प्राय: मनुष्य किसी प्रकार के झमेले में न पड़कर उससे दूर रहना चाहते हैं। अपने घर-परिवार के दायित्वो को यदि वह पूर्णरूपेण निभा ले तो उसका जीवन सफल कहलाता है। वह एक कामयाब इंसान बन जाता है। मनुष्य सुख और शान्ति से अपने जीवन को व्यतीत करना चाहता है।
महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है-
कुभार्यां च कुपुत्रं च कुराजानं कुसीहृदम्।
कुसंबंधं कुदेशं च दूरत: परित्यजेत्॥
अर्थात कुपत्नी, कुपुत्र, कुराजा, कुमित्र, कुसबंधी और कुदेश को शीघ्र त्याग देना चाहिए।
घर में पत्नी का कार्य सबके साथ ही सामंजस्य बनाकर रहना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करती और सदा अपनी मनमानी करती है। घर में रहकर भी यदि वह अपने घर की नहीं हो सकती तब उस घर पर हर समय कलह-क्लेश रहता है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। हमारे सयाने कहते थे कि जिस घर में ऐसी स्थिति होती है वहाँ घर के मटकों का पानी भी समाप्त हो जाता है। घर की बात जब सड़क पर आ जाती है तो उस घर को सब बड़ी ही बेचारगी वाली नजरों से देखते हैं। इसीलिए ऐसी पत्नी का परित्याग करना चाहिए।
पुत्र जब कुपुत्र बन जाए तब घर-परिवार बरबादी के कगार पर आ जाता है। समाज में वे उपहास का पात्र बनते हैं। वह माता-पिता के संताप का कारण बनता है। अपनी कुसंगति के कारण धन-संपत्ति की बर्बादी करता है। छोटे-बड़े का सम्मान करना वह भूल जाता है। उसके घर में रहते हुए सदा ही झगड़े होते रहते हैं। उस समय ऐसे कुपुत्र से किनारा कर लेना श्रेयस्कर होता है।
राजा यदि कुराजा हो तो उस देश को तत्काल छोड़ देना चाहिए। उस राज्य में न्याय व्यवस्था चरमराने लगती हैं, शीघ्र ही अराजकता अपने पैर जमाने लगती है। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसी समस्याएँ सिर उठाने लगती हैं। ऐसे देश पर कोई भी अन्य राष्ट्र आसानी अपना अधिकार कर सकता है। वहाँ के निवासियों की जान-माल सुरक्षित नहीं रहता और उनका जीवन नरक के समान कष्टदायी हो जाता है। ऐसे देश को छोड़कर अन्यत्र जाने वाला सुखी हो जाता है।
कुमित्र अपने मित्र का हितचिन्तक नहीं होता और न ही उसे कभी सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। वह बुराइयों के दलदल में उसे घसीट कर ले जाता है। जहाँ से उसका लौटना बहुत ही कठिन हो जाता है। सबसे मजे की बात यह है कि वह अपने साथी को मझधार छोड़कर किनारा कर लेता है। ऐसे अहित करने वाले मित्र से मनुष्य को शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा पाने का यत्न करना चाहिए।
कुसंबंधी भी कभी मनुष्य को अच्छी सलाह नहीं देते। वे सदा ही उसके जीवन, धन-सम्पत्ति, मान -सम्मान आदि को नष्ट करने के प्रयास में लगे रहते हैं। वे कभी नहीं चाहते कि उनका कोई संबंधी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़े या समाज में कभी उसकी वाहवाही हो। वे मीठी छुरी की तरह होते हैं जो मुँह के सामने सच्चे हितचिन्तक की तरह बर्ताव करते हैं पर पीठ पीछे उसकी जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य बखूबी करते हैं। ऐसे कुसंबधियोंसे दूरी बनाकर रहना ही उसके हित में होता है।
कुदेश में रहना बहुत ही कष्टप्रद होता है। कुराजा के रहते देश की स्थिति बहुत ही डाँवाडोल हो जाती है। सज्जनों के लिए उस स्थान पर रहना बहुत दूभर होने लगता है। वहाँ पर रहने वाले सभी लोग मनमाना आचरण करते हैं। इसलिए ऐसी परिस्थिति में संवेदनशील व्यक्ति के लिए वह देश छोड़कर अन्यत्र चले जाना हितकर होता है।
दुराचारिणी पत्नी, कुपुत्र, कुमार्गगामी मित्र, कुराजा और अपनी जड़ें काटने वाले संबंधियों का नित्य त्याग करना चाहिए। सज्जनों को अपने देश का मोह छोड़कर कुदेश से चले जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 9 सितंबर 2018
किसका त्याग?
