गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

आर्य और अनार्य

आर्य और अनार्य शब्द वेदादि ग्रन्थों में मिलते हैं। पश्चातवर्ती संस्कृत साहित्य में भी इस आर्य शब्द का प्रयोग मिलता है। आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील मनुष्य। अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशीलों का समाज, जो वेदों के अनुकूल चलने का प्रयास करते हैं। दूसरों को उस पर चलने को प्रेरित करते हैं।आर्य शब्द का अर्थ निम्न श्लोक में स्पष्ट किया गया है -
        कर्तव्यमाचरं काममकर्तव्यमनाचरम्।
        तिष्ठति प्राकॄताचारो य स: आर्य इति।।
अर्थात जो आचरणपूर्वक सभी करणीय कार्य करता है और वर्जित कृत्यों से दूर रहता है तथा सहज ही विवेकपूर्ण व्यवहार करे, वही 'आर्य' कहलाता है।
        हम कह सकते हैं कि विवेकी व्यक्ति आर्य कहलाता है। इस शब्द का प्रयोग ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए किया जाता है जो सदा देश, धर्म और समाज की भलाई के लिए कार्यरत रहते हैं। वे किसी भी व्यक्ति को जाति-धर्म, अमीरी-गरीबी, लिंग, रंग-रूप आदि के आधार पर अलग नहीं मानते। सभी इन्सानों को  एक ही समान समझते हैं।
          स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इसी आर्य शब्द का चयन अपने अनुयायियों के लिए किया था। वे वेद मत को पुनः स्थापित करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने आर्यसमाज की नींव रखी, जिसका अर्थ है श्रेष्ठ लोगों का समूह। वे चाहते थे कि जो भी लोग उनके साथ जुड़ें वे वास्तव में समाज के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने वाले हों। इनका आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगिराज श्रीकृष्ण हैं।
         वे सभी जीवों में उस परमपिता परमात्मा की ही छवि देखते हैं। इसलिए उन्हें सांप और बिच्छू आदि विपरीत स्वभाव वाले जीवों से भी डर नहीं लगता। वे प्राणिमात्र से प्यार करते हैं, किसी से घृणा नहीं करते। एवंविध आर्य न भूत प्रेत से डरते और न ही पीपल या बरगद आदि पेड़ों से।
         ईश्वर पर उन्हें अटूट विश्वास रखते है।  इन अन्धविश्वासों से दूर रहते हैं। बिल्ली या नेवले के रास्ता काट जाने पर, घर से निकलते ही छींक आने पर या खाली बाल्टी देखकर वे रास्ता नहीं बदलते। पूजा-पाठ अथवा कथा-प्रवचन के नाम पर होने वाले ढकोसलों पर वे अनवश्यक खर्च नहीं करते।  किसी कार्य की संभावित सफलता के लिए ईश्वर को रिश्वत नहीं देते। गंदगी और बदबू भरे नदियों और तालाबों के जल में नहाने के लिए विवश नहीं होते और न ही वे उन्हें दूषित करते हैं।
        उनके सभी कर्म ईश्वर को समर्पित होते हैं। इसीलिए कोई भी शुभकार्य बिना कोई मुहूर्त निकलवाए प्रभु का नाम लेकर आरम्भ कर देते हैं। उनका मत है कि ईश्वर के द्वारा बनाए गए सभी दिन शुभ हैं। वे अपने किए गए शुभ कर्मों का श्रेय ईश्वर को देते हैं। अपनी गलती को हरि इच्छा न मानकर भविष्य में दोहराने से परहेज करते हैं। सुबह-सुबह अखबार में पढ़कर अथवा टी.वी. में राशिफल देखकर अपने पूरे दिन का कार्यक्रम नहीं बनाते।
