माँ के हाथ का स्पर्श बच्चे के लिए रामबाण दवा होता है। बच्चा जब कहीं गिर जाता है या उसे चोट लग जाती है तो माँ उसे सहला देती है तो वह अपनी चोट के दर्द को भूल जाता है। घर में जब अपने से किसी बड़े से डाँट पड़ जाती है तो बच्चा रोते हुए आकर अपनी माँ से शिकायत करता है और तब माँ सब पर गुस्सा करने का उसे आश्वासन देकर बहला देती है।
उसका किसी दोस्त से यदि झगड़ा होता है और वह दुखी होकर घर आता है तब माँ उन दोनों में प्यार से सुलह करवा देती है। स्कूल में टीचर से फटकार लगती है तो बच्चा घर आकर अपनी माँ की गोद में दुबक जाता है। उसे लगता है कि माँ उसे बचा लेगी। माँ उसके सिर पर जब अपना ममता भरा हाथ फेरती है और प्यार करती है तो बच्चा कक्षा में हुए अपने तथाकथित अपमान को भूल जाता है।
अपनी माँ पर हर बच्चा आँख मूँदकर विश्वास कता है और सोचता है कि उसकी माँ उसे हर कष्ट से छुटकारा दिला देगी। इसी सोच से वह प्रसन्न हो जाता है। अपने सारे दुख-दर्द अपनी माँ के साथ साझा करके सब कष्टों अथवा परेशानियों को भूल जाता है और नवीन उत्साह से मस्त होकर नाचने लगता है।
इसे हम 'टच थेरेपी' भी कह सकते हैं। बच्चे को कैसा भी कष्ट हो माँ के स्पर्श मात्र से ही वह सब भूल जाता है। माँ का प्यार से सिर पर हाथ फेरना अथवा गोद में लेकर सहला देना ही उसकी हर मर्ज की दवा बन जाता है।
ईश्वर की कुदरत है कि माँ के साथ उसका सम्बन्ध सबसे अधिक होता है। वह नौ मास तक माता के गर्भ में रहता है और उसी से ही पुष्ट होता है। यह सुरक्षाकवच जन्म के पहले ही माता द्वारा उसे मिलता है। यही कारण है कि वह अपने हर कार्य के लिए अपनी माँ पर ही निर्भर रहता है। अपनी हर छोटी-बड़ी जिद उसी के माध्यम से पूरी करने का यत्न करता है।
ऐसा नहीं है कि घर के अन्य सदस्य उसे प्यार नहीं करते अथवा उसे आश्वस्त नहीं करते। वे उसकी सारी आवश्यकताओं का ध्यान भी रखते हैं। उसके मन को बहलाने के लिए वे माँ की तरह लोरी भी सुनाते हैं और कहानी भी। उसे घुमाते-फिराते भी हैं और उसकी जिद को पूरा करते हैं। इतना सब होने के बाद भी उसे माँ की गोद ही चाहिए होती है।
इसका कारण स्पष्ट है कि माँ का स्पर्श ही उसका सबसे बड़ा सहारा होता है। बच्चे को घर के अन्य सदस्य यदि न दिखें तो वह उनके बारे में पूछताछ करता है उन्हें ढूँढने का प्रयास करता है। परन्तु यदि वह कहीं से खेलकर लौटा है अथवा स्कूल से अपने घर वापिस आया है तो अपनी माँ को सामने न पाकर रोने लगता है। घर में चाहे सभी सदस्य विद्यमान हों पर वह यह कदापि सहन नहीं कर सकता कि उसकी अपनी माँ उसकी आँखों से पलभर के लिए भी ओझल हो जाए।
विद्वानों का मानना है कि बच्चे की कोई गलत आदत छुड़ानी हो या उसे अच्छे संस्कार देने हों तो उसके सो जाने पर यदि माता उसके सिर पर हाथ फेरते हुए गलत आदत छोड़ने या अच्छे संस्कार अपनाने के लिए प्रेरित करे तो बच्चे पर उस क्रिया का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
माँ बच्चे का यह सम्बन्ध बहुत ही भावनात्मक होता है। बच्चा काला-गोरा, दुबला-मोटा अथवा अपाहिज कैसा भी हो वह अपनी माँ के कलेजे का टुकड़ा होता है जिसे वह अपने सीने से लगाकर रखती है। दुनिया भर की मुसीबतें वह अकेले भी सह लेती है पर बच्चे को गर्म हवा तक नहीं लगने देती । बच्चा भी यह जानता-समझता है कि दुनिया में कोई भी उस पर हस ले या उसका मजाक उड़ा ले पर माँ कभी उसका उपहास नहीं करेगी। इसीलिए माँ तो माँ होती है। उसके नेह और छत्रछाया में बच्चे को हर पल आत्मविश्वास मिलता है जिसके सहारे वह कुछ भी कर गुजरता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 23 सितंबर 2015
