समय बीतते एक आयु के पश्चात मनुष्य बच्चे के समान हो जाता है। तब उसकी देखभाल बच्चे के समान ही करनी पड़ती है। वह भी बारबार बच्चों की तरह रूठने-मानने लगता है। अधिक बोलने लगता है। यदि किसी कारण से उसकी बात को अनसुना कर दिया जाए तो वह बौखला जाता है कभी-कभी अनाप-शनाप भी बोलने लगता है।
इसका कारण है कि सारी आयु वह संघर्ष करता रहता है। उसे अपना व अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिन-रात एक करना पड़ता है। स्वयं के विषय में सोचने के लिए ऐसी परिस्थितियों में उसके पास समय ही नहीं होता। जीवन की आपाधापी में अथवा भागदौड़ में उसे पता ही नहीं चलता कि वह कब युवा से वृद्ध हो गया। उसका रिटायरमेंट का समय आ गया।
रिटायरमेंट यानि साठ साल की आयु के बाद उसके जीवन में एक खालीपन सा आने लगता है। सवेरे से रात तक की उसकी व्यस्तता अब नहीं रहती। उसे समय व्यतीत करना भारी पड़ने लगता है। ऐसे समय में कुछ लोग पुनः नौकरी का प्रयास करते हैं और कुछ लोग अपना मन बहलाने के लिए दोस्तों का आसरा ढूँढते हैं, ताश खेलते हैं, सवेरे सैर करने जाते हैं, ग्रुप बनाकर कभी-कभार घूमने चले जाते हैं।
व्यापारियों की रिटायरमेंट थोड़ी देर से होती है जब तक वे स्वस्थ हैं काम करते रहते हैं। क्लब जाते हैं, पार्टियाँ देते रहते हैं और अपनी मीटिंगस में व्यस्त रहते हैं। पर एक समय के पश्चात उनके सामने भी वही समय बीताने की समस्या आती है।
जो लोग ऐसे समय में जो लोग हाबी अपना लेते हैं वे इस समस्या से निजात पा लेते हैं। कुछ समय पूजा-पाठ में बिताने से मन को शांति मिलती है। कोई सामाजिक कार्य करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। इससे मनुष्य व्यस्त रहता है और उसका खालीपन भी उसे कचोटता नहीं है और समाज का भी भला होता है।
कुछ और आयु बीतने पर मनुष्य की शक्ति कमतर होने लगती है। फिर वह अशक्त होने लगता है। बीमारियाँ उसे घेरने लगती हैं। उसे स्वस्थ होने में समय अधिक लगता है। डाक्टरों व अस्पतालों के चक्कर लगाते हुए हिम्मत जवाब देने लगती हैं उस समय उसे सहारे की आवश्यकता होती है। अपनों के प्यार व दुलार की जरूरत होती है।
ऐसे समय में जब उसकी बातों को बच्चे अनसुना करते हैं तो वह यह सहन नहीं कर पाता। उसे लगता है कि आयुभर जो अनुभव उसने कमाया है बच्चे उसका लाभ नहीं उठा रहे। वे उसे मूर्ख और स्वयं को अधिक समझदार मान रहे हैं। इसे वह अपना अपमान समझता है।
शरीरिक शक्ति क्षीण होने से वह स्वयं अपने कार्यों को पहले की तरह चुस्ती से नहीं कर पाता। इसलिए चिड़चिड़ा हो जाता है। इसी कारण वह अधिक बोलने लगता है।
आज बच्चे अपने दायित्वों को निभाने में दिन-रात एक कर रहे हैं। परन्तु उस वृद्ध को लगता है कि वे उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहे बोझ समझ रहे हैं। अत: वह खफा रहने लगता है, शिकायतें करता है।
आयु का यह दौर सबके लिए बहुत ही कष्टकारी होता है। सेवा करने वाले भी परेशान हो जाते हैं और सेवा करवाने वाले भी। नकारेपन के अहसास के कारण सेवा करवाना बहुत मुश्किल होता है।
