सोमवार, 6 मार्च 2017

ब्रह्मभोज का तिरस्कार

बहुत दिनों से इच्छा थी मृत्युभोज की कुप्रथा पर लिखने की। पाँच जनवरी की डी. पी. शर्मा जी की इस आशय पर लिखी  पोस्ट पढ़ी जिसमें उन्होंने इसका पुरजोर बहिष्कार व विरोध करने का आग्रह किया था। इस कुप्रथा पर अपने विचार लिखने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही। आशा है कि आप सभी सुधी लोग इस विषय पर मेरे  विचारों से एकमत होंगे।
        हिन्दू धर्म में जन्म के पूर्व गर्भाधान संस्कार से लेकर मृत्यु के पश्चात तक  अन्त्येष्टि संस्कार तक सोलह संस्कारों का विधान किया गया है। वहाँ किसी सत्रहवें संस्कार का विधान नहीं है तो बारहवीं या तेरहवीं के इस मृत्युभोज संस्कार का कोई औचित्य नहीं बनता।
        जिस परिवार में मृत्यु जैसी विपदा आई हो, उस संकट की घड़ी में उनके साथ मानवीयता के नाते  तन, मन और धन से अवश्य सहयोग करना चाहिए। बारहवीं या तेरहवीं पर होने वाले इस मृतक भोज का बहिष्कार करना चाहिए।
          महाभारत में एक घटना का जिक्र है कि जब कौरवों और पाण्डवों के बीच युद्ध होने वाला था तब भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को युद्ध न करके सन्धि करने का आग्रह किया। दुर्योधन ने उनका आग्रह ठुकरा दिया। श्रीकृष्ण को कष्ट हुआ और वे वहाँ चल पड़े तो दुर्योधन ने उनसे भोजन करने का आग्रह किया। इस पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा -
सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुन:।
अर्थात जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो और खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए।
       यदि खिलाने वाले का मन प्रसन्न न हो तो उस स्थान पर कदापि भोजन नहीं करना चाहिए। जिस घर का प्रिय व्यक्ति उन्हें छोड़कर परलोक सिधार गया हो, वे उसके चले जाने के गम में व्यथित होते हैं। उनकी ऐसी स्थिति में वहाँ हलुवा, पूरी, खीर आदि पकवान खाकर शोक मनाना किसी ढोंग से कम नहीं है। इसका विरोध युवापीढ़ी को अवश्य करना चाहिए।
         चौरासी लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव क्या उन पशु-पक्षी भी गया गुजरा है जो अपने किसी साथी के वियोग में उस दिन अपना भोज्य नहीं खाते और वह दूसरों की मृत्यु पर दावत उड़ाता है।
         हमारे आदी ग्रन्थों वेदादि में इस मृत्युभोज का विधान नहीं है। तथाकथित विद्वानों ने अपनी स्वार्थपूर्ति के कारण जन साधारण को गुमराह करने का कार्य किया है। हमारे इस समाज का ईश्वर ही मालिक है। महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
       इस कुरीति का बीभत्स रूप गाँवों में देखा जा सकता है। जहाँ भोले-भाले ग्रामीण इनके दबाव में आकर अपने घर, खेत, आभूषण गिरवी रखकर अथवा बेचकर पूरे गाँव को मृत्युभोज में दावत देते हैं। इसका दुष्परिणाम उन्हें आयुपर्यन्त भुगतना पड़ता है।
       महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, पं. श्रीराम शर्मा जैसे महान मनीषियों ने मृत्युभोज का जोरदार ढंग से विरोध किया है।
         शत्रुघ्न शर्मा ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया कि वैष्णव समाज के सभी गणमान्य बन्धुओं की उपस्थिति में प्रान्तीय वैष्णव ब्रिगेड टोंक ने 28 फरवरी 2017 को हुए सम्मेलन में मृत्युभोज पर प्रतिबन्ध लगाकर एक ऐतिहासिक निर्णय किया। उनका मानना है कि मृत्युभोज जैसी कुरीति पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। उन्होंने समाज के हित में एक बहुत अच्छा कदम उठाया है।
          युवाओं को चाहिए कि समाज से इन कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिए वे आगे आएँ। युवावर्ग का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह आगे आए और इस कुरीति के चंगुल से लोगों को बचाने का कार्य सम्हाले। यद्यपि पुरानी पीढ़ी का तथा पण्डतों का विरोध उन्हें झेलना पड़ेगा फिर भी सबकी भलाई के लिए उन्हें अपना साहस बनाए रखना है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 5 मार्च 2017

