गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

मुँह में राम

बगुला भक्तों के लिए प्रायः कहा जाता है-
              'मुँह में राम बगल में छुरी।'
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
        बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इंसान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? कहते हैं कि जब बगुला जब मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टांग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयंत्र को समझ नहीं सकीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगीं। अब बगुले की मौज हो गई। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
         मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। जौहरी उसका मूल्य स्वयं ही लगा लेता है।
        जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं वे मंदिर में जाकर कितनी भी घंटियाँ बजा लें ईश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय ही भयभीत रहते हैं।
       कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। कहते हैं- 'जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।' नाजायज तरीके से कमाए धन का सभी दुरूपयोग करते हैं।
        मंदिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम लाखों रूपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
       पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
        कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घंटों-घंटों पूजापाठ करते हैं उनका यह सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं- 'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।'
अर्थात जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
         अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से बचना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर सारे आडम्बर कर रहे हैं वह तो सर्वज्ञ है। आँखें बंद कर लेने से जैसे बिल्ली नहीं भाग जाती उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर नहीं जा सकता। अतः बगुला भक्त न बनकर सच्चा भक्त बनें।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

दुनिया चला-चली का मेला

यह दुनिया चला चली का मेला है। निश्चित समय के लिए हम इस संसार में आते हैं। अपना-अपना समय पूर्ण करके हम यहाँ से विदा ले लेते हैं और नयी यात्रा की शुरूआत करते हैं। पुनः पुनः वही क्रम जब तक संसार में अपने आने के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते। वह लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति। जब तक अपना लक्ष्य हम पा नहीं जाते तब तक जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। चौरासी लाख योनियों में भटकते रहते हैं।
        इसे एक कथा से समझते हैं। एक बड़ा सा कक्ष है जहाँ बहुत से द्वार हैं। उन सभी द्वारों में केवल एक ही द्वार खुला हुआ है। एक अंधा मनुष्य उस कमरे में बंद है। वह बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। कमरे की दीवारों को टटोल कर खुले हुए द्वार को ढूँढकर बाहर निकालने का यत्न कर रहा है। बार-बार वह दीवारें टटोलता हुआ ज्योंहि वह खुले हुए दरवाजे तक पहुँचता है उसे खुजली हो जाती है। वह खुजाने लगता है और उसका हाथ दीवार से छूट जाता है। इस तरह वह दरवाजे से आगे निकल जाता है। फिर से वही भटकाव और नयी यात्रा। इस तरह बारंबार उसके साथ घटता है। वह परेशान है, रोता है, चिल्लाता है पर उसकी पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नहीं है जो उसे कक्ष से बाहर निकाल सके।
       इस कथा को पढ़कर अंधे पर गुस्सा आ रहा है न। यदि एकांत में बैठकर मनन करें तो हम समझ जाएंगे कि वह अंधा व्यक्ति कोई और नहीं हम स्वयं हैं। चौरासी लाख योनियों वाले कक्ष में काम, क्रोध, अहंकार, मोह-माया आदि की पट्टी बांध कर हम बार-बार चक्कर लगा रहे हैं। जब एक खुला हुआ मोक्ष का द्वार पास आता है अर्थात् मानव जन्म मिलता है तो विषय-वासनाओं की खुजली के कारण उस द्वार को पारकर आगे निकल जाते हैं। फिर जन्मजन्मान्तर तक इस संसार में भटकते रहते हैं।
      समय रहते यदि हम न जागे तो पता नहीं कब हम उस अवसर को प्राप्त कर सकेंगे जब हम हाथ बढ़ाकर अपना लक्ष्य  छू सकेंगे। इस जन्म-मरण के चक्र से हम ईश्वर की सच्चे मन से की गई प्रार्थना से ही मुक्त हो सकते हैं। अन्ततोगत्वा वही हमारी शरणस्थली है। उसकी गोद में जाकर ही हम सच्चा सुख और शांति पा सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

