बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

टूटते तारे से विश

हमारे मन में यह अवधारणा घर कर गई है कि जब टूटता हुआ तारा दिखाई दे तो उस समय कोई विश माँग लो अथवा कामना करो तो वह पूरी हो जाती है। कहते हैं कि यह टूटता हुआ तारा है जो सब लोगों की मनोकामना पूर्ण करता है। इसका कारण शायद यही है कि उसे टूटने और अपने भाई-बन्धुओं से बिछुड़ने का दर्द शायद ज्ञात होता है। तभी तो वह सब लोगों को उनके हिस्से की सारी खुशियाँ देना चाहता है।
        कभी हम किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं और कभी निरुद्देश्य भटकते रहते हैं। जिंदगी कि कड़वी सच्चाई हमें तब ज्ञात होती है जब पेड़ों से टूटकर गिरे हुए फूलों ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि दूसरों को खुशबु देने वाले प्रायः कुचल दिए जाते हैं।
        यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि जो निःस्वार्थ महापुरुष दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहते हैं उन्हें स्वामी दयानन्द की तरह विषपान करना पड़ता है और ईसा की तरह सूली पर चढ़ जाना पड़ता है।
         फिर भी ये महानुभाव अपने साथ अत्याचार करने वालों को कोई सजा दिए बिना क्षमा करके अपनी सहृदयता और महानता का परिचय देते हैं।
       यदि कोई नजरअंदाज करता है तो निश्चिन्त रहिए, उसका बुरा मत मानिए। इस संसार में जो भी मूल्यवान लोग होते हैं, उन सब हीरों की कद्र करने की बात यह जनसाधारण नहीं समझ सकता। इसी प्रकार मंहगी वस्तुएँ जो लोगों की पहुँच से बाहर होती हैं, उसे दूर की कौड़ी कहकर वे उन्हें नजरंअदाज कर देते हैं।
       जब अपनी गलती का पता लग जाए उसी समय क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। साथ ही अपने दुष्कमों अथवा दुर्व्यसनों का अविलम्ब त्याग कर देना चाहिए। उसमेँ की गई देर कष्टदायक होती है। इसके पीछे सार यही है कि हम यात्रा करते हुए जितनी अधिक दूर चले जाते हैं, वापिस लौटने में हमें उतना ही अधिक समय लगता है।
        इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं है कि इस संसार में दूसरों पर हँसने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं हँसते रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा कर पाता है तो दुनिया उसके पीछे चलने लगती है। अन्यथा दुखों और परेशानियों के समय हर समय आँसू बहाते रहने वालों के आँसू सूख जाते हैं। फिर उन आँसुओं को मनुष्य की आँखो में भी जगह नहीं मिल पाती। यानि चाहकर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं आते।
         जो भी अपने साथ अच्छा या बुरा हो रहा है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर संतोष कर लेना चाहिए। उसके न्याय पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि उसका न्याय बड़ा ही विचित्र है। वह स्वयं ही दुनिया में संतुलन बनाकर रखता है।
         सयाने कहते हैं कि जब दाँत थे तो थे चबाने के लिए दाने खरीदने की सामर्थ्य नहीं थी और अब जब खाने के लिए दाँत नहीं हैं तो मनुष्य के पास दाने खरीदने की हैसियत हो गई है।
            इसी कड़ी में यह उदाहरण भी ले सकते हैं कि जो व्यक्ति हाड़तोड़ परिश्रम करता है और सौ-सौ किलो अनाज के बोरे उठा लेता हैं, उसके पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं है। इसके विपरीत जो नाजों से, शानो-शौकत में पला-बड़ा है, वह सौ किलो अनाज खरीद सकता है पर उसे उठा नहीं सकता।
        इसलिए कोई कार्य करने से पहले दस बार उसके परिणाम के विषय में सोचना चाहिए। मनुष्य जैसी करनी करेगा, उसका भुगतान उसे करना ही पड़ेगा।
         इसीलिए मनीषी सद् परामर्श देते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन काल में ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु के बाद इन्सान हँसते हुए इस दुनिया से विदा ले और बाकी लोग उसकी अच्छाइयों और सद् गुणों को याद करके रोते रहें।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