इन आयुप्राप्त लोगों को बस अपनों के प्यार-दुलार, सहारे और विश्वास की ही आवश्यकता होती है। यथासंभव थोड़ा-सा समय निकाल कर उनकी बात सुनें और उन्हें मात्र इतना भर अहसास दिला दें कि वे उन पर बोझ नहीं हैं। वे उनके अपने हैं और उन्हें बहुत प्यार करते हैं। बच्चों को उनके पास बैठने के लिए प्रेरित करें ताकि उन बजुर्गों का अंतिम दौर शांति व प्रसन्नता से व्यतीत हो।
उनकी नागवार बातों को अनदेखा व अनसुना करके बच्चों के समान उनका ख्याल रखें। इसीलिए कहते हैं-
'बच्चा बूढ़ा एक समान।'
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 8 सितंबर 2015
बच्चा बूढ़ा एक समान
सोमवार, 7 सितंबर 2015
आकर्षक पैकिंग से सावधान
आकर्षक पैकिंग को देखकर हम प्रभावित हो जाते हैं और यह मान लेते हैं कि इसके अन्दर रखी वस्तु भी उतनी ही अच्छी क्वालिटी की होगी जितनी यह दिखाई देती है। परन्तु हमेशा ही ऐसा नहीं होता। बहुधा हम धोखा खा जाते हैं और अपने धन एवं समय की हानि कर बैठते हैं।
उस समय हम स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस करते हैं। हमें इतना क्रोध आता है कि हमें ठगने वाला यदि हमारे सामने आ जाए तो उसका सिर फोड़ दें। परन्तु यह तो समस्या का हल नहीं है। आज किसी एक व्यक्ति या संस्था विशेष ने हमें धोखा दिया है तो इसकी क्या गारंटी है कि कोई और उसके झांसे में आकर ठगा नहीं जाएगा।
समाचार पत्रों में हमें अक्सर ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं जो किसी को भी बहुत प्रभावित कर लेते हैं। उनमें तरह-तरह के लालच परोसे जाते हैं।
आप लोगों को शायद याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व प्लांटेशन वालों ने सबको बहुत भरमाया था। समयावधि का तो मुझे ध्यान नहीं जिसके पश्चात इन्वेस्ट की गई राशि से कई गुणा राशि लौटाने का वादा किया गया था। उसके बाद सब कहाँ चले गए किसी को पता नहीं।
गली-मुहल्लों में भी बहुत बार ठगने की नियत से लोग आते हैं जो वादा करते हैं कि सोने को दुगना कर देंगे। सोने को दुगना तो क्या करेंगे परन्तु वे ठग कर चले जाते हैं।
इसी प्रकार बहुत-सी ऐसी कम्पनियाँ हैं जो उनके पास पैसा इन्वेस्ट करने वालों को बैंक की ब्याज दर से दुगना या तिगुना देने का वादा करती हैं। पर फिर थोड़े दिनों के पश्चात ही लोगों की मेहनत की कमाई बटोरकर रातोंरात गायब हो जाती हैं। अब ढूँढ लीजिए उन मक्कारों को।
ऐसे ही कई शेयर या डिविडेंड ऐसे भी हैं जिनमें यह पंक्ति लिखी रहती है कि मार्केट रिस्क इसमें रहेगा। तो इनमें पैसा इंनवेस्ट कर करने का तो मुझे कोई औचित्य समझ नहीं आता।
इसी प्रकार सस्ते व किश्तों पर प्लाट बेचने वाले विज्ञापन भी आकर्षित करते हैं क्योंकि सिर पर छत तो हर व्यक्ति चाहता है। वहाँ लोग पैसा फंसा देते है और जब कब्ज़ा लेने की बारी आती है तो पता चलता है कि वहाँ या तो ऐसी कोई जमीन नहीं जो उन्होंने खरीदी थी या उस जमीन को कई लोगों को बेचा गया है।
लोगों को विदेश भेजने का धन्धा भी जोरों पर चलता है। बिना पूरे कागजों के विदेश जाने वालों का क्या हाल होता है इसके उदाहरण हमें अपने आसपास ही मिल जाते हैं।
यह कुछ उदाहरण मैंने लिखे हैं जहाँ फंसकर मनुष्य न घर का रहता है न घाट का। एक व्यक्ति जब अनजाने में इस तरह के प्रलोभनों में फंस जाता है तो उसका बाहर निकलना उसके ठगे जाने के बाद ही होता है। उस समय यदि कोई साथी या रिश्तेदार उन्हें चेतावनी देने का प्रयास करता है तो उसे वे अपना शत्रु समझते हैं। उन्हें उस समय लगता है कि सभी उसकी तरक्की से जलते हैं। कोई नहीं चाहता कि वह सभी सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हो जाए।