शुक्रवार, 7 सितंबर 2018
पापकर्म नहीं धुलते
अपनी मान्यताओं में फँसा मनुष्य शेष सब भूल जाता है। उसे अच्छाई और बुराई का भान भी नहीं रहता। यद्यपि अपनी रूढ़ियों में जकड़ा मनुष्य अपने सुविचारों अथवा कुविचारों का उत्तरदायी स्वयं होता है। जो भी सुनो अथवा पढ़ो, उसे पहले अपनी तर्क की कसौटी पर कसना चाहिए। यदि वह विचार खरा उतरे और अपना विवेक उसे मानने की गवाही दे तभी अपनाना चाहिए अन्यथा उसे भूल जाना चाहिए।
इसी प्रकार की एक मान्यता पर हम बोधकथा के माध्यम से चर्चा करते हैं। लोग कहते हैं कि गंगा आदि नदियों में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। कहते हैं कि एक ऋषि गंगा नदी में स्नान करते हुए उसका स्तुतिगान कर रहे थे। सहसा उन्हें ध्यान आया कि पतित पावनी माँ गंगा में बहुत से लोग आकर अपने पाप धोते हैं। इसका यही अर्थ हुआ कि उन लोगों के सारे पाप एकत्र होकर गंगाजी में समा गए हैं और गंगाजी भी पापी हो गईं हैं। उन्हें माँ गंगा का पापी होने वाला विचार बहुत अखरा। ये पाप आखिर कहाँ जाते हैं? इस रहस्य जानने के लिए उन्होंने तपस्या करने का निर्णय किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देव उनके समक्ष प्रकट हुए। ऋषि ने उनसे पूछा- 'भगवन, लोगों के जो पाप गंगाजी में धोए जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?'
उन्होंने कहा- 'चलो, गंगाजी से ही पूछ लेते हैं।'
वे दोनों लोग गंगाजी के पास गए और बोले- 'हे गंगे! लोग आपके जल में अपने पाप धोते है तो इसका मतलब हुआ कि आप भी पापी हैं।'
माँ गंगा ने उत्तर दिया- 'मैं क्यों पापी होने लगी? मैं अपने पास आए सारे पापों की गठरी समुद्र को जाकर सौंप देती हूँ।'
यह सुनकर दोनों समुद्र के पास गए और उनसे बोले- हे 'सागर! गंगाजी आपको पाप समर्पित करती हैं तो इसका अर्थ हुआ कि आप पापी बन गए हैं।'
समुद्र ने रुष्ट होते हुए कहा- 'मैं कैसे पापी बन गया? मै उन सारे पापों को भाप में बदलकर बादल को देता हूँ।'
वहाँ से वे दोनों बादल के पास गए और उनसे बोले- हे 'बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर आपको दे देता हैं, इसका यही अभिप्राय हुआ कि आप पापी हैं।'
बादल ने नाराज होते हुए कहा- हम पापी कैसे हो गए? हम उन सारे पापों को जल के रूप में बरसाकर धरती पर वापिस भेज देते हैं, जिससे किसान अन्न उपजाता है। वही अन्न मनुष्य खाता है। अन्न जिस मानसिक स्थिति से उत्पन्न किया जाता है, जिस सद् वृत्ति या कुवृत्ति से कमाया जाता है, जिस अवस्था में खाया जाता है, उसी के अनुसार उस मनुष्य की मानसिक स्थिति बन जाती है।
इस कथा का अर्थ यही है कि जो भी कर्म मनुष्य करता है, वे लौटकर उसी के पास आ जाते हैं। इसीलिए मनीषी हमें समझते हुए कहते हैं-
'जैसा खाओ अन्न, वैसा बनता मन।'
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्न को मनुष्य किस तरह कमाता है। यदि कठोर परिश्रम करके, ईमानदारी से कमाता है तो उत्तम है। यदि अपनी मेहनत की कमाई के धन से अन्न खरीदा जाता है, तभी घर के सभी सदस्यों के विचारों में शुद्धता रहती है। वहाँ सन्तान आज्ञाकारी और माता-पिता की सेवा करने वाली होती है। धन की यदि कमी हो तो भी घर में सदा हर प्रकार से खुशहाली बनी रहती है।