शिकायत नहीं

जीवन में जितने कदम भी कोई अपने साथ चले उतना ही उसका आभार मानना चाहिए। अतः किसी से शिकवा-शिकायत नहीं करनी चाहिए। इससे मनुष्य को स्वयं को ही कष्ट होता है। यदि मनुष्य यह सोच ले कि वह भी तो किसी एक का हाथ सारी आयु नहीं थामता बल्कि एक को छोड़कर दूसरों का हाथ थाम लेता है। तब उसके मन में किसी के प्रति विद्वेष की भावना जन्म नहीं लेगी। वह बस यही सोचेगा कि समय और परिस्तिथियों के चलते जीवन के मायने बदल जाते हैं। इसलिए हमारे साथी भी बदलते रहते हैं।
          मनुष्य जीवन में न जाने कितने ही ऐसे पल आते हैं जब उसे किसी के साथ की महती आवश्यकता होती है। उस समय वह प्रयास करके किसी कन्धे का सहारा लेता है। फिर स्वार्थ पूर्ण हो जाने के बाद उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखता। कुछ उद्धरणों से इस पर विचार करेंगे। उससे पूर्व निम्न श्लोक देखते हैं जिसमें किसी कवि ने भी हमारे विचारों को पुष्ट किया है -
यथा हि पथिक: कश्चित् छायामाश्रित्य तिष्ठति
विश्रम्य च पुनर्गच्छेत् तद्वद् भूतसमागम: ॥
अर्थात जिस प्रकार यात्रा करने वाला पथिक कुछ समय के लिए वॄक्ष के नीचे विश्राम करता है। थोड़ा समय आराम करने के बाद वह आगे निकल जाता है। उसी प्रकार मनुष्य को थोडे समय के लिए उस वॄक्ष की तरह लोग छाया देते है और फिर उनका साथ छूट जाता है।
         अर्थात मनुष्य उनका साथ छोड़कर अपने निश्चित किए हुए रास्ते पर चला जाता है। फिर से वह नए सम्बन्ध बनाता है। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। इस तरह अन्य लोगों के साथ सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहते हैं। यह एक शाश्वत सत्य है, जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता।
         हम कहीं घूमने जाते हैं या वापिस घर लौटते हैं तो यातायात के किसी भी साधन यानी रेल, बस, हवाई जहाज, समुद्री जहाज आदि का सहारा लेते हैं। जो सीट हमें अलाट की होती है, उस पर न तो हम किसी को बैठने देते हैं और न ही किसी को वहाँ कोई सामान रखने देते हैं। यदि कोई ऐसा करने का प्रयास करता है तो हमारा उससे झगड़ा हो जाता है। परन्तु जब हमारा गन्तव्य आ जाता है तो हम उठते हैं और सीट छोड़कर ऐसे चल देते हैं कि मानो हमारा कभी उससे वास्ता ही नहीं था। अपने प्रियजनों से मिलने के उत्साह में हम उस सीट की और पीछे मुड़कर भी नहीं देखते। तब हम उससे निस्पृह हो जाते हैं।
         इसी प्रकार किसी होटल में या किसी अपने बन्धु-बान्धव के घर में ठहरते हैं तो अपने कमरे से लगाव होता है। कहीं से भी घूमकर आने के बाद उस तथाकथित अपने कमरे या उस बिस्तर पर बड़ा सुकुन मिलता है। फिर जब हम वहाँ से विदा लेते हैं तो वही अपना कहे जाने वाला कमरा हमारे लिए पराया हो जाता है। उसे बिना किसी मलाल के हम छोड़कर चल देते हैं मानो वे कभी अपने थे ही नहीं।
         वर्षों जिस कार्यालय में मनुष्य कार्य करता है, रिटायरमेंट के बाद वही ऑफिस, वही कमरा, वही सीट और वहाँ के लोग भी पराए लगने लगते हैं। कुछ ही समय पश्चात सब अनजाना-सा हो जाता है। वहाँ जाने पर कुछ अच्छा नहीं लगता। इन भौतिक स्थानों या मनुष्यों के प्रति हमारा यह मोह अथवा सम्बन्ध आवश्यकता के अनुसार होता है।
           उसी प्रकार इस शरीर और अपने कहे जाने वाले बन्धु-बान्धवों से भी हमारा सम्बन्ध तभी तक होता है जब तक यह श्वास चलती रहती है। जब हमारे इस संसार से विदा होने का समय आता है तब मनुष्य निस्पृह होकर आँखे मूँद लेता है। तब ऐसा लगता है कि मानो उसे किसी से कोई लेना देना ही नहीं था। अपना-पराया सब जीते जी की माया है। समय बीत जाने के बाद मनुष्य हाथ झाड़कर सब कुछ छोड़-छाड़कर बिना पीछे देखे चल पड़ता है। इसलिए किसी से कभी शिकायत नहीं करनी चाहिए।
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सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

