ईश्वर के साथ जब मनुष्य सम्पर्क साधने या उसके करीब जाने का प्रयास करने लगता है तो उसे आत्मिक बल मिलता है। इससे उसे ईश्वर और उसकी सत्ता पर विश्वास होने लगता है। उसे यह महसूस होने लगता है कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वह हमारे भले लिए कर रहा है। है। वह हमें हमारे कर्मों को भोगकर उनसे मुक्त होने का अवसर दे रहा है। वह अपने सभी कर्म ईश्वर को समर्पित करने लगता है। उस समय वह दुखों और परेशानियों को सहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।
इसके विपरीत मनुष्य उस परमपिता से जितना दूर जाने लगता है, मालिक से उसका सम्पर्क टूटने लगता है। वह उससे दूरी बनाकर रखता है। जब उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार फल भोगने के समय आता है तो वह उस मालिक को कोसता है, लानत-मलानत करता है। यह नहीं सोचता कि उसने ऐसे अशुभ कर्म किसी जन्म में किए होंगे तभी वह कष्ट पा रहा है। वह बस यही कहता रहता है कि पता नहीं ईश्वर मुझसे किस जन्म का बदला ले रहा है। मेरे साथ उसकी क्या शत्रुता है?
इस भौतिक जीवन में मनुष्य जितना अपने बन्धु-बान्धवों के सम्पर्क में रहता है उतना ही वह प्रसन्न रहता है। वे भी उसके सुख-दुख में शामिल होते हैं। उसके साथ कन्धा मिलाकर चलते हैं। मनुष्य इस कारण प्रसन्न रहता है कि उसके हितैषी सदा उसके साथ हैं। इसलिए उसके मन में उत्साह बना रहता है। उसे यही लगता है कि जीवन में कभी कोई परेशानी आएगी तो मेरे प्रियजन मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। उनके रहते कभी वह अकेला नहीं हो सकता।
इसके विपरीत जो लोग अपने झूठे अहं के नशे में रहते हैं, वे धीरे-धीरे बन्धु-बान्धवों को अपने कठोर या दुर्व्यवहार से दूर कर देते हैं। सुख के समय तो कोई हो या न हो, इतना अन्तर नहीं पड़ता। परन्तु जब दुख या कष्ट का समय आता है, तब वे सबको कोसते हैं कि उनका कोई भी साथी साथ निभाने के लिए नहीं आया। किसी से सम्पर्क रखा जाएगा तो कोई साथ खड़ा होगा अन्यथा किसी को शौक नहीं होता दूसरे के फटे में टाँग अड़ाने का। दूसरों के साथ मिलकर रहो, उन्हें अपना बनाओ तो वे सहारा बनते हैं।
एक बोधकथा कहीं पढ़ी थी, उस पर आज एक नजर डालते हैं। किसी पुजारी और नाई दोनों में मित्रता थी। नाई हमेशा पुजारी से कहता था- "ईश्वर ऐसा क्यों करता है, वैसा क्यों करता है? यहाँ बाढ़ आ गई, वहाँ सूखा पड़ गया, यहाँ एक्सीडेंट हुआ, वहाँ भुखमरी हो रही है, नौकरी नहीं मिल रहीं। हमेशा लोगों को ऐसी बहुत सारी परेशानियाँ देता रहता है।"
उसके प्रश्नों से उकताकर एक दिन उस पुजारी ने उसे एक भिखारी से मिलवाया। उसके बाल और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। उसने नाई से कहा- "देखो इस इन्सान के बाल बढ़े हुए हैं, दाढ़ी भी बढ़ी हुई है। तुम्हारे होते हुए ऐसा क्यों हो गया है?"