उस समय वे सोचते हैं कि यह सब प्राप्त करना उनके बूते की बात नहीं है इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं। उनके लिए वे प्रायः इन मुहावरों का प्रयोग करके उनकी हंसी उड़ाते हैं- 'अंगूर खट्टे हैं। और हाथ न पहुँचे थे कौड़ी।'
तुच्छ लालच में आकर इन धोखेबाजों से बचना चाहिए। अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को यूँ ही बरबाद नहीं करना चाहिए।
बाद में पुलिस स्टेशन में जाकर कितनी ही शिकायतें कर लीजिए पर वे लुटेरे तो लूटकर कर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। उन्हें पकड़ने में वर्षों लग जाते हैं। केवल सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठकर स्वयं अपने विवेक पर भरोसा कीजिए। अपने धन को व्यर्थ न गंवाकर उसे अपने पास या बैंक में सम्हाल कर रखना चाहिए ताकि वह हमारे सुख-दुख में काम आ सके। इन लोगों के विषय में हम यही कह सकते हैं-
'ऊँची दुकान फीका पकवान।'
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 6 सितंबर 2015
मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा
इस कथन से कोई भी मनुष्य इन्कार नहीं कर सकता कि मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा होता है। मूर्ख मित्र अपनी मूर्खता के कारण कब वार कर दे यह कोई नहीं जान सकता। इसका कारण यही है कि ऐसा मित्र स्वयं ही नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है? वह जानबूझकर हमारा अहित नहीं करता अपितु अनजाने में उससे गलती हो जाती है। वह अपने ही प्रिय मित्र पर घात तक कर बैठता है।
अपने शत्रु के विषय में हम जानते हैं कि वह तो दुश्मनी निभाएगा ही। उससे हम सदा ही सतर्क रहते हैं। हमारा यही प्रयास रहता है कि शत्रु वार करे उससे पहले हम चौकस हो जाएँ। ऐसा करने से शत्रु के वार का हम पर प्रभाव कम पड़ता है। वैसे तो हमारा यत्न यही रहता है कि उसे ऐसा कोई मौका न दिया जाए कि वह हम पर हावी हो जाए।
एक कथा प्रचलित है कि किसी राजा ने एक बन्दर को पाला था। उसे वह मित्र की तरह मानता था। वह बन्दर राजा की बहुत सेवा करता था। एक बार राजा सो रहा था और बन्दर उसे पंखा कर रहा था। इतने में एक मक्खी उड़कर राजा के मुँह पर इधर-उधर बैठने लगी। बन्दर उसे उड़ाने का यत्न करने लगा पर वह मक्खी इतनी ढीठ थी कि वह मान ही नहीं रही थी। मक्खी की इस ढिठाई पर बन्दर को क्रोध आ गया और तलवार लेकर उसे मारने के लिए सोचने लगा। इसी बीच राजा की नींद खुल गयी। उसने बन्दर के हाथ में तलवार देखकर सोचा कि मूर्ख मित्र से तो शत्रु ही अच्छा है। यदि मैं समय पर न जागता तो यह बन्दर मुझे मार ही डालता।
यह कथा हमें समझाने के लिए है कि क्रोध में आकर मूर्ख मित्र कब हम पर वार कर दे पता नहीं चलता। शत्रु के वार करने का तो हमें हमेशा अंदेशा रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि शत्रु को छुपकर वार करने की आवश्यकता नहीं होती। उसका तो खुला चैलेंज होता है।
अतः इस प्रकार मूर्ख मित्र के हाथों विनाश करवाने से अच्छा है कि शत्रु से ही हाथ मिला लिया जाए और उसे अपना बना लिया जाए।
