली हवा में साँस ले सकेंगीं। अपनी इच्छा से स्वतन्त्रता पूवर्क आ जा सकेंगी। कन्या भ्रूणहत्या की नृशंस समस्या से समाज इस समय त्रस्त हो रहा है उससे भी मुक्ति मिलेगी।
        दूसरे के धन को यदि हम मिट्टी मान लें तो कोई किसी की धन-संपत्ति पर कुदृष्टि नहीं डालेगा। चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, लूटपाट जैसे दुष्कर्म करने से मनुष्य तौबा कर लेगा। घरों में मोटे-मोटे ताले लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। घर खुला रहने पर भी चिन्ता नहीं होगी। क्योंकि चोरी तो कोई करेगा नहीं। बड़ी-बड़ी तिजोरियों में धन को सुरक्षित रखने की आवश्यकता ही नहीं होगी। मनुष्य दूसरों के धन पर अपनी नजर नहीं डालेगा। उसके मन में परिश्रम व ईमानदारी से कमाए अपने धन से संतोष उपजेगा। कहते हैं-
         गोधन गजधन बाजिधन और रत्नधन खान।
         जब आए संतोष धन सब धन धूरी समान॥
   संतोष रूपी धन परिवार की बुराइयों से रक्षा करता है। संतान को सुयोग्य बनाता है जिस पर माता-पिता, देश व समाज गर्व करता है।
      ऐसे कमाए अपने धन में बहुत बरकत होती है। गलत रास्ते से कमाये हुए धन का दुरूपयोग अधिक होता है। माना यही जाता है-
    चोरी का धन मोरी में और भी- चोरी का माल लट्ठों के गज।
        कहने का तात्पर्य है कि ऐसे पैसे को व्यर्थ बरबाद करने या लुटाने में कष्ट नहीं होता।
       अपने समान दूसरे को समझने का अर्थ है जैसा व्यवहार हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करना। हम चाहते ही कि सभी हमारे साथ सहृदयता, आत्मीयता का व्यवहार करें तो हमें भी दूसरों के प्रति सहृदय व आत्मीय होना होगा। यदि सम्मान चाहिए तो दूसरों को सम्मान दो और प्यार चाहिए तो सभी जीवों से प्यार करो।
        दूसरे शब्दों में कहें तो दूसरों से यदि हम दूसरों से दुर्व्यवहार या नफरत करेंगे तो वही मिलेगा। इसीलिए विद्वान कहते हैं-'जैसा बोओगे वैसा काटोगे' और 'बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय'
         हम अपने जीवन में वही प्राप्त करते हैं जो हम बाँटते हैं। इसलिए अपने समान सभी को समझने वाला सही अर्थों में विद्वान होता है। ऐसे महापुरुषों का संसर्ग हमेशा उन्नति कारक होता है। ये लोग मानवजाति के शुभचिंतक होते हैं।
        इन भावों को आत्मसात करके यदि जीवन में अपना लें तो मनुष्य महान बन जाता है। संसार की बहुत-सी बुराइयाँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

