बुधवार, 8 जुलाई 2015

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति 3

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति- 3

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति सीरीज की पिछली दो कड़ियों में हमने विचार किया था कि हाथों और पैरों के कारसपाँडेंट पर शरीर के विभिन्न अवयव आते हैं और शरीर का अपने हाथों पर विभाजन के विषय में विचार किया।
         एक्यूप्रेशर पद्धति में द्रव्य दस कहे गए हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, काल, दिशा, मन, आत्मा और तम। यही माना जाता है कि इनके असंतुलन से बिमारियाँ शरीर को घेर लेती हैं। अब हम देखेंगे कि हाथों की किस अंगुली पर कौन-सा द्रव्य आता है-
दाहिना हाथ (Right hand)-
अंगूठे (Thumb) को शून्य यानि अंक 0 दिया गया है। इस पर तम द्रव्य को रखा गया है।
तर्जनी अंगुली (Index finger) को अंक 4 दिया गया है। इस पर जल द्रव्य को रखा गया है।
मध्यमा अंगुली (Middle finger) को अंक 8 दिया गया है। इस पर मन द्रव्य को रखा गया है।
अनामिका अंगुली (Ring finger) को अंक 5 दिया गया है। इस पर पृथ्वी द्रव्य को रखा गया है।
कनिष्ठिका अंगुली (Small finger) को अंक 1 दिया गया है। इस पर आकाश द्रव्य को रखा गया है।
बाँया हाथ (Left hand)-
अंगूठे(Thumb) को शून्य यानि अंक 9 दिया गया है। इस पर आत्मा(प्रकाश) द्रव्य को रखा गया है।
तर्जनी अंगुली (Index finger) को अंक 3 दिया गया है। इस पर अग्नि द्रव्य को रखा गया है।
मध्यमा अंगुली (Middle finger) को अंक 7 दिया गया है। इस पर दिशा द्रव्य को रखा गया है।
अनामिका अंगुली (Ring finger) को अंक 6 दिया गया है। इस पर काल द्रव्य को रखा गया है।
छोटी या कनिष्ठिका अंगुली (Small finger) को अंक वायु दिया गया है। इस पर तम द्रव्य को रखा गया है।
इसी प्रकार पैरों की अंगुलियों में भी इन दसों द्रव्यों को रखा गया है।
        दोनों हाथों या दोनों पैरों की अंगुलियों पर हर द्रव्य से संबंधित रोग का उपचार दिया जाता है।
        इन द्रव्यों में गड़बड़ होने के कारण बिमारियाँ शरीर में आती हैं। जिस द्रव्य से संबंधित रोग आ जाए उस अंगुलि को दाँयें और फिर बाँए घुमाकर देखने से यदि दर्द अथवा जकड़न की अनुभूति होती हो तो यह इस बात का संकेत है कि उस द्रव्य के असंतुलन के कारण शरीर में समस्या आई है। इसलिए संबंधित अंगुलि पर उपचार दे दिया जाता है।