नाई बोला- "अरे! इसने मेरे से सम्पर्क ही नहीं किया।"
पुजारी ने उसे समझाया- "यही तो बात है, जो लोग ईश्वर से सम्पर्क करते हैं उनका दुःख खत्म हो जाता है। लोग सम्पर्क ही नहीं करते और कहते हैं वे दुःखी है। जो सम्पर्क करेगा वही तो दुःख से मुक्त होगा।"
इस बोधकथा से यही समझ आता है कि ईश्वर पर दोषारोपण करने का कोई लाभ नहीं होता। जितना मनुष्य ईश्वर के साथ अपना सम्पर्क साधता है, उतना ही वह अपने जीवन सुखी रहता है। वही उसे इस संसार सागर से पार उतरता है। शर्त बस यही है कि उस पर विश्वास करो और जीवन में आनन्द का भोग करो। उसके साथ स्वयं को जोड़ने से या ईश्वरमय हो जाने से मनुष्य या साधक अपने मन के कलुषयों को दूर करके उसका प्रिय बन जाता है।
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले अपने मन को साधना पड़ता है। ईश्वर हमारे हृदयों में रहता है पर हम मनुष्य अपनी मूर्खताओं के कारण उसे देख और समझ नहीं पाते। अपने मन को शुद्ध और पवित्र बनाना होता है तभी प्रभु का निवास मानव हृदय में होता है। उसे हम अपने अंगसंग अनुभव कर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 24 जून 2018
ईश्वर से सम्पर्क
शनिवार, 23 जून 2018
कर्मों का भुगतान
किए गए कर्मों का हिसाब प्रत्येक मनुष्य को इसी दुनिया में चुकाना पड़ता है। किसी भी कारण से लिया कर्जा चुकाने की इच्छा मनुष्य में होनी चाहिए। किसी की धन-सम्पत्ति को धोखे से हथिया लेना अथवा हड़प कर जाना उस समय बहुत अच्छा लगता है। परन्तु जब उसका फल भोगने के समय आता है तो परिणाम बहुत ही कष्टदायी होता है। इस दुनिया में मनुष्य इसलिए जन्म लेते हैं क्योंकि उन्हें अपने पूर्व जन्म के अनुसार किसी से कुछ लेना होता है या फिर किसी को कुछ देना होता है। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ-न-कुछ लेने अथवा देने के हिसाब चुकता करने के लिए ही इस जन्म में बन्धु-बान्धव मिलते हैं। इसमें उसकी किसी सम्मति की आवश्यकता नहीं होती।
इस लेनदेन के अनुसार ही इस संसार में रिश्ते मिलते हैं। यह ईश्वर का न्याय है, जिसे समझना हम मनुष्यों की बुद्धि से परे की बात है। इसके अनुसार कोई बेटा बनकर आता है तो कोई बेटी बनकर आती है। कोई पिता बनकर आता है तो कोई माँ बनकर आती है। कोई पति बनकर आता है तो कोई पत्नी बनकर आती है। कोई प्रेमी बनकर आता है तो कोई प्रेमिका बनकर आती है। कोई मित्र बनकर आता है तो कोई शत्रु के रूप में आता है। कोई पड़ोसी बनकर आता है तो कोई रिश्तेदार बनकर आता है। यह ईश्वर का नियम है कि दुःख हो या सुख सबका हिसाब देना ही पड़ता हैं।
इन सबके बीच सम्बन्ध केवल पूर्वजन्म के लेनदेन का भुगतान करने तक का होता है। जब उनके बीच के लेनदेन का हिसाब चुकता हो जाता है तब उनका वियोग हो जाता है यानी वह व्यक्ति विशेष इस दुनिया से विदा हो जाता हैं। उसका वियोग किस आयु में हुआ है, यह मायने नहीं रखता। सार यही है कि उसका हिसाब पूरा हो गया और वह छोड़कर चला गया। उस प्रिय जन के चले जाने पर बन्धु-बान्धव उसे याद करके रोते हैं और व्यथित होते हैं।
एक बोधकथा देखते हैं। एक सेठ जी बहुत ही दयालु थे। धर्म-कर्म में विश्वास करते थे। उनके पास जो भी व्यक्ति उधार माँगने आता वे उसे मना नहीं करते थे। वे मुनीम को बुलाते और जो उधार माँगने वाले व्यक्ति से पूछते- "भाई! तुम उधार कब लौटाओगे? इस जन्म में या फिर अगले जन्म में?"