         अनार्य शब्द का प्रयोग दुष्ट व्यक्तियों के लिए किया जाता है। जिनका कार्य सबको पीड़ा देना होता है। वे दूसरों को कष्ट में देखकर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। ये लोगों को डर दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आते। वे देश, धर्म और समाज के नियमों को तक पर रखना इनका स्वभाव बन जाता है। इन नियमों के विपरीत कार्य करने में ये गर्व महसूस करते हैं। ये लोग किसी कायदे-कानून को नहीं मानते। नियमों को तोड़ना इनकी आदत बन जाती है। दुष्प्रवृत्ति के ये लोग परमात्मा
की उपासना का ढोंग अधिक करते हैं। अपने से बढ़कर इन लोगों को और कुछ भी नहीं दिखाई देता।
          आर्य वास्तव में एक ईश्वर की उपासना करते हैं। स्वर्ग पाने के लिए वे किन्हीं अप्सराओं अथवा हूरों की कामना कदापि नहीं करते, अपितु अपने कर्मों की शुचिता पर ध्यान देते हैं। सच्चाई के मार्ग पर चलने वाले ये ईश्वर के प्रति पूर्णरूपेण से समर्पित होते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 6 दिसंबर 2017

अपना कौन

मनुष्य के आसपास रहने वाले या जिनसे वह सदा घिरा रहता है, वे सभी लोग उसके अन्तरंग नहीं बन पाते। यह भी सत्य है कि अपने से दूर रहने वाले सभी उसके पराए नहीं होते। मनुष्य के कौन कितना समीप है और कौन कितना दूर है, इसे परिभाषित कर पाना संभव नही है। विषय यही है कि फिर उसकी आत्मीयता किसके साथ होती है।
         गुड़ पर सदा मक्खियाँ मंडराती रहती हैं क्योंकि इससे उनका स्वार्थ जुड़ा होता है। जब गुड़ समाप्त हो जाता है, तब वे उड़ जाती हैं। फिर उस ओर मुड़कर देखती भी नहीं हैं। इसी प्रकार कुछ मौकापरस्त लोग भी अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु सम्बन्ध बनाते हैं। उसके पश्चात मुँह मोड़कर चल देते हैं। उनके लिए किसी सम्बन्ध का कोई मूल्य नहीं होता, वे बेमायने होते हैं।
         निम्न श्लोक में सम्बन्धों की बहुत सुन्दर परिभाषा दी गई है। कवि का कथन है-
         दूरस्थोऽपि न दूरस्थो, यो यस्य मनसि स्थितः।
         यो यस्य  हृदये नास्ति, समीपस्थोऽपि  दूरतः॥
अर्थात जो व्यक्ति हृदय में रहता है, वह दूर होने पर भी दूर नहीं है। जो हृदय में नहीं रहता, वह समीप रहने पर भी दूर ही है।
          यह श्लोक हमें समझ रहा है कि जो व्यक्ति अपने हृदय में रहता है, वह सदा ही समीप होता है। यहाँ समय और स्थान की दूरी कोई मायने नहीं रखती। वे लोग चाहे पास रहें या दूर रहें हमेशा ही निकट रहते हैं। इसी प्रकार वे चाहे प्रतिदिन मिलें या दिनों या महीनों या वर्षों के उपरान्त, उनकी आत्मीयता बनी रहती है। उनके सम्बन्धों का आकर्षण कभी समाप्त नहीं होता। इस श्रेणी में कोई भी बन्धु-बान्धव हो सकता है।
          इसके विपरीत जो बिल्कुल करीब रहते हैं या सम्बन्धों में बहुत करीबी होते हैं, पर जब वे किसी भी कारणवश मन से उतर जाते हैं तो वे दूर हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो मनभेद हो जाने पर कोई कितना भी पास रहता हो, दूर ही प्रतीत होता है। पति-पत्नी, भाई-बहन, सन्तान, मित्र-रिश्तेदार, सहकर्मी कोई भी हो सकता है, जिससे मनमुटाव हो जाए तो उसका चेहरा देखना भी इन्सान को पसन्द नहीं आता। उसके मन में उन सबके प्रति नफरत का भाव पनपने लगती है।