आत्मिक शान्ति सच्ची शान्ति

आत्मिक शान्ति मनुष्य की जीवनदायिनी शक्ति कहलाती है। जो मनुष्य इस शक्ति को प्राप्त कर लेता है, वह प्रसन्न रहता है व उत्साहित रहता है। यदि मनुष्य का मन प्रसन्न रहेगा तो उसके अन्तस में उत्साह बना रहता है। उस समय वह किसी भी शर्त पर खाली नहीं बैठ सकता। उसके पैर नहीं टिकते और वह कहता हैं मेरा काम करने का मन कर रहा है। तब मनुष्य सचमुच शीघ्रता से अपने सभी कार्यों को निपटा लेता है, फिर भी उसे कोई थकावट नहीं होती और न ही उसके उत्साह में कमी आती है। कभी-कभी ऐसा संयोग भी बनता है कि सब कार्य निपटा लेने के बाद उसे समझ में ही नहीं आता कि अब वह क्या करे?
       इस आध्यात्मिक शान्ति को प्राप्त कैसे किया जाए? यह ज्वलन्त प्रश्न है। यह बाजार में बिकने वाली कोई वस्तु नहीं है कि वहाँ गए और किलो के भाव से खरीदकर ले आए। फिर इस लबादे को ओढ़ लिया जाए और यह समझ लिया जाए कि आध्यात्मिक शान्ति की खोज पूर्ण हो गई। इसे पाने के लिए मनुष्य को अपने मन को यत्नपूर्वक साधना होता है। मन में सात्विक विचारों का होना बहुत आवश्यक होता है। अपने मन को सु-मन बनाना होता है जिसमें हर किसी के लिए स्थान बन सके। मनुष्य को अपने इस चञ्चल मन को कुमार्ग पर जाने से बलपूर्वक रोककर सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करना होता है।
        मनुष्य का मन तब प्रसन्न हो पाता है जब वह अपने पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक कार्यों का प्रतिपादन सुचारू रूप से कर लेता है। अपने दायित्वों को निभाने के कारण उसके मन में एक सन्तुष्टि का भाव आता है। इसके अतिरिक्त अपने मन को परोपकारी कार्यों में लगाने से भी आत्मतुष्टि का भाव भी मनुष्य के मन में आता है। यह सात्विक भाव तभी उसके हृदय में आ सकता है जब वह अपने मन से कुविचारों को दूर कर सके।
       जहाँ मनुष्य अपने दायित्वों के निर्वहण में कोताही बरतता है वहाँ उसका मन अशान्त हो जाता है।उसके मानस में अपराध बोध होता है जो उसे विचलित करता है। ऐसे समय में कुछ लोग आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं, तब उन्हें पलभर भी चैन नहीं मिलता। कभी उन्हें पुलिस का तो कभी कानून का डर सताता है। दिखाने को तो वे अकड़कर चलते हैं पर अन्दर से वे खोखले होते हैं। अपने अपराधबोध से ग्रस्त होकर ऐसे लोग मानसिक यन्त्रणा भोगते हैं। इसका कारण उनका नैतिक आचरण होता है। हम अपने आसपास ऐसा अनुभव कर सकते हैं।
      कहते हैं गलत कार्य यदि सौ परदों में भी छिपकर किया जाए, वह कभी-न-कभी या समय रहते प्रकाश में आ ही जाता है। मनुष्य अपनी शक्ति या पद के बल पर कुछ समय के लिए अपने कुकृत्यों को दबा तो सकता है पर प्रकाशित होने से नहीं रोक सकता। वे तो मनुष्य के न चाहने पर भी मुस्कुराते हुए सबके समक्ष आ खड़े हो जाते हैं। उस समय उसे आत्मग्लानि होती है। तब वह बेतुके तर्क देकर स्वयं को दूसरों की नजर में सन्तुष्ट करने का असफल प्रयास करता है। फिर ऐसा करके वह स्वयं ही दूसरे लोगों की नजरों में हंसी का पात्र बनता है।
        आत्मिक शान्ति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को देश, धर्म सामाज और परिवार के हितार्थ कार्य करने चाहिए, दूसरों की सहायता करनी चाहिए। सभी जीव-जन्तुओं के लिए भी मनुष्य के हृदय में सहृदयता का भाव बना रहना चाहिए। ऐसे परोपकारी कार्यों का निष्पादन करना बहुत आवश्यक होता है। इससे जहाँ मनुष्य का अपना मन शान्त रहता है, वहीं दूसरों के ऊपर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 22 अक्टूबर 2017