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति -2

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति- 2

कल की सीरीज में हमने विचार किया था कि हाथों और पैरों के कारसपाँडेंट पर शरीर के विभिन्न अवयव आते हैं।
       आज हम अपने शरीर का अपने हाथों पर विभाजन के विषय में विचार करेंगे।
          हमारे शरीर में दो हाथ, दो पैर और गला और उसके ऊपर का भाग मस्तक तक का भाग है। हमारे दोनों हाथों में पाँच अंगुलियाँ हैं। तर्जनी अंगुली (Index finger), मध्यमा अंगुली (Middle finger), अनामिका अंगुली (Ring finger), छोटी या कनिष्ठिका अंगुली (Small finger), और अंगूठा (Thumb)
          इन अंगुलियों की बनावट देखें तो दिखाई देता है कि अंगुठा हाथ में अंगुलियों से थोड़ी दूरी बनाए हुए है।
        अपने शरीर की ओर देखिए। हमारे दोनों हाथ दूर हैं और हमारी टाँगें पास हैं। इसलिए तर्जनी अंगुली (Index finger) और छोटी या कनिष्ठिका अंगुली (Small finger) बाहों का प्रतीक हैं। मध्यमा अंगुली (Middle finger) और अनामिका अंगुली (Ring finger) दोनों टाँगों का प्रतीक हैं।
          अब दोनों हाथों को अपने सामने की ओर सीधा करके रखें। हाथ की पहली दो अंगुलियाँ तर्जनी अंगुली (Index finger) और मध्यमा अंगुली (Middle finger) सीधी अर्थात Right side बनेंगी और  बाद वाली दो अंगुलियाँ अनामिका अंगुली (Ring finger) और छोटी या कनिष्ठिका अंगुली (Small finger) उल्टी यानि Left side बनेंगी।
          अपनी अंगुलियों की ओर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि हर अंगुली में तीन जोड़ हैं। इन जोड़ों को क्रम से लेते हैं। बाहों की प्रतीक तर्जनी (Index finger) और कनिष्ठिका अंगुलियों (Small finger) पर हथेली की ओर से पहले जोड़ हमारे कंधों (shoulders) के प्रतीक हैं।
         बीच वाले जोड़ हमारी कोहनियों (elbows) के प्रतीक है। ऊपर वाले जोड़ हमारी कलाइयों (wrists) के प्रतीक हैं। इसी प्रकार अंगुलियों की पोरों पर हमारी हथेली व अंगुलियाँ आती हैं।
        टाँगों की प्रतीक मध्यमा (Middle finger) और अनामिका अंगुलियों (Ring finger) में भी तीन जोड़ हैं। हथेली की तरफ से पहला जोड़ हिप ज्वाइंट का प्रतीक है। बीच वाला जोड़ घुटनों (knees) के प्रतीक हैं और ऊपर वाले जोड़ हमारे टखनों (ankles)के प्रतीक हैं। हाथों की पोरें पैरों के तलवे व अंगुलियों के प्रतीक हैं।
         अंगूठे पर दो जोड़ हैं। नीचे वाला जोड़ (Lower griddle)  और ऊपर वाला जोड़ (Upper griddle) हमारे गले के दो जोड़ों के प्रतीक हैं। उसके ऊपर हमारे होंठ और उनके अंदर दाँत आते हैं। उनके ऊपर बीचोबीच हमारी नाक, नाक की समाप्ति से पहले दोनों ओर दो आँखें, अंगूठे दोनों किनारों पर दोनों कान, आँखों के ऊपर की ओर माथा व टाप सिर के प्रतीक हैं।
           बाहों या टाँगों में किसी भी समस्या के आ जाने पर उससे संबधित जोड़ को ट्विस्ट करके आराम पाया जा सकता है।
ये सभी हम निम्न चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं। यहाँ मैं दांए हाथ का चित्र दे रही हूँ, उसी प्रकार बांए हाथ का भी विभाजन होगा।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति-1

