बच्चे महान समालोचक होते हैं। वे हर चीज का मुआयना (observe) बड़ी बारीकी से करते हैं। बड़ों की कोई भी गलती उनकी नजर से बच नहीं सकती। इसका कारण उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति होती है।
वे हर जगह, हर बात पर सदा ही क्या, क्यों, किसलिए, कब आदि को ढूँढते रहते हैं। इन्हीं सारे प्रश्नों के उत्तर वे खोजते रहते हैं। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे बारबार सबसे प्रश्न पूछते हैं और अपनी शंकाओं का समाधान करते रहते हैं।
कभी-कभी हम उनके इन प्रश्नों से झुँझला जाते हैं और डांटकर उन्हें चुप करा देते हैं। पर बालमन को इस डांट-फटकार से कोई लेना देना नहीं होता। अगले ही पल वह किसी नए प्रश्न को लेकर सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछते हैं।
उन्हें हम स्वयं गलत आदतें सिखाते है। हम उनके सामने झूठ बोलकर कहीं भी जाते हैं पर उन्हें सच बोलने का पाठ पढ़ाते हैं। घर में नापसंद मेहमानों के आने पर हम उनका सत्कार भार समझकर करते हैं और उनकी पीठ पीछे उन्हें भला-बुरा कहते हैं। परन्तु अपने प्रियजनों के आने पर प्रसन्नता से आवभगत करते हैं। बच्चों के सामने बैठ कर अपने कार्यक्षेत्र की, आस-पड़ोस की, मित्रों की संबंधियों अच्छी-बुरी सभी बातें चटखारे लेकर और शेखी बघारते हुए उनके सामने सुनाते हैं। अपने चेहरों पर लगाए मुखौटों के कारण हम समय-समय पर अलग-अलग तरह से व्यवहार करने का प्रयत्न करते हैं।
इन सबके अतिरिक्त किसी के दुख-सुख में मन माने तो हम शामिल हो जाते हैं अन्यथा बहानों की बड़ी लम्बी लिस्ट हमारे पास तैयार रहती है।
घर-परिवार में हम आपस में कैसा व्यवहार करते हैं? बड़े-बजुर्गों के प्रति हमारा रवैया सहानुभूति पूर्ण है या नहीं? छोटों व बराबर वालों के साथ हमारा बर्ताव कैसा है?
आस-पड़ोस से सहृदयतापूर्वक पेश आते हैं या नहीं ये बातें भी बच्चों के कोमल मन की स्लेट पर लिखी जाती हैं जो समय के साथ -साथ और गहरी होती जाती हैं।
बालमन पर पड़े इन संस्कारों के विषय में वह हैरान होकर सोचता रहता है। उसकी यही सोच उसका मार्गदर्शन करती है। अपने आसपास घटित घटनाओं से वह नोट्स बनाता रहता है और जब मौका होता है तो सबके सामने बिना झिझक कह भी देता है कि फलाँ समय पर आपने ऐसा कहा था या किया था। उस समय घर के बड़ों को शर्मिंदा होना पड़ता है। उस समय वे बगलें झाँकते हुए उस मासूम को डाँटकर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि बच्चे के कोमल हृदय पर इस व्यवहार का अच्छा असर नहीं होगा।
यदि बच्चों से अच्छा व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं तो पहले स्वयं के अंतस में झाँककर देखिए। आत्मपरीक्षण करने पर समझ आ जाएगा कि बच्चे के इस मुँहफट रवैये के पीछे स्वयं से ही चूक हो गई है। बच्चा जिद्दी व अड़ियल होकर बिना कारण बार-बार माता-पिता का सिर क्यों नीचा कराता है? उसे उनकी अवमानना करके खुशी क्यों मिलती है?