कुछ कह न पाना

बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य बहुत कुछ कहना चाहता है परन्तु उसके अपने शब्द ही उसका साथ नहीं देते। वह अपने भावों को शब्दों में ढाल नहीं पाता। इसलिए मूक रहकर एकटक ताकता रह जाता है या फिर पैर के नाखूनों से धरती खोदने लगता है। यदाकदा वह नजरें भी चुराने लगता है। उस समय उसका मौन अथवा उसके अश्रु उसकी भाषा बन जाते हैं।
           मनुष्य जब बहुत भावुक होता है तब वह बोल नहीं पाता, सहज होने पर ही अपनी बात बता सकता है। इसी प्रकार अत्यधिक कष्ट के समय भी मनुष्य के बोल उसका साथ छोड़ देते हैं। अधिक खुशी के आवेग में, भय या विस्मय, पश्चाताप आदि के समय भी उसकी आवाज नहीं निकल पाती। उसके चेहरे के भावों से उसके हृदय को पढ़ा जा सकता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि मनुष्य का चेहरा ही उसका आईना कहलाता है, जो उसके सभी प्रकार के मनोगत भावों को बिना कहे प्रकट कर देता है।
           इन सबके अतिरिक्त कई बार दूसरों के प्रति सम्मान भाव के कारण भी मनुष्य चाहते हुए भी प्रतिकार स्वरूप नहीं बोल पाता कि उसे अमुक बात पसन्द नहीं आई। चुप की भी अपनी एक आवाज होती है जो बिना कुछ बोले दूसरे के हृदय को चीर कर रख देती है। मनुष्य के हावभाव से उसका हर्षोल्लास झलकता है जो हर किसी को दिखाई देता है।
           ऐसा भी कहा जाता है कि घमण्डी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। उसके बिना कुछ कहे ही उसके व्यवहार से ही सब ज्ञात हो जाता है। मौन रहते हुए मनुष्य की सफलता-असफलता उसके बारे में बहुत कुछ कह देती हैं।
            पैसे के लिए प्रसिद्ध है कि वह बोलता है। पर पैसा तो निर्जीव है, वह बोल नहीं सकता। इसका यही अर्थ है कि जब किसी भी स्त्रोत से पैसा मनुष्य के पास अधिकता से आता है तब उसकी सद्य: खरीदी जाने वाली सुविधाएँ उसके पास पैसा होने के रहस्य की पोल खोल देती हैं। यहाँ पर भी वाणी के व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती।
           बिना शब्दों का उच्चारण किए भी मनुष्य अपने भावों को व्यक्त करने में समर्थ हो सकता है। यहाँ मैं याद दिलाना चाहती हूँ कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म पाकर भी जब दुर्भाग्यवश मनुष्य को ईश्वर की ओर से वाणी का उपहार नहीं मिलता तब वह गूँगा कहलाता है। वह अपने विचारों को बोलकर प्रकट नहीं कर सकता परन्तु उसके व्यवहार अथवा चेहरे के भावों से ही घर-परिवार के लोग अथवा बन्धु-बान्धव उसके सारे भावों को सहजता से समझ लेते हैं।
          हम अपने घर में मूक पालतू पशुओं को रखते हैं। वे तो हमारी तरह बोल नहीं सकते पर अपने स्पर्श से, अपने हावभाव से मौन रहते हुए अपने प्यार, क्रोध या जिद आदि के भावों को बखूबी समझा देते हैं। इसी प्रकार अपनी भूख-प्यास आदि दैनिक आवश्यकताओं के बारे में भी अच्छी तरह अवगत करवा देते हैं।
         इन्सान जितने भी घण्टे-घड़ियाल बजा ले पर ईश्वर उसे नहीं मिलता। वह तो उसके शुद्ध और पवित्र मन-मन्दिर में ही मिलता है। मनीषी कहते हैं कि ईश्वर भाव में रहता है। कहते हैं जिस प्रकार गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद का बखान नहीं कर सकता वैसे ही हम उस प्रभु का वर्णन नहीं कर सकते। उसका चित्रण करते समय हमारी वाणी 'नैति नैति' कहती है। अर्थात् ईश्वर यह भी नहीं है, वह भी नहीं है।
           चारों ओर पसरा सन्नाटा मनुष्य की कहानी बिन कहे सुना देता है। किसी सज्जन के प्रति किए गए अभद्र व्यवहार की क्षमा न माँगने पर भी उसके अविरल बहते आँसू उसकी क्षमायाचना का कारण बन जाते हैं।
           मौन रहते हुए भी माता-पिता बच्चों को बहुत-सा व्यावहारिक ज्ञान दे देते हैं। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि सारा समय हो-हल्ला करके ही अपनी बात रखी जाए या सान्त्वना दी जाए। मौन रहकर समझाई गई बात भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। उसकी मारक शक्ति अधिक होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