धन को सुरक्षित रखें

हाड़ तोड़ मेहनत से कमाई अपनी धन-संपत्ति को ध्यान से संभालें। सुनने में बहुत अटपटा लग सकता है। सच्ताई यही है जो वास्तविकता से दूर नहीं है। हम सब अपनी धन-दौलत को यथासम्भव दुनिया से बचाने का यत्न करते हैं। इसके लिए टैक्स तक में चोरी करते हैं।
          आप सोचेंगे ओर कहेंगे मेहनत से कमाई हुई धन-सम्पत्ति को क्या हम बरबाद करते हैं? यह क्या बात हुई? धन-सम्पत्ति को तो सम्हालकर सभी रखते हैं। हम भी इस कार्य में पीछे नहीं हैं। सदा उसे सबकी नजरों से छुपाकर रखते हैं। किसी की नजर उस न पड़े, हर समय चौक्कने रहते हैं। अपने पैसे को हमने बैंक में सुरक्षित रखा हुआ है। दिन-प्रतिदिन वह बढ़ता रहे, इसलिए फ्किस डिपाजिट करवाया है। शेयर आदि में लगया हुआ है। फिर यह बात कहाँ से उठ खड़ी हो गई?
          कहने का अर्थ यही है कि हर मनुष्य अपने धन को सुरक्षित करने के लिए तरह-तरह के उपाय करता है। सारा जीवन पाई-पाई करके उसका संग्रह करता है, उसे दाँतों से पकड़कर रखता है। उस समय उसे अपने जीवन की धूप-छाँव के लिए पैसे बचाने की फिक्र रहती है। वह इन सबके लिए परिश्रम पूर्वक बचत करता है।
         समय बीतते जब वह वृद्धावस्था की ओर कदम बढ़ाता है, उस समय वह भूल जाता है कि उसे अपने बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए उपाय करने हैं। सारा जीवन जिस धन को बचाने में लगा दिया, वही धन यदि बुढ़ापे में उसके किसी काम नहीं आ पाता तो यह उसका दुर्भाग्य होता है।
      सब कुछ होते हुए भी यदि वह दरबदर की ठोकरें खाने के लिए लाचार हो जाए अथवा उसे ओल्ड होम की शरण में जाना पड़े तो उस मनुष्य से बड़ा दुर्भाग्यशाली और कोई नहीं हो सकता। तब उस बचाए गए धन को कोसने का का कोई लाभ नहीं होता। जिनके कारण उसकी यह दुर्गति हुई, उन्हें भी लानत-मलानत करने का कोई औचित्य नहीं रहता।
           वृद्धावस्था तक आते-आते शरीर अशक्त हो जाता है, उस समय हर मनुष्य को सहारे की आवश्यकता होती है। यदि अपने घर और अपने बच्चों का सहारा उसे मिल जाए तो वह बहुत ही सौभाग्यशाली इन्सान होता है।
