माँ के रूप में एक बहुत ही अमूल्य उपहार मनुष्य को ईश्वर ने दिया है। उस परमात्मा को तो हम मनुष्य कभी इन चर्म चक्षुओं से देख नहीं सकते। परन्तु उस मालिक ने अपने प्रतिनिधि के रूप में जो माँ रूपी एक देवता मनुष्य को भेंट में दिया है, उसे हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। माता ईश्वर का ही दूसरा रूप है।
ईश्वर को प्रसन्न करने, उसे पाने के लिए मनुष्य पूजा-पाठ, जप-तप करता है। नाना विध उपाय करता है। यदि मनुष्य का इरादा दृढ़ हो, लगन सच्ची हो और प्रयत्न ईमानदार हो तो अन्ततः वह ईश्वर को पाकर निहाल हो जाता है।
उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी माता की सच्चे मन से सेवा करता है, उसका हर तरह से ध्यान रखता है और उसका किसी तरह से दिल नहीं दुखाता तो माता उससे सदा सन्तुष्ट रहती है और हरपल उसे अपने आशीर्वाद की दौलत से मालामाल करती रहती है। ऐसे बच्चों से ईश्वर भी प्रसन्न रहता है।
ईश्वर इस संसार की सृष्टि करता है और माता अपनी सन्तान की रचना करती है। नौ मास तक निज गर्भ में रखकर, अपने रक्त से उसका सिंचन करती है। कदम-कदम पर वह उसकी ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। उसे संस्कार देती है, योग्य बनाने के लिए जी-जान से यत्न करती है। उसके स्पर्शमात्र से ही बच्चा अपने दुखों और परेशानियों से मुक्ति पाता है।
'प्रतिमानाटकम्' में कवि भवभूति ने बड़े सुन्दर शब्दों में माता के इस स्पर्श के विषय में बताया है कि-
हस्तस्पर्शो हि मातृणामजलस्य जलाञ्जलि:। अर्थात् पुत्र के लिए माता के हस्त (हाथ) का स्पर्श प्यासे के लिए जलधारा के समान होता है। यानी माता का स्पर्श मनुष्य को जीवनदायिनी शक्ति देता है। उसे सदा यह विश्वास होता है कि सारी दुनिया चाहे उसे छोड़ दे पर माता उसका त्याग नहीं करेगी। माँ का साथ होना, उसे कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने देता।
स्कन्दपुराण में माता के विषय में कहा है कि-
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गति:।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा।।।
अर्थात माँ के समान छाया नहीं है, माँ के समान कोई गति नहीं है, माँ के समान कोई त्राता या रक्षा करने वाला नहीं है, माँ के समान कोई प्रपा या प्याऊ नहीं है।
इस श्लोक का यह भाव है कि माता की छत्रछाया में एक मनुष्य को आजीवन शीतल छाया यानी सुरक्षा मिलती रहती है। माता की आज्ञा का पालन करना, सेवा करना ही उसकी सबसे बड़ी गति है। माँ के समान इस ब्रह्माण्ड में कोई दूसरा नहीं है जो उसकी रक्षा कर सके। माता ही उसके जीवन की सारी कमियों को दूर करके उसे जल की तरह शीतल, शुद्ध, पवित्र और प्रवहणशील बनाती है।
इन्सान घर के बाहर अपने लिए सुख और शान्ति की खोज के लिए भटकता रहता है, परन्तु वह सच्ची शान्ति उसे घर के बाहर नहीं अपितु अपनी माता के चरणों में ही मिलती है। यदि हर व्यक्ति इस बात को ध्यान में रख सके तो उसे किसी तीर्थ स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। न ही उसे जंगलों में भटकने की जरूरत रह जाएगी।
इन्सान को तथाकथित गुरुओं की शरण में जाकर धोखा नहीं खाना पड़ता। तान्त्रिकों और मान्त्रिकों के बहकावे में आकर अपने कठोर परिश्रम से कमाए हुए धन और बहुमूल्य समय को व्यर्थ गँवाना नहीं पड़ता। उसका स्वर्ग और इस दुनिया की सारी दौलत उसकी माता के चरणों में ही है।
