मनुष्य को सागर की भाँति गम्भीर होना चाहिए। सागर की गम्भीरता की थाह हम मनुष्य नहीं पा सकते। अपने गर्भ में न जाने कितने अनमोल रत्न छिपाए हुए है जिनके बारे में हमें जानकारी तक नहीं है। जितना ही गहरे हम सागर में पैठते जाते हैं उतना ही इसकी विशालता का ज्ञान होता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने अन्तस में रखे सभी रहस्यों को गुप्त रखना चाहिए, उन्हें आत्मसात करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों के समक्ष उनको उद्घाटित नहीं करना चाहिए। इसी से ही उसकी गम्भीरता एवं महानता का ज्ञान होता है।
सागर की सबसे बड़ी महानता यह है कि इसने हमें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का मार्ग दिया है। मनुष्यों और सामान से लदे इतने भारी-भरकम समुद्री जहाजों को यह आवागमन से कभी नहीं रोकता। इसकी महानता के कारण हम अनेकानेक वस्तुओं का सुविधापूर्वक आयात-निर्यात करके उनका उपभोग कर पाते हैं।
अनेक नदियों को अपने अंतस में समाकर सागर उन्हें एकाकार कर लेता है। इसका जल विभिन्न आकार-प्रकार के अनेक इतने खूबसूरत जलचरों की आश्रय स्थली है जिनके विषय में हमें जानते तक नहीं है। उनकी खोज करने के लिए बारबार वैज्ञानिक आकर इसका सीना चीरते रहते हैं। अनेक खजानों को समेटने वाला यह सदा ही सबके लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। इसकी लहरों का उतार-चढ़ाव किसी चमत्कार से कम नहीं है।
महापुरुषों की यही पहचान है कि वे अपने अंतस में न जाने किन-किन दीन-दुखियों की गाथाओं को रहस्य बनाकर अपने मन के किसी कोने में छिपा देते हैं। सम्पर्क में आने वाले लोगों की अच्छाइयों और बुराइयों को केवल अपने तक सीमित रखते हैं। सागर की तरह हर प्रकार के उतार-चढ़ावों को झेल लेते हैं पर उसकी आँच किसी पर नहीं आने देते।
अपने साथ अन्याय करने वालों को भी सागर की तरह क्षमा कर देते हैं। किसी से बदला लेने के बारे में ये महापुरुष विचार तक नहीं करते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मंथन किया था। मंथन से मिलने वाले रत्नों का बटवारा तो हो गया परन्तु हलाहल विष को बाँटने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ तब भगवान शंकर ने उस विष का पान सृष्टि की भलाई के लिए किया। यही कार्य सज्जन जन भी करते हैं। दूसरों को सद् गुणों व खुशियाँ लुटाने वाले वे, समाज के व्यंग्य बाणों को हंसते हुए सहते हैं।
रामायण में प्रसंग आता है कि जब भगवान राम को रावण से युद्ध करने के लिए लंका पर चढ़ाई करनी थी तो उन्होंने सागर से मार्ग देने की प्रार्थना की थी। हम लोगों की तरह अनावश्यक अधिकार जमाने का प्रयास नहीं किया था। यह उनकी सज्जनता थी, महानता थी।
भगवान भोलेनाथ के विषय में प्रचलित है कि वे इतने भोले हैं जो हर भक्त की सच्चे मन से की साधना से प्रसन्न होकर उसे मनचाहा वरदान देते हैं। परन्तु यदि वे किसी कारण से कुपित हो जाएँ तो फिर उनके ताण्डव से सृष्टि में कोई भी नहीं बच सकता।
सागर हमें सब सुख देता है परन्तु फिर भी हम मनुष्य उसे दूषित करने से बाज नहीं आते। उसका परिणाम उसका उफान यानि ज्वार भाटा होता है जो किसी भी समय भयंकर विनाश कर सकता है। ऐसी चेतावनी वैज्ञानिक समय-समय पर देते रहते हैं।
सागर की तरह घोर गम्भीर सज्जन हमारे जीवन के मार्गदर्शक व प्रेरक होते हैं। अत: उनका सम्मान करने की आदत हम सबको होनी चाहिए। ऐसे महापुरुष बहुत विरले होते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018
