आज महिलाएँ करवाचौथ का व्रत रख रही हैं। इसे भी त्योहा की तरह मनाया जाता है। यह व्रत स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु के लिए रखती हैं। इस दिन प्रातः सरगी खाने के पश्चात सारा दिन भूखे और प्यासे रहना होता है। शाम के समय सोलह श्रृंगार करके और सुन्दर से नए वस्त्र पहन कर महिलाएँ ग्रुप में पूजा करती हैं। फिर रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात उनका व्रत पूर्ण होता है और तभी उन्हें खाना खाना होता है।
कुछ दिन पश्चात अहोई अष्टमी का व्रत भी आने वाला है। इस व्रत को पुत्र की दीर्घायु के लिए माता रखती है। इस व्रत में भी दिनभर कुछ भी खाना और पीना नहीं होता। दिन ढले शाम को पूजा करके व्रत को पूर्ण करने होता है।
हमारे आदी ग्रंथ वेदों में इन व्रतों का कोई उल्लेख नहीं है। पता नहीं किस समय और किन तथाकथित विद्वानों ने इन व्रतों का विधान किया। सबसे मजे की बात यह है कि उसके साथ ही लोगों के मन में यह भय भी पैदा कर दिया कि करवाचौथ का व्रत न रखने से पति की आयु लम्बी नहीं होती। इसी ही तरह अहोई अष्टमी का व्रत न रखने से पुत्र की आयु लम्बी नहीं होती।
यदि मनन किया जाए अथवा अपने आसपास नजर दौड़ाई जाए तो इन व्रतों की सच्चाई का पता चल जाएगा। व्रत रखने वाली स्त्रियों के पति की मृत्यु उनसे पहले भी हो जाती है। इसी प्रकार व्रत रखने वाली महिलाओं के पुत्र की मृत्यु भी उनके सामने ही उनके जीवनकाल में ही हो जाती है। इसलिए यह तथ्य गलत है कि व्रत रखने से किसी की आयु बढ़ती है और न ही व्रत न रखने से किसी की आयु काम होती है।
मनुष्य का बच्चे के रूप में जन्म होता है। उसके जन्म से पूर्व ही उसकी आयु का निर्धारण हो जाता है। मनुष्य को आयु उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसे मिलती है। इसलिए मनुष्य की आयु को न कोई कम कर सकता है और न ही कोई बढ़ा सकता है। इस बात को सदा स्मरण रखना चाहिए कि ईश्वर के न्याय में हम दखल नहीं दे सकते।
मैं इन व्रतों का विरोध नहीं कर रही और न ही किसी की भावना को ठेस पहुँचा रही हूँ। इस विषय में मेरा मात्र इतना ही कहना है कि गर्भवती महिलाओं, रोगी स्त्रियों को जबरदस्ती इन व्रतों को नहीं रखना चाहिए। न ही उन्हें समाज की परवाह करनी चाहिए। बीमारी की अवस्था में व्रत रखकर दवा न खाने से बीमारी बढ़ जाती है तो ऐसे व्रत की क्या उपयोगिता? ईश्वर यह कभी नहीं कहता कि अपने शरीर को कष्ट देकर व्रत आदि रखो। यदि फिर भी व्रत रखना हो तो बीच में फल खा लेने चाहिए, चाय या काफी पी लेनी चाहिए।
यह व्रत भी आजकल प्रदर्शन का विषय बन गया है। महिलाएँ ब्यूटी पार्लर में जाकर सजधजकर, खूब सारे आभूषण पहनकर पूजा में जाति हैं। वहाँ भी यही देखा जाता है कि कौन महिला अधिक सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनकर आई है। जिन पतियों की हैसियत नहीं होती, उनके घरों में इन उत्सवों पर कलह-क्लेश होता है। बताइए लड़ाई-झगड़ा करके या गली-गलौच करके व्रत रखने का औचित्य मेरी समझ से परे है।
