हमें यह शरीर कुछ सीमित समय के लिए मानो ईश्वर की और से किराए पर दिया गया है। इसका यह अर्थ हुआ कि यह शरीर हमेशा के लिए जीव को नहीं मिला है। यदि ऐसा होता तो सृष्टि के आदी से अब तक वही शरीर जीव को मिला रहता पर ऐसा नहीं है। थोड़े-थोड़े समय पश्चात जीव को मिला हुआ शरीर बदल जाता है जैसे किराए पर रहने वाले किराएदार को सीमित समय के पश्चात अपना मकान बदलना पड़ता है। अमेरिका में रहने वाली श्रीमती मृदुला कीर्ति द्वारा भेजी गई निम्न कविता बहुत ही मर्मस्पर्शी है-
रहता हूँ किराए की काया में
अपनी साँसों को बेचकर
किराया चुकाता हूँ इसका
मेरी औकात मिट्टी जितनी
बात मैं महल मीनारों की कर जाता हूँ
जल जाएगी मेरी यह काया एक दिन
फिर भी इसकी खूबसूरती पर इतराता हूँ
मुझे पता है मैं खुद के सहारे
श्मशान तक भी न जा सकूँगा
इसलिए जमाने में दोस्त बनाता हूँ।
इस कविता के अनुसार मनुष्य का यह शरीर किराए के मकान की तरह है, जिसमें वह रहता है। अपनी साँसों को बेचकर मनुष्य अपने इस घर का किराया चुकता है। उसकी औकात मिट्टी जितनी है यानी उसे एक समय के पश्चात मिट्टी में मिल जाना होता है। वह बड़ी-बड़ी बातें करता है, अपनी खूबसूरती पर घमण्ड करता है। जबकि वह खुद अपना सहारा नहीं बन सकता। उसे मृत्यु के उपरान्त श्मशान तक पहुँचने के लिए चार कन्धों की आवश्यकता होती है। इसलिए उसे अपने जीवन काल में ही बहुत से लोगों से मित्रता कर लेनी चाहिए।
किराए का मकान तब तक मनुष्य के पास रह सकता है जब तक मकान मालिक की इच्छा होती है, उसके बाद नहीं। मकान मालिक जब चाहे अपना मकान खाली करवा सकता है। जब मनुष्य किराए का मकान लेता है तो मकान मालिक कुछ शर्तें रखता है। जैसे मकान का किराया समय पर देना होगा। मकान में टूट-फूट नही होनी चाहिए। यानी माकन को कोई हानि नहीं पहुँचाई जएगी। अपुबन्ध करने के पश्चात भी मकान मालिक जब चाहे मकान को खाली करवा सकता है !
परमपिता परमात्मा ने भी जब यह शरीर दिया था तो उसने भी हम मनुष्यों के साथ एक अनुबन्ध किया था। मनुष्य ने जन्म लेने पूर्व माता के गर्भ के अन्धकार से घबराकर कहा था कि धरती पर जाने के बाद वह उसे भूलेगा नही बल्कि आयु पर्यन्त उसकी पूजा-आराधना करेगा। यही दोनों के बीच अनुबंध हुआ था। यानी इस शरीर के किराए के रूप में वह अपनी हर साँस में ईश्वर का भजन -सिमरण करेगा। इसके साथ ही यह भी कहा था कि बुरे विचार और दुर्भावनाएँ नहीं फैलाएगा। इसके साथ अन्य शर्त यह थी कि जब वह मालिक चाहेगा मनुष्य को यह शरीर छोड़कर दुनिया से विदा लेनी होगी। यानी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही जीवन और मृत्यु का उपहार जीव को मिलता है। उसके लिए वह कोई आनाकानी नहीं कर सकता। उसे अपना सब कुछ समेटने के लिए परमपिता परमात्मा उसे पलभर की मोहलत भी नहीं देता।