सागर की तरह गम्भीर
बुधवार, 5 दिसंबर 2018
सम्बन्धों में तनाव
अलग-अलग स्वभाव व कार्यक्षेत्र के अनेक लोगों से मनुष्य का अपने जीवन काल में वास्ता पड़ता है। कुछ लोगों की मधुर स्मृतियाँ उसकी पूँजी बन जाती हैं। उन्हे जीवन में प्राय: याद करके आनन्द से सराबोर हो जाता है। कुछ लोगों के साथ होने वाले कटु अनुभवों के कारण उन्हें याद करके उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है। उन्हें वह दुस्वप्न समझकर भूलने की नाकामयाब कोशिश करता है।
हर मनुष्य का स्वभाव ऐसा नहीं होता कि वह उनका प्रतिकार करे अथवा उनके मुँह पर जूता मारने जैसा व्यवहार करे। वह अपने भीतर-ही-भीतर कुढ़ता रहता है। यह पिष्टपेषण उसे चैन नहीं लेने देता और वह असहज होने लगता है। इस तरह उसके दिन-रात की मानसिक शान्ति भंग होने लगती है। यह स्थिति किसी भी तरह सराही नहीं जा सकती।
हमारे मनीषी इसीलिए समझाते है कि दिल में बुराई रखने से बेहतर है उस नाराजगी को प्रकट कर दो। ऐसी विकट परिस्थिति में जहाँ दूसरो को समझाना कठिन हो जाए, वहाँ स्वयं को समझ लेना ही बेहतर है। आत्मविश्लेषण करते रहना चाहिए। इससे पता चल जाता है कि गलती सामने वाले की थी या हमीं से कहीं चूक हो गई।
प्रसन्न रहने का सीधा-सा मन्त्र यही है कि आशा या उम्मीद केवल अपने आप से रखी जाए किसी अन्य से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर प्राय: निराशा ही हाथ लगती है। जितनी अपनी सामर्थ्य है उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिल पाती है। बहुत बार हम स्वयं ही अपनी उम्मीद के अनुसार सफलता पाने से चूक जाते हैं।
जब हम स्वयं अपनी आशा और विश्वास पर खरे नहीं उतर पाते तब हमें यह सोचना चाहिए कि दूसरा भी इन्सान है, उससे भी चूक हो सकती है। इसलिए हमें दूसरों से नाराज नहीं होना चाहिए।
सहृदयता पूर्वक चिन्तन करने से मन में दूसरों के प्रति आने वाली दुर्भावनाएँ स्वयं ही किनारा कर लेती हैं। इससे दूसरों के लिए मन में जमी ईर्ष्या व क्रोध रूपी धूल की परतें साफ हो जाती हैं और मन दर्पण की तरह चमकने लगता है।
मेरा विचार है कि जब दो लोगों में किसी भी विषय पर टकराव हो तो उसे आमने-सामने बैठकर सुलझा लेना चाहिए। अपने मन में दुराग्रह पाल करके बैठने से अच्छा है कि अपनी नाराजगी के कारण को प्रकट करके दूर कर देना चाहिए। ऐसा करने से सम्बन्धों में आने वाला मनमुटाव दूर हो जाता है और वे लम्बे समय तक बने रहते हैं।
सम्बन्ध कोई भी हो, चाहे माता-पिता का हो, पति-पत्नी का हो, फिर दोस्तों-रिश्तेदारों के मध्य हो अथवा कार्यालयीन साथियों का हो, उन सबमें पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है। अपने मनों में कभी भी, किसी भी कारण से दरार नहीं आनी चाहिए। उसके कारण आने वाली दूरी को पाटना असम्भव तो नहीं कठिन अवश्य हो जाता है।
यदि सम्बन्धों में तनाव बना रहेगा और उसे दूर करने का प्रयास नहीं किया जाएगा, तब सभी प्रभावित लोगों के मनों को अतीव कष्ट होगा। यह स्थिति किसी भी सहृदय के लिए भी सुखद नहीं कही जा सकती। सबसे बड़ी बात कि सहजता और सरलता का वातावरण बनाने में आई बाधा को सभी दूर करना चाहते हैं। इसके मूल में सभी पक्षों का अहं आड़े आ जाता है जो समझौता करने से इन्कार कर देता है।