मूर्ख को मित्र बनाना चाहें तो अवश्य बनाइए। पर उससे समझदारी की उम्मीद रखना मनुष्य की मूर्खता है। हाँ, अपनी जी हजूरी आप उससे करवा सकते हैं। उसे अपना चमचा बना सकते हैं। अपने बराबर बिठाकर परामर्श नहीं कर सकते। उससे दूरी बनाकर रखने में ही सदा अपनी भलाई समझनी चाहिए।
आज हम राजनीति में देखते हैं कि एक दल के सदस्य दूसरे दल वालों को अनाप-शनाप कोसते हैं, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है और आम जनों के सामने ऐसा प्रदर्शन करते हैं कि मानो एक-दूसरे को कच्चा चबा जाएँगे। परन्तु जब किसी कारणवश अपना दल छोड़कर कर किसी अन्य दल में जाकर शामिल हो जाते हैं तो कुछ देर पहले वाले सब प्रसंगों को भुलाकर नए दल का गुणगान करते नहीं थकते। अपने पुराने दल के साथियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जो पहले इस दल के सदस्यों के साथ करते थे।
इस प्रकार रातों-रात सभी समीकरण बदल जाते हैं। जब हमारे पथप्रदर्शक नेता लोग शत्रु को मित्र बनाने में संकोच नहीं करते तो आम जन को भी अपने शत्रु से हाथ मिलाने से बचना नहीं चाहिए।
यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम कैसे मित्रों का चुनाव करना चाहते हैं? जैसा रुचिकर हो वैसा मानकर अपने भविष्य के लिए जीवन का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 5 सितंबर 2015
आँखों देखी व कानों सुनी
आँखों देखी और कानों सुनी हुई बात पर भी हमें पूर्णरूपेण विश्वास नहीं कर लेना चाहिए। प्रायः ऐसा होता है कि हम अधूरी बातें सुनकर ही किसी के प्रति अपनी राय बना लेते हैं जिसका दुष्परिणाम हमें समय आने पर भुगतना पड़ता है।
लोग सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करके किसी व्यक्ति के विषय में धारणा बना लेते हैं जबकि वास्तविकता से उसका दूर-दूर तक लेना देना नहीं होता। सच्चाई के सामने आते ही मनुष्य को शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है और फिर वह बगलें झाँकने लगता है। ऐसी स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आजकल टीवी पर अक्सर यह सब दिखाई देता है। वहाँ किसी वाक्य विशेष पर टीका-टिप्पणी अथवा चर्चाएँ नित्य होती रहती हैं। बाद में संबंधित व्यक्ति यह कहकर अपनी सफाई देता है कि मैंने जो इस वाक्य से पहले कहा था या उसके बाद, सारे प्रसंग को मिलाकर देखिए फिर कथन का अर्थ कीजिए। इस प्रकार कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है।
सयाने हमें सोच-समझकर बात करने के लिए कहते हैं- 'पहले तोलो फिर बोलो।' यानि कि एक-एक शब्द को इस प्रकार सोचकर बोलो जिससे कोई उन शब्दों को अपने अनुसार ढालकर आपको अपमानित न कर सके। इसी कड़ी में आगे चेतावनी देते हुए कहते हैं-
'दीवारों के भी कान होते हैं।'
इसका अर्थ यह नहीं है कि दीवारों के कान लग गए हैं और उन्होंने ने सुनना शुरु कर दिया है। इसका अर्थ है कि कमरे के बाहर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति शायद बात सुन रहा होगा। चोरी-छिपे दूसरों की बातों को सुनने वाले अक्सर गच्चा खा जाते हैं। पूरी बात न सुन पाने के कारण वे अधूरे विचारों को ही ब्रह्म वाक्य मान लेते हैं तथा शत्रुता तक कर बैठते हैं। पूर्वाग्रह पाले हुए वे आजन्म इसे निभाने का प्रयास करते हैं।
