शनिवार, 6 जनवरी 2018

न्याय-अन्याय

इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो आज तक कोई भी युग ऐसा नहीं हुआ जिसमें न्याय-अन्याय न हुआ हो और आगे आने वाले समय में भी शायद इस अभिशाप से बचा जा सके। इसका कारण है परस्पर अहंकार का टकराव।
         रामायण काल में भगवान श्रीराम का अगले दिन होने वाला राज्यतिलक सहसा वनवास में बदल जाना कैकेयी के अहंकार और स्वार्थ का परिणाम था। यहाँ श्रीराम के प्रति अन्याय किया गया जिसे उन्होंने से सहर्ष स्वीकार कर लिया।
         शूर्पणखा की नाक काटना, अहिल्या का अपमान होना व उसका मूर्तिवत हो जाना, बाली व रावण जैसे योद्धाओं का वध होना, भगवती सीता का हरण और उनकी अग्नि परीक्षा तथा गर्भावस्था में पुनः निष्कासन सभी इसी न्याय-अन्याय की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।
        इसी प्रकार महाभारत काल में भी न्याय-अन्याय का चला यह चक्र बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है। कौरवों द्वारा पाण्डवों का राज्य हथियाना, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर का जुए के खेल में भाइयों और द्रौपदी को हार जाना, कौरवों का अन्यायपूर्ण राज्य करना और अन्ततः होने वाला महाभारत का युद्ध जिसमें सारे नियमों को अनदेखा करके छल-छद्म का सहारा लिया गया। इस युद्ध ने इतना भयंकर विनाश कर दिया।
        ये सब उन सबके अहं का परिणाम ही कहा जा सकता है। महाभारत काल में नैतिक-अनैतिक, न्याय-अन्याय आदि के सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया था जिसका परिणाम का हम आज तक भुगतान रहे हैं और न जाने कब तक भोगेंगे?
          उसके पश्चात मुगलों के शासनकाल का भयावह रूप हमें आज तक सताता है। उस समय जबरदस्ती तलवार के बल से लोगों का धर्म परिवर्तन कराना और न मानने पर नृशंसता करना, बहु-बेटियों का अपहरण करना, जन साधारण पर अत्याचार करना, मन्दिरों को ध्वस्त करना आदि बहुत से अन्यायपूर्ण कार्य किए गए। इसके फलस्वरूप देश में अशिक्षा, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का जन्म हुआ जिनसे महापुरुषों के अथक प्रयत्नों के बाद भी आज तक हम मुक्त नहीं हो सके।
         अंग्रेजों के शासन काल में भी कुछ कम अन्याय नहीं हुआ। निहत्थों पर गोली चलना, लोगों को बन्धुआ मजदूर बना लेना, चलती ट्रेन से किसी भी नागरिक को नीचे फैंक देना, स्वतन्त्रता सेनानियों को फाँसी देना व् काले पानी भेजन, जन साधारण पर अनेक प्रकार के अत्याचार करना आदि  इन अंग्रेजों का शगल था।
          ये तो थे न्याय-अन्याय के इतिहास से सम्बन्धित कुछ ऐसे उदाहरण जिन्हें प्रायः सभी लोग जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी न जाने कितने शासकों और उनके चमचों के द्वारा जनता अन्याय का शिकार होती रही है। जिस भी कालखण्ड के विषय में पढ़ने लगो तो उस समय में हुए अन्याय और अत्याचार के विषय में पढ़कर मन उदास और परेशान हो जाता है।
          आज राजतन्त्र नहीं प्रजातन्त्र है पर जन साधरण को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है। सत्ता में कोई भी आए, उसे तो बस पिसना ही है। अन्याय का सामना करना ही उसकी विवशता है। पुरातन युग की तरह आज भी राजपुरुषों का विरोध करना अपनी मौत को बुलावा देना ही होता है।