इसके विपरीत चोरी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, किसी को कष्ट देकर धन कमाया जाता है तो उस घर में कलह-क्लेश रहता है। वहाँ बच्चों में भी अच्छे संस्कार नहीं आते। सब कुछ होते हुए भी घर नरक की तरह दुखदायी बन जाता है। हर व्यक्ति दूसरे के प्रति असहिष्णु बन जाता है। यानी जैसा अन्न खाया जाता है वैसे ही घर के लोगों के विचार बन जाते हैं।
इसलिए इस मिथ से बाहर निकलिए कि मनुष्य के किए हुए पाप धुल जाते हैं। जो भी अच्छा या बुरा कर्म मनुष्य करता है, उसका फल भोगने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। उसे कोई शक्ति, कोई तन्त्र-मन्त्र, कोई तथाकथित गुरु उससे बचा नहीं सकते। इसलिए स्वयं ही सावधान हो जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
गुरुवार, 6 सितंबर 2018
आत्मरक्षा
अपनी सुरक्षा या आत्मरक्षा के लिए हर किसी को निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता उसकी रक्षा कोई दूसरा नहीं कर सकता। इसलिए शास्त्र कहते हैं- 'आत्मानं सततं रक्षेत्।'
अर्थात मनुष्य को अपनी रक्षा के लिए निरन्तर यत्न करना चाहिए।
यदि किसी मनुष्य में शारीरिक बल की कमी भी हो तो उसे अपना आत्मिक बल यानि अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए। जिस मनुष्य के पास आत्मिक बल होता है वह कभी किसी परिस्थिति में भी घबराता नहीं और किसी भी व्यक्ति का सामना कर सकता है।
एक चींटी जो बहुत ही छोटा जीव है और किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। यदि उसे छेड़ा जाए तो वह भी कुलबुलाते हुए अपना विरोध प्रकट कर देती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी आवश्यकता पड़ने पर अपने शक्तिशाली शत्रु का प्रतिरोध अवश्य करना चाहिए।
एक दृष्टान्त कभी पढ़ा था कि एक साँप को किसी मुनि ने कहा कि तुम व्यर्थ ही निरपराध लोगों को डसकर उन्हें मार देते हो। यह अच्छी बात नहीं है। तुम्हें भी अहिंसा का मार्ग अपना लेना चाहिए और अपना परलोक सुधारना चाहिए। उसे महात्मा जी की बात पसद आ गई और उसने सोचा क्यों न मैं लोगों को क्षमादान देकर आपन्ता परलोक सुधार लूँ।
कुछ दिन बीतने पर वह उन महात्मा जी के पास आया और अपनी व्यथा सुनाने लगा। उसने कहा कि जब से उसने लोगों को काटना छोड़ दिया है तब से कोई भी उससे नहीं डरता। लोग मुझे परेशान करते हैं और मुझ पर पत्थर भी बरसा देते हैं। बच्चे भी मेरी पूँछ मरोड़ देते हैं। उसकी बात सुनकर महात्मा जी ने उस साँप को समझाते हुए कहा कि तुझे लोगों को काटने के लिए मना किया था। यह थोड़ा कहा था कि तुम फुफकारना भी छोड़ दो। दूसरों को डराने के लिए अपना फन फैलाते हुए फुफकार अवश्य करो।
निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फटा।
विषो भवति वा मा भूत् फटटोपो भयङ्कर:॥