जीवन एक वर्ग पहेली

जीवन एक वर्ग पहेली की तरह चोकोर है जिसे हम लोगों के लिए सुलझाना टेढ़ी खीर जैसा है। हम चोकोर होना नहीं चाहते पर हमारे चाहने से कुछ नहीं होता।
        हम अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं पर हमारी नजरों से ओझल वह मालिक हम सबकी डोर थामे रहता है। हमें ईश्वर कठपुतलियों की तरह जैसा चाहे वह नाच नचाता रहता है। यद्यपि वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार ही सब कुछ देता है परंतु उसके न्याय को समझना जन साधारण  के लिए संभव नहीं।
        पहेली सुलझाते समय हम शब्द बनाते हैं व लिखते हैं पर फिट न बैठने पर उन्हें मिटाते हैं और सही शब्दों के बनने तक फिर-फिर यही क्रिया दोहराते हैं।
       उसी तरह सारा जीवन हम बार-बार गलतियाँ करते हैं और क्षमा याचना कर भूल सुधारना चाहते हैं। यह बात अलग है कि हम उसमें सफल नहीं हो पाते।
         आयुपर्यन्त हम शुभ की कामना करते हैं। अपनी जिम्मेवारियों को निपटाने में जुटे रहते हैं। दिन-रात चौबीसों घंटे जी तोड़ परिश्रम करते हैं और घर-परिवार, बन्धु-बांधवों व समाज के प्रति अपने दायित्व निभाते हैं। जब हमें यह लगता है कि सारे दायित्वों से मुक्त होकर अब हम चैन की सांस लेंगे तब वह मालिक घंटी बजा देता है और अपने पास बुला लेता है।
          कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी होश सम्हालने से लेकर मृत्यु तक कोई ऐसा क्षण मानव जीवन में नहीं आता जब वह यह कह सके कि ये पल मैंने बड़े सुकून से गुजारे हैं। सारा समय जो मैंने गुजारा यह मेरा अपना है।
       चोकोर होने का अर्थ है एक ही ढर्रे पर जीवन जीना। दूसरे शब्दों में कहें तो नीरस जीवन व्यतीत होना। केवल एक ही प्रकार से जीवन यापन करना तो बहुत ही कठिन होता है। मानव मन हमेशा कुछ-न-कुछ नया चाहता है क्योंकि उसे नवीनता ही भाती है।
एक ही आकृति को यदि बार-बार देखते रहें तो हम अपना आपा खोने लगते हैं और उसे उठाकर बाहर फैंक देना या बदल देना चाहते हैं। जीवन में यदि एकरूपता रहे तो भी मनुष्य परेशान हो जाता है। कभी-कभी डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। फिर बस डाक्टरों के चक्कर और पैसे की बरबादी होने लगती है।
       चोकोर या वर्ग के अतिरिक्त और भी कई आकृतियाँ होती हैं उसी प्रकार जीवन में भी बहुविध रंग एवं परिस्थितियाँ होती हैं। ये स्थितियाँ सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि के रूप में हमारे समक्ष आती हैं। इन अलग-अलग रंगों में रंगे हम कभी प्रसन्न होते हैं और कभी चीख-पुकार करते हैं।
        कल्पना कीजिए कि यदि ईश्वर सबको एक ही जैसा रंग-रूप देता तो चारों ओर एक ही शक्ल व एक ही रंग के लोग दिखते तब कितना बोरिंग लगता। इसी तरह सभी लाल, काले, सफेद या नीले किसी एक ही रंग के कपड़े पहनते तो वातावरण कैसा दिखाई देता? और यदि एक ही स्टाइल के कपड़े सभी पहनते तो सब भी अच्छा न लगता।
       ऐसे ही सभी एक ही तरह के अन्न-फल खाते तब भी मनभावन न हो पाता। अगर सभी फल-फूल, पेड़-पौधे आदि एक ही रंग व लंबाई-चौड़ाई के होते तो प्रकृति कितनी बदरंग दिखाई देती। उसकी सुन्दरता उसकी विविधता में है।
        ईश्वर की बनाई हुई इस सृष्टि में हर प्रकार की जो विविधता दिखाई देती है वह हमेशा हमें मोहित करती है।
         संसार में रहते हुए हम ईश्वरीय चमत्कारों से चमत्कृत होते रहते हैं। हम उसके इस विधान में कोई कमी नहीं निकाल सकते। अपने जीवन होने वाले ऊबाऊपन का त्याग करके हमें उसका अनुग्रहीत होना चाहिए जिसने जीवन में सब कुछ दिया है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नववर्ष का उत्साह