कुछ पति-पत्नी सारा साल झगड़ते रहते हैं और एक-दूसरे के अमंगल की कामना करते हुए गाली-गलौच करते रहते हैं तो ऐसी उन महिलाओं के व्रत रखने का भी कोई लाभ नहीं होता। व्रत रखकर यदि फ़िल्म देखने जाए या दिनभर दूसरों की निन्दा-चुगली की जाए तो व्रत रखना बेकार हो जाता है।
मेरे विचार में पति-पत्नी में परस्पर प्रेम, सौहार्द और विश्वास होना चाहिए। एक-दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए। यदि दोनों में ऐसा हो तो वर्हाँ किसी व्रत की आवश्यकता नहीं होती। घर में सुख-शान्ति हो तो उस घर में स्वाभाविक रूप स्वर्गं जैसी सुख और समृद्धि का निवास होता है। तब फिर व्रत रखना या न रखना कोई मायने नहीं रखता।
अन्त में यह सत्य प्रस्तुत करना चाहती हूँ कि विश्व में कुछ मुट्ठी भर लोग ही यह व्रत रखते हैं। वे लोग जिनके लिए कोई व्रत नहीं रखता, वे सभी मर नहीं जाते और जिनके लिए व्रत रखा जाता है, वे सभी दीर्घायु नहीं होते। इसलिए अपने स्वस्थ्य और परिस्थितियों को देखते हुए ही इन व्रतों को रखना चाहिए। भेड़चाल या किसी के जोर देने पर इन व्रतों को नहीं रखना चाहिए। व्रत रखकर ईश्वर की उपासना सच्चे मन से करनी चाहिए और अपने साथी या पुत्र की मंगल कामना करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 7 अक्टूबर 2017
कटवाचौथ का व्रत
शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017
बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति
बर्च्चों में आजकल हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। वे दिन-प्रतिदिन असहिष्णु बनते जा रहे हैं। पहले बात-बात चाकू-छुरे निकाल लेना तो आम बात थी। आजकल बहुत से बच्चे पिस्तोल व तमंचे भी रखने लगे हैं जिनका प्रयोग वे बिना हिचकिचाहट के शान दिखाते हुए करते हैं।
विदेशों में ऐसी हुई बहुत-सी घटनाओं की चर्चा हमने टी.वी. पर देखी-सुनी है और समाचार पत्रों में पढ़ी है। वहाँ स्कूलों के बच्चों ने अपने साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी। कभी-कभी उन्होंने अपने उन अध्यापकों की भी हत्या कर दी जो उनके जीवन के मार्गदर्शक हैं। इन घटनाओ के विषय में जानकर मन में पीड़ा होती है कि आखिर ये बच्चे बनना क्या चाहते हैं? ऐसी घटनाएँ अपने देश भारत में भी यदा-कदा होने लगी हैं। शायद यह पश्चिमी देशों का प्रभाव है।
साथियों को छुरा घोंप देने अथवा गोली मार देने पर उन्हें कौन से स्वर्गिक आनन्द की अनुभूति होती है? इसके पीछे कौन-सी मानसिक विकृति कुलाँचे भरती है? यह कभी समझ में नहीं आ सका।
किसी को जान से मारना हद दर्जे की क्रूरता है। बच्चों में आपसी भाईचारा और प्यार बहुत अधिक होता है। बच्चे जब बड़े हो जाते तब उनमें बड़ों की देखा-देखी स्वार्थ की भावना घर कर जाती है। यह स्वार्थ हिंसक नहीं होता। वह बस अपने और अपनों के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। उसमें हिंसा कदापि नहीं होती। नृशंता का यह भाव बच्चों में आ जाना वास्तव में बहुत ही चिन्ता का विषय है।
मुझे इस विषय में एक कारण जो समझ में आ रहा है, वह यह हो सकता है कि बच्चे जितने कार्टून सीरियल टी.वी. पर देखते हैं, उनमें हिंसा की भरमार होती है। विडियो गेम जो उनके लिए बनाए जाते हैं वे भी इन बच्चों में हिंसक वृत्ति को ही जन्म दे रहे हैं।