आयुप्राप्त माँ को यदि अपने बच्चे ही बेसहारा छोड़ देंगे, उसका और उसकी आवश्यकताओं का ध्यान नहीं रखेगे, उसके स्वास्थ्य की चिन्ता नहीं करेंगे तो इसका सीधा-सा अर्थ यही होगा कि उन्होंने अपनी माता की ही नहीं अपितु ईश्वर की भी अवमानना की है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 6 जनवरी 2017
माँ ईश्वर का उपहार
गुरुवार, 5 जनवरी 2017
माँ का रूठना
माँ का रूठना मानो सारे संसार का रूठ जाना होता है। जिन लोगों की माँ उनसे नाराज होकर रूठ जाती है, उन्हें घर-परिवार के लोग और समाज कभी माफ नहीं करता। सब सुख-सुविधाएँ होते हुए भी उनके मन का एक कोना रीता रह जाता है। उन्हें हर समय मानसिक सुख और शान्ति प्राप्त करने के लिए इधर-उधर भटकते ही रहना पड़ता हैं।
मनुष्य के लिए उसकी माँ सर्वस्व होती है। माता के बिना मनुष्य के अस्तित्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। माँ है तो उसकी सन्तान है। इस सार्वभौमिक सत्य को कोई झुठला नहीं सकता कि यदि वही नहीं होगी तो सन्तान कभी इस दुनिया में नहीं आ सकेगी।
हर मनुष्य के लिए माँ जीवनदायिनी शक्ति होती है। उसकी माता ही उसके लिए ऊर्जा और विश्वास का भण्डार होती है। वह आँख बन्द करके, बिना किसी झिझक के अपनी माता की अँगुली थामकर चल सकता है। उसके मन मे कभी यह भाव नहीं आता कि उसका अहित हो जाएगा।
माँ अपने सारे सुखों और सुविधाओं की बलि चढ़ाकर अपनी सन्तान को पोषित करती है। जब तक बच्चा चलने-फिरने या बोलने लायक नहीं हो जाता तब तक उसे देखभाल की बहुत आवश्यकता होती है। उसे पलभर के लिए भी घर में नजरों से परे करने का यह अर्थ होता है बच्चा किसी समस्या में घिर गया है। इसलिए उसकी सदैव चौकसी करनी पड़ती है।
छोटे बच्चे के लिए सरदी, गरमी, बरसात आदि हर पहला मौसम परेशानियाँ लेकर आता है। उसकी हर कठिनाई में उसे सम्बल चाहिए होता है, जिसे माता ही उसे देती है। उसे स्कूली शिक्षा के लिए तैयार करना और फिर जीवन में हर कदम पर सफल होने के लिए माँ ही उसकी सहायक बनती है।
वह उसके बड़े होने, योग्य बनने के लिए सदा ईश्वर से प्रार्थना करती रहती है। उसके सारे जप-तप, पूजा-पाठ सदा अपनी सन्तान की भलाई और खुशहाली के लिए ही होते हैं। उसके सारे कष्टों को अपने ऊपर ले लेने की कामना हर माँ करती है। बड़े होकर बच्चे अपने जीवन में सेटल हो जाते हैं तब उसकी प्रसन्नता का कोई पारावार नहीं रहता।
बच्चा जब बड़ा हो जाता है और अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है तब अपनी माता का हर प्रकार से ध्यान रखना, उसकी सारी आवश्यकताओं को प्रसन्नतापूर्वक मन से पूर्ण करना उसका परम दायित्व होता है। उसका सदा यही प्रयास होना चाहिए कि उससे जाने-अनजाने ऐसा कोई कार्य न होने पाए जिसके कारण उसकी माता को किसी भी प्रकार का कष्ट पहुँचे।
माता के दिल को दुखाना किसी भी इन्सान को शोभा नहीं देता। जिस माता ने उसे सदा दुनियादारी की शिक्षा दी, पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाया, उसी माता को बड़े होकर यह कहना कि आपको कुछ भी नहीं पता यानी वह मूर्ख है, यह सबसे बड़ा अपराध है।