बच्चों को हम जैसा बनाना चाहते हैं वे वैसे ही बन जाते हैं। स्वयं पर थोड़ा-सा ध्यान देने व संयम रखने से हम बच्चों के व्यवहार को अनुशासित कर सकते हैं। उन्हें एक सभ्य व सुशिक्षित नागरिक बनाने के अपने दायित्व का निर्वहण कर सकते हैं।
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शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
बच्चे महान समालोचक
गुरुवार, 6 अगस्त 2015
वृद्ध छतनार वृक्ष
एक नन्हे से शिशु का जन्म जब घर में होता है तब हम सब बहुत प्रसन्न होते हैं। उसके आने पर हम उत्सव मनाते हैं। बन्धुओं और मित्रों को दावत देते हैं। इसका कारण है कि वह नवागन्तुक हमारे सपनों की मूरत होता है। उससे हमारी सारी आकांक्षाएँ और हमारे सपने जुड़े होते हैं।
उसको पल-पल बढ़ते हुए देखकर हम उसमें अपना बचपन जीते हैं। हमारा सारा जीवन उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता है। उसकी उन्नति से हम प्रसन्न होते हैं। उसके कष्ट में हम परेशान होते हैं। हम अपने सपने उसके माध्यम से पूरे करना चाहते हैं। वह हमारे इस जीवन का आधार होता है।
अपने बच्चों के लिए यह सब करते हुए हम यह सोचते हैं कि जब हम अशक्त होंगे अथवा वृद्ध होंगे तब वह हमारी लाठी बनेगा। बड़ा होकर वह हमारा ध्यान उसी प्रकार रखेगा जैसे हम उसका रखते हैं।
दूसरी ओर घर में बैठे बड़े-बजुर्गों से कोई आशा नहीं होती इसलिए उनकी ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना देना चाहिए। वृद्धावस्था के कारण वे अशक्त हो जाते हैं। पहले की तरह वे अपने कार्यों को उतनी चुस्ती से नहीं कर पाते। उन्हें अपने बच्चों के मजबूत कांधों की आवश्यकता होती है। उस समय बच्चों की तरह उनको देखभाल की आवश्यकता होती है।
यदि उनके अपने बच्चे भी उनकी ठीक तरह से देखभाल नहीं करेंगे तो फिर वे किससे आशा रख सकेंगे। बहुत से घरों में वे भार की तरह माने जाते हैं। उस समय मनुष्य भूल जाता है कि वे भी उसके माता-पिता हैं। उन्होंने भी उन बच्चों से वैसी ही उम्मीद लगाई थी जैसी वे अपने बच्चों से लगा रहे हैं। इस अन्तर को यदि सभी बच्चे समझ लें तो बजुर्गों के प्रति अपने दायित्वों से वे कभी भी मुँह नहीं मोड़ सकेंगे।
एक ही घर में बच्चों और बड़ों के प्रति किए गए व्यवहार में इतना अन्तर तो हर किसी को स्पष्ट दिखाई देता है।
न जाने समय कब करवट बदल लेता है। ये बच्चे बड़े होकर अपना एक अलग ही घोंसला बना लेते हैं। माता-पिता के उन सारे सपनों को और अरमानों को चकनाचूर करते हुए वे रोजी-रोटी, व्यवसाय अथवा किसी भी अन्य कारणवश अपने ही देश में अन्यत्र या विदेश में कहीं भी चले जाते हैं। इंसान चाहे या न चाहे पर अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह सब तो उसे करना ही पड़ता है। इसके लिए किसी को भी दोष नहीं दिया जा सकता। यह सब तो विधि का विधान है। सब मनुष्य के अन्न-जल पर निर्भर करना है। उसकी कर्मस्थली उसे वहाँ बुला लेती है।