परमात्मा की जब इच्छा होती है वह अपने अंश इस आत्मा को वापिस बुला लेता है। मतलब यह है कि यह मनुष्य जीवन जीव को बहुत सीमित समय के लिए मिलता है। इसे व्यर्थ ही लड़ाई -झगड़ा करके या दुर्भावना रखकर नष्ट नही करना चाहिए बल्कि प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए व्यतीत करना चाहिए। तभी मनुष्य इस किराए के मकान के लिए किए गए अनुबन्ध का सही मायने में पालन कर पाता है। अन्त समय जब इस किराए के मकान को खाली करने का समय आए तो मन में सन्तोष की भावना रहनी चाहिए कि हमने इसे यथावत मकान मालिक को सौंप दिया है। हमने एक अच्छे और समझदार किराएदार का फर्ज निभाया है। उस प्रभु को भी हमसे शिकायत करने का कोई अवसर नहीं मिलने पाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 8 जुलाई 2018
किराए का मकान
शनिवार, 7 जुलाई 2018
धरती और बादल
गहरा काला, धूमिल बादल
आया है देखो सजधजकर
शायद इस प्यासी धरती को
रिझाने और प्यास बुझाने।
तरह-तरह के रूप बनाकर
नाना विधि के नृत्य दिखाकर
अपनी मोहक भावभंगिमा से
छोड़ रहा देखो तीर तरकश से।
कभी तड़ित की चमक दिखाता
कभी अपने मधुर गर्जन से उसे
रिझाता और उसके न सुनने पर
मानो नीर बहाकर उसे मानता।
धरती क्योंकर सुने उसकी पुकार
लम्बी प्रतीक्षा की उसने बादल की
उसकी पथराई आँखें हो गईं उदास
बादल न पसीजा उसकी हालत पर।
धरती कोई खिलौना नहीं है मित्रो
बादल जब चाहे उससे खेल सके
औ जब चाहे उससे मुँह मोड़ चले
यह गणित बस अधूरा कहलाएगा।
अब बदल मनाए औऱ धरती रूठे
खेल ये अनवरत यूँही चलता रहेगा
अब हार क्या है, जीत क्या दोनों में
मान-मनौव्वल तो बस चलता रहेगा।
कभी प्यार है और कभी उदासी
दोनों ही हैं जीवन के दो पहलू
बादल तो बस उमड़-घुमड़कर
प्यासी धरती की प्यास बुझाता।
धरती उसके प्यार में सराबोर हो
जल-थल होती वह मारे खुशी के
पागल होती, हिलोरें लेती झूम रही
खुशियाँ मानती सारे दुख भूलकर।
जानती है बादल की यह मजबूरी
बँधकर नहीं बैठ सकता वह कहीं
उसे जाना होता है अन्यत्र जगत में
जनहित हेतु सृष्टि की प्यास बुझाने।
यह जानना होता बहुत आवश्यक
प्यार जीवन में नहीं होता सब कुछ
उससे भी जरूरी और बहुत हैं काम
मनुष्य के जीवन में करने के लिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 6 जुलाई 2018
निन्यानवे का फेर
निन्यानवे का फेर बहुत परेशान करता है। इसके फेर से न तो कोई आज तक बच पाया है और भविष्य में भी शायद ही कोई इससे बच सकेगा।
आखिर यह निन्यानवे का फेर है क्या? क्यों यह सबके दुःख का कारण बनता है? इससे बच पाना मनुष्य के लिए असम्भव क्यों है?