जो लोग ईमानदार होते वो कहते - "सेठ जी हम तो इसी जन्म में आपका कर्ज चुकता कर देंगे।"
परन्तु कुछ लोग जो ज्यादा चालक व बेईमान होते वे कहते -"सेठ जी! हम आपका कर्ज़ अगले जन्म में उतारेंगे।"
वे अपनी चालाकी पर वे मन ही मन खुश होते। अगले जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है। ऐसे लोग मुनीम से पहले ही कह देते कि वो अपना कर्ज अगले जन्म में लौटाएँगे और मुनीम कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था। जो जैसा कह देता मुनीम वैसा ही बही में लिख लेता।
एक दिन एक चोर भी सेठ जी के पास उधार माँगने पहुँचा। उसे मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के लिए रकम उधार दे देता है। हालांकि उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना था। चोर ने सेठ से कुछ रुपये उधार माँगे, सेठ ने मुनीम को बुलाकर उधार देने को कहा। मुनीम ने चोर से भी वही पूछा और बही में अगले जन्म की बात लिख दी।
मुनीम ने तिजोरी खोलकर पैसे उसे दे दिए। चोर ने भी तिजोरी देख ली और तय किया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी आज रात में उड़ा दूँगा। वह रात में ही सेठ के घर पहुँच गया और भैंसों के तबेले में छिपकर सेठ के सोने का इन्तजार करने लगा। अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं। वह चोर भैंसों की भाषा ठीक से समझ पा रहा है । एक भैंस ने दूसरी से पूछा - "तुम तो आज ही आई हो न, बहन !"
उस भैंस ने जवाब दिया - “हाँ, आज ही सेठ के तबेले में आई हूँ, सेठ जी का पिछले जन्म का कर्ज उतारना है और तुम कब से यहाँ हो ?”
उस भैंस ने पलटकर पूछा तो पहले वाली भैंस ने बताया - "मुझे तो तीन साल हो गए हैं, बहन! मैंने सेठ जी से कर्ज लिया था यह कहकर कि अगले जन्म में लौटाऊँगी ।
सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले में चली आयी। अब दूध देकर उसका कर्ज उतार रही हूँ। जब तक कर्ज की रकम पूरी नहीं हो जाती तब तक यहीं रहना होगा ।”
चोर ने जब उन भैंसों की बातें सुनी तो उसके होश उड़ गए। उसे समझ आ गया कि उधार हर हाल में चुकाना ही पड़ता है, चाहे इस जन्म में चुकाओ या फिर अगले जन्म में। वह उल्टे पाँव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज उसने लिया था उसे मुनीम को लौटाकर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया ।
इस बोधकथा का सार यही है जो धन किसी से उधार लिया है, छीना है, धोखे से हथियाया है, उसका भुगतान तो करना ही पड़ता है। बैंक से लिए लोन की तरह कई गुना अधिक ब्याज के साथ लौटाना पड़ेगा। जितना समय अधिक बीतता जाएगा, उसी अनुपात में वह बढ़ता जाएगा। इसलिए अपने मन को बेईमानी करने से रोकना चाहिए ताकि अगले जन्म में कष्ट न भोगना पड़े। उस समय ईश्वर को उलाहना न देना पड़े कि किस जन्म की सजा दे रहा है
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 22 जून 2018
कौन अपना कौन पराया
इस संसार में कौन अपना है और कौन पराया है? इसका सहज अनुमान लगाया जा सकना बहुत ही कठिन है। इस सत्य को रिश्ते नहीं तय करते बल्कि समय और परिस्थितियाँ तय करती हैं। मोटामोटी समझें तो अपना वही है जो हमारे विषय में सोचे, हमारी चिन्ता करे। हमारे दुख में दुखी हो और सुख में सुखी हो। जिसके पास न रहते हुए भी उसकी मौजूदगी का हर पल अहसास हो। उसका व्यवहार, उसका मन से जुड़ाव ही उसे करीबी बना देता है। इस दुनिया में करोड़ों लोग बसते हैं पर हर कोई अपना नहीं बन जाता। किसी का अपना बनने या बनाने के लिए उस व्यक्ति विशेष को उसकी अच्छाइयों एवं कमियों के साथ ही पूर्णरूपेण अपनाना पड़ता है।