धोखेबाजों से सावधान

मनुष्य को धोखेबाजों या ठगों से हमेशा सावधानी बरतनी चाहिए। वे चाहे तथाकथित धर्मगुरु कहलवाने वाले हों या फिर समाज में भ्रमण करने वाले आम धूर्त जन। इन सबसे किनारा करना ही इन्सान के लिए श्रेयस्कर होता है अन्यथा बाद में जब हानि उठाने पड़ती है तब मनुष्य के पास पश्चाताप करने के अतिरिक्त कोई और चारा नही बचता।
          कहने का तात्पर्य यही है कि कठोर तप करके  ही गुरु-धर्मगुरु, ऋषि-महर्षि आदि की उपाधियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। वास्तव में सच्चे सन्त इन उपाधियों के गुलाम नहीं होते। जितना वे इनसे दूर भागते हैं उतना ही यह उपाधियाँ उनके पीछे भागती हैं। वे अपने जीवन में ऐसे कर्म करते हैं जिससे लोग स्वयं उन्हें अपने सिर माथे पर बिठाते हैं तथा उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।
         भारतीय संस्कृति कर्मसिद्धान्त और पुनर्जन्म पर आधारित हैं। मनीषियों का कथन है कि मनुष्य को उसके अपने कर्मों के अनुसार ही यश-अपयश, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुख आदि द्वन्द्वों को सहन करना पड़ता है। इसलिए उसे कभी अधीर नहीं होना चाहिए। उसे धैर्यपूर्वक उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। जब विपरीत स्थितियों के बादल छँट जाते हैं तब सूर्य की तरह चमकती हुई खुशियाँ उसक जीवन में पुनः आ जाती है।
         कबीर दास जी ने मनुष्य को उदास न होने के लिए कहा है-
          कबीरा  तेरी  झोंपड़ी  गलकटियन  के पास।
          जैसी करनी वैसी भरनी, तू क्यों भये उदास।।
कबीर का यह दोहा स्पष्ट निर्देश दे रहा है कि मनुष्य को उदास नहीं होना चाहिए। जो जैसा कार्य करेगा, उसे वैसा ही उसका फल भुगतना पड़ेगा।
        कालेज के समय में एक कथा पढ़ी थी। ऋषि विश्वामित्र घोर तपस्या कर रहे थे। उस समय देवराज इन्द्र की अप्सरा मेनका ने उनकी तपस्या भंग कर दी थी। इस कारण अपने समय के साधु समाज की कटु आलोचना का शिकार उन्हें बनना पड़ा था। उन्होंने पुनः तपस्या आरम्भ की। ब्रह्मर्षि कहलाने के लिए उन्हें महर्षि वसिष्ठ की स्वीकृति की आवश्यकता थी। यानि जा तक वसिष्ठ जी उन्हें मान्यता नहीं देंगे तब तक उन्हें ब्रह्मर्षि का पद नहीं दिया जाएगा।
        जब तक ऋषि विश्वामित्र इस पद के योग्य नहीं बन सके तब तक वसिष्ठ जी ने उन्हें ब्रह्मर्षि नहीं कहा। वर्षों की साधना के पश्चात वे अपने सदाचरण से जब वे इस पद के योग्य बन गए। तब महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कहकर सम्बोधित किया।
        साररूप में यही कहा जा सकता है कि जब तक विश्वामित्र के भाग्य में नहीं था तब तक वे कठोर तप करके भी मनचाहा फल नहीं प्राप्त कर सके। जब उनका भाग्य उदित हुआ तब उनकी सफलता की कमना पूर्ण हो सकी।
        निस्सन्देह मनुष्य के पुरुषार्थ के साथ-साथ जब उसका भाग्य या प्रारब्ध प्रबल होता है तभी उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैँ। इसी तरह यदि उसका भाग्य बलवान हो और वह आलस्य के कारण परिश्रम न करना चाहे तो वह अपनी उन्नति के स्वर्णिम अवसर से चूक जाता है।
        अतः अकेला भाग्य अथवा अकेला पुरुषार्थ मनुष्य को कभी सफलता के सोपान पर नहीं ले जा सकता। इन दोनों के संयोग होने पर ही मनुष्य का भाग्योदय होता है। यहाँ भगवान श्रीराम का उदाहरण ले सकते हैं जिनका अगली प्रातः राज्याभिषेक होना सुनिश्चित था परन्तु रात्रि में ही उन्हें चौदह वर्षों के लिए बनवास के लिए जाने का आदेश मिल गया और उन्होंने अपने अनुज लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वन की ओर प्रस्थान किया।
         कोई माने चाहे न माने परन्तु यह सत्य है कि यदि भाग्य बलवान हो तो गधे जैसा निरीह पशु भी पहलवान बन सकता है। अन्यथा बड़े-बड़े पहलवान भी पटखनी खा जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 4 मार्च 2017