ये कुछ प्रश्न हैं जिनकी हम विवेचना करेंगे। कहते हैं कि बहुत समय पहले एक गरीब दम्पत्ति बहुत कष्ट में अपना समय व्यतीत कर रहे थे। पर बड़े सुकून से रहते थे। उनकी यह दुरावस्था किसी सहृदय सज्जन से देखी नहीं गई। उन्होंने उनकी सहायता करने का विचार किया। यदि वे सामने से जाकर सहायता करते तो स्वाभिमानी दम्पत्ति आहत हो जाता।
इसलिए उन्होंने ने एक निर्णय लिया और फिर उसके घर में चुपके से एक थैली में कुछ रुपए रख दिए। अब वे देखना चाहते थे कि वे दोनों उस धन को पाकर क्या प्रसन्न हो जाएँगे? उन्होंने उन दोनों पर नजर रखनी शुरू की।
उन दोनों ने जब अपने घर में अचानक रुपयों से भरी थैली देखी उनकी ख़ुशी का पारावार न रहा तो अपने सौभाग्य को सराहा। जब उन्होंने ने पैसे गिने तो वे निन्यानवे सिक्के निकले। अब उनके मन में यह इच्छा हुई कि किसी तरह इस राशि को सौ तक पहुँचा दें। अब उनका सारा सुख-चैन खो गया। दिन-रात बस एक ही धुन कि किसी तरह उनकी धनराशि सौ रुपए हो जाए।
वे खूब मेहनत करके कमाते रहते और जब उन्हें लगता कि अब उनके पास सौ रुपए हो जाएँगे तो ऐसे खर्च आ जाते की वह राशि सौ के आंकडे तक ही नहीं पहुँच सकी। इसीलिए यह निन्यानवे के फेर वाली उक्ति बनी।
यह केवल उस गरीब दम्पत्ति की व्यथा-कथा नहीं है बल्कि हम सब भी इसी कमाने धुन में दिन-रात कठोर परिश्रम करते हुए कोल्हू का बैल बन जाते हैं। अपना सुख-चैन गंवा देते हैं पर मनचाहा धन नहीं कमा पाते।
इन्सान इस धन को कमाने की होड़ में अपना-आपा तक भूल जाता है। उसका मस्तिष्क बस पैसे को कमाने की जुगाड़ में लगा रहता है। उसका हृदय सच-झूठ, भ्रष्टाचार, कालाबजारी, किसी का गला काटने से भी परहेज न करता हुआ संवेदना शून्य तक हो जाता है। जिनके लिए वह सारे पाप-पुण्य करता है उन्हीं से दूर होकर एक समय के पश्चात अकेला रह जाता है।
यह पैसा है कि इसकी हवस दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है। जितना मनुष्य इसके पीछे भागता है उतना ही वह उसे और नाच नाचता है। इन्सान सोचता है कि उसने इतना कमा लिया की उसकी सात पुश्तें आराम से बैठकर खा सकती हैं। पर वह भूल जाता है कि जो भी वस्तु मनुष्य की बिना मेहनत किए मिल जाती है उसकी वह कद्र नहीं करता।
यही बात धन-संपत्ति के साथ भी होती है। अनायास मिले अकूत धन-वैभव को उसके उत्तराधिकारी सम्हाल नहीं पाते और उसे दुर्व्यसनों में बर्बाद कर देते हैं। फिर जायज-नाजायज तरीके से कमाया हुआ सारा धन तो व्यर्थ होता ही है और जिनको सताया उनकी बद्दुआएँ भी पीछा नहीं छोड़तीं।
इसीलिए सयाने कहते हैं-
पूत सपूत तो का धन संचै
पूत कपूत तो का धन संचै।
अर्थात यदि पुत्र सुपुत्र है तो वह स्वयं ही काम लेगा, उसके लिए धन का संचय न करो। यदि पुत्र कुपुत्र है तो वह सारा धन उजाड़ देगा, उसके लिए धन संचय करना व्यर्थ है।
इसके अतिरिक्त सुनामी, भूकम्प, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय यह अनैतिक कमाई नहीं दूसरों द्वारा दिए गए आशीर्वाद ही काम आते हैं। इस सत्य को कभी भी अपने मन से नहीं निकालना चाहिए।