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति- 1

मित्रो एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के विषय में कुछ आलेखों की एक सीरीज प्रस्तुत कर रही हूँ। मुझे आशा है कि इसे पढ़ने के पश्चात आप इस उपचार पद्धति का लाभ उठाएँगे।
        एक्यूप्रेशर नेच्युरोपैथी का ही एक रूप है। इसके विषय में जन सामान्य को  कोई विशेष जानकारी नहीं हैं इसलिए वे इसका लाभ नहीं उठा पाते। यह विधा कोई नयी नहीं है।
          हजारों वर्षों पूर्व आयुर्वेद का जन्म पंचम वेद के रूप में हुआ। हमारी महान ऋषि परंपरा रही है औषधि-विज्ञान के क्षेत्र में। इस कड़ी में महर्षि चरक, धन्वन्तरि, आत्रेय, भारद्वाज आदि का नाम प्रमुखता से ले सकते हैं।
         कुछ वर्ष पूर्व जब महात्मा बुद्ध को वेदनिन्दक कहकर तथाकथित विद्वानों ने तिरस्कृत किया, उस समय महात्मा बुद्ध के अनुयायी बहुत से बौद्ध भिक्षुक अपने धर्म का प्रचार करने के लिए अन्य देशों में चले गए। तब विश्व के कई देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। वे बौद्ध भिक्षुक अपने साथ एक्यूप्रेशर की इस विद्या को भी लेते गए। चीन, जापान सहित भारत के बाहर के कई देशों में इस चिकित्सा पद्धति का प्रचार और प्रसार हुआ। वे बौद्ध भिक्षुक अपने साथ एक्यूप्रेशर की इस विद्या को भी लेते गए। चीन, जापान सहित भारत के बाहर के कई देशों में इस चिकित्सा पद्धति का प्रचार और प्रसार हुआ।
         इस पद्धति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके प्रयोग से किसी भी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं होता। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी भी चिकित्सा पद्धति की आलोचना करना नहीं है बल्कि एक्यूप्रेशर के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करना है।
        ऋषियों का मानना है कि हमारे हाथों और पैरों के कुछ विशेष बिन्दुओं पर प्रेशर देकर की बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। कैंसर, मस्तिष्क के रोगों, टीबी, रीढ़ के सभी दोषों, हड्डियों, हृदयरोग, आँखों, दाँतों, डायलसिस, हर प्रकार की पथरी, एड्स, दमा, जन्मजात व हर प्रकार के असाध्य रोगों का उपचार भी इस एक्यूप्रेशर पद्धति से सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अब सरकार ने इस उपचार पद्धति को अपनी मान्यता दे दी है।
        इस चिकित्सा पद्धति पर 'एक्यूप्रेशर शोध प्रशिक्षण एवं उपचार संस्थान', इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में श्री एम. पी. खेमका और श्री जे. पी. अग्रवाल जी की देखरेख में निरन्तर शोधकार्य हो रहा है।
          हमारे शरीर के सभी अंग हाथों व पैरों के कारसपाँडेंट पर आते हैं। फिर उन्हीं कारसपाँडेंट बिन्दुओं पर उन-उन विशेष अंगों के रोगों का उपचार कार्य किया जाता है। या यूँ कह सकते हैं कि एक बिन्दु पर उपचार देने से उससे संबंधित कई रोगों का उपचार होता है। निम्न चित्र से हम समझते हैं कि हमारे हाथों और पैरों में किस स्थान पर कौन-कौन से अंग आते हैं।