उनकी भाषा भी सुसंस्कृत नहीं होती। दृश्य और श्रव्य माध्यमों का असर जल्दी होता है। शायद इसीलिए बच्चों को ऐसे हिंसक भाव हम अनजाने में ही परोस रहे हैं। इन सबके अतिरिक्त बच्चो के खिलौने भी उनमें हिंसक वृत्ति को जन्म देते हैं।
शक्तिमान, स्पाइडर मैन आदि सीरियल भी हिंसा को ही पोषित करते हैं और कुछ नहीं। इनके अलावा ऐतिहासिक सीरियल भी कमोबेश हिंसक विचारों को ही बढ़ाते हैं। उन्हे देखकर बच्चो के मन में भी ऐसे ही हीरो बनने की इच्छा बलवती हो जाती है। उन्हें यही लगता है कि कोई जरा-सा भी सिर उठाए तो उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। इस तरह आराम से जिन्दगी जी जा सकती है।
कभी-कभी घर-परिवार अथवा समाज से मिलने वाले तिरस्कार से बच्चे कुँठाग्रस्त होकर भी इस प्रकार हिंसा के मार्ग पर चल पड़ते हैं। यहाँ बदले की भावना प्रमुख कारण होती है। ऐसे बच्चों को प्यार व दुलार की आवश्यकता होती है। उन्हें सही दिशा दिखाना हमारा कर्त्तव्य है।
अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए इस हिंसक वृत्ति पर लगाम लगाना बहुत आवश्यक है। घर में माता-पिता का कर्त्तव्य बनता है कि हिंसा से भरपूर कार्टून के स्थान पर संस्कार देने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए प्रोत्साहित करें। ऐसे सीरियल कम-से-कम समय के लिए देखने दें। उन्हें बार-बार समझाएँ कि हिंसा से किसी का भला नहीं होता बल्कि नुकसान होता है। मिल-जुलकर भाईचारे से रहने के लिए शिक्षित करें। स्कूल या खेल के लिए जाते समय चौकस रहें कि बच्चे ऐसा कोई हिंसा करने वाला हथियार अपने साथ न ले जाएँ।
विद्यालय में अध्यापकों को भी चाहिए कि जहाँ बच्चे में हिसक प्रवृत्ति पनपती दिखाई दे, वहीं फौरन उनके मिता-पिता तथा स्कूल अथारिटिस को सूचित करें। इससे सम्भवत:इस मनोवृत्ति पर लगाम लगाई जा सके। समय-समय पर कौंसलर के पास ले जाने से बच्चे के मन में आए कुंठा अथवा एग्रेसिव भावों को नियन्त्रित किया जा सके।
ऐसे बच्चों के लिए सरकार ने सुधारगृह बनाए हैं। कई कानून भी बनाए गए हैं। समाजसेवी संस्थाएँ भी अपने स्तर पर इन्हें सुधारने का प्रयास कर रही हैं। इस प्रकार सबके सम्मिलित प्रयास से ही हम अपनी भावी पीढ़ी को इस विनाश से बचा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
बेटियाँ
नन्हें नन्हें पैरों में
पायल पहने हुए
रुनझुन करती बेटियाँ
घर के कोने कोने में इधर-उधर भागती हैं।
उस समय
घर का हर सदस्य
हृदय में खुशियाँ लिए
स्वयं को धन्य मानता बलिहारी होता है।
बेटी सीने से
जब लगती है
अपने माँ-पाप के
तब मानो स्वर्ग का सुख घर में आ जाता।
बेटी है तो घर
घर बन जाता है
सदा रौनक रहती है
उसके होने से आ जाता घर में अनुशासन।
सब सदस्यों की
चिन्ता करती है वह
सबके लिए ही जीती है
उसमें ही बसते घर और परिवार के प्राण।
दूसरे घर जाने से
नहीं कम हो जाती
उसकी वह चिन्ता जो
करती है अपने माता-पापा की सारे समय।
जरा भी मिले
उसे समय तो वह
मानो उड़कर आ जाती
बिना समय व्यर्थ गंवाए पल में उनके पास।
उनके सुख-दुख
साझा करती हुई
सम्बल बन जाती है
अपने माँ-पापा का जीवन भर यह बेटी ही।
आपकी प्यारी और
दुलारी ऐसी बेटी यह
न देखे कभी मुँह किसी का