हितचिन्तक ऐसा हो सकता है जिससे हमारा रक्त का सम्बन्ध न भी हो। पराया होकर भी वह अपना अभिन्न बन जाता है। इसका कारण है कि उसके साथ सम्बन्ध स्वार्थ न होकर मन से जुड़ाव होना होता है। दोनों का निश्छल प्रेम ही उन्हें परस्पर मिलाता है। इन दोनों की मित्रता प्राण जाए पर वचन न जाए वाली होती है। ये एक-दूसरे की कमियों को आत्मसात कर लेते हैं, किसी के समक्ष अपने प्रिय की कमियों को प्रकट नहीं करते। इसलिए उन्हें दूसरों के सामने उपहास का पात्र बनने का अवसर नहीं देते। ये सम्बन्ध विश्वास को डोर से बंधे होते हैं।
इसके विपरीत अहित करने वाला व्यक्ति अपना होकर भी पराया बन जाता है। वह दूसरे की आँख की किरकिरी बन जाता है। उसके साथ रक्त का सम्बन्ध ही क्यों न हो, उसे सहन करना कठिन हो जाता है। अहित करने वाला कितना ही प्रिय हो अथवा बहुत ही करीबी हो, उसे मनुष्य अपना शत्रु समझता है। अपने ही यदि शत्रुता करने लगें तो फिर शत्रुओं की क्या आवश्यकता रह जाती है? जो अपना होता है, वह कभी अहित करने वाला नहीं हो सकता।
अब देखिए कि रोग बेशक हमारे शरीर का ही अंश होता है, इस शरीर में ही पैदा होता है। उसके आने का कोई भी कारण हो सकता है। उसका अतिथि या अपने बन्धु की तरह सत्कार नहीं किया जाता। अपना होकर भी वह शरीर को हानि पहुँचाता है। मनुष्य को कष्ट देता है, परेशान करता हैं। इसलिए उसे कोई भी नहीं चाहता। सभी लोग उससे नफरत करते हैं, उसे अपना शत्रु मानते हैं। इस स्थिति में उस समय उपचार करवाना पड़ता है, समय और पैसा खर्च करना पड़ता है।
इसके विपरीत औषधि जंगल में पैदा होती है और उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसे अनेक प्रकार की दवाइयाँ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। परायी होकर भी वह हमारा हित करती है। हमें उन बिमारियों से बचाती है। इससे हमारा स्वास्थ्य लाभ हो पाता है। इसलिए लोग उससे घृणा नहीं करते। उसे खरीदकर लाते हैं, उसे सम्हालकर रखते हैं। फिर उसे खाकर स्वयं को स्वस्थ बनाते हैं। यह कहलाता है अपनापन, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारा हित साधती है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य को वही अपना लगता है जो उसका सच्चा हितैषी होता है। ऐसा साथी जो बिना कहे ही अपने प्रियजन की समस्या को समझ जाए और उसे सान्त्वना दे। उसके सिर पर अपना वरद हस्त रखकर कहे- "मैं हूँ न तुम्हारे साथ। घबराओ मत सब अच्छा होगा।"
इतना आश्वासन यदि किसी मनुष्य को मिल जाए तो उसे हर परिस्थिति में जूझने की शक्ति मिल जाती है। ऐसे हितचिन्तक मनुष्य अपने जीवन में मिल जाएँ तो उन्हें किसी भी मूल्य पर खोना नहीं चाहिए। मानपूर्वक उनका साथ पाने का प्रयास करते रहना चाहिए। यदि कभी कहीं दोनों में कोई गलतफहमी हो जाए तो आमने-सामने बैठकर उसे सुलझा लेना ही बुद्धिमत्ता कहलाती है। यदि कभी झुकना भी पड़ जाए तो अपने हितचिन्तक को मना लेना चाहिए, उससे किनारा करने के विषय में कभी सोचना भी नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 21 जून 2018
मन की स्थितियाँ