अमर होना

समुद्र मन्थन का आयोजन देवताओं और असुरों ने मिलकर किया था। शेष अन्य रत्नों के साथ विष और अमृत दोनों उससे निकले थे। विष संहारक था, इसलिए कोई भी उसे पीना नहीं चाहता था। अमृत पीकर अमर हुआ जा सकता था, अतः देवासुर सभी उसे पीना चाहते थे। उसके लिए देवताओं और असुरों में झगड़ा भी हुआ। कोई भी अमृत को छोड़ना नहीं चाहता था।
          विचारणीय प्रश्न है कि मनुष्य को यदि अमृत मिल जाए तो क्या उसका पान करना चाहिए? अमृत का पान करने का लाभ क्या है? अमृत को पीकर मनुष्य क्या करेगा? अमर होकर क्या मनुष्य सुखी हो सकता है?
           इन प्रश्नों के उत्तर में मैं एक ही बात काना चाहती हूँ कि अमृत का पान करने का मनुष्य को कोई लाभ नहीं हो सकता। अमर होकर यदि विषय-वासनाओं का गुलाम बनकर रहे तो भी कोई लाभ नहीं होगा। उनसे मुक्ति नहीं मिल सकती। उसके लिए यम-नियम आदि अष्टांग योग का पालन उसे करना ही पड़ेगा। अमृत का पान करके मनुष्य को कदापि सुख नहीं मिल सकता। पूर्वजन्म कृत सभी सुकर्मों और दुष्कर्मों का फल तो उसे फिर भी भुगतना पड़ेगा। उससे मनुष्य को किसी भी सूरत में मुक्ति नहीं मिल सकती। अमृत का पान करके यदि मनुष्य अहंकारी बन जाए तो भी इससे कुछ नहीं होने वाला।
           कहते हैं सिकन्दर उस जल की तलाश कर रहा था, जिसे पीकर मनुष्य अमर हो जाता है। बहुत दिनों तक भटकने के पश्चात उसने आखिरकार उस जगह को खोज लिया था, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो सकती थी। यह सोचते हुए वह प्रसन्न हो गया था कि उसने अमृत की प्राप्ति कर ली है। अब उसे पीकर वह अमर हो जाएगा। उसके समक्ष ही अमृत की पावन धारा बह रही थी। वह अपनी अञ्जलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि उस गुफा के भीतर बैठा बूढ़ा व्यक्ति जोर से चिल्लाया, "रुक जा भाई, यह भूल बिल्कुल मत करना।"
           वह वृद्ध व्यक्ति बहुत बुरी अवस्था में था। सिकन्दर ने उससे कहा, "तू मुझे रोकने वाला होता कौन है?"
          बूढे व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मैं भी तुम्हारी तरह अमृत की तलाश में इस गुफा आया था। मैंने इस अमृत को पी लिया था। अब मैं मरना चाहता हूँ, परन्तु अमर होने कारण मैं मर नहीं सकता। मेरी हालत देख लो। मैं अन्धा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं, अब मैं चीख रहा हूँ, चिल्ला रहा हूँ  कि कोई मुझे मार डाले। पर मेरा दुर्भाग्य कि मुझे मारा भी नहीं जा सकता। अब दिन-रात परमपिता परमात्मा से यही प्रार्थना करता रहता हूँ, "हे प्रभु! मुझे मौत दे दो, मैं जीना नहीं चाहता।"
           यह सुनकर सिकन्दर बिना अमृत पिए चुपचाप गुफा से वापिस लौट गया। वह समझ चुका था कि जीवन का आनन्द उसी समय तक लिया जा सकता है, जब तक मनुष्य उसे भोगने की स्थिति में होता है।
          अतः अपने स्वास्थ्य की रक्षा कीजिए। जितना जीवन मिला है, उसका भरपूर आनन्द उठाइए। दुनिया में सिकन्दर कोई भी नहीं है, बस वक्त ही सबसे बड़ा सिकन्दर है। अमृत का पान करके आसार संसार की सारी ऋतुओं का प्रभाव शरीर पर पड़ेगा। अमर हो जाने के कारण मनुष्य के अपने बन्धु-बान्धव तो सभी साथ छोड़कर चले जाएँगे तो वह अकेला क्या भाड़ झौंकेगा? उसका मरणधर्मा शरीर अशक्त होता जाएगा। उस स्थिति में वह बारम्बार मौत को गले लगाने की गुहार लगता फिरेगा पर मौत उससे मुँह मोड़कर चल देगी।
          जितना जीवन अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर की कृपा से मिला है, उसी का सदुपयोग यदि मनुष्य कर ले तो उसका जन्म सफल हो सकता है। अमृत पाने की चाह में वह
व्यर्थ ही यहाँ वहाँ भटकता रहता है। वास्तविक अमृत स्वरूप उस परमपिता परमात्मा को पाकर मनुष्य धन्य हो सकता है। उसे यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि यही वह समय होता है जब उसे जन्मजन्मान्तर के बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 21 अक्टूबर 2018