          प्रतिदिन टी वी, समाचार पत्रों और सोशल मिडीया में ऐसी दुखद खबरें हम सुनते और देखते रहते हैं। आज ह्यूमन राइट वाले बहुत एक्टिव हो रहे हैं किन्तु वे भी किसी को न्याय दिलाने में समर्थ नहीं हो रहे। ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वत्र होने वाला अन्याय शायद अधिक मुखर हो रहा है और इसीलिए उसका ही बोलबाला है। बहुत हो-हल्ला होता है परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात ही दिखाई देता है।
         केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में कमोबेश यही स्थिति है। कहीं भी किसी भी व्यक्ति ने जरा-सा सिर उठाने का दुस्साहस किया नहीं कि बस उसकी आफत आई समझो।
           बेशक इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे हैं परन्तु सामन्तवादी सोच से अभी भी हम बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए आज न्याय-अन्याय की जिम्मेदारी किसको दी जाए, यह समझ नहीं आ रहा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

अन्तरात्मा की आवाज

अन्तरात्मा (आत्मा) की आवाज़ के बारे में हम सबने सुना है। मनीषी मानते हैं कि मनुष्य की स्वयं के अन्तस से एक आवाज आती है। यह वह आवाज है जो केवल वही सुन सकता है। यदि वह उसे सुनकर, उस पर आचरण करता है तो उसकी उन्नति होती है। परन्तु यदि वह उसे अनसुना करता है तो उसकी स्वयं की हानि होती है
        सोचने की बात यह है कि आखिर आत्मा की आवाज है क्या? क्या यह सभी मनुष्यों को सुनाई देती है? यह आवाज देता कौन है? यह आवाज हमें कब जगाती है? यह किस प्रकार मनुष्य की उन्नति और अवनति का कारण बनती है?
         इस विषय में कहा जा सकता है कि इसे केवल हम ही सुन सकते हैं। हमारे पास बैठा हमारा कोई प्रिय या मित्र तक भी नहीं सुन सकता। यह आवाज कहीं बाहर से नहीं आती बल्कि हमारे अंत:करण से ही आती है। जैसे हम अपनों से बात करके उसे गुप्त रखते हैं ताकि उसकी सिक्रेसी बनी रहे, उसी तरह हमारे अन्तस् से आने आवाज भी गुप्त रहती है इसीलिए यह अन्य किसी व्यक्ति को सुनाई नहीं देती।
        यह आवाज हर मनुष्य को सुनाई देती है। इसे हम ईश्वरीय प्रेरणा भी कह सकते हैं। जो मनुष्य इस आवाज को सुनकर उस पर सदैव आचरण करता है, वह कदापि कुमार्गगामी नहीं बन सकता। वह व्यक्ति सन्मार्ग पर ही चलता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति इस आवाज को सुनकर भी अनसुना कर देता है, वह गलत कार्य कर सकता है, ऐसी सम्भावना सदा बनी रहती है।
          जब भी हम शुभ कार्य (घर-परिवार, समाज आदि के नियमानुसार कार्य) करते हैं तब हमारे मन में एक प्रकार का उत्साह होता है, खुशी होती है। इसका अर्थ है कि हमारे द्वारा किया जाने वाला कार्य करणीय है अर्थात् करने योग्य है। ये वे कार्य हैं जो हमें मानसिक शान्ति व चैन की जिन्दगी प्रदान करते हैं। इसलिए इन कार्यों को मनुष्य को यत्नपूर्वक सम्पन्न कर लेना चाहिए।
       इसके विपरीत जिस कार्य को करते समय हमारे मन में उत्साह नहीं होता, हमारा मन बैचेन होता है, मन को एक प्रकार का डर सताता रहता है कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा? तो वह निश्चित ही अकरणीय(न करने योग्य) कार्य है। यह कार्य घर-परिवार, समाज आदि के नियमों के विरूद्ध किए जाने वाला कार्य है।