घर-परिवार में, बन्धु-बान्धवों में अथवा कार्यक्षेत्र में हर स्थान पर ही यह समस्या सामने आती है। लोग अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में इस प्रकार के कुत्सित कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
दूसरों की बातों को तोड़-मरोड़कर अथवा नमक-मिर्च लगाकर किसी व्यक्ति विशेष की छवि घर-परिवार में या साथियों में धूमिल करना चाहते हैं। वे अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हीं की तरह कोई अन्य व्यक्ति भी ऐसा घृणित खेल खेल सकता है। इस सबसे बचने के लिए मनुष्य को हर कदम पर सदा सतर्क रहना चाहिए। उसे सदा अपनी आँखों और कानों को खुला रखना चाहिए।
मनुष्य को किसी के भी मुँह से कोई बात सुनकर तैश में नहीं आना चाहिए। उसे बात की तह तक जाना चाहिए। हो सकता है कि कहने वाले का वह तात्पर्य कदापि न हो जैसा उसने सुन-समझ लिया हो। यदि बात को गहराई से समझने का मन न हो तो उस व्यक्ति से सीधी बात करके तथ्य को जाना जा सकता है।
दूसरी बात यह कि दूसरे व्यक्ति को स्पष्टीकरण का मौका भी दिया जाना चाहिए। इससे अनावश्यक मन-मुटाव से बच सकते हैं। ऐसा यदि कर लिया जाए तो आपसी वैमन्स्य नहीं बढ़ता। न अपने मन को कष्ट होगा न दूसरे का दिल दुखता है। ऐसे समझदार व्यक्ति की संसार में सभी लोग सराहना करते हैं कि बड़ी सूझबूझ से समस्या को हल कर लिया।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2015
शिक्षक दिवस पर विशेष
शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) पर विशेष
शिक्षक या आचार्य कैसा होना चाहिए यह विषय आज बहुत महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि हमारे लाड़लों के भविष्य निर्माण का दायित्व उनके कंधों पर है।
प्राचीन काल में हमारे देश भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति होती थी। वहाँ गुरु पथप्रदर्शक होता था। उसके मार्गदर्शन में शिष्य सर्वांगीण विकास करता था। अपने छात्र के जीवन निर्माण का दायित्व उसका होता था इसलिए उसे गुरु कहा जाता था। वह निस्वार्थभाव से बिना किसी वेतन के शिक्षण कार्य करता था।
उपनिषद के शिक्षा वल्ली में शिक्षा पूर्ण कर चुके शिष्यों को गुरुकुल से विदा होते समय आचार्य उपदेश देता है-
माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। अतिथि को देवता मानो। सृष्टि के क्रम को न तोड़ना। जो हमारे अच्छे कार्य हैं उन्हें ग्रहण करते हुए उन पर चलो। परन्तु यदि कोई हमारा कार्य अनुकरणीय न हो तो उसे छोड़ देना।
आज के इस भौतिक युग में धन के प्रधान हो जाने से जीवन के इन मूल्यों का अभाव ही होता जा रहा है। शिक्षक भी व्पापारी होते जा रहे हैं। वे कक्षा में पढ़ाएँ या न पढ़ाएँ पर उनकी दुकानदारी चलनी चाहिए वाला कुछ शिक्षकों का एटीच्यूट शिक्षा पद्धति के लिए घातक बनता जा रहा है।
आज समय व परिस्थितियाँ बदल गईं है। धन पहली आवश्यकता बन गया है। इसीलिए ट्यूशन सेंटर कुक्करमुत्ते की तरह फैलते जा रहे हैं। इससे अध्यापकों की संवेदनशीलता पर प्रश्न चिह्न लगता जा रहा है।
शिक्षक शब्द का अर्थ ही यही है कि वह शिक्षित करे यानि अपने छात्रों को अपनी जीवन पद्धति के अनुसार ढाले। एक शिक्षक से सभी यह उम्मीद करते हैं कि वह उन्हें अपनी पारिवारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत को यथावत सौंपे। अपने देश के प्रति समर्पण की भावना बच्चों में कूट-कूटकर भरे।