माँ का स्पर्श
मंगलवार, 22 सितंबर 2015
हम रुचिकार सुनना चाहते
हमें जो रुचिकर लगता है वही हम सुनना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि कोई व्यक्ति हमारी आलोचना करे। इसे हम एक इंसानी कमजोरी कह सकते हैं कि मनुष्य अपने प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति का भी हस्तक्षेप अपने किसी मामले में पसंद नहीं करता।
वह स्वयं चाहे दूसरों पर कितनी ही छींटाकशी क्यों न कर ले, उन्हें भला-बुरा कह ले परन्तु जब उसकी बारी आती है तो वह क्रोधित हो जाता है। वह सोचता है कि फलाँ व्यक्ति की हिम्मत कैसे हुई कि उसका विरोध करे? अपने विरोधियों को वह गाली-गलौज करता है, उन्हें पानी पी-पीकर कोसता है। ऐसा तो कदापि नहीं हो सकता कि जो अच्छा है, मीठा है वह हमारे हिस्से में आएगा और जो कटु है, कड़वा है वह दूसरे के हिस्से में रहेगा। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं- 'बिना आईने के मनुष्य अपना चेहरा नहीं देख सकता।' अर्थात अपनी असलियत जानने के लिए उसे दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है।
हमें तो वही अच्छा लगता है जिसमें हमारी प्रशंसा हो। घर-परिवार में, भाई-बन्धुओं में और समाज में हमारा कोई भी विरोध करने वाला न हो। सभी लोग हमारी प्रशस्ति में कसीदे पढ़ते रहें। हमारे अंदर जो भी बुराइयाँ हैं उन्हें अनदेखा करके सब लोग केवल हमारी अच्छाइयों के प्रशंसक बनें।
इस सबको सोचने में, कल्पना करने में बहुत आनन्द आता है। परन्तु यदि हम इसे वास्तविकता के धरातल पर देख सकें तो यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता।
हम भगवान तो हैं नहीं कि हममें कोई बुराई नहीं होगी। हम इन्सान हैं गलतियाँ करना हमारी आदत है। हम समय-समय पर गलतियाँ करते रहते हैं और फिर बार-बार उसके लिए क्षमा याचना करते हैं। जब हम पूर्ण नहीं हैं तो हमारी आलोचना होना भी स्वाभाविक है। हम इस समस्या से कभी बच नहीं सकते।
ईश्वर जो पूर्ण है उस पर भी अकारण दोषारोपण करने से नहीं चूकते तो फिर दूसरों से यह आशा किस प्रकार रख सकते हैं कि हमारी मूर्खताओं के बावजूद भी वे हमें अपमानित नहीं करेंगे।
अपनी टीका-टिप्पणी होने पर मनुष्य को कभी घबराना नहीं चाहिए। विपरीत परिस्थिति होने पर उसे सदैव डटकर सामना करना चाहिए, अपने आलोचकों को सम्मान देना चाहिए। ये वही लोग हैं जो उसकी कमियों को चुन-चुनकर दूर करने में उसकी सहायता करते हैं। यदि मनुष्य इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखे तो वह अपने अन्दर विद्यमान कमजोरियों को नियन्त्रित करके अपने भावी जीवन को सफल बना सकता है। इन निन्दकों को शुभचिन्तक कहा है-
निन्दक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी-साबुन बिना निर्मल करे सुभाय॥
ये लोग मनुष्य के अंतस के दोषों को दूर करने में सहायक होते हैं। इसलिए इनसे घृणा करने के बजाय उन्हें अपना हितैषी मानना चाहिए।
यदि मनुष्य ऐसा सोच ले तो उसे अपनी निन्दा होने पर दुख नहीं होगा बल्कि उसे उन सब लोगों की तुच्छ मानसिकता के विषय में सोचकर कष्ट होगा जो अपना मूल्यवान समय अनावश्यक ही दूसरों की बुराई करने में बरबाद करते हैं। तब अपनी प्रशंसा सुनकर उसे न तो प्रसन्नता होगी और न ही अपनी निन्दा सुनकर वह कभी विचलित होगा।
