फैशन का जनून हर युग में रहा है। स्वयं को दूसरों से अलग दिखाने की होड़ लोगों में लगी रहती है। मानव मन की स्वाभाविक कमजोरी है कि वह सबसे सुन्दर दिखना चाहता है। नित-नये वस्त्राभूषणों की तलाश करता रहता है। ये सभी वस्त्राभूषण व प्रसाधन सामग्री उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।
ईश्वर ने इस संपूर्ण सृष्टि को बहुत सुन्दर रंगों से तराशा है। एक-एक जीव-जंतु, फल-फूल, पेड़-पौधे को अनोखा सौंदर्य प्रदान किया है। सारी प्रकृति अपनी सुन्दरता से हमें मोह लेती है। जिधर भी नज़र डालते हैं उसका सौंदर्य बोध हमें आश्चर्यचकित कर देता है हम मन्त्र मुग्ध रह जाते हैं।
इन्सान भी इसी तरह सौंदर्य की प्रतिमा बन चहकना चाहता है। इसी कारण नित-नये सौंदर्य प्रसाधनों की बाजार में भरमार हो रही है। बाजारीकरण के इस युग में कंपनियाँ दिन-प्रतिदिन जनमानस को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के विज्ञापन देते हैं। उन्हें हम टीवी पर देख सकते हैं। समाचार पत्रों व सड़क के किनारे लगे होर्डिंग्स पर भी ये विज्ञापन देखे जा सकते हैं।
कंपनियाँ अपने उत्पादों को प्रचारित करने के लिए फैशन शो का आयोजन करवाती रहती हैं। युवा पीढ़ी को प्रभावित होने से नहीं रोक सकते। इस दौड़ में शामिल होकर वह धन व शरीर की हानि करती है। शरीर की हानि से तात्पर्य है कि सौंदर्य प्रसाधनों का अत्यधिक प्रयोग त्वचा को खराब करता है। इससे कैंसर जैसी बिमारियाँ गले लगाने को हमेशा तैयार रहती हैं।
युवाओं को इस अंधानुकरण से बचना चाहिए। इस बात का ध्यान उन्हें रखना चाहिए कि ये प्रसाधन मनुष्य के प्रकृतिक सौंदर्य को नष्ट करते हैं। फैशन के अनुरूप पहनना-ओढ़ना मानवीय कमजोरी है। इससे बचना नामुमकिन तो नहीं पर मुश्किल अवश्य है।
फैशन करते समय इस बात ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि वह फूहड़ न दिखाई दे। इसका कारण है हर फैशन हर व्यक्ति पर नहीं जँचता। अपने रंग-रूप के अनुसार यदि कलात्मक तरीके से फैशन किया जाए तो मनुष्य सुन्दर व आकर्षक दिखाई देता है लोग उसके सौंदर्यबोध की प्रशंसा करते हैं अन्यथा वह हँसी का पात्र बनता है। लोग भद्दे मजाक करने से बाज नहीं आते। इस छींटाकशी से व्यक्ति का मन दुखी होता है और लोगों का मनोरंजन होता है।
हर फैशन की भी मर्यादा होती है। अपनी आयु व शरीर के अनुसार फैशन से मनुष्य सदा शालीन दिखाई देता है।
सुरुचिपूर्ण फैशन कलाकारों, कवियों, चित्रकारों और समाज के सौंदर्य बोध का प्रभावी अंग है। फैशन यदि उत्तेजक व अश्लील न हो तो सर्वत्र सराहनीय होता है। यदि फैशन फूहड़ या अंग प्रदर्शन का माध्यम बन जाए तो वह समाज में स्वीकार्य नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए अभद्र टीका-टिप्पणी की जाती है।
आधुनिकता के नाम पर हर मर्यादा व मान्यताओं को तोड़ा नहीं जा सकता। आधुनिकता का दंश हमें कहीं का नहीं छोड़ता। अपना घर तो उजड़ता ही है और जग हँसाई भी होती है।