कचरे जैसे लोगों से बचें

संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैँ जो कचरे के ढेर की भाँति होते हैं। ऐसे लोगों को कूढ़-मगज कहा जाता है। वे ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, घृणा, चिन्ता, निराशा आदि नकारात्मक विचारों का बहुत-सा कूड़ा अपने मस्तिष्क में भरकर रखते हैं। यद्यपि इसका जीवन में न तो कोई महत्त्व होता है और न ही कोई आवश्यकता होती है। जब उनके दिमाग में वह अधिक हो जाता है तब वे उसे दूसरों पर फैंकने का मौका ढूँढ़ने लगते हैं।
        ऐसे लोगों से सदा ही दूरी बनाकर रखनी चाहिए ताकि उनकी गन्दगी से अपने दामन पर कभी छींटे न पड़ सकें। उनकी मूर्खतापूर्ण गन्दगी को एक बार यदि किसी ने स्वीकार कर लिया तो हो सकता है वह भी उनकी ही भाँति बनने लग जाए और फिर उसे लोगों पर गिराने के लिए वह भी अवसर खोजने लगे।
        मनुष्य की यह जिन्दगी बहुत ही अमूल्य और ख़ूबसूरत है। उसे इन मूर्खों के कारण कभी बोझिल नहीं बनना चाहिए। सज्जनों को उनके सदा सद्व्यवहार के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए और दुर्जनों के उनके दुर्व्यवहार के लिए  क्षमा कर देना चाहिए। यह सूत्र अपनाने वाले अपने जीवन की किसी बाजी में कभी मात नहीं खाते।
         कभी-कभी सड़क पर स्वयं आराम से गाड़ी चलते हुए जा रहे हों, उस समय कोई दूसरा चालक तेज गति से अथवा गलत तरीके से अचानक ही सामने आकर तेजी से ब्रेक लगा देता है। तब अपनी गाड़ी उससे टकराते-टकराते बच जाती है। ऐसे में उस तथाकथित मूर्ख चालक से उलझने या गाली-गलौज करने से अच्छा है कि स्वयं पर काबू रखते हुए, उसे भुनभुनाता छोड़कर वहाँ से निकल जाओ।
        इससे स्वयं को बहुत आनन्द आता है और अपनी मानसिक शान्ति बनी रहती है। हाँ, उस मूढ़मति को उसकी गलती का अहसास अवश्य करना चाहिए ताकि वह भविष्य में वैसी गलती न करने के लिए  सजग रहे। यदि सड़क पर खड़े होकर मारपीट करने लगें या झगड़ा कर लिया जाए तो दूसरे के भेजे में समझदारी की बात नहीं समा सकती। न ही इसे समझदारी नहीं कह सकते हैं कि सड़क पर भौंकने वाले कुत्तों के साथ गाड़ी से उतरकर भौंकना आरम्भ कर दिया जाए। उन्हें उनके रास्ते जाने देना चाहिए।
          जिस मनुष्य के पास जो होता है वह दूसरों को वही बाँटता है। जो व्यक्ति सुखी होता है वह सबको सुख बाँटता है और जो दु:खी होता है वह दुःख बाँटता है। इसी प्रकार जो ज्ञानी होता है वह ज्ञान का प्रसार करता है और मूर्ख दूसरों के साथ अपनी मूर्खता साझा करने का प्रयास करता है। दिशाहीन भ्रमित व्यक्ति सब लोगों को भ्रम में रखता है।
         स्वयं भयभीत रहने वाला मनुष्य सबको डराने-धमकाने का कार्य करता है। समाज का दबा-कुचला मनुष्य भी सबको दबाकर रखना चाहता है। सूर्य की तरह चमकने वाला इन्सान ही संसार को दिशा-निर्देश देता है। एवंविध एक सफल व्यक्ति सबको सफलता का मन्त्र देता है और वहीं असफल व्यक्ति किसी का मार्गदर्शक नहीं बन पाता।
          बहुत से मनोरोगी  हमारे आस-पास खुले में घूमते रहते हैं, सभी अस्पताल में भर्ती नहीं किए जाते। मनुष्य को अपनी सोच का दायरा विस्तृत करते हुए सदा ही सकारात्मक विचारों को बढ़ाना चाहिए। अन्यथा उसके मस्तिष्क में नकारात्मक विचारों का कूड़े-कचरा ठीक उसी तरह भरने लगता है जैसे खाली पड़े हुए खेत में फसल न बोने पर वहाँ खरपतवार उगने लगते हैं।
         समाज में रहते हुए प्रत्येक सुधी मनुष्य का नैतिक दायित्व बनता है कि वह निराशा के गर्त में डूबे लोगों में आशा की ज्योति जलाने का कार्य करे। ऐसा करने से यदि किसी का जीवन संवर जाएगा तो वह इस उपकार के प्रतिकार स्वरूप आजन्म ऋणी हो जाएगा। इस सुकृत्य से अपने मन को भी सन्तोष मिलेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