अपने प्रति हुए ऐसे व्यवहार पर वह आनन्दित होगा और उससे सदा ही प्रेरणा लेता हुआ नित्य ही उन्नति के शिखर पर पहुँच जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 21 सितंबर 2015
अफवाहों पर ध्यान न दें
सुनी-सुनाई अफवाहों पर हमें ध्यान नहीं देना चाहिए। अफवाहें फैलाने वाले बेसिर-पैर की बातों को उड़ाते रहते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि फैलाई गयी सारी खबरों में सच्चाई हो। कभी-कभी उनकी सत्यता की परख करने पर परिणाम शून्य होता है। उस समय हमारे मन को कष्ट होता है कि काश हमने इन अफवाहों को सुनकर व्यक्ति विशेष के लिए राय न बनाई होती। तब तक सब हाथ से निकल जाता है। हमने जो भी लानत-मलानत करनी होती है वह हम कर चुके होते हैं।
ये अफवाहें हमारे लिए रास्ते का काँटा बन जाती हैं। यदि हम गम्भीरता से विचार करें तो आज इस भौतिकतावादी युग में सब कुछ सम्भव है। लोगों को दूसरों की छिछालेदार करने में अभूतपूर्व सुख मिलता है। उन्हें मिथ्या आत्मतोष मिलता है कि उन्होंने दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोग अपने विरोधियों पर कीचड़ उछाल करके उन्हें अपमानित करने के अवसर से नहीं चूकते। परन्तु ऐसा दुष्कृत्य करने वाले वे भूल जाते हैं कि कल जब उनकी बारी आएगी तो फिर उन्हें कैसा लगेगा?
इन कुत्सित अफवाहों से हम अपना ध्यान थोड़ा हटा करके तर्कशास्त्र की इस उक्ति पर हम विचार करते हैं। तर्कशास्त्र का मानना है- 'यत्र यत्र धूम: तत्र तत्र वह्नि:।' अर्थात जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य होती है। यदि आग जलेगी तो धुआँ भी होगा। वह धुआँ दूर-दूर तक उड़कर जाता है। दूर तक उड़ते हुए उस धुँए के कारण यदि किसी को जलती हुई आग नहीं दिखाई देती तो उसका यह अर्थ हम कदापि नहीं लगा सकते कि कहीं भी आग नहीं जल रही है।
अपने इस सूत्र को सिद्ध करने के लिए तर्कशास्त्र उदाहरण देता है कि एक मोटा-सा देवदत्त नामक व्यक्ति है जो दिन में नहीं खाता। इसका सीधा-सा यही अर्थ निकलता है कि देवदत्त खाना खाता ही नहीं है। अब प्रश्न यह उठता है कि फिर वह जीवित कैसे रहता है?
इस पर तर्क या विवाद करते हुए शास्त्र कहता है कि यदि वह देवदत्त दिन में नहीं खाता तो निश्चित ही रात को खाता होगा। क्योंकि कोई भी व्यक्ति बिना खाए बहुत समय तक जीवित नहीं रह सकता। यदि वह स्वस्थ है तो पक्की बात है कि वह सबसे नजर बचाकर छिपकर खाता है या फिर रात को खाता है। इसे कह सकते हैं तर्क की कसौटी पर परख कर विश्वास करना।
एक बात और मैं आपके सामने रखना चाहती हूँ जिससे आप सभी सहमत होंगे। मीडिया के इस युग में कम्प्यूटर के फोटोशाप के द्वारा किसी भी तरह के चित्र अथवा वीडियो बनाए जाते हैं। इसी प्रकार वायस मिक्सिंग करके आडियो भी बनाए जा रहे हैं। इन सबसे किसी को भी बदनाम किया जा सकता है। इस प्रकार आँखों से देखी और कानों सुनी पर भी विश्वास करना बहुत घातक हो सकता है।
अतः अपनी आँखों से देखी हुई और कानों से सुनी हुई किसी भी बात को आँख मूँदकर मानने से पहले उस पर अच्छी तरह विचार-विमर्श कर लेना चाहिए। उसे अपने विवेक की कसौटी पर कस लेना चाहिए, तभी उसे मानना चाहिए। अन्यथा अनर्थ की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 20 सितंबर 2015
दूसरों का मूल्यांकन