फैशन की रफ्तार सरपट भागने वाली होती है। पता ही नहीं चलता कब वह आया और कब गया। पलक झपकते ही पुराना हो जाता है। इसीलिए वही-वही डिज़ाइन थोड़ा रूप बदलकर थोड़े समय बाद हमारे सामने आ जाते हैं या कभी उसी रूप में भी। इसलिए फैशन की यह अंधी दौड़ हर किसी को पागल बना देती है।
फैशन के इस भूत ने युवा पीढ़ी को जकड़ लिया है। इसके चक्कर में वे अपनी सभ्यता व संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए घातक होती है। समय रहते अपनी जिम्मेदारियों को नहीं को छोड़ यदि इस अंधी दौड़ में बढ़ते जाएँगें तो फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 7 नवंबर 2017
फैशन का जनून
सोमवार, 6 नवंबर 2017
ईश्वर रूपी मनुष्य का कर्मफल
एक गाने की पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं जिसमें कवि ने ईश्वर से इस संसार में आकर कुछ समय रहने के लिए प्रार्थना की है -
भगवान दो घड़ी जरा इन्सान बन के देख।
धरती पे चार दिन का मेहमान बन के देख।
इन पंक्तियों में कवि के मन की वेदना छलक रही है। इसका अर्थ हम कर सकते हैं कि दुखों और परेशानियों से घिरा मनुष्य ईश्वर को उलाहना दे रहा है कि ऊपर बैठा वह बस उसे कष्टों में घिरा देखता रहता है। यदि वह इस संसार में कुछ दिन के लिए इन्सान बनकर आ जाए तो उसे भी यह अहसास हो जाएगा कि मनुष्य का जीवन फूलों की सेज नहीं है बल्कि काँटों पर चलते रहने का नाम होता है। यदि भगवान भी इन्सान बनेगा तो उसे भी चैन से बैठना नसीब नहीं होगा, उसे भी हम मनुष्यों की तरह सारी आयु पापड़ बेलने पड़ेंगे।
उसे भी सारा समय सुखों के मीठे फल खाने होंगे और दुखों के थपेड़े भी सहने होंगे। वह अपनी सृष्टि के बनाए इन नियमों से मुक्त नहीं हो सकेगा। जब वह साधारण मनुष्यों की भाँति जन्म लेगा तो वह भी इस संसार के आकर्षणों के मकड़जाल से बच नहीं पाएगा यानी अछूता नहीं रहेगा।
आज हम उन महापुरुषों की चर्चा करेंगे जिन्हें हम भगवान कहते हैं। जब उनका इस सृष्टि में अवतरण हुआ तो सांसरिक स्थितियाँ उनके लिए सहज व सरल नहीं थीं बल्कि विपरीत ही थीं।
भगवान राम का जन्म राजा दशरथ के घर में बहुत समय बाद हुआ था। उनके युवा होने से लेकर राक्षसों से युद्ध करते रहे।जब उन्हें राज्य मिलना निश्चित हुआ, उस समय उनकी सौतेली माता कैकेयी ने उन्हें चौदह वर्ष का बनवास दे दिया। वे भगवती सीता और भाई लक्ष्मण के साथ राज्य का सुख भोगने के स्थान पर वन में चले गए। वहाँ सीता जी का अपहरण हो गया, उसके बाद उन्हें ढूंढते हुए यहाँ वहाँ जंगलों में भटकते रहे। फिर रावण से युद्ध जीतने के बाद राज्य का सुख भोग भी नहीं पाए थे कि गर्भावती सीता जी से पुनः वियोग हुआ। कितना दुर्भाग्य था कि अपने बच्चों को भी नहीं पहचान सकते थे और बाद में जब बच्चे मिले तो पत्नी माँ सीता से वियोग हो गया। अन्त में उन्होंने सरयू नदी में जलसमाधि ली।