तात्पर्य यही है कि बच्चों को संस्कारी बनाएँ। धन तो वे काम ही लेंगे। स्वयं भी ईमानदारी और सच्चाई से धन कमाइए उसमें बहुत बरकत होती है। ईश्वर भी ऐसे सज्जनों से प्रसन्न रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 5 जुलाई 2018
हिंदी साहित्य की विडम्बना
हिन्दी साहित्य का दायित्व यदि प्रूफ रीडर सम्हालेंगे तो साहित्य का क्या होगा? यह प्रश्न बार-बार मन को मथ रहा है, उद्वेलित कर रहा है। यहाँ मैं किसी का नाम नहीं लिख रही। एक सुप्रसिद्ध रचनाकार का यह कथन है कि उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी पुस्तकों का संशोधन कार्य प्रूफ रीडर करते हैं, वे नहीं करते।
उनके इस वाक्य ने मनन करने पर विवश कर दिया है। प्रायः प्रूफ रीडर अधिक पढ़े नहीं होते। यदि वे पढ़े-लिखे होते तो इस कार्य को न करके कोई अच्छी नौकरी करते। किसी भी प्रूफ रीडर का कार्य मात्र इतना होता है कि जैसा पाण्डुलिपि में लिखा है, वैसा ही अक्षरश: उसका शोधन किया जाए। उस प्रूफ में कुछ भी घटाना या जोड़ना प्रूफ रीडर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यानी उनका कार्य मक्खी पर मक्खी मारना होता है।
बड़े-बड़े प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों की बात अलग है वहाँ पर मोटी तनख्वाह पर एडिटर रखे जाते हैं, प्रूफ रीडर को उतना वेतन नहीं दिया जाता। प्रायः प्रकाशक अपने संस्थान में प्रूफ रीडर नियुक्त नहीं करते। वे कार्य के अनुसार ही प्रूफ रीडर को राशि देते हैं।
स्वयं को संवेदनशील रचनाकार कहने वालों का साहित्य के प्रति इतना लापरवाह रवैया वास्तव में चिन्ता का विषय है। तथाकथित साहित्यकारों को भाषा की समझ नहीं है। बहुत से रचनाकार ऐसे हैं जो दो वाक्य भी शुद्ध नहीं लिख सकते। प्रायः रचनाकारों को वर्तनी, विराम चिह्न आदि का ज्ञान नहीं होता। वे अपेक्षा करते हैं कि कम पढ़ा प्रूफ रीडर उनकी भाषा को शुद्ध भी करेगा, उनके वर्तनी दोष भी सुधरेगा और यथोचित स्थान पर विराम चिह्न भी लगा देगा।
कितना दुर्भाग्यपूर्ण है हिन्दी साहित्यकारों का यह रवैया? क्या हम यही थाती अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं?
आज के तथाकथित साहित्यकार स्वयं को बहुत महान समझते हैं और दूसरों को मूर्ख समझने की भूल करते हैं। इसी कारण दूसरों की आलोचना और टाँग खिंचाई का कार्य अधिक होने लगा है। जो कुछ थोड़े बहुत विद्वान साहित्यकार हैं, वे प्रायः अपने अनुजों को प्रोत्साहित न करके निराश ही करते हैं। आज के तथाकथित साहित्यकार न तो साहित्य की साधना करते हैं और न ही अपने पूर्ववर्ती श्रेष्ठ रचनाकरों को पढ़ना चाहते हैं।
इसीलिए हिन्दी भाषा और साहित्य की दुर्गति हो रही है। तुष्टिकरण की राजनीति के चलते आज साहित्यिक गुटबाजी बढ़ती जा रही है। साहित्य की समझ है या नहीं, लिखना आता है या नहीं, बस सम्मान पत्र बटोरने को होड़ लगी हुई है। साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित करवाकर सम्मानित होने की ललक साहित्य को किस मोड़ पर लाकर खड़ा करेगी, समझ नहीं आ रहा। इसीलिए साहित्य का इतना अधिक पतन हो रहा है। हिन्दी साहित्य का तो बंटाधार हो रहा है। समझ नहीं आ रहा कि इस अन्धी दौड़ में घर, परिवार, बच्चे सब न जाने कहाँ पीछे छूटते जा रहे हैं?