दूसरों का मूल्यांकन करते समय हमें ऐसा प्रतीत होता है कि फलाँ व्यक्ति में तो ऐसी कोई विशेष योग्यता नहीं है जिसकी चर्चा अवश्य करनी चाहिए। इस संसार में कोई भी व्यक्ति दूसरे को योग्य कहकर उसकी प्रतिष्ठा नहीं करना चाहता।
अपने घर की ओर नजर डालिए वहाँ आपका बेटा अथवा बेटी इतने योग्य हो सकते हैं कि दफ्तर में उनके अधीन अनेक कर्मचारी हों। आफिस में उनका अनुशासन इतना अधिक हो कि कोई कर्मचारी गलत काम न कर सकता हो। वह स्वयं भी दिन-रात कार्य करते हुए अपने अधीनस्थों से वैसा ही कार्य करवाते हों जैसा वे चाहते हैं। उनके विरोधी भी उनका लौहा मानने के लिए विवश हों।
ऐसे योग्य बच्चों के माता-पिता को यही लगता है कि उनके बच्चे बेशक बहुत पढ़-लिख गए हैं और बड़े हो गए हैं पर फिर भी अभी नादान हैं, बहुत भोले हैं और उन्हें तो दुनियादारी की बिल्कुल भी समझ नहीं है। अपनी ओर से वे उन्हें अपनी छत्रछाया में संरक्षित करना चाहते हैं। अपने बच्चों के लिए आयुपर्यन्त ही संवेदनशील बने रहना चाहते हैं।
प्राय: पति भी अपनी पत्नी के विषय में सोचते हैं कि उनकी पत्नी तो मूर्ख है उसे क्या समझ है? यह भी हो सकता है यदि वे उसकी योग्यता के विषय में सोचने लगे तो उसे स्वयं ही समझ में आ जाए कि उनकी सोच बहुत गलत थी। उनकी पत्नी में तो बहुत से गुण हैं यानि कि वह मल्टी टेलेंटेड औरत है। वह घर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर सफल है। जितनी कुशलता व लगन से वह अपने दफ्तर के कार्य निपटाती है उसी ही निष्ठा से घर-गृहस्थी व बच्चों के कामों को भी करती है। अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए नित्य अनावश्यक बहाने नहीं बनाती।
प्रायः पत्नियाँ भी अपने पतियों के विषय में इसी प्रकार के नकारात्मक विचार रखती हैं। उन्हें भी ऐसा लगता है उनके पति को कोई समझ नहीं है। न वे घर का कार्य कर पाते हैं और न बाहर के दायित्वों का निर्वहन कर सकते हैं। हाँ, घर पर जितना समय रहते हैं अशान्ति ही फैलाते रहते हैं। इसलिए दोनों एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं और हर समय ही अपने साथी को सहन न कर सकने का रोना रोते रहते हैं।
पति और पत्नी घर में एक-दूसरे को नासमझ मानकर परस्पर दोषारोपण करते रहते हैं। उन दोनों में से कोई भी अपने मन से यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता कि उनका जीवनसाथी किन्हीं विशेष योग्यताओं वाला हो सकता है। जिसके कारण उसका सम्मान उसके अधीनस्थ करते हैं। उससे सम्पर्क में आने वाले उसके काम करने के तरीकों से प्रभावित हो जाते हैं। अपने फील्ड में लोग उसकी कार्यशैली और उसकी पर्सनेलिटी से ईर्ष्या करने के लिए विवश हो जाते हैं।
मित्र, बन्धु-बान्धव, भाई-बहन आदि भी अपने संबंधियों के प्रति सकारात्मक विचार नहीं रखते। उनकी कल्पना से परे की बात होती है कि उनका प्रियजन इतना महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है जो बड़े-से-बड़े चैलेंज जीतकर आज इतना प्रतिष्ठित हो गया है। उससे मिलने के लिए भी समय लेना पड़ता है और प्रतीक्षा करनी होती है।
हमें किसी की भी वेशभूषा अथवा रहन-सहन से उसके प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं पालना चाहिए। उसका मूल्यांकन करते समय सचेत रहना चाहिए। किसी को भी कमतर नहीं समझना चाहिए। दूसरे का मूल्यांकन करते समय उसकी योग्यता और पद आदि को ध्यान में रखना बहुत ही आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 19 सितंबर 2015