मन प्रसन्न है, उत्साहित है, उदास है, निराश है, दुखी है, बेचैन है, मन लग नहीं रहा, कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा आदि सब मन की विभिन्न स्थितियाँ हैं। ये सब समयानुसार बदलती रहती हैं। जैसी मनुष्य की अवस्था होती है, वैसी ही उसके मन की स्थिति होती है। इन स्थितियों का सामना धनवान, निर्धन, राजनेता, अभिनेता, व्यापारी, उच्चपदासीन, साधारण मनुष्य आदि सभी को करना पड़ता है। इसके लिए कारण कोई भी हो सकता है। मानव का यह मन बहुत ही चञ्चल है। वह उसे पल भर भी चैन से नहीं बैठने देता।
मन अलादीन के चिराग से निकले हुए जिन्न की तरह होता है। उसे हर समय कुछ-न-कुछ काम चाहिए। वह खाली बैठेगा तो निश्चित ही उठा-पटक करने लगता है। यदि उसे किसी सकारात्मक कार्य में नियोजित किया जाए तो सोने पर सुहागे जैसा काम हो जाएगा। परन्तु यदि उसे नकारात्मक कार्यों में लगाया जाए तो मनुष्य का पतन अवश्यम्भावी है। उसे निठ्ठला बिठाकर रखना कभी खतरे से खाली नहीं हो सकता। हर समय उसे व्यस्त रखना बहुत आवश्यक होता है। अन्यथा वह सिर पर सवार हो जाता है और मनमाने तरीके से मनुष्य को नचाता रहता है। इस कार्य में तो उसे मानो महारत हासिल है।
चन्द्रमा उसी जल में प्रतिबिम्बित होता है जो जल शान्त है, स्थिर है। यही समस्या मानव मन की भी होती है। समुद्र की लहरों की भाँति विचारों की गहराई मन को निरन्तर स्थिर रखती है। ज्वार भाटा के लहरों के उद्वेग की भाँति मन में भी उथल-पुथल मची रहती है। यह मन कभी शान्त नहीं रह पाता। कभी किसी भी कारण से और कभी बिना वजह वह अशान्त हो जाता है। इसलिए शान्ति वहाँ अधिक समय तक नहीं बनी रह पाती।
कुछ भी सोचने और समझने के लिए मन का मौन रहना नितान्त आवश्यक है। किसी भी विषय पर विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए मन की भूमिका विशेष होती है। विचार शून्यता की स्थिति बहुत ही कठिन होती है। किसी भी साधक के लिए यह उच्चावस्था होती है जो बहुत कठिनता से प्राप्त होती है। साधारण मनुष्य के लिए तो यह असम्भव है। वह इस मन को चाहकर भी साध नहीं सकता। उसके लिए तो यह दूर की कौड़ी है या अंगूर खट्टे वाली स्थिति है।
यह मानव मन है कि मानो मौन रहना जानता ही नहीं। वह तो निरन्तर कुछ-न-कुछ उधेड़-बुन या जोड़-तोड़ में लगा रहता है। इस मन पर कभी सुविचारों का तो कभी कुविचारों का आक्रमण चलता रहता है। यही वह त्रासदी है जिसके कारण व्यक्ति कभी भी शब्दों के जाल से मुक्त नहीं हो पाता। सही अथवा गलत का निर्णय करने में वह चूक जाता है। जीवन की यथार्थता और सार्थकता का बोध वह नहीं कर पाता। वे हैं जो सदा उसकी प्रतीक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाए रहते हैं और यह मन उनसे दूर भागता रहता है।
मन की चञ्चलता मनुष्य के विवेक का हरण कर लेती है। जरा-सी बात हुई नहीं कि यह पिष्टपेषण करने लगता है। इसलिए मनुष्य को अनावश्यक ही क्रोध आने लगता है। यह स्थिति उसे अपनों से दूर करने का कार्य करती है। उस समय क्रोध के आवेग में वह गलत कदम उठा लेता है पर बाद में वही कदम उसकी शर्मिंदगी व पश्चाताप का कारण बन जाता है। पहले ही यदि मन की न सुनकर मनुष्य एक बार पुनः विचार कर ले तो इस प्रकार की दुखदायी परिस्थितियों से वह बच सकता है। उसे अपनों को खोने या अलग होने का दंश नहीं झेलना पड़ता।