गलती करना मानवीय प्रकृति है, इसे सदा याद रखना चाहिए। यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे स्वीकार करते हुए यदि क्षमाशील बना जाए तो दूसरों को मानसिक सन्ताप देने के स्थान पर उन्हें उन्हीं की गलती का अहसास कराते हुए अपनी विशालहृदयता का परिचय देना चाहिए। हर व्यक्ति दूसरों की उम्मीद पर खरा नहीं हो सकता। अतः दूसरों से नाउम्मीद होने के स्थान पर स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 4 दिसंबर 2018
सौभाग्यशाली मनुष्य
उस मनुष्य से बढ़कर बड़भागी अथवा सौभाग्यशाली व्यक्ति इस संसार में कोई और नहीं हो सकता जिसके द्वार पर कोई सहायता माँगने के लिए आता है। उसे अपने ऊपर मान होना चाहिए पर घमण्ड नहीं कि उसे किसी ने इस योग्य समझा कि उसके पास आकर वह अपनी समस्या का वह निदान कर सकता है।
कोई भी व्यक्ति किसी के पास बहुत आशा लेकर आता है। मनुष्य किसी के पास तीन कारणों से आता है- भाववश, अभाववश अथवा प्रभाववश।
व्यक्ति यदि सच्चे मन से किसी भावना से आया है तो उसे उस समय प्रेम की आवश्यकता होती। इसलिए उसके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हो सकता है वह अपनी मूर्खता से या अपनी किसी मजबूरी के कारण समाज से कटकर अलग-थलग पड़ गया हो। उसे अनचाहे अवसाद के समय शायद किसी अपने के भावनात्मक सहारे की जरूरत हो। यदि ऐसा कर सका जाए तो वह मनुष्य उस सहारा देने वाले व्यक्ति का अपना बन जाता है।
समय और परिस्थितियों के कारण कोई अभावग्रस्त किसी पास जाता है तो यथासम्भव उसकी मदद अवश्य ही करनी चाहिए, उसे इन्कार करके निराश नहीं करना चाहिए। पता नहीं वह व्यक्ति कितना मजबूर होगा जो अपने जमीर को मारकर सहायता माँगने आया है। सयाने कहते हैं- 'माँगन गए सो मर गए, मरकर माँगन जाए।'
इसलिए उस मजबूर व्यक्ति की आशा को निराशा में न बदलते हुए एक अच्छे सामाजिक इन्सान होने का परिचय देना चाहिए। इसी प्रकार एक-दूसरे की सहायता करते रहने से संसार के सभी व्यवहार चलते हैं। समृद्ध व्यक्ति की सहायता कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। वहाँ तो इस प्रकार के लेनदेन का व्यापार होता ही रहता है।
यदि किसी प्रभावशाली के पास कोई मनुष्य उसके प्रभाव के कारण से आया है तो इस बात के लिए प्रसन्न होना चाहिए कि परमात्मा ने उसे इतनी सामर्थ्य दी है कि वह किसी के काम आ सकता है। ऐसी स्थिति में किसी की सहायता करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। इसे अपना सौभाग्य ही समझना चाहिए कि सारा शहर छोड़कर वह व्यक्ति आपके पास आया है किसी और के पास नहीं गया। उसे आपसे कुछ अच्छाई की उम्मीद होगी, तभी तो आपकी शरण में सहायता लेने आया है।
इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किस्मत की एक आदत है कि वो पलटती जरुर है और जब पलटती है तब सब कुछ उलट-पलट करके रख देती है। जीवन में ऐसी विपरीत स्थिति किसी भी व्यक्ति की हो सकती है। इसलिये अच्छा समय आने पर अहंकार न करो और कष्टदायी समय में धैर्य रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके अपनी उन्नति के समय अपने हाथों से कुछ ऐसे काम कर लेने चाहिए जिससे मनुष्य सबके हृदयों में अपना स्थान बना सके।
दूसरा व्यक्ति किसी के पास चाहे भाव के कारण, अभाव से त्रस्त होकर अथवा रुतबे से प्रभावित होकर आया है, यानि कि किसी भी परिस्थिति के वशीभूत होकर आया है, उसे निराश नहीं करना चाहिए। समय पर उसके सिर हाथ रख देने से वह कृतज्ञ होकर उसका मुरीद बन जाता है। इस प्रकार मनुष्य के हितचिन्तकों की संख्या बढ़ती रहती है। मनुष्य की पहचान उसके बन्धु-बान्धवों और मित्रों से होती है। वे उसके अपने बन गए तो मानो वह जिन्दगी की जंग जीत गया अन्यथा कुचलने के लिए तो जमाना तैयार ही बैठा हुआ है।