उसे अपने पैरों खड़ा होने योग्य बनाना होगा।
घर का मान-सम्मान
अपनी बेटी को सदा ही
सुसंस्कारित करने का अपना
दायित्व निभा समाज को नगीना देना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017
साधु-सन्तों का दायित्व
साधु-सन्तों का देश, धर्म और समाज के प्रति महान दायित्व होता है। जब देश, धर्म और समाज पर कष्ट का समय आता है अथवा बाहरी शक्तियाँ उसकी अस्मिता को चुनौती देती हैं तब साधु समाज हाथ पर हाथ रखकर कदापि नहीं बैठ सकता। वह उस परीक्षा की घड़ी में आपसी मनमुटाव का त्याग करके देश, धर्म और समाज के उद्धार के लिए कमर कस लेता है।
समाज के प्रति साधु-सन्तों का दायित्व आमजन से कहीं अधिक होता है। धर्म और समाज की रक्षा करना उनके लिए भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य होता है। देश के हितों की रक्षा करना भी उनका एक विशेष दायित्व होता है। इससे वे अपना मुँह नहीं मोड़ सकते। यदि वे ऐसा करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि वे वास्तव में सन्त न होकर स्वार्थी जन हैं, जिनकी इस देश और समाज को कोई आवश्यकता नहीं है।
कुछ दशक पूर्व जब हमारा देश परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था तो उस समय आर्य समाज के संस्थपक महर्षि दयानन्द सरस्वती के ने स्वतन्त्रता संग्राम में अपना भरपूर योगदान दिया था। उस समय उनके साथ और भी कई सन्तों ने जनजागृति के कार्य किए होंगे। अन्ततः उनके योगदान ने भारत को स्वतन्त्र कराने में अहं भूमिका निभाई। हमें अपने ऐसे सन्तों पर गर्व है।
जब तक राजनीति पर सन्तों और विद्वानों का प्रभुत्व रहा तब तक राजकार्य सुचारू रूप से चलता रहा। राजा और प्रजा दोनों ही कुकर्म करने से बचते थे क्योंकि उन्हें ईश्वर का डर होता था। राज्य में सुख-समृद्धि बनी रहे उसके राजा सच्चाई और ईमानदारी से यत्न करता था। राजा पुत्रवत अपनी प्रजा की रक्षा करता था। उसका ध्यान रखता था। प्रजा के सुख-दुख मानो राजा के अपने होते थे। राजा अपना वेश बदलकर भी अपनी प्रजा की स्थिति को जानने का यत्न करता था।
जब ये स्थितियाँ विपरीत होने लगी यानी राजनीति में साधु-सन्तों को तिरस्कृत किया जाने लगा, तभी से सारी समस्याओं का जन्म होने लगा। कहने का तात्पर्य यह है कि धर्म के चाबुक का जब तक राजाओं को भय था तब तक राज्य प्रजाजनों के हितार्थ कार्य करते रहे। परन्तु जब धर्म का भय राजाओं के मन से दूर होने लगा तब वे स्वार्थी और मदान्ध होने लगे। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ उन लोगों में बलवती होने लगी। यहीं से राजनीति में गिरावट आनी प्रारम्भ हो गई।
सतयुग और त्रेतायुग तक ये सारी व्यवस्थाएँ सुचारू रूप से चलती रहीं। द्वापरयुग तक आते आते अन्य नैतिक मूल्यों की तरह इस परम्परा का भी बहुत हद तक ह्रास हुआ। परन्तु आज यह स्थिति बन गई है कि सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया है। राजसत्ता को किसी का भी भय नहीं है। इसीलिए आज के राजतन्त्र में सर्वत्र रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, कालाबाजारी, अनैतिक कार्य करने वालों को प्रश्रय देना आदि अवगुण नित्य प्रति बढ़ते जा रहे हैं।