           मन में होने वाली उथल-पुथल को सदा गहराई से समझने पर हम स्वयं ही ज्ञात कर सकते हैं कि हमें कौन-से कार्य करने चाहिए और किन कार्यों को छोड़ना चाहिए। इसके लिए मनुष्य को अन्तस् से उठने वाली उस आवाज को सुनकर, उस पर अपने विवेक से मनन करना चाहिए। उस समय जो निष्कर्ष निकले उसका अनुसरण यत्नपूर्वक करना चाहिए।
          यदि बार-बार हम इस आवाज़ को अनसुना करते रहते हैं तो एक समय ऐसा भी आता है जब उसे सुन ही नहीं पाते। हमारी अन्तरात्मा ईमानदारी से अपना चेतावनी देने का कोई मौका नहीं छोड़ती, बस हम ही ऐसे अहसान फरामोश हैं जो उससे अनजान बन जाते हैं। इस तरह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं।
       यदि हम अपनी आत्मा की आवाज को सुनकर उसके अनुसार कार्य करेंगे, तब हम वास्तव में सफलता की सीढ़ियाँ चढेंगे और हमारा मन सदैव प्रफुल्लित रहता है, उत्साहित रहता है। यदि हम अपनी आत्मा की आवाज के विपरीत कार्य करेंगे तो हमारा मन निश्चित ही हमें कचोटेगा, हम निरूत्साहित रहेंगे। हम कैसा जीवन जीना चाहते हैं इसका निर्णय हमें स्वयं ही करना है। इसलिए हमें अपने मन की, अपनी अन्तरात्मा की आवाज को सुनकर उसके अनुसार कार्य करना चाहिए। कह सकते हैं-
           सोते को जगाया जा सकता है
           जागते को  जगाना  कठिन है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 4 जनवरी 2018

धर्म-कर्म व्यक्तिगत

धर्म-कर्म, पूजा-पाठ आदि प्रत्येक मनुष्य का व्यक्तिगत मामला है। किसी दूसरे को इसमें दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है। कौन किस धर्म या सम्प्रदाय को मानता है या किस विशेष देवी-देवता की आराधना करता है इसे व्यक्ति विशेष को ही विचार करने दें तो अधिक उपयुक्त होगा।
      कोई सकार ईश्वर की उपासना करता है और कोई निराकार की। कोई कर्मकाण्ड करता है, ईश्वर को नवधा भक्ति से रिझाने का यत्न करता है तो कोई केवल योग के माध्यम से उस तक पहुँचना चाहता है और कोई मात्र जप-तप का मार्ग अपनाता है। कहने का अर्थ है तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र किसी भी मार्ग को अपनाकर प्रभु तक पहुँचने के लिए मानव यत्नशील है। किसी भी मार्ग को अनुचित कहना शोभनीय नहीं है। यह जरूरी नहीं कि हम दूसरे व्यक्ति की सोच से सहमत हों।
       विश्व में अनेकों धर्म हैं और उनकी अनुपालना करने वाले भी असंख्य लोग हैं। इसमें झगड़े वाली कोई बात है ही नहीं। ये सभी धर्म मानव के उत्थान की चर्चा करते हैं। उसे यही समझाते हैं कि ईश्वर को पाना ही उसका अंतिम लक्ष्य है।
     वह  ईश्वर एक है उसका हम अनेकानेक नामों से स्मरण करते हैं। वेद कहता है-
             एको हि सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात् ईश्वर एक है उसे विद्वान अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं।
       इस विषय में हम एक भौतिक उदाहरण लेते हैं। व्यक्ति एक है पर उसे बेटा, मित्र, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, पति, फूफा, मौसा आदि उसके अनेक संबोधन हैं। इन सबके अतिरिक्त उसके कार्यक्षेत्र के अनुसार भी कई अन्य नामों से अभिहित किया जाता है। जब एक सांसारिक व्यक्ति को हम इतने नाम दे सकते हैं तो जिसने ऐसे अरबों-खरबों जीवों को उत्पन्न किया हैं उसके असंख्य नाम होना तो स्वाभाविक ही है।