बच्चों की तरह मासूम
हम बड़े बच्चों की तरह मासूम बनकर क्यों नहीं रह सकते? यह यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष मुँह बाये खड़ा है जिसका हल हम सबको मिलकर सोचना है। कल्पना कीजिए यदि सभी बड़े लोग सरल व सहज स्वभाव के हो जाएँ तो बहुत सी बुराइयों का अन्त हो जाएगा अथवा वे पनपेंगी ही नहीं।
तब किसी प्रकार के लड़ाई-झगड़े या दंगे-फसाद की नौबत ही नहीं आएगी। यदि पलभर के लिए हम विवाद करेंगे या झगड़ा करेंगे तो अगले ही पल गले में बांहे डालकर घूमते हुए नजर आएँगे। ऐसी स्थिति के विषय में सोचकर मन को बहुत ही सुकून मिलता है। यदि धर्म, जाति, वर्ग एवं वर्ण आदि के पचड़ों में न पड़कर हम अपनी स्वयं की अथवा अपने देश की भलाई के कार्य कर सकें तो देश और समाज का भला हो सकता है।
सरल स्वभाव के होते हुए हम हर प्रकार की धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी, छल-फरेब, मारकाट, जालसाजी आदि से मुक्त हुए समाज की सहज ही कल्पना कर सकते हैं। सबसे बड़ी आतंकवाद की जो समस्या है उससे भी विश्व को राहत की साँस मिल सकती है। हालाँकि यह सोच हम सब के लिए एक बहुत ही आदर्शवादी स्थिति की है जिसकी हम कल्पना मात्र ही कर सकते हैं। इस पर चलना हम कभी भी गंवारा नहीं करते।
जिन बच्चों के लिए बड़े लोग एक-दूसरे से टकराकर दुश्मनी मोल ले लेते हैं वही बच्चे अगले क्षण सिर जोड़कर घूमते हुए नजर आ जाते हैं। इन बच्चों की दुनिया बड़ी अलग तरह की होती है जिसमें सबके लिए प्यार भरा होता है। एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले अथवा हाथ पकड़कर वे घूमते रहते हैं। किसी प्रकार के नफरत की वहाँ पर कोई गुँजाइश नहीं होती।
उन्हें बड़ों की तरह न तो स्टेटस की चिन्ता होती है और न ही वे इंसान-इंसान में फर्क करते हैं। उनके लिए धर्म, जाति, रंग-रूप आदि का अन्तर कोई मायने नहीं रखता। उन्हें तो बस प्यार की भाषा समझ में आती है। जो भी उन्हें प्यार करता है वे बच्चे उसी की अंगुली थामकर चल पड़ते हैं। बच्चों के शब्दकोश में 'अपना-पराया' जैसे कोई भी शब्द नहीं होते। हम बड़े अपने तुच्छ स्वार्थों के कारण ही ऐसा खतरनाक जहर उनके कोमल हृदयों में भर देते हैं जिससे बड़े होते हुए उनके मन भी प्रदूषित होने लग जाते हैं। उनका भोलापन तो हमारी मूर्खता से नष्ट हो जाता है और तब वे हमारे बताए हुए रास्ते से दुनिया की रेस में शामिल हो जाते हैं।
बच्चों की मासूमियत हमें इसी से दिखाई देती है जब वे हर बात को समझने के लिए कब, क्या, क्यों, कैसे आदि प्रश्नों के माध्यम से हल ढूँढते हैं। मासूम से चेहरे पर गोल-गोल आँखे करके बच्चे सहज रूप से अपनी भोलीभाली जिज्ञासाओं को शान्त करने का यत्न करते रहते हैं। बड़ों की डाँट-फटकार की उन्हें कोई परवाह नहीं होती। परेशान हुए बिना अथवा परवाह किए बिना वे बारबार अपने प्रश्नों की झड़ी हर किसी के आगे लगा देते हैं। वे इस बात से बेखबर रहते हैं कि जिनसे उन्होंने पूछा है वे उनके प्रश्न का उत्तर दे भी पाएँगे अथवा नहीं।
यदि हम सब तेरे मेरे वाली इस संकीर्ण मनोवृत्ति से छुटकारा पा सकें तो मानव जीवन सफल हो जाएगा। तब सभी राष्ट्र अपने बहुत से आपसी झगड़ों से मुक्त हो सकेंगे। अनावश्यक सैनिक खर्च में कटौती करके वे उस धन को अपने राष्ट्र की प्रगति करने में व्यय कर सकते हैं। अपने देश को उन्नति के मार्ग पर ले जा सकते हैं। अपने-अपने देशों को खुशहाल बना सकते हैं। इससे भाईचारा तो बढ़ेगा ही और विश्व सबके रहने के लिए एक खूबसूरत स्थान बन जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015