दो पक्षी

जीव यानी आत्मा और ईश्वर देखने में एक ही जैसे लगते हैं। इसका कारण यह है कि आत्मा उस परमपिता परमात्मा का एक अंश मात्र है। इसलिए दोनों में समानता अथवा एकरूपता होना स्वाभाविक है। इन दोनों में समानता होते हुए भी भिन्नता है। सबसे बड़ा अन्तर यह है कि परमात्मा अजर, अमर, अविनाशी है जबकि आत्मा बार-बार जन्म लेती है। कहते हैं चौरासी लाख योनियों में अपने कर्मानुसार आत्मा जन्म लेती है। वह जन्म और मरण के इस चक्र में भटकती रहती है।
          ऋग्वेद में एक मन्त्र आया है जिसमे वर्णन किया गया है कि जीव और ईश्वर एक ही वृक्ष पर ही बैठे हैं। आत्मा यानी जीव उस वृक्ष के खट्टे-मीठे फल खाता है जबकि परमात्मा मूक दर्शक बना देखता रहता है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वादवत्त्यनश्ननन्यो अभिचाक शीति॥
अर्थात दो सुंदर पंखों वाले पक्षी, साथ-साथ एकसाथ एक वृक्ष पर बैठे हुए हैं, एक दूसरे के सखा हैं। एक वृक्ष को वे सब ओर से घेरे हुए हैं। उनमें से एक आत्मा वृक्ष के फल को बड़े स्वाद से खा रहा है, दूसरा बिना चखे, सब कुछ साक्षी भाव से सिर्फ़ देख रहा है।
          इस मन्त्र में एक दृष्टान्त के माध्यम से जीवात्मा और परमात्मा के सम्बन्ध के विषय में  समझने का प्रयास किया है। ये दोनों पक्षी हैं और प्रकृति वृक्ष है। कर्मफल इस वृक्ष का फल है। जीवात्मा का काम है कर्म करते रहना, इसलिए उसे जीवनकाल में कर्मफल मिलता है। परमात्मा प्रकृति से आसक्त हुए बिना, साक्षी भाव से जीव और प्रकृति को देख रहा है यानी वह केवल द्रष्टा मात्र है।
       ऋग्वेद का यह मन्त्र हमें समझा रहा है कि प्रकृति रूपी वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं- जीवात्मा जो कर्म करता है और वृक्ष रूपी प्रकृति का फल चखता है। दूसरा पक्षी परमात्मा इस क्रम से निर्लिप्त रहता है, वह फल नहीं चखता। न
वह कर्ता है और न ही भोक्ता है। यह मन्त्र हमारे समक्ष इस सत्य को उजागर करता है कि ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीनों अनादि और अनन्त हैं।
