हर मनुष्य की अपनी स्वयं की एक परछाई होती है। वह अपनी परछाई के पीछे सदा भागता रहता है जो कभी उसके हाथ नहीं लगती। मनुष्य आगे-आगे चलता जाता है और यह परछाई हमेशा उसके पीछे-पीछे ही चलती रहती है। चाहकर भी वह हाथ बढ़ाकर उसे छू नहीं सकता।
इंसान जब पीछे मुड़ जाती कर इसे देखने का प्रयास करता है तो यह सिमट है और दिखाई नहीं देती। थोड़ी देर के बाद जब वह सीधा चलने लगता है तो यह पुन: उसके पीछे हो जाती है। यह मृगतृष्णा के ही समान उसे छलती रहती है। कोई भी मनुष्य सदा के इसे लिए बाँधकर नहीं रख सकता।
मनुष्य जहाँ भी जाता है उसकी यह परछाई उसके साथ-साथ चलती हुई सी सबको दिखाई देती है। यह प्रकाश में ही दिखाई देती है। प्रात:काल और सायंकाल यह छोटी होती है दोपहर के समय लम्बी। रात के स्याह अंधेरे में यह भी छिप जाती है और तब दिखाई नहीं देती।
यह एक दास की तरह पूर्ण रूपेण हमारा अनुसरण करती है। हम धीरे-धीरे चलते हैं तो यह भी मस्त चाल में चलती है। हम तेज-तेज चलते हैं तो यह भी तेजी दिखाती है और यदि हम भागते हैं तो यह भी भागती हुई दिखाई देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि कैसी भी गति में हम हों हमारे पीछे-पीछे रहती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब मनुष्य दुखों और परेशानियों के अंधेरे काले बादलों से घिर जाता है उस समय इस दुनिया के सभी भौतिक रिश्ते-नाते उसका साथ छोड़ देते हैं यहाँ तक कि उसकी अपनी परछाई भी उससे मुँह मोड़ लेती है।
कहने का तात्पर्य यही है कि रात की कालिमा जैसे भयंकर कष्ट के समय यह परछाई भी बेगानी हो जाती है और मनुष्य से दूर भाग जाती है। जब उसके जीवन से दुख के बादल छटने लगते हैं और मनुष्य को पुन: आशा की एक किरण दिखाई देने लगती है। तब धीरे-धीरे उसके दुखों का अन्त होने लगता है। उसके जीवन में सुखों के साथ-ही-साथ स्थायित्व का प्रकाश भी चमकने लगता है। उस समय यह फिर उसके पीछे हो लेती है और साथ चलने लगती है। यानि यह भी मनुष्य के सुख की साथी है दुख की कदापि नहीं।
यह वही परछाई होती है जो कहने के लिए मनुष्य की अपनी होती है। परन्तु इस पर भी अन्य भौतिक पदार्थों की तरह भरोसा न करने का परामर्श हमारे विद्वान हमें देते हैं।
इस परछाई के विषय में एक और बात जो खास तौर से कही जाती है वह यह है कि जब मृत्यु मनुष्य के सिर पर मंडरा रही होती है उस समय मनुष्य की परछाई दिखनी बंद हो जाती है। अर्थात मनुष्य जीवन के अन्तकाल के पहले ही यह परायों की तरह उसका साथ छोड़ देती है। बस यहीं तक का उसका और मनुष्य का साथ होता है।
भौतिक जगत की शेष अन्य सम्पदाओं की भाँति यह भी केवल इसी संसार में ही साथ निभाती है परलोक में हमारा साथ निभाने नहीं जाती। इस तरह तो उसे हम विश्वसनीय नहीं कह सकते।
मनुष्य को चाहिए कि मृगतृष्णा के समान धोखा देने वाले इन छलावों के प्रपंच से यथासंभव बचकर रहे। इनके जाल में फंसने से जीवन में कष्ट के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। ईश्वर सबके जीवन में भरपूर सुख और शान्ति दे इसी कामना के साथ।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 23 मार्च 2017
परछाई छू नहीं सकते
बुधवार, 22 मार्च 2017
सामर्थ्यानुसार दान
अपने खून-पसीने से कमाए धन में से कुछ अंश अवश्य ही दान देना चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि यथासंभव दान योग्य या सुपात्र को ही दिया जाए। स्वेच्छा से किये गये दान का पता नहीं चल पाता कि अपनी गाढ़ी कमाई से दिया गया दान सुपात्र को मिला या नहीं। यदि किसी कारणवश दान कुपात्र को दिया गया और वह उससे कोई कुकर्म करता है तो कुपात्र से अधिक दोष दानी को लगता है।