रविवार, 5 जुलाई 2015

कस्तूरी की मृग की तरह तलाश

कस्तूरी मृग की तरह हम सुगन्ध को ढूढँने के लिए भटकते रहते हैं। कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है और उसे खोजने के लिए वह जंगल में मारा-मारा फिरता है। उसी प्रकार ईश्वर रूपी कस्तूरी हमारे हृदयों में विद्यमान है पर हम उसे खोजने के लिए भटकते फिरते रहते हैं।
          हम उसे ढूँढने के लिए  कभी तीर्थ स्थलों की सैर करते हैं, कभी जंगलों में भटकते फिरते हैं अथवा धार्मिक स्थानों पर जाकर माथा रगड़ते हैं। पवित्र नदियों के जल में स्नान करके आत्मशुद्धि का व्यर्थ प्रयास करते हैं। इसी कड़ी में तथाकथित पाखण्डी धर्म गुरुओं, तन्त्र-मत्र वालों के जाल में फंसते जाते हैं। पर ईश्वर तो फिर भी कहीं नहीं मिलता। वह तो हमें तभी मिलेगा न जब हम उसे सच्चे मन से तलाशेंगे।
         हम मानते हैं ईश्वर कण-कण में और जर्रे-जर्रे में विद्यमान है। उसे खोजने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह हर घड़ी, हर पल हमारे अंगसंग रहता है। उसका निवास स्थान तो हमारा हृदय है जिसे हमने मंदिर की तरह पवित्र बनाना है। ऐसा तभी होगा जब हम यम-नियमों का पालन सख्ती से करेंगे।
         धर्म के दसों लक्षणों के अनुसार ही चलेंगे- धैर्य, क्षमा, संमय, चोरी न करना, तन-मन की पवित्रता, इन्द्रयों को वश में करना, सद् बुद्धि रखना, विद्या ग्रहण, सत्य बोलना करना और क्रोध न करना।
          इन यम-नियमों और धर्म  का पालन करके हम अपने जीवन को सात्विक बना लेंगे, उस समय जब चाहेंगे अपने मन में उस प्रभु का ध्यान लगाकर उसका साक्षात्कार करने में सक्षम हो सकेंगे।
       हम उस परमपिता का अंश हैं, वह सदा ही हमें अपने में समेटे रखना चाहता है। इसलिए वह सदा ही हमारे साथ रहता है। वह कभी हमें अपने से दूर नहीं करना चाहता। पर हम अड़ियल व नादान बच्चे की तरह उसकी अंगुली छुड़ाकर इधर-उधर भागते रहते हैं। इस संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि हम ललचाते हुए उनकी ओर जाना चाहते हैं।
         यहाँ एक उदाहरण देना चाहती हूँ। बच्चे अपने कैरियर, पढ़ाई या किसी अन्य आकर्षण के कारण अपने माता-पिता को छोड़कर देश अथवा विदेश कहीं भी चले जाते हैं। तब उनके माता-पिता पलक-पाँवड़े बिछाए उनकी राह निहारते रहते हैं और पल-पल उनकी प्रतीक्षा करते रहते हैं।
          यही स्थिति हमारी है हम भौतिक आकर्षणों के कारण, कभी सांसारिक बंधनों को निभाने के नाम पर, कभी अपनी बिमारियों का ढोल पीटते हुए या फिर अपनी व्यस्तताओं का रोना रोते हुए उस प्रभु से दूर होते जाते हैं। हमारे लौट आने की प्रतीक्षा करता हुआ वह वहीं खड़ा रहता है।
          जब हम सच्चे मन से भाव-विभोर होकर उसे पुकारते हैं तो वह हमें अपने में समेट लेने के लिए आतुर हो जाता है। जब हम तन और मन से पवित्र हो जाते हैं,  तब ईश्वर के और करीब हो जाते हैं।
        हमारे विद्वान मनीषी हमें समझाते हैं कि कस्तूरी की तरह हमारे अपने हृदय में विद्यमान उस परमेश्वर की सुगन्ध को पाने के लिए अनावश्यक भटकाव से मुक्त होकर स्वयं को उसके योग्य बनाओ। अपने मन को मन्दिर की तरह पवित्र बनाने के लिए वे बल देते हैं ताकि वहाँ पर ईश्वर का वास हो सके। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि तभी हम ईश्वर के साथ एकाकार या ईश्वरमय हो सकते हैं।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

