रविवार, 19 अक्टूबर 2014

विजयदशमी

विजयदशमी का पर्व हम सभी ने कल बड़े पारंपरिक तौर-तरीके व उत्साह से मनाया व मिठाई भी खाई। विचार इस प्रश्न पर करना है कि किस हद तक हम इसे मनाने में सफल हुए?
         रावण दहन करके हम आंतरिक प्रसन्नता का अनुभव करते है। पर जो रावण का प्रतीक बुराइयाँ हमारे अंदर डेरा जमाए बैठी हैं उनके बारे में हम सजग हैं या नहीं- यह  चिन्तन का विषय है।
      अभी-अभी नवरात्रों के व्रत संपन्न हुए। यदि हम यह व्रत ले पाएँ कि अपनी एक बुराई को दूर करने का ईमानदारीपूर्वक यत्न करेंगे तभी इन नौ दिनों के व्रतों की सार्थकता है अन्यथा ये मात्र ढकोसला बनकर रह जाएंगे। इसी तरह यदि हम वर्ष अपने अंदर पलने वाली बुराइयों में से केवल एक बुराई का भी अंत कर सकें तो धीरे-धीरे अपने अंत:करण को शुद्ध करने में समर्थ हो सकेंगे।
        मन के शुद्ध होने पर हमें यह दुनिया और भी खूबसूरत लगने लगेगी। ऐसा महसूस होगा कि चारों ओर का वातावरण स्वच्छ व उत्साहवर्धक हो गया है। हम और अधिक स्फूर्ति से जीवन में आगे बढ़ेंगे। इस तरह अपनी सोच में यदि बदलाव हम ला पाएँ तो इस धरा पर हमारा जन्म लेना सार्थक हो जाएगा।
        

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

स्त्री शिक्षा

शिक्षा की समस्या आज हमारे भारत में बहुत ही विकट है। यहाँ अशिक्षा का प्रतिशत अधिक है। उस पर लड़कियों की शिक्षा? बड़े शहरों में भी इस समस्या से हम इन्कार नहीं कर सकते तो फिर छोटे शहरों, गाँवों व कस्बों में स्थितियाँ और भी चौंकाने वाली हैं।
      यहाँ हम नारी शिक्षा की चर्चा करेंगे। लड़कियों को शिक्षित करना इसलिए आवश्यक है कि वे समाज व परिवार की धुरी हैं। उनके पढ़े होने से वे पूरी पीढ़ी को शिक्षित कर सकती हैं।आज भी बहुत से परिवारों में उन्हें शिक्षा से वंचित किया जाता है।
       प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजाराम मोहन राय जैसे महापुरुषों ने स्त्री शिक्षा पर बल दिया।
       वैदिक काल की गार्गी, सुलभा, मैत्रयी, कात्यायनी आदि सुशिक्षित स्त्रियाँ थीं जो ऋषि- मुनिओं की शंकाओं का समाधान करती थी।
      राजा अर्थात् सरकार का कर्त्तव्य है कि वह शिक्षा के लिए सजग हो। देश में कोई भी बच्चा विद्या से रहित न हो। ऋग्वेद ६/४४/१८ का भाष्य करते हुए स्वामी दयानंद लिखते हैं राजा ऐसा यत्न करे जिससे सब बालक और कन्यायें ब्रह्मचर्य से विद्यायुक्त होकर समृधि को प्राप्त हो सत्य, न्याय और धर्म का निरंतर सेवन करें।
       इसी प्रकार यजुर्वेद १०/७ में भी कहा है कि राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए।
      इसके अतिरिक्त विद्वानों से भी ऋग्वेद ३/१/२३ में कहा गया है कि सब कुमार और कुमारियों को पुन्दित बनावे, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों।
      इसी प्रकार विदुषियों के लिए भी ऋग्वेद २/४१/१६ में निर्देश है कि जितनी कुमारी हैं वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करें।
         हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि भारत में स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं  वे अध्ययन-अध्यापन का कार्य करती थीं।
       सारी समस्याओं की जड़ मुगल काल है जहाँ लड़कियों को शिक्षा से वंचित रहने पर विवश कर दिया गया। आज हम परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़कर स्वतंत्रता पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। अब हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम समाज से कुरीतियों को उखाड़ फैंके और प्राचीन गौरव के अनुरूप अपनी बेटियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित न रखें।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

हसीन वादियाँ

चलो चलें इन हसीन वादियों के
सपनों में खो जाने के पल ढूंढ लें
बंद कर लो पलकें अहसास पाने
अपने अंतस् को छोड़ दो गहराने

जहाँ देखो बस देखते ही रह जाओ
प्रकृति का जलवा हर सू ललचाये
फूलों की खूशबू चहूँ ओर महकाये
मन में बस-बस कर मुझे यूँ हरषाये

खुली वादियाँ और दिलकश नजारे
बुलाएँ मुझे हर पल यूँही मुस्कुरायें
पक्षियों का ये कलरव लोरी सुनायें
ठंडी हवाएँ देखो आकर थपथपायें

मेरे शब्द लौट-लौट कर धूम मचाये
पत्तों की ये सरसराहट राग सुनाये
छन-छन कर आती यह धूप सुहाये
नदी झरनों का कलकल मुझे बुलाये

हिलोरे लेता ये पगला मन ललचाये
आ-आके यहाँ प्यार की पींगे बढ़ायें
आओ सखी एक नयी दुनिया बनायें
इन वादियों सा मासूम प्यार लुटायें।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