इसी बात को पुष्ट करती हुई यह घटना है। कहते हैं कि किसी समय एक राजा प्रतिदिन एक करोड़ गाय दान में देता था। परन्तु दुर्भाग्यवश उसके द्वारा दिए गए दान का दुरूपयोग दान लेने वाले ने किया। फलस्वरूप ऋषियों ने उसे श्राप दिया। जिसके फलस्वरूप उसे अगले जन्म में मनुष्य के स्थान पर गिरगिट की योनी मिली।
मनीषी कहते हैं कि मनुष्य के पास जो भी हो उसे ही दान में देना चाहिए। आवश्यक नहीं कि दान का पुण्य कमाने के लिए व्यक्ति दुष्कर्म करने लग जाए। लूट-खसोट, चोरी-डकैती, हेराफेरी, भ्रष्टाचार, रिश्तखोरी जैसे सामाजिक अपराध के मार्ग पर प्रवृत्त हो जाए। केवल ईमानदारी और सच्चाई से कमाए हुए धन का दान ही फलदायी होता है। ऐसी कमाई का धन जिसके पास जाता है उसे बरकत देता है, उसके बहुत से कार्य सँवरता है।
व्यक्ति के पास यदि प्रभूत धन नहीं होता तो वह इसी चिंता में घुलता रहता है कि दान न दे सकने के कारण उसका यह लोक तो बरबाद हो गया, परलोक भी बिगड़ जाएगा। इससे जीते जी उसका जीवन नरक तुल्य बन जाता है। इसी बात को ध्यान में रखकर एक गरीब आदमी गुरु नानक देव जी के पास गया और उसने उनसे प्रश्न किया - ‘मैं इतना गरीब क्यों हूँ?’
गुरु नानक देव जी ने उससे कहा - ‘तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा।’
उनका उत्तर सुनकर उस आदमी ने कहा - ‘मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है।'
तब गुरु नानक देव जी ने उसे समझते हुए कहा - ‘तुम्हारा चेहरा एक मुस्कान दे सकता है। तुम्हारा मुँह किसी की प्रशंसा कर सकता है या दूसरों को सुकून पहुँचाने के लिए दो मीठे बोल बोल सकता है। तुम्हारे हाथ किसी ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते है और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नही। मनुष्य की आत्मा की गरीबी ही वास्तविक गरीबी होती है।’
धन्य हैं ऐसे महापुरुष और प्रेरक हैं उनकी कही गई बातें। महापुरुषों के उपदेशों का सदैव अनुकरण करना चाहिए। उनकी कही गई महान बातें मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा बदल देते हैं।
इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि मनुष्य को अपने मन की शान्ति के लिए दान अवश्य करना चाहिए। सभी सामाजिक और धार्मिक कार्यों के सम्पादन हेतु धन की आवश्यकता होती है। जब तक सभी लोग सहयोग न करें तो कोई भी कार्य पूर्ण नहीं किया जा सकता। जैसे बूँद-बूँद से गागर भरती है, उसी प्रकार सभी के सम्मिलित प्रयास से यानी दान देने से ही सामाजिक और धार्मिक कार्यों का निष्पादन किया जाता है।
दान भार समझकर नहीं बल्कि अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि दान देते समय पक्षपात नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी माननीय व्यक्ति के दबाव में आकर या किसी का चेहरा देखकर अपनी हैसियत से बढ़कर भी दान नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से मन में एक प्रकार का अपराधबोध होने लगता है और कई आवश्यक खर्चों में अनावश्यक कटौती करनी पड़ जाती है। इसका दुष्परिणाम दूरगामी होता है। अतः दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 21 मार्च 2017
विश्वास बनाए रखें
मनुष्य को अपने जीवन में निश्चिन्त होकर रहना चाहिए। जब मनुष्य बन्धु-बान्धवों पर विश्वास करके कदम आगे बढ़ाता है तो उसे कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिए। एक छोटे बच्चे को जब माता, पिता या अन्य लोग ऊपर उछालते हैं तो उस नन्हें से बच्चे को यह विश्वास होता है कि उसे किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होगी। इसीलिए वह भी मस्ती करता है और खिलखिलाकर हँसता है।