रूढ़ियों से बचना आवश्यक

व्रत रखना अथवा किसी त्योहार को मानना, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय है, किसी पर उसे थोपना अनुचित कहलाता है। यदि कोई स्वेच्छा से अथवा प्रसन्नता से व्रत रखता हैं तो यह एक अलग विषय है। परन्तु यदि कोई नहीं रखता अथवा उसे ढकोसला मानता है तो उसकी अपनी सोच है। इसके लिए किसी की आलोचना करना या टीका-टिप्पणी करना किसी भी तरह क्षम्य नहीं है।
         इस कारण अपने सामने वाले को स्वयं से हेय दृष्टि से देखना, उसे पाखण्डी या दिखावटी धार्मिक समझना अनुचित है। यह व्यक्ति विशेष के अहंकार का परिचायक होता है। हर व्यक्ति का अपना एक दृष्टिकोण होता है। वह चाहे सही हो या गलत, उसका फैसला करने का अधिकार किसी को नहीं होता। उसे अपनी कसौटी पर परखना किसी भी समझदार के लिए अनुचित होता है।
         वर्षभर में लोग अनेक व्रत रखते हैं। साथ ही वे कई प्रकार के नियमों का भी पालन करते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि उनके समान अन्य कोई ईश्वर का भक्त नहीं है। इसके विपरीत कुछ लोग इन व्रतों के मकड़जाल में न पड़ते हुए अन्य विधियों से ईश्वर की आराधना करते हैं। इसका यह तात्पर्य बिल्कुल भी नहीं लगाया जा सकता कि इनमें से कौन श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र पाने का वास्तव में अधिकारी बन गया है।
          करवाचौथ का व्रत ही लीजिए। यह श्रद्धा और विश्वास के साथ पति की लम्बी उम्र के लिए रखा जाता है। इसी आशय से ही किसी तीज का व्रत भी रखा जाता है। अपने विवेक की कसौटी पर यदि खरा उतरे तो ऐसे व्रत अवश्य रखने चाहिए। इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि विश्व में मुट्ठी भर स्त्रियाँ ही ये व्रत रखती हैं। यदि इन व्रतों को रखने से किसी की आयु बढ़ती तो आज तक किसी पुरुष की मृत्यु न हुई होती और कोई स्त्री विधवा न होती।
         विचारणीय है कि जो पुरुष दिनभर बैठे-ठाले पति-पत्नी के रिश्ते को शर्मसार करने वाले चुटकुले बनाते हैं, अपनी पत्नी को पैर की जूती तथा दोयम दर्जे का मानते हैं और उसे बच्चे पैदा करने की मशीन से अधिक कुछ नहीं समझते, चूल्हे-चौके से आगे उनकी हैसियत मानने के लिए भी तैयार नहीं होते, ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले वे पुरुष इस लायक नहीं हैं कि उनके लिए व्रत रखा जाए।
         इससे भी बढ़कर वे पुरुष हैं जो सदा अपनी पत्नी का दूसरों के समक्ष मजाक बनाते हैं, उसके अहं को तार-तार करते नहीं अघाते, अपनी भाभियों और सालियों के साथ चुहलबाजी करने की ताक में रहते हैं, विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाते हैं, ऐसे दोगले, समर्पण से दूर और अविश्वसनीय पुरुषों के लिए व्रत रखने का कोई औचित्य समझ नहीं आता।
        यह व्रत भी आजकल मानो फैशन का प्रतीक बनता जा रहा है। किस स्त्री ने कितना अधिक खर्चा किया, यह होड़ बढ़ती जा रही है। नए-नए डिजाइनर कपड़े और जेवर पहनकर उनकी प्रदर्शनी करना व्रत रखने से अधिक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। किसने कौन-सी फिल्म देखी उसका बखान करना भी शायद आवश्यक बनता जा रहा है।