अब भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं। उनका जन्म मथुरा की जेल में हुआ था। उनके पैदा होने से पहले मृत्यु उनका इन्तजार कर रही थी। जिस रात उनका जन्म हुआ उसी रात उन्हें अपने माता-पिता से अलग होकर गोकुल में बाबा नन्द और यशोदा माँ के पास जाना पड़ा। उनका बचपन गायों को चराने में बीता। अभी जब वे चल भी नही सकते थे, उस समय उन पर कई प्राणघातक हमले हुए।
उनके पास कोई सेना नही थी। कोई शिक्षा भी उन्हें नही मिल सकी। उन्हें कोई महल भी नही मिला। उनके अपने सगे मामा ने उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा। वह उन्हें मारने के उपाय करता रहता था। बड़े होने पर उन्हें ऋषि सन्दीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला। अपनी पसन्द की लड़की से विवाह करने का अवसर भी उन्हें नहीं मिला।
उन्हें बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें उन्होंने राक्षसों से छुड़ाया था। जरासन्ध के प्रकोप के कारण उन्हें अपने परिवार को सुदूर प्रान्त में समुद्र के किनारे बसाना पड़ा। दुनिया ने उन्हें रणछोड़ या कायर तक कहा। पाण्डवों के महाभारत का युद्ध जीतने का श्रेय भगवान कृष्ण को न मिलकर अर्जुन को मिला। कौरवों ने अपनी हार का उत्तरदायी श्रीकृष्ण को माना। अन्त में एक शिकारी के द्वारा पैर पर मारे गए तीर से उनकी मृत्यु हुई।
भगवान कहे जाने वाले महामानवों भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के विषय में चर्चा की। उन दोनों के जीवन मे घटने वाली ये सभी घटनाएँ इसी बात का द्योतक हैं कि सारी आयु वे भी मनुष्यों की तरह दुख-सुख के हिण्डोले में ही झूलते रहे। इस संसार में जो भी जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। कोई भी जीव कर्मफल के चक्र के फेर से नहीं बच सकता, फिर चाहे मनुष्य के रूप में भगवान ही क्यों न अवतरित हो जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 5 नवंबर 2017
धार्मिक उन्माद
धार्मिक उन्माद मानवता की जड़ों को पल-पल खोखला करता रहता है। इस उन्माद के कारण दूसरों पर अमानवीय अत्याचार करना, अन्याय करना, दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करना तो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सभी धर्म आपस में प्रेम, भाईचारा, सद्भावना, सहिष्णुता का मार्ग दिखाते हैं अलगाव या विद्वेष का नहीं। कोई भी धर्म कभी भी किसी एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से नफरत करना या लड़ना नहीं सिखाता। इकबाल की यह पंक्ति याद आ रही है-
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना।
हमारे समक्ष ये प्रश्न मुँह बाये खड़े हैं कि फिर धर्म के नाम पर यह मार-काट क्यों? अत्याचार क्यों? इंसान एक-दूसरे के खून का प्यासा क्यों? समझ नहीं आता कि इंसान दिन-ब-दिन असहिष्णु क्यों बनता जा रहा है?