यह सृष्टि का क्रम है कि आज जो बच्चे हैं वे आने वाली पीढ़ी के लिए माता-पिता होंगे। इसी प्रकार उनके बच्चे अपनी भावी पीढ़ी के माता-पिता बनेंगे। आज की पीढ़ी के माता-पिता एक छतनार वृक्ष की भाँति हैं जो घर-परिवार को छाया और आशीर्वाद की अपनी पूँजी देते हैं। उनकी छत्रछाया में अनेक नए बच्चे रूपी बीज अंकुरित होते हैं। ऐसे उन गहरी जड़ों वाले वृक्षों को भी सहारे की आवश्यकता होती है। अत: उनके प्रति सदा ही सहृदयता का व्यवहार करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य है। उनकी उचित देखभाल, उनकी सेवा-सुश्रुषा करना और उनकी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति करना बच्चों का परम कर्त्तव्य है। इस जिम्मेदारी से मुँह मोड़कर उन्हें अपयश का भागीदार बनने से बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 5 अगस्त 2015
दूसरों के महल देखकर
दूसरों के सुन्दर महल देखकर ईर्ष्या करके अपने मन को अकारण व्यथित नहीं करना चाहिए। किसी मनुष्य को उसके भाग्य से ज्यादा और समय से पहले कुछ नहीं भी मिलता। यदि इस थ्योरी पर हम विश्वास करते हैं तो भी हमें अनावश्यक रूप से दूसरों की उन्नति और अपनी तंगहाली पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।
कोई भी इसे उचित नहीं कहेगा कि दूसरे का महल देखकर हम अपने झोंपड़े को अग्नि के हवाले कर दें। इसीलिए किसी सयाने ने हमें समझाते हुए कहा है-
देख पराई झोंपड़ी मत ललचावीं जी
रुखी सुखी खाए के ठंडा पानी पी॥
अर्थात दूसरों के ऐश्वर्य को देखकर अपना मन को नहीं ललचाना चाहिए। अपने भाग्य अथवा पुरुषार्थ से जो भी रूखा-सूखा मिले उसे खाकर और ठंडा पानी पीकर संतोष करना चाहिए।
कोई कितने व्यंजन खाता है, कितने प्रकार के सुखों का भोग करता है? किसी के पास कितनी गाड़ियाँ हैं? कितने नौकर-चाकर हैं? इस सबको नगण्य (इग्नोर) करते हुए मनुष्य को सदा अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। जो भी हम प्राप्त करना चाहते हैं उसके लिए ईमानदार यत्न करना चाहिए। बारबार प्रयास करने और ईश्वर के न्याय पर भरोसा करके ही मनुष्य अपना मनचाहा पा सकता है।
यह तो स्पष्ट है कि अपने भाग्य से जो भी हमें मिला है उसी पर संतोष करते हुए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। अनावश्यक ही भाग्य को कोसने अथवा उस मालिक को दोष देने से कुछ भी नहीं होगा। वह बड़ा न्यायकारी है और किसी के साथ अन्याय नहीं करता।
जो भी अच्छे या बुरे कर्म हम करते हैं उसी के अनुसार ही हमें फल मिलता है। कारण यह है कि कर्म करने में हम स्वतन्त्र हैं। जब हम सत्कर्म करते हैं तब ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। परन्तु जब हम कुकर्म तब हम अपने मन के राजा होते हैं।
हमें किसी का डर नहीं होता। हम सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने, उसे आग लगा देने आदि की बात करते हैं। किसी की जान ले लेना, किसी का अपमान करना तो खेल बन जाता है। उस समय हम भूल जाते हैं कि इन सब का परिणाम भुगतना पड़ता है। सांसारिक न्यायालय से प्रमाणों के अभाव में बरी हो सकते हैं पर उस परम न्यायाधीश की अदालत से सजा पाए बिना नहीं बच सकते। क्योंकि वहाँ किसी गवाह या सबूत की आवश्यकता नहीं होती।
इसीलिए ऋषि-मुनि और विद्वान हर कदम सम्भाल कर रखने का परामर्श देते हैं। यदि समय रहते हुए हम चेत जाएँ तो उस प्रभु के कोप से बच सकते हैं। उसकी बेआवाज लाठी हमें दुखों की ओर नहीं ले जाएगी।