बस शर्त एक ही है कि मनुष्य को किसी की सहायता करने का घमण्ड नहीं करना चाहिए, उसे केवल अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। उसे अपने किए गए परोपकार के कार्यों को यहाँ वहाँ गाते नहीं फिरना चाहिए। ऐसा करने से सम्मान के स्थान पर उसे लोगों की अपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
मनुष्य को सदा इस बात के लिए परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने इस संसार में भेजकर उसे इस योग्य बनाया है कि वह किसी दूसरे के काम आ रहा है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 3 दिसंबर 2018
अपने हिस्से के दुख
अपने हिस्से के दुःख और कष्ट मनुष्य को स्वयं अकेले ही झेलने पड़ते हैं। आप कह सकते हैं कि हमारा भरा-पूरा परिवार है, हम सदा अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे रहते हैं। सभी हमारी परवाह भी करते हैं। फिर यह कथन तो उपयुक्त प्रतीत नहीं हो रहा है। मेरा यह कथन अपने-आपमें एक बहुत गहरा अर्थ समेटे हुए है। इस विषय पर विवेचना कर ली जाए तब इसका सार समझ पाना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाएगा।
मनुष्य माँ के गर्भ में प्रवेश करने के बाद से जन्म तक अँधेरे और कष्ट का सामना अकेले ही करता है। उस दुःख से घबराकर ईश्वर से मुक्त होने की प्रार्थना करता है। फिर जन्म से मृत्यु तक अनेकानेक दुःख-तकलीफों से रूबरू होता हुआ जीवन व्यतीत करता है। अन्त में मृत्यु का सामना करता हुआ अकेला ही इस संसार से विदा ले लेता है।
मनीषी कहते हैं कि सुख बाँटने से बढ़ता है और दुःख भोगने से काटता है। आज की परस्थितियों में लोग अपने दुःख से दुखी नहीं होते अपितु दूसरों के सुख से व्यथित होते हैं। कोई खुश होता है तो उसकी प्रसन्नता कुछ लोग सहन नहीं कर पाते। उससे ईर्ष्या करते हैं और उसे चुटकी काटने अथवा सुई चुभोने से बाज नहीं आते। इसी तरह लोग दूसरों के दुःख को आग्रहपूर्वक सुनकर, मगरमच्छ वाले आँसू बहाने वाले सदा उसका उपहास उड़ाने की फ़िराक में लगे रहते हैं।
जिस भी व्यक्ति को शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट सहन करना पड़ता है, उसे ही पता होता है कि उसकी समस्या कितनी विकट है? अस्वस्थ व्यक्ति के चारों ओर कितने ही बन्धु-बान्धव खड़े हों, वे केवल सहानुभूति प्रदर्शित कर सकते हैं, सेवा कर सकते हैं, अच्छे-से-अच्छा इलाज करवा सकते हैं परन्तु उसके होने वाले कष्ट को किसी भी सूरत में बाँट नहीं सकते, काम नहीं कर सकते।
यह उनकी मज़बूरी ही कही जा सकती है कि अपने तड़पते हुए प्रियजन के लिए दुखी होने के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं कर पाते, इस समय स्वयं को लाचार अनुभव करते हैं। यही कारण है कि मनुष्य इतनी भीड़ से घिरा होते हुए भी स्वयं को अकेला ही खड़ा पाता है। इन दुखों और परेशानियों से उसे अकेले ही जूझना पड़ता है, इसके अतिरिक्त उसके पास और कोई भी चारा नहीं बचता। इसी से मनुष्य की असहायता का अनुमान लगाया जा सकता है।
घर में खाने की मेज पर सजे स्वादिष्ट व्यञ्जन या किसी शादी-पार्टी में चाहे कई प्रकार के छप्पन भोग बने हों, परन्तु उस रोगी से उसकी स्थिति पूछिए जो केवल उन्हें टुकुर-टुकुर देख सकता है, खा नहीं सकता। सब कुछ होते हुए भी जो खाने से लाचार है, वही उन सबसे वञ्चित है और कोई नहीं। कोई भी उसके इस दुःख का भागीदार नहीं बन सकता। उसे सांत्वना देने के अतिरिक्त और किया भी क्या जा सकता है?