अर्थात विषरहित साँप को भी फुफकारना चाहिए। उसके पास विष हो चाहे न हो पर उसका फन फैलाना ही सबके हृदय में भय पैदा कर देता है।
अग्नि बहुत ही शक्तिशाली है। वह बड़े-बड़े जंगलो और भवनों तक को नष्ट कर देती है। जो भी जीव उसकी चपेट में आ जाता है जलकर भस्म हो जाता है। वही जब वह राख बनकर ठंडी पड़ जाती है तो उस पर चींटियाँ भी चलने लगती हैं।
इसी प्रकार भयंकर विषधर जो किसी भी जीव को नहीं बख्शता उसके निर्जीव हो जाने पर चींटियाँ उसे खा जाती हैं।
कहने का तात्पर्य यही है कि निर्बल व्यक्ति को इस ससार में कोई भी जीने नहीं देता। कहते हैं बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। इसी प्रकार का व्यवहार एक बलवान निर्बल के साथ करता है। उसे हर तरह से प्रताड़ित करता है। उसका वश चले तो किसी शक्तिहीन को जीने ही न दे। वही इस दुनिया का मालिक बनकर रहने लगे। पर अफसोस यह करना उसके बस में नहीं है। ईश्वर ने अपनी सृष्टि में सभी प्रकार के जीव उत्पन्न किए हैं और उनकी रक्षा भी करता है।
मनुष्य को ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी नहीं डरना चाहिए। वह उसका परम रक्षक है। इसलिए केवल उसकी शरण में जाना चाहिए। महात्मा गांधी की तरह शारीरिक बल न होते हुए भी आत्मिक बल होना चाहिए जिससे शक्तिशाली साम्राज्यों की नींव भी हिल जाती है। फिर इंसान तो कुछ भी नहीं है। वह चाहे कितना खूँखार और बलशाली हो आत्मविश्वासी के समक्ष टिक नहीं सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
बुधवार, 5 सितंबर 2018
मुँह देखे की माया
'सब जीते जी की माया है' या 'मुँह देखे की माया है' ऐसी उक्तियाँ हमें प्रायः सुनने को मिल जाती हैं। इनके पीछे छिपा सार बहुत ही गम्भीर और मन को कष्ट देने वाला होता है। अपनों से जाने-अनजाने दूरी बन जाती है परन्तु सामने पड़ जाने पर ऐसे प्रदर्शित किया जाता है कि उस व्यक्ति विशेष से बढ़कर इस दुनिया में कोई और सगा है ही नहीं। उस समय मनुष्य का मन आह्लादित होने के स्थान पर मनन करने के लिए विवश हो जाता है।
बहुत विचित्र है इस दुनिया का दस्तूर है कि कोई व्यक्ति कितना भी प्रिय हो, उसके बिना जीने की कल्पना करना भी चाहे कठिन हो, उसकी मृत्यु के बारे में सोचने मात्र से ही बेशक दिल दहल जाता हो। परन्तु वास्तविकता कुछ अलग ही बयान करती है। अपना प्रियतम व्यक्ति जब काल के गाल में समा जाता है, तब उसे कुछ समय भी सहन करना दुश्वार हो जाता है। उसे घर से निकालने के लिए मनुष्य बेसब्र हो जाता है।
उस समय कोई हमदर्द या सगा नहीं रह जाता। जिसे काँटा चुभने पर या जरा-सी चोट लगने पर हम बेचैन हो जाते हैं, सारा घर सिर पर उठा लेते हैं, उसी लाश बन चुके व्यक्ति को शमशान में ले जाकर, शीघ्र ही उसे अग्नि के सुपुर्द करने में हम समय नहीं लगते। तब उसे अपने उसी घर से ही बेदखल कर देते हैं जिसे उसने बहुत ही हसरतों से बनाया होता है। यह वही समय होता है जब अपने लोग ही पूछ्ने लगते हैं कि अभी और कितना समय लगेगा इसके संस्कार में। इससे विचित्र और क्या हो सकता है इस संसार में?