         मजे की बात यह है कि जब फल जीव को वृक्ष द्वारा ही प्राप्त हेते हैं तो फिर भी वह बाहर नजरें गड़ाए बैठा रहता है। इन्द्रियों से, मन से, बुद्धि से उसे जो भी प्राप्त होता है वह इस शरीर के भीतर ही प्राप्त होना है। दोनों प्रकार भोग के फल व मित्र उसे इस शरीर के भीतर ही उसे मिलते हैं।
         वह बाहर फल खाने के लिए भागता है तो उसे लगता है कि परमात्मा रूपी मित्र भी बाहर ही मिलेगा। उसे अपने भीतर कुछ झाँकने की आदत ही नहीं है। बाहर उसकी पहुँच केवल फलदार उस वृक्ष तक ही सीमित है। उसे भगवान बाहर नहीं मिल सकता वह केवल तभी दिख सकता है जब उसके भीतर के नेत्र खुले हों।
           इस मन्त्र का निष्कर्ष यह निकलता है कि जीव प्रातःकाल और साँयकाल प्रभु के सान्निध्य में बैठे। ईश्वर उसके अन्तस में सदा विद्यमान है। जीव यानी मनुष्य दिन भर अपने कार्य करता रहे अथवा शरीर रूपी फलों का रसास्वादन करता रहे। आवश्यकता पड़ने पर वह प्रभु से सहायता पाने के लिये अपने भीतर कभी भी झाँक सकता है। पर सन्ध्या समय होते ही सांसारिक कार्य कलापों को बिसराकर अपने सखा उस मालिक की शरण में अवश्य लौट आना चाहिए। इससे उसे अपने मित्र की आनन्दमयी मित्रता का सुख मिलता रहेगा। उस पर मालिक की कृपा सदा बरसती रहेगी।
          यहाँ एक पक्षी का उदाहरण लेते हैं। पक्षी सारा दिन भोजन की तलाश में घूमते रहते हैं और खाते रहते हैं, परन्तु साँय होते ही वे अपने-अपने घोंसलों में लौट आते हैं। फिर प्रात: होते ही घोंसले से बाहर अपने भोजन की तलाश में बाहर निकल जाते हैं।
         पक्षी की ही तरह हम भी अपने घोंसले यानी अपने घर से प्रात: निकलते हैं और शाम होते ही उसमें वापिस लौट आते हैं। यह तो हुई इस भौतिक जगत के घर की बात है। मनुष्य का वास्तविक घर प्रभु की शरण है। वहाँ जाकर वह सच्चा विश्राम पा सकता है। मनुष्य ईश्वर से जितना दूर जा रहा है, उतना ही वह कष्ट पा रहा है।
          दिनभर कर्मफल का भोग करने के पश्चात आत्मा को अपने मित्र परमात्मा की शरण में आ जाना चाहिए। अपनी दिन भर में एकत्र हुई सभी चिन्ताओं को उस प्रभु से साझा करके, उनसे मुक्ति पाई जा सकती है। उस परममित्र के साथ समय व्यतीत करने पर मनुष्य जीवन में वास्तविक आनन्द को प्राप्त होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