       सभी धर्म उस प्रभु तक पहुँचने का मार्ग मात्र हैं। इसलिए सभी धर्म समान हैं तथा उनकी श्रेष्ठता से इंकार नहीं किया जा सकता।
        मान लीजिए हमने अपने देश भारत की राजधानी दिल्ली जाना है। बताइए कैसे जाएँ? रेल से, बस से, हवाई जहाज से, अपनी कार से या अन्य कोई और ट्रक-टेम्पो आदि वाहन हो सकता है। इनमें से किसी भी साधन से देश या विश्व के किसी भी कोने से दिल्ली आया जा सकता है।
      अनगिनत मार्ग हैं इस भौतिक प्रदेश में पहुँचने के लिए। वैसे ही ये सभी धर्म हैं जो अपने-अपने तरीके से उस परमसत्ता तक जाने का मार्ग दर्शाते हैं।
        सभी धर्म मानवता, सौहार्द, दया, करुणा, प्राणीमात्र से प्यार करना, अहिंसा आदि मानवोचित गुणों को पालन करने का पाठ पढ़ाते हैं। लड़ाई-झगड़े या नफरत करने की आज्ञा हमें कोई भी धर्म नहीं देता।
        कुछ मुट्ठी भर इंसानी दिमाग धर्म के नाम पर नफरत फैलाते हैं जो किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
        किसी भी धर्म को नीचा दिखाकर उन धर्मावलम्बियों का अपमान करना कदापि उचित नहीं। लोगों को लालच देकर या जोर- जबरदस्ती धर्मांतरण करना किसी भी तरह उचित नहीं।
       अब यह हमारी मेधा पर निर्भर करता है कि हम उस मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बना पाते हैं या नहीं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 3 जनवरी 2018

मुखिया का दायित्व

मुखिया या Head को निष्पक्ष होना चाहिए। उसकी दृष्टि में सभी बराबर होने चाहिए। मुखिया कैसा होना चाहिए? इस विषय पर तुलसीदास जी ने कहा है-
          'मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक।'
          पाले पैसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक॥
दोहे की इस पंक्ति में तुलसीदास  का कहना है कि मुखिया को मुख के समान होना चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मुख में जब कोई खाद्य पदार्थ डाला जाता है तो वह खाने में कोई भेदभाव नहीं करता। अब चाहे वह खाना नमकीन, खट्टा, मीठा, तीखा, कसैला आदि किसी भी स्वाद का हो। वह सभी पदार्थों को एक ही प्रकार से बिना किसी झिकझिक के खाता है। उसी प्रकार एक ही प्रक्रिया से उन सबको पचने व शरीर के संपूर्ण अंगों को पुष्ट करने के लिए आगे भेज देता है।
        इसी प्रकार मुखिया भी होना चाहिए। उसे किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। धर्म-जाति, रंग-रूप, अमीर-गरीब आदि के भेद को अनदेखा करते हुए सबको एक समान समझे और सबके साथ एक जैसा व्यवहार करे। अब प्रश्न यह उठता है कि मुखिया किसे कहते हैं? वह कौन होता है? उसके क्या कर्त्तव्य हैं? आदि।
         इन प्रश्नों के उत्तर में कह सकते हैं कि मुखिया सबसे बड़े या प्रमुख को कहते हैं। अब वह किसी व्यापारिक संस्था, किसी आफिस, किसी धार्मिक संस्था आदि का बास हो सकता है। घर-परिवार में सबसे बड़ा सदस्य हो सकता है या फिर किसी देश का राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री कोई भी हो सकता है।