जीवन की संध्या बेला

जीवन की संध्या बेला अब आई है
साथ ही खुशियों की बारात लाई है
ढोल नगाड़े सब साथ लेकर आई है
सुन रही हूँ शोरगुल सब मद छाई है।

किसीने उसे बताया उदासी छाई है
मत कहो उदासी यहाँ खुशी आई है
यहाँ हर ओर जश्न की ही तैयारी है
उत्सव मनाने की सबकी तैयारी है।

मुझे सबको ही एक बात बतानी है
ध्यान से कान लगा इसे सुनानी है
यह जीवन धूप-छाँव की कहानी है
मत भूलो हमको सबसे पार पानी है

ओ मेरे मीत अब देरी न करानी है
बैठो भी यही जीवन की कहानी है
निराशा छोड़ अब हिम्मत बढ़ानी है
इसे सोच-समझ अमल में लानी है।

अवनि से गहरी

अवनी से गहरी माँ  की छाया
अंबर से ऊँचा पिता का साया
अंगुली थाम चलना सिखलाया
हर धूप-छाँव में मन सहलाया

अपने ऊपर आए जब ज्वाला
फिर उस आँच से सदा बचाया
कब हमने उसका मोल चुकाया
फिर-फिर निश्छल नेह लुटाया

ऐसा निस्वार्थ प्यार बस पाया
होकर बावरा यह मन हरषाया
इसमें है नहीं कछु और समाया
कभी इस दिल को न समझाया

आज वर्षों बीते समझ में आया
उनके जाये पीछे मोल है भाया
जान लेती यह मन था भरमाया
काश किसी ने होता इसे जताया

भूल होती न होता मन मदमाया
अब कैसे मैं पाऊँ उनकी छाया
मनवा पहले क्यों न मुझे चेताया
ढूंढती उनको हूँ ये जग न भाया

तन्हाइयाँ

आज दोपहर में बैठे हुए उन लोगों के विषय में विचार आया जो दुनिया में बिल्कुल अकेले हैं या भरापूरा परिवार होते हुए भी अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं अथवा सामाजिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर निपट अकेले हैं।
         मैं कविता नहीं लिखती परंतु मन में आए इन विचारों को सूत्र में पिरोने से रोक नहीं पाई। इसलिए इस विषय पर लिखे मेरे कुछ उदगार यहाँ लिख रही हूँ। आशा है आप इन्हें पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देंगे।
तन्हाइयाँ
मेरे पीछे-पीछे दबे पाँव अचानक कोई
घर में घुसने की कोशिश में शायद अब
जोर से दरवाजे की साँकल खटका रहा है
समझ नहीं पाई कि कौन हो सकता है?
उफ अब तो उठकर जाना ही होगा मुझे
दरवाज़ा भी खोलना पड़ेगा न चाहते हुए
चलो चलकर देखते हैं कौन है वहाँ पर?
क्यों मुझे वह अधीरता से पुकार रहा है?
उसकी बैचेनी का आखिर कारण क्या है?
उठती हूँ, बाहर जाती हूँ उसे देखने के लिए
सोचती हूँ कौन मेहमान आया है यहाँ
यह क्या, द्वार खोलते ही एक अजनबी
मुझे एकटक निहारती हुई यह कौन है?
अपनी दोनों बाहें फैलाए सामने से आती
मेरी ओर खुले मन से बढ़ती यह कौन है?
मैंने द्वार पर खड़े-खड़े ही उससॆ पूछा
कौन हो तुम? मैं नहीं पहचानती तुम्हें
वह बोली बड़ी जोर से हँसकर मुझे
मैं तेरी सखी हूँ, भूल गई हो क्या मुझे
मैं तो हर पल ही तेरे साथ थी पगली
कुछ दिन तेरे घर की चहल-पहल देख
दूर चली गई थी घूमने-फिरने के लिए
पर अब तो मैं तेरे पास लौट आई हूँ
तुझे थामने, अपने प्यार से बचाने के लिए
मैंने फिर उससे तमतमा कर पूछ लिया
यह बता दो मुझे तुम आखिर हो कौन
वह मुझसे लिपट कर प्यार से बोली
मैं तेरी सखी हूँ तेरी तन्हाई हूँ बावली
तुझ से दूर रहकर मैं जी नहीं सकती
तभी तो तेरे पास आई हूँ अरी सखी
अब किसी साथी के न होने का गम
नहीं सतायेगा तुझे अकेलापन उम्रभर

आसमान के तारे

आसमान के अनगिनत तारों को
देखूँ तो नज़र भर उन प्यारों को
ढूँढती हूँ मैं अपने सब दुलारों को
नहीं मिलता ओरछोर वो मुझको।

सुना था हमसे बिछुड़ कर गए जो
अब तारे आकाश के कहलाते हैं वो
चमचमाती लौ की तरह हैं अब तो
दूर से हम सबको अब भाते हैं वो।

कैसे भूलूँ सभी ही मेरे सहारे थे वो
जीवन के कितने खट्टे-मीठे पल वो
हमने इक साथ बिताए थे कभी जो
नश्तर बन चुभते हैं इस दिल में वो।

सोचती हूँ जाके ढूँढू उन सितारों को
शायद कोई सदियों से निहारता हो
मेरे आने की बाट बेकरार जोहता हो
मुझे निरख पलभर सकूँ पा सके वो।

चलें अब अज्ञात पथ पर तैयार हो
जाने कौन थाम ले मुझे इस पल को
थक गयी हूँ निहारकर रोज तार को
नहीं खोज पायी अपने उस प्यारे को।