मन की उतनी ही सुननी चाहिए, जहाँ तक मनुष्य को हानि न उठानी पड़े। उसे अपने मन में आए हुए कुविचारों को झटककर उनके स्थान पर सुविचारों को ही प्रश्रय देना चाहिए। इससे उसे अपरिहार्य स्थितियों से बचने में सदा सहायता मिलेगी। अपने मन को बलपूर्वक साधकर ही मनुष्य का मन शान्त और प्रसन्न रह सकता है। धीरे-धीरे विपरीत स्थितियाँ उसके अनुकूल होने लगती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 20 जून 2018
योगदिवस
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष-
योग बहुत गहन और गम्भीर विषय है। यह मनुष्य के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। पातञ्जलि विरचित योगशास्त्र का मानना है -
योगश्चित्तवृति: निरोध:।
अर्थात योग चित्त की वृत्तियों को नियन्त्रित करता है।
योग हमारे ऋषि-मुनियों के द्वारा दी गई एक अमूल्य देन है। योग अपने आप में एक समूचा दर्शन है। आजकल कुछ लोग इसे उछल कूद करने का माध्यम समझ रहे हैं जो उचित नहीं है। टीवी के सामने खड़े होकर या सीडी देखकर हाथ-पैरों को हिला लेना मात्र योग बन गया है। जिसको आज ये आधुनिक लोग योगा की संज्ञा देते हैं वास्तव में वह योग नहीं है वे योगासन कहलाते हैं।
योग एक बहुत गंभीर विषय है। इसकी अनुपालना करना इतना सरल कार्य नहीं है। महर्षि पातंजलि ने योगशास्त्र में योग के आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों का पालन करते हुए मनुष्य समाधि के द्वारा ईश्वर को प्राप्त करता है। इनमें पहले पाँच अंगों को बहिरंग कहते हैं और अंतिम तीन को अंतरंग। इन आठ अंगो के कारण ही इसे अष्टांगयोग कहते हैं।
मनुष्य का सारा जीवन व्यतीत हो जाता है यम और नियम का पालन करते हुए पर उनकी पूर्ण रूप से अनुपालना नहीं कर पाते। जिस प्रकार नींव के बिना यदि घर बनाया जाए तो वह बहुत दिन तक टिका नहीं रह सकता उसी प्रकार यम और नियम के बिना समाधि तक पहुँच पाना असंभव होता है। योग की पहली सीढ़ी यम है इसके पालन के बिना नियम की अनुपालना नहीं हो सकती। इन दोनों के पालन से अंत:करण पवित्र होता है। इनके पालन के बिना प्राणायाम भली-भाँति होना कठिन है। अब इन अंगों की संक्षिप्त जानकारी लेते हैं -
1. यम- महर्षि पातंलि योगदर्शन में कहते हैं-
अहिंसासत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:
अर्थात अहिंसा, सत्य, अस्तेय(चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह(संग्रह न करना) ये पाँच यम हैं। मन, वचन व कर्म से इनका पालन करना चाहिए। सारा जीवन ईमानदार कोशिश करने पर भी इनका पालन असंभव-सा है।
2. नियम- योगशास्त्र के अनुसार नियम हैं-
शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्चप्रणिधानानि नियमा:।
अर्थात शौच(तन और मन की स्वच्छता), संतोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान (सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना)। पाँचों नियमों का पालन इन पाँचों यमों के साथ-साथ ही करना होता है।
3. आसन- योगाभ्यास करते समय उपयुक्त आसन का चुनाव करके बैठना चाहिए। साधक प्रायः पद्मासन में ही बैठते हैं। आसन में बैठते समय तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. मेरुदंड, ग्रीवा और मस्तक को बिल्कुल सीधा रखना चाहिए। 2. नासिकाग्र पर या भृकुटि में दृष्टि रखनी चाहिए। 3. यदि आलस्य न सताए तो आँखें मूँदकर बैठ सकते हैं। इस प्रकार योगाभ्यास किया जाता है।