अस्पताल के आई सी यू में पीडीए या आपरेशन की टेबल पर पड़े प्रियतम का साथ भी दरवाजे तक ही दिया जा सकता है। उसके आगे की यात्रा उसकी अपनी ही होती है। किसी रोग के कारण चलने-फिरने से लाचार व्यक्ति को अपने अकेलेपन का स्वयं ही सामना करना पड़ता है। सारा समय यानी चौबिसौ घण्टे उसके साथ जुड़कर कोई नहीं बैठ सकता, क्योंकि सभी को अपने-अपने कार्य करने होते हैं।
कुछ लोग जन्म से ही रोगी पैदा होते हैं। उन्हें लोग कर्मरोगी कहते हैं और उनके रोग को कर्मरोग कहकर अपने कर्तव्य की इति कर लेते हैं। वे आयुपर्यन्त अपने इस रोग के बोझ में दबे हुए जीते हैं। जीवनभर ही वे लोगों की सहानुभूति का पात्र बने रहते हैं।
शुभाशुभ कर्म करते समय मनुष्य यह भूल जाता है कि एक दिन उसे उन सब कृत कर्मों का भुगतान करना पड़ता है। उनका फल भोगने के समय बहुत ही कष्ट होता है। तब मनुष्य परम न्यायकारी ईश्वर पर पक्षपात करने का आरोप लगाने लगता है। अपने ही भाई-बन्धुओं को कोसता है, ग़ाली-गलौच करता है। उसे सारी दुनिया अपनी दुश्मन प्रतीत होती है।
मनुष्य को सदा ही सावधानीपूर्वक अपना कर्म करते रहना चाहिए, जिससे उसे इन दारुण दुखों से दो-चार न होना पड़े और उसे इनसे मुक्ति मिल सके।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 2 दिसंबर 2018
चिरयुवा रहने के लिए
चिरयुवा बने रहने के लिए मनुष्य को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। समय निरन्तर प्रवाहमान है। अतः आयु को बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। आयु के हर पड़ाव में मनुष्य कुछ विशेष सावधानियाँ बरतकर स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। अपनी वृद्धावस्था में जब शरीर अशक्त होने लगता है, उस समय भी निम्न उपायों द्वारा स्वयं को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जा सकता है। इससे जीवन में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।
जहाँ तक हो सके सरल व साधारण चीजों का आनन्द लेना चाहिए। जीवन में कैसी भी परिस्थितियाँ आएँ, प्रयास सदा यही करना चाहिए कि प्रसन्न रहा जाए। खूब देर तक और ऊँची आवाज में हँसना चाहिए। हँसना एक प्रकार का व्यायाम है। इससे मनुष्य तनावमुक्त हो जाता है। बहुत से पार्कों में लोग यह अभ्यास करते हुए दिखाई देते हैं। केवल हँसमुख लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए। ऐसे लोगों के साथ अपना कुछ समय व्यतीत करना चाहिए जो सकारात्मक सोच रखते हों। पर क्रूर और चिड़चिड़े लोग सदा नकारात्मक सोच रखते हैं। इनसे मित्रता करने से बचा जा सके तो बहुत अच्छा रहेगा।