अपना कहे जाना वाला मनुष्य भी ऐसी अवस्था में पराया हो जाता है। उसके साथ किसी को भी सुहानुभूति शेष नहीं बचती। उससे छुटकारा पाने का हर सम्भव प्रयास देखते-ही-देखते शीघ्र कर लिया जाता है। फिर कहते हैं-
आज मरे कल दूसरा दिन।
मनुष्य नहीं, उसकी यादें शेष अवश्य बच जाती हैं। उन्हें अपने हृदय में संजोकर रख लिया जाता है।
मनुष्य को अपने जीवनकाल में ऐसे कार्य कर लेने चाहिए कि उसकी मृत्यु के बाद भी लोग उसका नाम सम्मान से लें, हिकारत से नहीं। जो लोग अपने जीवन में कुछ विशेष नहीं कर पाते बल्कि उनका जीवन समाज के लिए भार बन जाता है, वे जीते-जी मर जाते हैं। ऐसे लोग दूसरों को कष्ट देते हैं, उनको पीड़ा देकर सुख का अनुभव करते हैं। ये देश, धर्म, घर-परिवार और समाज के विरोधी कार्य करने में परहेज नहीं करते। अमानवीय कार्य करने वालों का नाम भी कोई अपनी जिह्वा से नहीं लेना चाहता। ऐसे लोगों का होना-न-होना एक बराबर होता है।
इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपना जीवन जीने में असमर्थ रहते हैं यानी सारा जीवन अभावों में जीते हैं। वे न अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण कर पाते हैं और न ही अपने परिवारी जनों की आवश्यकताओं को। ऐसे लोगों का जन्म भी इस संसार में भार की तरह होता है। ये लोग समाज में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाते। इसलिए इनका जीवन मृत तुल्य कहलाता है।
इनके अतिरिक्त कुछ लोग मर कर भी अमर हो जाते हैं। ये वही लोग होते हैं जो अपना जीवन देश, धर्म, समाज को समर्पित कर देते हैं। सहृदय, परोपकारी, दयावान लोग इस संसार की वास्तविक पूँजी होते हैं। अपने सद् कृत्यों के कारण मरणोपरान्त भी युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। अपने आदशों का पालन करने वाले ये लोग वास्तव में जीवन जीते हैं। इन्हीं लोगों की बदौलत समाज चलता है।
जीवन उन्हीं लोगों का सफल होता है जो समाज के दिग्दर्शक बनते हैं। आने वाली पीढ़ियाँ उनके कार्यों के कारण युगों तक उन पर मान करती हैं। जीवन और मृत्यु शाश्वत हैं। इन दोनों को मात देकर अमर हो जाने वाले ही महापुरुष कहलाते हैं। ऐसे ही लोगों का जन्म धरा पर सफल होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
मंगलवार, 4 सितंबर 2018
बूँद बूँद से
बूँद-बूँद से घट भरता है और यदि किसी कारणवश उसमें छेद हो जाए तब उसी प्रकार से समय बीतते क्रमशः खाली भी हो जाता है। मनुष्य को अपने जीवन में सदा ही सावधान रहना चाहिए। उसे एक-एक करके अपने शुभ कर्मों में बढ़ोत्तरी करनी चाहिए। तुच्छ स्वार्थों के कारण उन्हें नष्ट नहीं होने देना चाहिए।
मनुष्य अपने भीतर यदि अच्छाइयों को जोड़ना आरम्भ करेगा तो वह अपने इस जीवन में ऊँचाइयों को छू लेता है। गुणों की अधिकता उसे महान बनाती है। वह संसार में पूजनीय बन जाता है। समाज को दशा और दिशा देने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है। उसका जीवन सात्विक बन जाता है। उसका लोक और परलोक दोनों ही संवर जाते हैं।
इसके विपरीत यदि वह बुराइयों की डगर पर चल पड़ता है तब उसका जीवन नरक के समान कष्टदायक हो जाता है। ऐसे मनुष्य से सभी किनारा करते हैं। कोई भी मनुष्य उसकी संगति में रहकर अपयश का भागी नहीं बनना चाहता। उसके अपने परिवारी जन भी दुखी होकर उससे मुँह मोड़ लेते हैं। फिर वह अकेला रह जाता है। समय बीतते उसे यह अहसास होता है कि क्षणिक सुख की चाह में उसने बहुत कुछ गंवा दिया है। उस समय रिश्ते टूट जाते हैं और जीवन के अवसान का समय आ जाता है।