मनुष्य के जीवन का आधार जो ऐसी जननी है, उसके प्रति कोताही बरतना, उसका तिरस्कार करना किसी भी तरह से क्षम्य नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति को किसी भी तरह से क्षमा नहीं किया जा सकता।
इसीलिए ब्रह्माण्डपुराण ने बड़े स्पष्ट शब्दों में मनुष्य को चेतावनी देते हुए मनुष्य से कहा है-
पातकानां किलान्येषांप्रायश्चितानि सन्त्यपि।
मातेद्रुहामवेहि त्वं न क्वचित् किल निष्कृति:।।
अर्थात निस्सन्देह अन्य पातकों ( पापों) का प्रायश्चित हो सकता है परन्तु मातृ-द्रोह का कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता।
कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य यदि कोई गलत कार्य या कुकर्म करता है तो उसका प्रायश्चित किया जा सकता है, उसके लिए सजा भोगी जा सकती है। परन्तु माता के प्रति वह कोई दोष करता है या बुराई करता है तो उसका इस संसार में किसी प्रकार का कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता।
मनुष्य को सदा यही प्रयत्न करना चाहिए कि देवतुल्य माता के साथ स्वप्न में भी ऐसा व्यवहार न करे जिससे उसके मन को कभी कष्ट हो अथवा रुष्ट हो करके उसे अपनी ही सन्तान से भारी मन से मुख मोड़ना पड़ जाए। ऐसी कृत्य के लिए इस लोक में तो क्या परलोक में भी उसे शान्ति नहीं मिल सकती।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 4 जनवरी 2017
माँ होने के मायने
माँ होने के मायने हैं परमपिता परमेश्वर की बनाई हुई सृष्टि का विस्तार करना। माता को ही इस विशेष योग्यता का उपहार उस मालिक ने दिया। इसी कारण ही हमारे शास्त्र माँ को देवता कहकर सदा सम्मानित करते हैं। बच्चों को 'मातृदेवो भव' का निर्देश देते हुए कहते हैं कि वे देवता के समान उसकी पूजा-अर्चना करें। उसकी सेवा करने में कभी कोताही न बरतें।
स्त्री का जीवन मातृत्व का उपहार पाकर पूर्ण होता है। सन्तान न होने पर उसके जीवन में अधूरेपन का अहसास रह जाता है। यह दंश उसे मृत्यु पर्यन्त कष्ट देता रहता है। उसका सुख और चैन सब स्वाहा हो जाते हैं।
बच्चों की होने वाली किलकारियों से घर जीवन्त हो उठता है। घर गूँजायमान होता रहता है और चहल-पहल बनी रहती है। बच्चे सभी के आकर्षण का केन्द्र होते हैं। चाहे सभी सदस्य घर में विद्यमान हों फिर भी उनके बिना एक खालीपन-सा घर में घर कर जाता है।
बच्चों का रूठना-मानना, खेलना-कूदना, जिद करना आदि सभी हरकते माँ को हार्दिक प्रसन्नता देती हैं। उसकी भोली और मनमोहक अदाओं पर वह बलिहारी जाती है। जब वे मिट्टी से लोटपोट होकर आते हैं तब वह उनकी बलैंया लेते नहीं अघाती। उसका सारा संसार उसके बच्चे के होने से होता है।
माता छोटे बच्चे को अँगुली पकड़कर चलना सिखाती है। उसे अक्षर ज्ञान कराती है। इसलिए वह बच्चे की प्रथम गुरु कही जाती है। उसकी तुतलाती बातों को सुनकर अपने सारे दुख और तकलीफों को भूल जाती है। उसके आँचल की छाँव में बच्चा स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है। माँ की गोद में बच्चा बड़ा होकर भी स्वयं को धन्य समझता है।
माँ के न होने का अभाव उन बच्चों से अधिक कोई नहीं समझ सकता जिनकी माता उन्हें अल्पायु में छोड़कर इस संसार से विदा लेकर परलोक सिधार जाती है। उन बच्चों के जीवन में उसकी कमी बनी आजीवन बनी रहती है। उनके मन में निराशा का भाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