         जीवन में एकसाथ जीने-मारने की कसमें खाने वाले, एक ही छत के नीचे रहने वाले पति-पत्नी के मध्य जब विश्वास और सामञ्जस्य की डोर टूटने लगती है तब वे अजनबियों की भाँति व्यवहार करने लगते हैं। कभी अपनी सन्तान के मोहवश या किसी अन्य कारण से साथ रहते हुए भी उनके सम्बन्धों में गर्माहट समाप्त हो जाती है। एक ही छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे को वे फूटी आँख नहीं भाते और दोनों ही साथी को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं चूकते। 
         इसी तरह भौतिक धन-सम्पत्ति के लिए विवाद करने वाले या न्यायालय की शरण में जाने वाले सगे बन्धुजन परस्पर शत्रुवत बन जाते हैं। उनमें परस्पर इतनी शत्रुता हो जाती है कि उनके बीच सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। तब उनके मध्य वार्तालाप का रास्ता भी बन्द हो जाता है। वहाँ सुलह-सफाई की कोई भी गुंजाइश नहीं रह जाती। विवशता के कारण यदि उनका आमना-सामना कभी हो भी जाए तो वे कन्नी काटकर निकल जाने में अपनी भलाई समझते हैं।
         अपनी आँखों के तारे, जिनके लिए इस संसार में मनुष्य जीता है, वही बच्चे उसे उस समय कोढ़ यानी नासूर की तरह लगने लगते हैं, जब वे उसका सब कुछ छीनकर उसे दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देते हैं। उस समय वह सोचता है कि यदि ऐसी औलाद न होती और वह निस्संतान रह जाता तो अधिक अच्छा होता।
           साररूप में यही कहा जा सकता है कि किसी के साथ दूरी होना अथवा समीपता होना मनुष्य के अपने व्यवहार पर निर्भर करता है। जो अधिक गम खाता है, वही सबका अपना होता है। अपने स्वार्थ को प्रश्रय देने वाला दूसरों की नजरों से उतर जाता है। तब पास होते हुए भी वह दूर हो जाता है।
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मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

अन्तरंग से साझा

मनुष्य अपने मन की बात केवल उस व्यक्ति से साझा करता है जो उसका अन्तरंग होता है। इसके पीछे यही भाव होता है कि वह व्यक्ति उसका विश्वासपात्र है। वह उससे अपनी परेशानी अथवा प्रसन्नता बाँट सकता है। उसकी बातों का बढ़ा-चढ़ाकर, चटखारे लेकर वह किसी के सामने बखान नहीं करेगा। उसके सामने या पीठ पीछे उसके लिए अपमानजनक स्थितियाँ नहीं बनने देगा।
           यदि कभी ऐसी विपरीत परिस्थिति बनती है तो वह हितैषी उसकी पीठ पीछे भी उसके विरूद्ध कुछ नहीं कहेगा अपितु उसका पक्ष लेकर विरोधियों का प्रतिकार ही करेगा, उन्हें बुराई नहीं करने देगा।
          अंग्रेजी भाषा में दो शब्द हैं ओपन और क्लोज। इन शब्दों को हम सभी अपने प्रतिदिन के जीवन में प्राय: सुनते हैं और प्रयोग भी करते हैं। व्यावहारिक जीवन में कोई मनुष्य उसी व्यक्ति के समक्ष सबसे अधिक ओपन हो पाता है अथवा खुल पाता है, वह सबसे अधिक जिसके क्लोज होता है अथवा करीब होता है।
           किसी भी मनुष्य का सौभाग्य होता है कि उसके पास कोई शुभचिन्तक हो। वह चाहता है कि ऐसे व्यक्ति के सामने वह अपने मन की सारी परतें खोलकर रख दे। हर प्रकार से वह उसे सान्त्वना प्रदान करे, उसके जख्मों पर अपने सहानुभूतिपूर्ण वचनों से मलहम लगाए। उसका व्यवहार ऐसा हो कि जिससे उस मनुष्य के पास जाकर वह अपनी सारी परेशानियों से उभरने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त कर सके।