ईश्वर ही बचाए इन तथाकथित बुद्धिजीवियों से और उन्हें सदबुद्धि प्रदान करे ताकि ये लोग हिन्दी साहित्य से खिलवाड़ करना बन्द करें। दिन-प्रतिदिन हिन्दी साहित्य का उत्थान हो, यही कामना है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 4 जुलाई 2018
उपचार पद्धतियों की तरह लोग
उपचार पद्धतियों की तरह मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं। इस विषय पर कुछ दिन पूर्व पढ़ा था कि किसी महानुभाव ने इस दुनिया में तीन तरह के लोगों का उल्लेख किया था। उनका मानना है कि पहले आयुर्वैदिक प्रकार के लोग होते हैं जो बोलचाल में बढ़िया होते हैं लेकिन इमरजेंसी में काम नहीं आते। दूसरे होम्योपैथिक प्रकार के लोग होते हैं। वैसे तो किसी काम के नहीं होते पर साथ रहते हैं तो अच्छा लगता है। तीसरे एलोपैथिक इलाज की तरह के लोग इमरजेंसी में काम आते हैं। लेकिन कब क्या सेड इफेक्ट दिख दें, कोई भरोसा नहीं है।
अब इस विषय पर गहन चर्चा करते हैं। आयुर्वैदिक उपचार पद्धति भारत की पुरातन पद्धति है। इसके माध्यम से हर रोग का इलाज किया जाता था। जीवक आदि वैद्यों के ऑपरेशन करने के विषय में भी ज्ञात होता है। जड़ी-बूटियाँ तो वही हैं जिनका आयुर्वैदिक और एलोपैथिक दोनों ही प्रकार की औषधियों में उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है। फिर भी लोग आयुर्वैदिक उपचार पर विश्वास नहीं करते। आजकल के एलोपैथिक डॉ लोग आयुर्वैदिक और होम्योपैथिक आदि उपचारों का नाम सुनते ही भड़क जाते हैं, नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं, जैसे किसी ने उन्हें भद्दी-सी गाली दे दी हो। जब लोग हर तरफ से निराश हो जाते हैं, पैसा खर्च करके थक-हार जाते हैं तब इन उपचारों की ओर लौटते हैं।
अब चर्चा करते हैं इन उपचार पद्धतियों के समान व्यवहार करने वाले लोगों की। सबसे पहले आयुर्वैदिक प्रकार के लोगों की बात करते हैं। ये लोग बोलचाल में, व्यवहार में बहुत बढ़िया होते हैं। इनका प्रभाव दूसरे के ऊपर गहरा नहीं होता। जब भी कभी कोई इमरजेंसी हो जाती है तब ये काम नहीं आते। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे लोग दूर से ही दोस्ती निभाते हैं। शायद मन से इनका जुड़ाव नहीं हो पाता। इसीलिए इनके लिए मन में अपनेपन का भाव नहीं आ पाता।
दूसरे होम्योपैथिक प्रकार के लोग होते हैं। इस पद्धति से किया गया उपचार धीरे-धीरे अपना असर दिखता है। इस प्रकार के लोग वैसे तो किसी काम के नहीं होते पर साथ रहते हैं तो अच्छा लगता है। कुछ लोग जीवन में ऐसे मिलते हैं जो जीवन में अधिक लाभ नहीं पहुँचा पाते पर उनका साथ होना अच्छा लगता है। होम्योपैथिक मीठी गोलियों की तरह इनका व्यवहार मधुर होता है। उनके होने से मन में सन्तुष्टि का भाव रहता है। ऐसा लगता है कि कोई तो हमारा अपना है। इनका साथ अधिक देर तक नहीं रह पाता।
तीसरे एलोपैथिक इलाज की तरह के लोग इमरजेंसी में काम आते हैं। यह उपचार पद्धति एमरजेंसी में बहुत काम आती है। पहले लोग अपने घरेलू इलाज करते रहते हैं, दवाइयाँ खाते रहते हैं। इसलिए जब कोई उपाय काम नहीं आता तब इस पद्धति की ओर इमरजेंसी में जाते हैं। इस उपचार की भी कोई गारण्टी नहीं होती कि मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा। इस उपचार के साइड इफेक्ट बहुत होते है। यानी यह उपचार कब क्या साइड इफेक्ट दिख दें, कोई भरोसा नहीं है।