उसी प्रकार उसे यह पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि उसके जीवन की बागडोर उस ईश्वरीय शक्ति के हाथों में सुरक्षित है जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। वह इस संसार के सभी जीवों का भरण-पोषण करता है। उनके पूर्वजन्म कृत कर्मानुसार उन्हें बिनमाँगे फल प्रदान करता रहता है। उसकी ओर से कहीं किसी गलती की गुँजाइश ही नहीं होती।
इस भौतिक संसार में मनुष्य यात्रा करते समय हवाई जहाज में निश्चिन्त होकर बैठता हैं जबकि वह पायलट को जानता तक नहीं है। न ही यात्रा करते समय वह उसकी शक्ल ही देख पाता है। परन्तु फिर भी उसे यह विश्वास होता है कि पायलट योग्य है और वह उचित समय पर, निश्चत गन्तव्य स्थान पर यात्रियों को पहुँचाने में सक्षम होगा।
इसी प्रकार बस में भी सवारी करते समय मनुष्य अनजान बस ड्राइवर को पहचानते भी नहीं हैं। उनके मन में यह पूरा विश्वास होता है कि ड्राइवर अपने कार्य में दक्ष है और सभी यात्रियों को बिना किसी परेशानी के सही सलामत उनके गन्तव्य पर पहुँचाने में सफल हो जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर कैब बुक करते हैं। वहाँ भी अनजान ड्राइवर के साथ प्रसन्नता से अपनी यात्रा पर चल पड़ते हैं।
एवंविध रेल में सैंकड़ों यात्री बेफिक्र होकर यात्रा करते हैं जबकि वे रेलचालक को को पहचनते तक नहीं। वहाँ दिन और रात में कई घण्टों की यात्रा करते हुए भी माथे पर चिन्ता की लकीरें नहीं आतीं। यहाँ भी भाव यही होता है कि यात्रा सुगमता से पूर्ण हो जाएगी। विभिन्न झूलों पर झूलने के लिए बैठते हुए भी मनुष्य को चालक पर पूर्ण विश्वास होता है तभी मनुष्य अपने बच्चों के साथ उस पर बिठाता है।
अतः परस्पर विश्वास ही जीवन का मूल आधार होता है। इसके बिना मनुष्य एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। यदि वह परस्पर विश्वास को खो देगा तो वह निपट अकेला रह जाएगा। यह अकेलापन ही उसके जीवन का अभिशाप बन जाता है जो अपने साथ अनेक समस्याओं को जन्म देता है। इससे घबराकर मनुष्य यदा कदा कुमार्गगामी होकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करने लगता है।
दुनिया पर भरोसा करके मनुष्य स्वयं को और अपनों को उनके भरोसे छोड़ देता है। परन्तु यह समझ नहीं आता कि वह उस परमपिता परमेश्वर को जिसने उसे और उसके अपनों को जीवन दिया है, उस पर विश्वास क्यों नहीं कर सकता? वहाँ उसका विश्वास क्यों डगमगा जाता है? क्या सारे संसार को पोषित करने वाला वह मालिक उसका अहित कैसे कर सकता है?
ये सभी प्रश्न वास्तव में विचारणीय हैं। मनुष्य ईश्वर से जितना विमुख होता जा रहा है, उतना ही अशान्त और परेशान रहता जा रहा है। इसके विपरीत जितना प्रभू के प्रति आस्थावान रहता हे उतना ही उसे मानसिक सन्तोष मिलता है। एक नन्हे बच्चे की तरह उस जगतजननी पर अपने सभी कमों को उसे समर्पित करके हर मनुष्य पूर्णरूपेण निश्चिन्त हो सकता है।
‘वह मालिक जाने और उसका काम जाने’ वाला मनुष्य का भाव उसे हर विपरीत स्थिति से बचाता है। ऐसे मनुष्य को कोई रोग-शोक नहीं सता सकता। वह मनुष्य वास्तव में सौभाग्यशाली होता है जो मालिक पर विश्वास करके स्वयं को उसे सौंपकर आजन्म चैन की बांसुरी बजाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 20 मार्च 2017
जीवन दर्पण
जीवन एक चमकते हुए स्वच्छ दर्पण के समान है, वह अपने सामने खड़े मनुष्य को उसके अपने कर्मों को प्रतिबिम्बित कराता है। जैसा वह अपने भविष्य के लिए बोता है वैसा ही पा लेता हैं। अब यह उस पर निर्भर करता है कि उसकी अपने जीवन से क्या अपेक्षा है? कैसे लोगों की संगति में रहना चाहता है? दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहता है?