            ऐसा हितचिन्तक सज्जन, मित्र अथवा घर-परिवार का कोई भी व्यक्ति हो सकता है। ये सहृदय व्यक्ति विशेष सरल होते हैं। सबका हित साधना उनका उद्देश्य होता है। वे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना रखते है और सबको अपना समझते हुए उनकी भलाई करने के लिए कटिबद्ध रहते हैं। उनके लिए कोई भी मनुष्य पराया नहीं होता।
            वे सब लोगों के साथ समानता का व्यवहार करते हैं। धर्म, जात-पात, रंग-रूप, ऊँच-नीच आदि की दीवारों में कैद नहीं होते। उनके लिए सभी बराबर होते हैं। इन सब पचड़ों से दूर रहकर प्राणिमात्र का भला करते हैं।
          अपने सुकर्मों के कारण वे समाज में अपना एक स्थान बना पाते हैं। दुनिया उन्हें अपनी आँखों का तारा बना लेती है। इस दुनिया से विदा लेने के पश्चात भी वे सबके हृदयो में विराजमान रहते हैं। लोग उनको भूल नहीं पाते। उनके द्वारा किए गए उपकारों को याद करते रहते हैं।
           जो लोग किसी के लिए भी विश्वास के योग्य नहीं होते, वे कदापि अच्छे इन्सान नहीं कहलाते। इस पृथ्वी पर एक बोझ की तरह जन्म लेते हैं और अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर द्वारा दिए गए अपने समय को पूरा करके इस दुनिया से कूच कर जाते हैं। इनकी न समाज में पूछ होती है और न ही अपने घर में। उनके साथ हुए कटु अनुभवों के कारण उन्हें लोग याद ही नहीं रखना चाहते। वे लोगो द्वारा भुला दिए जाते हैं।
          मनुष्य को यत्नपूर्वक ऐसे हितैषियों को खोजना चाहिए जो उसकी उम्मीदों पर खरे उतर सकें। उसके सुख-दुख के साथी बनकर वे उसे अपने कलेजे से लगाकर रखें। उसके सारे दुखों और परेशानियो को अपना समझकर उसकी हर प्रकार से रक्षा और सहायता करें। उनकी शरण में जाकर वह स्वयं को सहज अनुभव कर सके। ऐसे स्वार्थरहित महानुभावों की सत्संगति का लाभ उठाकर मनुष्य इहलोक के सम्पूर्ण आनन्दों का लाभ उठा सके।
            इसके साथ ही वे मनुष्य को अपने कर्त्तव्यों के पालन करने का बोध कराएँ, ताकि मनुष्य एक अच्छा इन्सान बनकर देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के सभी दायित्वों को निभाने वाला बनकर समाज का प्रिय बन सके।
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सोमवार, 4 दिसंबर 2017

मृत्यु विश्राम स्थली

दिनभर भागदौड़ करते हुए जब मनुष्य थक जाता है तो वह रात्री उसके लिए विश्राम स्थली बन जाती है। नींद पूरी कर लेने के पश्चात प्रातःकाल नए दिन की चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए वह तरोताजा हो जाता है।
         उसी प्रकार जीवन पर्यन्त संसार सागर में द्वन्द्वों के थपेड़ों को झेलता हुआ मनुष्य बहुत थक जाता है, तब जीव को भी विश्राम की महती आवश्यकता होती है। वह उसे मृत्यु की गोद में जाकर मिलता है। इसे हम दूसरे शब्दों में चिरनिद्रा भी कह सकते हैं।
         एक जन्म से दूसरे जन्म की यात्रा करते समय यह मृत्यु एक पड़ाव है। इसे हम आम भाषा में होटल या धर्मशाला में ठहरना भी कह सकते हैं। यहाँ पर यात्री निश्चित अवधि के लिए रुकता है और फिर आगे की अपनी यात्रा पूर्ण करने के लिए चल पड़ता है। इसी प्रकार मृत्यु की अवधि को पार करके जीव अपनी आगे की यात्रा के लिए तैयार हो जाता है।