शायद यही कारण है कि आज शासक वर्ग जनता की परवाह नहीं करता और वह जनता को मात्र एक वोट से अधिक कुछ नहीं जानती। जनता भी शासक वर्ग को कुछ नहीं समझती। वह जानती है कि पाँच वर्ष में एक बार नेता वोट माँगने के लिए झोली फैलाकर आएँगे और फिर दोनों के रास्ते अलग-अलग हो जाएँगे। दोनों ही पक्ष अपना-अपना उल्लू सीधा करने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। आज के समय में यह कोरी कल्पना प्रतीत होती है कि कभी राजनीति धर्म से प्रेरित होकर चलती थी। कुछ दशक पूर्व गौ हत्या रोकने के लिए आन्दोलन साधु समाज के द्वारा किया गया था। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उस समय गौवंश की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले निहत्थे सन्तों और जनता पर गोलियाँ चलाई गई थीं।
आज के इस युग में सच्चे साधु-सन्तों की एक बार फिर से महती आवश्यकता है जो अपने ज्ञान से समाज को सकारात्मक दिशा दे सकें। गर्त में जा रही इस स्वार्थपरक राजनीति को पुनः अपने निर्देश से ऊँचाइयों की ओर ले जा सकें।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 2 अक्टूबर 2017
मनुष्य का जीवन एक बार
मानव का यह शरीर मनुष्य को एक ही बार मिलता है। इसलिए इस सुअवसर को यूँ ही नष्ट नहीं करना चाहिए। अपने जीवनकाल में इसे भरपूर जीना चाहिए और अपने सभी दायित्वों का पूर्णरूपेण से पालन करना चाहिए ताकि इस संसार से विदा लेते समय मन में यह मलाल न रहने पाए कि उसने यह जीवन बरबाद कर दिया है। काश हम जीवन को अपनी इच्छा से भरपूर भोग सकते, अपनी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण कर पाते।
निम्न श्लोक में कवि मनुष्य को चेतावनी देते हुए कहा रहा है कि धन-सम्पत्ति,राज्य आदि उसे बारबार मिल सकते हैं, परन्तु यह शरीर नहीं -
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः।।
अर्थात् यद्यपि धन, सम्पति, मित्र, स्त्री, राज्य मनुष्य को बार-बार मिल सकते हैं। लेकिन मनुष्य का यह शरीर केवल एक ही बार प्राप्त होता है। एक बार नष्ट हो जाने के बाद इसे पुनः प्राप्त करना असम्भव होता है।
धन को मनुष्य अथक मेहनत करके कमाता है। दिन-रात एक करके वह कोल्हू का बैल बनने से भी नहीं हिचकिचाता। उसके लिए अपनी आयु के कई वर्ष व्यतीत करता है, तब कहीं जाकर पाई-पाई करके वह धन का संचय कर पाता है। दुर्भायवश यदि उस धन की हानि ही जाती है तो पुनः प्रयास करके धन को वह फिर कमा लेता है। मनुष्य बारबार धन को व्यय भी करता है और कमाता भी है। इसी प्रकार वह अपने लिए सम्पत्ति बनाता है। किसी कारणवश यदि वह सम्पत्ति उससे छिन जाती है अथवा किसी अनिवार्य परिस्थिति में उसे बेचनी पड़ जाती है तो फिर से मनुष्य परिश्रम करके अपनी सम्पत्ति बना लेता है।
जीवनकाल में अच्छे और सच्चे मित्रों का चुनाव मनुष्य करता है। यदि मित्र किसी दूर स्थान चला जाए या उसका साथ छूट जाए तो पुनः मित्र बनाया जा सकता है। इसी प्रकार स्त्री से यदि वियोग हो जाए अथवा उनमें परस्पर मत वैभिन्य के कारण अलगाव हो जाए तो दुनिया वहीं समाप्त नहीं हो जाती। मनुष्य पुनः विवाह करके अपनी गृहस्थी बस लेता है। इस तरह निस्संदेह उसे अपना नया जीवनसाथी मिल जाता है।