यदि वह अपने जीवन में सदा शुभ की कामना करता है तो उसे दूसरों की भलाई के कार्य करने चाहिए। कहते हैं कि लाभ का उल्टा भला होता है। यदि मनुष्य परोपकार के कार्य करता है तो निश्चित ही उसे जीवन में लाभ मिलता है। सर्वत्र उसकी प्रशंसा होती है, उसका साथ देने के लिए बहुत से साथ आगे बढ़ते हैं। इससे उसे आत्मिक बल मिलता है।
इसी प्रकार यदि मनुष्य दूसरे लोगों के हृदयों में अपना स्थान बनाना चाहता है तो उसे जीवमात्र पर दया करनी चाहिए। दया का उल्टा होता है याद। किसी के मन में मनुष्य अपनी यादों को सदा के लिए बसाना चाहता है तो उसे दया का मार्ग अपनाना ही होगा। उसे क्षमाशील बनकर सबके हृदयों पर राज करने से कोई नहीं रोक सकता।
दूसरों को सदा खुशियाँ बाँटते रहना चाहिए। ऐसा करके मनुष्य स्वतः ही सबके प्रेम का भाजन बनता है। यदि सामने वाला प्रसन्न होता है तो वह आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ ही जाती है। इस संसार में यह भी एक प्रकार का लेन देन यानी Give and take का ही व्यापार कहलाता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं -
'इस हाथ दे उस हाथ ले।'
कहने का तात्पर्य मात्र यही है कि मनुष्य जितना दूसरों को देता है, वह कई गुणा होकर उसे वापिस मिलता है। जैसे पृथ्वी बादलों को अपना जल देती है तो बादल उसका कई गुणा अधिक जल वर्षा के रूप में उसे वापिस लौटा देते हैं। वही जल मनुष्य की जीवनी शक्ति बनता है। वही वर्षा का जल उसे अन्न, फल, शाक-सब्जी आदि देता है। उसे सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान करता है। सूर्य की प्रचण्ड गर्मी से राहत देता है।
एक पौधे को मनुष्य रोपित करता है तो वह जीवन पर्यन्त उसके किए गए इस उपकार के बदले उसे फल, छाया, ईंधन आदि देता है। पर्यावरण को शुद्ध करके उसकी सेवा करता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति मनुष्य की सदैव सहायक बनती है, उसकी हर तरह से रक्षा करती है। परन्तु यदि उसके साथ छेड़छाड़ की जाती है तो वह अपने उपकारी स्वभाव को त्यागकर महाप्रलयंकारी रौद्र रूप अपना लेती है। तब उसके प्रकोप से कोई भी बचने में समर्थ नहीं हो सकता।
समाज में रहते हुए दूसरों के साथ किए गए सदव्यवहार और सद्भावना कभी व्यर्थ नहीं जाते। इन्हीं सद्गुणों को अपनाने के कारण मनुष्य चाहे तो सबके हृदयों में सम्राट बनकर एकछत्र राज्य कर सकता है। अन्यथा उसे जमीन पर पटखनी खाने के लिए पलभर का समय भी अधिक हो जाता है।
व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसे अपने जीवनकाल में क्या चाहिए? सबसे पहले उसे स्थिरमति होकर विचार करना चाहिए। तदुपरान्त उसके अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। जैसा व्यवहार उसे अपने लिए अपेक्षित होता है, वैसा ही उसका आचरण अन्यों के लिए भी होना चाहिए। अन्यथा तब उसकी कथनी और करनी के विरोधाभास पर एक बहुत बड़ा-प्रश्नचिह्न लगने की सम्भावना बनी रहती है।
मनुष्य को सदैव हर कार्य को अपने विवेक की कसौटी पर कसकर ही आचरण करना चाहिए। यदि अपने प्रश्न का उत्तर हाँ में मिले तब उस कार्य को शीघ्र ही कार्यरूप में परिणत लेना चाहिए। परन्तु यदि उत्तर न में मिले तो उस कार्य को करने का विचार त्याग देना ही समीचीन होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 19 मार्च 2017
मन के गुलाम
मानव मन उसे बड़े ही नाच नचाता है। यह सदा आगे-ही-आगे भागता रहता है। इसकी गति बहुत तीव्र होती है। मनुष्य देखता ही रह जाता है और यह पलक झपकते ही पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाकर वापिस लौट आता है। इससे पार पाना बहुत ही कठिन होता है। यह चाहे तो मनुष्य को सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है और चाहे तो गर्त में ढकेल सकता है।