         व्यापारिक संस्था या किसी आफिस का मुखिया यानि मालिक या बास यदि अपने सभी कर्मचारियों के साथ मधुरता व सहृदयता का व्यवहार करता है, उनके सुख-दुख में उनसे सहानुभूति रखता है तो वहाँ का माहौल बहुत ही सौहार्दपूर्ण होता है। सभी कर्मचारी अपनी क्षमता से भी बढ़कर अपने काम निपटाते हैं। ऐसी ही संस्थाएँ निरन्तर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं।
         इसी प्रकार अन्य धार्मिक, समाजिक आदि संस्थाओं में प्रधान आदि के समतापूर्वक व्यवहार से कार्य कुशलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं। वहाँ पर सभी मिलजुल कर संस्था को उन्नत करते हैं।
        शिक्षण संस्थानों की सफलता भी वहाँ के मुखिया यानी प्रिंसिपल के व्यवहार पर निर्भर करता है। यह उसके हाथ में होता है कि संस्था को नम्बर वन बनाए ताकि उसकी धूम मच सके। अन्यथा संस्था के लोग उसके विरूद्ध हो जाते हैं और संस्थान की टी आर पी नित्य गिरने लगती है।
         घर-परिवार में यदि मुखिया छोटे-बड़े सभी सदस्यों के साथ समता का व्यवहार करेगा, सबको यथायोग्य सम्मान देगा तो उस घर में सौहार्द व सद्भावना का माहौल रहेगा। सबकी शक्ति मिलकर जब एक हो जाती है तो वहाँ सभी परेशानियाँ पलक झपकते दूर हो जाती हैं। ऐसे परिवारों में सुख, समृद्धि व शांति का साम्राज्य होता है जो सबको आह्लादित करता है। यदि  मुखिया पक्षपात करेगा तो वहाँ नित झगड़े होने लगते। संबंधों में दरारें आने लगती हैं और घर नरक के तुल्य हो जाता है।
         किसी देश में राजा या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जो भी मुखिया है यदि वह अपने देशवासियों को एकसमान मानते हुए सबके लिए नीतियाँ और कानून बनाता है तो देश की भलाई होती है।वहाँ लूट- नहीं खसौट नहीं होती और न ही अराजकता का वातावरण होता है। शासक सकारात्मक रुख अपनाएगा तो देश के लोग समृद्धि की ओर कदम बढ़ाते हैं। यही समृद्ध देश किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए सक्षम होता है। पर यदि वह अपनी प्रजाजनों के साथ भेदभाव करेगा तो लोगों में आपस में वैमनस्य बढ़ेगा, परस्पर एक दूसरे पर विश्वास नहीं रहता और वहाँ अराजकता फैल जाती है। ऐसे देश पर कोई अन्य देश अपना आधिपत्य कर लेता है।
        मुखिया जब निष्पक्ष होकर अपने अधीनस्थों के लिए सोचता है तो सबका दिल जीत लेता है। वह प्रिय बनकर सबके हृदयों पर राज करता है। तब सर्वत्र ही खुशियाँ खुश होकर दस्तक देती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 2 जनवरी 2018

सन्त समाज के पथ-प्रदर्शक

आजकल तथाकथित सन्तों या धर्मगुरुओं की चर्चा टी वी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर छाई रहती है। आम साधारण लोग इनके तमझाम से आकर्षित होकर उलझ जाते हैं। वे उन्हें ईश्वर का सच्चा प्रतिनिधि मानकर उनकी शरण में जाते हैं। वे ज्ञान व शान्ति की तलाश में उनके पास जाते हैं पर उन्हें वहाँ कुछ भी नहीं मिलता। जब उनकी आँखें खुलती हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है।
        आज हम सन्त के विषय में चर्चा करते हैं। सन्त समाज का आईना व मार्गदर्शक होते हैं। साधु-सन्तों की जाति नहीं पूछी जाती बल्कि उनका ज्ञान परखा जाता है। इसीलिए कहा है-
'जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।'