किसी राजा के शत्रु यदि उसके राज्य पर आक्रमण करके उसे राज्य से च्युत कर देते हैं तो वह हारा हुआ राजा अपनी सैन्य शक्ति का पुनः विस्तार करके या अन्य मित्र राजाओं की सहायता से अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर सकता हैं। इस प्रकार वह राजा अपना हारा हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर सकता है।
श्लोक के अन्त में कवि चेतावनी देते हुए कह रहा है कि मनुष्य का यह जन्म एक बार समाप्त हो जाए तो पुनः नहीं मिल सकता। यदि पुण्य कर्मों की अधिकता हो तो उसका अगला जन्म मनुष्य का हो सकता है परन्तु वह शरीर इस जन्म में मिला हुआ शरीर नहीं होगा। इसके अतिरिक्त यह भी कह सकते हैं कि एक जन्म में अपने कर्मों के अनुसार मिली हुई निश्चित अवधि के पश्चात मानुष उस जन्म को भूलकर अगली यात्रा के लिए चल पड़ता है। इसलिए मनीषी कहते हैं कि एक बार इस भौतिक शरीर के भस्म हो जाने पर वह किसी भी शर्त पर मनुष्य पुनः नहीं मिल सकता, उसके लिए चाहे वह कितने भी यत्न क्यों न कर ले।
अतः बड़ी कठिनाइयों अर्थात चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात मिले हुए इस अनमोल मानव देह को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। मनुष्य को शुभकर्म करके इस देह का सदुपयोग करना चाहिए। वास्तव में उसी मनुष्य का ही जीवन सफल होता है जो प्रत्येक दिन अपने सत्कर्मों की पूँजी में यत्नपूर्वक वृद्धि करता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 1 अक्टूबर 2017
बुजुर्गों की देखभाल
आयु प्राप्त होने पर मनुष्य जब बुजुर्ग हो जाते हैं तो उन्हें बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। वे छोटे बच्चों की तरह संवेदनशील हो जाते हैं। बात-बात पर तुनक जाते हैं, रूठने-मानने और जिद करने लगते हैं। बच्चों की जरा-सी भी अनदेखी सहन नहीं कर पाते। इसलिए हर बात पर वे बिफर जाते हैं। किसी भी प्रकार की मनपसन्द बात न होने पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई भी उन्हें नहीं चाहता, वे घर के सदस्यों पर बोझ हैं। इस प्रकार विचार करते हुए कभी-कभी अनावश्यक-सी बात हो जाने पर रोने लगते हैं।
उनका शरीर अशक्त होने लगता है। शरीर कमजोर हो जाने के कारण उनका साथ छोड़ने लगता है। उन्हें अपने कार्यों को करने में भी परेशानी होने लगती है। हर छोटे-बड़े कार्य के लिए उन्हें दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है। जो व्यक्ति बच्चों को पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाते हैं, जब उन्हीं से अपने लिए बेरुखी का व्यवहार पाते हैं तो सहन नहीं कर पाते। तब वे टूटने लगते हैं और उनके सपने बिखर जाते हैं।
इसलिए वे मनसिक रूप से स्वयं को असहाय अनुभव करने लगते हैं। तन और मन दोनों से आहत होने पर रोग शीघ्र ही उन पर आक्रमण करने लगते हैं।
उस समय उन्हें अपनों के साथ की बहुत आवश्यकता होती है। आयु के इस पड़ाव में यदि उनके अपने बच्चे भी उनकी परवाह नहीं करेंगे तब उन बुजुर्गों की दुर्दशा होने लगती है। बच्चों का नैतिक दायित्व है कि इस असहाय अवस्था में उनकी लाठी बनें। उनकी सेवा-सुश्रुषा करें।