4. प्राणायाम- श्वास के आरोह व अवरोह का निरोध करना प्राणायाम कहलाता है। इसी बात को योगशास्त्र कहता है-
तस्मिन सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:।
देश, काल और संख्या के संबंध से बाह्य (कुम्भक), आभ्यन्तर(रेचक) और स्तम्भन वृत्ति(रोकना) वाले तीनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। प्राणायाम सिद्ध होने पर विवेक को कुंठित करने वाले अज्ञान का नाश होता है और मन स्थिर होता है।
5. प्रत्याहार- अपने-अपने विषय के संयोग से हट जाने और इन्द्रियों का चित्त के रूप में अवस्थित होना प्रत्याहार कहलाता है। प्रत्याहार से इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं और साधक बाह्य ज्ञान से दूर होता जाता है।
6. धारणा- योगशास्त्र कहता है-
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
अर्थात चित्त को किसी भी एक ध्येय स्थान पर स्थित करने को धारणा कहते हैं।
7. ध्यान- ध्यान के विषय में योगशास्त्र ने कहा है-
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।
अर्थात ध्येय वस्तु में चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।
8. समाधि- एकाग्र ध्यान धीरे-धीरे समाधि की ओर प्रवृत्त करता है। तब ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं।
स्थूल पदार्थ में समाधि 'निर्वितर्क' कहलाती है और सूक्ष्म में समाधि 'निर्विचार' कहलाती है। यही समाधि ईश्वर विषयक होने से मुक्ति प्रदान करती है।
इस संक्षिप्त विवेचन से यह समझ आता है कि योग एक बहुत ही गहन विषय है। इसके प्ररंभिक अंगों यम और नियम का पालन आजीवन करना होता है। मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाने वाला है। इसकी अनुपालना करके ही जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिलती है और मनुष्य चौरासी लाख योनियों के फेर से बच जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 19 जून 2018
प्रसन्नता दासी नहीं
प्रसन्नता किसी की दासी नहीं कि वह चाहे तो उसके पास सदा के लिए रह जाए। हर व्यक्ति प्रसन्न रहना चाहता है। कोई नहीं चाहता कि दुख-तकलीफें उसके पास फटकें। समस्या यह है कि प्रसन्नता मनुष्य के पास अधिक समय तक टिक नही पाती। वह आती तो है पर मनुष्य के हाथ से उसी तरह फिसल जाती है जैसे रेत से मछली। इससे जो समझ आता है वह यह है कि खुशियाँ जब आती हैं तब मनुष्य उनमें इतना डूब जाता है कि उसे दीन-दुनिया की खबर नहीं रहती। वह सब कुछ भूलकर मस्ती में डूब जाता है। इसलिए वे क्षण मानो आकर उड़न छू हो जाते हैं। उसे लगता है कि खुशी आई भी और पता ही नहीं चला।
इन खुशियों को समेटने के लिए मनुष्य को लम्बी-चौड़ी योजनाएँ नहीं बनानी पड़तीं। उनके क्रियान्वयन की कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती। बड़ी-बड़ी खुशियाँ मनुष्य के पास यथासमय आती हैं। उसे अपने आसपास तत्कालिक छोटी-छोटी खुशियाँ ढूंढनी चाहिए जिससे वह प्रसन्न रह सके। उसके लिए बस कुछ ठोस कदम उठाकर ही मनुष्य अपनी प्रसन्नता को लम्बे समय तक बनाकर रख सकता है। इस प्रसन्नता को हम तीन श्रेणियों में बाँट सकते हैं।