धर्म के नाम पर आतताइयों की जमात तैयार करने वाले मानवता के शत्रु होते हैं। हम किसी को इजाजत नहीं दे सकते कि वह मासूम बच्चों को धर्म के नाम पर झोंक दे। उनके माता-पिता को सारे जीवन का गम देकर निराश्रित कर दे।
वह धर्म कदापि नहीं हो सकता जो मनुष्य को बुराई के रास्ते पर ले जाए। वे तथाकथित धर्मगुरु भी बहिष्कृत करने योग्य हैं जो जन साधारण को ईश्वरीय ज्ञान से मालामाल करने के स्थान पर उन्हें कुमार्ग या पतन की ओर प्रवृत्त करें। ऐसे धर्मगुरुओं का सामाजिक रूप से बहिष्कार होना चाहिए उन्हें सिर पर कदापि नहीं बिठाना चाहिए।
आज पूरा विश्व इस धार्मिक उन्माद का शिकार है। जगह-जगह बम विस्फोट करवाना या मानव बंब बनाकर दूसरों के साथ उनकी भी हत्या सभ्य कहे जाने वाले समाज को शोभा नहीं देता।
जो मानवता का विरोधी हो वो धर्म नहीं हो सकता और जो आत्मोन्नति का पथ न दिखा सकें वो धर्मगुरु नहीं कहला सकता। इन दोनों को तिरस्कृत व बहिष्कृत कर देना चाहिए क्योंकि ये सम्मान के योग्य नहीं होते। इसलिए यथासंभव इनसे किनारा कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 4 नवंबर 2017
वैराग्य की अति
वैराग्य की पराकाष्ठा मनुष्य का अपने शरीर तक से मोहभंग करवा देती है। वह इस असार संसार के साथ-साथ स्वयं अपने को भी विस्मृत कर देना चाहता है। इसीलिए कह बैठता है-
'क्या तन मांजता रे आखिर
माटी में मिल जाना।'
अर्थात इस शरीर को क्या माँजना इसने तो मिट्टी में मिल जाना है।
इस पंक्ति के अनुसार श्री को सजाना-संवारना व्यर्थ है। लोग नाहक ही इस शरीर पर चौबिसों घण्टे ध्यान देते रहते हैं। इसे खूबसूरत दिखाने के लिए हरसम्भव प्रयास करते हैं। ब्यूटी पार्लर में हजारों रुपए व्यय करते हैं। जिम जाते हैं, योग के नाम पर एक्सरसाइज़ करते हैं, डायटिंग करते हैं, प्लास्टिक सर्जरी करवाते हैं। यानी शारीरिक सौन्दर्य बना रहे इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
शारीर को दिन-रात सजाने के चक्कर में वे अपने अहं कार्यों की ओर से विमुख हो जाते हैं। इसलिए उन्हें अपने घर और परिवार के दायित्वों से अधिक अपने शरीर की ओर ध्यान देना अधिक उपयुक्त लगता है।
ऐसे विचार रखने वालों की इस धरा के किसी भी कार्य-कलाप में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वे सभी कार्यों को करते समय निर्लिप्त रहते हैं। परन्तु कभी-कभी कुछ लोग इन सांसारिक दायित्वों से किनारा भी कर लेते हैं। इसे पलायनवादी प्रकृति भी कहा जा सकता है। भौतिक संसार के सभी रिश्ते-नातों से स्वयं को दूर करते हुए मनुष्य ईश्वर के समीप होने लगते हैं। दिन-रात वह प्रभु का नाम जपने में स्वयं को व्यस्त रखना चाहते हैं।
यह शरीर हमें ईश्वर ने एक साधन के रूप में दिया है। जिसके माध्यम से हम इस संसार में अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण कर सकें। यदि हम इसकी सार-सम्हाल नहीं करेंगे तो यह रोगी हो जाएगा। तब न ईश्वर की भक्ति होगी और न ही सांसारिक दायित्व पूरे हो पाएँगे। दूसरे शब्दों में -
माया मिली न राम' वाली हमारी स्थिति हो जाएगी।