प्रेम का मार्ग

प्रेम का रास्ता बहुत ही कष्टकर होता है। इसके साथ-साथ बहुत तग अथवा संकरा भी होता है। एक समय में इसमें से एक ही व्यक्ति गुजर सकता है, दो नहीं। इसी भाव को दोहे के इस अंश में कहा गया है-
          प्रेम गली अति सांकरी जा में दो न समाए।
अर्थात् प्रेम की गली में बहुत संकरी है, उसमें इतना स्थान ही नहीं है कि उसमें से दो लोग एकसाथ समा सकें।
         जब तक दो व्यक्तियों में तेरा और मेरा का भाव रहेगा तब तक प्रेम नहीं हो ही नहीं सकता। जब वे दो जिस्म और एक जान बन जाते हैं तब सही मायने में प्यार होता है। यह बहुत ही गूढ़ विषय है। जब दो लोगों में ऐसा प्यार हो जाता है तो वहाँ समर्पण की भावना होती है। वे दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को बिन कहे और बिन सुने समझ जाते हैं। मीलों दूर बैठे हुए भी एक-दूसरे की खैर-खबर रख सकते हैं, जिसे हम टेलीपैथी कहते हैं। वह उनमें स्वत: विकसित हो जाती है।
          यह सब दुधारी तलवार की धार पर चलने के समान होता है। जहाँ चूक हो गई वहाँ मनुष्य चोट खा लेता है। फिर उसे सुधारने में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं।
         प्रेम की यह गहरी परिभाषा है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार से दो अलग-अलग शख्सियत बनकर इस मार्ग में नहीं रहा जा सकता है। सच्चा प्रेम अपने अस्तित्व को अर्थात् स्व को मिटाकर दूसरे में एक हो जाना होता है। यह सम्बन्ध प्रतिदान नहीं माँगता बल्कि पूर्ण समर्पण भाव इसमें होता है।
         प्रेम कुछ लेना नहीं जानता, वह तो बस देना ही जानता है। इसीलिए सबको अपना बना लेता है। यदि लेनदेन की या बदले की भावना यहाँ हावी गई तो फिर वह प्रेम नहीं रह जाता बल्कि व्यापार बन जाता है। इस प्रेम को विशुद्ध ही रहने दें, इसमें विष न घोलें।
         पति-पत्नि का प्रेम भी सही मायने में ऐसा ही होना चाहिए। दोनों में तेरा-मेरा न होकर हमारा होना चाहिए। दोनों के सुख-दुख सब एक होने चाहिए। जब तक तन, मन और धन से वे दोनों एक नहीं होंगे उनका प्रेम अधूरा रहेगा। परस्पर का यह अधूरापन हमेशा नुकसान देता है।
         दोनों में समझौता हो जाना कोई शुभ लक्षण नहीं है। जहाँ समझौता टूटा वहीं पर बिखराव होने लगता है। तब परिवार टूटने लगते हैं और आपसी सम्बन्ध दरकने लगते हैं। लम्बे समय तक दोनों को साथ निभाना होता है। इसलिए जीवन में परस्पर प्रेम और  विश्वास को बनाए रखना पति-पत्नि दोनों का कर्त्तव्य है।
          आज युवा पीढ़ी ने इस प्यार को एक व्यापार बना दिया है। उनके लिए इस प्यार के मायने केवल मौज-मस्ती है।प्यार के नाम पर वे उच्छृंखल बनते जा रहे हैं। जहाँ तक उनका स्वार्थ पूरा होता रहता है, बस वहीं तक प्यार होता है। उसके बाद फिर तू कौन और मैं कौन? वे इस बात को बिल्कुल भूल गए हैं कि प्यार देने और समर्पण का नाम है। इसमें स्वार्थ का कोई काम नहीं है।
          एकपक्षीय प्रेम सदा ही घातक होता है। इसके चक्कर में हत्याएँ व आत्महत्याएँ भी हो जाती हैं। एसिड अटैक भी इसी का ही परिणाम है। यथासम्भव इससे बचना चाहिए और दूसरो को बचाना चाहिए।
           ईश्वर से प्रेम का आधार भी पूर्ण समर्पण है। उससे लौ लगाने का अर्थ है उसमें एकाकार हो जाना। यह वही प्यार है जो मीराबाई ने दुनिया की परवाह न करके अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर भगवान कृष्ण से किया। राधा ने भी सच्चे मन से भगवान कृष्ण से नाता जोड़ा। हमारे ऋषि-मुनि इसी प्यार की बदौलत असार संसार के सारे कारोबार से स्वयं को विलग कर लेते हैं।
          जब तक इस प्यार में तड़प न हो, तब तक मनुष्य इस संकरे रास्ते पर चल ही नहीं सकता। दोनों के मैं को छोड़े बिना यह पवित्र प्रेम सम्भव नहीं है।
चन्द्र प्रभा सूद
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