वह स्वयं चरित्रवान बने और अपने छात्रों को भी इसका पालन करने के लिए प्रेरित करे।
कुछ मुट्ठी भर शिक्षकों के कदाचार के कारण यह गुरु-शिष्य का पवित्र संबंध आज कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। अध्यापक आज अपने ही शिष्यों लड़के या लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते पकड़े गए हैं। कुछेक बलात्कार जैसे घृणित कार्य तक कर बैठे हैं। वे अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्य को भूल गए हैं कि शिष्य या शिष्या बेटे एवं बेटी ही होते हैं। इस प्रकार के चारित्रिक पतन ने उन्हें अधम बना दिया है।
शिक्षकों की एक और गंभीर समस्या है कि वे दैनन्दिन सामान्य ज्ञान से भी परे हैं। प्रायः वे मात्र केवल उस विषय की जानकारी रखना चाहते हैं जिसे स्कूल या कालेज में पढ़ाते हैं। उनमें से भी बहुत से ऐसे अध्यापक हैं जो अपना विषय है या जिसे पढ़ाते हैं उसमें भी दक्ष नहीं हैं। अपने ज्ञान की वृद्धि करने की ललक उनमें नहीं है। इसलिए अन्य पुस्तकें या पत्र-पत्रिकाएँ तो छोड़िए अपने विषय से संबंधित पुस्तकें तक नहीं पढ़ना चाहते। बिना तैयारी के कक्षा में चले जाते हैं और बच्चों में हंसी का पात्र बनते हैं।
जहाँ शिक्षक को अपनी योग्यता व ज्ञान के बल पर अपना स्थान बनाना चाहिए था वहाँ वह ऐसे शिष्यों की तलाश करता है जिनके माता-पिता धनाढ्य हैं या बड़े-बड़े व्यापारी हैं या राजनैतिक रुतबे वाले हैं या ऊँचे पदों पर कार्य रत हैं ताकि तुच्छ भौतिक स्वार्थों की पूर्ति कर सके। ऐसा ही कुछ हाल शिक्षण संस्थानों का भी है।
शिक्षक या आचार्य को यदि अपनी गरिमा बनाए रखनी है व प्राचीन भारतीय गुरुओं की भाँति सम्मान चाहिए तो अपने को सामर्थ्यवान बनाना होगा। अपने सात्विक गुणों, निस्वार्थ सेवा और अपनी योग्यता आदि गुणों को अपने अंतस में समाहित करना होगा।
सभी मित्रों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 सितंबर 2015
खाली बैठना कठिन
मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि खाली रहना अर्थात निठल्ला बैठना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है। परिश्रम करते-करते जब थक जाते हैं तब हम कहते हैं कि अब हमें ब्रेक चाहिए। थोड़ा-सा विश्राम करके या फिर घूम-फिर कर हम तरोताजा हो जाते हैं और फिर अपने काम में उसी ऊर्जा से वापिस जुट जाते हैं।
मैं कभी-कभी उन लोगों के विषय में सोचती हूँ जो सवेरे से शाम तक कोई कार्य नहीं करते। यानि निरुद्देश्य जीवन जीते हैँ। सारे दिन में बस खा लिया और सो गए। बहुत हुआ तो दोस्तों के साथ शापिंग कर ली या फिर क्लब की सैर कर ली। इस प्रकार के जीवन में न कोई जिम्मेदारी और न ही कोई आकर्षण।
कुछ गृहिणियाँ जो ईश्वर की कृपा से समृद्ध हैं और घर पर रहती हैं। उनके घर में नौकर-चाकर काम करते हैँ। उन्हें तो यह भी पता नहीं होता कि बच्चे स्कूल गए हैँ या छुट्टी कर गए। उन्होंने कुछ खाया भी है या नहीं। नौकरों ने जो कुछ उल्टा-सीधा बना दिया वह बच्चे को पसंद आया या नहीं। उसने वह खाया था क्या? उनका पति अपने व्यापार के लिए कुछ खाकर या बिना खाए कब घर से चला गया?