सबसे पहले शारीरिक प्रसन्नता की बात करते हैं। मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहेगा तो उसे अपने कार्यों को निपटाने में कष्ट नहीं होगा। काया का निरोगी होना मनुष्य के लिए सबसे वरदान है, अमूल्य सुख है। इसे रोगरहित रखने के लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक पौष्टिक खाना खाना चाहिए। जंक फूड से परहेज करना चाहिए। मैं यह नहीं कहती उसे अछूत मानकर उसका तिरस्कार करो। पर प्रतिदिन के खाने में उसे शामिल न करें। सादा और पौष्टिक भोजन खाने से शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर के स्वस्थ रहने से मन प्रफुल्लित रहता है। मन में उत्साह व स्फूर्ति बानी रहती हैं। हर कार्य को करने में मन लगा रहता है।
इसके साथ ही प्रतिदिन नियमपूर्वक समय से आराम करना चाहिए। समय से सोना-जागना शरीर को शिथिल नहीं होने देता। आजकल जीवनशैली में आया परिर्वतन शरीर में विकार लेकर आ रहा है। इससे शरीर में सुस्ती रहती है, किसी काम में मन नहीं लगता। अपने समय में से थोड़ा-समय निकालकर मनुष्य को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए। इससे शरीर का अंग-प्रत्यंग खुलता है। शरीर की मोटरें ठीक से कार्य करने लगती हैं। शरीर में स्फूर्ति बानी रहती है। उचित आहार-विहार और व्यायाम करके शरीर को प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए।
अब हम मानसिक प्रसन्नता की बात करते हैं। अपेक्षाएँ काम रखने से मन शान्त रहता है, इससे मानसिक प्रसन्नता बनी रहती है। जितनी अधिक अपेक्षाएँ मनुष्य पालता है, उतना ही दुखी रहता है। उसे लगता है कि जितना मैं दूसरों के लिए करूँ, उतना ही वे उसके लिए करें। जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सभी परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर चिल्लाता है, उन्हें कोसता है। इससे उसके मन में सकारात्मक विचार दूर होते जाते हैं। उनका स्थान नकारात्मक विचार ले लेते हैं। यहीं से उसके दुखों और परेशानियों का दौर शुरू हो जाता है। वह अपने झूठे अहं के कारण सबसे किनारा कर लेना चाहता है। उसे लगता है कि उसकी हेठी हो गई है जिसे वह सहन नहीं कर पाता। जितना अपने से हो सके दूसरों के लिए करना चाहिए पर बदले में अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य को अपने अहं को वश में करके सदा नकारात्मक विचारों से मुक्त होने का प्रयास करते रहना चाहिए। तभी उसे मानसिक प्रसन्नता मिल सकती है।
अन्त में आध्यात्मिक प्रसन्नता की चर्चा करते हैं। शरीर एक साधन के रूप में मनुष्य को ईश्वर ने दिया है। इस शरीर में विद्यमान आत्मा को प्रभु तक लेकर जाने का यह माध्यम मात्र है। जब मनुष्य शरीर को साध्य मान लेता है तो उसी की सार-सम्हाल में लगा रहता है। सारा समय उसे सजाता रहता है। उस समय वह आत्मा, परमात्मा, जन्म, मृत्यु सब भूल जाता है। जो मनुष्य इस रहस्य को जानकर अपनी आत्मिक उन्नति करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक प्रसन्नता मिलती है।
अन्त में यही कहना चाहती हूँ कि भूतकाल में जो गलतियाँ की हैं उन्हें भूलकर वर्तमान में जीने का अभ्यास करना चाहिए। भविष्य में क्या होगा इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उसे समय के हाथ में सौंप देना चाहिए।
अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रसन्नता की ओर ध्यान देना अनिवार्य है। सदा प्रभु को धन्यवाद देते हुए उससे प्रार्थना करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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