हीरे की पहचान

हीरे की पहचान जौहरी को ही होती है। वह उसे देखते ही उसके रंग-रूप और कैरेट आदि के अनुसार बिना समय गंवाए उसका मूल्य बता देता है। हम जैसे अनाड़ी कितनी भी देर तक उसे हाथ में पकड़े उल्ट-पुलट कर निहारते रहें फिर भी उसके मूल्य का अंदाजा तक नहीं लगा सकते। हीरा स्वयं यह नहीं कहता कि देखो मैं बहुत मूल्यवान हूँ, मुझे खरीद लो या अपने पास संभालकर रख लो।
         इसी प्रकार इस संसार में हीरे जैसे जो लोग विद्यमान हैं वे भी अपना ढिंढोरा नहीं पीटते और न ही वे स्वयं होकर कहते हैं कि हम विद्वान हैं। आओ हमें पहचान कर हमारी कद्र करो। उन विद्वानों की विद्वता, उनकी सधी हुई वाणी और उनका सभी जीवों के प्रति व्यवहार आदि सद् गुण ही उनकी पहचान होते हैं। वे कहीं भी छिपकर रहें पर फूल की तरह उनकी सुगन्ध चारों ओर फैल जाती है।
           मीलों दूर कूड़े के ढेर की बदबू तेज हवा के चलने पर अपना प्रभाव दिखा देती है। वह पीछा नहीं छोड़ती बल्कि परेशान कर देती है। ऐसे ही हींग को कितनी परतों में छिपाकर रख लो उसकी हीक तो आ ही जाती है। यानि कि सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों ही अपना प्रभाव छोड़ती हैं।
        इसी प्रकार दुर्जन(दुष्ट) की कुख्याति भी देश-देशान्तर में फैलती है। कानून व पुलिस उनके पीछे रहते हैं। उनका दिन-रात का चैन खो जाता है। अपने को बचाने के लिए वे इधर-उधर भटकते रहते हैं और अपने रहने के ठिकाने बदलते रहते हैं। अब सोचिए कि ऐसे अकूत धन का क्या लाभ जो देश व समाज का शत्रु ही बना दे। न चाहते हुए अपना घर-परिवार और बन्धु-बान्धव छुड़वा दे।
        हीरे जैसे विद्वानों की विद्वत्ता देखी जाती है और उनका ज्ञान परखा जाता है, उनकी आयु नहीं देखी जाती। इसी बात इस श्लोकांश में कहा कहा गया है-
           धर्मवृद्धेषु वय: न समीक्ष्यते।
       शरीर में आठ स्थानों से टेढ़े ज्ञानी बालक अष्टावक्र ने उस समय के विद्वानों में अपनी  योग्यता का लोहा मनवा लिया था। हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, सिर्फ खोजने की आवश्यकता है।
         अलौकिक गुणों से युक्त ये महानुभाव सभी के सच्चे हितैषी होते हैं। घर-परिवार, देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए हर समय तत्पर रहते हैं। जो कोई इनके पास जाकर इनसे सहायता की अपेक्षा करता है उसे कभी भी निराश नहीं करते। इनका साथ सोने में सुहागे की तरह होता है। ये लोग सत्वगुण वाले सदाचारी होते हैं। जो स्वयं सन्मार्ग पर चलते हैं और समाज को उचित मार्गदर्शन देते हैं। अपना उद्धार करने के लिए इन महानुभावों की संगति यत्न पूर्वक करनी चाहिए।
        इनकी संगति से मन में पड़ी ग्रन्थियाँ स्वतः खुलने लगती हैं और मन में आए हुए सभी दुर्विचार खुद ही किनारा करते जाते हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब हम राग-द्वेष, छुआछात, जाति-पाति व अमीरी-गरीबी आदि के भेद से स्वयं को ऊपर पाएँगे। सभी जीव हमारे लिए भी एक समान हो जाएँगे।
           अपने आसपास हमेशा ही ऐसे हीरों की तलाश करते रहिए और यथासंभव उनसे जुड़ने का यत्न कीजिए। इस प्रकार लोक और परलोक दोनों सुधर जाएँगे और ईश्वर प्रदत्त मानव जीवन पाने का उद्देश्य भी पूर्ण हो जाएगा।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