इसी प्रकार जो पुरुष भी खाली बैठे रहते हैं वे भी अपने जीवन से निराश हो जाते हैं।कुछ लोग ताश खेलकर या व्यर्थ निन्दा-चुगली करने लगते हैं। नवयुवा जो इधर-उधर डोलते रहते हैं उन्हें सब टोक देते हैं कि कोई काम-धन्धा करो, अवारा मत फिरो। स्पष्ट है कि खाली बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति सबकी आँखों में खटकता है। अपना कार्य करने में व्यस्त व्यक्ति को ही सब पसंद करते हैं।
खाली बैठने के कारण मनुष्य धीरे-धीरे अनावश्यक बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है। उसका एक काम बढ़ जाता है। वह काम है रोज डाक्टरों के चक्कर काटना। जबकि उनकी बीमारी होती उनका खालीपन होती है।
खाली बैठकर अनावश्यक सोचते रहने से मन और शरीर दोनों प्रभावित होते हैं। विचार प्रवाह प्रायः नकारात्मक होने लगता है सकारात्मक नहीं। सयाने कहते हैं कि-
'खाली घर भूतों का डेरा।'
अर्थात खाली पड़ा हुआ घर हमेशा भूतों की निवास स्थली बन जाता है।
कहने का तात्पर्य है यह है कि वहाँ उस घर में नकारात्मक ऊर्जा आने लगती है। जब वहाँ चहल-पहल होने लगती है तब स्थितियाँ अलग हो जाती हैं। वही हाल खाली दिमाग का भी होता है। इसीलिए कहते हैं-
'खाली दिमाग शैतान का घर।'
फालतू बैठे सोचते रहने से दिमाग में प्रायः सकारात्मक विचार नहीं आ पाते बल्कि नकारात्मक विचार घर करने लग जाते हैं। उस समय ऐसा लगता है मानो मस्तिष्क की नसें फटने लगी हैं। सारा शरीर बेकार-सा हो रहा है।
ऐसी स्थिति में जो स्वयं को सम्हाल पाते हैं वे बच जाते हैं और जिनका अपने ऊपर वश नहीं रहता वे समय बीतते मनोरोगी बन जाते हैं। नित्य डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए धन व समय को व्यय करते हैं।
अपने आप को किसी सकारात्मक कार्य में लगाए रखना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो किसी हाबी में स्वयं को व्यस्त रखना चाहिए। किसी सामाजिक कार्य को करते हुए भी व्यस्त रहा जा सकता है।
कहने का तात्पर्य है कि इस दिमाग को खाली मत छोड़ो। जहाँ इसे मौका मिला यह तोड़फोड़ करना आरंभ कर देगा। जितना अधिक यह व्यस्त रहेगा उतना ही खालीपन का या अकेलेपन का अहसास नहीं करेगा। यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि क्या करे बोर हो रहे हैं। इसे भी खुराक मिलती रहनी चाहिए अन्यथा यह बागी होकर कहर ढाने लगता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 सितंबर 2015
सार तत्त्व ग्रहण करें
मनुष्य का स्वभाव सूप (छाज) की भाँति होना चाहिए यानि सार तत्व को ग्रहण करने वाला होना चाहिए और जो कुछ भी अनावश्यक है अर्थात कूड़ा है उसे उड़ा देने वाला होना चाहिए। यह वास्तव में बहुत ही व्यावहारिक ज्ञान है।