          दुर्भाग्यवश जिन महिलाओं को ये सब नहीं मिल पाते उनके मन में कुण्ठा घर करने लग जाती है। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप पिछले दिनों किसी पत्नी ने अपने पति की हत्या तक कर डाली।
        वैसे बहुत-सी स्त्रियों ने इन व्रतों को रखना छोड़ दिया है। इनके विरोध और समर्थन दोनों में लोग अब चर्चा करने लगे हैं। हालाँकि कामकाजी महिलाएँ ऐसे व्रत रखने के पक्ष में नहीं है। उन्हें अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसके लिए उन पर व्यंग्य बाण छोड़े जाते हैं। मेरा मानना है कि जो पुरुष स्त्री की परेशानियों को नहीं समझना चाहता, वह अपनी पत्नी से यह व्रत रखने की निश्चित ही अपेक्षा अवश्य करता है।
         नारीमुक्ति का परचम फहराने और भाषण देने वाली तथाकथित यानी सो कॉल्ड महिलावादी स्त्रियों को शायद इन रूढ़ियों से मुक्ति नहीं चाहिए। सम्भवत: इसीलिए उन्होंने इस विषय पर अपने विचार नहीं रखे हैं। यदि उन्हें वास्तव में बदलाव की कामना है तो स्वयं अपने से ही शुरुआत करनी चाहिए। इन थोपी हुई सड़ी-गली रूढ़ियों से मुक्त होने कीआधुनिक वैज्ञानिक युग में सचमुच बहुत आवश्यकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 2 मार्च 2017

पढ़ने की प्रवृत्ति

आज समय और परिस्थितियाँ बदल रही हैं। पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति मानो कहीं खो रही है। दुर्भाग्य की बात है कि बच्चे पढ़ने के नाम से ही दूर भागने लगते हैं। अपनी पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने में बच्चों की कमतर होती प्रवृत्ति वास्तव में चिन्ता का विषय बनती जा रही है। बड़े हो जाने पर उनकी यह आदत और अधिक परिपक्व हो जाती है।
         इसके लिए अकेले बच्चों को दोष नहीं दिया जा सकता। आज कम्पीटिशन के इस युग में माता-पिता प्रायः बच्चों को अपने विषय के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने से निरुत्साहित करते हैं। वे शायद इसे समय की बरबादी मानते हैं। हम इस बात से कदापि इन्कार नहीं कर सकते कि विषयेतर पुस्तकें पढ़ने से पढ़ाई के तनाव से मुक्ति मिलती है। मन और मस्तिष्क को एक प्रकार की नवीन स्फूर्ति व ऊर्जा मिलती है।
        जिस व्यक्ति ने पुस्तकों को मित्र बना लिया, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसे कभी अकेलेपन का अहसास ही नहीं होता। पुस्तकें ज्ञान का अथाह भण्डार होती हैं। जितना मनुष्य इस ज्ञान के सागर में गहरे पैठता जाता है, गोते लगाना सीख लेता है, वह उतने ही मोती चुनकर ले आता है। ऐसे उस महामानव की विद्वत्ता के समक्ष कोई भी अन्य व्यक्ति नहीं ठहर सकता। सभी उसकी विद्वत्ता के कायल हो जाते हैं। ऐसे ही विद्वान नीर-क्षीर विवेकी कहलाते हैं।
        साहित्य सदा से ही लिखा और पढ़ा जाता रहा है। ये हमारी धरोहर है। हमारे साँस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मूल्यों का ज्ञान हमें अपने इन महान ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। प्राचीन महान विरासत को जानने-समझने में ये हमारी सहायता करते हैं। किसी भी प्रकार के अनुसन्धान को करने के लिए हमें इन ग्रन्थों की महती आवश्यकता होती है।

        भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में इन पुस्तकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। उस समय के बहुत-से कवियों और लेखकों ने जनजागृति करने के अपने दायित्व को बखूबी निभाया था।
         आज यह त्रासदी है कि पुस्तकों के विक्रय की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। सरकारी खरीद कम होती जा रही है। लोग स्वयं खरीदकर पुस्तकें पढ़ना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि उन्हें उपहार में मिल जाएँ और इसके लिए अपनी जेब से राशि व्यय न करनी पड़े। इस संकुचित सोच के चलते साहित्य को क्षति हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो आजकल फिर से प्राचीन काल वाला 'बार्टर सिस्टम' आ गया है। तुम अपनी पुस्तक मुझे भेंट करो और मैं अपनी पुस्तक तुम्हें भेंटस्वरूप में दूँगा।
        कुछ लोगों की संकीर्ण मानसिकता को इसी से परखा जा सकता है कि साझा संकलनों में छपकर भी उस पुस्तक की प्रति क्रय नहीं करना चाहते। बताइए भला यह भी कोई बात हुई? ये तथाकथित महान साहित्यकार जब दूसरे रचनाकारों को नहीं पढ़ना चाहते तो दूसरों से यह आशा करना ही व्यर्थ है कि वे उन्हें पढ़ें।
         डर इस बात का है कि कहीं पुस्तकें कबाड़ी बाजार से ही खरीदने के लिए न मिलने लगें। आजकल दिल्ली के दरिया गंज क्षेत्र में रविवार के साप्ताहिक बाजार में पुस्तकें औने-पौने भाव पर मिलती हैं। और भी न जाने ऐसे कितने बाजारों में ये पुस्तकें मिलती हैं। इसीलिए ही शायद किसी विद्वान ने व्यथित होकर इतना कड़वा सच लिखा है -
'जब किताबें सड़क के किनारे पर रखकर बिकेगी और जूते काँच के शोरूम में, तब यह समझ जाना चाहिए कि लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है।'
         कहने का तात्पर्य यही है कि एवंविध साहित्य लेखन की इस दुर्दशा के लिए लेखक व प्रकाशक सभी उत्तरदायी हैं। सभी सुधीजनों से अनुरोध है कि साहित्य को पल्लवित और पोषित करने के लिए सहृदय बनें। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए। दो-चार कामिक्स उन्हें दिलवाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं समझनी चाहिए। जब तक बच्चों में अपने साहित्य-संस्कार घुट्टी में नहीं दिए जाएँगे, तब तक साहित्य का उद्धार नहीं हो सकता। कम्प्यूटर से चाहे कितना ही ज्ञान क्यों न मिल जाए, पुस्तक पढ़ने की उनकी आदत छूटनी नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 1 मार्च 2017