किसी दुर्घटनावश अथवा किसी भी जीवन साथी की नपुंसकता के कारण यदि घर में सन्तान न हो सकने की स्थिति बन जाए तब अपने घर में रौनक बनाए रखने के लिए, किसी बच्चे को गोद लिया जा सकता है। वह बच्चा चाहे किसी रिश्तेदार का हो या फिर किसी जान पहचान वाले का हो, उसे गोद ले लेना घर के लिए उचित होता है।
अनाथालय से भी बच्चा गोद लिया जा सकता है। इस तरह किसी अनाथ को माता-पिता और एक घर मिल जाता है। माँ को उसका मातृत्व का सुख मिलता है और उसके आ जाने से मानो घर आबाद हो जाता है।
आजकल नई वैज्ञानिक तकनीक से 'टेस्ट ट्यूब बेबी' पैदा किए जा सकते हैं। आई.वी.एफ. अथवा सैरोगेसी जैसे नवीन माध्यमों मे लोग सन्तान का सुख प्राप्त कर रहे हैं।
प्राचीन काल में भारत में इस तरह की समस्या का समाधान करने के लिए मनुस्मृति में नियोग प्रथा का उल्लेख है। पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा उपाय किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि पति जीवित है और संतान नहीं हो सकती तो भी इसके अनुसार घर-परिवार में उसकी सहमति से एक बच्चे को जन्म दिया जा सकता है। परन्तु किसी विशेष परिस्थिति में दो बच्चे उत्पन्न किए जा सकते थे। इसके विपरीत यानी आनन्द के लिए ऐसा आचरण करने वाले दण्ड और प्रायश्चित के भागीदार होते थे।
इस प्रथा के उदाहरण पाण्डु, धृतराष्ट्र और विधुर आदि के विषय में महाभारत का अध्ययन करके जाना जा सकता है।
माँ और उसके ममत्व का कोई भी ओरछोर नहीं होता है। उसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता। उसकी इस महानता के समक्ष देवता भी नतमस्तक होकर उसकी प्रशस्ती गाते हैं। माँ के इस मायने की एक सार्थकता यह भी है कि देवता भी उसकी गोद में आने के लिए लालायित रहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 3 जनवरी 2017
माँ घर का केन्द्र
माँ घर और परिवार की धुरी या केन्द्र बिन्दु होती है। घर के सारे सदस्य उसी के चारों ओर घूमते रहते हैं। उसके बिना घर घर नहीं रह जाता, वह श्मशान के समान बन जाता है। उस घर में पसरने वाला सन्नाटा बहुत ही कष्टदायी होता है।
आज भी पुरुष प्रधान समाज में वही घर का मुखिया कहा जाता है। घर के कार्यों का बटवारा मनीषियों के अनुसार इस प्रकार किया गया है कि उसमेँ किसी भी तरह के झगड़े की गुँजाइश नहीं रह जाती। पति पुरुष का कार्य होता है कि वह धनार्जन करके लाए और अपनी पत्नी को सौंप दे। पत्नी का कार्य होता है घर-गृहस्थी का सुचारू रूप से संचालन करना ।
यह गृहस्थी रूपी गाड़ी को चलाने का सकारात्मक तरीका है। आज स्थितियों में कुछ परिवर्तन आ गया है। लड़कियाँ भी उच्च शिक्षा ग्रहण करके अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। यानी वे भी अपना व्यापार या नौकरी करने लगी हैं।
स्थितियों में थोड़ा परिवर्तन आया अवश्य है। पुरुष आज भी घर का मुखिया है। वह कमाकर लाएगा वाली स्थिति बदल गई है। आज स्त्री भी धन कमाती है। वह घर और व्यवसाय दोनों क्षेत्रों को दक्षता से सम्हालती हैं। उनमें सामञ्जस्य स्थापित करके सफलता की बुलन्दियों को छूती जा रही है।