सूप में जब अनाज को साफ करने के लिए फटका जाता है तो उसमें जो भी कूड़ा-कर्कट होता है वह आगे आ जाता है जिसे फैंक दिया जाता है। यह क्रम तब तक चलता है जब तक अनाज साफ न हो जाए। सूप का यही स्वभाव है कि वह साफ-सुथरी वस्तुओं को अपने पास रखता है और उनमें पड़े कूड़े को उड़ाकर अलग कर देता है।
यदि मनुष्य जीवन में आने वाले कटु-मधुर अनुभवों से कुछ सकारात्मक शिक्षा यानि सार तत्व ग्रहण कर लेता है तो उसका जीवन सफल हो जाता है। परन्तु यदि नकारात्मक ज्ञान यानि व्यर्थ बातों में स्वयं को उलझाए रखता है तो उसका जीवन दूभर हो जाएगा।
जीवन का सार तत्त्व यही है कि मनुष्य ईमानदारी और सच्चाई से अपनी रोजी-रोटी कमाए। किसी से ईर्ष्या-द्वेष न करे। अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों को यथाशक्ति पूर्ण करे। अपने देश के प्रति वफादारी निभाए। बिना किसी पूर्वाग्रह के घर में आने वाले सभी अतिथियों का खुले मन से स्वागत करे। सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण नियमपूर्वक करता रहे।
धर्म व समाज विरोधी कार्य मनुष्य जीवन में व्यर्थ के व्यवहार हैं। उनसे यथासंभव बचना चाहिए क्योंकि बुराइयों की जड़ वे मनुष्य के लिए कष्ट का कारण बनते हैं।
ज्यों-ज्यों मनुष्य जीवन में उन्नति करता है त्यों-त्यों उसमें दुर्गुणों के आने की संभावना बढ़ जाती है। यदि उस समय वह याद रखे कि मुझे इन दुर्गुणों से बचना है, अपने जीवन में इन्हें स्थान नहीं देना है तो वह अपनी परीक्षा में खरा उतरता है।
ऐसे व्यक्ति की सुगन्ध उसके बिना कुछ कहे चारों ओर स्वयं ही फैल जाती है। वह सबके लिए आदर्श बन जाता है, सबके लिए उदाहरण बन जाता है। लोग उसके जैसा बनने का यत्न करने लगते हैं। उसे अपने सिर माथे पर बिठाते हैं।
ऐसा सारग्राही व्यक्ति ही पथप्रदर्शक बनकर नेतृत्व करता है। लोग उसके सद् परामर्श से अपने जीवन को सफल बनाने का प्रयास करते हैं।
मानव मन बहुत ही चंचल है। यह यहाँ-वहाँ कभी भी, कहीं भी भटकता रहता है। यह मन क्षणिक लालच, तुच्छ स्वार्थ अथवा भय के कारण शीघ्र ही विचलित हो जाता है। उस समय सभी जीवन मूल्य, जो सार हैं उन्हें ताक पर रखने में हिचचिकाता नहीं है। तब वह गलत रास्ते का चुनाव कर भटक जाता है। फिर समय बीतते वह कूड़े-कर्कट की तरह बाहर निकालकर फैंक दिया जाता है।
इसीलिए हमारे मनीषी समझाते हैं कि दुनिया के आकर्षणों में फंसकर स्वयं को दुखों की भट्टी में मत झोंको। ऐसा करके मनुष्य न स्वयं को कष्ट देता है अपितु अपने उन प्रियजनों के लिए भी दारुण दुख का कारण बन जाता है जिन्हें अपने जीवन काल में गर्म हवा तक नहीं लगने देना चाहता। यदि थोथेपन को अपनाने या उस मार्ग पर चलने का विचार मन में आए तो उसके दुष्परिणाम सोचते हुए उसे झटक दो या उड़ा दो, इसी में बुद्धिमत्ता है। इसीलिए कबीरदास कहते हैं -
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय॥
चन्द्र प्रभा सूद
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