हमारा यह मन नित नए मूड पर आधारित रहता है। जिसे भी देखो वह यही कहता सुनाई पड़ता है कि मेरा मूड नहीं है। कभी प्रसन्न तो कभी उदास रहता है। कभी-कभी बच्चों की तरह चहकने लगता है, तब ऐसा लगता है मानो इन्सान के पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे। कभी उदास या मायूस हो जाता है और फिर निराशा के सागर में डूबने-उबरने लगता है। कभी ऐसा उखड़ जाता है कि इन्सान कहने लगता है कि मेरा किसी काम में मन नहीं लग रहा।
ये सब इस मन की अवस्थाएँ हैं जो समय-समय मनुष्य को अपना रंग दिखाती रहती हैं। ईर्ष्या-द्वेष, हर्ष-विषाद, क्रोध-प्यार, आश्चर्य आदि भावनाएँ भी इसी मन में निवास करती हैं। ये भाव उसके चरित्र का एक हिस्सा बन जाते हैं। जिस भी भाव की अधिकता समय पर विशेष होती है, उसी के अनुसार मनुष्य व्यवहार करने लगता है।
मन को मौजी इसीलिए कहते हैं कि यह अपनी ही धुन में रहता है। मानो इसे किसी से कोई लेना-देना ही नहीं हैं। मनीषी कहते हैं-
मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
अर्थात यदि मनुष्य अपने मन की बात मानकर, निराश होकर, थक-हारकर बैठ जाए तो असफलता ही उसके हाथ लगेगी। परन्तु यदि मनुष्य अपने मन की निराशा को दरकिनार करके साहसिक कार्य कर जाता है तो कोई ऐसा कारण नहीं कि वह सफलता की सीढ़ियाँ न चढ़ सके। अब यह निर्णय तो उसका अपना ही होता है कि वह अपने जीवन को किस ओर ले जाना चाहता है।
मन को हम चमत्कारी कह सकते हैं। भाषा की दृष्टि से यदि मन के बाद न शब्द जोड़ दिया जाए तो एक नया शब्द मनन बन जाता है। इसके विपरीत यदि मन से पूर्व न शब्द को जोड़ा जाए तो नया शब्द नमन हो जाता है। मनुष्य यदि अपने जीवन में यथायोग्य प्रणाम अथवा नमन करे और मनन करने का अभ्यास कर ले तो निस्संदेह उसका यह जीवन सार्थक हो जाएगा।
यह मन हमारे शरीर रूपी रथ की लगाम है। इस लगाम को अनुशासन में रखना बहुत आवश्यक होता है। इस पर विवेक या बुद्धि का नियन्त्रण होना चाहिए। यदि लगाम न कसी जाए तो इन्द्रियाँ रूपी घोडे यहाँ वहाँ भागने लगते हैं। यदि वह इसे चलाने में कोताही करेगा तो मानव शरीर में बैठा यात्री आत्मा अपने गन्तव्य यानी मोक्ष तक नहीं पहुँच सकता।
हमारा यह मन आकर्षक और लुभावने रास्तों पर चलकर बड़ा खुश रहता है, उसे शार्टकट भाते हैं। चाहे आगे जाकर उस गलती का कितना ही भयंकर परिणाम क्यों न हो। इस मन का क्या? वह तो अपने बचाव में सौ बहाने गढ़ लेगा और स्वयं को सन्तुष्ट कर लेगा। लेकिन वास्तविकता तो यही है कि भुगतना तो मनुष्य को ही पड़ता है। चारों ओर से प्रश्नों की बौछार को उसे ही सहना होता है।
यह मन भी सच्चाई और ईमानदारी की कठिन डगर पर चलने के लिए मनुष्य को हमेशा हतोत्साहित करता है। हालाँकि यह मार्ग कठिन भी होता है और लम्बा भी होता है पर इस पर चलने से हमेशा शुभ ही होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य को सफलता इसी राह पर चलकर मिलती है।
मन के कहने पर यदि मनुष्य चलने लगें तो अनेकश: परेशानियों का सामना करना पड़ जाता है। इसलिए उन्नति अथवा सफलता की कामना करने वाले लोगों को मन के अनुसार चलने के बजाय अपने तरीके से उसे चलाना चाहिए। उसे यत्नपूर्वक साधकर अपनी मर्जी से चलाना ही श्रेयस्कर होता है। इससे मनुष्य का जीवन भटकाव से बचा रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 17 मार्च 2017
प्रेम की जिज्ञासा