पुरुष की अहंवादी मानसिकता को स्त्री के कमाने से परहेज नहीं है परन्तु स्वयं होकर उसके कामों में हाथ बटाना उसे आज भी स्वीकार्य नहीं। वह महाराजा की तरह बैठकर बस आदेश देना चाहता है और अपनी सेवा करवाना चाहता है। घर कैसे चल रहा है? उसे इससे कुछ भी लेना देना नहीं होता।
वैसे यहाँ भी अपवाद हैं। आज कई पुरुष घरेलू कार्यों में पत्नी की सहायता करने के लिए स्वयं अपना आगे हाथ बढ़ाने लगे हैं। इससे दोनों में सहृदयता बढ़ती है और तालमेल बन जाता है, जो गृहस्थी के लिए आवश्यक है। आजकल बढ़ते एकल परिवारों में दोनों का मिल-जुलकर सामञ्जस्यपूर्वक रहना बहुत ही आवश्यक हो जाता है।
कुछ पुरुष ऐसे भी हैं जिनकी पत्नी नौकरी या व्यवसाय करे तो उनकी नाक नीची हो जाती है। वे कूप मण्डूक की तरह होते हैं। समय की माँग के अनुसार उन्हें अपने विचारों में बदलाव लाने की आवश्यकता है। इसलिए उन घरों मे स्त्रियों के पास अपना मन मसोसकर रह जाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं बचता। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है।
खैर, स्थितियाँ कैसी भी विकट क्यों न हों, स्त्री को घर का केन्द्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। पति उसके सहयोग के बिना एक कदम नहीं चल सकता। घर और बाहर पत्नी के अवलम्ब की आवश्यकता उसे सदा होती है।
बच्चे जो अपने पिता से डरते हैं वे अपनी हर बात माँ के माध्यम से मनवा लेते हैं, पिता से नहीं कहते। अन्य बच्चे अपनी माता से अतिशय प्रेम करने के कारण उस पर आश्रित रहते हैं और अपनी सारी बातें माँ से पूरी करवाते हैं।
घर के कामकाज से लेकर बच्चों की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान माँ रखती है। जो चौबीसों घण्टे सुगमता से उपलब्ध रहेगा, बच्चे उसी के होकर रहते हैं। फिर उन्हें इस बात का भी ज्ञान होता है कि घर में पिता अथवा अन्य किसी सदस्य के प्रकोप से माँ ही बचा सकती है।
घर की स्त्री को ही घर-परिवार से व्यवहार करने अथवा लेनदेन की अधिक समझ होती है। इसलिए उसका दिया गया परामर्श लाभदायक होता है। इसे मानने में परहेज नहीं करना चाहिए। जिस घर को माँ सम्हाल लेती है, वह कमियों के होते हुए स्वर्ग के समान सुखद होता है।
ईश्वर ने सहृदय, उदार, कोमल और करुणा की साक्षात मूर्ति स्त्री को ही बनाया है। अपने घर और परिवार में सामञ्जस्य स्थापित करने, सभी सदस्यों की देखभाल करने, बच्चों का लालन-पालन करने साथ-साथ उन्हें संस्कारित करने, अतिथि सत्कार आदि समस्त दायित्वों का प्रसन्नता और सलीके से निर्वहण करने के कारण ही एक माँ परिवार की धुरी होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 2 जनवरी 2017
माँ का समर्पण
माँ शब्द को सुनते ही एक ऐसी आकृति नजरों के सामने आ जाती है जो बच्चों की चिन्ता में हर समय घुलती रहती है। उसकी दुनिया उसके पति और बच्चों के इर्दगिर्द घूमती रहती है। अपने घर-परिवार से आगे उसे कुछ भी नहीं दिखाई देता।
उन्हीं की खुशी के लिए वह अपना सारा जीवन ही समर्पित कर देती है। उनके सुख में सुखी होती है और उनके दुख में उदास हो जाती है। यानी कि घर-परिवार के सभी सदस्यों के सुख-दुख उसके अपने बन जाते हैं।
मनस्वी मनीषियों का यह मानना है कि गर्भावस्था में माता जैसे विचार रखती है अथवा जैसा आचरण वह करती है, उसी के अनुसार उसके बच्चे में भी संस्कार आते हैं। यदि माता उस समय प्रसन्न रहती है, अच्छी पुस्तकें पढ़ती है तो उसकी सन्तान खुशमिजाज व संस्कारी होती है। वह सबका सम्मान करने वाली होती है।