इसी प्रकार इस श्रेणी के लोग भी होते हैं। वे इमरजेंसी में काम तो आते हैं। जब और कोई सहारा नहीं दिखाई देता, उस समय इन लोगों की याद आती है। उन पर सदा विश्वास नहीं किया जा सकता। पता नहीं चलता कि वे कब, किस समय रंग बदल जाएँ। कहने का तात्पर्य यह है कि इनके साइड इफेक्ट्स होते हैं। इसलिए ये विश्वसनीय नहीं होते। इन लोगों पर पूर्णरूपेण विश्वास करना बहुत कठिन होता है। जब ये गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते हैं तो उस समय सहायता करने वाले के रहस्यों को उद्घाटित भी कर सकते हैं। ऐसे लोग जितनी सहयता नहीं करते उससे अधिक गाते हैं। ऐसी स्थिति में लगता है कि इनसे सहायता न ली होती तो अच्छा होता।
साररूप में कह सकते हैं कि निस प्रकार 'हर दोस्त जरूरी होता है' उसी प्रकार हर उपचार पद्धति की भी आवश्यकता होती है। हर पद्धति पसर लोगों को विश्वास होता है, तभी वे उपचार करवाते हैं। इसी प्रकार जीवन में हर प्रकार के साथियों की आवश्यकता होती है। किसी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यानी हर उपचार पद्धति, हर प्रकार के मित्र जीवन नैया को चलाने के लिए चाहिए होते हैं। इसलिए किसी का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए। बस अपनी सोच का दायरा विस्तृत करने की जरूरत होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 3 जुलाई 2018
चरण स्पर्श
तपस्वी, साधकों अथवा धर्मगुरुओं को स्त्रियों से दूर रहने के लिए शास्त्र आदेश देते हैं। उसी प्रकार स्त्री साधकों को भी पुरुषों से दूर रहने का निर्देश शास्त्र देते हैं। स्त्रियों के लिए अपने पति के अतिरिक्त किसी भी अन्य पुरुष का चरण स्पर्श करना वर्जित माना गया है। इसी प्रकार पुरुषों के लिए भी विधान है कि वे किसी महिला साधु का चरण स्पर्श न करे।
इसके पीछे जो तर्क मुझे समझ आता है, वह यह है कि समाज में किसी प्रकार का अनाचार और कदाचार न फैलने पाए। इस तरह यदि व्यभिचार फैलेगा तो सामाजिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। इसका कारण है कि स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध आग और घी का माना जाता है। इसलिए उनका संयोग कष्टदायी होग। यही कारण है कि हमारे दूरदर्शी महान ऋषियों ने एक सुदृढ़ विवाह संस्था की परिकल्पना की। इससे सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती है और समाज में किसी प्रकार के दुराचरण की कोई गुँजाइश ही नही रहती।
इस विषय पर मैं बहुत प्रसिद्ध दो उदाहरण आपके समक्ष रखना चाहती हूँ। महर्षि विश्वामित्र उच्चकोटि के परम तपस्वी थे। देवलोक की अप्रतिम सुन्दरी अप्सरा मेनका के जल में फंसकर पथभ्रष्ट हो गए। जब उन्हें होश आया, तब तक वे अपना तपोबल नष्ट कर चुके थे। बहुत वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात् उन्होंने पुनः अपना स्थान ऋषियों में बनाया।
दूसरे गुरु मछन्दरनाथ जी हैं जो अपनी तपस्या भूलकर गृहस्थी के चक्कर में पड़कर अपने गुरुपद से च्युत हो गए। यह उनका सौभाग्य था कि गुरु गोरखनाथ जी जैसा शिष्य उन्हें मिला था। गोरखनाथ जी उन्हें उस संसार से साधना के पथ पर वापिस लेकर गए।
इन दोनों उद्धरणों को लिखने का उद्देश्य यही है कि स्त्री और पुरुष दोनों दो ध्रुवों की भाँति हैं। विपरीत लिंगी होने का आकर्षण इन दोनों के मध्य रहता है। इसीलिए शास्त्र स्पष्ट निर्देश देते हैं कि पिता और पुत्री को अथवा भाई और बहन को भी एक कमरे में अकेले नहीं बैठना चाहिए। इस कथन का यह अर्थ कदापि नहीं है कि सभी पुरुष कुकर्मी या बलात्कारी होते हैं। इसका अर्थ यह लगाना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियों से बचाना चाहिए, जिसमे कोई भी पक्ष अपना संयम खो बैठे।
नकारात्मक विचार रखने वाले किसी महानुभाव ने 'नारी नरक का द्वार है' कहकर अपनी नाकामयाबी को प्रकट किया है। नारी यदि नरक का द्वार है तो पुरुष को क्या कहा जाए?