ज्ञान का छींटा

ब़चपन में अपनी माता जी के मैं साथ कभी-कभी आर्य समाज चली जाती थी। वहाँ पर एक भजन गाया करते थे। वह मुझे पूरा याद नहीं पर दो-तीन लाइनें याद हैं-
        तेरे दर को छोड़कर किस दर जाऊँ मैं
        सुनता मेरी कौन है जिसे सुनाऊँ मैं
        जबसे याद भुलाई तेरी लाखों कष्ट उठाए हैं
        छींटा दे दो ज्ञान का होश में आऊँ मैं।
इसे सुनकर बाल सुलभ जिज्ञासा मन में उठती थी। उस समय हम बच्चों में उतनी समझ नहीं थी जितनी आज की पीढ़ी चुस्त है। तब मैं सोचा करती थी कि यह सुनता कौन है? अगर यह सुनता कोई इंसान है तो वह क्या सुनाना चाहता है? वह ऐसा क्यों कहता कि उसकी बात कोई नहीं सुनता? सब उसे नजर अंदाज क्यों करते हैं? ये प्रश्न निरंतर मन को उद्वेलित करते रहे।
       फिर जब कुछ बड़ी हुई तो अर्थ समझ आया कि सुनता कोई इंसान नहीं है बल्कि यह हम सब की पीड़ा है कि हमारी बात कोई नहीं सुनता हम किसे अपनी बात सुनाएँ। अब भी प्रश्न मुँह बाए खड़ा रहता कि माता-पिता, भाई-बहन, मित्र-रिश्तेदार आदि सभी तो अपने हैं फिर वे हमारी बात क्यों नहीं सुनेंगे?
        उसके बाद जब गहरे उतरी तो समझ आया कि दुनियावी रिश्ते तो बस नाम के हैं। ये सभी पूर्वजन्म कृत हमारे अपने कर्मों के अनुसार हमारे साथ जुड़े हुए हैं। सभी माया में जकड़े हुए लाचार हैं जो चाहकर भी अपनों के लिए कुछ नहीं कर पाते। बस असहाय से उसके दुख-तकलीफों आदि में व्यथित होते रहते हैं।    
       हमारा असली रिश्ता तो उस परमात्मा के साथ है जिसके हम अंश हैं। वही हमारे लिए सब कुछ करता है। हमें सुख-समृद्धि देता है। हमारे कर्मों के हमें अनुसार जन्म भी देता है और हमारा पालन-पोषण करता है। वही हमारी बातों को सुनता है। हमारे सांसारिक रिश्ते-नाते मुँह मोड़ लेते हैं तो इंसान सबसे कटकर अलग-थलग हो जाता है। कोई भी उसका साथी नहीं रहता। उस स्थिति की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
          सोचिए यदि वह मालिक हमारी ओर से मुख मोड़ ले तो? नहीं, हम यह बात स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। उसे प्रसन्न करने के लिए, उसकी कृपा पाने के लिए हम तरह-तरह के यत्न करते हैं। उसे रिझाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। उन प्रयासों की सफलता या असफलता निश्चित ही हमारी सच्चाई और ईमानदार कोशिशों पर निर्भर करती है।
         इन पंक्तियों में कहा है कि प्रभु को भुला देने पर लाखों कष्टों का सामना करना पड़ा है। जितना उससे दूर होते जाएँगे उतने ही हमारे दुखों में वृद्धि होती जाती है। हम अज्ञानी हैं इसलिए अपराध कर बैठते हैं। यहाँ उस परमपितासे प्रार्थना की है कि हमें ज्ञान का छींटा दे दो ताकि हम होश में आ जाएँ। जैसे बहोश व्यक्ति को पानी का छींटा देते हैं तो उसकी बेहोशी दूर हो जाती है और उसकी चेतना लौट आती है।
          उसी प्रकार हम अज्ञानियों को जब ईश्वर ज्ञान का छींटा देगा तो हमारा अज्ञान दूर हो जाएगा और हमारे अंतस में ज्ञान का प्रकाश हो जाएगा। तब हमें सही-गलत का भेद समझ में आ जाएगा। उस समय हम कुमार्ग का त्याग करके सन्मार्ग की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
          दूसरे शब्दों में कहें तो इस संसार की असारता को समझकर हम सारतत्त्व ईश्वर की ओर अपना ध्यान करेंगें। हम तो मनुष्य हैं न, घाटे का सौदा नहीं कर सकते। यहाँ पर भी अपना लाभ देखते हुए प्रभु की ओर सच्चे मन से उन्मुख होंगे। ऐसा करके ही अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करने का मार्ग सहज हो जाएगा।