घर में हम वाहन रखते है तो समय-समय पर उसका परीक्षण करवाना, उसमें ईंधन डलवाना, नित्य उसकी साफ-सफाई रखना आवश्यक होता है अन्यथा वह कबाड़ बनकर हम पर बोझ बन जाता है। इसी प्रकार शरीर को यदि साफ-सुथरा न रखा जाए, इसे समय पर भोजन न दिया जाए तो यह भी अपने और अपनों पर रोगी होकर बोझ बन जाता है।
इसलिए इसका स्वस्थ रहना बहुत ही आवश्यक है। इस शरीर को बेशक आप साध्य न माने पर यह ईश्वर तक जाने का साधन तो है ही। हमारे सभी ऋषि-मुनि इस शरीर को साधन मानकर इसका पूरा ध्यान रखने का परामर्श देते हैं।
यह सच है कि हमें केवल इस शरीर के लिए ही नहीं जीना चाहिए। मात्र इसी को सजाते-संवारते रहें और इसकी देखरेख के लिए ही पानी की तरह पैसा बहाते रहें। सारा-सारा दिन ब्यूटी पार्लर में जाकर सजते रहें अथवा नित नए बालों के स्टाइल बनवाते रहें। उस पर विभिन्न प्रकार के इत्र या परफ्यूम या डियो डालकर इसे नकली सुगन्ध से महकाते रहें। इस तरह इसको खूबसूरत दिखाने के चक्कर में हम दीन-दुनिया भूल जाएँ। घर-परिवार के दायित्वों से मुँह मोड़कर नित्य ही कलह-क्लेश करते रहें।
इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सच है कि शारीरिक सौन्दर्य कुछ सीमित समय के लिए ही रहता है। जहाँ मनुष्य आयु को प्राप्त करने लगता है अर्थात वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है वहीं उसके चेहरे पर झुरियाँ आने लगती हैं। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार की दुर्घटना का शिकार होने पर अथवा किसी रोग के आ जाने पर भी शरीर की सुन्दरता मुँह मोड़ने लगती है।
उस समय जिस शरीर की सुन्दरता पर हमें बड़ा मान था वह साथ निभाने से इन्कार कर देती है। तब हमारा यह सुन्दर शरीर सामान्य-सा रह जाता है। इसीलिए गुणीजन कहते है कि इस शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। यह हमारा सौन्दर्य स्थायी नहीं है। जब यह नहीं रहता तब हमें बहुत दुख होता है।
अति वैराग्य की चर्चा को यदि हम छोड़ भी दें तो भी इस बात का विशेष ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह शरीर ही सब कुछ नहीं है इसके पीछे भागने का कोई लाभ नहीं होता। इसके अंदर रहने वाली उस आत्मा के विषय में भी सोचना चाहिए। तभी हम सब अपने मानव होने के धर्म को सार्थक करके अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 3 नवंबर 2017
दो पाटों के बीच मनुष्य
यह संसार चक्की के दो पाटों की भाँति निरन्तर चलायमान है। इसका एक पाट जन्म है और दूसरा पाट मृत्यु है। इस जन्म और मृत्यु के दोनों पाटों में जीव आजन्म पिसता रहता है। इस क्षणभंगुर संसार में जन्म और मृत्यु के दो पाटों में पिसते हुए मनुष्य का अन्त निश्चित है। अतः इस असार संसार से विरक्ति का होना स्वाभाविक ही है।
सन्त कबीरदास ने इसे अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोया है-
चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
अर्थात चक्की को चलते हुए देखका कबीर रो पड़े हैं। इसके दो पाटों में अनाज का कोई दाना साबुत नहीं बच सका। सभी पिस गए हैं।
ये दो पाट द्वन्द्व हैं यानी सुख-दुःख, लाभ- हानि, जय-पराजय, यश-अपयश, अपना-पराया, दिन-रात आदि। इनसे जो जीत गया, वह समझो बच सकता है। वही परम ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इसे साक्षी भाव कहा है।
कबीरदास को उदास देखकर उनके पुत्र कमाल ने यह दोहा लिखा-