हम परिश्रम करके यदि थोड़ा-थोड़ा करके धन का संग्रह करते हैं तो बहुत-सी धनराशि एकत्र कर लेते हैं जो हमारे सुख-दुख में हमारा साथ निभाती है। इसके विपरीत यदि मनुष्य कुव्यसनों में पड़ जाए या उसे निठल्ले बैठने की आदत हो जाए तब पूर्वजों द्वारा कमाया हुआ भी साथ नहीं देता बल्कि बरबाद हो जाता है। तब धन-सम्पत्ति रूठकर घर से विदा हो जाती है। तब हम चाहकर भी उसे रोक नहीं पाते बस हाथ ही मलते रह जाते हैं। इसके अतिरिक्त हम कुछ और कर भी नहीं सकते।
अपना लोक व परलोक सुधारने के लिए नियमित आत्मविशलेषण करके हम अपने दुर्गुणों को दूर करते हुए क्रमशः सद् गुणों को अपने अंतस में समाहित कर सकते हैं।
मूर्ख व्यक्ति का कोई भी साथी नहीं बनना चाहता। सभी उससे अपना पिण्ड छुड़ाना चाहते हैं। ऐसे मूर्ख व्यक्ति के परलोक की बात तो छोड़ दीजिए उसका इहलोक भी नरक के समान ही कष्टदायक हो जाता है।
धीरे-धीरे सद् ग्रन्थों को पढ़कर हम ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। आयु के बीतने पर हम अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। नहीं तो मूर्खों की कतार को बढ़ाकर आयुपर्यन्त दूसरों द्वारा किए गए अपमान को सहन करते रहते हैं।
लोगों को दूसरों की छीछालेदार करने में बहुत ही मानसिक प्रसन्नता मिलती है। उन्हें अनुचित रूप से टीका-टिप्पणी करके आनन्दित होने का अवसर कभी नहीं देना चाहिए।
अपने आप को संतुलित बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम घट की भाँति पूर्ण बनें और बूँद-बूँद जल रूपी सद् गुणों से अपने व्यक्तित्व में निखार लाकर पूर्णता की ओर बढ़ें। छेदयुक्त मटके की तरह बनकर रिक्तता के मार्ग पर चलने से अर्थात जीवन को जीरो बनाने हमें सदा ही बचना चाहिए। तभी हम विवेकशील मनुष्य कहला सकेंगे
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
सोमवार, 3 सितंबर 2018
दुष्ट क्रोध
लाल-लाल आँखों से
डराता हुआ मेरा ये क्रोध
शायद आज अनावश्यक ही
मेरी परीक्षा लेने को आतुर हो रहा है।
मुझे तो अभी कुछ भी
समझ में नहीं आ रहा है
ये क्योंकर मुझे सता रहा है
आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहा है?
देखो तो क्रोधवश मैं
आपे से बाहर हो रही हूँ
मेरी भृकुटि तनती जा रही है
मेरा चेहरा अनायास लाल होने लगा है।
मेरा सारा शरीर अब
थर-थर काँपने लगा है
चाहकर संयत नहीं हो रही हूँ
मैं बस बहुत कुछ बोल देना चाहती हूँ।
छोटी-सी जबान मेरी
अब लड़खड़ाने लगी है
पर बोलने से नहीं हट रही है
देखो न जाने क्या क्या कहती न रही है।
मेरी सारी कुण्ठाएँ
मेरे सारे जो आक्रोश हैं
वे सब मौका तलाश रहे हैं
बस बाहर निकलने को मचल रहे हैं।
अपनों से झगड़ा करवा
उन्हें भला-बुरा कहलाकर
सबसे बेगाना बनाना चाहता है
दुष्ट क्रोध दूर खड़ा तमाशा देख रहा है।
इसने बहुत विनाश किया
सृष्टि को तबाह औ बर्बाद किया
इसका ताण्डव जब दिख जाता है
तब चारों ओर हाहाकर मचने लगता है।
सोचती हूँ इसे वश में करूँ
अपने ऊपर हावी न होने दूँ
हर बार मेरी कसम तोड़ देता है
मुझे सदा मुँह के बल गिराकर हँसता है।
दुष्ट क्रोध मेरी चुनौती है
तेरे झाँसे में कभी न आना है
लाख यत्न कर ले मैंने नहीं हारना
मन के कोने में तुझे जाकर शरण लेनी है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 2 सितंबर 2018
सार ग्रहण करना
विद्वान मनीषी जिस भी परिवेश में रहते हैं, वहाँ से वे सदा ही कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं। सीखना चाहें तो एक बच्चे से ज्ञान लिया जा सकता है। पशु-पक्षियों से भी सीखा जा सकता है। जो न सीखना चाहे वह विद्वानों की संगति में रहकर भी कुछ नहीं ग्रहण कर सकता, वह मूर्ख ही रहता है। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि कुँए के पास जाकर भी वह मनुष्य प्यासा रह जाता है। मनुष्य को जहाँ तक हो सके ज्ञानार्जन की पिपासा को जिलाए रखना चाहिए, उसे बुझने नहीं देना चाहिए। सारी आयु सीखते रहने पर भी लगता है कि अभी बहुत कुछ है सीखने के लिए।