बुधवार, 1 जुलाई 2015

अनतरात्मा की आवाज

सभी मनुष्यों के मन से एक ध्वनि(आवाज़) आती है जिसे अन्तरात्मा  या आत्मा की आवाज़ कहते हैं। इसके बारे में हम सब ने सुना है। सोचने की बात यह है कि आखिर आत्मा की आवाज़ है क्या? इस विषय में कहा जा सकता है कि यह ऐसी आवाज़ है जो हमें चेतावनी देती है, जगाती है और प्रोत्साहित करती है। इसे केवल हम ही सुन सकते हैं। हमारे पास बैठा हमारा कोई प्रिय या मित्र तक भी नहीं सुन सकता।
        यह आवाज़ कहीं बाहर से नहीं आती बल्कि हमारे अंत:करण से आती है। जैसे हम अपनों से बात करके उसे गुप्त रखते हैं ताकि उसकी सिक्रेसी बनी रहे उसी तरह हमारे अंतस् से आने आवाज़ भी गुप्त रहे इसीलिए यह अन्य किसी को सुनाई नहीं देती। ऐसा ईश्वर ने विधान बनाया है। वह स्वयं प्रत्यक्ष होकर हमें कुछ नहीं कहता पर इस आवाज़ के माध्यम से सजग करता रहता है।
         यह आवाज़ हमें कब जगाती है? यह विचारणीय है। जब भी हम कोई शुभ कार्य (घर-परिवार, समाज आदि के नियमानुसार कार्य) करते हैं तब हमारे मन में उत्साह होता है, खुशी होती है। इसका अर्थ है कि हमारा किया जाने वाला कार्य करणीय है अर्थात् करने योग्य है। यही वे कार्य हैं जो हमें मानसिक शान्ति व चैन की जिन्दगी प्रदान करते हैं। हमें उन्नति के पथ पर आगे बढ़ाते जाते हैं।
        इसके विपरीत जिन कार्यों को करते समय हमारे मन में उत्साह नहीं होता, वह बैचेन हो जाता है या परेशान होता है तो वे निश्चित ही अकरणीय (न करने योग्य) कार्य होते हैं। घर-परिवार, समाज आदि के नियमों के विरूद्ध किया जाने वाला कार्य है। इसका यही अर्थ होता है कि हमें वह कार्य किसी भी शर्त पर नहीं करना चाहिए। इन कार्यों को करने से मन व्यग्र रहता है, दिन-रात का चैन छिन जाता है। ऐसे कार्यों को करने में असफलता हाथ लगती है।
       मन में होने वाली उथल-पुथल को गहराई से समझने पर स्वयं हम ज्ञात कर सकते हैं कि हमें कौन-से कार्य करने चाहिए और किन्हें छोड़ना चाहिए। यह आवाज़ सदा हमें पतन के रास्ते पर जाने से रोकती है। ईश्वर कभी नहीं चाहता कि हम कुमार्गगामी बनें और घर-परिवार, देश-समाज, पुलिस-कानून आदि से डर-डरकर जीवन व्यतीत करें। उसकी यही इच्छा होती है कि हम सन्मार्ग पर चलकर उसके पास जाने का मार्ग प्रशस्त करें।
         यदि बार-बार हम इस आवाज़ को अपने अहंकार के कारण अनसुना करते हैं तो एक समय ऐसा आ जाता है जब उसे सुन ही नहीं पाते। वह चेतावनी देता रहता है और कोई मौका नहीं छोड़ता पर बस हम ही उससे अनजान बने रह जाते हैं। इसी अज्ञानता के चलते दुखों के सागर में डूबते-उतरते रहते हैं। तब विचार करने लगते हैं कि हमने ऐसा क्या अपराध किया जिस कारण  परेशानियाँ हमारा पीछा नहीं छोड़ रही हैं।
       यदि हम अपनी आत्मा की आवाज़ सुनेंगे और उसे ईश्वर की आज्ञा मानकर कार्य करेंगे तब हम वास्तव में सफलता की सीढ़ियाँ चढेंगे और हमारा मन प्रफुल्लित रहेगा, उत्साहित रहेगा। अपनी व अपनों के जीवन में सुख-शांति बनी रहे इसके लिए अन्तरात्मा की आवाज़ को अनसुना न करते हुए आगे बढ़ते रहें। ईश्वर हम सबका मार्ग प्रशस्त करे।