जिन बच्चों को समय रहते माता-पिता संस्कारी बनाते हैं वे अपने कर्त्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ते बल्कि उस असहाय अवस्था में उनकी सभी जरूरतों को पूरा करते हुए उन्हें अकेलेपन के अहसास से दूर रखते हैं।
बच्चे अपने माता-पिता की सारी धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि को जायज-नाजायज तरीके से हथिया लेते हैं, उन्हें ईमोशनली ब्लैकमेल भी करते हैं। तब फिर उन्हें असहाय अवस्था में दर-बदर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ देते हैं।
इसीलिए कुकुरमुत्ते की तरह स्थान-स्थान पर 'ओल्ड एज होम्स' खुलते जा रहे हैं। कई सरकारी होम्स भी हैं। इनमें से कुछ होम्स में बुजुर्गों को मुफ्त सुविधाएँ दी जाती हैं और कुछ होम्स में वृद्ध शुल्क देकर रहते हैं। केवल महिलाओं के लिए भी होम्स हैं। शारीरीक रूप से असमर्थ और बीमार वृद्धों के लिए होम्स हैं। इनके अतिरिक्त स्वयंसेवी संस्थाएँ भी बुजुर्गों की सहायता के लिए तत्पर रहती हैं।
कुछ ओल्ड होम्स में एक निश्चित राशि देकर वृद्ध लोग रह सकते हैं। वहाँ उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। आवश्यकता होने पर उनको चिकित्सा की सुविधाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
पुलिस स्टेशन पर भी सीनियर सिटीजन का रिकार्ड रखा जाता है उसके लिए उन्हें वहाँ पंजीकरण करवाना होता है। फिर समय-समय पर पुलिस उनकी देखभाल करती है। इनके अतिरिक्त विद्यालयों में भी ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं। बच्चे ऐसे अकेले रहने वाले बुजुर्गों के घर जाकर उनके साथ समय व्यतीत करते हैं। उनकी परेशानियों को दूर करने का यत्न करते हैं।
सीनियर सिटीजनों को रेल और हवाई यात्राओं के किराए में छूट दी जाती है। इसी प्रकार बैंक और पोस्ट आफिस में जमा किए गए धन पर अतिरिक्त ब्याज दिया जाता है। उनकी सुरक्षित वृद्धावस्था के लिए मेडिक्लेम पालिसी भी उपलब्ध हैं। जिससे वे अपना ईलाज करवाकर स्वय को सुरक्षित अनुभव कर सकते हैं।
बैंक वृद्धों की पार्पर्टी पर उन्हें लोन भी देते हैं जिससे उन्हें जीवन यापन करने में सुविधा हो सके।
ऐसे नालायक बच्चों से भी माता-पिता को भरण-पोषण का अधिकार भारतीय संविधान देता है। बजुर्गों के संवैधानिक अधिकार निम्नलिखित है-
मेंटेनस एंड वेलफेयर आफ पेरेंटस एडं सीनियर सिटीजनस एक MWPSCA के अनुसार बच्चों का बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार की स्थिति में शीघ्र ही कानूनी रूप से उनके बच्चों अथवा नाती-पोतों(grand childern) से उनकी देखभाल के लिए राशि दें। इसका पालन न करने पर ₹5000 का जुर्माना तथा तीन माह तक की जेल की सजा का प्रावधान है। उन्हें माता-पिता की जयदाद से बेदखल किया जा सकता है। अभी 15 सितम्बर 2017 को असम विधानसभा ने बिल पारित किया है कि जो सरकारी कर्मचारी अपने बुजुर्ग माता-पिता अथवा दिव्यांग भाई या बहन का ध्य्यन नहीं रखेंग, शिकायत मिलने पर एक निश्चित राशि उनके वेतन से काटकर उनके भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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