        मृत्युकाल की अवधि जीव के कर्मों के अनुसार निश्चित होती है। मनीषी ऐसा मानते हैं कि पुण्यात्माओं को पुराना शरीर छोड़ते ही नया शरीर मिल जाता है। जिन लोगों के खाते में पापकर्मों की अधिकता होती है वे जीव ब्रह्माण्ड में निरूद्देश्य घूमते रहते हैं। उन्हें काफी समय पश्चात ही नया जन्म मिलता है।
          इस प्रकार मृत्यु के पश्चात स्वयं द्वारा कृत शुभाशुभ कर्मों के अनुसार जीव को चौरासी लाख योनियों में से किसी भी योनी में निश्चित समयावधि के पश्चात नया जन्म मिलता है। उसके लिए उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती। इस सबके लिए उसके कर्म ही प्रधान होते हैं।
         जो जीव ब्रह्माण्ड में यानी शून्य में विचरते रहते हैं उन्हें ही आम भाषा में भूत और प्रेत की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। ये अपने नए जन्म की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
       मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए। जन्म के पश्चात मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म जीव की स्वभाविक प्रक्रिया है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है-
               वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
               नवानि   गृह्णाति   नरोSपराणि।
               तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
               न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
अर्थात जिस प्रकार पुराने वस्त्रों को छोड़कर मनुष्य नए वस्त्र ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए शरीरों को धारण करती है।
          कहने का तात्पर्य यही है कि शरीर परिवर्तन जीव या आत्मा का स्वभाव है। शरीर का मोह मनुष्य को होता है, आत्मा को नहीं। मनुष्य सारा जीवन इस नश्वर भौतिक शरीर को सजाने-संवारने में लगा रहता है। दूसरों से अधिक सुन्दर दिखाई देने के लिए घर में रहते हुए उपाय करता है, ब्यूटी पार्लर में जाकर लाखों रुपए और समय खर्च करता है।
        फिर भी यह शरीर एक दिन उसका साथ छोड़ देता है। तब मनुष्य के प्रिय बन्धु-बान्धव उसे थोड़ा समय भी घर में नहीं रखते बल्कि अग्नि के हवाले कर देते हैं। यह शरीर मनुष्य को छोड़कर अग्नि में भस्म हो जाता है और इस शरीर में रहने वाला जीव अपनी अगली यात्रा के लिए चल पड़ता है।
         मृत्यु को दुखदायी या बीभत्स नहीं मानना चाहिए। यह तो जीव के रूप का मात्र परिवर्तन करती है। यदि ईश्वर ने मृत्यु का विधान न रखा होता तो सृष्टि के आदी से अब तक जीवों की मानो बाढ़-सी आ जाती। इस पृथ्वी पर तिल रखने की जगह न बचती। इसीलिए मनीषी हमें समझाते हैं कि जो भी जीव इस असार संसार में आया है उसका अन्त निश्चित है।
         मृत्यु से घृणा करने अथवा उससे डरने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। जीवन की बाजी हार चुके, थके-माँदे, बीमारियों से जूझते, एक्सीडेंट में लाचार हो रहे लोगों के लिए नवजीवन का उपहार है, उनकी विश्राम स्थली है। जीवनकाल में ऐसे शुभकर्म कर लेने चाहिए जिससे मृत्यु के भय से मुक्त हुआ जा सके। जिस प्रकार आने वाले नए जीवों का हम स्वागत करते हैं उसी प्रकार मृत्यु का भी स्वागत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 3 दिसंबर 2017