दिन और रात कि क्रम
दिन के बाद रात और रात के बाद दिन यही प्रकृति का नियम है। सृष्टि के आरम्भ से ही ईश्वर ने यह विधान हमारे लिए बनाया है। सूर्य प्रातःकाल होते ही उदय होता है तब दिन होता है। जब चन्द्रमा प्रकट होता है तब रात्रि होती है। संध्या समय होने पर सूर्य अस्त हो जाता है और प्रातः होने पर चन्द्रमा विदा ले लेता है।
सूर्य व चन्द्र के उदित और अस्त होने का यह क्रम निर्बाध रूप से निरन्तर चलता रहता है। इसमें कहीं कोई त्रुटि नहीं होती। न ही उन दोनों को कोई प्रतिदिन कोई काम पर जाने का आदेश देता है और न ही कोई अलार्म उन्हें जगाता है। कभी इन दोनों ने यह नहीं सोचा कि हम प्रतिदिन अपनी ड्यूटी करके थक गए हैं, चलो इंसानों की तरह चार दिन की छुट्टी करके आराम कर लें अथवा देश-विदेश में कहीं भी घूम आएँ या किसी हिल स्टेशन की सैर कर आएँ।
कल्पना कीजिए यदि ऐसी स्थिति कभी आ जाए तब क्या होगा? सूर्य के न होने पर चारों ओर बर्फ का साम्राज्य हो जाएगा। हम गरमी और प्रकाश पाने के लिए छटपटाएँगे। दिन नहीं होगा और चारों ओर अंधकार की चादर बिछी हुई दिखाई देगी। नदियों और नालों का सारा पानी जम जाएगा। हम पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसेंगे। खाने के लिए भी हमें परेशानी हो जाएगी।
इसी प्रकार चन्द्रमा के न होने पर रात नहीं होगी। उसकी शीतलता से हम वञ्चित हो जाएँगे। सूर्य का प्रचण्ड प्रकोप हमें सहना पड़ेगा। इस प्रकार इन दोनों में से किसी एक के भी अवकाश पर चले जाने से सारे मौसमों और सारी ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा जाएगा।
एवंविध सूर्य और चन्द्रमा के न होने की अवस्था में सारी सृष्टि में त्राहि माम वाली परिस्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इसी प्रकार अन्य प्राकृतिक संसाधनों के न होने पर भी स्थिति बिगड़ जाएगी। ईश्वर ने हम मनुष्यों को हर प्रकार का सुख और आराम देने के लिए सारा मायाजाल अथवा आडम्बर रचा है।
हमारे लिए उस मालिक ने दिन और रात बनाए हैं। इसका उद्देश्य यही है कि अपने स्वयं के लिए और घर-परिवार के दायित्वों को पूर्णरूपेण निभाने के लिए दिन भर जीतोड़ परिश्रम करो। जब थककर चूर हो जाओ तब रात हो जाने पर चैन की बाँसुरी बजाते हुए घोड़े बेचकर सो जाओ। अगली प्रातः तरोताजा होकर फिर से अपने काम में जुट जाओ।
मनुष्य सारा दिन हाड़ तोड़ मेहनत करके जब थकहार कर घर आता है तब उसे आराम करने की बहुत आवश्यक होता है। अगर ईश्वर ने रात न बनाई होती तो मनुष्य सो नहीं पाता। नींद न ले पाने के कारण अनिद्रा से परेशान होकर वह अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाता। फिर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए बहुमूल्य समय व धन की बरबादी होती।
सूर्य का उदय होना हमें नवजीवन का संदेश देता है और उसका अस्त होना जीवन के अंतकाल का परिचायक है। सूर्य और चन्द्र दिन और रात के प्रतीक हैं जो हमें समझाते हैं कि जीवन में दुखों एवं कष्टों से पूर्ण रात कितनी भी लम्बी हो उसके बाद प्रकाश आता है। सूरज और चंदा की तरह जीवन में भी दिन और रात की तरह सुख एवं दुख की आँख मिचौली चलती रहती है। इसलिए जीवन में हार न मानते हुए आगे बढ़ो।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015