यह कहना कि सारा दोष स्त्री का है उचित नहीं है। यदि नारी अपने हावभाव से पुरुष को रिझाती रहती है तो पुरुष भी कोई दूध का धुल हुआ नहीं है। वह भी स्त्री को अपने वश में करने के लिए तरह तरह के जाल बिछाता रहता है। कभी प्यार से और कभी बलपूर्वक उसे पाना चाहता है। उसे सब्जबाग दिखाता है। फिर अपना स्वार्थ निकल जाने पर दूध में पड़ी हुई मक्खी की तरह बाहर फैंक देता है।
मनीषी हमें समझाते हैं - 'मातृवत् परदारेषु' यानी दूसरे की या पराई स्त्री को माता के सामान मानो। यह कहकर शास्त्र ने पुरुषों के लिए मर्यादा की एक सीमारेखा खींची है। गुरु को पिता की श्रेणी में रखकर गुरु को शासित किया है। उसका दायित्व बनता है क़ि वह अपने पास आने वाले भक्तों या शिष्यों को अपनी सन्तान की तरह ही माने।
इस विवरण से हमें यही समझना चाहिए कि चाहे धर्मगुरु हो या साधु-सन्त, सबको अपनी-अपनी मर्यादा में ही रहना चाहिए। तभी समाज का सन्तुलन बना रहता है। स्त्रियों से भी अनुरोध है कि यदि वे किसी धार्मिक स्थान, किसी सभा या धारण किए हूए गुरु के पास कभी अकेले न जाएँ। अपने मित्रों, पारिवारिक सदस्यों या अपने पति के साथ ही जाएँ। इस प्रकार तथाकथित ढोंगी साधुओं, तान्त्रिकों, मान्त्रिकों के चंगुल से बचा जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 1 जुलाई 2018
अपने दुख
अपने हिस्से के दुःख और कष्ट मनुष्य को स्वयं अकेले ही झेलने पड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि हमारा भरा-पूरा परिवार है, हम सदा अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे रहते हैं। सभी हमारी परवाह भी करते हैं। फिर यह कथन तो उपयुक्त प्रतीत नहीं हो रहा है। मेरा यह कथन अपने-आपमें एक बहुत गहरा अर्थ समेटे हुए है। इस विषय पर विवेचना कर ली जाए तब इसका सार समझ पाना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाएगा।
मनुष्य माँ के गर्भ में प्रवेश करने के बाद से जन्म तक अँधेरे और कष्ट का सामना अकेले ही करता है। उस दुःख से घबराकर ईश्वर से मुक्त होने की प्रार्थना करता है। फिर जन्म से मृत्यु तक अनेकानेक दुःख-तकलीफों से रूबरू होता हुआ जीवन व्यतीत करता है। अन्त में मृत्यु का सामना करता हुआ अकेला ही इस संसार से विदा ले लेता है।
मनीषी कहते हैं कि सुख बाँटने से बढ़ता है और दुःख भोगने से काटता है। आज की परस्थितियों में लोग अपने दुःख से दुखी नहीं होते अपितु दूसरों के सुख से व्यथित होते हैं। कोई खुश होता है तो उसकी प्रसन्नता कुछ लोग सहन नहीं कर पाते। उससे ईर्ष्या करते हैं और उसे चुटकी काटने अथवा सुई चुभोने से बाज नहीं आते। इसी तरह लोग दूसरों के दुःख को आग्रहपूर्वक सुनकर, मगरमच्छ वाले आँसू बहाने वाले सदा उसका उपहास उड़ाने की फ़िराक में लगे रहते हैं।