मोबाईल आधुनिकता की देन

छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक सबके पास मौजूद इस मोबाइल ने दिलों और घर में दूरियाँ बढ़ा दी हैँ। सभी सदस्य इसी पर व्यस्त रहते हैं, एक ही घर में रहते हुए किसी से बात करने का समय उन्हें नहीं मिल पाता। यह चिन्ता का विषय है। इस मोबाइल की इतनी तल लग गई है कि न चाहते हुए भी इसके बिना रह पाना कठिन हो जाता है।
         वास्तव में मोबाइल ने हम सबको इस हद तक अपनी गिरफ्त में ले लिया है कि इसके बिना सब सूना लगता है। ऐसा लगता है मानो आदिम युग में आ गए हैं। पार्टी में, विवाह में या अन्य किसी कारण से इकट्ठे होने पर सभी अपने मोबाइल पर ही लगे रहते हैं। शायद उनकी इच्छा ही नहीं होती किसी से मिलने की। इसीलिए शायद एक-दूसरे से न मिल पाने के लिए आज सबके पास समय की कमी का बहाना रहता है।
         आज दूरियाँ और व्यस्तताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि मनुष्य को खुद से ही संवाद करने का समय नही मिलता। आपस में मिल-बैठकर सुख-दुख बाँटने का समय भी किसी के पास नहीं है। बस सन्देश भेज दो और दायित्व से मुक्त हो गए।
          मोबाइल ने संवाद और रिश्तों को ऐप्स में समेट दिया है। किसी का हालचाल पूछना, जन्मदिन की शुभकामना देना, पार्टी या शादी में निमन्त्रण देना हो तो वाट्सअप कर दो। देखते-देखते हम में इतने सीमित हो गए हैं कि बाहरी दुनिया से संबंध-रिश्ते न के बराबर बचे हुए हैं। अब तो समय व्यतीत करने का माध्यम बस मोबाइल रह गया है।
     सबकी अपनी एक अलग दुनिया  है, जिसमें अपने मोबाइल के साथ बस खुश रहते हैं। जब उदास या परेशान होते हैं तब फेसबुक या ट्विटर पर कुछ भी लिखकर पोस्ट कर देते हैं। कुछ ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ पाकर खुश या उदास हो जाते हैं।
        मजे की बात यह है कि अपनों की चिंता से अधिक आभासी दुनिया द्वारा चिंता किया ज्यादा अच्छा लगता है। बच्चे के पैदा होने की, बीमारी की अथवा किसी सम्बन्धी के मरने की खबर रिश्तेदारों को बताने से पहले फेसबुक पर डाली जाती है।
       इस मोबाइल-संस्कृति ने सबको आत्मकेन्द्रित कर दिया है। सोते-जागते  सदा ही घंटी बजने या मैसेज आने का आभास होता रहता है। मोबाइल की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। मोबाइल के इस आकर्षण बच पाना असम्भव होता जा रहा है।
      यह बीमारी बच्चों में भी बढ़ती जा रही है। जब उन्हें फुर्सत मिलती है, तब मोबाइल पर अपना मन बहलाते हैं। आजकल दो-तीन साल के बच्चों की मोबाइल पर तेजी से चलती अंगुलियों को देखकर दंग रह जाते हैं। वास्तव में इन बच्चों को मोबाइल की दुनिया में धकेलने में माता-पिता का बहुत योगदान है। फिर वे उनसे परेशान होते हैं कि इसका ध्यान मोबाइल के अलावा कहीं लगता नहीं।
       मोबाइल का उपयोग उत्पादों और सेवाओं के आदेश देने, प्रतियोगिताओं में भाग लेने, विज्ञापन देने और सेवाएँ प्रदान करने के लिए किया जाने लगा है। भुगतान देय तिथियों तथा अन्य सूचनाओं के लिए भी मोबाइल आज का प्रयोग सरलता से किया जा रहा है।