जीवन में प्रेम के विषय में जिज्ञासा की जाए तो मनुष्य के मन मन्दिर के द्वार स्वतः खुल जाते हैं। जिस व्यक्ति ने प्रेम को जान लिया वह आज नहीं कल अपने मन मन्दिर के द्वार पर दस्तक अवश्य देगा। जब प्रेम में अभूतपूर्व आनन्द मिलता है तो प्रार्थना में भी उतना ही रस मिलता है। प्रेम यदि बून्द है या बिन्दु है तो प्रार्थना मनुष्य के लिए सागर के समान होती है।
प्रेम को समझने के लिए न किसी धर्मशास्त्र की आवश्यकता होती है और न ही किसी गुरु धारण करने की आवश्यकता होती है। यह प्रेम ईश्वर का दिया हुआ एक ऐसा वरदान है जिसे वह सृष्टि के सभी जीवों को प्रदान करता है। इस प्रेम के बिना सृष्टि चल ही नहीं सकती। घर-गृहस्थी के मूल में इसकी अहं भूमिका होती है। बच्चे का लालन-पालन भी बिना प्रेम के नहीं हो सकता।
प्रेम से मनुष्य सृष्टि के सभी जीवों को अपने वश में कर सकता है। फिर चाहे वह सबसे खूँखार पशु शेर ही क्यों न हो। वह हाथी जैसा शक्तिशाली जीव भी हो सकता है। इसी प्रकार अन्य जीवों यानी घोड़ा, भैस, गाय, बैल, बकरी, गधा, हाथी, ऊँट, कुत्ता, बिल्ली, साँप आदि सभी जीवों से अपना मनचाहा कार्य करवा लेता है। उन्हें अपना पालतू बना लेता है।
वास्तव में प्रेम दो व्यक्तियों का ऐसा मिलन होता है जहाँ वे अपने अहंकार का त्याग कर देते हैं और मैं से हम बन जाते हैं। यह बात सदा ही स्मरण रखनी चाहिए कि प्रेम की कोई जाति अथवा धर्म नहीं होता। प्रेम गरीब, अमीर, सम्प्रदाय, ऊँच, नीच, काला, गोरा आदि सभी प्रकार के बन्धनों से परे होता है। देश व काल की कोई सीमा इसके मार्ग में बाधक नहीं बन सकती। यह देशातीत व कालातीत होता है।
ऐसे प्रेम प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है जहाँ कोई भी बन्धन इसके लिए पैरों की बेड़ियाँ नहीं बन सका। लाख पहरे बिठा दिए जाने पर भी परवान चढ़ने वाले इस प्रेम को बाँधकर नहीं रखा जा सका। चाहे सारा समाज ही क्यों न शत्रु बन जाए अथवा हुक्का पानी तक बन्द कर दिया जाए, फिर भी इसके ज्वार को रोका नहीं जा सकता।
प्रेम जीवन को प्रशिक्षित करता है और उसे सहिष्णु बनाता है। इसके लिए मनुष्य कुछ भी कर गुजरता है। कुछ लोग प्रेम नहीं करते अपितु हजार उपाय कर लेते हैं। अपने बचाव के लिए लोग स्वार्थवश प्रेम का त्याग करते जा रहे हैं। प्रेम को छोड़कर धन, कुल, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी बातों का विचार किया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रेम ऐसा भयानक सूत्र है जो इस मानव जीवन का सारा ही अर्थशास्त्र बिगाड़कर रख देता है।
मीराबाई अलौकिक प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में अनेक कष्टों का सामना किया। उन्हें विषपान तक करना पड़ा। फिर भी उनका प्रेम घटने के बजाए दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला गया। कोई बन्धन उनके इस प्रेम को रोक नहीं सका।
जीवन में भौतिक वस्तुओं से प्रेम करने के स्थान पर मनुष्य जब परमात्मा से प्रेम करने लगता है तब उसे किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं रह जाती। धीरे-धीरे प्रेम की यह प्रगाढ़ता ही प्रार्थना का रूप ले लेती है। इसके सहारे से मनुष्य ईश्वर को जानने और समझने लग सकता है और फिर उसके रस में डूबकर अलौकिक आनन्द प्राप्त कर सकता है।
जिसने ईश्वर से अपनी लौ लगा ली, उसके लिए दुनिया में कुछ भी जानना शेष नहीं बचता। वह जन्म और मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। फिर जीव चौरासी लाख योनियों के फेर से भी मुक्त होकर मानव जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। तब जीव परम आनन्द का रसास्वादन करता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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