ताली दोनों हाथों से बजती
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। हम अपने दोनों हाथों का प्रयोग करते हैं तभी ताली बजा सकते हैं। हाँ, एक हाथ से मेज थपथपाकर अपनी सहमति अथवा प्रसन्नता अवश्य ही प्रदर्शित कर सकते हैं।
घर, परिवार अथवा समाज में लोगों के व्यवहार को देखते-परखते हुए ही हम इसका अनुभव कर सकते हैं।भाई-बहन, पति-पत्नी, मित्रों अथवा संबंधियों आदि में यदि मनमुटाव या झगड़ा होता है तब हम एक-दूसरे को दोष देकर अपना-अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं। यदि दोनों पक्षों की बात निष्पक्ष होकर सुन ली जाए तो पता चलता है कि गलती दोनों की होती है।
यह तो हो ही नहीं सकता कि किसी एक की गलती के कारण झगड़ा हो जाए या वैमन्स्य हो। जब तक दोनों पक्ष आपस में न टकराएँ तब तक दुश्मनी की नौबत नहीं आ सकती। इसलिए सावधानी रखनी आवश्यक है।
यदि एक व्यक्ति चुप लगा जाए तो दूसरा कब तक बकझक करेगा। आखिर वह भी यह कहकर चुप हो जाएगा कि यह तो कुछ बोलता नहीं, कौन दीवारों से सिर फोड़े? समस्या तभी बढ़ती है जब दोनों ही बराबर की टक्कर दें। कोई भी व्यक्ति अपने आपको छोटा कहलाना पसंद नहीं करता। इसलिए कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं होता। सब एक-दूसरे को देख लेने की धमकी देते हैं। तभी ऐसी कटु स्थिति बनती है।
इसी प्रकार कार्यक्षेत्र में भी आपसी कटुता के कारण ही बास व कर्मचारियों के बीच मनमुटाव बढ़ता रहता है। इस कारण वहाँ कामबंदी, तालाबंदी अथवा धरने- प्रदर्शनों आदि की नौबत आती है।
रिश्तों में भी अलगाव की स्थिति के लिए भी दोनों ही व्यक्ति जिम्मेदार होते हैं। एक का पक्ष लेकर दूसरे पर दोषारोपण करना अनुचित होता है। सभी समझदार लोगों को जागरूक रहना चाहिए और दूसरों को भी सचेत करना चाहिए।
रिश्तों में यदि झूठे अहम को छोड़कर दोनों थोड़ा-सा गम खा लें तो बिखराव के कारण होने वाली बिनबुलाई समस्याओं से बचा जा सकता है।
यह तो हो सकता है कि किसी एक की गलती दूसरे पर भारी पड़ जाती है। पर कमोबेश स्थिति यही होती है कि दोष दोनों का ही होता है। यह चर्चा हमारे भौतिक संबंधों की है।
प्रकृति को हम दोष देते नहीं थकते कि वह हम पर अत्याचार करती है। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी भूकम्प आ जाते हैं, कभी अतिवृष्टि होती है, कभी अनावृष्टि होती है, बीमारियाँ फैल रही हैं, हमारा पर्यावरण दूषित हो रहा है आदि। परन्तु क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखा है कि इन सारी प्राकृतिक आपदाओं के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने स्वयं ही इन सब मुसीबतों को न्यौता दिया है।
प्रकृति से हम स्वयं छेड़छाड़ करते हैं। हम खुद को बहुत विद्वान मानते हैं। तभी प्राकृतिक संसाधनों का हम आवश्यकता से अधिक दोहन करते हैं। जब हम अपनी इन हरकतों से बाज नहीं आएँगे तो उसका दण्ड कोई दूसरा नहीं हमें स्वयं को ही तो भोगना पड़ेगा। आज तक मुझे यह समझ नहीं आया कि फिर हम इतनी हाय तौबा क्योंकर करते हैं।
प्रयास यही करना चाहिए कि जीवन में छोटी-मोटी कटुताओं को अनदेखा कर दिया जाए। उन्हें अनावश्यक तूल देकर आपसी संबंधों की बलि न चढ़ाई जाए। संबंधों को तोड़ने के लिए ताली को दोनों हाथों से न बजाएँ बल्कि उनमें मधुरता लाने का यथासंभव यत्न करें।
चन्द्र प्रभा सूद
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