यदि माँ उस समय में लड़ाई-झगड़ा करती है या जोड़-तोड़ करने में लगी रहती है अथवा परेशान रहती है, तो उसके बच्चे में भी वैसे ही संस्कार आ जाते हैं। उसका बच्चा षडयन्त्र करने वाला और हर समय रोने-बिसूरने वाला ही होता है व स्वार्थी बनता है।
इसीलिए बड़े-बुजुर्ग उस समय माँ को सद्ग्रन्थ पढ़ने और सुविचार रखने का परामर्श देते हैं। इसका उदाहरण महाभारत काल के अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का है, जिसने माता के गर्भ में चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सीख ली थी।
माता ने ही गार्गी, लोपामुद्रा जैसी वैदिक ऋषिकाओं को जन्म दिया। भगवती सीता, सावित्री और दमयन्ती जैसी महान विभूतियों को इस संसार में लाने का कार्य किया।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम जैसे पुत्र और गीता का ज्ञान देने वाल परम ज्ञानी सन्तान श्रीकृष्ण को जन्म दिया। इनके महान गुणों से प्रभावित होकर कवियों ने अनेक कालजयी ग्रन्थ लिखे। उन ग्रन्थों का युगों युगों तक पारायण और मनन करके लोग भाव विभोर हो जाते हैं। इसीलिए हम इन्हें भगवान कहकर संबोधित करते हैं।
धन्य हैँ वे माताएँ जिन्होंने प्रह्लाद और ध्रुव जैसे ईश्वर के परम भक्त बालकों को जन्म दिया। नचिकेता जैसे आत्मज्ञानी बच्चों को जन्म दिया।
महाराणा प्रताप और वीर शिवाजी जैसे परम साहसी और शूरवीरों को जन्म दिया।
देश को स्वयं को समर्पित करने वाली चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिह, राजगुरु जैसी अनेकानेक सन्तानों को जन्म दिया। सुभाष चन्द्र बोस जैसे अपने देश के हितचिन्तकों को जन्म दिया।
देश व धर्म की रक्षा के लिए अल्पायु में ही अत्याचारी मुगल शासक औरंगजेब द्वारा दीवार में चुनवा दिए गए उन चार सपूतों को जन्म दिया।
समाज का सुधार करने वाले तथा धर्म की रक्षा करने वाले स्वामी दयानन्द, महात्मा बुद्ध और महावीर जैसे करने वाले महामानवों को जन्म दिया।
ये तो कुछ उदाहरण मात्र हैं।माताओं ने अनेकानेक ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने देश, धर्म और समाज की रक्षा की। इतिहास का अनुसंधान करने पर हम उन सब अनेक महानुभावों के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
धन्य हैं ऐसी माताएँ जिन्होंने बिना माथे पर शिकन लाए हँसते हुए अपने बच्चों को देश, धर्म और समाज के हित में स्वयं अपना बलिदान देने वाली इन सन्तानों को जन्म देने का सुकार्य किया।
यह सब उन्हीं महान माताओं के सुसंस्कारों का ही परिणाम है जिनकी पुण्यात्मा सन्तानों को संसार श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होकर युगों तक स्मरण करता है। उनकी शौर्य गाथाएँ सुन-सुनकर वह बलिहारी होता रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 1 जनवरी 2017
माँ की शीतल छाया
माँ के विषय में गाई गई गीत की एक पंक्ति स्मरण हो रही है-
माँवाँ ठण्डियाँ छावाँ कि छावाँ कौन करे
अर्थात माँ शीतल छाया देती है। उसके समान और कोई भी ऐसी शीतलता वाली छाया नहीं दे सकता।