अपने आसपास उन सबको रखिए जो आपको प्रिय हों। आपका परिवार, पालतू जानवर, स्मृतिचिह्न-उपहार, संगीत, पेड़-पौधे, कोई हॉबी या अन्य कुछ भी। आपका घर ही आपकी आश्रयस्थली है। प्रयास यही होना चाहिए कि कुछ नया सीखते रहा जाए। शिल्प, कम्प्यूटर, बागवानी आदि के विषय में कुछ और जानने की कोशिश कीजिए। इनमें मन रमा रहेगा तो दिमाग निष्क्रिय नहीं रहेगा। खाली बैठकर उधेड़बुन करने के स्थान पर सदा सकारात्मक कार्य कीजिए। इस तरह समय भी व्यतीत हो जाएगा। मनीषी कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। अनावश्यक ही पिष्टपेषण करते रहने के कारण अल्झाइमर यानी मनोरोग होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचना आवश्यक है।
अनावश्यक ही आयु, कद और वजन आदि के विषय में सोचना छोड़ देना चाहिए। इन सबके बारे में डॉक्टर है न चिन्ता करने के लिए। वह इसके लिए मोटी फीस लेता है और लोग हँसकर उसे पैसा देते है। अपनी सेहत का ध्यान रखिए। जहाँ तक हो सके सादा और पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए। यदि शरीर स्वास्थ्य है तो उसे सम्भालकर रखिए, यदि अस्वस्थ है तो इलाज करवाइए और यदि कोई असाध्य रोग है तो किसी की सहायता लेने से परहेज मत कीजिए।
खुशी अथवा गम हर समय आँसू आते ही रहते हैं। उन्हें बह जाने दीजिए, रो लीजिए। सुख और दुःख दोनों को महसूस कर लीजिए और फिर स्वस्थ होकर आगे बढ़ जाइए। मनुष्य स्वयं ही एक ऐसा व्यक्ति है जो सारी जिन्दगी अपने साथ रहता है। जब तक यह जीवन है तब तक प्रफुल्लित होकर रहना चाहिए। पता नहीं कब क्या होनी-अनहोनी घटित हो जाए। हर स्थिति के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। इससे दुख काम होता है।
जिन्हें आप प्यार करते हैं उनसे बार-बार अहसास करवाते रहिए कि आप उन्हें कितना चाहते हैं और सदा उन्हें याद करते रहते हैं। जीवन का पैमाना उन साँसों की संख्या से नहीं होता जिन्हें हम अपने भीतर लेते या बाहर छोड़ते हैं बल्कि उनसे होता है जो लम्हे हमारी साँस को लेकर चले जाते हैं। हमें प्रतिदिन अपने जीवन को अपने तरीके से जीने की आवश्यकता है। यह मानकर चलना चाहिए कि हर दिन आखिरी दिन है और हर साँस आखिरी है। इस सोच के साथ जीने से इन्सान को न मृत्यु से डर लगता है और न ही जीवन से। इसे याद करते रहने से जीवनयात्रा सरल और सुगम हो जाती है।
हर समय स्वयं को दोषी ठहराना बन्द कर दीजिए। अनावश्यक का यह अपराध-बोध जिजीविषा को समाप्त करता है। जब भी मन में उदासी के भाव आने लगें, उस समय किसी मॉल में या बाजार में घूमने चले जाइए, किसी पड़ोसी या किसी मित्र के घर उनसे मिलने चले जाइए। देश-विदेश जहाँ मन करे और साधन आज्ञा दें वहाँ कहीं भी यात्रा के लिए जाइए। जहाँ जाकर मन अशान्त हो वहाँ बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए पुस्तकें पढ़ सकते हैं। हल्का-फुल्का योग कर सकते हैं, पुराने फोटो देखकर मधुर स्मृतियों का स्मरण कर सकते हैं। इन सबसे भी बढ़कर प्रभु का नाम जप सकते हैं। वही सब दुखों को दूर करने की परम औषधी है।
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शनिवार, 1 दिसंबर 2018
माँ की शीतल छाया
माँ के विषय में गाई गई गीत की एक पंक्ति स्मरण हो रही है-
माँवाँ ठण्डियाँ छावाँ कि छावाँ कौन करे?