       जिसे हम वास्तव में सन्त कहते हैं वह संसार के बंधनों से मुक्त होता है। वह किसी आडम्बर या नाम की इच्छा नहीं रखता।ऐसे सन्त समाज का आभूषण कहलाते हैं। वे अनाम रहकर आत्मोन्नति के लिए समाज से कटकर जंगलों, पर्वतों या गुफाओं साधना करते हुए  कैवल्य प्राप्त करते हैं। और यदि समाज में रहते भी हैं तो भौतिक ऐश्वर्यों का त्याग कर समाज की भलाई के कार्य करते हुए संसार से विदा लेते हैं। 
       सन्तों को हम उनके सद् गुणों, संयम, आचार-व्यवहार, उनकी कथनी-करनी के एकस्वरूप होना आदि गुणों से पहचान सकते हैं।
       सन्त को पहचान कर उस पर विश्वास करना उचित है। दूसरों की चिकनी-चुपडी बातों में न उलझकर अपने विवेक पर भरोसा कीजिए।आपकी तर्क की कसौटी  पर जो खरा उतरे उसे मानें अन्यथा सब छोड दें।
     सन्त समाज को दिशा नहीं दे सकता अथवा दिग्दशर्क नहीं बनता तो ऐसा वह त्याज्य है व सम्मान नहीं प्राप्त करने के योग्य नहीं हो सकता।
      सन्त की कोई उपाधि नहीं होती। न ही उसके लिए कोई मापदण्ड होता है। उसके लिए किसी विद्वत परिषद के गठन की भी आवश्यकता नहीं होती।
     सन्त यदि केवल पुस्तकीय ज्ञान से प्रभावित करता है और उसका आचरण अनुकरणीय नहीं है तो वह त्याज्य है। पुस्तकीय ज्ञान तो गधे पर लादे बोझ की तरह होता है यदि उस पर मन, वचन व कर्म से आचरण न किया जाए। साधु-संतो की परख उनके सद् गुणों और आचरण से होती है।
       हमारा अपना विवेक सबसे बडी कसौटी है। अपनी तर्क की कसौटी पर जो खरा उतरे उसे ही विद्वान मानें अन्यथा सब छोड दें। हमारा विश्वास हमारी पूँजी है इसे यूँ ही नहीं डगमगाने दे सकते।
      वे कदापि सन्त या धर्मगुरु नहीं कहे जा सकते जिन्हें लोकप्रशंसा की भूख हो। जो टीवी अथवा राजनैतिक पार्टी के मंच से लुभावने और मंत्रमुग्ध करने वाले प्रवचनों और भाषणों से सबको मन्त्र मुग्ध कर लें।  इसके अतिरिक्त वे भी सन्त नहीं हो सकते जो देश व समाज के प्रति आपराधिक गतिविधियों में संलग्न हो। मजबूरन उन पर भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आरोप सिद्ध किए जाएँ।
       सन्तों का स्वभाव बालसुलभ होता है। वे सच्चे सन्त नहीं हो सकते जो द्वन्द्व सहन नहीं कर सकते या मात्र अपनी आलोचना से विचलित हो जाएँ।
      मेरा मानना है कि सन्त की उपाधि के  ज्ञान, धैर्य, इन्द्रिय नियंत्रण, मानसिक और शारीरिक बल के आकलन की कदापि आवश्यकता नहीं होती। सन्त बनाने या कहलाने के कोई मानक या मापदण्ड नहीं हैं।
     एक आख्यान है कि ऋषि विश्वामित्र को महर्षि कहलाने के लिए महर्षि वसिष्ठ की अनुमति चाहिए थी। पर जब तक वे इस पद के योग्य न हुए तब तक वसिष्ठ जी ने उन्हे महर्षि नहीं कहा। वर्षों की साधना के पश्चात जब वे अपने आचरण से इस पद के योग्य हुए तब उन्हें महर्षि वसिष्ठ ने उनको महर्षि विश्वामित्र कहकर पुकारा।
       साधना करके ही ये उपाधियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। वैसे जो वास्तव में सच्चे सन्त होते हैं वे इन उपाधियों के गुलाम नहीं होते। उनके कर्म ऐसे होते हैं जिससे लोग उन्हें सिर माथे पर बिठाते हैं।
       दूसरों को धोखा देने या ठगने वालों से हमेशा सावधान रहना चाहिए चाहे वे तथाकथित धर्मगुरु कहलवाने वाले हों या आम धूर्त। इनसे किनारा करना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
     यदि आप कर्मसिद्धांत और पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं तो कबीर दास जी के शब्दों में मानकर चलिए-
  जो करेगा सो भरेगा तू क्यों भया उदास।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 1 जनवरी 2018

संयुक्त परिवार का विघटन

संयुक्त परिवार में विघटन छोटी-छोटी बातों को लेकर होता है। बच्चों व बड़ों की असहिष्णुता इसका मुख्य कारण होता है। दोनों ही पक्ष जब अपने-आपको सही ठहराते हुए दूसरों की बात नहीं सुनना चाहते तो समस्या बहुत बढ़ जाती है।
         संयुक्त परिवारों में बच्चे सुरक्षित रहते हैं। बच्चे, जिनके लिए माता-पिता इतनी मेहनत करते हैं पता भी नहीं चलता कि वे हँसते-खेलते, लड़ते-झगड़ते कब बड़े हो जाते हैं। माता-पिता यदि अपने काम पर जाते हैं तो बच्चे दादा-दादी या अन्य परिवार जनों के साथ रहते हैं तो उनका समुचित विकास होता है। उनको अकेलेपन का सामना नहीं करना पड़ता। नौकरों के सहारे रहकर उनके संस्कार व उनकी तरह का व्यवहार नहीं सीखना पड़ता।
        बजुर्गों को भी अकेलेपन का दंश नहीं झेलना पड़ता। उनका समय बच्चों के साथ बिना परेशानी के बीत जाता है।
        कुछ परिवारों में जब विघटन की स्थिति बनती है तो मन को पीड़ा होती है। घर का बेटा यदि  समझदारी से काम करे तो घर की इज्जत बनी रहती है और परिवार भी टूटन से  बच सकता है।
बजुर्गों को केवल सम्मान व बच्चों का साथ चाहिए होता है। यदि उन्हें यथोचित सम्मान व थोडा वक्त  दे दिया जाए तो संयुक्त परिवार कभी न टूटे।
         कुछ बजुर्ग अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं होते। वे सामंजस्य बैठाने में अपनी तौहीन समझते हैं। वे सोचते हैं कि बहु आयी है तो वह घर-बाहर की सभी जिम्मेवारियों को भी निभाए और वे अपना  शासन जमाएँ। सास-ससुर स्वयं में बदलाव लाने के बजाय बहु अर्थात् नये सदस्य से सामंजस्य करने की आशा रखते हैं।ऐसे परिवारों में विघटन की समस्या अधिक रहती है।
       कई परिवारों में अपनी स्वतन्त्रता व हठ के कारण लड़कियाँ ससुराल में अपने अमर्यादित  आचरण से  रहती हैं। सास-ससुर को अपने  माता-पिता  जैसा आदर नहीं देतीं। घरेलू कामकाज भी नहीं करना चाहतीं। वे सोचती हैं कि हम नौकरी करके पैसा कमाती हैं तो घर के काम क्यों करें? सभी परिवारों में नौकर-चाकर नहीं होते कि हुक्म  चलाएँ और काम चल जाये।
       लड़की के माता-पिता का अनावश्यक हस्तक्षेप भी पारिवारिक बिखराव का कारण बनता है। उन्हें चाहिए कि अपनी बेटी को आपसी तालमेल के साथ परिवार में मिलकर रहना सिखायें। अपने परिवार की ही तरह बेटी के परिवार को भी समझें और सकारात्मक रुख रखें।
       आज के इस भौतिक युग में बच्चे समझदार हो रहे हैं वे संयुक्त परिवार की अहमियत को जानने लगे हैं। उन्हें यह लग रहा है कि यदि बड़े-बजुर्ग साथ रहेंगे तो वे व बच्चे सुरक्षित होंगे। इसलिए वे संयुक्त परिवार की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
      परिवार के विघटन में अहं आड़े आता है चाहे वह बच्चों का हो या बड़ों का। बड़ों की अगर गलती हो तो भी बच्चों को नजरअंदाज करना चाहिए यदि पारिवारिक विघटन रोकना हो तो। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाता है और बड़ों को भी अपनी गलती का अहसास हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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