अपनी सुख-समृद्धि के रास्ते का रोड़ा हम स्वयं हैं। जब हम समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त होते हैं तभी उनका परिणाम न चाहते हुए दुखों के रूप में ही भुगतते हैं। हम अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं।
यही कारण है कि संसार में इतनी असमानता है। कोई बहुत सुन्दर है, कोई मृत्यु पर्यन्त स्वस्थ रहता है, कोई जीवन में सुविधाओं का भोग करता है, कोई उच्च पद पर आसीन है, कोई हर प्रकार से सुखी जीवन जीता है।
इसके विपरीत कोई कुरूप है, दो जून रोटी भी नहीं खा सकता, कोई जन्मजात रोगी है, किसी को जीवन भर लानत झेलनी पड़ती है, कोई अभावों में एड़ियाँ रगड़ते मरता है।
हमें सदा अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए दूसरों से कभी ईर्ष्या-द्वेष नहीं करना चाहिए। उनकी समृद्धि को देख यथासंभव सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त होना चाहिए ताकि आगामी जन्मों हमें भी मनचाहे ठाठ मिल सकें।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 4 अगस्त 2015
सुखी रहने का शार्टकट
सुखी रहने का शार्टकट है कि अपने जीवन में कोई झंझट न पालो। किसी जीव अथवा पशु-पक्षी से इतना मोह न बाँधो कि उनके जाने के बाद अनावश्यक रूप से परेशान होना पड़े या रोना पड़े।
लोग विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों को पालतू बना लेते हैं। फिर उसके बाद इंसानों की तरह उनकी देखरेख, खानपान, डाक्टरी सुविधाओं आदि के लिए समय निकालना पड़ता है। आपाधापी वाले जीवन में आजकल उसकी कमी सबसे ज्यादा रहती है।
मैं सोचने लगी कि दो-चार प्रकार के ही जीव-जन्तु होंगे जिन्हें लोग पालतू बनाते हैं। पर गहराई से सोचने पर तो लिस्ट बढ़ती ही जाने लगी। हम इन पालतू जीवों का इस प्रकार वर्गीकरण कर सकते हैं-
1. अपने शौक के लिए कुत्ता, बिल्ली, तोता, मोर, रंग-बिरंगी चिड़ियाँ, बतख, कबूतर, बटेर, सुन्दर चमकीली मछलियाँ आदि पालते हैं।
2. रोजी-रोटी के लिए लोग बंदर, साँप, नेवला, भालू, हाथी, घोड़ा, गधा, खच्चर आदि जीवों को पालते हैं।
3. दूध के व्यवसाय के लिए गाय, भैंस और बकरी आदि को पालते हैं।
4. मुर्गियों को भी अपने व्यवसाय के लिए पालते हैं।
5. कृषि के लिए बैलों आदि को पालते हैं।
घोड़ा, भैंसा, बैल, गधा आदि को आज भी सवारी के लिए भी प्रयोग में लाते हैं।
हाथी भी प्रदर्शन का एक बड़ा माध्यम है। अनेक स्थानों पर इसकी आवश्यकता होती है। बंदर, साँप, नेवला और भालू के खेल हम प्राय: देखते रहते हैं।
विदेशों में तो इन पशु-पक्षियों के अतिरिक्त और भी न जाने किन-किन जीवों को पालते रहते हैं जिनके बारे में डिस्कवरी आदि टीवी चैनलों पर हम अक्सर देखते रहते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न प्रकार के पशुओं को हम अपनी जरुरत, मनोरंजन, घर की सजावट व सुरक्षा के लिए पालते हैं।
कहते हैं पशु के साथ पशु बनना पड़ता है तभी इनका पालन कर सकते है। इनके रहने व खाने के लिए भी समुचित व्यवस्था करनी पड़ती है। अब शहरों में तो स्थानाभाव के कारण यह संभव नहीं हो पाता। कभी हम भारतीयों की समृद्धि के प्रतीक कहे जाने वाले गोधन, गजधन और बाजिधन अब घरों से लुप्त हो गए हैं। अब मुट्ठी भर लोगों के लिए ये व्यवसाय के लिए बनकर रह गए हैं।