         आज स्थितियाँ बहुत विपरीत होती जा रही हैं। सभी पर स्वार्थ हावी होता जा रहा है। स्वार्थ में डूबे बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति तो पाना चाहते हैं पर उनकी देखभाल नहीं करना चाहते। वे उनकी जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते।
          बहुत से ऐसे बच्चे आज दिखाई देते हैं जिन्होंने धोखे से साइन करवाकर मकान, दुकान या फेक्टरी अपने नाम करवाकर अपने माता-पिता को मोहताज बना दिया। कभी-कभी माता-पिता स्वयं सन्तान के मोह में आकर अपनी सारी जमा -पूँजी उन्हें थमा देते हैं।
          जब तक माता-पिता का सब कुछ हथिया नहीं लेते तब तक वे श्रवण कुमार की तरह आज्ञाकारी होने का ढोंग करते हैं। सब पा लेने के बाद दो जून रोटी के लिए भी उन्हें तरसाते हैं। उनकी जरूरतों से ज्यादा अपनी जरूरतें उन बच्चों को दिखने लगती हैं। ऐसी स्थिति में उनके स्वास्थ्य की चिन्ता वे नालायक बच्चे क्योंकर करने लगे।
         पाँचों अगुलियाँ जिस प्रकार बराबर नहीं होतीं, उसी प्रकार सभी बच्चों को एक लाठी से हाँकना ठीक नहीं। इतनी बुराई समाज में आ जाने के बाद भी माता-पिता की चिन्ता करने वाले बच्चो की संख्या बहुत है।
         बच्चे चाहे आज्ञाकारी हों अथवा नालायक, मनुष्य को अपने लिए अवश्य ही धन बचाकर रखना चाहिए। जब तक जीवन है तब तक अपना सब कुछ बच्चों को सौंपना नहीं चाहिए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आपके बहुत-सी धन-दौलत है और बच्चों के सचमुच के कठिन समय में आप उनकी सहायता करने से इन्कार कर दें।
         आपकी मृत्यु के पश्चात आपका सब कुछ बच्चों का है। जीते-जी अपने हाथ से उनके जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि के मौके पर उन्हें भेंट के रूप में अवश्य देते रहें। समय रहते अपनी वसीयत भी बना लें ताकि दोनों में से जो पीछे बचे उसे कठिनाई का सामना न करना पड़े।
       इसलिए मैंने आप सभी को आगाह करते हुए कहा है कि अपनी धन-सम्पत्ति को बचाइए, उस पर साँप की तरह कुण्डली मारकर भी मत बैठिए और अनावश्यक प्रदर्शन करते हुए उसे बरबाद भी मत करिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