        मोबाइल 'आल इन वन' हो गया है। इसके आने से हाथ की घड़ी, अलार्म घड़ी, म्यूजिक सिस्टम, डी वी डी प्लेयर, ट्राँजिस्टर, टेप रिकारँडर, कैमरा आदि के  इन सबकी आवश्यकता ही नहीं रह गई है। इनके साथ ही तार भेजने के स्थान पर मैसेज भेज दिए जाते हैं। इससे आन लाइन शापिंग, मनी ट्राँस्फर, बिलों का भुगतान किया जा सकता है। रेलवे व हवाई जहाज की टिकट बुक करना, सिनेमा टिकट लेना, होटलों मे बुकिंग आदि सुविधा से होने लगी है।
         यह मोबाइल बुजुर्गों के लिए समय बिताने का एक साधन है। इसके आने से देश-काल की सीमाएँ सिमट गई हैं। इससे अच्छे या बुरे हर तरह के संस्कार लिए जा सकते हैं। इस नई तकनीक का सदुपयोग अथवा दुरूपयोग करना हमारे अपने हाथ में है।
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शनिवार, 2 दिसंबर 2017

जीवन चलने का नाम

जीवन चलते रहने का नाम है। जब तक जीवन का रथ चलता रहता है तभी तक सब सुचारू रूप से आगे बढ़ता है। जहाँ पहिया रुका बस वहीं जीवन का अंत समझो।
        जीवन का महत्त्व विरले ही समझते है और जिसने इसका रहस्य जान लिया वह स्वर्णाक्षरों में चमकता है। यूँ तो सभी अपना जीवन जीते हैं पर इस कला के जानकार ही बता सकते हैं इसकी उपयोगिता।
        हम आसपास वाहनों को देखते हैं। जब तक उनका पहिया चलता है सब ठीक रहता है पर जब पहिया जाम हो जाता है तब परेशानियां बढ़ जाती हैं। कष्ट भी होता है और खर्च भी होता है। गाड़ी ठीक से चले उसके लिए पेट्रोल, डीजल आदि डलवाना पड़ता है और समय-समय पर जांच करवानी पड़ती है।
      उसी तरह जीवन का पहिया रुकने पर दुखों-परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अस्वस्थ होने पर डाक्टरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और धन भी खर्च होता है।
        हमारा जीवन सुचारू रूप से चले तो इसके लिए हमें अपने को संयमित करना होगा। संतुलित आहार-विहार के नियमों का पालन करना होगा इससे हम स्वस्थ भी रहेंगे और डाक्टरों की आवश्यकता भी हमें कम पड़ेगी।
       यह हमपर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। मेरा विचार है हम सभी अमन और चैन से अपना जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो अपनी जीवनशैली में थोड़ा सा परिवर्तन लाकर हम बहुत कुछ पा सकते हैं।
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शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

ईश्वर के न्याय में दखलंदाजी

हम जाने-अनजाने उस न्यायकारी ईश्वर के न्याय में दखलअंदाजी करते हैं जो किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। हो सकता है आप मेरी बात से असहमत हों परन्तु यदि मेरे विचारों को पढ़कर तर्क की कसौटी पर कसेंगे तो मानेंगे कि मैं सर्वथा सत्य कह रही हूँ।
         संसार में रहते हुए हमें यदा-कदा लोगों के कटाक्ष अथवा उनके द्वारा किए गए अपमान का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त किसी दूसरे के कारण हमें कभी-कभी हानि उठानी पड़ती है अथवा न चाहते हुए अनावश्यक झगड़े में फंस जाना पड़ता है। उस समय हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं- "हे ईश्वर! मेरा दिल दुखाने वाले उस मनुष्य को कभी न छोड़ना, उसे माफ भी न करना। उसे कड़ी-से-कड़ी सजा देना ताकि उसे सबक(lesson) मिल जाए। वह फिर मेरा अहित करने की हिम्मत न करे।"