घरों में प्राय: कुत्तों को पाला जाता है। उनका स्वास्थ्य परीक्षण, खानपान की व्यवस्था, उन्हें प्रातः सायं सैर के लिए ले जाना आदि नियमित जिम्मेदारी होती है। यदि वे किसी को काट लें तो और समस्या हो जाती है।
मछलियों को एक्वेरियम में सजा कर रखा जाता है। उनका पानी निश्चित अवधि में बदलना, खाने का प्रबन्ध करना आदि आवश्यक होता है। देखभाल में जरा सी चूक हो जाए तो मछलियाँ मर जाती हैं।
इसी प्रकार अन्य सभी पशुओं की भी देखरेख, नियमित खानपान और उनके स्वास्थ्य आदि के प्रति सचेत रहना पड़ता है।
कहने का सीधा-सा अर्थ है कि पशु भी बच्चों के समान पाले जाने चाहिएँ। यदि कहीं परिवार सहित घर से दूर जाना हो तो बड़ी विकट समस्या हो जाती है। पीछे उन जीवों की देखरेख में कमी न हो बस यही चिन्ता सताती रहती है। इन्हीं सभी प्रकार की समस्याओं को देखते हुए कहा है-
'जे सुख लोड़ें जिन्दड़िए ते कुकड़ी वी न रख।'
अर्थात मनुष्य को जीवन में यदि सुकून से रहना हो तो उसे मुर्गी तक नहीं पालनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 3 अगस्त 2015
किसी के प्रभाव में न आएँ
संसार में आने वाले सभी जीव भिन्न-भिन्न प्रकृति के होते हैं। हम कुछ मुट्ठी भर लोगों को ही जानते हैं जो हमारे संपर्क में होते हैं शेष अन्यों को नहीं। इसकी भी कोई गारंटी नहीं कि हम उन्हें भलीभाँति पहचानते हैं। हो सकता है वे मुखौटा लगाकर दूसरों को प्रभावित कर उन्हें अपने जाल में फंसा रहे हों। हमारे लिए किसी के रंग-रूप, धन-संपत्ति, डीलडौल( व्यक्तित्व) या लच्छेदार बातों के कारण बिना जाँचे-परखे उसके प्रभाव में आ जाना युक्तिसंगत नहीं।
मनुष्य अपने स्वभाव व आदतों से परखे जाते हैं। रहीम जी इस दोहे के माध्यम से कौवे और कोयल का उदाहरण देते हुए लोगों को सही रूप में पहचानने का सद् परामर्श देते हैं-
दोनों रहिमन एक से, जब तक बोलत नाहीं।
जान परत हैं काक-पिक, ऋतु बसंत के माहीं॥
इस दोहे के माध्यम से रहीम जी कौवे की मूर्खता और कोयल की मक्करी के बारे में बताते हुए सतर्क रहने के लिए समझा रहे हैं। रंग व रूप में दोनों मिलते-जुलते हैं। दोनों का रंग काला है। कोयल मीठा गाकर सबका मन मोह लेती है। इसके विपरीत किसी के घर की मुंडेर पर कौआ बोले तो कर्कश ध्वनि के कारण लोग उसे कंकर मार कर उड़ा देते हैं। कोयल की मक्करी की हद तो देखिए अपने अंडे सेने के लिए कौवे के घोंसले में रख देती है। मूर्ख कौवा उसकी चाल नहीं समझ पाता। वसंत ऋतु जब आती है तब कोयल की आवाज़ के कारण उन दोनों का वास्तविक रूप सबके सामने आ जाता है।
यह बहुत बड़ा सत्य है कि हम प्राय: लोगों को पहचानने में भूल कर बैठते हैं। दूसरों की चिकनी-चुपड़ी बातों में बिना आगा-पीछा सोचे आ जाते हैं जिससे हम धोखा जा जाते हैं। कुछ लोग आस्तिन के साँप की तरह होते हैं जो मौके-बेमौके डंक मारने से भी नहीं चूकते।उनसे सावधान रहना बहुत आवश्यक होता है।