संसार से विदा करना

अपने किसी प्रियजन को जब इस असार संसार से विदा करना पड़ता है तब मन उस अकथनीय पीड़ा से विदीर्ण होने लगता है। यह दुख सहन करना बहुत ही कठिन होता है। जैसे किसी भी कारण से शाखा से टूटा हुआ फूल वापिस उसी टहनी पर नहीं लगाया जा सकता, उसी प्रकार इस दुनिया से विदा हुए मनुष्य को पुनः लौटाकर उसी रूप में वापिस नहीं लाया जा सकता।
       पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार जितना भी समय जीव को वर्तमान जीवन में ईश्वर की ओर से मिलता है, उसे भोगने के पश्चात मनुष्य को एक पल की भी मोहलत नहीं मिल पाती। अपनी सारी धन-सम्पत्ति और भौतिक रिश्ते-नातों को इसी धरा पर छोड़कर उसे खाली हाथ परलोक गमन करना पड़ता है।
       संसार मे ऐसा कोई भी एक घर नहीं मिलेगा जहाँ से आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। यदि ऐसा हो पाता तो सभी राजा-महाराजा, महापुरुष और शक्तिशाली लोग तो सृष्टि के आदि से आज तक जीवित होते। तब इस धरती पर तिल रखने जितनी जगह भी हमें न मिल पाती। इस मरणधर्मा संसार में किसी भी जीव के स्थायित्व की कल्पना कर लेना नितान्त असम्भव है।
        एक कथा स्मरण हो रही है। बहुत लोगों ने इसे पढ़ा और सुना होगा। अनेक महात्माओं के साथ जोड़कर यह कथा समझाने के लिए सुनाई जाती है। एक स्त्री के इकलौते बेटे की मृत्यु हो गई। वह बहुत दुखी थी और रो-रोकर उसका बहुत बुरा हाल था। फिर कुछ सोचकर और निर्णय करके अपने गाँव में पधारे हुए सन्त के पास अपने बच्चे के शव को लेकर गई।
       महात्मा जी के पास जाकर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने बेटे के शव को उनके चरणों में रख दिया। उनसे बार-बार आग्रह करने लगी कि उसके जीवन के एकमात्र सहारे उसके बेटे को वे जीवित कर दें। सन्त ने कहा - "जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे जीवित करना किसी के वश की बात नहीं है।

        यह सच है कि ईश्वर के इस न्याय को कोई भी नहीं बदल सकता। परन्तु वह स्त्री हठ ठानकर बैठ गई कि उसे उसका बेटा जीवित चाहिए। उसने कहा कि सन्त-महात्मा चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं। महात्मा के लाख समझाने पर भी वह न मानी।
        अन्त में महात्मा ने उस स्त्री से कहा- "ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आओ, जिस घर में किसी की मौत न हुई हो। तभी मैं तुम्हारे बेटे को जीवित करूँगा।"
        वह स्त्री महात्मा जी के कहने के अनुसार एक मुट्ठी चावाल लेने गाँव में चली गई। वह आश्वस्त हो गई थी कि अब उसका बेटा अवश्य जीवित हो जाएगा। वह अपने सारे गाँव का चक्कर लगाकर आ गई। पर यह क्या, उसे ऐसा कोई भी घर वहाँ नहीं मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो।
       तब उसे समझ में आ गया कि कुदरत के फैसले को बदला नहीं जा सकता। यह तो सृष्टि का नियम है कि जो इस संसार में आया है उसे यहाँ से विदा लेनी ही पड़ती है। लौटकर उसने महात्मा जी के चरण पकड़ लिए और अपने किए पर पश्चाताप करने लगी।
        यह कथा मनुष्य को मात्र यही शिक्षा देती है कि इस संसार में ईश्वरीय नियम अटल हैं। उन्हें बदलने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मनुष्य तो बस भोक्ता मात्र है। वह अपने पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिए इस संसार में आता है। सभी रिश्ते-नाते, भाई-बन्धु उसे जीवन यात्रा पूर्ण करने के लिए मिलते हैं। वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है अथवा उनकी कितनी सहायता लेता है, उस पर निर्भर करता है।
         हमारा प्रिय-से-प्रिय जन भी एक-न-एक दिन अपना हाथ छुड़ाकर हमें रोता-बिलखता छोड़कर परलोक की यात्रा के लिए अकेला ही चला जाता है। हालाँकि अपने प्रियजनों का वियोग सहन कर पाना इतना सहज नहीं होता परन्तु कोई और चारा भी तो नहीं होता। ईश्वर के इस न्याय के आगे सिर झुका देना ही समझदारी है। उस परम न्यायकारी परमात्मा को कोसने या गाली देने से उसका न्याय नहीं बदल सकता। हमें अपनी मानसिकता को ही बदलना पड़ता है।
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शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