नव वर्ष नये उल्लास व नये उत्साह का प्रतीक है। नव शब्द नवीनता का द्योतक है जो हमें कुछ नया करने की प्रेरणा देता है। नये वर्ष का प्रारंभ हमारे जीवन में एक नया अध्याय लाता है। हमें समझाता है कि जागो और पिछले वर्ष किए अपने कार्यों का लेखाजोखा खंगालो। अपने सुकृत्यों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करो और उन्हें आगे बढ़ाओ। हमारे द्वारा जो कार्य अधूरे रह गए हैं उन्हें नए साल में पूरा करें। जो हमने जाने-अंजाने गलतियाँ की हैं उन्हें सुधारने का संकल्प लें।
          वैसे देखें तो साल का प्रारंभ हमारे बाल्यकाल की तरह है जो हमें नवीनता की ओर ले जाता है। हमें नयी योजनाएँ बनाने की प्रेरणा देता है। पिछले साल का अंत हमें यह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार जीवन का अंत पुनः जन्म लेने के लिए होता है अर्थात् नव निर्माण होता है उसी प्रकार बीते वर्ष का अंत भी नूतन-नवीन वर्ष के आगमन से होगा। इसलिए खुले मन से इसका स्वागत करते हुए नवनिर्माण में जुट जाओ।
      नव वर्ष अलग-अलग तिथि को व विधि से पूरे विश्व में एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है।
     सभी लोग अपने मित्रों व संबंधियों को बधाई संदेश फोन से या प्रत्यक्ष जाकर देते हैं। नए साल की बधाई देते हुए लोग ग्रीटिंग कार्ड भेजते हैं।
      हर छोटे-बड़े शहरों में स्थान-स्थान पर होटल व रेस्टोरेंट आकर्षक ढंग से सजे-धजे दिखते हैं। वैसे तो होटल व रेस्टोरेंट हमेशा ही सजे हुए दिखते हैं पर इस खास अवसर की सजावट विशेष रूप से की जाती है। अपने ग्राहकों को लुभावनी योजनाओं से आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। कहीं कोई कमी न रहे होटल मालिक इसका खास ध्यान रखते हैं। इसीलिए इनमें बहुत भीड़ उमड़ती रहती है।
      बस इस बात का ध्यान रखिए कि किसी की लुभावनी योजना से आप ठगे न जाएँ जिससे आपकी नव वर्ष की पार्टी फीकी न रह जाए और आप दुखी व उदास मन से घर न बैठ जाएँ।
      आजकल घर से बाहर पार्टी करके नए साल का स्वागत करने का चलन बढ़ रहा है। मनाने लोग होटलों में जाकर रात बिताते हुए नव वर्ष की पार्टी की करते हैं।
     जो होटल नहीं जाते वे अपने परिवार तथा मित्रों के साथ मिलकर नव वर्ष मनाने के लिए कुछ दिन पहले से ही योजनाएँ बनाते हैं।
       इतना ठंडा मौसम होने के बावजूद लोग बहुत ही प्रसन्नता व उल्लास से इस दिन को मनाते हैं। इस दिन की मधुर स्मृतियों को हृदय में संजोते हैं।
       हर प्रकार से खुशियों को समेटते हुए अपने भविष्य का ध्यान रखिए।किसी प्रकार की असावधानी से बचते हुए यातायात नियमों का पालन करें ताकि दुर्घटना को रोका जा सके और अपना तथा अपनों का भविष्य सुरक्षित रहे।
       आप सभी पाठकों को 'दैनिक चन्द्रहार टाइम्स' की ओर से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर आपको दिन दूनी रात चौगुनी तरक्क़ी से मालामाल करे।

चल रे बटोही

चलता चल रे बटोही अपने जीवन पथ पर आगे
देख न मुड़कर आगे पीछे क्यों हरदम बस भागे
खुद को यूँ न समझ अकेला तो सब अपने लागे
बीत गए हैं वर्षों सोते-सोते अब तक न तुम जागे

न कोई शिकवा न कोई शिकायत रह जाए आगे
सम्हालो इस जीवन में रिश्तों के उलझे टूटे धागे
बस थामो अपने जज़्बातों को उनके वेग न लागे
पीछे मुड़ देखने की आस यहाँ पर कभी न जागे

मेरे मानस में कभी नहीं कोई था यूँ सबसे आगे
सब अपने हैं इनको दुख देकर मत करना नागे
स्वार्थ ये का चश्मा उतरो फिर सब अपने लागे
सबको बना लो अपना तबही मन मेंममता जागे

चारों ओर उमड़ रहा प्यार का सागर तब आगे
सुनाई दे रहा शोर ठहाकों का सब बाहर भागो
ढूँढ़ो रहे हो भाई क्या सबमें बस अपनापा लागे
बहुत हो गया मान मनौव्वल अब सब जन जागे

हृदय कड़ा मत करो चीत्कार सुन लो बढ़ आगे
बाहर निकलो देखो जग में कौन कितने पग पागे
मनवा है बेचैन बहुत अब तन्हाई में मन नहीं लागे
थोड़ा-थोड़ा कदम बढ़ाने से तो प्रेम रसायन जागे