माँ की गोद है ही ऐसी कि सारी आयु मनुष्य के ताप हरती रहती है। वहाँ आकर मनुष्य को वास्तविक शान्ति मिलती है। माँ के हाथ का स्पर्श मनुष्य को उसकी हर आयु में सम्बल प्रदान करता है।
माँ उसे गर्म हवा का एक झौंका भी नहीं लगने देना चाहती। वह चाहती है कि उसकी सन्तान के सारे कष्ट उसके हिस्से में आ जाएँ और उसके बच्चे हँसते-मुस्कुराते रहें। उन्हें कष्टों और परेशानियों से बचाने के लिए सदैव उपाय करती रहती है। उसे सबकी नजरों से बचाने का प्रयास करती रहती है।
उसकी हार्दिक कामना होती है कि उसके बच्चे फले-फूलें। योग्य बनकर बच्चे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहें। उन्हें कभी असफलता का मुँह न देखना पड़े।
सन्तान को सुई चुभने जैसा कष्ट भी हो जाए तो उसका सारा सुख-चैन स्वाहा हो जाता है। उसकी नीन्द उड़न छू हो जाती है। वह अपना खाना-पीना सब छोड़कर अपने बच्चों की तिमारदारी में जुट जाती है। जब तक वह स्वस्थ नहीं हो जाता, तब तक वह बस एक पैर पर ही खड़े रहकर दिन-रात की परवाह किए बिना उसकी देखभाल करती रहती है।
ऐसी होती है माँ की ममता जो बिना किसी प्रतिकार की कामना किए अपनी सन्तान का हित साधती है। सदा उसके शुभ की कामना करती है। बच्चे चाहे उसकी उपेक्षा भी करें, फिर भी वह उनके विरोध में किसी की कोई बात नहीं सुन सकती। वह स्वयं भी उनके लिए अपशब्द नहीं कहती।
बच्चे का जब जन्म होता है तो उसका चेहरा देखते ही वह अपने सारे कष्टों और परेशानियों को भूल जाती है। बस उसकी तिमारदारी में जुट जाती है। उसे पल-पल बढ़ता देखकर खुशी से फूली नहीं समाती। उसकी बाल सुलभ चेष्टाओं पर बलिहारी जाती है। उसमें अपने बचपन को देखती है। उसके भावी जीवन के लिए सदा ही सपने बुनती रहती है। सच्चे मन से उसके दुख में दुखी होती है और उसके सुख में सुखी होती है।
बच्चे के जन्म से लेकर अपनी मृत्यु तक के सारे जीवन में माँ अपने आँचल की छाया में उन्हें उसी प्रकार रखती है, जिस प्रकार एक मादा पक्षी पंख फैलाकर अपने नन्हें बच्चों को सुरक्षा देती है। बच्चा अपने जीवन में कुमार्ग पर न जाने पाए, इसके लिए भरसक प्रयत्न करती है।
घर-परिवार के सदस्य यदि कभी उसे डाँट दें या उसका तिरस्कृत कर देते हैं तो उनके और बच्चे के बीच ढाल बनकर माँ खड़ी हो जाती है। वह हर स्थिति में उसका सुरक्षा कवच होती है। कैसी भी कठिन परिस्थिति हो उससे उसे धैर्यपूर्वक बाहर निकालकर ले आती है।
जीवन में सदा शीतलता देने वाली जन्मदात्री माता के प्रति मनुष्य के भी कुछ कर्त्तव्य हैं जब वह युवा होकर अपने पैरों पर खड़ा होता है। उसका भी अपना एक परिवार होता है। उस समय उसकी माता की आयु भी बढ़ रही होती है।
वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाती हुई, उसकी अशक्त होती हुई माता को अपने बच्चों के मजबूत कन्धों के सहारे की ही आवश्यकता होती है। उस समय अपनी ऐसी माता का ध्यान उसे उसी तरह रखना चाहिए जिस प्रकार वह उसके बाल्यकाल से युवा होने तक रखती रही है।
माता को समुचित मान-सम्मान देने वाले बच्चे समाज में सदा ही सम्मानित किए जाते हैं। ऐसे बच्चों पर घर-परिवार और समाज को सदा गर्व होता है। उनकी सर्वत्र सराहना होती है। यही वे बच्चे हैं जो उदाहरण बनते हैं और युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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