दीपक तले अंधेरा

'दीपक तले अंधेरा' हमारे सयानों ने सोच-समझकर ही यह वाक्य कहा है। दीपक जब जलता है तो चारों ओर उसका प्रकाश फैलाता है परन्तु जिस स्थान पर वह रखा जाता है यानि उसके ठीक अपने ही नीचे प्रकाश नहीं पहुँच पाता। उस स्थान पर अंधेरा ही रहता है।
          इस वाक्य के पीछे के छुपे मर्म को समझना बहुत आवश्यक है। यह वाक्य हमें सोचने के लिए विवश कर देता है कि ऐसा कहने के पीछे हमारे विद्वानों की क्या सोच रही होगी? उनके समक्ष ऐसा क्या घटित हुआ होगा जिसके कारण उन्होंने अपनी ऐसी राय बनाई होगी?
         इस विषय पर बहुत विचार करने के बाद मैंने यही निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य अपने कुटुम्बी जनों के लिए जैसे जीवन की परिकल्पना करता है अथवा जैसा समाज को बनाना चाहता है शायद अपनों को उस साँचे के अनुरूप ढाल पाने में उसे सफलता हाथ नहीं लग पाती।
         बहुत बार ऐसा भी देखा गया है कि समाज सुधार करने वालों के अपने बच्चे राह भटककर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। इसका कारण है कि वे अधिक समय तक घर से बाहर के झमेलों को सुलझाने में लगे रहते हैं। उन्हें निपटाने में इतना व्यस्त रहते हैं कि घर और बच्चों का उन्हें होश ही नहीं रहता।
           अपने घर-परिवार और बच्चों को वे उतना समय नहीं दे पाते जितना उनके लिए आवश्यक होता है। घर में थोड़ा-सा समय रहकर अपने स्वयं के बच्चों को संस्कारित करने का ख्याल ही उनके मन से शायद निकल जाता है। अथवा वे ऐसा ही मानकर चलते हैं कि उनके घर के सदस्य तो कोई गलत कार्य कर नहीं सकते।
          माता-पिता यदि बच्चों को अपने पास बिठाकर संस्कारित नहीं कर पाएँगे तो उनका भटकना तो स्वाभाविक ही है। परन्तु यदि उन पर सस्कारों का अंकुश ही नहीं रहेगा तो वे अपनी मनमानी निश्शंक या निडर होकर करते रहेंगे। मनमानी करते हुए वे कहाँ तक पहुँच जाएँगे इस विषय में कोई कुछ भी नहीं कहने में समर्थ नहीं है।
        इतिहास के पन्ने खंगालने पर हमें इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जहाँ महान साम्रज्यों को उनके उत्तराधिकारियों द्वारा बरबाद कर दिया गया।
         आज भी समाचार पत्रों अथवा टीवी चैनलों में सुर्खियाँ बटोरते हुए उदाहरणों की कमी नहीं है जहाँ बड़े-बड़े पदों पर विराजमान और न्यायालय में न्याय करने वालों के बच्चे कार चोरी जैसी वारदातों को अंजाम देते हैं या अन्य कुकर्म करते हुए पकड़े जाते हैं। शिक्षाविदों  के बच्चे किसी भी कारण से पढ़ने से वंचित रह जाते हैं।
        इसी प्रकार अहिंसा का पाठ पढ़ाने वालों के बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के हो जाते हैं। समाजसेवियों के घरों के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने बन जाते हैं। दूसरों को धर्म का उपदेश देने वालों के यहाँ भी अधर्मी जन्म ले लेते हैं। देशभक्तों की सन्तानें देशद्रोही हो सकती हैं। ईमानदार लोगों के उत्तराधिकारी समय के साथ बहते हुए भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर और दूसरों का गला काटने वाले बन जाते हैं।
       समाज को प्रकाशित करने में जुटे लोग यदि अपने घर-परिवार में इच्छित सुधार  कर लें तब लिए 'दीपक तले अंधेरे' वाली यह उक्ति उनके लिए अनुपयोगी सिद्ध हो सकती है अन्यथा दीपक तले अंधेरा तो वास्तव में होता ही है इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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