जिस भी व्यक्ति को शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट सहन करना पड़ता है, उसे ही पता होता है कि उसकी समस्या कितनी विकट है? अस्वस्थ व्यक्ति के चारों ओर कितने ही बन्धु-बान्धव खड़े हों, वे केवल सहानुभूति प्रदर्शित कर सकते हैं, सेवा कर सकते हैं, अच्छे-से-अच्छा इलाज करवा सकते हैं परन्तु उसके होने वाले कष्ट को किसी भी सूरत में बाँट नहीं सकते, काम नहीं कर सकते।
यह उनकी मज़बूरी ही कही जा सकती है कि अपने तड़पते हुए प्रियजन के लिए दुखी होने के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं कर पाते, इस समय स्वयं को लाचार अनुभव करते हैं। यही कारण है कि मनुष्य इतनी भीड़ से घिरा होते हुए भी स्वयं को अकेला ही खड़ा पाता है। इन दुखों और परेशानियों से उसे अकेले ही जूझना पड़ता है, इसके अतिरिक्त उसके पास और कोई भी चारा नहीं बचता। इसी से मनुष्य की असहायता का अनुमान लगाया जा सकता है।
घर में खाने की मेज पर सजे स्वादिष्ट व्यञ्जन या किसी शादी-पार्टी में चाहे कई प्रकार के छप्पन भोग बने हों, परन्तु उस रोगी से उसकी स्थिति पूछिए जो केवल उन्हें टुकुर-टुकुर देख सकता है, खा नहीं सकता। सब कुछ होते हुए भी जो खाने से लाचार है, वही उन सबसे वञ्चित है और कोई नहीं। कोई भी उसके इस दुःख का भागीदार नहीं बन सकता। उसे सांत्वना देने के अतिरिक्त और किया भी क्या जा सकता है?
अस्पताल के आई सी यू में पीडीए या आपरेशन की टेबल पर पड़े प्रियतम का साथ भी दरवाजे तक ही दिया जा सकता है। उसके आगे की यात्रा उसकी अपनी ही होती है। किसी रोग के कारण चलने-फिरने से लाचार व्यक्ति को अपने अकेलेपन का स्वयं ही सामना करना पड़ता है। सारा समय यानी चौबिसौ घण्टे उसके साथ जुड़कर कोई नहीं बैठ सकता, क्योंकि सभी को अपने-अपने कार्य करने होते हैं।
कुछ लोग जन्म से ही रोगी पैदा होते हैं। उन्हें लोग कर्मरोगी कहते हैं और उनके रोग को कर्मरोग कहकर अपने कर्तव्य की इति कर लेते हैं। वे आयुपर्यन्त अपने इस रोग के बोझ में दबे हुए जीते हैं। जीवनभर ही वे लोगों की सहानुभूति का पात्र बने रहते हैं।
शुभाशुभ कर्म करते समय मनुष्य यह भूल जाता है कि एक दिन उसे उन सब कृत कर्मों का भुगतान करना पड़ता है। उनका फल भोगने के समय बहुत ही कष्ट होता है। तब मनुष्य परम न्यायकारी ईश्वर पर पक्षपात करने का आरोप लगाने लगता है। अपने ही भाई-बन्धुओं को कोसता है, ग़ाली-गलौच करता है। उसे सारी दुनिया अपनी दुश्मन प्रतीत होती है।
मनुष्य को सदा ही सावधानीपूर्वक अपना कर्म करते रहना चाहिए, जिससे उसे इन दारुण दुखों से दो-चार न होना पड़े और उसे इनसे मुक्ति मिल सके।
चन्द्र प्रभा सूद
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