अर्थात माँ शीतल छाया देती है। उसके समान और कोई भी ऐसी शीतलता वाली छाया नहीं दे सकता।
माँ की गोद है ही ऐसी कि सारी आयु मनुष्य के ताप हरती रहती है। वहाँ आकर मनुष्य को वास्तविक शान्ति मिलती है। माँ के हाथ का स्पर्श मनुष्य को उसकी हर आयु में सम्बल प्रदान करता है।
माँ उसे गर्म हवा का एक झौंका भी नहीं लगने देना चाहती। वह चाहती है कि उसकी सन्तान के सारे कष्ट उसके हिस्से में आ जाएँ और उसके बच्चे हँसते-मुस्कुराते रहें। उन्हें कष्टों और परेशानियों से बचाने के लिए सदैव उपाय करती रहती है। उसे सबकी नजरों से बचाने का प्रयास करती रहती है।
उसकी हार्दिक कामना होती है कि उसके बच्चे फले-फूलें। योग्य बनकर बच्चे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहें। उन्हें कभी असफलता का मुँह न देखना पड़े।
सन्तान को सुई चुभने जैसा कष्ट भी हो जाए तो उसका सारा सुख-चैन स्वाहा हो जाता है। उसकी नीन्द उड़न छू हो जाती है। वह अपना खाना-पीना सब छोड़कर अपने बच्चों की तिमारदारी में जुट जाती है। जब तक वह स्वस्थ नहीं हो जाता, तब तक वह बस एक पैर पर ही खड़े रहकर दिन-रात की परवाह किए बिना उसकी देखभाल करती रहती है।
ऐसी होती है माँ की ममता जो बिना किसी प्रतिकार की कामना किए अपनी सन्तान का हित साधती है। सदा उसके शुभ की कामना करती है। बच्चे चाहे उसकी उपेक्षा भी करें, फिर भी वह उनके विरोध में किसी की कोई बात नहीं सुन सकती। वह स्वयं भी उनके लिए अपशब्द नहीं कहती।
बच्चे का जब जन्म होता है तो उसका चेहरा देखते ही वह अपने सारे कष्टों और परेशानियों को भूल जाती है। बस उसकी तिमारदारी में जुट जाती है। उसे पल-पल बढ़ता देखकर खुशी से फूली नहीं समाती। उसकी बाल सुलभ चेष्टाओं पर बलिहारी जाती है। उसमें अपने बचपन को देखती है। उसके भावी जीवन के लिए सदा ही सपने बुनती रहती है। सच्चे मन से उसके दुख में दुखी होती है और उसके सुख में सुखी होती है।
बच्चे के जन्म से लेकर अपनी मृत्यु तक के सारे जीवन में माँ अपने आँचल की छाया में उन्हें उसी प्रकार रखती है, जिस प्रकार एक मादा पक्षी पंख फैलाकर अपने नन्हें बच्चों को सुरक्षा देती है। बच्चा अपने जीवन में कुमार्ग पर न जाने पाए, इसके लिए भरसक प्रयत्न करती है।
घर-परिवार के सदस्य यदि कभी उसे डाँट दें या उसका तिरस्कृत कर देते हैं तो उनके और बच्चे के बीच ढाल बनकर माँ खड़ी हो जाती है। वह हर स्थिति में उसका सुरक्षा कवच होती है। कैसी भी कठिन परिस्थिति हो उससे उसे धैर्यपूर्वक बाहर निकालकर ले आती है।
जीवन में सदा शीतलता देने वाली जन्मदात्री माता के प्रति मनुष्य के भी कुछ कर्त्तव्य हैं जब वह युवा होकर अपने पैरों पर खड़ा होता है। उसका भी अपना एक परिवार होता है। उस समय उसकी माता की आयु भी बढ़ रही होती है।
वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाती हुई, उसकी अशक्त होती हुई माता को अपने बच्चों के मजबूत कन्धों के सहारे की ही आवश्यकता होती है। उस समय अपनी ऐसी माता का ध्यान उसे उसी तरह रखना चाहिए जिस प्रकार वह उसके बाल्यकाल से युवा होने तक रखती रही है।
माता को समुचित मान-सम्मान देने वाले बच्चे समाज में सदा ही सम्मानित किए जाते हैं। ऐसे बच्चों पर घर-परिवार और समाज को सदा गर्व होता है। उनकी सर्वत्र सराहना होती है। यही वे बच्चे हैं जो उदाहरण बनते हैं और युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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