'दूरतः पर्वता: रम्या:' अर्थात् दूर से देखने पर तो पर्वत भी सुन्दर लगते हैं पर पास जाने पर उनका सौंदर्य गायब हो जाता है और हमें परेशानियाँ दिखाई देने लगती हैं। वहाँ ऊपर चढ़ने की कठिनाई और हर तरफ एक अजीब सी गंध भी महसूस होती है।
उसी प्रकार सभी इंसान हमें देखने में भले प्रतीत होते हैं परंतु जब उनसे व्यवहार किया जाता है तब उनकी असलियत सामने आ जाती है कि वे कितने पानी में हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 2 अगस्त 2015
जीवन का वास्तविक आनन्द
जीवन का वास्तविक आनंद वही ले पाते हैं जो कठोर श्रम करते हैं आलस करने वाले या सुविधाभोगी नहीं। जिन्हें पकी-पकाई खीर मिल जाए वे खीर बनाने का रहस्य नहीं जान सकते। उसके लिए कितना श्रम करना पड़ता है, कितनी प्रकार की सामग्रियाँ जुटाई जाती हैं? उसको बनाने वाले की भावना या उसके प्यार के मूल्य को वे उतना नहीं जान सकते।
ठंडी हवा का सुख उसी व्यक्ति को समझ में आ सकता है जो बाहर की गरमी में तपकर आया है, अपना पसीना बहाकर आया है या परिश्रम करके थका हुआ है। जो मनुष्य दिन भर कूलर या एसी में बैठा हुआ गरमी में खूब ठंडक का आनन्द ले रहा है वह हवा की शीतलता के वास्तविक सुख का अहसास नहीं कर सकता।
फूलों की खूशबू उसी व्यक्ति को मोहित करती है जो फूलों का आनंद लेना जानता है। सारा दिन इत्र, डियो आदि में नहाया रहने वाला प्राकृतिक सुगंध से दूर होता जाता है। उसे फूलों से सुगंध के स्थान पर दुर्गन्ध का आभास होता है।
दिनभर शीतल पेय पीने वाले, फ्रिज और वाटर कूलर ठंडे जल पीने वाले वास्तव में जल की शीतलता के वास्तविक सुख से वंचित रहते हैं। गरमी में तपकर आए हुए व्यक्ति को मटके या नल का जल मिल जाए तो वह भी उसके लिए अमृत तुल्य होता है।
माता-पिता के मेहनत से कमाए धन पर ऐश करने वाले पैसे की कीमत नहीं जानते। पर यदि दुर्भाग्य से उन्हें जब कभी एड़ी-चोटी का जोर लगाकर पापड़ बेलते हुए बहुत कठिनाई से धन कमाना पड़ता है तब उन्हें उसकी कीमत पता चलती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य सुविधाभोगी हो जाता है तो वह वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता हैं। जमीनी हकीकत से मुँह मोड़ लेता है।
ईश्वर न करे यदि अस्वस्थ होने पर या दुर्भाग्यवश कभी किसी भी कारण से सुविधाओं से वंचित होना पड़े अथवा कभी जीवन की सच्चाइयों से दो-चार होना पड़े या उनका सामना करना पड़े तो हालात बड़े कठिन हो जाते हैं।
इन्हीं स्थितियों से जीव जगत को बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने गीता में द्वन्द्व सहन करने का सदुपदेश दिया था। हमें सभी सुविधाओं को भोगते हुए विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए सन्नद्घ रहना चाहिए और प्रतिदिन ईश्वर द्वारा दी गई नेमतों के लिए उसका धन्यवाद करना चाहिए।
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शनिवार, 1 अगस्त 2015
मानव जन्म कठिनता से
मानव शरीर में रहने वाली इस आत्मा का भौतिक शरीर धारण करना कोई नई बात नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने आत्मा के शरीर बदलने के विषय में कहा है-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,
नवानि गृह्णाति नरोSपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य-
न्यानि संयाति नवानि देहि॥
इस श्लोक का अर्थ है कि हम मनुष्य पुराने, कटे-फटे कपड़ों को बदलकर नए वस्त्र पहन लेते हैं उसी प्रकार आत्मा रोगी, बूढ़े शरीरों को छोड़कर नए शरीर धारण करती है।
सृष्टि के आदि से अब तक अगणित योनियों में इसने शरीर धारण किया है। युद्धक्षेत्र में अपने बन्धु-बान्धवों को देखकर जब महान धनुर्धर अर्जुन जब विचलित हो गए थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाते हुए श्रीमद्भगवद्गीता में कहा था-
न त्वाहं जातु नासं च त्वं नेमे जनाधिपा:।
न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम्॥
अर्थात जो भी इस युद्धक्षेत्र में विद्यमान मैं, तुम और ये सभी राजा पहले इस संसार में नहीं थे ऐसा नहीं है और भविष्य में जन्म नहीं लेंगे ऐसा भी नहीं है। यह श्लोक हमें स्पष्ट रूप से बता रहा है कि हम सब लोग बार-बार इस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।
इस संसार का शायद ही कोई संबंध होगा जिसमें ये आत्मा अवतरित नहीं हुई। भौतिक शरीर के अनेकानेक माता-पिता, भाई-बन्धु, मित्र, बॉस, सेवक आदि रहे हैं जिनकी गणना करना हमारे लिए असंभव है।
जब जीव के पुण्य कर्म और पाप कर्म बराबर हो जाते हैं तब उसे मनुष्य का जीवन मिलता है। अनेक कष्टों को भोगकर और अनेकानेक योनियों में आवागमन करता हुआ जीव मानव योनि प्राप्त करता है। यदि पुण्य कर्मों की अधिकता हो तो सभी ऐश्वर्यों से पूर्ण जीवन व्यतीत करता है। पुण्य कर्मों की जमापूँजी (bank balance) न होने पर जीव को जीवनकाल में अभाव ग्रस्त जीवन जीने पर विवश होना पड़ता है।
अभावों में जीवन व्यतीत करने वाले मृत्यु पर्यन्त संघर्ष करते रहते हैं परन्तु सफल नहीं हो पाते। अगर पूर्वजन्मों में पुण्यकर्मों को अपने खाते में जमा किया होता तो शायद वे भी सुख-समृद्धि का भोग कर रहे होते। जीवन काल में कभी तो सफलता की आहट सुन लेते। तब न अमीरों से घृणा करते और न ही अमीरी के स्वप्न उन्हें उद्वेलित करते।
यदि अब सद् कार्य करके अपने कर्मों की जमापूंजी में बढ़ोत्तरी कर लेंगे तब हमें किसी से ईर्ष्या करने की या दूसरों की होड़ करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। हम अपने शुभकर्मों से ही वह सब वस्तुएँ प्राप्त कर लेंगे जो जीवन जीने के लिए उपयोगी हैं।
सार यही है कि जितने शुभकर्म अपने अकाऊँट में जमा किए हैं उतना ही सुकून व सुख-समृद्धि जीव को प्राप्त होती है। पिछले जन्मों में हमने क्या किया? हम नहीं जानते पर यह जन्म तो हमारे समक्ष है। यदि अब हम सचेत हो जाएँ और अगले जन्म के लिए कुछ पुण्यों को अपने खाते में जोड़ लें तो आगामी जन्मों में अपना जीवन सुविधा सम्पन्न बना सकते हैं।
यह मानव जन्म बहुत ही कठिनाई से मिलता है। न जाने किन किन तूफानों को पार करके यह नर तन मिलता है इसे यूँ ही व्यर्थ न गंवाएँ।
'जो बीत गया सो बीत गया अब आगे की सुधी लो' को ध्यान में रखते हुए अभी से आत्मचिन्तन आरम्भ कर दें। लोक एवं परलोक दोनों को ही सुधारने के लिए कटिबद्ध हो जाएँ। कठिन कुछ भी नहीं है बस अपनी इच्छाशक्ति को जगाना है। शेष ईश्वर शुभ करेगा।
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