चलती चक्की देख कर, दिया कमाल ठठाय।
कीले से जो लग रहा, सोई रहा बचाय।।
अर्थात चक्की को चलता हुआ देखकर कमाल ठहाका लगा रहे है। इस चक्की में केवल वही अनाज बच सकता है जो चक्की के मध्य में जुडी कील से चिपक जाता है।
पहला दोहा मनुष्य की अनित्यता के कारण वैराग्य उपजाता है, लेकिन दूसरा दोहा मन में आशा और आस्था का दीपक दिखाता है। आवागमन रूपी दो पाटों में फँसा जीव अपने दायित्वों को निभाते हुए सदा ऐसे ही पिसता रहता है।
कुछ प्रश्न मन में उठते हैं कि बचकर क्या जीवन और मृत्यु से मुक्त हो सकते है? क्या काल को वश में किया जा सकता है? पानी के बुलबुले जैसे इस नश्वर जीवन को क्या स्थायित्व मिल सकता है? पल-पल नष्ट होते हुए इस शरीर को क्या सदा के लिए यथावत रखा जा सकता है?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर न ही है। जो मनुष्य प्रभु भक्ति के मार्ग पर चल पड़ता है और उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाता है, केवल वही बच सकता है। हर तरफ से स्वयं को समेटकर सिर्फ उस मालिक के साथ एकाकार हो जाना ही ज्ञान है, मूल मंत्र है।
जन्म और मृत्यु के इस भय से बचने का ही साधन है मुक्ति। मनीषी इसे निर्वाण, परम पद और अभय पद आदि कहते हैं। इस अवस्था को शरीर की सीमा में रहते हुए पाया जा सकता है। अपने अंतस के शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से स्वयं को मुक्त कराना ही मोक्ष पाना है।
मनुष्य को वीतरागी होना चाहिए। सभी विपरीत गुणों का अतिक्रमण करने से ही व्यक्ति गुणातीत होटा है। जीवन के तमाम परस्पर विरोधी भाव चक्की के दो पाटों की तरह हैं। पाप और पुण्य दोनों कर्म बंधन की वजह बनते हैं।
राग-द्वेष आदि भाव संसार समाज, परिवार, राष्ट्र में हमेशा ही रहेगा। यदि मनुष्य स्वयं को इनसे विलग करके मुक्त हो सकता है। जीवन के सभी विरोधी प्रतीत होने वाले भावों में जो सम रहता है उसे उपनिषद ऋषियों और भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोगी कहा है। वही जन्म और मृत्यु के बन्धनों को काट सकता है। तब वह काल का ग्रास नहीं बनता।
जीवन का द्वैत भाव उसे चक्की के दो पाटों की तरह ही खा जाता है। जो सच्ची श्रद्धा और अपने निश्चित मन से कीले में चिपके अनाज की तरह उस परमपिता परमात्मा के सदैव समीप रहता है, वही इस भव सागर को पार कर लेता है। जो अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहण करते हुए चौबिसों घण्टे अपने हृदय में प्रभु का स्मरण करता रहता है, वह बालक भक्त प्रह्लाद की तरह हर प्रकार के भौतिक कष्टों से मुक्त हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 2 नवंबर 2017
देख पराई चौपड़ी
दूसरों के सुन्दर महल देखकर ईर्ष्या करके अपने मन को अकारण व्यथित नहीं करना चाहिए। किसी मनुष्य को उसके भाग्य से ज्यादा और समय से पहले कुछ नहीं भी मिलता। यदि इस थ्योरी पर हम विश्वास करते हैं तो भी हमें अनावश्यक रूप से दूसरों की उन्नति और अपनी तंगहाली पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।
कोई भी इसे उचित नहीं कहेगा कि दूसरे का महल देखकर हम अपने झोंपड़े को अग्नि के हवाले कर दें। इसीलिए किसी सयाने ने हमें समझाते हुए कहा है-
देख पराई चोपड़ी मत ललचावीं जी।
रुखी सुखी खाए के ठंडा पानी पी॥
अर्थात दूसरों के ऐश्वर्य को देखकर अपना मन को नहीं ललचाना चाहिए। अपने भाग्य अथवा पुरुषार्थ से जो भी रूखा-सूखा मिले उसे खाकर और ठंडा पानी पीकर संतोष करना चाहिए।
कोई कितने व्यंजन खाता है, कितने प्रकार के सुखों का भोग करता है? किसी के पास कितनी गाड़ियाँ हैं? कितने नौकर-चाकर हैं? इस सबको नगण्य (इग्नोर) करते हुए मनुष्य को सदा अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। जो भी हम प्राप्त करना चाहते हैं उसके लिए ईमानदार यत्न करना चाहिए। बारबार प्रयास करने और ईश्वर के न्याय पर भरोसा करके ही मनुष्य अपना मनचाहा पा सकता है।
यह तो स्पष्ट है कि अपने भाग्य से जो भी हमें मिला है उसी पर संतोष करते हुए ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए। अनावश्यक ही भाग्य को कोसने अथवा उस मालिक को दोष देने से कुछ भी नहीं होगा। वह बड़ा न्यायकारी है और किसी के साथ अन्याय नहीं करता।
जो भी अच्छे या बुरे कर्म हम करते हैं उसी के अनुसार ही हमें फल मिलता है। कारण यह है कि कर्म करने में हम स्वतन्त्र हैं। जब हम सत्कर्म करते हैं तब ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। परन्तु जब हम कुकर्म तब हम अपने मन के राजा होते हैं।
हमें किसी का डर नहीं होता। हम सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने, उसे आग लगा देने आदि की बात करते हैं। किसी की जान ले लेना, किसी का अपमान करना तो खेल बन जाता है। उस समय हम भूल जाते हैं कि इन सब का परिणाम भुगतना पड़ता है। सांसारिक न्यायालय से प्रमाणों के अभाव में बरी हो सकते हैं पर उस परम न्यायाधीश की अदालत से सजा पाए बिना नहीं बच सकते। क्योंकि वहाँ किसी गवाह या सबूत की आवश्यकता नहीं होती।
इसीलिए ऋषि-मुनि और विद्वान हर कदम सम्भाल कर रखने का परामर्श देते हैं। यदि समय रहते हुए हम चेत जाएँ तो उस प्रभु के कोप से बच सकते हैं। उसकी बेआवाज लाठी हमें दुखों की ओर नहीं ले जाएगी।
अपनी सुख-समृद्धि के रास्ते का रोड़ा हम स्वयं हैं। जब हम समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त होते हैं तभी उनका परिणाम न चाहते हुए दुखों के रूप में ही भुगतते हैं। हम अभावग्रस्त जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं।
यही कारण है कि संसार में इतनी असमानता है। कोई बहुत सुन्दर है, कोई मृत्यु पर्यन्त स्वस्थ रहता है, कोई जीवन में सुविधाओं का भोग करता है, कोई उच्च पद पर आसीन है, कोई हर प्रकार से सुखी जीवन जीता है।
इसके विपरीत कोई कुरूप है, दो जून रोटी भी नहीं खा सकता, कोई जन्मजात रोगी है, किसी को जीवन भर लानत झेलनी पड़ती है, कोई अभावों में एड़ियाँ रगड़ते मरता है।
हमें सदा अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए दूसरों से कभी ईर्ष्या-द्वेष नहीं करना चाहिए। उनकी समृद्धि को देख यथासंभव सत्कार्यों की ओर प्रवृत्त होना चाहिए ताकि आगामी जन्मों हमें भी मनचाहे ठाठ मिल सकें।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 1 नवंबर 2017
जितना समान उतना कष्ट
एक मनुष्य को अपने जीवन में दो वक्त की रोटी, सिर छिपाने के लिए एक छत और दो जोड़ी कपड़ों की मात्र आवश्यकता होती है। ऐसा हमारे सयाने लोगों का कथन है।