          अब बताइए कि वह मालिक जब सब कुछ जानता है तो हम कौन होते हैं उसे न्याय करना सिखाने वाले? क्या हमने कभी उससे अपने तथाकथित शत्रु को क्षमा करने करने के लिए प्रार्थना करते हुए कहा है- "हे प्रभु! फलाँ व्यक्ति ने अपराध तो किया है पर अज्ञानतावश। उसे क्षमा कर देना और उसे मेरे कारण कष्ट न देना।" यदि हम ऐसा करें तो उस न्यायप्रिय प्रभु को शायद अच्छा लगेगा कि हम दूसरों को क्षमा कर सकते हैं।
         ईश्वर के लिए सभी जीव एक समान हैं। उसकी नजर से कोई बच नहीं सकता। हमारे प्रति अपराध करने वाला हो सकता है दोषी ही न हो बल्कि दोष हमारा ही हो। ऐसा भी हो सकता है कि हमने उसके प्रति कभी कुछ गलत किया होगा जिसका परिणाम हमें अब भुगतना पड़ रहा हो। हाँ ऐसा भी हो सकता है कि वास्तव में वही दोषी हो।
        दोनों स्थितियों में दोषी और निर्दोष होने का न्याय हम नहीं कर सकते। अत: इस समस्या को उसी मालिक पर ही छोड़ देना चाहिए।
         वह स्वयं इसका न्याय कर लेगा। हम उसकी तरह हर जीव के मन के भावों को न पढ़ सकते हैं और न ही जान सकते हैं। इसलिए सारी व्यवस्थाएँ वही संभालता है। यदि वह हमारे ऊपर सब छोड़ दे तो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के मुँह में जाता हुआ निवाला भी छीनकर खा जाएगा। इस प्रकार दुनिया में अव्यवस्था फैल जाएगी। चारों ओर हाहाकार मच जाएगा और लोग त्राहि-त्राहि कर उठेंगे। शातिर व दुराचारी लोगों का बोलबाला हो जाएगा। तब आम आदमी का जीना दुश्वार हो जाएगा।
        हम अपने आसपास बहुधा देखते हैं कि कुछ व्यक्ति विशेष ऐसे होते हैं जिनका अहित करने वालों का कभी अच्छा नहीं होता, अपने किए गए दुष्कर्म का फल उन्हें निश्चित मिलता है। और कुछ लोगों के साथ बुरा करने वालों का बाल भी बांका नहीं होता। कारण वही है कि प्रथम श्रेणी के लोग मन से सहज, सरल व शुभचिन्तक होते हैं, वे किसी का अहित नहीं करते। दूसरी श्रेणी के लोग दिखावा अधिक करते हैं परन्तु मन से दूसरों का हित चिन्तन नहीं करते।
        हमारे पूर्वजन्मकृत कर्मों के ही आधार पर वह सर्वश्रेष्ठ जज बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी के दबाव में आए हमारे लिए निष्पक्ष न्याय करता है। उसी की कड़ी है कि हमें किसी व्यक्ति विशेष से सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ आदि मिलते हैं। फिर हम उस न्यायकारी परमेश्वर से अपने प्रति किए गए किसी भी दोष के लिए उस व्यक्ति विशेष को दण्डित करने की गुहार क्यों लगाएँ? मेरे विचार में उचित नहीं है।
          हमें अपने कर्मों को करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि यथासंभव वे किसी के लिए अहितकर न हों। अपने प्रयासों में यदि हम सच्चाई व ईमानदारी को ला सकें तो ऐसे छोटे-मोटे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाएँगे। हमें उस दयालु न्यायकारी के न्याय में हस्ताक्षेप करने का दोष नहीं लगेगा।
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