बोझ से मुक्ति

मनुष्य अपना जीवन तभी निश्चिन्त होकर व्यतीत कर सकता है जब वह अपने सिर पर लादी हुई दुश्वारियों की गठरी उतारकर फैंक देता है। अपने मनोमस्तिष्क पर उन्हें हावी नहीं होने देना चाहिए। इस सत्य से कोई मुँह नहीं मोड़ सकता कि जीवनकाल में दुख-परेशानियाँ भी आएँगी और सुख-समृद्धि भी आएगी। इन सबके चलते जीवन को हारना नहीं है अपितु जिजीविषा बनाए रखनी चाहिए।
      मनुष्य को आयुपर्यन्त जिम्मेवारियों का बोझ उठाना पड़ता है। यदि वह उन्हें भार समझ लेता है तो हर समय परेशान होता रहता है, अपनों और अपनी स्वयं की जिन्दगी से शिकायत करता रहता हैँ। वह सदा ईश्वर को भी उलाहने देता रहता है। उसके इस प्रकार करने से उसके साथ-साथ उसके बन्धु-बान्धव भी मायूस होने लगते हैं।
        इसके विपरीत सकारात्मक रुख अपनाते हुए यदि मनुष्य अपने दायित्वों का निर्वहण करता है तो वह इन्हें प्रसन्न होकर निभाता है। तब वह न तो निराश होता है और न ही किसी को लानत-मलानत करता है। उसके ऐसे आचरण से घर-परिवार में सर्वत्र उत्साह का वातावरण बना रहता है। वह स्वयं भी आनन्दित रहता है और उसके बन्धु-बान्धव भी मस्त रहते हैं।
       मनुष्य भार समझकर जो भी कार्य करता है, उसे उल्टा-सीधा करके बाद में दुखी होता है। वे मानो उसके गले में हड्डी बनकर फँस जाते हैं। वह उस बोझ को शीघ्र उतारकर फैंकना चाहता है। इसी भाव को मन में सोचते हुए किन्हीं महात्मा जी ने अपने पास आए लोगों से ऐसा एक प्रश्न पूछा - 'सबसे ज्यादा बोझ कौन-सा जीव उठाकर घूमता है?'
       इस प्रश्न के उत्तर में किसी ने कहा गधा, किसी ने बैल और किसी ने ऊँट का नाम लिया। यानी सब लोगों ने अलग-अलग प्राणियों के नाम बताए। महात्मा जी किसी के भी उत्तर से सन्तुष्ट नहीं हुए।
        उनके असन्तुष्ट होने का कारण है। क्योंकि गधे, बैल और ऊँट आदि पशुओं के ऊपर बोझ कुछ समय तक लादते हैँ और ले जाते हैं। उसके बाद उस बोझ को उतारकर रख दिया जाता है लेकिन मनुष्य अपने मन के ऊपर जबरदस्ती लादे हुए विचारों के बोझ को मरते दम तक भी नहीं उतार पाता। जिस दिन मनुष्य इस बोझ को उतारकर फैंक देगा, उसी दिन वह सही मायने में जीवन जीने की कला को सीख जाएगा। तब निराशा उसके जीवन से सदा के लिए छूमन्तर हो जाएगी।
        मनुष्य अपने सीने पर न जाने कितने बोझ उठाकर रखता है। यदि किसी व्यक्ति ने उसके साथ अन्याय किया अथवा दुर्व्यवहार किया तो उसे भी याद रखने का बोझ उठाए फिरता है। भविष्य में क्या घटने वाला है, इसकी चिन्ता के कारण वह अनावश्यक बोझ से दबा रहता है। अपने किए गए पापों की गठरी का बोझ सिर पर उठाकर जन्म-जन्मान्तरों तक चलता है।
         इस प्रकार बच्चों के लालन-पालन, योग्य बनाने और सैटल करने की चिन्ता में ही वह घुला जाता है। घर-परिवार, कार्यक्षेत्र, स्वास्थ्य आदि की चिन्ताओं के अनावश्यक बोझ को पीठ पर गठरी की तरह लादकर चलता है। इस प्रकार भाँति-भाँति के ये बोझ मनुष्य की पीठ झुका देते हैं। असहाय मनुष्य मूक द्रष्टा बना बस उन्हें निहारता रहता है।
        वास्तव में इन सब परिस्थितियों का वह स्वयं जिम्मेदार है। यदि वह इन सबको बोझ न समझकर अपना दायित्व मान सके तो पीड़ा कम होती है अन्यथा बिमारियों को न्योता देना होता है। फिर सारा जीवन दवाइयाँ खाते हुए गुजार देता है। इस तरह अपना धन और समय नष्ट करता हुआ वह अनजाने ही अपने परिजनों के कष्ट का माध्यम बन जाता है।
          सुधी मनीषी जन इसीलिए मनुष्य को बारम्बार समझाते हैँ कि अपने जीवन को जल की तरह शान्त बनाना चाहिए। उसमें अनावश्यक कंकर फैंककर उद्वेलित नहीं करना चाहिए। अपनी जिम्मेवारियों को बोझ न समझते हुए उन्हें सहर्ष निभाना चाहिए। इसी में मानव जीवन की सार्थकता कहलाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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