समस्याएँ तभी जन्म लेती हैं जब हमारी महत्त्वाकाँक्षाएँ पैर पसारने लगती हैं। तब हमारा दिन-रात का सुख-चैन सब हवा होने लगता है अर्थात छिनने लगता है। हम कोल्हू के बैल की तरह अहर्निश जुटे हुए परेशान होते रहते हैं।
एक दाल अथवा सब्जी से रोटी खा लो चाहे छप्पन भोग बना लो रोटी तो वही दो ही खानी हैं। जब इन्सान ईश्वर से मात्र धन की कामना करता है तो वह उसे प्रचुर धन तो देता है पर साथ ही यह भी कहता है कि बेटा अब अपनी सारी मनचाही वस्तुएँ खाकर तो दिखा। तब वह मनुष्य खजाने के ढेर बैठा हुआ भी खाली हाथ रहता है।
मालिक उसे धन के साथ ऐसे रोग भी उपहार में दे देता है कि डाक्टर उसे हर तरह के खाने की चीजों का परहेज बता देते हैं। वह बस टुकुर-टुकुर ताकता हुआ उन मनपसन्द खाद्यों को निहारता रहता है। दिन भर में ढेरों दवाइयाँ खाता रहता है। तब फिर उस मालिक से गिला-शिकवा करता है और वह हंसता है कि मनचाहा पाकर भी शिकायत करता है मूर्ख मनुष्य।
मनुष्य को पहनने के लिए वास्तव में दो जोड़ी कपड़ों की आवश्यकता होती है। एक पहनो और फिर दूसरा अगले दिन पहनने के लिए धोकर सूखने डाल दो। हमने कपड़े की हवस भी इतनी बड़ा ली है जो एक और टेंशन का कारण बन जाती है।
हम सब लोगों की अल्मारियाँ कपड़ों से भरी रहती हैं फिर भी हमारे पास कहीं जाते समय पहनने के लिए कपड़े ही नहीं होते। बस एक ही रोना रोते रहते हैं सब कि क्या पहने कपड़े ही नहीं हैं। अरे कोई पूछे तो सही कि भाई जब ये सारे कपड़े पहनने के लिए हैं ही नहीं तो फिर्इ तनी सारी अल्मारियाँ इन कपड़ों से क्योंकर भरकर रखी हुई हैं। न तो हम खुद उन कपड़ों को पहनते हैं और न ही मंहगे और ब्राँडेड कपड़े होने के कारण किसी को देना चाहते हैं।
रहने के लिए भी एक छत मनुष्य को चाहिए होती है। परन्तु जब सौभाग्य से उसे एक मनपसंद घर मिल जाता है तब वह दूसरा और फिर तीसरा घर बनाना चाहता है। कोई अन्त नहीं, इच्छाएँ तो असीम होती हैं। उनके पीछे भागते-भागते कब तक अपने सुख और् चैन की आहूति दोगे।
पहला घर बन गया तो हम बड़े प्रसन्न हुए कि चलो सिर पर छत तो हो गई। थोड़े दिनों बाद दिमाग में फिर कीड़ा कुलबुलाने लगता है कि घर छोटा है गुजारा नहीं होता अब बड़ा घर चाहिए। इसी तरह हम अपने दुखी होने के लिए हजारों बहाने ढूँढते ही रहते हैं।
एवंविध आधुनिक भौतिक उपकरणों के पीछे हम भागते रहते हैं। अपनी हैसीयत के अनुसार पहले छोटी गाड़ी, फिर बड़ी गाड़ी और फिर मंहगी-से-मंहगी गाड़ी। इसी प्रकार टीवी, फ्रिज, एसी, मोबाइल फोन और बच्चों के खिलौने आदि।
हमारी निस्सीम कामनाएँ हमारा जीना दूभर कर देती हैं। हम चक्करघिन्नी की तरह इस दुनिया में गोल-गोल घूमते रहते हैं। जीवन की चक्की में पिसते हुए रोते-झींकते रहते हैं। यह विचार मन में नहीं आता कि- 'सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।'
चार दिन के लिए मिली इस जिन्दगी में उस मालिक दो घड़ी बैठकर याद कर लिया जाए जिसने इस जीवन में हमारी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दी हैं। यदि मनुष्य जीवन में थोड़ा संतोष कर ले तो बहुत मजे से इस मानव जीवन का आनन्द ले सकता है।
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