ब्रह्माण्ड में अक्षय ज्ञान का भण्डार है, जिसे न जाने कितने जन्म लग जाएँगे सीखने में। सारी प्रकृति मनुष्य को सिखाने के लिए तैयार बैठी है, पर शर्त यह है कि कोई सीखना तो चाहे तब न। जहाँ से भी सार्थक ज्ञान मिले उसे आत्मसात कर लेना चाहिए। जो भी बुराई दिखे उसकी ओर ध्यान ही नहीं देना चाहिए, उसे अनदेखा कर देना ही समझदारी कहलाती है। तभी मनुष्य कुछ सीख पाता है, जान पाता है।
विद्वान को हंस की तरह नीर-क्षीर विवेकी होना चाहिए। कहते हैं हंस दूध में से दूध और पानी को अलग कर देता है। उसी तरह सज्जन को भी सर्वत्र सार-सार ग्रहण करके फालतू बातों को उड़ा देना चाहिए। उनमें अपना दिमाग खराब नहीं करना चाहिए, उससे किसी भी तरह उनका भला नहीं होने वाला।
कबीरदास जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाने का प्रयास किया है। वे कहते हैं-
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।।
अर्थात् साधु या विद्वान का स्वभाव ऐसा होना चाहिए जैसे सूप (छाज) का स्वभाव होता है। वह सार यानी उपयोगी वस्तु को ग्रहण कर लेता है और जो थोथा यानी अनावश्यक कूड़ा-कर्कट होता है, उसे उड़ा देता है।
कबीरदास जी का यह कथन बहुत ही सार्थक और उपयोगी है। अपने लिए जो भी संग्रहणीय है, सार युक्त है, उसे मनुष्य को ग्रहण कर लेना चाहिए। जो भी अनर्गल वार्ता हो रही हो उसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देना चाहिए अथवा अनदेखा कर देना चाहिए। सज्जन इसीलिए गुणी होते हैं क्योंकि वे कबीरदास जी की बात को सदा स्मरण रखते हैं और उस पर आचरण करते हैं।
संस्कृत भाषा के एक विद्वान कवि ने बहुत सरल भाषा में इसी बात को समझाने का प्रयास किया है-
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्य: कुशलो नर:।
सर्वत: सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पद:।।
अर्थात् समझदार व्यक्ति को शास्त्रों में से उनका सार निकाल लेना चाहिए, जैसे मधुमक्खी या भंवरा सभी प्रकार के फूलों मे से केवल मधु एकत्रित करता है।
कवि का कथन है कि समझदार व्यक्ति को अपने शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए। उसे अपने लिए सार तत्त्व को ग्रहण करना चाहिए। इसी श्लोक में मधुमक्खी एवं भँवरे का उदाहरण भी दिया है कि वे फूलों पर मँडराते हैं और अपने मतलब के लिए मधु को एकत्र करके उड़ जाते हैं। बाकी फूल से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता, वे फूल की ओर देखते भी नहीं हैं।
जो मूर्ख होते हैं वे अनावश्यक चर्चाओं में अपना समय और ऊर्जा व्यर्थ गँवाते है। जिस समय परिश्रम करना चाहिए, उस समय वे अनर्गल प्रलाप करते हैं। इसलिए सफलता उनसे दूर-दूर भागती रहती है। उनके हाथ नहीं लगती। सफलता आगे-आगे भागती है और वे पीछे-पीछे। वे चाहकर भी उस तक पहुँच नहीं पाते। इसलिए मूर्ख लोग विद्वानों से ईर्ष्या करते हैं। इसका कारण है स्वयं तो वे कुछ करते नहीं और उनकी परिश्रमपूर्वक कमाई गई सफलता से खुश नहीं होते। उनका तो कुछ बिगड़ता नहीं है। वे बस दुखी होते रहते हैं और अपना खून जलाते रहते हैं।
विद्वान भी यदि स्वयं को सर्वज्ञ समझने लगे तो समझो उसका पतन निश्चित है। ऐसे लोग मानने लगते हैं कि इन ग्रन्थों में जो लिखा है, वह सब उन्हें पता है। दूसरे सभी लोग उसके सामने पानी भरते हैं, वे उसके पासंग भी नहीं हैं। ऐसे अहंकारी विद्वान का पतन निश्चित होता है। इसलिए विद्वानों के लिए स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि अपने ग्रन्थों के मूल तत्त्व यानी जीवनोपयोगी सार को ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बनाएँ। इस प्रकार करने से उनका इहलोक और परलोक सुधर जाता है। यही ज्ञानी लोग समाज के दिग्दर्शक कहलाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp